37.6 C
Delhi
होम ब्लॉग पेज 62

खुद ही अपना देश बचाओ

0

कठिन दौर ये कैसा आया।
कुदरत ने आतंक मचाया।।
देश में दिखे शोर बहुत है।
सीमाओं पर जोर बहुत है।।

खींचातानी मची हुई है।
रोटी खूँ से सनी हुई है।।
लड़ किस्मत से मरे जा रहे।
जंगल खुद ही जले जा रहे।।

कहीं-कहीं तो जल विप्लव है।
कहीं विषाणु का तांडव है।।
दुश्मन चालें चले जा रहा।
देश हमारा जले जा रहा।।

सब मिलकर के आगे आओ।
खुद ही अपना देश बचाओ।।
कर्तव्यों की जोत जलाओ।
शक्ति आज अपनी दिखलाओ।।
-पंकज मिश्रा

खामोशी

0
wapt image 4737
wapt image 4737

भावनाओं से बिछी
रिश्तों की चादर पर
खामोशी आजकल
पहरा देने लगी है
बेबसी सी रहने लगी है
दिल की जुबां पर
घुटन बैठने लगी है
प्रेम से बंधी डोरी पर
कशमकश रहने लगी है
एक-दूसरे से
दूर जाने की
रिश्तों के टूट जाने की
प्रतिस्पर्धा सी लगने लगी है
आसूंओं में भी
आंखों से बह जाने की
ना जाने इस भीड़ में
क्या पाने की आस
और क्या खोने का गम है

क्षुधा का समर

0

क्षुधा का समर (कविता)

लहू से लथपथ सड़क
चीख रही है
जान हथेली पर रखकर
निराला के कुकुरमुत्ता
काल के गाल में समाए जा रहा
मेरे मुल्क के निजा़म
हे करुणामय प्रधान
दीन दिन मर रहा
यह रंजिश का समर नहीं
यह क्षुधा का समर है।

©सुभाष कुमार कामत

कौन हैं भारत माता ?: पुरुषोत्तम अग्रवाल

0

कौन हैं भारत माता ?: पुरुषोत्तम अग्रवाल

परिचय

किताब के बारे में ‘यह भारतमाता कौन है, जिसकी जय आप देखना चाहते हैं?’ 1936 की एक सार्वजनिक सभा में जवाहरलाल नेहरू ने लोगों से यह सवाल पूछा। फिर उन्होंने कहा—बेशक ये पहाड़ और नदियाँ, जंगल और मैदान सबको बहुत प्यारे हैं, लेकिन जो बात जानना सबसे ज़रूरी है वह यह कि इस विशाल भूमि में फैले भारतवासी सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं। भारतमाता यही करोड़ों-करोड़ जनता है और भारतमाता की जय उसकी भूमि पर रहने वाले इन सब की जय है।’ यह किताब इस सच्ची लोकतांत्रिक भावना और समावेशी दृष्टिकोण को धारण करने वाले शानदार दिमाग़ को हमारे सामने रखती है। यह पुस्तक आज के समय में ख़ासतौर से प्रासंगिक है जब ‘राष्ट्रवाद’ और ‘भारतमाता की जय’ के नारे का इस्तेमाल भारत के विचार को एक आक्रामक चोगा पहनाने के लिए किया जा रहा है जिसमें यहाँ रहनेवाले करोड़ों निवासियों और नागरिकों को छोड़ दिया गया है। ‘कौन हैं भारतमाता?’ में नेहरू की क्लासिक किताबों—‘आत्मकथा’, ‘विश्व इतिहास की झलक’ और ‘भारत की खोज’—से लेख और अंश लिये गए हैं। उनके भाषण, निबन्ध और पत्र, उनके कुछ बहुत प्रासंगिक साक्षात्कार भी इसमें हैं। संकलन के दूसरे भाग में नेहरू का मूल्यांकन करते हुए अन्य लेखकों के अलावा महात्मा गांधी, भगत सिंह, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद समेत अनेक महत्त्वपूर्ण हस्तियों के आलेख शामिल हैं। इसकी विरासत आज भी महत्त्वपूर्ण बनी हुई है |.

51JitP9XPRL. AC SY200
‘Kaun Hain Bharat Mata?’ : Itihas, Sanskriti aur Bharat ki Sankalpana ke Bare Mein : Jawahar Nehru

लेखक

पुरुषोत्तम अग्रवाल हिंदी के एक प्रमुख आलोचक, कवि, चिन्तक और कथाकार हैं। कई पुस्तकों का लेखन किया है, जिनमें ‘संस्कृति: वर्चस्व और प्रतिरोध’, ‘तीसरा रुख’,’विचार का अनंत’, ‘शिवदान सिंह चौहान’, ‘निज ब्रह्म विचार’, ‘कबीर: साखी और सबद’, ‘मजबूती का नाम महात्मा गाँधी’ (गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नयी दिल्ली के वार्षिक भाषण का पुस्तकाकार प्रकशित रूप) ‘अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय’(२००९) प्रमुख हैं। प्रो॰ अग्रवाल की प्रसिद्धि का आधार है: ‘अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय’. इस पुस्तक ने अग्रवाल को दुनियाभर में कबीर के मर्मभेदी आलोचक के रूप में प्रसिद्ध कर दिया. 

पुस्तक खरीदें

कौन कहता है कि साहित्य का फूल ग्रामों में नही पलता,

0
wapt image 2120
wapt image 2120
कौन कहता है कि साहित्य का फूल ग्रामों में नही पलता, नहीं खिलता। कलकत्ता के उनगरिय शिल्पांचल के एक ग्रामांचल ‘गौरीपुर” के गरिफा मैत्रेयी ग्रंथागार में मुंशी प्रेमचंद जी के जयंती समारोह का आयोजन किया गया।कहा जाता है कि साहित्यिक जुनून सिर्फ साहित्य प्रेमियीं में ही देख जा सकता है,वह आज देखने को मिला।रिमझिम बारिश,पानी से भरे लबालब सड़कों को पार करते हुए समस्त साहित्य प्रेमी उपस्थित हुए।कार्यक्रम आयोजक डॉ इंदु सिंह एवं डॉ विक्रम इस आयोजन  के लिये सराहना के पात्र हैं। कार्यक्रम में प्रेम चंद जी के साहित्य सुधा की ऐसी रसधारा बही जिसका उल्लेख शब्दों में कर पाएं सम्भव नहीं। मुख्य अतिथि के रूप में श्रीमती माला वर्मा,कल्याणी विध्वविद्यालय के डॉ. श्रीकांत गोंड, ऋषि बंकिम चंद महिला महाविद्यालय(womens कॉलेज) के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष श्री एन. चंद्रा राव,रिसड़ा के साहित्य प्रेमी श्री चंद्र कुमार मुखर्जी,श्री धर्मदेव सिंह,श्रीमती आरती वर्मा उपस्थित थे। इनके अतिरिक्त विभिन्न विद्यालयों/महाविद्यालयों के छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।सबसे कम उम्र के वक्ता कक्षा सातवीं के छात्र हैं। विभिन्न वक्ताओं के विचार एवं आख्यान के बीच श्रीमती माला वर्माजी की नवीनतम रचना *विश्व के 20 आश्चर्य* का लोकार्पण हुआ। डॉ. इंदु सिंह एवं डॉ. विक्रम इस प्रकार के साहित्य जागरण पिछले सात वर्षों से करते आ रहे हैं।जिनके कार्यक्रमों की मुख्य खासियत है ये स्कूल और कॉलेज के युवाओं में साहित्य प्रेम का संस्कार डालने का प्रयास कर रहे हैं।

कोश विज्ञान की उपादेयता- डॅा. गीता नायक, श्रीमती अंजू श्रीवास्तव

0

कोश विज्ञान की उपादेयता

शोध निर्देशकः- डॅा. गीता नायक

शोधार्थीः- श्रीमती अंजू श्रीवास्तव

भाषा विज्ञान किसी भी ज्ञान में सबसे अधिक भूमिका निभाता है । दरअसल शिक्षण, अध्यापन या ज्ञान प्राप्ति का माध्यम ही भाषा है। बिना भाषा के मानव समाज कभी वर्तमान स्वरूप तक नहीं पहुंच सकता था और नहीं वह अपने संचित अनुभव को परंपराओं तक संजो सकता था। इसीलिये किसी भी भाषा में रचा गया ज्ञान जानने के लिये भाषा का ज्ञान होना बहुत जरूरी होता है । और यह ज्ञान भाषा विज्ञान के माध्यम से ही समझा जा सकता है। जैसा कि स्पष्ट है कि भाषा का ज्ञान भी अपने आप में विज्ञान है अर्थात् उसको समझने के लिये विशेष तरीको  पद्धतियों एवं नियमों का पालन करना होता है। इस अध्ययन के अंतर्गत भाषा नामक इकाई की परिभाषा पहचान ] उसके अस्तित्व में आने और विस्तार के तथा उसके घटक तत्वों के बारे में अध्ययन किया जाता है।

भाषा यद्यपि ध्वनि के रूप में नैसर्गिक रूप से विद्यमान रही किंतु उसे अभिव्यक्ति का नियमित माध्यम बनाने के लिये ध्वनि विशेष को संचित करके वर्ण और फिर सभी को संज्ञा देने के लिये शब्दों का निर्माण किया गया है। अतः भाषा के संपूर्ण विस्तार में शब्दों का अत्याधिक महत्व है और किसी भाषा में सेंकडों वर्षो के प्रयोग के बाद जितने भी शब्दों का निर्माण किया गया हैं उसे जानने के लिये शब्दकोश का निर्माण बहुत जरूरी है। अन्यथा कम उपयोग या उपयोग न होने के कारण शब्द भाषा से गायब हो सकता है जो कि भाषा के लिये अमूल्य संपत्ति होता है।

इसी कोश निर्माण और उसके अध्ययन को कोश विज्ञान के रूप में जाना जाता है। कोश विज्ञान सिर्फ शब्दों का बेतरतीब भंडार या संग्रह नहीं है बल्कि उसे व्यवस्थित बनाकर ही संपूर्ण भाषा को जाना जा सकता है। अतः कोश निर्माण भी अपने आप में अत्यंत श्रमसाध्य प्रक्रिया है अंग्रेजी में केाश विज्ञान को (lexicology) कहा जाता है । कुछ विद्धान इसे (lexicography) भी कहते है। जिसका हिन्दी पर्याय कोश कला है । वास्तव में ये दोनो एक दूसरे के पूरक हैं। एक सैद्धतिक रूप है दूसरा व्यवहारिक या प्रायोगिक रूप है।

कोश विज्ञान तो कोश बनाने का विज्ञान है। इस में उन सिद्धांतों का विवेचन करते है जिनके आधार पर कोश बनते है दूसरी ओर कोश कला उसके प्रयोग को अधिक सुंदरता से प्रयोग करने का तरीका हैं। भाषा विज्ञान के सभी विद्वानां ने दोनो को एक दूसरे का पूरक माना है।

कोश विज्ञान की उत्पत्तिः-

भाषा के जन्म और उसके ज्ञान के विभिन्न घटकों के ज्ञान की भी उत्पत्ति भारत में हुई । वैदिक साहित्य में शब्द कोश या कोश विज्ञान के लिये निघण्टु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इतिहासकारों ने उसे 1000 ई- पू- का माना है यद्यपि वेदिक काल की कल्पना को इतिहास के काल खंड में नहीं बांटा जा सकता है क्योंकि यह वस्तुतः साहित्य में वार्णित सभ्यता के आधार पर माना गया है। तथापि 1000 ई-पू- से 1000 ई- के दो हजार वर्षो में भारत में अनके कोशों का निर्माण किया गया जिनमें से कई आज भी उपलब्ध हैं। यूरोप में कोश विज्ञान का आरभ सन 1000 ई- के बाद हुआ परंतु अंग्रेजी भाषा के उल्लेखनीय कोश सोलहवी सदी में ही निर्मित हुऐ जो आज भी काफी प्रचलित है। इन कोशो के अंतर्गत उस भाषा में अब तक प्रयुक्त हुऐ लगभग सभी शब्दों का संग्रह किया गया है किन्तु फिर भी उन्हें अंग्रिम या पूर्ण संग्रह नहीं कहा जा सकता है। इतना अवश्य है कि कोश के ज्ञान के बाद भाषा का लगभग संपूर्ण स्वरूप जाना जा सकता है। किसी भी भाषा को अगर सीखना या समझना है तो उसके तीन घटकों को सीखना पड़ता है। तभी हम उसके विद्वान बन सकते हैं ।

1 व्याकरणः- इसके अंतर्गत उस भाषा के कर्ता ] कर्म] क्रिया और कारकों को लिखने] बोलने का उचित अनुक्रम और विभिन्न कालों और वाक्यों में उसके भीतर परिवर्तन की सीखा जाता है।

2 शब्द कोशः- व्याकरण से भली भांति परिचित होकर शब्द कोश का ज्ञान किया जाता है। यह एक अत्यंत कठिन प्रक्रिया है। शब्द का ज्ञान ] शब्दों के अर्थ] वर्तनी का प्रयोग आदि इस में सीखे जाते हैं।

3- शब्दों के विभिन्न प्रयोग या प्रयोग कलाः- इसके माध्यम से हम भाषा के विभिन्न प्रयोग] प्रभावी प्रयोग और विभिन्न भावों को दर्शाने के लिये जो विभिन्न तरीके जैसे पर्यायवाची] मुहावरे ] गूढ प्रयोग या रहस्यपरक चमत्कारी प्रयोग आदि आते है। इन तीनों प्रकारों को हम प्रतिभा] व्युत्पत्ति और अभ्यास में भी रख सकते है। प्रतिभा अर्थात भाषा संरचना का ज्ञान] व्युत्पत्ति अर्थात शब्द कोश का ज्ञान एवं अभ्यास अर्थात भाषा के विभिन्न प्रयोग के अंतर्गत रख सकते हैं।

कोश निर्माण विधिः-

कोश निर्माण के लिये डॅा. भोलानाथ तिवारी और डॅा. द्वारिका प्रसाद सक्सैना दोनों ने 10 बातों को महत्वपूर्ण माना है।

1- शब्द संग्रह- शब्द संग्रह का आशय भाषा के शब्दों को एकत्रित करके प्रस्तुत करना है। कोशकार का प्रयत्न यह रहता है कि सभी शब्दों का वह संग्रह कर सके किन्तु यह पूर्णतः संभव नहीं है। प्रत्येक भाषा में कई विषयों के शब्द होते हैं जिन्हें एकत्र करने के लिये कोशकार को उस भाषा के विभिन्न विषयों के विद्वानों से भी सहायता लेना हेाता है । शब्द संग्रह काफी श्रम साध्य प्रक्रिया है और इसके लिये काफी शोध और मूल्यांकन की आवश्यकता रहती है। एक ही तरीके से उच्चारित होने वाले शब्द विभिन्न भाषाओं में हो सकते हैं ऐसे में उन्हें अलग करना और सभी अर्थों को बताना भी आवश्यक है कुल मिलाकर कोश निर्माण के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण शब्द संग्रह ही है।

2- वर्तनीः- कोश निर्माण में वर्तनी अर्थात् शब्द को किस प्रकार लिखने से प्रचलित अर्थ प्रकट होता है। वर्तनी में जितनी स्पष्टता होगी] भाषा उतनी ही उपयोगी होगी। देवनागरी लिपि में हर ध्वनि के लिये लिपिचिन्ह की पूर्णता है परंतु अंगे्जी में वर्तनी की समस्या काफी है जिसमें उच्चारण भिन्न हैं किन्तु वर्तनी भिन्न हो जाती है । शब्द कोश में वर्तनी का जो रूप शुद्ध माना है उसका कारण भी बताना चाहिये ताकि उसका शुद्ध रूप ही प्रयुक्त हो। चूंकि कोश प्रमाणित ग्रंथ है। अतः वर्तनी पर विशेष ध्यान होना चाहिये ताकि शब्दों में स्पष्टता बनी रहे।

3- शब्द निर्णय: शब्द निर्णय भी एक आवश्यक प्रक्रिया है । कई बार एक ही तरीके से उच्चरित होने वाले शब्द या सूक्ष्म अंतर रखने वाले शब्द या एक ही भाषा में या भिन्न भाषाओं में प्रयुक्त शब्द होते हैं। ऐसे में किस शब्द को प्राथमिक रखा जाये यह भी आवश्यक है । प्रायः उसी भाषा के शब्द को प्रथम रखा जाता है। यदि एक ही भाषा का शब्द हो तो प्रचलित अर्थ वाले शब्द को ही रखा जाता है।

4- व्युत्पत्ति : – शब्द कोश मे प्रमाणिकता रखने के लिये शब्द की मूल उत्पत्ति] उसका रूप तत्सम] तदभव] देशज या विदेशी को भी बताना चाहिये । हिन्दी की उत्पत्ति संस्कृत से है संस्कृत शब्द धातुओं से बनते हैं जिनमें उपसर्ग प्रत्यय द्वारा कई शब्द बन जाते है । शब्द का प्रयोग करने के लिये व्युत्पत्ति का ज्ञान आवश्यक है।

5- व्याकरण : शब्द कोश में एक ही शब्द शब्दकोश में एक ही शब्द संज्ञा] सर्वनाम] विशेषण आदि के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। कोश में शब्द की प्रकृति के आधार पर स्पष्ट करना होता है कि यह एक सर्वनाम] क्रिया आदि किस में आता है और उसका भिन्न प्रयोग किन परिस्थितियों में होता है, यह भी बताना चाहिये; साथ ही व्याकरण तत्व के लिये भिन्न रूपों का भी वर्णन होना चाहिये ।

6- उच्चारण : कोश में उच्चारण भी स्पष्ट किया जाना चाहिये ताकि उसका व्यवहार उचित रूप में हो । अंग्रेजी में भिन्न अक्षर के भिन्न उच्चारण किये जाते हैं कभी ध्वनि शांत भी रहती है हिन्दी में भी अ ऐ औ ऋ श ज्ञ श्र आदि के संबंध में उच्चारण स्पष्ट किया जाना चाहिये । मिलती जुलती बनावट वाले वर्णों में भी स्पष्टता के लिये उच्चारण करना आवश्यक हैं ।

7- अर्थः- शब्दकोश में शब्द का संचय भिन्न अर्थ को दर्शाने के लिये ही होता है। डॅा. भोलानाथ तिवारी ने वर्णनात्मक कोश में दो प्रकार के अर्थ माने हैं। पर्यायवाची और ऐतिहासिक l डॅा. द्वारिका प्रसाद सक्सैना ने ऐतिहासिक आधार पर शब्द के परिवर्तित रूप के भिन्न अर्थ के आधार पर भी कोश में उसे बताना आवश्यक माना है। प्रत्येक शब्द का अर्थ शब्दकोश में बताना अत्यंत आवश्यक है।

8- प्रयोग : – जहा शब्द के अर्थ में प्रयोग के आधार पर अस्पष्टता हो वहा उस शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुऐ वाक्यों में प्रयोग करके उस शब्द का प्रयोग स्पष्ट करना चाहिये । जहां आवश्यक हो संदर्भों का प्रयोग भी करना चाहिये साथ ही प्रयोग में कालक्रम का संयोजन भी रखना चाहिये ।

9- चित्र : कई शब्दो के लिये उदाहरण देना भी कठिन होता है ऐसे में चित्र के रूप में पहचान करने के लिये चित्र का प्रयोग किया जाना चाहिये । अच्छे शब्दकोश में आवश्यकता रूप से चित्र होना चाहिये ।

10- शब्द क्रमः- शब्दकोश में शब्दों की संख्या काफी अधिक होती है। अतः आवश्यक होने पर उस शब्द को खोजने के लिये शब्दों का संयोजन पद्धति अनुसार होना चाहिये । ताकि शब्द को खोजने वाला अध्येता उसे आसानी से खोज सके ।

डॅा. भीलानाथ तिवारी और द्वारिका प्रसाद सक्सैना ने पाच प्रकार के शब्द क्रम माने है।

1- वर्णानुक्रमः- जिस भाषा में कोश का निर्माण किया जाना है उस भाषा में वर्णमाला के अनुसार ही शब्दों का संचयन किया जाता है । इसमें न सिर्फ प्रथम अक्षर को क्रम से रखा जाता है अपितु शब्द में प्रथम वर्ण के बाद आने वाले शब्दों को भी वर्णमाला के अनुसार रखा जाता है हिंदी में मात्राओं की व्यवस्था है अतः मात्रा के अनुसार भी शब्दों को वर्णक्रम से रखा जाता है। इससे स्वर के साथ ही व्यंजनों को भी सुगमता से खोजा जा सकता है । यह पद्धति काफी सुविधा जनक है और सामान्यतः भाषा के वृहत् कोश में इसी प्रयोग होता है।

2- अक्षर संख्या : इस पद्धति में शब्द में आने वाले वर्ण की संख्या के आधार पर रखा जाता है प्राचीन भारत में इस प्रकार के कोश मिलते हैं। अक्षर संख्या वाली पद्धति में वर्णानुक्रम का प्रयोग किया जाता है। यह पद्धति काफी जटिल है और तकनीकी पद्धति में समस्या भी आती है।

3- विषयक्रमः- कुछ कोशों में विषय के अनुसार शब्दों को रखा जाता है। संस्कृत का अमर कोश इसी श्रेणी का है। इस पद्धति में शब्दों की पुनरावृत्ति हो सकती है क्योंकि कई शब्द विभिन्न विषयों में आ सकते हैं। इस प्रकार के कोश विषय विशेष के लिये उपयुक्त हैं। बृहद्कोश में यह पद्धति त्रुटिपूर्ण है।

4- सुरक्रम : जो भाषाये सुर प्रधान होती है उनके कोशों की रचना इसी प्रकार होती है । इस प्रकार के कोश में एक ही शब्द जो कई प्रकार से बोला जाता है क्रम अनुसार रख दिया जाता है।

5- व्युत्पत्ति के आधार पर-: इस कोश में व्युत्पत्ति के अनुसार शब्दों का क्रम रखा जाता है । अरवी भाषा के कोशों ये यह पद्धति है।

कोश के भेद :

डॅा. द्वारिका प्रसाद सक्सैना ने कोश के चार भेद माने है।

1- व्यक्ति कोश: व्यक्ति कोश में किसी व्यक्ति विशेष के संपूर्ण साहित्य या पुस्तकों में प्रयुक्त शब्दों को रखा जाता है प्रत्येक शब्द का पुस्तक] स्थान] पृष्ठ पर उल्लेख और प्रयुक्त अर्थ रखा जाता है इससे व्यक्ति विशेष के साहित्य और व्यक्तित्व दोनों का ही ज्ञान होता है ।

2- पुस्तक कोशः- इस कोश में किसी पुस्तक में प्रयुक्त सभी शब्दों का संदर्भानुसार उल्लेख किया जाता है।

3- विषयकोशः- इस कोश में किसी विषय के अध्ययन में प्रयुक्त होने वाले सभी शब्दों को संकलित किया जाता है। प्रायः इनमें पारिभाषिक शब्दों का विस्तृत कोश होता है और विषय के अध्ययन में यह काफी महत्वपूर्ण होता है।

4- भाषा कोश: भाषा कोश में संपूर्ण भाषा कोश का संकलन किया जाता है। यह एक भाषा] दो भाषा या अनेक भाषाओं का हो सकता है । प्रायः दूसरी भाषा सीखने सिखाने के लिये द्विभाषा या बहुभाषा कोश ही बनाये जाते है इससे दोनो भाषा का विस्तृत ज्ञान गहन रूप से किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त सुविधा के लिये विभिन्न प्रकार के कोश भी निर्मित होते हैं या किये जा सकते हैं यथा शब्द परिवार कोश] पर्यायवाची कोश] लोकोक्ति मुहावरा कोश] प्रयोगकोश] लोक भाषा कोश ]पारिभाषिक कोश ] विश्व कोश आदि ।

डॅा. भोलानाथ तिवारी ने भी व्यक्ति कोश, पुस्तक कोश, भाषा कोश, के अतिरिक्त वर्णनात्मक कोश, ऐतिहासिक कोश, तुलनात्मक कोश को भी स्थान दिया है ।

उक्त वर्णन से स्पष्ट होता है कि शब्द कोश का अध्ययन और निर्माण एक कठिन और तकनीकी कार्य है जो काफी श्रमसाध्य एवं महत्वपूर्ण है।

भाषा वि़ज्ञान का महत्व

भाषा विज्ञान के क्षेत्र में हम पूरी तरह शब्द कोश पर ही निर्भर हैं। बिना उसके भाषा का प्रयोग असंभव है। भाषा विज्ञान के अध्ययन के तहत कोश विज्ञान का भी अध्ययन किया जाता है बल्कि देखा जाये तो शब्दकोश का ज्ञान भाषाविज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।

  1. किसी भाषा का निर्माण] संरचना] परिवर्तन और उसके महत्व आदि का अध्ययन भाषाविज्ञान में किया जाता है किन्तु उस भाषा के विस्तार ] संपूर्ण रचनात्मक प्रयोग का ज्ञान कोश के माध्यम से ही किया जाता है । वस्तुतः आदर्श कोश में भाषाविज्ञान के सभी तत्वों के आधार पर ही उसका निर्माण किया जाता है अर्थात देखा जाये तो कोश के अंतर्गत भाषा विज्ञान के सभी का अध्ययन किया जा सकता है ।
  2. साहित्य में तो सदा ही नवीन शब्द या पर्याय शब्दों का प्रयोग किया जाता है। आवश्यकता के अनुसार शब्द की व्यवस्था तुकान्तता भाव विशेष की अभिव्यक्ति और व्यक्त करने की शैली आदि विभिन्न कारकों के लिये विभिन्न शब्दों की आवश्यकता होती है जो भले ही एक अर्थ प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में समृद्ध भाषा में शब्दों का असीम संसार होना आवश्यक है।
  3. कोश विज्ञान का भाषा के साथ साथ संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में भी अपरिहार्य योगदान है। कोश के माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपने अभिव्यक्ति के संसार को विस्तार प्रदान कर सकता है। शिक्षा व्यवस्था] ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों को प्राप्त करना बहुविध कलाओं, शिक्षाओं ओैर विषयों के ज्ञान के लिये उसके शब्दों को जानना आवश्यक है । विभिन्न भाषायें] विभिन्न अनुभव] ज्ञान के साथ ही अपनी पृथक विशेषता भी रखती है ऐसे में भाषाओं की सीमा से परे जाने के लिये विभिन्न भाषाओं को जानना भी जरूरी होता है । विभिन्न प्रकार का ज्ञान संपूर्ण रूप से लेने के लिये सही व स्पष्ट शब्दों का ज्ञान जरूरी है।
  4. प्रायः शब्द का गलत प्रयोग या उच्चारण] अर्थ को पूरी तरह बदल देता है। अतः शब्द के उच्चारण के संबंध में ज्ञान होना अनिवार्य है।
  5. कई बार व्यक्ति को अपनी सुविधा अनुसार शब्दों का निर्माण करना होता है। ऐसे में शब्दों का ज्ञान आवश्यक हो जाता है।
  6. कई बार ऐसी संज्ञाओं] वस्तु का ज्ञान करने के लिये जो देखी नहीं गई हो किन्तु उसका प्रयोग करना हो या सुना हो तब चित्र के माध्यम से अपने ज्ञान को स्पष्ट किया जा सकता है।
  7. किसी भाषा में कई शब्द सुगम होते हैं या अभिव्यक्ति के लिये उपयुक्त होते हैं किंतु प्रयोग न होने के कारण अप्रचलित हो जाते हैं। साथ ही एक ही अर्थ को दर्शाने वाले विभिन्न शब्दों का ज्ञान रखने और कथन विशेष को दर्शाने के लिये विशेषोक्ति के लिये पर्यायवाची और मुहावरा कहावतों का प्रयोग अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

उपर्युक्त सभी परिस्थितियों में शब्दकोश की अत्यंत आश्यकता होती है और बिना किसी बृहद् कोश के हम अपने लक्ष्य में सफल नहीं हो सकते अतः शब्दकोश की ज्ञान प्राप्ति ]व्यक्त्वि निर्माण और सभी क्षेत्रों में सफल होने के लिये या सामान्य से हट कर विशेष स्थान पाने के लिये महती आवश्यकता होती है ।

अंततः विस्तृत विवेचन से समझा जा सकता है कि कोश विज्ञान न सिर्फ भाषा विज्ञान में अपितु ज्ञान के समस्त क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थान और उपादेयता है।

लेखिका

शोध निर्देशकः- डॅा. गीता नायक। शोधार्थीः- श्रीमती अंजू श्रीवास्तव

हिन्दी अध्ययनशाला विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन म-प्र-

C/O LIG/53 शिवानगर शिवपुरी म-प्र- 473551 7566605253

कोश विज्ञान की उपादेयता

1
magnifying glass on white table
Photo by Markus Winkler on Unsplash

कोश विज्ञान की उपादेयता

कोश विज्ञान क्या है

भाषा विज्ञान किसी भी ज्ञान में सबसे अधिक भूमिका निभाता है । दरअसल शिक्षण, अध्यापन या ज्ञान प्राप्ति का माध्यम ही भाषा है। बिना भाषा के मानव समाज कभी वर्तमान स्वरूप तक नहीं पहुंच सकता था और नहीं वह अपने संचित अनुभव को परंपराओं तक संजो सकता था। इसीलिये किसी भी भाषा में रचा गया ज्ञान जानने के लिये भाषा का ज्ञान होना बहुत जरूरी होता है । और यह ज्ञान भाषा विज्ञान के माध्यम से ही समझा जा सकता है। जैसा कि स्पष्ट है कि भाषा का ज्ञान भी अपने आप में विज्ञान है अर्थात् उसको समझने के लिये विशेष तरीको ] पद्धतियों एवं नियमों का पालन करना होता है। इस अध्ययन के अंतर्गत भाषा नामक इकाई की परिभाषा ] पहचान ] उसके अस्तित्व में आने और विस्तार के तथा उसके घटक तत्वों के बारे में अध्ययन किया जाता है।

भाषा यद्यपि ध्वनि के रूप में नैसर्गिक रूप से विद्यमान रही किंतु उसे अभिव्यक्ति का नियमित माध्यम बनाने के लिये ध्वनि विशेष को संचित करके वर्ण और फिर सभी को संज्ञा देने के लिये शब्दों का निर्माण किया गया है। अतः भाषा के संपूर्ण विस्तार में शब्दों का अत्याधिक महत्व है। और किसी भाषा में सेंकडों वर्षो के प्रयोग के बाद जितने भी शब्दों का निर्माण किया गया हैं उसे जानने के लिये शब्दकोश का निर्माण बहुत जरूरी है। अन्यथा कम उपयोग या उपयोग न होने के कारण शब्द भाषा से गायब हो सकता है जो कि भाषा के लिये अमूल्य संपत्ति होता है।

इसी कोश निर्माण और उसके अध्ययन को कोश विज्ञान के रूप में जाना जाता है। कोश विज्ञान सिर्फ शब्दों का बेतरतीब भंडार या संग्रह नहीं है बल्कि उसे व्यवस्थित बनाकर ही संपूर्ण भाषा को जाना जा सकता है। अतः कोश निर्माण भी अपने आप में अत्यंत श्रमसाध्य प्रक्रिया है अंग्रेजी में केाश विज्ञान को (lexicology) कहा जाता है । कुछ विद्धान इसे (lexicography) भी कहते है। जिसका हिन्दी पर्याय कोश कला है । वास्तव में ये दोनो एक दूसरे के पूरक हैं। एक सैद्धतिक रूप है दूसरा व्यवहारिक या प्रायोगिक रूप है।

कोश विज्ञान तो कोश बनाने का विज्ञान है। इस में उन सिद्धांतों का विवेचन करते है जिनके आधार पर कोश बनते है दूसरी ओर कोश कला उसके प्रयोग को अधिक सुंदरता से प्रयोग करने का तरीका हैं। भाषा विज्ञान के सभी विद्वानां ने दोनो को एक दूसरे का पूरक माना है।

कोश विज्ञान की उत्पत्तिः-

भाषा के जन्म और उसके ज्ञान के विभिन्न घटकों के ज्ञान की भी उत्पत्ति भारत में हुई । वैदिक साहित्य में शब्द कोश या कोश विज्ञान के लिये निघण्टु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इतिहासकारों ने उसे 1000 ई- पू- का माना है यद्यपि वेदिक काल की कल्पना को इतिहास के काल खंड में नहीं बांटा जा सकता है क्योंकि यह वस्तुतः साहित्य में वार्णित सभ्यता के आधार पर माना गया है। तथापि 1000 ई-पू- से 1000 ई- के दो हजार वर्षो में भारत में अनके कोशों का निर्माण किया गया जिनमें से कई आज भी उपलब्ध हैं। यूरोप में कोश विज्ञान का आरभ सन 1000 ई- के बाद हुआ परंतु अंग्रेजी भाषा के उल्लेखनीय कोश सोलहवी सदी में ही निर्मित हुऐ जो आज भी काफी प्रचलित है। इन कोशो के अंतर्गत उस भाषा में अब तक प्रयुक्त हुऐ लगभग सभी शब्दों का संग्रह किया गया है किन्तु फिर भी उन्हें अंग्रिम या पूर्ण संग्रह नहीं कहा जा सकता है। इतना अवश्य है कि कोश के ज्ञान के बाद भाषा का लगभग संपूर्ण स्वरूप जाना जा सकता है। किसी भी भाषा को अगर सीखना या समझना है तो उसके तीन घटकों को सीखना पड़ता है। तभी हम उसके विद्वान बन सकते हैं ।

1 व्याकरणः- इसके अंतर्गत उस भाषा के कर्ता ] कर्म] क्रिया और कारकों को लिखने] बोलने का उचित अनुक्रम और विभिन्न कालों और वाक्यों में उसके भीतर परिवर्तन की सीखा जाता है।

2 शब्द कोशः- व्याकरण से भली भांति परिचित होकर शब्द कोश का ज्ञान किया जाता है। यह एक अत्यंत कठिन प्रक्रिया है। शब्द का ज्ञान ] शब्दों के अर्थ] वर्तनी का प्रयोग आदि इस में सीखे जाते हैं।

3- शब्दों के विभिन्न प्रयोग या प्रयोग कलाः- इसके माध्यम से हम भाषा के विभिन्न प्रयोग] प्रभावी प्रयोग और विभिन्न भावों को दर्शाने के लिये जो विभिन्न तरीके जैसे पर्यायवाची] मुहावरे ] गूढ प्रयोग या रहस्यपरक चमत्कारी प्रयोग आदि आते है। इन तीनों प्रकारों को हम प्रतिभा] व्युत्पत्ति और अभ्यास में भी रख सकते है। प्रतिभा अर्थात भाषा संरचना का ज्ञान] व्युत्पत्ति अर्थात शब्द कोश का ज्ञान एवं अभ्यास अर्थात भाषा के विभिन्न प्रयोग के अंतर्गत रख सकते हैं।

कोश निर्माण विधिः-

कोश निर्माण के लिये डॅा. भोलानाथ तिवारी और डॅा. द्वारिका प्रसाद सक्सैना दोनों ने 10 बातों को महत्वपूर्ण माना है।

1- शब्द संग्रह- शब्द संग्रह का आशय भाषा के शब्दों को एकत्रित करके प्रस्तुत करना है। कोशकार का प्रयत्न यह रहता है कि सभी शब्दों का वह संग्रह कर सके किन्तु यह पूर्णतः संभव नहीं है। प्रत्येक भाषा में कई विषयों के शब्द होते हैं जिन्हें एकत्र करने के लिये कोशकार को उस भाषा के विभिन्न विषयों के विद्वानों से भी सहायता लेना हेाता है । शब्द संग्रह काफी श्रम साध्य प्रक्रिया है और इसके लिये काफी शोध और मूल्यांकन की आवश्यकता रहती है। एक ही तरीके से उच्चारित होने वाले शब्द विभिन्न भाषाओं में हो सकते हैं ऐसे में उन्हें अलग करना और सभी अर्थों को बताना भी आवश्यक है कुल मिलाकर कोश निर्माण के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण शब्द संग्रह ही है।

2- वर्तनीः- कोश निर्माण में वर्तनी अर्थात् शब्द को किस प्रकार लिखने से प्रचलित अर्थ प्रकट होता है। वर्तनी में जितनी स्पष्टता होगी] भाषा उतनी ही उपयोगी होगी। देवनागरी लिपि में हर ध्वनि के लिये लिपिचिन्ह की पूर्णता है परंतु अंगे्जी में वर्तनी की समस्या काफी है जिसमें उच्चारण भिन्न हैं किन्तु वर्तनी भिन्न हो जाती है । शब्द कोश में वर्तनी का जो रूप शुद्ध माना है उसका कारण भी बताना चाहिये ताकि उसका शुद्ध रूप ही प्रयुक्त हो। चूंकि कोश प्रमाणित ग्रंथ है। अतः वर्तनी पर विशेष ध्यान होना चाहिये ताकि शब्दों में स्पष्टता बनी रहे।

3- शब्द निर्णय: शब्द निर्णय भी एक आवश्यक प्रक्रिया है । कई बार एक ही तरीके से उच्चरित होने वाले शब्द या सूक्ष्म अंतर रखने वाले शब्द या एक ही भाषा में या भिन्न भाषाओं में प्रयुक्त शब्द होते हैं। ऐसे में किस शब्द को प्राथमिक रखा जाये यह भी आवश्यक है । प्रायः उसी भाषा के शब्द को प्रथम रखा जाता है। यदि एक ही भाषा का शब्द हो तो प्रचलित अर्थ वाले शब्द को ही रखा जाता है।

4- व्युत्पत्ति : – शब्द कोश मे प्रमाणिकता रखने के लिये शब्द की मूल उत्पत्ति] उसका रूप तत्सम] तदभव] देशज या विदेशी को भी बताना चाहिये । हिन्दी की उत्पत्ति संस्कृत से है संस्कृत शब्द धातुओं से बनते हैं जिनमें उपसर्ग प्रत्यय द्वारा कई शब्द बन जाते है । शब्द का प्रयोग करने के लिये व्युत्पत्ति का ज्ञान आवश्यक है।

5- व्याकरण : शब्द कोश में एक ही शब्द शब्दकोश में एक ही शब्द संज्ञा] सर्वनाम] विशेषण आदि के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। कोश में शब्द की प्रकृति के आधार पर स्पष्ट करना होता है कि यह एक सर्वनाम] क्रिया आदि किस में आता है और उसका भिन्न प्रयोग किन परिस्थितियों में होता है, यह भी बताना चाहिये; साथ ही व्याकरण तत्व के लिये भिन्न रूपों का भी वर्णन होना चाहिये ।

6- उच्चारण : कोश में उच्चारण भी स्पष्ट किया जाना चाहिये ताकि उसका व्यवहार उचित रूप में हो । अंग्रेजी में भिन्न अक्षर के भिन्न उच्चारण किये जाते हैं कभी ध्वनि शांत भी रहती है हिन्दी में भी अ ऐ औ ऋ श ज्ञ श्र आदि के संबंध में उच्चारण स्पष्ट किया जाना चाहिये । मिलती जुलती बनावट वाले वर्णों में भी स्पष्टता के लिये उच्चारण करना आवश्यक हैं ।

7- अर्थः- शब्दकोश में शब्द का संचय भिन्न अर्थ को दर्शाने के लिये ही होता है। डॅा. भोलानाथ तिवारी ने वर्णनात्मक कोश में दो प्रकार के अर्थ माने हैं। पर्यायवाची और ऐतिहासिक l डॅा. द्वारिका प्रसाद सक्सैना ने ऐतिहासिक आधार पर शब्द के परिवर्तित रूप के भिन्न अर्थ के आधार पर भी कोश में उसे बताना आवश्यक माना है। प्रत्येक शब्द का अर्थ शब्दकोश में बताना अत्यंत आवश्यक है।

8- प्रयोग : – जहा शब्द के अर्थ में प्रयोग के आधार पर अस्पष्टता हो वहा उस शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुऐ वाक्यों में प्रयोग करके उस शब्द का प्रयोग स्पष्ट करना चाहिये । जहां आवश्यक हो संदर्भों का प्रयोग भी करना चाहिये साथ ही प्रयोग में कालक्रम का संयोजन भी रखना चाहिये ।

9- चित्र : कई शब्दो के लिये उदाहरण देना भी कठिन होता है ऐसे में चित्र के रूप में पहचान करने के लिये चित्र का प्रयोग किया जाना चाहिये । अच्छे शब्दकोश में आवश्यकता रूप से चित्र होना चाहिये ।

10- शब्द क्रमः- शब्दकोश में शब्दों की संख्या काफी अधिक होती है। अतः आवश्यक होने पर उस शब्द को खोजने के लिये शब्दों का संयोजन पद्धति अनुसार होना चाहिये । ताकि शब्द को खोजने वाला अध्येता उसे आसानी से खोज सके ।

डॅा. भीलानाथ तिवारी और द्वारिका प्रसाद सक्सैना ने पाच प्रकार के शब्द क्रम माने है।

1- वर्णानुक्रमः- जिस भाषा में कोश का निर्माण किया जाना है उस भाषा में वर्णमाला के अनुसार ही शब्दों का संचयन किया जाता है । इसमें न सिर्फ प्रथम अक्षर को क्रम से रखा जाता है अपितु शब्द में प्रथम वर्ण के बाद आने वाले शब्दों को भी वर्णमाला के अनुसार रखा जाता है हिंदी में मात्राओं की व्यवस्था है अतः मात्रा के अनुसार भी शब्दों को वर्णक्रम से रखा जाता है। इससे स्वर के साथ ही व्यंजनों को भी सुगमता से खोजा जा सकता है । यह पद्धति काफी सुविधा जनक है और सामान्यतः भाषा के वृहत् कोश में इसी प्रयोग होता है।

2- अक्षर संख्या : इस पद्धति में शब्द में आने वाले वर्ण की संख्या के आधार पर रखा जाता है प्राचीन भारत में इस प्रकार के कोश मिलते हैं। अक्षर संख्या वाली पद्धति में वर्णानुक्रम का प्रयोग किया जाता है। यह पद्धति काफी जटिल है और तकनीकी पद्धति में समस्या भी आती है।

3- विषयक्रमः- कुछ कोशों में विषय के अनुसार शब्दों को रखा जाता है। संस्कृत का अमर कोश इसी श्रेणी का है। इस पद्धति में शब्दों की पुनरावृत्ति हो सकती है क्योंकि कई शब्द विभिन्न विषयों में आ सकते हैं। इस प्रकार के कोश विषय विशेष के लिये उपयुक्त हैं। बृहद्कोश में यह पद्धति त्रुटिपूर्ण है।

4- सुरक्रम : जो भाषाये सुर प्रधान होती है उनके कोशों की रचना इसी प्रकार होती है । इस प्रकार के कोश में एक ही शब्द जो कई प्रकार से बोला जाता है क्रम अनुसार रख दिया जाता है।

5- व्युत्पत्ति के आधार पर-: इस कोश में व्युत्पत्ति के अनुसार शब्दों का क्रम रखा जाता है । अरवी भाषा के कोशों ये यह पद्धति है।

कोश के भेद :

डॅा. द्वारिका प्रसाद सक्सैना ने कोश के चार भेद माने है।

1- व्यक्ति कोश: व्यक्ति कोश में किसी व्यक्ति विशेष के संपूर्ण साहित्य या पुस्तकों में प्रयुक्त शब्दों को रखा जाता है प्रत्येक शब्द का पुस्तक] स्थान] पृष्ठ पर उल्लेख और प्रयुक्त अर्थ रखा जाता है इससे व्यक्ति विशेष के साहित्य और व्यक्तित्व दोनों का ही ज्ञान होता है ।

2- पुस्तक कोशः- इस कोश में किसी पुस्तक में प्रयुक्त सभी शब्दों का संदर्भानुसार उल्लेख किया जाता है।

3- विषयकोशः- इस कोश में किसी विषय के अध्ययन में प्रयुक्त होने वाले सभी शब्दों को संकलित किया जाता है। प्रायः इनमें पारिभाषिक शब्दों का विस्तृत कोश होता है और विषय के अध्ययन में यह काफी महत्वपूर्ण होता है।

4- भाषा कोश: भाषा कोश में संपूर्ण भाषा कोश का संकलन किया जाता है। यह एक भाषा] दो भाषा या अनेक भाषाओं का हो सकता है । प्रायः दूसरी भाषा सीखने सिखाने के लिये द्विभाषा या बहुभाषा कोश ही बनाये जाते है इससे दोनो भाषा का विस्तृत ज्ञान गहन रूप से किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त सुविधा के लिये विभिन्न प्रकार के कोश भी निर्मित होते हैं या किये जा सकते हैं यथा शब्द परिवार कोश] पर्यायवाची कोश] लोकोक्ति मुहावरा कोश] प्रयोगकोश] लोक भाषा कोश ]पारिभाषिक कोश ] विश्व कोश आदि ।

डॅा. भोलानाथ तिवारी ने भी व्यक्ति कोश, पुस्तक कोश, भाषा कोश, के अतिरिक्त वर्णनात्मक कोश, ऐतिहासिक कोश, तुलनात्मक कोश को भी स्थान दिया है ।

उक्त वर्णन से स्पष्ट होता है कि शब्द कोश का अध्ययन और निर्माण एक कठिन और तकनीकी कार्य है जो काफी श्रमसाध्य एवं महत्वपूर्ण है।

भाषा वि़ज्ञान का महत्व

भाषा विज्ञान के क्षेत्र में हम पूरी तरह शब्द कोश पर ही निर्भर हैं। बिना उसके भाषा का प्रयोग असंभव है। भाषा विज्ञान के अध्ययन के तहत कोश विज्ञान का भी अध्ययन किया जाता है बल्कि देखा जाये तो शब्दकोश का ज्ञान भाषाविज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।

  1. किसी भाषा का निर्माण] संरचना] परिवर्तन और उसके महत्व आदि का अध्ययन भाषाविज्ञान में किया जाता है किन्तु उस भाषा के विस्तार ] संपूर्ण रचनात्मक प्रयोग का ज्ञान कोश के माध्यम से ही किया जाता है । वस्तुतः आदर्श कोश में भाषाविज्ञान के सभी तत्वों के आधार पर ही उसका निर्माण किया जाता है अर्थात देखा जाये तो कोश के अंतर्गत भाषा विज्ञान के सभी का अध्ययन किया जा सकता है ।
  2. साहित्य में तो सदा ही नवीन शब्द या पर्याय शब्दों का प्रयोग किया जाता है। आवश्यकता के अनुसार शब्द की व्यवस्था तुकान्तता भाव विशेष की अभिव्यक्ति और व्यक्त करने की शैली आदि विभिन्न कारकों के लिये विभिन्न शब्दों की आवश्यकता होती है जो भले ही एक अर्थ प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में समृद्ध भाषा में शब्दों का असीम संसार होना आवश्यक है।
  3. कोश विज्ञान का भाषा के साथ साथ संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में भी अपरिहार्य योगदान है। कोश के माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपने अभिव्यक्ति के संसार को विस्तार प्रदान कर सकता है। शिक्षा व्यवस्था] ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों को प्राप्त करना बहुविध कलाओं, शिक्षाओं ओैर विषयों के ज्ञान के लिये उसके शब्दों को जानना आवश्यक है । विभिन्न भाषायें] विभिन्न अनुभव] ज्ञान के साथ ही अपनी पृथक विशेषता भी रखती है ऐसे में भाषाओं की सीमा से परे जाने के लिये विभिन्न भाषाओं को जानना भी जरूरी होता है । विभिन्न प्रकार का ज्ञान संपूर्ण रूप से लेने के लिये सही व स्पष्ट शब्दों का ज्ञान जरूरी है।
  4. प्रायः शब्द का गलत प्रयोग या उच्चारण] अर्थ को पूरी तरह बदल देता है। अतः शब्द के उच्चारण के संबंध में ज्ञान होना अनिवार्य है।
  5. कई बार व्यक्ति को अपनी सुविधा अनुसार शब्दों का निर्माण करना होता है। ऐसे में शब्दों का ज्ञान आवश्यक हो जाता है।
  6. कई बार ऐसी संज्ञाओं] वस्तु का ज्ञान करने के लिये जो देखी नहीं गई हो किन्तु उसका प्रयोग करना हो या सुना हो तब चित्र के माध्यम से अपने ज्ञान को स्पष्ट किया जा सकता है।
  7. किसी भाषा में कई शब्द सुगम होते हैं या अभिव्यक्ति के लिये उपयुक्त होते हैं किंतु प्रयोग न होने के कारण अप्रचलित हो जाते हैं। साथ ही एक ही अर्थ को दर्शाने वाले विभिन्न शब्दों का ज्ञान रखने और कथन विशेष को दर्शाने के लिये विशेषोक्ति के लिये पर्यायवाची और मुहावरा कहावतों का प्रयोग अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

उपर्युक्त सभी परिस्थितियों में शब्दकोश की अत्यंत आश्यकता होती है और बिना किसी बृहद् कोश के हम अपने लक्ष्य में सफल नहीं हो सकते अतः शब्दकोश की ज्ञान प्राप्ति ]व्यक्त्वि निर्माण और सभी क्षेत्रों में सफल होने के लिये या सामान्य से हट कर विशेष स्थान पाने के लिये महती आवश्यकता होती है ।

अंततः विस्तृत विवेचन से समझा जा सकता है कि कोश विज्ञान न सिर्फ भाषा विज्ञान में अपितु ज्ञान के समस्त क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थान और उपादेयता है।

लेखिका

शोध निर्देशकः- डॅा. गीता नायक। शोधार्थीः- श्रीमती अंजू श्रीवास्तव

हिन्दी अध्ययनशाला विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन म-प्र-

C/O LIG/53 शिवानगर शिवपुरी म-प्र- 473551 7566605253

 

कोविड -19 महामारी से निपटने के लिए डिजिटल परिवर्तन की आवश्यकता – मनीष कुमार सिंह

0
green typewriter on white surface
Photo by Markus Winkler on Unsplash

ये मानव जाति के लिए वास्तव में कठिन समय हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से हम सबसे खराब मानवीय संकट के बीच हैं। कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह अनुमान लगा रहे हैं कि हालात अगले कुछ हफ्तों या महीनों तक खराब ही रहेंगे। वर्तमान स्थिति एक हॉलीवुड फिल्म सरीखे लग रही है।यद्यपी दुनिया भर में सरकारें विभिन्न उपाय कर रही हैं और लोग सामाजिक दूरी और लॉकडाउन दिशानिर्देशों का पालन कर रहे हैं, ऐसे कुछ तरीके हैं जिनसे तकनीक इन कठिन समय के दौरान लोगों की मदद कर सकती है। कई चीजें ऐसी हैं जहां आप विभिन्न कार्यों को करने के लिए आधुनिक डिजिटल तकनीक का उपयोग कर सकते हैं। 

डिजिटल बैंकिंग आपके सभी बैंकिंग लेनदेन संबंधी जरूरतों का ध्यान रख सकती है। आज के समय में सभी बैंकों के मोबाइल और वेब ऐप उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग करके आप अपने घर पर बैठकर ही विभिन्न गतिविधियाँ कर सकते हैं। लगभग सभी बैंक अपने डिजिटल चैनलों को बढ़ावा दे रहे हैं और उपयोगकर्ताओं को अपने संबंधित डिजिटल बैंकिंग प्लेटफार्मों का यथासंभव उपयोग करने के लिए कह रहे हैं। यदि आप इनमें से किसी ऐप का उपयोग करते समय समस्याओं का सामना करते हैं, तो चैट के साथ-साथ ऑन-कॉल के माध्यम से सहायता उपलब्ध रहती है।

किराने और अन्य दैनिक जरूरत की वस्तुओं के लिए ऑनलाइन ऑर्डर मददगार हो सकते हैं। कई बड़ी सुपरमार्केट चेन या दुकानें ऑनलाइन ऑर्डर देने की सुविधा प्रदान करती हैं और उपलब्ध स्लॉट के आधार पर वे आपके साथ भौतिक संपर्क में आए बिना आपके घर तक आइटम पहुंचा सकती हैं। अमेज़न, बिग बास्केट और इस तरह की कई वेबसाइट्स इस तरह की सुविधाएँ उपलब्ध करवाती हैं। इन तरीकों से आप पूरी सुरक्षा से घर के सामान मंगवा सकते हैं । जितना ही आप चीजें खरीदने के लिए बाहर कम जाएँगे , बीमारी को पकड़ने की संभावना उतनी ही कम होती जाएगी।

ऑनलाइन कक्षाएं और ई-लर्निंग एक और चीज है जो वर्तमान समय में काफी उपयोगी है। इस महामारी के समय में इनकी महत्ता और भी बढ़ गयी है। छात्रों, शिक्षाविदों से लेकर कामकाजी पेशेवरों तक के लिए, कई ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म कक्षाओं का संचालन करने और नई चीजें सीखने के लिए उपयोग किए जा रहे हैं। इन सभी साधनों का उपयोग करने में लोगों को बहुत फायदा हो रहा है। इस तरह से नियमित कक्षाओं में समय की हानि को रोका जा सकता है। इस तरीके से लोग नई चीजें सीख सकते हैं और एक दूसरे का सहयोग भी कर सकते हैं।

यूटिलिटी बिल भुगतान विभिन्न ऐप और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से किये जा सकते हैं। आप बिना किसी चिंता के विभिन्न मोबाइल ऐप का उपयोग करके अपने बिजली के बिल, फोन बिल, गैस कनेक्शन बिल का भुगतान आसानी से कर सकते हैं। कई सरकारी संस्थाएँ ​​डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से भुगतान स्वीकार कर रही हैं। आप गैस प्रदाता वेबसाइट पर कुछ क्लिक करके गैस सिलेंडर बुक कर सकते हैं और ऑनलाइन भुगतान भी कर सकते हैं। अधिकांश भुगतान तुरंत या एक-दो व्यावसायिक दिनों के भीतर परिलक्षित हो सकते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय द्वारा विकसित मोबाइल ऐप आरोग्य सेतु, नागरिकों को कोविद-19 (कोरोनावायरस) के अनुबंध के जोखिम की पहचान करने में मदद करता है। इस ऐप के पहली बार लॉन्च होने के कुछ दिनों के भीतर ही 10 मिलियन से अधिक डाउनलोड हो गए। यह ऐप गूगल प्ले ( एंड्राइड फ़ोन के लिए ) अवं एप्पल ऐप स्टोर ( आई-फ़ोन हेतु ) दोनों पर उपलब्ध है। यह ऐप कुल ११ भाषाओं – १० भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में उपलब्ध है। आरोग्य सेतु को उपयोगकर्ता को उस मामले में सूचित रखने के लिए डिज़ाइन किया गया है यदि उसने किसी ऐसे व्यक्ति के साथ संपर्क किया हो जिसका कोरोना सकारात्मक परीक्षण किया गया है। यह ट्रैकिंग एक ब्लूटूथ और स्थान-जनरेट किए गए सामाजिक ग्राफ़ के माध्यम से की जाती है, जो किसी कोविद-१९ पॉजिटिव संदिग्ध व्यक्ति से आपके संपर्क को दर्शा सकती है।  – मनीष कुमार सिंह

कोरोना संक्रमण और आपदाओं के संकट में आत्मनिर्भर भारत- सामाजिक संस्कृति के परिवर्तित परिप्रेक्ष्य में: रजनी

0

शोध सार

वर्तमान में, दुनिया कोरोना (कोविद -19) महामारी की समस्या से जूझ रही है। जिसके कारण दुनिया के कई देशों को तालाबंदी का आदेश जारी करना पड़ा है। इस ताले के प्रभाव को प्रकृति पर देखें तो वायु शुद्ध, जल शुद्ध, पृथ्वी शुद्ध, आकाश शुद्ध और अग्नि शुद्ध। कहने का आशय यह है कि पूरी दुनिया का पर्यावरण शुद्ध है। प्रकृति प्रदूशण की गुलाम थी। मनुष्य इस लॉक डाउन की स्थिति में स्वतंत्र प्रकृति का आनंद ले रहा है। इतिहास हमेशा हमें जितना हो सके उतना विकसित होने की चेतावनी देता रहा है की विकास से संस्कृति और प्रकृति पर आधात पहुंचाया जा रहा है जो की पतन की ओर मार्ग प्रश स्त करता है। गौतम बुद्ध ने कहा कि वीणा के तार को उतना ही कसो जितना कि मधुर ध्वनि निकलती है। वीणा के तार को इतना तंग करें कि वह टूट जाए। यही है, विकास के तार को उतना ही कस लें जितना आवश्यक हो, अन्यथा विकास के दौरान, विकास के तार टूट जाएंगे।

मुख्य शब्द संस्कृति, लॉकडाउन, प्रकृति, आत्मनिर्भर भारत।

शोध विस्तार

भारत जैसे विशाल  संस्कृतियों भरे देश  को एकता का प्रतीक माना जाता है जिसे कभी प्रश्न  के कटघरे में किसी ने खड़ा करने का प्रयास नहीं किया। यहां कि संस्कृति और परंपरा ही एकता का सबसे बड़ा स्रोत है। इस परंपरा को जो अब तक न हिला सका उसे एक संक्रमण ने हिला कर रख दिया। यह परिस्थिति केवल भारत में ही नहीं अपितु यह पूर्ण विष्व में एक महामारी के रूप में उभरी है जिसका प्रारंभ चीन से होकर भारत तक पहुंचा। जहां इसने भारत की व्यवस्था को जड़ से हिला दिया, इसने आर्थिक व्यवस्था के साथ-साथ राजनीतिक और सामाजिक, धार्मिक व्यवस्था को भी झुकने पर विवश  कर दिया है। इसका सबसे अधिक प्रभाव भारत में मंदिर, मस्जिद, चर्च के साथ लोकप्रिय उत्सव के रूप में मनाएं जाने वालों त्यौंहारों पर भी देखने को मिला जैसे नवरात्रे, हनुमान जयंती, श ब्ब-ए-रात, रोज़े इत्यादि। जिसे सरकार द्वारा दिषा-निर्देषों के उपरांत बंद करने के आदेश  के साथ भक्तों का दौरा करने पर भी पाबंदी लगा दी गयी, कन्या भोजन, ईद पर मिलने को निशिद्ध किया गया।

परंतु इस प्रकार के आदेश  के अंतराल में जनता के द्वारा किए जाने वाले पालन में कुछ ऐसे भी असामाजिक तत्व शामिल  थे जिन्होने अपने धार्मिक प्रकारों को राजनीतिक रंग चढ़ाने का कार्य करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है तब्लीगी जम़ात। 13-15 मार्च को इस समूह द्वारा आयोजित एक धार्मिक सभा ने भारत में सबसे बड़ा कोरोना वायरस फैलाने करने में अहम भूमिका निभाई है, उसी प्रकार जैनो द्वारा भी कुछ परिस्थितियां उत्पन्न की गई, परंतु इस पर सरकार द्वारा निंयत्रण करने के प्रसासों मे काफी सीमा तक सफलता प्राप्त की है।

भारत की प्रकृति, संस्कृति को संरक्षण  प्रदान करने का कार्य इतिहास ने भरपूर किया है, वहीं दार्शनिको ने भी अपने तरीको से समझाने का प्रयत्न किया है- जैसे हॉब्स द्वारा एक कथन में कहा गया कि व्यक्ति पशु  की भांति और स्वार्थी होता है जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को हानि पहुंचा सकता है और वैष्वीकरण के युग की हानि को रूसों ने अपने शब्दों में स्पश्ट किया कि विज्ञान और विवके ने समाज को क्श ति की ओर प्रेरित किया है तो वहीं भारतीय दार्शनिक स्वामी विवेकानंद का वेदों की ओर लौटो की ओर संकेत करते है। यह सभी कथन और विचार आज यर्थाथ प्रतीत होते है इन्हे वर्तमान युग में मान्य देखा जा सकता है जिसका आशय प्रकृति और मानव से लगाया जा सकता है। कहा जाता है की प्रकृति से सब की रचना है जिसमें मानव भी शामिल  है परंतु इसी मानव ने उसी प्रकृति को नष्ट  करने का भरपूर प्रयास किया है। भारतीय दर्शन जो सत्य की खोज के साथ अध्यात्म पर बल देता है वह नैतिकता और कर्मो की भाषा  को भी दर्शाता  है जिसका साक्ष्य वर्तमान युग में आने वाले जैसे कोरोना संक्रमण और उसके साथ में आने वाली आपदाओं के रूप में देखा जा सकता है जो इस बात का साक्ष्य है कि प्रकृति को जो हानि मानव द्वारा पहुंचाई गई है उसकी भरपाई अब प्रकृति स्वयं मानव से ही करने लगी है और यह प्रकृति का संकेत प्रथम बार नहीं है जो मानव को दिया गया है मानव सभ्यता को इस बात पर चेताया भी गया है, इसे तीन रूपों में देखा जा सकता है-

1.         संक्रमण के रूप में- संक्रमण के रूप से आशय जब कोई भी बीमारी कम समय में तीव्र गति से फैलने लगे तो महामारी कहा जाता है इसका प्रारूप प्राकृतिक और निर्मिती के आधार पर देखा जा सकता है और आज इसका रूप कोरोना के रूप में जाना जा रहा है। इस प्रकार के संक्रमण भारत या पूर्ण विश्व में प्रथम सूची में नहीं देखें जा सके यह आज के समय में 114 देषों से अधिक में फैला है जिसे डब्लू. एच. ओ. ने इसे महामारी घोशित किया है, परंतु इसका आगमन पुराने समय से विभन्न रूपों में देखा जा सकता है। महामारियों का अपना ही इतिहास है जिसने 14वीं शताब्दी में यूरोप के 70 प्रतिश त लोगो को प्रभावित कर जान ले ली थी। अंग्रेजी में महामारी के लिए 2 भिन्न श ब्द का प्रयोग होता है- प्रथम बिडेमिक अर्थात वो बिमारी जो किसी एक क्षेत्र या देश  में तीव्र गति से फैले परंतु जैसे ही कोई बीमारी किसी देश  की सीमाओं से बाहर निकलकर दूसरे देश  में फैलने लगती है तो उसे पेनेडेमिक कहा जाता है और यह प्रथम बार नहीं है कि किसी बीमारी को महामारी घोशित किया गया हो। इससे प्रथम वर्ष  2009 में इसे महामारी घोषित किया जा चुका है तब पूर्ण विष्व में 200000 से अधिक लोग स्वाइन फ्लू की चपेट में आने से मारे गए थे। ऐसे ही भारत में स्वाइन फ्लू और कोरोना वायरस से पहले भी तीन महामारियां वर्ष  1940, 1970, 1995 में घोशित की जा चुकी है। 1994 में सितंम्बर के माह में गुजरात के सूरत में प्लेग से एक व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत इस मृत्यु के आकड़ों में वृद्धि हुई और स्वतंत्रता के उपरांत 25 प्रतिश त जनसंख्या ने पलायन किया जिसे स्वतंत्रता के बाद का का सबसे बड़ा पलायन कहा गया। जहां बिहार और उत्तर प्रदेश  की बड़ी संख्या रह रही थी जिसके पलायन से प्लेग अन्य स्थानों पर फैला और गांव के गांव समाप्त हो गए। सत्या्रह की एक रिर्पोट के अनुसार देश  में 108 हजार करोड़ की हानि हुई, लंदन में इण्डिया के प्लेन को ’’प्लेग प्लेन’कहा  गया वहीं ब्रिटिश  समाचार पत्रों में इसे मध्यकालिन श्राप की संज्ञा दी गई। गुजरात के बाद यह अहमदाबाद और हैदराबाद में फैला। प्लेग फैलने का कारण चूहों को बताया गया। 1853 में इसके लिए एक जांच कमीश न नियुक्त किया गया यह 1876,  1898, फैला। वहीं 1940 के दश क में फैला कॉलरा जिसे हैजा कहा जाता है जिसका मुख्य कारण दूषित  जल रहा। जिस पर बाद में 1975 में और 1990 के दशक में टीके के कारण इस पर नियंत्रण पाया गया। 1960 के आस-पास भारत में फैलने वाले चेचक से 18 वी. शताब्दी के प्रारंभ में ही हर वर्ष  4 लाख लोग मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे और 20वी. सदी में विष्व में करोड़ो लोगो की मौत हुई है।

2.         आपदा के रूप में- सूखा, बाढ़, चक्रवाती तूफानों, भूकम्प, भूस्खलन, वनों में लगनेवाली आग, ओलावृष्टि, टिड्डी दल और ज्वालामुखी फटने जैसी विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है, न ही इन्हें रोका जा सकता है, लेकिन इनके प्रभाव को एक सीमा तक कम अवष्य किया जा सकता है, जिससे कि जान-माल की कम से कम हानि हो। यह कार्य तभी किया जा सकता है, जब सक्श म रूप से आपदा प्रबंधन का सहयोग मिले। प्रत्येक वर्ष   प्राकृतिक आपदाओं से अनेक लोगों की मृत्यु हो जाती है। परंतु इन आपदाओं का वर्तमान युग में एक विशेष  स्थान है जिसका कारण कोरोना संक्रमण को कहा जा सकता है इसे कुछ विशेष ज्ञों द्वारा ईष्वर की मानव पर दोहरी मार भी कहा जा रहा है क्योंकि जहां अभी विष्व में कोरोना जैसी बीमारी से सुरक्षा प्राप्त नहीं हुई है कि अन्य प्रकार की घटनाएं अपना प्रकोप दिखाने लगी है-उदाहरणस्वरूप भूकम्प जो भारत में 2 मई और फिर 15 मई और फिर इसकी संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिली। अप्रैल और मई में चिली, मैक्सिको, इंडोनेषिया, कोलंबिया, ग्रीस, जापान, ब्रिटेन, साउथ कोरिया आदि में यह देखने को मिला। इसी प्रकार बिना मौसम के होने वाली निंरतर बारिश  जो मानवता को नष्ट  करने की ओर अग्रसर है जिसका हाल ही में उदाहरणस्वरूप इम्फान और निसर्ग जैसे तूफानों का दस्तक देना तो दूसरी ओर लोक्ट्स टिड्डी का आक्रमण रहा है।

3.         मानव निर्मित संकट- अभी हाल ही में भारत के विषाखापत्ट्नम और साउदी अरब में होने वाला गैस रिसाव, साउदी अरब जैसे कई देषो के कुछ इमारतों में लगने वाली भंयकर आग और भूख तथा लॉकडाउन के चलते लोगो का अपने वाहनों में गति के नियंत्रण में न होने के कारण दुर्घटनाओं का होना और रेल द्वारा लोगो की मृत्यु इत्यादि घटनाओं का होना मानव नियंत्रण में है जिसे रोका जा सकता है, परंतु यह सब राजनीति की चपेट में है।

  1. अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता

वैसे तो समकालीन दुनिया ने 2008 की मंदी का दौर भी देखा था, जब कंपनियां यकसाथ बंद हुईं थीं और एक साथ कई सौ-हजार लोगों को बेरोजगार भी होना पड़ा था। परंतु यह समय उससे भी अधिक खराब हो सकता है। क्योंकि उस समय तो एयर कंडिशन जैसी चीजों पर टैक्स कम हुए थे। तब, सामान की कीमत कम होने पर भी लोग उसे खरीद रहे थे, लेकिन लॉकडाउन में सरकार यदि अपना टैक्स जीरो भी कर दे तो भी उसे कोई खरीदने वाला नहीं है। लिहाजा, विशेष  ज्ञ मौजूदा स्थितियों को सरकार के लिए भी बहुत ही चुनौतीपूर्ण मान रहे हैं। क्योंकि अचानक ही उसके सामने कोरोना त्रासदी से उपजे लॉकडाउन जैसी एक विशाल समस्या आ खड़ी हुई है। यहां यह स्पष्ट कर दें कि 2008 के दौर में तो कुछ कंपनियों को आर्थिक सहायता देकर संभाला गया था। लेकिन, आज यदि सरकार ऋण भी दे तो उसे सभी को देना पड़ेगा। क्योंकि हर सेक्टर में उत्पादन और खरीदारी प्रभावित हुई है। किंतु सरकार सबको लोन देने का जोखिम कितना उठा पाएगी, यह समय बताएगा। बहरहाल, इस बात में कोई दो राय नहीं कि कोरोना वायरस का प्रभाव पूर्ण विष्व पर पड़ा है। चीन-अमेरिका जैसे बड़े देश और मजबूत अर्थव्यवस्थाएं भी इसके सामने लाचार दिखाई दे रहे हैं। इटली-फ्रांस की हालत से सभी वाकिफ ही हैं। इस कोरोना त्रासदी से भारत में विदेशी निवेश के जरिए अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने की कोशिशों को भी बड़ा धक्का पहुंचेगा। क्योंकि जब विदेशी कंपनियों के पास भी पैसा ही नहीं होगा तो वो निवेश में भी रूचि नहीं दिखाएंगी। हालांकि, जानकारों का यह भी कहना है कि अर्थव्यवस्था पर इन स्थितियों का कितना गहरा असर पड़ेगा, यह निकट भविष्य में घटित होने वाली दो बातों पर निर्भर करेगा। पहला तो ये कि आने वाले समय में कोरोना वायरस की समस्या भारत में और कितनी गंभीर होती है, और दूसरा ये कि कब तक इस पर काबू पाया जाता है। अब जो भी हो, लेकिन किसी भी नेतृत्व के लिए यह स्थिति किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। परंतु इस समस्या से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार देश के सामने ‘आत्मनिर्भर भारत’ का खाका पेश किया। सीआईआई की 125वीं सालगिरह पर पीएम मोदी ने कहा कि भारत को फिर से तेज विकास के पथ पर लाने के लिए, और अर्थव्यवस्था संभालने के लिए आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए 5 चीजें बहुत जरूरी हैं. ये हैं- Intent,  Inclusion,  Investment,  Infrastructure, InnovationA इन सभी की झलक लिए गए अब तक सभी निर्णयों में मिल जाएगी। महिलाएं हों, दिव्यांग हों, बुजुर्ग हों, श्रमिक हों, हर किसी को इससे लाभ मिला है। लॉकडाउन के अंतर्गत सरकार ने गरीबों को  8 करोड़ से ज्यादा गैस सिलेंडर उपलब्ध कराए हैं। साथ ही प्रवासी श्रमिकों के लिए भी मुफ्त राशन पहुंचाया जा रहा है। कोरोना के खिलाफ अर्थव्यवस्था को फिर से मजबूत करना, हमारी पहली प्राथमिकता में से एक है। अधिक कमाई के रास्तों को जैसे मदिरा के ठेके, दुकानों, रेस्टरॉन को पुनः प्रारंभ किया गया।

  • सामाजिक व्यवहार और संस्कृति

जिस प्रकार भारत की अर्थव्यवस्था चरमराई है, उसी प्रकार इसका विपरित रूप सामाजिक व्यवहार में संबंधो को लेकर देखने को मिला है उदाहरणस्वरूप विवाह, षोक समारोह, जन्म समाहरोह या अन्य कोई भी पार्टी। इस प्रकार के समारोंह में जहां कोरोना से पूर्व दिखावे के जलसे अधिक देखनें को मिलते थे, लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी, सबसे बड़ी समस्या मध्यमवर्गीय के लिए उत्पन्न होती थी कि उसे अपनी हैसियत से अधिक देने के लिए विवश  होना पड़ता था, फिर भले ही विवाह हो या जन्म का समारोह। परंतु इस कोरोना के काल ने इस प्रकार की दिखावी परंपरा को तोड़ कर रख दिया है जिसका वर्णन हमारे षास्त्र भी नहीं करते। वहीं सबसे बड़ी राहत दहेज प्रथा पर बहुत हद तक रोक देखने को मिली है जिसके कारण कई लोग कर्जे के षिकार होते तो कई षोशण और अत्याचार और घरेलू हिंसा के तो कई आत्महत्या के षिकार होते थे। दहेज प्रथा को जिसे अब तक सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद नियंत्रित न किया जा सका उसे इस कोरोना ने नियंत्रित कर दिया। वहीं सरकार के निर्देषो अनुसार 20 से 50 तक लोगो की संख्या सीमित कर दी गई। वहीं इसने पारिवारिक महत्वता की समझ को बढाया है जहां मनुष्य  अपने फोन, मोबाईल, ऑफिस जैसे कार्य और रोजगार के लिए परिवार से अलग होना महत्वपूर्ण समझता था वहीं आज उसे अपने परिवार तक पहुंचने के लिए प्रयास करना पड़ रहा है। अपने जीवन की चिंता किए बिना अपने परिवार के पास लौटने के लिए ललायित है। सामाजिक जीवन से अत्यंत प्रिय अब परिवार का साथ लगने लगा है। सनातन संस्कृति जो हाथ जोड़कर प्रणाम करना अपनी विरासत समझती थी, वह भी पश्चिम की नकल कर आलिंगन में ही आधुनिक होने की तस्वीर देख रही थी, ऐसे में जब विश्व गुरु कहलाने वाले विभिन्न देश ही हमारी संस्कृति की अनुगामी बनने को तैयार खड़ी हो।

  • आलोचनात्मक मूल्यांकन

21वीं सदी की दुनिया को लॉकडाउन किया गया है। जिस प्रकार प्रकृति खिलकर अपने यौवन को प्रदर्शित कर रही है, उसी प्रकार कोरोना की मार वैश्विक स्तर पर काफी व्यापक है। कोरोना की त्रासदी संग मानव जाति जीने की जीवंतता भी अभिव्यक्त कर रही, वह सुखद पहलू है। इन सब के बीच प्रकृति जैसे-जैसे अपने यौवन का श्रृंगार कर रही, ऐसे में वह कहीं न कहीं मानव समाज से अपने प्रतिशोध की खुशी व्यक्त कर रही है।

आज मनुष्य  घरों में प्रकृति के बंदी है, इंसानी गतिविधियाँ ठप्प हैं। इन सब के बीच आसपास का वातावरण और अन्य जीव-जन्तु कलरव कर यह संदेश दे रहे कि मानव मस्तिश्क भले कोरोना को “चीनी-वायरस” या अन्य नाम देकर अपनी कर्तव्यों से दूर भागने की कोशिश कर लें, लेकिन वास्तव में यह प्रकृति द्वारा ली गयी अंगड़ाई है। परंतु सामाजिक व्यवहार में होने वाले परिवर्तन ने कहीं न कहीं पष्चिमीकरण की ओर भी रूख किया है-जैसे व्यक्तिगत जीवन जीना जो हमारी संस्कृति में हमारे वेदो में नहीं देखने को मिलता। मानव से दूरी बनाए रखना जिसका परिणाम मनुष्य  ने मानवता से भी दूरी बना ली है। सामाजिक दूरी से मानवता से दूरी की ओर उन्मुख हुआ है, पिता, मां, भाई पत्नि की मृत्यु पर सहारा देने के बजाए उनसे मुंह मोड़ने लगे है, वहीं लोगो को भूखमरी, दरिद्रता, और आपदाओं जैसे संकट का सामना करना पड़ रहा है।

  • निष्कर्ष

निष्कर्षतः कहा जा सकता है की कोरोना का संक्रमण न किसी धर्म से समाप्त हो सकता और न ही किसी राजनीति के धृणित खेल से, इसे समाप्त करने हेतु आवष्यकता है कि समाज को हिंदू-मुस्लिम जैसे साम्प्रदायिक श ब्दों में न जकड़कर पुनः एकता के साथ लोकतंत्र को बचाएं रखने का प्रयास करना आवष्यक है जिसे  सरकार के द्वारा दिए गए दिषा-निर्देषो का पालन करने के उपरांत ही प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही इसके नकारात्मक प्रभाव के साथ इसके सकारात्मक प्रभाव देखने को मिले- प्रथम इसने परिवार षैली को अधिक बढ़ावा दिया जहां लोग परिवार से दूर रहने के लिए तत्पर रहते थे वह अब परिवार के पास लौटने के लिए जान की बाजी लगाने को भी तत्पर है। दूसरी ओर इसने वेदों की ओर लौटो जैसे मोदी जी द्वारा दिए गए ’दीये जलाने’ के संदेश  को  जो की ऊर्जा के स्रोत का प्रतीक है, वहीं तीसरा धार्मिक मान्यताएं जो लोगो में थी वह सभी परंपराओं को कोरोना घर पर बंद करके भी समाप्त नहीं कर पाया। नियमित होने वाले कार्यो में सभी कार्यो को भली-भांति संपन्न कि गया, चौथा कार्य कट्टर धार्मिकता को समाप्त कर समाज सेवा की ओर लोगो को अग्रसर होते देखा गया है। वहीं कुछ अस्पतालों और चिकित्सकों के साथ होने वाला दुश्कर्म जिसे मुसलमानों द्वारा जो तब्लीगी जमात से जुड़े हुए थे द्वारा होने वाली घटना जिसके कारण यह आरोंपो के घेरे में आए है उन्हें नकारा नहीं जा सकता।

वहीं इस प्रकार की होने वाली घटनाएं जो प्रकृति की मार के साथ मानव की ही मार मानव को नष्ट  करने पर उतारू है। कोरोना जैसा संक्रमण अपने साथ प्राकृतिक और मानव आपदा दोनो को ही साथ लेकर आया है। जहां प्रकृति ने स्वयं की भरपाई मानवता से करने का प्रयास किया है उदाहरणस्वरूप वर्तमान में होने वाली सभी प्रकार की नदियों का जल षुद्धता में गुणवत्ता को प्राप्त करने में अधिक सफल रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति की वायु में फैली विशैली वायु ने स्वयं को स्वच्छता प्रदान की है। इसी प्रकार अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए गांवों को सशक्त किया जाएँ। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी जाएँ। इससे दो फायदे होंगें- आगामी भविष्य में कभी संकट काल आएगा तो सम्पूर्ण देश एकाएक बन्द नहीं होगा और दूसरा लोगों को अपने आसपास के क्षेत्रों काम मिल पाएगा। चौथी बात हमें ही नहीं सम्पूर्ण विश्व को विकास के साथ प्रकृति के संरक्श ण की बात को हमेशा जेहन में रखनी होगी। इसके अलावा जिस दिन मानव समाज ईमानदारी के साथ पर्यावरण के प्रति वफादारी और शाकाहार के साथ अपने पुरातन संस्कार को आत्मार्पित कर लेगा, कोरोना जैसी विपदा से डरकर घर में छिपने की नौबत नहीं आएगी।

संदर्भ

  • शेख, नोवुल; राबिन, रोनी कैयर्न (10 मार्च 2020)। “द कोरोनावायरस: वैज्ञानिकों ने अब तक क्या सीखा है”। न्यूयॉर्क टाइम्स। 24 मार्च 2020 को लिया गया।
  • रेगन, हेलेन; मित्रा, एशा; गुप्ता, स्वाति (23 मार्च 2020)। “भारत कोरोनोवायरस से लड़ने के लिए लाखों लोगों को बंद कर देता है”। सीएनएन।
  • “कोरोनोवायरस आशंकाओं के बीच भारत में 100 मिलियन से अधिक लोग बंद हैं”। अल जज़ीरा। 23 मार्च 2020।
  • “भारत के कोरोनावायरस लॉकडाउन: यह कैसा दिखता है जब भारत के 1.3 बिलियन लोग घर रहते हैं”। Ndtv.com। 22 फरवरी 2019। 11 अप्रैल 2020 को लिया गया।
  • “17 मई तक लॉकडाउन विस्तारित: क्या खुलेगा, बंद रहेगा”। Livemint। 1 मई 2020. 14 मई 2020 को लिया गया।
  • रे, देवराज; सुब्रमण्यन, एस।; वांडेवेल, लोर (9 अप्रैल 2020)। “भारत का तालाबंदी”। भारत मंच।

रजनी,

शोधार्थी, 

राजनीति विज्ञान विभाग, 

दिल्ली विश्वविद्यालय ,

 ईमेल  riya7116@gmail.com,