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विश्व पुस्तक मेले में गुरमीत बेदी का नया काव्य संग्रह

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ऊना, 5 जनवरी –
हिमाचल के साहित्य जगत के लिए नया साल एक सुखद खबर लेकर आया है । हिमाचल साहित्य
अकादमी अवार्ड से पुरस्कृत कवि व ऊना के जिला लोक संपर्क अधिकारी गुरमीत बेदी का
दूसरा कविता संग्रह “मेरी ही कोई आकृति ” नई दिल्ली में 7 जनवरी से शुरू
हो रहे विश्व पुस्तक मेला का हिस्सा बनने जा रहा है। इस संग्रह की भूमिका पदमश्री
से अलंकृत देश के वरिष्ठतम कवि लीलाधर जगूड़ी ने लिखी है और भावना प्रकाशन ने इसे
प्रकाशित किया है। बेदी का यह दूसरा काव्य संग्रह 23 साल के लम्बे अंतराल के बाद
प्रकाशित हुआ है.
      
इससे पूर्व 1994 में गुरमीत बेदी का पहला कविता संग्रह “मौसम का
तकाजा” प्रकाशित हुआ था और इसे हिमाचल साहित्य अकादमी अवार्ड से नवाजा गया
था। गुरमीत बेदी ने देश के साहित्यिक परिदृश्य में कवि
, कहानीकार व व्यंग्यकार के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई है और इन सभी
विधाओं में उनकी 8 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें तीन व्यंग्य संग्रह
,
दो कविता संग्रह , दो कहानी संग्रह और एक शोध
की पुस्तक शामिल है। गुरमीत बेदी के तीन उपन्यास भी धारावाहिक रूप से प्रकाशित व
चर्चित हुए हैं।
     
गुरमीत बेदी विदेशों में भी कविता व व्यंग्य पाठ करके हिमाचल प्रदेश का
गौरव बढ़ा चुके हैं और उन्हें विदेशों में सम्मानित भी किया गया है। तीन वर्ष
पूर्व उन्हें जर्मनी के बर्लिन में आयोजित वर्ल्ड पोइट्री फेस्टिवल में भी
आमंत्रित किया गया था । उन्हें व्यंग्य संग्रह “नाक का सवाल” के लिए
कनाडा का विरसा अवार्ड भी मिल चुका है। पिछले साल गुरमीत बेदी मॉरीशस में कविता
पाठ के लिए गए थे।
   
गौरतलब है कि 3 महीने पहले ही गुरमीत बेदी का कहानी संग्रह “सूखे
पत्तों का राग” प्रकाशित होकर आया है जिसकी समीक्षा व चर्चा लगातार देश की
प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में हो रही है। गुरमीत बेदी के व्यंग्य के कॉलम भी देश
की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में बड़े चाव से पढ़े जाते हैं ।

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डॉ. राकेश जोशी की ग़ज़लें

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1
हर नदी के पास वाला घर तुम्हारा
आसमां में जो भी तारा हर तुम्हारा
बाढ़ आई तो हमारे घर बहे
बन गई बिजली तो जगमग घर तुम्हारा
तुम अभी भी आँकड़ों को गढ़ रहे हो
देश भूखा सो गया है पर तुम्हारा
कोई भी तुमको मदारी क्यों कहेगा
छोड़कर जाएगा जब बन्दर तुम्हारा
ये ज़मीं इक दिन उसी के नाम पर थी
वो जिसे कहते हो तुम नौकर तुम्हारा
दूर उस फुटपाथ पर जो सो रहा है
उसके कदमों में झुकेगा सर तुम्हारा
2
बादल गरजे तो डरते हैं नए-पुराने सारे लोग
गाँव छोड़कर चले गए हैं कहाँ न जाने सारे लोग
खेत हमारे नहीं बिकेंगे औने-पौने दामों में
मिलकर आए हैं पेड़ों को यही बताने सारे लोग
मैंने जब-जब कहा वफ़ा और प्यार है धरती पर अब
भी
नाम तुम्हारा लेकर आए मुझे चिढ़ाने सारे लोग
गाँव में इक दिन एक अँधेरा डरा रहा था जब सबको
खूब उजाला लेकर पहुँचे उसे भगाने सारे लोग
भूखे बच्चे, भीख
माँगते कचरा बीन रहे लेकिन
नहीं निकलते इनका बचपन कभी बचाने सारे लोग
धरती पर खुद आग लगाकर भाग रहे जंगल-जंगल
ढूँढ रहे हैं मंगल पर अब नए ठिकाने सारे लोग
इनको भीड़ बने रहने की आदत है, ये याद रखो
अब आंदोलन में आए हैं समय बिताने सारे लोग
चिड़ियों के पंखों पर लिखकर आज कोई चिट्ठी
भेजो
ऊब गए है वही पुराने सुनकर गाने सारे लोग
3
हमें हर ओर दिख जाएं, ये कचरा बीनते बच्चे
भुलाए किस तरह जाएं, ये कचरा बीनते बच्चे
यही है क्या वो आज़ादी कि जिसके ख़्वाब देखे थे
ये कूड़ा ढूँढती माँएं, ये कचरा बीनते बच्चे
तरक्की की कहानी तो सुनाई जा रही है पर
न इसमें क्यों जगह पाएं, ये कचरा बीनते बच्चे
ये बचपन ढूँढते अपना, इन्हीं कचरे के ढेरों में
खिलौने देख ललचाएं, ये कचरा बीनते बच्चे
वो जिनके हाथ में लाखों-करोड़ों योजनाएँ हैं
उन्हें भी तो नज़र आएं, ये कचरा बीनते बच्चे
वो जिस आकाश से बरसा है, इन पर आग और पानी
उसी आकाश पर छाएं, ये कचरा बीनते बच्चे
वो तितली जिसके पंखों में, मैं सच्चे रंग भरता हूँ
कहीं उसको भी मिल जाएं, ये कचरा बीनते बच्चे
कभी ऐसा भी दिन आए, अंधेरों से निकलकर फिर
किताबें ढूँढने जाएं, ये कचरा बीनते बच्चे
4
सूखा आया तो कुछ तनकर बैठ गए
बाढ़ जो आई और अकड़कर बैठ गए
माँ की याद आने पर सारे लोग बड़े
छोटे-छोटे बच्चे बनकर बैठ गए
जिनके पैरों में थोड़ी हिम्मत कम है
वो तो थोड़ी देर ही चलकर बैठ गए
मंच पे रक्खी सबसे ऊंची कुर्सी पर
मंत्री जी जब गए तो अफसर बैठ गए
वो सच्चाई के हक में चिल्लाएंगे
वो हम जैसे नहीं कि डरकर बैठ गए
ज़िक्र वफ़ा का आया तो हम सब-के-सब
दीवारों के पीछे छुपकर बैठ गए
4
जो इस कोने में आओ तुम कभी क़व्वालियां लेकर
मिलूंगा चाय की खुशबू-भरी मैं प्यालियां लेकर
किसी के बोल देने से कोई छोटा नहीं होता
नहीं होता बड़ा कोई किसी को गालियां देकर
कोई देता है कम्प्यूटर, कोई देता मोबाइल है
खड़े सब भूख के मारे हैं खाली थालियां लेकर
जहाँ जम्हूरियत का ये तमाशा रोज़  होता है
वहाँ मैं रोज़ जाता हूं, बहुत-सी तालियां लेकर
जो इन बंज़र ज़मीनों पर चलता हल मिले तुमको
उसे गेहूँ की तुम आना वो पहली बालियां देकर
बुझे सपनो, बुझे चूल्हो,
डरे लोगो, ज़रा सुन लो
मैं फिर से आ रहा हूँ आग और चिंगारियां लेकर
5
धरती के जिस भी कोने में तुम जाओ
वहाँ कबूतर से कह दो तुम भी आओ
अगर आग से दुनिया फिर से उगती है
जंगल-जंगल आग लगाकर आ जाओ
बादल से पूछो, तुम
इतना क्यों बरसे
कह दो, लोगों की
आँखों में मत आओ
गूंगे बनकर बैठे थे तुम बरसों से
अब सड़कों पर निकलो, दौड़ो, चिल्लाओ
महल में राजा के कल फिर से दावत है
भूखे-प्यासे लोगो, अब तुम सो जाओ
फसलो, तुमसे बस
इतनी-सी विनती है
सेठों के गोदामों में तुम मत जाओ
6
जगमगाती शाम लेकर आ गया हूँ
मत डरो, पैग़ाम लेकर
आ गया हूँ
हम सभी गद्दार हैं, हक़ माँगते हैं
सर पे ये इल्ज़ाम लेकर आ गया हूँ
फिर गरीबों को उदासी बाँटकर
मैं ज़रा आराम लेकर आ गया हूँ
सब यहाँ तलवार लेकर आ गए हैं
मैं तुम्हारा नाम लेकर आ गया हूँ
आत्मा तुमने बहुत सस्ते में बेची
मैं तो ऊँचे दाम लेकर आ गया हूँ
आज अपने साथ मैं रोटी नहीं
कुछ ज़रूरी काम लेकर आ गया हूँ
7
हर तरफ गहरी नदी है, क्या करें
तैरना आता नहीं है, क्या करें
ज़िंदगी, हम फिर से
जीना चाहते हैं
पर सड़क फिर खुद गई है, क्या करें
यूं तो सब कुछ है नए इस नगर में
पर तुम्हारा घर नहीं है, क्या करें
पेड़, मुझको याद
आए तुम बहुत
आग जंगल में लगी है, क्या करें
लौटकर हम फिर शहर में आ गए
फिर भी इसमें कुछ कमी है, क्या करें
तुमसे मिल पाया नहीं, बेबस हूँ मैं
और बेबस ये सदी है, क्या करें
8
डीज़ल ने आग लगाई है, फिर भी ज़िंदा हूँ
खूब बढ़ी महंगाई है, फिर भी ज़िंदा हूँ
पत्थर बनकर पड़ा हुआ हूँ धरती पर
याद तुम्हारी आई है, फिर भी ज़िंदा हूँ
बहुत उदासी का मौसम है ख़ामोशी है
मीलों तक तन्हाई है, फिर भी ज़िंदा हूँ
खेतों में फसलों के सपने देख रहा हूँ
नींद नहीं आ पाई है, फिर भी ज़िंदा हूँ
एक कुआँ है कई युगों से मेरे पीछे
आगे गहरी खाई है, फिर भी ज़िंदा हूँ
सरकारों ने कहा गरीबों की बस्ती में
खूब अमीरी आई है, फिर भी ज़िंदा हूँ
जंगल-जंगल आग लगी है और तुम्हारी
चिट्ठी फिर से आई है, फिर भी ज़िंदा हूँ
9
हर तरफ भारी तबाही हो गई है
ये ज़मीं फिर आततायी हो गई है
कुछ नए क़ानून ऐसे बन गए हैं
आज भी उनकी कमाई हो गई है
जब से हम पर्वत से मिलकर आ गए हैं
ऊँट की तो जग-हँसाई हो गई है
फिर किसानों को कोई चिठ्ठी मिली है
फिर से ये धरती पराई हो गई है
मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ
बीच में गहरी-सी खाई हो गई है
वो तो बच्चों को पढ़ाना चाहता है
पर बहुत महंगी पढ़ाई हो गई है
10
कैसे-कैसे लोग शहर में रहते हैं
जलता है जब शहर तो घर में रहते हैं
जाने क्यों इस धरती के इस हिस्से के
अक्सर सारे लोग सफ़र में रहते हैं
भूख से मरते लोगों की इस दुनिया में
राजा-रानी रोज़ ख़बर में रहते हैं
दौर नया है, जिसमें
हम सबके सपने
दबकर फाइल में, दफ्तर
में रहते हैं
जनता जब मिलकर चलती है सड़कों पर
दरबारों में लोग फ़िकर में रहते हैं
वो जो इक दिन इस दुनिया को बदलेंगे
मेरी बस्ती, गाँव,
नगर में रहते हैं
डॉ. राकेश जोशी
सम्पर्क:
डॉ. राकेश जोशी
असिस्टेंट प्रोफेसर (अंग्रेजी)
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डोईवाला
देहरादून, उत्तराखंड
डॉ. राकेश जोशी
परिचय:
अंग्रेजी साहित्य में एम. ए., एम. फ़िल., डी. फ़िल. डॉ. राकेश जोशी मूलतः
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड
में
अंग्रेजी साहित्य के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.
इससे पूर्व वे कर्मचारी
भविष्य निधि संगठन, श्रम मंत्रालय, भारत सरकार में हिंदी अनुवादक के पद
पर मुंबई में कार्यरत रहे. मुंबई में ही
उन्होंने थोड़े समय के लिए
आकाशवाणी विविध भारती में आकस्मिक उद्घोषक के
तौर पर भी कार्य किया. उनकी
कविताएँ अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय
पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने
के साथ-साथ आकाशवाणी से भी प्रसारित हुई हैं.
उनकी एक काव्य-पुस्तिका
“कुछ बातें कविताओं में”, एक ग़ज़ल संग्रह पत्थरों के शहर में”, तथा
हिंदी से अंग्रेजी में अनूदित एक पुस्तक द क्राउड बेअर्स विटनेसअब तक
प्रकाशित हुई है. डॉ. राकेश जोशी की ग़ज़लों
को दुष्यंत की परंपरा को आगे
बढ़ाने वाली ग़ज़लें माना जाता है. उनकी
ग़ज़लों में आम-जन की
पीड़ा एवं संघर्ष को सशक्त अभिव्यक्ति मिलती
है
,
इसलिए ये आज के इस दौर
में भीड़ से बिलकुल अलग खड़ी नज़र आती हैं.

सच्चिदानंद जोशी की लोकप्रिय कहानियाँ

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यह कहानी संग्रह प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। राष्ट्रीय पुस्तक मेले में इसका लोकार्पण 14 जनवरी को सायं 4 बजे प्रभात प्रकाशन के स्टाल पर किया जाएगा.

दलित स्त्री लेखन की उपलब्धियां और सम्भावनाएँ

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“दलित स्त्री लेखन की उपलब्धियां और सम्भावनाएँ”

 

-तुपसाखरे श्यामराव पुंडलिक
हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद,
पीन- 500046

दलित स्त्री की लेखन प्रक्रिया में एक तरफ जहां आशावाद की किरणें नजर आती हैं तो दूसरी ओर दलित आदिवासी तथा स्त्री की गरीबी, निर्बलता और विवसता भी दिखाई देने लगती है, साथ ही दलित स्त्री के उपर होनेवाले प्रतिदिन की घटनाएं बढते अन्याय-अत्याचार साफ तरह से दिखाई देते हैं। इस आलेख में दलित स्त्री लेखन की उपलब्धियां क्या रही है और आगे क्या सम्भावनाएं हो सकती है इस पर प्रकाश डालने की कोशिश की जा रही है।

दलित स्त्री लेखने एक आंदोलन की भांति है उसमें आदोलन की अधिक दिशा नजर आने लगती है। दलित कवयित्रियां लेखन के साथ-साथ आंदोलन को भी महत्व देने में आगे आने लगी है। कहना होगा कि दलित स्त्री लेखन एक आंदोलन है, जिसमें उनके उपर हुए अन्याय-अत्याचार को उद्वेलित करने का कार्य हो रहा है। दलित स्त्री के हीत में अनेक संगठन कार्य में लगे हुए है और उसमें दलित लेखिकाओं की भागीदारी विशेष है। दलित महिलाओं के आंदोलन पर पीटर जे. स्मिथ का कहना है कि, “यह आंदोलन अब विश्व व्यापी बन चूका है।”[1] उनका मानना है कि, आज दलित स्त्री संगठन में जो विश्वव्यापी प्रवृत्ति निर्माण हुई है उसके पीछे का कारण उनके द्वारा निर्मित मानव अधिकारों की मूल्यों को अपनाना है। दलित स्त्री लेखन के मूल्यों में समता, स्वतंत्रता का सबसे अधिक स्थान दिखाई देता है। दलित स्त्री लेखन आंदोलन का नया पाडाव है। केवल इसे नया कहना ही पर्याप्त नहीं है यह भारतीय सामाजिक कुव्यवस्था के विरोध में लेखन परम्परा का ऐतिहासिक दस्तावेज है। प्रो.बजरंग विहारी तिवारी दलित स्त्री लेखन और दलित नारीवाद को स्पष्ट करते हुए लिखते है, कि “दलित नारीवादी दलित स्त्रियों द्वारा अपनी स्थिति को अलग से रेखांकित किए जाने के बाद उभरा है। वैसे तो दलित स्त्रियां कमोबेश दलित लेखन के शुरुआत से ही सक्रिय रही हैं। लेकिन दलित नारीवाद बाद का विकास है । जाति और लिंग के सम्मिलित बोध ने दलित नारीवाद की वैचारिक जमिन तयार की है।”[2] दलित नारीवाद को दलित लेखन से भिन्न एक अलग श्रेणी में रखना चाहिए या नहीं यह विवाद का विषय है परन्तु दलित साहित्य से दलित स्त्री लेखन को अलग कैटेगरी में रखना नहीं चाहिए, उसे दलित लेखन के भीतर में ही रखा गया ताकि दलित साहित्य में एकता टिकी रहे। दलित स्त्री लेखन को अलग से स्वीकृति मिलने के बाद व्यापक दलित एकता टूटेगी दलित साहित्य का मुख्य हेतू हासिल करने में बादा उत्पन्न होगी साथ ही दलित आंदोलन कमजोर होगा। दलित स्त्रियों की अनेक समस्याएं दलित साहित्य में नहीं आ रही है इसलिए दलित स्त्री को अलग से अपनी लेखनी चलाना पडा। इस लेखन को देखकर कुछ साहित्यकार है जिन्होंने दलित स्त्री लेखन पर अलग से विचार नहीं होना चाहिए इतना ही नहीं बल्कि उसे दलित आंदोलन और लेखन में विशेष अहमियत भी नहीं मिलनी चाहिए। ऐसी सोच को बजरंग बिहारी तिवारी जवाब के तौर पर लिखना चाहते है कि, “इस समझ के बरक्स दलित नारीवाद की पैरोकार लेखिकाएं पितृसत्ता के प्रश्नो को जाति समस्या के बराबर रखती है । वे जानते है कि, दलित साहित्य को साहित्य की एक भिन्न और स्वतंत्र कैटिगरी के रुप में स्वीकृति आसानी से नहीं मिली है दलित लेखकों ने तमाम अवरोंधो, निषेधकारी तर्को को पार करके ही वांछित स्वीकृति पाई है। तो तर्क दलित साहित्य को स्वीकृति दिलाने के लिए प्रस्तुत किए गए वही दलित नारीवादी साहित्य के संदर्भ में भी लागू होता है।”[3] दलित महिलाओं का शोषण सर्वाधिक हुआ है लेकिन साहित्य की मुख्यधारा में उनका जीवन अनुपस्थित रहा है, मुख्यधारा की बात छोडिए दलित साहित्य में भी वह पर्याप्त प्रतिनिधित्व की भागीदार नहीं बन पाई है। जिस प्रकार दलित साहित्य को रचने के लिए दलितों की पीडा की स्वानुभूति की आवश्यकता लगी है ठिक वैसे ही दलित स्त्री लेखन की सर्जना को भी दलित स्त्री की पीडा, यातनाओं की स्वानुभूति की आवश्यकता अनिवार्य ही होगी। दलित स्त्रियां जाति और पितृसत्ता दोनों का सम्मिलित अत्याचार झेलती है। इसलिए उनका अनुभव दूसरों से भिन्न और विशिष्ट है। दलित स्त्री लेखन के द्वारा भारतीय समाज व्यवस्था के सामने ऐसे अनेक अप्रत्याशित, अनसुने और आधारभूत सवाल किए साथ ही उसने दलित लेखकों, विचारों व कार्यकर्ताओं के समक्ष ऐसे-ऐसे जटिल सवाल प्रस्तुत किए उस सवाल के जवाब देने में नाकाम हो जाते हैं। इतना सब कुछ होने के बावजूद बजरंग बिहारी तिवारी जैसे विचारक भी स्त्री लेखन को अभी भी प्रारंभिक अवस्था में रखते हुए दिखाई देते है, उन्होंने स्पष्ट लिखा है, “इस स्थिति में जाति विरोधी संघर्ष को सपाट होने से बचाया और विचार के नए आयाय तथा संघर्ष के नए मोर्चे खोले दलित नारीवाद बुनियादी सवालों को लेकर चला है और यह समाज की बुनियाद की बदलने की क्षमता रखता है। क्योंकि दलित नारीवाद अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही है। इसलिए उसकी क्षमताओं का ठीक-ठीक आकलन इस वक्त नहीं किया जा सकता।”[4]

इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि, दलित स्त्री लेखन का प्रारंभिक दौर शुरु है, साथ ही दलित स्त्री संगठित होने, आंदोलनों को चलाने का सीधा मतलब स्त्री जीवन की स्थिति में परिवर्तन की शुरुआत हुई है।

दलित स्त्री लेखन की उपलब्धियां

हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण उपलब्धी है कि दलित स्त्री का लेखन प्रक्रिया में आना। उन्होंने अपने अनुभव स्वत: रचनाओं के माध्यम से समाज के सामने रखने की सफल कोशिश करने में तत्पर है। वैसे हिंदी दलित स्त्री लेखन में अनेक कमियां है परन्तु उन कमियों को दूर करने के प्रयत्न जारी है। केवल ऐसा नहीं बल्कि उनके लेखन की कुछ उपलब्धियां भी सामने आती है उसे चित्रित करना महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि अनिवार्य है। कारण ऐसा करने से दलित स्त्री लेखन की दिशा और दशा को भी तय किया जा सकता है।

दलित स्त्रियों का कारवां

दलित स्त्री लेखन की उपलब्धियां रही है कि वह लेखन के साथ-साथ स्वयं दलित आंदोलन को साथ लेकर चलने में अपनी सार्थक भूमिका अदा करती है। डॉ. अम्बेडकर भारतीय साहित्य के साथ-साथ विदेशी साहित्य के अच्छे जानकार थे उन्होंने अध्ययन में पाया कि विदेश में स्त्रियों को किस प्रकार स्वतंत्रता प्राप्त है और भारत में स्त्री जीवन की क्या हालत है। साहित्य अध्ययन के दौरान हमारे सामने कई उदाहरण है जिसमें बुद्ध की थेरियों से लेकर सावित्रीमाई फुले व अन्य उनकी कई महिला मित्र थी जिन्होंने स्वयं पढ-लिखकर बाद में समाज के विकास और परिवर्तन के लिए कार्य किया है। आगे जाकर डॉ. अम्बेडकर के समय का काल स्त्रियों के लिए सवर्ण काल समझा जाता है। कारण उनके साथ दलित स्त्रियों का कारवां बढकर आगे आने लगा और अपने हक एवं अधिकारों की मांग करने लगा। अनिता भारती लिखती है, “डॉ. अम्बेडकर के समय में चले दलित आंदोलन में लाखों-लाख शिक्षित-अशिक्षित, घरेलू, गरीब मजदूर, किसान व दलित शोषित महिलाएं जुडीं। जिन्होंने जिस निर्भीकता बेबाकी और उत्साह से दलित आंदोलन में भागीदारी निभाई वह अभूतपूर्व थी। दलित महिला आंदोलन और डॉ. अम्बेडकर के साथ महिला आंदोलन की सुसंगत शुरुआत 1920 से मान सकते हैं हालांकि सुगबुगाहट सन 1913 से ही हो गई थी।”[5] 1920 में ‘भारतीय बहिष्कृत परिषद’ की सभा में शाहू महाराज की अध्यक्षता में हुई सभा में पहली बार दलित महिलाओं ने भाग लेकर अपनी उपस्थिति दर्ज की थी। उस सभा में तुलसीबाई बनसोडे और रुकमणिबाई लडकियों को उनकी भाषा में शिक्षा की ताकत का महत्व बताकर उनमें परिवर्तन की जोति जगाई। आगे चलकर देशभर में स्त्री कारवां दलित महिला आंदोलन के रुप में आकार ले रहा दिखाई देने लगा। तभी 20 जुलाई 1924 ई. में मुंबई में आयोजित ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना की गई। “बहिष्कृत हितकारिणी सभा की अधिसंख्य सभाएं जो जगह-जगह गांव देहातों में आयोजित की जाती थी। उनमें दलित महिलाओं की उपस्थिति लगातार रही है। इस समय दलित महिलाएं अपने समाज और परिवार जनित पीडा को सार्वजनिक रुप से अभिव्यक्त कर रही थीं। पर उनकी अभिव्यक्ति अधिकतर गानों व स्वागत गान रुप में ही होती थी।”[6] इस प्रकार के गित गाने के लिए वेनुमाई भटकर और रंगमाई शुभरकर अपने मधुर कंठ से दलित पीडा की मार्मिक और संघर्षपूर्ण अभिव्यक्ति को गीतों में ढालकर समाज को संबोधित करती थी।

ज्योतिराव फुले, डॉ. अम्बेडकर के स्त्री उद्धार कार्य से दलित महिलाओं ने आंदोलन को स्वयं चलाने का निर्णय लेकर दलित स्त्रियों का कारवां निर्माण किया और उनको अधिकार दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उसमें जईमाई चौधरी का नाम आता है, “एक दलित महिला द्वारा दलित बच्चियों के लिए विद्यालय स्थापित करना। उच्च शिक्षित दलित महिला जाईमाई चौधरी जो बाद में सशक्त दलित महिला नेता के रुप में स्थापित हुई। उन्होंने 1924 में चोखा मेला कन्या पाठशाला आरंभ की। जाईमाई चौधरी स्वयं बहुत ही मुसीबतों से पढ लिख पायी थी। जाईमाई चौधरी शिक्षिका के साथ-साथ एक जागरुख लेखिका एवं अच्छी वक्ता भी थीं। जाईमाई चौधरी बाबासाहब के कार्य से और शिक्षा प्रणाली से प्रभावित होकर उनकी पक्की अनुयायी बनी थी।”[7] इस प्रकार जाईमाई चौधरी ने डॉ. अम्बेडकर की स्त्री विषयक विकास की दृष्टि का प्रचार-प्रसार करके स्त्री शिक्षा को अत्याधिक महत्वपूर्ण मानते हुए स्त्री शिक्षा पर बल दिया। इस प्रकार दलित महिला आंदोलन की माला में संघर्ष का एक मोती और जुड गया। दलित कवयित्रियां लेखन कार्य के साथ-साथ अम्बेडकरवादी आंदोलन को आगे बढाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अम्बेडकरवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना ही उनके लेखन का महत्वपूर्ण इद्देश्य हैं।

विश्वव्यापी दलित स्त्री लेखन

हिंदी का दलित साहित्य जिस प्रकार से विश्व में अपना डंका बजाने लगा है। वैसे ही दलित स्त्री कवयित्रियां भी अपनी अभिव्यक्ति को न केवल सिमीत रखती है बल्कि उसे विश्वव्यापी बनाकर भारतीय समाज में दलित स्त्री की योग्यता को समझाने लगी है। यह अलग है कि ब्राह्मणवादियों के मन में उनके प्रति ऐसा करने से कोई सहभाव नहीं है परन्तु उन्हें सच्चाई के सामने कुछ करने का साहस ही नहीं होता। यही वजह है कि दलित स्त्री अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ आावाज उठाने से न ही परिवार के सदस्यों से डरती है और नहीं सवर्ण मानसिकता से डरती है। दलित कवित्रियों की हिंम्मत व संयुक्त राष्ट्र संघ के सहयोग से दलित स्त्री लेखन को विश्वव्यापी बनने में बडी सहायता प्राप्त हुई है। “दलित महिलाओं का आंदोलन बीजिंग के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन से देश की परिधि बाहर भी विस्तृत होने लगता है। इसमें संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने संम्मेलन में स्वयंसेवी संस्था एवं विश्वव्यापी नेटवर्क के लिए एक जगह प्रदान किया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकारों पर जोर दिए जाने से दलित महिलाओं के आंदोलन को बल मिला है।”[8] इस प्रकार से संयुक्त राष्ट्र के दबाव के कारण सभी देशों को दबाव में बनाया जा सकता है। स्मित लिखते है, “स्वयं सेवा संस्था अपना देस की परिधि से बाहर दलितों एवं उपेक्षितों की स्थिति को सामने लाकर ‘शर्मनाक’ तथ्यों को दर्शाते हैं। इस अन्तर्राष्ट्रीय कार्य से उन देशों की सरकारों पर संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं का एक राजनीतिक और नैतिक दबाव पडता है तब ये देश उस दिशा में सक्रिय होते दिखते है।”[9] दलित कवयित्रियों ने विश्व के अनेक देशों में यात्राएं की है। रमणिका गुप्ता भी “विश्व के उन्नीस देशों की यात्रा कर चुकी हैं। भारत के प्रतिनिधि के रुप में उन्होंने मजदूर परिषद मैक्सिको, बर्लिन, रुस, युगोस्लव्हिया, फिलीपाईन्स, तथा क्यूबा में भाग लिया। उन्होंने कई राष्ट्र की साहित्यिक यात्राएँ की हैं। अमेरिका, कनाडा, हाँगकाँग, बँकॉक, इंग्लैण्ड, फ्रांस, इटली, नार्वे, स्विटजरलैण्ड का दौरा किया है।”[10]

संयुक्त राष्ट्र संग के अलावा अनेक सामाजिक संस्थाएं दलित स्त्री के लिए कार्य करने में तत्पर है जैसे- विश्व सामाजिक मंच, हेग सम्मेलन, ऑल इंडिया दलित वूमेन फोरम, महिला दल, बहुजन महिला संघ, बहुजन महिला परिषद आदि कई संगठन है जो दलित स्त्री के हीत में कार्य करने में आगे है। विश्व सामाजिक मंच में जनवरी 2007 में अफ्रीका एवं दक्षिण एशिया की महिलाएं एकत्र आयीं। ये मंच जाति एवं रंगभेद की नीति के प्रतिरोद में था इसमें भी दलित महिलाओं के मुद्दे पर विचार किया गया। विश्व सामाजिक मंच वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभाव के खिलाफ एक अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिरोध है। दलित महिलाओं ने विश्व सामाजिक मंच में वैश्वीकरण को दलित समाज और उनके उपर हो रहे नकारात्मक प्रभाव को हमेशा से सामने रखने का सफल प्रयास किया है। नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स (एनसीडीएचआर) ने 2003 में वैश्वीकरण के दलित महिलाओं पर हो रहे दुष्परिणाम को उजागर किया। विमल थोरात इस एनसीडीएचआर की सदस्या है जे कि दलित है। उन्होंने बताया है कि, “दलित महिलाओं को वैश्वीकरण का दुष्परिणाम सबसे ज्यादा झेलना पडता है। इसमें दलित महिलाओं में गरीबी, बेरोजगारी, श्रमिकों की दुर्दशा, अनौपचारिक क्षेत्रों में वृद्धि, निजीकरण में वृद्धि, कल्याणकारी योजनाओं में कटौती, सार्वजनिक क्षेत्रों में नौकरियों में कमी, स्वास्थ्य सुविधाों का महंगा होना शामिल है। इसके साथ ही कृषि का वाणिज्यीकरण, पाणी जैसे संसाधनों का निजीकरण आदि से ग्रामीण इलाकों में रहनेवाले दलित महिलाओं के परेशानी हो रही है। दलित महिलाएं जो सर पर मैला ढोने के कामों में लगी हुई हैं। उनके प्रश्न पर भी चिन्तन किया गया।”[11]

विविध विधाओं में लेखन कार्य

दलित स्त्री को समाज के द्वारा गूँगा पैदा करना पहला अभिशाप है, लडकी को घर परिवार में न बोलने का या कम बोलने की शिक्षा मिलती है। घर के बाहर तो वह कोई बलता है तो वह चूपचाप सुनने के लिए तयार रहना और गुस्सा भी आए तो चूपचाप पी जाओं, ऐसा नही करेगी तो समजा उसे कुलटा और न जाने कितनी उपाधियां देगा यह सोचकर वह खुद को नाकाम समझकर चूप बैठने के अलावा कुछ नहीं करती है। ऐसे में अगर कोई दलित कवयित्री अपनी बेडियां तोडने रचनाओं का निर्माण करती है तो यह साहित्य के लिए बहुत बडी उपलब्धि है।

कोई दलित लडकी समाज की बुराईयों को सामने लाना चाहती है, यह अच्छी बात है। आज के समय में दलित लेखकों के साथ-साथ दलित कवयित्रियां भी साहित्य में अपने जीवन को अभिव्यक्त कर रही है। हिंदी की दलित कवयित्रियां अपने लेखनी में ऐसे विषयों को लेकर आने लगी है जिस पर ब्राह्मणवादी मानसिकता लडखडा रही है।

कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, आत्मकथा, आलोचनात्मक लेख आदि विधाओं में दलित स्त्री साहित्य लिखा जा रहा है। और उसकी सराहना भी बहुत होने लगी है। स्त्री आंदोलन के शुरुआती दिनों में महिलाओं के अनुभव की अभिव्यक्ति करने केवल एक ही मंच उपस्थित था लेकिन दलित लेखिकाओं ने शीघ्र ही यह अनुभव किया कि विभिन्न वर्ग की महिलाएं अनेक अपने मुद्दों पर अलग-अलग ढंग से प्रभावित रही है। और उसे महसूस हुआ कि अपनी अभिव्यक्ति का अलग से रास्ता निकाला जा सकता है। ठिक वैसे दलित नारी संगठित होकर उनके साथ हो रहे दाहरे शोषण को विविध विधाओं द्वारा साहित्य में प्रस्तुत करने लगी है। “दलित स्त्री साहित्यिक आंदोलन में दलित स्त्री अब सभी विधाओं में अपनी बाते कह रही है। वह है, आत्मकथा, कविता, नाटक, एकांकी, यात्रा वृतांत एवं लोकगीतों के माध्यम से आत्मकथा के माध्यम से दलित स्त्री घर के अंदर पितृसत्ता को रेखांकित कर रही है। जिसके निसाने पर आमतौर पर पति का व्यवहार घर के अंदर के अन्य लोगों का व्यवहार निसाने पर आता है। इस संदर्भ में पुस्तक का तिसरा खंड दलित स्त्री लेखन जिसमें केवल अनिता भारती ने अपने आलेख ‘दलित लेखन में स्त्री चेतना की दस्तक’ में संपूर्ण दलित स्त्री लेखन पर चर्चा की है।”[12] विवाह के बाद भी पढाई के साथ-साथ साहित्य से समाज को सही दिशा देती रहीं। रमणिका गुप्ता हर विधा में कई सारे विषयों को उजागर करती हैं। वह एक साहित्यकार के साथ-साथ सफल पत्रकार भी हैं। ‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका की संपादिका हैं। उन्होंने साहित्य के माध्यम से न केवल भारत में चर्चित हैं बल्कि विदेशों में भी अपनी अलग छाप छोडी हैं। मानवतावाद रमणिका गुप्ता के साहित्य का केंद्र बिंदू है। इसी को आधार बनाकर विविध विधाओं में अपनी वैचारिक दृष्टि समाज में रुजाने के लिए तत्पर रहती हैं। कविता, कहनी, उपन्यास, नाटक, आलोचनात्मक लेख और आत्मकथा विधाओं पर हिंदी में लेखनी चलाई हैं और साथ ही बहुआयामी व्यक्तित्व होने के कारण उन्हें बहुभाषा का ज्ञान होने से उन्होंने हिंदी साहित्य तेलगु, गुजराती, पंजाबी, मराठी, मलयालम आदि भाषाओं में अनुवादित कर अनेक संस्कृतियों को मिलाने व समझाने का कार्य किया हैं।

दलित स्त्री लेखन पर शोध तथा शैक्षणिक हलचल

आज दलित स्त्री लेखन विविध प्रकार की साहित्य की विधाओं को स्थान देकर व्यापक रूप धारण किया हुआ है। विविध विश्वविद्यालयों में दलित स्त्री लेखन को पाठ्यक्रम में पढाया जा रहा है। और साथ ही दलित स्त्री लेखन पर केवल चर्चा न होकर विविध विषय के शोध कार्य हो रहे है। यह दलित स्त्री लेखन की बडी उपलब्धि मानी जायगी अब दलित मुद्दों पर एवं दलित स्त्रियों के मुद्दों पर लेखन और बोध में वृद्धि होती दिखती है। जिस आक्रोश के तेजाब से स्त्री आस्मिता को रौंदा जाता रहा है, उस आक्रोश का प्रतिउत्तर देना दलित स्त्रियां सीख लिया है। वे आज आत्मनिर्भर हो रहीं है तथा आत्मबल से लबालब हैं। वह साक्षर होना जान गई है इसलिए खुद की आत्मरक्षा करने में समर्थ बनी है, आज दलित स्त्री अपनी खुदारी को पहचाना है, अब वह बेबस, बेचारी, लाचार, अबला नहीं हैं बल्कि किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए तयार है। यह हिंमत उन्हें डॉ. अम्बेडकर के कार्य से प्राप्त हुई है। संविधान ने सभी स्त्रियों को समानता का अधिकार देकर उनके जीवन में क्रांति का बीज बोया है। परिणाम स्वरुप आज दलित स्त्री भी अपनी लेखनी में स्त्री समाज के उपर हो रहे अन्याय- अत्याचार को वाणी दे रही है। पुष्पा विवेक ने बहुत अच्छी बात की है, “धर्मवीर जी, जब चीटी पर पैर पडता है तो वह भी काटती है। यहां तो दलित-शुद्र स्त्री का सवाल है जो एक इंसान है, फिर चाहे वह कायस्त हो, चमार हो या कोई भी जाति की स्त्री। जब उनके साथ अन्याय होगा तो वह भी पलटवार तो करेंगे ही, अब चाहे ब्राह्मण विरोधी कायस्थ हो या धर्मवीर विरोधी स्त्री। जब उनके साथ अभद्र व्यवहार, अश्लील भाषा का प्रयोग किया जायेगा तो क्या वह चूपचाप बर्दास्त कर लें। आज की स्त्री पढी-लिकी व समझदार है, उसे अपने अधिकारों व अच्छे बूरे का ज्ञान है। निर्लज्ज और समाज विरोधी व्यक्ति का विरोध कर आज की स्त्री ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह धर्मवीर जैसे ओछी प्रवृत्ति के व्यक्ति को सबक सिखाने का हौसला रखती है।”[13]

दलित स्त्री लेखन का विस्तार आज की तारीख में पुरे देश में विश्वविद्यालय और महाविद्यलय में होते हुए नजर आ रहा है। विश्वविद्यलय में अनेकों दलित कवयित्रियों के रचनाओं पर शोध कार्य चल रहा है। यह उनके किए कार्य का ही फल कहना चाहिए। सुशीला टाकभौरे, रजनी तिलक, कौशल्या बैसंत्री, रजतरानी मीनू, अनिता भारती आदि कवयित्रियों के रचनाओं को लेकर विविध विषयों को सामने रखकर शोधकार्य हो रहे है।

दलित लेखिकाओं ने स्त्री हिंसा के खिलाफ अपना विरोध प्रकट किया है। दलित हिंसा के खिलाफ आवाज बुलंद करते समय अनोकों स्त्रियों को हिंसा व बलात्कार का शिकार होना पडा।

डॉ. अम्बेडकर ने स्त्री जीवन को सशक्त बनाने के लिए स्त्री-पुरुष की समानता अधिक महत्वपूर्ण तथा आवश्यक मानते थे। लडकों के साथ-साथ बिना भेदभाव किए लडकियों को भी समान रुप से शिक्षा दी जाए तो भारतीय समाज विश्वजगत में अतिशीघृ प्रगति कर सकेगा। डॉ. अम्बेडकर इस तरह इसलिए चाहते थे कि, स्त्री और दलित स्त्री को कई हजारों सालों से केवल शिक्षा में ही नही बल्कि सभी क्षेत्रों से दूर रखा गया और पुरुषसत्ता के वर्चस्व के अधिन रखकर उन्हें गुलाम, दास, बनाया गया। इसका जिम्मेदार डॉ.अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म ग्रंथों और मनु को माना है कारण मनु ने स्त्रियों को वेद पढने नही दिया, “स्त्रियों को पढने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए उनके संस्कार वेद मंत्रों के बिना किए जाते है। स्त्रियों को वेद जानने को अधिकार नहीं है इसलिए उन्हें धर्म का कोई ज्ञान नही होता।”[14] मनु के समय के पूर्व स्त्रियों को गुरुकुलों में शिक्षा दी जाती थी, इसका उलेख डॉ.अम्बेडकर करते है, “श्रोत सूत्र से यह स्पष्ट है कि नारी वेद मंत्रों का अनुपाठ कर सकती थी और उसे वेदों का अध्ययन करने के लिए शिक्षा दी जाती थी पाणिनि की अष्टाध्यायी से इस बात के भी प्रमाण मिलते है कि, नारियाँ गुरुकुलों में जाती और वेदों की विभिन्न शाखाओं का अध्ययन करती थी। और वे मीमांसा में प्रविण होती थी। पतंजली के महाभाष्य का कहना है कि, नारियां शिक्षक होती थीं और बालिकाओं को वेदों का अध्ययन कराती थी।”[15]

बाबासाहेब डॉ.अम्बेडकर शिक्षा को अन्याय के खिलाफ लडने का शास्त्र माना है। ‘शिक्षा शेरनी का दूध है, यह दूध जो भी कोई पिएगा वह अन्याय के खिलाफ जंग छेडे बीना नही रहेगा’, ‘जब तक गुलामों को उसकी गुलामी का ज्ञान नही होगा तब तक वह गुलामी से मुक्त नही होगा।’ बिना शिक्षा से कोई भी व्यक्ति गुलामी को पहचान नहीं सकता। गुलामों को गुलामी की पहचान तब हो सकती है, जब वह शिक्षा आत्मसात करके सही गलत की पहचान करने में परिपूर्ण साबित हो, “डॉ.अम्बेडकर जब विदेश में पढने गए तो वहां के स्वतंत्र जीवन में उन्होंने स्त्रियों को चहुंमुखी विकास करते देखा तो उन्हें समझ में आया कि, बिना स्त्री शिक्षा के कोई भी प्रगति अधूरी है। विदेश में होते हुए वहां की स्त्रियों को स्वतंत्रतापूर्वक जीवन जीते हुए, चिंतन मनन करते हुए, उनकी प्रगति देख स्त्री चेतना को धार मिली।”[16] डॉ.अम्बेडकर का अपना मानना था कि, “यह गलत है कि माँ-बाप बच्चों के जीवन को उचित मोड दे सकते है, यह बात अपने मन पर अंकित कर यदि हम लोग अपने लडकों की शिक्षा के साथ ही लडकियों की शिक्षा के लिए भी प्रयास करे तो हमारे समाज की उन्नति तीवृ होगी। इसलिए आपको नजदीकी रिस्तेदारों में यह विचार तेजी से फैलाना चहिए।”[17] शिक्षा मनुष्य की आँखों के समान होती है, जिस प्रकार आँखों के बिना हम कुछ देख और समझ नही सकते उसी प्रकार शिक्षा के बिना भी समाज को सही ढंग से समझ नही सकते। इसलिए जीवन में शिक्षा का होना महत्वपूर्ण ही नही बल्कि अनिवार्य है।

शिक्षा से ही विवेक-बुद्धि प्राप्त होती हैं जिसके द्वारा हम अपनी स्थिति और सही-गलत का भेद करके सत्य को आधार बनाकर सच्चा इतिहास लिखेंगें। कहा जाता है कि जिनकों अपने इतिहास के बारे में कुछ जानकारी नहीं वह अपना इतिहास लिख नही सकते। आज तक वही होते आ रहा था लेकिन आज दलित, आदिवासी और स्त्रियों ने शिक्षा के बल पर अपना इतिहास जानकर स्वयं इतिहास लिखने का काम ही बल्कि इतिहास में अपनी खास जगह बना रही है। अतः स्पष्ट है कि, इतिहास जानने के लिए शिक्षा बहुत जरुरी है। शिक्षा प्राप्ति के उपरांत हम अपना इतिहास और वर्तमान को अच्छे से समझकर भविष्य में उन्नति-प्रगति पर राह का इतिहास खुद बना सकते है। सुशीला टाकभौरे लिखती है, “सर्वप्रथम महात्मा ज्योतिबा फुले स्त्री शिक्षा का अभियान चलाया था क्रांति माँ सावित्री फुले ने प्रथम शिक्षिका बनकर, स्त्री शिक्षण अभियान को आगे बढाया। बाबासाहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने स्त्रियों के हक में कानून बनाकर स्त्रियों को अधिकार दिलाए, जिसके फलस्वरुप वे शिक्षा और प्रगति के क्षेत्र में आगे बढ सकी।”[18]

दलित स्त्री की बदलती परिस्थिति

दलित स्त्री की परिस्थिति पहले से बेहतर हो रही है। आज वह अपने हक एवं अधिकार के लिए समाज से लड रही है। अब दलित स्त्री के आंदोलन, मुद्दों पर भी , सोचने का तरिक बदला है। भले ही दलित स्त्री को समानता का अधिकार न मिला हो लेकिन उसे समाज ने यह कबूल कर लिया है कि दलित स्त्री भी एक मनुष्य है और उसे मनुष्य होने का अधिकार मिलना चाहिए। वैसे स्त्री बहुत ही सहनशील होती है समाज ने उसे इस सहनशीलता का फायदा उठाकर कमजोर बनाया। परन्तु पुरुष के यह पत्ता नहीं था कि सहनशील होने के लिए हौसला रखना चाहिए। स्त्री के पास इतना सहन करने की शक्ति होती है कि सब कुछ छोडकर अपने परिवार के लिए जी जान लगा देती है। लेकिन आज स्त्री के पास यह उपलब्धि हैं, कि वह “आज औरत अपने सीमित दायरे से बाहर निकलकर प्रगति पथ पर अवश्य आगे बढ रही है, परन्तु समानता ने अभी भी कोसों दूर है।”[19] सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा शैक्षणिक क्षेत्र में दलित स्त्री की स्थिति में जितनी विकाश की गती होनी थी वह नहीं हो पायी। फिर भा कह सकते है कि दलित स्त्री आज सभी क्षेत्र में अपना दबदबा निर्माण करना चाहती है।

दलित साहित्य को राजनीति से जोडकर देखना आवश्यक कारण दलित साहित्य केवल साहित्य ही नहीं बल्कि विचारों का एक राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आंदोलन भी हैं। एक ऐसा आंदोनल जिसके द्वारा दलित, आदिवासी, स्त्री तथा दबे-कुचले लोग भी अपनी लडाई खुद लडने के लिए तयार हैं। हक एवं अधिकार की बात करते ही साहित्य अपने आप राजनीति से जुड जाता है। पर सवाल हि कि क्या दलित साहित्य का राजनीति से कोई संबंद है या नहीं। कारण हम दलित साहित्य को आंदोलन का रुप मानते है तो फिर कोई भी आंदोलन राजनीतिक विचारों के बिना आगे नहीं बढ सकता हैं। अनिता भारती ठिक ही लिखती है, “दलित आंदोलन और दलित साहित्य की भी एक राजनीतिक विचारधारा है जिसके प्रेरणास्रोत अम्बेडकर, फुले, कबीर, बुद्ध हैं।”[20] दलित साहित्य और आंदोलन के प्रेरणास्रोत डॉ.अम्बेडकर के नेत्रत्व में दलित समाज तथा स्त्री समाज जिस चेतना से लाखों करोडों की संख्या में जुड रहा है। वैसा किसी भी इतिहास में नहीं संभव नहीं है। डॉ. अम्बेडकर ने केवल दलित समाज को ही सुधारने का या उनको आगे लाने का कार्य नहीं किया बल्कि उनके दृष्टि में समाज की सभी महिलाओं को न्याय दिलाना ही मकसद रहा है। तथकालीन समाज में चले स्त्रियों के छोटे-बडे आंदोलनों की आखिर यही राजनीति रही होगी कि, दलित आंदोलन से जुडकर शोषण और दमन के खिलाफ एक ऐसे स्वस्थ समाज के लिए संघर्ष करना जहां समाज में दलित पुरुषों के साथ खंदे से खंदा मिलाकर कार्यरत रहे और वह भी समानता, स्वतंत्रता का हिसा बने। “1977 में कुल 19 महिलाएं ही संसद में पहुंचीं जबकि 1984 में सबसे अधिक 46 महिलाएं संसद में पहुंचीं। यह इंदिरा गांधी हत्याकांड का वर्ष था, जब राजीव गांधी सहानूभूति की तेज लहर चली थी उसके बाद संसद में महिलाओं की संख्या घटती चली गई। 1999 में फिर इसमें थोडा सुधार आया और संसद में पहुंचने वाली महिलाओं का संख्या 48 हो गयी।”[21] इतना ही नहीं बल्कि भारत का सबसे बडा राज्य उत्तरप्रदेश की पहली बार एक दलित महिला मुख्यमंत्री बनी है। और दलित महिलाओं में दूसरी मुख्यमंत्री रही राबडी देवी जो कि लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद बनी। बात अलग है कि उनका मुख्यमंत्री बनना मजबूरी थी लेकिन राबडी देवा भी हमेशा लालू प्रसाद को सहयोग की भूमिका में ही दिखाई देती रही है। इसके अलावा अनेक दलित महिलाओं ने राजनीति में भागीदारी दर्ज की उसमें मध्यप्रदेश की जमुना देवी उपमुख्यमंत्री पद पर रही और बिहार में मुसहर जाति की महिला भगवती देवी राज्यमंत्री भी बनी साथ ही केंद्र में सांसद भी रही।

जहां मायावती ने दलित महिलाओं का स्वाभिमान जगाया, वही एक बिल्कुल ग्रामिण महिला ने व्यवस्था से विद्रोह कर अपने अपमान का बदला लिया। जहां लाखों ठाकूरों और ब्राह्मणों की नजर में फूलन देवी एक डकैत थी, जिसने बेहमई में ठाकूरों को मौत के घाट उतारा, लेकिन ये ही लोग फूलन पर अत्याचार-दुष्कर्म को भूल जाते हैं। परन्तु हम यह कभी नहीं भूल सकते कि फुलन दलित महिलाओं की चेतना थी, उनके विद्रोह की कहानी थी। 12 साल जेल में रहकर बाहर आने के बाद राजनीतिक हलचलें शुरु हुई है। फुलन पर उनकी मल्लाह जाति को बहुत गर्व था, अन्त में उन्होंने एक राजनैतिक दल की सदस्य बनकर मिर्जापुर से सांसद वनी।

आज संविधान के तहत आरक्षण की बदौलत बडी संख्या में दलित महिलाएं पंचायत और क्षेत्र पंचायतों की प्रमुख सदस्य हैं। और हिम्मत और खुशी से अपना काम कर रही है। लेकिन बहुत सारी महिलाएं अपने पति के निर्देशों पर ही काम करती हैं जो कि संविधान की मुल भावना के खिलाफ है। दलित महिलाओं को अपने हक एवं अधिकारों की लडाई राजनैतिक ताकत को बढाकर ही लडनी होगी और यह सही मायनों में तभी संभव होगा सकता है जब सांप्रदायिकता, हिंसा और धार्मिकता से स्वयं को दूर रखेंगे। यही सबसे अधिक दलित महिलाओं के शोषण के हतियार बनकर आये हैं। इसलिए दलित महिलाओं को अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति सचेत रहकर ही राजनीति में अपना कदम रखना अनिवार्य तथा महत्वपूर्ण रहेगा।

कहना होगा कि दलित स्त्री हर क्षेत्र में आगे आने की कोशिश में जूटी हुई है। दलित महिलाएं विभिन्न प्रांतो में सजग तो हो रही है परन्तु आज भी हिंसा, गरीबी, छुआछूत, शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य की कमी जैसी समस्याओं के चलते जीने को मजबूर है। इसके चलते हम कह सकते हैं कि दलित महिलाओं के स्थितियों में बहुत कुछ अन्तर नहीं आया है। शिवकुमार के अनुसार “अभी भी दलित महिलाओं को अपने ही दलित आंदोलन में पूरी पहचान नहीं मिल पायी है। हांलाकि वे इस दिशा में प्रयासरत हैं।”[22] और इस संदर्भ में सुशीला टाकभौरे और अन्य दलित कवयित्रियां चिंतीत है। दलित आंदोलन व लेखन के सामने यह बहुत बडा प्रश्न है कि समाज में महिलाओं के प्रति ब्राह्मणवादी मानसिकता को किस प्रकार बदला जाय कारण इस मानसिकता के कारण संपूर्ण दलित महिला वर्ग नारी मुक्ति आंदोलन से जुड नहीं पाती है। इसका बडा कारण पितृसत्ता का वर्चस्व कहा जा सकता है। इसलिए आज भी वे घर हो या घर के बाहर का कोई भी कार्य हो परिवार के पुरुष की अनुमति के बिना कर नही सकती। अत: संभावना कर सकते है कि स्त्री के प्रति इस तरह की मानसिकता को जब तक बदला न जाय तब तक नारी मुक्ति के प्रश्नों का समाधान नही कर पायेंगे।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि, दलित स्त्री राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों से पिछडी हुई हैं। धीरे-धीरे वह पिछडी जिंदगी को पिछे छोडकर विकास का रास्ता अपना रही है। हिंदी दलित स्त्री लेखन में अनेक संभावनाएं हैं। कही गयी बात को पुन: पुन: उसी अंदाज में कहना रीपीटेशन अधिक होता है। इसलिए आगे भविष्य में इस प्रकार एक ही बात को अलग प्रकार से चित्रित करने की कोशिश होनी चाहिए। विषयों में भी विभिन्नता होनी आवश्यक हैं। दलित स्त्री के अनेक मुद्दे अभी भी साहित्य में चित्रित करना बाकी रहा है। उम्मीद हैं कि दलित स्त्री आगे इसकी कमी दुर करेगी।

 

-तुपसाखरे श्यामराव पुंडलिक

शोधार्थी- हिंदी विभाग, मानविकिय संकाय

हैदराबाद विश्वविद्यालय हैदराबाद,500046

गच्चीबाउली हैदराबाद,

मो. न. 7382460576

  1. भारत में दलित महिलाओं का सशक्तिकरण आंदोलन, डॉ. अंजना, पृ.166

  2. दलित महिलाएं इतिहास, वर्तमान और भविष्य, एस. विक्रम, पृ.203

  3. दलित महिलाएं इतिहास, वर्तमान और भविष्य, एस. विक्रम, पृ.205

  4. दलित महिलाएं इतिहास, वर्तमान और भविष्य, एस. विक्रम, पृ.203

  5. दलित महिलाएं इतिहास, वर्तमान और भविष्य, एस. विक्रम, पृ.54

  6. दलित महिलाएं इतिहास, वर्तमान और भविष्य, एस. विक्रम, पृ.55

  7. दलित महिलाएं इतिहास, वर्तमान और भविष्य, एस. विक्रम, पृ.55

  8. भारत में दलित महिलाओं का सशक्तिकरण आंदोलन (1920 – 2000), डॉ. अंजना, पृ.168

  9. भारत में दलित महिलाओं का सशक्तिकरण आंदोलन (1920 – 2000), डॉ. अंजना, पृ.168

  10. हिन्दी दलित साहित्य आंदोलन, सरोज पगारे, पृ.30

  11. भारत में दलित महिलाओं का सशक्तिकरण आंदोलन (1920 – 2000), डॉ. अंजना, पृ.170

  12. दलित महिलाएं इतिहास, वर्तमान और भविष्य,पृ.संपादकिय-25

  13. स्त्री नैतिकता का तालिबानीकरण, रमिका गुप्ता, विमल थोरात,पृ.70

  14. बाबासाहेब डॉ.अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-7,पृ.333

  15. बाबासाहेब डॉ.अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-7,पृ.334

  16. दलित महिलाएँ इतिहास,वर्तमान और भविष्य, एस.विक्रम, पृ.52

  17. दलित महिलाएँ इतिहास, वर्तमान और भविष्य, एस.विक्रम, पृ.52

  18. हाशिए का विमर्श, सुशीला टाकभौरे,पृ.133

  19. समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन-2, सम्पा. सुशीला टाकभौरे, पृ.105

  20. समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध, अनिता भारती, पृ.282

  21. दलित महिलाएं: इतिहास वर्तमान और भविष्य, सम्पा. एस विक्रम, पृ.225

  22. भारत में दलित महिलाओं का सशक्तिकरण आंदोलन (1920-2000)

आत्मकथा : हिंदी साहित्य लेखन की गद्य विधा- डॉ. प्रमोद पाण्डेय

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आत्मकथा : हिंदी साहित्य लेखन की गद्य विधा

               – डॉ. प्रमोद पाण्डेय

       आत्मकथा हिंदी साहित्य लेखन की गद्य विधाओं में से एक है। आत्मकथा यह व्यक्ति के द्वारा अनुभव किए गए जीवन के सत्य तथा यथार्थ का चित्रण है। आत्मकथा के केंद्र में आत्मकथाकार या किसी भी व्यक्ति विशेष के जीवन के विविध पहलुओं तथा क्रिया-कलापों का विवरण होता है। आत्मकथा का हर एक भाग मानव की जिजीविषा तथा हर एक शब्द मनुष्य के कर्म व क्रिया-कलापों से जुड़ा हुआ होता है। “न मानुषात् श्रेष्ठतर हि किंचित्” अर्थात मनुष्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है। आत्मकथा के अंतर्गत आत्मनिरीक्षणआत्मपरीक्षणआत्मविश्लेषणआत्माभिव्यक्ति यह आत्मकथा के द्वारा की जाती है। आत्मकथा के अंतर्गत सत्यता का विशेष महत्व होता है। यदि आत्मकथा में सत्यता नहीं होगी तो वह आत्मकथा उत्कृष्ट नहीं माना जाता है। आत्मकथा के अंतर्गत व्यक्तिगत जीवन के विविध पहलुओंजो कि आत्मकथाकार ने स्वयं भोगा है तथा उसके अपने निजी जीवन व घटनाओं का सटीक व सही चित्र शब्दों के माध्यम से उकेरता है। आत्मकथाकार आत्मकथा लेखन में जिस शैली व भाषा का प्रयोग करता है वह उसकी अपनी स्वयं के जीवन अनुभव से जुड़ी होती है|

         आत्मकथा यह गद्य साहित्य का रूप है। जिसके अंतर्गत किसी व्यक्ति विशेष का जीवन वृत्तांत स्वयं के द्वारा ही लिखा जाता है।

        आज आत्मकथा लेखन विधा को अपना स्वतंत्र अस्तित्व प्राप्त है तथा हिंदी गद्य साहित्य में अपना स्थान स्थापित कर चुकी है।

          आत्मकथा यह आत्म‘ व कथा‘ के योग से बना है। जिसमें आत्म‘ का अर्थ है- अपनास्वयंनिजीस्वकीय आदि। इसी प्रकार कथा‘ का अर्थ है- कहानीकिस्सावार्ताचर्चा आदि। अत: उपर्युक्त अर्थ के आधार पर आत्मकथा‘ का अर्थ हुआ- अपनी निजी कहानीस्वयं का किस्सास्वकीय कहानी आदि।

       आत्मकथा के अंतर्गत आत्मकथाकार की मुख्य भूमिका यह होती है कि वह अपने जीवन का सही ढंग से चित्रण करे। इसमें आत्मकथाकार कथा का पात्र स्वयं होता है।

           आत्मकथा को परिभाषित करते हुए डॉ. श्यामसुंदर घोष ने लिखा है कि -“जब लेखक अपनी जीवनी स्वयं लिखे तो वह आत्मकथा है। आत्मकथा के लिए हिंदी में आत्मचरित या आत्मचरित्र शब्द प्रयुक्त होते हैं।” हिंदी साहित्य कोश के अनुसार -“आत्मचरित और आत्मचरित्र हिंदी में आत्मकथा के अर्थ में प्रस्तुत शब्द हैं और तत्वत: आत्मकथा से भिन्न नहीं हैं।” इसी क्रम में डॉ. माज़दा असद भी लिखते हैं कि ” स्वयं लिखी अपनी जीवनी आत्मकथा कहलाती है. इसे दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है – जब कोई व्यक्ति कलात्मकसाहित्यिक ढंग से अपनी जीवनी स्वयं लिखता है तब उसे आत्मकथा कहते हैं।

आत्मकथा लिखते समय आत्मकथाकार को यह विशेष ध्यान रखना चाहिए कि आत्मकथा में रोचकता हो अन्यथा वह आत्मकथा नीरस और उबाऊ हो जाएगी। आत्मकथा को रोचक बनाने हेतु कुछ मुद्दे मानविकी पारिभाषिक कोश में लिखे गए हैं. वे मुद्दे इस प्रकार से हैं :-

१- किन्हीं ऐतिहासिक घटनाओं या आन्दोलनों से यदि लेखक का संपर्क रहा हो तो उसका विवरण बाद की पीढ़ियों के लिए रोचक और उपयोगी होता है। क्योंकि उससे तत्कालीन मनोवृत्ति का कुछ सही अनुमानसुलभ हो पाता है।

२- हो सकता है कि स्वयं लेखक का ही इतिहास निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान रहा हो विख्यात विजेताशासकराजनीतिज्ञ अथवा चिंतक के विचारों का अपने तथा अन्य व्यक्तियों तथा घटनाओं के विषय में उसके मतामत का सदा महत्व रहता है।

३- लेखक के दृष्टिकोण या विचारों में कुछ विशेषता या अनूठापन हो अथवा वह अपने युग से आगे की बात सोचने वाला हो।

४- लेखक ऐसा व्यक्ति हो जिसके जीवन का मुख्य कार्य आत्ममंथन और चिंतन ही रहा हो।

   आत्मकथा को संस्मरण विधा भी माना जाता है। इस संदर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. हरिचरण शर्मा ने लिखा है कि “आत्मकथा एक संस्मरणात्मक विधा है जिसमें स्वयं लेखक अपने जीवन के विषय में निरपेक्ष होकर लिखता है। आत्मकथा वह साहित्यिक विधा है जिसमें लेखक अपनी सबलताओं और दुर्बलताओं का संतुलित एवं व्यवस्थित चित्रण करता है. आत्मकथा व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व के निष्पक्ष उद् घाटन में समर्थ होती है।” परंतु इस संदर्भ में प्रसिद्ध आलोचक शिप्ले आत्मकथा व संस्मरण को परस्पर भिन्न मानते हैं। इस संदर्भ में वे लिखते हैं कि ” आत्मकथा और संस्मरण देखने में समान साहित्यिक स्वरूप मालूम पड़ते हैंकिंतु दोनों में अंतर है। यह अंतर बल संबंधी है। एक में चरित्र पर बल दिया जाता है और दूसरे में बाह्य घटनाओं और वस्तु आदि के वर्णनों पर ही लेखक की दृष्टि रहती है। संस्मरण में लेखक उन अपने से भिन्न व्यक्तियोंवस्तुओंक्रियाकलापों आदि के विषय में संस्मरणात्मक चित्रण करता है जिनका उसे अपने जीवन में समय-समय पर साक्षात्कार हो चुका है।

  पं. जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखित “मेरी कहानी” को अनुवादित करके अब्राहम काउली आत्मकथा के संबंध में लिखते हैं कि ” किसी आदमी को अपने बारे में खुद लिखना मुश्किल भी है और दिलचस्प भी क्योंकि अपनी बुराई या निन्दा लिखना खुद हमें बुरा मालुम होता है और अगर हम अपनी तारीफ करें तो पाठकों को उसे सुनना नागवार मालूम होता है।

     इसी क्रम में आत्मकथा के संबंध में गुलाब राय अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि ” साधारण जीवन चरित्र से आत्मकथा में कुछ विशेषता होती है। आत्मकथा लेखक जितनी अपने बारे में जान सकता है उतना लाख प्रयत्न करने पर भी कोई दूसरा नहीं जान सकता किन्तु इसमें कहीं तो स्वाभाविक आत्मश्लाघा की प्रवृत्ति बाधक होती है और किसी के साथ शील-संकोच आत्म-प्रकाश में रुकावट डालता है।

          आत्मकथा अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने का सबसे आसान व सहज माध्यम है। आत्मकथा के द्वारा आत्मकथाकार अपने जीवनपरिवेशमहत्त्वपूर्ण घटनाओंविचारधाराओंनिजी अनुभवोंअपनी क्षमताओंदुर्बलताओं तथा अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को शब्दों के  माध्यम से लोगों के समक्ष प्रस्तुत करता है।

         हिन्दी में आत्मकथा लेखन की एक लंबी परंपरा रही है। इस परम्परा को तीन कालखण्डों में विभाजित किया गया है जो कि निम्नवत है :-

१-आत्मकथा लेखन का आरंभिक काल :-

                     हिंदी की पहली आत्मकथा सन् 1641 में बनारसीदास जैन द्वारा लिखित ‘अर्द्धकथा’ को माना गया है। इस आत्मकथा में लेखक ने अपने गुणों और अवगुणों का यथार्थ चित्रण किया है। पद्यात्मक शैली में लिखी गई इस आत्मकथा के अलावा संपूर्ण मध्यकाल में हिंदी में कोई और दूसरी आत्मकथा नहीं मिलती है। हिंदी साहित्य लेखन के अंतर्गत गद्य लेखन की अन्य विधाओं के साथ आत्मकथा लेखन विधा भी भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय में विकसित हुई। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पत्रिकाओं में प्रकाशन के द्वारा इस विधा को न सिर्फ पल्लवित किया बल्कि अपितु इसे आगे बढ़ाने में अहम् भूमिका भी निभायी। उन्होंने अपने स्वयं के जीवन पर आधारित आत्मकथा “एक कहानी कुछ आपबीती कुछ जगबीती” का लेखन किया। जिसका आरंभिक अंश “प्रथम खेल” नामक शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। यह आत्मकथा आम-बोलचाल की भाषा में लिखी गई जो कि रोजमर्रा के जीवन में प्रयोग किए जाने  वाले शब्दों की बहुलता इस आत्मकथा में दिखाई देती है।

      भारतेंदु हरिश्चंद्र के अलावा इस कालखण्ड के आत्मकथाकारों द्वारा लिखी गई आत्मकथाओं में से सुधाकर द्विवेदी की ‘रामकहानी’ तथा अंबिकादत्त व्यास की ‘निजवृतांत’ को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया  है।

       इसी क्रम में सन् 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती की आत्मकथा सामने आई। इस आत्मकथा में दयानंद सरस्वती के जीवन के विविध पहलुओं को उजागर किया गया है। सत्यानंद अग्निहोत्री की आत्मकथा ‘मुझ में देव जीवन का विकास’ का पहला खण्ड सन् 1909 में और दूसरा खण्ड सन् 1918 में प्रकाशित हुई। सन् 1921 में परमानंद जी की आत्मकथा ‘आपबीती’ प्रकाशित हुई। इस आत्मकथा में आत्मकथाकार ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपने योगदानअपनी जेल यात्रा तथा आर्य समाज के प्रभाव को उकेरा है। सन् 1924 में स्वामी श्रद्धानंद की आत्मकथा ‘कल्याणमार्ग का पथिक’ प्रकाशित हुई। जिसमें उन्होंने अपने के जीवन संघर्षों का सही-सही चित्रण किया है।

२- स्वतंत्रता-पूर्व आत्मकथा लेखन :-

           हिंदी आत्मकथा साहित्य के विकास में ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशित आत्मकथांकों का विशेष योगदान रहा है। सन् 1932 में प्रकाशित अंक में जयशंकर प्रसादवैद्य हरिदासविनोदशंकर व्यासविश्वंभरनाथ शर्मा दयाराम निगममौलवी महेशप्रसादगोपालराम गहमरीसुदर्शनशिवपूजन सहायरायकृष्णदासश्रीराम शर्मा आदि साहित्यकारों और गैर-साहित्यकारों के जीवन के कुछ अंशों को प्रेमचंद ने स्थान प्रदान किया।

सन् 1941 में प्रकाशित इस काल की सबसे महत्वपूर्ण आत्मकथा श्यामसुंदर दास की ‘मेरी आत्मकहानी’ है। इसमें लेखक ने अपने जीवन की निजी घटनाओं को कम स्थान देते हुए इतिहास और समकालीन साहित्यिक गतिविधियों को अधिक प्राधान्य दिया है। इसी कालखण्ड के आस-पास बाबू गुलाबराय की आत्मकथा ‘मेरी असफलताएँ’ भी प्रकाशित हुई। जिसमें बाबू गुलाब राय ने व्यंग्यात्मक शैली में अपने जीवन की असफलताओं का सजीव चित्र उकेरा है।

इसी क्रम में सन् 1946 में राहुल सांकृत्यायन की आत्मकथा ‘मेरी जीवन यात्रा’ का प्रथम भाग प्रकाशित हुआ। सन् 1949 में दूसरा तथा सन् 1967 में उनकी मृत्यु के उपरांत तीसरा भाग प्रकाशित हुआ। सन् 1947 के आरंभ में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की आत्मकथा “मेरी जीवन यात्रा” प्रकाशित हुई। इस आत्मकथा में राजेंद्र प्रसाद ने देश की दशा का वर्णन किया है।

३- आत्मकथा लेखन का स्वातंत्रयोत्तर काल :- (1947 के बाद से अब तक)

सन् 1948 में वियोगी हरि की आत्मकथा ‘मेरा जीवन प्रवाह’ प्रकाशन हुआ। इस आत्मकथा में समाज के निम्न वर्ग का मार्मिक वर्णन किया गया है। यशपाल की आत्मकथा ‘सिंहावलोकन’ का प्रथम भाग सन् 1951 मेंदूसरा भाग सन् 1952 में और तीसरा भाग सन् 1955 में प्रकाशित हुआ। सन् 1952 में ही शांतिप्रिय द्विवेदी की आत्मकथा ‘परिव्राजक की प्रजा’ प्रकाशित हुई। इसमें लेखक ने अपने जीवन की करुण कथा का वर्णन किया है। सन् 1953 में देवेंद्र सत्यार्थी की आत्मकथा ’चाँद-सूरज के बीरन’ प्रकाशन हुआ।

    सन् 1960 में प्रकाशित पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र‘ की आत्मकथा ‘अपनी खबर’ प्रकाशित हुई।

         हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ (सन् 1969), ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ (सन् 1970), ‘बसेरे से दूर’ (सन् 1977) और ‘दशद्वार से सोपान तक’ (सन् 1985) चार भागों में विभाजित एवं प्रकाशित हिंदी की सर्वाधिक सफल और महत्वपूर्ण आत्मकथा मानी जाती है । बच्चन की आत्मकथा ने अनेक आत्मकथाकारों को जन्म दिया। बच्चन जी के बाद प्रकाशित आत्मकथाओं में वृन्दावनलाल वर्मा की ‘अपनी कहानी’ ( (सन् 1970)देवराज उपाध्याय की ‘यौवन के द्वार पर’ (सन् 1970)शिवपूजन सहाय की ‘मेरा जीवन’ (सन् 1985)प्रतिभा अग्रवाल की ‘दस्तक ज़िंदगी की’ (सन् 1990) और भीष्म साहनी की ‘आज के अतीत’ (सन् 2003) प्रकाशित हुई।

       समकालीन आत्मकथा साहित्य में दलित आत्मकथाओं का भी विशेष रूप से  योगदान रहा है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘जूठन’मोहनदास नैमिशराय की ‘अपने-अपने पिंजरे’ और कौशल्या बैसंत्री की ‘दोहरा अभिशाप’सूरजपाल चौहान की आत्मकथा तिरस्कृत‘ (2002) तथा संतप्त‘ (2006) आदि आत्मकथाओं ने इस विधा को एक नया आयाम प्रदान किया ।

     वर्तमान समय में महिला और दलित आत्मकथाकारों ने इस विधा को सामाजिकता से जोड़ा है। महिला कथाकारों में मैत्रेयी पुष्पाप्रभा खेतान आदि का नाम विशेष रूप से लिया जाता है जिन्होंने आत्मकथा का लेखन किया है।

       इसी क्रम में आत्मकथा एवं कथा साहित्य पर तुलनात्मक अध्ययन की दृष्टि से दृष्टिपात करते हैं तो इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि आत्मकथा व्यक्ति के जीवन यात्रा की कहानी होती है परंतु यह कहानी अधूरी रहती है क्योंकि इसमें व्यक्ति के जीवन के एक पड़ाव का लेखा-जोखा ही प्रस्तुत किया जाता है। यदि आत्मकथा लेखन पूर्ण हो जाने के बाद लेखक कुछ और वर्षों तक जिंदा रहता है तो उन वर्षों का ब्यौरा आत्मकथा द्वारा प्राप्त नहीं होता है। जबकि कथा साहित्य में काल्पनिकता होने के बावजूद उसके अंतर्गत कहानी का प्रारंभविकास और अंत सुनियोजित ढंग से तथा व्यवस्थित रूप से होता है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि आत्मकथा व्यक्ति विशेष के जीवन की अनुकृति होने के साथ-साथ कथा साहित्य की तुलना में यह अनियोजित एवं अपूर्ण होती है। अत: कथा साहित्य के अंतर्गत इसे अधूरी कथा की संज्ञा दी जा सकती है क्योंकि कोई भी आत्मकथा लेखक अपनी मृत्यु के बाद तो आत्मकथा लिख नहीं सकता और जीवित रहकर लिखी गई आत्मकथा में जीवन के कुछ अंश शेष रह जाते हैं। कहना न होगा कि आत्मकथा का अंत यह किसी कथा साहित्य की भॉति पूर्व नियोजित अंत नहीं होता है। बावजूद इसके आत्मकथा में कथावस्तुचरित्र-चित्रणभाषा-शैलीकथोपकथनउद्देश्य और वातावरण जैसे कथा साहित्य के तत्व विद्यमान रहते हैं।

      कहना न होगा कि हिंदी आत्मकथा साहित्य यह कथाकार के अपने जिए हुए जीवन की मार्मिक अभिव्यक्ति है। आत्मकथा आज अपने जीवन की सार्थकता के कारण दिन-प्रतिदिन उँचाइयों की ओर अग्रसर है तथा हिंदी साहित्य में अपना स्थान सुनिश्चित किए हुए है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

१- आदर्श हिंदी शब्दकोश – पं. रामचन्द्र पाठक (सं.)

२- साहित्य के नये रूप – डॉ. श्यामसुंदर घोष

३- हिंदी साहित्य का इतिहास – डॉ. हरिचरण शर्मा

४- हिंदी साहित्य कोश- धीरेन्द्र वर्मा

५- मानविकी पारिभाषिक कोश- डॉ. नगेन्द्र ( सं.)

६- काव्य के रूप – गुलाब राय

७- गद्य की नयी विधाएँ – डॉ. माज़दा असद

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नाम : डॉ. प्रमोद पाण्डेय
(एम.ए. , पीएच.डी. – हिंदी)
पता : ए-201, जानकी निवास, तपोवन, रानी सती मार्ग, मालाड (पूर्व), मुंबई – 400097. (महाराष्ट्र)
मो.नं. : 09869517122
ईमेल : drpramod519@gmail.com

प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास : प्रवासी स्त्री जीवन का संत्रास

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flying birds above herd of animals near trees
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प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास : प्रवासी स्त्री जीवन का संत्रास

सपना दास

शोध सारांश:

प्रवासी चर्चित महिला साहित्यकारों में उषा प्रियंवदा का नाम अग्रणी है | उन्होंने अबतक 6 उपन्यासों की रचना की हैं | 2007 में प्रकाशित उपन्यास ‘भया कबीर उदास के बाद 2016 में प्रकाशित ‘नदी’ उपन्यास प्रवासी स्त्री जीवन के दस्तावेज को चित्रित करने वाला उपन्यास है | प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास में प्रवासी स्त्री जीवन की गाथा को प्रस्तुत करने वाला उपन्यास है | यह उपन्यास प्रवासी स्त्री जीवन के मानवीय मूल्यों, नैतिक विचारों से लेकर प्रवासी स्त्री जीवन के विविध स्वरूप को एवं उनके अधिकारों की गाथा कहने वाली उपन्यास कहलाएगी | प्रवास में गए लोगों विशेषकर स्त्रियों के संघर्ष, मानसिकता का विखराव, दाम्पत्य जीवन में विखंडन, परिवार में अलगावबोध, घुटन, संत्रास, अकेलापन आदि जीवन की विविध परिस्थितियों का वर्णन लेखिका ने किया है | प्रस्तुत शोधालेख शोधार्थियों के लिए अति लाभदायक सिद्ध होगा |

इस उपन्यास में प्रवासी स्त्री जीवन के विविध पक्षों को सामने उजागर किया गया है चाहे वह विस्थापन की समस्या हो, या परिवार से दूर कुंठा की समस्या, एकांकीपन की समस्या, प्रवासी स्त्री जीवन का संघर्ष हो, चाहे मानसिक अंतर्द्वद्व की समस्या ही क्यों न हो? और मानसिकता की टकराहट पीढ़ीगत भी निहित है, जिसके भीतर नयी पीढ़ी के साथ साथ द्वितीय पीढ़ी यानी स्वयं इस उपन्यास की नायिका आकाशगंगा और उसके पति गगनेंद्र को झेलना पड़ता है | साथ ही इसकी चपेट में बूढ़े माँ-बाप और दोनों बेटियाँ भी आ घिरते हैं |

मूल शब्द: प्रवासी, डायस्पोरा, प्रवासन, अप्रवासी, उत्प्रवासी, वासी, मूल निवासी, एन. आर. आई. आदि

अन्य नाम: प्रवासी साहित्य लगभग 80 के बाद आया जबकि 1834 में गिरमिटिया प्रथा, उससे पहले दास प्रथा या गुलामी प्रथा के नाम से जाना गया |

भाव: जीवन मूल्य, मानवीय मूल्यबोध, आधुनिकता उत्तर आधुनिकताबोध, संस्कृति बोध

उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास में प्रवासी स्त्री जीवन का यथार्थ

उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास में भारत और अमेरिकी पृष्ठभूमि स्वतंत्रता का ताना-बाना अत्यंत व्यापक रूप से दिखाया गया है | इस उपन्यास में उपन्याकार मध्यवर्गीय परिवार से जुड़ी आधुनिकता की दौड़ में भागती नारी के अंतर्द्वंद्व, वैचारिक वैमनस्य के कारण पारिवारिक, सामाजिक, दाम्पत्य संबंधों की टूटन को रेखांकित करती हैं | यह विघटन पात्रों की मानसिकता को भी प्रभावित करता है और तनाव और अकेलेपन से ग्रस्त हो जाते हैं | लेखिका ने अन्य परम्परागत रिश्तों की गढ़न को नकारते हुए वर्तमान संदर्भ में विभाजित किया है | स्वतंत्रता बाद के उपन्यासों में अनेकों बदलाव परांगत होती हुई नज़र आती है | यह बदलाव बदलता हुआ परिवेश व दृष्टि की ही देन है | मूलरूप से इसका आभास प्रेमचंद के गोदान से ही मिलने लगता है | “गोदान ही हिंदी का वह पहला उपन्यास है, जिसने सभी परंपरागत, भ्रष्टाचार, तिलिस्म और मनोरंजन के सस्ते नुस्खे के चौखट को उखाड़ फेका है और सामाजिक यथार्थ को उसके समस्त कोणों से उद्घाटित कर एक नवीन औपन्यासिक धर्म का सूत्रपात किया है |”1

आधुनिक उपन्यासकार के लिए कथानक, चरित्र-चित्रण, कथोपकथन आदि परंपरागत बातें महत्वपूर्ण नहीं रह गई | वह इन्हें नकार कर नवीनता और आधुनिकता बोध के नये आयाम खोजता है | साथ ही परिवेश को चरित्र में एवं चरित्र को मनोविज्ञान में खोजता है जबकि मनोविज्ञान को व्यक्तित्व में खंगालता है | उषा प्रियम्वदा ने अपने उपन्यासों में विविध परिस्थितियों के आधार पर सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक, यथार्थवादी आदि विविध विषयों पर उपन्यास में केन्द्रित किया | “आज का उपन्यासकार ऐतिहासिक, सामाजिक या राजनीतिक उपन्यास नहीं लिखता, वह उनके माध्यम से आधुनिक व्यक्ति चेतना को परखता है, प्रतिस्थित करता और उनका मुल्यांकन करता है |”2

मानव मन बहुत ही चंचल होता है कभी यहाँ तो कभी वहाँ | जीवन के विविध क्षेत्र में उतार चढ़ाव लगे रहते हैं ऐसे में व्यक्ति का जीवन परिस्थियों से होकर यथार्थ रूप में मानस पटल पर विचरित करता रहता है | ‘नदी’ उपन्यास आधुनिक जीवन के यथार्थ को प्रस्तुत करने का स्पष्ट दस्तावेज़ है | जिसका संबंध मानव के आम जीवन से जुड़ा हुआ है | उषा प्रियंवदा ने ‘नदी’ उपन्यास में प्रवासी जीवन के यथार्थ को विविध समस्याओं व् परिस्थितयों के माध्यम से मुखरित किया है –

परिवार से दूर विस्थापन की समस्या

परिवार से दूर जाकर प्रावासी व्यक्ति वियोग का शिकार हो जाता है | अपनी मातृभूमि का मोह प्रत्येक व्यक्ति के मन में वियोग की स्थिति उत्त्पन्न कर देता है | जैसे-जैसे पुरानी स्मृतियाँ मन-मस्तिष्क पर छाने लगती है व्यक्ति पूरी तरह से अतीत में चला जाता है ऐसे में उसकी वेदना की गति तीव्र होने लगती है | वह चाह कर भी प्रवास में अपने परिवार और अपने रिश्तों को भुला नहीं सकता | अच्छी जिंदगी व्यतीत करने की लालसा और अपनी मिट्टी से जुड़कर अपनी पहचान बनाए रखने की आकांक्षाओं के कारण ही विदेश में रहते हुए भी व्यक्ति की मानसिकता को कुरेदती है |

शिक्षा अथवा रोजगार के उद्देश्य से व्यक्ति भले ही प्रवाश में जाकर नयी गृहस्थी शुरू करता है परन्तु पाश्चात्य समाज में व्यक्ति को फिट होने में समय लग जाता है | विदेशी चकाचौंध सदैव भारतीयों को अपनी ओर आकर्षित करती है परन्तु वास्तविकता तब नजर आती है जब व्यक्ति उस समाज में उस मानसिकता के साथ फिट नहीं बैठता | ऐसे में आर्थिक रूप से सम्पन्नता भी कमी होने लगती है | यहाँ सबसे ज्यादा जो जरुरी चीज है वह है निश्चित आवास का होना | परन्तु पराये देश में पहले पहले किसी न किसी व्यक्ति का आश्रय लेना पड़ता है फ़िर जाकर फ्लेट या अपार्टमेन्ट में रहना पड़ता है | यह स्थिति अनेक दिक्कते उत्पन्न करती है| आकाशगंगा के शब्दों में- दूर देश में न कोई सगा सम्बन्धी है, न रहने का ठिकाना |”3 बहुत बार ऐसा देखा गया है कि विदेश में अपनी इच्छाओं की ललक को पूरा करने के लिए अनेक भारतवंशी जाकर वहाँ बस जाते है | यानी कभी इच्छा वश तो कभी बेसहाय वश परन्तु भारतीय परिवार को अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है, जो कि एक प्रवासी के लिए बड़ा सपना बन कर रह जाता है |

 

अपनत्व का अभाव

प्रत्येक क्रिया-कलाप, मान्यताएं, मूल्य-बोध, संस्कृति आदि समस्त गतिविधियाँ सामाज द्वारा संचालित होता है | यही कारण है कि प्रत्येक सामाजिक जीवन मूल्यों को समाज ही गतिशीलता प्रदान करती है, उसे विकसित है | प्रवासी जीवन शैली भारतीय जीवन शैली से कई अधिक भिन्न है | भारतीय समाज में पाश्चात्य की लहर आधुनिकता का ही मापदंड है | प्रवास के दौरान व्यक्ति में परिवर्तन आना एवं उनकी मानसिकता में बदलाव का आना स्वभाविक है | साथ ही विविध प्रकार की समस्यायों का यथार्थ रूप में सामना करना, चाहे वह रंगभेद की दृष्टि से हो या भाषागत दृष्टि से ही क्यों न हो | बदलते परिवेश में दूरियों का आना आम बात जान पड़ता है | इससे व्यक्ति परिवार से परिवार समाज से कटता जाता है और एक नए समाज में अपने को सामंजस्य बैठाने की कोशिश में लग जाता है, परन्तु इसका विखंडित स्वरूप परिवार में खलन पैदा करता है | यही कारण है कि प्रवासी जीवन जीने के दौरान व्यक्ति को जीवन के तमान कठिनाईयों से होकर गुजरना पड़ता है | साथ ही अपनत्व अभाव खलता रहता है | इस संदर्भ में गोविन्द मिश्र कथन बहुत ही प्रासंगिक है | उनका कहना है- “विचारों की आंधियां आती जाती रहती है | थोडा बहुत संवेदना को मोड़ती है | लेकिन मूलतः उसका विकास जमीन के साथ जो-जो हो रहा है उसी के साथ चलता है | छलांग लगाकर कलाहीन और नहीं पहुँच सकता… जैसा की वैचारिक स्तर पर अक्सर संभव होता है |”4 गंगा का जीवन एक ऐसे छोर पर जा अटकी थी जिसमें कोई सगा सम्बन्धी था ही नहीं | एक ऐसे पराए देश में जहाँ न कोई परिवार न कोई रिश्ता | वह कहती है- “ क्या लौटना पडेगा ? यह सब छोड़कर, उस दूर देश में, जहाँ कोई सगा सम्बन्धी नहीं |”5

व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में, रोजगार की खोज में या नई जीवन यापन की खोज में व आर्थिक विवशता के कारण आदि चाहे जिन परिस्थितियों में प्रवास में निवास करता है | उस दैनिक जीवन में अपनी मिट्टी की खुसबू उसे सताती है | जिसके चलते व्यक्ति पराए देश में रहकर वह न वहां का हो पाता है और न ही यहाँ का | क्योंकि प्रवासी व्यक्ति का मन पेंडुलम की तरह डोलते रहता है जिससे की एकाग्र नहीं हो पाता | भले ही थोड़े समय के लिए अपने को फिट परिस्थितियों के अनुसार फिट कर लें परन्तु कुछ समय बाद जब उसे अपने घर और परिवार का बोध होता है तो कहीं न कहीं अपने आप को अकेला ही पाता है जिसके चलते वह व्यक्ति प्रवास में रहकर भी अपनी मिट्टी से जुड़ा रहता है | आकाशगंगा के शब्दों में- “अपनी संस्कृति और सभ्यता से अपने को उखाड़ कर न यहाँ के पूर्णत: हो पाते हैं, न वहाँ के |”6 प्रवासी मनुष्य की मानसिकता अनिश्चित होती है | जब उस पर पुरानी स्मृतियाँ हावी होती है तब वह न अपने देश को भुला पाता है और न ही पाश्चात्य संस्कृति को अपने में फिट बैठा पता है | यही कारण है कि वह अपनी जमीन व मातृभूमि के प्रति खिचाव बढ़ता चला जाता है |

अकेलापन एवं अजनबीपन

मूल्यों की विसंगति ही अकेलापन है | व्यक्ति के भीतर सामाजिक मूल्यों एवं निजी मूल्यों की स्वीकृति का जो संघर्ष उत्पन्न होता है उससे अलगाव की समस्या उत्पन्न होती है | अलगाव का मतलब है दूर हो जाना या अलग हो जाना | ऐसे में व्यक्ति अकेलापन का शिकार हो जाता है | अर्थात् इसका मूल अभिप्राय हुआ अलग या अजनबीपन होने की अनुभूति | अमृतराय ने लिखा है- “यह अजनबीपन और संवेदनहीनता मूलतः एक ही चीज है | आदमी-आदमी के बीच संवाद नहीं है और न होने की संभावना | इसलिए सब के सब एक दूसरे के लिए अजनबी है |”7 यह दूर होने की प्रक्रिया के पीछे कई कारण भी हो सकते हैं जैसे आपसी अनबन के कारण अपनों से दूर हो जाना, दाम्पत्य जीवन में प्रेम की माधुर्यता की कमी के कारण दूर हो जाना इत्यादि | जबकि अकेलापन आज की सबसे विकत समस्या है | देवी शंकर अवस्थी के शब्दों में- “आधुनिक मानव का अकेलापन ही इसकी त्रासदी और विडम्बना है |”8

पुत्र भविष्य के अंतिम संस्कार कर लौटने के बाद पति डॉ. सिन्हा का कटु वचन उसे न केवल पति से बेगाना बना देता है बल्कि पूरे परिवार में रहकर भी अपने आप को अलगाव का बोध करने लगती है | ऐसे समय में उसे उसे जिसका साथ चाहिए था वही उस पर लांछन लगाता है- “तुमसे शादी करने की गलती की मैंने, गोर चेहरे को देख कर माता जी धुल गई थीं, पर तुम्हारा रक्त ही दूषित है, तुम्हारे दो भाई ल्यूकीमिया से मरे-और मेरा भविष्य भी तुम्हारे जहर भरे रक्त की भेंट चढ़ गया | अब मुझे तुमसे लेना-देना नहीं | जो चाहो करो, जहाँ चाहो जाओ |”9 ऐसे में आकाशगंगा के पास उसकी अपनी पीड़ा, आत्मलांछना और अपराध भावना का तो कोई छोर ही न था |

व्यक्ति जब समाज से या परिवार से अपने आप को अजनबी महसूस करने लगता है तब ऐसी स्थिति में उसके विश्वास और आस्था के सारे सहारे टूट कर बिखर जाते हैं तथा जब वह महसूस करता है कि स्वयं परिवार में उसका कोई आदर नहीं हो रहा है तो उसमें अपने आप ही अजनबीपन की भावना का उत्पन्न होना स्वाभाविक है | औद्योगिकीकरण के इस चकाचौंध ने व्यक्ति को अपनी ओर इस कदर आकर्षित कर रखा है कि दिनोंदिन वह काल के गाल में समाता चला जा रहा है |

वैज्ञानिक प्रगति के कारण परंपरागत जीवन मूल्यों के आगे आज प्रश्न चिह्न लगाये जा रहे हैं | मौलिक चिंतन शक्ति के विकास के कारण परंपरागत मूल्य आज निरर्थक मानकर छोड़े जा रहे हैं | समकालीन सामाजिक जीवन में मूल्यों का विघटन एक ओर व्याप्त है तो दूसरी ओर यांत्रिकी | मुख्यत: भूमंडलीकरण के प्रभाव के कारण मानवीय संबंध भयंकर तनाव के बीच गुजर रहे हैं | वास्तव में मूल्यों के साथ हमारा मानसिक संबंध स्थापित हो जाता है | चूँकि युगीन परिस्थितियों में परिवर्तन होने के साथ जीवन मूल्यों में भी परिवर्तन होना सहज है |

प्रवास में जीवन यापन कर रहे एक भारतीय महिला की सारी संवेदनाएँ विघटित हो जाने के लिए विवश है | उसे येसा लग रहा है कि अब उसका इस दुनिया में कोई नहीं | आकाशगंगा समुन्द्र के किनारे जा रेत पर लेट जाती है उसे न सुध है लहरों की न ही मृत्यु की | समुद्र की यह लहरे आती और पैरों को भिगोकर चली जाती है | लेखिका के शब्दों में- “यह शरीर कितना अतृप्त है, कितना वंचित है किसी के स्नेहिल स्पर्श का, जैसे सारी त्वचा में धीरे-धीरे आँच सुलग रही है |”10 अकेलेपन की छटपटाहट उसे अंदर से व्याकुल कर देती है | दूर प्रदेश में उसका कोई अपनानहीं रहता है सिवाय एकाकीपन के | क्योंकि जो अपना था वह भी उसे अकेले छोड़ गया | वह बुदबुदाती है, “सभी कोई क्यों मुझे छोड़कर चले जाते हैं- तुम आओ न माँ-मुझे उठकर अपनी बाँहों में भर लो | मुझे दुलराओ माँ- मुझे उठाकर बैठाओ-अरे कोई तो हो जो…”11 अत: उसे न सांस की परवाह है और ना ही मृत्यु की | प्रवास का यह अकेलापन विछोह की स्थिति वाला अकेलापन नहीं है | “वरन व्यक्ति और घटनाओं के बीच असम्प्रेरणा से युक्त अद्भुत छटपटाहट का क्षण है जिसका उत्तर दर्शन के पास नहीं है |”12

इस उपन्यास में नायिका आकशगंगा के जीवन में द्वंद्वात्मक परिस्थितियाँ तब उभर कर सामने आती है जब एक ओर प्रवास में पति छोड़कर चला जाता है | वहीँ दूसरी ओर अर्जुन सिंह का आश्रय पाती है परन्तु गैर क़ानूनी कम करवाने के जुर्म में रातों-रात उसकी गिरफ्तारी हो जाती है | ऐसे में उसके पास न वीजा है न भारत लौटने का दूसरा मार्ग | आकाशगंगा के शब्दों में- “इस ठंडे पराए देश में, जहाँ आकर लोग इतना बदल जाते हैं कि उन्हें सही गलत का आभास भी नहीं रहता ?”13 प्रवासी समाज में सांस ले रहा भारतीय समाज व परिवार जब भी परायेपन का शिकार होता है तब वह अतीत में खो जाता है और वर्तमान में अपने उन पुरानी यादों के बीच छोटी-छोटी खुशियों को तलाशने की कोशिश करने लगता है | अतीत के प्रति मोह व्यक्ति को नए परिवेश में सामंजस्य स्थापित करने में बाधा उत्पन्न करता है |

अकुलाहट

एकांत जीवन का यह भयावह सच है कि व्यक्ति का मन मश्तिष्क, चेतना शून्य हो जाता है | जीवन में सब चीज उसे बिखरता हुआ ही नज़र आता है जहाँ केवल अँधेरा ही अँधेरा है | समुन्द्र के किनारे, रेत पर बैठी-बैठी आकाशगंगा जान रही थी कि “यह जिन्दगी ऐसे टूट गई है, टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गई है कि नर्सरी गीत के ह्म्पटी – डम्पटी की तरह कभी जुड़ नहीं पाएगी |”14

आधुनिक प्रेम की विडम्बना का प्रस्तुतीकरण भी इनके साहित्य में हैं कि आज का मनुष्य अपने भीतर अलगाव, अभाव एवं शून्य आदि जैसी विविध परिस्थितियों का अनुभव कर रहा है | उसके इस अभाव की पूर्ति प्रेम से ही हो सकती है | किन्तु मानव जीवन यह है कि वह प्रेम करने में असमर्थ है | पति गगनेंद्र अपने बेटे के मृत्यु का आक्षेप अपनी पत्नी को मानता है यही कारण है कि वह अपनी पत्नी एवं उसके प्रेम को भूलकर सदैव के लिया छोड़ कर भारत चला जाता है | बिना बताए चले जाने से आकाशगंगा को यकीन नहीं होता | यही कारण है कि वह वर्तमान में जीते हुए भी अतीत के गर्त में चली जाती है | घर वही रहता है बशर्ते उसमें रहने वाला व्यक्ति कोई नहीं रहता है | यह जानते हुए भी की उसका पति अपनी बेटियों को लेकर चला गया है बावजूद इसके भी उसे येसा लगता है कि मानों यह स्वप्न है | बेटियाँ झरना और सपना उसे आकर पुकारेगी | अत: अपने पति के प्रेम से वंचित होकर वह काल्पनिक जगत में यहाँ से वहाँ विचरती रहती है |

बेरोजगारी की समस्या

पति से विलगाल हो जाने के बाद आकाशगंगा प्रवास में स्थाई रूप से नौकरी करके रहने का मार्ग अपनाती है | वास्तविकता से परिचित है कि डॉ. सिन्हा उसे अपनाएंगें नहीं इसलिए वह विदेश में ही रहकर काम करना चाहती है | एरिक से कहती है- “मैं सम्मान से जीना चाहती हूँ बहले ही मुझे झाड़ू लगाने का काम करना पड़े |”15

मूल्यों की टकराहट

“मूल्य शब्द मूल्य+यात से निष्पन्न है, जिसका अभिप्राय है- किसी वस्तु के विनिमय में दिया जाने वाला धन, दाम, बाजार भाव आदि | परन्तु क्रमशः मूल्य शब्द के अर्थ में विस्तार हुआ है और यह शब्द मानदण्ड के अर्थ की भी अभिव्यक्ति करने लगा है | यही नहीं संस्कृति जैसे सूक्ष्म भाव के आधारभूत तत्वों को जिनसे किसी समाज की सांस्कृतिक अवस्था का ज्ञान होता है इसे भी मूल्य कहा जाने लगा है |”16 आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परस्पर विरोधी मूल्य एक दूसरे से टकराकर टूट रहे हैं | आज का व्यक्ति परंपरागत जीवन मूल्यों को आत्मसात करने लगा है | इस नव मूल्य की प्रक्रिया में व्यक्ति के लिए संघर्ष एक आवश्यकता बन गया है| इस उपन्यास में प्रवास में जीवन यापन कर रहे भारतीय परिवार के जीवन मूल्यों की टकराहट को स्पष्टत: देखा जा सकता है |

मूल्य जन समाज की वह रीढ़ है, जिसके सहारे समाज पूर्णत: अस्तित्ववान होता है | किसी समाज की संस्कृति का अध्ययन उस समाज में प्रचलित मानव मूल्यों के आधार पर ही संभव है | मानव की तानित सी त्रुटि संसार की अशांति का कारण बन सकती है | वस्तुतः मूल्य विघटन आधुनिक काल की उपज है | यह उपन्यास आपसी रिश्तों में आये खलन, नैतिक जीवन मूल्यों में विघटन पर बल देता है | शक के बुनियाद पर टिकी यह पति-पत्नी का संबंध अधूरे मानसिकता, आडम्बरों से पैदा हुए चकाचौंध जैसे मन:स्थिति को उजाकर कर पाठको के समक्ष प्रस्तुत करता है | बदले परिवेश में पुरानी मायताओं को लेकर जूझती रहती है | इस भाग दौड़ की जिंदगी में गंगा अपने को अशांत पाती है | महेंद्र भल्ला कृत ‘दूसरी तरफ’ उपन्यास में वे विदेशी आक्रान्ताओं को स्पष्ट करते हुए कहते हैं- “हिन्दुस्तान में बिल्कुल विपरीत जहाँ लोगों की आवाज़े बोलती थी, बेचने की आवाज़े चिल्लाती थी, सबसे ऊपर होती थी | शायद यही फर्क है पश्चिम और पूरब में |”17 देखा जाए तो मूल्य संघर्ष का संत्रास गंगा के जीवन में कही-न-कही किसी न किसी रूप में चलता रहता है | जिसके चलते जीवन मूल्यों के बीच सघर्ष करती हुई दिखाई देती है | मूल्य विघटन का प्रमुख कारण निरंतर होने वाला परिवर्तन ही है | डॉ. गणेश दास के अनुसार- “जन व्यक्ति के जीवन मूल्यों के बीच संक्रमण आती है | तब मनुष्य उसे स्पष्ट रूप से विभाजित नहीं कर पाता |”18 मानसिक और बाहरी द्वंद्व के कारण व्यक्ति उलझन से भरा रहता है | इससे उसका चरित्र किसी भी ढांचे में ढल नहीं पाता है यही कारण है कि व्यक्ति के जीवन मूल्यों में टकराहट की स्थिति दिखाई देती है |

वर्तमानयुगीन जीवन मूल्यों के संक्रमण के कारण उत्पन्न मानव जीवन की कटुता, परिवार विघटन आदि के परिप्रेक्ष्य में नवमूल्यों की स्थापना ही इस उपन्यास का उद्देश्य है | मूल्य विघटन की स्थिति में स्त्री जीवन असंगत बनाता जा रहा है | विद्रूपता, भावहीनता आदि अनेक असंगत प्रवृतियाँ उसमें दिखाई देने लगी है |

भारतीय सामजिक जीवन में दाम्पत्य संबंध या विवाह वासनापूर्ति का साधन नहीं हैं | वह जीवन का पवित्र बंधन है, त्याग एवं समर्पण का चिह्न है | पति पत्नी के बिना पारिवारिक रथ नहीं चल सकता | भारतीय समाज में पारिवारिक जीवन की सफलता का मुख्य कारण पारम्परिक प्रेम एवं त्याग है | वर्तमान सांचा आज खोखला हो चुका है | इस उपन्यास में पति डॉ. सिन्हा अपनी पत्नी को अमेरिका में छोड़ कर भारत केवल इसलिए चला जाता है क्योंकि उसके पुत्र भविष्य के मृत्यु का कारण अपनी पत्नी को मानता है | इसलिए वह बिना बताए वीजा लेकर चला जाता है | यही कारण है कि परित्यक्ता होकर जीवन बिताती है | “परित्यक्ता होना आखिर कोई ऐसी अनहोनी बात तो नहीं है , हमारे देश में तो न जाने कितने लोग अपनी पत्नी को छोड़ देते हैं |”19

स्त्री-पुरुष के वार्तालाप से ही कटुता का अहसास होता है कि दाम्पत्य जीवन से सुखी नहीं है | जहाँ तक स्त्री की बात है पति के स्वभाव के साथ उसका स्वभाव मेल नहीं खाता | पाश्चात्य संस्कृति में निवास करने के कारण पत्नी की विचारधारा स्वतंत्र होती है परन्तु भारतीय पति को यह पसंद न था | जबकि पत्नी अपने पति का प्यार चाहती है परन्तु बदलें में उसे आत्मलांछना का शिकार होना पड़ता है | कई बार उसे अपने पति के कटु वचन का शिकार होना पड़ता है | “तुमसे शादी करने की गलती की मैंने, तुम्हारा रक्त ही दूषित है |”20 उनकी यही बात उनके बीच कटुता बनकर उभरती है | यहाँ एक प्रश्न है क्या यह जरुरी है कि दाम्पत्य जीवन की पीड़ा का दोष स्त्री के माथे मढ दिया जाए | यदि किसी भी रिश्ते में कटुता व् कड़वाहट उत्पन्न हो रही है तो इसमें दोनों भागीदारी है न कि कोई एक |

प्रवास में रह रहे भारतीय परिवार की मानसिकता वहीँ धरी की धरी है | आधुनिक होकर भी उसकी मानसिकता दबी कुची है | परन्तु यह भी सत्य है कि आधुनिकता की इस चकाचौंध में व्यक्ति अपनी गरिमा को न पार करे | पति का यह बदलाव तब देखा जाता है जब स्वयं के परिवार को ही संदेह की दृष्टि से देखने लगता है | पति डॉ. सिन्हा अपनी माँ से कहता है- “अम्माँ- तुम उसे पहचानती नहीं, वह बड़ी चालाक है, उसका भरोसा मत करो-अच्छा, रात को उसके कमरे में बाहर से ताला लगा दिया करो |”21

नारी के स्वतंत्र सामाजिक जीवन में पुरुष वर्ग द्वारा अपने परंपरागत संस्कारों एवं अधिकारों को छोड़ नहीं पाना तथा आर्थिक दृष्टि से नारी की आत्मनिर्भरता, अविश्वास बनावट आदि ही के कारण है जिनसे समकालीन दाम्पत्य संबंधों में कटुता आ रही है | डॉ. सुरेश सिन्हा का कथन दृष्टव्य है- “इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक तरफ आज की नारी की वेदना को बड़ी मार्मिकता से रूपायित करता है, दूसरी तरफ आधुनिक जीवन सन्दर्भों की कृत्रिमता और खोखलेपन को बड़ी सूक्ष्मता से उजागर किया गया है |”22 गौरतलब यह है कि दाम्पत्य संबंधों की विषमता एवं विघटन का प्रभाव वर्तमान समय में न केवल पति और पत्नी पर पड़ रहा है अपितु उनकी संतान एवं परिवार पर भी पड़ रहा है

यौन संबंध

यौन प्रवृति मनुष्य की जन्मजात प्रवृतियों में से एक है | वर्तमान समय में आधुनिक नारी की यौन सम्बन्धी दृष्टि बदली है | डॉ. रामेश्वर नारायण ‘रमेश’ के मतानुसार- “आधुनिक नारियाँ बौधिक आदर्शवादी है तो यथार्थवादी भी | आधुनिक बौधिक नारियाँ सत्यानुभूति से प्रेरित होकर तथ्यों पर बल देती है | वे आधुनिक है, शिक्षिता है | संभवत: इसलिए वे आदर्शवादिता का विरोध करती है | वे पूर्णरूपेण विकासवादी सिद्धांत की समर्थिका है इसलिए वह यथार्थवादी है|”23 स्त्री पुरुष का पारस्परिक आकर्षण एक नैसर्गिक मनोवृति है | इस उपन्यास में अर्जुन सिंह का सान्निध्य आकाशगंगा को बुरा नहीं लगा | अर्जुन सिंह ने उसे सब सुविधाओं से पाट दिया था , काम-काज या सारी जिम्मेंदारियों से मुक्त कर रखा था | अर्जुन सिंह केवल उसे सज-सँवारकर बैठे देखना चाहता था | अर्जुन सिंह आकाशगंगा से कहता है- “तुझसे कभी जी नहीं भरेगा मेरी डार्लिंग-तेरा चाहे भर जाए |”24 आकाशगंगा का संबंध पहले अर्जुन सिंह से होता है फ़िर एरिक से तत्पश्चात प्रवीन से | परन्तु इन संबंधों में कहीं मजबूरीवश, शारीरिक जरूरतों की माँग है, तो कहीं, तो कहीं असहाय वश एकाकी जीवन का सहारा मात्र |

वास्तविकता तो यह है कि औरत पुरुष को अपनी जिंदगी का अंतिम पुरुष मानती है | पर पुरुष अपने चाहे जितनी औरतों के संपर्क में आया हो, औरत से जानना कभी नहीं भूलता कि उसके पहले उसकी जिंदगी में कोई आया तो नहीं, शायद इससे उसका अहम् सन्तुष्ट होता होगा | समकालीन समय में स्त्री स्वछंद विचार धारा रखती है | इस संदर्भ में डॉ. राजरानी शर्मा का कहना है- “अब नारी सेक्स के संदर्भ में न ग्लानी अनुभव करती है और न उसके लिए मात्र पुरुष को जिम्मेदार मानती है | वह अपने कर्म और स्वयं के फल के प्रति अपने को जिम्मेदार मानती है | यह नारी की रुढ़िमुक्तता का ही एक आयाम है |”25

‘यौन विकृति’ की चर्चा भी इस उपन्यास में मिलती है | आज आधुनिक समाज में रिश्ते और नामों का कोई सार्थक अर्थ नहीं रह गया है | सच में संबोधन जितने सच्चे होते है, उतना सच्चा प्यार नहीं होता | अर्जुन सिंह उसे सहलाता, थपकियाँ देता, पहले-पहल आकाशगंगा को यह सब अजीब सा लगा | परन्तु पति द्वारा अपमान मिलने रहने के कारण इस प्रकार से पुरुष का स्पर्श वह भूल चुकी थी | लेखिका कहती है- “इस रिश्ते में अगर कुछ रिश्ता था-तो वह केवल शरीर का- उसे तृप्ति तो मिल रही थी, पर वांछनीय नहीं था, वह जानती थी यह उसकी मज़बूरी नहीं थी, वह बंधी नहीं थी, किसी भी दिन दरवाज़ा खोलकर होटल से बाहर जा सकती थी पर उसे लगा कि वह जाना नहीं चाहती, एकदम निष्क्रिय रहने, होटल में रहने की सुविधा और एक पुरुष का हर वक़्त उसकी इच्छा पूर्ति करना एक सुखद अनुभव था |”26 इस रिश्ते का न कोई नाम है न ही इस रिश्तें में प्यार बल्कि यह एक-दूसरे की इच्छापूर्ति का माध्यम है | डॉ.त्रिभुवन सिंह के मतानुसार- “समय ऐसा आ गया है, जिसमें नाम और संबंध एक दूसरे की पर्यायवाचिता खो बैठे हैं, यहाँ तक कि उसके उल्लंघन में अब पश्चाताप और मानसिक क्लेश भी नहीं रह गया है |”27

पारस्परिक रूप में स्त्री-पुरुष के काम रूप को अभिन्न अंग माना गया है “यौन भावना प्राकृतिक आवश्यकता या शारीरिक भूख है जिसकी तृप्ति चाहे किसी भी स्थिति में होनी चाहिए |”28 फ्रायड ने काम को समस्त चेतन जगत एवं क्रिया-कलापों का मूल माना है | अत: यह आवश्यक नहीं है कि जिसके साथ यौन संबंध हो उसके साथ प्रेम हो या किसी भी प्रकार का संबंध हो | यौन प्रवृति के संस्कारपूर्ण रोप का विकास है प्रेम | प्रेम मानव चरित्र का प्रेरक तत्व है | “शारीरिक और संवेगात्मक आकर्षक के मिलन बिंदु पर प्रेम का आविर्भाव होता है | प्रेम केवल अध्यात्म की अनुभूति नहीं है, शरीर से उसका दृढ़ संबंध होता है | मांस में उसकी चेतना है, रक्त में उसका उष्ण | या वासना चाहे अछि हो या बुरी, जीवन का नेवारी अंग है |”29

नर नारी का आकर्षण स्वाभाविक एवं सहज है | इस दृष्टि से वह सम्पूर्ण जीवन प्रसंगों से जुड़ी हुई परिपक्व जटिल प्रक्रिया है | अपने व्यापक अर्थ में प्रेम भावना मूलतः एक मानवीय जुड़ाव का भाव है | “नर नारी के बीच सम्बन्धों की समस्या सदैव रही है | इसमें भावात्मक, रागात्मक, सेक्स-मूलक सम्बन्धों के व्यस्था की समस्या अपने आप में काफी जटिल है |”30 किन्तु आधुनिक मानवीय संबंधों के प्रभाव से समकालीन प्रेम भावना को भी धक्के लगे है | एक ओर जहाँ गंगा को पति का प्रेम नहीं मिल पाता है | वहीँ दूसरी ओर अर्जुन सिंह से नैसर्गिक संबंध का बनना कहाँ तक सही है ? साथ ही उसका साथ थोड़े ही दिन का रहता है कि आगे एरिकसन का साथ सहानुभूति का साथ है जिसमें प्रेम का नाम नहीं परन्तु संबंध स्थापित जरुर होता है |

सौन्दर्य का ख्याल रखना , प्लास्टिक सर्जरी करवाना, मसाज करवाना आदि जिअसी विविध गतिविधियाँ कहीं न कहीं पाश्चात्य की ही दें है | लोग विज्ञापन की चकाचौंध में पूरी तरह समाहित होता चला जा रहा है | इस विज्ञापन पद्धति को व्यक्ति दिनोंदिन अपनी निजी जीवन में भी लागू करता जा रहा है | चुकी किसी भी आकर्षक चीज क्षणभंगुर मात्र है | बशर्ते जरुरत है कि उन चीजों का हम उपयोग करते हैं या दुरपयोग | पाश्चात्य परिवेश में देखा गया है कि “वे जवानी में में खूबसूरती का दीवाना हुआ करते हैं | इसलिए हजारों स्त्री-पुरुष प्लास्टिक सर्जरी करवाकर अपने को जवान रखतेहैं |”31 चूँकि गंगा अपने आप को साज-सँवारकर महज अर्जुन सिंह के लिए रखती जिसने उसे हर प्रकार की सुविधाओं से भरपूर कर रखा था | न उसे अशार का बोध होता और न ही एकाकीपन का | ऐसे में उसे क्या चाहिए केवल यही कि जिस पुरुष ने उसे हर बंधनों से मुक्त रखा उसकी इच्छापूर्ति का ख्याल रखे | “खाली समय में वह पलंग पर पड़ी-पड़ी छत को ताका करती थी, न टेलीविजन देखती थी, न ही पढ़ती-लिखती थी | हर दो-तीन दिन में होटल की ब्यूटी शॉप में जाकर हाथ, पाँव, चेहरा सब सँवरवा लेती थी, पुरे शरीर की मालिश हो जाती थी | फ़िर तैयार होकर यानी साड़ी या चमकदार सलवार-कुरता पहनकर बैठी रहती थी |”32 यह साज-सजा स्वयं के लिए नहीं था बल्कि अपने को जवान रख कर अर्जुन सिंह को रिझाने के लिए था |

यह संबंध स्पर्श का, एहसास का, आत्मीयता का, सहानुभूति का होता है | चूँकि गंगा जानती है कि एरिक का साथ साथ महज़ कुछ ही क्षण के लिए है इसके बाद वह स्वीटजरलैंड चला जाएगा | बावजूद इसके भी वह उसके द्वारा प्राप्त सहानुभूति सरे ग़मों को भुला देती है | यह भी एक प्रकार से उत्कृष्ट प्रेम की चरम सीमा है | एरिक आकाशगंगा से कहता है- “अभी तो हम संग है न- बस यही काफी नहीं है ?”33 विघटन की प्रक्रिया से गुजर रहे आधुनिक प्रेम भावना पर यंत्र युग के आत्मनिर्वसन का प्रभाव पड़ा है |

उषा प्रियंवदा का ‘नदी’ उपन्यास प्रेम और नैतिकता के परंपरागत प्रतिमानों पर न केवल प्रश्न चिह्न लगता है, अपितु मानवीय संबंधों के यथार्थ को भी प्रस्तुत करता है | भारतीय संस्कृति के अनुसार शादी के पूर्व या बाद एक स्त्री किसी गैर पुरुष से संबंध रखती है तो उसे गलत माना जाता है | परन्तु जब एक पुरुष पत्नी के रहते किसी एनी स्त्री से संबंध रखे तो उसे मर्दानगी कहा जाता है | गंगा नए देश, नए परिवेश में है, अर्जुन के साथ संबंध हर दृष्टि से गलत है, वह विवाहिता हैं , चार बेटियों और एक बेटे का पिता है | यह जानते हुए भी गंगा उसके साथ नैसर्गिक संबंध बनती है | यहाँ तक कि अर्जुन सिंह भी केवल अपनी इच्छाओं की ही पूर्ति मात्र गंगा से करता है जो कि उसे अपनी पत्नी से नहीं प्राप्त हो पता | अर्जुन सिंह कहता है- “मैं किसी का हक़ छीनकर किसी और से नहीं बाँट रहा हूँ- यह मेरी ख़ुशी है | मुझे भी कुछ ख़ुशी पाने का अधिकार है कि नहीं |”34 यौन संबंध को घृणा एवं अश्लील की की एवं अश्लील की से देखा जाता था परन्तु आज उसकी सहज अभिव्यक्ति अपेक्षित है |

निष्कर्ष

आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी जटिल व् प्रमुख समस्या आजीविका, प्रेम, विवाह और सेक्स की कमी है | कमजोरियाँ हर व्यक्ति में होती हैं, कोई भी पूर्ण नहीं | स्त्री भी अपनी कमजोरियों को जानती है, पर कुछ कमजोरियाँ आदत और बेसहाय व् लाचारीपन में शामिल हो जाती हैं | कभी-कभी यह भी एक कारण बन जाती है, कटुता का, अलगाव, विखरापन का, संबंध विखंडन का आदि | व्यक्ति इस क्षेत्र में समाज की रूढ़ सनातन धारणाओं एवं मान्यताओं में अनास्था रखता हुआ मानसिक संघर्षों से ग्रस्त रहता है | सामाजिक मान्यताओं को प्रधानता देने पर जिस आत्मिक कष्ट और अंतर्द्वंद्व को लेकर वह जीता है वह उसके व्यक्तिगत क्षेत्र में हानिकारक सिद्ध होता है | अतृप्त वासनाएँ व्यक्ति के जीवन को कुंठित कर पूर्ण रूप से उसे मानसिक रोगी बना देती है | भारतीय समाज प्राचीन संस्कृति एवं आदर्शों में इतना आस्थावान है कि उनके विपरीत संस्कृति, मनोभाव, आचरण वालो को उचित मान्यता नहीं देता |

मुख्यरूप से देखा जाए तो इस उपन्यास में कलात्मक परिपक्वता, संवेदनशीलता और उत्तर आधुनिक बोध की परिपूर्णता दिखाई देती है | साथ ही इसमें प्रवासी भारतीय स्त्री के जीवन के संत्रास और अकेलेपन से उत्पन्न छटपटाहट और मानसिकता यंत्रणा, अर्थाभाव के कारण चाहते हुए भी कुछ ना कर पाने की विवशता अपने पूर्ण यथार्थ के साथ अभिव्यक्त हुई है| लेखिका ने व्यक्ति, परिवार तथा स्त्री-पुरुष के संबंधों, नारी की स्थिति आदि को अत्यंत प्रभावशाली रूप में चित्रित किया है |

उपन्यास के केंद्र में स्त्री की सुख-दुखात्मक स्थितियाँ, अंतर्द्वंद्व, आकांक्षा तथा पुरुष से उसका संबंध आदि विषय है | साथ ही उससे जूझती समस्याओं का एवं सवेद्नाओं का मार्मिक विस्तारपूर्वक वर्णन है | इसके साथ ही साथ द्विभाषीय राष्ट्र जैसे भारत और अमेरिकीय जीवन शैली की विरोधी संस्कृतियों की टकराहट भी इनमें स्पष्ट रूप से उभर कर आती है | जिसके चलते पारिवारिक जीवन शैली में तनाव व टकराहट की स्थितियाँ आ जाती है | जिसका परिणाम यह होता है कि स्त्री-पुरुष के संबंध में विखराव के साथ- साथ मानव जीवन में उत्पन्न परिस्थियों से रु-ब-रु करवाया गया है |

संदर्भ ग्रन्थ सूची

डॉ. दंगल झाल्टे, नए उपन्यासों में नए प्रयोग, पृष्ठ-16

डॉ.पुरुषोत्तम दुबे, व्यक्ति चेतना और स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यास, पृष्ठ-170

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-84

श्री गोविन्द मिश्र, साहित्य का सन्दर्भ, पृष्ठ-100

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-84

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-36

गीता सोलंकी, नारी चेतना और कृष्णा सोबती के उपन्यास, पृष्ठ-116

वहीँ, पृष्ठ-116

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-21

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ संख्या-25

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ संख्या-25

क्षमा गोस्वामी, नगरीकरण और हिंदी उपन्यास, पृष्ठ-188

उषा प्रियंवदा, नदी, उपन्यास, पृष्ठ-36

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-22

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ संख्या-44

आप्टे वामन शिवराम, संकृत हिंदी कोश, पृष्ठ-812

महेंद्र भल्ला, दूसरी तरफ उपन्यास, पृष्ठ-204

डॉ.सौ मंगल कप्पीकेरे, साठोत्तरी हिंदी लेखिकाओं की कहानियों में नारी, पृष्ठ-68

मन्नू भंडारी, एक इंच मुस्कान, पृष्ठ-23

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-22

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-60

डॉ. सुरेश सिन्हा, हिंदी उपन्यास, पृष्ठ-23, स्वराज प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2006

डॉ. माधवी बागी, देवेश ठाकुर के उपन्यास में नारी, पृष्ठ-118

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-31

डॉ.राजरानी शर्मा, हिंदी उपन्यासों में रुढियमुक्त नारी, पृष्ठ-102

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-28

डॉ.त्रिभुवन सिंह, हिंदी उपन्यास और यथार्थवादी लेखक, पृष्ठ- 586, स्वराज प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2006

डॉ.रामदरश मिश्र, हिंदी उपन्यास एक अंतर्यात्रा, पृष्ठ-93

डॉ. गणेशन, हिंदी उपन्यास साहित्य का अध्ययन, पृष्ठ-169

डॉ. माधवी बागी, देवेश ठाकुर के उपन्यासों में नारी, पृष्ठ-113

उषा प्रियंवदा का रचना संसार,

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-29

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-42

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-33

सपना दास
एम.फिल (शोधार्थी)
हिंदी विभाग
गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय
दूरभाष संख्या-7044355873
ईमेल पता-sapna070295@gmail.com

आदिवासी कथा साहित्य में स्त्री

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आदिवासी कथा साहित्य में स्त्री

लीना कुमारी मीना
शोधार्थी, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय
नई दिल्ली ११००६७

आदिवासी एवं आदिवासी साहित्य 

वर्तमान दौर में आदिवासी साहित्य अस्मितावादी विमर्शों की कड़ी में अपनी पहचान के लिए दस्तक दे चुका है दलित व स्त्री साहित्य के बाद, अब आदिवासी साहित्य अपनी प्रखर आवाज में सदियों से शोषित-पीड़ित आदिवासी समाज के संघर्षों को वाणी दे रहा है|

“भारत के लोग अधिकतर जनजातियों(एस.टी.)को आदिवासी कहते हैं|…..संस्कृत में आदिवासी शब्द का अर्थ है, किसी क्षेत्र के मूल निवासी जो आदिकाल से किसी स्थान विशेष में रहते चले आ रहे हैं| माना जाता है कि आदिवासी भारतीय प्रायद्वीप के सबसे प्राचीन बाशिंदे या मूल निवासी हैं|”[1] इसके अलावा यह भी मान्यता है कि “आर्यों के अतिक्रमण के समय आदिवासी पहले से ही भारतीय उपमहाद्वीप में रह रहे थे|”[2] अर्थात् प्राचीनकाल में आर्यों ने भारतवर्ष पर आक्रमण के दौरान यहाँ के मूल निवासियों में से कुछ को बंदी बना लिया व कुछ घने जंगलों में पलायन कर गये| बंदी बनाये जाने वाले लोगों को अछूत कहा जाने लगा एवं जो व्यक्ति समूह बनाकर घने जंगलों में पलायन कर गये; वे सभ्यता, संस्कृति, आचार–विचार से मुख्यधारा के समाज से बिल्कुल कट गये| ये लोग समूहों के रूप में रहने लगे, ऐसे लोगों को ही आदिवासी कहा जाने लगा|

अंग्रेज सरकार की औपनिवेशिक नीति में विकास के तहत जंगलों की कटाई शुरू हुई जिससे आदिवासियों के पारम्परिक रोजगार के साधन समाप्त हो गये और इन्हें आजीविका के लिए मजदूरी का विकल्प तलाशना पड़ा| अंग्रेजी प्रशासक प्रारम्भ में इन्हें बहादुर, मेहनती और सरल स्वभाव का मानते थे परन्तु जब इन आदिवासियों ने अंग्रेजों की स्वार्थपूर्ण नीतियों का विरोध किया तो उन्होंने इनकी अर्थव्यवस्था, धर्म, संस्कृति एवं रीति-रिवाजों का कोई सम्मान न करते हुए इन्हें घुमन्तू, असभ्य एवं जंगली घोषित कर दिया|

यद्यपि आदिवासी साहित्य की मौखिक रूप में एक लम्बी परम्परा रही है परन्तु अशिक्षा की वजह से उसका कोई लिखित इतिहास नहीं रहा| आजादी के बाद से ही आदिवासी समाज को साहित्य का विषय बनाया जाने लगा परन्तु उसमें उन्हें प्रकृति पर निर्भर, कमर पर बित्तेभर चिंदी लपेटने वाला अर्थात् एक अजूबे के रूप में पेश किया गया| स्वतंत्रता के पश्चात् ‘राष्ट्र निर्माण’ के लिए बनाई गयी नीतियों ने आदिवासी समाज के सामने व्यापक समस्याएं खड़ी कर दी| उन नीतियों की वजह से उनके जंगलों पर रहे परम्परागत अधिकार खत्म होते चले| औद्योगीकरण की नीतियों ने उनको अपने जल, जंगल, जमीन से बेदखल कर दिया, इसके तहत जो समाज अब तक आत्मनिर्भर था वही अब भूखा मरने लगा| ऐसे समय में योगेन्द्रनाथ सिन्हा, राजेन्द्र अवस्थी, शानी, मेहरुनिशा परवेज आदि लेखक-लेखिकाओं ने इस समाज को लेखनी का विषय बनाया| बंगला लेखिका महाश्वेता देवी के आदिवासी लेखन और उड़िया लेखक गोपीनाथ महंती ने आदिवासी लेखन के हिंदी अनुवादों से भी आदिवासी समाज की तरफ पाठक वर्ग का ध्यान खींचा,लेकिन आदिवासी समाज तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य में हाशिये पर ही बना रहा|

आदिवासी साहित्य और स्त्री 

आदिवासी समुदाय के हाशियेकरण की कोशिश 90 के दशक में सर्वाधिक हुई| 90 के दशक में भारत सरकार की वैश्वीकरण, उदारीकरण की नीतियों ने आदिवासी समाज को सर्वाधिक प्रभावित किया| उदारीकरण की नीतियों ने मुक्त व्यापार और मुक्त बाजार की व्यवस्था को स्थापित किया जिससे सीधे तौर पर आदिवासी समुदाय प्रभावित हुआ क्योंकि देश की सबसे अधिक वन एवं अन्य प्राकृतिक सम्पदा, खनिज सम्पदा आदिवासी क्षेत्रों में है| इस प्राकृतिक सम्पदा की लूट-खसोट के लिए नित्य नई वैश्विक कम्पनियां आदिवासी इलाकों में पहुँचने लगी है जिसके कारण आदिवासी समाज के जल, जंगल, जमीन उनसे छीने जाने लगे| सरकार उनकी स्थितियों पर गौर किए बिना उनके शोषण में उद्यमियों का साथ दे रही है- “छत्तीसगढ़, झारखण्ड और उड़ीसा में हाल के दिनों में वहाँ की सरकारों ने खनिज सम्पदा के अंधाधुंध दोहन में जुटी देश-विदेश की बड़ी कम्पनियों के इशारे पर जिस तरह से सूबे की गरीब, आदिवासी और पिछड़ी आबादी को विकास के ‘शत्रु-खेमे’ में डालकर उनके खिलाफ अभियान चलाया है, वह भारतीय लोकतंत्र के अब तक के इतिहास का सबसे शर्मनाक कारनामा है| लाखों को बेदखल किया गया है और असंख्य भूमि हड़पी गयी है| इस तरह के उद्योग-विस्तार के नाम पर जहाँ-जहाँ राज्य प्रशासन ने भूमि-हड़प अभियान को सफलतापूर्वक चलाया, सत्ताधारी खेमे और मीडिया के बड़े हिस्से ने उन सरकारों को ‘विकासवादी’ बताकर महिमामंडित किया है|” [3]इसी तरह के भूमि-हड़प के चक्कर में सिंगूर और नंदीग्राम में जिस तरह से सरकार ने गरीबों पर अत्याचार किए हैं वह रोंगटे खड़े करने वाले हैं| इससे विस्थापन की समस्या प्रमुख रूप से सामने आयी है| इस विस्थापन एवं पलायन की सर्वाधिक मार आदिवासी महिलाओं को झेलनी पड़ी है| जंगलों के उजड़ने व औद्योगिक शहरों के विकास के कारण आदिवासी महिलायें पहले से अधिक असुरक्षित हो गई हैं| शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाओं के प्रचार–प्रसार से आदिवासियों का मुख्यधारा के समाज से सम्पर्क स्थापित हुआ हैं| इससे इस समाज की स्त्रियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा| पितृसत्तात्मक व्यवस्था का प्रभाव आदिवासियों पर मुख्यधारा के समाज से ही आया है वरन् आदिवासी समाज में स्त्री एवं पुरुष की स्वतन्त्रता व समानता में विशेष अंतर नहीं है| इस समाज में स्त्रियों के सम्मान एवं स्वतन्त्रता में जब कोई दखल देता है तो वे इसका खुलकर विरोध करती हैं परन्तु गैर आदिवासी रचनाकारों ने मुख्यधारा के देखा-देखी आदिवासी साहित्य में भी स्त्री पर बाहरी संस्कृति लाद दी है इस सन्दर्भ में डॉ. रोज केरकेट्टा लिखती है- “आदिवासी शिष्ट साहित्य में स्त्री श्रम, सहिष्णुता, ममत्व से पूर्ण तो मिलती है, लेकिन अपने लिए और परिवार के लिए निर्णय लेती हुई कम मिलती है| वह जीने के लिए कठिन परिश्रम करती है, देस-परदेस जाती है, सेवा करती है, दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए|”[4] परन्तु वास्तविकता में ऐसा नहीं है यह केवल सामन्ती समाज की सोच है| आदिवासी कविता व लोककथाओं में यह स्त्री बराबरी की माँग करती हुई इस तरह नजर आती है-

“मैं जानती हूँ कि तुम क्या सोच रहे हो मेरे बारे में

वही जो एक पुरुष, एक स्त्री के बारे में सोचता है|

पर याद रखो

तुम्हारी मानसिकता की पेचीदा गलियों से गुजरती

मैं तलाश रही हूँ तुम्हारी कमजोर नसें

ताकि ठीक समय पर

ठीक तरह से कर सकूं हमला

और बता सकूं सरेआम गिरेबान पकड़

कि मैं वो नहीं हूँ जो तुम समझते हो|”

आदिवासी समाज में स्त्री अपनी आजादी में किसी की रोक-टोक स्वीकार नहीं करती है| यदि उसकी मान्यताएं इसमें उसके आड़े आती है तो वह इनका विरोध करती है| ‘शाम की सुबह’ उपन्यास में वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’ ने संध्या नामक युवती को कथा नायिका बनाया है जो जीवन में आने वाली कई समस्याओं से जूझते हुए समाजसेवा के निहितार्थ नर्स के व्यवसाय को अपनाती है| इस उपन्यास में स्त्री का आत्मसम्मान सर्वोपरि है| उसके जीवन में कई उलझने आती है परन्तु वह कुंठाग्रस्तता से बचते हुए अपने स्वाभिमान एवं नारीत्व को बनाए रखती है|

‘लौटते हुए’ उपन्यास में लेखक ने आदिवासी युवतियों के काम के लिए महानगरों की ओर तेजी से बढ़ते पलायन की समस्या को कथावस्तु का आधार बनाया है| इस उपन्यास में आदिवासी युवती ‘सलोमी’ कथा की नायिका है| महानगरों में इन युवतियों को विविध समस्याओं का सामना करना पड़ता है| वहाँ सभी लोग इनका अधिक से अधिक शोषण करना चाहते हैं, जिसमें देह शोषण भी शामिल है| पिछड़े हुए आदिवासी इलाकों में लोग सुधारवाद से प्रभावित होकर ईसाई धर्म में धर्मान्तरित हो गये परन्तु इससे उनकी सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है|

इसके अलावा इस उपन्यास में एक मुद्दा यह भी उठाया गया है कि माता-पिता एवं परिवार की देखभाल के एवज में आदिवासी स्त्रियों को पैतृक सम्पति में हिस्सा नहीं मिलता| माता-पिता के जीवित रहते हुए एवं उनकी सेवा करने के उपरांत भी, उनकी जमीन की उपज का उपभोग तक वे नहीं कर पाती हैं| उनकी विडम्बना है कि कमाकर कर लाए गए पैसों का उपभोग पूरा परिवार करता है, परन्तु उनके भविष्य के लिए तनिक भी चिंता नहीं करता|

‘छैला सन्दू’ मंगल सिंह मुंडा द्वारा रचित उपन्यास है| आदिवासी समाज स्त्री-पुरुष के प्राकृतिक प्रेम को सहजता से स्वीकार करने वाला समाज रहा है| कुल-जाति-गोत्र-पूंजी की दीवारें यहाँ प्रेम के रास्ते में खड़ी नहीं की जाती| लेकिन अपने स्वाभिमान को गिरवी रखकर प्रेम के आगे बिक जाना भी यहाँ स्वीकार्य नहीं है| इस उपन्यास का नायक छैला सांवले रंग का, छरहरे शरीर का, आकर्षक व्यक्तित्व और मानवीय गुणों से युक्त अपने समाज का चहेता पात्र है| सन्दू इलाके के सूबेदार की बेटी बुंदी से प्यार करता है लेकिन एक दिन इस बेमेल प्रीति की बात उजागर हो जाती है| ऊँची जाति और ऊँचे पद का गुमान अपनी बेटी के आदिवासी प्रेमी को स्वीकार कैसे सकता था? इस कारण सूबेदार सन्दू के गाँव पर अपनी फौज के साथ चढ़ाई करता है| मुंडा आदिवासी भी अपने प्रेम और स्वाभिमान की खातिर सन्दू का साथ देते हुए हाकिम से युद्ध करते हैं| किन्तु आदिवासियों की संयुक्त ताकत के सामने हाकिम को झुकना पड़ता है| लेकिन अपने स्वाभिमान की लड़ाई में वह सन्दू और बुंदी के प्रेम और विवाह के साथ एक प्रतियोगिता की शर्त जोड़ देता हैं परन्तु शर्त जीतकर अपने प्रेम को उपहार में एक वस्तु की तरह पाना, स्त्री-पुरुष समता में विश्वास करने वाली आदिवासी संस्कृति का रिवाज नहीं होता| अत: शर्त में मिले दान को नकारकर सन्दू अपने गाँव लौट आता है| लोगों की साजिश के तहत सन्दू की मौत हो जाती है एवं सन्दू की मौत से उसका इंतजार कर रही बुंदी के भी प्राण पखेरू उड़ जाते है| इस उपन्यास के माध्यम से ज्ञात होता है कि स्त्री-पुरुष की सहज मैत्री आदिवासी समाज में उदारता की द्योतक है|

‘शव काटने वाला आदमी’ उपन्यास येसे दरजे थोंगछी द्वारा लिखित है| अरुणाचल प्रदेश की एक जनजाति है मनपा| बौद्ध धर्मावलम्बी इस जनजाति के लोग मृतकों को एक सौ आठ टुकड़ों में काटकर नदी में बहा देते हैं| इसी रीति के आधार पर इस उपन्यास की कहानी केन्द्रित है| मनपा जनजाति में स्त्री–पुरुषों के मध्य समानता है| स्त्रियाँ भी पुरुषों के प्रत्येक कार्य में बराबर की भागीदारी निभाती है| इस उपन्यास में स्त्री बेटी, पत्नी, माँ, प्रेमिका व दोस्त के रूप में उपस्थित है| वह अपने प्रत्येक रिश्ते को बखूबी निभाती है|

फादर पीटर पौल एक्का ने भी ‘मौन घाटी’, ‘जंगल के गीत’, ‘पलाश के फूल’ एवं ‘सोनपहाड़ी’ में आदिवासी जनजीवन को अपने उपन्यासों की विषयवस्तु बनाया है| ‘मौनघाटी’ उपन्यास में रांची के निकट ‘अम्बाघाट’ नामक आदिवासी इलाका केंद्रबिंदु के रूप में है| उपन्यास में सरोज, सरस्वती, सुधारानी आदि स्त्रीपात्र है; ये सभी इस इलाके के सुधार हेतु प्रयासरत हैं, परन्तु अस्पताल का कर्मचारी हरिया, फोरेस्टर व कुछ लोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए यहाँ के लोगों का भरपूर शोषण करते हैं तथा औरतों को वे केवल भोग की वस्तु समझते हैं|

‘जंगल के गीत’ उपन्यास में लेखक ने आदिवासियों के एक गाँव को केंद्रबिंदु बनाया है जो दुनिया के नियमों से बेखबर अपने अलग संसार में खुश है| दिकु समाज का शोषणतन्त्र यहाँ भी अपना शिकंजा फैलाये हुए है जो तरह- तरह के हथकंडे अपनाकर इन आदिवासियों का शोषण करने में कोई कसर नहीं छोड़ता| इन आदिवासियों के मध्य पितृसत्तात्मक व्यवस्था हावी नहीं है| समाज के नियमों-उपनियमों को बनाने में यहाँ स्त्री व पुरुष अपनी समान भागीदारी निभाते हैं एवं सभी मिलकर शोषक वर्ग का प्रतिरोध करते हैं|

‘पलास के फूल’ एवं ‘सोनपहाड़ी’ उपन्यासों में भी फादर पीटरपौल एक्का ने आदिवासी समुदायों के रहन-सहन, संस्कृति एवं सामाजिक जीवन को बखूबी उकेरा है| इस समुदाय में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को लेखक ने बेहतर ढंग से पेश किया है एवं दिखाया है कि औरतें किस तरह से सामाजिक व्यवस्था में अपनी भागीदारी भलीभांति निभाती हैं|

‘पूर्वोत्तर की आदिवासी कहानियाँ’ कहानी संकलन ‘रमणिका गुप्ता’ द्वारा सम्पादित है| पूर्वोत्तर की कहानियाँ अपनी संस्कृति, भाषा, भूगोल आदि कई मायनों में शेष भारत से अलग है| बीस कहानियों के संग्रह में दस भाषा की कहानियाँ शामिल है| असम से बोडो, कार्बी और तीवा भाषा की तेरह कहानियाँ हैं| मिजो और खासी की तीन-तीन और तैनिडे, लेपचा और शेरदुकपेन की दो-दो और कोकबोरोक व मैतेई भाषा की एक-एक कहानी है| आदिवासी महिला की स्थिति सामाजिक परम्पराओं रीति-नीतियों और सामाजिक नियमों के कम बंधन के चलते आजाद रहती है पर आर्थिक बदहाली और पुरुष की सोच कई बार वैसी क्रूर रही है जितनी कि मुख्यधारा में देखने को मिलती है| वह उतनी ही प्रताडना की शिकार है जितनी भारतीय औरत रही है| ‘बाँझ’ कहानी में पुरुष से औरत की कमजोर स्थिति व त्रासदी को उजागर किया है| रोबांसी हमेशा अपने पति द्वारा पीटी जाती है| उसकी पिटाई में सास-ससुर की मूक सहमति रहती है क्योंकि वह बाँझ है| वह उनके आरोपों और पति की पिटाई से तंग आकर अपने पूर्व प्रेमी गजोम की झोपड़ी में एक अंधेरी रात में दस्तक देकर उसे पत्नी बनाने का खुला प्रस्ताव देती है| परन्तु गजोम की चुप्पी का अर्थ ना समझकर वह रात में ही घर लौट आती है| पति दूसरे का बच्चा पत्नी की कोख में पलता देख कर उसे बुरी तरह से पीटता है| इस कहानी से पता चलता है कि कई बार आदिवासी औरत भी अन्य औरतों की भांति पति की ज्यादतियाँ सहती है| पूर्वोत्तर आदिवासी समाज की सांस्कृतिक झांकी इस कहानी संग्रह में संकलित कहानियों के माध्यम से मिलती है|

‘पगहा जोरी-जोरी रे घाटों’ में आदिवासी लेखिका रोज केरकेट्टा द्वारा लिखित कहानियाँ संकलित है| इन कहानियों में झारखण्ड के ग्रामीण समाज के प्रति उनका गहरा जुड़ाव दिखाई देता है| भंवर, घाना लोहार का, कोंपलों को रहने दो, केराबांझी इत्यादि कहानियों में लेखिका स्त्री अधिकारों व उनकी प्राप्ति को लेकर प्रतिबद्ध है| भंवर एक आदिवासी विधवा महिला की कहानी है जिसे कानूनी रूप से अधिकार मिलने पर भी सामाजिक कमजोरी के कारण वह इनका उपयोग नहीं कर पाती है इससे समाज में स्त्री की वास्तविक स्थिति का बोध होता है| ‘केराबांझी’ पुरातन परम्परा का पालन करने वाले एक किसान कालीचरण की कहानी है जो परिवार नियोजन को एक बुराई के रूप में देखता है परन्तु उसके दो बेटे व बहू इसका विरोध करते हैं| उसकी बहू सिर्फ एक बेटी पैदा करती है एवं स्वयं को केराबांझी कहने पर कोई शर्म महसूस नहीं करती| इस कहानी में स्त्री-चेतना की झलक देखने को मिलती है|

‘अपना-अपना युद्ध’, ‘जंगल की ललकार’ व ‘देने का सुख’ कहानी संकलन वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’ द्वारा रचित है| इन कहानी संकलनों में उन्होंने आदिवासी समाज में विद्यमान पितृसत्तात्मक व्यवस्था एवं आदिवासी स्त्रियों की स्थिति का जिक्र किया है|

‘राजकुमारों के देश में’ एवं ‘क्षितिज की तलाश’ फादर पीटर पाल एक्का द्वारा रचित कहानी संग्रह है| इन कहानियों में भी लेखक ने आदिवासी समाज की विसंगतियों को उजागर किया है|

‘सिसकियाँ’ कहानी संग्रह विजय सिंह मीणा द्वारा रचित है| विगत दशकों में गाँव की दशा-दुर्दशा में भारी बदलाव आया है| आधुनिकता के संसाधन शहरों-कस्बों से होते हुए गाँव तक पहुंच गये हैं एवं गाँव भी छल-कपट और राजनीतिक कुचेष्टाओं के शिकार हो रहे हैं| अधिकांश गाँव का जीवन आज भी अभाव और उत्पीड़न का जीवन है| नारी जीवन तो और भी दुखद है क्योंकि इन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ रही है, जहाँ सामाजिक बन्धनों ने इन्हें कठोर बेड़ियों में जकड़ रखा है, वहीं वे अपने परिवार में ही घुट-घुट कर जीवन बिताने को विवश हो जाती हैं| इनकी लगभग सारी कहानियाँ राजस्थान के ग्रामीण समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं|

मंगल सिंह मुंडा की कहानियाँ ‘महुआ का फूल’ नामक कहानी संग्रह में संकलित हैं| इनकी कहानियाँ समयानुकूल है| इन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से समाज के नग्न और कठोर यथार्थ को बड़े खुले और स्पष्ट ढंग से उजागर करने का प्रयत्न किया है| कहानियों में स्वाभाविकता एवं मनोवैज्ञानिकता है| ‘महुआ का फूल’ शीर्षक कहानी में लेखक ने पुरुषों के अत्याचारों का विरोध करती हुई नारी को दर्शाया है| आदिवासी स्त्री राधिकाबाई करमु सरपंच के आदमी बिरजू को छुरा मारकर हत्या कर देती है और इस प्रकार वह स्त्रियों के ऊपर होने वाले पुरुषों के अत्याचारों का विरोध करती है जिससे समाज में स्त्रियों का सिर ऊँचा उठता है| ‘सिंदूर की डिबिया’ शीर्षक कहानी दहेज विरोधी एक लड़की के त्याग की कहानी है| दहेज के कारण सुनीता की शादी भूपति बाबू नहीं कर पाते| सुनीता पिता के दर्द को पहचान जाती है और अचानक एक दिन घर से चुपचाप निकल पडती है|

 

  1. पृष्ठ स. 29,आदिवासी कौन-रत्नाकर भेंगरा,सी.आर बिजोय,सम्पादिका- रमणिका गुप्ता

  2. पृष्ठ स.37भारत का इतिहास,रोमिला थापर- भाग 1 ,पेंग्विन प्रकाशन, नई दिल्ली

  3. पृष्ठ स.13,उदारीकरण और विकास का सच, सम्पादक- उर्मिलेश, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स(प्रा.)लिमिटेड ,नई दिल्ली-2010

  4. पृष्ठ संख्या197, आदिवासी साहित्य विमर्श- लेखिका-वंदना टेटे (सम्पादक- गंगा सहाय मीणा)

जनता कर्फ्यू

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गंगा धर शर्मा 'हिन्दुस्तान'

जनता-कर्फ्यू
पात्र
माँ
पुंडू (10 -12 वर्ष का एक बालक)
(मंच सज्जा : ड्राइंग रूम का दृश्य : एक सोफे पर बैठी माँ, सामने रखी सेंटर-टेबल पर बिछे अख़बार पर फैला कर रखी सब्जियों को साफ़ कर रही है. बीच बीच में सोफे पर रखा मोबाईल उठाकर उसको ऐसे देखती है मानों किसी के व्हाट्स-अप संदेश पढ़ रही हो. तभी मंच पर पुंडू आता है. उसके हाथ में क्रिकेट खेलने का बैट है, जिससे वह हवा में ही किसी अदृश्य गेंद को मारने का अभ्यास कर रहा है.)
पुंडू : माँ! आज मेरी छुट्टी है.
माँ : हाँ बेटा! आज सबकी छुट्टी है.
पुंडू : पापा की भी ?
माँ : हाँ..
पुंडू : पर पापा तो रोज ऑफिस जाते हैं.
माँ : पर अब सब अपने घर पर रहेंगे.
पुंडू : वाह ! तब तो मजा आ जायेगा. अभी तो मैं अपने दोस्तों के साथ खेलने बाहर जा रहा हूँ.
( कहकर पुंडू बाहर जाने को उद्धत होता है . माँ उसे जाने से रोकने के लिए कहती है.)
माँ : नहीं ! आज घर पर ही खेलो.
(पुंडू थोड़ा ठहरकर)
पुंडू : मैं अभी आ ही रहा हूँ. बस, थोड़ी देर राहुल के साथ क्रिकेट खेलने के बाद सीधा घर आ जाऊँगा.
(कहकर पुंडू फिर बाहर जाने लगता है, मगर माँ फिर उसे जाने से मना कर देती है.)
माँ : नहीं बेटा! आज घर से बाहर नहीं जाना..
पुंडू : मगर क्यों… आज तो छुट्टी है ना..
माँ : छुट्टी तो है मगर फिर भी…
पुंडू : फिर क्यों ?
(कहते हुए पुंडू अपनी माँ के पास ही सोफे पर बैठ जाता है.)
माँ : क्योंकि आज जनता-कर्फ्यू है .
पुंडू : जनता-कर्फ्यू … मतलब..
माँ : तुम्हें पता है अभी एक बीमारी पूरी दुनिया में फैली हुई है..
पुंडू : हाँ, वो तो मुझे पता है..
माँ : क्या नाम है उसका ..
पुंडू : कोरोना ..कोरोना नाम है …रोज तो टीवी पर आता है…
माँ : ये कोरोना बड़ी खतरनाक बीमारी है.
पुंडू : हाँ, यह तो हमारे सर भी बता रहे थे.
माँ : क्या बताया है सर ने …
पुंडू : वो बता रहे थे कि यह बीमारी चीन की वुहान नामक जगह के बहुत से लोगों को मारने के बाद धीरे-धीरे पूरी दुनिया में पहुँच गयी है.
माँ : बिल्कुल ठीक ! सही कहा तुम्हारे सर ने..
पुंडू : हाँ , सर कह रहे थे कि जब तक कोरोना रहेगा, तुम्हारी छुट्टी है..
माँ : अच्छा ! तुम ही बताओ, कोई बीमार होता है तो छुट्टी कौन लेता है ?
पुंडू : जो बीमार होता है..
माँ : और बाकी लोग ?
पुंडू : वो तो स्कूल आते हैं…
माँ : फिर तुम्हारी छुट्टी क्यों की गई ?
पुंडू : ये तो मुझे नहीं पता..
माँ : इसलिए कि जो स्वस्थ हैं वे बीमार न् पड़ें..
पुंडू : अच्छा मम्मी, अभी तो मैं खेल के आता हूँ , फिर सारी बातें सुनूंगा ..
(कहकर पुंडू एक बार फिर बाहर जाने के लिए सोफे से उठने लगता है तो उसकी माँ उसका हाथ पकड़ कर उसे फिर सोफे पर बिठा देती है.)
माँ : नहीं ! बताया तो है कि जनता-कर्फ्यू है…
पुंडू : फिर वही जनता-कर्फ्यू ? ये है क्या ?
माँ : कोरोना जैसी भयानक बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे में न फैले, इसके लिए हर व्यक्ति का एक दूसरे से दूर रहना बहुत जरूरी है. हम सब लोग अपने-अपने घरों में रहकर बीमारी को फैलने से रोकेंगे.
पुंडू : पर मम्मी ! मेरा दोस्त तो बिल्कुल ठीक है. उसके साथ खेलने से मैं बीमार नहीं हो सकता.
माँ : तुम्हारी बात ठीक है पर यह जो कोरोना है ना, इसके वायरस बहुत ही जिद्दी किस्म के हैं. यह किसी भी वस्तु पर पहुँच जाते हैं तो वहाँ 10-12 घंटे तक जिंदा रह सकते हैं और उस जगह को जरा सा भी छू लेने वाले व्यक्ति को भी यह बीमार कर सकते हैं. लेकिन 12 घंटे तक कोई जीवित प्राणी इन्हें न् छुए तो यह वायरस स्वयं ही खत्म हो जाता है.
पुंडू : तो मम्मी मैं तो बाहर बस खेलूँगा. किसी और चीज को मैं बिल्कुल भी नहीं छुऊँगा…
(पुंडू फिर से उठने का उपक्रम करता है. इस बार माँ उसका क्रिकेट-बैट उससे लेकर सोफे के किनारे रख देती है.)
मम्मी : नहीं ! गार्डन में, पार्क की बेंच, दरवाजे, फेंसिंग और रेलिंग में कहीं भी यह वायरस हुआ तो वहाँ जाने वालों के साथ उनके घर जा सकता है. इसीलिए तो सबने मिलकर निश्चय किया है कि सब 14 घंटे तक अपने घरों में ही रहेंगे. अपने-आप सारी जनता का अपने घरों में बन्द रहना ही जनता-कर्फ्यू है.
पुंडू : अब मैं सब समझ गया. मैं अपने दोस्तों को अभी फोन करता हूँ….
(पुंडू मम्मी के पास रखा मोबाईल उठा लेता है.)
माँ : किसलिए…
पुंडू : उन्हें भी घर पर रहकर जनता-कर्फ्यू को सफल बनाना होगा.
(सभी दर्शकों को संबोधित करते हुए पुंडू हाथ की मुट्ठी बंधकर हवा में लहराते हुए नारा लगता है.)
कोरोना तब नहीं रहेगा जब बच्चे खेलें घर के भीतर .
जनता-कर्फ्यू के प्रभाव से भाग जाये कोरोना डरकर …
(पुंडू फोन पर नंबर मिलाने लगता है, और पर्दा गिर जाता है.)

गंगा धर शर्मा ‘हिन्दुस्तान’
472 बी के कौल नगर, अजमेर (राज.)
मोबाईल नं. : 9414368582ggggg 35e0ad87

एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी- रेणु साहित्य का समकालीन संदर्भ

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प्रेस-विज्ञप्ति

ल.ना. मिथिला विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में दिनांक 24/02/2021 को एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन होने जा रहा है, जिसका विषय है-"रेणु साहित्य का समकालीन संदर्भ"। इस संगोष्ठी में स्मारिका का प्रकाशन होना है, इस निमित्त विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा शिक्षकों से शोध-आलेख (अधिकतम 3000 शब्दों में) तथा शोध-सार (अधिकतम 300 शब्दों में) आमंत्रित किए जाते हैं। आलेख समर्पित करने की अंतिम तिथि 10 फरवरी, 2021 निर्धारित है। आलेख क्रुतिदेव-10 फाॅन्ट में टंकित होना चाहिए। आलेख ईमेल नंबर- rajendra13011960@gmail.com पर प्रेषित कर हार्ड काॅपी विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग मे समर्पित करना अनिवार्य है। साथ ही ज्ञात हो कि संगोष्ठी में प्रतिभागिता हेतु विद्यार्थी के लिए- 200, शोधार्थी के लिए 500 तथा शिक्षक के लिए 700 रुपये शुल्क निर्धारित है, जिसका नगद भुगतान विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग में करना होगा।

डाॅ. विजय कुमार
प्रभारी विभागाध्यक्ष
विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
लनामिवि, दरभंगा।