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पाठीयता के प्रतिमान- मोहिनी मुरारका

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Book reading

पाठीयता के प्रतिमान


मोहिनी मुरारका
पी-एच.डी.हिंदी (भाषा-प्रौद्योगिकी)
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी
विश्वविद्यालय
, वर्धा
शोध-सारांश
वस्तुतः पाठ एक
संप्रेषणात्मक अभिव्यक्ति है। इस संप्रेषणात्मक अभिव्यक्ति की लिखित इकाई को पाठ
कहा जाता है। पाठभाषाविज्ञान के अनुसार राबर्ट-एलन द ब्यूग्रांड और वुल्फगेंग
ड्रेसलर जैसे भाषाविदों ने किसी लिखित इकाई को पाठ कहने के लिए उसमें सात
प्रतिमानों (संसक्ति
, संगति, सोद्देश्यता,
स्वीकार्यता
, सूचनात्मकता,
स्थित्यात्मकता
, अंतर-पाठीयता) का होना आवश्यक बताया है। अतः
पाठीयता के बोध के लिए इन सात प्रतिमानों का होना आवश्यक है। प्रस्तुत पत्र में पाठीयता
के इन सातों प्रतिमानों की सविस्तार चर्चा की गई है।
प्रस्तावना :
     राबर्ट-एलन द
ब्यूग्रांड और वुल्फगेंग ड्रेसलर जैसे भाषाविदों ने पाठ को संप्रेषणात्मक
प्रस्तुति के रूप में परिभाषित करते हुए
, पाठीयता के लिए आवश्यक सात
प्रतिमानों का उल्लेख किया है। जिनकी कसौटी पर खरा उतरने पर ही कोई भाषिक उक्ति या
उक्ति समुच्चय पाठ संज्ञा से अभिहित किया जा सकता है। ये प्रतिमान
1. संसक्ति (Cohesion) 2. संगति (Coherence) 3. सोद्देश्यता (Intentionality) 4. स्वीकार्यता (Acceptability) 5. सूचनात्मकता (Informativity) 6. स्थित्यात्मकता
(
Situationality) 7. अंतरपाठीयता (Intertextuality) है।
     इन भाषाविदों के
अनुसार किसी पाठ को पाठ कहने के लिए या पाठ की संरचना के लिए इन सात प्रतिमानों का
होना आवश्यक है। अतः इनमें से किसी एक प्रतिमान के न होने पर पाठ में संप्रेषणीयता
नहीं होगी और जब तक किसी पाठ में संप्रेषणीयता नहीं होगी तब तक उसे पाठ नहीं कहा
जा सकता। संक्षेप में पाठीयता के बोध के लिए इन सात प्रतिमानों का होना आवश्यक है।
1. संसक्ति (Cohesion)
पाठीयता
के प्रथम प्रतिमान को संसक्ति कहते हैं। संसक्ति वास्तव में शाब्दिक
एवं व्याकरणिक संजाल है
, जो पाठ के विभिन्न भागों के बीच जुड़ाव एवं अन्य संबंधों को दर्शाती है, साथ ही पाठ के संगठन में सहायक होती है। अन्य शब्दों में संसक्ति का
संबंध उन घटकों से है जिनके आधार पर पाठ के बाह्य स्तर पर प्रयुक्त शब्द परस्पर
संबद्ध होते हैं। बाह्य स्तर पर प्रयुक्त ये शब्द व्याकरणिक नियमों से बंधे होते
हैं
, इसलिए संसक्ति का सीधा संबंध पाठ की व्याकरणिकता से
होता है। बाह्य स्तर पर पाठ जिस व्याकरणिक संरचनाओं द्वारा जुड़ा होता है उन्हीं के
माध्यम से पाठ के अर्थ और प्रयोग को समझा जाता है। अतः कहा जा सकता है कि संसक्ति
ही किसी वाक्य-समुच्चय को पाठ के रूप में निष्पादित करती है और यही बुनावट का मूल
तत्व है।
हैलीडे और हसन
(
1976) ने संसक्ति की युक्तियों को पाँच भागों में विभाजित किया। 1.संदर्भ (Reference) 2.प्रतिस्थापन (Substitution) 3.अध्याहार (Ellipsis) 4.समुच्चयबोधक (Conjunction) 5.शाब्दिक
संसक्ति
(Lexical Cohesion)
2.  संगति (Coherence) – पाठीयता का द्वितीय
प्रतिमान संगति है। इस प्रतिमान के अंतर्गत विभिन्न घटक किस प्रकार परस्पर संबंद्ध
हुए है अथवा होते हैं
, इसका अध्ययन किया जाता है। अर्थात संगति के अंतर्गत आंतरिक धरातल पर
निहित संकल्पनाओं और संबंधों के रूप की परस्पर संबद्धता का अध्ययन किया जाता है।
संसक्ति पाठ के बाह्य संरचनात्मक स्वरूप में परिलक्षित होती है
, जबकि संगति आंतरिक तल का वैशिष्ट्य है। जो बाह्य संरचना में झलकती है।
दूसरे शब्द में जब पाठ में सभी अंश या चरण तार्किक अनुक्रम में एक साथ जुड़े होते
हैं
, तब संगति होती है।
इसी संदर्भ में निम्नलिखित उदाहरण दृष्टव्य हैं-
1. दोनों कड़ी मेहनत
करते थे।
2. बेचारे बैल को भी
रूखा-सूखा ही भूसा मिलता था।
3.
उसके पास एक बैल था।
4.
एक किसान था।
5.फिर भी किसान का गुजारा मुश्किल से चलता था।
6.
पर बैल बड़ा संतोषी था।
    
उपर्युक्त 6 वाक्यों को यदि इसी क्रम
में अनुच्छेदबद्ध कर दे तो यह पाठ नहीं कहलाएगा। क्योंकि इन वाक्यों को
अनुच्छेदबद्ध करने पर न तो इनमें कोई तार्किक संबंध मिलेगा और न ही कोई संसक्ति।
दूसरे शब्दों में ये सभी वाक्य मिलकर किसी संदेश को उद्घाटित करने में असमर्थ
होंगे। किंतु जब इन वाक्यों को भाषा पाठों के पूर्वानुभावों के आधार पर पुनः
व्यक्त किया जाएगा तो यह अनुच्छेद सहजतः निम्नलिखित पाठ के रूप में प्रकट होगा।
जिसमें संसक्ति के साथ ही संगति भी उद्घाटित होगी।
1.
एक किसान था। 2. उसके पास एक बैल था। 3.
दोनों कड़ी मेहनत करते थे। 4. फिर भी किसान का
गुजारा मुश्किल से चलता था।
5. बेचारे बैल को भी रुख-सूखा
भूसा ही मिलता था।
6. पर बैल संतोषी था।
     उपर्युक्त उदाहरण द्वारा
स्पष्ट होता है कि एक समग्र पाठ संबद्धता को प्रदर्शित करता है
तथा अपनी विशेष बनावट और बुनावट द्वारा संपूर्ण लेखन का आधार
होता है साथ ही जो (पाठ-केंद्रित) प्रतिमानों अर्थात संसक्ति एवं संगति को भी
दर्शाता है।
3.  सोद्देश्यता (Intentionality) – सोद्देश्यता पाठीयता का तृतीय प्रतिमान है। वास्तव में पाठ
की संप्रेषणीयता को समझने के लिए प्रयोक्ता केंद्रित अवधारणाओं को समझना भी आवश्यक
होता है। प्रयोक्ता से तात्पर्य यहाँ रचनाकार एवं पाठक दोनों से है
,
क्योंकि रचनाकार किसी विशेष उद्देश्य या अभिप्राय को पाठक तक संप्रेषित करने के
लिए पाठ की रचना करता है
, अर्थात पाठ संरचना के इस तृतीय
प्रतिमान का सीधा संबंध रचनाकार से है। इसमें पाठ के रचयिता का दृष्टिकोण उजागर
होना चाहिए। पाठ रचयिता अपने लक्ष्य या मंतव्य को प्राप्त करने के लिए जो योजना
बनाता है
, उसे यह सोद्देश्यता ही प्राप्त करती है। पाठ की
योजना का उद्देश्य भी यही होता है। इस दृष्टिकोण की प्राप्ति पाठ की बाह्य संरचना
से होती है। वास्तव में सोद्देश्यता रचनाकार के इस दृष्टिकोण पर निर्भर है कि वह
विभिन्न इकाइयों को एक संसक्त एवं संगत पाठ के रूप में प्रस्तुत कर रहा है ताकि वह
रचनाकार के उद्देश्य के अनुरूप सुनियोजित रूप से ज्ञान-संप्रेषण या निश्चित
प्रतिपाद्य को अभिव्यक्त कर सके।
4. स्वीकार्यता
(
Acceptability) –
पाठीयता का चतुर्थ
प्रतिमान स्वीकार्यता है। स्वीकार्यता का संबंध प्राप्तकर्ता की पाठ विषयक
अभिवृत्ति या दृष्टि से है कि वह एक संसक्त और संगत पाठ का वाचन कर रहा है। एक
मातृ भाषाभाषी जिस सीमा तक भाषिक सामग्री को संभव तथा मान्य समझता है उसे
स्वीकार्यता की संज्ञा दी जाती है। वास्तव में किसी कथन की स्वीकार्यता निर्धारित
करने में अनेक जटिलताएँ आती हैं क्योंकि प्रायः मातृभाषियों के स्वीकार्यता संबंधी
निर्णय समान नहीं होते अर्थात इस प्रतिमान के अनुसार पाठ इस तरह से संसक्ति और
संगति से युक्त होना चाहिए कि वह प्राप्तकर्ता/पाठक के लिए उपयोगी और प्रासंगिक
हो। अर्थात जिससे उसे कुछ ज्ञान या निश्चित संदेश प्राप्त हो सके।
5. सूचनात्मकता (Informativity) – सूचनात्मकता पाठात्मकता का पंचम प्रतिमान है। सूचनात्मकता
अर्थात पाठ में कुछ-न-कुछ ऐसा होना चाहिए जो संभावित की तुलना में असंभावित या
ज्ञात के तुलना में अज्ञात को व्यक्त करता हो। दूसरे शब्दों में पाठ में कथित
घटनाएँ प्राप्तकर्ता की आशाओं के कितनी अनुरूप हैं और कितनी अननुरूप
, कितनी
ज्ञात हैं और कितनी अज्ञात
, इन्हीं बिंदुओं पर उसकी
प्रतिक्रिया निर्भर करती है।
     वास्तव में पाठ के
अंतर्गत सूचनाओं के अनुक्रम होते हैं। सूचनात्मकता पाठ के संदेश को उजागर या
विस्तारित करती है। इसमें उम्मीद की जाती है कि पाठ पाठक के लिए नया हो तथा उसमें
कुछ नई जानकारियाँ शामिल हो
, किंतु यह सूचनात्मकता इतनी भी न हो कि
संप्रेषण बाधित हो जाए। अल्पसूचनात्मकता प्राप्तकर्ता में ऊब उत्पन्न कर सकती है
, जिससे वह उसे अस्वीकार भी कर सकता है। इस संदर्भ में ड्रेसलर ने एक अच्छा
उदाहरण दिया है। विज्ञान विषयक कोई पाठ
, यदि निम्नलिखित
वाक्य से प्रारंभ हो-
  
“The
sea is water………”
     तो सुज्ञात सूचना की स्थिति होगी। इस पाठ का
कथ्य/अर्थ इतना ज्ञात है कि कथन की कोई आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती। इसमें पदों
की सन्निधि भी है
, संसक्ति भी है, स्वीकार्यता भी है, किंतु ऐसी कोई सूचना नहीं है, जिसे अज्ञात कहा जा
सके। यही पाठ यदि निम्नलिखित रूप में हो-
“The
sea is water in the sense that water is the dominant substance present.
Actually it is solution of gases and salts in addition to vast number of living
organisms…………”
     तो अतिरिक्त
सूचनाएँ उपलब्ध होती है। संरचना के बाह्य स्तर पर प्रयुक्त
‘Actually’ पद यह सूचित करता है कि समुद्र पानी ही नहीं है,
बल्कि और भी बहुत कुछ है
, अतः सूचनात्मकता का स्तर बढ़ जाता
है।
6. स्थित्यात्मकता (Situationality) – स्थित्यात्मकता पाठीयता के प्रतिमानों में से एक है। इससे
तात्पर्य है कि प्रत्येक पाठ की प्रासंगिकता उस पाठ की प्रस्तुति की स्थिति से
जुड़ी होती है। जैसे ट्रैफिक के निर्देशों
धीरे
चले
’, आगे गतिरोधक है’, हॉर्न बजाना मना है आदि का
सीधा संबंध अलग-अलग स्थितियों से है।
धीरे चले और हॉर्न बजाना मना है
निर्देश किसी विद्यालय या अस्पताल से पहले ही प्रासंगिक होंगे। गतिरोधक से पहले ही
आगे गतिरोधक है निर्देश का औचित्य
होगा। कहने का तात्पर्य है कि प्रत्येक पाठ किसी विशेष स्थिति एवं रूपों में ही
प्रासंगिक होता है
, अन्यथा उस पाठ की पाठीयता संदिग्ध हो
जाती है।
     यदि इन्हीं
ट्रैफिक के निर्देशों को विस्तृत रूप में लिख दिया जाए तो यह पाठ वाहन चालकों के
लिए अर्थहीन एवं अप्रासंगिक हो जाएगा। क्योंकि चलते हुए वाहन की गति एवं सड़क पर
चलने वाले अन्य वाहनों के प्रति सजगता के कारण वाहन चालक केवल संक्षिप्त रूप में
लिखे निर्देशों को ही कम समय में देख पाएगा। इस प्रकार संक्षिप्त ट्रैफिक
निर्देशों की पाठीयता अधिक होगी विस्तृत पाठों की नहीं।
7. अंतरपाठीयता
(
Intertextuality) –
अंतरपाठीयता का सरोकार
पाठ के साथ तब होता है
, जब वह पाठ ज्ञान और समझ की दृष्टि से दूसरे पाठ पर निर्भर करता है, तथा उसे विकसित करने में मदद करता है। उदा. यदि पाठ में कहा जा रहा है कि
उपर्युक्त पाठ के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें, तो नीचे दिए गए सभी प्रश्नों का सीधा संबंध उसके ऊपर दिए गए पाठ के अंश
से होगा। यदि इस पंक्ति उपरोक्त पाठ
। के ऊपर कोई पाठ नहीं दिया गया है तो न इस पंक्ति की कोई प्रासंगिकता
होगी न ही उसके नीचे दिए गए प्रश्नों की। अर्थात किसी कलाकृति या रचना की समीक्षा
किसी तथ्य का खंडन आदि तभी पाठीयता से युक्त होंगे जब प्रापक को इन सभी के मूल की
जानकारी होगी। इस सिद्धांत का प्रयोग साहित्य के अध्ययन के लिए किया जाता है।
साहित्य-पाठों में किसी भी रचे जानेवाले पाठ में पूर्व पाठ या पाठांश का उपयोग
अंतर पाठीयता कहलाता है।
निष्कर्ष :
     पाठीयता के ये सभी
प्रतिमानों द्वारा पाठ संप्रेषणीय होता है तथा इनके अभाव में कोई भी पाठ
संप्रेषणीय नहीं रहता। दूसरे शब्दों में प्रतिमानों के अभाव में पाठ की मूल्यवत्ता
समाप्त हो सकती है। वास्तव में पाठीयता के प्रथम और द्वितीय प्रतिमान संसक्ति और
संगति पाठ-केंद्रित प्रतिमान है
, तथा अन्य सभी प्रतिमान प्रयोक्ता केंद्रित
है। संसक्ति जहाँ संयोजकता को व्याख्यायित करती है। वहीं संगति का संबंध तार्किक
विचार से है। सोद्देश्यता में रचनाकार का दृष्टिकोण उजागर होता है अर्थात जब भी
कोई रचनाकार किसी पाठ की रचना करता है
, तो उसका उद्देश्य होता
है कि वह जिस पाठ की रचना कर रहा है वह पाठ संसक्त तथा संगत हो। इसी प्रकार
स्वीकार्यता का संबंध पाठक अथवा प्राप्तकर्ता से होता है पाठक यह मानकर चलता है कि
जो पाठ वह पढ़ रहा है वह पाठ संसक्त तथा संगत है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि
पाठ में कुछ बातें व्यक्त होती है तथा कुछ बातें अव्यक्त। किंतु पाठक अपने पूर्व
ज्ञान के आधार पर उसे समझ लेता है।
    
संदर्भ 
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पाठालोचन की प्रविधि : समस्याएँ और संभावनाएं विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी

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केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा तथा भारतीय हिन्दी परिषद के तत्त्वावधान में पण्डित जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय, बाँदा में पाठालोचन की प्रविधि : समस्याएँ और संभावनाएं विषय पर डॉ अश्विनीकुमार शुक्ल के संयोजन में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समारम्भ हुआ। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर नन्दकिशोर पांडेय, Nand Kishore Pandeyअध्यक्ष, वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग एवं निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा ने की। इस सत्र में बीज वक्तव्य प्रोफेसर हरिशंकर मिश्र ने दिया, मुख्य आतिथ्य प्रोफेसर राजमणि शर्मा, विशिष्ट आतिथ्य प्रोफेसर योगेंद्रप्रताप सिंह, डॉ कन्हैया सिंह, डॉ रामानन्द शर्मा और प्रोफेसर दयाशंकर शुक्ल ने सुशोभित किया। सत्र का संचालन प्रोफेसर नरेन्द्र मिश्र ने किया। प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर योगेंद्रप्रताप सिंह, प्रोफेसर नरेश मिश्र, प्रोफेसर ललिताम्बा और डॉ कन्हैया सिंह के अध्यक्षमण्डल ने की। इस अवसर पर डॉ. पुनीत बिसारिया, डॉ बृजेश पांडेय, डॉ सियाराम और डॉ मधुसूदन मिश्र ने व्याख्यान दिए। मैने अपने व्याख्यान में पाठालोचन का नाम पाठान्वेषण रखने का सुझाव दिया तथा पाठलोचक के मानक पाठ को ही पाठ्यक्रम में शामिल करने पर ज़ोर दिया। मेरा सुझाव था कि पांडुलिपियों का वंशवृक्ष बनाने तथा प्राचीनता निर्धारण में फॉरेंसिक साइंस की सहायता ली जानी चाहिए। इस सत्र का प्रतिवेदन प्रोफेसर पवन अग्रवाल ने प्रस्तुत किया तथा सफल संचालन डॉ अमरेन्द्र त्रिपाठी ने किया।

पहाड़िया साम्राज्य के आदि विद्रोह एवं बलिदान की समरगाथा: हुल पहाड़िया उपन्यास- विकास पराशर, डॉ विनोद कुमार

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पहाड़िया साम्राज्य के आदि विद्रोह एवं बलिदान की समरगाथा: हुल पहाड़िया उपन्यास

विकास पराशर1 (पी.एच.डी शोधार्थी), 
डॉ विनोद कुमार(निर्देशक)
हिंदी विभाग,
लवली प्रोफैशनल यूनिवर्सिटी, फगवाड़ा, पंजाब

शोध सार

भारत को परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त करवाने में यदि किसी ने योगदान दिया तो वह पहाड़ियां समाज के वीर नायक बाबा तिलकामांझी थे। जिन्होंने अपने अदम्य साहस और शौर्य से ईस्ट इंडिया कंपनी के झंडे को ललकारा और अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों से कंपनी की दमनकारी योजनाओं का विनाश किया।  इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि भारत को स्वतंत्र कराने में समयसमय पर अनेक प्रकार के आंदोलन और विद्रोह हुए। जिन्होंने ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया लेकिन इन सभी आंदोलनों के नायक तो आदि नायक अर्थात् आदिवासी ही थे। हुल पहाड़िया उपन्यास यथार्थ के धरातल को व्यक्त करने वाला एक ऐसा उपन्यास है। जिसमें इतिहास को यथार्थ के धरातल पर पाठकों के समक्ष लेखक ने बड़ी मेहनत के साथ प्रकट किया है।  इतिहास के वीर नायकों को आधुनिक पीढ़ी से रूबरू कराने में कुल पहाड़िया उपन्यास सर्वदा सार्थक सिद्ध हुआ है।

बीज शब्द: आदिवासी, नायक, संघर्ष, आजादी, विद्रोह, उपन्यास

शोध विस्तार

बाहरी शक्तियों द्वारा किसी समाज या समुदाय विशेष की पहचान और अस्मिता के अतिक्रमण तथा उसके विरोध की कड़ियों के दस्तावेजीकरण से इतिहास की श्रंखला का एक बड़ा हिस्सा तैयार होता रहा है। इसके समानांतर एक सच यह भी है कि घुसपैठ और विद्रोह की ना जाने कितनी द्वंद्वात्मक संघर्ष गाथाएँ इतिहास का हिस्सा बनने से रह जाती हैं या फिर जानबूझकर उन्हें इतिहास से बेदखल कर दिया जाता है। भारत के आदि-निवासियों की प्रमुख जनजाति पहाड़िया का स्वतंत्र संघर्ष इतिहास में दर्ज होने से छूट गया या छोड़ दिया गया। भारत को परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त करवाने में यदि किसी ने योगदान दिया तो वह पहाड़ियां समाज के वीर नायक बाबा तिलकामांझी थे। जिन्होंने अपने अदम्य साहस और शौर्य से ईस्ट इंडिया कंपनी के झंडे को ललकारा और अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों से कंपनी की दमनकारी योजनाओं का विनाश किया।  इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि भारत को स्वतंत्र कराने में समय-समय पर अनेक प्रकार के आंदोलन और विद्रोह हुए। जिन्होंने ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया लेकिन इन सभी आंदोलनों के नायक तो आदि नायक अर्थात् आदिवासी ही थे। जिनमें तिलका मांझी (जबरा) का नाम सर्वोपरि है। जो काम सभ्य लोगों ने किया। वही काम इतिहासकारों ने किया। पहाड़िया साम्राज्य के इतिहास को अस्तित्वहीन कर दिया। आदि नायकों की वीर गाथाओं का चित्रण शून्य स्तर पर किया। जिसके कारण लोगों तक उनके शौर्य की गाथाएँ पहुँच नहीं पाई। राकेश कुमार जी इसी बात को उद्घाटित करते हुए। अपने उपन्यास हुल पहाड़िया में लिखते हैं “गुलामों को महिमामंडित कैसे कर सकते थे गोरे? हमारे भारतीय इतिहासकार भी अंग्रेजी की मानसिक दासता से कहां मुक्त हो सके। इनकी आधार सामग्री भी तो वहीं थी। अंग्रेज अफसरों के संस्मरण, डायरियां अंग्रेजों द्वारा तैयार गजेटियर्स।”1 भारत में ऐसे बहुत वीर नायक हुए। जिनकी शौर्य गाथाएं सिर्फ मौखिक रूप में ही रह गई। उन्हें ठोस रूप देने में सदैव इतिहासकारों ने हिचकिचाहट की। जब किसी भी समाज के अस्तित्व, अस्मिता और उनकी स्वतंत्रता में बाहरी हस्तक्षेप होता है तो विद्रोह का नगाड़ा स्वयं ही बजे उठता है। जिसके कारण संघर्ष की उत्पत्ति होती है और जब संघर्ष अपनी चरम सीमा की ओर बढ़ता है तो विद्रोह को जन्म देता है। जो आगे चलकर भीष्म युद्ध की उत्पत्ति करता है। यही हालात पहाड़ियां समाज के थे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने जबरदस्ती उनकी जमीनों को अपने अधिकार में लेना शुरू कर दिया। उनकी स्वतंत्रता को परतंत्रता की जंजीरों में जकड़ना आरम्भ कर। जिसके फलस्वरूप उन्हें तीरों के स्थान पर हथियार उठाने उड़े। “तिलका बाबा को विवश किया था। ईस्ट इंडिया कंपनी की दमनकारी नीतियों ने। कैप्टन ब्रूक, ब्राउन और क्लीवलैंड की अंग्रेज तिकड़ी ने।” 2 साल 1784 में उन्होंने भागलपुर पर हमला किया और 13 जनवरी 1784 में ताड़ के पेड़ पर चढ़कर घोड़े पर सवार अंग्रेज कलेक्टर अगस्टस क्लीवलैंड को अपने जहरीले तीर का निशाना बनाया और मार गिराया। कलेक्टर की मौत से पूरी ब्रिटिश सरकार सदमे में थी।  उन्होंने सपने में कभी सोचा न था कि जंगलों रहने वाला कोई आम आदिवासी ऐसी हिमाकत कर सकता है। जंगल के बेटे ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया और न ही कभी समपर्ण किया और न ही वह अंग्रेजों के प्रहारों से डरे। स्थानीय सूदखोर और ज़मीदारों, अंग्रेज़ी शासकों को जीते जी चैन की नींद सोने नहीं दिया। तिलका मांझी आदिवासियों की स्मृतियों और उनके गीतों में हमेशा जिंदा रहेंगे ना जाने कितने ही आदिवासी लड़ाके के तिलका के गीत गाते हुए फांसी के फंदे पर चढ़ गए। गीतों तथा कविताओं में तिलकामांझी का विभिन्न रूपों में याद किया जाता है।

“तुम पर कोड़ों की बरसात हुई

तुम घोड़ों में बांधकर घसीटे गए

फिर भी तुम्हे मारा नहीं जा सका

तिलका मांझी, मंगल पाण्डेय नहीं

तुम आधुनिक भारत के पहले विद्रोही थे।” 3

पहाड़िया आदिवासी मुगल अफगान और मराठे तीन-तीन आक्रमणकारियों से लड़े थे। उन्होंने अपने पुरखों द्वारा स्थापित राज्यों पर दीकूओं का वर्चस्व कभी स्वीकार नहीं किया। रक्तबीज के वंशधर थे। राजमहल की पहाड़ियां। बार बार हारते थे। पर टूटते नहीं थे। गिर-गिर कर खड़े होने वाले हटी पहाड़िया लोगों का लड़ाका मनोबल अक्षुण्ण रहा था। ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रत्येक षड्यंत्रकारी योजनाओं को मिट्टी में धूमिल कर दिया था तिलका मांझी पहाड़िया साम्राज्य के नायक ने। जो उपन्यास के इस संवाद से स्पष्ट हो जाता है। “ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी सन्न थे। अजब घटित हुआ था। कंपनी का खजाना लूट गया था। दिन-दहाड़े जंगलतराई के क्षेत्र में पहली बार कंपनी के खजाने की लूट हुई थी।” 4 ऐसा नहीं है कि आदिवासियों के राजनीतिक चेतना प्रखर नहीं है। वे विरोध करना जानते ही नहीं, सत्ता पक्ष की हर भाषा को जानते हैं। समझते हैं। उनके हर वास्तविक इरादों का मुकम्मल जवाब भी दे सकते हैं। वे राजनीति में उथल-पुथल भी मचा सकते है। वे अपने क्षेत्र में ही सही लेकिन अंग्रेजों को करारी टक्कर दे रहे थे। औपनिवेशिक युग में जितने विद्रोह आदिवासियों ने किए। उतने भारत की किसी भी जाति ने नहीं किए। इसका कारण था कि औपनिवेशिक सत्ता ने आदिवासियों के जंगल जमीन का वास्तविक आधार ही छीन लिया था।  सबसे ज्यादा विद्रोह झारखंड में हुए और इसमें मुंडा, संथाल, हो तथा भूमिज आदिवासियों ने निर्णयकारी भूमिका अदा की। इनके आंदोलनों में निरंतरता है। जोड़ने वाली कड़ी है। जो समाज सुधार से लेकर राजनीतिक स्वायत्तता तक जाती है। रवि कुमार ने अपनी कविता पुस्तक आदिवासी अभिव्यक्ति में तिलका मांझी और इतिहास के वीर नायकों की गाथा को समाज के समक्ष प्रकट किया है। जिसे सदैव साहित्यकारों ने हाशिये की सीमा से पार नहीं किया।

“दहक उठी थी सन 1774 में

अंग्रेज विरोधी थी वह क्रांति

1824 में तिलका मांझी ने

मार गिराया अंग्रेज कमिश्नर।” 5

हुल पहाड़िया उपन्यास यथार्थ के धरातल को व्यक्त करने वाला एक ऐसा उपन्यास है। जिसमें इतिहास को यथार्थ के धरातल पर पाठकों के समक्ष लेखक ने बड़ी मेहनत के साथ प्रकट किया है।  इतिहास के वीर नायकों को आधुनिक पीढ़ी से रूबरू कराने में कुल पहाड़िया उपन्यास सर्वदा सार्थक सिद्ध हुआ है। ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी थी। धीरे-धीरे व्यापार के साथ-साथ उन्होंने पूरे भारत को अपने साम्राज्य में मिला लिया और पूरे भारत पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। ईस्ट इंडिया कंपनी के राज्य काल में प्रत्येक व्यक्ति को दुख और दरिद्रता के इलावा कुछ हासिल नहीं हुआ। कंपनी ने आदिवासी समाज की रीढ़ की हड्डी को तोड़ डाला। अनेक प्रकार के उन पर प्रतिबंध लगा दिए। जल, ज़मीन, जंगल को उनसे छीन लिया गया और कर, लगान व्यवस्था को लागू कर दिया गया। जिसके कारण स्वतंत्र अस्तित्व वाले पहाड़िया आक्रोशित थे उन्होनें विद्रोही रूपी स्वर में कहाँ, “जंगलतराई में पठान आए। मुगल आए और वह भी गए। किसी बादशाह, राजा, पेशवा या सूबेदार ने कभी भी स्वतंत्र पहाड़िया लोगों से कर नहीं मांगा था।”6 पहाड़िया आदिवासी अब तक स्वतंत्र रहते आए थे। उन्हें अपने ऊपर किसी भी प्रकार का अधिकार स्वीकार्य नहीं था। अपने स्वतंत्र को किसी के सामने गिरवी रखना उन्हें मंजूर नहीं था। स्वच्छंद एवं स्वतंत्र जीवन जीने वाले पहाड़िया को मजबूरी में भी किसानी सीखना मंजूर नहीं था। उन्होंने अंग्रेजों की नीतियों से विद्रोह करने की ठान पकड़ ली थी। सारे पहाड़िया समाज एक ही सपना था। कंपनी से आजादी। तिलका ने हमेशा से ही अपने जंगलों को लूटते और अपने लोगों पर अत्याचार होते देखा था। गरीब आदिवासियों की भूमि खेती, जंगली वृक्षों पर अंग्रेजी शासकों ने कब्जा कर रखा था।  आदिवासी और पर्वती सरदारों की लड़ाई अक्सर अंग्रेजी सत्ता से रहती थी। लेकिन पर्वतीय जमीदार अंग्रेजी सत्ता का साथ देते थे। तिलका मांझी राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए भागलपुर में स्थानीय लोगों को सभा में संबोधित करते थे। जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोगों को देश के लिए एकजुट होने के लिए प्रेरित करते थे। उन्होंने को ज्ञात था कि एकता ही स्वतंत्रता की चाबी है। उपन्यास के एक पात्र दीना ने अपनी एकजुटता को परिचय देते हुए कहा, “बाघ, भालू, हाथी अजगर सबसे लड़े हम। जंगल काटने में कितने पहाड़िया बीत गए। तब जाकर हमने गांव बसाए हैं।  अब अपने दम पर थोड़ी जमीन बनाई तो दूसरों को लगान क्यों दे? खेती किसानी नहीं करते फिर लगान कैसा?7 शोषण उत्पीड़न और विस्थापन जैसी समस्याओं को निरंतर झेलने वाले आदिवासियों की आर्थिक स्थिति बड़ी बदतर है। पहले तो वे प्राकृतिक संसाधनों, खनिजों जड़ी बूटियों, लकड़ियों को बेचकर कुछ न कुछ पैसे अर्जित कर लिया करते थे। लेकिन जब से पूंजीपतियों ने अपने अतिक्षमतावान यंत्रों के द्वारा उनके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना शुरू कर दिया।  तब से यह बेचारे आदिवासी भूमिहीन तथा उत्तरोत्तर कंगाल होते गए। अब उन्हें अपनी रोजमर्रा के जीवन को चलाने के लिए पूर्णतया बाज़ार पर ही निर्भर होना पड़ रहा है। स्वतंत्रता से पहले भी उनकी स्थिति ऐसी थी और आज भी वैसी ही है। आदिवासी साहित्य में हमें विद्रोह की चेतना सर्वाधिक मुखरता के साथ देखने को मिलती है। उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष को अपनी अस्मिता का संघर्ष बना दिया है। आज वे उन ताकतों का मुखर विरोध करती है। जिसने उसकी आत्मा को अपमानित किया है। दिल पर गहरे जख्म दिया है। उनके हर चीजों को छीना है। उनके सपनों को रौंद कर रख दिया है। “उसे अपनी पहचान के संघर्ष को अपने स्वाभिमान से जोड़कर संघर्ष और मूल्यों का पर्याय बना दिया है। उसका साहित्य अपनी कोई या कहीं छीनी गई इज्जत या मर्यादा को अपने मूल्यों में तोल कर अपने शब्दों, प्रतीकों, मिथकों में बाँधने लगा है।”8 आज आदिवासी साहित्य जो केवल लोकसाहित्य तक ही सीमित था आगे निकल गया है और समकालीन साहित्य का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। आदिवासियों के जीवन में मुगलों के आक्रमण और अन्य   बाहरी आक्रमणों से बदलाव शुरू हुआ। किंतु यह बदला बहुत प्रभावशाली नहीं रहे। मुगलों के पश्चात जब अंग्रेजी सत्ता भारत में काबिज हुई तो उन्होंने देखा कि असली धन का भंडार तो आदिवासियों के पास जंगलों में हैं। उन्होंने वन कानून में अपनी मर्जी से संशोधन किया और जंगलों में मार्ग का निर्माण किया और आदिवासियों के जीवन में सड़क मार्ग ने विष घोलने शुरू कर दिया। विद्रोह की ज्वाला भी धीरे-धीरे भड़कने लगी थी आदिवासी भले ही जंगलों में निवास करते है।  लेकिन अपनी अस्मिता और अस्तित्व के लिए मर मिटने को तैयार हो जाते हैं। ब्रिटिश फौजों ने जब पहाड़िया राज्य की सीमा को लांघना शुरू कर दिया तो विद्रोह की ज्वाला ने भी उनकी सहनशीलता की सीमा को पार कर दिया। प्रत्येक पहाड़िया अपने साम्राज्य की अस्मिता के लिए संघर्ष रूपी मशालें  लेकर खड़ा हो गया और सभी ने एकजुट होकर तीर ध्वनि के साथ विजय गीत गाया। “विजयी मशालें जल उठी थीं। रणक्षेत्र बने नाले की रेत पर नाचने लगे थे पहाड़िया। पलटन काटेंगे हम। जैसे हमारे पुरखों ने बाघ काटा था। कम्पनी को काटेंगे हम।” 9 विद्रोह की आग जब जलती है तो दुश्मनों की सीनों को छलनी कर देती है। स्वत्रंता का अहसास उनके अंदर विजय का शंखनाद कर देता है। यह शंखनाद समस्त जन-जीवन को सकारात्मक से भर देता है। असत्य पर सत्य की जीत को प्रकट करता है। तीर और कमान आदिवासी की पहचान रहे हैं। आज यह कलम की शक्ति के रूप में उद्घाटित हो रही है। जैसे-जैसे जागृत और चेतना बढ़ रही है। ज्ञान की रोशनी से जंगलवासी परिचित हो रहे हैं। वैसे-वैसे उन्हें अपने स्तत्व बोध और अस्मिता का ज्ञान होता जा रहा है। जीवन के बुनियादी हकों के लिए वह संगठित हो रहे हैं। भारतीय इतिहास ने प्राचीनकाल से आज तक उनकी पहचान, उनकी अस्मिता को सामने नहीं लाया, अपितु उन्हें राक्षस, दास, दस्यु, किरात, चपटी नाकवाले, कलूटे, चोर, डकैत, जंगली, वनवासी, शराबी, आलसी, अंधविश्वासी आदि हीनत्व बोधक उपाधियाँ देकर उनका उपहास ही किया “अश्वेत लेखिका टोनी माँरिसन कहती है इतिहास जहां मौन होता है। वही साहित्य मुखर होता है। मैं जो कुछ लिखती हूँ। वह साहित्य भी है और इतिहास भी। हम ऐसे देश में रहते हैं। जहाँ अतीत मिटाया जाता है और भविष्य निर्दोष हुआ करता है। 10

निष्कर्ष: देश की स्वतंत्रता के लिए प्राणों की आहुति देने वाले क्रांति के अग्रदूत तिलका मांझी की सशक्त संघर्ष गाथा है पहाड़िया उपन्यास। इतिहासकारों की उपेक्षा का शिकार बाबा तिलका मांझी की समर गाथा को संवेदनशील रचनाकार राकेश कुमार सिंह ने अत्यंत लगन से सरल प्रभावमयी  शैली में ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर नियुक्त किया है। इतिहासकारों में नया मौलिक अधिकार निर्मित करनी की इच्छा जगनी चाहिए। तभी भारत के महान क्रांतिकारियों को इतिहास में अपेक्षाकृत स्थान मिलेगा। महान लेखक राकेश कुमार सिंह ने शौर्य और वीरता की मूर्ति तिलका मांझी की स्मृति को ‘हुल पहाड़िया’ उपन्यास के माध्यम एक मूर्त रूप प्रदान किया जिसे वह जन-जन तक पहुँच पाया ।

 

 

सन्दर्भ सूची

  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 94
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 95
  • https://hindi.thebetterindia.com/11842/tilka-manjhi-was-the-first-indian-freedom-fighter/
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 51
  • रविकुमार गोंड़, ‘आदिवासी अभिव्यक्ति’, दिल्ली: अनंग प्रकाशन, 2015 पृ 29
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 101
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 124
  • डॉ धीरेन्द्र सिंह, ‘प्रतिरोध की संस्कृति और आदिवासी कविता’, नई दिल्ली: अनंग प्रकाशन, 2017 पृ 74
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 130
  • विशाल शर्मा, ‘आदिवासी साहित्य एवं संस्कृति’, नई दिल्ली: स्वराज प्रकाशन, 2014 पृ 74

 

जनकृति के जुलाई 2020 अंक में प्रकाशित

विकास पराशर
शोधार्थी
स्थान: लवली प्रोफ़ैशनल यूनिवर्सिटी, फगवाड़ा (पंजाब)
पता: मकान संख्या 180 अशोक नगर, 
बाज़ार वकीला, होशियारपुर, पंजाब
संपर्क सूत्र: 7986100904
विकास पराशर, पी.एच.डी शोधार्थी
Vikasnk98prashar@gmail.com

पलायन

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उदास बूढ़ी आँखें
इन्तजार करती है
शहर गये बच्चे
लाैटकर नहीं आते।
घर जाे कभी
जीवित थे यहाँ
हाे गये हैं खडंहर
उनकी यादाें मे।
उजड़े हुए खेत
सुन्सान गलियाँ
आैर हर आैर
पसरा हुआ सन्नाटा।
न त्याैहाराे में
न समाराेहाें में
शहर गये बच्चे
लाैटकर नहीं आते।

पल प्रतिपल 86 : आलोचना का समकाल [विनोद शाही, रोहिणी अग्रवाल, विनोद तिवारी और वैभव सिंह पर एकाग्र]

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पल प्रतिपल 86 : आलोचना का समकाल
विनोद शाही, रोहिणी अग्रवाल, विनोद तिवारी और वैभव सिंह पर एकाग्र
एक अरसे से साहित्य की दुनिया में एक शोर सा सुनाई देता रहा है कि हिंदी की अपनी आलोचना कहां है ? कुछ कहते हैं आलोचना साहित्य से पिछड़ गई है और प्रतिवाद में दलील आती है कि रचनात्मक साहित्य उथला हो गया है। आज हमें यह बताने वाला कोई नहीं बचा है कि साहित्य और यथार्थ का रिश्ता कैसा होता है और वह हमारे समय में अलग तरह का कैसे हो गया है। आलोचनाशास्त्र की स्थिति यह हो गयी है कि साहित्य के छात्र जिस शास्त्र को पढ़ कर आते हैं उसका व्यावहारिक रूप उन्हें कहीं दिखाई नहीं देता। रससिद्धांत से लेकर औचित्य तक की सारी धारणाएं एक तरफ पड़ी रह जाती हैं और वे हमें हमारे समय के साहित्य को समझने में कुछ खास मदद करती प्रतीत नहीं होती। यह स्थिति पश्चिम से आये आलोचनाशास्त्र की है। साहित्य को समझने के जो औज़ार पश्चिम ने दिए हैं वे या तो पराये लगते हैं या अपने साहित्य पर आरोपित। ऐसे में किसे चुने किसे छोड़ें यह असमंजस और गहरा होता जा रहा है। बात की जाती है कि पुराने सभी प्रतिमान टूट गए हैं। उम्मीद की जाती है कि नए प्रतिमान आएंगे। हमारा समय प्रतिमानों के टूटने और बनने के बीच का समय है। हमने पल प्रतिपल 86 को इसी संकट से मुख़ातिब होने की सोच के साथ तैयार करना आरम्भ कर दिया है। तीसरी दुनिया के साहित्य की बात वैसे भी हाशिये पर है। उसमें हिंदी साहित्य की स्थिति क्या है यह बताने की जरुरत नहीं। दावे चाहे कितने किये जाएँ पर हकीकत हमारी पीछा करती ही रहती है। साहित्य और आलोचना की आपसदारी के बिना किसी भाषा का साहित्य अपनी ऊंचाई को नहीं पा सकता। हम जानना चाहेंगे कि इस आपसदारी को निर्मित करने के क्या रुकावटें हैं। साहित्य को इतिहास ऊंचाई देता है। आलोचना को विचार और दर्शन तेजस्वी बनाते हैं। हम सब को अपने दायित्व के निर्वाह के लिए एक बड़े फ़लक पर काम करना होगा। हमने सोचा कि शुरआत क्यों न आलोचना से की जाये हालांकि पल प्रतिपल 80 आलोचना पर ही केंद्रित था जिससे हमें प्रेरणा मिली कि आलोचना के समकाल पर भी काम करने की जरुरत है। हमारे आलोचक मित्र अपने काम में जुटे हैं। वे पूरे परम्परा परिदृश्य को खंगाल रहे हैं और हम उनके इस रचनात्मक संघर्ष से उम्मीद लगाए बैठे हैं। अवश्य कुछ तो बचा कर रखने लायक हाथ लगेगा।
आवरण, साजसज्जा और पोस्टर : कुंवर रविंद्र

परिंदे : निर्मल वर्मा

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low angle photography of flock of silhouette of bird illustration
Photo by Mehdi Sepehri on Unsplash

परिंदे : निर्मल वर्मा

अँधेरे गलियारे में चलते हुए लतिका ठिठक गयी। दीवार का सहारा लेकर उसने लैम्प की बत्ती बढ़ा दी। सीढ़ियों पर उसकी छाया एक बैडौल कटी-फटी आकृति खींचने लगी। सात नम्बर कमरे में लड़कियों की बातचीत और हँसी-ठहाकों का स्वर अभी तक आ रहा था। लतिका ने दरवाजा खटखटाया। शोर अचानक बंद हो गया। “कौन है?”

लतिका चुप खड़ी रही। कमरे में कुछ देर तक घुसर-पुसर होती रही, फिर दरवाजे की चिटखनी के खुलने का स्वर आया। लतिका कमरे की देहरी से कुछ आगे बढ़ी, लैम्प की झपकती लौ में लड़कियों के चेहरे सिनेमा के परदे पर ठहरे हुए क्लोजअप की भाँति उभरने लगे। “कमरे में अँधेरा क्यों कर रखा है?” लतिका के स्वर में हल्की-सी झिड़की का आभास था। “लैम्प में तेल ही खत्म हो गया, मैडम!” यह सुधा का कमरा था, इसलिए उसे ही उत्तर देना पड़ा। होस्टल में शायद वह सबसे अधिक लोकप्रिय थी, क्योंकि सदा छुट्टी के समय या रात को डिनर के बाद आस-पास के कमरों में रहनेवाली लड़कियों का जमघट उसी के कमरे में लग जाता था। देर तक गप़-शप, हँसी-मजाक च़लता रहता। “तेल के लिए करीमुद्दीन से क्यों नहीं कहा?” “कितनी बार कहा मैडम, लेकिन उसे याद रहे तब तो।”

कमरे में हँसी की फुहार एक कोने से दूसरे कोने तक फैल गयी। लतिका के कमरे में आने से अनुशासन की जो घुटन घिर आयी थी वह अचानक बह गयी। करीमुद्दीन होस्टल का नौकर था। उसके आलस और काम में टालमटोल करने के किस्से होस्टल की लड़कियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आते थे। लतिका को हठात कुछ स्मरण हो आया। अँधेरे में लैम्प घुमाते हुए चारों ओर निगाहें, दौड़ाईं। कमरे में चारों ओर घेरा बनाकर वे बैठी थीं- पास-पास एक-दूसरे से सटकर। सबके चेहरे परिचित थे, किन्तु लैम्प के पीले मद्धिम प्रकाश में मानो कुछ बदल गया था, या जैसे वह उन्हें पहली बार देख रही थी। “जूली, अब तक तुम इस ब्लाक में क्या कर रही हो?”

जूली खिड़की के पास पलँग के सिरहाने बैठी थी। उसने चुपचाप आँखें नीची कर ली। लैम्प का प्रकाश चारों ओर से सिमटकर अब केवल उसके चेहरे पर गिर रहा था। “नाइट रजिस्टर पर दस्तखत कर दिये?” “हाँ, मैडम।” “फिर…?” लतिका का स्वर कड़ा हो आया। जूली सकुचाकर खिड़की से बाहर देखने लगी। जब से लतिका इस स्कूल में आयी है, उसने अनुभव किया है कि होस्टल के इस नियम का पालन डाँट-फटकार के बावजूद नहीं होता। “मैडम, कल से छुट्टियाँ शुरू हो जायेंगी, इसलिए आज रात हम सबने मिलकर…” और सुधा पूरी बात न कहकर हेमन्ती की ओर देखते हुए मुस्कराने लगी। “हेमन्ती के गाने का प्रोग्राम है, आप भी कुछ देर बैठिए न।”

लतिका को उलझन मालूम हुई। इस समय यहाँ आकर उसने इनके मजे को किरकिरा कर दिया। इस छोटे-से-हिल-स्टेशन पर रहते उसे खासा अर्सा हो गया, लेकिन कब समय पतझड़ और गर्मियों का घेरा पार कर सर्दी की छुट्टियों की गोद में सिमट जाता है, उसे कभी याद नहीं रहता। चोरों की तरह चुपचाप वह देहरी से बाहर को गयी। उसके चेहरे का तनाव ढ़ीला पड़ गया। वह मुस्कराने लगी। “मेरे संग स्नो-फॉल देखने कोई नहीं ठहरेगा?” “मैडम, छुट्टियों में क्या आप घर नहीं जा रही हैं?” सब लड़कियों की आँखे उस पर जम गयीं। “अभी कुछ पक्का नहीं है-आई लव द स्नो-फॉल!”

लतिका को लगा कि यही बात उसने पिछले साल भी कही थी और शायद पिछले से पिछले साल भी। उसे लगा मानों लड़कियाँ उसे सन्देह की दृष्टि से देख रही है, मानों उन्होंने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया। उसका सिर चकराने लगा, मानों बादलों का स्याह झुरमुट किसी अनजाने कोने से उठकर उसे अपने में डुबा लेगा। वह थोड़ा-सा हँसी, फिर धीरे-से उसने सर को झटक दिया। “जूली, तुमसे कुछ काम है, अपने ब्लॉक में जाने से पहले मुझे मिल लेना- वेल गुड नाइट!” लतिका ने अपने पीछे दरवाज़ा बंद कर दिया।

“गुड नाइट मैडम, गुड नाइट, गुड नाइट…” गलियारे की सीढ़ियाँ न उतरकर लतिका रेलिंग के सहारे खड़ी हो गयी। लैंप की बत्ती को नीचे घुमाकर कोने में रख दिया। बाहर धुन्ध की नीली तहें बहुत घनी हो चली थीं। लॉन पर लगे हुए चीड़ के पत्तों की सरसराहट हवा के झोंकों के संग कभी तेज, कभी धीमी होकर भीतर बह आती थी। हवा में सर्दी का हल्का-सा आभास पाकर लतिका के दिमाग में कल से शुरू होनेवाली छुट्टियों का ध्यान भटक आया। उसने आँखें मूँद लीं। उसे लगा कि जैसे उसकी टाँगें बाँस की लकड़ियों की तरह उसके शरीर से बँधी हैं, जिसकी गाँठें धीरे-धीरे खुलती जा रही हैं। सिर की चकराहट अभी मिटी नहीं थी, मगर अब जैसे वह भीतर न होकर बाहर फैली हुई धुन्ध का हिस्सा बन गयी थी।

सीढ़ियों पर बातचीत का स्वर सुनकर लतिका जैसे सोते से जगी। शॉल को कन्धों पर समेटा और लैम्प उठा लिया। डॉ. मुकर्जी मि. ह्यूबर्ट के संग एक अंग्रेजी धुन गुनगुनाते हुए ऊपर आ रहे थे। सीढ़ियों पर अँधेरा था और ह्यूबर्ट को बार-बार अपनी छड़ी से रास्ता टटोलना पड़ता था। लतिका ने दो-चार सीढ़ियाँ उतरकर लैम्प को नीचे झुका दिया। “गुड ईवनिंग डाक्टर, गुड ईवनिंग मि. ह्यूबर्ट!” “थैंक यू मिस लतिका” – ह्यूबर्ट के स्वर में कृतज्ञता का भाव था। सीढ़ियाँ चढ़ने से उनकी साँस तेज हो रही थी और वह दीवार से लगे हुए हाँफ रहे थे। लैम्प की रोशनी में उनके चेहरे का पीलापन कुछ ताँबे के रंग जैसा हो गया था।

“यहाँ अकेली क्या कर रही हो मिस लतिका?” – डाक्टर ने होंठों के भीतर से सीटी बजायी। “चेकिंग करके लौट रही थी। आज इस वक्त ऊपर कैसे आना हुआ मिस्टर ह्यूबर्ट?” ह्यूबर्ट ने मुस्कराकर अपनी छड़ी डाक्टर के कन्धों से छुला दी – “इनसे पूछो, यही मुझे जबर्दस्ती घसीट लाये हैं।”

“मिस लतिका, हम आपको निमन्त्रण देने आ रहे थे। आज रात मेरे कमरे में एक छोटा-सा-कन्सर्ट होगा जिसमें मि. ह्यूबर्ट शोपाँ और चाइकोव्स्की के कम्पोजीशन बजायेंगे और फिर क्रीम कॉफी पी जायेगी। और उसके बाद अगर समय रहा, तो पिछले साल हमने जो गुनाह किये हैं उन्हें हम सब मिलकर कन्फ्रेंस करेंगे।” डाक्टर मुकर्जी के चेहरे पर भारी मुस्कान खेल गयी। “डाक्टर, मुझे माफ करें, मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है।”

“चलिए, यह ठीक रहा। फिर तो आप वैसे भी मेरे पास आतीं।” डाक्टर ने धीरे-से लतिका के कंधों को पकड़कर अपने कमरे की तरफ मोड़ दिया। डाक्टर मुकर्जी का कमरा ब्लॉक के दूसरे सिरे पर छत से जुड़ा हुआ था। वह आधे बर्मी थे, जिसके चिह्न उनकी थोड़ी दबी हुई नाक और छोटी-छोटी चंचल आँखों से स्पष्ट थे। बर्मा पर जापानियों का आक्रमण होने के बाद वह इस छोटे से पहाड़ी शहर में आ बसे थे। प्राइवेट प्रैक्टिस के अलावा वह कान्वेन्ट स्कूल में हाईजीन-फिजियालोजी भी पढ़ाया करते थे और इसलिए उनको स्कूल के होस्टल में ही एक कमरा रहने के लिए दे दिया गया था। कुछ लोगों का कहना था कि बर्मा से आते हुए रास्ते में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी, लेकिन इस सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि डाक्टर स्वयं कभी अपनी पत्नी की चर्चा नहीं करते।

बातों के दौरान डाक्टर अक्सर कहा करते हैं – “मरने से पहले मैं एक दफा बर्मा जरूर जाऊँगा” – और तब एक क्षण के लिए उनकी आँखों में एक नमी-सी छा जाती। लतिका चाहने पर भी उनसे कुछ पूछ नहीं पाती। उसे लगता कि डाक्टर नहीं चाहते कि कोई अतीत के सम्बन्ध में उनसे कुछ भी पूछे या सहानुभूति दिखलाये। दूसरे ही क्षण अपनी गम्भीरता को दूर ठेलते हुए वह हँस पड़ते – एक सूखी, बूझी हुई हँसी।

होम-सिक्नेस ही एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज किसी डाक्टर के पास नहीं है। छत पर मेज-कुर्सियाँ डाल दी गईं और भीतर कमरे में परकोलेटर में कॉफी का पानी चढ़ा दिया गया। “सुना है अगले दो-तीन वर्षों में यहाँ पर बिजली का इन्तजाम हो जायेगा” -डाक्टर ने स्प्रिट लैम्प जलाते हुए कहा। “यह बात तो पिछले दस सालों से सुनने में आ रही है। अंग्रेजों ने भी कोई लम्बी-चौड़ी स्कीम बनायी थी, पता नहीं उसका क्या हुआ” – ह्यूबर्ट ने कहा। वह आराम कुर्सी पर लेटा हुआ बाहर लॉन की ओर देख रहा था।

लतिका कमरे से दो मोमबत्तियाँ ले आयी। मेज के दोनों सिरों पर टिकाकर उन्हें जला दिया गया। छत का अँधेरा मोमबत्ती की फीकी रोशनी के इर्द-गिर्द सिमटने लगा। एक घनी नीरवता चारों ओर घिरने लगी। हवा में चीड़ के वृक्षों की साँय-साँय दूर-दूर तक फैली पहाड़ियों और घाटियों में सीटियों की गूँज-सी छोड़ती जा रही थी। “इस बार शायद बर्फ जल्दी गिरेगी, अभी से हवा में एक सर्द खुश्की-सी महसूस होने लगी है” – डाक्टर का सिगार अँधेरे में लाल बिन्दी-सा चमक रहा था। “पता नहीं, मिस वुड को स्पेशल सर्विस का गोरखधन्धा क्यों पसन्द आता है। छुट्टियों में घर जाने से पहले क्या यह जरूरी है कि लड़कियाँ फादर एल्मण्ड का सर्मन सुनें?” – ह्यूबर्ट ने कहा।

डॉक्टर को फादर एल्मण्ड एक आँख नहीं सुहाते थे। लतिका कुर्सी पर आगे झुककर प्यालों में कॉफी उँडेलने लगी। हर साल स्कूल बन्द होने के दिन यही दो प्रोग्राम होते हैं – चैपल में स्पेशल सर्विस और उसके बाद दिन में पिकनिक। लतिका को पहला साल याद आया जब डाक्टर के संग पिकनिक के बाद वह क्लब गयी थी। डाक्टर बार में बैठै थे। बार रूम कुमाऊँ रेजीमेण्ट के अफसरों से भरा हुआ था। कुछ देर तक बिलियर्ड का खेल देखने के बाद जब वह वापिस बार की ओर आ रहे थे, तब उसने दायीं ओर क्लब की लाइब्रेरी में देखा- मगर उसी समय डाक्टर मुकर्जी पीछे से आ गये थे। मिस लतिका, यह मेजर गिरीश नेगी है।” बिलियर्ड रूम से आते हुए हँसी-ठहाकों के बीच वह नाम दब-सा गया था। वह किसी किताब के बीच में उँगली रखकर लायब्रेरी की खिड़की से बाहर देख रहा था। “हलो डाक्टर” – वह पीछे मुड़ा। तब उस क्षण…

उस क्षण न जाने क्यों लतिका का हाथ काँप गया और कॉफी की कुछ गर्म बूँदें उसकी साड़ी पर छलक आयी। अँधेरे में किसी ने नहीं देखा कि लतिका के चेहरे पर एक उनींदा रीतापन घिर आया है। हवा के झोंके से मोमबत्तियों की लौ फड़कने लगी। छत से भी ऊँची काठगोदाम जानेवाली सड़क पर यू.पी. रोडवेज की आखिरी बस डाक लेकर जा रही थी। बस की हैड लाइट्स में आस-पास फैली हुई झाड़ियों की छायाएँ घर की दीवार पर सरकती हुई गायब होने लगीं।

“मिस लतिका, आप इस साल भी छुट्टियों में यहीं रहेंगी?“डाक्टर ने पूछा। डाक्टर का सवाल हवा में टँगा रहा। उसी क्षण पियानो पर शोपाँ का नोक्टर्न ह्यूबर्ट की उँगलियों के नीचे से फिसलता हुआ धीरे-धीरे छत के अँधेरे में घुलने लगा-मानों जल पर कोमल स्वप्निल उर्मियाँ भँवरों का झिलमिलाता जाल बुनती हुईं दूर-दूर किनारों तक फैलती जा रही हों। लतिका को लगा कि जैसे कहीं बहुत दूर बर्फ की चोटियों से परिन्दों के झुण्ड नीचे अनजान देशों की ओर उड़े जा रहे हैं। इन दिनों अक्सर उसने अपने कमरे की खिड़की से उन्हें देखा है-धागे में बँधे चमकीले लट्टुओं की तरह वे एक लम्बी, टेढ़ी-मेढ़ी कतार में उड़े जाते हैं, पहाड़ों की सुनसान नीरवता से परे, उन विचित्र शहरों की ओर जहाँ शायद वह कभी नहीं जायेगी।

लतिका आर्म चेयर पर ऊँघने लगी। डाक्टर मुकर्जी का सिगार अँधेरे में चुपचाप जल रहा था। डाक्टर को आश्चर्य हुआ कि लतिका न जाने क्या सोच रही है और लतिका सोच रही थी-क्या वह बूढ़ी होती जा रही है? उसके सामने स्कूल की प्रिंसिपल मिस वुड का चेहरा घूम गया-पोपला मुँह, आँखों के नीचे झूलती हुई माँस की थैलियाँ, ज़रा-ज़रा सी बात पर चिढ़ जाना, कर्कश आवाज में चीखना-सब उसे ‘ओल्डमेड’ कहकर पुकारते हैं। कुछ वर्षों बाद वह भी हू-ब-हू वैसी ही बन जायेगी…लतिका के समूचे शरीर में झूरझूरी-सी दौड़ गयी, मानों अनजाने में उसने किसी गलीज वस्तु को छू लिया हो। उसे याद आया कुछ महीने पहले अचानक उसे ह्यूबर्ट का प्रेमपत्र मिला था – भावुक याचना से भरा हुआ पत्र, जिसमें उसने न जाने क्या कुछ लिखा था, जो कभी उसकी समझ में नहीं आया। उसे ह्यूबर्ट की इस बचकाना हरकत पर हँसी आयी थी, किन्तु भीतर-ही-भीतर प्रसन्नता भी हुई थी। उसकी उम्र अभी बीती नहीं है, अब भी वह दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर सकती है। ह्यूबर्ट का पत्र पढ़कर उसे क्रोध नहीं आया, आयी थी केवल ममता। वह चाहती तो उसकी गलतफहमी को दूर करने में देर न लगती, किन्तु कोई शक्ति उसे रोके रहती है, उसके कारण अपने पर विश्वास रहता है, अपने सुख का भ्रम मानो ह्यूबर्ट की गलतफहमी से जुड़ा है…।

ह्यूबर्ट ही क्यों, वह क्या किसी को चाह सकेगी, उस अनुभूति के संग, जो अब नहीं रही, जो छाया-सी उस पर मँडराती रहती है, न स्वयं मिटती है, न उसे मुक्ति दे पाती है। उसे लगा, जैसे बादलों का झुरमुट फिर उसके मस्तिष्क पर धीरे-धीरे छाने लगा है, उसकी टाँगे फिर निर्जीव, शिथिल-सी हो गयी हैं। वह झटके से उठ खड़ी हुई- “डाक्टर माफ करना, मुझे बहुत थकान-सी लग रही है…बिना वाक्य पूरा किये ही वह चली गयी। कुछ देर तक टैरेस पर निस्तब्धता छायी रही। मोमबत्तियाँ बूझने लगी थीं। डाक्टर मुकर्जी ने सिगार का नया कश लिया – “सब लड़कियाँ एक-जैसी होती है-बेवकूफ और सेंटीमेंटल।” ह्यूबर्ट की उँगलियों का दबाव पियानो पर ढीला पड़ता गया, अन्तिम सुरों की झिझकी-सी गूँज कुछ क्षणों तक हवा में तिरती रही।

“डाक्टर, आपको मालूम है, मिस लतिका का व्यवहार पिछले कुछ अर्से से अजीब-सा लगता है।” ह्यूबर्ट के स्वर में लापरवाही का भाव था। वह नहीं चाहता था कि डाक्टर को लतिका के प्रति उसकी भावनाओं का आभास-मात्र भी मिल सके। जिस कोमल अनुभूति को वह इतने समय से सँजोता आया है, डाक्टर उसे हँसी के एक ठहाके में उपहासास्पद बना देगा। “क्या तुम नियति में विश्वास करते हो, ह्यूबर्ट?” डाक्टर ने कहा। ह्यूबर्ट दम रोके प्रतीक्षा करता रहा। वह जानता था कि कोई भी बात कहने से पहले डाक्टर को फिलासोफाइज करने की आदत थी। डाक्टर टैरेस के जंगले से सटकर खड़ा हो गया। फीकी-सी चाँदनी में चीड़ के पेड़ो की छायाएँ लॉन पर गिर रही थी। कभी-कभी कोई जुगनू अँधेरे में हरा प्रकाश छिड़कता हवा में गायब हो जाता था।

“मैं कभी-कभी सोचता हूँ, इन्सान जिन्दा किसलिए रहता है-क्या उसे कोई और बेहतर काम करने को नहीं मिला? हजारों मील अपने मुल्क से दूर मैं यहाँ पड़ा हूँ – यहाँ कौन मुझे जानता है, यहीं शायद मर भी जाऊँगा। ह्यूबर्ट, क्या तुमने कभी महसूस किया है कि एक अजनबी की हैसियत से परायी जमीन पर मर जाना काफ़ी खौफनाक बात है…!”

ह्यूबर्ट विस्मित-सा डाक्टर को देखने लगा। उसने पहली बार डॉक्टर मुकर्जी के इस पहलू को देखा था। अपने सम्बन्ध में वह अक्सर चुप रहते थे। “कोई पीछे नहीं है, यह बात मुझमें एक अजीब किस्म की बेफिक्री पैदा कर देती है। लेकिन कुछ लोगों की मौत अन्त तक पहेली बनी रहती है, शायद वे ज़िन्दगी से बहुत उम्मीद लगाते थे। उसे ट्रैजिक भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आखिरी दम तक उन्हें मरने का एहसास नहीं होता।” “डाक्टर, आप किसका जिक्र कर रहे हैं?” ह्यूबर्ट ने परेशान होकर पूछा। डाक्टर कुछ देर तक चुपचाप सिगार पीता रहा। फिर मुड़कर वह मोमबत्तियों की बुझती हुई लौ को देखने लगा।

“तुम्हें मालूम है, किसी समय लतिका बिला नागा क्लब जाया करती थी। गिरीश नेगी से उसका परिचय वहीं हुआ था। कश्मीर जाने से एक रात पहले उसने मुझे सबकुछ बता दिया था। मैं अब तक लतिका से उस मुलाकात के बारे में कुछ नहीं कह सका हूँ। किन्तु उस रात कौन जानता था कि वह वापस नहीं लौटेगा। और अब…अब क्या फर्क पड़ता है। लेट द डेड। डाई…” डाक्टर की सूखी सर्द हँसी में खोखली-सी शून्यता भरी थी।

“कौन गिरीश नेगी?” “कुमाऊँ रेजीमेंट में कैप्टन था।” “डाक्टर, क्या लतिका…” ह्यूबर्ट से आगे कुछ नहीं कहा गया। उसे याद आया वह पत्र, जो उसने लतिका को भेजा था, कितना अर्थहीन और उपहासास्पद, जैसे उसका एक-एक शब्द उसके दिल को कचोट रहा हो। उसने धीरे-से पियानो पर सिर टिका लिया। लतिका ने उसे क्यों नहीं बताया, क्या वह इसके योग्य भी नहीं था? “लतिका… वह तो बच्ची है, पागल! मरनेवाले के संग खुद थोड़े ही मरा जाता है।“

कुछ देर चुप रहकर डाक्टर ने अपने प्रश्न को फिर दुहराया। “लेकिन ह्यूबर्ट, क्या तुम नियति पर विश्वास करते हो?” हवा के हल्के झोंके से मोमबत्तियाँ एक बार प्रज्जवलित होकर बुझ गयीं। टैरेस पर ह्यूबर्ट और डाक्टर अँधेरे में एक-दूसरे का चेहरा नहीं देख पा रहे थे, फिर भी वे एक-दूसरे की ओर देख रहे थे। कान्वेंट स्कूल से कुछ दूर मैदानों में बहते पहाड़ी नाले का स्वर आ रहा था। अब बहुत देर बाद कुमाऊँ रेजीमेंट सेण्टर का बिगुल सुनायी दिया, तो ह्यूबर्ट हड़बड़ाकर खड़ा हो गया। “अच्छा, चलता हूँ, डाक्टर, गुड नाइट।”

“गुड नाइट ह्यूबर्ट…मुझे माफ करना, मैं सिगार खत्म करके उठूँगा…” सुबह बदली छायी थी। लतिका के खिड़की खोलते ही धुन्ध का गुब्बारा-सा भीतर घुस आया, जैसे रात-भर दीवार के सहारे सरदी में ठिठुरता हुआ वह भीतर आने की प्रतीक्षा कर रहा हो। स्कूल से ऊपर चैपल जानेवाली सड़क बादलों में छिप गयी थी, केवल चैपल का ‘क्रास’ धुन्ध के परदे पर एक-दूसरे को काटती हुई पेंसिल की रेखाओं-सा दिखायी दे जाता था।

लतिका ने खिड़की से आँखें हटाईं, तो देखा कि करीमुद्दीन चाय की ट्रे लिये खड़ा है। करीमुद्दीन मिलिट्री में अर्दली रह चुका था, इसलिए ट्रे मेज पर रखकर ‘अटेन्शन’ की मुद्रा में खड़ा हो गया। लतिका झटके से उठ बैठी। सुबह से आलस करके कितनी बार जागकर वह सो चुकी है। अपनी खिसियाहट मिटाने के लिए लतिका ने कहा – “बड़ी सर्दी है आज, बिस्तर छोड़ने को जी नहीं चाहता।”

“अजी मेम साहब, अभी क्या सरदी आयी है- बड़े दिनों में देखना कैसे दाँत कटकटाते हैं” – और करीमुद्दीन अपने हाथों को बगलों में डाले हुए इस तरह सिकुड़ गया जैसे उन दिनों की कल्पना मात्र से उसे जाड़ा लगना शुरू हो गया हो। गंजे सिर पर दोनों तरफ के उसके बाल खिजाब लगाने से कत्थई रंग के भूरे हो गये थे। बात चाहे किसी विषय पर हो रही हो, वह हमेशा खींचतान कर उसे ऐसे क्षेत्र में घसीट लाता था, जहाँ वह बेझिझक अपने विचारों को प्रकट कर सके।

“एक दफा तो यहाँ लगातार इतनी बर्फ गिरी थी कि भुवाली से लेकर डाक बँगले तक सारी सड़कें जाम हो गईं। इतनी बर्फ थी मेम साहब कि पेड़ों की टहनियाँ तक सिकुड़कर तनों से लिपट गयी थी – बिलकुल ऐसे,” और करीमुद्दीन नीचे झुककर मुर्गा-सा बन गया। “कब की बात है?” लतिका ने पूछा।

“अब यह तो जोड़-हिसाब करके ही पता चलेगा, मेम साहब, लेकिन इतना याद है कि उस वक्त अंग्रेज बहादूर यहीं थे। कण्टोनमेण्ट की इमारत पर कौमी झण्डा नहीं लगा था। बड़े जबर थे ये अंग्रेज, दो घण्टों में ही सारी सड़कें साफ करवा दीं। उन दिनों एक सीटी बजाते ही पचास घोड़ेवाले जमा हो जाते थे। अब तो सारे शेड खाली पड़े हैं। वे लोग अपनी खिदमत भी करवाना जानते थे, अब तो सब उजाड़ हो गया है”। करीमुद्दीन उदास भाव से बाहर देखने लगा। आज यह पहली बार नहीं है जब लतिका करीमुद्दीन से उन दिनों की बातें सुन रही है जब अंग्रेज बहादुर ने इस स्थान को स्वर्ग बना रखा था। “आप छुट्टियों में इस साल भी यही रहेंगी मेम साहब?” “दिखता तो कुछ ऐसा ही है करीमुद्दीन, तुम्हें फिर तंग होना पड़ेगा।” “क्या कहती हैं मेम साहब! आपके रहने से हमारा भी मन लग जाता है, वरना छुट्टियों में तो यहाँ कुत्ते लोटते हैं।”

“तुम जरा मिस्त्री से कह देना कि इस कमरे की छत की मरम्मत कर जाये। पिछले साल बर्फ का पानी दरारों से टपकता रहता था।“ लतिका को याद आया कि पिछली सर्दियों में जब कभी बर्फ गिरती थी, तो उसे पानी से बचने के लिए रात-भर कमरे के कोने में सिमटकर सोना पड़ता था।

करीमुद्दीन चाय की ट्रे उठाता हुआ बोला – “ह्यूबर्ट साहब तो शायद कल ही चले जायें, कल रात उनकी तबीयत फिर खराब हो गयी। आधी रात के वक्त मुझे जगाने आये थे। कहते थे, छाती में तकलीफ है। उन्हें यह मौसम रास नहीं आता। कह रहे थे, लड़कियों की बस में वह भी कल ही चले जायेंगे।” करीमुद्दीन दरवाजा बन्द करके चला गया। लतिका की इच्छा हुई कि वह ह्यूबर्ट के कमरे में जाकर उनकी तबीयत की पूछताछ कर आये। किन्तु फिर न जाने क्यों स्लीपर पैरों में टँगे रहे और वह खिड़की के बाहर बादलों को उड़ता हुआ देखती रही। ह्यूबर्ट का चेहरा जब उसे देखकर सहमा-सा दयनीय हो जाता है, तब लगता है कि वह अपनी मूक-निरीह याचना में उसे कोस रहा है – न वह उसकी गलतफहमी को दूर करने का प्रयत्न कर पाती है, न उसे अपनी विवशता की सफाई देने का साहस होता है उसे लगता है कि इस जाले से बाहर निकलने के लिए वह धागे के जिस सिरे को पकड़ती है वह खुद एक गाँठ बनकर रह जाता है।

बाहर बूँदाबाँदी होने लगी थी, कमरे की टिन की छत खट-खट बोलने लगी। लतिका पलँग से उठ खड़ी हुई। बिस्तर को तहाकर बिछाया। फिर पैरों में स्लीपरों को घसीटते हुए वह बड़े आईने तक आयी और उसके सामने स्टूल पर बैठकर बालों को खोलने लगी। किंतु कुछ देर तक कंघी बालों में ही उलझी रही और वह गुमसुम हो शीशे में अपना चेहरा ताकती रही। करीमुद्दीन को यह कहना याद ही नहीं रहा कि धीरे-धीरे आग जलाने की लकड़ियाँ जमा कर ले। इन दिनों सस्ते दामों पर सूखी लकड़ियाँ मिल जाती हैं। पिछले साल तो कमरा धुएँ से भर जाता था जिसके कारण कँपकँपाते जाड़े में भी उसे खिड़की खोलकर ही सोना पड़ता था।

आईने में लतिका ने अपना चेहरा देखा – वह मुस्कुरा रही थी। पिछले साल अपने कमरे की सीलन और ठण्ड से बचने के लिए कभी-कभी वह मिस वुड के खाली कमरे में चोरी-चुपके सोने चली जाया करती थी। मिस वुड का कमरा बिना आग के भी गर्म रहता था, उनके गदीले सोफे पर लेटते ही आँख लग जाती थी। कमरा छुट्टियों में खाली पड़ा रहता है, किन्तु मिस वुड से इतना नहीं होता कि दो महीनों के लिए उसके हवाले कर जायें। हर साल कमरे में ताला ठोंक जाती हैं वह तो पिछले साल़ गुसलखाने में भीतर की साँकल देना भूल गयी थीं, जिसे लतिका चोर दरवाजे के रूप में इस्तेमाल करती रही थी।

पहले साल अकेले में उसे बड़ा डर-सा लगता था। छुट्टियों में सारे स्कूल और होस्टल के कमरे साँय-साँय करने लगते हैं। डर के मारे उसे जब कभी नींद नहीं आती थी, तब वह करीमुद्दीन को रात में देर तक बातों में उलझाये रखती। बातों में जब खोयी-सी वह सो जाती, तब करीमुद्दीन चुपचाप लैम्प बुझाकर चला जाता। कभी-कभी बीमारी का बहाना करके वह डाक्टर को बुलवा भेजती थी और बाद में बहुत जिद करके दूसरे कमरे में उनका बिस्तर लगवा देती।

लतिका के कंधे से बालों का गुच्छा निकाला और उसे बाहर फेंकने के लिए वह खिड़की के पास आ खड़ी हुई। बाहर छत की ढलान से बारिश के जल की मोटी-सी धार बराबर लॉन पर गिर रही थी। मेघाच्छन्न आकाश में सरकते हुए बादलों के पीछे पहाड़ियों के झुण्ड कभी उभर आते थे, कभी छिप जाते थे, मानो चलती हुई ट्रेन से कोई उन्हें देख रहा हो। लतिका ने खिड़की से सिर बाहर निकाल लिया – हवा के झोंके से उसकी आँखें झिप गयी। उसे जितने काम याद आते हैं, उतना ही आलस घना होता जाता है। बस की सीटें रिजर्व करवाने के लिए चपरासी को रुपये देने हैं जो सामान होस्टल की लड़कियाँ पीछे छोड़े जा रही हैं, उन्हें गोदाम में रखवाना होगा। कभी-कभी तो छोटी क्लास की लड़कियों के साथ पैकिंग करवाने के काम में भी उसे हाथ बँटाना पड़ता था।

वह इन कामों से ऊबती नहीं। धीरे-धीरे सब निपटते जाते हैं, कोई गलती इधर-उधर रह जाती है, सो बाद में सुधर जाती है। हर काम में किचकिच रहती है, परेशानी और दिक्कत होती है, किन्तु देर-सबेर इससे छुटकारा मिल ही जाता है किन्तु जब लड़कियों की आखिरी बस चली जाती है, तब मन उचाट-सा हो जाता है। खाली कॉरीडोर में घूमती हुई वे कभी इस कमरे में जाती हैं और कभी उसमें। वह नहीं जान पातीं कि अपने से क्या करें, दिल कहीं भी नहीं टिक पाता, हमेशा भटका-भटका-सा रहता है।

इस सबके बावजूद जब कोई सहज भाव में पूछ बैठता है, “मिस लतिका, छुट्टियों में आप घर नहीं जा रहीं?” तब वह क्या कहे? डिंग-डांग-डिंग… स्पेशल सर्विस के लिए स्कूल चैपल के घंटे बजने लगे थे। लतिका ने अपना सिर खिड़की के भीतर कर लिया। उसने झटपट साड़ी उतारी और पेटीकोट में ही कन्धे पर तौलिया डाले गुसलखाने में घुस गयी। लेफ्ट-राइट लेफ्ट…लेफ्ट…

कण्टोनमेण्ट जानेवाली पक्की सड़क पर चार-चार की पंक्ति में कुमाऊँ रेजीमेंट के सिपाहियों की एक टुकड़ी मार्च कर रही थी। फौजी बूटों की भारी खुरदरी आवाजें स्कूल चैपल की दीवारों से टकराकर भीतर ‘प्रेयर हाल’ में गूँज रही थीं।

“ब्लेसेड आर द मीक…” फादर एल्मण्ड एक-एक शब्द चबाते हुए खँखारते स्वर में ‘सर्मन आफ द माउण्ट’ पढ़ रहे थे। ईसा मसीह की मूर्ति के नीचे ‘कैण्डलब्रियम’ के दोनों ओर मोमबत्तियाँ जल रही थीं, जिनका प्रकाश आगे बेंचों पर बैठी हुई लड़कियों पर पड़ रहा था। पिछली लाइनों की बैंचें अँधेरे में डूबी हुई थीं, जहाँ लड़कियाँ प्रार्थना की मुद्रा में बैठी हुई सिर झुकाये एक-दूसरे से घुसर-पुसर कर रही थीं। मिस वुड स्कूल सीजन के सफलतापूर्वक समाप्त हो जाने पर विद्यार्थियों और स्टाफ सदस्यों को बधाई का भाषण दे चुकी थीं- और अब फादर के पीछे बैठी हुई अपने में ही कुछ बुड़बुड़ा रही थीं मानो धीरे-धीरे फादर को ‘प्रौम्ट’ कर रही हों।

‘आमीन।’ फादर एल्मण्ड ने बाइबल मेज पर रख दी और ‘प्रेयर बुक’ उठा ली। हॉल की खामोशी क्षण भर के लिए टूट गयी। लड़कियों ने खड़े होते हुए जान-बूझकर बैंचों को पीछे धकेला – बैंचे फर्श पर रगड़ खाकर सीटी बजाती हुई पीछे खिसक गयीं – हॉल के कोने से हँसी फूट पड़ी। मिस वुड का चेहरा तन गया, माथे पर भृकुटियाँ चढ़ गयीं। फिर अचानक निस्तब्धता छा गयी। हॉल के उस घुटे हुए घुँधलके में फादर का तीखा फटा हुआ स्वर सुनायी देने लगा -“जीजस सेड, आई एम द लाइट ऑफ द वर्ल्ड, ही दैट फालोएथ मी शैल नॉट वाक इन डार्कनेस, बट शैल हैव द लाइट ऑफ लाइफ।”

डाक्टर मुखर्जी ने ऊब और उकताहट से भरी जमुहाई ली, “कब यह किस्सा खत्म होगा?” उसने इतने ऊँचे स्वर में लतिका से पूछा कि वह सकुचाकर दूसरी ओर देखने लगी। स्पेशल सर्विस के समय डाक्टर मुकर्जी के होंठों पर व्यंग्यात्मक मुस्कान खेलती रहती और वह धीरे-धीरे अपनी मूँछों को खींचता रहता। फादर एल्मण्ड की वेश-भूषा देखकर लतिका के दिल में गुदगुदी-सी दौड़ गयी। जब वह छोटी थी, तो अक्सर यह बात सेाचकर विस्मित हुआ करती थी कि क्या पादरी लोग सफेद चोगे के नीचे कुछ नहीं पहनते, अगर धोखे से वह ऊपर उठ जाये तो?

लेफ्ट…लेफ्ट…लेफ्ट… मार्च करते हुए फौजी बूट चैपल से दूर होते जा रहे थे-केवल उनकी गूँज हवा में शेष रह गयी थी।

‘हिम नम्बर ११७’फादर ने प्रार्थना-पुस्तक खोलते हुए कहा। हॉल में प्रत्येक लड़की ने डेस्क पर रखी हुई हिम-बुक खोल ली। पन्नों के उलटने की खड़खड़ाहट फिसलती हुई एक सिरे से दूसरे सिरे तक फैल गयी। आगे की बैंच से उठकर ह्यूबर्ट पियानो के सामने स्टूल पर बैठ गया। संगीत शिक्षक होने के कारण हर साल स्पेशल सर्विस के अवसर पर उसे ‘कॉयर’ के संग पियानो बजाना पड़ता था। ह्यूबर्ट ने अपने रूमाल से नाक साफ की। अपनी घबराहट छिपाने के लिए ह्यूबर्ट हमेशा ऐसा ही किया करता था। कनखियों से हॉल की ओर देखते हुए अपने काँपते हाथों से हिम-बुक खोली। लीड काइण्डली लाइट…

पियानो के सुर दबे, झिझकते से मिलने लगे। घने बालों से ढँकी ह्यूबर्ट की लंबी, पीली अँगुलयाँ खुलने-सिमटने लगीं। ‘कॉयर’ में गानेवाली लड़कियों के स्वर एक-दूसरे से गुँथकर कोमल, स्निग्ध लहरों में बिंध गये। लतिका को लगा, उसका जूड़ा ढीला पड़ गया है, मानो गरदन के नीचे झूल रहा है। मिस वुड की आँख बचा लतिका ने चुपचाप बालों में लगे क्लिपों को कसकर खींच दिया। “बड़ा झक्की आदमी है…सुबह मैंने ह्यूबर्ट को यहाँ आने से मना किया था, फिर भी चला आया” – डाक्टर ने कहा।

लतिका को करीमुद्दीन की बात याद हो गयी। रात-भर ह्यूबर्ट को खाँसी का दौरा पड़ा था, कल जाने के लिए कह रहे थे। लतिका ने सिर टेढ़ा करके ह्यूबर्ट के चेहरे की एक झलक पाने की विफल चेष्टा की। इतने पीछे से कुछ भी देख पाना असंभव था, पियानो पर झुका हुआ केवल ह्यूबर्ट का सिर दिखायी देता था।

लीड काइण्डली लाइट, संगीत के सुर मानों एक ऊँची पहाड़ी पर चढ़कर हाँफती हुई साँसों को आकाश की अबाध शून्यता में बिखेरते हुए नीचे उतर रहे हैं। बारिश की मुलायम धूप चैपल के लम्बे-चैकोर शीशों पर झिलमिला रही है, जिसकी एक महीन चमकीली रेखा ईसा मसीह की प्रतिमा पर तिरछी होकर गिर रही है। मोमबत्तियों का धुआँ धूप में नीली-सी लकीर खींचता हुआ हवा में तिरने लगा है। पियानो के क्षणिक ‘पोज’ में लतिका को पत्तों का परिचित मर्मर कहीं दूर अनजानी दिशा से आता हुआ सुनायी दे जाता है। एक क्षण के लिए एक भ्रम हुआ कि चैपल का फीका-सा अँधेरा उस छोटे-से ‘प्रेयर-हॉल’ के चारों कोनों से सिमटता हुआ उसके आस-पास घिर आया है मानों कोई उसकी आँखों पर पट्टी बाँधकर उसे यहाँ तक ले आया हो और अचानक उसकी आँखें खोल दी हों। उसे लगा कि जैसे मोमबत्तियों के धूमिल आलोक में कुछ भी ठोस, वास्तविक न रहा हो-चैपल की छत, दीवारें, डेस्क पर रखा हुआ डाक्टर का सुघड़-सुडौल हाथ और पियानो के सुर अतीत की धुन्ध को भेदते हुए स्वयं उस धुन्ध का भाग बनते जा रहे हों।

एक पगली-सी स्मृति, एक उद्भ्रान्त भावना-चैपल के शीशों के परे पहाड़ी सूखी हवा, हवा में झुकी हुई वीपिंग विलोज की काँपती टहनियाँ, पैरों तले चीड़ के पत्तों की धीमी-सी चिर-परिचित खड़….खड़…। वहीं पर गिरीश एक हाथ में मिलिटरी का खाकी हैट लिये खड़ा है-चौड़े, उठे हुए, सबल कन्धे, अपना सिर वहाँ टिका दो, तो जैसे सिमटकर खो जायेगा, चार्ल्स बोयर, यह नाम उसने रखा था, वह झेंपकर हँसने लगा। “तुम्हें आर्मी में किसने चुन लिया, मेजर बन गये हो, लेकिन लड़कियों से भी गये बीते हो, ज़रा-ज़रा-सी बात पर चेहरा लाल हो जाता है।” यह सब वह कहती नहीं, सिर्फ सोचती भर थी, सोचा था कभी कहूँगी, वह ‘कभी’ कभी नहीं आया, बुरुस का लाल फूल लाये हो न झूठे खाकी कमीज के जिस जेब पर बैज चिपके थे, उसमें से मुसा हुआ बुरुस का फूल निकल आया। छिः सारा मुरझा गया अभी खिला कहाँ है? (हाउ क्लन्जी) उसके बालों में गिरीश का हाथ उलझ रहा है-फूल कहीं टिक नहीं पाता, फिर उसे क्लिप के नीचे फँसाकर उसने कहा- देखो

वह मुड़ी और इससे पहले कि वह कुछ कह पाती, गिरीश ने अपना मिलिटरी का हैट धप से उसके सिर पर रख दिया। वह मन्त्रमुग्ध-सी वैसी ही खड़ी रही। उसके सिर पर गिरीश का हैट है-माथे पर छोटी-सी बिन्दी है। बिन्दी पर उड़ते हुए बाल है। गिरीश ने उस बिन्दी को अपने होंठों से छुआ है, उसने उसके नंगे सिर को अपने दोनों हाथों में समेट लिया है – लतिका

गिरीश ने चिढ़ाते हुए कहा- मैन ईटर आफ कुमाऊँ- (उसका यह नाम गिरीश ने उसे चिढ़ाने के लिए रखा था)… वह हँसने लगी। “लतिका…. सुनो!” गिरीश का स्वर कैसा हो गया था! “ना, मैं कुछ भी नहीं सुन रही।” “लतिका… मैं कुछ महीनों में वापिस लौट आऊँगा” “ना… मैं कुछ भी नहीं सुन रही” किन्तु वह सुन रही है- वह नहीं जो गिरीश कह रहा है, किन्तु वह जो नहीं कहा जा रहा है, जो उसके बाद कभी नहीं कहा गया… लीड काइण्डली लाइट…

लड़कियों का स्वर पियानो के सुरों में डूबा हुआ गिर रहा है, उठ रहा है. .ह्यूबर्ट ने सिर मोड़कर लतिका को निमिष भर देखा, आँखें मूँदे ध्यानमग्ना प्रस्तर मूर्ति-सी वह स्थिर निश्चल खड़ी थी। क्या यह भाव उसके लिए है? क्या लतिका ने ऐसे क्षणों में उसे अपना साथी बनाया है? ह्यूबर्ट ने एक गहरी साँस ली और उस साँस में ढेर-सी थकान उमड़ आयी। “देखो… मिस वुड कुर्सी पर बैठे-बैठे सो रही है” डाक्टर होंठों में ही फुसफुसाया। यह डाक्टर का पुराना मजाक था कि मिस वुड प्रार्थना करने के बहाने आँखे मूँदे हुए नींद की झपकियाँ लेती है।

फादर एल्मण्ड ने कुर्सी पर फैले अपने गाउन को समेट लिया और प्रेयर बुक बंद करके मिस वुड के कानों में कुछ कहा। पियानो का स्वर क्रमशः मन्द पड़ने लगा, ह्यूबर्ट की अँगुलियाँ ढीली पड़ने लगी। सर्विस के समाप्त होने से पूर्व मिस वुड ने आर्डर पढ़कर सुनाया। बारिश होने की आशंका से आज के कार्यक्रम में कुछ आवश्यक परिवर्तन करने पड़े थे। पिकनिक के लिए झूला देवी के मन्दिर जाना सम्भव नहीं हो सकेगा, इसलिए स्कूल से कुछ दूर ‘मीडोज’ में ही सब लड़कियाँ नाश्ते के बाद जमा होंगी। सब लड़कियों को दोपहर का ‘लंच’ होस्टल किचन से ही ले जाना होगा, केवल शाम की चाय ‘मीडोज’ में बनेगी।

पहाड़ों की बारिश का क्या भरोसा? कुछ देर पहले धुआँधार बादल गरज रहे थे, सारा शहर पानी में भीगा ठिठुर रहा था- अब धूप में नहाता नीला आकाश धुन्ध की ओट से बाहर निकलता हुआ फैल रहा था। लतिका ने चैपल से बाहर आते हुए देखा-वीपिंग बिलोज की भीगी शाखाओं से धूप में चमकती हुई बारिश की बूँदे टपक रही थीं, लड़कियाँ चैपल से बाहर निकलकर छोटे-छोटे गुच्छे बनाकर कॉरीडोर में जमा हो गयी हैं, नाश्ते के लिए अभी पौन घण्टा पड़ा था और उनमें से अभी कोई भी लड़की होस्टल जाने के लिए इच्छुक नहीं थी। छुट्टियाँ अभी शुरू नहीं हुई थीं, किन्तु शायद इसीलिए वे इन चन्द बचे-खुचे क्षणों में अनुशासन के भीतर भी मुक्त होने का भरपुर आनन्द उठा लेना चाहती थीं।

मिस वुड को लड़कियों का यह गुल-गपाड़ा अखरा, किन्तु फादर एल्मण्ड के सामने वह उन्हें डाँट-फटकार नहीं सकी। अपनी झुँझलाहट दबाकर वह मुस्कराते हुए बोली- “कल सब चली जायेंगी, सारा स्कूल वीरान हो जायेगा।” फादर एल्मण्ड का लम्बा ओजपूर्ण चेहरा चैपल की घुटी हुई गरमाई से लाल हो उठा था। कॉरीडोर के जंगले पर अपनी छड़ी लटकाकर वह बोले – “छुट्टियों में पीछे हॉस्टल में कौन रहेगा?” “पिछले दो-तीन सालों से मिस लतिका ही रह रही हैं।” “और डाक्टर मुकर्जी छुट्टियों में कहीं नहीं जाते?” “डाक्टर तो सर्दी-गर्मी यहीं रहते हैं।” मिस वुड ने विस्मय से फादर की ओर देखा। वह समझ नहीं सकी कि फादर ने डाक्टर का प्रसंग क्यों छेड़ दिया है!

“डाक्टर मुकर्जी छुट्टियों में कहीं नहीं जाते?” “दो महीने की छुट्टियों में बर्मा जाना काफी कठिन है, फादर!” – मिस वुड हँसने लगी।

“मिस वुड, पता नहीं आप क्या सोचती हैं। मुझे तो मिस लतिका का होस्टल में अकेले रहना कुछ समझ में नहीं आता।” “लेकिन फादर,” मिस वुड ने कहा, “यह तो कान्वेन्ट स्कूल का नियम है कि कोई भी टीचर छुट्टियों में अपने खर्चे पर होस्टल में रह सकते हैं।” “मैं फिलहाल स्कूल के नियमों की बात नहीं कर रहा। मिस लतिका डाक्टर के संग यहाँ अकेली ही रह जायेंगी और सच पूछिए मिस वुड, डाक्टर के बारे में मेरी राय कुछ बहुत अच्छी नहीं है।” “फादर, आप कैसी बात कर रहे हैं? मिस लतिका बच्चा थोड़े ही है।” मिस वुड को ऐसी आशा नहीं थी कि फादर एल्मण्ड अपने दिल में ऐसी दकियानूसी भावना को स्थान देंगे।

फादर एल्मण्ड कुछ हतप्रभ-से हो गये, बात पलटते हुए बोले- “मिस वुड, मेरा मतलब यह नहीं था। आप तो जानती हैं, मिस लतिका और उस मिलिटरी अफसर को लेकर एक अच्छा-खासा स्कैण्डल बन गया था, स्कूल की बदनामी होने में क्या देर लगती है” “वह बेचारा तो अब नहीं रहा। मैं उसे जानती थी फादर! ईश्वर उसकी आत्मा को शान्ति दे।” मिस वुड ने धीरे-से अपनी दोनों बाँहों से क्रास किया।

फादर एल्मण्ड को मिस वुड की मुर्खता पर इतना अधिक क्षोभ हुआ कि उनसे आगे और कुछ नहीं बोला गया। डाक्टर मुकर्जी से उनकी कभी नहीं पटती थी, इसलिए मिस वुड की आँखों में वह डाक्टर को नीचा दिखाना चाहते थे। किन्तु मिस वुड लतिका का रोना ले बैठी। आगे बात बढ़ाना व्यर्थ था। उन्होंने छड़ी को जंगले से उठाया और ऊपर साफ खुले आकाश को देखते हुए बोले- “प्रोग्राम आपने यूँ ही बदला, मिस वुड, अब क्या बारिश होगी।”

ह्यूबर्ट जब चैपल से बाहर निकला तो उसकी आँखें चकाचैंध-सी हो गईं। उसे लगा जैसे किसी ने अचानक ढेर-सी चमकीली उबलती हुई रोशनी मुट्ठी में भरकर उसकी आँखों में झोंक दी हो। पियानो के संगीत के सुर रुई के छुई-मुई रेशों की भाँति अब तक उसके मस्तिष्क की थकी-माँदी नसों पर फड़फड़ा रहे थे। वह काफी थक गया था। पियानो बजाने से उसके फेफड़ों पर हमेशा भारी दबाव पड़ता, दिल की धड़कन तेज हो जाती थी। उसे लगता था कि संगीत के एक नोट को दूसरे नोट में उतारने के प्रयत्न में वह एक अँधेरी खाई पार कर रहा है।

आज चैपल में मैंने जो महसूस किया, वह कितना रहस्यमय, कितना विचित्र था, ह्यूबर्ट ने सोचा। मुझे लगा, पियानो का हर नोट चिरन्तन खामोशी की अँधेरी खोह से निकलकर बाहर फैली नीली धुन्ध को काटता, तराशता हुआ एक भूला-सा अर्थ खींच लाता है। गिरता हुआ हर ‘पोज’ एक छोटी-सी मौत है, मानो घने छायादार वृक्षों की काँपती छायाओं में कोई पगडण्डी गुम हो गयी हो, एक छोटी-सी मौत जो आनेवाले सुरों को अपनी बची-खुची गूँजों की साँसे समर्पित कर जाती है, जो मर जाती है, किन्तु मिट नहीं पाती, मिटती नहीं इसलिए मरकर भी जीवित है, दूसरे सुरों में लय हो जाती है।

“डाक्टर, क्या मृत्यु ऐसे ही आती है?” अगर मैं डाक्टर से पूछूँ तो वह हँसकर टाल देगा। मुझे लगता है, वह पिछले कुछ दिनों से कोई बात छिपा रहा है- उसकी हँसी में जो सहानुभूति का भाव होता है, वह मुझे अच्छा नहीं लगता। आज उसने मुझे स्पेशल सर्विस में आने से रोका था – कारण पूछने पर वह चुप रहा था। कौन-सी ऐसी बात है, जिसे मुझसे कहने में डाक्टर कतराता है। शायद मैं शक्की मिजाज होता जा रहा हूँ, और बात कुछ भी नहीं है।

ह्यूबर्ट ने देखा, लड़कियों की कतार स्कूल से होस्टल जानेवाली सड़क पर नीचे उतरती जा रही है। उजली धूप में उनके रंग-बिरंगे रिबन, हल्की आसमानी रंग की फ्रॉकें और सफेद पेटियाँ चमक रही हैं। सीनियर कैम्ब्रिज की कुछ लड़कियों ने चैपल की वाटिका के गुलाब के फूलों को तोड़कर अपने बालों में लगा लिया है कण्टोनमेण्ट के तीन-चार सिपाही लड़कियों को देखते हुए अश्लील मजाक करते हुए हँस रहे हैं और कभी-कभी किसी लड़की की ओर ज़रा झुककर सीटी बजाने लगते हैं।

“हलो मि. ह्यूबर्ट!” ह्यूबर्ट ने चैंककर पीछे देखा। लतिका एक मोटा-सा रजिस्टर बगल में दबाये खड़ी थी। “आप अभी यहीं हैं?” ह्यूबर्ट की दृष्टि लतिका पर टिकी रही। वह क्रीम रंग की पूरी बाँहों की ऊनी जैकट पहने हुई थी। कुमाऊँनी लड़कियों की तरह लतिका का चेहरा गोल था, धूप की तपन से पका गेहुँआ रंग कहीं-कहीं हल्का-सा गुलाबी हो आया था, मानों बहुत धोने पर भी गुलाल के कुछ धब्बे इधर-उधर बिखरे रह गये हों। “उन लड़कियों के नाम नोट करने थे, जो कल जा रही हैं सो पीछे रुकना पड़ा। आप भी तो कल जा रहे हैं मि. ह्यूबर्ट?” “अभी तक तो यही इरादा है। यहाँ रुककर भी क्या करूँगा। आप स्कूल की ओर जा रही हैं?“ “चलिए”
पक्की सड़क पर लड़कियों की भीड़ जमा थी, इसलिए वे दोनों पोलो ग्राउण्ड का चक्कर काटती हुई पगडण्डी से नीचे उतरने लगे। हवा तेज हो चली। चीड़ के पत्ते हर झोंके के संग टूट-टूटकर पगडण्डी पर ढेर लगाते जाते थे। ह्यूबर्ट रास्ता बनाने के लिए अपनी छड़ी से उन्हें बुहारकर दोनों ओर बिखेर देता था। लतिका पीछे खड़ी हुई देखती रहती थी। अल्मोड़ा की ओर से आते हुए छोटे-छोटे बादल रेशमी रूमालों से उड़ते हुए सूरज के मुँह पर लिपटे से जाते थे, फिर हवा में बह निकलते थे। इस खेल में धूप कभी मन्द, फीकी-सी पड़ जाती थी, कभी अपना उजला आँचल खोलकर समूचे शहर को अपने में समेट लेती थी।

लतिका तनिक आगे निकल गयी। ह्यूबर्ट की साँस चढ़ गयी थी और वह धीरे-धीरे हाँफता हुआ पीछे से आ रहा था। जब वे पोलोग्राउण्ड के पवेलियन को छोड़कर सिमिट्री के दायीं और मुडे, तो लतिका ह्यूबर्ट की प्रतीक्षा करने के लिए खड़ी हो गयी। उसे याद आया, छुट्टियों के दिनों में जब कभी कमरे में अकेले बैठे-बैठे उसका मन ऊब जाता था, तो वह अक्सर टहलते हुए सिमिट्री तक चली जाती थी। उससे सटी पहाड़ी पर चढ़कर वह बर्फ में ढँके देवदार वृक्षों को देखा करती थी। जिनकी झुकी हुई शाखों से रुई के गोलों-सी बर्फ नीचे गिरा करती थी, नीचे बाजार जानेवाली सड़क पर बच्चे स्लेज पर फिसला करते थे। वह खड़ी-खड़ी बर्फ में छिपी हुई उस सड़क का अनुमान लगाया करती थी जो फादर एल्मण्ड के घर से गुजरती हुई मिलिटरी अस्पताल और डाकघर से होकर चर्च की सीढ़ियों तक जाकर गुम हो जाती थी। जो मनोरंजन एक दुर्गम पहेली को सुलझाने में होता है, वही लतिका को बर्फ में खोये रास्तों को खोज निकालने में होता था।

“आप बहुत तेज चलती हैं, मिस लतिका” – थकान से ह्यूबर्ट का चेहरा कुम्हला गया था। माथे पर पसीने की बूँदे छलक आयी थीं। “कल रात आपकी तबियत क्या कुछ खराब हो गयी थी?” “आपने कैसे जाना? क्या मैं अस्वस्थ दीख रहा हूँ?” ह्यूबर्ट के स्वर में हलकी-सी खीज का आभास था। सब लोग मेरी सेहत को लेकर क्यों बात शुरू करते हैं, उसने सोचा। “नहीं, मुझे तो पता भी नहीं चलता, वह तो सुबह करीमुद्दीन ने बातों-ही-बातों में जिक्र छेड़ दिया था।” लतिका कुछ अप्रतिभ-सी हो आयी। “कोई खास बात नहीं, वही पुराना दर्द शुरू हो गया था, अब बिल्कुल ठीक है।” अपने कथन की पुष्टि के लिए ह्यूबर्ट छाती सीधी करके तेज कदम बढ़ाने लगा। “डाक्टर मुकर्जी को दिखलाया था?” “वह सुबह आये थे। उनकी बात कुछ समझ में नहीं आती। हमेशा दो बातें एक-दूसरे से उल्टी कहते हैं। कहते थे कि इस बार मुझे छह-सात महीने की छुट्टी लेकर आराम करना चाहिए, लेकिन अगर मैं ठीक हूँ, तो भला इसकी क्या जरूरत है?”

ह्यूबर्ट के स्वर में व्यथा की छाया लतिका से छिपी न रह सकी। बात को टालते हुए उसने कहा – “आप तो नाहक चिन्ता करते हैं, मि. ह्यूबर्ट! आजकल मौसम बदल रहा है, अच्छे भले आदमी तक बीमार हो जाते हैं।” ह्यूबर्ट का चेहरा प्रसन्नता से दमकने लगा। उसने लतिका को ध्यान से देखा। वह अपने दिल का संशय मिटाने के लिए निश्चिन्त हो जाना चाहता था कि कहीं लतिका उसे केवल दिलासा देने के लिए ही तो झूठ नहीं बोल रही। “यही तो मैं सोच रहा था, मिस लतिका! डाक्टर की सलाह सुनकर मैं डर ही गया। भला छह महीने की छुट्टी लेकर मैं अकेला क्या करूँगा। स्कूल में तो बच्चों के संग मन लगा रहता है। सच पूछो तो दिल्ली में ये दो महीनों की छुट्टियाँ काटना भी दूभर हो जाता है।”

“मि. ह्यूबर्ट….कल आप दिल्ली जा रहे हैं?” लतिका चलते-चलते हठात् ठिठक गयी। सामने पोलो-ग्राउण्ड फैला था, जिसके दूसरी ओर मिलिटरी की ट्रकें कण्टोनमेण्ट की ओर जा रही थीं। ह्यूबर्ट को लगा, जैसे लतिका की आँखें अधमुँदी-सी खुली रह गयी हैं, मानों पलकों पर एक पुराना भूला-सा सपना सरक आया है।

“मि.ह्यूबर्ट…आप दिल्ली जा रहे हैं,” इस बार लतिका ने प्रश्न नहीं दुहराया उसके स्वर में केवल एक असीम दूरी का भाव घिर आया। “बहुत अर्सा पहले मैं भी दिल्ली गयी थी, मि. ह्यूबर्ट! तब मैं बहुत छोटी थी, न जाने कितने बरस बीत गये। हमारी मौसी का ब्याह वहीं हुआ था। बहुत-सी चीजें देखी थीं, लेकिन अब तो सब कुछ धुँधला-सा पड़ गया है। इतना याद है कि हम कुतुब पर चढ़े थे। सबसे ऊँची मंजिल से हमने नीचे झाँका था, न जाने कैसा लगा था। नीचे चलते हुए आदमी चाभी भरे हुए खिलौनों-से लगते थे। हमने ऊपर से उन पर मूँगफलियाँ फेंकी थीं, लेकिन हम बहुत निराश हुए थे क्योंकि उनमें से किसी ने हमारी तरफ नहीं देखा। शायद माँ ने मुझे डाँटा था, और मैं सिर्फ नीचे झाँकते हुए डर गयी थी। सुना है, अब तो दिल्ली इतना बदल गया है कि पहचाना नहीं जाता”

वे दोनों फिर चलने लगे। हवा का वेग ढीला पड़ने लगा। उड़ते हुए बादल अब सुस्ताने से लगे थे, उनकी छायाएँ नन्दा देवी और पंचचूली की पहाड़ियों पर गिर रही थीं। स्कूल के पास पहुँचते-पहुँचते चीड़ के पेड़ पीछे छूट गये, कहीं-कहीं खुबानी के पेड़ों के आस-पास बुरुस के लाल फूल धूप में चमक जाते थे। स्कूल तक आने में उन्होंने पोलोग्राउण्ड का लम्बा चक्कर लगा लिया था। “मिस लतिका, आप कहीं छुट्टियों में जाती क्यों नहीं, सर्दियों में तो यहाँ सब कुछ वीरान हो जाता होगा?”

“अब मुझे यहाँ अच्छा लगता है,” लतिका ने कहा, “पहले साल अकेलापन कुछ अखरा था, अब आदी हो चुकी हूँ। क्रिसमस से एक रात पहले क्लब में डान्स होता है, लाटरी डाली जाती है और रात को देर तक नाच-गाना होता रहता है। नये साल के दिन कुमाऊँ रेजीमेण्ट की ओर से परेड-ग्राउण्ड में कार्नीवाल किया जाता है, बर्फ पर स्केटिंग होती है, रंग-बिरंगे गुब्बारों के नीचे फौजी बैण्ड बजता है, फौजी अफसर फैन्सी ड्रेस में भाग लेते हैं, हर साल ऐसा ही होता है, मि. ह्यूबर्ट। फिर कुछ दिनों बाद विण्टर स्पोट्र्स के लिए अंग्रेज टूरिस्ट आते हैं। हर साल मैं उनसे परिचित होती हूँ, वापिस लौटते हुए वे हमेशा वादा करते हैं कि अगले साल भी आयेंगे, पर मैं जानती हूँ कि वे नहीं आयेंगे, वे भी जानते हैं कि वे नहीं आयेंगे, फिर भी हमारी दोस्ती में कोई अंतर नहीं पड़ता। फिर…फिर कुछ दिनों बाद पहाड़ों पर बर्फ पिघलने लगती है, छुट्टियाँ खत्म होने लगती हैं, आप सब लोग अपने-अपने घरों से वापिस लौट आते हैं – और मि. ह्यूबर्ट पता भी नहीं चलता कि छुट्टियाँ कब शुरू हुई थीं, कब खत्म हो गईं”

लतिका ने देखा कि ह्यूबर्ट उसकी ओर आतंकित भयाकुल दृष्टि से देख रहा है। वह सिटपिटाकर चुप हो गयी। उसे लगा, मानों वह इतनी देर से पागल-सी अनर्गल प्रलाप कर रही हो। “मुझे माफ करना मि. ह्यूबर्ट, कभी-कभी मैं बच्चों की तरह बातों में बहक जाती हूँ।” “मिस लतिका…” ह्यूबर्ट ने धीरे-से कहा। वह चलते-चलते रुक गया था। लतिका ह्यूबर्ट के भारी स्वर से चौंक-सी गयी। “क्या बात है मि. ह्यूबर्ट?” “वह पत्र उसके लिए मैं लज्जित हूँ। उसे आप वापिस लौटा दें, समझ लें कि मैंने उसे कभी नहीं लिखा था।”

लतिका कुछ समझ न सकी, दिग्भ्रान्त-सी खड़ी हुई ह्यूबर्ट के पीले उद्धिग्न चेहरे को देखती रही। ह्यूबर्ट ने धीरे-से लतिका के कन्धे पर हाथ रख दिया। “कल डाक्टर ने मुझे सबकुछ बता दिया। अगर मुझे पहले से मालूम होता तो…तो” ह्यूबर्ट हकलाने लगा। “मि. ह्यूबर्ट…” किन्तु लतिका से आगे कुछ भी नहीं कहा गया। उसका चेहरा सफेद हो गया था।

दोनों चुपचाप कुछ देर तक स्कूल के गेट के बाहर खड़े रहे। मीडोज…पगडण्डियों, पत्तों, छायाओं से घिरा छोटा-सा द्वीप, मानों कोई घोंसला दो हरी घाटियों के बीच आ दबा हो। भीतर घूसते ही पिकनिक के काले आग से झुलसे हुए पत्थर, अधजली टहनियाँ, बैठने के लिए बिछाये गये पुराने अखबारों के टुकड़े इधर-उधर बिखरे हुए दिखायी दे जाते हैं। अक्सर टूरिस्ट पिकनिक के लिए यहाँ आते हैं। मीडोज को बीच में काटता हुआ टेढ़ा-मेढ़ा बरसाती नाला बहता है, जो दूर से धूप में चमकता हुआ सफेद रिबन-सा दिखायी देता है।

यहीं पर काठ के तख्तों का बना हुआ टूटा-सा पुल है, जिस पर लड़कियाँ हिचकोले खाते हुए चल रही हैं।

“डाक्टर मुकर्जी, आप तो सारा जंगल जला देंगे”। मिस वुड ने अपनी ऊँची एड़ी के सैण्डल से जलती हुई दियासलाई को दबा डाला, जो डाक्टर ने सिगार सुलगाकर चीड़ के पत्तों के ढेर पर फेंक दी थी। वे नाले से कुछ दूर हटकर चीड़ के दो पेड़ों से गुँथी हुई छाया के नीचे बैठे थे। उनके सामने एक छोटा-सा रास्ता नीचे पहाड़ी गाँव की ओर जाता था, जहाँ पहाड़ की गोद में शकरपारों के खेत एक-दूसरे के नीचे बिछे हुए थे। दोपहर के सन्नाटे में भेड़-बकरियों के गलों में बँधी हुई धण्टियों का स्वर हवा में बहता हुआ सुनायी दे जाता था। घास पर लेटे-लेटे डाक्टर सिगार पीते रहे। “जंगल की आग कभी देखी है, मिस वुड…एक अलमस्त नशे की तरह धीरे-धीरे फैलती जाती है।”

“आपने कभी देखी है डाक्टर?” मिस वुड ने पूछा, “मुझे तो बड़ा डर लगता है।”

“बहुत साल पहले शहरों को जलते हुए देखा था।” डाक्टर लेटे हुए आकाश की ओर ताक रहे थे। “एक-एक मकान” ताश के पत्तों की तरह गिरता जाता। दुर्भाग्यवश ऐसे अवसर देखने में बहुत कम आते हैं।

“आपने कहाँ देखा, डाक्टर?”

“लड़ाई के दिनों में अपने शहर रंगून को जलते हुए देखा था।” मिस वुड की आत्मा को ठेस लगी, किन्तु फिर भी उनकी उत्सुकता शान्त नहीं हुई।

“आपका घर, क्या वह भी जल गया था?”

डाक्टर कुछ देर तक चुपचाप लेटा रहा।

“हम उसे खाली छोड़कर चले आये थे, मालूम नहीं बाद में क्या हुआ।” अपने व्यक्तिगत जीवन के सम्बन्ध में कुछ भी कहने में डाक्टर को कठिनाई महसूस होती है।

“डाक्टर, क्या आप कभी वापिस बर्मा जाने की बात नहीं सोचते?” डाक्टर ने अँगड़ाई ली और करवट बदलकर औंधे मुँह लेट गये। उनकी आँखें मुँद गईं और माथे पर बालों की लटें झूल आयीं।

“सोचने से क्या होता है मिस वुड… जब बर्मा में था, तब क्या कभी सोचा था कि यहाँ आकर उम्र काटनी होगी?”

“लेकिन डाक्टर, कुछ भी कह लो, अपने देश का सुख कहीं और नहीं मिलता। यहाँ तुम चाहे कितने वर्ष रह लो, अपने को हमेशा अजनबी ही पाओगे।”

डाक्टर ने सिगार के धुएँ को धीरे-धीरे हवा में छोड़ दिया- “दरअसल अजनबी तो मैं वहाँ भी समझा जाऊँगा, मिस वुड। इतने वर्षों बाद मुझे कौन पहचानेगा! इस उम्र में नये सिरे से रिश्ते जोड़ना काफी सिरदर्द का काम है, कम-से-कम मेरे बस की बात नहीं है।”

“लेकिन डाक्टर, आप कब तक इस पहाड़ी कस्बे में पड़े रहेंगे, इसी देश में रहना है तो किसी बड़े शहर में प्रैक्टिस शुरू कीजिए।”

“प्रैक्टिस बढ़ाने के लिए कहाँ-कहाँ भटकता फिरूँगा, मिस वुड। जहाँ रहो, वहीं मरीज मिल जाते हैं। यहाँ आया था कुछ दिनों के लिए, फिर मुद्दत हो गयी और टिका रहा। जब कभी जी ऊबेगा, कहीं चला जाऊँगा। जड़ें कहीं नहीं जमतीं, तो पीछे भी कुछ नहीं छूट जाता। मुझे अपने बारे में कोई गलतफहमी नहीं है मिस वुड, मैं सुखी हूँ।”

मिस वुड ने डाक्टर की बात पर विशेष ध्यान नहीं दिया। दिल में वह हमेशा डाक्टर को उच्छृंखल, लापरवाह और सनकी समझती रही है, किन्तु डाक्टर के चरित्र में उनका विश्वास है, न जाने क्यों, क्योंकि डाक्टर ने जाने-अनजाने में उसका कोई प्रमाण दिया हो, यह उन्हें याद नहीं पड़ता।

मिस वुड ने एक ठण्डी साँस भरी। वह हमेशा यह सोचती थी कि यदि डाक्टर इतना आलसी और लापरवाह न होता, तो अपनी योग्यता के बल पर काफी चमक सकता था। इसलिए उन्हें डाक्टर पर क्रोध भी आता था और दुख भी होता था।

मिस वुड ने अपने बैग से ऊन का गोला और सलाइयाँ निकालीं, फिर उसके नीचे से अखबार में लिपटा हुआ चौड़ा कॉफी का डिब्बा उठाया, जिसमें अण्डों की सैण्डविचें और हैम्बर्गर दबे हुए थे। थर्मस से प्यालों में कॉफी उंडेलते हुए मिस वुड ने कहा – “डाक्टर, कॉफी ठण्डी हो रही है”

डाक्टर लेटे-लेटे बुड़बुड़ाया। मिस वुड ने नीचे झुककर देखा, वह कोहनी पर सिर टिकाये सो रहा था। ऊपर का होंठ जरा-सा फैलकर मुड़ गया था, मानों किसी से मजाक करने से पहले मुस्करा रहा हो।

उसकी अँगुलियों में दबा हुआ सिगार नीचे झुका हुआ लटक रहा था। “मेरी, मेरी, वाट डू यू वाण्ट, वाट डू यू वाण्ट?” दूसरे स्टैण्डर्ड में पढ़नेवाली मेरी ने अपनी चंचल, चपल आँखें ऊपर उठायीं, लड़कियों का दायरा उसे घेरे हुए कभी पास आता था, कभी दूर खिंचता चला जाता था।

“आई वाण्ट… आई वाण्ट ब्लू” दोनों हाथों को हवा में घुमाते हुए मेरी चिल्लायी। दायरा पानी की तरह टूट गया। सब लड़कियाँ एक-दूसरे पर गिरती-पड़ती किसी नीली वस्तु को छूने के लिए भाग-दौड़ करने लगीं। लंच समाप्त हो चुका था। लड़कियों के छोटे-छोटे दल मीडोज में बिखर गये थे। ऊँची क्लास की कुछ लड़कियाँ चाय का पानी गर्म करने के लिए पेड़ों पर चढ़कर सूखी टहनियाँ तोड़ रही थीं।

दोपहर की उस घड़ी में मीडोज अलसाया-ऊँघता-सा जान पड़ता था। हवा का कोई भूला-भटका झोंका, चीड़ के पत्ते खड़खड़ा उठते थे। कभी कोई पक्षी अपनी सुस्ती मिटाने झाड़ियों से उड़कर नाले के किनारे बैठ जाता था, पानी में सिर डुबोता था, फिर ऊबकर हवा में दो-चार निरुद्देश्य चक्कर काटकर दुबारा झाड़ियों में दुबक जाता था।

किन्तु जंगल की खामोशी शायद कभी चुप नहीं रहती। गहरी नींद में डूबी सपनों-सी कुछ आवाजें नीरवता के हल्के झीने परदे पर सलवटें बिछा जाती हैं, मूक लहरों-सी हवा में तिरती हैं, मानों कोई दबे पाँव झाँककर अदृश्य संकेत कर जाता है- “देखो मैं यहाँ हूँ” लतिका ने जूली के ‘बाब हेयर’ को सहलाते हुए कहा, “तुम्हें कल रात बुलाया था।”

“मैडम, मैं गयी थी, आप अपने कमरे में नहीं थीं।” लतिका को याद आया कि रात वह डाक्टर के कमरे के टैरेस पर देर तक बैठी रही थी और भीतर ह्यूबर्ट पियानो पर शोपाँ का नौक्टर्न बजा रहा था। “जूली, तुमसे कुछ पूछना था।” उसे लगा, वह जूली की आँखों से अपने को बचा रही है। जूली ने अपना चेहरा ऊपर उठाया। उसकी भूरी आँखों से कौतूहल झाँक रहा था।

“तुम आफिसर्स मेस में किसी को जानती हो?” जूली ने अनिश्चित भाव से सिर हिलाया। लतिका कुछ देर तक जूली को अपलक घूरती रही।

“जूली, मुझे विश्वास है, तुम झूठ नहीं बोलोगी।” कुछ क्षण पहले जूली की आँखों में जो कौतूहल था, वह भय से परिणत होने लगा। लतिका ने अपनी जैकेट की जेब से एक नीला लिफाफा निकालकर जूली की गोद में फेंक दिया। “यह किसकी चिट्ठी है?”

जूली ने लिफाफा उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, किन्तु फिर एक क्षण के लिए उसका हाथ काँपकर ठिठक गया-लिफाफे पर उसका नाम और होस्टल का पता लिखा हुआ था।

“थैंक यू मैडम, मेरे भाई का पत्र है, वह झाँसी में रहते हैं।” जूली ने घबराहट में लिफाफे को अपने स्कर्ट की तहों में छिपा लिया। “जूली, ज़रा मुझे लिफाफा दिखलाओ।” लतिका का स्वर तीखा, कर्कश-सा हो आया।

जूली ने अनमने भाव से लतिका को पत्र दे दिया। “तुम्हारे भाई झाँसी में रहते हैं?” जूली इस बार कुछ नहीं बोली। उसकी उद्भ्रान्त उखड़ी-सी आँखें लतिका को देखती रहीं। “यह क्या है?”

जूली का चेहरा सफेद, फक पड़ गया। लिफाफे पर कुमाऊँ रेजीमेण्टल सेण्टर की मुहर उसकी ओर घूर रही थी। “कौन है यह?” लतिका ने पूछा। उसने पहले भी होस्टल में उड़ती हुई अफवाह सुनी थी कि जूली को क्लब में किसी मिलिटरी अफसर के संग देखा गया था, किन्तु ऐसी अफवाहें अक्सर उड़ती रहती थीं, और उसने उन पर विश्वास नहीं किया था। “जूली, तुम अभी बहुत छोटी हो” जूली के होंठ काँपे-उसकी आँखों में निरीह याचना का भाव घिर आया।

“अच्छा अभी जाओ, तुमसे छुट्टियों के बाद बातें करूँगी।” जूली ने ललचाई दृष्टि से लिफाफे को देखा, कुछ बोलने को उद्यत हुई, फिर बिना कुछ कहे चुपचाप वापिस लौट गयी।

लतिका देर तक जूली को देखती रही, जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो गयी। क्या मैं किसी खूँसट बुढ़िया से कम हूँ? अपने अभाव का बदला क्या मैं दूसरों से ले रही हूँ?

शायद, कौन जाने… शायद जूली का यह प्रथम परिचय हो, उस अनुभूति से, जिसे कोई भी लड़की बड़े चाव से सँजोकर, सँभालकर अपने में छिपाये रहती है, एक अनिर्वचनीय सुख, जो पीड़ा लिये है, पीड़ा और सुख को डुबोती हुई उमड़ते ज्वर की खुमारी, जो दोनों को अपने में समो लेती है एक दर्द, जो आनन्द से उपजा है और पीड़ा देता है।

यहीं इसी देवदार के नीचे उसे भी यही लगा था, जब गिरीश ने पूछा था-“तुम चुप क्यों हो?” वह आँखें मूँदे सोच रही थी, सोच कहाँ रही थी, जी रही थी, उस क्षण को जो भय और विस्मय के बीच भिंचा था-बहका-सा पागल क्षण। वह अभी पीछे मुड़ेगी तो गिरीश की ‘नर्वस’ मुस्कराहट दिखायी दे जायेगी, उस दिन से आज दोपहर तक का अतीत एक दुःस्वप्न की मानिन्द टूट जाएगा। वही देवदार है, जिस पर उसने अपने बालों के क्लिप से गिरीश का नाम लिखा था। पेड़ की छाल उतरती नहीं थी, क्लिप टूट-टूट जाता था, तब गिरीश ने अपने नाम के नीचे उसका नाम लिखा था। जब कभी कोई अक्षर बिगड़कर ढेढ़ा-मेढ़ा हो जाता था तब वह हँसती थी, और गिरीश का काँपता हाथ और भी काँप जाता था।

लतिका को लगा कि जो वह याद करती है, वही भूलना भी चाहती है, लेकिन जब सचमुच भूलने लगती है, तब उसे भय लगता है कि जैसे कोई उसकी किसी चीज को उसके हाथों से छीने लिये जा रहा है, ऐसा कुछ जो सदा के लिए खो जायेगा। बचपन में जब कभी वह अपने किसी खिलौने को खो देती थी, तो वह गुमसुम-सी होकर सोचा करती थी, कहाँ रख दिया मैंने। जब बहुत दौड़-धूप करने पर खि़लौना मिल जाता, तो वह बहाना करती कि अभी उसे खोज ही रही है, कि वह अभी मिला नहीं है। जिस स्थान पर खिलौना रखा होता, जान-बूझकर उसे छोड़कर घर के दूसरे कोने में उसे खोजने का उपक्रम करती। तब खोई हुई चीज याद रहती, इसलिए भूलने का भय नहीं रहता था।

आज वह उस बचपन के खेल का बहाना क्यों नहीं कर पाती? ‘बहाना’शायद करती है, उसे याद करने का बहाना, जो भूलता जा रहा है…दिन, महीने बीत जाते हैं, और वह उलझी रहती है, अनजाने में गिरीश का चेहरा धुँधला पड़ता जाता है, याद वह करती है, किन्तु जैसे किसी पुरानी तस्वीर के धूल भरे शीशे को साफ कर रही हो। अब वैसा दर्द नहीं होता, सिर्फ उसको याद करती है, जो पहले कभी होता था, तब उसे अपने पर ग्लानि होती है। वह फिर जान-बूझकर उस घाव को कुरेदती है, जो भरता जा रहा है, खुद-ब-खुद उसकी कोशिशों के बावजूद भरता जा रहा है। देवदार पर खुदे हुए अधमिटे नाम लतिका की ओर निस्तब्ध निरीह भाव से निहार रहे थे। मीडोज के घने सन्नाटे में नाले पार से खेलती हुई लड़कियों की आवाजें गूँज जाती थीं…वाट डू यू वाण्ट? वाट डू यू वाण्ट?

तितलियाँ, झींगुर, जुगनू…मीडोज पर उतरती हुई साँझ की छायाओं में पता नहीं चलता, कौन आवाज किसकी है? दोपहर के समय जिन आवाजों को अलग-अलग पहचाना जा सकता था, अब वे एकस्वरता की अविरल धारा में घुल गयी थीं। घास से अपने पैरों को पोंछता हुआ कोई रेंग रहा है झाड़ियों के झुरमुट से परों को फड़फड़ाता हुआ झपटकर कोई ऊपर से उड़ जाता है किन्तु ऊपर देखो तो कहीं कुछ भी नहीं है। मीडोज के झरने का गड़गड़ाता स्वर, जैसे अँधेरी सुरंग में झपाटे से ट्रेन गुजर गयी हो, और देर तक उसमें सीटियों और पहियों की चीत्कार गूँजती रही हो।

पिकनिक कुछ देर तक और चलती, किन्तु बादलों की तहें एक-दूसरे पर चढ़ती जा रही थीं। पिकनिक का सामान बटोरा जाने लगा। मीडोज के चारों ओर बिखरी हुई लड़कियाँ मिस वुड के इर्द-गिर्द जमा होने लगीं। अपने संग वे अजीबोगरीब चीजें बटोर लायी थीं। कोई किसी पक्षी के टूटे पंख को बालों में लगाये हुए थी, किसी ने पेड़ की टहनी को चाकू से छीलकर छोटी-सी बेंत बना ली थी। ऊँची क्लास की कुछ लड़कियों ने अपने-अपने रूमालों में नाले से पकड़ी हुई छोटी-छोटी बालिश्त भर की मछलियों को दबा रखा था जिन्हें मिस वुड से छिपकर वे एक-दूसरे को दिखा रही थीं।

मिस वुड लड़कियों की टोली के संग आगे निकल गयीं। मीडोज से पक्की सड़क तक तीन-चार फर्लांग की चढ़ाई थी। लतिका हाँफने लगी। डाक्टर मुकर्जी सबसे पीछे आ रहे थे। लतिका के पास पहुँचकर वह ठिठक गये। डाक्टर ने दोनों घुटनों को जमीन पर टेकते हुए सिर झुकाकर एलिजाबेथयुगीन अंगे्रजी में कहा – “मैडम, आप इतनी परेशान क्यों नजर आ रही हैं?” और डाक्टर की नाटकीय मुद्रा को देखकर लतिका के होंठों पर एक थकी-सी ढीली-ढीली मुस्कराहट बिखर गयी। “प्यास के मारे गला सूख रहा है और यह चढ़ाई है कि खत्म होने में नहीं आती।”

डाक्टर ने अपने कन्धे पर लटकते हुए थर्मस को उतारकर लतिका के हाथों में देते हुए कहा – “थोड़ी-सी कॉफ़ी बची है, शायद कुछ मदद कर सके।” “पिकनिक में तुम कहाँ रह गये डाक्टर, कहीं दिखायी नहीं दिये?” “दोपहर भर सोता रहा-मिस वुड के संग। मेरा मतलब है, मिस वुड पास बैठी थीं।” “मुझे लगता है, मिस वुड मुझसे मुहब्बत करती हैं।” कोई भी मजाक करते समय डाक्टर अपनी मूँछों के कोनों को चबाने लगता है। “क्या कहती थीं?” लतिका ने थर्मस से कॉफी को मुँह में उँडेल लिया। “शायद कुछ कहतीं, लेकिन बदकिस्मती से बीच में ही मुझे नींद आ गयी। मेरी जिन्दगी के कुछ खूबसूरत प्रेम-प्रसंग कम्बख्त इस नींद के कारण अधूरे रह गये हैं।”

और इस दौरान में जब दोनों बातें कर रहे थे, उनके पीछे मीडोज और मोटर रोड के संग चढ़ती हुई चीड़ और बाँज के वृक्षों की कतारें साँझ के घिरते अँधेरे में डूबने लगीं, मानों प्रार्थना करते हुए उन्होंने चुपचाप अपने सिर नीचे झुका लिये हों। इन्हीं पेड़ों के ऊपर बादलों में गिरजे का क्रास कहीं उलझा पड़ा था। उसके नीचे पहाड़ों की ढलान पर बिछे हुए खेत भागती हुई गिलहरियों से लग रहे थे, जो मानों किसी की टोह में स्तब्ध ठिठक गयी हों। “डाक्टर, मि. ह्यूबर्ट पिकनिक पर नहीं आये?” डाक्टर मुकर्जी टार्च जलाकर लतिका के आगे-आगे चल रहे थे। “मैंने उन्हें मना कर दिया था।” “किसलिए?”

अँधेरे में पैरों के नीचे दबे हुए पत्तों की चरमराहट के अतिरिक्त कुछ सुनायी नहीं देता था। डॉक्टर मुकर्जी ने धीरे-से खाँसा। “पिछले कुछ दिनों से मुझे संदेह होता जा रहा है कि ह्यूबर्ट की छाती का दर्द शायद मामूली दर्द नहीं है।” डाक्टर थोड़ा-सा हँसा, जैसे उसे अपनी यह गम्भीरता अरुचिकर लग रही हो।

डाक्टर ने प्रतीक्षा की, शायद लतिका कुछ कहेगी। किन्तु लतिका चुपचाप उसके पीछे चल रही थी। “यह मेरा महज शक है, शायद मैं बिल्कुल गलत होऊँ, किन्तु यह बेहतर होगा कि वह अपने एक फेफड़े का एक्सरे करा लें, इससे कम-से-कम कोई भ्रम तो नहीं रहेगा।” “आपने मि. ह्यूबर्ट से इसके बारे में कुछ कहा है?” “अभी तक कुछ नहीं कहा। ह्यूबर्ट जरा-सी बात पर चिन्तित हो उठता है, इसलिए कभी साहस नहीं हो पाता” डॉक्टर को लगा, उसके पीछे आते हुए लतिका के पैरों का स्वर सहसा बन्द हो गया है। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, लतिका बीच सड़क पर अँधेरे में छाया-सी चुपचाप निश्चल खड़ी है। “डाक्टर…” लतिका का स्वर भर्राया हुआ था। “क्या बात है मिस लतिका, आप रुक क्यों गयी?” “डाक्टर-क्या मि. ह्यूबर्ट…?

डाक्टर ने अपनी टार्च की मद्धिम रोशनी लतिका पर उठा दी…उसने देखा लतिका का चेहरा एकदम पीला पड़ गया है और वह रह-रहकर पत्ते-सी काँप जाती है। “मिस लतिका, क्या बात है, आप तो बहुत डरी-सी जान पड़ती हैं?” “कुछ नहीं डाक्टर, मुझे…मुझे कुछ याद आ गया था” वे दोनों फिर चलने लगे। कुछ दूर जाने पर उनकी आँखें ऊपर उठ गयीं। पक्षियों का एक बेड़ा धूमिल आकाश में त्रिकोण बनाता हुआ पहाड़ों के पीछे से उनकी ओर आ रहा था। लतिका और डाक्टर सिर उठाकर इन पक्षियों को देखते रहे। लतिका को याद आया, हर साल सर्दी की छुट्टियों से पहले ये परिन्दे मैदानों की ओर उड़ते हैं, कुछ दिनों के लिए बीच के इस पहाड़ी स्टेशन पर बसेरा करते हैं, प्रतीक्षा करते हैं बर्फ के दिनों की, जब वे नीचे अजनबी, अनजाने देशों में उड़ जायेंगे।

क्या वे सब भी प्रतीक्षा कर रहे हैं? वह, डाक्टर मुकर्जी, मि. ह्यूबर्ट, लेकिन कहाँ के लिए, हम कहाँ जायेंगे?

किन्तु उसका कोई उत्तर नहीं मिला-उस अँधेरे में मीडोज के झरने के भुतैले स्वर और चीड़ के पत्तों की सरसराहट के अतिरिक्त कुछ सुनायी नहीं देता था। लतिका हड़बड़ाकर चौंक गयी। अपनी छड़ी पर झुका हुआ डाक्टर धीरे-धीरे सीटी बजा रहा था।

“मिस लतिका, जल्दी कीजिए, बारिश शुरू होनेवाली है।” होस्टल पहुँचते-पहुँचते बिजली चमकने लगी थी। किन्तु उस रात बारिश देर तक नहीं हुई। बादल बरसने भी नहीं पाते थे कि हवा के थपेड़ों से धकेल दिये जाते थे। दूसरे दिन तड़के ही बस पकड़नी थी, इसलिए डिनर के बाद लड़कियाँ सोने के लिए अपने-अपने कमरों में चली गयी थीं।

जब लतिका अपने कमरे में गयी, तो उस समय कुमाऊँ रेजीमेण्ट सेण्टर का बिगुल बज रहा था। उसके कमरे में करीमुद्दीन कोई पहाड़ी धुन गुनगुनाता हुआ लैम्प में गैस पम्प कर रहा था। लतिका उन्हीं कपड़ों में, तकिये को दुहरा करके लेट गयी। करीमुद्दीन ने उड़ती हुई निगाह से लतिका को देखा, फिर अपने काम में जुट गया। “पिकनिक कैसी रही मेम साहब?” “तुम क्यों नहीं आये, सब लड़कियाँ तुम्हें पूछ रही थीं?” लतिका को लगा, दिन-भर की थकान धीरे-धीरे उसके शरीर की पसलियों पर चिपटती जा रही है। अनायास उसकी आँखें नींद के बोझ से झपकने लगीं। “मैं चला आता तो ह्यूबर्ट साहब की तीमारदारी कौन करता। दिनभर उनके बिस्तर से सटा हुआ बैठा रहा और अब वह गायब हो गये हैं।” करीमुद्दीन ने कन्धे पर लटकते हुए मैचे-कुचैले तौलिये को उतारा और लैम्प के शीशों की गर्द पोंछने लगा।

लतिका की अधमुँदी आँखें खुल गयी। “क्या ह्यूबर्ट साहब अपने कमरे में नहीं हैं?” “खुदा जाने, इस हालत में कहाँ भटक रहे हैं। पानी गर्म करने कुछ देर के लिए बाहर गया था, वापिस आने पर देखता हूँ कि कमरा खाली पड़ा है।” करीमुद्दीन बड़बड़ाता हुआ बाहर चला गया। लतिका ने लेटे-लेटे पलँग के नीचे चप्पलों को पैरों से उतार दिया।

ह्यूबर्ट इतनी रात कहाँ गये? किन्तु लतिका की आँखें फिर झपक गयीं। दिन-भर की थकान ने सब परेशानियों, प्रश्नों पर कुंजी लगा दी थी, मानों दिन-भर आँख-मिचौनी खेलते हुए उसने अपने कमरे में ‘दय्या’ को छू लिया था। अब वह सुरक्षित थी, कमरे की चहारदीवारी के भीतर उसे कोई नहीं पकड़ सकता। दिन के उजाले में वह गवाह थी, मुजरिम थी, हर चीज का उससे तकाजा था, अब इस अकेलेपन में कोई गिला नहीं, उलाहना नहीं, सब खींचातानी खत्म हो गयी है, जो अपना है, वह बिल्कुल अपना-सा हो गया है, जो अपना नहीं है, उसका दुख नहीं, अपनाने की फुरसत नहीं…

लतिका ने दीवार की ओर मुँह घुमा लिया। लैम्प के फीके आलोक में हवा में काँपते परदों की छायाएँ हिल रही थीं। बिजली कड़कने से खिड़कियों के शीशे-चमक-चमक जाते थे, दरवाजे चटखने लगते थे, जैसे कोई बाहर से धीमे-धीमे खटखटा रहा हो। कॉरीडोर से अपने-अपने कमरों में जाती हुई लड़कियों की हँसी, बातों के कुछ शब्द, फिर सबकुछ शान्त हो गया, किन्तु फिर भी देर तक कच्ची नींद में वह लैम्प का धीमा-सा ‘सी-सी’ स्वर सुनती रही। कब वह स्वर भी मौन का भाग बनकर मूक हो गया, उसे पता न चला। कुछ देर बाद उसको लगा, सीढ़ियों से कुछ दबी आवाजें ऊपर आ रही हैं, बीच-बीच में कोई चिल्ला उठता है, और फिर सहसा आवाजें धीमी पड़ जाती हैं। “मिस लतिका, जरा अपना लैम्प ले आइये” – कॉरिडोर के जीने से डाक्टर मुकर्जी की आवाज आयी थी।

कॉरीडोर में अँधेरा था। वह तीन-चार सीढ़ियाँ नीचे उतरी, लैम्प नीचे किया। सीढ़ियों से सटे जंगले पर ह्यूबर्ट ने अपना सिर रख दिया था, उसकी एक बाँह जंगले के नीचे लटक रही थी और दूसरी डाक्टर के कन्धे पर झूल रही थी, जिसे डाक्टर ने अपने हाथों में जकड़ रखा था। “मिस लतिका, लैम्प ज़रा और नीचे झुका दीजिए….ह्यूबर्ट…ह्यूबर्ट…” डाक्टर ने ह्यूबर्ट को सहारा देकर ऊपर खींचा। ह्यूबर्ट ने अपना चेहरा ऊपर किया। व्हिस्की की तेज बू का झोंका लतिका के सारे शरीर को झिंझोड़ गया। ह्यूबर्ट की आँखों में सुर्ख डोरे खिंच आये थे, कमीज का कालर उलटा हो गया था और टाई की गाँठ ढीली होकर नीचे खिसक आयी थी। लतिका ने काँपते हाथों से लैम्प सीढ़ियों पर रख दिया और आप दीवार के सहारे खड़ी हो गयी। उसका सिर चकराने लगा था।

“इन ए बैक लेन ऑफ द सिटी, देयर इज ए गर्ल हू लव्ज मी…” ह्यूबर्ट हिचकियों के बीच गुनगुना उठता था।

“ह्यूबर्ट प्लीज…प्लीज,” डाक्टर ने ह्यूबर्ट के लड़खड़ाते शरीर को अपनी मजबूत गिरफ्त में ले लिया।

“मिस लतिका, आप लैम्प लेकर आगे चलिए” लतिका ने लैम्प उठाया। दीवार पर उन तीनों की छायाएँ डगमगाने लगीं।

“इन ए बैक लेन ऑफ द सिटी, देयर इज ए गर्ल हू लव्ज मी” ह्यूबर्ट डाक्टर मुकर्जी के कन्धे पर सिर टिकाये अँधेरी सीढ़ियों पर उल्टे-सीधे पैर रखता चढ़ रहा था।

“डाक्टर, हम कहाँ हैं?” ह्यूबर्ट सहसा इतनी जोर से चिल्लाया कि उसकी लड़खड़ाती आवाज सुनसान अँधेरे में कॉरीडोर की छत से टकराकर देर तक हवा में गूँजती रही।

“ह्यूबर्ट…” डाक्टर को एकदम ह्यूबर्ट पर गुस्सा आ गया, फिर अपने गुस्से पर ही उसे खीझ-सी हो आयी और वह ह्यूबर्ट की पीठ थपथपाने लगा। “कुछ बात नहीं है ह्यूबर्ट डियर, तुम सिर्फ थक गये हो।“ ह्यूबर्ट ने अपनी आँखें डाक्टर पर गड़ा दीं, उनमें एक भयभीत बच्चे की-सी कातरता झलक रही थी, मानो डाक्टर के चेहरे से वह किसी प्रश्न का उत्तर पा लेना चाहता हो। ह्यूबर्ट के कमरे में पहुँचकर डाक्टर ने उसे बिस्तरे पर लिटा दिया। ह्यूबर्ट ने बिना किसी विरोध के चुपचाप जूते-मोजे उतरवा दिये। जब डाक्टर ह्यूबर्ट की टाई उतारने लगा, तो ह्यूबर्ट, अपनी कुहनी के सहारे उठा, कुछ देर तक डाक्टर को आँखें फाड़ते हुए घूरता रहा, फिर धीरे-से उसका हाथ पकड़ लिया। “डाक्टर, क्या मैं मर जाऊँगा?” “कैसी बात करते हो ह्यूबर्ट!” डाक्टर ने हाथ छुड़ाकर धीरे-से ह्यूबर्ट का सिर तकिये पर टिका दिया। “गुड नाइट ह्यूबर्ट” “गुड नाइट डाक्टर,” ह्यूबर्ट ने करवट बदल ली। “गुड नाइट मि. ह्यूबर्ट…” लतिका का स्वर सिहर गया। किन्तु ह्यूबर्ट ने कोई उत्तर नहीं दिया। करवट बदलते ही उसे नींद आ गयी थी।

कॉरीडोर में वापिस आकर डाक्टर मुकर्जी रेलिंग के सामने खड़े हो गये। हवा के तेज झोंकों से आकाश में फैले बादलों की परतें जब कभी इकहरी हो जातीं, तब उनके पीछे से चाँदनी बुझती हुई आग के धुएँ-सी आस-पास की पहाड़ियों पर फैल जाती थी। “आपको मि. ह्यूबर्ट कहाँ मिले?” लतिका कॉरीडोर के दूसरे कोने में रेलिंग पर झुकी हुई थी। “क्लब के बार में उन्हें देखा था, मैं न पहुँचता तो न जाने कब तक बैठे रहते। डाक्टर मुकर्जी ने सिगरेट जलायी। उन्हें अभी एक-दो मरीजों के घर जाना था। कुछ देर तक उन्हें टाल देने के इरादे से वह कॉरीडोर में खड़े रहे।” नीचे अपने क्वार्टर में बैठा हुआ करीमुद्दीन माउथ आर्गन पर कोई पुरानी फिल्मी धुन बजा रहा था।

“आज दिन भर बादल छाये रहे, लेकिन खुलकर बारिश नहीं हुई” “क्रिसमस तक शायद मौसम ऐसा ही रहेगा।” कुछ देर तक दोनों चुपचाप ख़डे रहे। कॉन्वेन्ट स्कूल के बाहर फैले लॉन से झींगुरों का अनवरत स्वर चारों ओर फैली निस्तब्धता को और भी अधिक घना बना रहा था। कभी-कभी ऊप़र मोटर रोड पर किसी कुत्ते की रिरियाहट सुनायी पड़ा जाती थी। “डाक्टर… कल रात आपने मि. ह्यूबर्ट से कुछ कहा था मेरे बारे में?” “वही जो सब लोग जानते हैं और ह्यूबर्ट, जिसे जानना चाहिए था, नहीं जानता था।” डाक्टर ने लतिका की ओर देखा, वह जड़वत अविचलित रेलिंग पर झुकी हुई थी। “वैसे हम सबकी अपनी-अपनी जिद होती है, कोई छोड़ देता है, कोई आखिर तक उससे चिपका रहता है।” डाक्टर मुकर्जी अँधेरे में मुस्कराये। उनकी मुस्कराहट में सूखा-सा विरक्ति का भाव भरा था। “कभी-कभी मैं सोचता हूँ मिस लतिका, किसी चीज को न जानना यदि गलत है, तो जान-बूझकर न भूल पाना, हमेशा जोंक की तरह उससे चिपटे रहना, यह भी गलत है। बर्मा से आते हुए मेरी पत्नी की मृत्यु हुई थी, मुझे अपनी जिन्दगी बेकार-सी लगी थी। आज इस बात को अर्सा गुजर गया और जैसा आप देखती हैं, मैं जी रहा हूँ उम्मीद है कि काफी अर्सा और जिऊँगा। जिन्दगी काफी दिलचस्प लगती है, और यदि उम्र की मजबूरी न होती तो शायद मैं दूसरी शादी करने में भी न हिचकता। इसके बावजूद कौन कह सकता है कि मैं अपनी पत्नी से प्रेम नहीं करता था, आज भी करता हूँ” “लेकिन डाक्टर…” लतिका का गला रुँध आया था। “क्या मि़स लतिका…”

“डाक्टर – सबकुछ होने के बावजूद वह क्या चीज़ है जो हमें चलाये चलती है, हम रुकते हैं तो भी अपने रेले में वह हमें घसीट ले जाती है।” लतिका को लगा कि वह जो कहना चाह रही है, कह नहीं पा रही, जैसे अँधेरे में कुछ खो गया है, जो मिल नहीं पा रहा, शायद कभी नहीं मिल पायेगा। “यह तो आपको फादर एल्मण्ड ही बता सकेंगे मिस लतिका,” डाक्टर की खोखली हँसी में उनका पुराना सनकीपन उभर आया था। “अच्छा चलता हूँ, मिस लतिका, मुझे काफी देर हो गयी है,” डाक्टर ने दियासलाई जलाकर घड़ी को देखा। “गुड नाइट, मिस लतिका।” “गुड नाइट, डाक्टर।”

डाक्टर के जाने पर लतिका कुछ देर तक अँधेरे में रेलिंग से सटी खड़ी रही। हवा चलने से कॉरीडोर में जमा हुआ कुहरा सिहर उठता था। शाम को सामान बाँधते हुए लड़कियों ने अपने-अपने कमरे के सामने जो पुरानी कापियों, अखबारों और रद्दी के ढेर लगा दिये थे, वे सब अब अँधेरे कॉरीडोर में हवा के झोंकों से इधर-उधर बिखरने लगे थे।

लतिका ने लैम्प उठाया और अपने कमरे की ओर जाने लगी। कॉरीडोर में चलते हुए उसने देखा, जूली के कमरे में प्रकाश की एक पतली रेखा दरवाजे के बाहर खिंच आयी है। लतिका को कुछ याद आया। वह कुछ क्षणों तक साँस रोके जूली के कमरे के बाहर खड़ी रही। कुछ देर बाद उसने दरवाजा खटखटाया। भीतर से कोई आवाज नहीं आयी। लतिका ने दबे हाथों से हलका-सा धक्का दिया, दरवाजा खुल गया। जूली लैम्प बुझाना भूल गयी थी। लतिका धीरे-धीरे दबे पाँव जूली के पलँग के पास चली आयी। जूली का सोता हुआ चेहरा लैम्प के फीके आलोक में पीला-सा दीख रहा था। लतिका ने अपनी जेब से वही नीला लिफाफा निकाला और उसे धीरे-से जूली के तकिये के नीचे दबाकर रख दिया।

परिचय का नया अंक

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कपाल की क्लर्की बनाम मुक्तिबोध की कविता:

अहंकार समझो या सुपिरिओरिटी काम्प्लेक्स
लेकिन सच है यह कि जीवन की तथाकथित सफलता को पाने की
हमको फुर्सत नहीं
खाली नहीं हैं हम लोग!
बहुत बीजी हैं हम।

जाकर उन्हें कह दे कोई
पहुंचा दे यह जवाब
और फिर भी करते हों वे हुज्जत
तो कह दो की हमारी सांस जिसमें है आजकल
के रब्त जब्त तौर तरीकों की तरह जहरीली कडुवाहट
जरा सी तुम भी पी लो तो
दवा का एक डोज समझ
तुम्हारे दिमाक के रोगाणु मर जायेंगे
और शरीर में, मष्तिष्क में जबरदस्त संवेदन उत्तेजन
इतना कुछ हो लेगा कि अकुलाते हुए ही तुम
अँधेरे के खीमें को त्यागकर
उजाले के सुनहले मैदानों में भागते आओगे!!
(कहने दो उन्हें जो कहते हैं-नामक कविता में मुक्तिबोध)

आज के समय में कपाल की क्लर्की करने वाले ‘कीर्ति व्यापारी ‘ मुक्तिबोध की कविता का चाहे जितना इस्तेमाल कर लें,लेकिन यकीन कीजिये, उनकी आत्मा के स्याह घेरे में जमीं हुई अड़ियल और कड़ियल व्यवस्था की जो रुग्ण काई है, एक दिन उसी पर फिसलकर वे आसपास के नुकीले चोंच युक्त गिद्धों के शिकार होंगे! मुक्तिबोध एक सर्जक को इन आततायियों से बचने के लिए स्वयं ही प्रतिवाद रचते हैं व् व्यवस्था की हर ‘कुटिल क्लर्की’ की चीड़ फाड़ करते हैं।

काश की ये जाग्रत पंक्तियाँ मुक्तिबोध के उन झंडाबरदारों तक पहुँच पातीं जो खुद को बेचकर अब मुक्तिबोध को बेच रहे हैं।ऐसे लोग सफलता के जंग खाए तालों व् कुंजिओं की दुकान के कबाड़ी हैं जो —–

“सामाजिक महत्त्व की गिलौरियों को खाते हुए
असत्य की कुर्सी पर आराम से बैठे
मनुष्य की त्वचाओं का पहने हुए ओवर कोट
बंदरों व् रीछों के सामने नई नई अदाओं से नाचकर-सफलता के ताले खोलते हैं”।

(परिचय ,17 के संपादकीय का अंश!)
नोट-पत्रिका के कवर पर रोहित जी रशिया की पेंटिंग है। 

परिकल्पनाएँ (Hypothesis), उद्देश्य (Objectives), एवं निष्कर्ष ( Findings) का स्वरुप : एक अवलोकन

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Photo by Dan Dimmock on Unsplash

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के १२४ वे उन्मुखी कार्यक्रम के सभी प्रतिभागियों के पीएच.डी. शोध प्रबंध में उल्लिखित परिकल्पनाएँ (Hypothesis), उद्देश्य (Objectives), एवं निष्कर्ष ( Findings) का स्वरुप : एक अवलोकन

डॉ. रमा प्रकाश नवले

डॉ. प्रेरणा पाण्डेय

डॉ. मंजु पुरी

प्रस्तावना एवं विषय चयन का महत्व

पिछले कई सालों से अध्ययन – अध्यापन करते समय तथा शोधार्थियों से शोध कार्य करवाते समय यह ध्यान में आया कि शोधार्थी अनुसंधान प्रविधि से परिचित नहीं होता| यदि अनुसंधान प्रविधि से परिचित होता है तो परिकल्पनाओं (Hypothesis) के बारे में वह जानता नहीं है| परिकल्पनाएँ अर्थात क्या? परिकल्पनाओं का स्वरूप क्या होता है? परिकल्पनाएँ किस तरह लिखी जाती हैं? इन परिकल्पनाओं का शोधकार्य में क्या महत्व है? – इन सारी बातों के प्रति शोधकर्ता अनभिज्ञ होता है | शोधकार्य का प्रारंभ वास्तव में मन में उठी किसी जिज्ञासा, किसी प्रश्न या कोई समस्या से होता है| जिज्ञासा ही शोधार्थी को शोधकार्य करने के लिए बाध्य करती है| प्रश्न का उत्त्तर पाने की ललक शोधार्थी को चलाती है और समस्या का समाधान ढूँढे बिना शोधार्थी को शान्ति नहीं मिलती| परंतु यह अनुभव है कि न तो शोधार्थी के मन में कोई जिज्ञासा होती है, और न ही उनके मन में कुछ प्रश्न होते हैं और ना ही किसी समस्या को लेकर शोधार्थी निर्देशक के पास आता है| यह स्थिति अक्सर दिखाई देती है अपवादात्मक रूप में ही कोई शोधार्थी, वास्तविक शोधार्थी के रूप में दिखाई देता है| अनुसंधान में विषय चयन का बहुत महत्व होता है| यह एक लंबी प्रक्रिया भी है| शोधार्थी पहले कुछ पढ़े, उस विषय में उसकी रूचि बढे तब कही वह उस विषय पर शोध के बारे में सोच सकता है| शोधार्थी की किसी विषय के बारे में सोचने की प्रक्रिया शुरू होना शोध की पहली सीढ़ी है| पंजीकरण के पूर्व की यह प्रक्रिया लंबे समय तक चलती है | सोचने की प्रक्रिया के कारण ही अनुसंधानकर्ता अपनी रूचि के क्षेत्र का चयन कर सकता है| अनुसंधान कर्ता को अपनी रूचि के क्षेत्र में अध्ययन करने की स्थिति इस प्रक्रिया से ही निर्माण हो सकती है और इसी प्रक्रिया के कारण उपर्युक्त प्रश्न उसके मन में निर्मित होते हैं| परन्तु वास्तविकता कुछ और ही होती है| शोधार्थी तो सीधे शोधनिर्देशक के पास पहुंचता है और शोधनिर्देशक से ही यह कहता है कि – “कोई आसान विषय आप ही दीजिए; ताकि शोधकार्य जल्दी से जल्दी पूरा हो जाए|” शोधनिर्देशक को भी अपने शोधार्थियों की संख्या बढ़ानी होती है | वह उसे विषय दे देता है और काम शुरू हो जाता है| शोधकार्य का प्रारंभ ही उचित पद्धति से न होने के कारण न वह परिकल्पनाएँ लिख पाता है और न वह जो कार्य करने जा रहा है उसका उद्देश्य क्या है इस बात का उसे पता चलता है| अनुसंधान में परिकल्पनाएँ उसके दिमाग में नहीं है, शोधकार्य के उद्देश्यों का भी पता नहीं है तब उसके कार्य में भटकाव आ जाता है| दिशा के अभाव में बार – बार शोध कार्य छोड़ देने की इच्छा बलवती होती है| कभी – कभी वह अनुसंधान कार्य पूरा कर नहीं पाता| शोधकार्य आनंद देने के बजाए नीरस और उबाऊ लगने लगता है| उपाधि पाना उसका लक्ष्य है| इसलिए जैसे तैसे वह काम पूरा कर लेता है| ऐसी स्थिति में शोध कार्य के निष्कर्ष स्पष्ट रूप में कैसे आ सकते है? निष्कर्ष भी वह लिख नहीं पाता| शोधप्रबंध जांचने की विधि एक अलग शोध का विषय हो सकता है| इस प्रकार के शोधप्रबंध कचरे के ढेर का हिस्सा बन जाते हैं| विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रविधि सुनिश्चित कराने के बावजूद इस प्रविधि के प्रति गंभीरता से न देखने के कारण शोधकार्य में भारत पिछड़ रहा है; यह बात सर्वविदित है| अनुसंधान में दुनिया के १३० देशों में भारत का स्थान कभी भी १०० के अंदर नहीं आ पाया है| यह चिंताजनक स्थिति है| शोध में सुधार हमारी अनिवार्यता है| इस कार्य के प्रति शोधकर्ताओं को अधिक सतर्क, सक्रिय, परिश्रमी, बनाने की दृष्टि से तथा निश्चित दिशा में काम करने की दृष्टि से प्रयास जरुरी हैं| यही वह प्रश्न है जिसके उत्तर ढूँढने का एक छोटा सा प्रयास इस कार्य द्वारा किया जाना है|

शोधकार्य का अंतर अनुशासनीय दृष्टि से महत्व (Interdisciplinary Approuch)

अनुसंधान की एक निश्चित पद्धति है ; जिसे अनुसंधान प्रविधि कहा जाता है| इस प्रविधि के अनुसार ही शोध कार्य होना चाहिए| इस प्रविधि से, किसी भी संकाय के किसी भी विषय में शोध करनेवाले शोधकर्ता को परिचित होना जरुरी होता है| प्रो. यशपाल ने भारतीय ज्ञान आयोग द्वारा अंतर अनुशासनीय अध्ययन के महत्व को सबसे पहली बार प्रतिपादित किया| उसके बाद अंतर अनुशासनीय दृष्टि से किए जानेवाले अध्ययन का महत्व बढ़ गया| विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अंतर अनुशासनीय शोध पर बल देता है| लघु और बृहत प्रकल्प कार्य को स्वीकृति देते समय शोध विषय का अंतर अनुशासनीय दृष्टि से महत्व देखा जाता है| यह जो छोटा सा प्रकल्प कार्य किया जा रहा है इसका महत्व तो सभी ज्ञान शाखाओं की दृष्टि से है| अनुसंधान प्रविधि का अध्ययन किए बिना किसी भी विषय में शोध कार्य किया ही नहीं जा सकता| शिमला में आयोजित १२४ वे उन्मुखी कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों के १६ विषयों के प्रतिभागी सम्मिलित है| इन सभी की दृष्टि से इस विषय का महत्व है| इनमें कुछ शोध निर्देशक हैं, कुछ विद्यावाचस्पति है, कुछेक को अभी विद्यावाचस्पति बनना है| सभी की दृष्टि से इस विषय का महत्व निर्विवाद है| यह शोध प्रकल्प अंतर अनुशासनीय शोध प्रकल्प है|

शोध विषय का राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से महत्व

ऊपर बताया जा चुका है अनुसंधान के क्षेत्र में भारत बहुत पिछड़ रहा है| विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने विद्यावाचस्पति उपाधि के लिए पंजीकृत शोधार्थियों के लिए एक पाठ्यक्रम (Ph.D. Course – Work) अनिवार्य किया है| इस पाठ्यक्रम में चार प्रश्नपत्रों में पहला प्रश्नपत्र अनुसन्धान प्रविधि का भी है| हमारे यहाँ बहुत अच्छी –अच्छी योजनाएँ बनती है ; परंतु अमल में लाते समय उसका मूल रूप बच नहीं पाता, यह वास्तविकता सर्वविदित है| किसी भी योजना का प्रत्याभरण (Feed –Back) लेने की पद्धति का अभाव यहाँ है| यदि अनुसंधान प्रविधि का गंभीरता से पालन होता तो हम अनुसन्धान के क्षेत्र में अव्वल न सही, पहले २५ में तो होते| यह प्रश्न अनुसंधानकर्ता को भी छलता है| यह अनुमान जरुर लगाया जा सकता है कि कही कोई सुराख जरुर हो सकता है; जिसके कारण अनुसंधान प्रविधि का गंभीरता से अध्ययन नहीं हो रहा है| इस सुराख को ढूँढ़ने का प्रयास ; यह शोध कार्य है| इस पाठ्यक्रम की व्यावहारिकता का स्वरूप क्या है? जमीनी स्तर पर यह प्रविधि पहुँच चुकी है क्या ; इसे पहचानना राष्ट्रीय कार्य है और इसमें सुधार के लिए बूँद भर किया गया प्रयास भी अंतर्राष्ट्रीय महत्व की ओर संकेत करता है|

पुनरावलोकन (View of Research and Development in the Subject)

शोध प्रविधि पर अंग्रेजी, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में दर्जनों किताबें लिखी गयी हैं| परंतु इस प्रविधि का व्यावहारिक स्तर पर कितना पालन होता है इस विषय पर हमारी जानकारी में कोई शोध कार्य नहीं हुआ है| शोध-गंगा पर भी इस विषय के बारे में जानकारी लेने का प्रयास किया गया ; परन्तु इस पद्धति का एवं इस प्रकार के विषय पर अभी तक कोई शोध कार्य नहीं हुआ है| इस विषय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि नमूने के तौर पर विविध भू – भागों से संबंधित तथा विभिन्न विषयों से संबंधित शोध निर्देशकों, विद्यावाचास्पतियों, शोधार्थियों के प्राध्यापकों का ३१ लोगों का समूह मिलना दुर्लभ बात है| इस प्रकार के नमूने का चयन कर शोध कार्य नहीं किया गया है, ऐसा हमारा मानना है|

शिमला में आयोजित १२४वे उन्मुखी कार्यक्रम के अंतर्गत प्रतिभागियों को एक परियोजना (Project) का कार्य पूरा करना होता है| यह कार्य सामूहिक शोध को बढ़ावा देनेवाला कार्य है| सामुहिक अनुसंधान में प्रवृत्त कराना भी समय का तकाज़ा है, जरुरत है| अत: सामूहिक रूप से यह सोचा गया कि क्यों न यू.जी.सी. – एच.आर.डी. सी. शिमला द्वारा आयोजित १२४ वे उन्मुखी कार्यक्रम में सम्मिलित ३१ प्रतिभागियों के इस छोटे से समूह को नमूने के तौर पर चयन कर अध्ययन किया जाएँ? यह एक सुअवसर है ; क्योंकि प्रतिभागियों का यह समूह देश के विभिन्न भू – भागों से जुड़ा है तथा विभिन्न विषयों से संबधित है| ये प्रतिभागी अनुसंधान प्रविधि से परिचित हैं क्या? इन प्रतिभागियों ने अपने शोधकार्य में अनुसंधान प्रविधि का पालन किया है क्या? परिकल्पनाएँ (Hypothesis), शोधकार्य का उद्देश्य (Objectives) और शोधकार्य के निष्कर्ष (Findings) के बारे में वे जानते हैं क्या? अपने शोध प्रबंध में उन्होंने परिकल्पनाएँ (Hypothesis), शोधकार्य का उद्देश्य (Objectives) और शोधकार्य के निष्कर्ष (Findings) स्पष्ट रूप से दिए हैं क्या? आदि बातें जानने की दृष्टि से यह समूह इस कार्य में प्रवृत्त हुआ है|

परियोजना की परिकल्पनाएँ (Hypothesis)

  1. अधिकतर शोधार्थी अनुसंधान प्राविधि से परिचित नहीं होते हैं |
  2. अनुसंधान प्राविधि से परिचित होने के बावजूद परिकल्पनाएँ स्पष्ट रूप से लिख नहीं पाते हैं| साहित्य के क्षेत्र में कार्यरत शोधार्थियों में यह स्थिति और भी चिंताजनक है|
  3. शोधकार्य किसलिए किया जा रहा है इसका स्पष्ट चित्र शोधार्थी के दिमाग में नहीं होता| भिन्न संकायों के शोधार्थियों में यह स्थिति अलग-अलग हो सकती है|
  4. शोधकार्य के अंत में शोधार्थी बहुत स्पष्ट रूप में निष्कर्ष नहीं दे पाता| भिन्न संकायों के शोधार्थियों में यह स्थिति भी अलग-अलग हो सकती है| विज्ञान और वाणीज्य में निष्कर्ष स्पष्ट रूप से आने का औसत अधिक है| कला संकाय के शोधार्थियों में और विशेष कर साहित्य के क्षेत्र के शोधार्थी निष्कर्ष दे नहीं पाते|

परियोजना के उद्देश्य (Objectives)

  1. एच.आर.डी.सी. शिमला द्वारा आयोजित १२४ वे उन्मुखी कार्यक्रम में सम्मिलित प्रतिभागियों के शोधकार्य का अवलोकन करते हुए अनुसंधान प्रविधि का पालन करनेवाले शोधार्थियों का औसत जानना | यह औसत भिन्न – भिन्न संकायों के अनुसार भिन्न है क्या – इसे पहचानना|
  2. शोधकार्य की परिकल्पनाएँ (Hypothesis), शोधकार्य के उद्देश्य (Objectives) तथा शोधकार्य के निष्कर्ष स्पष्ट रूप में उल्लिखित करनेवालों का औसत भिन्न – भिन्न संकायों के अनुसार जानना |
  3. प्राप्त औसत के अनुसार सुधार के उपायों पर भिन्न-भिन्न संकाय के अनुसार उपायों पर विचार करना
  4. पीएच. डी. उपाधि प्राप्त करने हेतु कार्यरत शोधार्थियों को अनुसंधान प्रविधि के प्रति सचेत करना|
  5. शोधकार्य की परिकल्पनाएँ (Hypothesis), शोधकार्य के उद्देश्य (Objectives) तथा शोधकार्य के निष्कर्ष के स्वरुप की समझ बढ़ाना तथा अपने शोधकार्य में स्पष्ट रूप से इसका उल्लेख करने के प्रति शोधार्थियों को सतर्क करना|

उन्मुखी कार्यक्रम की २८ दिनों की समय सीमा में रोज के नियमित कामकाज के अलावा अनेकों कार्यों की व्यस्तता (कार्यालयीन कामकाज से विरत होने के बाद घर में किए जानेवाले काम) के साथ एक परियोजना का कार्य पूरा करना अपने आप में बहुत बड़ी कसरत है| बड़ी मुश्किल से ८-१० दिन का, रोज औसत डेढ़ या दो घंटे का समय मिलना भी कठिन रहा है| समय की सीमा का ध्यान रखकर यह कार्य करना काफी चुनौतीपूर्ण रहा है| इस समूह ने सबसे पहले चर्चा कर विषय निश्चित किया| शोधकार्य की निश्चित रूप – रेखा बनने के बाद एक प्रश्नावली तैयार की गयी| यह प्रश्नावली सभी प्रतिभागियों में वितरित की गयी| सभी प्रतिभागियों से यह विनम्र निवेदन किया गया कि अधिक से अधिक दो दिन में यह प्रश्नावली भरकर वापिस दी जाए| प्राप्त जानकारी की गोपनीयता के प्रति प्रतिभागियों को आश्वस्त किया गया तथा संचालक एवं समन्वयक से भी इस विषय पर चर्चा की गयी| बावजूद प्रश्नावली भरकर आने में पांच से छह दिन का समय लगा| कुछ लोगों ने प्रश्नावली भरकर दी, कुछ विद्यावाचस्पति नहीं थे तो कुछ ने प्रश्नावली वापिस नहीं की| इस जानकारी को निम्न ग्राफ के माध्यमसे जाना जा सकता है –

आगे ग्राफ दिया जा रहा है – ग्राफ क्रमांक

  1. कुल प्रतिभागियों की संख्या
  2. प्रश्नावली भरकर देनेवालों की संख्या का ग्राफ

ग्राफ क्रमांक १. में कुल प्रतिभागियों की संख्या, जो विद्यावाचस्पति हैं उनकी संख्या तथा जो विद्यावाचस्पति नहीं हैं उनकी संख्या दर्शायी गयी हैं| यू.जी.सी. – एच. आर. डी. सी. समर हिल शिमला द्वारा आयोजित १२४ वे उन्मुखी कार्यक्रम में कुल ३१ प्राध्यापक सदस्य हैं| ये ३१ प्राध्यापक ११ राज्यों से संबंधित हैं पर ९ राज्यों में कार्यरत हैं | यह ९ राज्य इसप्रकार हैं – हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, आसाम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल| १६ विषयों से संबधित ये प्राध्यापक विज्ञान, वाणिज्य, कला, इंजीनियरिंग, पेंटिंग, संगीत, योगा, कंप्यूटर सायंस, फ़ूड टेक्नोलॉजी आदि संकायों से संबधित हैं| अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से हमने इन्हें चार वर्गों में बाँटा है –

  1. कला विभाग
  2. वाणिज्य विभाग
  3. विज्ञान विभाग
  4. अन्य कलाएँ (Performing Art)

ग्राफ क्रमांक १. आगे दिखाया जा रहा है

उपर्युक्त ग्राफ क्र. २ में प्रश्नावली भरकर देनेवालों की संख्या दी गयी हैं| कुल ३१ प्रतिभागियों के ३१ फॉर्म वितरित किए गए| उनमें से २३ प्रतिभागियों ने फॉर्म भककर वापिस कर दिए| २३ में ०२ विद्यावाचस्पति नहीं हैं| शेष ०८ प्रतिभागियों में जिन्होंने फॉर्म वापिस नहीं किया उनमें ०४ विद्यावाचस्पति हैं तो ०४ विद्यावाचस्पति नहीं है| ३१ में से कुल २१ प्रतिभागियों की प्रश्नावली के आधारपर जो अवलोकन किया गया इसे निम्न रूप से प्रस्तुत किया जा रहा है –

शोधकार्यों में उल्लिखित परिकल्पनाएँ (Hypothesis) : अवलोकन

परिकल्पना अर्थात शोध कार्य शुरू करने से पहले किए गए पूर्वानुमान है| ये पूर्वानुमान शोधकार्य के लिए निश्चित लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं| ये अनुमान हैं, सिद्ध हो भी सकते हैं या नहीं भी| यह एक विचार है जो स्वानुभव या परानुभव से भी होता है| शोधकार्य आरंभ करने के पूर्व परिकल्पना का निर्माण आवश्यक है या नहीं, इस पर मतभेद हैं इस मत को प्रतिपादित करते हुए डॉ विनयमोहन शर्मा लिखते हैं – “एक मत के अनुसार परिकल्पना तभी निर्मित की जा सकती है जब विषय का शोधकार्य काफी आगे बढ़ जाता है| क्योंकि शोधकार्य के पूर्व परिकल्पना की स्पष्ट कल्पना नहीं हो सकती| ———- — – – दूसरा मत – जो परिकल्पना को शोधकार्य के पूर्व आवश्यक मानते हैं| ये दोनों मत विषय के प्रकार को देखकर मान्य या अमान्य किए जा सकते हैं| परिकल्पना की व्याख्या करते हुए डॉ. तिलकसिंह लिखते हैं – “शोधकार्य में परिकल्पना या प्राक्कथन का शाब्दिक अर्थ है पूर्व का कथन अर्थात पहले कहना| शोध कार्य में प्राक्कथन का अर्थ है शोध क्षेत्र में प्रवेश की प्रेरणा, विषय विशेष के प्रति संस्कार, शोधकार्य की प्रक्रिया आदि का उल्लेख|

प्रश्नावली में कई प्रतिभागियों ने परिकल्पना की व्याख्या निम्न रूप से की है –

  • परिकल्पना का अर्थ है समस्या के उत्तर के रूप में प्रस्तावित अनुमानों को ही परिकल्पना कहा जाता है| – योगा प्राध्यापक 3
  • परिकल्पना से अभिप्राय है कि जो कार्य हम अपने शोध में करना चाहते हैं उसकी एक रूपरेखा तैयार कर चलना कि मेरे इस शोधकार्य के पश्चात ये परिणाम निकलने चाहिए | – हिंदी प्राध्यापक 4
  • It is a tentative and formal prediction about the relationship between two or more variables in the population being studied, and the hypothesis translates the research question in to a prediction of expected outcomes. So hypothesis is a statement about the relationship between two or more variables that we set out to prove or disprove in our research. Study. – Music Prof 5

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधारपर स्पष्ट होता है कि परिकल्पना शोधकार्य शुरू करने के पूर्व किया गया अनुमान या विचार है जो शोध के दौरान सिद्ध हो भी सकता है नहीं भी| एक परिकल्पना से दूसरी परिकल्पना जन्म लेती है| आज से ३० – ४० साल पहले परिकल्पना की अनिवार्यता के बारे में मतभेद था| आज अनुसंधान प्रविधि में इसे अधिक महत्व दिया जा रहा है| यह शोधकार्य की दिशा निश्चित करनेवाला सोपान है|

कुल २१ प्रश्नावलियों में से १७ शोधार्थियों ने अपने शोधप्रबंध में परिकल्पनाएँ दी हैं| ०४ शोधार्थियों ने परिकल्पनाओं का उल्लेख नहीं किया हैं| अर्थात १९.०४ % शोधार्थी परिकल्पना का अर्थ एवं स्वरूप नहीं जानते| एक दूसरा कारण परिकल्पनाएँ शोध विषय पर निर्भर होती है ऐसा कुछ विद्वानों का मानना है| इसलिए शोध विषय के अनुसार परिकल्पनाएँ कभी आवश्यक होती है तो कभी आवश्यक हो भी नहीं सकती| कुछेक शोधार्थियों की परिकल्पनाएँ अस्पष्ट हैं| कुछ शोधार्थी केवल उदेश्यों के आधारपर निष्कर्ष लिख रहे हैं|

विभिन्न शाखाओं के शोधार्थियों ने निम्न रूप में परिकल्पनाएँ दी हैं –

  • कुल शोधार्थी २१ में कला संकाय के ०७ शोधार्थी हैं | ०७ शोधार्थियों में से ०६ ने परिकल्पनाएँ दी हैं| ०१ शोधार्थी ने परिकल्पनाएँ दी नहीं है| कला संकाय में परिकल्पानाओं का उल्लेख न करनेवाले शोधार्थियों का औसत १४.२८% है|
  • कुल शोधार्थी २१ में से वाणीज्य संकाय के शोधार्थी ०३ हैं | ०३ शोधार्थियों में से ०२ ने परिकल्पनाएँ दी हैं| ०१ शोधार्थी ने परिकल्पनाएँ दी नहीं है| वाणीज्य संकाय में परिकल्पानाओं का उल्लेख न करनेवाले शोधार्थियों का औसत ३३.३३ % है|
  • कुल शोधार्थी २१ में से विज्ञान संकाय के शोधार्थी ०९ हैं | ०९ शोधार्थियों में से ०८ ने परिकल्पनाएँ दी हैं| ०१ शोधार्थी ने परिकल्पनाएँ दी नहीं है| विज्ञान संकाय में परिकल्पानाओं का उल्लेख न करनेवाले शोधार्थियों का औसत ११.११ % है|
  • कुल शोधार्थी २१ में से परफोर्मिंग आर्ट्स के शोधार्थी ०२ हैं | ०२ शोधार्थियों में से ०१ ने परिकल्पनाएँ दी हैं| ०१ शोधार्थी ने परिकल्पनाएँ दी नहीं है| परफोर्मिंग आर्ट्स में परिकल्पानाओं का उल्लेख न करनेवाले शोधार्थियों का औसत ५०.०० % है|

परिकल्पनाओं का उल्लेख न करनेवाले शोधार्थियों का औसत निम्न रूप से देखा जा सकता है- कला संकाय – १४.२८ %

वाणीज्य संकाय – ३३.३३ %

विज्ञान संकाय -११.११ %

परफोर्मिंग आर्ट्स – ५० %

इसे ग्राफ क्रमांक ३ द्वारा अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है|

उपाय :

  1. अनुसंधान प्रविधि में परिकल्पना का स्वरूप अधिक प्रभावपूर्ण पद्धति से समझाया जाए|
  2. शोध निर्देशक अपने शोधार्थियों को परिकल्पनाएँ लिखने के लिए निर्देशित करे|
  3. शोधार्थी की परिकल्पनाएँ निश्चित हुए बिना उसे शोधकार्य में आगे ना बढाएं | ताकि शोधार्थी की शोध के प्रति गंभीरता बढ़ेगी एवं रुचिकर विषय की ओर वह प्रवृत्त होगा|

उद्देश्य एवं निष्कर्ष : एक अवलोकन

शोध कार्य निश्चित उद्देश्य से किया जाता है| विज्ञान के क्षेत्र में नया आविष्कार या किसी समस्या का समाधान करना शोध है| | जैसे इसी उन्मुखी कार्यक्रम के अंतर्गत विविध होटलों में जो खाना परोसा जा रहा है उसके नमूने संग्रहित कर इस अन्न में कितनी मात्रा में जीवाणु है तथा यह अन्न मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं क्या ? इसका परीक्षण कर निष्कर्ष प्रस्तुत किए जा रहे हैं| यहाँ अन्न का परीक्षण कर मनुष्य स्वास्थ्य को बचाना शोध का उदेश्य है| वाणिज्य के क्षेत्र में भी इसी प्रकार किसी नए तथ्य की ओर अनुसंधानकर्ता संकेत करता है| साहित्य भले ही नया आविष्कार न करता हो पर साहित्य अध्ययन का नया आयाम, नई दृष्टि, नया विचार वह जरुर प्रस्तुत करता है| शोध कर्ता पहले से ही निश्चित लक्ष्य लेकर चलता है| अनुसंधान राष्ट्रीय कार्यों में उपयोगी होता है, देश की योजनाओं को दिशा देता है तथा समाज की पुनर्रचना करने में सहायक होता है|

उपर्युक्त उन्मुखी कार्यक्राम में सम्मिलित करीब करीब सभी प्रतिभागियों ने अपने शोध के उदेश्य स्पष्ट रूप से दिए हैं तथा निष्कर्ष भी प्रस्तुत किए हैं| इन शोध कार्यों के विषय जल, अन्न, जैव विविधता, नैनो पार्टिकल , ड्रग्स, इन्डियन स्टॉक मार्केट, निजीकरण, आर्थिक विकास, विशिष्ट भूभाग का भौगोलिक, अध्ययन, केमेस्ट्री के कई विषय, साहित्य में स्त्री, दलित, संगीत में वादन शैलियाँ, आधुनिकता बोध, युगबोध, संगीत का प्रभाव, वाद्य एवं राष्ट्रीयता, पुराण एवं गीता में आचरणीय मूल्य आदि हैं| जैसे एक प्रतिभागी का लक्ष्य कावेरी के जल की शुद्धता-अशुद्धता का अध्ययन करना है| अध्ययनोपरांत उन्होंने पाया कि कावेरी के जल में अशुद्धियाँ हैं| एक प्रतिभागी ने खमिर जनित अन्न का परीक्षण कर यह सिद्ध किया कि खमीर करके पकाया गया खाद्य स्वास्थ्य के लिए अच्छा और सुपाच्य है| एक प्रतिभागी ने उतरांचल राज्य के गठन के पूर्व तथा बाद की स्थितियों का अध्ययन कर यह निष्कर्ष रूप में पाया की उत्तरांचल राज्य के गठन के बाद राज्य एवं मंडल के आर्थिक विकास में गति आयी है| साहित्य के क्षेत्र की अध्ययन कर्ता ने लेखक की आधुनिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि किस तरह मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा में सहायक है इसे स्पष्ट किया| विश्व की आधी आबादी स्त्री की नई छवि प्रस्तुत कर लेखक किस तरह महिला सशक्तिकरण की प्रक्रिया को मजबूत बना रहा है ; इसकी ओर संकेत किया| तो कुछेक शोधार्थियों ने समाज में उपेक्षित तबका दलित की व्यथा कथा के माध्यमसे लेखक किस तरह इनकी स्थिति में बदलाव चाहता है इसकी ओर संकेत किया है| योगा के क्षेत्र में शोध कार्य कर गीता एवं भागवतपुराण के आचरणीय तत्वों की खोज कर मूल्य शिक्षा की राष्ट्रीय नीति में सहायता की है| कलाएँ संस्कृति की संरक्षक होती हैं| संस्कृति को बचाना है तो कला को बचाना जरुरी है यह निष्कर्ष देते हुए एक प्रतिभागी ने कलाकार (वादक) के प्रति सम्मान की भावना विकसित करने की दृष्टि से प्रयास किया है| महाविद्यालय के छात्रों पर संगीत के प्रभाव का अध्ययन कर एक प्रतिभागी ने संगीत के प्रभाव के करण छात्रों में आये परिवर्तनों को रेखांकित किया है|

उपर्युक्त विविध संकायों के विविध विषयों के शोध कार्य का अवलोकन करने के बाद निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि इन शोधकार्यों के उद्देश्य निश्चित ही राष्ट्रीय नीति में सहायक हो सकते हैं| तुलनात्मक शोध कार्य भी हो रहे हैं ; पर इस कार्य में अधिक स्पष्टता आना आवश्यक है| तुलनात्मक शोध कार्य की निश्चित दिशा अभी स्पष्ट होना आवश्यक है| तुलनात्मक शोध कार्य राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा देनेवाले होते हैं| वर्तमान समय अंतर अनुशासनीय ज्ञान शाखाओं का समय है| इन २३ शोधकार्यों में इसका अभाव दिखाई दिया है| साहित्य पर अनुसंधान हो रहे हैं परंतु भाषाओं का अध्ययन नहीं हो पा रहा| भाषावैज्ञानिक शोधकार्यों की कमी भी खलती है| इस परियोजना के शोधकर्ताओं का संबध साहित्य से होने के कारण अन्य संकायों में किस तरह के शोध कार्य होना अपेक्षित है यह बताने में शोधकर्ता असमर्थ हैं | यह इस शोधकार्य की सीमा भी है| इस परियोजना का लक्ष्य बहुत सीमित है| शोधकर्ताओं ने अपने शोधकार्य में परिकल्पनाएँ लिखी है या नहीं और उद्देश्य एवं निष्कर्ष स्पष्ट रूप से दिए गए हैं या नहीं ; केवल इसी का अध्ययन करना है|

निष्कर्ष :

यह परियोजना यू.जी.सी. – एच. आर. डी. सी शिमला द्वारा आयोजित १२४ वे उन्मुखी कार्यक्रम में सम्मिलित प्रतिभागियों के शोधकार्य में परिकल्पनाएँ, उद्देश्य, निष्कर्ष स्पष्ट रूप में दिए जा रहे हैं क्या यह देखने से संबधित है| अनुसंधान प्रविधि से संबंधित तथा अंतर अनुशासनीय यह शोध बहुत कम समय में पूरा किया गया है| शोध विषय बहुत सीमित है| जिस समूह का अध्ययन करना है वह केवल ३१ लोगों का समूह है | परंतु इस छोटे से समूह की सबसे अधिक सशक्त बात यह है कि यह समूह करीब – करीब भारत के व्यापक हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है| ११ राज्यों से जुड़े प्रतिभागी, ९ राज्यों में कार्यरत हैं और १६ विषयों से संबंधित हैं ; यह इस छोटे से समूह की विशेषता है| यह एक दुर्लभ योग है|

शोधकार्य के प्रारंभ में यह अनुमान लगाया गया था कि शोधकर्ता परिकल्पना के स्वरूप को नहीं समझता और न वह अपने शोध प्रबंध में स्पष्ट रूप से परिकल्पनाएँ दे पाता है| प्रश्नावली के आधारपर यह कहा जा सकता है कि यह बात १९.०४ प्रतिशत सच है| यह औसत भी कम नहीं है| अत: यह औसत कम करने की दृष्टि से प्रयास करने होंगे | विभिन्न ज्ञान शाखाओं में इसका औसत कम अधिक है| परफोर्मिंग आर्ट्स में यह बात ५० % सच है तो सबसे कम औसत अर्थात केवल ११.११ % विज्ञान शाखा का है| यह भी अनुमान था कि कला संकाय के लोग परिकल्पनाएँ लिख नहीं पाते| न जाननेवालों में इसी शाखा के लोगों का औसत अधिक होगा| पर शोध कार्य के अंत में यह पता चला कि ८५.७२ % लोग इस प्रविधि से परिचित हैं| साथ ही यह कहना आवश्यक है कि शोधकार्य के उद्देश्य से ये शोधकर्ता भली-भाँती परिचित हैं तथा निष्कर्ष भी स्पष्ट रूप से लिख रहे हैं| अनुसंधान कर्ता को शोध के नए – नए विषयों की ओर बढना चाहिए| खासकर इन सभी शोध प्रबंधों में एक भी प्रबंध अंतर अनुशासनीय नहीं है| वर्तमान समय में अंतर अनुशासनीय शोधकार्यों की ओर बढना अनुसंधान कर्ता का दायित्व है| शोधनिर्देशक को इस प्रकार के शोध कार्यों की पहल करनी चाहिए|

सन्दर्भ ग्रंथ सूची

  1. शोध प्रविधि – डॉ. विनयमोहन शर्मा, नेशनल पब्लिशिंग हाउस , नयी दिल्ली ११०००२, संस्करण १९८० – पृ. ३५.
  2. नवीन शोध विज्ञानं – डॉ. तिलक सिंह, प्रकाशन संस्थान, वसू -२२ नवीन शहादरा, दिल्ली – ११००३२, प्रथम संस्करण १९८२ – पृ. संख्या १५५
  3. प्रश्नावली
  4. प्रश्नावली
  5. प्रश्नावली

संलग्न – ग्राफ

शोध कर्ता

डॉ. रमा प्रकाश नवले

डॉ. प्रेरणा पाण्डेय

डॉ. मंजु पुरी

परसाई : उत्पीड़ित शोषित अवाम की आवाज

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five brown wooden chairs
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परसाई : उत्पीड़ित शोषित अवाम की आवाज

-एम.एम. चन्द्रा

हिंदी साहित्य में गंभीर और प्रतिबद्ध व्यंग्य लेखन कबीर, भारतेन्दु, बालमुकुन्द गुप्त की एक लम्बी परम्परा रही है. परसाई के समय में  गंभीर साहित्यिक व्यंग्य रचना नहीं हो रही थी, साहित्य की इस धारा को साहित्यिक समाज में शूद्र यानि पिछड़ी व हल्की रचना समझा जाने लगा था . परसाई ने अपने समकालीन परिदृश्य की प्रत्येक विसंगति को पैनी नजर से देखना शुरू किया. नतीजन उन्होंने पहली बार लेखक के दायित्वबोध को व्यंग्य लेखन के साथ प्रतिबद्ध लेखन की शुरूआत की, उन्होंने अपने लेखन में यह बात साबित कर दी कि कोई भी लेखक जाने अनजाने में किसी न किसी के प्रति प्रतिबद्ध लेखन करता है. उन्होंने अपने लेखन से आम पाठकों के मन में एक नयी हलचल और मौजूदा संरचना में परिवर्तन के भाव को प्रमुखता के साथ उठाया. उनके इसी नजरिये ने उन्हें एक अलग गंभीर व्यंग्यकार के रूप स्थापित किया. उन्होंने स्वयं कहा है कि मैंने व्यंग्य को शुद्र से धारदार क्षत्रिय के रूप में बना दिया है.

हिंदी साहित्य के इतिहास में व्यंग्य को एक उन्नत धरातल पर पहुँचने वाले परसाई ने व्यंग्य लेखन और जीवन से कभी भी समझौता नहीं किया. समझौताविहीन लेखन के चलते उन्हें बहुत बड़ी कीमत तक चुकानी पड़ी थी (जिसका जिक्र दूसरे आलेख में). जब परसाई ने बहुत ही कम उम्र में जंगल विभाग और अध्यापन की नौकरी छोड़कर स्वतंत्र लेखन करना शुरू किया, यही वो समय था जब पूरा देश आजादी के जश्न में हिलोरें मार रहा था. इस आजादी को लेकर लेखक और लेखक संगठनों में तमाम तरह के मतभेद उभर कर सामने आये. साहित्य में आदर्शवादिता अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी. ऐसा लग रहा था जैसे नई आजादी, नया सपना व एक नया समाज बनने के लिए लोगों के दिलों में जज्बा एकदम साफ दिखाई दे रहा था. साहित्य के लिए समर्पित लोगों ने अपने अपने तरीके से इस आजादी का स्वागत किया. लेकिन कहते हैं कि एक सक्षम व्यंग्यकार की नजर सबसे पहले वहां पड़ती है जहाँ आम पाठक उसे पकड़ नहीं पाता, इसी पकड़ को लेखक आम लोगों तक पहुंचाता है. ऐसे समय में परसाई की व्यंग्य दृष्टि ने उस समय की विसंगतियों की ही तरफ सिर्फ इशारा ही नहीं किया बल्कि एक चेतना युक्त समाज निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे.

परसाई ने अपने लेखन से एक बड़ी आबादी गरीब मजदूर और उत्पीड़ित और शोषित आबादी को बड़े पैमाने पर प्रभावित करने में सफल हुए कि ये आजादी मुकम्मल आजादी नहीं है. परसाई ने अपने लेखन में व्यंग्य को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया और व्यंग्य से उन्हें स्पिरिट मिलने लगी. परसाई अपनी समग्र दृष्टि से समाज की नब्ज को पकड़ रहे थे. देश की आजादी के कुछ दिन बाद जैसे ही उनकी एक व्यंग्य रचना “प्रहरी” में प्रकाशित हुई तो लेखक वर्ग की बेचैनी और परसाई के प्रहार क्षमता को  बड़े पैमाने इंगित किया जाना शुरू हो गया.

परसाई अपने समय की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक संरचना को पकड़ रहे थे. धीरे-धीरे उनकी आने वाली रचनाओं में गरीब, मजदूर और उत्पीड़ित जनता की आवाज को स्पष्ट रूप से सुना जाने लगा. उनकी रचनाओं में आम पात्रों की मजबूत,स्पष्ट और वैचारिक उपस्थित ने उन्हें प्रेमचंद के बाद हिंदी के एकमात्र ऐसे लेखक के रूप में स्थापित किया, जिन्होंने देश की अधिक से अधिक उत्पीड़ित आबादी का प्रतिनिधित्व किया और व्यंग्य के मूल्य, सौन्दर्यबोध को वास्तविक जीवन से जोड़कर दिखाया. उन्होंने व्यंग्य की परंपरागत परिधि को नये सिरे से परिभाषित ही नहीं किया बल्कि  समाज के व्यापक और ज्वलंत मुद्दों को आम जनता से जोड़ने में भी  कामयाब रहे. यही नहीं उन्होंने मजदूर वर्ग के प्रश्नों को अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया.

उनकी व्यंग्य रचनाएँ मन में सिर्फ गुदगुदी पैदा करने के लिए नहीं बल्कि उस समय की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक विसंगतियों को पाठकों के सामने खड़ा कर करती है. उन्होंने जहाँ एक तरफ अपनी रचनाओं के माध्यम से लगातार खोखली होती जा रही तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था पर प्रहार किया, वहीँ दूसरी तरफ इस व्यवस्था में पिसते गरीब मजदूर वर्ग की सच्चाइयों से रूबरू कराते हुए नए समाज निर्माण के लिए उनका  आवाहन भी किया.

परसाई अच्छी तरह से जानते थे कि जब तक वैज्ञानिक चेतना युक्त जनता को लामबंध नहीं किया जायेगा, तब तक किसी भी प्रकार का लेखन बेमानी है. इसीलिए उन्होंने ने तत्कालीन लोकतंत्र के पाखंड और और उनके द्वारा अपनाये जा रहे रूढ़िवादी जीवन–मूल्यों की खिल्ली उड़ाते हुए धार-दार प्रहार किया और अवाम को तर्क, विवेक और विज्ञान–सम्मत दृष्टि लेश किया. उन्होंने अपने व्यंग्य लेखन को एक सामाजिक कर्म के रूप अपनाकर जितनी मजबूती से अवाम की आवाज बनकर उभरे,जिसका कोई भी सानी नहीं है. वे आज भी हिन्दी साहित्य में अनमोल धरोहर है.

परसाई व्यंग्य लेखन के साथ-साथ अवाम में रहकर लोगों को संगठित करने और अवाम की चेतना को विकसित करने का काम भी निरंतर जारी रखा. इसी लिए उन्होंने स्पष्ट शब्दों कहा था कि जब तक लेखक के पास सामाजिक अनुभव नहीं होगा, तब तक वह वास्तविक साहित्य लिखा ही नहीं सकता. उन्होंने समय-समय पर होने वाले सामाजिक एवं राजनीतिक आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और सामाजिक विसंगतियों के प्रति गहरा सरोकार रखा. यही कारण था कि परसाई ने अपने समय का रचनात्मक उपयोग बड़े पैमाने पर करके अपने समय से मुठभेड़ की और नए समाज निर्माण  के सपनों को जिन्दा रखा.

परसाई ने मार्क्सवाद का विधिवत अध्ययन किया और अपने लेखन और जीवन में लागू किया उन्होंने एक स्थान पार लिखा है कि ‘मैं श्रमिक आंदोलन से भी सम्बद्ध हो गया. तभी मेरा संपर्क मुक्तिबोध से हुआ और उन्होंने मेरे मार्क्सवादी विश्वासों को मजबूत तथा दृष्टि को बिलकुल साफ और महीन कर दिया’ . परसाई के बहुत करीबी कान्ति कुमार जैन लिखते हैं कि‘मार्क्सवाद से हुई दोस्ती ने बताया कि परसाई लड़ो, लड़ो अपने लिए ही नहीं, दुनिया के लिए लड़ो, दुनिया को साथ लेकर लड़ो। लड़ने के लिए लेखन को हथियार बनाओ, तुम्हें कालजयी साहित्य नहीं लिखना है- जो साहित्य अपने समय के साथ नहीं है, वह समयजयी क्या होगा। सो पार्टनर स्तम्भ लिखो, कॉलम लिखो, और अंत में लिखो, कबीरा खड़ा बाजार में लिखो,तुलसीदास चन्दन घिसें लिखो, लिखने को हथियार बनाकर लिखो’.

परसाई उत्पीड़ित शोषित वर्ग का प्रतिनिधि करते थे. उनका सम्पूर्ण लेखन इसी वर्ग को समर्पित था. इनके लेखन में गरीबी उत्पीड़न शोषण को आप स्पष्ट रूप से देख सकते है. नौकरी छोड़कर परसाई ने अल्प साधन में लेखन के क्षेत्र में शुरू से लेकर अंत तक बने रहे उनकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ गई थी कि यदि वे चाहते तो बहुत सारी सुख सुविधाओं के साथ किसी बड़े शहर में रहते लेकिन उन्होंने एक छोटे से शहर में ही रहना स्वीकार किया और वही से पूरी दुनिया का अवलोकन और लेखन करते रहे.

आज हम देखते है उनके लेखन को कोई भी देश या जड़वादी धारा बांध नहीं सकी . परसाई का स्वतंत्र चिंतन उत्पीड़ित वर्ग की सतह से जुड़ा हुआ है. उनका लेखन भाषा शिल्प और विचार देश-विदेश की तमाम सीमाओं को पार करता हुआ आगे बढ़ा . परसाई की रचनाएं पहले के समय में भी प्रासंगिक थी और आज भी है और यदि यही स्थिति रही तो भविष्य में भी रहेगी.

परसाई का व्यंग्य लेखन कमजोर वर्ग को हमेशा बल देता रहा, वही शोषक वर्ग को निरंतर भयभीत भी करता रहा. उन्होंने उत्पीड़ित वर्ग की घनघोर जिजीविषा से हमेशा प्रेरणा ली और अपनी व्यंग्य रचनाओं से उनकी जिजीविषा को मजबूत करता रहा. उनका सम्पूर्ण लेखन जीवन से जुड़ा हुआ था, इसीलिए उनका साहित्य आज भी अधिक से अधिक अवाम के साथ आसानी से जुड़ जाता है .

परसाई ने अंधेरे समय में रोशनी और चुप्पी को व्यंग्य के रूप आवाज दी. शासक वर्ग के खिलाफ, अँधेरे के खिलाफ लड़ाई लड़ी. उन्होंने विसंगतियों के खिलाफ लड़ने के लिए व्यंग्य को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया. परसाई जीवन भर विचारधारात्मक और सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर विसंगतियों से लड़ते रहे. परसाई ने बालमुकुंद गुप्त, इंशाअल्ला खाँ, प्रेमचंद की परंपरा को विकसित किया है.

मेरा अपना मत है कि प्रेमचंद के एकमात्र उत्तराधिकारी यदि कोई है तो वो परसाई है. आज परसाई के लेखन कर्म का मूल्यांकन करना वर्तमान पीढ़ी का दायित्व है. यह काम आज भी अधूरा है…..

परंपरागत हिंदी काव्य में चित्रित दलित समाज और जीवन-डॉ. चैनसिंह मीना

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परंपरागत हिंदी काव्य में चित्रित दलित समाज और जीवन

डॉ. चैनसिंह मीना

दलित, स्त्री, आदिवासी, किसान, मजदूर, अल्पसंख्यकों आदि के जीवन संघर्ष और उनसे जुड़े विविध मुद्दों पर हिंदी के परंपरागत काव्य में पर्याप्त विचार विमर्श हुआ है। आधुनिक हिंदी काव्य के अंतर्गत युगीन साहित्यिक प्रवृतियों के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक संदर्भों में भी रचनात्मक लेखन किया गया। परंपरागत काव्य में अनेक गैर-दलित कवियों के नाम सामने आते हैं जिन्होंने दलित जीवन और उसकी समस्याओं पर पूरी संवेदना के साथ भाव और विचार व्यक्त किए हैं। यह बात अलग है कि वर्तमान दलित आलोचकों की दृष्टि में इन रचनाकारों का यह चित्रण सहानुभूति और पूर्वग्रहों से युक्त है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने साहित्यिक और आलोचकीय मान्यताओं द्वारा दलित लेखन में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी है। इस संदर्भ में उनका मत है कि “हिंदी के महान कवियों की रचनाओं को सामने रख कर बात की जाये तो निष्कर्ष स्वयं सामने आ जायेंगे। आधुनिक हिंदी साहित्य के शीर्षस्थ कवियों नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध की रचनाओं में हजारों साल से इस देश की विकास यात्रा को अवरुद्ध कर देने वाली वर्ण-व्यवस्था और उससे उपजी जाति व्यवस्था का उनकी रचनाओं में कहीं मुखर विरोध सुनायी पड़ता है? इनमें से नागार्जुन की ‘हरिजन गाथा’ या त्रिलोचन की ‘नगई महरा’ जैसी इक्का-दुक्का कविताओं को अपवाद मानकर छोड़ दें तो कहीं भी उनका स्वर पीड़ा के साथ स्वयं को नहीं जोड़ पाता है।”[1] यह परंपरागत हिंदी काव्य और आलोचना का यथार्थ है लेकिन तत्कालीन समय और समाज की परिस्थितियों एवं चुनौतियों के संदर्भ में गैर-दलित कवियों के रचना कर्म को रेखांकित करने का प्रयास तो किया ही जा सकता है। दलित जीवन का चित्रण करने वाले रचनाकारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔद्य’, गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, भगवती चरण वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुभद्रा कुमारी चौहान, नागार्जुन, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, धूमिल, केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी इत्यादि नाम उल्लेखनीय हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बड़ी सहजता से यह स्वीकार किया कि समाज में व्याप्त असमानता या भेदभाव का कारण सत्ताधारी वर्ग की वर्चस्ववादी नीतियाँ ही हैं-

‘अपरस, सोला, छूत रचि

किये तीन तेरह सबै

छौंका चौका लाय

बहुत हमने फैलाए अधर्म

बढ़ाया छुआछूत का कर्म।’

कुछ मुट्ठी भर लोग शासन और सत्ता पर काबिज होकर शोषणकारी नीतियाँ बनाते हैं। उल्लेखनीय है कि ऐसी नीतियों से बहुसंख्यक वर्ग व्यापक स्तर पर आक्रांत होता है। अदम गोंडवी ने आजाद भारत की ऐसी ही अकल्पनीय तस्वीर को अपने शब्दों में व्यक्त किया है- ‘सहमी सहमी हर नजर हर पाँव में जंजीर है/ ये मेरे आजाद हिंदुस्तान की तस्वीर है।’ दलित समुदाय के जीवन से जुड़े बिना उसके कष्टों और बिडंबनाओं को समझ पाना किसी के लिए भी विशेषकर समाज की मुख्यधारा के लिए कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य है। दलित समाज का परिवेश, वातावरण, रहन-सहन, वेषभूषा, खान-पान इत्यादि मुख्यधारा के व्यक्ति के लिए असह्य है। मुख्यधारा निरंतर इस समाज के परिवेश से अपने को दूर रखने का प्रयास करती रही है। गाँव और शहरों की सबसे अंतिम बस्ती में रहने वाले दलित समाज का हर शख्स पग-पग पर किसी-न-किसी समस्या या शोषण से आक्रांत है। उदाहरणस्वरूप अदम गोंडवी की कुछ काव्य पंक्तियों यहाँ दृष्टव्य हैं-

‘आइए महसूस करिए ज़िंदगी के ताप को

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में

तट पे नदियों की घनी अमराइयों की छाँव में

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही हैं

तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए

बेचती हैं जिस्म कितनी कृष्णा रोटी के लिए।’

मुख्यधारा से सम्बद्ध संवेदना युक्त कवि जानता है कि छूत-अछूत का भाव महज एक भेदभाव पैदा करने की नीति है। वास्तविक तौर पर ऐसा कुछ नहीं होता। किसी व्यक्ति के द्वारा छू लेने मात्र से कोई अछूत कैसे हो सकता है? अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔद्य’ ने छूत-अछूत भावों और प्रसंगों में अपनी कलम चलाई है-

‘हरिऔद्य’ धरमधुरंधर मुदित होत,

मोह मद बिनसे प्रमादीन के मुये ते,

छाये रहे उर मैं अवनि के अछूते-भाव,

बनत अछूत ना अछूत-जन छूये ते।’[2]

राष्ट्रीय काव्यधारा में महत्त्वपूर्ण स्थान रखने वाले कवि मैथिलीशरण गुप्त ने ‘बुद्ध महाभिनिष्क्रमण’ कविता में राष्ट्र के अंतर्गत अछूत जीवन और उसकी त्रासदी को उकेरने का प्रयास किया है- ‘क्यों अछूत है आज अछूत?/ वे हैं हिंदू कुल संभूत/ गाते हैं श्री हरि का नाम/ आते हैं हम सबके काम/ बने विधर्मी वे अनजान/ मुसलमान किंवा क्रिस्तान/ तो हो जाते हैं सुपृश्य?/ हाय देव क्या दारुण दृश्य?’ भूख और लाचारी की मार सबसे अधिक दलित-दमित समाजों को झेलनी पड़ी है। आधुनिक भारत भी इस समस्या से मुक्त नहीं हो सका। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के काव्य में इस समस्या का व्यापक चित्रण मिलता है-

‘श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं

माँ की हड्डी से चिपक ठिठुर, जाड़ों की रात बिताते हैं।

युवती के लज्जा वसन बेच जब ब्याज चुकाए जाते हैं

मालिक जब तेल-फुलेलों पर पानी-सा द्रव्य बहाते हैं

पापी महलों का अहंकार देता तब मुझको आमंत्रण।’

प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक दलित समाज की समस्याएँ इतनी विकराल हो चुकी हैं कि कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को आहत मन से यह कहना पड़ा- ‘दीन दलितों के क्रंदन बीच/ आज क्या डूब गये भगवान।’ यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अछूत समुदाय के श्रम और जीवन संघर्ष पर ही सवर्ण समुदाय सछूत बना हुआ है या कहें कि उसका अस्तित्व कायम है। सवर्ण समुदाय की नजर में बहुत से कार्य घृणित और हेय हैं। उन सब कार्यों में मजबूरन या जबरन दलित समुदाय संलग्न है। गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ इस संदर्भ में भाव व्यक्त करते हैं कि दलित समुदाय की गैर मौजूदगी में यह कार्य स्वयं सवर्ण समाज को करना पड़ता-

‘सेवक अगर अछूत न होते

कैसे आप अछूते रहते

किसी तरह तो पूत न होते

सेवक अगर अछूत न होते।’[3]

ऐसा नहीं है कि गौतम बुद्ध, संत कबीर, संत रविदास आदि के विचारों ने केवल दलित-दमित या अस्मिता के लिए संघर्षरत समुदाय के लोगों को ही प्रभावित किया। इनके समस्त विचार या वाणियाँ मानवता के हित में थी। इन व्यक्तित्वों की मान्यताओं ने सवर्ण समुदाय के कवियों और उनके विचारों को भी व्यापक स्तर पर प्रभावित किया। इसी प्रभाव के आलोक में मुख्यधारा के काव्य में भी मानवीय भेदभाव की ऐतिहासिक परंपरा का चित्रण मिलता है-

‘एक ही विधाता के अमृत पुत्र, एक देश

कुछ यों अपूत कुछ पूत कैसे हो गए?

सब की नसों में रक्त एक ही प्रवाहित है

कुछ देवदूत कुछ भूत कैसे हो गये?

बंधु श्री वशिष्ठ, व्यास विदुर, पाराशर के

वाल्मीकि वंशज अछूत कैसे हो गये?’

अछूत होने का भाव उसे ही पीड़ित करता है जिसने अछूतपन की त्रासदी को झेला हो। यह याद रखा जाना चाहिए कि इस पीड़ा को किसी एक व्यक्ति ने नहीं बल्कि भारतीय सामाजिक परिदृश्य में करोड़ों व्यक्तियों ने सहा है। कितनी बड़ी बिडंबना है कि ‘वसुधैवकुटुंबकम’ के दर्शन को लेकर चलने वाले देश में करोड़ों लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त करना तो दूर उन्हें छूना तक पाप समझा गया। ऐसी कुंठित मानसिकता और भेदभाव आज भी बदस्तूर जारी है। यह भेदभाव भारतीय सामाजिक संरचना में समरसता की भावना पर प्रश्नचिह्न लगाता है। यहाँ पर भगवती चरण वर्मा की कुछ महत्त्वपूर्ण काव्य पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-

‘अरे ये इतने कोटि अछूत

तुम्हारे बेकौड़ी के दास

दूर है छूने की बात

पाप है आना इनके पास।’

मंदिर प्रवेश दलितों के लिए प्राचीन काल से ही वर्जित रहा। संभवतः मंदिर प्रवेश में पाबंदी के चलते ही मध्यकालीन समय में संत कवियों द्वारा निर्गुण काव्य रचा गया। तत्कालीन समय में संत कवियों के पास इसके अतिरिक्त और कोई विकल्प भी नहीं था। आधुनिक काल में आकार ही मंदिर प्रवेश के संदर्भ में अखिल भारतीय स्तर पर आंदोलन हुए। उल्लेखनीय है कि सभी धर्मों के मूल स्वरूप में जब विकृति का समावेश हो गया तो दलित-दमित वर्गों और स्त्री को दोयम दर्जे पर रखा गया। मंदिर प्रवेश के संदर्भ में भी शूद्र और स्त्री के लिए स्थिति बदतर ही रही। मंदिर प्रवेश के संदर्भ में स्त्री और अछूत जीवन की बिडंबना पर कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपने भाव व्यक्त किए हैं-

‘मैं अछूत हूँ मंदिर में आने का,

मुझको अधिकार नहीं है।

किंतु देवता यह न समझना,

तुम पर मेरा प्यार नहीं है।

प्यार असीम अमिट है फिर भी,

पास तुम्हारे आ न सकूँगी।

यह अपनी छोटी-सी पूजा,

चरणों तक पहुँचा न सकूँगी।’[4]

आधुनिक काल में अनेक सुधार आंदोलनों द्वारा सामाजिक परिवर्तन भी हुए। जाति और वर्ण के संदर्भ में आए कुछ परिवर्तनों को सुमित्रानन्दन पंत ने अपने काव्य में रेखांकित किया है- ‘जाति वर्ण की श्रेणी वर्ग की तोड़ भित्तियाँ दूर्धर/ युग-युग के बंदीगृह से मानवता निकली बाहर।’ छायावाद के बाद की कविता जन की ओर अधिक उन्मुख हुई। देश की आजादी के साथ निम्न वर्गों की सामाजिक प्रताड़नाओं से मुक्ति का संकल्प भी छायावादोत्तर हिंदी कविता में परिलक्षित होता है। ‘आधुनिक हिंदी कविता में दलित चेतना को व्यापक अभिव्यक्ति मिली है। हिंदी कविता का सृजन करने वाले प्रगतिशील कवियों ने दलित-शोषित की पक्षधरता की है। उनके द्वारा रचित कविताओं में शोषित वर्ग के दुख-दर्द को अभिव्यक्ति मिल सकी है। स्वयं दलित न होने पर भी इन कवियों ने शोषित तथा दलितों के जीवन में बदलाव लाने हेतु जन चेतना को जाग्रत किया।’[5] आधुनिक हिंदी कवियों में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का व्यक्तित्व अपनी अलग आभा रखता है। उन्होंने दलित, दमित, मजदूर, किसान, असहाय, स्त्री इत्यादि से जुई समस्याओं का बेवाकी से चित्रण किया। नि:संदेह दलित समाज की समस्याएँ व्यापक हैं। दलित समाज की त्रासदी को भी उन्होंने भली-भाँति पहचाना। इस समाज के दुखों को देखकर वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि-

‘दलित जन पर करो करुणा

दीनता पर उतर आए

प्रभु तुम्हारी शक्ति अरुणा।

हरे तन मन प्रीति पावन।’

दलित समाज को लेकर मुख्यधारा का कविमन सदैव द्वंद से युक्त रहा। पीड़ा के संदर्भ में ईश्वर का स्मरण भी कहीं-न-कहीं उसी व्यवस्था का समर्थन है जो इस समाज के कष्टों का कारण है। जिस ईश्वर और धर्म के नाम पर दलित समाज का शोषण किया गया उसी ईश्वर पर आस्था किसी भी लिहाज से दलित हित में नहीं है। दलित शोषण की दीर्घ परंपरा से निराला भली-भाँति परिचित हैं। निराला ने बीसवीं सदी में उभरती दलित चेतना को निराला को रेखांकित किया है- ‘जिस शूद्र को एक दिन सामाजिक नियमों के लांछन के कारण अवतार श्रेष्ठ श्रीराम के हाथों प्राण देने पड़े थे, वही शूद्र शक्ति आज सहस्त्र रामचंद्रों को पराजित कर देने में समर्थ है। अछूत ही आज भारत के प्रथम गण्य मनुष्य, चिंत्य समस्या है।[6] एक संवेदनशील मनुष्य और कवि होने के नाते उन्हें दलित-दमित वर्गों ऊपर होने वाला शोषण सहन नहीं होता। यही कारण है कि उन्होंने शोषण की परंपरा का शीघ्रता से खात्मा कर सामाजिक न्याय और समता की स्थापना का आह्वान किया-

‘जल्द जल्द पैर बढ़ाओ, आओ आओ।

आज अमीरों की हवेली

किसानों की होगी पाठशाला

धोबी, पासी, चमार, टेली,

खोलेंगे अंधेरे का ताला

एक पाठ पढ़ेंगे टाट बिछाओ

जल्द जल्द पैर बढ़ाओ, आओ आओ।’[7]

दलित समाज भारतीय संस्कृति का निर्माता रहा। आधुनिक भारतीय समाज और नव संस्कृति के विकास की बड़ी ज़िम्मेदारी भी उस पर है। कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ दलित समाज की इस शक्ति से भली-भाँति परिचित हैं-

‘नव संस्कृति के अग्रदूत हैं

पद दलितों की आस।

एक तुम्हारी गति पर अटकी

मानवता की आस।

पर अजेय है आज तुम्हारी

पहले से भी शक्ति

जिसमें मिली विश्व भर के

दलितों की चिर अनुरक्ति।’

दलित शोषण की दृष्टि से नागार्जुन कृत ‘हरिजन गाथा’ कविता बहुत महत्त्वपूर्ण है। 1977 में पटना जिले के बेलछी गाँव में 13 दलित समुदाय के लोगों को जिंदा जला दिया गया था। सामंती समाज और उसी के पक्ष में खड़ा कानून, प्रशासन पूरी तरह इस घटना से अनभिज्ञ एवं मूक बना रहा। क्या यह लोकतंत्र के विपरीत अमानवीय और निंदनीय कृत्य नहीं था? अखिल भारतीय परिदृश्य में ऐसी अनेकानेक दलित नरसंहार की घटनाएँ घटित हुईं हैं। इन अमानवीय घटनाओं को सड़ी-गली, प्राचीन और क्रूर परंपराओं के नाम पर, वर्चस्व के नाम पर ही अंजाम दिया जाता है। उल्लेखनीय है कि इनमें से अनेक घटनाएँ उभरती दलित चेतना और सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा को नेस्तनाबूद करने के उद्देश्य से भी प्रायोजित होती हैं। ‘हरिजन गाथा’ कविता की पंक्तियाँ यहाँ दृष्टव्य हैं-

‘ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि

एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं

तेरह के तेरह अभागे

अकिंचन मनुपुत्र

जिंदा झोंक दिए गए हों

प्रचंड अग्नि की विकराल लपटों में।

साधन-सम्पन्न ऊँची जातियों वाले

सौ-सौ मनुपुत्रों द्वारा!’

‘हरिजन गाथा’ कविता दलित जीवन की त्रासदी को चित्रित करने वाली श्रेष्ठ कविताओं में से एक है। यह कविता न केवल दलित शोषण को रेखांकित करती है बल्कि आज की आवश्यकता के अनुरूप भावी समाज का विकल्प भी प्रदान करती है। डॉ. मैनेजर पाण्डेय के अनुसार ‘इस कविता में भारतीय समाज-व्यवस्था के वर्तमान रूप का यथार्थ चित्र और उसके भावी विकास का संकेत है। भारत के गाँवों में सामंतों द्वारा खेतिहर मजदूरों-हरिजनों के क्रूरतम…. दमन का जैसा प्रभावशाली चित्रण हरिजन गाथा में है, वैसा इस बीच की किसी दूसरी कविता में नहीं है। नागार्जुन इस भयानक यथार्थ का त्रासद चित्रण करके चुप नहीं हो गए हैं। उन्होंने इस यथार्थ के परिवर्तन का संकेत भी दिया है। कविता में एक बच्चे के माध्यम से इतिहास प्रक्रिया व्यक्त हुई है। वह बच्चा इतिहास का बेटा है और भावी इतिहास का निर्माता है।’ मुख्यधारा के कविहृदय जातिप्रथा, धार्मिक कट्टरता, सांप्रदायिकता, भेदभाव एवं अप्रासंगिक प्राचीन रीति-रिवाजों के दुष्परिणामों से भली-भाँति परिचित हैं तथा राष्ट्र और समाज हित में जातिप्रथा को नेस्तनाबूद करने के समर्थक हैं। कवि केदारनाथ सिंह जातिप्रथा के खात्मे के संदर्भ में अपने भाव व्यक्त करते हैं कि-

‘भारत का सृजन अगर

फिर से करना

तो जाति-नामक रद्दी को

फेंक देना अपनी टेबुल के नीचे

टोकरी में।’[8]

भारत में वर्ण व्यवस्था की विकृति, सांस्कृतिक संक्रमण और धार्मिक कट्टरता के नाम पर तमाम संघर्षरत दलित-दमित वर्गों का शोषण किया गया। परंपरागत हिंदी कवियों में से कुछ इस तथ्य को नकारते हैं तो कुछ पूर्णतः स्वीकार करते हैं। वर्ण व्यवस्था की विसंगतियों के दुष्परिणामों को देखकर ही राजेश जोशी यह लिखने को मजबूर होते हैं कि-

‘मेरे मर जाने के बाद

जब लिखा जाए कहीं कि मैं हिंदू था

तो लिखा जाए साफ-साफ कि मैं शर्मिंदा था।’[9]

शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बाद दलित समाज में अधिकार चेतना व्यापक स्तर पर जागृत हुई। आज दलित कविता में शोषण के विरुद्ध कवियों के आक्रोशित स्वर को देखा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि यह आक्रोश न केवल दलित समाज से जुड़े कवियों का है बल्कि गैर दलित कवियों के यहाँ भी दलित-दमित दमन के संदर्भ में पर्याप्त मात्रा में आक्रोश मिलता है। उदाहरण स्वरूप बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की काव्य पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं- ‘लपक चाटते जूठे पत्ते/ जिस दिन देखा मैंने नर को/ उस दिन सोचा क्यों न लगा दूँ आग/ आज इस दुनिया भर को।’ प्राचीन काल से लेकर आज तक समस्या यही रही है कि दलित-दमित समाज जो किसी समय समता और स्वतन्त्रता से युक्त थे उन्हें मुख्यधारा के जीवन से नितांत दूर रखा गया। यह स्थिति आधुनिक काल में कुछ सुधरी लेकिन पूर्णतः खत्म नहीं हुई है। मुख्यधारा के काव्य में स्पष्ट तौर पर यह स्वीकार किया गया है कि यह प्रवृति या अमानवीयता समाज को उन्नति से दूर रखेगी। रूप नारायण पाण्डेय कृत ‘सत्यानाश भयो भारत को’ कविता इस सत्य को सम्मुख रखती है-

‘अपना ही अंग है अंत्यज असंख्य इन्हें,

गले न लगाया तो अवश्य पछताओगे।

ममता के मंत्र से विषमता का विश जो,

उतारा नहीं जाति को तो जीवित न पाओगे।

पक्षाघात पीड़ित समाज जो रहेगा पंगु,

उन्नति की दौड़ में कहाँ से जीत पाओगे।

साधना स्वराज की, सफल कभी होगी नहीं,

अगर अछूतों को न आप अपनाओगे।’[10]

ऐसा नहीं है कि मुख्यधारा के सभी कवि दलित जीवन के विरोधी हैं या उनकी संवेदना झूठी है। एक कवि के नाते संवेदना का प्रस्फुटन गैर दलित कवि में भी स्वाभाविक तौर पर मिलता है। कोई भी शोषक यह घोषित नहीं करेगा कि वह किसी का शोषण कर रहा है। जब दलित समाज के शोषण की बात आती है तो मुख्यधारा भी इसे अधिकांशतः नकारती ही रहती है। लेकिन मुख्यधारा के कुछ कवियों ने दलित समुदाय के प्रति इतिहास के संदर्भ में होने वाली साजिश का पर्दाफाश भी किया है। उदाहरणस्वरूप ऋषवदेव शर्मा की काव्य पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं-

‘तुम्हारे अंधे इतिहास में

तुम्हारी सभ्यता के विकास में

मेरा गला जला जा रहा है

मेरी पीठ सुलग रही है

तेरी आँखों में चिंगारी धधक रही है

मेरे कानों में जलन भर रही है

और मेरी जीभ में चुभन हो रही है

तुम्हारे अंधे इतिहास में

अंकित है

मेरी हत्या का षड्यंत्र।’[11]

भारतीय समाज और संस्कृति के अंतर्गत ‘शस्त्र’ और ‘शास्त्र’ दोनों के जरिये दलित शोषण को व्यापकता से अंजाम दिया गया। रमणिका गुप्ता ने सदियों से चले आ रहे और कभी खत्म नहीं होने वाले शोषण के चक्रव्यूह को ‘अब मूरख नहीं बनेंगे हम’ कविता के माध्यम से स्पष्ट किया है- ‘एक शब्द गीता/ सब्र का जहर/ संतोष की अफीम/ भाग्य का चक्रव्यूह/ निष्काम प्रेम का नशा/ परिश्रम के/ फल से वंचित रखने की साजिश/ परजीवी जमातों का/ सर्जक/ निठल्ले लोगों का स्वर्ग।’ मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं से वंचित समाज और उसकी समस्याओं को बहुलता से चित्रित किया गया है। सुख-सुविधाएँ बाद की बात है अधिकांशतः दलित समाज आज भी जीवन का गुजारा करने के लिए संघर्षरत है, सामाजिक सम्मान से वंचित है। रमणिका गुप्ता ने ‘प्रतिरोध’ कविता में दलित समाज की विद्रोही चेतना का कारण स्पष्ट किया है-

‘हमने तो कलियाँ माँगी ही नहीं

काँटे ही माँगे

पर वो भी नहीं मिले

यह न मिलने का एहसास

जब सालता है

तो काँटों से भी अधिक गहरा चुभ जाता है

तब

प्रतिरोध में उठ जाता है मन—

भाले की नोकों से अधिक मारक बनकर।’

गैर-दलित कवियों ने दलित जीवन के संदर्भ में जो भी कविताएँ लिखी हैं उनकी व्यापक स्तर पर चर्चा हुई। रामचन्द्र शुक्ल कृत ‘अछूत की आह’, सुभद्रा चौहान कृत ‘प्रभु तुम ही जानो’, श्रीहरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘हरिजन बंधु’ भगवती चरण वर्मा कृत ‘हिंदू’, धूमिल कृत ‘मोचीराम’, वीरेन डंगवाल कृत ‘राम सिंह’, विष्णु खरे कृत ‘मैला ढोने की प्रथा’ आदि कविताएँ भी इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। भले ही दलित आलोचक मुख्यधारा के कवियों द्वारा रचित कविताओं को सिरे से खारिज करें या ये कविताएँ वर्तमान दलित कविता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती हों किंतु इन कविताओं में निहित विचार किसी-न-किसी रूप में हिंदी दलित कविता और दलित समाज के सहयोगी अवश्य ठहरते हैं। इन कवियों के विचार जाति, वर्ण, वर्ग, धर्म, समाज, संस्कृति के संदर्भ में मानवीयता पर उसी प्रकार बल देते हैं जैसे दलित समुदाय के कवियों के विचार। दलित समाज के समकालीन यथार्थ से मुँह मोड़ना मुख्यधारा के कवियों के लिए भी आसान नहीं रहा। यह अवश्य है कि इस चित्रण में मुख्यधारा का अपना नजरिया है। डॉ. मैनेजर पाण्डेय के अनुसार ‘हिंदी में दलितों के जीवन पर उपन्यास और कविता लिखने वाले गैर-दलित ने अपने वर्ग और वर्ण-संस्कारों से मुक्त होकर ही दलित जीवन पर लिखा है। फिर भी, उनके लेखन में अनजाने में ही सही, सवर्ण संस्कारों की छाया आ गई है।’[12] जो भी हो हिंदी की मुख्यधारा के रचनाकारों ने दलित जीवन पर जो लिखा है उसे कमतर आँकना साहित्यिक दृष्टि से उचित नहीं। समकालीन समय में इस लेखन का भी अपना महत्त्व है। कथा साहित्य को लेकर प्रेमचंद पर भी तमाम आक्षेप लगाए गए। यहाँ सवाल उठता है कि क्या तत्कालीन समय में दलित जीवन से जुड़े मुद्दों पर प्रेमचंद जैसा साहित्य मिलता है? उस समय के सामाजिक परिवेश में इस तरह का लेखन (जिसे दलित आलोचक सहानुभूति से युक्त साहित्य मानते हैं) भी जोखिम में डालने वाला कार्य था। इसका कारण स्पष्ट है कि तत्कालीन समाज उस सहानुभूति के भी खिलाफ था। उल्लेखनीय है कि मुख्यधारा के काव्य के अंतर्गत दलित जीवन और समाज के संदर्भ में जैसा लेखन किया गया उसे तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही आलोचकों को अपनी राय निर्मित करनी चाहिए न कि पूर्वग्रहों को ओढ़कर।

  1. संदर्भ:-

    ब्रजेश (संपादक); सृजन संवाद, अंक-10, अगस्त 2010, पृ. 142

  2. पंडित नंदकिशोर तिवारी (संपादक); चाँद (अछूत अंक), मई 1927, दूसरी आवृति 2008, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, पृ. 14
  3. पंडित नंदकिशोर तिवारी (संपादक); चाँद (अछूत अंक), पृ. 64
  4. माताप्रसाद; हिंदी काव्य में दलित काव्यधारा, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, सं. 1993, पृ. 76
  5. डॉ. रमेश कुमार; दलित चिंतन के सरोकार, पृ. 93
  6. सुधा, मासिक, लखनऊ, जून 1933, संपादकीय से
  7. विवेक निराला; निराला साहित्य में दलित चेतना, शिल्पी प्रकाशन, इलाहाबाद, 2006, पृ. 85
  8. केदारनाथ सिंह; सृष्टि पर पहरा, राजकमल प्रकाशन, सं. 2014, पृ. 47
  9. शरण कुमार लिंबाले; दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, वाणी प्रकाशन, सं. 2000, पृ. 25
  10. माताप्रसाद, हिंदी काव्य में दलित काव्यधारा, पृ. 77
  11. ऋषभदेव शर्मा; ताकि सनद रहे, तेवरी प्रकाशन, हैदराबाद, 2002, पृ. 56
  12. मैनेजर पाण्डेय; मेरे साक्षात्कार, किताबघर, नई दिल्ली, सं., पृ. 128
    डॉ. चैनसिंह मीना
    सहायक प्राध्यापक
    हिंदी विभाग
    पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज
    दिल्ली विश्वविद्यालय 
    नेहरू नगर, नई दिल्ली-110065
    मो.- 8010081419
    
    ई-मेल- csmeena.foa@gmail.com