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लोकप्रिय साहित्‍य की अवधारणा- सुशील कुमार

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लोकप्रिय साहित्‍य की अवधारणा

सुशील कुमार
 शोधार्थी
हिन्दी विभाग ,हैदराबाद विश्वविद्यालय
हैदराबाद -500046 .
मोबाइल न॰-8789484808

साहित्‍य के दो रूप मिलते हैं- एक, लोकप्रिय साहित्‍य और दूसरा, कलात्‍मक साहित्‍य। कलात्‍मक साहित्‍य को गंभीर साहित्‍य माना जाता है, जबकि लोकप्रिय साहित्‍य को सतही साहित्‍य। साधारणत: माना जाता है कि जो साहित्‍य व्‍यापक जनसमुदाय के बीच सहज रूप में स्‍वीकृत और ग्राह्य हो, वह लोकप्रिय साहित्‍य है। सहजता, सरलता और सुबोधता ऐसे साहित्‍य के अनिवार्य गुण माने जाते हैं। लेकिन कोई साहित्‍य व्‍यापक जनसमुदाय के बीच सिर्फ सहजता, सरलता और सुबोधता के कारण लोकप्रिय नहीं होता। वह साहित्‍य व्‍यापक जनसमुदाय के बीच लोकप्रिय तभी होगा, जब उसका जुड़ाव आम जन से होगा। जब आम जन-जीवन की वास्‍तविकताएँ और आकांक्षाएँ उस साहित्‍य में सहज, सरल रूप में अभिव्‍यक्‍त हो, तभी वह साहित्‍य लोकप्रिय साहित्‍य होगा। वहीं कलात्‍मक साहित्‍य को गंभीर लेखन बताकर आमजन से दूर किया जाता रहा है। कलात्‍मक साहित्‍य भी व्यापक जनसमुदाय से जुड़ा हो सकता है तथा वह भी लोकप्रिय साहित्‍य हो सकता है।

लोकप्रिय साहित्‍य में लोकप्रिय है क्‍या? लोकप्रिय का अर्थ है- जो लोग को प्रिय हो। लेकिन यहाँ लोक का अर्थ क्‍या है? 

हिन्‍दी साहित्य कोश, भाग-1 में ‘लोक’ के संबंध में लिखा गया है कि- ‘‘शब्‍दकोशों में लोक शब्‍द के कितने ही अर्थ मिलेंगे, जिनमें से साधारणत: दो अर्थ विशेष प्रचलित हैं। एक तो वह जिससे इहलोक, परलोक अथवा त्रिलोक का ज्ञान होता है। वर्तमान प्रसंग में यह अर्थ अभिप्रेत नहीं। दूसरा अर्थ लोक का होता है- जनसामान्‍य- इसी का हिन्‍दी रूप लोग है। इसी अर्थ का वाचक ‘लोक’ शब्‍द साहित्‍य का विशेषण है।’’ लोकप्रिय साहित्‍य में लोकप्रिय में लोक का अर्थ सर्वजन, सर्ववर्ण, सब लोग से ही है।

हिन्‍दी का ‘लोक’ शब्‍द ‘फोक’ का पर्याय है। इस फोक के विषय में इन्‍साइक्‍लोपीडिया ब्रिटानिका ने बताया है कि आदिम समाज में तो उसके समस्‍त सदस्‍य ही लोक (फोक) होते हैं और विस्‍तृत अर्थ में तो इस शब्‍द से सभ्‍य राष्‍ट्र की समस्‍त जनसंख्‍या को भी अभिहित किया जा सकता है कि सामान्‍य प्रयोग में पाश्‍चात्‍य प्रणाली की सभ्‍यता के लिए ऐसे प्रयुक्‍त शब्‍दों में, जैसे लोकवार्ता (फोक लोर), लोक संगीत (फोक म्‍यूजिक) आदि में इसका अर्थ संकुचित होकर केवल उन्‍हीं का ज्ञान कराता है, जो नागरिक संस्‍कृति और सविधि शिक्षा के प्रवाहों से मुख्‍यत: परे हैं, जो निरक्षर भट्टाचार्य हैं अथवा जिन्‍हें मामूली सा अक्षर ज्ञान है, ग्रामीण और गँवार।’’ यहाँ लोक को दो अर्थों में प्रयोग किया गया है- एक का अर्थ है साधारण जन, जिसमें सभी लोग सम्मिलित हैं, दूसरा अर्थ इसका संकुचित है जो नागरिक संस्‍कृति और सविधि शिक्षा के प्रवाह से परे है अर्थात् जो ग्रामीण है, गँवार है, देहाती है। लेकिन लोकप्रिय साहित्‍य में लोक का अर्थ साधारण जन से ही है। इसलिए हमें इसका अर्थ साधारण जन ही स्‍वीकार्य होगा।

हिन्‍दी साहित्‍य कोश, भाग-1 में ही लोक को इस रूप में परिभाषित किया गया है- ‘‘लोक मनुष्‍य समाज का वह वर्ग है, जो अभिजात्‍य संस्‍कार, शास्‍त्रीयता और पाण्डित्‍य की चेतना और पाण्डित्‍य के अहंकार से शून्‍य है और जो एक परंपरा के प्रवाह में जीवित रहता है।’’ यहाँ ‘लोक’ का अर्थ उन लोगों से है जो अभिजात्‍य संस्‍कार, शास्‍त्रीयता और पांडित्‍य की चेतना और पांडित्‍य ने अहंकार से शून्‍य है अर्थात् जो गँवार है, अनगढ़ है, देहाती है।        

साधारण शब्‍दों में ‘लोक’ का अर्थ है- सभी लोग, आम जन, साधारण जन। और इस अर्थ में ‘लोक’ में सभी लोग शामिल हो जाते हैं। लेकिन विशेष अर्थ में ‘‘यह ‘विशेष’ से अलग होता है। कला के क्षेत्र में हम लोक और शास्‍त्रीयता का विभाजन देखते हैं, जिसमें शास्‍त्रीयता का मतलब ही परिष्‍कृत और व्‍याकरणिक होता है, जबकि लोक का मतलब अनगढ़ होता है।’’ 

लोकप्रिय का अर्थ है – जो लोक को प्रिय हो अर्थात् जो जनसामान्‍य को प्रिय हो अर्थात् पसंद हो, रुचिकर हो। अंग्रेजी में लोकप्रिय का पर्याय है – ‘पोपुलर’। पोपुलर अच्‍छी तरह से पसंद किये जाने की सामाजिक स्थिति है, जिसका प्रसार व्‍यापक होता है। अर्थात् जन समुदाय द्वारा अच्‍छी तरह से जानी पहचानी गई और अच्‍छी तरह से पसंद की गई चीज पोपुलर होती है। लोक में प्रसिद्धि से ही लोकप्रियता का पता चलता है।

‘लोकप्रिय साहित्‍य’ क्‍या है? लोकप्रिय साहित्‍य किसको कहेंगे? लोकप्रिय साहित्‍य के स्‍वरूप को स्‍पष्‍ट करते हुए मैनेजर पाण्‍डेय ने लिखा है- ‘‘आम तौर पर माना जाता है कि जो साहित्‍य और कला व्‍यापक जनसमुदाय के बीच सहज रूप में ग्राह्य और स्‍वीकार्य हो, वह लोकप्रिय है।’’ यहाँ मैनेजर पाण्‍डेय कहते हैं कि वही साहित्‍य और कला लोकप्रिय होगा, जो व्‍यापक जनसमुदाय को ग्राह्य और स्‍वीकार्य हो और व्‍यापक जनसमुदाय के बीच उनकी स्‍वीकृति और ग्रहण भी सहज रूप में हो। आगे वे लोकप्रिय साहित्‍य के गुणों की चर्चा करते हैं। वे कहते हैं- ‘‘सरलता, सहजता और सुबोधता आदि ऐसे साहित्‍य के अनिवार्य गुण हैं।’’ अर्थात् वही साहित्‍य लोकप्रिय होगा, जो सरल, सहज और सुबोध हो। वे सरलता, सहजता और सुबोधता को लोकप्रिय साहित्‍य के लिए अनिवार्य गुण तो बतलाते हैं, लेकिन वे यह भी कहते हैं कि – ‘‘व्‍यापक जनसमुदाय के बीच कोई साहित्‍य केवल सरलता और सुबोधता के कारण लोकप्रिय नहीं होता। लोकप्रियता कला या साहित्‍य के रूप की ही विशेषता नहीं है। वही साहित्‍य व्‍यापक जनता के बीच लोकप्रिय होताहै जिसमें जनजीवन की वास्‍तविकताएँ और आकांक्षाएँ सहज-सुबोध रूप में व्‍यक्‍त होती है। इसलिए लोकप्रियता का संबंध साहित्‍य के रूप के साथ-साथ उसकी अंतर्वस्‍तु, उस अंतर्वस्‍तु में मौजूद यथार्थ चेतना और उस यथार्थ चेतना में निहित विश्‍व दृष्टि से भी होता है। केवल रूप संबंधी लोकप्रियता सतही होती है और रचना वर्ग भी सतही बनाती है।’’ 

वे लोकप्रियता का संबंध सिर्फ रूप से नहीं जोड़ते वे उसे जोड़ते हैं रूप के साथ, उसकी अंतर्वस्‍तु से, अंतर्वस्‍तु में मौजूद यथार्थ चेतना से और यथार्थ चेतना में मौजूद विश्‍व दृष्टि से। जिस साहित्‍य में ये गुण मौजूद होगा, वह लोकप्रिय साहित्‍य तो होगा ही, गंभीर भी होगा और कालजयी भी। वे स्‍पष्‍ट कहते हैं कि सरलता और सुबोधता के कारण ही कोई साहित्‍य लोकप्रिय नहीं होता तथा केवल रूप संबंधी लोकप्रियता उस साहित्‍य को सतही ही बनाएगा, गंभीर और कालजयी नहीं।

लोकप्रिय साहित्‍य को चवन्‍नी छाप साहित्‍य सस्‍ता साहित्‍य, सतही साहित्‍य, फुटपाथी साहित्य, घटिया साहित्‍य, घासलेटी साहित्‍य, व्‍यावसायिक साहित्‍य, बाजारू साहित्‍य, भीड़ का साहित्‍य, लुगदी साहित्‍य आदि कहा जाता है। लेकिन साहित्‍य के समाजशास्‍त्र में इसे लोकप्रिय साहित्‍य के नाम से ही जाना जाता है।

संदर्भ  

हिन्‍दी साहित्‍य कोश, भाग-1 – प्रधान संपादक धीरेन्‍द्र वर्मा, पृ.सं. 747

  हिन्‍दी साहित्‍य कोश, भाग-1 – प्रधान संपादक धीरेन्‍द्र वर्मा, पृ.सं. 747

  हिन्‍दी साहित्‍य कोश, भाग-1 – प्रधान संपादक धीरेन्‍द्र वर्मा, पृ.सं. 747

  लोकप्रिय शब्‍द सुनते ही बौद्धिक वर्ग के कान खड़े हो जाते हैं – प्रभात रंजन, दिनांक 28 मई 2012, जानकीपुल.कॉम   

  साहित्‍य और समाजशास्‍त्रीय दृष्टि – मैनेजर पाण्‍डे, पृ.सं. 330

  साहित्‍य और समाजशास्‍त्रीय दृष्टि – मैनेजर पाण्‍डे, पृ.सं. 330

  साहित्‍य और समाजशास्‍त्रीय दृष्टि – मैनेजर पाण्‍डे, पृ.सं. 330

हिंदी कहानी का नाट्य रूपांतरण – कथानक के स्तर पर: चंदन कुमार

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people standing on stage with lights turned on during nighttime
Photo by Erik Mclean on Unsplash

हिंदी कहानी का नाट्य रूपांतरण – कथानक के स्तर पर

चंदन कुमार

शोधार्थी

हिंदी विभाग

गोवा विश्वविद्यालय

संपर्क: 8390122193

ईमेल: chandankumar3491@gmail.com

सारांश

कहानियों में भाव बोध को अपनी भाव भंगिमा के साथ प्रस्तुत करना उसका नाट्य रूपांतरण है । विभिन्न प्रकार से घटना, कथा अथवा कहानी कहने की शैली रूपांतरण की जननी है । वर्तमान समय में रूपांतरण एक अनूठी कला की तरह है जो वर्तमान समय में खूब हो रहा है । कविताओं और कहानी का नाटक में, कहानी और नाटक का फिल्मों में रूपांतरण तेज़ी से हो रहा है । अभिव्यक्ति और कथानक को नए रूप में परिवर्तित कर के मंच पर लाया जा रहा है । ध्यातव्य हो कि एक विधा से दूसरी विधा में परिवर्तित होने पर भाषा, काल, दृश्य, संवाद भी बदल जाते हैं । यह बदलने के साथ मर्म को उसी अभिव्यक्ति से साथ प्रस्तुत करना ही नाट्य रूपांतरण को सही अर्थ देता है ।

बीज शब्द

कहानी, रूपांतरण, भाव, भंगिमा

आमुख

हिंदी कहानी का इतिहास साहित्य की दृष्टी से लगभग दो सौ पचास का है किन्तु कहानी कहने और सुनने की प्रथा अति प्राचीन है । किस्सागोई की परम्परा प्रायः बैठकों में होती ही रहती है । किसी घटना या बात को कहने की शैली से बात का महत्व और अधिक हो जाता है । जितना अधिक प्रभावशाली वक्तव्य होता है उसे उतनी अधिक रुचि से सुना जाता है । “कहानी सुनाने की एक सुदीर्घ परम्परा हमारे देश में रही है लेकिन आज जब एक प्रशिक्षित अभिनेता मंच पर कहानी करना चाहता है तो कई सवाल उठ खड़े होते हैं क्या रंगमंच पर लाने के कहानी के अपने अस्तित्व को बदलना होगा…”[1] कहानियों में भाव बोध को अपनी भाव भंगिमा के साथ प्रस्तुत करना उसका नाट्य रूपांतरण है । विभिन्न प्रकार से घटना, कथा अथवा कहानी कहने की शैली रूपांतरण की जननी है । विश्व साहित्य की अनेक विधाओं का अलग-अलग स्वरूप होता है, न केवल उनकी रचना प्रक्रिया अलग होती है बल्कि उनके तत्व भी एक दूसरे से बिल्कुल पृथक होते हैं । उनके भीतर संवेदना का स्तर भी अलग होता है । किसी विधा में रची गई रचना के मर्म को अभिव्यक्त करना रूपांतरण के लिए सबसे जरूरी अंग है । इसके साथ-साथ यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि साहित्यिक विधाओं का स्वरूप, समय और आवश्यकता के अनुसार बदलता रहता है । वर्तमान समय में रूपांतरण एक अनूठी कला की तरह है जो वर्तमान समय में खूब हो रहा है । कविताओं और कहानी का नाटक में, कहानी और नाटक का फिल्मों में रूपांतरण तेज़ी से हो रहा है । अभिव्यक्ति और कथानक को नए रूप में परिवर्तित कर के मंच पर लाया जा रहा है । ध्यातव्य हो कि एक विधा से दूसरी विधा में परिवर्तित होने पर भाषा, काल, दृश्य, संवाद भी बदल जाते हैं । यह बदलने के साथ मर्म को उसी अभिव्यक्ति से साथ प्रस्तुत करना ही नाट्य रूपांतरण को सही अर्थ देता है ।

कहानी का नाटक में रूपांतरण करने के लिए सबसे पहले कहानी और नाटक में वैविध्य तथा समानताओं को समझना आवश्यक है । जहाँ कहानी का संबंध लेखक और पाठक से जुड़ता है वहीं नाटक का नाटककार, निर्देशक, पात्र, दर्शक, श्रोता एवं अन्य लोगों को एक दूसरे से जोड़ता है । सुनने से अधिक दृश्य का स्मृतियों से गहरा संबंध होता है इसलिए नाटक एवं फिल्म को लोग देर तक याद रखते हैं । कथा साहित्य से जितना रंगमंच ने लिया है उससे कहीं ज्यादा सिनेमा से कथा साहित्य से रचनाएँ ली हैं और उसे नए आयाम दिए हैं । सिनेमा के पास मंच से अतिरिक्त अवकाश होता है यही कारण है कि गोदान, पंचलाइट, तीसरी कसम, देवदास, उसने कहा था, चीफ की दावत, दोपहर का भोजन, चंद्रकांता, सद्गति आदि के रूपांतरण कई बार और कई तरह से हुए हैं । ‘कथा’ अंतर्गत कार्यव्यापार की योजना को ‘कथानक’ (P।ot) कहते हैं । अंग्रेजी में ‘कथावस्तु’ को ‘प्लाट’ कहा जाता है । ‘प्लाट’ अरस्तु के ‘माइथास’ का अंग्रेजी रूपान्तरण है ।”[2] ‘कथानक’ और ‘कथा’ दोनों ही शब्द संस्कृत ‘कथ’ धातु से उत्पन्न हैं । संस्कृत साहित्यशास्त्र में ‘कथा’ शब्द का प्रयोग एक निश्चित काव्यरूप के अर्थ में किया जाता रहा है किंतु “कथा शब्द का सामान्य अर्थ है- वह जो कहा जाए ।”[3] यहाँ कहने वाले के साथ-साथ सुनने वाले की उपस्थिति भी अंतर्भुक्त है कयोंकि ‘कहना’ शब्द तभी सार्थक होता है जब उसे सुनने वाला भी कोई हो । श्रोता के अभाव में केवल ‘बोलने’ या ‘बड़बड़ाने’ की कल्पना की जा सकती है, कहने की नहीं । इसके साथ ही, वह सभी कुछ जो कहा जाए कथा की सीमाओं में नहीं सिमट पाता है । साधारणतः कथा का तात्पर्य किसी ऐसी कथित घटना के कहने या वर्णन करने से होता है जिसका एक निश्चित क्रम एवं परिणाम सामने नजर आ रहे हों । “घटनाओं के कालानुक्रमिक वर्णन को कथा (स्टोरी) की संज्ञा दी है जैसे ‘नाश्ते के बाद मध्याह्न का भोजन’, ‘सोमवार के बाद मंगलवार’, यौवन के बाद वृद्धावस्था आदि ।”[4] कहानी कही जाती है या पढ़ी जाती है । वर्तमान दौर में कहानी और उपन्यास की गिनती नाटकों की अपेक्षा अधिक है कारण स्पष्ट है कि आज के लगातार जटिल होते यथार्थ को पूरी गहराई, सूक्ष्मता और तीव्रता से व्यक्त करने में अपने ख़ास फार्म के कारण नाटक समर्थ नहीं हो पा रहे हैं । उसके मर्म को दिखाने के लिए कहानी के रूपांतरण को छोटे-छोटे संवादों, संगीत, प्रकाश के सहयोग से दिखाया जाता है । कहानी को मंच पर प्रस्तुत करने के लिए दो प्रक्रियाओं का सहारा लिया जाता है, अव्वल कहानी को भावों के साथ संवादों के उतार-चढ़ाव के साथ पढ़ दी जाए जिससे वह बोरियत सी न लगे ।  दूसरा उसे नाटक में परिवर्तित कर के अनेक पात्रों की सहायता से विधिवत प्रस्तुत किया जाए । भारतीय रंगमंच ‘भरत’ के ‘नाट्यशास्त्र’ पर आधारित है लेकिन नाट्य रूपांतरण ने उस शास्त्रीयता को लाँघ कर अपनी अस्मिता बनाई है । मंचन के रूप में कहानी का रूप परिवर्तित होता है किन्तु संवेदना के साथ किसी तरह का कोई समझौता नहीं होता है, किसी कारण ऐसा होता है तो वह कहानी के मर्म की हत्या होती है । नाटक में किसी भी पात्र, पात्र के संवाद और दृश्य की कटौती करने से पूरे नाटक का संतुलन बिगड़ सकता है किन्तु कहानी के मंचन में यह सुविधा रहती है कि सूत्रधार की सहायता से पात्रों की संख्या घटाई जा सकती है, मंच पर कम से कम चीज़ों से काम चलाया जा सकता है और इस तरह करने से नाटक की प्रोडक्शन लागत बहुत कम हो जाती है । किसी नाटक के मंचन के लिए अभिनय, मंच सज्जा, संगीत, प्रकाश व्यवस्था होती है । नाटकीयता साहित्य की अधिकतर विधाओं में विधमान रहती है । कविता और कहानी में नाटकीयता अन्य विधाओं के मुकाबले अधिक होती है । कहानी और नाटक दोनों में एक कहानी होती है, पात्र होते हैं, परिवेश होता है, कहानी का क्रमिक विकास होता है, संवाद होते हैं, द्वंद्व होता है, चरम उत्कर्ष होता है । इस तरह हम देखते हैं कि नाटक और कहानी की आत्मा के कुछ मूल तत्व एक ही हैं । यह अवश्य है कि कुछ मूल तत्व जैसे ‘द्वंद्व’ नाटक में जितना और जिस मात्रा में आवश्यक है उतना संभवतः कहानी में नहीं है ।

कहानी को नाटक में रूपांतरित करने के लिए सबसे पहले कहानी की विस्तृत कथावस्तु को समय और स्थान के आधार पर विभाजित किया जाता है । कथावस्तु उन घटनाओं का लेखा-जोखा है जो कहानी में घटती है । प्रत्येक घटना किसी स्थान पर किसी समय में घटती है । ऐसा भी संभव है कि घटना स्थान तथा समय विहीन हो । “कहानी किसी घटना या स्थिति का किया गया वर्णन है । जिसमें वह वर्मान में अतीत की सूचना बनती है इसके विपरीत नाटक घटित हो रही या होते रहने की क्रिया की दृश्यात्मक प्रस्तुति है ।”[5] ऐसा हो सकता है कि कुछ ऐसे दृश्य बनते हों जिन में लेखक ने केवल विवरण दिया हो और उसमें कोई संवाद न हो । ऐसे दृश्यों का भी पूरा खाका तैयार किया जाता है । दृश्य निर्धारित करने के बाद दृश्यों और मूल कहानी को पढ़ने से यह अनुमान लग सकता है कि मूल कहानी में ऐसा क्या है जो दृश्यों में नहीं आया है । ऐसे समय में नाट्य रूपांतरणकर्ता पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि कथा अथवा कहानी को किसी प्रकार से हानि न हो । लेखक द्वारा परिवेश का विवरण या परिस्थितियों पर टिप्पणियाँ प्रायः दृश्यों में नहीं ढल पाती है । कई ऐसे कथाकार हैं जिनकी कहानियों में कई-कई पैराग्राफ दृश्य संयोजन और वस्तुस्थिति बताने में निकल जाते हैं जिन्हें मंचित करना संभव नहीं हो पाता है । यह देखना आवश्यक है कि परिस्थिति, परिवेश, पात्र, कथानक इत्यादि से संबंधित विवरणात्मक टिप्पणियाँ किस प्रकार की हैं । विभिन्न प्रकार के विवरणों को नाटक में स्थान देने के अलग-अलग तरीके होते हैं । कथा को सामान्य भाषा में लिख दी गई हैं किन्तु कथानक में उसके पूरे विवरणात्मक रूप को दिखाया जाता है ।

साहित्य में विधाओं का आदान प्रदान होता रहता है किन्तु विधा बदलने से काव्य प्रभाव और आस्वाद में भी बदलाव आता है । कहानी के नाट्य रूपांतरण का एक दृश्य की कथावस्तु, कथानकद्ध को सामने रखकर एक-एक घटना को चुन-चुनकर निकाला जाता है और उसके आधार पर दृश्य बनता है तात्पर्य यह कि यदि एक घटना, एक स्थान और एक समय में घट रही है तो वह एक दृश्य होगा । स्थान और समय के आधार पर कहानी का विभाजन करके दृश्यों को लिखा जाता है । यह देखना आवश्यक है कि प्रत्येक दृश्य का कथानक के अनुसार औचित्य हो और  प्रत्येक दृश्य का कथानुसार तार्किक विकास हो रहा है या नहीं । यह सुनिश्चित करने के लिए दृश्य विशेष के उद्देश्य और उसकी संरचना पर विचार आवश्यक है । प्रत्येक दृश्य एक बिंदु से प्रारंभ होता है कथानुसार अपनी आवश्यकताएँ पूरी करता है और उसका ऐसा अंत होता है जो उसे अगले दृश्य से जोड़ता है । इसलिए दृश्य का पूरा विवरण तैयार किया जाता है । कहीं ऐसा न हो कि दृश्य में कोई आवश्यक जानकारी छूट जाए या उसका क्रम बिगड़ जाए । नाटक ही में नहीं बल्कि नाटक के प्रत्येक दृश्य में प्रारंभ, मध्य और अंत होता है स्पष्ट है एक दृश्य कई काम एक साथ करता है ।

कथानक की गतिशीलता सीधी रेखा में नहीं चलती उसमें उतार चढ़ाव आते हैं । कथानक में जीवन की इसी गतिमान संघर्षशील रूप की अवतारणा की जाती है । एक ओर वह कथानक को आगे बढ़ाता है तो दूसरी ओर पात्रों और परिवेश को संवादों के माध्यम से स्थापित करता है । इसके साथ-साथ दृश्य अगले दृश्य के लिए भूमिका भी तैयार करता है । कहानी में छपे लंबे संवाद को पाठक पढ़ सकता है लेकिन मंच पर बोले गए लंबे संवाद से तारतम्य बनाए रख पाना कठिन होता है । एक कहानी को मंच पर लाना और साथ ही उसके भाव बोध का सही सम्प्रेषण कथाकार को रोमांचित कर देता है । “यह निर्णय दर्शकों और आलोचकों पर ही छोड़ना होगा । स्वयं मेरे लिए यह बात कि कहानियों को सुनने पढ़ने के अलावा देखा भी जा सकता है, एक विस्मयकारी अनुभव था । जिन कहानियों को अरसा पहले मैंने अपने अकेले कमरे में लिखा था उन्हें खुले मंच पर दर्शकों के बीच देखना कुछ वैसा ही था जैसे टेपरिकॉर्डर पर अपनी आवाज़ सुनना जो अपनी होने पर भी अपनी नहीं जान पड़ती ।”[6] कहानी में चरित्र-चित्रण अलग प्रकार से किया जाता है और नाटक में उसकी विधि कुछ बदल जाती है । रूपांतरण करते समय कहानी के पात्रों की दृश्यात्मकता और नाटक के पात्रों में उसका प्रयोग किया जाता है । संवाद को नाटक में प्रभावशाली बनाने का अगला तरीका अभिनय है जो प्रायः निर्देशक का काम है पर लेखक भी इस ओर संकेत करता है । पात्र की भाव भंगिमाओं, तौर तरीको और उसके मैनरिस्म से प्रभाव उत्पन्न किया जाता है । कहानी के लंबे संवादों को छोटा-छोटा कर के उन्हें अधिक नाटकीय बनाया जाता है । लम्बे संवाद मंच पर अधिक कारगर नहीं हो पाते कभी कभी वो बोझिल से लगने लगते हैं । दो पात्रों के संवाद को इस तरह लिखा जाता है जिससे वह कटे हुए न लगे अपितु कहानी के उस हिस्से को भरे जिनमें केवल दृश्य और वातावरण का जिक्र है ।

जब कभी कहानी के रंगमंच की चर्चा होती है तब देवेन्द्र राज अंकुर का नाम सर्वोपरि आता है । “इस दिशा में देवेन्द्र राज अंकुर ने बहुत पहले 1975 में ‘तीन एकांत’ के शीर्षक से निर्मल वर्मा की तीन कहानियों ‘डेढ़ इंच ऊपर’, ‘धूप का एक टुकड़ा’, ‘वीक एंड’ को मंचित करके जो नया मुहावरा अर्जित किया था, उसमें रंगमंच की एक नई ऊर्जा से साक्षात्कार हुआ था अभीनय और वाचन की नई चुनौतियों और आयामों की ओर संकेत करने वाला यह प्रयोग बाद में ‘कहानी का रंगमंच’ नाम से चर्चित हुआ ।”[7] कहानी का रंगमंच और कहानी का नाट्य रूपांतरण दोनों में एक महीन रेखा खिंची हुई है । कथा और कथानक की दृष्टी से दोनों में परिवर्तन संभव हैं इन दोनों ही में भाव-बोध की समझ अतिआवश्यक है । हिंदी कहानी के नाट्य रूपांतरण की वास्तविक जड़ें ‘तीन एकांत’ के प्रदर्शन से लेकर वर्तमान तक हैं और निश्चित रूप से भविष्य में इसी तरह फूलेंगी । कहानी के मंचन में रचना और अभिव्यक्ति की जितनी शैलियाँ दिखाई पड़ती है, उन्हें पारम्परिक किस्सागोई की हल्की झलक के साथ आधुनिक रंगशैली के कलात्मक संयोजन द्वारा मंचित करते हुए दृश्यात्मक सम्प्रेषण की नई दिशाओं को उकेरा गया है । कहानियों के टेक्स्ट को सुरक्षित रखने के लिए निर्देशक ने अपनी ओर से कुछ भी कहने का प्रयास न करके उसे मूल रूप में ही स्वीकार किया है । “आज के लेखन में इस तरह की बुनावट को छोड़ा जा रहा है । झटके वाली कहानी आज कल कम लिखी जाती है इस तरह आलोचकों का कहना है कि कहानी लेखन पत्रकारिता के निकट आया है । जिस भांति पत्रकार किसी घटना का ब्यौरा सहज स्वाभाविक ढंग से, अपनी ओर से कुछ भी जोड़े या ओढ़ाए बिना पाठक के सामने रख देता है वैसे ही लेखक भी रखने लगा है ।”[8] कुछ वाक्यों को आगे पीछे करने या कहानी के दोहराव को छोड़ने के अतिरिक्त कुछ भी सम्पादित या बदलने की कोशिश नहीं की । ये भी उन स्थानों पर हुआ है, जहाँ कहानी के पात्रों का तनाव, गुस्सा, अकेलापन या संघर्ष आदि है और जिन्हें कार्य व्यापार से व्यंजित किया जाता था । इस रंग प्रयोग की अधिसंख्य प्रस्तुतियों को देखने के बाद कहानी-रंगमंच की दृष्टि से अभिनय शैली की नवीनता पर बातचीत करना दिलचस्प और सार्थक लगता है । कहानी पढ़ते समय पाठक जिस अनुभूति का साक्षत्कार करता है और सूक्ष्म रूप से छिपा हुआ, जो दृश्य संसार उसके सामने बनता संवरता है, उन दृश्यों को रचना के भीतर से तलाश करके मंच पर प्रदर्शित करने से ही ‘कहानी के रंगमंच’ का रूप बनता है ।  एक पाठक जब कहानी को पढ़ता या सुनता है, उसी समय, कहानी के पाठक के समांतर वह कहानी को दृश्यताम्क रूप से भी देखता चलता है ।

निर्मल वर्मा की तीन कहानियों ‘धूप का एक टुकड़ा’, ‘डेढ़ इंच ऊपर’ और ‘वीकएंड’ की मंच-प्रस्तुति ‘तीन एकांत’ शीर्षक से 1975 में देवेंद्र राज अंकुर के निर्देशन में की गई थी । तीनों कहानियों की भावभूमि और शैली लगभग एक-जैसी है । तीनों कहानियों में एक-एक पात्र है जो शुरू से लेकर अन्त तक एक लम्बा संवाद बोलता है, पूरा संवाद एक कथा के रूप में है । कहानी का मंचन इस प्रकार से किया गया है कि एक अहसास भी बना रहता है कि संवाद की शुरूआत किसी दूसरे पात्र के साथ होती है लेकिन यहाँ उसकी स्थिति का कोई अर्थ नहीं रहता है क्योंकि न जाने कब यह संवाद मात्र स्व-केन्द्रित होकर रह जाता है । उपस्थित पात्र इस प्रकार से संवादों को सुपुर्द करता है जैसे उसकी बात को सुनकर कोई उसे उत्तर देगा । कहानियों के रूप कई तरह के होते हैं ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक, मोनोलॉग इत्यादि । “मध्ययुगीन लोकनाट्य परम्परा में प्रचलित नाट्य रूपों के साथ-साथ किस्सागोई की परम्परा रही है…मुग़ल बादशाह जहाँगीर के समय क़िस्साख़्वाब का वर्णन मिलता है । आज भी आल्हा, पंडवानी या पाबूजी की पड़ आदि पारम्परिक वाचन शैली के नाटकीय तत्वों से इनकार नहीं किया जा सकता मगर समकलीन कहानी रंगमंच किस्सागोई के इन रूपों से अलग अपना स्वतंत्र रूप बना रहा है…उन्हें तोड़कर या बदलकर प्रस्तुत करने से वह मूल रचना की प्रस्तुति नहीं रहती ।”[9] मोनोलॉग से सम्बंधित प्रकार की कहानियां भारत में विदेशी प्रभाव के कारण आई हैं, मोनोलॉग एक प्रकार से एकालाप होता है जिसमें एक आदमी बोलता रहता है जैसे नाटकों में स्वगत कथन होता है । इस प्रकार ये कहानियाँ अकेलेपन के कुछ क्षणों में पात्रों के स्वयं अपने से साक्षात्कार की कहानियाँ हैं ।

निर्मल वर्मा की कहानियों में विदेशी प्रभाव अधिक है । कहानी का परिवेश, पात्रों की मानसिक स्थिति, उनके संवाद इत्यादि । ‘धूप का एक टुकड़ा’ कहानी का दृश्य एक पब्लिक पार्क से शुरू होता है जहाँ कई बेंचें हैं, पृष्ठभूमि में एक चर्च है और जहाँ-तहाँ फैले धूप के कुछ टुकड़े हैं । एक बूढ़ा है जो एक पैरेम्बुलेटर के सामने बैठा है और संयोग से उसी बेंच पर आकर बैठ जाता है जहाँ एक औरत (नायिका) रोज़ाना आकर बैठती है । इस प्रकार एक मौन, बूढ़े और अपने में ही व्यस्त पात्र की उपस्थिति ने इस औरत के अकेलेपन को भी ज़्यादा रेखांकित करती है । एक पार्क से शुरू होकर भी कहानी का दृश्य-जगत औरत के लम्बे संवाद में उसके अतीत के प्रसंगानुसार बदलता रहता है । उन दोनों बेंचों में किसी तरह का चेंज किए बिना ही मात्र प्रकाश द्वारा रेखांकित कुछ विशेष क्षेत्रों अथवा संगीत और अन्ततः एकल अभिनेत्री द्वारा ही कहानी की पूरी यात्रा को पकड़ने की कोशिश की गई है । नायिका के सम्वादानुसार दृश्य बदलते रहते हैं कभी प्रकाश द्वारा कभी संगीत द्वारा तो कभी नायिका के ‘मूव्स’ द्वारा दृश्यों के संकेत दिए गए हैं । कहानी के मूल फॉर्म को बिगड़ने नहीं दिया गया वहां मूलतः अंतर्द्वंद का चित्रण हैं । जैसा निर्मल वर्मा ने लिखा वैसा ही मंचित किया गया । इस संदर्भ में ‘तीन एकांत’ के निर्देशक देवेन्द्र राज अंकुर ने कहा “एक निर्देशक के नाते यह बात शुरू से ही मेरे सामने थी कि मुझे कहानियों के नाटकीय रुपान्तरण की ओर नहीं बढ़ना है वरन कहानी के अपने मूल फॉर्म में निहित कथ्य शब्द और दृश्य को ही मंच पर स्थापित करना है ।”[10] अर्थात कहानी के मूल रूप को बिना कोई ठेस पहुंचाएं उसे मंच पर प्रस्तुत किया गया । कहानी में घटित घटनाओं को नायिका अपने अतीत को बताती रहती है कहानी पढ़ने पर पाठक उसे समझ सकता है कि ये कहानी उसके अतीत की हैं । एक कहानी में कितने भी दृश्य हो सकते हैं और पाठक उन्हें अपनी दृष्टी से दृश्य की कल्पना कर सकता है किन्तु दर्शक के पास केवल एक दृश्य है और उसी पर कई तरह की क्रिया हो रही है । वैसे मूलतः इस कहानी में पब्लिक पार्क का एक ही दृश्य है किन्तु नायिका के संवादों में एक दर्जन दृश्य हैं जिनमे गिरजाघर से लेकर मोहल्ला, सड़क, पब, सारा शहर इत्यादि । कहानी इन्हीं दृश्यों के इर्द-गिर्द घूमती रहती है फिर भी इसका केंद्र पब्लिक पार्क है जहाँ नायिका बेंच पर बैठी हुई है और अपने संवादों से सभी दृश्यों का वर्णन कर रही है ।

प्रत्येक घटना के वर्णन में संवादों की अहम भूमिका होती है । संवाद में भी एक क्रम है कहानी के पहले संवाद में सुबह का दृश्य है नायिका का एकालाप शाम तक चलता है । ऐसा मंच पर प्रकाश व्यवस्था से संभव है, ऐसे ही संवादों का क्रम जारी रहता है । एक संवाद के बाद दूसरे संवाद के बीच अधिक समय नहीं है जैसा अधिकतर फ़्लैशबैक की शैली में होता है । चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ में एक संवाद से दूसरे संवाद में जाने में पच्चीस वर्ष का समय बीत गया “…कल देखते नहीं यह रेशम से कढ़ा हुआ…राम राम यह भी लड़ाई है…”[11] कहानी को पढ़ते समय एक पंक्ति में ये वर्ष निकल जाते हैं किन्तु मंच पर इसे दिखाने में अभिनेता और निर्देशक को अधिक परिश्रम करना पड़ता है । नाट्य रूपांतरण और कहानी के मंचन में संवादों का क्रम चलता रहता है । इस क्रम में कहानी की संवेदना को किसी प्रकार की ठेस नहीं पहुंचती । संवादों को थोडा परिवर्तित भी किया गया है “…यह पत्ता मेरा है और वह उसका…”[12] मंचन में यही संवाद “…यह पत्ता आपका है दूसरा किसी दूसरे का…”[13] है । ऐसा करने से संवाद को और अधिक बल मिलता है और ‘कहानी की थीम’ पर किसी प्रकार से कोई हानि नहीं पहुँचती है । अपवाद रूप में एक स्थान पर दो शब्दों को मात्र बदला गया है । दृश्यों को मंचित करने के लिए रंगमंच में कई संकेत दिए गए हैं । मंच पर अँधेरा, प्रकाश की योजना, मंच सज्जा इत्यादि का भी विस्तृत वर्णन है । “कहानी को तोड़कर, शब्दों को बदलकर, फॉर्म को चोट पहुंचाकर…नाट्य मंचन से वह कहानी के बहाने नए नाटक का मंचन होगा । इसकी अपेक्षा अभिनेता कहानी का हाव-भाव, स्वर के उतार चढ़ाव तथा संकेतों को नाटकीय ढंग से पढ़े तो वह ठीक होगा ।”[14] नई भाव भंगिमा और नए कलेवर के साथ कहानी का मंचन नए काव्य स्वाद को जन्म देता है । संस्कृत काव्यशास्त्रों में नाटक को ‘काव्य’ ही कहा जाता है । कहानी के मंचन के संदर्भ में निर्मल वर्मा भी कहते हैं कि “कहानी के मूल स्वभाव को विकृत किए बिना उसे मंच पर प्रस्तुत किया जाए, जहाँ एक ही समय में नाटक का ‘इल्यूजन’ दे सके और दूसरी ओर कहानी का आंतरिक फॉर्म और लय को अक्षुण्ण रख सके ।”[15] कहानी के मंचन द्वारा उसके नाटकीय तत्वों को उजागर करना है । वास्तव में कहानी रंगमंच की अभिनय प्रक्रिया एक पात्र से दूसरे पात्र को प्रतिबिंबित करने की यात्रा जैसी है । जिसमें अभिनेता कभी एक पात्र को मूर्त करता है और फिर उसे छोड़ कर दूसरे या तीसरे पात्रं की तलाश में चल पड़ता है । पात्रों की नाटकीय गतियों, कहानी-वाचन अभिनय, दृश्य परिकल्पना और प्रकाश संयोजन परस्पर घुलती मिलती हुई कहानी को नया रूप देती हैं । ऐसे मंचन में दूसरे उपकरण मौजूद नहीं होते इसीलिए अभिनेता अपनी वाणी और अपने शारीरिक हाव-भाव से दर्शकों को बांधे रखता है ।

निर्मल वर्मा की तीनों कहानियों का मूल विषय अकेलापन है । इन कहानियों के पात्र वर्तमान में रहते हुए अतीत की घटनाओं को जीते हैं । ‘डेढ़ इंच ऊपर’, ‘धूप का एक टुकड़ा’ जैसे फ्रेम की कहानी होते हुए भी अपने अन्तिम स्वरूप में यह उससे बिल्कुल ही अलग होती गई । इसमें भी दो पात्र हैं- एक बोलने वाला और दूसरा सुनने वाला । शुरू में पहली कहानी की तरह यहाँ भी सुनने वाले पात्र की परिकल्पना की गई लेकिन ज्यों-ज्यों कहानी आगे बढ़ती गई, सुनने वाला पात्र बिलकुल ही अनुपस्थित हो जाता है । कहानी का बूढ़ा पात्र बियर पीते हुए खुद ब खुद ही खुलता चलता है । कहानी का स्थान ‘पब’ है किंतु संवादों से कई स्थानों का भ्रमण किया गया है । प्रस्तुतिकरण के बीच-बीच में उसे बीयर ‘सर्व’ करने के लिए एक बेयरा है जो मुख्य पात्र की आवाज़ पर जब-जब बीयर का मग रखने को आता तो अनायास ही कहानी के दृश्य को पुनः ‘पब’ से जोड़ देता है । कहानी में जो घटना है अर्थात ‘पब’ की उस घटना को वैसे ही प्रस्तुत किया है इस कहानी में भी ‘फ़्लैशबैक’ की सहायता नहीं ली गई । मंच पर नीचे ऊपर दो विभिन्न कोनों पर दो मेजें और चार कुर्सियां मात्र है । कहानी में दृश्यों का आरम्भ ‘पब’ से होता है, अन्य दृश्यों को दिखाने के लिए प्रकाश व्यवस्था है जो उसकी रौशनी में बनते मिटते रहते हैं, इनमें कुल मिलकर नौ दृश्य हैं । कहानी के मंचन के आरम्भ में इस प्रकार के दृश्य निर्मित किए गए हैं जिससे स्थिति का पता चलता है । कहानी में दो पात्र हैं मंचन में केवल एक पात्र लिया गया है उस पात्र की उपस्थिति दर्ज कराने के लिए कुछ बातें कही जा रही है । “अपुस्थित श्रोता मानो उसके सामने वाली कुर्सी पर आकर बैठ गया है ।”[16] यहाँ श्रोता से अर्थ कहानी के दूसरे पात्र से है जिसे यहाँ दर्शाया नहीं गया सिर्फ उसके होने का अहसास कराया जा रहा है । दृश्यों में नाटकीयता के लिए तरह-तरह की क्रियाएं कर रहे हैं, ओवरकोट उतार कर रखना, कुर्सी से उठाना फिर बैठ जाना, सिगार जलाना इत्यादि कहानी में इस तरह की कोई क्रिया नहीं है । कहानी को नाटक से जोड़ने की कोशिश की जा रही है । अतिरिक्त पात्र रखा गया है जो बीयर ‘सर्व’ कर रहा है इस पात्र का कहानी से कोई सरोकार नहीं है किन्तु उसके होने से मंच पर चहल-कदमी हो रही है और मंचन की दृष्टी से अतिआवश्यक क्रिया है । कहानी को मंचित करने के लिए निर्देशक ने अपनी ओर से पात्र रखा और अपनी ओर से हटा भी दिया । देवेन्द्र राज अंकुर ने दो पात्र रखें जबकि शिवलकर ने एक ही पात्र से प्रस्तुति दी । इससे प्रयोग से कहानी के मर्म की कोई हानि नहीं हुई । इसी कहानी को अभिनेता राजेश विवेक द्वारा अभिनीत बूढ़ा व्यक्ति एक पात्र भी है और वाचक की भूमिका में वह खुद है । कभी वह स्वयं से बात करता है और कभी सीधे दर्शकों से संबोधित होता है । इसी प्रक्रिया में कभी खाली कुर्सी से मुखातिब होकर अपने एकालाप को संवाद में बदल देता है । यह मंचन करने वाले की खूबी है की वह वर्णनों को व्यावधान न बनाते हुए स्थितियों और बिखड़ी हुई कड़ियों को जोड़ता है ।

निर्मल वर्मा की तीसरी कहानी वीकएंड भी पूरी की पूरी नायिका के ‘स्वचिन्तन’ से सम्बन्धित दिखाई गई है । नायिका का एकालाप होता है किन्तु उससे पहले शारीरिक क्रिया है जिससे दर्शक उसकी ओर आकर्षित हो जाएँ और उसके संवाद से जुड़े । कहानी की शुरूआत सुबह के भूरे आलोक में नायिका की ‘टेपरिकॉर्डर ’ पर आती आवाज़ से की गई ‘‘यह में याद रखूँगी, ये चिनार के पेड़, यह सुबह का भूरा आलोक और क्या याद रहेगा ? पेड़ों के बाद बदन में भागता यह हिरन, आइसक्रीम का कोन, घास पर धूप में चमकता हुआ एक साफ़ धुली पीड़ा की फाँक, जैसा मानो अकेला अपने को टोह रहा हो ।’’[17] मंचन में प्रकाश की व्यवस्था से अँधेरे से शुरू होकर उजाले की तरफ जाना । फिर मुँह अँधेरे में अलार्म की आवाज़ सुनकर ही उसके मुँह से पहले संवाद निकलते हैं । कहानी में संवाद हैं किन्तु उनका कोई उतार-चढ़ाव नहीं है लेकिन मंचन के समय नायिका की चीख, उसका विषाद, उसका अकेलापन सब उसके अभिनय से उसके चरित्र में नज़र आने लगते हैं । नायिका एक ‘वीकएंड’ की समाप्ति पर सुबह-सुबह अपने कमरे पर जाने के लिए तैयार हो रही है, उसका प्रेमी अभी तक पलंग पर सोया हुआ है । इसी बीच पिछले दिन की घटनाओं पर पुनर्विचार करने लगती है और कहानी कमरे से निकलकर एक पार्क में पहुँच जाती है । उस कमरे में कोई नहीं है लेकिन उसकी भाव भंगिमा से यह आभास होता है कि उसके साथ कोई है जिससे वह मिलती है । यह कहानी भी अकेलेपन का एक रूप है नायिका का एकालाप अतीत के पन्नो को फिर से जिन्दा कर देता है । संगीत नायिका के जागने से लेकर उसके प्रस्थान तक धीमी आवाज़ में चलता रहता है । उसके चीखने पर संगीत तेज़ और शांत होने पर मद्धम गति में चलता है । यह संगीत कर्णप्रिय रहता है ताकि दर्शक उससे खुद को जोड़ पाए । इस प्रकार देवेन्द्र राज अंकुर ने निर्मल वर्मा की कहानियों के साथ ऐसा सृजनात्मक परिवेश रचते हैं जिससे अभिनेता मुक्त होकर क्रियाशील हो सकें ।

तीन एकांत की कहानियों को बहुत से रंगकर्म के विद्वानों ने कहानी का रंगमंच कहा है क्योंकि इन कहानियों में सूत्रधार या संवादों का आदान प्रदान नहीं है वह इसीलिए मोनोलॉग है । महत्वपूर्ण बात यह है कि “इस रंग प्रयोग में देखी सुनी जा रही कहानी अपने उप-पाठ की आंतरिक ले की पुनर्रचना बनती है । दरअसल इस प्रयोग में कहानी के उस अदृश्य मर्म को पकड़ने की कोशिश है जो कहीं एक दो शब्दों या वाक्यों के बीच उपस्थित रहता है । इस प्रक्रिया में कहानी की दुनिया छोटी होती हुई भी उन कई अर्थ छायाओं को उजागर करनी है जिनको केवल पढ़ने से अनुभव नहीं किया जा सकता ।”[18] कह सकते हैं की कहानी की प्रस्तुति सम्पूर्ण कहानी को संवाद बनाते हुए उसके कथ्य, निजी रूप, शब्द और उनसे उभरते संगीत एवं ध्वनियों के माध्यम से उसके श्रव्य की अभिव्यंजना होती है । कहानी के मंचन की अभियक्ति इस प्रकार से होती है जिससे दर्शक उन हिस्सों को भी जीता है जो कहानी में लिखी हुई नहीं होती है । कहानी की कई अमूर्त घटनाओं को भी मंचन से नाटक में शामिल कर लिया जाता है जिससे कहानी और भी प्रभावशाली हो जाती है ।

कहानी के रंगमंच से जब हम कहानी के नाट्य रूपांतरण की तरफ बढ़ते हैं तब मंच और भी सक्रीय हो जाता है । जहाँ एकालाप था वह अब पूर्ण रूप से संवाद स्थापित होने लगा है । कथानक, पात्र योजना, संवाद, दृश्यों का संयोजन, प्रकाश व्यवस्था, वेशभूषा में तब्दीली, मुख सज्जा, मंच सज्जा, प्रवेश-प्रस्थान इत्यादि सब बदल जाता है । कहानी के दृश्यकाव्य में संवाद होते हैं लेकिन ठीक उसी तरह नहीं होते जैसे नाटकों में होते हैं । संवाद कहानी से ही प्राप्त होते हैं लेकिन क्रमानुसार नहीं होते है उन्हें अन्वेषित करना पड़ता है । हिंदी साहित्य की प्रारंभिक कहानियों में संवाद काफी संख्या में हुआ करते थे बल्कि बहुत सी कहानियां नाटक की तरह संवादों में ही आगे बढ़ती थी । प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भीष्म साहनी, फणीश्वरनाथ रेणु, भगवतीचरण वर्मा इत्यादि कथाकारों की कहानियों में अच्छे संवाद की कोई कमी नहीं होती है । नाट्य क्रियाओं की दृष्टी से कुछ कहानियां सम्पन्न होती हैं । ज्यादातर कहानियों में नाट्य क्रिया सीधे साफ़ दिखाई नहीं देती पर उनमें जरुर रहती हैं । प्रेमचंद की सौ कहानियों से अधिक का नाट्य रूपांतरण और मंचन हुआ है । उनकी प्रसिद्द कहानी ‘ईदगाह’ को बहुत सी संस्थाओं ने मंच पर उतारा है । इस कहानी में संवाद, दृश्य, समय, भाव, परिवेश सब मौजूद है फिर भी प्रेमचंद ने ईदगाह में मेला जाते समय हामिद के कपड़ों का जिक्र नहीं किया है और न ही अन्य लड़को के बारे में कुछ लिखा है परंतु मंचन करने वाले को यह स्वयं अनुमान लगाना होगा कि हामिद नंगे पैर होगा, उस के कुरते में पैबंद लगे होंगे जबकि अन्य लड़कों के अच्छे कपड़े उनकी अच्छी आर्थिक स्थिति के सूचक होंगे । ईदगाह का वह हिस्सा जहाँ हामिद इस द्वंद्व में है कि क्या-क्या खरीदे या जहाँ वह यह सोचता है कि अम्मा का हाथ जल जाता है उसका रूपांतरण कठिन है । रूपांतरण में इस तरह के विवरण प्रस्तुत करने के लिए ‘स्वगत’ कथन का प्रयोग किया जाता है जिसमें अभिनेता मंच के कोने में जाकर अपने आप से यह संवाद बोलता है लेकिन आजकल ‘वायस ओवर’ अर्थात ऐसी ध्वनि जो दर्शकों को सुनाई देती है पर पात्र नहीं बोलता के माध्यम से संभव है । अम्मा वाले अंश के लिए फ़्लैशबैक शैली का उपयोग किया गया है । इसी प्रकार हामिद की ललचाई आँखो, होठों पर जीभ फेरते और बाद में भारी कदमों से दुकान से दूर जाने का दृश्य बनाया जाता है । यही दूसरी ओर रामायण कथा का ‘नाट्य रूपांतरण (रामलीला)’ स्थानीय रंग में संवादों को रंग कर चरित्र-चित्रण को परिमार्जित किया जाता है । जहाँ भाषा का रूप परिवर्तित हो जाता है । ध्वनि और प्रकाश भी चरित्र-चित्रण करने तथा संवेदनात्मक प्रभाव उत्पन्न करने में कारगर सिद्ध होते हैं । रूपांतरण में एक समस्या पात्रों के मनोभावों को कहानीकार द्वारा विवरण के रूप में व्यक्त किए प्रसंगों या मानसिक द्वंद्व के दृश्यों की नाटकीय प्रस्तुति में आती है ।

निष्कर्ष

            स्पष्ट है कि कहानी के मंचन में कथानक की अभिव्यक्ति अभिनेता और निर्देशक के ऊपर निर्भर है । वह उसकी मार्मिकता को किस स्तर पर ले जाना चाहता है । लिखित कथा को मंच पर प्रस्तुत करने पर कथा की भावभूमि और उसका प्रभाव दोनों ही में सामंजस्य बैठाना ही नाट्य रूपांतरण का मूल आधार है ।

सहायक ग्रन्थ सूची

  • मेरी प्रिय कहानियां – निर्मल वर्मा,  राजकमल प्रकाशन
  • तीन एकांत (धूप का एक टुकड़ा, डेढ़ इंच ऊपर और वीक एन्ड कहानियों का नाट्य रूपांतरण) – निर्मल वर्मा, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 1990
  • नाटक और रंगमंच – सम्पादक – ललित कुमार शर्मा ‘ललित’, डॉ भानु शंकर मेहता  प्रभा प्रकाशन, संस्करण 1985
  • कथा कोलाज़ (भाग 1-2) – दिनेश खन्ना, राष्टीय नाट्य विद्यालय, संस्करण 1994
  • रंग दर्शन – नेमिचंद्र जैन, राधाकृष्ण प्रकाशन, संस्करण 1983
  • समकालीन हिंदी नाटक और रंगमंच – संपादक डॉ. विनय, भारतीय भाषा प्रकाशन, संस्करण 1981
  • अभिव्यक्ति और माध्यम – एन. सी. ई. आर. टी. दिल्ली (कक्षा 11-12) संस्करण 2006
  • कहानी का रंगमंच – संपादन – महेश आनंद, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2001
  • कहानी का रंगमंच और नाट्य रूपांतरण – डॉ. करन सिंह उत्वाल, गोविन्द पचौरी जवाहर पुस्तकालय मथुरा, संस्करण 2008
  • रंग प्रक्रिया के विविध आयाम – संपादक – प्रेम सिंह, सुषमा आर्य, राधाकृष्ण प्रकाशन, संस्करण 2007

पत्रिकाएं

  • वागर्थ – मई 2013, संपादक – एकान्त श्रीवास्तव, कुसुम खेमानी
  • समकलीन भारतीय साहित्य – वर्ष 40अंक 204 जुलाई अगस्त 2019 संपादक मंडल – चंद्रशेखर कंबार, माधव कौशिक, के श्रीनिवासराव, अतिथि संपादक ब्रजेन्द्र त्रिपाठी
  • इन्द्रप्रथ भारती – संपादक – जीतराम भट्ट, नवम्बर दिसम्बर 2018
  • समीक्षा – संपादक – सत्यकाम, अंक जनवरी मार्च 2018, वर्ष 50 अंक 4
  • बहुवचन – प्रधान संपादक गिरीश्वर मिश्र, संपादक अशोक मिश्र महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
  • अनभै सांचा – जनवरी जून 2018, सम्पादक – द्वारका प्रसाद चारुमित्र

[1] कहानी का रंगमंच : संपादन – महेश आनंद, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या 45

[2] हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली – डॉ अमरनाथ, पृष्ठ संख्या 110

[3] हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली – डॉ अमरनाथ, पृष्ठ संख्या 109

[4] ई.एम. फ़ार्स्टर – एस्पेक्ट्स ऑव द नावेल, पृष्ठ संख्या 29

[5] कहानी का रंगमंच : संपादन – महेश आनंद, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या 15                                                                           

[6] तीन एकान्त की भूमिका –  निर्मल वर्मा, पृष्ठ संख्या 03

[7] कहानी का रंगमंच – महेश आनंद, पृष्ठ संख्या 14

[8] कहानी-रंगमंच का अनुभव – भीष्म साहनी,  कहानी का रंगमंच – महेश आनंद, पृष्ठ संख्या 31

[9] नया मुहावरा – कहानी का रंगमंच – महेश आनंद, पृष्ठ संख्या 124 

[10] तीन एकांत – निमल वर्मा, पृष्ठ संख्या 11

[11] उसने कहा था – चंद्रधर शर्मा गुलेरी, पृष्ठ संख्या 65

[12] धूप का एक टुकड़ा – निर्मल वर्मा, पृष्ठ संख्या 31

[13] धूप का एक टुकड़ा –  तीन एकांत, निमल वर्मा, पृष्ठ संख्या 12

[14] कहानी का रंगमंच और नाट्य रुपान्तरण – करण सिंह उत्वल, पृष्ठ संख्या 67

[15] तीन एकांत – निर्मल वर्मा, पृष्ठ संख्या 08

[16] डेढ़ इंच ऊपर- तीन एकांत, निर्मल वर्मा, पृष्ठ संख्या 39

[17] वीक एंड- तीन एकांत, निर्मल वर्मा, पृष्ठ संख्या 55

[18] रंग प्रक्रिया के विविध आयाम – संपादक प्रेम सिंह, सुषमा आर्य, पृष्ठ संख्या 134

दलित महिला रचनाकारों की आत्मकथाओं में अभिव्यंजित व्यथा- विजयश्री सातपालकर

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silhouette of woman near window blinds
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दलित महिला रचनाकारों की आत्मकथाओं में अभिव्यंजित व्यथा

                                                                                                                      विजयश्री सातपालकर

शोधार्थी,

कार्मेल कला, वाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालय,

मडगाव-गोवा

7875507882

vijayshri_1996@rediffmail.com

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शोध सारांश

महिला आत्मकथाकारों में कौशल्या बैसंत्री की ‘दोहरा अभिशाप’ एवं सुशीला टाकभौरे की ‘शिकंजे का दर्द’ उल्लेखनीय है। पुरुष लेखक की तुलना में दलित लेखिकाओं की आत्मकथाएं उतनी मात्र में उपलब्ध नहीं है। भारतीय वर्ण व्यवस्था के तले दलित स्त्रियाँ ने मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा की दोहरी मार सही है। प्रस्तुत लेख में कौशल्या बैसंत्री कृत ‘दोहरा अभिशाप’ और सुशीला टाकभौरे कृत ‘शिकंजे का दर्द’ आत्मकथाओं में अभिव्यक्त व्यथा का चित्रण किया गया है।

बीज शब्द

आत्मकथा, दलित महिला, दृष्टिकोण, अस्मिता, विमर्श

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आमुख

आत्मकथा हिन्दी साहित्य में बहुत महत्वपूर्ण विधा है। हिन्दी के प्रख्यात रचनाकारों ने अपनी आत्मकथा को सबके समक्ष प्रस्तुत कर आत्मकथा विधा को और चर्चित कर दिया है। मनुष्य कोई भी हो उसके जीवन में उतार-चढ़ाव आता ही है। आत्मकथा में इन्हीं बिन्दुओं के साथ अन्य कई बिन्दु आत्मकथाओं में दृष्टिगत होते हैं। विशेषतः दलित आत्मकथाओं में संत्रास, पीड़ा, संघर्ष, अत्याचार, अपमान, अवहेलना, व्यथा आदि देखने के लिए मिलता है। आत्मकथा में रचनाकार जीवनानुभूतियों को अभिव्यक्त करता है। डॉ. बच्चन के अनुसार आत्मकथा का अर्थ ‘आत्म चित्रण’ है। अस्मिता विमर्श उभरने के बाद आत्मकथाओं में गति आने लगी। “आत्मकथा लेखन में एक नया मोड़ आता है अस्मिता विमर्श के उभार के बाद। लंबे समय तक आत्मकथा लेखन उपेक्षित पड़ा रहा। अस्मिता विमर्शों के बाद समाज के वंचित एवं उपेक्षित समुदाय की यातना कथा सामने आने लगी तो आत्मकथा लेखन एक बार महत्वपूर्ण हो उठा। ‘पर्सनल इज पॉलिटिकल’ की तर्ज पर वंचित समुदायों की जीवन कथा महत्वपूर्ण हो गई। यही कारण है कि चाहे दलित विमर्श हो या स्त्री विमर्श में आत्मकथाएं बड़ी संख्या में सामने आई।”1

हिंदी साहित्य में सर्व प्रथम दलित आत्मकथा 1995 में प्रकाशित मोहनदास नैमिशराय कृत ‘अपने-अपने पिंजरे’ को माना जाता है। और यहा से दलित आत्मकथाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है। महिला आत्मकथाकारों में कौशल्या बैसंत्री की ‘दोहरा अभिशाप’ एवं सुशीला टाकभौरे की ‘शिकंजे का दर्द’ उल्लेखनीय है। पुरुष लेखक की तुलना में दलित लेखिकाओं की आत्मकथाएं उतनी मात्र में उपलब्ध नहीं है। भारतीय वर्ण व्यवस्था के तले दलित स्त्रियाँ ने मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा की दोहरी मार सही है। “दलित पुरुष मात्र जातिभेद का शिकार हैं, जबकि दलित स्त्रियाँ जातिभेद के साथ-साथ लिंगभेद की दोहरी चक्की में पिसती आई हैं।”2 अपनी इसी त्रासदी को लेखिकाओं ने अपनी आत्मकथाओं में चित्रित किया है। कौशल्या कृत ‘दोहरा अभिशाप’

कौशल्या बैसंत्री की आत्मकथा ‘दोहरा अभिशाप’ 1999 में प्रकाशित हुई। कौशल्या बैसंत्री ने अपने विवाहित जीवन में बहुत कष्टों का सामना किया। उन्होने विवाह के लगभग चार दशक तक यातनाएं सही। उनका विवाह एक स्वतंत्रता सेनानी से हुआ था जो भारत सरकार के उच्च पद पर स्थित होते हुये भी अपनी पत्नी पर जुल्म करता था। इसीलिए उनसे अलग होने के बाद ही लेखिका ने अपने पूरे जीवनानुभवों को कलमबद्ध किया।

कौशल्या ने आत्मकथा में अपने तीन पीढ़ियों की स्थिति को उजागर किया है। “कौशल्या बैसंत्री ने अपनी इस आत्मकथा में अपनी तीन पीढ़ियों की दलित स्त्रियों की जिजीविषा को रेखांकित किया है। आत्मकथा में यह समाज में व्याप्त रूढ़िवाद, जातिवाद से उत्पन्न छुआछूत, भेदभाव, पूर्वाग्रह और स्त्रियों के प्रति हिन नजरिया, गरीबी, भुखमरी, दलित महिला हिंसा को सभ्य समाज के समक्ष प्रस्तुत करती हैं। लेखिका ने अपनी अभिव्यक्ति के साथ-साथ उनके आस-पास हो रही हिंसा को बड़ी गंभीरता से महसूस किया और उन पर भी टिप्पणी की है।”3

कौशल्या जी का जन्म दलित परिवार में होने के कारण उन्हें बहूत सहना पड़ा है। वे बचपन से ही जातिभेद का शिकार रही है। निम्न जाति की होने के कारण स्कूल की शिक्षिका भी उनपर अत्याचार किया करती थी। बाल्यावस्था में उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। इसी आर्थिक बदहाली के चलते पाँचवी कक्षा में कौशल्या के माता-पिता फीस नहीं दे पाये। “बाबा ने हेड मिस्ट्रेस को आश्वासन दिया और उनके चरणों के पास अपना सिर झुकाया दूर से, क्योंकि वे अछूत थे, स्पर्श नहीं कर सकते थे। बाबा का चेहरा कितना मायूस लग रहा था उस वक्त! मेरी आँखें भर आयी थीं। अब भी इस बात की याद आते ही बहुत व्यतीत हो जाती हूँ। अपमान महसूस करती हूँ। जाति-पाँति बनाने वालों का मुंह नोचने का मन करता है। अपमान का बदला लेने का मन करता है।”4

कौशल्या जी ने तत्कालीन दलित स्त्रियों की स्थिति का भी वर्णन अपने आत्मकथा में किया। दलित स्त्रियों पर शारीरिक, मानसिक अत्याचार किया जाता था। जिससे विवश होकर वे आत्महत्याएं करने के लिए प्रवृत हो जाती थी। “सखाराम की औरत दिहाड़ी पर मजदूरी कर रही थी। वह सीमेंट-ईंटें ढोकर मिस्त्री को देती थी। वह देखने में सुंदर थी, मिस्त्री बदमाश था। वह आते-जाते उसे छेड़ता था। एक दिन उसने सीमेंट का गोला बनाकर उसकी छाती पर मारा। उस औरत ने उसे गलिया दी परंतु वह बेशर्म हँसता रहा। साथ में खड़े मजदूर भी देखकर हंस रहे थे। यह बात उस औरत ने अपने पति से कही पति का काम था जाकर उस बदमाश को डांटे फटकारे। परंतु उसने अपनी औरत को ही डाटना शुरू किया और कहने लगा कि तुम और औरतें भी तो वहाँ काम करती हैं, उन्हें वह कुछ नहीं कहता और तुम्हें ही क्यों छेड़ता है। तुम ही बदचलन हो, यह कहकर उसे रात भर घर के बाहर रखा वह बेचारी झाड़ी में छिपी रही क्योंकि उसके बदन पर पूरे कपड़े नहीं थे। रात में वह बस्ती के कुएं में कूद गई। सवेरे उसका शरीर पानी के ऊपर तैर रहा था। उसके माँ बाप आए और कहने लगे कि इसने हमारी नाक कटवाई अच्छा ही हुआ कि यह कुलटा मर गई।”5

यह लंबा उद्धरण दलित स्त्री की विवशता को भली भांति स्पष्ट करता है। इससे तत्कालीन समाज की मानसिकता को परखना आसान हो जाता है। पुरुष अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए स्त्री की गलती के बिना उसे ही कसूरवार ठहरता है। कौशल्या जी ने स्त्री होने के कारण बहुत अत्याचार सहे। पुरुष के लिए स्त्री कभी मायने नहीं रखती थी। स्त्री उसके लिए उपभोग की वस्तु मात्र थी। कौशल्या जी का वैवाहित जीवन कभी सुखी नहीं रहा। उनके पति लेखक और स्वतंत्र सेनानी थे अपने पति के बारे में वह लिखती हैं “देवेंद्र कुमार को पत्नी सिर्फ खाना बनाने और शारीरिक भूक मिटाने के लिए चाहिए थी। दफ्तर के काम और लिखना यही उसकी चिंता थी। मुझे किस चीज की जरूरत है, उसका उसने कभी ध्यान नहीं दिया।”6

लेखिका के पति उच्च शिक्षित होकर भी अपनी पत्नी को कभी सम्मान नहीं दे पाए। पितृसत्तात्मक समाज ने कभी स्त्री को उसका अधिकार नहीं दिया। कौशल्या जी आत्मकथा की भूमिका में लिखती हैं, “पति ने कभी मेरी कदर ही नहीं की बल्कि रोज-रोज के झगड़े, गालियों ने मुझे मजबूरन घर छोड़ना पड़ा और कोर्ट केस करना पड़ा।”7

कौशल्या ने अपने ऊपर होने वाले अत्याचार का सदैव प्रतिरोध किया। उन्होने कुंठित जीवन व्यतीत करने की अपेक्षा अधिकार के लिए लड़ने की प्रेरणा दी है। लेखिका को दलित होने के लिये प्रताड़ित भी किया जाता था किन्तु वह निर्भय होकर उनका प्रतिरोध किया करती। एक बार लेखिका ने अपने मोहल्ले में बी. सी डाल दी । उसमें अधिकतर ब्राह्मण महिलाएँ थी, जिन्होंने कौशल्या पर आपत्ति जताई तब लेखिका ने अपनी आवाज बुलंद की, “आपने मुझे मुझसे मेरी जाति नहीं पूछि। क्या मैं अपनी जाति का पोस्टर पीठ पर चिपका कर रखूँ? आप सभ्य नहीं लगती। सभ्य आदमी जाति-पाँति का विचार अपने मन में नहीं रखते और जाति-पाँति मानने वालों से मैं अपना संपर्क नहीं रखती मुझे पहले पता होता कि आप जाति-पाँति मानती हो तो मैं स्वयं आपके चिटफंड में नहीं आती।”8

सुशीला टाकभौरे कृत “शिकंजे का दर्द”

सुशीला का जन्म मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के बानापुरा गाँव में दलित परिवार में हुआ। उस गाँव में छुआछूत, उंच-नीच, जातिभेद की भावना हर जगह विद्यमान थी। निम्न जाती के लोग जिनमें भंगी हरिजन शामिल थे। उनके घर गाँव के बाहर ही थे। उन्होने शिक्षा को ज्यादा महत्व नहीं दिया। उनका मानना था “बच्चों को पढ़ाकर का होयगो? अपनी जात तो वही रहेगी। काम, रोजगार तो अपनी जात के ही करनो पड़ेगों फिर क्यों बच्चों को परेशान करें?”9

किन्तु सौभाग्यवश सुशीला के माता-पिता शिक्षा की महत्ता को जानते थे। तमाम जटिलताओं के बावजूद उन्होंने सुशीला को पढ़ाया। सुशीला को स्कूल में भी जातिभेद का शिकार होना पड़ा। तत्कालीन समाज में छुआछूत का इतना प्रभाव था कि बच्चे अपने हाथ से पानी भी लेकर नहीं पी सकते थे। उन्हें फर्श पर बैठना पड़ता था। अपने ऊपर होने वाले शोषण से पीड़ित होकर लेखिका ने स्वयं को हिन्दू मनाने से भी इंकार किया है। “हिन्दू धर्म में नदी, पहाड़, पेड़-पौधे, जानवर  सभी को महत्व और सम्मान दिया जाता है, लेकिन अछूत मनुष्य को कोई सम्मान नहीं। हिन्दू धर्म के आडंबर में मिट्टी से बने पुतलों को भी भगवान की तरह पुजा जाता है मगर इंसान को इंसान नहीं मानते। यह हिन्दू धर्म की विडम्बना है, हिन्दू संस्कृति का कलंक है। लोग इसे ही धर्म कहते है।”10

भारतीय वर्ण व्यवस्था के तहत वर्षों से दलितों का शोषण किया जा रहा है। उन्हें नारकीय एवं उपेक्षित जीवन जीने के लिए बाध्य किया जाता है। लेखिका अपने आत्मकथा के माध्यम से दलित समाज, दलित स्त्री की स्थिति, लाचारी, विवशता को स्पष्ट किया है।

मनुवादी व्यवस्था ने दलितों को कभी कुछ समझा ही नहीं। “मनुस्मृति में अछूतों को शिक्षा से दूर रहने के निर्देश दिये गए हैं। समाज में इन निर्देशों का पालन श्रद्धा और निष्ठा के साथ किया जाता था।”11

इस मानसिकता के चलते दलित शिक्षा से सदैव दूर ही रहा। किन्तु सुशीला के परिवार वाले खास कर उनकी माँ ने उनका साथ दिया। सुशीला ने बाल्यावस्था में प्रतड़ाना सहीं थी किन्तु वह जान गई कि इन सबसे छूटकारा उन्हें शिक्षा प्राप्ति से ही मिलेगा। अपनी मन की व्यथा वह इस तरह बयान करती है, “सच यह था  कब आया योवन जान न पाया मन। शिकंजे में जकड़ा जीवन कभी मुक्त भाव का अनुभव ही नहीं कर पाया। जिंदगी एक निश्चित की गई लीक पर चलती रही। वह उमंग कभी मिली ही नहीं जो योवन का अहसास करती। उम्र के साथ कटु अनुभूतियों के दंश महसूस होते रहे। पीड़ा से छटपटाता मन मुक्ति का ध्येय लेकर आगे बढ़ता रहा। तब मुक्ति का मार्ग मैंने शिक्षा प्राप्ति को ही माना था।”12

समाज की उलाहना, शोषण, उपेक्षा, तिरस्कार सहते हुए सुशीला शिक्षा ग्रहण करती रही। स्कूल में सब उनका मज़ाक उड़ाया करते थे। कक्षा में सिर्फ शिक्षक सवर्णों पर ही ज्यादा ध्यान देते थे। दलित बच्चों को स्वर्णों के पिछली पंक्ति में बिठाया जाता। एक दिन सुशीला पहली पंक्ति में बैठ जाती है तब गुरुजी उन्हें डांटकर कहते है , “सुशीला तुम आगे क्यों बैठी है। तुम्हें पीछे बैठना चाहिए।”13

सुशीला को लगता है कि उनकी नानी गंदा साफ करती है इसीलिए उन्हें कोई सम्मान नहीं देता। नानी मौसम की परवाह किए बिना अपना काम करती बारिश में गंदा उठाकर टोकरी में भरकर सर पर रखकर दूर फेंक देती। इसी पर वह अत्यंत शुब्द्ध होकर कहती है, “यह सब तेरी करतूत है भगवान। जात पांत क्यों बनाई? हम ही क्यों करे ये नरक सफाई का काम।”14

तमाम उपेक्षा के बावजूद लेखिका सबकुछ सहते हुए आगे बढ़ती रही। लेखिका जानती थी कि शिक्षा दलितों की समस्या का हल है। उम्र के साथ जीवन के हर कदम पर उन्हें समाज के लोगों ने दलित होने के कारण उनके साथ दुर्व्यवहार किया। दलित स्त्री की परिस्थिति शिकंजे में फंसे पक्षी की भांति है जो अपने मुक्ति के लिए छटपटाता है। यह जाती रूपी शिकंजा दलित स्त्री का जीवन दुखमय करता है। इसी शिकंजे के दर्द को लेखिका ने अपने आत्मकथा में व्यक्त किया है।

सुशीला के शिकंजे की जकड़न विवाह के पश्चात और कसती गई। उनका सुंदरलाल टाकभौरे के साथ अनमेल विवाह था। उनमें बीस साल का अंतर था। पितृसत्तात्मक समाज के तहत सुशीला अपने पति का अत्याचार सहने के लिए विवश थी। पति का मारना मिटना, सास-ननद के ताने सुनना आदि। सुशीला जी घरेलू हिंसा का शिकार थी। आत्मकता में हर जगह इस व्यथा को देखा जा सकता है। “स्कूल से या बाहर से आने के बाद कभी-कभी टाकभोरे जी मेरे सामने पैर लंबे कर देते। मेरा ध्यान न रहने पर हाथों से इशारा करके जूते उतारने के लिए कहते। मैं चुपचाप उनके पैरों के पास बैठकर जूते के फिते खोलती जूते उतारती, मौजे उतारती। यह बात मुझे अजीब लगती थी।” 15

इससे पुरुष सत्तात्मक मानसिकता का पता चलता है। पुरुषों ने कभी स्त्रियॉं को अपने बराबर नहीं समझा। सदैव उन्हें भयभीत रखा और केवल उपभोग की वस्तु ही समझा। स्त्री को धमकाकर उन पर अधिकार जमाकर अपनी सत्ता को कायम रखा है। सुशीला जी के लिए पति द्वारा मार-पीट, गाली-गलौच, नौकरनी जैसा व्यवहार करना आम बात हो गई थी। “कभी कभी वे स्पष्ट शब्दों में कहते थे। मेरे पैर पर अपना सिर रखकर माफी मांग तब मैं तेरी बात मानूँगा।”16

कटु जीवनानुभूतियों को सहने के पश्चात सुशीला जी ने अपनी हक की लढाई लड़ना शुरू कर दिया। जुल्म करने से ज्यादा जुल्म सहनेवाला होता है। यह बात लेखिका जान गई। सड़ी गली परंपरों, रूढ़ियों से टकराने का साहस जुटाकर समाज उद्धार के कार्यों में सक्रिय हो गयी। लेखिका लेखन कार्य, दलित-साहित्य सम्मेलनों, चर्चाओं में भाग लेने लगी, दलित साहित्य से संबन्धित स्वयं की पुस्तकें प्रकाशित कर हिन्दी दलित साहित्य में अपनी पहचान बनाई।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि इन आत्मकथाओं में दलित होने के कारण दलितों पर होने वाले अत्याचार, शोषण, प्रताड़णा, उपेक्षा, हीनता, व्यथा को देखा जा सकता है। भारतीय वर्ण व्यवस्था के तले दलित सदैव से ही पिसता आ रहा है। दलित आत्मकथायें दहकता हुआ दस्तावेज़ साबित हो रही है। इन आत्मकथाओं में दलित होने के साथ ही एक स्त्री पर होने वाले शोषण को व्यक्त किया है। इन लेखिकाओं ने कभी हर नहीं मानी। शिक्षा प्राप्ति को सारे दुखों का हल जानकार अपने जीवन में आगे बढ़ती रहीं।

संदर्भ ग्रंथ :

1) अनामिका कुमारी, 2018, स्त्री आत्मकथा लेखन के प्रेरक तत्व:, रिसर्च रिविऊ इंटरनेशनल जर्नल औफ़ मल्टीडिसिप्लिनरी, पृ. 576।

2) डॉ. राजेश्वरी, 2016, प्रतिरोध के स्वर बुलंद करतीक दलित लेखिकाओं की आत्मकथाएं: शब्द ब्रह्म, , volume 4, पृ॰6।

3) रजनी तिलक, 2018, ‘हिन्दी दलित साहित्य में स्त्री चित्रण व पितृसत्ता’, समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन आत्मकथा:, स्वराज प्रकाशन दिल्ली, पृ॰ 45।

4) कौशल्य बैसंत्री, 2012, दोहरा अभिशाप, परमेश्वरी प्रकाशन, पृ॰ 47।

5) कौशल्य बैसंत्री, 2012, दोहरा अभिशाप:, परमेश्वरी प्रकाशन, पृ॰ 56।

6) वहीं,

7) वहीं, पृ॰ 7

8) वहीं, पृ॰ 116

9) सुशीला टाकभौरे,  2014, शिकंजे का दर्द वाणी प्रकाशन, पृ॰ 16।

10) वहीं, पृ॰ 51

11) वहीं, पृ॰ 16

12) वहीं, पृ॰ 19

13) वहीं, पृ ॰ 22

14) वहीं, पृ॰ 26

15) वहीं, पृ॰ 143

२१वी सदी की ‘सुशीला’ को चाहिए ‘अनंत असीम दिगंत…..’-प्रो. डॉ. सौ. रमा प्र. नवले

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प्रो. डॉ. सौ. रमा प्र. नवले

पूर्व प्र.प्राचार्य एवं विभागप्रमुख

स्नातकोत्तर हिंदी विभाग एवं अनुसन्धान केंद्र

पीपल्स कॉलेज, नांदेड

—————————————————————————————————————————————————पत्राचार का पता – ९८, माणिक नगर, डॉ. पाटील हॉस्पिटल के पास, नांदेड (४३१६०५), दूरध्वनी – ०२४६२ – २६१३२५ , मो. ९८९०३५०३२५ Email – ramanawle@gmail.com


दि ११/०५/२०१८

२१वी सदी की ‘सुशीला’ को चाहिए ‘अनंत असीम दिगंत…..’

सुशीला टाकभौरे की कविताओं के आस्वाद से यह महसूस किया जा सकता है कि २१वी सदी में अब स्त्री विमर्श युवा होकर अपने सौंदर्य के जलवे बिखेर रहा है| अब इस विमर्श ने अपने व्यक्तित्व को पहचान लिया है| इसलिए अपनी अस्मिता से यह कविता दीपदीपाने लगी है| एक साहस, एक आत्मविश्वास, आत्ममुग्धता, निर्भीड़ता, उचित-अनुचित के निर्णय की क्षमता क्या होती है इसकी पहचान इस साहित्य ने कर ली है| लग रहा इस साहित्य का लक्ष्य अब निश्चित है| एक साहसी पथिक की तरह कैसे निरंतर चलते रहना है – जीवन के इस मर्म को, अब इस कविता ने पहचान लिया है| सुशीलाजी की कविताएँ स्त्री विमर्श के केवल युवा होने का ही परिचय नहीं देती बल्कि प्रौढत्व का भी परिचय देती है| हमारे महामहीम राष्ट्रपति अबुलकलाम आज़ाद ने कहा था – ‘ छोटा सपना देखना पाप होता है’| २१वी सदी की सुशीला भी छोटा सपना नहीं देखती उसे तो चाहिए ‘अनंत असीम दिगंत …. ’ इसलिए यह कहना अत्युक्ति न होगा कि हिंदी महिला लेखन अब सुशीला जैसी कई कवयित्रियों के माध्यमसे ‘आकाश’ में विचरण कर रहा है, पैर उसके ‘धरती’ पर ही है और मन में उसके ‘सागर’ है|

मेहतर समाज की एक छोटी सी लड़की ‘सुशीला’ का अदम्य साहस अचंभित करता है| अत्यंत दरिद्र और सात भाई-बहनों के साथ एक बड़े परिवार में जीनेवाली यह लड़की, पिता के पढ़ाई बंद करने के निर्णय के विरुद्ध उपोषण करती है| एक ओर दरिद्रता और दूसरी ओर निम्न जाति में भी निम्न समझी जानेवाली मेहतर जाति के दंश की पीड़ा लगातार वह भुगतती रही है | ना वह अपनी सहेलियों के साथ बैठ पाई न खेल पाई और ना ही पीएच. डी. जैसी उच्चतम उपाधि पाने के बाद भी ‘झाडूवाली’ शब्द से छुटकारा पा सकी; पर ताज्जुब यह है कि जाति और लिंग भेद के अंधे कुँए के अँधेरे को चीरकर सतरंगी सपने बराबर वह देखती रही है| उनमें साहस इतना है कि पत्थर पर भी लकीर बनाना आसन है पर उनके निर्णयों को डिगाना या तोड़ पाना मुश्किल| ‘सुरक्षा’ से अधिक ‘स्व रक्षा’ में अधिक विश्वास करनेवाली यह स्त्री है| हर चीज की तरह व्यक्ति का भी इस्तेमाल किए जानेवाली इस सदी में ना वह अपना उपयोग किसी को भी करने देंगी और ना ही नमूने की तरह अपने को शोभा की वस्तु बनाकर रखने देंगी| वह तो खुद एक ‘आइकॉन’ बनी हुई है – “मगर यह नहीं की बरबस / मुझे किसी छोटे गमले में / लगाया जाए / या किसी नर्सरी में / मात्र अर्थोपार्जन के लिए / एक नमूने के रूप में रखा जाए | मेरा उपयोग / मेरा उपभोग / नहीं सह सकती मैं, / सदियों से / शोषित – पीड़ित / अब नहीं रह सकती मैं / मेरा इतिहास है, स्वाभिमान है, गौरव है / अपने अस्तित्व के लिए / लड़ सकती हूँ मैं, / जल – थल नभ की / हर लड़ाई चुनौती के साथ |” १

सुशीलाजी डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के विचारों की मशाल हाथ में लेकर चलती है| उन्हें बापू के तीन बंदर भोले-भाले लोगों को भर्मानेवाले दिखाई देते हैं – ‘आज हमें लगता है / यही था आपका दूरदर्शी अभिमान /भोलेभाले लोगों को / भरमाने के लिए / देते रहे ऐसा ज्ञान / सत्य मत देखो / सत्य मत कहो / सत्य मत सुनो २ और स्त्री-पुरुष की प्राकृतिक समानता की दावेदारी पर वह अटल हैं| वह यह मानती है कि इन दो ध्रुवों को बाँधकर रखनेवाला प्रेम और आकर्षण है| प्रेम और आकर्षण का चुम्बक स्त्री और पुरुष की बराबरी में, समानता में है – “प्रेम आकर्षण स्नेह प्यार / रहेगा जबतक / स्त्री-पुरुष समानता का भाव / बराबरी के दावेदार / दोनों रहेंगे महत्वपूर्ण / चुम्बक रहेगा ३

एक आत्मकथा – ‘शिकंजे का दर्द’ (२०११), उपन्यास – ‘नीला आकाश’ (२०१३), ‘तुम्हें बदलना ही होगा’ (२०१५), ‘वह लड़की’ (२०१८), कहानी संग्रह – ‘संघर्ष’ (२००६), ‘जरा समझो’ (२०१४) लिखकर अभी तक चार कविता संग्रह ‘स्वाति बूँद और खरे मोती’ (१९९३), ’यह तुम भी जानो’ (१९९४), ‘तुमने उसे कब पहचाना’ (१९९७), ‘हमारे हिस्से का सूरज’ (२००५) – उन्होंने दिए हैं| ‘संवादों का सफ़र’ (दलित मुक्ति आन्दोलन, महिला मुक्ति तथा सामाजिक परिवर्तन से संबंधित पत्रों का संग्रह), ‘सुधीर शर्मा के पत्र’ (२०१८, पत्र संग्रह) हैं| इसके अलावा ‘हिंदी साहित्य के इतिहास में नारी’ १९९४), ‘भारतीय नारी, समाज और साहित्य के परिप्रक्ष्य में’ (१९९६), ‘हाशिए का विमर्श’ (१९९६), ‘अनुभूति के घेरे’ (१९९७), ‘टूटता वहम’ (१९९७), ‘दलित साहित्य एक आलोचना दृष्टि’ (२०१५) – आदि रचनाओं के माध्यमसे उनके विचारों को जाना जा सकता है| ‘रंग और व्यंग्य’ (२००६, स्त्री-पुरुष समानता का संदेश देनेवाले नाटक), ‘नंगा सत्य’ (२००७) नाटक हैं| उनके साक्षात्कारों का संग्रह ‘मेरे साक्षात्कार’ (२०१५) है| सुशीलाजी को कई पुरस्कारों से नवाज़ा गया है – ‘यह तुम भी जानो’ इस कविता संग्रह के लिए मध्य प्रदेश दलित साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री गुलाबभाई अवार्ड, ‘ज्ञान ज्योती अवार्ड’ तथा महारष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा भी उन्हें पुरस्कृत किया गया है | आज वह पूरे देश्भार में एक जानीमानी साहित्यकार के रूप में पहचानी जाती है | उन्होंने जो सपना देखा था – ‘और मैं सबकी नज़र बनना चाहती हूँ’ के मुताबिक़ आज वह सबकी ‘नज़र’ में हैं|

वर्तमान साहित्य के केंद्र में मनुष्य की अनुभूतियाँ प्रमुख हो गयी हैं| सुशीलाजी एक दलित स्त्री होने के कारण एक ओर दलित होने की और दूसरी ओर स्त्री होने की पीड़ा से वह गुज़री हैं| भोगी हुई पीड़ा होने के कारण कविता की अनुभूतियाँ बहुत तीव्र रूप में पाठकों को भी कचोटती हैं| यह लेख उनकी कविता में अभिव्यक्त स्त्री मन पर केन्द्रित है, यह इस लेख की सीमा है| सुशीलाजी की कविताएँ स्त्रियों के अंतर्मन की सूक्ष्म पतों को खोलकर रखती है| उस पर छाये अमूर्त दबाव तंत्र को विश्लेषित करती हैं| और सबसे बड़ी बात उनकी कविताएँ स्त्री के ‘व्यक्तित्व’ को व्याख्यायित करते हुए उसके स्वरूप पर बहुत स्पष्ट शब्दों में प्रकाश डालती है| यह कार्य करते समय उनकी भाषा इन अमूर्त भावों को मूर्त करने में ज़रा भी हिचकिचाती नहीं है| शब्द बहुत विश्वास के साथ एक-एक परतों को खोलते जाते हैं |

मनुष्य जितना-जितना सुसंस्कृत एवं सभ्य होता जा रहा है ; शोषण के तरीके भी उतने ही प्रौढ़ और शिष्ट रूप में आ रहें हैं| व्यवस्था का शिकंजा स्त्री को अपने ही कब्जे में रखना चाहता है| एक दबाव तंत्र जो स्त्रियों के जीने के साथ-साथ ही चलते रहता है| जो दिखाई नहीं देता ; पर दिलोंदिमाग पर नाग के फन की तरह बैठे रहता है| ज़रा हिले नहीं कि फूफकारते रहता है| ज़रा सी नज़र हिलने पर फूसफूस करते रहता है| यह आतंक की तरह हमेशा साथ रहता है| इसका स्वरूप इतना सूक्ष्म होता है कि इस दबाव तंत्र को समझना सामान्य से परे की बात होती है| सुशीलाजी इस दबाव तंत्र को ज़रा खोलती है| इसके निराकार नुकीले दांत वह दिखाती है| इसकी कुरूपता और भयावहता से वह परिचित कराती है – एक स्त्री / जब भी कोई कोशिश करती है – / लिखने की, बोलने की, समझाने की, / सदा भयभीत – सी रहती है / मानो / पहरेदारी करता हुआ / कोई / सर पर सवार हो / पहरेदार / जैसे एक मजदूर औरत के लिए / ठेकेदार / या खरीदी संपत्ति के लिए / चौकीदार ४ एक सामान्य स्त्री पर यह दबाव तंत्र अपना वर्चस्व बनाए रखने में कामयाब होता है| इसके भी माया की तरह अनेक रूप होते है| कभी स्त्री को महिमा मंडित कर, कभी प्रशंसा कर, कभी प्रेम के जाल में उलझाकर, कभी आश्वस्त कर, कभी भ्रम – जाल निर्माण कर … नाना रूपों से यह दबाव तंत्र स्त्री को ठगते रहता है, वह स्त्री को अपने कब्जे में घेर लेता है| पर २१ वी शती की स्त्री को अपने कब्जे में घेरना दबाव तंत्र के लिए भी मुश्किल हो गया है ; क्यों कि ‘जानकी जान गयी है’- “आज जानकी सब जान गयी है / अब वह धरती में नहीं आकाश में जाना चाहती है / बिजली – सी चमक कर / सन्देश देना चाहती है / ‘पुरुष प्रधान समाज में / स्त्री भी / समानता की अधिकारी है’ / उसकी अस्मिता के प्रति / तुमने जो भेदभाव किया / तुम्हारे देशवासी भी करते हैं / इसलिए देवभूमि के इस देश में / ‘भूकंप’ आते रहते हैं| ५ यह दबाव तंत्र सुशीला जैसी सुशिक्षित और प्रबुद्ध साहित्यकार महिला पर भी अपना असर दिखाने लगता है| इस दबाव तंत्र की तकलीफ सामान्य महिला को उतनी चुभती नहीं है ; पर जो सब जानती है उसे यह पीड़ा बहुत कचोटती है| जो प्रबुद्ध साहित्यकार महिला अपनी कलम से समाज का दिशा निर्देश करती है उसी कलम को अन्य दिशाओं का पालन करने के लिए दबाव बढ़ने लगता है तब सुशीला की कलम जुझारू हो जाती है| स्त्री कैसे रहे? कैसे जिए? कैसे सोचे? कैसे लिखे? कैसे अभिव्यक्त हो? इस पर परिवार और समाज की नज़रे रहती ही है| यह नज़र चाहे पुरुष की हो या स्त्री की वह पितृसत्ताक व्यवस्था से उत्पन्न हुई नज़र है| इन नज़रों के अमूर्त नुकीलेपन को कवयित्री ने अपनी ‘स्त्री’ कविता के माध्यमसे अत्यंत स्पष्ट और मूर्त रूप में उजागर कर दिया है | यह दबाव तंत्र कलम को भी झुकाने के निर्देश देने लगता है तब वह बहुत बेचैन हो जाती है – “वह सोचती है / लिखते समय कलम को झुका ले / बोलते समय बात को सँभाल ले / और समझने के लिए / सबके दृष्टिकोण से देखे, / क्योंकि वह एक स्त्री है / लेकिन कब तक?” ६ कविता की इन पंक्तियों में कवयित्री की अपनी अनुभूतियों को उनके मूल रूप के साथ अभिव्यक्त न कर पाने की पीड़ा की अभिव्यक्ति हुई है| एक सृजनशील स्त्री (कवयित्री का दर्द) इन पंक्तियों में उभरा है| अपनी और समस्त स्त्री जाति की अस्मिता के प्रति सचेत स्त्री को अपनी ‘कलम को झुकाना’ कितना मुश्किल होता है? कलम को झुकाना अर्थात अपनी अस्मिता को गिरवी रखना है| अस्मिता के प्रति सजग व्यक्ति को मृत्यु भी इतनी यातना नहीं देता जितनी उसे अपनी अस्मिता को गिरवी रखने से होती है| अपनी ताकतवर नज़र को भुलाकर सबके दृष्टिकोण से देखना यह और भी कठिन है| प्लेटो ने कहा था ‘गुलामी मृत्यु से भी भयंकर होती है’ – सुशीला की इन पंक्तियों को पढ़ते समय इन शब्दों को सहज ही बड़ी तीव्रता से हम महसूस किया जा सकता है| सुशीलाजी ‘कलम को झुकाने की पीड़ा, टीस की तरह पाठकों के लिए छोड़ती हैं| यह टीस तब तक शाश्वत रहेगी जब तक स्त्री की कलम इस दबाव तंत्र के आगे झुकने के लिए बाध्य रहेगी| स्त्रियों की अभिव्यक्ति पर रही पाबंदियों का इतना वास्तव चित्रण अन्यत्र दुर्लभ है|

सुशीलाजी की कविताएँ स्त्री के ‘व्यक्तित्व’ को बहुत प्रखर रूप में उभारती है एवं स्त्री के व्यक्तित्व का एक पूरा स्केच अपनी कविताओं के माध्यमसे प्रस्तुत करती है| इनकी कविताओं में आई स्त्री २१वी सदी की शिक्षित एवं प्रबुद्ध स्त्री है; जो अपनी अस्मिता के प्रति सजग है| यह स्त्री ‘स्त्री’ होने का हक़ नहीं जताती और ना ही अपने लिए केवल स्त्री होने के नाते कुछ विशेष सुविधाएँ चाहती है| यह स्त्री समाज के अन्य ‘मनुष्य सदस्यों’ की तरह (स्त्री और पुरुष) अपने को भी मनुष्य सदस्य मानती है| केवल स्त्री होने के कारण अपनी अलग विशेषता यह रेखांकित नहीं करती ; और ना ही अपने लिए कोई विशेष सुविधा चाहती है| वह पुरुष के प्रति देखने के श्रेष्ठता भाव (ग्रंथी) से और स्त्री को हीन माननेवाले हीनता भाव (हीनता ग्रंथी) से मुक्त है| यह स्त्री ‘अपनी सुरक्षा’ के लिए किसी दूसरे का इंतजार नहीं करती बल्कि ‘स्वरक्षा’ में विश्वास करती है| इसकी सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि ऊपर उल्लिखित दबावतंत्र के प्रति वह पूरी तरह से सजग है| उसके विकास के बाधक तत्वों को वह पहचानती है| यह बात ही सुशीला को २१ वी सदी की प्रबुद्ध स्त्री के रूप में सिद्ध करती है| उसे पता है कि उसके व्यक्तित्व के खुलने या उसके व्यक्तित्व के विकास में ये तत्व उसके सामने महा ठगिनी माया की तरह उसे ठगने के लिए आये हैं| ये बाधक तत्व कभी-मीठी छूरी की तरह स्नेह का रूप भी धारण कर आते हैं| इनको पहचानना आसान नहीं है| यह तंत्र इतना सूक्ष्म है कि कब स्त्री को अपने भुलावे में लेकर अपनी धूर्तता से उसके आत्मविश्वास को ख़त्म कर देगा उसे पता ही नही चलेगा| किसी के व्यक्तित्व को मिटाने की पहली सीढ़ी उसके आत्मविश्वास को, उसके मनोबल को तोड़ना है| दुनिया की नज़रों से गिरा हुआ व्यक्ति आसानी से ऊपर उठ सकता है ; पर अपनी ही नज़र से गिरे व्यक्ति का ऊपर उठना बहुत-बहुत मुश्किल होता है| कवयित्री इस चाल को समझती है| इसलिए सबसे पहले अपने विश्वास को ; जिसके कारण उसका व्यक्तित्व खुल नहीं पाया, पहले उसे लौटा देने की बात करती है| इसी कारण अब उसे किसी भी पुरुष के व्यवहार पर विश्वास नहीं है| वह उसकी हर बात को संदेह की नज़र से देखती है| ‘लौटा दो मेरा विश्वास’ कविता की पंक्तियाँ दृष्टव्य है – “मैं करने लगी हूँ अविश्वास / तुम्हारे हर व्यवहार पर / ……….. . . . जब भी मैंने पंख फैलाये / तुमने उनको क़तर दिया है / स्नेह संरक्षण के भ्रम से / मुझे पनपने नहीं दिया है| ७ बावजूद कवयित्री अपने व्यक्तित्व को फैलाने और पनपाने से बाज नहीं आती| यह साहस एवं आत्मविश्वास काबिले तारीफ़ है| वह खुरच-खुरच कर दबाव तंत्र की सारी परतों को उतार फेंकती है| वह किसी भी प्रकार के भुलावे में नही फँसती| अपनी कविता ‘आज की खुद्दार औरत’ में कवयित्री ने इन सारे पुराने जेवरों को त्यागने की बात की है – “पहचानों उसके नए तेवर / श्रद्धा, शर्म, दया, धरम / किसमें खोजते हो? / सँभालो अपने / पुराने जेवर / थान के थान / परिधान” ८

सुशीलाजी की कविताओं में न स्त्री-पुरुष के प्रेम संबंध है और ना ही विवाह बाह्य संबंध| इनकी कविताएँ केवल और केवल ‘स्त्री के व्यक्तित्व’ पर ध्यान केन्द्रीत करती है| अपने व्यक्तित्व के अलावा कवयित्री को कुछ भी प्रिय नहीं है| यह व्यक्तित्व ‘असीम अनंत दिगंत’ की चाहत रखता है| उड़ान की क्षमता तो देखिए….. अब इस स्त्री को छत का खुला आसमान नहीं, आसमान की खुली छत चाहिए – “मुझे अनंत असीम दिगंत चाहिए, / छत का खुला आसमान नहीं, / आसमान की खुली छत चाहिए / मुझे अनंत आसमान चाहिए”९ २१वी सदी की स्त्री की सोच में इस प्रकार का परिवर्तन आना ही इस सदी की स्त्री की विशेष विशेषता है| स्त्री के जिस ‘व्यक्तित्व’ की बात की जा रही है वह आखिर है क्या? वह असीम अनंत दिगंत क्या है? कवयित्री अपनी कविताओं में इसका विश्लेषण करती है| स्त्री के व्यक्तित्व को सुशीलाजी बहुत स्पष्ट शब्दों में रेखांकित कर रही है| व्यक्तित्व की पहचान अपनी अस्मिता के प्रति सजग होने में है| अपने व्यक्तित्व के विकास में रोड़े डालने के लिए फैलाए गए जाल को पहचानकर उसे तोड़ने में है| कहाँ – कहाँ पर अपनी प्रगति के पंखों को, किन – किन भ्रमों को फैलाकर काटा जा रहा है – उसकी पहचान में है (लौटा दो मेरा विश्वास) इन पंक्तियों में ‘मुझे पनपने नहीं दिया है’ – यह पंक्ति स्त्री के भीतर की उन सारी क्षमताओं की ओर इशारा करती है जिसके कारन उसका व्यक्तित्व बनता है| पितृ व्यवस्था या परिवार व्यवस्था ने उसकी इन क्षमताओं को कभी उभरने नहीं दिया| एक ‘स्त्री’ को कभी ‘व्यक्तित्व’ में परिणित नहीं होने दिया| उसे भ्रमजाल में उलझाकर रखा| वह यह भी जानती है कि स्त्री को अक्सर उपेक्षा की ठंडक से और आक्रोश के तेज़ाब से रौंदा जाता है (तुमने उसे कब पहचाना) यह बात वही स्त्री पह्चान सकती है जो शिक्षित एवं प्रबुद्ध है| यह वही स्त्री हो सकती है जो अपने को समानता की अधिकारिणी मानती है और केवल स्त्री होने के कारण अपने लिए किसी विशेष स्थान की अपेक्षा नहीं करती| यह वही स्त्री हो सकती है जिसके ह्रदय में सागर होगा और मन में आकाश पर पैर उसके अपनी धरती पर ही होंगे ; क्षितीज वह खुद ही ढूंढ लेंगी (सागर और आकाश)| यह वही स्त्री होगी जो यह सोचती है कि कोई दूसरा आकर उसकी सुरक्षा नहीं करेगा, बल्कि उसे स्व की सुरक्षा स्वयं ही करनी है| सुशीलाजी व्यक्तित्वधारिणी है| इसलिए इनकी कविताएँ धरती से उपजी है ; पर विचरण आकाश में करती है| रस धरती से लेती है और आकाश में सपनों के रंग बिखेरती है| इनके सपनों पर लाख पाबंदियां हो पर इनके सपने उन पाबंदियों को काटकर मुक्त हो ही जाते हैं और आकाश में इंद्रधनुषी रंग बिखेर देते है|

व्यक्तित्व की पहचान संघर्ष के साहस से बनती है| यह संघर्ष स्वयं के लिए भी हो सकता है और समग्र स्त्री जाति के लिए भी एवं दलितों – शोषितों के लिए भी | ऊपर बताया जा चुका है कि सुशीलाजी स्वयं पर विश्वास कर जीनेवाली महिला है| हम उनके लेखन के माध्यमसे नयी दृष्टि का परिचय पाते हैं| जहां दलित विमर्श का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अपनी स्थिती से रूबरू कराना है वही सुशीलाजी दलितों की स्थिति से परिचित कराने के बजाए उन्हें ही उनकी स्थिति का जिम्मेदार मानती है| उनके मन में यह प्रश्न उठता है, उनके पूर्वजों ने क्यों नहीं इस घिनौनी और लाचार जिंदगी का विरोध किया? खतरे किसी भी युग में कम नहीं होते| स्थितियां समान रूप से हर युग में उतनी ही चुनौतीपूर्ण होती है| फिर अपनी स्थिति बदलने का प्रयास क्यों नहीं हुआ? सुशीलाजी की यह दृष्टि उनके व्यक्तित्व की पहचान है| खुद को तराशना और निरंतर अपने आपको निखारते जाना किसी भी सामर्थ्यशाली व्यक्ति के व्यक्तित्व का हिस्सा होता है| अपने संकुचित वृत्तों से परे जाकर सोचनेवाला आदमी ही बुरे को बुरा और अच्छे को अच्छा कहने का सामर्थ्य रखता है| इसलिए वह अपने पूर्वजों की नपूंसकता को ललकारती हैं| वह प्रश्न पूछती है – “हाथ नहीं उठाया/ किसी ने भी, / गुरु-भक्ति के नाम पर / आवाज नहीं उठाई? / विषमता और स्वार्थ की बात को / तुम सबने / मौन रूप से स्वीकार किया| / ………….. किसकी प्रशंसा करे इतिहास? अंधी गुरु भक्ति की / या नपुंसक वीरता की? / महाभारत का विजेता / पार्थ / प्रशंसनीय है, / तुम / क्यों दया के पात्र हो ? १० सुशीलाजी पूर्वजों से मिली विचारों की जमीन पर स्थिर खड़े रहने से निजात पाती है| वह आ तो गयी है अँधेरे कुँए से पर साहस इतना है कि केवल कुँए से बाहर निकलना उसका लक्ष्य नहीं है; यह कोई भी कर सकता है| कवयित्री इससे इतना आगे बढ़ना चाहती है कि ; इन परंपराओं के निशान वह पूरी तरह से मिटा देना चाहती है| व्यक्तित्व का परिचय तो तब मिलता है जहाँ वह केवल पुराने निशान मिटाकर भी रुकना नहीं चाहती ; बल्कि प्रकाश के पूंजों की वह खुद भी पूर्वज बनना चाहती है और समग्र जाति को भी पूर्वज बनाना चाहती है| बंधक गुलाम पीढी के / वंशज कहलाना / शर्म की बात है / तुम पूर्वज बनो प्रकाश पुंजों के/ प्रकाश तुम में निहित है| ११ इसी तरह वह स्त्रियों की भी प्रकाश पुंज बनना चाहती है और अन्य स्त्रियों को भी प्रकाश पुंज बनाने के लिए प्रेरित करती है| जिन स्त्रियों के आँख, कान और विचार स्वतंत्र हैं पर अभी भी पांवों में बंधन हैं, इसलिए वह चौखट के बाहर आना नहीं चाहती उन स्त्रियों को आनेवाली पीढ़ियों के लिए रास्ता बनाने के लिए प्रेरित करती है – “आँख, कान, विचार स्वतंत्र है / बंधन है सिर्फ पांवों में| / कुल की लाज / सीमाओं का दायरा / घर की चौखट तक / मायका हो या ससुराल / दरवाजे के पीछे /परदे की ओट से /वह देखती रहती है संसार / आनेवाली पीढ़ियों / नहीं रह सकती उसके पीछे / उन्हें रास्ता देना होगा आगे बढ़कर, / घर की चौखट से बाहर निकलकर| १२ यह रास्ता उनके लिए बनाना है जिनके जन्म की ज़मीन (बेटियों के) ही नदारद है उनके लिए पैर जमाकर खड़े होने के लिए ज़मीन बनाने के लिए इन औरतों को चौखट के बहार लाना चाहती है|

सुशीलाजी की कविताओं को पढ़ते समय यह जिज्ञासा थी कि इनकी कविताओं में दलित स्त्री की अलग अनुभूतियों से परिचय होगा| हिंदी में अभी भी इन अनुभवों का इंतजार है| सुशीलाजी के साहित्य के केंद्र में सामान्य स्त्री ही है| दलित स्त्री की अनुभूतियाँ न के बराबर हैं| ‘मेरा अस्तित्व’ नामक कविता में दलित स्त्री चेतना की हल्की सी झलक मिलती है| एक ब्राह्मणवाद ( अपने को श्रेष्ठ और अन्यों को कनिष्ठ मानने की वृत्ति के अर्थ में) समूची व्यवस्था पर छाया हुआ है| अपने अहं के प्रतिपादन के मौके आदमी छोड़ नहीं पाता| यह मनुष्य की असाध्य बीमारी है| यह बीमारी छूत की तरह दलितों को भी लगी है| सुशीलाजी इमानदार कवयित्री है| एक पल के लिए उनके भी मन में यह अहंकार जगता है; पर तुरंत वह अपने आप को सँभाल लेती है| आज वह भले ही ‘सवर्ण’ बन गयी है ; पर इस वृत्ति को तुरंत वह ताड़ लेती है| इस कविता में यह संघर्ष अभिव्यक्त हुआ है| परन्तु कविता के अंत तक पहुंचते-पहुँचते वह अपना अस्तित्व बिरादरी के अस्तित्व में ही ढूंढ लेती है|

दलित साहित्य अनुभूति का साहित्य है| इस साहित्य की परख अनुभूति के आधारपर ही होनी चाहिए ; न कि कलात्मकता के आधारपर| सुशीलाजी की रचनाएँ एक कदम आगे चलती है| स्त्रियों के अमूर्त भाव, उसकी पीडाओं – यातनाओं के साथ उसके सपनों को बुनने में इनकी काव्य – भाषा समर्थ है| स्त्री के व्यक्तित्व को रौंदने के लिए ‘उपेक्षा की ठंडक’ और ‘आक्रोश का तेज़ाब’ जैसे शब्दों का प्रयोग बड़ा सार्थक है| स्त्री मस्तिष्क पर छाये समूचे दबाव तंत्र को साधारण एवं बोलचाल की भाषा में अभिव्यक्त करने में कवयित्री को कमाल की सफलता मिली है| दबाव तंत्र के कारन अभिव्यक्ति में निर्माण बाधक तत्वों को, स्त्री की ‘तथाकथित समझदारी’ को तथा उसकी सृजनात्मकता पर कार्यरत पहरेदारी को बहुत साधारण और बोलचाल के दो-तीन शब्दों में ही अभिव्यक्त करने में कवयित्री सफल हो पायी है| जैसे सहज अभिव्यक्ति के लिए – ‘बोलते समय बात को सँभाल ले’, उसकी ‘समझदारी’ अपने दृष्टिकोण से देखने में नहीं बल्कि औरों की दृष्टि से देखने में हैं – इस बात को – ‘और समझने के लिए / सबके दृष्टिकोण से देखे / क्योंकि वह एक स्त्री है’ तथा एक प्रबुद्ध स्त्री की सृजनात्मक पहरेदारी को – ‘लिखते समय कलम को झुका ले’ – जैसे छोटे-छोटे वाक्य अमूर्त दबावतंत्र को मूर्त रूप देते है| बेटी के ‘जन्म की जमीन नदारद है’ (आस की पीड़ा) कहकर कवयित्री इस बेटी के ‘जन्म की जमीन पाने के सपने को, आस को’ – ‘बेटी झील सी आँखों से / राह तकती रहेगी’ कहकर इस पीड़ा को झील जितना गहारा बना देती है और पाठकों को बेचैन कर वास्तविकता की जमीन पर ला पटकती है| उसे ‘असीम अनंत दिगंत चाहिए’ में ऐसे महीन दबाव तंत्र को भी दबाकर बहुत ऊपर उठने के सपनों को बुनती है ; जो इक्कीसवी सदी की शिक्षित एवं प्रबुद्ध स्त्री की पहचान कराने में समर्थ है| इन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति में भाषा उनके सामने झुक जाती है|

संदर्भ सूची

  1. स्वाती बूद और खारे मोती – सुशीला टाकभौरे, पृ. २४
  2. बलि के बकरे – यातना के स्वर – सुशीला टाकभौरे, पृ. १६
  3. चुम्बक – स्वाती बूँद और खरे मोती – सुशीला टाकभौरे, – पृ. ४३
  4. स्त्री – यह तुम भी जानो – सुशीला टाकभौरे, पृ. ३०
  5. जानकी जान गयी है – तुमने उसे कब पहचाना – सुशीला टाकभौरे, पृ ६६
  6. स्त्री – यह तुम भी जानो – सुशीला टाकभौरे, पृ. ३०
  7. लौटा दो मेरा विश्वास – तुमने उसे कब पहचाना – सुशीला टाकभौरे, पृ. ९३
  8. आज की खुद्दार औरत – तुमने उसे कब पहचाना – सुशीला टाकभौरे, पृ. ७९
  9. विद्रोहिणी – तुमने उसे कब पहचाना – सुशीला टाकभौरे, पृ. ८४
  10. भील एकलव्य – यह तुम भी जानो – सुशीला टाकभौरे, पृ. ३४
  11. प्रकाश पुंज – यह तुम भी जानो – सुशीला टाकभौरे, पृ. २४
  12. घर की चौखट से बाहर – तुमने उसे कब पहचाना – सुशीला टाकभौरे, पृ.७७

प्रो. रमा प्र. नवले

९८९०३५०३२५

हिंदी कविता का समकालीन परिदृश्य: राहुल देव

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प्रकाशक: यश पब्लिकेशन एंड प्राईवेट डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड, दिल्ली 
ईमेल-: yashpublishersprivatelimited@gmail.com दूरभाष- 09599483884, 85, 86, 87

100 से अधिक हिंदी लेखकों का प्रधानमंत्री को खुला पत्र

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सेवा में,
श्री नरेन्द्र मोदी जी
माननीय प्रधान मंत्री,
भारत सरकार

विषय : भोजपुरी या हिन्दी की किसी भी अन्य बोली को संविधान की #आठवीं_अनुसूची में
शामिल न किया जाय.

10sep39U





महोदय,

हमारी हिन्दी आज टूटने के कगार पर है. निजी स्वार्थ के लिए कुछ लोगों ने भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग तेज कर दी है. भोजपुरी के कलाकार और दिल्ली से भाजपा के सांसद श्री मनोज तिवारी ने संसद और उसके बाहर भी यह माँग दुहराई है. जन भोजपुरी मंच नामक संगठन ने अपनी माँग के पक्ष में जिन 9 आधारों का उल्लेख किया है उनमें से सभी आधार तथ्यात्मक दृष्टि से अपुष्टअतार्किक और भ्रामक हैं. हिन्दी बचाओ मंच ने उनकी व्यापक छानबीन की है और उन सभी आधारों पर क्रमश: अपना पक्ष प्रस्तुत करता है.

1. भाषा विज्ञान की दृष्टि से भोजपुरी भी उतनी ही पुरानी है जितनी ब्रजीअवधीबुन्देलीछत्तीसगढ़ीहरियाणवीकुमायूंनी- गढ़वालीमगहीअंगिका आदि हिन्दी की अन्य बोलियाँ. क्या उन सबको आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाना संभव है?

2. भोजपुरी भाषियों की संख्या 20 करोड़ बताई गई है. यह कथन मिथ्या है. हिन्दी समाज की प्रकृति द्विभाषिकता की है. हम लोग एक साथ अपनी जनपदीय भाषा भोजपुरीअवधीब्रजी आदि भी बोलते हैं और हिन्दी भी. लिखने- पढ़ने का सारा काम हम लोग हिन्दी में करते हैइसीलिए राजभाषा अधिनियम 1976 के अनुसार हमें ’ श्रेणी में रखा गया है और दस राज्यों में बँटने के बावजूद हमें हिन्दी भाषी’ कहा गया है. वैसे 2001 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार भोजपुरी बोलने वालों की संख्या लगभग 3,30,99497 ही है.

3. स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले सिर्फ हम भोजपुरी भाषी ही नहीं थे. देश भर के लोगों ने स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया था. वैसे स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले अब संयोग से बचे नहीं हैं. वर्नावे अपने उत्तराधिकारियों की माँग से कत्तई सहमत नहीं होते. उन्होंने तो अंग्रेजों की गुलामी से पूरे देश की मुक्ति के लिए लड़ाई लड़ी जबकि ज.भो.मं. के लोग अपना घर बाँटने के लिए लड़ रहे हैं.

4. ज.भो.मं. के अनुसार भोजपुरी देशी भाषा है तो क्या हिन्दी देशी #भाषा नहीं हैक्या वह किसी अन्य देश से आई है?

5. ज.भो.मं. ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सहित देश के कुछ विश्वविद्यालयों में भोजपुरी के पठन पाठन का जिक्र किया है. यह सूचना भ्रामक है. भोजपुरी हिन्दी का अभिन्न अंग हैवैसे ही जैसे राजस्थानीअवधीब्रज आदि और हम सभी विश्वविद्यालयों के हिन्दी- पाठ्यक्रमों में इन सबको पढ़ते-पढ़ाते हैं. हिन्दी इन सभी के समुच्चय का ही नाम है. हम कबीरतुलसीसूरचंदबरदाईमीरा आदि को भोजपुरीअवधीब्रजराजस्थानी आदि में ही पढ़ सकते हैं. हिन्दी साहित्य के इतिहास में ये सभी शामिल हैं. इनकी समृद्धि और विकास के लिए और भी प्रयास किए जाने चाहिए.

6. ज.भो.मं. ने मारीशस में भोजपुरी को सम्मान मिलने का तर्क दिया है. मारीशस में भोजपुरी को सम्मान मिलने से हिन्दी भी गौरवान्वित हो रही है. इससे अपने देश में भोजपुरी को मान नहीं मिल रहा- यह कैसे प्रमाणित हो सकता हैक्या घर बाँट लेना ही मान मिलना होता हैवैसे 2011 की जनगणना की रिपोर्ट अनुसार मारीशस की कुल आबादी बारह लाख छत्तीस हजार है जिसमें से सिर्फ 5.3 प्रतिशत लोग भोजपुरी भाषी है. यानीकिसी भी तरह यह संख्या एक लाख नहीं होगी.

7. क्या ज.भो.मं.मेडिकल और इंजीनियरी की पढ़ाई भोजपुरी में करा पाएगातमाम प्रयासों के बावजूद आज तक हम इन विषयों की पढ़ाई हिन्दी में करा पाने में सफल नहीं हो सके. ऐसी मांग करने वाले लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाते हैंखुद हिन्दी की रोटी खाते हैं और #मातृभाषा के नाम पर भोजपुरी को पढ़ाई का माध्यम बनाने की माँग कर रहे हैंताकि उनके आस पास की जनता गँवार ही बनी रहे और उनकी पुरोहिती चलती रहे.

8. भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से करोड़ों भोजपुरी भाषियों में आत्मगौरव नहींआत्महीनताबोध पैदा होगा. घर बँटने से हिन्दी भी कमजोर होगी और भोजपुरी भी

9. ज.भो.मं. का कहना है कि भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिन्दी को कोई क्षति नहीं होगी. हिन्दी को होने वाली क्षति का बिन्दुवार विवरण हम यहाँ दे रहे हैं.:–

संविधान की आठवीं अनुसूची में भोजपुरी के शामिल होने से हिन्दी को होने वाली क्षति –

1. भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिन्दी भाषियों की जनसंख्या में से भोजपुरी भाषियों की जनसंख्या (ज.भो.मं. के अनुसार 20 करोड़) घट जाएगी. मैथिली की संख्या हिन्दी में से घट चुकी है. स्मरणीय है कि सिर्फ संख्या-बल के कारण ही हिन्दी इस देश की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है. यदि यह संख्या घटी तो #राजभाषा का दर्जा हिन्दी से छिनते देर नहीं लगेगी. भोजपुरी के अलग होते ही ब्रजअवधीछत्तीसगढ़ीराजस्थानीबुंदेलीमगहीअंगिका आदि सब अलग होंगी. उनका दावा भोजपुरी से कम मजबूत नहीं है. रामचरितमानस’, ‘पद्मावत’, या सूरसागर’ जैसे एक भी ग्रंथ भोजपुरी में नहीं है.

2. ज्ञान के सबसे बड़े स्रोत विकीपीडिया ने बोलने वालों की संख्या के आधार पर दुनिया के सौ भाषाओं की जो सूची जारी की है उसमें हिन्दी को चौथे स्थान पर रखा है. इसके पहले हिन्दी का स्थान दूसरा रहता था. हिन्दी को चौथे स्थान पर रखने का कारण यह है कि सौ भाषाओं की इस सूची में भोजपुरीअवधीमारवाड़ीछत्तीसगढ़ीढूँढाढीहरियाणवी और मगही को शामिल किया गया है. साम्राज्यवादियों द्वारा हिन्दी की एकता को खंडित करने के षड़्यंत्र का यह ताजा उदाहरण है और इसमें विदेशियों के साथ कुछ स्वार्थांध देशी जन भी शामिल हैं.

3. हमारी मुख्य लड़ाई अंग्रेजी के वर्चस्व से है. अंग्रेजी हमारे देश की सभी भाषाओं को धीरे धीरे लीलती जा रही है. उससे लड़ने के लिए हमारी एकजुटता बहुत जरूरी है. उसके सामने हिन्दी ही तनकर खड़ी हो सकती है क्योंकि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से वह आज भी देश की सबसे बड़ी भाषा है और यह संख्या-बल बोलियों के जुड़े रहने के नाते है. ऐसी दशा में यदि हम बिखर गए और आपस में ही लड़ने लगे तो अंग्रेजी की गुलामी से हम कैसे लड़ सकेंगे?

4. भोजपुरी की समृद्धि से हिन्दी को और हिन्दी की समृद्धि से भोजपुरी को तभी फायदा होगा जब दोनो साथ रहेंगी. आठवीं अनुसूची में शामिल होना अपना अलग घर बाँट लेना है. भोजपुरी तब हिन्दी से स्वतंत्र वैसी ही भाषा बन जाएगी जैसी बंगलाओड़ियातमिलतेलुगू आदि. आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद भोजपुरी के कबीर को हिन्दी के कोर्स में हम कैसे शामिल कर पाएंगेक्योंकि तब कबीर #हिंदी के नहींसिर्फ भोजपुरी के कवि होंगे. क्या कोई कवि चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाय?

5. भोजपुरी घर में बोली जाने वाली एक बोली है. उसके पास न तो अपनी कोई #लिपि है और न मानक व्याकरण. उसके पास मानक गद्य तक नहीं है. किस भोजपुरी के लिए मांग हो रही हैगोरखपुर कीबनारस की या छपरा की ?

6. कमजोर की सर्वत्र उपेक्षा होती है. घर बँटने से लोग कमजोर होते हैंदुश्मन भी बन जाते हैं. भोजपुरी के अलग होने से भोजपुरी भी कमजोर होगी और हिन्दी भी. इतना ही नहींपड़ोसी बोलियों से भी रिश्तों में कटुता आएगी और हिन्दी का इससे बहुत अहित होगा. मैथिली का अपने पड़ोसी अंगिका से विरोध सर्वविदित है.
7. संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को स्थान दिलाने की माँग आज भी लंबित है. यदि हिन्दी की संख्या ही नहीं रहेगी तो उस मांग का क्या होगा?

8. स्वतंत्रता के बाद हिन्दी की व्याप्ति हिन्दीतर भाषी प्रदेशों में भी हुई है. हिन्दी की संख्या और गुणवत्ता का आधार केवल हिन्दी भाषी राज्य ही नहींअपितु हिन्दीतर भाषी राज्य भी हैं. अगर इन बोलियों को अलग कर दिया गया और हिन्दी का संख्या-बल घटा तो वहाँ की राज्य सरकारों को इस विषय पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है कि वहाँ हिन्दी के पाठ्यक्रम जारी रखे जायँ या नहीं. इतना ही नहींराजभाषा विभाग सहित केन्द्रीय हिन्दी संस्थानकेन्द्रीय हिन्दी निदेशालय अथवा विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसी संस्थाओं के औचित्य पर भी सवाल उठ सकता है.

मान्यवरभोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग भयंकर आत्मघाती है. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और स्व. चंद्रशेखर जैसे महान राजनेता तथा महापंडित राहुल सांकृत्यायन और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे महान साहित्यकार ठेठ भोजपुरी क्षेत्र के ही थे किन्तु उन्होंने भोजपुरी को मान्यता देने की मांग का कभी समर्थन नहीं किया. आज थोड़े से लोगअपने निहित स्वार्थ के लिए बीस करोड़ के प्रतिनिधित्व का दावा करके देश को धोखा दे रहे है.

अत: ‘#हिन्दी_बचाओ मंच’ के हम सभी सदस्य आपसे से विनम्र अनुरोध करते हैं कि-

कृपया हिन्दी की किसी भी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल न करें और इस विषय में यथास्थिति बनाए रखें.
सधन्यवाद,

निवेदक : भारत के हम हिन्दी -लेखक :-
1. डॉ. अमरनाथप्रोफेसरक. वि. वि. तथा संयोजकहिन्दी बचाओ मंचकोलकातामो: 9433009898
2. प्रो. अच्युतानंद मिश्रपूर्व कुलपतिमा. च. पत्रकारिता विश्वविद्यालयभोपाल.
3. डॉ. अभिजीत सिंहआलोचक एवं संस्थापक सदस्यहिन्दी बचाओ मंचसिलीगुड़ी.
4. प्रो. अनंतराम त्रिपाठीप्रधानमंत्रीराष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समितिवर्धा.
5. प्रो. अरुण होताअध्यक्षहिन्दी विभागप.बं.रा.विश्वविद्यालयबारासात.
6. प्रो. अच्युतनपूर्व प्रोफेसरहिन्दी विभागकालीकट विश्वविद्यालयकालीकट.
7. प्रो. आलोक पाण्डेयप्रोफेसरहिन्दी विभागकेन्द्रीय विश्वविद्यालयहैदराबाद.
8. प्रो. आलोक गुप्ताप्रोफेसरहिन्दी विभागकेन्द्रीय विश्वविद्यालयगाँधीनगर.
9. डॉ. आशुतोषलेखक व संस्थापक सदस्यहिन्दी बचाओ मंचकोलकाता.
10. ओमप्रकाश पाण्डेयप्रतिष्ठित लेखक व संपादक, ‘नया परिदृश्य’, सिलीगुड़ी.
11. कविता वाचक्नवीप्रख्यात लेखिका व महासचिव, ‘विश्वंभरा’, हॉस्टन,टैक्सास.
12. प्रो.कमलकिशोर गोयनकाप्रख्यात लेखक व उपाध्यक्षके.हि.सं.आगरा.
13. कनक तिवारीप्रख्यात लेखकसामाजसेवी व वरिष्ठ अधिवक्ताहाई कोर्टबिलासपुर.
14. प्रो. करुणाशंकर उपाध्यायअध्यक्षहिन्दी विभागमुंबई विश्वविद्यालय.
15. डॉ. करुणा पाण्डेयप्रतिष्ठित लेखिकाकोलकाता.
16. प्रो. काशीनाथ सिंहसाहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात लेखकवाराणसी.
17. प्रो. कृष्णकुमार गोस्वामीप्रख्यात भाषावैज्ञानिक व लेखकदिल्ली.
18. डॉ.कैलाशचंद्र पंतप्रतिष्ठित लेखक व मंत्रीम.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समितिभोपाल.
19. प्रो.गंगाप्रसाद विमलप्रख्यात साहित्यकार व पूर्व प्रोफेसरजे.एन.यू. नई दिल्ली.
20. चित्रा मुद्गलव्यास सम्मान से सम्मानित कथाकारदिल्ली.
21. प्रो. चौथीराम यादवप्रख्यात लेखक व पूर्व प्रोफेसरबी.एच..यू.वाराणसी.
22. ज्योतिष जोशीप्रख्यात लेखक व संपादकललित कला अकादमीदिल्ली.
23. प्रो. जवरीमल्ल पारखप्रख्यात मीडिया समीक्षक व प्रोफेसरइग्नूनई दिल्ली.
24. डॉ. जवाहर कर्णावटप्रतिष्ठित लेखक व सहायक महाप्रबंधक (राजभाषा)मुंबई.
25. प्रो. जयप्रकाशप्रख्यात आलोचक एवं पूर्व प्रोफेसरचंडीगढ़ विश्वविद्यालय.
26. जय प्रकाश धूमकेतुप्रतिष्ठित लेखक व संपादक अभिनव कदम’, मऊनाथ भंजन.
27. जाबिर हुसेनबिहार विधान सभा के पूर्व अध्यक्ष व प्रख्यात लेखकपटना.
28. प्रो.जी. गोपीनाथनपूर्व कुलपतिम.गाँ.अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालयवर्धा.
29. जीवन सिंहसह सचिव अपनी भाषा’ एवं संस्थापक सदस्य हिन्दी बचाओ मंच’, कोलकाता.
30. प्रो.तंकमणि अम्मापूर्व हिन्दी विभागाध्यक्षकेरल विश्वविद्यालयतिरुवनंतपुरम.
31. डॉ. दामोदर खड़सेसाहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखकमुंबई.
32. प्रो. देवराजप्रख्यात लेखक तथा डीनम.गां.अं.हि.वि.विश्वविद्यालयवर्धा.
33. डॉ. देवेन्द्र गुप्तप्रसिद्ध लेखक व संपादक, ‘सेतु’ एवं विपाशा’, शिमला.
34. डॉ. देवसिंह पोखरियाप्रख्यात आलोचक एवं प्रोफेसरकुमायूं विश्वविद्यालयनैनीताल.
35. प्रो. नंदकिशोर पाण्डेयनिदेशककेन्द्रीय हिन्दी संस्थानआगरा.
36. डॉ. नरेश मिश्रप्रोफेसरहरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालयमहेन्द्र गढ़.
37. डॉ. निर्मल कुमार पाटोदीलेखक व पूर्व निदेशक राजभाषामुंबई.
38. नीरज कुमार चौधरीशोधछात्रक.वि.वि. एवं संस्थापक सदस्यहिन्दी बचाओ मंचकोलकाता.
39. पंकज बिष्टप्रख्यात लेखक व संपादक समयांतर’, दिल्ली.
40. डॉ. परमानंद पांचालप्रसिद्ध लेखक व मंत्रीनागरी लिपि परिषददिल्ली.
41. पुष्पा भारतीप्रख्यात लेखिकाफ्लैट नं.-5शाकुन्तल साहित्य सहवासमुंबई.
42. डॉ. प्रकाशचंद्र गिरिप्रतिष्ठि कवि व एसो. प्रोफेसरएम.एल.के.कॉलेजबलरामपुरउ. प्र.
43. प्रो. प्रमोद कुमार शर्माअधिष्ठाताकला संकायनागपुर विश्वविद्यालय.
44. प्रेमपाल शर्माप्रख्यात भाषाविद्लेखक तथा पूर्व संयुक्त सचिवरेलवे बोर्डदिल्ली.
45. प्रभु जोशीप्रख्यात लेखक व चित्रकारइंदौर.
46. प्रो.पुष्पिता अवस्थीसुप्रसिद्ध लेखिका व कवयित्रीनीदरलैंड.
47. बलदेव बंशीप्रख्यात कवि – आलोचक व हिन्दी के योद्धाफरीदाबाद.
48. बीना बुदकीमंत्रीहिन्दी कश्मीरी संगमदिल्ली.
49. डॉ. बीरेन्द्र सिंहअसिस्टेंट प्रोफेसरस्काटिश चर्च कालेज व सदस्यहिन्दी बचाओ मंचकोलकाता.
50. बिजय कुमार जैनप्रख्यात पत्रकार व संयोजकहिन्दी वेलफेयर ट्रस्टमुंबई.
51. प्रो.बी.वै.ललिताम्बाप्रख्यात लेखिकाहिन्दी सेवी व पूर्व प्रोफेसरबंगलौर.
52. भारतेन्दु मिश्रप्रतिष्ठित लेखक व शिक्षाविद्दिल्ली.
53. प्रो.महावीर सरन जैनभाषाविद् व पूर्व निदेशकके. हि. सं. आगरा.
54. डॉ. महेश दिवाकरअध्यक्षअंतरराष्ट्रीय साहित्य कला मंचमुरादाबाद.
55. महेश जायसवालप्रख्यात नाटककार व संस्कृतिकर्मीकोलकाता.
56. महेश चंद्र गुप्तप्रख्यात हिन्दी सेवी व पूर्व निदेशक (राजभाषा)दिल्ली.
57. डॉ. एम. एल. गुप्ता आदित्यसंयोजकवैश्विक हिन्दी सम्मेलनमुंबई.
58. प्रो.एम.बेंकटेश्वरसमीक्षक व पूर्व प्रोफेसरउस्मानिया विश्वविद्यालयहैदराबाद.
59. प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंहप्रोफेसरहिन्दी विभागलखनऊ विश्वविद्यालयलखनऊ.
60. प्रो. रंजना अरगड़ेअध्यक्षहिन्दी विभागगुजरात विश्वविद्यालयअहमदाबाद.
61. रंजीत संकल्पसचिवबंगीय हिन्दी परिषद एव संस्थापक सदस्य हिन्दी बचाओ मंच’, कोलकाता.
62. प्रो. रमेश दवेप्रख्यात आलोचक एवं पूर्व प्रोफेसरभोपाल.
63. रमेश जोशीप्रतिष्ठित लेखक व प्रधान संपादक विश्वा’, ओहायो.
64. पद्मश्री रमेशचंद्र शाहव्यास सम्मान से सम्मानित प्रख्यात साहित्यकारभोपाल.
65. प्रो.रविभूषणप्रख्यात लेखक व पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्षराँची विश्वविद्यालयरांची.
66. प्रो. रवि श्रीवास्तवप्रख्यात आलोचक व पूर्व प्रोफेसरहिन्दीराजस्थान वि.वि. जयपुर.
67. रविप्रताप सिंहप्रतिष्ठित कवि व अध्यक्ष, ‘शब्दाक्षर’, कोलकाता.
68. डॉ. राजेन्द्रनाथ त्रिपाठीमंत्रीबंगीय हिन्दी परिषद्कोलाकाता.
69. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेयप्रतिष्ठित लेखकवाराणसी.
70. डॉ. राजेन्द्र कुमारप्रख्यात लेखक व पूर्व प्रोफेसरइलाहाबाद विश्वविद्यालयइलाहाबाद.
71. प्रो. राजश्री शुक्लाअध्यक्षहिन्दी विभागकलकत्ता विश्वविद्यालयकोलकाता.
72. राजकिशोरप्रख्यात लेखक- पत्रकार एवं संपादक, ‘रविवार’, इंदौर.
73. डॉ. राजेन्द्रआलोचक व संस्थापक सदस्यहिन्दी बचाओ मंचकोलकाता.
74. राकेश पाण्डेयसंपादक, ‘प्रवासी संसार’, नई दिल्ली.
75. राहुल देवप्रख्यात पत्रकारदिल्ली.
76. डॉ. राधेश्याम शुक्लसंपादक, ‘भास्वर भारत’, हैदराबाद.
77. प्रो. रूपा गुप्ताप्रसिद्ध लेखिका व अध्यक्षहिन्दी विभागबर्दवान विश्वविद्यालय.
78. प्रो. रोहिणी अग्रवाललेखिका व अध्यक्षहिन्दी विभागम.द.विश्वविद्यालयरोहतक.
79. डॉ.ऋषिकेश रायप्रतिष्ठित कवि- आलोचक व उपनिदेशक(राजभाषा),टी.बोर्डकोलकाता.
80. प्रो.ऋषभदेव शर्माप्रतिष्ठित लेखक व संयुक्त संपादक, ‘भास्वर भारत’, हैदराबाद.
81. विश्वनाथ सचदेवप्रख्यात पत्रकारसंपादक नवनीत’ मुंबई.
82. विभूतिनारायण रायप्रख्यात लेखक व पूर्व कुलपति,म.गाँ.अं.हि.विश्वविद्यालयवर्धा.
83. प्रो.विजयकुमार मल्होत्राप्रख्यात लेखक व भाषाविद्दिल्ली.
84. डॉ. विजयबहादुर सिंहप्रख्यात आलोचक एवं पूर्व संपादक वागर्थ’, भोपाल.
85. विजय गुप्तप्रसिद्ध लेखक व संपादक साम्य’, अम्बिकापुरजिला- सरगुजाछ.ग.
86. डॉ. विमलेश कान्ति वर्माप्रख्यात भाषाविद व प्रोफेसरदिल्ली विश्वविद्यालय.
87. डॉ. विद्या विन्दु सिंहप्रतिष्ठित लेखिका व पू.सं.नि. उ. प्र. हिं. सं. लखनऊ.
88. डॉ. वेदप्रताप वैदिकप्रख्यात पत्रकारदिल्ली.
89. डॉ. वेद प्रकाश पाण्डेयप्रतिष्ठित लेखक व अवकाशप्राप्त प्राचार्यगोरखपुर.
90. डॉ.शंकरलाल पुरोहितप्रख्यात लेखक व अनुवादकभुवनेश्वर.
91. शकुंतला बहादुरप्रतिष्ठित लेखिकाकैलीफोर्निया.
92. शकुन त्रिवेदीसंपादक, ‘द वेक’, कोलकाता.
93. शची मिश्राभोजपुरी की प्रतिष्ठित लेखिकापुणे.
94. प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्माअध्यक्षहिन्दी विभागविक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन.
95. श्रीमती शान्ता बाईसचिवकर्णाटक महिला हिन्दी सेवा समितिबंगलौर.
96. श्रीधर बर्वेप्रतिष्ठित लेखक व पूर्व प्राचार्यइंदौर.
97. प्रो. श्रीभगवान सिंहप्रख्यात लेखक व प्रोफेसरभागलपुर विश्वविद्यालय.
98. डॉ. श्रीनिवास शर्माप्रख्यात आलोचक संस्थापक सदस्यहिन्दी बचाओ मंचकोलकाता.
99. प्रो. एस.एम. इकबालराष्ट्रपति द्वारा सम्मानित हिन्दी लेखकविशाखापत्तनम्
100. प्रो. सोमा बंद्योपाध्यायप्रतिष्ठित लेखिका एवं कुलसचिवकलकत्ता विश्वविद्यालय.
101. प्रो. संजीव कुमार दुबेअध्यक्षहिन्दी विभागकेन्द्रीय विश्वविद्यालय गाँधीनगर.
102. प्रो. एस. शेषारत्नम् पूर्व प्रोफेसरआंध्रा विश्वविद्यालयविशाखापत्तनम्.
103. प्रो.सुधीश पचौरीप्रख्यात लेखक व पूर्व प्रतिकुलपतिदिल्ली विश्वविद्यालय.
104. प्रो. सदानंद गुप्तप्रतिष्ठित लेखक व पूर्व प्रोफेसरगोरखपुर विश्वविद्यालय.
105. डॉ.सत्यप्रकाश तिवारीसंस्थापक सदस्यहिन्दी बचाओ मंचकोलकाता.
106. प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षितसंयोजक हिन्दीसाहित्य अकादमीदिल्ली.
107. प्रो. सुरेन्द्र दुबेप्रतिष्ठित लेखक व कुलपतिबुन्देलखंड विश्वविद्यालयझांसी.
108. स्नेह ठाकुरप्रतिष्ठित लेखिका व संपादक वसुधा’, टोरंटोकनाडा.
109. सुरेशचंद्र शुक्लप्रतिष्ठित लेखक व संपादक ‘Speil दर्पण’, नार्वे.
110. सुशील कुमार शर्माप्रोफेसरहिन्दी विभागमिजोरम विश्वविद्यालय.
111. प्रो. हरिमोहनकुलपतिजे. एस. विश्वविद्यालयशिकोहाबादफिरोजाबाद.
112. प्रो. हरिमोहन बुधौलियापूर्व हिन्दी विभागाध्यक्षविक्रम वि.वि.उज्जैन.
113. क्षमा शर्माप्रतिष्ठित लेखिकादिल्ली.

संपर्क : डॉ. अमरनाथ
प्रोफेसरहिन्दी विभागकलकत्ता विश्वविद्यालय एवं संयोजकहिन्दी बचाओ मंच
ईई-164/402सेक्टर-2साल्टलेककोलकाता-700091
ई-मेल : amarnath.cu@gmail.com, Mobile: 09433009898
साभार: हिंदी बचाओ मंच

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