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पुस्तक समीक्षा -सपनों के करीब हों आंखें – जयप्रकाश मानस

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black and orange abstract painting
Photo by Pawel Czerwinski on Unsplash
जीवन का मर्म है ‘सपनों के क़रीब हों आंखें
कविता होगी तो ‘
हर लड़ाई के बाद/सिर्फ मनुष्य बच रहेगा/मनुष्य के कुछ स्वप्न होंगे/जिसमें होगी अधिक चहचहानेवाली चिड़िया/और चिड़िया के साथ खिलखिलाती सुबह/कविता होगी तो /बची रहेंगी सारी संभावनाएं/
असीम आशाओं , संभावनाओं  स्वप्न और यथार्थ के बीच समन्वय स्थापित करते हुए सीधे सरल शब्दों की कविताएं हैं ”सपनों के क़रीब हों आंखें‘संग्रह
‘रश्मि प्रकाशन’  लखनऊ से प्रकाशित इस कविता संग्रह को पढ़ते समय कवि कीभाषा की सरलता मनमोहक लगती है ।कविता के शब्द तो बिल्कुल आपके जाने पहचाने हैं पर कविता के भाव में जो दार्शनिकता है ,जो चित्रकारी है वह कवि के कविकर्म को सराहने को मजबूर करती है।इनकी कविताएं पढ़ते समय अशोक वाजपेयी जी की कही कुछ बातें याद आती हैं कि” कविता कोई ख़बर नहीं जो सुनते ही समझ में आ जाए या प्लेट में रखा समोसा भी नहीं कि उठाया और गप से खा लिया।कविता में हर सच अधूरा सच होता है।वह पूरा ही तब होता है जब उसे सुननेवाला या पढ़नेवाला या कविता का रसिक थोड़ा सच अपना  उसमें मिला दे ।”मानस जी की कविताओं के शब्द  बिल्कुल सभी की पकड़ के हैं।वे बहुत कम शब्दों में आपको ऐसी जगहें दिखा देंगे जो पहले आपने देखी तो हैं पर महसूस नहीं की है।इसे महसूस करने के लिए आपको अपना थोड़ा सा सच मिलाना होगा तभी आप कविमन और कविता के मर्म को समझ पाएंगे।
कवि मानस के इस कविता संग्रह में कुल 82 कविताएं नदी की कलकल छलछल की भांति जीवन के हर संघर्ष, हर मनोभाव से,हर हरियाली से,हर गांव,हर घर,हर खेत ,हर रिश्तों, समकालीन सामाजिक , आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक परिस्थितियों के सानिध्य और सरोकारों से होकर गुजरती है।पीछे छूट  गई यादों के कारवां,जीवन संघर्षों को व्यक्त करती आशाओं ,अपेक्षाओं के बीच उलझती सुलझती आगे बढ़ती है।
काव्य संग्रह का मुखपृष्ठ भी संग्रह के नाम  को भली-भांति न्याय देता प्रतीत होता है।जिस तरह व्यक्ति स्वप्न में उलझन को सुलझाने का प्रयत्न करता दिखाई देता है,जिस तरह टूटी कड़ियों को जोड़ने की जद्दोजहद में लगा रहता है , बिल्कुल उसी तरह की उलझन,एक फटे हुए पृष्ठ के कुछ टुकड़े, उसमें नज़र आती नदी व पेड़ की छाया,काले रंगों से बनी कुछ उलझी ,एक दूसरे से मिलती बिछुड़ती आकृतियां,बैंगनी,सफेद ,काले आसमानी और लाल रंग के असमान  चतुर्भुज जैसे जीवन की विसंगतियों का वर्णन कर रहे हों और कह रहे हों कि जीवन कभी भी   पूर्णता को प्राप्त नहीं होता, इन्हीं असमान चतुर्भुजों के बीच आशाओं ,अपेक्षाओं और संभावनाओं का अहसास कराती नियोन रंग की तीन मोटी रेखाएं हैं ,स्वप्न के अहसासी नीले- बैंगनी रंगों से बना मुखपृष्ठ बिल्कुल सपनों की  तरह ही कुछ घटित -अघटित,कल्पना-अतीत और भविष्य का रंग ऊंड़ेलता सा प्रतीत होता है।
  संग्रह के सबसे प्रथम पृष्ठ पर ही कवि ने लिख दिया है  “हर वक़्त मुझे पुकारती गांव की माटी के लिए” इस पंक्ति से ही कविमन की मूल संवेदना, गांव के प्रति आस्था ,प्रतिबद्धता, संस्कृति की याद, गांव के प्रत्येक सजीव -निर्जीव  के प्रति लगाव का भाव उजागर होता है।कवि स्वयं छत्तीसगढ़ की माटी में पैदा हुए हैं इसलिए छत्तीसगढ़ राज्य के गठन पर उनकी कविता उनके मन के उल्लास  का वर्णन करती नजर आती है।
‘अब जो दिन आएगा’/सिर्फ़ एक ही अर्थ होगा/धान की पकी बालियों के झूमने का/ आंखों में जाग उठेगी/नदी की मिठास/पर्वतों की छातियों में/उजास और पूरी-पूरी सांस/आम्र-मंजरियों की हुमक से जाग उठेंगी दिशाएं/
”तरतीब ‘ के अंतर्गत कविताओं के क्रम और उसके पश्चात वरिष्ठ कवि चंद्रेश्वर द्वारा लिखा आमुख है।जो कि अपने आप में कविता संग्रह का आईना है। यहां कवि चंद्रेश्वर ‘कविता संग्रह के मूल भावों को व्यक्त करते हैंऔर लिखते हैं  कि,”आम आदमी की फ़िक्र में लिखी गई कविताएं हैं।मानस की कविताओं के सरोकारके केंद्र में उनके आसपास का मामूली आदमी है।’
 मानस  जी को लोकमन का कवि कहना काफी उचित लगता है क्योंकि वे साधारण मानव मन की सूक्ष्म से सूक्ष्म बातों को जानते हैं और हर उस बात का जिक्र अपनी कविता में करते हैं जिससेआम आदमी किसी न किसी तरह प्रभावित होता है।
”निहायत छोटा आदमी/नयी सब्जी का स्वाद पड़ोस में बांट आता है/निहायत छोटा आदमी/सिरहाने रखता है पुरखों का इतिहास/बूझता है सारा भूगोल/जितना दिखता है/उतना छोटा नहीं होता है/निहायत छोटा आदमी/लहूलुहान पांवों से भी नाप लेता है अपना रास्ता/निहायत छोटा आदमी के छोटे होते हैं  पांव,पर डग भरता है बड़े-बड़े/जैसी पंक्तिया आम आदमी के दमखम को अभिव्यक्त करती हैं।
मानस के कविता संग्रह में कई  आयाम  अभिव्यक्त हुए हैं ।उसी में से एक है सत्ता के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता ।उनकी कविताओं से एक बात तो स्पष्ट होती है कि वे भारतीय प्रजा को आंखें खोलने की सलाह देते हैं ।कविता  ‘ आत्महत्या ‘में लिखते हैं-  जो आत्महत्या नहीं करते /हो सकता है,वे दुनिया से रंचमात्र भी परेशान न हों/पर यह कतई नहीं हो सकता कि/वे दुनिया से नाराज़ और दुखी न हों/
एक दूसरी कविता है ”कुछ लोग सुसायडल नोट नहीं लिख छोड़ते’/कुछ लोग आत्महत्या से पहले/सुसायडल नोट नहीं लिख छोड़ते/इसलिए नहीं/ कि उन्हें लिखना नहीं आता/इसलिए भी नहीं/ कि वे सच के साथ नहीं होते/बल्कि इसलिए/ कि उन्हें पता होता है /पुलिस बड़ी चाव से जांच करती है/लोग गवाहियां भी देते हैं/दोषी को कटघरे में खड़ा किया जाता है/इधर वह जेल की चक्की पीसता है/उधर सारी दुनिया में उसकी जग हंसाई होती है/सिर्फ और सिर्फ इसलिए/कि अचानक एक दिन यही दुनिया/फिर किसी को/आत्महत्या के लिए मजबूर कर देती है।/
इस तरह की कविताएं पढ़ते समय आप ये महसूस करेंगे कि मानस जी को मनोविकारों को पढ़ने की कला आती है।इन कविताओं को पढ़ते हुए आप ये भी महसूस कर सकते हैं कि मानसशास्त्र का कोई पद्यात्मक चैप्टर पढ़ रहे हैं।
मानस जीवन की नश्वरता और शाश्वतता  पर अटूट आस्था रखते हैं और अपनी धरोहरों और संस्कृति के प्रति एक श्रद्धा का भाव रखते  हुए पुरखे कविता में  लिखते हैं कि’हम बहुत पहले से हैं/बहुत बाद तक हमी झिलमिलाते रहेंगे/
”कुछ बचे या न बचे’ में लिखते हैं कुछ संभले या न संभले/कुछ बचे या न बचे/टूटता -बिखरता ढाई आखर जरूर सम्हले/धूप -छांही रंग में संभाल रखना ही है /फिर-फिर उजड़ने के बाद भी/बसती हुई दुनिया को/
‘बचे रहेंगे’ में लिखते हैं- नहीं चले जाएंगे समूचे/बचे रहेंगे कहीं-न-कहीं/बची रहती हैं दो-चार बालियां/पूरी फसल कट जाने के बावजूद/भारी-भरकम चट्टान के नीचे/बची होती हैं चींटियां/बचे रहेंगे ठीक उसी तरह/बच नहीं पाए फिर भी बचे रहेंगे/अनसुने शब्द हवा में स्पंदित/
‘बचे रहेंगे सबसे अच्छे’ में लिखते हैं- अच्छे मनुष्य बचे रहेंगे/उनके हिस्से की दुनिया से/चले जाने के बाद भी/लोककथाओं की असमाप्त दुनिया के/राजकुमार की तरह/
 कवि सच्चाई,अच्छाई, ईमानदारी और खूशबू को बहुमोल बताते हुए कहते हैं कि दुनिया कितनी भी परिवर्तित हो जाए और नश्वरता से टकरा जाए तब भी अच्छाई अनश्वर है वह बची रहेगी और लोगों को प्रेरित करती रहेगी।
कवि आशावादी हैं भविष्य के प्रति वे सकारात्मकता  से लबालब भरे हुए हैं।सपने देखते हैं और सिर्फ इंसानी सपनों की बात नहीं करते तो अन्य सजीवों     के सपनों का भी उल्लेख करते हैं।’सपना’ कविता  में लिखते हैं-कुछ घास/कुछ झाड़ियां/पीठ पर बैठकर गुनगुनानेवाली कुछ चिड़िया/कुछ पोखरियां/कुछ छांवदार पेड़/इससे ज्यादा कुछ भी नहीं/बकरियों के सपनों में/
बिल्कुल एक सर्वहारा वर्ग की तरह सीमित आवश्यकताओं का उल्लेख दिखाई देता है यहां।
कविता’ एक जरूरी प्रार्थना’ में एक पुष्ट बीज के सपने को वर्णित करते हैं-मौत से पहले एक बार जरूर/बीज देख सके भरा -पूरा वृक्ष/
जाग्रत अवस्था में हम अपने क्रियाकलापों, व्यवहार,आचरणों को संनियंत्रित करते हैं परंतु,स्वप्न में ऐसा कोई दबाव कोई बाध्यता नहीं रहती। इसीलिए सपनों में मन स्वतंत्र विचरण करता है।इसी आधार पर प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्रायड ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि”प्रत्येक स्वप्न अतीत की अनुभूतियों और दैहिक संवेदनाओं,विकारों का संयुक्त परिणाम होता है।स्वप्न यह स्पष्ट करता है कि हमारा चेतन मन,हमारी भावनाओं के हाथ का एक खिलौना मात्र है।”कवि मानस भी  स्वप्न में स्वतंत्र विचरण करते  हैं और अपने अचेतन मन में बसी यादों को विभिन्न  भावनाओं द्वाराअभिव्यक्त करते हैं  और इन भावनाओं का स्रोत है’ गांव’।हर वक़्त पुकारती गांव की माटी को समर्पित इस  काव्य संग्रह में कवि ‘कविता ,पत्थर,पानी ‘में  लिखते हैं -ज्यादा दिन  हुए नहीं/कविता में होता था गांव/और गांव में जलाशय/बरगद के नीचे पत्थर/
 गांव की याद
आने के विभिन्न कारण भी हैं ।’मां की रसोईं में’ लिखते हैं -सारे पड़ोस को पता चल जाता है/कौन -सी सब्जी पक रही /यहां आकर /हम भाइयों की भूख एकाएक जाग उठती /गोल घेरे में बैठ जाते पिता और दादा भी/बिना मुंह फुलाए किउन्हें अपने बेटों से कुछ शिकायत है/
कवि यहां गांव, घर,रिश्तों की अहमियत पर बल देते हैं और सहज खुशी और संयुक्त परिवार के महत्व को भी उजागर करते दिखाई देते हैं और ‘एक अदद घर’में लिखते हैं  –जब/मां/नींव की तरह बिछ जाती है/पिता /तने रहते हैं हरदम छत बनकर/भाई सभी/ उठा लेते हैं स्तंभों की मानिंद/बहन/हवा और अंजोर बटोर लेती है जैसे झरोखा/बहुएं/मौसमी आघात से बचाने तब्दील हो जाती हैं दीवाल में/तब/नयी पीढ़ी के बच्चे खिलखिला उठते हैं आंगन-सा/
गांव की धरोहरों को याद करते हुए’खुदाई में आसमान ‘में  लिखते हैं-पितरों की अनझुकी रीढ़ के अवशेष/माखुर की डिबिया/चोंगी सुपाचने वाली चकमक/मूर्ति में दैत्य/देवता के हाथों में त्रिशूल खड्ग वाण/नाचा के मुखौटे/खुदाई में कुछ और चौड़ी होती है धरती /कुछ और ऊंचा उठता है आसमान/
‘याद’ कविता में लिखते हैं याद एक गांव है/पुरखे,रिश्ते-नाते,संगी-साथी हंसते गाते/भरी दोपहरी में महुए की छांव है/
गांव के प्रति उनका लगाव पूरे संग्रह में बिखरा नजर आता है ।भिन्न -भिन्न कविताओं में  भिन्न -भिन्न भाव हैं। गांव से पलायन का दुख है,अकाल में गांव है,बेटी की बिदाई में रीति रिवाजों की जंजीरों में जकड़ा गांव है  ,कर्ज में डूबा गांव है,निरक्षरता गरीबी ,छल-कपट में सिर तक डूबा गांव है,गांव के गीत हैं ,लोकधुन,लोककथा,गांव की नदी,पुरखे,कर्ज में डूबे किसान के खेत वापसी को देखकर हुआ खुशगवार मौसम है, पगडंडियां
हैं ,वनदेवता है।
कवि अपने गांव के किसान की खुशी के सपने देखते हैं।साथ ही यह भी समझते हैं कि आखिर किसान की आत्महत्या के पीछे की  साजिश क्या है। सामाजिक-राजनैतिक घटनाओं और हत्याओं को प्रकृति द्वारा बखूबी प्रस्तुत करते हैं-‘तोते को किसने किया विवश’ में लिखते हैं-तोते को किसने किया विवश/आत्महत्या के लिए/सारे पक्षी जानते हैं/झुरमुट की आड़ में/रचे गए षडयंत्रों की कानाफूसी/सबने सुनी है/तोते के चेहरे पर पसरा/ अंतर्द्व न्द्व/सबने देखा है/कहां पड़े हैं कटे हुए पंख/किस सरोवर में धोए गये हथियार/सबको पता है।/
 सत्ता के षड्यंत्रों और उनमें फंसी जनता की मूर्खता और अंधविश्वास पर  भी ‘बस्तर’ कविता द्वारा बड़ी सरल भाषा में चोट करते नजर आते हैं-मुद्दा यह नहीं /वहां पहले नक्सली पहुंचे या पुलिस/मुद्दा यह है कि/इन दोनों की वहां कभी भी/ कोई जरूरत नहीं थी/
जब विवश हो जाते हैं तो लिखते हैं-आप किधर जाना चाहेंगे ?जब आपके पास सिर्फ दो ही रास्ते बचे हों/पहला हत्या/दूसरा आत्महत्या का/सच -सच बताना/तब/आप किधर जाना चाहेंगे?
कविता ‘दरअसल ‘ में  सत्ता पक्ष और सामान्य जनता की जरूरतों को  ध्यान में रखते हुए कहते हैं  कि ,बहुत नजदीक से ही/ दिखते हैं गांव,खेत और अन्न के दाने/सिर हिलाते बैल,खुर रोपती बकरी,लवठी धरे चरवाहे/धरती से बहुत दूर ऊपर से/केवल मरे हुए जानवरों की सड़ी – गली देह/नि:संदेह/तथ्य अपनी जगह ,अपनी जगह तर्क है/दरअसल/गौरेये और गिद्ध में ज़मीन आसमान का फर्क है/
मानस जी के कविता संग्रह में कुछ बहुत ही छोटी नौ शब्दों की कविता भी अपने आप में गहराई लिए हुए है।’अंतत:’-बाहर से लहू-लुहान/आया घर/मार डाला गया/अंतत:
मानस जी की कविताओं की सूक्ष्म दृष्टि  उनके मानवीय संवेदनाओं को उजागर करती है।
कविता ‘याद न आये जिसे ‘अपने आप में पूरी कहानी है।एक ऐसी कहानी,  एक ऐसा इतिहास है जिससे उसकी प्रगति का अवरोही क्रम दिखाई देता है
।पानी देखते ही नदी/नदी  देखते ही नाव/ नाव  देखते ही नाविक/नाविक देखते ही पतवार/पतवार देखते ही पेड़/पेड़ देखते ही गांव/गांव देखते ही  बढ़ई/बढ़ई देखते ही बसूला/बसूला देखते ही लुहार/लुहार देखते ही धार/धार देखते ही पानी/सबको जोड़ती कोई एक कहानी/याद न आये बरबस जिसे/क्या-क्या याद दिलायें उसे?
सपनों के क़रीब हों आंखें‘काव्य संग्रह में हर वह दृश्य कल्पना है जिसके बीच होकर आपकी आंखें गुजरी होंगी ।इस संग्रह में पत्थर,पानी,मां की रसोई,घर, बाजार,नदी,तीज-त्योहार,रस -रंग-प्यास,मौसम, ,गांव,सपना,पुरखे,प्रार्थना ठूंठ,चिरैया,कुदाल है,आत्महत्या,गोली, चौपाल है,भाव,यादें, तालिबान ,ऊहापोह,श्रद्धांजलि,गीत, तरकीब  और मनोकामना है।
कवि मानस कविता लिखते समय बड़ी ईमानदारी से अपनी प्रेरणा का उल्लेख भी करते हैं।
कवि मानस की पुस्तक की कीमत काफी कम है।पाठक इसे पढ़कर हाथों हाथ लेंगे।पुस्तक पाठक के मानस में एक स्थाई स्थान बना लेगी पाठक प्रेरित होंगे।कवि को उनके कविकर्म हेतु ढेर सारी शुभकामनाएं।
भारती संजीव श्रीवास्तव
शोधार्थी , मुंबई यूनिवर्सिटी
समीक्षक , कवयित्री, शिक्षाविद्

पुल पर बैठा बूढ़ा: मूल कथा : अर्नेस्ट हेमिंग्वे- अनुवाद : सुशांत सुप्रिय

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( अनूदित अमेरिकी कहानी )

पुल पर बैठा बूढ़ा

मूल कथा : अर्नेस्ट हेमिंग्वे

अनुवाद : सुशांत सुप्रिय

स्टील के फ़्रेम वाला चश्मा पहने एक बूढ़ा आदमी सड़क के किनारे बैठा था । उसके कपड़े धूल-धूसरित थे । नदी पर पीपों का पुल बना हुआ था और घोड़ा-गाड़ियाँ , ट्रक , मर्द , औरतें और बच्चे उस पुल को पार कर रहे थे । घोड़ा-गाड़ियाँ नदी की खड़ी चढ़ाई वाले किनारे से लड़खड़ा कर पुल पर चढ़ रही थीं । सैनिक पीछे से इन गाड़ियों को धक्का दे रहे थे । ट्रक अपनी भारी घुरघुराहट के साथ यह कठिन चढ़ाई तय कर रहे थे और किसान टखने तक की धूल में पैदल चलते चले जा रहे थे । लेकिन वह बूढ़ा आदमी बिना हिले-डुले वहीं बैठा हुआ था । वह बेहद थक गया था इसलिए आगे कहीं नहीं जा सकता था ।

पुल को पार करके यह देखना कि शत्रु कहाँ तक पहुँच गया है , यह मेरी ज़िम्मेदारी थी । आगे तक का एक चक्कर लगा कर मैं लौट कर पुल पर आ गया । अब पुल पर ज़्यादा घोड़ा-गाड़ियाँ नहीं थीं , और पैदल पुल पार करने वालों की संख्या भी कम थी । पर वह बूढ़ा अब भी वहीं बैठा था ।

” आप कहाँ के रहने वाले हैं ? ” मैंने उससे पूछा ।

” मैं सैन कार्लोस से हूँ , ” उसने मुस्करा कर कहा ।

वह उसका अपना शहर था । उसका ज़िक्र करने से उसे खुशी होती थी , इसलिए वह मुस्कराया ।

” मैं तो पशुओं की देखभाल कर रहा था , ” उसने बताया ।

” ओह , ” मैंने कहा , हालाँकि मैं पूरी बात नहीं समझ पाया ।

” हाँ , मैं पशुओं की देख-भाल करने के लिए वहाँ रुका रहा । सैन कार्लोस शहर को छोड़ कर जाने वाला मैं अंतिम व्यक्ति था । “

वह किसी गरड़िए या चरवाहे जैसा नहीं दिखता था । मैंने उसके मटमैले कपड़े और धूल से सने चेहरे और उसके स्टील के फ़्रेम वाले चश्मे की ओर देखते हुए पूछा — ” वे कौन से पशु थे ? “

” कई तरह के , ” उसने अपना सिर हिलाते हुए कहा , ” मुझे उन्हें छोड़ कर जाना पड़ा । “

मैं पुल पर हो रही आवाजाही और आगे एब्रो के पास नदी के मुहाने वाली ज़मीन और अफ़्रीकी-से लगते दृश्य को ध्यान से देख रहा था । मन-ही-मन मैं यह आकलन कर रहा था कि कितनी देर बाद मुझे शोर का वह रहस्यमय संकेत मिलेगा ,

जब दोनों सेनाओं की आमने-सामने भिड़ंत होगी । किंतु वह बूढ़ा अब भी वहीं बैठा हुआ था ।

” वे कौन-से पशु थे ? ” मैंने दोबारा पूछा ।

” उनकी संख्या तीन थी , ” उसने बताया । ” दो बकरियाँ थीं और एक बिल्ली थी और कबूतरों के चार जोड़े थे । “

” और आप को उन्हें छोड़ कर जाना पड़ा ? ” मैंने पूछा ।

” हाँ , तोपख़ाने की गोलाबारी के डर से । सेना के कप्तान ने मुझे तोपख़ाने की मार से बचने के लिए वहाँ से चले जाने का आदेश दिया । “

” और आपका कोई परिवार नहीं है ? ” मैंने पूछा । मैं पुल के दूसरे छोर पर कुछ अंतिम घोड़ा-गाड़ियों को किनारे की ढलान से तेज़ी से नीचे उतरते हुए देख रहा था ।

” नहीं , ” उसने कहा , ” मेरे पास केवल मेरे पशु थे । बिल्ली तो ख़ैर अपना ख़्याल रख लेगी , लेकिन मेरे बाक़ी पशुओं का क्या होगा , मैं नहीं जानता । “

” आप किस राजनीतिक दल का समर्थन करते हैं ? ” मैंने पूछा ।

” राजनीति में मेरी रुचि नहीं , ” वह बोला । ” मैं छिहत्तर साल का हूँ । मैं बारह किलोमीटर पैदल चल कर यहाँ पहुँचा हूँ , और अब मुझे लगता है कि मैं और आगे नहीं जा सकता । “

” रुकने के लिए यह अच्छी जगह नहीं है , ” मैंने कहा । ” अगर आप जा सकें तो आगे सड़क पर आपको वहाँ ट्रक मिल जाएँगे , जहाँ से टौर्टोसा के लिए एक और सड़क निकलती है । “

” मैं यहाँ कुछ देर रुकूँगा , ” उसने कहा । ” और फिर मैं यहाँ से चला जाऊँगा । ट्रक किस ओर जाते हैं ? “

” बार्सीलोना की ओर , ” मैंने उसे बताया ।

” उस ओर तो मैं किसी को नहीं जानता , ” उसने कहा , ” लेकिन आपका शुक्रिया । आपका बहुत-बहुत शुक्रिया । “

उसने खोई और थकी हुई आँखों से मुझे देखा और फिर अपनी चिंता किसी से बाँटने के इरादे से कहा , ” मुझे यक़ीन है ,बिल्ली तो अपना ख़्याल रख लेगी । बिल्ली के बारे में फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं । लेकिन बाक़ियों का क्या होगा ? बाक़ियों के बारे में आप क्या सोचते हैं ? “

” मुझे तो लगता है कि शायद आपके बाक़ी पशु-पक्षी भी इस मुसीबत से सही-सलामत निकल आएँगे । “

” क्या आपको ऐसा लगता है ? “

” क्यों नहीं , ” दूर स्थित नदी के किनारे को देखते हुए मैंने कहा । वहाँ अब कोई घोड़ा-गाड़ी नहीं थी ।

” लेकिन वे तोपख़ाने की मार से कैसे बचेंगे जबकि मुझे तोपख़ाने की संभावित गोलाबारी की वजह से वहाँ से चले जाने के लिए कहा गया था ? “

” क्या आपने कबूतरों का पिंजरा खुला छोड़ दिया था ? ” मैंने पूछा ।

” जी हाँ । “

” तब तो वे उड़ जाएँगे । “

” जी हाँ , वे ज़रूर उड़ जाएँगे । लेकिन बाक़ियों का क्या होगा ? बेहतर होगा कि मैं बाक़ियों के बारे में सोचूँ ही नहीं । ” उसने कहा ।

” अगर आपने आराम कर लिया हो , तो मैं चलूँ , ” मैंने कहा । ” अब आप उठ कर चलने की कोशिश कीजिए । “

” शुक्रिया , ” उसने कहा और वह उठ कर खड़ा हो गया , लेकिन उसके थके हुए पैर उसे नहीं सँभाल पाए , और काँपते हुए वह वापस नीचे बैठ गया ।

” मैं तो केवल पशुओं की देख-भाल कर रहा था , ” उसने निरुत्साहपूर्वक कहा , हालाँकि अब वह मुझसे बातचीत नहीं कर रहा था । ” मैं तो केवल पशुओं की देख-भाल कर रहा था । “

अब उसके लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता था । वह ईस्टर के रविवार का दिन था और फ़ासिस्ट फ़ौजें एब्रो की ओर बढ़ रही थीं । वह बादलों से घिरा सलेटी दिन था । बादल बहुत नीचे तक छाए हुए थे जिसकी वजह से शत्रु के विमान उड़ान नहीं भर रहे थे । यह बात और यह तथ्य कि बिल्लियाँ अपनी देख-भाल खुद कर सकती थीं — उस बूढ़े के पास अच्छी किस्मत के नाम पर केवल यही चीज़ें मौजूद

थीं ।

————०————

प्रेषक : सुशांत सुप्रिय

A-5001 ,

गौड़ ग्रीन सिटी ,

वैभव खंड ,

इंदिरापुरम ,

ग़ाज़ियाबाद – 201014

( उ. प्र. )

मो : 8512070086

ई-मेल : sushant1968@gmail.com

पुरूषोत्तम व्यास की कविताएँ

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पुरूषोत्तम व्यास की कविताएँ

अघोषित युध्द….

कहाँ…कहाँ नही

विचारों में

चौराहों में

हर नगर गांव की गलीयों में

बच नही पाता कोई

न कोई बडे-बडे टेक

न कोई मशीनगन

फिर भी चल रहा

अघोषित युध्द…

बोझा पहाड-सा

इसको पकडू

इसको जकडू

नफरत फैलाने वाले आदोंलन…

अलग मैं

मेरे विचार अलग

मेरा झंडा अलग

मेरा एजेडा अलग

मै सबसे अलग…

हिड्डियाँ का साम्राज्य

भडक रहा…तूफान.

नई-नई योजनाओं संग

नये-नये नारों के संग

अघोषित युध्द……

वेक्यूमकिनर 

कितना डर समेटे रहता

नही मालूम

कौन से कोने से

डर भरे विचार आ

जाते…..

तोड़ते रहते हिम्मत

चारों तरफ

टूट टूट के गिर रहे

पहाड़ चारो ओर

हा-हाकार…..

कीजड़ कीजड़

फैली हजारों लाशे

फट पडे बादल…..

स्थिती अतिभयानक

मौंत का ताड़व

भूखे प्यासे भटक रहे…….

टूटा/ टूटा

फटा/ फटा

कटा /कटा

मिटा /मिटा

चल रहे अधंकार के

तरफ…….

सीधी-सरल जीवन शैली

शून्य/ शून्य

दिवश/ दिवश  बीत रहे

चितायें दीमक की तरह

शरीर को खाई जा रही……..

स्थितीयों पर बस नही

ईष्या..

घ़ृणा…

के भाव पालते हुयें……

धोखा….

षड़यत्र…..

लूट खसोट

पेड़ो पर चमगादड़ लटकते हुयें

मांस नोचते हुयें बाज

पखों की घड-घड आवाज

कमरे में गुजंती हुई……….

कहाँ उड़ो मैं

पिघल गई

हिमशिलायें

पूर्ण रूप से झनझोर

देना चाहता विचारो को……..

आरसी में

जब भी आपने आप को देखता

आखों में नफरत ही दिखती……

विचारो की श्रृंखला

खून चूसते हुयें

कीड़े…….

वहम का बहुत बड़ा

साम्राज्य

टूट टूट के गिर रहे

हरे हरे पत्ते…….

मंथता रहता

बस मे नही

करवटे बदलती रहती…

स्थितीयाँ

अभिशाप

प्रेम के फूल महकते

नही

भड़की हुई आग

धुआँ का अता पत्ता नही

बारिस का मौसम

टिन पर बूदों की आवाज…….

दिवारों पर पपड़ीयाँ

घाव भी हरे हो जाते….

समझोंता

गंदगी मन-में

कोनसे वेक्यूमकिनर का उपयोग किया जायें…….।

पुरूषोत्तम व्यास

C/o घनश्याम व्यास

एल.जी 63 नानक बगीचे के पास

शांतीनगर कालोनी

नागपुर(महाराष्ट)

ई-मेल pur_vyas007@yahoo.com

मो. न. 8087452426

पुरस्कार

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पीडीऍफ़ को वर्ड में कैसे बदलें जानिये हिंदी में …(एसआरके टेक्नीकल)

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पीडीऍफ़ को वर्ड में कैसे बदलें जानिये हिंदी में

कई बार हमको इन्टरनेट पर लेख इत्यादि पीडीऍफ़ में मिलते हैं ऐसे में यदि आप इसे वर्ड फाईल में बदलना चाहें तो कैसे बदलेंगे वह भी बिना किसी सॉफ्टवेयर के. आइये जानते हैं हिंदी में एसआरके टेक्नीकल द्वारा. वीडियो के साथ चैनल को सब्सक्राईब अवश्य करें ताकि यह जानकारी आपको मिलती रहे-
सब्सक्राईब करने के लिए- https://www.youtube.com/channel/UCoJ0L3nfEtjd8MA-MdhrnxQ

वीडियो यहाँ देखें-

पीठ पर रोशनी

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समय की रोशनी में खिलता जीवन का चेहरा

समीक्षक: राहुल देव

 

‘पीठ पर रोशनी’ युवा कवि नीरज नीर का दूसरा कविता संग्रह है जिसे मुंबई के प्रलेक प्रकाशन ने सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रकाशित किया है। संग्रह की शुरुआत में ही कवि अपनी काव्यप्रक्रिया के बारे में स्पष्ट कर देता है, ‘मेरी कवितायेँ मेरे नितांत निजी अनुभवों, संवेदनाओं की अभिव्यक्ति हैं, जो व्यष्टि से समष्टि की ओर उन्मुख होने का प्रयत्न करती है।’ वह ईमानदारी के साथ आगे कहता है, ‘मेरे लिए मेरी कवितायेँ उदासियों के अँधेरे घेरे से बाहर उजाले में निकलने की जीवंत कोशिश है।’ कवि की यह साफगोई आगे उसकी कविताओं में भी साफ़ झलकती है।

इस कविता संग्रह की कविताओं को पांच भागों में बांटा गया है- आग की कवितायेँ, पानी की कवितायेँ, वायु की कवितायेँ, आकाश की कवितायेँ, क्षितिज की कवितायेँ जोकि कहीं न कहीं जीवन के लिए आवश्यक पंच महाभूतों- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा को प्रदर्शित करती हैं। यह सारे खंड कहीं न कहीं एक दूसरे से माला के मोतियों जैसे जुड़े हुए से प्रतीत होते हैं। कवि ने बड़ी कुशलता से इन्हें कविता की शक्ल दे दी है।

नीरज नीर के इस नए संग्रह की कविताओं से गुज़रते हुए अक्सर स्मृतियों के बियाबान का सन्नाटा अपना मौन तोड़ता नज़र आता है। उसकी चिंताओं में मनुष्य की मनुष्यता को बचाया जाना हरदम शामिल रहा है। जैसे वर्ग वैषम्य को दर्शाती ‘अलग-अलग चिंताएं’ शीर्षक कविता। प्रेम, मानवीय रिश्ते और भावनाएं, जीवन जगत और प्रकृति जगत के कुछ सुलगते हुए प्रश्न हमारे समकालीन सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने का सहज विश्लेषण करते हैं। अपनी ‘बाज़ार’ शीर्षक कविता में कवि बाजारवाद की भयावहता को लक्ष्य करते हुए मानो हमें चेतावनी देते हुए सा कहता है, ‘बाज़ार ने पैदा की है/ नई नस्ल/ जो स्वयं बाज़ार से दूर रहकर/ बाज़ार को पहुंचा रहा है/ हमारे घरों के अन्दर’। आगे संग्रह की ‘भूख और युद्ध’ शीर्षक कविता में नीरज लिखते हैं, ‘हम जिस दिन समझ जायेंगें/ भूख, युद्ध से बड़ी चुनौती है/ समाप्त हो जायेगा/ युद्ध का भय’।

संग्रह में स्त्री को लेकर कुछ बेहतरीन कविताएँ पढ़ने को मिलती हैं। हालाँकि इसके बावजूद संग्रह में कुछ औसत कविताएँ भी शामिल हैं। आदिवासी विमर्श की अधिकांश कविताओं को पढ़ते हुए एक सामान्य विसंगति मुझे अक्सर देखने को मिलती है वह है विकास की दुहाई देते हुए विकास कार्यो को कोसने की प्रवृत्ति। इस कंट्राडिक्शन से नीरज भी नही बच सके हैं। संग्रह की ‘जंगल का विकास वाया सड़क’ तथा ‘पीठ पर रोशनी’ शीर्षक कविता ऐसी ही है। ‘पीठ पर रोशनी’ के पहले पैरा और अंतिम पैरा पढ़कर मेरी बात की पुष्टि की जा सकती है। शायद नक्सल समस्या को क्रांतिकारिता की इकहरी दृष्टि से देखने के कारण हमारे साहित्यकार इसके दूसरे पक्ष से सर्वथा अनभिज्ञ नज़र आते हैं।

इसके बावजूद कवि नीर की काव्य कहन-शैली बिलकुल भी कठिन नही है। कविता में भाषा की कूट रचना कवि को कतई पसंद नही। अपने भाव-भाषा-शिल्प में वे स्वयंसिद्ध होती हैं। विचार और भाव का सुन्दर समन्वय इन कविताओं की विशेषता है। अपनी ‘चिड़ियाँ और शिकारी’ शीर्षक कविता में कवि कहता है- ‘तोप से नही बरसेंगें फूल/ तोप के मुँह में घोंसला बना लेने से,/ तोप नहीं समझता है/ प्रेम की भाषा…’। संग्रह की अन्य उल्लेखनीय कविताओं की बात करूँ तो उनमे ‘बन्दर हांक रहा शेरों को’, ‘मीडिया’, ‘सीखना आदमी से’, ‘खून का स्वाद’, ‘मतलब’, ‘महानगर’, ‘आज़ादी’, ‘भक्ति’, ‘हत्यारे’ का नाम लिया जा सकता है।

अपनी ‘शह के बात मात’ शीर्षक कविता में कवि मनुष्यद्रोहियों को चेतावनी देते हुए कहता है, ‘शहर में आग लगाने से पूर्व/ देख लीजिये/ आपका घर शहर के बीचो-बीच तो नही।’ यह पंक्तियाँ पढ़कर राहत इन्दौरी का चर्चित शेर याद आता है कि, ‘लगेगी आग तो आयेंगें सभी ज़द में/ यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है।’ तो वहीँ रोने की कला नामक कविता में वह तल्ख होकर कह उठता है, ‘हत्यारे रोने की कला में/ माहिर होते हैं’।

नीरज नीर हिंदी कविता के उन युवा हस्ताक्षरों में हैं जिन्हें अभी लम्बी यात्रा तय करनी है। उनके कविता संग्रह की इन कविताओं में हमारा समकालीन समय सांस लेता हुआ हमेशा जिंदा मिलता है। इस कविता संग्रह का हिंदी के कविता प्रान्त में खुलकर स्वागत किया जाना चाहिए।

पीठ पर रोशनी/ कविता संग्रह/ नीरज नीर/ प्रलेक प्रकाशन, मुंबई/ 2021/ पृष्ठ 152/ मूल्य 200/-

पिया परदेश में है ए सखी उनको मनाऊँगी

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नवगीत…

पिया परदेश में है ए सखी
उनको मनाऊँगी
न वे आए तो उनके बिन
न इक दीपक जलाऊंगी
उन्हें यह क्या पता कि
हमने कैसे दिन गुजारे हें
की उनकी याद में व्याकुल
हुए आँसू बहाए हैं
दिवाली आ गई आ जाओ
न तुमको सताऊंगी
पिया परदेश में है
ए सखी उनको मनाऊँगी
गए व्यापार करने को वे
अपना छोड़कर घर द्वार
कबूतर ले गया है खत
कि वे बैठे हुए उस पार
में वादा करती हूँ साजन
न अब तुमको सताऊंगी
पिया परदेश में है ए सखी
उनको मनाऊँगी ।
कटी है रात विरहन में
सपन उस पर भी देखें है
बताऊं कैसे उनको उनके
बिन हम कितना तड़पे है
मेरा मन बार बार
द्वार की साँकल बजाता है
मेरी बैचेनी का किस्सा
उन्हें सपनों में आता है
मेरा दिल रो रहा है
फिर भी मै उनको हँसाउंगी
पिया परदेश में है ए सखी
उनको मनाऊँगी
तुम्हे यह क्या पता
हिचकी हमारी कैसे रुकती है
सजल आँखों से अश्रु धार
बालम कितनी बहती है
विरह की आग में झुलसे है
अब हमको न तड़पाओ
अरज है तुमसे ओ सरताज
अपने घर चले आओ
करो विश्वास मेरा
में तुम्हे दिल मे बसाऊंगी बसाऊंगी
पिया परदेश में है ए सखी
उनको मनाऊँगी ।
नही आए तो में तुम बिन
नही दीपक जलाऊँगी
पिया परदेश में है ए सखी
उनको मनाऊँगी ।
……
अनिल गुप्ता
8, कोतवाली रोड़ उज्जैन

पितृसत्ता: अर्थ, उत्पत्ति एवं व्यापकता-पूजा मिश्रा

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woman in black tank top climbing on brown rocky mountain during daytime
Photo by Fionn Claydon on Unsplash

पितृसत्ता: अर्थ, उत्पत्ति एवं व्यापकता

*पूजा मिश्रा

सारांश:

प्रस्तुत आलेख द्वारा वैश्विक स्तर पर स्त्री की दोयम स्थिति के आधारभूत और महत्वपूर्ण कारक के रूप में पितृसत्ता को परिभाषित किया गया है। पितृसत्ता को मूलरूप से समझने के लिए इसके उत्पत्ति संबंधित मतों पर ध्यान देना आवश्यक है अतः पितृसत्ता को सार्वभौमिक और सार्वकालिक घोषित करने वाले विभिन्न मतों के साथ ही मानवविज्ञानी, सैली स्लोकम, इतिहासकार गर्डा लर्नर तथा मार्क्सवादी फ्रेडरिक एंगल्स इत्यादि द्वारा इन मतों का खंडन करने वाले तर्क भी प्रस्तुत किए गए हैं जिससे यह सत्यापित हो सके कि पितृसत्ता, सार्वभौमिक और सार्वकालिक नहीं है। पितृसत्ता की व्यापकता का अनुभव विश्व की लगभग प्रत्येक संस्कृति और समाज में किया जा सकता है परंतु यदि सम्मिलित प्रयास किए जाएं तो निश्चय ही पितृसत्ता और मातृसत्ता से परे एक समतामूलक समाज की स्थापना की जा सकती है।

बीज शब्द:

पितृसत्ता, मातृसत्ता, स्त्रीविमर्श, सामाजिक संरचना, शिकारी पुरुष, आदिम समाज

भूमिका:

पितृसत्ता अंग्रेजी के शब्द ‘पैट्रिआर्की’ का हिंदी अनुवाद है तथा ‘पैटर’ और ‘आर्के’ शब्दों से मिल कर बना है अर्थात ‘पिता का शासन’। पितृसत्ता एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसमें परिवार की संपूर्ण बागडोर घर के वृद्ध अथवा प्रभावशाली पुरुष के हाथ में होती है। परिवार में वंश पिता के पूर्वजों के अनुसार चलता है। ऐसी पारिवारिक व्यवस्था में सत्ता का हस्तानांतरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक पुरुष से दूसरे पुरुष के हाथों होता रहता है। भारत ही नहीं वरन विश्व के अधिकांश भागों में पितृसत्तात्मक व्यवस्था का ही अनुसरण किया जाता है। स्त्रीवादी विशेषज्ञों ने स्त्री की सामाजिक दोयम स्थिति का मूलभूत कारण पितृसत्ता को ही घोषित किया है। केट मिलेट ने अपनी पुस्तक ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’ में स्त्री के ऊपर पुरुष वर्चस्व की स्थिति के लिए ‘पितृसत्ता’ शब्द का प्रयोग किया था। विभिन्न स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा पितृसत्ता व्यवस्था की व्याख्या की गई है। प्रसिद्ध समाज शास्त्री सिल्विया वाल्बे के अनुसार “पितृसत्ता सामाजिक संरचना की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें पुरुष महिला पर अपना प्रभुत्व जमाता है, उसका दमन करता है और शोषण करता है।”[1] स्त्रीविमर्श के विभिन्न संप्रदायों में से एक ‘उग्र स्त्रीवाद’ पितृसत्ता की जिस प्रकार से व्याख्या करता है , वह अनेक स्त्रीवादी विद्वानों को संतुष्ट नही करती है। ‘उग्र स्त्रीवाद’ स्त्रियों की प्रजनन क्षमता को उसकी अधीनता के मुख्य कारकों में गिनता है। ‘उग्र स्त्रीवाद’ यह मानता है कि यदि स्त्री प्रजनन की अनिवार्यता को हटा दिया जाए तो पुरुषों पर निर्भर रहने की उनकी विवशता स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। शुल्मिथ फायरस्टोन अपनी पुस्तक ‘द डायलेक्टिक ऑफ़ सेक्स’ द्वारा इसी विचारधारा का समर्थन करती हैं परंतु अन्य स्त्रीवादी विद्वान मानते हैं कि हमारा समाज जाति, जेंडर, नस्ल, वर्ग और धर्म इत्यादि के आधार पर बंटा हुआ है अतः पितृसत्ता के अनुभव प्रत्येक स्त्री के लिए एक से ही नहीं हैं। उदाहरंणस्वरूप देखा जा सकता है कि निम्न जातियों की स्त्री का शोषण मात्र पितृसत्ता ही नहीं वरन जाति व्यवस्था द्वारा भी किया जाता है। वह पुरुषों की अधीनता के साथ ही उच्च वर्ग की स्त्रियों द्वारा भी शोषण का शिकार होती है। इसी प्रकार निम्न जाति के पुरुष भी उच्च जाति की स्त्रियों द्वारा शोषित होते हैं। तात्पर्य यह है कि अन्य स्त्रीवादियों ने उग्र स्त्रीवादियों के पितृसत्ता संबंधी विचारों पर अपना मत रखते हुए कहा कि सामाजिक संरचना एक जटिल संरचना है और इसका विभाजन मात्र स्त्री और पुरुष को दो भिन्न खेमों में रख कर नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार ‘बैरेट’ और ‘शीला रोबोथम’ जैसे स्त्रीवादी विद्वान पितृसत्ता की अवधारणा को अनुपयोगी करार देते हैं। इस संदर्भ में सिल्विया वाल्बी कहती हैं कि, “इस सिद्धांत को अनुपयोगी मानने की अपेक्षा इसे एक संकल्पना और सिद्धांत के रूप में इस तरह से विकसित किया जा सकता है कि स्त्री अधीनता की देश, काल, जाति, नस्ल, वर्ग तथा धर्म इत्यादि पर आधारित भिन्नताएं नजरअंदाज ना होने पाएं।”[2]

इसप्रकार पितृसत्ता को लेकर विभिन्न विद्वानों के विभिन्न मत हैं परंतु ध्यान देने वाली बात यह है कि पितृसत्ता एक व्यवस्था है, पितृसत्ता एक मानसिकता है। यह जरुरी नहीं है कि सभी पुरुष पितृसत्तात्मक मानसिकता का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। बहुत सारी स्त्रियाँ भी पुरुषवादी सोच का प्रतिनिधित्व करती हैं। पितृसत्ता, सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण अंग कैसे बनी या पितृसत्ता कब से विद्यमान है इस संबंध में विभिन्न मत हैं। पितृसत्ता के पक्षधर इसे मानव सभ्यता का एक स्वाभाविक अंग मानते हुए इसे सार्वभौमिक और सार्वकालिक घोषित करते हैं परंतु इस संबंध में हुए गहन शोध के उपरांत विभिन्न इतिहासकारों, स्त्रीवादी विद्वानों तथा मानव विज्ञानियों इत्यादि द्वारा इस तथ्य की पुष्टि की गई है कि पितृसत्ता , मानव सभ्यता के विकास का एक स्वाभाविक अंग न होने के साथ ही सार्वभौमिक और सार्वकालिक भी नहीं है। “समाज और संस्कृति निर्माण की प्रक्रिया में महिलाएं सदैव ही केंद्रीय भूमिका में रही हैं न कि हाशिए पर।”[3]

पितृसत्ता उत्पत्ति संबंधी मत:

पितृसत्ता की सार्वभौमिकता और सार्वकालिकता के संबंध में धार्मिक तर्क दिए जाते हैं जिनके अनुसार संपूर्ण विश्व का निर्माण ईश्वर द्वारा किया गया है और ईश्वर द्वारा ही स्त्री और पुरुष के लिए अलग- अलग भूमिकाओं का निर्धारण किया गया है। स्त्री का जन्म घर सँभालने और बच्चों की देखभाल करने के लिए ही हुआ है। आज भी इन धार्मिक तर्कों पर विश्वास रखने वाले परिवार का वंश आगे बढ़ाने के लिए पुत्र जन्म अनिवार्य मानते हैं। पुत्रवधुओं को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया जाता है। पितृसत्ता के पक्षधरों द्वारा पितृसत्ता की सार्वभौमिकता के लिए ‘शिकारी पुरुष’ का तर्क दिया जाता है। मानव विज्ञानी शेरवुड वाशबर्न और सी. लैंकैस्टर ने पितृसत्ता के संबंध में डार्विन के उद्विकास सिद्धांत( थ्योरी ऑफ़ इवोल्यूशन) के आधार पर ‘शिकारी पुरुष’ का तर्क प्रस्तुत किया। यह तर्क डार्विन की कृतियों ‘ओरिजिन ऑफ़ स्पेशीज’ और ‘द डिस्टेंट ऑफ़ मैन’ में उद्धृत मानव विकास की लंबी शृंखला पर आधारित है। इस अवधारणा के अनुसार आदिम समाज में पुरुष शिकार पर जाया करते थे और स्त्रियाँ घर पर बच्चों की देखभाल करती थीं तथा भोजन की व्यवस्था करती थीं। ‘शिकारी पुरुष’ का तर्क पुरुष को स्त्री के आश्रयदाता के रूप में स्वीकार करता है। मानव विज्ञानी सैली स्लोकम ‘शिकारी पुरुष’ की अवधारणा को मानवशास्त्रियों की पुरुषवादी दृष्टि की उपज बताती हैं।[4] वह शिकारी पुरुष की अपेक्षा स्त्री और पुरुष दोनों को ही आहारसंग्रहकर्ता की भूमिका में देखती हैं। स्लोकम मानती हैं कि यदि पुरुष शिकार पर जाते थे तो इस समय को स्त्रियों ने बच्चों के पालन-पोषण के साथ ही कुछ रचनात्मक गतिविधियों में लगाया होगा यथा कंदमूल एकत्र करना और आरंभिक काल की कृषि की ओर अग्रसर होना। इतिहासकार गर्डा लर्नर भी मानती हैं कि आदिम समाज, भोजन के लिए पुरुषों द्वारा जुटाए गए बड़े शिकारों की अपेक्षा स्त्रियों द्वारा जुटाए गए छोटे शिकारों तथा कंदमूल पर अधिक निर्भर था।[5] इस प्रकार के तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि शिकार संग्रह अवस्था में भले ही स्त्री और पुरुष के बीच श्रम विभाजन रहा हो परंतु आदिम समाज में पुरुष, स्त्री के आश्रयदाता की अपेक्षा उसके पूरक के रूप में देखे जाते थे। भारतीय इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने मध्य भारत की भीमबेटका की गुफाओं के भित्तिचित्र का उदाहरण दिया है। इन भित्तिचित्रों में स्त्रियाँ एक साथ विभिन्न भूमिकाओं में नजर आती हैं। स्त्रियों के हाथ में फल- फूल बटोरने की टोकरी के साथ मछली पकड़ने का जाल भी नजर आता है। इन भित्तिचित्रों से यह स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ माँ होने के साथ ही आहार संग्रहकर्ता की भूमिका भी निभाती थीं।[6] पितृसत्ता के पक्षधरों में नाम जीव-विज्ञानी ई. ओ. विल्सन का भी आता है। विल्सन, स्त्री और पुरुष के बीच की असमानता को उचित ठहराने के लिए डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत का सहारा लेते हैं। विल्सन का मत है कि जिस समूह में मादाएं बच्चों को पालने पोसने का काम करती हैं और नर भोजन जुटाने का काम करते हैं वह समूह विकास की राह पर आगे निकल आता है।[7] इतिहासकार गर्डा लर्नर, विल्सन के इस मत का खंडन करती हैं कि आज के आधुनिक समाज में जहाँ बच्चों का पालन- पोषण मात्र माँ पर ही निर्भर नहीं करता है तथा जहाँ स्त्रियाँ भी बाहर जाकर आत्मनिर्भर बन रही हैं वहां इस तरह की धारणा निर्मूल हो जाती हैं। लर्नर, प्राचीन और आधुनिक समाज दोनों में ही ऐसे कबीलों का उदाहरण देती हैं जहाँ शिशु के पालन- पोषण का दायित्व कबीले के वृद्ध पुरुष, युवक अथवा अपेक्षाकृत बड़े बच्चे निभाते हैं। नारीवादी आलोचकों द्वारा भी विल्सन के इस मत को अप्रमाणिक एवं अवैज्ञानिक घोषित किया गया है। पितृसत्ता की उत्पत्ति उसकी सार्वभौमिकता तथा सार्वकालिकता को लेकर उसे सामाजिक व्यवस्था का एक स्वाभाविक अंग घोषित करने वाले विद्वानों की स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा कड़ी आलोचना की गई है। गर्डा लर्नर ने अपनी पुस्तक ‘क्रिएशन ऑफ़ पैट्रीआर्की’ में लिखती हैं कि, “पितृसत्ता की स्थापना को मात्र किसी एक घटना से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि इसे एक प्रक्रिया की भांति समझा जा सकता है जिसे बनने में लगभग 2500 वर्ष( 3100 से 600 ईसा पूर्व) लगे हैं।”[8] गर्डा लर्नर से पूर्व यह मत फ्रेडरिक एंगल्स द्वारा भी दिया जा चुका है कि पितृसत्ता का निर्माण एतिहासिक घटनाक्रमों में कुछ निश्चित कारणों से हुआ है। फ्रेडरिक एंगल्स ने 1884 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्यों की उत्पत्ति’ में स्त्री पराधीनता के मुख्य कारकों के संबंध में विस्तार से चर्चा की है। एंगल्स ने अपनी इस पुस्तक द्वारा परिवार के इतिहास को समझाने के लिए 1861 में प्रकाशित बखोफेन की पुस्तक ‘मदर राईट’ तथा 1870 में प्रकाशित हेनरी मार्गन की पुस्तक ‘प्राचीन समाज’ की सहायता ली है। पितृसत्ता पारिवारिक संरचना से जुड़ा हुआ शब्द है अतः पितृसत्ता की व्याख्या के लिए एंगल्स आदिम समाज में पारिवारिक संरचना की व्याख्या करते हैं। एंगल्स के अनुसार 1861 में बखोफेन की पुस्तक के प्रकाशन के बाद से परिवार के इतिहास का अध्ययन आरंभ हुआ। बखोफेन की पुस्तक मूलरूप से जर्मन में ‘Das Mutterrecht’ के नाम से लिखी गई थी जिसमें ‘मातृ अधिकार’ नाम से एक अध्याय है। यह पुस्तक आदिम सामाजिक व्यवस्था के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर प्रकाश डालती है। बखोफेन के अनुसार आदिम समाज ‘यौन स्वछंदता’ या हैटेरिज्म की स्थिति में था जिसमें एक स्त्री के विभिन्न पुरुषों से संबंध होते थे। इस अवस्था में किसी नवजात शिशु के पिता का निर्धारण नहीं किया जा सकता था। अतः शिशुओं की पहचान माँ द्वारा ही होती थी और वंश भी मातृ पूर्वजों के नाम से ही चलता था। बखोफेन के अनुसार यह वह समय था जब स्त्रियों को समाज में बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। बखोफेन के मातृ अधिकार की अवधारणा से ही मातृसत्ता की अवधारणा विकसित होती है। बखोफेन हैटेरिज्म से एकनिष्ठ विवाह में परिवर्तन और मातृसत्ता से पितृसत्ता में परिवर्तन के पीछे यूनानी सभ्यता में हुए धार्मिक परिवर्तनों का आधार देते हैं। इसके लिए उन्होंने इस्खिलिस के नाटक ‘ओरेस्टिया’ की नई व्याख्या दी। इस नाटक के अनुसार ‘ओरेस्टस’ को अपनी माता ‘क्लिटेमिस्ट्रा’ की हत्या के आरोप से बरी कराने के लिए देवता अपोलो तथा देवी ऐथना ओरेस्टस का साथ देते हैं। बखोफेन रोमन सभ्यता में आए इस पौराणिक बदलाव को ही मातृसत्ता के विनाश का आरंभ मानते हैं। “बखोफेन द्वारा प्रस्तुत आदिम समाज में उपस्थित मातृसत्ता की अवधारणा से बीसवीं सदी के अधिकाँश नारीवादी विचारक सहमत हैं। फ्रेडरिक एंगल्स, चार्लोट पर्किंसन, गिलमैन तथा एलिजाबेथ कैंडी स्टैंटन इत्यादि विचारकों ने बखोफेन की अवधारणा के अनुसार स्त्री- पराधीनता पर अपने मत प्रस्तुत किए हैं।”[9] फ्रेडरिक एंगल्स निजी संपत्ति के आविर्भाव को मातृसत्ता के विनाश का कारण मानते हैं। एंगल्स ने परिवार शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा कि परिवार या फेमिली शब्द फेम्युलस (famulus) शब्द से बना है जहाँ फेम्युलस शब्द का अर्थ ‘घरेलू दास’ होता है। फेमेलिया शब्द का अर्थ एक व्यक्ति के सारे दासों का समूह होता है। रोमन लोगों द्वारा निर्मित इस सामाजिक संगठन फेमेलिया में उसके मुखिया के अधीन उसकी पत्नी, उसके बच्चे और कुछ दास होते थे। और रोमन पितृसत्ता के अंतर्गत उसके हाथों में इन लोगों की जिंदगी और मौत का अधिकार होता था। एंगल्स ने घर के मुखिया की निरंकुश सत्ता को इंगित करते हुए लिखा, “पत्नी के सतीत्व की रक्षा करने के लिए यानि बच्चों के पितृत्व की रक्षा करने के लिए नारी को पुरुष की निरंकुश सत्ता के अधीन बना दिया जाता है। वह यदि उसे मार भी डालता है तो वह अपने अधिकार का ही प्रयोग करता है।”[10] फ्रेडरिक एंगल्स ने निजी संपत्ति की अवधारणा के साथ ही स्त्री अधीनता के लिए स्त्रियों की उत्पादन में भागेदारी न होने को भी दोषी ठहराया। घरेलू श्रम के दायरे में सीमित हो जाने के कारण स्त्रियाँ सामाजिक उत्पादन के क्षेत्रों से दूर होती जाती हैं। एंगल्स मानते हैं कि, “जब तक स्त्रियों को सामाजिक उत्पादन के काम से अलग और केवल घर के कामों तक ही, जो निजी काम होते हैं, सीमित रखा जाएगा तब तक स्त्रियों का स्वतंत्रता प्राप्त करना और पुरुषों के साथ बराबरी का हक़ पाना असंभव है और असंभव ही बना रहेगा।”[11] परंतु एंगल्स के तर्कों की भी स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा आलोचना की गई। लर्नर ने यह स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं है कि विश्व की हर संस्कृति में घरेलू कार्यों की जिम्मेदारी मात्र स्त्री की ही होती है। क्रिश हर्मन मानती हैं कि स्त्री के इन्हीं घरेलू कार्यों की जिम्मेदारी उठाने से ही कृषि का विकास हुआ। स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा एंगल्स की इसलिए भी आलोचना की गई क्यों कि उन्होंने मातृसत्ता और मातृवंशीयता को एक दूसरे का पर्याय समझा। इसके अतिरिक्त एंगल्स की निजी संपत्ति के आविर्भाव से स्त्री अधीनता के पथ पर अग्रसर हुई इस तथ्य को प्रायः सभी स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा गलत साबित किया गया जिसमें मुख्यतः संरचनावादी मानवविज्ञानी क्लाउड मेलेसा, इतिहासकार गर्डा लर्नर तथा मानव विज्ञानी पीटर आबी प्रमुख हैं। इस प्रकार “आधुनिक मानवविज्ञानियों द्वारा बखोफेन और एंगल्स की आदिम समाज में मातृसत्ता के अस्तित्व की अवधारणा को निरस्त किया गया है। आधुनिक मानवविज्ञानी ‘मातृसत्ता’ की अपेक्षा ‘मातृस्थानिकता’ तथा ‘मातृवंशीयता’ शब्द को अधिक उपयुक्त मानते हैं।”[12] गर्डा लर्नर लिखती हैं कि, “मैं मातृसत्ता को पितृसत्ता के विलोम के रूप में परिभाषित कर सकती हूँ और इस परिभाषा के अनुसार मैं निष्कर्षतः यह कह सकती हूँ कि मातृसत्तात्मक समाज कभी भी अस्तित्व में नहीं रहे हैं।”[13] लर्नर की इस पुष्टि के साथ ही यह भी तथ्यात्मक सत्य है कि भारत में केरल के नायर संप्रदाय और पूर्वोत्तर भारत के गारो, खासी और जयंतिया समुदाय में ‘मातृस्थानिकता’ और ‘मातृवंशीयता’ के साथ ही ‘मातृसत्तात्मक व्यवस्था’ का प्रभाव भी देखा जा सकता है। गर्डा लर्नर ने अपनी पुस्तक ‘क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की’ में पितृसत्ता के विविध पक्षों पर गंभीर विचार किया है। लर्नर का मानना है कि पितृसत्ता को एक घटना के रूप में नहीं वरन प्रक्रिया के रूप में देखने की आवश्यकता है। पितृसत्ता उत्पन्न नहीं हुई वरन मानव सभ्यता के विकास के पथ पर ग्रसर होने के साथ क्रमशः निर्मित होती चली आई है। इसके पीछे किसी एक कारक की भूमिका न होकर विविध कारकों का हाथ है। लर्नर यह नहीं मानती कि पितृसत्ता एक सोची समझी साजिश का परिणाम है। लर्नर कहती हैं कि स्त्री- पुरुष के बीच का श्रम विभाजन आगे के वर्षों में स्त्री को अधीनता के पथ पर अग्रसर कर देगा इसका स्त्रिओं को जरा सा भी भान नहीं था। ‘सेपियंस’ पुस्तक के लेखक युवाल नोआह हरारी मानते हैं कि स्त्री और पुरुष को दो भिन्न- भिन्न खेमों में बाँटना यह ज्यादा कुछ सांस्कृतिक और काल्पनिक सत्य पर निर्भर करता है न कि जैव वैज्ञानिक सत्य पर। स्त्रीत्व और पुरुषत्व सामाजिक भिन्नताओं के साथ बदलता रहता है। किसी जीव के सेक्स का निर्धारण जीव विज्ञान के आधार पर किया जाता है किन्तु जेंडर या लिंग का निर्धारण सांस्कृतिक आधार पर किया जाता है। हरारी मानते हैं कि मानव विकास की प्रक्रिया में लगभग सभी समाज कृषि क्रांति के बाद से पितृसत्तात्मक ही रहे हैं। अतः हरारी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि “पितृसत्तात्मक व्यवस्था जैववैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित न होकर मिथकों पर आधारित है।”[14] संरचनावादी मानवविज्ञानी क्लाउड लेवी स्त्रास संस्कृति के निर्माण के लिए स्त्री- पराधीनता की आवश्यकता पर पर एक सैद्धांतिक व्याख्या देते हैं। “स्त्रास के अनुसार आदिम और खानाबदोश जनजातियों में स्त्रियों की अदला- बदली ही स्त्री- पराधीनता का मूल है।”[15] शेरी ऑटनर ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था की उत्पत्ति और स्त्री पराधीनता पर अपना मत प्रस्तुत करते हुए 1974 के एक निबंध में लिखा था कि “अभी तक के सभी ज्ञात आदिम समाज में स्त्रियों का संबंध संस्कृति की अपेक्षा प्रकृति से ज्यादा प्रगाढ़ रहा है। लगभग प्रत्येक समाज एवं संस्कृति में मानव द्वारा विकास पथ पर अग्रसर होने में प्रकृति की उपेक्षा की गई है। जिसका सीधा असर स्त्रियों पर भी पड़ा है।[16]

इस प्रकार स्त्री- पराधीनता के मूल तथा पितृसत्तात्मक व्यवस्था की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न मत हैं। जिनका एक संक्षिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

पितृसत्ता: व्यापकता

जब से स्त्री विमर्श के विद्वानों द्वारा स्त्री की दोयम स्थिति और उसके अधीनता के कारकों के रूप में पितृसत्ता को परिभाषित किया गया है तब से यदि देखा जाए तो पितृसत्ता की व्यापकता हमें जीवन के हर मोड़ पर दिखाई देगी। “ स्त्री का अपना होना और उस होने की प्रक्रिया की सारी अर्थवत्ता अब तक पितृसत्ता निर्धारित करती आई है। चूँकि कोई ‘दूसरा’ यानी पुरुष जाति उसका निर्धारण करती है इसलिए स्त्री की अपनी स्वायत्तता नहीं रहती। उसका वस्तुकरण हो जाता है। स्त्री के संदर्भ में यह एक ऐतिहासिक सच है।”[17] विश्व की प्रत्येक संस्कृति में इस सत्ता के पोषकों द्वारा स्त्रियों को हमेशा दब कर रहने की हिदायत दी जाती। धार्मिक रूप से भी इस सत्ता का सदैव समर्थन किया गया है। भारतीय धर्मशास्त्र की आधारशिला कही जाने वाली मनुस्मृति में पतिसेवा को ही स्त्रियों के अग्निहोत्र कर्म के तुल्य बताया गया है।[18] पति यदि सदाचारहीन, कामी या विधादि गुणों से हीन भी हो तो वह पूज्य है।[19] मुस्लिम धर्म ग्रंथ ‘सुरा बकारा’ की आयत 223 में स्त्री को उसके पति द्वारा चरने के लिए तैयार अनाज का खेत कहा गया है।[20] यह पितृसत्ता की व्यापकता ही है कि स्त्री चेतना के शुरूआती दौर में स्त्रियों को अपने मौलिक नागरिक अधिकारों के लिए भी संघर्ष करना पड़ा। चाहे वह वोट देने का अधिकार हो, चाहे वह संपत्ति में हिस्से का अधिकार हो या फिर तलाक लेने का अधिकार हो। 1929 में अपनी पुस्तक ‘ए रूम ऑफ वंस ओन’ में वर्जीनिया वूल्फ इस दोयम स्थिति के संदर्भ में एक प्रश्न पूछती हैं कि यदि शेक्सपियर की कोई बहन होती तो क्या उसे भी अपने कौशल को विकसित करने के वही समान अवसर मिलते जो शेक्सपियर को मिले थे?[21] स्त्री शिक्षा के सीमित अवसरों और संसाधनों की ओर इंगित करते हुए वर्जीनिया लिखती हैं कि, “आप (पितृसत्तात्मक समाज) चाहें तो अपने पुस्तकालयों पर ताला लगा सकते हैं। पर कोई दरवाजा, कोई ताला ऐसा नहीं है जिससे आप मेरी मानसिक स्वतंत्रता को अवरुद्ध कर सकें।”[22] वर्जीनिया वुल्फ के प्रश्न और कथन तब और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं जब स्वयं वर्जीनिया और उनकी बहन की शिक्षा- दीक्षा घर में ही संपन्न हुई जबकि उनके भाइयों को प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ने का अवसर मिला। सीमंतनी उपदेश की अज्ञात लेखिका 1882 में स्त्री- पुरुष की तुलना करते हुए महिलाओं पर थोपे गए धार्मिक पाखंडो, रीति- रिवाजों पर प्रश्न उठाती हैं।[23] बीसवीं सदी के शुरूआती दौर में महादेवी वर्मा अपने निबंधों के संग्रह ‘शृंखला की कड़ियाँ’ में स्त्रियों के मूल नागरिक अधिकारों की मांग करते हुए लिखती हैं कि “हमें न किसी पर जय चाहिए, न किसी से पराजय, न किसी पर प्रभुता चाहिए, न किसी का प्रभुत्व। केवल अपना वह स्थान, वे स्वत्व चाहिए जिनका पुरुषों के निकट कोई उपयोग नहीं है, परंतु जिनके बिना हम समाज का उपयोगी अंग बन नहीं सकेंगी। हमारी जागृत और साधन संपन्न बहनें इस दिशा में विशेष महत्वपूर्ण कार्य कर सकेंगी इसमें संदेह नहीं।”[24] स्त्री चेतना के फलस्वरूप स्त्री की सामाजिक दोयम स्थिति के विरोध में विभिन्न प्रयास किए जा रहे हैं। लिंग समानता के पुरजोर प्रयास किए जा रहे हैं परंतु इन लक्ष्यों में सबसे बड़ी बाधा पितृसत्तात्मक व्यवस्था की व्यापकता ही है। आज स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अधिकांश अपराधों के मूल में पितृसत्तात्मक व्यवस्था की वह मानसिकता ही है जो विभिन्न अपराधों द्वारा पुरुषों की स्त्रियों पर श्रेष्ठता साबित करना चाहती है।

निष्कर्ष:

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि पितृसत्ता पर हुए गहन अध्ययन के उपरान्त इसे सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक कहना उचित नहीं है और न ही इसे मानव सभ्यता के विकास का स्वाभाविक अंग समझना चाहिए। स्त्रीवादी विद्वानों ने मातृसत्ता के अस्तित्व को नकारने के साथ ही स्त्रियों के सदैव पराधीन रहने के तथ्य को भी नकारा है। स्त्रीवादी दृष्टिकोण से पितृसत्तात्मक व्यवस्था की जांच- पड़ताल का मुख्य उद्देश्य लिंग- समानता की स्थापना तथा किसी भी लिंग विशेष के आधिपत्य से मुक्ति है। इस दिशा में यदि सकारात्मक प्रयास किए जाएँ तो निश्चित रूप से एक ऐसी व्यवस्था उभर कर आएगी जो मातृसत्तात्मक अथवा पितृसत्तात्मक होने की अपेक्षा मानव संभावनाओं के सभी द्वारों को सभी के लिए समान रूप से खुला रखेगी।

*शोधार्थी

प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी, कोलकाता

9674380830

pooja.shukla2607@gmail.com

  1. फरहत खान एवं डॉ. अरुणा सेठी द्वारा लिखित आलेख, भारत में लिंग असमानता, Indian Streams Research Journal
  2. विजय झा द्वारा लिखित आलेख, पितृसत्ता: विमर्श के भीतर, कथादेश, मार्च 2019, पृ. सं.- 64
  3. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, भूमिका
  4. सैली स्लोकम का आलेख, आहार संग्रहकर्ता की भूमिका में स्त्री: मानवशास्त्र की पुरुषवादी दृष्टि, अनुवाद- रंजना श्रीवास्तव, कथादेश, मार्च 2019, पृ. सं.- 13
  5. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 22
  6. विजय झा द्वारा लिखित आलेख, पितृसत्ता: विमर्श के भीतर, कथादेश, मार्च 2019, पृ. सं.- 66
  7. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 19
  8. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, भूमिका
  9. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 26
  10. एंगल्स फ्रेडरिक, परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति, प्रगति प्रकाशन, मास्को, पृ. सं.- 73
  11. एंगल्स फ्रेडरिक, परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति, प्रगति प्रकाशन, मास्को, पृ. सं.- 208
  12. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 29
  13. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 31
  14. युवाल नोआह हरारी, सेपियंस, विंटेज प्रकाशन, लंदन, पृ. सं.- 178
  15. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 24
  16. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 26
  17. पितृसत्ता के नए रूप, संपादक: राजेंद्र यादव, प्रभा खेतान, अभय कुमार दूबे, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. सं.- 16
  18. मनुस्मृति, संपादक- पंडित हरिशंकर शास्त्री, साक्षी प्रकाशन, दिल्ली, पृ. सं.- 38
  19. मनुस्मृति, संपादक- पंडित हरिशंकर शास्त्री, साक्षी प्रकाशन, दिल्ली, पृ. सं.- 16
  20. अग्रवाल रोहिणी, साहित्य का स्त्री स्वर, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. सं.- 08
  21. वुल्फ वर्जीनिया , ए रूम ऑफ वंस ओन’, फिंगर प्रिंट क्लासिक, (प्रकाश बुक्स इंडिया)
  22. वुल्फ वर्जीनिया , ए रूम ऑफ वंस ओन’, फिंगर प्रिंट क्लासिक, (प्रकाश बुक्स इंडिया), पृ. सं.- 81
  23. सीमंतनी उपदेश, संपादक: डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
  24. वर्मा महादेवी, शृंखला की कड़ियाँ, लोकभारती पेपरबैक्स, इलाहबाद, पृ. सं.- 23-24

पाठ्यक्रमों के द्वारा जेण्डर संवेदनशीलता : चित्रलेखा अंशु

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पाठ्यक्रमों के द्वारा जेण्डर संवेदनशीलता 

चित्रलेखा अंशु
पी-एच.डी.
स्त्री अध्ययन विभाग
chitra.anshu4@gmail.com 
वर्धा, महाराष्ट्र 
समाज में बच्चों को कई तरह के व्यावहारिक पाठशालाओं से होकर गुजरना पड़ता है । प्राथमिक रूप से परिवार में बच्चों को नैतिक और चारित्रिक शिक्षा दी जाती है वहीं स्कूल के स्तर से बच्चों के व्यावहारिक ज्ञान का विकास पुस्तकों के माध्यमों से होता है । यही वह आधारभूत समय होता है जब एक बच्चे की चेतना विभिन्न माध्यमों से गहराई से विकसित की जाती है । यही वह प्राथमिक समय भी होता है जब एक बच्चे को पाठ्यक्रमों के द्वारा सैद्धांतिक बातें भी सिखाई जाती है जिसका प्रभाव ताउम्र उनके मानो-मस्तिष्क पर पड़ता है । हमारे समाज में एक मुहावरा बहुत प्रचलित है, ‘जैसा बोओगे वैसा काटोगे’ अर्थात हम बच्चों के प्रारम्भिक जीवन में उन्हें जैसी शिक्षा देंगे उसका प्रभाव अंतिम समय तक वैसा ही बना रहेगा । सकूल के स्तर से ही सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक रूप से बाल मन में जेण्डर की समझ विकसित की जा सकती है। समाज में होने वाले अधिकतर हिंसात्मक वारदातें इसी आधारभूत शिक्षा के अभाव में होती हैं । कभी-कभी पढ़े-लिखे लोग भी घटनाओं को अंजाम देते हैं लेकिन वह अपवाद के रूप में शामिल है । किन्तु अधिकतर घटनाएँ अल्पशिक्षा, गरीबी और सामाजिक बंदिशों के कारण देखी जाती है । 
16 दिसंबर की वह रात लंबे समय तक लोग नहीं भूल सकते जब महिला स्वतंत्रता की सैद्धांतिक बातों की धज्जियाँ चौराहे पर उड़ाई गई थी । आज तीन साल बाद का परिदृश्य भी महिला स्वतंत्रता के नाम पर अधिक नहीं बदला है क्योंकि समाज के पितृसत्तात्मक मानसिकता से लैस कुछ लोग अपनी कुंठित मनोवृत्ति से उबर नहीं पा रहे हैं । जहाँ स्त्री स्वतंत्रता उनके तथाकथित पुरुषत्व को चुनौती देती है । कोर्ट ने डाक्यूमेंट्री सिनेमा ‘इंडियास डौटर’ के प्रदर्शन पर बैन लगा दिया गया । बीबीसी की इस सिनेमा को लेसली उडविन ने निर्देशित किया है जो 16 दिसंबर 2012 को हुए ‘निर्भया बलात्कार कांड’ पर आधारित है । इसीलिए उस कुंठित मानसिकता का विश्लेषण होना चाहिए जो इस सिनेमा में न केवल दिखाया गया है बल्कि समाज में वह मानसिकता आज भी बड़ी संख्या में फल-फूल रही है जो महिला विरोधी है । इस सिनेमा को देखने के बाद जेण्डर और संवेदना की बहस और भी तेज हो गई है कि किस प्रकार एक अपराधी और उनका डिफेंस वकील एक जैसे महिला विरोधी तालिबानी स्टेटमेंट दे रहे हैं । प्रश्न यह उठता है एक अशिक्षित अपराधी और एक पढ़े-लिखे वकील की मनोवृत्ति एक जैसी कैसे हो सकती है ? उत्तर लगभग यह है कि उनकी शिक्षा-दीक्षा में जेण्डर को लेकर असंवेदनशीलता का होना तथा उनकी संकीर्ण रूप से की गई परवरिश । इसमें आधारभूत पाठ्यक्रमों की प्रमुख भूमिका के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक कारण भी जुड़े हुए हैं । किन्तु सबसे प्रमुख मुद्दा उनके ज्ञान तथा उनके विकास से जुड़ा हुआ है। अत: हम उन बातों पर विचार-विमर्श करेंगे कि सामाजिक रूप से जागरूकता बढ़ाने के कार्यक्रमों के अतिरिक्त बुनियादी रूप से पाठ्यक्रमों को आधारभूत स्तर से जेण्डर संवेदनशील कैसे होना चाहिए ? एक समस्या फिर जन्म लेती है कि अपराधी किस्म के लोगों की शिक्षा-दीक्षा न के बराबर होती है तो ऐसे लोगों के लिए जेण्डर संवेदनशीलता हेतु क्या उपाय किए जाएँ ? चूंकि यह एक आधारभूत प्रश्न है जिसका उत्तर लाचारी, गरीबी, बेरीजगारी और भूख के सवालों से अंतरसंबंधित है। 
साक्षरता तथा सशक्तिकरण के क्षेत्र में नारीवादी साक्षरताकर्मी कई राज्यों के गाँवों में जाकर महिलाओं को विभन्न माध्यमों से शिक्षित करने का प्रयास कर रही हैं । लेकिन साथ ही उनका मानना यह है कि, “नारीवादियों के लिए ये मुद्दे लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं, परंतु भारत के स्त्री आंदोलन में साक्षरता और शिक्षा की राजनीति का मुद्दा प्राय: हाशियाई सरोकार ही रहा है”।[1] तात्पर्य यह है कि इस प्रकार के हाशिएकरण की स्थिति ने पाठ्यक्रमों में स्त्री विषयक मुद्दों के समावेश हेतु किसी भी तरह की कोई आवाज नहीं उठाई। परिणामस्वरूप इतिहास से तो महिलाएँ एक समय के बाद गायब कर ही दी गईं साथ ही आधारभूत पाठ्यक्रमों से भी उनके योगदान को नज़रअंदाज़ कर दिया गया । पितृसत्तात्मक समाज में जेण्डर की उपेक्षा के फलस्वरूप महिलाओं को इसका परिणाम हिंसा तथा अपराध के रूप में समय-समय पर भुगतना पड़ता है । 
हमें सदैव यह पढ़ने तथा सुनने को मिलता है कि शिक्षा से ही व्यक्ति सशक्त होता है । पाउलो फ्रेरो ने तो “शिक्षा को वंचितों का हथियार तक कहा है”। और जो व्यक्ति शिक्षित है वह सशक्त है किन्तु उसके सशक्त होने से पितृसतात्मक समाज को कोई सरोकार क्यों नहीं है। शिक्षा को स्त्री मुक्ति का आधार के रूप में चिन्हित किया गया है किन्तु पितृसत्तात्मक समाज उसे स्वच्छंदता के परिचायक के रूप में क्यों लेता है। यह प्रश्न जेण्डर के मनोवैज्ञानिक सामाजीकरण से गहराई से जुड़ा हुआ है। ब्रानविन डेविज के अनुसार, “लैंगिक भूमिका के समाजीकरण सिद्धांत में लैंगिक भूमिका के शारीरिक आधार को मान लिया जाता है तथा व्यस्क अपने बच्चों को जो ‘भूमिकाएँ’ सीखाते हैं, उनको ‘वास्तविक’ शारीरिक विभेद पर परत की तरह बिछा दिया जाता है। यह एक सतही सामाजिक चादर भर होती है । इन दोनों विश्वासों में इस आशय का भ्रम बहुत गहरा है कि कोई व्यक्ति वास्तव में क्या है और वह वैसा क्यों बन जाता/ जाती है”।[2]
उपरोक्त विवरण बच्चों के प्री स्कूलिंग से जुड़ा हुआ है जिसके परिप्रेक्ष्य में सीमोन दि बउआर ने अपनी पुस्तक ‘द सेकेंड सेक्स’ में 1949 में ही यह बात सपष्ट कर दी थी कि, “स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि स्त्री बनाई जाती है”[3] । तात्पर्य यह है कि प्री-स्कूल से ही जेण्डर की आधारभूत समझ पारिवारिक प्रशिक्षण के मध्यम से होता है जिसमें व्यस्कों की बहुत बड़ी भूमिका होती है । अत: जेण्डर की संवेदना और समझ के लिए प्रशिक्षण देने वाले व्यस्कों के लिए किस प्रकार की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि वे अपने बच्चों को इस परिप्रेक्ष्य में सही जानकारी प्रदान कर सकें? क्योंकि जेण्डर रोल स्त्री तथा पुरुष दोनों बच्चों के ऊपर थोपे जाते हैं और जेण्डरगत भेद-भाव यहीं से पैदा होता है । एक पुरुष बच्चे को पुरुष व्यस्क बनाने हेतु बिल्कुल स्वतंत्र रवैये को अपनाया जाता है । साथ ही पुरुष बच्चे को ‘पुरुषत्व’ के लिए प्रेरित किया जाता है जबकि ‘स्त्री बच्ची’ के ऊपर मनोवैज्ञानिक रूप से दब्बूपन, सहनशीलता तथा ‘स्त्रीत्व’ के व्यवहार अधिरोपित किए जाते हैं । इसलिए कई बार स्त्रियाँ इन्हीं विचारों में अपनी स्वतंत्रता ढूँढती हैं । “एडम्स और वाकरडीन के अनुसार, लड़कों में हिंसा को लगभग एक सकारात्मक गुण में तब्दील किया जा सकता है, जबकि ‘हिंसक’ लड़कियाँ के लिए ‘कुतिया’ और ‘वैश्या’ जैसी गालियों का इस्तेमाल किया जाता है”।[4]
अपने पी-एच.डी. शोध कार्य के दौरान मैंने 16 वर्ष से 20 वर्ष तक की लड़कियों से एक प्रश्न पूछा कि, “क्या आपको नहीं लगता कि आप भी रात को देर तक बाहर घूमे तथा अपने मित्रों के साथ खुश रहें? इस प्रश्न के उत्तर में कुछ लड़कियों ने यह जवाब दिया कि उन्हें भी लड़कों की तरह अपनी सहेलियों के साथ देर रात तक बाहर घूमना अच्छा लगता है। किन्तु अधिकतर लड़कियों ने यह माना कि रात को बाहर घूमना ठीक नहीं है और लड़कियों को देर तक बाहर नहीं रहना चाहिए। उत्तर से दो बातें निकालकर सामने आई है। पहली बात कि जिस पुरुषयोचित व्यवहार के द्वारा पुरुष महिलाओं के विरुद्ध हिंसा करते हैं, हम पुरुषों को जेण्डर संवेदनशील बनाने की जगह स्त्रियों को ही घरों में समेट देते हैं । दूसरी बात कि स्त्रियों के ऊपर बचपन से ही यह मनोवैज्ञानिक दवाब बनाया जाता है कि उनके लिए बाहर रहना ठीक नहीं घर ही उनके लिए सेफ जोन है। क्या यह बात शत प्रतिशत सच है ? क्या हमने घरों में किशोरियों के ऊपर अपने ही सगे संबंधियों द्वारा यौन हिंसा के विषय में नहीं सुन रखा है ? फिर से हमारे समक्ष एक प्रश्न खड़ा होता है कि जेण्डर की समझ बनाने के लिए आधारभूत उपाय क्या हों गे?
“वेक्स(1979) तथा हॉग(1987) ने दिखाया है कि लड़कियों को काफी अस्वाभाविक और दब्बू मुद्राओं में बैठने की नसीहत दी जाती है जिससे उनके घुटने आपस में सटे रहते हैं। इसके विपरीत लड़के ज्यादा स्वाभाविक रूप से बैठने के लिए आजाद रहते हैं। उनके घटने एक दूसरे से अलग होते है और ऐसा करते हुए वे प्रभुत्वशाली और आक्रामक दिखाई देते हैं । जो लड़कियाँ ‘पुरुषों वाली’ मुद्राओं में बैठती हैं, उन्हें आक्रामक और प्रभुत्वशाली नहीं, बल्कि यौनिक रूप से उत्तेजना पैदा करनेवाली और ‘उपलब्ध’ के रूप में देखा जाता है”[5] । 
इसका अर्थ यह है कि समाजीकरण की जो प्रारंभित मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है उसके अंतर्गत पुरुषत्व का अधिक विकास किया जाता है । यदि एक स्त्री अपने स्त्रीत्व का प्रदर्शन सशक्त ढंग से करती है तो उसे ‘पुरुषों की नकल’ या ‘कमोडिटी’ मानकर उन्हें ‘अपीलिंग’ या ‘सेक्सिस्ट’ का खिताब दिया जाता है । ये सभी उदाहरण और भी समृद्ध तब होते हैं जब पाठ्यक्रमों के मद्देनज़र उन्हें और भी पुष्ट किया जाता है । ख़ासतौर से चित्रों, जेण्डरगत भाषायी माध्यम, वाक्य विन्यासों तथा आँकड़ों के माध्यम से स्त्री को द्वितीयक प्रदर्शित किया जाता है। प्री-स्कूल में प्राप्त व्यावहारिक प्रशिक्षण और प्री-स्कूल से पोस्ट-स्कूल तक के बीच की सैद्धांतिकी जेण्डर संवेदनशीलता को और भी अधिक स्टीरियोटाईप (पाठ्यक्रमों द्वारा) साबित कर देती है । उदाहरण के लिए पाठ्यक्रम की पुस्तकों में दिखाया जाना कि छोटा बच्चा स्कूल जाता है किन्तु बहन छोटे भाई को संभालती है या रसोई में माँ की मदद करती है । ऐसे अनेकों उदाहरण पाठ्यपुस्तकों में भरे हुए हैं। 
इस प्रकार की समस्या से बचने और जेण्डर संवेदनशील समाज का आधार रखने के लिए कुछ बिंदुओं पर ध्यान देने की अतिआवश्यकता है । उदाहरण के लिए एन.सी.ई.आर.टी द्वारा प्रकाशित ‘स्टेटस ऑफ विमेन थ्रू करिक्यूलम: एलीमेंट्री टीचर्स हैंडबुक’ (1982) के दस्तावेज़ में लिखी गई बातों को जेण्डर संवेदनशीलता हेतु सार्वभौमिक रूप से सभी पाठ्यक्रमों के साथ शामिल किया जा सकता है जो निम्नलिखित हैं:- 
“1. घर और घर की साज-संभाल से जुड़ी सभी तरह की जिम्मेवारियों में सहभागी बनाने के लिए बच्चों का विकास।
2. घर के भीतर और बाहर निभाई जाने वाली भूमिकाओं में श्रम की मर्यादा की भावना का विकास।
3. परिवार के पुरुषों और महिलाओं में घर के भीतर और बाहर कार्य करने की समान प्रतिबद्धता का विकास; लड़कियों/ महिलाओं पर निर्भरता जैसे पारंपरिक मूल्य का परित्याग।
4. जीवन के सभी क्षेत्रों में समान रूप से अवसर की प्राप्ति के जरिए राष्ट्र के विकास में समान भागीदारी।
5. अधिकारों और सक्षमताओं के प्रति जागरूकता।
6. परिवार से लेकर समाज के हर स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की हिस्सेदारी। 
7. विवाह के समय दहेज और दुल्हन की कीमन लगाने जैसी समाजविरोधी गतिविधियों के विरुद्ध जनमत का निर्माण। 
8. आवश्यकता अनुरूप उपभोग पर ज़ोर ताकि महिलाओं को समृद्धि की निशानी मानी जाने वाली सोच का परित्याग संभव हो सके। 
9. व्यक्ति की गरिमा को प्रोत्साहन ताकि महिलाएँ खुद को यौन प्रतीकों के रूप में स्वीकार करने की जगह आत्म-निर्भर, स्व-चालित और स्व-निर्देशित बन सकें। 
10. महिलाओं को अलग-थलग नहीं बल्कि समग्रता के एक अंग के रूप में देखने की समझ। 
11. विषयगत सामग्री के अंतर्गत कुछ ऐसे संदर्भ बिन्दु दिए गए हैं जिनका प्रयोग बहुत ही सावधानी से करना होगा। विषयवस्तु के चयन करते समय राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति और मूल्यों के समाहितीकरण से संबंधित मनोवृत्तियों के विकास को ध्यान में रखना होगा। कभी-कभी इच्छित उद्देश्य की महत्ता को स्पष्ट करने के लिए नकारात्मक पृष्टभूमि का उल्लेख भी कर दिया जाता है। विषयवस्तु को प्रस्तुत करने का तरीका बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें महिलाओं की स्थिति को प्रमुखता दी जानी चाहिए और किसी भी परिस्थिति में महिलाओं का अवमूल्यन नहीं किया जाना चाहिए”[6]
हमारा समाज विभिन्न कालखंडों से गुजरता हुआ इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशका में प्रवेश कर चुका है। किन्तु विडंबना यह है कि जेण्डर को लेकर अपनी स्टीरियोटाईप अवधारणा से यह आज भी निकल नहीं पाया है। हमारे पाठ्यक्रमों को काफी मेहनत से तथा बार-बार संशोधन करके विद्वानों की मण्डली द्वारा तैयार किया जाता है। किन्तु जेण्डर संवेदनशीलता का पक्ष हर बार हाशिए पर चला जाता है। स्त्री संबंधित अपराधों के बढ़ते हुए ग्राफ को देखते हुए जेण्डर संवेदनशीलता की अवधारणा बहुत ही प्रासंगिक तथा महत्वपूर्ण हो गई है। 
पिछ्ले कई वर्षों से जेण्डर को लेकर निस्संदेह समाज के कुछ प्रतिशत लोगों के मन में संवेदना जागृत हुई है। 16 दिसंबर 2012 को हुए ‘निर्भया बलात्कार कांड’ के बाद वैचारिक जागृति सड़कों पर उतरी और उसने पूरे विश्व की चेतना को झकझोरा किन्तु उसी घटना के ऊपर बनी डाक्यूमेंट्री में अपराधी तथा उसके वकील द्वारा की गई महिला विरोधी टिप्पणी ने यह साबित कर दिया है कि समाज के एक बहुत बड़े हिस्से को अभी जेण्डर संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है । और यह सब पाठ्यक्रमों में तथा समाज में जेण्डर को लेकर आधारभूत समझ बनाए बगैर संभव नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त जेण्डर विकास कार्यक्रमों में महिलाओं के विशेषाधिकार, मानवाधिकारों की बात तथा पुरुषों के भीतर लिंग संवेदनशीलता कार्यक्रमों को विस्तृत रूपों में आकार दिया जाना चाहिए । तभी हम यह मानकर चल सकते हैं कि स्त्री के विरुद्ध अपराधों में धीरे-धीरे कमी हो सकती है । 
संदर्भ 
1. जेण्डर और शिक्षा रीडर भाग 1, निरंतर(2010), नई दिल्ली
2. जेण्डर और शिक्षा रीडर भाग 2, निरंतर(2011), नई दिल्ली
3. बउआर,सिमोन, स्त्री उपेक्षिता (2004), हिन्दी पाकेट बुक्स, नई दिल्ली
4.मधु किश्वर, 1986, ‘आर्य समाज एंड विमेन एजुकेशन ,ई पी ड्ब्ल्यू , अंक 17,
5. . एन. ओकली, (1974), हाउसवाइफ, लंदन, एलेन लेन
6. जी. पास्कल व आर. कॉक्स(प्रकाश्य )विमेन रिटर्निंग टू हायर एजुकेशन्न, मिळ्टन केंस, ओपेन यूनिवर्सिटी प्रेस,
7. कोठारी आयोग रिपोर्ट , (1964 66), भारत सरकार दस्तावेज
8.राष्ट्रीय शिक्षा नीति ,(1986), भारत सरकार दस्तावेज
9.राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद,1982‘स्टेटस ऑफ विमेन थ्रू करिक्यूलमरूएलिमेंट्री टीचर्स हैंडबुक, नई दिल्ली
10.सूसी थारु एवं के. ललिता , 1991 , विमेन राइटिंग इन इंडिया, 600 बीसी टू प्रेजेंट ,खण्ड 1, दिल्ली,ऑक्स्फोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस,
[1] घोष,मालिनी, जेण्डर और शिक्षा रीडर भाग-2(2011), पृ. 84 
[2] डेवीज,ब्रानविन, जेण्डर और शिक्षा रीडर भाग-1(2010) पृ. 210 
[3] बउआर,सिमोन, स्त्री उपेक्षिता (2004) पृ.131 
[4] डेवीज,ब्रानविन, जेण्डर और शिक्षा रीडर भाग-1(2010) पृ.221 
[5] डेवीज,ब्रानविन, जेण्डर और शिक्षा रीडर भाग-1(2010) पृ. 221 
[6] एन.सी.आर.टी. का दस्तावेज़, पाठ्यक्रमों में महिलाओं की स्थिति, जेण्डर और शिक्षा रीडर भाग-1, पृ.195