कफ़न- प्रेमचंद
कफ़न- प्रेमचंद
झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए हैं और अन्दर बेटे की जवान बीबी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अन्धकार में लय हो गया था।
घीसू ने कहा-मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।
माधव चिढक़र बोला-मरना ही तो है जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?
‘तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफाई!’
‘तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।’
चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना काम-चोर था कि आध घण्टे काम करता तो घण्टे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मजदूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की कसम थी। जब दो-चार फाके हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढक़र लकडिय़ाँ तोड़ लाता और माधव बाज़ार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम की कमी न थी। किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसी वक्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी सन्तोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनो साधु होते, तो उन्हें सन्तोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल जरूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई सम्पत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जिये जाते थे। संसार की चिन्ताओं से मुक्त कर्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई गम नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ कर्ज़ दे देते थे। मटर, आलू की फसल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पाँच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाश-वृत्ति से साठ साल की उम्र काट दी और माधव भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाये थे। घीसू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए, देहान्त हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जब से यह औरत आयी थी, उसने इस ख़ानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-गैरतों का दोजख भरती रहती थी। जब से वह आयी, यह दोनों और भी आरामतलब हो गये थे। बल्कि कुछ अकडऩे भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निब्र्याज भाव से दुगुनी मजदूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इन्तजार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोयें।
घीसू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा-जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या? यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है!
माधव को भय था, कि वह कोठरी में गया, तो घीसू आलुओं का बड़ा भाग साफ़ कर देगा। बोला-मुझे वहाँ जाते डर लगता है।
‘डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।’
‘तो तुम्हीं जाकर देखो न?’
‘मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं; और फिर मुझसे लजाएगी कि नहीं? जिसका कभी मुँह नहीं देखा, आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूँ! उसे तन की सुध भी तो न होगी? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी न पटक सकेगी!’
‘मैं सोचता हूँ कोई बाल-बच्चा हुआ, तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में!’
‘सब कुछ आ जाएगा। भगवान् दें तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपये देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था; मगर भगवान् ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।’
जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज़्यादा सम्पन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज़्यादा विचारवान् था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाजों की कुत्सित मण्डली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी, कि बैठकबाजों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मण्डली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फ़ायदा तो नहीं उठाते! दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि ठण्डा हो जाने दें। कई बार दोनों की जबानें जल गयीं। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा जबान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज़्यादा खैरियत इसी में थी कि वह अन्दर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठण्डा करने के लिए काफ़ी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते।
घीसू को उस वक्त ठाकुर की बरात याद आयी, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक़ बात थी, और आज भी उसकी याद ताजी थी, बोला-वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला। लडक़ी वालों ने सबको भर पेट पूडिय़ाँ खिलाई थीं, सबको! छोटे-बड़े सबने पूडिय़ाँ खायीं और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोज में क्या स्वाद मिला, कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, माँगो, जितना चाहो, खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म, गोल-गोल सुवासित कचौडिय़ाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिये जाते हैं। और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी? खड़ा हुआ न जाता था। चटपट जाकर अपने कम्बल पर लेट गया। ऐसा दिल-दरियाव था वह ठाकुर!
माधव ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मजा लेते हुए कहा-अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।
‘अब कोई क्या खिलाएगा? वह जमाना दूसरा था। अब तो सबको किफायत सूझती है। सादी-ब्याह में मत खर्च करो, क्रिया-कर्म में मत खर्च करो। पूछो, गरीबों का माल बटोर-बटोरकर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ, खर्च में किफायत सूझती है!’
‘तुमने एक बीस पूरियाँ खायी होंगी?’
‘बीस से ज़्यादा खायी थीं!’
‘मैं पचास खा जाता!’
‘पचास से कम मैंने न खायी होंगी। अच्छा पका था। तू तो मेरा आधा भी नहीं है।’
आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पाँव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलिया मारे पड़े हों।
और बुधिया अभी तक कराह रही थी।
सबेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठण्डी हो गयी थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टँगी हुई थीं। सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था।
माधव भागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों जोर-जोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोस वालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आये और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे।
मगर ज़्यादा रोने-पीटने का अवसर न था। कफ़न की और लकड़ी की फ़िक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह गायब था, जैसे चील के घोंसले में माँस?
बाप-बेटे रोते हुए गाँव के जमींदार के पास गये। वह इन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे। कई बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा-क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता।
घीसू ने ज़मीन पर सिर रखकर आँखों में आँसू भरे हुए कहा-सरकार! बड़ी विपत्ति में हूँ। माधव की घरवाली रात को गुजर गयी। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दगा दे गयी। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक! तबाह हो गये। घर उजड़ गया। आपका ग़ुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह सब तो दवा-दारू में उठ गया। सरकार ही की दया होगी, तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊँ।
जमींदार साहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कम्बल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया, कह दें, चल, दूर हो यहाँ से। यों तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब गरज पड़ी तो आकर खुशामद कर रहा है। हरामखोर कहीं का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दण्ड देने का अवसर न था। जी में कुढ़ते हुए दो रुपये निकालकर फेंक दिए। मगर सान्त्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ ताका तक नहीं। जैसे सिर का बोझ उतारा हो।
जब जमींदार साहब ने दो रुपये दिये, तो गाँव के बनिये-महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता? घीसू जमींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना जानता था। किसी ने दो आने दिये, किसी ने चारे आने। एक घण्टे में घीसू के पास पाँच रुपये की अच्छी रकम जमा हो गयी। कहीं से अनाज मिल गया, कहीं से लकड़ी। और दोपहर को घीसू और माधव बाज़ार से कफ़न लाने चले। इधर लोग बाँस-वाँस काटने लगे।
गाँव की नर्मदिल स्त्रियाँ आ-आकर लाश देखती थीं और उसकी बेकसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थीं।
बाज़ार में पहुँचकर घीसू बोला-लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गयी है, क्यों माधव!
माधव बोला-हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।
‘तो चलो, कोई हलका-सा कफ़न ले लें।’
‘हाँ, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?’
‘कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।’
‘कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।’
‘और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपये पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।’
दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घूमते रहे। कभी इस बजाज की दूकान पर गये, कभी उसकी दूकान पर! तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जँचा नहीं। यहाँ तक कि शाम हो गयी। तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुँचे। और जैसे किसी पूर्व निश्चित व्यवस्था से अन्दर चले गये। वहाँ जरा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे। फिर घीसू ने गद्दी के सामने जाकर कहा-साहूजी, एक बोतल हमें भी देना।
उसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछली आयी और दोनों बरामदे में बैठकर शान्तिपूर्वक पीने लगे।
कई कुज्जियाँ ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गये।
घीसू बोला-कफ़न लगाने से क्या मिलता? आखिर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।
माधव आसमान की तरफ देखकर बोला, मानों देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो-दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बाँभनों को हजारों रुपये क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!
‘बड़े आदमियों के पास धन है, फ़ूँके। हमारे पास फूँकने को क्या है?’
‘लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?’
घीसू हँसा-अबे, कह देंगे कि रुपये कमर से खिसक गये। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपये देंगे।
माधव भी हँसा-इस अनपेक्षित सौभाग्य पर। बोला-बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो खूब खिला-पिलाकर!
आधी बोतल से ज़्यादा उड़ गयी। घीसू ने दो सेर पूडिय़ाँ मँगाई। चटनी, अचार, कलेजियाँ। शराबखाने के सामने ही दूकान थी। माधव लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया। पूरा डेढ़ रुपया खर्च हो गया। सिर्फ थोड़े से पैसे बच रहे।
दोनों इस वक्त इस शान में बैठे पूडिय़ाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाबदेही का खौफ था, न बदनामी की फ़िक्र। इन सब भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था।
घीसू दार्शनिक भाव से बोला-हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा?
माधव ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक़ की-जरूर-से-जरूर होगा। भगवान्, तुम अन्तर्यामी हो। उसे बैकुण्ठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वह कभी उम्र-भर न मिला था।
एक क्षण के बाद माधव के मन में एक शंका जागी। बोला-क्यों दादा, हम लोग भी एक-न-एक दिन वहाँ जाएँगे ही?
घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया। वह परलोक की बातें सोचकर इस आनन्द में बाधा न डालना चाहता था।
‘जो वहाँ हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे?’
‘कहेंगे तुम्हारा सिर!’
‘पूछेगी तो जरूर!’
‘तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!’
माधव को विश्वास न आया। बोला-कौन देगा? रुपये तो तुमने चट कर दिये। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सेंदुर मैंने डाला था।
‘कौन देगा, बताते क्यों नहीं?’
‘वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया। हाँ, अबकी रुपये हमारे हाथ न आएँगे।’
‘ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज होती थी, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जाता था। कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाये देता था।
वहाँ के वातावरण में सरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज़्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाएँ यहाँ खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं।
और यह दोनों बाप-बेटे अब भी मजे ले-लेकर चुसकियाँ ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थीं। दोनों कितने भाग्य के बली हैं! पूरी बोतल बीच में है।
भरपेट खाकर माधव ने बची हुई पूडिय़ों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा इनकी ओर भूखी आँखों से देख रहा था। और देने के गौरव, आनन्द और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया।
घीसू ने कहा-ले जा, खूब खा और आशीर्वाद दे! जिसकी कमाई है, वह तो मर गयी। मगर तेरा आशीर्वाद उसे ज़रूर पहुँचेगा। रोयें-रोयें से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं!
माधव ने फिर आसमान की तरफ देखकर कहा-वह बैकुण्ठ में जाएगी दादा, बैकुण्ठ की रानी बनेगी।
घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला-हाँ, बेटा बैकुण्ठ में जाएगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गयी। वह न बैकुण्ठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मन्दिरों में जल चढ़ाते हैं?
श्रद्धालुता का यह रंग तुरन्त ही बदल गया। अस्थिरता नशे की ख़ासियत है। दु:ख और निराशा का दौरा हुआ।
माधव बोला-मगर दादा, बेचारी ने ज़िन्दगी में बड़ा दु:ख भोगा। कितना दु:ख झेलकर मरी!
वह आँखों पर हाथ रखकर रोने लगा। चीखें मार-मारकर।
घीसू ने समझाया-क्यों रोता है बेटा, खुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गयी, जंजाल से छूट गयी। बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द माया-मोह के बन्धन तोड़ दिये।
और दोनों खड़े होकर गाने लगे- ‘ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी।
पियक्कड़ों की आँखें इनकी ओर लगी हुई थीं और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाये जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बताये, अभिनय भी किये। और आखिर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े।
कथाकार भगवानदास मोरवाल से डॉ. एम. फीरोज अहमद की बातचीत
कथाकार भगवानदास मोरवाल से डॉ. एम. फीरोज अहमद की बातचीत
1- आप अपने जन्म स्थान घर परिवार और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में विस्तार से बताइए…?
– मेरा जन्म हरियाणा के काला पानी कहे जाने वाले मेवात क्षेत्र के छोटे-से क़स्बा नगीना के एक अति पिछड़े मज़दूर और इस धरती के आदि कलाकार कुम्हार जाति के बेहद निम्न परिवार में हुआ। अपने मेरे घर-परिवार और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में पूछा है। अभी हाल में मैं अपने क़स्बे में गया हुआ था, तो संयोग से कुम्हार जाति की वंशावली का लेखा-जोखा रखने वाले हमारे जागा अर्थात जग्गा आ पहुँचे। मैंने जब इनसे अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में पूछा, तब इन्होंने कुछ ऐसी जानकारी दी जो मेरे लिए लगभग अविश्वसनीय थीं। जैसे इन्होंने बताया की हमारे मोरवाल गोत्र के पूर्वज उत्तर प्रदेश के काशी के मूल निवासी थे। काशी से वे पलायन कर बनारस आये। इसके बाद बनारस से पलायन कर सैंकड़ों मील दूर दक्षिण हरियाणा के बावल क़स्बे, जो रेवाड़ी के पास है, यहाँ आये। बावल से चलकर ये दक्षिण दिल्ली के महरोली, महरोली से पलायन कर सोहना (गुडगाँव) के समीप इंडरी गाँव और अंत में यहाँ से चलकर दक्षिण हरियाणा के ही मेवात के इस क़स्बे में जाकर पनाह ली। अपने आप को ऋषि भारद्वाज के वंशज कहलाने वाले इन जागाओं की बेताल नागरी में लिखी इन पोथियों में यह भी दर्ज़ है कि मेरे सड़ दादा गंगा राम के पाँच बेटे थे। इनमें से तीसरे नंबर के पल्टू राम के बेटे सुग्गन राम और सुग्गन राम के चार बेटों में से दूसरे नंबर के बेटे मंगतू राम के तीन बेटों में से दूसरे नंबर का बेटा भगवानदास। मुझ समेत हम तीन भाई और दो बहनें हैं। मैं यहाँ एक बात बता दूं कि हमारा पुश्तैनी काम मिटटी के बर्तन बनाना था, जो 1985 तक रहा।
मेव (मुसलमान) बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण मेरे क़स्बे और मेरे क़स्बे का वह चौधरी मोहल्ला भी मेव बाहुल्य मोहल्ला है। यहाँ एक रोचक जानकारी दे दूँ कि मेरे इस चौधरी मोहल्ले का नामकरण हिन्दुओं के चौधरियों के नाम पर नहीं है बल्कि मेव चौधरियों के नाम पर है। मेरे घर के सामने अगर ऐसा ही मेव चौधरी का घर है, तो बाएं तरफ भी ऐसा ही घर है। जबकि हमारे घर का पिछवाड़ा मुसलमान लुहारों से आबाद है। अपने परिवार में उस समय के हिसाब से मैं एकमात्र शिक्षित व्यक्ति था। हालाँकि अपनी क्षमता के अनुसार मैंने अपने दोनों बच्चों अर्थात बेटा प्रवेश पुष्प जिसकी शिक्षा एमसीए है, तो बेटी नैया ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी में पीएच.डी किया हुआ है। वैसे मैंने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में अपनी स्मृति-कथा पकी जेठ का गुलमोहर में भी विस्तार से लिखा हुआ है।
2. आप की शिक्षा-दीक्षा कहां से हुई और कहां तक…?
– मेरी प्रारंभिक शिक्षा अपने कस्बे में हुई। हाँ, स्नातक मैंने मेवात के जिले और प्रमुख शहर नूहं से की है। बाकी की शिक्षा जिसे ‘शिक्षा’ कहना उचित नहीं होगा, ऐसे ही चलते-चलाते पूरी की। स्नातक के बाद पहले राजस्थान विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। इसके बाद यहीं से हिंदी में एम.ए. किया। बस, मेरठ विश्वविद्यालय से ‘हिंदी पत्रकारिता में दिल्ली का योगदान’ विषय में पीएच.डी. होती-होती रह गयी।
3. आपकी प्रिय विधा कौन सी है और क्यों….
– जहां तक मेरी प्रिय विधा का प्रश्न है तो इस समय निसंदेह मेरी प्रिय विधा उपन्यास है। इसका एक कारण यह है कि एक लेखक द्वारा जिस तरह एक विधा साधनी चाहिए, शायद वह मुझसे साध गयी है। इसका प्रमाण पिछले कुछ सालों में एक के बाद तीन उपन्यासों के रूप में देखा जा सकता है। जबकि आगामी उपन्यास पर धीरे-धीरे काम हो रहा है। मुझे लगता है एक लेखक के रूप में मैं जितना सहज अपने आपको उपन्यास में पाता हूँ उतना शायद दूसरी विधा में नहीं। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि जीवन-जगत को प्रस्तुत करने के लिए जिस आख्यान की ज़रुरत होती है, उपन्यास उसे बखूबी अपना विस्तार प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में कहूं तो मेरी जैसी सामाजिक पृष्ठभूमि है उसके दुखों, संतापों और आक्रोश को मैं उपन्यास के माध्यम से ही व्यक्त कर सकता हूँ। इसीलिए मैं जितना अपने व्यक्तिगत जीवन में निर्मम हूँ, उतना ही अपनी रचनाओं में हूँ। प्रपंच या नकलीपन न मेरे असली जीवन में है, न मेरी रचनाओं में आपको नज़र आएगा। सच कहूं अब मैं उपन्यास को नहीं जीता हूँ बल्कि उपन्यास मुझे जीता है। मेरी रचनाओं और उनके पात्रों में आपको वह दुविधा या दुचित्तापन दिखाई नहीं देगा जो एक लेखक को कमज़ोर बनाता है।
4. हलाला उपन्यास लिखने का उद्देश्य किया था…?
– आपने हलाला के लिखने के उद्धेश्य के बारे में पूछा है। मेरा माना है कि किसी भी लेखक से उसके लिखने के उद्धेश्य के बारे में नहीं पूछना चाहिए ल लेखक या रचनाकार किसी उद्धेश्य को ध्यान में रख कर नहीं लिखता है। क्या प्रेमचन्द ने गोदान, रेणु ने मैला आँचल, राही मासूम रज़ा ने आधा गाँव, अब्दुल बिस्मिल्लाह ने बीनी-बीनी झीनी चदरिया, भीष्म साहनी ने तमस, श्रीलाल शुक्ल ने राग दरबारी, अज्ञेय ने नदी के द्वीप किसी उद्धेश्य के तहत लिखे होंगे – नहीं। दरअसल, रचना किसी उद्धेश्य का प्रतिपाद नहीं बल्कि एक लेखक के अंदर अपने समाज में देखी गयी विसंगतियों से पनपे द्वन्द्वों का सत्य होता है। यह वह सत्य होता है जिसे एक व्यक्ति महसूस तो करता मगर उसे व्यक्त नहीं कर पाता। एक लेखक वास्तव में उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व या कहिए ऐसा प्रतिरूप होता है जो एक पाठक को अलग-अलग पात्रों के रूप में नज़र आता है। उसके लिए धर्म-संप्रदाय या स्त्री-पुरुष मायने नहीं रखते हैं बल्कि उसके लिए उनके दुःख-दर्द और सरोकार कहीं ज़्यादा मायने रखते हैं। एक बेहतर कल्पना उसके लिए कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है। इसलिए यह कहना की हलाला लिखने मेरा क्या उद्धेश्य रहा होगा, इसे आपने उसे पढ़ कर जान और समझ लिया होगा।
5. क्या यह सब लिखने के लिए आप किसी मुस्लिम महिला से मुलाकात की थी?
-आपने पूछा कि इसे लिखने के लिए मैंने किसी मुस्लिम महिला से मुलाक़ात की थी? ‘हलाला’ की पृष्ठभूमि मेवात की होने के कारण पाठक को ऐसा लगता है मानो हलाला की रस्म मेवात में प्रचलित है। सच तो यह है कि मेवात में यह रस्म बिलकुल भी चलन में नहीं है। मैंने आज तक हलाला से संबंधित एक भी मामला न देखा न हीं सुना। अब आप पूछेंगे कि फिर आपने इसे मेवात की कहानी क्यों बनाया? इस पर मैं पलट कर आपसे जानना चाहता हूँ कि क्या ऐसी समस्याएँ सिर्फ़ मेवात की हो सकती हैं। मेवात से बाहर का मुस्लिम समाज ऐसी समस्याओं से नहीं जूझ रहा होगा ? इस उपन्यास की पृष्ठभूमि मेवात देने का कारण मात्र इतना है ही कि मैं उस समाज को गहरे तक जानता हूँ। अपने लेखकीय कौशल का इस्तेमाल कर मैं पानी बात को अपने चिर-परिचित पात्रों के माध्यम से कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से कह सकता हूँ। सच तो यह कि तलाक़ या हलाला जैसी समस्याएँ सामाजिक समस्याएँ हैं जिन्हें हमने धार्मिकता का वारन ओढा कर और विकराल बना दिया। इस विकरालता को और भयानक हमारे उन मर्दों ने बना दिया जो औरत को महज एक उपभोग की वस्तु और अपनी जागीर मान बैठा है।
लेखक का पाने पात्रों में ढालना या कहिए परकाया में प्रवेश करना ही उसकी सबसे बड़ी सफलता है। अगर यह उपन्यास काल्पनिक होते हुए भी कुछ सवाल उठाता है तो लेखक के साथ-साथ यह इसकी भी सफलता है।
6. हलाला उपन्यास लिखने के लिए क्या आपने कुरान या हदीस को पढ़ा था?
-यह आप अच्छी तरह जानते हैं कि किसी भी रचना या उपन्यास पर काम करने से पहले एक शोधार्थी की तरह मैं अपनी क्षमता और समझ के मुताबिक़ पूरी मेहनत करता हूँ। विषय से संबंधित हर तरह की उपलब्ध साहित्य और सामग्री का अध्ययन करता हूँ। उपन्यास ‘हलाला’ पर काम शुरू करने से पहले इस रस्म से संबंधित कुरआन की आयतों को खोजा, तो कुरआन में इससे संबंधित सूरा अल-बक़रा की मुझे सिर्फ़ 230वीं एक आयत मिली। बाकी हलाला के बारे में मुझे कोई दूसरी आयत नहीं मिली। इस आयत को मैं हू-ब-हू यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ – ‘तो यदि उसे ‘तलाक़’ दे दे, तो फिर उस के लिए यह स्त्री जायज नहीं है जब तक कि किसी दूसरे पति से निकाह न कर ले। फिर यदि वह उसे तलाक़ दे दे, तो फिर इन दोनों के लिए एक-दूसरे की ओर पलट आने में कोई दोष न होगा।’
इसे और स्पष्ट करने के लिए कुरआन में लिखा गया है –‘यह दूसरा पति यदि उसे छोड़ दे या उसकी मृत्यु हो जाए, तो यह स्त्री अपने पहले पति के साथ फिर से विवाह कर सकती है। ‘ इस आयत का अलग-अलग कोणों से अध्ययन करने के बाद मेरे मन में एक प्रश्न यह उठा कि अगर कुरआन में ऐसा कहा गया है, तो फिर दूसरे पति से निकाह के बाद उससे सहवास की बात कहाँ से आयी। हालाँकि कुरआन से इतर दूसरे धार्मिक ग्रन्थ जैसे हदीस में इसे क्यों और कहाँ जोड़ा गया कि औरत दूसरे शौहर के लिए उस वक़्त तक हलाल नहीं हो सकती, जब तक कि दूसरा शौहर उसके साथ न कर ले। अगर मैं एक आम मुस्लिम के नज़रिए से सोचूँ तो मेरे भीतर इस सवाल का उठाना स्वाभाविक है कि जब कुरआन में ऐसा कहीं है ही नहीं तो दूसरे पति से सहवास का क्या मतलब है। जहाँ तक हदीस की बात है और जितना मुझे पता है हदीस का आधार भी कुरआन ही है। अब हम यदि कुरआन को एक मुक्कदस आधार ग्रन्थ मानते हैं तो जो बात उसमें है ही नहीं वह खां से आयी। जबकि इसके बरअक्स दूसरे ग्रन्थों में सहवास का न केवल उल्लेख किया गया है बल्कि एक आम मुसलमान को जिस तरह समझाने की कोशिश की गयी है, उसमें मर्दवादी सोच पूरी तरह निहित है। जैसे सैयद अबुल आला मौदूदी की एक पुस्तक में हलाला के बारे में कहा गया है – नबी सल्लाहेवलेअस्ल्लम ने साफ़ कहा है कि हलाला के लिए केवल दूसरा निकाह ही काफी नहीं है, बल्कि औरत उस वक़्त तक पहले शौहर के लिए हलाल नहीं हो सकती, जब तक कि दूसरा शौहर उससे सहवास का स्वाद न चख ले। इसी तरह मैंने एक पत्रिका इसलाहे समाज में पढ़ा था कि …दूसरा शौहर उससे सहवास का मज़ा न चख ले।
अब आप देखिए कि कुरआन की मूल आयात का अर्थ एक पुस्तक से होता हुआ एक रिसाले तक आते-आते कितने चटखारे और मसालेदार हो गया ? मेरी नज़र में इस रस्म को घृणित और एक तरह से पूररी तरह स्त्री विरोधी उसके बाद के इन अर्थों और व्याख्याओं ने बना दिया है। चूंकि हमारा आम असमाज और आम नागरिक अपने धार्मिक दानिशवरों पर बहुत भरोसा करता है इसलिए जब स्वाद और मज़ा उन तक संप्रेषित होते हैं , उनके मायने और सलीके भी बदल जाते हैं। एक लेखक होने के नाते मैंने अपनी बात बिना किसी उत्तेजना और उकसावे के स्त्री के हक़ में कही है।
7. अधिकांश लेखक दूसरे की प्रथा पर लिखने से बचते हैं आपको नहीं लगा की कुछ गलत लिख दिया तो….
-आपने सही कहा है कि कोई भी लेखक दूसरे की प्रथा विशेष कर धार्मिक प्रथाओं पर लिखने से बचता है और बचाना भी चाहिए। मगर यह इस पर निर्भर करता है कि ऐसा विषय चुनते हुए उसकी मंशा और नीयत क्या और कैसी है। ऐसा ही सवाल कई पाठकों ने मेरे दूसरे उपन्यास ‘बाबल तेरा देस में’ को पढ़ने के बाद उठाया था। इस उपन्यास में भी ऐसे मुद्दों को उठाया गया था। इस बारे में मेरा कहना यह है कि मुझे बचना या डरना तब चाहिए जब मैं दूसरे मज़हब या धर्म को आहात कर रहा हूँ। आप ‘हलाला’ को पढ़ कर थोड़ी देर के लिए सहमत या असहमत तो हो सकते हैं लेकिन मेरी बदनीयती पर सवाल नहीं उठा सकते। हाँ, अगर मुझे सिर्फ़ विवादास्पद होना होता , या मुझे कुछ हासिल करना होता तो शायद यह बात लागू होती। ऐसी कोई मंशा मेरी न तो ‘बाबल तेरा देस में’ लिखने के दौरान थी, न ‘हलाला’ लिखने के दौरान। सनसनी पैदा करने की नीयत से लिखी गयी किसी भी कृति या रचना की उम्र बहुत छोटी होती है। अच्छी रचना वही है जो पाठक को भीतर से बेचैन करे,न कि मज़े लेने के लिए लिखी जाए। हाँ, कभी-कभी तब डर-सा लगता है जब कुछ लोग इसे अपनी निजता और धार्मिक मामलों में दखल समझ कर लेखक पर सवाल उठाते हैं कि लेखक को इस्लाम की क्या समझ है। मैं मानता हूँ कि समझ नहीं होगी मगर कोई धर्म या धार्मिकता मनुष्यता से तो ऊपर नहीं है। लेखक का एक दायित्व यह भी होता है कि वह निरपेक्ष हो कर अपने विवेकानुसार गलत और सही में फ़र्क करे। किसी एक का पक्षकार होना भी कभी-कभी उसके लिए घातक सिद्ध हो सकता है। गलत और सही का आकलन खुद लेखक से बेहतर और कौन कर सकता है।
8. क्या आप को पता है कि हज और जमात में बहुत अंतर है?
– आपने पूछा है कि क्या आपको पता है कि हज्ज और जमात में बहुत अंतर है। आपका सोचना एक हद तक बहुत सही है और ईमानदारी से कहूँ, तो सचमुच मुझे हज्ज और जमात में क्या अंतर है, नहीं पता। मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि ‘हज्ज’ मुसलमानों का एक ज़ियारत अर्थात तीर्थ-स्थल है। मक्का मदीना स्थित अल्लाह का वह काबा (घर) है जिसके दर्शन का हर मुसलमान इरादा रखता है। वैसे ‘हज्ज’ का मतलब ही इरादा करना होता है। ‘हज्ज’ यानी इरादा करना, वास्तव में आदमी की ओर से इस बात का एलान करना है कि उसका प्रेम और श्रद्धा, उसकी इबादत और बंदगी सब कुछ अल्लाह के लिए ही है। ‘हज्ज’ का मूल उद्देश्य यह है कि इनसान अल्लाह की चाह में उन्मत्त हो कर अपना सब कुछ उसकी राह में लगा दे। वास्तव में यह मूल उद्देश्य केवल हज्ज का ही नहीं है बल्कि सभी धर्मों के तीर्थ-स्थलों का है। इस ‘मूल’ की अवधारणाएँ इतनी व्यापक हैं कि अगर मनुष्य इन्हें सच्चे मन से धारण कर ले, तो आज हमारे समाज में जिस तरह की धार्मिक अहिष्णुता घर कर गयी है, वह शायद हमें देखने को न मिले। दरअसल, यह धारण करना ही धर्म कहलाता है।
अब आता हूँ ‘तबलीग़ जमात’ पर। अरबी में तबलीग़ शब्द का अर्थ होता है ‘किसी के पास कुछ पहुँचाना’, ‘धर्म का प्रचार करना’ या ‘दूसरों को अपने धर्म में मिलाना’। यहाँ यह एक बड़ा प्रश्न है की तबलीग़ आन्दोलन मुस्लिम मिशनरी है या मुस्लिम धर्म का पुनर्जीवन आन्दोलन। इसी पर अपनी समझ और जानकारी के मुताबिक़ कुछ रोशनी डाल सकता हूँ। शायद आपको यक़ीन न हो, या आपको इसमें कुछ अतिश्योक्ति लगे, मगर आपको सुनकर हैरानी होगी कि तबलीग़ जमात की शुरुआत 1926 में मेरे मेवात से ही हुई और इसके प्रवर्तक और प्रेरक थे मौलाना मौहम्मद इलियास खंडालवी (1885-1944)। वही तबलीग़ जमात जो आज हर मुसलमान के लिए मानो उसकी धार्मिक अनिवार्यता और जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। मौलाना इलियास ने एक नारा दिया दिया था -ऐ मुसलमानो मुसलमान बनो ! हालांकि तबलीग़ की स्थापना मौलाना इलियास द्वारा 1920 में की गयी थी। मगर इसकी जड़ें 19वीं शताब्दी के उत्तर्राद्ध में इनके वालिद मोहम्मद इस्माइल ने बंगले वाली मस्जिद, हज़रात निजामुद्दीन, नई दिल्ली में जमा दी थीं। मौलाना इलियास 1923 ने मेवात के नूहं में मदरसा मोइनुल इस्लाम की स्थापना की। 1926 में तबलीग़ जमात का पहला जत्था सहारनपुर के मौलाना खलील अहमद के नेतृत्व में आया। इस जत्थे ने स्थानीय लोगों की मदद से नूहं क़स्बे में एक सम्मेलान का आयोजन किया था। हज़ारों की तादाद वाले इस सम्मलेन में लोगों से हिन्दू-रीति-रिवाजों को त्यागने और मुस्लिम क्रियाकलापों को अपनाने तथा पूरे मेवात में तबलीग़ आन्दोलन को फैलाने की अपील की गयी थी। मेवात के मेव मुसलमानों से यह अपील इसलिए की गयी थी की यहाँ के मेव मुसलानों की धार्मिकता आधी हिन्दू रीति-रिवाजों पर आधारित थी, तो आधी मुस्लिम रीति-रिवाज़ों पर। यहाँ तक कि उस समय के पुरषों के नाम हिन्दू नामों से प्रेरित थे, जैसे हरिसिंह, धनसिंह, चांदसिंह, लालसिंह आदि। इस तरह तबलीग़ जमात के मेवात से शुरुआत का एक कारण यह भी हो सकता है।
9. आपने जिन जिन पात्रों का उपन्यास में उल्लेख किया है क्या वह काल्पनिक है या वास्तविक?
-किसी भी रचना के चरित्र या पात्र वास्तविक और काल्पनिक दोनों होते हैं। बल्कि कहना होगा कि कोई भी पात्र न तो अपने आप में पूरी तरह काल्पनिक होता है, न पूरी तरह वास्तविक जो पात्र वास्तविक जीवन से लिए गये होते हैं, उनमें लेखक अपनी कल्पना और लेखकीय कौशल इतना विश्वसनीय और प्रामाणिक बना देता है कि एक पाठक के लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है वह कितना काल्पनिक है और कितना वास्तविक। यही बात उन काल्पनिक पात्रों पर लागू होती है। एक लेखक निजी अनुभवों और पात्रों के मिश्रित अनुभवों से अपने इन काल्पनिक पात्रों को अपनी कल्पना शक्ति से इतना जीवंत और प्रामाणिक बना देता है कि पाठक को लगता है मानो ये पात्र यहीं कहीं उसके आसपास खड़े हैं। यह एक लेखक की कल्पनाशीलता और लेखकीय कौशल पर निर्भर करता है कि वह अपने इन पात्रों को कितना और किस तरह जीता है, या कहिए उनको किस हद तक आत्मसात करता है। यह आत्मसात करने की चुनौती तब और बढ़ जाती है, जब उसने अपने किसी पात्र से ज़िन्दगी में कभी मुलाक़ात ही न की हो। बल्कि दूसरे धर्म व स्त्री पात्र और पुरुष पात्रों के मनोविज्ञान को व्यक्त करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। यह चुनौती स्त्री व पुरुष दोनों लेखकों के लिए सामान होती है। मैं यह बात सिर्फ़ ‘हलाला’ के सन्दर्भ में नहीं, बल्कि मेरी सभी रचनाओं के पात्रों पर लागू होती है। आप कल्पना कर सकते है कि एक लेखक अपने पूरे जीवन काल की अपनी कितनी रचनाओं के कितने काल्पनिक और वास्तविक पात्रों को एकसाथ जीता होगा। इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि एक लेखक के असंख्य पात्रों से गुज़रते हुए हम के पात्रों के नहीं बल्कि एक लेखक के अनेक रूपों और व्यक्तित्वों से भी गुज़रते हैं। यह आशा-निराशा ख़ुशी-गम, नैराश्य-कुंठा, चतुराई-चालाकियाँ, घात-प्रतिघात पात्रों की नहीं स्वयं लेखक की होती हैं। अब एक लेखक अपने पाठकों को अपने लेखकीय कौशल से उलझाता या भ्रमित करता है , तो यह उसकी सबसे बड़ी सफलता है।
10. क्या आपने सूर बकरा आयत नं. 228 को पढ़ा है उसमें भी शायद उसी तरह का कोई जिक्र हुआ है । आपकी टिप्पणी?
-सूरा अल-बक़रा की आयतें पारंपरिक तलाक़ यानी उन सूरतों की आयते हैं जिनमें कुरआन के मुताबिक़ तलाक़ के पूरे विधि-विधान की बात कही गयी है। जबकि भारतीय समाज के ज़्यादातर तलाक़ के मामले कुरआन के मुताबिक़ होते ही नहीं हैं। अधिकतर मामलों में पति की अराजक मनमर्ज़ी चलती है। उसका एक कारण है कि कुरआन में पुरुष को औरत का क़व्वाम यानी एक दर्ज़ा दिया गया है। तलाक़ के मामलों में प्राय: यह देखने में आया है कि विधि-विधान की शर्तें केवल औरत पर थोपी जाती हैं, जबकि पुरुष इनसे पूरी छूट ले लेता है। वैसे भी सूरा अल-बक़रा की यह आयत बीवी के गर्भवती होने कि स्थिति को लेकर है। जिन तीन महावारियों का इसमें ज़िक्र किया गया है, वह इसीलिए किया गया है ताकि यह पता चल सके कि वह गर्भवती है या नहीं। या कहना चाहिए कि इस बहाने तीन महीने तक औरत के चरित्र की परीक्षा ली जाति है।
11. बिना इद्दत की अवधि पूरे किए व निकाह किए बिना स्त्री बपने पूर्व पति के घर नहीं जा सकती है। लेकिन आपने गलत उल्लेख कर दिया। जिससे लोगों में भ्रामकता पैदा होती है।
-आपने अपने सवाल में इद्दत का मुद्दा उठाया है तो मैं इसके बारे में यह कहना चाहता हूँ कि उपन्यास ‘हलाला’ में यह कहाँ नहीं कहा गया है कि बिना इद्दत पूरी किये नज़राना का डमरू से निकाह हुआ है, या अपने पहले पति के पास लौट आयी होगी ? तलाक़ के मामले में इद्दत एक सामान्य प्रक्रिया है, और इसके बारे हम सब लगभग जानते हैं। चूँकि इस उपन्यास की विषय वस्तु हलाला को आधार बना कर तैयार की गयी है न कि तलाक़ को आधार बना कर, इसलिए पाठक को ऐसा लगता है मानो इद्दत को छोड़ दिया गया है। इद्दत का मामला शिक्षित परिवारों के उन तलाक़ के मामलों में बारीक़ी के साथ देखा जाता है, जहाँ पति-पत्नी के बीच अचानक नहीं बल्कि काफी सोच-विचार के बाद तलाक़ लिया जाता है। वैसे भी यह उपन्यास एक ग्रामीण और लगभग अशिक्षित समाज को केंद्र में रख कर लिखा गया है। एक ऐसे भारतीय आम परिवारों को केंद्र बना कर जिनमें धर्म की जगह उनके जीवन-जगत में सिर्फ़ उतनी रहती है, जिससे उनकी धार्मिक पहचान सुरक्षित रह सके। और यह बात सभी धर्मों के समाजों पर लागू होती है। अधिकतर धर्मों में बहुत-सी रस्मों का पता भी नहीं होता है, बस परम्परा के नाम पर एक-दूसरे की देखादेख उन्हें लगभग निभाया भर जाता है। हिन्दुओं में भी धर्म का असली पालन कितना होता है, हम सब जानते हैं। इसका बड़ा उदाहरण है करवा चौथ। छलनी से चन्द्रमा देखने से यह व्रत पूरा थोड़े ही हो जाता है। मगर एक भेड़चाल जिसने शिक्षित-अशिक्षित सभी तरह की महिलाओं को अपनी चपेट में ले लिया है। दरअसल ऐसी शर्तों के पीछे स्त्री को बंधक बनाये रखने की हम मर्दों की एक चाल है। इसलिए तलाक़ ही नहीं बाकी के मामलों में भी मेरा यह मानना है कि एक ‘सच्चा’ मुसलमान अगर पूरी ईमानदारी से कुरआन का पालन करे, तो मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि मुस्लिम समाज में न एक तलाक़ हो, न एक हलाला। सच तो यह है कि अपने स्वार्थों के चलते हमने अपनी कुछ सामाजिक समस्याओं को धार्मिक बना कर रख दिया। धर्म या मज़हब को पूरी तरह आत्मसात करना हरेक के बूते की बात है ही नहीं। दरअसल, धर्म का मामला इतना आसान नहीं है जितना हम समझते हैं।
12. आपने अपने हलाला उपन्यास को पाँच अध्याय में विभक्त किया है जिसके नाम पाँच वक्त की नमाजों पर है उससे आपका क्या अभिप्राय है।
-उपन्यास को पाँच अध्यायों में न तो किसी सोचे-समझे अभिप्राय के तहत बाँटा गया है न किसी योजना के तहत। अगर इसमें से इन पाँचो नमाज़ों, कुरआन की आयतों और रेखांकनों को हटा भी दें, तो मूल कथा पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। अंतिम प्रूफ़ तक यह उपन्यास सिर्फ़ दस अध्यायों बांटा गया था। मेरे पास जब इसको सरसरी तौर पर अवलोकन के लिए भेजा गया, तो मुझे लगा यह एक पाठक के साथ अन्याय होगा कि वह दस अध्याय बिना अपनी आँखों को आराम दिए पढता जाए। इसलिए मैंने सोचा कि पाठक को पढ़ने के दौरान कुछ रीलिफ़ मिलनी चाहिए। इसके लिए एक ही तरीक़ा था कि इसके अध्याय बनाये जाएँ। कैसे बनाये जाएँ अंतिम समय में यह बड़ी चुनौती थी। एक बार सोचा कि इसे सुबह, दोपहर, शाम इन तीन शीर्षकों के अध्यायों में बांटा जाए। लेकिन तभी लगा कि इस तरह के शीर्षक पहले भी प्रयोग में लाये जा चुके हैं। वैसे भी यह जिस तरह का उपन्यास है उसके लिए ये उपयुक्त नहीं था। ऐसा लगना चाहिए कि सचमुच अध्याय उपन्यास के कथानक के ही हिस्से हैं। बहुत सोच-विचार के बाद मन में आया कि इसे नमाज़ों के शीर्षकों में विभाजित किया जाए, तथा इसे और प्रमाणिक व रोचक बनाने के लिए इसमें कुरआन की आयतें दी जाएँ। यह प्रयोग पाठकों को भाया भी। हालाँकि कई पाठकों ने इस पर यह कहते हुए आपत्ति जतायी कि कुरआन की आयतों का ऐसे इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मेरा एक लेखक होने के नाते यह कहना है कि ऐसे प्रयोग उसी रचना प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसे जानने की एक पाठक में बड़ी जिज्ञासा होती है। मेरा मानना है कि ऐसे प्रयोगों से रचना की रेंज बढ़ती ही है, घटती नहीं हैं।
13. नजराना हलाला उपन्यास की मुख्य पात्र है जो हलाला से पीड़ित है उसको उपन्यास में कम महत्व दिया गया है बल्कि वही दूसरी पात्र आमना को ज्यादा स्पेस दिया है… ऐसा क्यों?
-आपने यह बड़ा रोचक सवाल पूछा है कि मुख्य पात्र नज़राना की अपेक्षा इसकी एक अन्य पात्र आमना को ज़्यादा स्पेस दिया गया है। दरअसल, कोई भी रचना विशेषकर उपन्यास लिखते समय लेखक कई तरह के प्रयोगों से झूझता रहता है, जिसमें एक यह भी है कि कोई पात्र दूसरे पात्र पर बेवजह ज़्यादा भारी न पड़ जाए। जिस स्पेस की आपने बात की है, वह स्पेस नहीं प्रवृत्तियाँ हैं। चाहे वह मनुष्य है अथवा पशु-पक्षी, यहाँ तक कि पेड़-पौधे सबकी कुछ न कुछ प्रवृत्तियाँ होती हैं। यही प्रवृत्तियाँ पात्रों की विशेषताएँ होती हैं जो एक-दूसरे को एक-दूसरे से अलग करती हैं। ये प्रवृत्तियाँ अगर साहित्यिक शब्दावली का इस्तेमाल करूँ तो पात्रों की विशेषताएँ होती हैं। मैं आपसे ही पूछना चाहता हूँ कि आमना के बिना यह उपन्यास आपको कुछ अधूरा नहीं लागत। क्या हमारे समाज में नसीबन जैसी भाभियाँ नहीं होती हैं ? डमरू जैसे युवा नहीं होते हैं ? नियाज़ जैसे लोग नहीं होते हैं ? लपरलैंडी जैसे किरदार नहीं होते हैं ? कहने का मेरा आशय यह है कि रचना में किसी पात्र को कोई स्पेस नहीं दिया जाता। यह तो रचना की मांग पर निर्भर करता है कि उसका कौन-सा पात्र कितना स्पेस लेता है।
14. स्त्री किस तरह के पुरुषवाद का शिकार है कि वह एक दूसरी स्त्री को खुद गालियां देती है?
-आपके इस प्रश्न से ऐसा लगता है जैसे एक स्त्री पुरुष के इशारों पर दूसरी स्त्री की जान की दुश्मन बनी हुई है। पता नहीं हमारा तथाकथित सभ्य समाज अपनी गालियों के प्रति इतना दुराग्रही क्यों हैं ? ऐसा लगता है जैसे वह अपने लोक को विस्मृत करता जा रहा है। पता नहीं हिंदी में ऐसा कोई शोध हुआ है या नहीं मगर बांग्ला में अपने समाज की गालियों और उनके मनोविज्ञान को लेकर कुछ शोध हो चुके हैं। गाली या कहिए अश्लीलता की आड़ में हम अपनी उस शुचिता को ढांपने का प्रयास करते हैं, जो हमारे लोक जीवन और उसके हास-परिहास का बड़ा हिस्सा रहा है। अगर आप ब्रज समेत उत्तर भारत में शादी की कुछ रस्मों को देखेंगे, तो आपको लगेगा जैसे बिना गालियों के शादी-विवाह का कोई अर्थ नहीं है। लड़की की शादी से ठीक एक दिन पहले महिलाएँ जो रतजगा करती हैं और उसमें जिस तरह अपने देवी-देवताओं के सामने गालियाँ, वह भी स्त्रियों द्वारा इस्तेमाल की जाती हैं उसकी आप कल्पना नहीं कर सकते। ऐसी ही एक रस्म है खोड़िया । इस रस्म में लड़के की बारात जाने के बाद, घर-मोहल्ले में रह गयी महिलाओं द्वारा खेले जाने वाले खेलों को एक पुरुष देख-सुन नहीं सकता। इसलिए इसमें पुरुषों की उपस्थिति पूरी प्रतिबंधित होती है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। मुझे ऐसा लगता है कि पुरुषों द्वारा सदियों से स्त्री का दमन होता रहा है, ऐसी रस्मों में गाली उसकी परिणति है। इस रस्मों का किसी धर्म से कोई लेना-देना है, ये समाज में पनपी उन्हीं चलनों का अतिक्रमण है, जिन्हें स्त्रियों पर ज़बरन थोपा गया है। यहाँ एक बात कह दूँ कि अश्लीलता वास्तव में हमारी समझ और नज़र का फ़र्क है।
चूँकि यहाँ बात सिर्फ़ ‘हलाला’ उपन्यास को लेकर हो रही है और इस उपन्यास की पृष्ठभूमि मेवाती है इसलिए आपके मन में यह सवाल उठ रहा है। इसमें ही नहीं मेरे इससे पहले के दोनों उपन्यास ‘काला पहाड़’ और ‘बाबल तेरा देस में’ जिनकी पृष्ठभूमि भी मेवात है उनमें स्त्रियों द्वारा ‘रंडी’ शब्द का बहुत इस्तेमाल हुआ है। कहने और सुनने में यह शब्द किसी गाली से कम नहीं है। बल्कि गाली ही है। मगर इस शब्द के अर्थ इसके कहन के लहज़े के चलते बदल जाते हैं। सच कहूँ इस तरह के शब्द जिन्हें हम गाली मानते हैं मेवाती संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। उसकी अपनी एक पहचान हैं।
15. हलाला उपन्यास में गालियों का भी प्रयोग है क्या उसके बिना हलाला की समस्या को स्पष्ट नहीं किया जा सकता था?
-आपने ‘हलाला’ में गालियों के प्रयोग को हलाला की समस्या से जोड़ कर देखा है। जबकि इनका इस समस्या से कोई संबंध नहीं है। वैसे इस उपन्यास में कुल कितनी गालियों (जिन्हें मैं गालियाँ नहीं मानता) का इस्तेमाल हुआ होगा ? मुश्किल से तीन-चार। तो क्या लेखन या सृजन महज हमारी शुचिताओं को सुरक्षित रखने का औज़ार मात्र है ? हाँ, उपन्यास में मेवात की जगह अगर लखनऊ या किसी ऐसे ही सभ्य मुस्लिम परिवेश चित्रण होता, तो वहाँ इनका इस्तेमाल नहीं होता। पात्रों के संवाद इस पर निर्भर करते हैं कि रचना की पृष्ठभूमि और परिवेश क्या है। किसी भी रचना को पृष्ठभूमि और परिवेश मौलिक बनाता है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जितनी बात इस उपन्यास पर इसकी मेवाती पृष्ठभूमि के चलते हो रही है, उतनी शायद किसी दूसरी पृष्ठभूमि के चलते नहीं होती। मैं इस उपन्यास की एक बड़ी सफलता की वजह इसके विषय के साथ-साथ इसकी पृष्ठभूमि भी मानता हूँ।
16. डमरू को छेड़ने के पीछे स्त्रियों का कौन सा मनोविज्ञान काम कर रहा है? जबकि वह एक सीधा सा पुरुष है?
– हमारे समाज में आदमी के भोलेपन और उसके सीधेपन को अक्सर उसकी मूर्खता का पर्याय माना जाता है। डमरू वास्तव में हमारे समाज के इसी भोलेपन और उसके सीधेपन का प्रतीक है। आपने सही कहा कि डमरू सीधा-सा पुरुष है और वह लगता भी है। मगर सीधा होने का अर्थ ना-समझ या अज्ञानी होना नहीं होता। ठीक ऐसे ही जैसे शराफत को आजकल किसी की भीरुता से जोड़ दिया जाता है। देवर को छेड़ने-कोंचने या कहिए चुहल की परंपरा कोई नई नहीं है। सच तो यह है जीवन के सारे उल्लास हमारे संबंधों में छिपे हुए हैं। वैसे भी डमरू तीनों भाइयों में सबसे छोटा तो है ही साथ में कुँआरा भी है। कुरूपता और बढ़ती उम्र का यह कुँआरापन ही उसके लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। मगर समाज और परिवार की मर्यादाओं का इसने कभी अतिक्रमण नहीं किया। इसलिए डमरू के प्रति पाठक के मन में उसका सम्मान धीरे-धीरे बढ़ता चला जाता है। नज़राना की आसक्ति भी उसके प्रति उसके इसी व्यवहार और मन की निर्मलता के चलते मजबूत होती जाती है, जिसकी परिणति नज़राना के उस सार्वजनिक फैसले के रूप में होती है, कि वह इसी ईमान वाले आदमी के साथ रहेगी। वास्तव में डमरू किसी दुचित्तेपन या द्वंद्व का शिकार नहीं है।
17. क्या हलाला प्रथा मर्द के अधिकारों का गलत इस्तेमाल है?
-सिर्फ़ हलाला ही नहीं बल्कि ज़्यादातर धर्मों की प्रथाओं का ग़लत इस्तेमाल हो रहा है। हलाला को मैं इसलिए ज़्यादा अमानवीय मानता हूँ कि जो शर्त कुरआन में ही नहीं है उसकी स्त्री के ख़िलाफ़ ग़लत व्याख्या क्यों की जा रही है। हालाँकि इसकी मूल भावना तलाक़ को रोकने की है। मगर उसके बजाय धर्म की आड़ में इस प्रथा को दुष्कर्म का रूप दे दिया। जहाँ इससे स्त्री और पुरुष को बराबर रूप से सबक सिखाना रहा है, पर वहाँ यह स्त्री-शोषण का एक हथियार बन गया। दरअसल यह एक मर्दवादी साज़िश है। एक और बात मुझे तो यही समझ में नहीं आता कि ऐसा कौन-सा मरद होगा, जो जानते हुए दूसरे शौहर के साथ सहवास के बाद अपनी पहली पत्नी को आसानी से स्वीकार कर लेगा। मर्दवादी मानसिकता इसे आसानी से स्वीकार ही नहीं करेगी और ऐसा कुछ मर्दों ने किया भी है, तो सच कहूँ वे कम-से-कम इनसान तो नहीं फ़रिश्ते ही होंगे। सोचिए कि ऐसे फ़रिश्तों और पति-पत्नियों को उसी का समाज किस नज़र से देखता होगा ?
18- वैसे आपने इस्लाम के भीतर की एक वैवाहिक प्रथा हलाला को केन्द्र में रखकर किया है लेकिन बीच-बीच में हिन्दू कथाओं के मिथकों और दोहों का भी उल्लेख किया है। क्या और भी किसी धर्म में ऐसा होता है?
-अगर आप समाजशास्त्रीय नज़रिए से अपनी प्रथाओं, रस्मों अर्थात रीति-रिवाज़ों का गहराई से अध्ययन करें, तो इनका अस्तित्व में आना मनुष्य की ज़रूरतों और उसके सामाजिक अनुशासन की मुख्य वजह रही हैं। चूँकि मनुष्य का स्वभाव थोड़ा बगावती रहा है इसलिए इन्हें लागू करने के लिए धर्म का सहारा लिया गया। धर्म का सहारा इसलिए ताकि मनुष्य को अधर्म के रास्ते से भटकने से रोका जा सके। इसके लिए हमारे संत-फ़कीरों ने जीवन-दर्शन को मनुष्य का आईना बना उसके कर्मों पर आधारित लोक साहित्य रचा। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है हमारा मध्य काल अर्थात भक्ति काल। इस काल को अगर सामाजिक नव जागरण काल कहा जाता है तो इसीलिए कि इसमें सामाजिक बुराइयों और कुप्रथाओं पर सबसे ज़्यादा चोट की गयी है। यह चोट मिथकों और मौखिक साहित्य के द्वारा की गयी है। आप देखेंगे कि लोकोक्तियों, मुहावरों और दोहों की मारक क्षमता इतनी गहरी और असरदार होती है कि जिस अनैतिकता का इलाज़ कानून कि किसी किताब में नहीं होता उसे ये बखूबी कर जाते हैं। लोक साहित्य व्यक्ति के निजी और उसके सामाजिक अनुभवों से सींचा हुआ होता है। इसीलिए कहा गया है कि अपने लोक से कटे लेखक का चिंतन कभी मौलिक नहीं हो सकता। रही बात लोकोक्तियों, मुहावरों और दोहों के किसी धर्म विशेष से जुड़े होने की, तो मैं आपसे पूछता हूँ कि मनुष्य का दुःख-दर्द, उसकी पीड़ा, पीड़ा, संताप और उनकी अभिव्यक्ति को क्या हम किसी धर्म के खानों में बाँट कर देख सकते हैं ? क्या हम इसे व्याख्यित कर सकते हैं कि हिन्दू का दुःख ऐसा होता है, और मुसलमान का दुःख वैसा है । चूँकि हमारा समाज आस्था, मिथकों और परंपराओं पर जीने वाला समाज है, इनका हस्तक्षेप हमारे निजी जीवन में ज़रुरत से ज़्यादा रहा है इसलिए हमारी बहुत-सी मुश्किलों का निदान भी इनमें छिपा हुआ है।
19. क्या धर्म और मर्दवादी व्यवस्था ने स्त्री को बागे नहीं बढ़ने दिया है? आपकी राय?
-धर्म और मर्दवादी व्यवस्था का गठजोड़ इतना मजबूत है कि उसे बींधना बहुत मुश्किल है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि सभी धर्मों के धर्मग्रंथों के रचयिता हम मर्द ही रहे हैं। इसलिए हमने अपने बचने के तो सारे रास्ते खोज लिए मगर अपने से निरीह और कमज़ोर तबकों के रास्ते या तो बेहद संकरे छोड़ दिए, या उन्हें बंद ही कर दिया। पूरी दुनिया में धर्मों का जितना इस्तेमाल स्त्री सत्ता के खिलाफ हुआ है उसके बारे में हम सब जानते है। कई बार तो ऐसा लगता है मानो सब धर्मों के धार्मिक ग्रंथों के रचयिताओं ने आपस में मिलकर स्त्री-संबंधी संहिताओं को बुना है। इसका मैं एक उदाहरन देता हूँ। अथर्ववेद (2:36:4) का एक श्लोक है जिसका अर्थ है- ‘जिस तरह वन्य-जीवों तक को शांत वातावरण प्रिय होता है, उसी तरह परिवार को सुखमय बनाने के लिए स्त्री को चाहिए कि वह पति से विरोध या कलह न करे, अपितु उसके अनुकूल रहकर प्रियता प्राप्त कर अपने ऐश्वर्य की वृद्धि करे।’
अब आप कुरआन की चौथी सूरा अन-निसा की इस 34वीं आयत को देखिए,जिसका अर्हत है-
‘मर्द औरतों के सवामी हैं। जो नेक औरतें होती हैं, वे आज्ञाकारी और अपने रहस्यों की रक्षा करने वाली होती हैं। जिन स्त्रियों से विद्रोही होने का भय हो – उन्हें समझाओ, उन्हें अपने बिस्तरों से दूर रखो और उन्हें कुछ सज़ा दो।’
इन दोनों यानी अथर्ववेद के श्लोक और कुरआन की इस आयत में समानता देखिए कि सारी हिदायतें, सारी सलाह औरत को ही दी गयी हैं। इतना ही ही नहीं अगर वह आज्ञाकारी नहीं है तो उसे सज़ा भी दी जाए। इतना ही नहीं हमारे संविधान के स्त्री संबंधी कानून भी इन्हीं धर्म-ग्रंथों को ध्यान में रख कर बनाये गये हैं। मेरे अपने हरियाणा के पुराने गुड़गाँव के मेवात में ऐसा ही रिवाज़-ए-आम को ध्यान में रख कर कानून बना हुआ है। इस कानून के मुताबिक़ अगर किसी बहन के सगे भाई नहीं हैं, तो पिता की संपत्ति पर उसका नहीं, उसके चचेरे या ताऊ के लड़कों का हक़ होगा।
मुझे इस्लाम के धर्म गर्न्थों का तो पता नहीं लेकिन मैं हिन्दू धर्म की कह सकता हूँ कि जितना धर्म और मर्दवादी मानसिकता के चलते धर्म का इस्तेमाल स्त्रियों के विरुद्ध किया गया है, उतना शायद ही दूसरे धर्मों में किया गया है। मनुस्मृति ही नहीं दूसरे ब्राह्मणों द्वारा रचित धर्म ग्रंथों में स्त्री और दलितों के विरुद्ध ज़हर उगला गया है, आप उसकी अक्ल्पने नहीं कर सकते। अम्बेडकर ने तो इस मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन ही इसलिए किया था कि इसमें दलितों और स्त्रियों को आगे बढ़ने न देने के स्पष्ट निर्देश दिए गये हैं। कहने का मेरा आशय यह है कि आदि काल से ही धर्म का इस्तेमाल हमारी मर्दवादी व्यवस्था करती आ रही है।
20. आपको लगता है कि शरीयत और हदीस का भय दिखाकर औरतों का शोषण होता है?
आपका कहना सही है कि शरीयत या हदीस का भय दिखा कर पुरुषों द्वारा स्त्रियों का शोषण होता रहा है। मैं आपकी बात को थोड़ा विस्तार देना चाहता हों और यह कि अगर स्त्रियों का सबसे ज्यादा शोषण हुआ है तो वह धर्म की आड़ में हुआ है। ‘स्त्री-धर्म’ के नाम पर पुरुषों द्वारा उसके चारों तरफ़ जिस तरह वर्जनाओं की कंटीले तारों की बाड़ खड़ी कर दी गयी है, उसे वह चाह कर भी नहीं लांघ पाती है। कहीं वह इस मर्दवादी व्यवस्था के खिलाफ बग़ावत न कर बैठे, इसलिए धर्म का हवाला दे उसके आगे बढ़ने के रास्तों को रोकने की कोशिश होती रही है। यह रास्ता स्त्रियों में भी दलित स्त्री, विधवा, अशिक्षित के लिये और भी मुश्किल है। मैं कई बार कहता हूँ स्त्री का सबसे पहले आर्थिक और शैक्षणिक रूप से सशक्त होना बहुत ज़रूरी है। जैसे-जैसे स्त्री आर्थिक और शैक्षणिक रूप से सशक्त होती जा रही है, वह वैसे-वैसे एक पुरुष और सामाजिक रूढ़ियों के लिए चुनौती बनती जा रही। वह अपनी आवाज़ उठाने लगी है। इसका जीता-जागता उदाहरण है इसी हलाला और तीन तलाक़ के मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय। मगर मेरा सवाल यहाँ दूसरा है और यह कुरआन के ही संदर्भ में है कि जब कुरआन के मुताबिक़ एकसाथ तीन तलाक़ मान्य है ही नहीं तब यह प्रचलन में क्यों है ? क्या ऐसा करना कुरआन की तौहीन नहीं है। कहने का आशय यह है कि धर्म में दिए गए निर्देशों की व्याख्याओं को पुरुष अपनी सुविधा और मर्ज़ी से तय करना लगा है। सच तो यह है कि स्त्रियाँ अपनी मर्ज़ी से नहीं पुरुषों के तय किये गए निर्देशों के अनुसार जी रही हैं। धर्म की आड़ में स्त्रियों की नकेल पुरुष अपने हाथ में रखना चाहता है।
21. आपने हलाला उपन्यास में महिलाओं की नकारात्मक छवि दिखाई है ऐसा क्यों?
-आपने एक बड़ा ही असहज करने वाला सवाल किया है कि उपन्यास ‘हलाला’ में मैंने महिलाओं की नकारात्मक छवि दिखाई है। जहां तक मैं आपके इस प्रश्न की गहराई को समझ पाए हैं उसके अनुसार आपका कहना यह है कि कहीं न कहीं मैं इस अवधारणा को और पुख्ता करना चाहता हूँ कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है ? या फिर आपके कहने का मतलब यह है कि एक स्त्री को अपने विवेक सम्मत कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए , या मर्दों द्वारा स्त्री-धर्म के नाम पर उसके चारों तरफ खींच दी गयी लक्ष्मण-रेखा को उसे नहीं लाँघना चाहिए ? अगर नज़राना चुपचाप शरई क़ानून के मुताबिक़ ज़िनाह के नाम पर हलाला जैसी क्रूर रस्म का पालन कर एक ‘नेक’ और ‘भली’ स्त्री की तरह अपने पहले पति के पास आ जाती ? आमना को अपने देवर डमरू की शादी नहीं होने देनी चाहिए थी ? कैसे महिलाओं की नकारात्मक छवि दिखाई है, और कौन सी वह नकारात्मकता है जो आपको नज़र आती है ? जहां तक इस उपन्यास में आपके मुताबिक़ कुछ गालियों का सवाल है, मैं इसे नकारात्मकता के रूप में नहीं देखता। यह तो लोक से उपजी एक क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक पहचान है। असल बात यह है कि स्त्री के मनोभावों को एक पुरुष जानने का दम तो भरता है मगर सच्चाई यह है कि यह पुरुष का कोरा भ्रम है। आपसे मैं एकदम सहमत नहीं हूँ कि उपन्यास ‘हलाला’ में मैंने महिलाओं की किसी तरह की नकारात्मक छवि पेश की है।
कटे छंटे मजदूर
कट गए बँट गए छँट गए नेह से
जो कमाने गए रोटियां गेह से
कुछ सियासत हुई छूटकर ठेह से
छूटकर के बिखर वो गए देह से
ठौर कुछ भी ना था वे कहाँ सो सकें
टूटता था बदन श्रम कहाँ खो सके
लौह पट पर पड़े नींद भी आ गई
यम खड़े पूर्व में जिन्दगी भा गई
चल के छुक-छुक करे देख आहें भरे
यम नियम था खड़ा कुछ इशारे करे
बँट गया बोटियों में बिखर वह गया
घर पहुंचने का मानस बना ढह गया
रोटियां जो कमाइँ वहीं रह गईँ
पटरियों पर कहानी गढी कह गईँ
वाह रे यह सियासत कहाँ ले गई
उन सभी की मजूरी उन्हें दे गई
जिनके बल पर वो घूमें निजी कार से
टुकड़े उसके तनों के जो बेकार से
उनके घर में बनी रोटियां बोटियाँ
इनके घर रो रही इनकी जो बेटियां
कौन आके दिलाएगा ढाढ़स इन्हें
पति पिता पुत्र कहने का साहस जिन्हें
चित्र देखा मनोबल वहां ढह गया
लिख दिया आंख में था जो सब बह गया
औपचारिक शिक्षा व्यवस्था पर अनियोजित शहरीकरण का प्रभाव: विश्व और भारतीय परिदृश्य-अश्विनी
औपचारिक शिक्षा व्यवस्था पर अनियोजित शहरीकरण का प्रभाव: विश्व और भारतीय परिदृश्य
अश्विनी
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कार्ल मार्क्स ने दास कैपिटल में कहा था, “मजदूरों का कोई देश नहीं होता।” (Marx, 1848) इसका एक अर्थ यह भी है कि व्यक्ति की आजीविका ही उनका निवास स्थान तय करता है। औद्योगिक क्रांति के बाद आर्थिक संरचना में हुए तेजी से बदलाव एवं बढ़ते शहरीकरण ने इस बात को भली भांति प्रमाणित कर दिखाया। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की रिपोर्ट ‘विश्व जनसंख्या की स्थिति 2007’ (‘The State of World Population 2007’ के अनुसार वर्ष 2008 विश्व जनसंख्या में संक्रमण (परिवर्तन) का एक ऐतिहासिक काल है। इस वर्ष, मानव इतिहास में पहली बार, दुनिया की आधी से अधिक आबादी (3.3 बिलियन) शहरी क्षेत्रों में रह रही थी। अब (2018में) यह 55% हो गयी थी और 2050 तक, इसके 68 % हो जाने की उम्मीद है। एशिया और अफ्रीका में शहरी आबादी 2000 से 2030 के बीच दोगुना हो जाने का अनुमान है। विकासशील दुनिया के कस्बों और शहरों में इसी अवधि के दौरान कुल वैश्विक शहरी जनसंख्या का 80% हिस्सा होगा। भारत भी इस विश्व परिदृश्य से अछूता नहीं रहा है। साल 2018 से 2050 के बीच शहरी आबादी में भारत 41.6 करोड़, चीन 25.5 करोड़ और नाइजीरिया 18.9 करोड़, के साथ सर्वाधिक योगदान करने वाला देश होगा। इस अवधि में टोक्यो को पीछे छोड़ते हुए दिल्ली सबसे बड़ी आबादी का नगर बन जायेगा। इस प्रकार 21वीं शताब्दी को हम शहरीकरण का युग भी कह सकते है। (Obaid, 2007)
1901 की जनगणना के अनुसार, भारत में शहरी क्षेत्रों में रहने वाली जनसंख्या 11.4% थी। जो 2001 की जनगणना के अनुसार 28.53% हो गई, और 2011 की जनगणना के अनुसार 31.16% हो चुकी है । 2007 में जारी संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी ‘राज्य जनसंख्या रिपोर्ट’ के एक सर्वेक्षण के अनुसार, 2030 तक, भारत की आबादी का 40.76%( 600 मिलियन) शहरी क्षेत्रों में रहने की उम्मीद है। विश्व बैंक के अनुसार, भारत, चीन, इंडोनेशिया, नाइजीरिया और संयुक्त राज्य अमेरिका को पछाड़, 2050 तक दुनिया की शहरी जनसंख्या का नेतृत्व करेगा और भारत की आबादी का 50% से अधिक हिस्से का शहरीकरण हो चुका होगा। इस प्रकार भारत इस शताब्दी के मध्य तक आते-आते अपनी कृषि प्रधानता और ग्राम प्रधानता की विशेषता को इतिहास के पन्नों में दफ़न कर शहर प्रधान देश बन चुका होगा। (Rizvi, 2013) (CHANDRAMOULI, 2011) अब एक चुनौती के रूप में भारत सहित तीसरी दुनिया के सभी देशों में ‘तीव्र शहरीकरण’ का विश्व परिदृश्य उभरा है।
1.2 नीतिगत कारणों की तलाश – आखिर निवेश कहाँ हुआ-
मानवीय संसाधनों मे या भौतिक संसाधनों में ? शहरी क्षेत्र में या ग्रामिण क्षेत्र में?
अर्थशास्त्री डब्ल्यू आर्थर लुईस के बाद शहरीकरण को आर्थिक विकास की धुरी मानने वाले अर्थशास्त्री जॉन सी एच फाई एवं गुस्ताव रैनिस के अनुसार “यदि कृषि मजदूरों को औद्योगिक क्षेत्र में स्थानांतरित किया जाता है तो इससे उनकी आर्थिक उत्पादन क्षमता में वृद्धि होगी, जिसके फलस्वरूप आर्थिक विकास होगा।” (Thrilwall, 2006) गौरतलब बात यह है इन तीनों ही अर्थशास्त्रियों के विकास और/या संवृद्धि मॉडल के में निम्न बातों का न तो कोई समाधान प्रस्तुत किया न ही जिक्र ही हुआ –
- संवृद्धि के इन मॉडलों के नीतिगत कार्यान्वयन के फलस्वरूप शहरी क्षेत्र में बढ़ने वाली जनसंख्या के घनत्व का समाधान प्रस्तुत नहीं किया।
- शहरी क्षेत्र में बढ़ती जनसंख्या के लिए जन सुविधाओं की व्यवस्था का प्रावाधान भी नहीं दिया।
- गहन औद्योगिकीकरण और उच्च स्तर की सेवाओं को बढ़ावा देने में शिक्षा एवं तकनीकी ज्ञान की क्या भूमिका हो सकती है, इसकी भी चर्चा नहीं की ।
- शहरी व्यवस्था के सुचारू संचालन में शिक्षा के योगदान की चर्चा तक नहीं की।
- तकनीकी कौशल एवं शिक्षा का उत्पादकता से संबंध की चर्चा भी नहीं है।
जबकि, अंतर्जात संवृद्धि एवं विकास(Endogenous Growth and Development Modal ) मॉडल ने शिक्षा और अनुसंधान को आर्थिक एवं समाजिक विकास की धुरी माना है। “मानव पूंजी मॉडल का तात्पर्य है कि शिक्षा कौशल वाले व्यक्तियों को जन्म देती है।“ “मानव पूंजी मॉडल के अनुसार शिक्षा एक निवेश है जो भविष्य में लाभ पैदा करता है। इसलिए शिक्षा खर्च में हालिया कटौती भविष्य की राष्ट्रीय आय को कम कर देगी।“ (Quiggin, 1999) इस प्रकार शिक्षा और अनुसंधान में निवेश ही दीर्घकालीन संवृद्धि एवं विकास की धुरी है। आज, जापान, पूर्वी एशिया के नव विकसित देशों एवं पश्चिमी देशों के विकास का आधार शिक्षा ही है। गौरतलब है कि शिक्षा पर होने वाले खर्च से सीधे तौर पर लाभान्वित व्यक्ति को ही लाभ नहीं मिलता, बल्कि सभी को अधिक शिक्षित समाज और विकसित अर्थव्यवस्था का लाभ मिलता है। एक व्यक्ति के लिए शिक्षा साथ ही दूसरों को भी लाभ पहुंचती है। हर व्यक्ति के लिए शिक्षा सम्पूर्ण समाज को समग्र तौर पर लाभ पहुंचती है। । इन तरह में, “शिक्षा एक सकारात्मक बाह्यता है।“ “शिक्षा में निवेश करने वाली अर्थव्यवस्था अपनी बाजार प्रणाली को प्रोत्साहन देकर विश्व अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करेगी।” (Parker, 2012) इस प्रकार मुफ्त और सर्वव्यापी शिक्षा की जरूरत को समाजवाद के साथ जोड़ कर देखना एक अधुरा सत्य है। पूर्ण सत्य तो यह है कि शिक्षा हर तरह की आधुनिक अर्थव्यवस्था और समाज के विकास की धुरी है।
1966 में अंतर्जात संवृद्धि एवं विकास के सिद्धांत पर कोठारी कमीशन की ‘राष्ट्रीय शिक्षा और विकास’ रिपोर्ट आयी थी। इस रिपोर्ट ने सकल घरेलू उत्पाद का 6 % शिक्षा पर व्यय करने का सुझाव दिया गया था। जिसे भविष्य में बढ़ाना भी था । पर, कोठारी कमीशन का यह सुझाव धरा का धरा रह गया। अभी तक हमारी सरकारें इसके आधे के बराबर भी शिक्षा पर खर्च नहीं कर रही है। पर, अर्थशास्त्री लुईस-फाई-रैनिस के आर्थिक विकास मॉडलों का नीतिगत प्रभाव यह पड़ा कि भारत में स्वतंत्रता के बाद योजना काल (Nehru-Mahalanobish Model, 1950-1990) और गैर योजना या उदारीकरण काल (Raw-Manmohan Model, 1991- Till), इन दोनों ही कालों में अपनायी गयी, आर्थिक नीतियों ने शहरीकरण को बढ़ावा दिया है। मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति की वजह से जहाँ शहरीकरण की प्रक्रिया में गति आयी और बोकारो, राउरकेला आदि नए-नए शहरों के साथ कई छोटे बड़े कस्बे उभरे। पर, 1991 में अपनायी गयी उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नई आर्थिक नीति ने शहरीकरण की प्रक्रिया को सिर्फ बड़े शहरों तक केन्द्रित करते हुए, शहरीकरण की इस प्रक्रिया में अनियंत्रित रूप से बाढ़ की स्थिति ला दी। 1991 के बाद के दौर में, राष्ट्रीय आबादी एव जनसंख्या धनत्व के मुकाबले महानगरों की आबादी एवं जन-घनत्व कई गुणा अधिक तेजी से बढ़ा है। कई क्षेत्रों में तो ग्रामिण एवं कस्बई जनसंख्या एवं जन घनत्व कम भी हुआ है। जिसका सीधा सा अर्थ है कि लोग गांवों कस्बों से महानगरों की तरफ पलायन कर रहे है।
अधोसंरचना पर होने वाले कुल सार्वजनिक निवेश के एक बड़े हिस्से का निवेश (अनुमानतः 60-70%) शहरी, विशेषतः मैट्रोपोलिटेंट क्षेत्रों या उनकों केन्द्र में रख कर ही किया जा रहा है । औद्योगिक क्षेत्र के विकास के लिए आवश्यक अद्योसंरचना का विकास ग्रामिण एवं ग्रामिण क्षेत्र के साथ सटे कस्बाई क्षेत्रों में तुलनात्मक रूप में कम ही रहा है। निजी उपभोक्ताओं का भी प्रतिव्यक्ति व्यय एवं उपभोग प्रवृति भी शहरी क्षेत्र में अधिक है। इसलिए, सार्वजनिक निवेश हो या निजी निवेश या उपभोक्ता व्यय, हर तरह के व्यय का केन्द्र शहरी और वह भी महानगरों तक ही सीमित है। अतः ये सरकार की आर्थिक नीतियों का ही परिणाम है कि रोजगार का सृजन विशेषतः महानगरीय क्षेत्रों में ही हो रहा है। परिणामस्वरूप ‘रोजगार का सृजन एवं रोजगार गुणक’ भी शहरी क्षेत्र तक ही सीमित है या कहे कि महानगरीय क्षेत्रों में ही केन्द्रित है। रोजगार गुणक एवं आय गुणक ये बताते है कि निवेश की एक युनिट खर्च करने पर कितने गुणा रोजगार की युनिट और आय की युनिट में बढ़ौतरी होगी। इसलिए, महानगरीय क्षेत्रों में उच्च स्तर के रोजगार गुणक एवं आय गुणक होने की वजह से एक लम्बे अरसे से रोजगार की तलास में, बड़ी संख्या में लोगों का पलायन शहरी क्षेत्र की तरफ हो रहा है। अब, महानगरीय क्षेत्र में यदि किसी एक व्यक्ति के लिए रोजगार का सृजन होता है तो, उस व्यक्ति पर आश्रित उसका परिवार मतलब चार-पांच और लोग भी धीरे-धीरे शहर में ही आ कर बस जाते है। इन आश्रितों में एक बड़ी संख्या स्त्रियों और बच्चों की होती है। उस व्यक्ति के परिवार के विस्तार के साथ ही, आश्रित बच्चों की संख्या में और वृद्धि होती है। इस प्रकार, लगातार हो रहे पलायन की वजह शहरी क्षेत्र की जनसंख्या वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत वृद्धि से कई गुणा अधिक है। पर गौर करने वाली बात यह है कि ये शहर गांवों के आस-पास के कस्बे और छोटे शहर होते तो, शहरीकरण का प्रव्रजन(Migration) प्रभाव इतना चुनौतिपूर्ण न होता।
1.3 महानगरीय-शहरीकरण का स्वरूप
अब, जैसा कि ऊपर चर्चा की जा चुकी है कि इस शताब्दी के मध्य तक, विकासशील दुनिया के कस्बों और शहरों में कुल वैश्विक शहरी जनसंख्या का 80% हिस्सा निवास कर रहा होगा। अब इसके बाद जो सवाल उठता है वह यह है कि इन देशों के शहरीकरण की प्रकृति शहरी प्रभुत्व वाले यूरोपीय और अन्य पश्चिमी देशों के समान है या यह अलग होगा? अतः कुल मिला कर सवाल शहरीकरण के स्वरूप पर ही आ टिकता है? आम तौर पर शहरी क्षेत्र की पहचान चौड़ी सड़के और नियोजित एवं व्यवस्थित रूप से खड़ी गगनचुमंबी इमारतों, शिक्षा और स्वास्थ्य की जैसे नागरिक सुविधाओं की समूचित व्यवस्था से करायी जाती है। पर, भारत एवं अन्य विकासशील मूल्कों की हकीकत कुछ और भी है। इन देशों में, शहरी क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा फुटपाथों, स्लम और अनियोजित तंग कॉलोनियों में निवास करता है। इस प्रकार भारत एवं तीसरी दूनियाँ के देशों का शहरीकरण यूरोप में हुए शहरीकरण से भिन्न है। यूरोप एवं अन्य पश्चीमी देशों की अधिकतर आबादी शहरों में बसती है। वहां का शहरीकरण एक व्यवस्थित शहरीकरण है, जो एक योजनाबद्ध तरीके से हुआ है। भारत में भी नई दिल्ली का लुटियन जोन, चंडीगढ़, टाटानगर और बोकारो आदि शहरों को युरोपीय तर्ज पर ही विकसित किया गया है। पर, शहरीकरण की मांग और पूर्ति में असंतुलन की वजह से अधिकतर शहरों का एक बड़ा हिस्सा अनियोजित और अव्यवस्थित तौर पर बढ़ता जा रहा है। आज दिल्ली शहर की 80-85% आबादी अनियोजित रिहायशी क्षेत्रों में बसी हुई है। दिल्ली के कुल रिहायशी क्षेत्र का 24% हिस्सा ही नियोजित ढ़ग से विकसित है। मेरठ, पटना, कानपुर आदि-आदि शहरों की स्थिति तो और भी अधिक भयानक है । अनियोजित क्षेत्रों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि बिना जमीन के उपयोग की स्थिति को बदले ही राजनीतिक एवं प्रशासनिक मिली भगत से आर्थिक फायदे के लिए रातो-रात तंग बस्तियाँ बसा दी जाती है। इन कॉलोनियों में अलग से न तो सार्वजनिक स्कूलों के लिए कोई जगह होती है और न ही पार्कों और हस्पतालों आदि के लिए ही। (Madhuri, 2015) अतः अल्पविकसित देशों के शहरीकरण का एक बड़ा विरोधा भाष यह ही है कि एक तरफ मांग से पूर्णतः अपर्याप्त योजनाबध तरिके से “स्मार्ट सिटी”(व्यवस्थित शहर) बसाये जाते है, वही उस स्मार्ट सीटी के बाहर की पैरी-फैरी में घनी आबादी स्वतः बस जाती है। नियोजित शहर और इस क्षेत्रों की आबादी के घनत्व में जमीन आसमान का अंतर होता है। उदाहरण के लिए, दिल्ली के सभी क्षेत्रों की आबादी का न तो घनत्व (Density) ही समान है और न ही विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं हस्पतालों का आबंटन ही जनसंख्या-घनत्व के अनुरूप है। दिल्ली में नई दिल्ली, दक्षिण पश्चिम, दक्षिण दिल्ली की आबादी का घनत्व जहाँ क्रमशः 4000, 5446, 11000 हजार प्रति वर्ग किलोमीटर है। वहीं उत्तर पूर्व, पूर्वी दिल्ली की आबादी का घनत्व जहाँ क्रमशः 36,000, 27,000 हजार प्रति वर्ग किलोमीटर है। अब यदि तुलना अनियोजित और नियोजित आबादी में की जाए तो स्थिति और भी भयानक हो जाएगी।
1.4 शिक्षा प्रणाली पर अनियोजित शहरीकरण का प्रभाव
अब यदि शैक्षिक सुविधाओं की बात करे तो, वे इलाके जहाँ पर आबादी का घनत्व अधिक है, वहाँ आबादी के अनुपात में शैक्षिक संस्थाओं का नितांत अभाव है। वही इस शहर के अधिकतर गुणवतापूर्ण सरकारी एवं निजी शिक्षण संस्थान कम घनत्व वाले नियोजित इलाकों में ही स्थित है। एक अवलोकन के दौरान मैंने पाया कि शिक्षा स्वास्थ्य जैसी तमाम जनसुविधाओं से वंचित उत्तर पूर्व दिल्ली स्थित सोनिया विहार और उत्तरी पश्चीमी दिल्ली स्थित प्रेमनगर किराड़ी की आबादी नई दिल्ली (NDMC), भुसावल, सिरसा आदि शहरों से भी कही ज्यादा है, या बराबर है। इन रिहायसी क्षेत्रों की जनसंख्या की ताकत को इस तरह से समझा जा सकता है कि सोनिया विहार से इलाके से दो MCD के पार्षद चुने जाते है। किराड़ी गाँव के पास तो अपनी विधानसभा सीट भी है। पर दो MCD सीट देने वाले सोनिया विहार के पास एक ही प्राथमिक और एक ही माध्यमिक स्कूल बिल्डिंग है। जिसमें दो पाली में दो स्कूल चलते है। यही हाल किराड़ी का है। ये स्कूल 1990 की आबादी के हिसाब से प्रयाप्त है, पर प्रव्रजन की वजह से जिस अनुपात में जनसंख्या का घनत्व बढ़ा है, उस हिसाब से अब ये पूर्णतः अप्रयाप्त है।
इस प्रकार घनी आबादी की कच्ची कॉलोनियों में एक तरफ सरकारी स्कूलों का नितांत अभाव है। जिसकी वजह से सरकारी स्कूलों में विद्यार्थी शिक्षक अनुपात 100-150 या उस के भी अधिक हो जाता है। दूसरी तरफ, गली-गली में ‘कम लागत के निजी (तथाकथित) स्कूल’ खुल रहे है। इन स्कूलों में न तो अहर्तायुक्त सक्षम शिक्षक ही मौजूद है और न ही स्वस्थ और सुरक्षित शैक्षिक वातावरण ही। माता-पिता या तो, सही स्कूलों के अभाव में और/या आय के अभाव में और/या शिक्षाशास्त्र एवं शिक्षा अधिकार अधिनियम की समझ के आभाव में, इन खाना पूर्ति के निजी स्कूलों में ही अपने बच्चों का दाखिला दिलवाते है।
पर आश्चर्य तो तब होता है जब NUPAE जैसी संस्था इन स्कूलों में दाखिल 6-14 वर्ष के विद्यार्थियों को ‘शिक्षा अधिकार अधिनियम’ के तहत विद्यालयी शिक्षा प्राप्त करने वाले में गिनती शामिल कर लेती है।(DIAS Report) जबकी शिक्षक से लेकर तमाम तरह की शैक्षिक सुविधाओं तक से ये स्कूल नदा नद है?
1.5 शिक्षा का अधिकार
अब ‘शिक्षा के अधिकार’ का कदापि अर्थ ‘विद्यालयों की कैद’ तो, नहीं ही हो सकता। अब, जब यहाँ विद्यालयों की तुलना ‘जेलों’ से की जा रही है तो, इसका सीधा सा अर्थ है ‘शिक्षा के अधिकार’ का दायरा निशुल्क और अनिवार्य विद्यालयी दाखिले (शिक्षा) से कहीं आगे का है। “बच्चों का निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम यह अधिकथित करता है कि पाठ्यक्रम में कार्यकलाप ,अन्वेषण और खोज के माध्यम से शिक्षा प्राप्ति का प्रावधान होना चाहिए।” इसमें सभी के लिए गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा शामिल है न कि सिर्फ स्कूलों में होने वाले दाखिला भर। यदि शिक्षा प्रक्रिया में गुणवत्ता का अभाव है तो इसका सीधा सा अर्थ है कि बच्चों को उनके शैक्षिक अधिकार से वंचित किया जा रहा है।
1.6 छिपा शैक्षिक अपव्यय एवं ठहराव
शिक्षा का दायरा, लिखने पढ़ने की योग्यता से कही आगे है। प्रारंभिक कक्षाओं में तो प्रोन्नति (Promote) के बावजूद भी यदि विद्यार्थी माध्यमिक कक्षा में सुचारू रूप से शिक्षा ग्रहण करने की योग्यता से वंचित है, यहाँ तक कि प्रारंभिक कक्षा पास विद्यार्थी यदि आधारभूत लेखन कौशल भी हासिल नहीं कर पाता एवं ‘विवेचनात्मक कौशल’ की जगह सिर्फ जानकारियों का पुलिंदा ही हासिल कर पाता है। ऐसी शिक्षा उन विद्यार्थियों के जीवन और समाज के आर्थिक एवं सांस्कृतिक उत्थान में स्थाई ‘ठहराव’ ही पैदा ही नहीं करेगी, अपितु अवनति लाएगी।
प्रारंभिक कक्षा के विद्यार्थियों को भी NCF-2005 में वर्णित एवं RTE-2009 में अधिनियमित बालकेन्द्रित विधि से सीखने का वातावरण नहीं मिला तो, वे ‘शिक्षा के मौलिक अधिकार(अनुच्छेद 21A)’ से वंचित ही है। प्रारंभिक कक्षा पास करने वाले ये विद्यार्थी ‘छद्म रूप से ही शिक्षितों’ में गिने जाएंगे। पर हकीकत में ये सभी विद्यार्थी ‘सीखने के आभाव (Learning Deficit)’ से ग्रसित है। ऐसी विद्यालयी व्यवस्था धन, उर्जा और समय का अपव्यय कर, उनके जीवन में स्थाई ठहराव लाएगी। हकीकत में ऐसे विद्यार्थियों ने अपने जीवन के आठ सालों को विद्यालय में व्यर्थ ही गंवाता है।
ऐसे सरकारी या निजी स्कूल, जो किसी भी तरह से रचनात्मक एवं विवेचनात्मक शिक्षण के लिए उपर्युक्त नहीं है। पर आश्चर्य तो तब होता है जब NIEPA जैसी संस्था द्वारा तैयार DIAS Report(NIEPA) में ऐसे ‘Learning Deficiency’ वाले स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को RTE-2009 के अनुरूप शिक्षा का अधिकार प्राप्त करने वालों में गिना लिया जाए। अब या तो RTE में ही खामी है या NIEPA जैसी संस्था के अनुसंधान प्रक्रिया में कि ‘Learning Deficiency’ से ग्रस्त बच्चों को RTE के तहत शिक्षा अधिकार प्राप्त बच्चों के दायरे में गिना जाता है।
1.7 छिपे अपव्यय एवं ठहराव पर रोकने हेतू ‘क्रांतिक न्यूनतम प्रयत्न’ अनिवार्यता
किसी भी समाजिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आर्थिक संसाधनों को जुटाने की भी जरूरत होती है। अतः हर रिहायसी क्षेत्र के, हर विद्यालय में गुणवतापूर्ण शिक्षा के न्यूनतम स्तर के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ‘वास्तविक क्रांतिक निवेश’ का एक न्यूनतम स्तर अनिवार्य है। यदि संसाधनों को न्यूनतम क्रांतिक स्तर से कम जुटाया जाए तो, निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करना संभव नहीं होगा।
“पिछड़ेपन की स्थिति से अधिक विकसित स्थिति में संक्रमण करने के लिए, जहां से हम स्थिर समान वृद्धि दर की उम्मीद कर सकते हैं, यह आवश्यक है, हालांकि हमेशा पर्याप्त स्थिति नहीं है, उसी बिंदु पर या इसी अवधि के दौरान, अर्थव्यवस्था को विकास के लिए एक प्रोत्साहन प्राप्त करना चाहिए जो एक निश्चित क्रांतिक न्यूनतम आकार का हो “– लाइबेनस्टीन
क्रांतिक न्यूनतम प्रयत्न के इस सिद्धान्त को यदि मार्गदर्शक सिद्धान्त के रूप में देखे तो शिक्षा के क्षेत्र में न्यायौचित स्तर पर, समतामूलक तरिके से न्यूनतम क्रांतिक निवेश की ही आवश्यकता नहीं, उस निवेश का प्रभावपूर्ण प्रतिफल प्राप्त करने के लिए संस्थागत एवं व्यवस्थागत ढांचे मे भी परिवर्तन अनिवार्य है। अब यदि उस क्रांतिक न्यूनतम स्तर से कम का निवेश होगा और लक्ष्य के अनुरूप संस्थागत ढ़ांचे में परिवर्तन नहीं होगा, तो कभी भी निर्धारित लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकेगा। उदाहरण के तौर पर, शिक्षा पर पैसा खर्च तो हो रहा हो, पर वह किसी भी तरह से शिक्षा अधिकार अधिनियम या इस विषय पर गठित आयोगों के द्वारा सुझाई स्थिती को प्राप्त करने के अनुकूल नहीं है तो, हम जहां से चले थे, वही पर लुढ़क कर पहुंच जाएंगे। अर्थात किया गया सब निवेश सब पूर्णतः व्यर्थ । इस प्रकार हम शिक्षा के क्षेत्र में ‘ठहराव’ की स्थिति में ही होंगे और शिक्षा के क्षेत्र में जो भी निवेश होगा वह सब का सब व्यर्थ ‘अपव्यय’ होगा। यह तो स्थिर जनसंख्या की स्थिति का वर्णन था।
1.8. अब बढ़ती जनसंख्या की स्थिति में
तेजी से बढ़ती शहरी आबादी की वृद्धि दर के मुकाबले, यदि शिक्षा में होने वाले निवेश की वृद्धि दर अधिक नहीं तो, एक समय में क्रांतिक न्यूनतम स्तर से ऊपर का इलाका भी क्रांतिक न्यूनतम स्तर से नीचे आ जाएगा। अतः किसी भी रिहायसी क्षेत्र में किया जाने वाला शिक्षा पर निवेश, उस क्षेत्र की जनसंख्या वृद्धि (जन्मदर-मृत्यु दर+ पलायन) दर(विशेषः बाल जनसंख्या वृद्धि दर) से अधिक होना चाहिए। नहीं तो, उस क्षेत्र विशेष के लोगों की जीवन गुणवता में विकास के स्थान पर, ह्रास होने लगेगा।
- इस विश्लेषण के आधार पर हम कह सकते है कि शहरीकरण की प्रक्रिया को व्यवस्थित किये बिना क्या शिक्षा के अधिकार का कार्यान्वयन संभव नहीं है?
- तंग गलियों में, तंग दरवाजे के साथ तंग इमारत वाला एक निजी स्कूल बच्चों के जीवन के साथ खेल रहा है। परसवाल यह है कि सरकार ऐसे स्कूल चलाने की अनुमति ही क्यों और कैसे देती है? जहाँ न तो कोई फायर ब्रिगेड और न ही कोई अन्य सहायता दल पहुंच सकता है।
- अब यदि अनियोजित क्षेत्र में बच्चों के समग्र विकास के लक्ष्य के अनुरूप विद्यालय संभव ही नहीं, तो यह भी छात्रों की शिक्षा के अधिकार का हनन ही है?
- बच्चों को उनका शिक्षा अधिकार उपलब्ध कराने के लिए विद्यालयी व्यवस्था के नियोजन के साथ, अनियंत्रित शहरीकरण को नियंत्रित कर शहरीकरण के नियोजन की भी आवश्यकता है।
क्या अनियोजित शहरीकरण बच्चों के जीने के अधिकार का अतिक्रमण नहीं ?
1.9. गरीबी का दुष्चक्र बनाम विषमता का दुष्चक्र
अर्थशास्त्री प्रो. रागनर नर्क्से द्वारा प्रतिपादित ‘गरीबी के दुष्चक्र’ की अवधारणा के अनुसार अल्पविकसित देश गरीबी के दुष्चक्र में फंसे होते है। यह दुष्चक्र अनेक शक्तियों का ऐसा घेरा होता है। जो एक दूसरे के साथ ऐसी क्रिया-प्रतिक्रिया करता है। जिसकी वजह से निर्धन-निर्धन बना रहता है। प्रो. नर्क्से ने गरीबी को ही गरीबी का मुख्य कारण माना है। जबकि शिक्षाविद पाउलो फ्रेरे के शिक्षाशास्त्र के अनुसार इस (गरीबी) विभीषिका का राज विषमता में छिपा है। विषमता का प्रकट रूप गरीबी में दिखाई देता है। समस्या को गरीबी कहना ही एक गलत प्रस्थान बिन्दु है। गरीबी उत्पीडन का एक सुविधाजनक और भ्रामक नाम है। उत्पीडित को गरीब बता कर उत्पीडक वर्ग उसकी स्थिति और हैसियत को वैध ठहराने में समर्थ होता है। अतः उत्पीड़न का परिणाम, गरीबी की अमानवीय स्थिती पूंजी के अभाव के कारण नहीं है। यह उत्पीडक वर्ग द्वारा लगातार उत्पीडित वर्ग अर्थात आर्थिक एवं समाजिक रूप से कमजोर वर्ग का शोषण किये जाने की वजह से है। पाउलो फ्रेरे आगे कहते है, ‘‘शोषक और शोषित दोनों का अमानुषीकरण मानवीय विडंबना है। इस दो तरफा अमानवीकरण से इंसानी नियति को बचाने की क्षमता एवं जिम्मेदारी शोषक के पास न होकर शोषित की ही है।“ स्पष्ट है शोषक यथास्थिती के बनाए रखने से लाभ की स्थिती में है। वह भला क्यों इस स्थिती में बदलाव लाना चाहेगा? अतः यथास्थिती में बदलाव लाने का जिम्मेदारी उत्पीडित की ही है। पर क्या शिक्षातंत्र के स्तरीकरण के माध्यम से उत्पीड़न तंत्र को चलाए रखने की चेतना उत्पीडित वर्ग (जनसामान्य) की है?
विष्मता (गरीबी) के दुष्चक्र को तोड़ने के लिए रचनात्मक-विवेचनातमक शिक्षा महत्वपूर्ण औजार हो सकता है। पाउलो फ्रेरे के अनुसार शिक्षा भी राजनीति है। जिस तरह राजनीति वर्गीय होती है, उसी तरह शिक्षा भी वर्गीय होती है। शिक्षा के वर्गीय होने का सीधा सा अर्थ शिक्षा के पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्या एवं प्रावाधानों का किसी वर्ग विशेष के हितों के अनुरूप होना। शिक्षा के ढर्रे को कक्षाओं ‘समाजिक पूंजी’ के विविध पायादानों पर बैठे व्यक्तियों का भविष्य उनकी ‘स्कूलिंग’ की प्रक्रिया ही तय कर रही है। अब जरा विजय रैना द्वारा हिन्दी में रूपांतरित पुस्तक खतरा स्कूल के “जैसा बाप – वैसा बेटा” अध्याय में चित्र के माध्यम से जो सवाल उठाया गया है। उस सवाल को यदि हम भारतीय स्कूली ढांचे के संदर्भ में देखें तो, सवाल उठता है कि एक जैसे पाठ्यक्रम वाली, विविध समाजिक-आर्थिक हैसियत वाले स्कूली व्यवस्था में पाठ्यचर्या को लागू करने के तरिकों में अंतर की वजह से एक स्तर की कक्षा पास विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धियों में संभवतः एक सार्थक अंतर है। यह अंतर स्कूलों के स्तर की विविधता का या विद्यार्थियो की अपनी क्षमता का। इस पर सवालीया निशान है? उच्च शिक्षा में श्रेष्ट इलाकों के श्रेष्ट माने जाने वाले विद्यालयों के विद्यार्थियों का ही प्रवेश देखा गया है। क्यों? हर क्षेत्र के सर्वोच्च पदों जैसे नौकरशाह, प्रोफेसर, प्रबंधक, डॉक्टर, इंजिनियर, सैन्य अधिकारी, यहाँ तक कि लोकप्रिय एवं धनअर्जन करने वाले खेलों के खिलाड़ी तक सभी इसी श्रेष्ट माने जाने वाले स्कूलों के रास्ते आते है या सभी स्तर के स्कूलों की इसमें समान भागीदारी होती है? सिक्यूरिटी गार्ड, हेल्पर आदि की स्कूलिंग किस ढर्रे के स्कूलों में हुई है? निम्न आय वर्ग एवं निम्न स्तर के विद्यालयों के विद्यार्थी कामचलाऊ तौर पर ही साक्षर हो पाते है? अपवाद समाज विज्ञान की वास्तविकता ही नहीं, यथास्थिती को बनाए रखने का सेफ्टीवॉल भी होता है। पर क्या समाजिक यथार्थ यह नहीं कि किसी बच्चे का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस तरह की पृष्ठभूमि से संबंधित है? क्या गली नुक्कड़ के स्कूलों और बढ़ती आबादी की जरूरत के हिसाब से नाकाफी सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों और उन्हीं के समकक्ष उच्च स्तर के निजी और सरकारी स्कूलों(प्रतिभा, केन्द्रीय स्कूलों) में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की शैक्षिक गुणवता में अंतर उनके स्कूलों के स्तर में अंतर की वजह से है? यदि हाँ, तो क्या उनकी शिक्षा पर होने वाला अपर्याप्त व्यय एक अपव्यय नहीं और उन विद्यार्थियों के जीवन में स्थाई ठहराव पैदा करने वाला नहीं?
1.10 ‘क्रांतिक न्यूनतम प्रयत्न’ का ‘सामूहिक क्रांतिक न्यूनतम चेतना’ से संबंध
इवान इलिच भी जब डिस्कूलिंग सोसायटी में स्कूलों को भंग करने की बात करते है तो वे वहाँ स्कूल के माध्यम से से एक खास तरह के सांचे में ढ़ालने की प्रक्रिया अर्थात ‘स्कूलड’ पर अंकुश लगाने की बात कर रहे है। वे कहते है, “स्कूल रूपी संस्था इस सिद्धांत पर स्थापित है कि सीखना (स्कूली) शिक्षण का परिणाम है।” और “जिसे हम आजकल ‘शिक्षा’ कहते हैं, वह उपभोक्ता माल है, जिसका उत्पादन ‘स्कूल’ नाम की संस्था द्वारा होता है। इसलिए कोई व्यक्ति जितना अधिक तथाकथित श्रेष्ट विद्यालयों की शिक्षा का उपभोग करता है, उसका अपना भविष्य उसे उतना ही अधिक सुरक्षित महसूस होता है। साथ ही साथ, ज्ञान के पूँजीवादी तंत्र में अपना दर्ज़ा वह उतना ज़्यादा ऊँचा उठाने में सफल रहता है। इस तरह शिक्षा समाज के पिरामिड में एक नया वर्ग बनाती है और जो शिक्षा का उपयोग करते हैं, वे यह दलील पेश करते हैं कि उन्हीं से समाज को ज़्यादा फायदा होगा।” जैसा देखा गया है कि नियोजित क्षेत्र की तुलना में, तो अनियोजित क्षेत्र के निजी और सरकारी स्कूलों की स्थिति बदतर हैं। निजी और सरकारी स्कूलों के भी अलग-अलग स्तर हैं। इन स्कूलों में विद्यार्थियों का दाखिला पूर्णतः उनके माता पिता की समाजिक एवं आर्थिक हैसियत का प्रतिफल है। तो क्या हम यह माने कि नियोजित और अनियोजित क्षेत्र के स्कूलों के बीच का अन्तर लोगों के सामाजिक हैसियत के अंतर का प्रतिफल है और उसी को बनाए रखने के लिए है?
माइकल ऐप्पल ‘आधिकारिक ज्ञान’ पुस्तक में कहते है कि शिक्षा की व्यवस्था पर निजी क्षेत्र का दबदबा दक्षिण पंथी सांस्कृतिक वर्चस्व की रणनीतियों का हिस्सा है। स्कूल के भीतर की गतिविधियाँ इस प्रकार से संचालित की जाती है कि वे निजी और व्यावसायिक क्षेत्र के आर्थिक आधार को कायम रखने वाली समाजिक अद्योसंरचना को मजबूत बनाने में सहायक हो।
- अब उनकी इस बात को भारतीय संदर्भ में देखने का प्रयास करें,
- भारतीय संविधान सभा द्वारा शिक्षा को मौलिक अधिकार के खंड से निकाल कर नीति निर्देशक सिद्धान्तों के खंड मे डालना,
- संविधान के लागू होने के दस वर्ष के भीतर 0-14 साल के बच्चों की हर भरसक प्रयत्न(न्यूनतम क्रांतिक प्रयत्न) करने के संविधानिक वादे के वावजूद शिक्षाव्यवस्था का जस का तस बना रहना।
- कोठारी आयोग(1964-66) की समान विद्यालयी व्यवस्था की अनुशंसा के बावजूद भी, विद्यालयी व्यवस्था का असमान रहना,
- 1993 के मोहिनी जैन और उन्नीकृष्णन्न वाद के फैसलों से शिक्षा के मौलिक अधिकार बनने के बाद, अनुच्छेद 45 की भाषा को 86वें संशोधन में संकुचित कर 21A लाना
- 21A में शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के बावजूद भी विद्यालयों के विविध स्तर का बने रहना,
1.11 निष्कर्ष बिन्दु
किसी भी राष्ट्र की समृद्धि एवं सुव्यवस्था का स्तर सुशिक्षित जनसंख्या का समानुपातिक होता है। आज वे ही देश तरक्की कर रहें है जो वैज्ञानिक(रचनात्मक एवं विवेचनात्मक) एवं तकनीकी रूप से सुशिक्षित है। शहरी गैर नियोजित क्षेत्रों में उन सामाजिक, संथागत एवं व्यवस्थागत बाधाओं के बने रहना चिंता का विषय है, जो वंचित वर्ग के बच्चों की मानवीय क्षमता को सीमित करती है। जो लोग अपने बच्चों को शिक्षक और शैक्षिक सुविधाओं से अभाव ग्रस्त स्कूलों में दाखिला करा रहे है, क्यों नहीं वे लोग समान विद्यालयी व्यवस्था की मांग कर रहे है? दूसरा बड़ा सवाल क्या इतनी घनी अबादी में, अबादी के अनुपात में स्कूल संभव भी है? यदि नहीं, तो लोगों के शैक्षिक अधिकारों की रक्षा के लिए, शिक्षा का अधिकार अधिनियम और शहरी नियोजन अधिनियम कानून के बीच समन्वय की आवश्यकता है। ऐसी स्थिति में सिद्धांतिक रूप से ‘शिक्षा अधिकार अघिनियम 2009’ के लागू होने के बावजूद भी बच्चों को ‘गुणवतापूर्ण शिक्षा’ के अधिकार से वंचित स्थिती में देख कर व्याग्रित है।
लोगों में सामूहिक ‘क्रांतिक न्यूनतम शिक्षाशास्त्रीय चेतना’ के अभाव एवं दक्षिणपंथी राजनीति के सांस्कृति वर्चस्व की वजह से ही शिक्षा में क्रांतिक निवेश की मांग नहीं हो रही है। शिक्षा में विषमता दक्षिणपंथी रूढ़िवादी राजनीतिक एजेंडें के सांस्कृतिक वर्चस्व को कायम रखने की नीति का ही हिस्सा है। सार्वजनिक एवं निजी विद्यालयों का विविध स्तर पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्या, पाठ्यपुस्तकों एवं शिक्षण का विविध स्तर इसी सांस्कृतिक वर्चस्व को बनाए रखने का उपकरण है। अतः शिक्षा में क्रांतिक निवेश हो इसके लिए लोगों के शिक्षाशास्त्रीय चेतना को जगाने की जरूरत है।
ओड़िया कहानी-बिना मिट्टी के पृथ्वी: भूपेन महापात्र (अनुवादक- स्मृतिरेखा नायक)
ओड़िया कहानी
बिना मिट्टी के पृथ्वी
मूल लेखक- भूपेन महापात्र
अनुवादक- स्मृतिरेखा नायक
सूखी खुद एक किलोमीटर दूर नदी से पानी लाती है। अस्पताल भी आठ किलोमीटर दूरी पर है और उसी आठ किलोमीटर दूर में लगी बाजार को शाल पत्र, दातुन, जंगली चीजें आदि बैचने के लिए जाती है। इसलिए उसके लिए दो किलोमीटर की दूरी कुछ भी नहीं है। असल बात तो यह है कि वह रास्ता सही नहीं है। रास्ता जंगल से होते हुए बाजार तक जा पहुँचती है। इतना घना जंगल है कि उसमें भेड़ से लेकर शेर तक सभी की संख्या बहुत अधिक है। कभी-कभी तो हाथियों की झुंड अचानक से रास्ते पर आ पहुँचती है। वह चईना को एक-दो बार बताई है कि —“चलो हम शहर को चले जाते हैं। यहाँ तो जंगल से कुछ खास जंगली चीजें नहीं मिल रही है। अब तो हर बात में नियम कानून बना दी गयी है। पेड़ में हाथ देते ही पुलिस आँख दिखाने लगती है। चलो ! शहर को चले जाते हैं। अंतत: वहाँ हम दोनों को काम तो मिलेगा। मैं घर-घर में जाकर काम कर लूँगी। वहाँ पर बाबू लोगों के घर में काम करने को मिल जाती है। और तुझे भी काम की कमी नहीं होगी। इसमें क्या परेशानी है ?”
शुक्रा को भी पढ़ा पायेंगे। सुना है वहाँ हर बस्ती में स्कूल है। स्कूल की संख्या इतनी अधिक है कि पढ़ने के लिए बच्चे नहीं मिलते। यह बात सुनकर चईना का सिर फिर जाता है। वह गुस्से में आकार कहता है, तेरे दिमाग पर यह सब बातें कौन डालता है ? पढ़ाई क्या है ? इंसान कैसे जियेगा उसके बारे में कोई चिंता नहीं, बोल रही है बच्चा पढ़ेगा कैसे ? तू मुझे बस इतना बता दे कि अगर सभी पढ़ने में ही जुट जायेंगे तब गाय कौन रखेगा ? जंगल को कौन संभालेगा ? हम यहाँ है तभी तो जंगल है, नहीं तो यह पुलिस वाले क्या इसे रहने देते ? जंगल न हो तो हम कैसे जियेंगे ?
सूखी कभी-कभी सोचती है कि इन परूषों को कौन कैसा बनाया किया ? कुछ भी नहीं समझते हैं। अगर पढ़ाई जरूरी नहीं है तब ऐसे हजार-हजार बच्चे क्यूँ पढ़ते हैं ? उनके माँ-बाप क्या मूर्ख हैं ? दूसरे गाँव के बच्चे तो साइकिल से स्कूल जाते हैं।
वह चईना को समझाने की कोशिश में लगी रहती है। पढ़ाई की भी अपना महत्व है। अगर नहीं है तो सरकार बच्चों को किताब, कपड़े, मध्यान्ह भोजन की योजना, साइकिल आदि क्यूँ देता ? कभी-कभी उसे दु:ख भी होता है कि उसकी और एक-दो बच्चे होते तो कितना अच्छा होता ? स्कूल से एक वक्त की खाना तो मिलती है। जितने दिन चाहते स्कूल जाते, उसके बाद जमीन की देख-रेख करते और कहीं मजदूरी करते। पर चईना वह सब बातें बिलकुल भी नहीं समझता है। कहता है, पढ़ाई से बेकार और कुछ नहीं है और इस बारे में मुझसे बिलकुल बात नहीं करना।
हर दिन की तरह उस दिन भी सूखी चईना को हाथ जोड़कर कहने लगी— “बेटे को जरा जंगल के उस पार छोड़ आओ, ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। मैं तुम्हारे गाय-बकरी को लेकर जंगल जाती हूँ ।”
स्थिर होकर चईना सूखी को देखना लगा। उसके बाद बोला –“तू तो पढ़ाई को जोंक जैसे पकड़ के रखी हो। उससे सारा रक्त क्या तू अकेले ही चूस लेगी ? ज्यादा मत चूस। जोंक जैसे फूलकर मोटि हो जाएगी।” उसने सूखी की बात अनसुना कर दिया। सूखी ने देखा कि दूसरे टोली वाले बच्चे चले गए हैं। उनके साथ जाता तो चला जाता। पुआल की बने हुए छप्पर में घुसाये हुए लकड़ी की डांडा को निकालकर वह खुद तैयार हो गयी। चईना भी अपने काम को जाने के लिए तैयार है। उसने सूखी को पूछा —“तू कब तक लौटेगी ? मैं आज साहूकार के घर जाऊँगा। साला, आज को तीन महीना हो गये मगर तलाब खुदाई करने का पैसा अब तक नहीं दिया है। बोल रहा है कि सरपंच नहीं दे रहा है। और सरपंच बोल रहा है ब्लॉक से नहीं मिला है। साला कौन यहाँ सही है ?”
अरे! तू थोड़ा धीरे से बोल, रास्ते से जा रहे लोगों में से अगर कोई सून ले तो खैर नहीं। मैं क्या गलत कह रहा हूँ ? अब तक गंदी गाली तो नहीं बका है न ? मैं तुझे गाली देने की बात नहीं कह रही हूँ , तो तू क्या कह रही है ? मैं अभी आती हूँ।
सूखी बेटे को लेकर चली गयी। रास्ते में बेटे को समझाती है – “मास्टर जी किताब और पेंट –सर्ट देंगे, वह सब लेते आना। हाँ, और एक बात भात खाने समय कुछ भी नहीं छोड़ना। बाद में भूख लगेगी।” जंगल पार होने के बाद भी और कुछ रास्ता बेटे को पैदल चलना है। अब उसे कोई डर नहीं। सूखी उस जंगली रास्ता पार कराकर बेटे को दूसरी गाँव के रास्ते तक पहुँचने तक खड़ी होकर वहाँ से देखने लगी। आते समय ओर कोई डर नहीं, बाकि बच्चों के साथ वापस आ जायेगा।
सूखी की लौटने तक चईना वैसे ही घर के सामने बैठा हुआ था। हैरानी की बात है, तू तो साहूकार के घर जाने बाला था ?
‘क्या हुआ तूझे ?’
‘नहीं गया ?’ सूखी पूछने लगी।
“जाने से क्या होगा ? साला दृष्ट कहीं का ? घनिआ गया था उसके घर, बोल रहा है स्वतन्त्रता दिवस के दिन आए हुए मंत्री जी के लिए जो दावत हुई थी उसमें खर्च हुए पैसा हमारा मजदूरी का पैसा है। हिसाब लगाने के बाद जितना बचेगा उसे हम सब में बांट देगा।” यह सुनकर सूखी कहती है “उसमें से हमें कितना मिलेगा ? हम तो किसी खाने में शामिल नहीं हुए थे, न कहीं खाये थे। हम तो ये भी नहीं कहे थे कि हमारे पैसों से दावत दी जाए ?”
“मैं क्या ऐसे ही गुस्सा हो रहा था ? मौज – मस्ती तुम करोगे और पैसे हम देंगे ? यह कैसा न्याय है ? तुम इतना गुस्सा होकर भी क्या कर लोगे ? मार-पीट करोगे क्या ? गुस्सा करने से अपना ही नुकसान है। भलाई इसमें है कि चूप रहो और देखो क्या नतीजा निकलता है। सब जो करेगें हम भी वही करेगें।”
घर के अंदर जाकर सूखी फिर वापस आँगन में आ गयी और गहरी सोच में डूब गयी। चईना पूछता है “तू क्या सोच रही है कि बच्चे को जैसे भी हो पढ़ाएगी ? क्यूँ उसके पीछे इतनी लगी हुई है ? पढ़कर क्या तुझे वह पक्का घर में रखेगा ? और तू कुर्सी-मेज पर बैठेगी ?”
“तू क्यूँ हर वक्त उसी बात को लेकर शुरू हो जाता है ? उसके पढ़ाई में तेरा कौनसा पैसा खर्च हो रहा है ? उसे तो सरकार सब दे रहा है। दिन में चावल-दाल भी मिल रहा है, नहीं तो तू दे पता क्या ?” अब चईना भी गुस्से में आ गया। “मैं दे रहा हूँ तेरे सरकार को ! वह तो देख रहा है न वे लोग कैसे हमारे पैसे से मजा कर रहे हैं ? अब बेटे को सात साल पूरा होकर आठ साल होने को है। धीरे-धीरे वह भी अब सियाना होने लगा है। इस उम्र में उसे काम शिखना चाहिए। घर चलाने में मेरा मदद करना चाहिए , मुझे भी थोड़ा आराम मिल जाता। तू गाँव के दूसरों बच्चों को देख नहीं रही है ? हमारे गाँव के कितने बच्चे स्कूल जा रहे हैं बोल तो ? यह कहकर वह थोड़ा शांत हो गया जैसे आग से लोहे को निकालने के बाद धीरे-धीरे ठंडा होने लगता है।”
“तू मेरा बात सून ! वह फिर कहने लगा, दीना राऊत मुझे कह रहा था, बेटे को मेरे पास छोड़ दे। मैं उसे शहर में दूध बेचने वाले होटल में रखवा दूँगा। बहुत बड़ा होटल है। एक दिन में कम-से-कम दस हजार रोजगार वहाँ होता है। उधर खा-पीकर दो-चार दिन में ही तगड़ा हो जाएगा। माह की माह तनख्वा भी मिलेगी। बैसे भी क्या काम करना है ? बस बर्तन धोना है और रषोईया की थोड़ी मदद करनी है।”
सूखी चूप होकर सून रही थी। बेटे की पढ़ाई और नहीं हो पायेगी। यह बात उसे बहुत कष्ट पहुंचाई थी। एक ही तो बेटा है, भगवान उसे दो भी नहीं दिये हैं। दो अक्षर पढ़ता तो गाँव में उसका इज्जत होता। गाँव के थोड़े बहुत पढ़े-लिखे बच्चों को वह देख रही है। उनमें से कई तो ब्लॉक ऑफिस, पंचायत ऑफिस में काम करके पैसे कमा रहे हैं। पैंट-सर्ट पहन कर साइकिल में आना-जाना करते हैं। जरा-सी कष्ट सहकर बेटे को पढ़ाती तो दस साल बाद उसको अपने बेटे पर फक्र होता। और पढ़ाई का भी सारा खर्च तो सरकार उठा रहा है।
फिर सूखी सोचने लगी कि दो वक़्त के लिए खाना मिले तो सही, इतवार के दिन तो स्कूल छुट्टी रहती है और रात में तीनों का पेट भूखा रहता है। कुछ समेटना चाहे तो बाकि बिखरा हुआ रहता है। कमाई तो थोड़ा –सा है और खर्च उससे कई गुना ज्यादा। कहाँ से होगा ? दो लोग चाहे जितने भी काम करें पर वहीं सरकार छलकर भूखे रहने के लिए मजबूर कर देता है। “चलो ! हम दोनों तो न खाकर पानी पीकर सो जायेंगे मगर बच्चे का पेट खाली रहेगा तो क्या हम शांति से रह पायेंगे ? खाने के लिए कुछ दो सुनते ही जैसे माथे पर पहाड़ टूट पड़ता हुआ लगने लगता है।”
बी.पी.एल कार्ड तो है मगर खाली कार्ड रहने से क्या होता है ? सरकार चावल देगा तो उसके लिए भी पैसे चाहिए। अचानक उसकी दिमाग में यह सवाल उमड़ने लगी कि सरकार के घर में तो हमारा ही पैसा है। इसलिए सरपंच को हमें दो रूपये वाली चावल देना चाहिए और हम मुफ़्त में तो मांग नहीं रहे हैं। यह सब सुनकर चईना आश्चर्य से उसे देखने लगता है। तेरे दिमाग में इतनी बुद्धि कहाँ से आती है ? दीना राऊत कि बात सूखी की मन को फिर से उदास कर दिया। पर किसी भी प्रकार वह अपने बेटे को होटल में बर्तन धोने नहीं देगा। चाहे उसके लिए वह खुद को तैयार कर लेगी पर बेटे को जैसे भी हो पढ़ने देगी। बच्चे का भी पढ़ने में मन है। जितना हो पायेगा उतना पढ़ेगा और बाद में उसके किस्मत में जो होगा उसे वह भुगतना पड़ेगा। वह चईना को यह सब बातें खुलकर बता दी। शूक्रा का पढ़ाई बंद नहीं होगी। चाहे इसके लिए मुझे उसी होटल में काम क्यूँ न करना पड़े ?”
“धेत ! चईना ज़ोर से चिल्लाने लगा। तू औरत जात ! जाकर होटल में काम करेगी ? होटल में काम कब शुरू होती है और कब खत्म होती है उसके बारे में कुछ पता है ? शुबह के चार बजे से शुरू होकर रात के ग्यारह बजे खत्म होती है। तू मर्दों के साथ रात में काम करेगी ? और तू रहेगी कहाँ ? शहरी मर्दों के बारे में कुछ आता-पता है ?” बोलते-बोलते चईना के मुँह में स्मित अर्थपूर्ण हास्य उभरने लगी। सूखी को यह हँसी सुई जैसे चुभ गई। वह सोची कि यह जान-बूझकर चईना ने कहा है। मर्दों के साथ काम करने से क्या होगा ? क्या यहाँ में मर्दों के साथ काम नहीं करती हूँ ? मिट्टी उठाते समय कितने बार सीना से सीना टकराया है। मदन भोई हो या सपन तंति, जाने या अनजाने में, न जाने कितने बार धक्का हुआ है। यह नहीं हुआ है, कहा नहीं जा सकता। उसके हाथ-पैर भी खूब शक्त एवं मोटा है। बड़े-बड़े पैडों को काटकर जंगल से घर तक सिर के बल पर उठा ला सकता है। लेकिन कभी उसे किसी जानवर जैसे भूखे आँखों में नहीं देखा है।
हाँ, सरपंच दाम सिंह की बात कुछ अलग है। मिट्टी की खुदाई करने समय वह कई बार सूखी के पास जाकर खड़ा हुआ है, हँसा है और उससे मज़ाक करके बात करने की कोशिश किया है। मगर सूखी उसे कभी सीधे मुँह न कभी देखी है न उसके साथ बात की है। हर साँप जैसे बीन सुनने के लिए नहीं ठहरते हैं, उसी तरह हताश होकर लौटने वाली लहर जैसे हृदय लेकर वह लौट जाता था। हजारों पुरूषों के पास काम करने या जान बूझकर कोई उसके शरीर से घिसने से उसको क्या फर्क पड़ता है ? वह अपने को मजबूत बना ली है। उसके शरीर और मन को काबू में रखी है। लेकिन आज चईना यह क्या कह रहा है ? वह क्या सूखी को आज पहली बार देखा है ? दस साल से घर-संसार करने के बाद यह पहली बार देखा है ?
ये भी तो एक मर्द है। सब मर्द समान हैं। सिर्फ खूद की औरत को छोड़कर सारे मर्द दूसरें औरतों को देखते रहते हैं। सूखी के अंदर एक नारी सुलभ स्वाभिमान उमड़ पड़ा, जिसके ऊपर थोड़ा सा भी दरार सहन नहीं करेगी।
तूम क्या मुझे उस तरह की औरत समझते हो ? ऐसे क्यूँ कह रहे हो ? ऐसे क्यूँ कह रहे हो ? मुझे काम करना है और मैं करूँगी भी। मैं मर्दों को दोष नहीं देती हूँ। हम औरतों का भी दोष है। पैर फिसलने से गहरे पानी में जा गिरेगें और उठ नहीं पाएंगे। सूखी वहाँ से चली गई। गुस्से से एक जहरली साँप जैसे वह फाँ-फाँ कर रही थी। इतनी छोटी सी बात पर सूखी इतनी आग बबूला बन जायेगी यह बात चईना को पता नहीं था। वह तो मज़ाक में बोल दिया और चूप हो गया।
उस दिन दोपहर को चईना खाकर घर के सामने छांव में चटाई बिछाकर सोया हुआ देखकर सूखी चौंक गई। वह तो दोपहर में कभी नहीं सोता है। पिछली रात को भी कुछ नहीं खाया था। तब वह तो कोई सोचने बाली बात नहीं है। इस टोली में कितनों के घर में चूल्हा दो बार जलती है ? हाँ ! दो दिन पहले साहूकार के दुकान से दो केजी चावल उधारी से लाया था तब आज दिन में भात पका था। खाने के बाद चईना को नशे जैसे लगा होगा और अब अभी काम भी तो कुछ करने को नहीं है।
‘तू सो गया ?’
‘कहीं जाने का नहीं है क्या ?’
तबीयत ठीक नहीं लग रहा है। बुखार जैसे लग रहा है। सूखी उसके सिर पर हाथ रखी तो उसे पता चला कि चईना को तेज बुखार है। “तू बाहर क्यों शोया है ? मैं घर के अंदर बिस्तर लगा देती हूँ । वहाँ जाकर सो जा। बारिश भी होने बाली है। सूखी परेशानी में पड़ गयी। घर के मर्द अगर बिस्तर पर आ जाए तब चारों ओर अंधकार दिखाई पड़ती है। वही साहूकार बुखार की दवाई भी देता है और तंत्र-मंत्र के पानी भी। सभी का वह पहला डाक्टर होता है।
कहता है कि “ईश्वर के नाम पर एक रूपये रखकर प्रणाम करो।” सूखी सोची कि संध्या समय उसके पास जायेगी। पर यह नहीं हो पाया। संध्या से पहले झड़-तूफान होने लगी। बिजली कड़कने लगी। सूखी देवी माँ के पास दीया जलायी और प्रार्थना की। अब वह क्या करेगी, कहाँ जायेगी ? कौन उसकी मदद करेगा। उसके आँखों से आँसू बहने लगी। सूखी को इस विपत्ति से बचाने के लिए कोई नहीं है। मनुष्य के पास इसी तरह के विपदा कभी-कभार आती है जहाँ सब होते हुए भी कोई नहीं होता है। मनुष्य का भरोसा केवल ईश्वर पर और किसीके ऊपर नहीं। सूखी के जीवन जंजाल में ईश्वर ने कभी कोई सूखी नहीं दिया है। इस बात को सूखी कई बार परखा है। फिर भी वह ईश्वर से गुहार लगाती रहती है। इस जीवन रूपी समुद्र में कहीं कोई सहारा न देने समय अगर वह सहायता कर दें तो उसकी घर बच सकता था।
चईना को सात दिन से बुखार हुआ है, छूटता ही नहीं। सभी प्रकार के ईलाज करा चुकी है। साहूकार बैदराज से लेकर चमनपूर के तंत्र-मंत्र के साधक भी दो बार झाड़-फूँक किया है पर नतीजा कुछ नहीं। उस दिन सरपंच आया था, कहा कि इन सब देहाती ईलाज को छोड़कर सरकारी अस्पताल जाओ। वह अपने और से कहा “मैं आदमी भेज दूंगा, वह दवाई लेकर आजाएगा।”
जब सूखी उधारी से लाये हुये दस रूपये सरपंच को दिए तब अचानक से सरपंच खड़ा हो गया और कहने लगा “अरे! यह क्या बात हुई। सरकारी अस्पताल में मुफ्त की दवाईयां मिलती है। वहाँ पैसों की कोई जरूरत नहीं है। अरे! सुरिया तू चला जा, मेरा नाम डाक्टर बाबू को कहना और दबाई लेते आना। उसके बाद वह घूमकर सूखी से कहा, ठीक है तू उसे दस रूपये दे दे। वापस आने में एक दिन तो चला जाएगा, रास्ते में कुछ खा-पी लेगा। बेचारा वह भी तो गरीब है। अपने से खाने के लिए कहाँ से पैसे लायेगा।”
रात के करीब दो बजे तक सुरिया खाली हाथ लौट आया। कहा कि वहाँ डाक्टर या कम्पाउंडर कोई नहीं था। सात दिन से बंद है। वहाँ एक लड़का बैठा था। उसने दो दिन के बाद आने को कहा है। तभी डाक्टर से मुलाक़ात हो पायेगी। बुखार ही तो हुआ है, इतना परेशान होने की क्या है ? सूखी की दु:ख पहाड़ जैसे बढ़ती जा रही थी। चईना चित्कार करने लगा। “ओह! मुझे पकड़ो, पकड़ो ! सूखी दौड़ते हुए उसके पास गयी। चईना ज़ोर –ज़ोर से हाथ पैर पटक रहा था और सिर पकड़कर रोता जा रहा था। माँ –बेटे दोनों उसे ज़ोर से पकड़े हुए थे पर उसे संभाल नहीं पा रहे थे।”
पड़ोश में रहने वाला नरीया चईना के घर गया और कहा कि ‘सूखी, अगर तू कहेगी तो मैं एक खटिया और उसे ढ़ोहने वाले आदमियों को साथ ले आऊँगा। उनके साथ मैं भी चलूँगा। वे कुछ नहीं लेगें। शहर के बड़े अस्पताल को इसे ले जायेंगे। इसके बिना ओर कोई ऊपाय नहीं है। पर इसके लिए भी कुछ चाहिए। मैं एक बात कहूँगा, मानोगी ?’
सूखी आँसू चाहे जितना पोंछ रही थी लेकिन आँसू खत्म ही नहीं हो रही थी। आँसू क्या कभी खत्म होती है ? शायद भगवान इन आँखों के पीछे एक विस्तृत नदी जोड़ दिये हैं, जिससे हर बात में, काम में और हर समय औरतें आँसू से मुँह धो पायेंगी ईश्वर द्वार दी गयी यह एक सुंदर वरदान है। इसे कोई बदल नहीं सकता है।
नरीया ने कहा “तू पैसों की इंतजाम करने चली जा, मैं यहाँ खटिया और बाकि इंतजाम करता हूँ । आज रात में ही इसे अस्पताल ले जाना होगा। रात होने से क्या है ? हम चार लोग तो जा रहे हैं, डरने की कोई बात नहीं है। नरीया की बात मानकर सूखी गाँव के अंदर के तरफ भागने लगी और जाकर साहूकार की पैर पकड़ ली। ‘मुझे बचाओ साईं ! जो कहोगे वही करूंगी। मुझे बस अभी ५०० रूपये उधारी दे दो। मैं चईना को लेकर बड़े अस्पताल को जाऊँगी। नहीं तो मैं आपके पैर नहीं छोडूंगी।
साहूकार खा चुके थे और खड़े होकर अपने मोटे से पेट पर हाथ फिरा रहे थे। कुछ समय तक शांत हो गये। उसके बाद कहने लगे ‘अरे! तू क्यूँ रो रही है ? इसमें रोने की क्या है ? हाँ, तू विपत्ति के समय में मेरे पास आयी है, इन कुछ रूपये के लिए…क्या मैं नहीं दूँगा ? एक ही गाँव में तो रहते हैं।’
पर मैं खाली हाथ आयी हूँ। सूखी रो-रोकर कहने लगी। तुम जो कहोगे मैं वह करने के लिए तैयार हूँ। साहूकार की गला नरम होने लगी और कहा कि “तू तो औरत है, मैं तुझे क्या कहूँगा ? तू कर भी क्या सकती है ? ठीक है, यह ले ! बस यहाँ अपनी उंगली की निशान लगा दे और कुछ करने की जरूरत नहीं है। एक लंबाऔर मोटा –सा कागज उसके सामने रख दिया। उसके बाद सूखी के उंगली में काली लगाकर कागज में प्यार से निशान लगा दी।”
तब नरीया और शुक्रा भागते हुए वहाँ आ पहुँचे। वे दोनों कुछ नहीं कह पा रहे थे। उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था, जैसे गूंगे हो गए हैं। एकदम चूप होकर खड़ा हुआ शुक्रा ज़ोर से रोने लगा। उसके क्रंदन से सूखी और नरीया के अंदर अज्ञात भय की सिहरण पैदा कर रहा था। शुक्री अपनी माँ को पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर रो रहा था। बारिश की वह रात अधिक गंभीर और गहरी हो उठी थी। जंगल-पहाड़ सभी उस बारिश के साथ एकात्म हो गए थे।
पता-
स्मृतिरेखा नायक
ग्राम-भीमपुर, पोस्ट-काऊपुर
भाया-बरपदा,जिला-भद्रक
पिन न.-756113, ओड़िशा
Mobile-7749026444
ई मेल-smruti032@gmail.com
ऑनलाइन ‘राष्ट्रीय निबन्ध प्रतियोगिता २०२०’
पहले आओ-पहले प्रतिभाग करो (गूगल स्प्रेड शीट के अनुसार प्रथम 100 प्रतिभागी ही चुने जायेंगे)
निबन्ध विधा को पुनर्स्थापित करने का प्रयास सूक्ष्म प्रयास
यह प्रतियोगिता विशेष रूप से मात्र विभिन्न देश के विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों में शोधरत शोधकर्ताओं (कोई भी विषय) हेतु ही आयोजित करायी जा रही है. इसलिए इससे इतर पंजीकरण न करें.
‘अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी प्रतियोगिता-२०२०’ की सफलता के क्रम में ही अब राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली) टिहरी गढ़वाल के हिन्दी विभाग द्वारा प्रथम ऑनलाइन ‘राष्ट्रीय निबन्ध प्रतियोगिता २०२०’ आयोजित की जा रही है. इस प्रतियोगिता में भारत के समस्त विश्विद्यालयों-महाविद्यालयों व संस्थानों के शोधार्थी प्रतिभाग कर सकते हैं. इस प्रतियोगिता हेतु पहले 100 प्रतिभागियों को की प्रतिभाग करने का अवसर प्रदान किया जायेगा. सभी 100 प्रतिभागियों को ई-प्रमाण पत्र दिया जाएगा.
साथ ही प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान के अतिरिक्त 10 विशिष्ट निबन्धों को ‘विशिष्ट प्रतिभागी’ का प्रमाण पत्र भी प्रदान किया जाएगा. इतना ही नहीं समस्त 100 निबन्धों में 50 स्तरीय निबन्धों का प्रकाशन (ISBN सहित) भी किया जाएगा. पंजीकरण व प्रकाशन हेतु कोई शुल्क नहीं लिया जायेगा. इसलिए निबन्ध की शैली और गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं होगा. निबन्ध यूनिकोड में टाइप होगा और टाइप्ड निबन्ध को gdcpokhri_essaycomp2020@rediffmail.com पर मेल से भेजना अनिवार्य होगा. आपको मौलिक निबन्ध रचना का प्रमाण पत्र और पासपोर्ट फोटो सहित अपना सम्पूर्ण परिचय (डाक पता पिनकोड सहित) मेल के साथ ही भेजना होगा.
निबन्ध प्रेषित करने की तिथि – (25.05.2020 से 06.06.2020)
नियम व् शर्तें
१- निबन्ध अधिकतम १५०० से १८०० शब्दों का होना चाहिए.
२- निबन्ध, निबन्ध की विशेष शैली पर आधारित होना चाहिए. (निबन्ध की शैली का विशेष ध्यान रखें, शोध पत्र शैली में प्राप्त निबन्धों को स्वीकार नहीं किया जाएगा.)
३- निबन्ध यूनिकोड में स्पष्ट और व्याकरणिक अशुद्धियाँ रहित हो.
४- निबन्ध doc व pdf फॉर्मेट में gdcpokhri_essaycomp2020@rediffmail.com पर भेजने के बाद व्हात्सप पर सूचित करें.
५- निबन्ध की मौलिकता का प्रमाण पत्र बगैर निबन्ध को स्वीकार नहीं किया जाएगा.
६- अन्य जानकारी समय समय पर व्हात्सप के माध्यम से दी जाएगी. प्रथम 100 प्रतिभागियों को ही व्हात्सप ग्रुप में शामिल किया जायेगा, इसलिए व्हात्सप नम्बर सही भरें.
७- निर्णायक मंडल की घोषणा सभी निबन्ध आने के बाद व्हात्सप ग्रुप के माध्यम से की जाएगी.
८- अंतिम परिणाम की घोषणा में समय लग सकता है और उसकी सूचना भी आपको व्हात्सप से मिलेगी.
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संयोजक
डॉ० राम भरोसे
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी विभाग प्रभारी)
राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली) टिहरी गढ़वाल
९०४५६०२०६१ (व्हात्सप)















