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बेईमान मौसम के खिलाफ़

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बेईमान मौसम के खिलाफ़

मैं किसान, मजदूर हूँ ! साहब
देश की चिंता मुझे भी हैं
सुख किसे पसंद नहीं है ?
पर क्या करुं ! साहब
वतन का नमक जो खा रखा हूँ
जब तक साँसें चलेंगी
बेईमान मौसम के खिलाफ़
लड़ता रहूंगा
बस डर इसी बात की है
कल कहीं कोई नेता
भूख से न मर जाए
और इलज़ाम
हमारे सर चढ़ जाए।
©सुभाष कुमार कामत

बुद्ध की अनत्ता के सिद्धांत की चोरी और आत्मा का वेदांती भवन: संजय जोठे

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बुद्ध की अनत्ता के सिद्धांत की चोरी और आत्मा का वेदांती भवन

वेदान्त या किसी भी अन्य आस्तिक दर्शन के अंधभक्तों से बात करते हुए बड़ा मजा आता है. कहते हैं ध्यान एक अनुभव है, इन्द्रियातीत अनुभव है. इसकी चर्चा नहीं की जा सकती इसे अनिर्वचनीय और अगम्य अनकहा ही रहने दो. अभी कल से एक प्रौढ़ और सुशिक्षित बुजुर्ग सज्जन से चर्चा चल रही थी. अंत में वे अपने सारे कमेंट्स डिलीट करके विदा हो गये और कह गये कि मैं कहता आंखन देखि, तुम शब्दों को संभालते रहो. कितनी ऊँची लगती है न उनकी बात ? लेकिन कितनी षड्यंत्रपूर्ण और बचकानी है असल में इसे देखिये. पहली बात तो वे कहते हैं कि इन्द्रियातीत अनुभव की चर्चा हो ही नहीं सकती,
अब यहाँ गौर से देखिये अनुभव का मतलब ही इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान है, इन्द्रियातीत अनुभव नाम का वेदांती शब्द स्वयं वेदान्त की तरह असंभव शब्द है. वेदांत का अर्थ होता है ज्ञान का अंत – यह अर्थ है तो अनर्थ कि क्या परिभाषा हो सकती है? विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि ज्ञान या इन्फोर्मेशन या अनुभव या समझ (इस अर्थ में इन्फोर्मेशन) का कोई नाश नहीं होता. वेदान्त का अर्थ ही वेद (ज्ञान) का अंत है, इस तरह ज्ञान को नष्ट करने वाले दर्शन के रूप में वेदान्त का पूरे भारत पर क्या असर हुआ है वह समझ में आता है. हजारों साल तक अज्ञानी अन्धविश्वासी और गुलाम भारत तभी संभव है जब ज्ञान का सच ही में अंत कर दिया गया हो.
तो, वे सज्जन कह गए कि इन्द्रियातीत अनुभव या ज्ञान की चर्चा असंभव है. यह रसगुला चखने जैसा है कोई व्याख्या नहीं हो सकती. कुछ हद तक ये ठीक है लेकिन रसगुल्ले और मिठास के अनुभव को आधार बनाकर बहुत ठोस तर्क और तर्कपूर्ण अनुमान से बहुत कुछ जाना जा सकता है. इसी पर कोमन सेन्स और विवेक सहित कल्पनाशीलता टिकी हुई है जो कि किसी भी तथाकथित अध्यात्मिक ज्ञान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है.
कोई भी आध्यात्मिक ज्ञान या अनुभव कामन सेन्स से बड़ा नहीं होता. हो ही नहीं सकता. कामन सेन्स ने ही वह विज्ञान तकनीक, सभ्यता, नैतिकता और सौन्दर्यबोध दिया है जिसने हमें इंसान बनाया है. अब इन इंसानों को गुलाम और अन्धविश्वासी बनाकर उलझाए रखने के लिए सबसे जरुरी काम क्या होगा?
निश्चित ही तब सबसे जरुरी काम होगा कि ज्ञान के आधार और उसकी संभावना पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाए. सभी आस्तिक दर्शन और खासकर हिन्दू वेदान्त यही करता है. आजकल के बाबाओं को ओशो रजनीश, जग्गी वासुदेव, श्री श्री या मोरारी बापू जी या आसाराम बापूजी को देखिये. वे इन्द्रियों से हासिल ज्ञान को नाकाफी बताते हुए किसी अदृश्य अश्रव्य और अगम्य को अत्यधिक महत्व देते हैं
और इस एक मास्टर स्ट्रोक से वे उस तथाकथित अध्यात्मिक ज्ञान, ध्यान, समाधी और निर्विचार सहित आनंद और अनुभव मात्र की व्याख्या का अधिकार अपने पास सुरक्षित रख लेते हैं. इस तरह ज्ञान अनुभव और इनपर खडी सभी संभावनाओं की चाबी वे अपने पास रख लेते हैं और न सिर्फ अपना रोजगार बल्कि इस देश की जड़ता को भी सदियों सदियों तक बनाये रखते हैं.
क्या आपको ताज्जुब नहीं होता कि भारत में षड्दर्शन के बाद सातवाँ दर्शन क्यों पैदा नहीं हुआ? क्या दिक्कत है? यूरोप में तो हर दार्शनिक अपना नया स्कूल आफ थॉट आरंभ कर सकता है लेकिन यहाँ अरबिंदो, विवेकानन्द, शिवानन्द, योगानन्द सहित ओशो जैसे बाजीगरों को भी इन छः डब्बों में से कोई एक डब्बा पकड़ना होता है वरना वे भारतीय ज्ञान और दर्शन की छोटी सी और उधार ट्रेन से बाहर निकाल दिए जायेंगे.
लेकिन यूरोप में यह ट्रेन बहुत लंबी है. जितना चाहे उतना डब्बे जोड़ते जाइए. इसी से वहां नये ज्ञान विज्ञान तकनीक और सौंदर्यशास्त्र जन्म लेते ही रहते हैं. भारत की पूरी कहानी चार वर्ण और छः दर्शनों पर खत्म हो जाती है. यहाँ हाथ के पंजों की दस उँगलियों के परे कोई गिनती जाती ही नहीं. दस पर बस आ जाता है.
यह अगम्य और अनुभवातीत क्या है? अगर यह है तो आप या मैं या कोई और इसकी चर्चा कैसे कर रहा है? अगर यह इतना ही दूर और अगम्य है तो इसकी चर्चा क्यों करते हैं? ये आत्मा परमात्मा और समाधि की रात दिन की बकवास क्यों पिलाई जाती है? फिर जब कोई इनके बारे में सच में ही जिज्ञासा करे तो घबराकर कहेंगे कि ये सब अगम्य अगोचर है. अरे भाई जब ये अगम्य अगोचर अनिर्वचनीय है तो उसकी रात दिन मार्केटिंग और बकवास करते ही क्यों हो?
और ध्यान रखियेगा उसकी मार्केटिंग इस तरह की जाती है जैसे अभी ये बाबाजी आपके हाथ में निकालकर रख देंगे “अभी और यहीं” की भाषा में बात करेंगे और हजारों जन्म की साधना की बात भी करेंगे, गुरु की महिमा, शरणागती और गुरु शिष्य परम्परा की बात भी करेंगे.. ये ओशो रजनीश का सबसे मजेदार खेल रहा है. अमन और अनात्मा की संभावना पर जो ध्यान का अनुभव खड़ा है उसे आत्मा की बकवास के साथ सिखाते हैं. जब व्यक्ति सनातन आत्मा की चर्चा सुनकर “मैं” को मजबूत बना लेता है तब कहते हैं कि मैं से मुक्त होना ही सच्ची मुक्ति है.
अब यहाँ खेल देखिये एक तरफ आत्मा की सनातनता का सिद्धांत देकर आत्मा (मैं, मेरे होने के भाव) को मजबूत कर रहे हैं. फिर साधना सिखा रहे हैं कि इस मैं को विलीन कर दो, ये वेदान्त की जलेबी है. दूसरी तरफ बुद्ध को देखिये वे कहते हैं कि यह मैं होता ही नहीं इसे जान लो. तब इस मैं से मोह और आत्मभाव पैदा ही नहीं होगा. तब ध्यान समाधि या तादात्म्य हीनता एकदम आसान हो जाती है. लेकिन वेदान्त यह नहीं होने देता. वह सनातन आत्मा या मैं के भाव को ठोस खूंटे की तरफ गाड़ देता है फिर इसे विलीन करने का इलाज भी बता है. मतलब पहले कीचड में पाँव डलवाता है फिर स्नान भी करवाता है. इस प्रकार वेदांती हमाम और इसके ठेकेदारों का रोजगार बना रहता है.
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अब ध्यान दीजिये मैं को विलीन करने की टेक्नोलोजी असल में बुद्ध की अनत्ता की या अनात्मा की टेक्नोलोजी हैं जिसे ये चुराकर आत्मा की टेक्नोलोजी के नाम से मार्केटिंग कर रहे हैं. ऊपर से तुर्रा ये कि अनत्ता या मैं के विलीन होने पर जो शून्य बच रहता है उसे ये “आत्मज्ञान” कहते हैं. हद्द है मूढ़ता की.
मतलब समझे आप? आत्मा को मिटाने पर जो ज्ञान हुआ उसे बुद्ध की तरह अनात्मा का ज्ञान कहने में ये डरते हैं कि कहीं चोरी न पकड़ी जाए. उसे ये अनात्मा न कहके आत्मा का ज्ञान कहते हैं. हालाँकि ये भली भाँती जानते हैं कि आत्मा या स्व के विलीन होने पर ही इनका मोक्ष या बुद्ध का निर्वाण घटित होता है और इसीलिये तःताकथित अध्यात्म या धर्म की सारी सफलताएं असल में अनात्मा की सफलता हैं. फिर भी इनका षड्यंत्र देखिये कि इसके बावजूद भी आत्मा और उसकी सनातनता का ढोल बजाना बंद नहीं करते. यह कितना शातिर और गहरा खेल है आप अनुमान लगाइए.
इतना स्पष्ट सा विरोधाभास क्या इन्हें नजर नहीं आता? बिलकुल नजर आता है. लेकिन दिक्कत ये है कि अगर ये समाधि या ध्यान के अनुभव को अनात्मा के अनुभव या स्व (मैं/मेरा) के निलंबित हो जाने के अनुभव की तरह प्रचारित करने लगें तो इनमे और बुद्ध में कोई अंतर नहीं रह जाएगा. तब पूरे हिन्दू धर्म और वेदान्त को चोरी पकड़ी जायेगी.
इस खेल को गौर से देखिये और समझिये मित्रों. इस देश के शोषक धर्म पर इस स्तर से हमला करेंगे तो यह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएगा और बहुत प्रकार से हम शोषण और अंधविश्वासों को चुनौती दे सकेंगे. तब भारत में नैतिकता, विज्ञान, न्यायबोध और धम्म का मार्ग आसान हो सकेगा.

(लिखी जा रही और शीघ्र प्रकाश्य किताब का एक अंश)
– © संजय जोठे
– *चित्र गूगल से साभार

बुंदेलखण्डी-लोक साहित्य: अनुरुद्ध सिंह

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Photo by Joshuva Daniel on Unsplash

बुंदेलखण्डी-लोक साहित्य

अनुरुद्ध सिंह

(शोधार्थी) भारतीय भाषा केन्द्र

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय नई दिल्ली

144 झेलम छात्रावास ज.ने.वि.नई दिल्ली

Email-ID-shvmsngh0@gmail.com

लोक साहित्य का अर्थ

बुंदेलखण्डी ‘लोक साहित्य’ को जानने से पहले हमें ‘लोक’ और ‘लोक साहित्य’ को जान लेना चाहिए कि आखिरकार ‘लोक’ और ‘लोक साहित्य’ होता क्या है- ‘लोक’ शब्द संस्कृत के ‘लोकृ दर्शने’ धातु से ‘धञ्’ प्रत्यय करने पर निष्पन्न हुआ है.1 इस धातु का अर्थ देखना होता है. अत: ‘लोक’ शब्द का अर्थ हुआ देखने वाला. इस प्रकार वह समस्त जन समुदाय जो इस कार्य को करता है ‘लोक’ कहलायेगा. साधारण जनता के अर्थ में इसका प्रयोग ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर किया गया है. ऋग्वेद में ‘लोक’ के लिए ‘जन’ का भी प्रयोग उपलब्ध होता है.2

भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र के चौदहवें अध्याय में अनेक नाट्यधर्मी तथा लोकधर्मी प्रवृत्तियों का उल्लेख किया है .महर्षि व्यास ने अपनी शतसाहस्त्री संहिता की विशेषताओं का वर्णन करते हुये लिखा है कि यह ग्रन्थ (महाभारत) अज्ञान रुपी अन्धकार से अन्धे होकर व्यथितलोक (साधारण जनता) की आँखों को ज्ञान रुपी अंजन की शलाका लगाकर खोल देता है-

“अज्ञानतिमिरान्धस्य लोकस्य तु विचेष्टत: ज्ञानांजनशलाकाभिनत्रोन्मीलनकारकम्”3

इसी प्रकार महाभारत में वर्णित विषयों की चर्चा करते हुए लोकयात्रा का उल्लेख किया गया है-

“पुराणानां चैव दिव्यानां कल्पनां युद्धकौशलम्

वाक्यजातिविशेषाश्च लोकयात्राक्रमश्च य:”4

महर्षि व्यास ने लिखा है- “प्रत्यक्षदर्शी लोकानां सर्वदर्शी भवेन्नर:.”5

अर्थात जो व्यक्ति लोक को स्वत: अपने चक्षुओं से देखता है वही उसे सम्यक रुप से जान सकता है .

भगवदगीता में ‘लोक’ तथा ‘लोकसंग्रह’ आदि अनेक शब्दों का प्रयोग अनेक स्थानों पर किया गया है. भगवान श्री कृष्ण ने ‘लोकसंग्रह’ पर बड़ा बल दिया है. वे अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं-

“कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय:

लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि”.6

कहने की आवश्यकता नहीं कि यहाँ लोकसंग्रह का अर्थ साधारण जनता का आचरण व्यवहार तथा आदर्श है.

लोक साहित्य की परिभाषा

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘लोक’ के संबंध में अपने विचार को प्रकट करते हुए लिखा है कि- “लोक शब्द का अर्थ ‘जन-पद’ या ‘ग्राम्य’ नहीं है बल्कि नगरों और गाँवों में फैली हुई वह समूची जनता है जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं. ये लोग नगर में परिष्कृत, रुचि सम्पन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रुचि वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारिता को जीवित रखने के लिए जो भी वस्तुयें आवश्यक होती हैं उनकों उत्पन्न करते हैं.”7

डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय के मत के अनुसार ‘लोक’ की परिभाषा निम्नलिखित है- “आधुनिक सभ्यता से दूर अपने प्राकृतिक परिवेश में निवास करने वाली, तथाकथित अशिक्षित एवं असंस्कृत जनता को लोक कहते हैं जिनका आचार-विचार एवं जीवन परम्परायुक्त नियमों से नियंत्रित होता है.”8

इससे स्पष्टतया ज्ञात होता है कि जो लोग संस्कृत तथा परिष्कृत लोगों के प्रभाव से बाहर रहते हुये अपनी पुरातन स्थिति में वर्तमान है उन्हें ‘लोक’ की संज्ञा प्राप्त है. इन्हीं लोगों के साहित्य को ‘लोकसाहित्य’ कहा जाता है. यह साहित्य प्राय:मौखिक होता है तथा परम्परागत रुप से चला आता है. यह साहित्य जब तक मौखिक रहता है तभी तक इसमें ताजगी तथा जीवन पाया जाता है. लिपि की कारा में कैद करते ही इसकी संजीवनी शक्ति नष्ट हो जाती है.

लोक संस्कृति को अंग्रेजी में ‘फोकलोर’ कहा जाता है. ‘फोकलोर’ दो शब्दों से मिलकर बना है.1- ‘फोक’ तथा 2- ‘लोर’. ‘फोक’ शब्द की उत्पत्ति ऐंग्लो सैक्सन शब्द ‘folc’ से मानी जाती है. जर्मन भाषा में इसे ‘volk’ कहते हैं. डॉ. बार्कर ने ‘फोक’ शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है कि- ‘फोक से सभ्यता से दूर रहने वाली किसी पूरी जाति से बोध होता है परन्तु इसका यदि विस्तृत अर्थ लिया जाय तो किसी सुसंस्कृत राष्ट्र के सभी लोग इस नाम से पुकारे जा सकते है.’9 वहीं ‘पं. रामनरेश त्रिपाठी का ‘फोक’ शब्द के लिए ‘ग्राम’ शब्द पर अत्यधिक आग्रह है. इसी आधार पर उन्होंने फोकसांग का हिन्दी पर्याय ग्राम-गीत स्वीकार किया है.’10 कृष्णदेव उपाध्याय का मानना है कि- “फोकलोर के लिए लोक संस्कृति शब्द का प्रयोग नितांत उपयुक्त एवं समीचीन है. लोक संस्कृति के अंतर्गत जनजीवन से संबंधित जितने आचार-विचार, विधि-निषेध, विश्वास, प्रथा, परम्परा , धर्म, मूढ़ाग्रह, अनुष्ठान आदि हैं वे सभी आते हैं.”11

सोफिया बर्न ने ‘फोकलोर’ के क्षेत्र विस्तार के सम्बंध में लिखा है कि- ‘यह एक जाति वाचक शब्द की भाँति प्रतिष्ठित हो गया है जिसके अंतर्गत पिछड़ी हुई जातियों में प्रचिलित अथवा अपेक्षाकृत समुन्नत जातियों के असंस्कृत समुदायों के अवशिष्ट विश्वास, रीति-रिवाज, कहानियाँ, गीत तथा कहावतें आती हैं. इनके अतिरिक्त इसमें विवाह, उत्तराधिकार, बाल्यकाल तथा प्रौढ़ जीवन में रीति-रिवाज तथा अनुष्ठान और त्यौहार, युद्ध, आखेट पशुपालन आदि विषयों के भी रीति-रिवाज और अनुष्ठान इसमें आते हैं तथा धर्मगाथाएँ अवदान लोक कहानियाँ, बैलेड, गीति, किंवदंतियाँ, पहेलियाँ भी इसके विषय हैं.संक्षेप में लोक की मानसिक संपन्नता के अन्तर्गत जो वस्तु आ सकती है वे सभी इसके क्षेत्र में है.’12

‘सोफिया बर्न ने फोकलोर के विषय को तीन श्रेणियों में विभक्त किया है-

1-लोकविश्वास और अंधपरम्पराएँ

2-रीति-रिवाज तथा प्रथाएँ

3-लोक साहित्य

सोफिया बर्न ने लोक संस्कृति का जो श्रेणी विभाजन किया है उस पर दृष्टि डालने से यह स्पष्ट होता है कि लोक साहित्य लोक संस्कृति का एक भाग है उसका एक अंश है.यदि लोक संस्कृति की उपमा किसी विशाल वट वृक्ष से दी जाय तो लोक साहित्य को उसकी एक शाखा मात्र समझनी चाहिए. यदि लोक संस्कृति शरीर है तो लोक साहित्य इसका एक अवयव है. लोक–संस्कृति का क्षेत्र–विस्तार अत्यंत व्यापक है परन्तु लोक साहित्य का विस्तार संकुचित है. लोक-संस्कृति की व्यापकता जन-जीवन के समस्त व्यापारों में उपलब्ध होती है परन्तु लोक साहित्य जनता के गीतों, कथाओं, गाथाओं मुहावरों तक ही सीमित है.लोक संस्कृति में लोक साहित्य का अंतर्भाव होता है.’13

लेकिन लोक साहित्य का विस्तार अत्यंत व्यापक है. साधारण जनता जिन शब्दों में गाती है, रोती है, हँसती है, खेलती है उन सबको लोक साहित्य के अन्तर्गत रखा जा सकता है.पुत्र जन्म से लेकर मृत्यु तक जिन षोडस संस्कारों का विधान हमारे प्राचीन ऋषियों ने किया है प्राय: उन सभी संस्कारों के अवसर पर गीत गाए जाते हैं. विभिन्न ऋतुओं में प्रकृति में जो परिवर्तन दिखायी पड़ता है उसका प्रभाव जन साधारण के हृदय पर पड़े बिना नहीं रहता. अत: बाह्य जगत में इस परिवर्तन को देखकर हृदय में जो उल्लास या आन्नद की अनुभूति होती है वह लोक गीतों के रुप में प्रकट होती है. गाँव के लोग अपने दैनिक व्यवहार तथा वार्तालाप में सैकड़ों मुहावरों तथा कहावतों का प्रयोग किया करते हैं. छोटे-छोटे बच्चे खेलते समय अनेक प्रकार के हास्याजनक गीत गाते हैं. ये सभी गीत तथा कथाएँ लोक साहित्य के अन्तर्गत आती हैं.

भारतवर्ष का लोक-साहित्य आध्यात्मिकता और धार्मिक विश्वासों से ओतप्रोत है,यह कहने में कोई संदेह नहीं है. देश की प्राचीन सांस्कृतिक परम्पराएँ हमें लोक साहित्य द्वारा आज विरासत के रुप में प्राप्त हुई है.भले ही भाषा और भावों में अन्तर आ गया हो,पर आधुनिक संस्कृति की मूल धारा खोजने में हमें कठिनाई नहीं होती है .डॉ.वासुदेवशरण अग्रवाल ने एक स्थल पर बड़ा ही युक्तियुक्त पूर्ण कहा है-“वेदव्यास ने महाभारत में कहा है ‘गुहंय् ब्रहम् तदिदं ब्रवीमि,नाहि मानुषाच्छेष्ठतरं हि किंचित’ अर्थात रहस्य ज्ञान की एक कुंजी बताता हूँ कि इस लोक में मनुष्य से बढ़कर और कुछ भी नहीं है.मनुष्य से सब नीचे हैं, मनुष्य सबसे बढ़कर है,जो ज्ञान मनुष्य के लिये उपयोगी नहीं,वह दो कौड़ी का है.”14 आगे उन्होंने भारतीयों की सहिष्णुता के विषय में लिखा है- “वनों के निषाद और शवरों के प्रति भी हिन्दूधर्म ने सदा ही सहिष्णुता की आरती सजाई है…चतुर्दिक जीवन के साथ सहानुभूति और सहिष्णुता का भाव इसकी विशेषता रही है.आज का हिन्दू धर्म भारतवर्ष के महाकान्तार दण्डकारण्य की तरह ही विशाल और गम्भीर है,जिसमें अपरिमित जीवन के प्रतीक एक दूसरे के साथ गुंथकर किलोल करते रहे हैं.”15

स्पष्ट है कि ‘लोक साहित्य में किसी देश या जाति की हजारों वर्षों की परम्परा,राष्ट्र के उत्थान-पतन,मानव जाति के सम्पूर्ण जीवन की कहानी गुम्फित है.अतीत से लेकर आज तक की समस्त बौद्धिक,धार्मिक तथा सामाजिक प्रवृत्तियों का विकासशील इतिहास लोक साहित्य में मिलता है. लोक साहित्य समुद्र की भाँति है,जिसकी भाव लहरियों और भाव गह्वरों का पार कर पाना आसान काम नहीं.परन्तु जिन्होंने भाव सागर की गहराई में प्रवेश किया,उन्होंने अनूठे रत्न खोज निकाले हैं. भाव-उर्मियों के बोलते छन्दों के कलरव में देश की गाथाएँ,संस्कृतियाँ जन-जन के कंठों से मुखरित हो रही है.राम,कृष्ण और शिव की अमरता का श्रेय पुराणों और इतिहासों को उतना नहीं है,जितना लोक साहित्य को.इन गीतकारों ने रामत्व और कृष्णत्व को मानव जीवन के साधारण धरातल पर ला खड़ा किया है और उनसे तादात्म्य स्थापित करने में गौरव अनुभव किया है.’16

लौकिक साहित्य समानरूप से नगरों और ग्रामों दोनों की ही सम्पत्ति है.साहित्यिक वर्ग जहाँ परिष्कृत एवं परिमार्जित भाव और भाषा का अध्ययन मनन एवं श्रवण करता है,वहाँ अशिक्षित अथवा अर्द्धशिक्षित मानव समुदाय भी अपने ज्ञान वैभव को प्रदर्शित करने का इच्छुक रहता है.परम्परागत नरसी,ढोला और भरथरी के कथा गीतों को गाकर आत्मानन्द प्राप्त करता है.तभी विद्वान ग्रिम ने कहा है कि-“लोक गीत जनता का,जनता द्वारा ओर जनता के लिए रचा गया काव्य होता है.”17 विदेशी विद्वानों ने भारतीय ग्राम गीतों की प्रशंसा मुक्तकंठ से की है.

बुंदेलखंड का परिचय

बुंदेलखण्ड मध्य भारत का एक प्राचीन क्षेत्र है. इसका विस्तार मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में है. बुंदेली इस क्षेत्र की मुख्य बोली है. भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताओं के बावजूद बुंदेलखण्ड में जो एकता और समरसता है, उसके कारण यह क्षेत्र अपने आप में सबसे अनूठा बन पड़ता है. अनेक शासकों और वंशों के शासन का इतिहास होने के बावजूद बुंदेलखण्ड की अपनी अलग ऐतिहासिक,सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत है. ‘दीवान प्रतिपाल सिंह’ ने बुन्देलखण्ड का इतिहास में ‘राजा छत्रसाल’ के समय के बुन्देलखण्ड की सीमा निम्नलिखित छंद में निर्धारित की है.

“इत जमुना उत नर्मदा,इत चम्बल उत टौंस

छत्रसाल सों लरन की, रही न काहू हौंस

उत्तर समथल भूमि गंग जमुना सु बहति हैं

प्राची दिशि कैमूर सोंन कासी सु लसति है

दक्खिन रेवा विंध्यांचल तन शीतल करनी

पच्छिम में चम्बल चंचल,सोहति मन हरनी

तिन मधि राजे गिरि, बन सरिता सहित मनोहर

कीर्तिस्थल बुन्देलन को बुन्देलखण्ड बर.”18

बुन्देलखण्ड की भूमि आर्य सभ्यता के आगमन के पूर्व अनार्य कालीन संस्कृति के प्राचीनतम रूपों की क्रीड़ा स्थली रही है. भारद्वाज,याज्ञवल्क्य आदि स्मृतिकारों के आश्रम बुन्देलखण्ड के अन्तर्गत थे. रामायण के अनुसार बाल्मीकि, अत्रि, शरभंग, सुतीक्ष्ण, अगस्त ऋषियों के आश्रम इसी प्रदेश में थे. बुन्देलखण्ड राम के समय में दण्डकारण्य का भाग था. महाराजा रामचन्द्र यमुना को पार करके चित्रकूट आये थे. महाभारत में कालिंजर अगस्त मुनि का स्थान बताया गया है. भवभूति के रामचरित में वाल्मीकि आश्रम के निकच मुरला(नर्मदा) और तमसा (टोंस) नदियों का नाम आया है. बुन्देलखण्ड की तपस्थली में ऋषि मुनियों ने अपार ज्ञान-कोष संग्रह कर सारे देश को प्रकाशित किया. और अनार्यों की संस्कृति का संगम-स्थल यही बुन्देलखण्ड रहा है. निषाद, गुह, खरदूषण, मारीच, आदि राक्षसों का निवासस्थल यहीं था. आज भी द्राविड़ संस्कृति के संरक्षक बैंगा, गोंड तो अपने को रावणवंशीय मानते हैं. ये लोग रावण की पूजा भी करते हैं.

अठारह पुराणों और महाभारत के रचयिता कृष्णद्वैपायन वेदव्यास की जन्मभूमि काल्पी थी,जिसका पौराणिक नाम कालप्रिय था. महाभारत काल में पांडवों के नाना कुन्तलपुर के अधीश्वर थे जो वह कुन्तावर के नाम से प्रसिद्ध है.महर्षि सन्दीपनि का आश्रम इसी भू-भाग में था. विद्याओं के भंडार तपोनिधि पाराशर जी,वीर मित्रोदय,बृहदकोश के रचयिता मित्रमिश्र,चन्द्रोदय के रचयिता पं. कृष्णमिश्र एवं शीघ्रबोध के पं.काशीनाथ मिश्र ने इसी भूमि को अलंकृत किया.कौशाम्बी में भगवान बुद्ध ने बहुत समय तक निवास किया था.

यह पुण्यस्थली विद्वान कवियों एवं साहित्यकारों की लीलाभूमि रही है,जिसकी गोद में पलकर आचार्यों एवं कवियों ने साहित्य सर्जन किया है.चारण कवि चंदबरदाई,जगनिक को यहाँ से प्रतिभा प्राप्त हुई.अकबर के विनोदप्रिय दरबारी बीरबल,प्रसिद्ध अर्थशास्त्री राजा टोडरमल यहीं के थे कविकुल गुरु कालिदास ने यहीं से प्रेरणा पाई है. आचार्य केशवदास ने ओरछा की राजसभा में रहकर साहित्य निर्माण किया है .कविकुल तुलसीदास की जन्भूमि राजापुर रही है.छतरपुर के ठाकुर कवि,पन्ना के लाल ,करन पजनेस कवि दतिया के गदाधर कवि इसी भूमि के हैं. मिश्रबन्धु, पदमाकर ने यहीं साहित्यसेवा की है. यहीं के राजा साहित्यप्रेमी रहें हैं पन्ना छतरपुर विजावरा अजयगढ़ चरखारी दतिया सिमथर के राजा कवियों के आश्रयदाता रहें हैं. राजा छत्रसाल कविता प्रेमी रहे हैं. वे स्वयं कवि थे और पत्र-व्यवहार कविता में करते थे. ओरछा तो साहित्य का केन्द्र रहा है. ये कवियों के आश्रयदाता भी थे. कवि भूषण ने तभी कहा है – “सिवा को बखानौं कि बखानौं छत्रसाल को.”19 छत्रसाल तो पत्र-व्यवहार भी कविता में करते थे. जब बुन्देलों पर मुगलों ने आक्रमण किया तब छत्रसाल ने बाजीराव पेशवा को सौं दोहों का एक पत्र लिख भेजा. अंतिम पंक्तियां बड़ी ही मार्मिक हैं-

“जो गति ग्राह गजेंन्द्र की,सो गति भई है आय

बाजी जात बुन्देल की,राखो बाजीराय.” 20

केशवदास, बलभद्रमिश्र, भूषण, चिन्तामणि आदि यहाँ के प्रसिद्ध कवि हुए हैं .बुन्देलखण्ड के आधुनिक कवि एवं लेखकों ने बड़ी ख्याति प्राप्त की है.राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, डॉ. वृन्दावनलाल वर्मा, पं. बनारसीदास चतुर्वेदी इसी तपोभूमि में पलकर अभिवृद्धि करने में जुटे रहें हैं. बुंदेलखण्ड प्रारंभ से वीरभूमि रहा है. यहाँ के वीर पुरुषों,आल्हा,ऊदल और परमाल आदि का नाम लिया जाता है. बुंदेलखण्ड में आल्हा-ऊदल के वीर गीत भी गाये जाते हैं. वर्तमान बुंदेली साहित्य अर्थात बीसवीं सदी के कवियों में ईसुरी प्रसाद ईसुरी और गंगाधर व्यास के नाम उल्लेखनीय है. ईसुरी की फागें अत्यधिक प्रसिद्ध पा चुकी हैं,जो जनसाधारण में खूब लोकप्रिय हुई हैं. ईसुरी के सम्बन्ध में कहा गया है-

“रामायण तुलसी कही,तानसेन ज्यों राग

सोई या कलिकाल में कही ईसुरी फाग.”21

ईसुरी की फाग की भाषा देखिए-

“करके नेह टोर जिन दइयो,दिन दिन और बड़इयो

जैसे मिलै दूद में पानी,उसई मनै मिलइयो.”22

गंगाधर व्यास की फागें भी ख्याति-प्राप्त हैं.युगलेश जी की फागों में लोकोक्तियों का यथोचित प्रयोग मिलता है.जैसे-

“जुगलेश दबैल की प्रीति बुरी,नहीं कीजिए,बूड़मरै मंझधारौ

मित्र न एसौ करौ सपने,हो,जो खीर में सोंज महेरी में न्यारौ.”23

विन्ध्यांचल की श्रेणियों से घिरा हुआ यह भू भाग काव्य और साहित्य का गढ़ प्राचीनकाल से रहा है. साहित्य में लोक-जीवन की अभिव्यक्ति यहाँ पूर्ण रुप से हुई. लोकगीत ग्राम साहित्य का स्फुरण यहीं हुआ. मन को गुदगुदाने वाली लोकोक्तियों कहनौत, बुझौअल आदि बड़ी मात्रा में यहाँ पाये जाते हैं. चारण भाटों की विनोदशीलता एवं शौर्य वर्णन बुन्देली काव्य में पूर्ण रुप मिलता है,जो जन मनोरंजन की स्वस्थ परंपरा में निरंतर योगदान देता रहता है.

देश के विभिन्न क्षेत्रों के समान ही बुंदेलखंडी भूमि का मानस धरातल भावों की उच्च भूमि पर प्रतिष्ठित है. यहाँ के आचार-विचार, संस्कार, रीतिरिवाज एवं मान्यताएं उसी रुप में प्रचिलित हैं, जैसी अन्य प्रन्तों में भले ही आनुष्ठानिक अभिचारों में थोड़ी-बहुत विभिन्नता हो. यहाँ के धार्मिक व्रत, त्यौहार और उनसे सम्बंधित लौकिक अभिचार तथा कथाएं,बालक और बालिकाओं के खेल तथा खेल गीत, स्त्रियों द्वारा संस्कारों की औपचारिकता तथा तत्संबंधी, सामाजिक रीतियाँ लौकिक विश्वासों की रुढ़िवादिता, कौटुम्बक स्नेह एवं विद्वेश की प्रकृत भावनाएँ भारतीय लोक साहित्य में समान रुप से उदभासित हुई हैं. इस संबंध में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विचार पठनीय है- “यदि सब देशों के लोक गीत संकलित किये जा सकें और उनका तुलनात्मक अध्ययन हो,तो यह प्रत्यक्ष होगा कि उनमें एक ही मन और हृदय छिपा है,जो मनुष्य मात्र के समान है.”24 गीतों के रचनाकाल एवं उनके लेखकों के अज्ञातनामा होने के सम्बंध में वे लिखते हैं- “उन सब कविताओं में चिरत्व है. न मालूम कब किस काल में कौन सी कविता लिखी गई,किसने इन्हें लिखा,ये प्रश्न किसी के मन में उठते ही नहीं.इसी स्वाभाविक चिरत्व गुण के कारण ये आज रचित होने पर भी प्रचीन हैं और एक हजार साल पहले लिखी जाने पर भी नवीन हैं.”25 भारतीय नारी इस मौखिक साहित्य की सृजक एवं संरक्षिका रही है उसने लोक गीतों की रचना में महत्तव-पूर्ण योगदान दिया है.

स्त्रियाँ स्वभावत:भावुक और करुणामयी होती हैं.अत:उनके कंठों में गीतों का अटूट भन्डार फूटता रहता है.जबकि पुरुष कभी-कभी ही गाता है. फिर उनके गीतों में श्रृंगारिक भावना का आधिक्य रहता है.एक तरह से गीतों पर स्त्रियों को एकाधिकार है.मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त विविध संस्कार,विविध कार्यकलाप एवं विविध भआवनाओं के गीत स्त्री समाज द्वारा गाये जाते हैं.उनके कोमल कंठों की स्वर लहरियाँ वायुमंडल को मधुरिमा से भर देती है और उसमें सच्चा रसिक आन्नदरस का आस्वादन करता है. इन गीतों में दाम्पत्य प्रेम की झाँकी पग-पग पर मिलती है.एक नृत्यगीत में गीत की लय नृत्य के ताल के साथ चलती दिखाई देती है जिसमें एक नवौढ़ा बुंदेली बधु पति को रिझाने का सफल प्रयत्न करती जान पड़ती है-

“मैं हूँ नारि नवेली,ओहो रे अलबेली

तुम तो राजा महल अटारी,मैं हूँ कच्ची हवेली

ओ हो रे अलबेली,मैं हूँ नारि नवेली

तुम तो राजा लड्डू पेरा,मैं हूँ गुड़ की डेली.”26

बुंदेलखण्ड का लोक साहित्य बहुत ही विस्तृत है. सन् 1944 ई. में ओरछा के तत्कालीन महाराज के संरक्षण में लोकवार्ता परिषद की स्थापना टीकमगढ़ में हुई थी जिसने बुंदेलखण्ड के लोकगीतों, गाथाओं तथा मुहावरों के संकलन का कार्य वैज्ञानिक पद्धति से प्रारम्भ किया था. इस परिषद के तत्वावधान में लोकवार्ता नामक एक त्रैमासिक पत्रिका भी प्रकाशित होती थी जिसके सम्पादक थे लोकसाहित्य के विद्धान श्री कृष्णा नन्द जी गुप्त.परन्तु स्वतंत्रता के प्राप्ति के पश्चात् ओरछा राज्य के भारतीय संघ में विलयन के साथ ही इस परिषद का भी विलयन हो गया. इसी समय पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने मधुकर पत्र द्वारा बुन्देलखण्डी लोकसाहित्य को प्रकाश में लाने का कार्य किया था. पिछले दो वर्षों से झाँसी जिले के मऊ रानीपुर में ईसुरी परिषद् की स्थापना हुई है जिसके मंत्री हैं श्री नर्मदा प्रसाद जी गुप्त. इस परिषद् का उद्देश्य भी लोकवार्ता परिषद् की ही भाँति बुन्देलखण्डी लोकसाहित्य का संकलन तथा प्रकाशन है.

संस्कृति में बुंदेला शासन के प्रारम्भ होने के बीच एक ऐसा संधिकाल बुंदेलखंड में आता है जिसकी संस्कृति और समाज का चित्रण साहित्य के माध्यम से ही संभव है. जगनिककृत “आल्हा” और विष्णुदास कृत “रामायन कथा” तथा “महाभारत कथा” का आश्रय लेना श्रेष्ठकर है. विदेशी आक्रमणों का ऐसा सिलसिला चला कि राजनैतिक दृष्टि से भारत में स्थिरता नहीं रह पाई. तथापि धार्मिक और सांस्कृतिक परिवेश कठोर नियमों से अनुसासित होने लगा समाज के चारों वर्णों को स्मृतियों के अनुसार चलने के निर्देश धार्मिक नेताओं ने दिए. स्मृतियों के अनुसारण में कट्टरता बढ़ी और जाति और उपजातियों की श्रृंखला बढ़ती ही गई. सवर्णों में पुनर्विवाह वर्जित था परन्तु शूद्रों में इसका प्रचलन था. दास-दासियों के रखने का चलन था. चन्देलों के समय धर्म का जो रुप था उसमें इस काल में कोई लक्षणीय अन्तर नहीं दिखता है. गुजरात के सोलंकी नरेश कुमारपाल के संरक्षण में जैन धर्म अवश्य ही उत्थान पा गया. उड़ीसा के जगन्नाथ,कोणार्क के सूर्य मन्दिर के नमूने तथा भुवनेश्वर समूहों का निर्माण इस समय हुआ. जैन मन्दिरों के नमूने आबू के दैलवाड़े मन्दिरों में दृष्टव्य हैं राजाओं की चिन्ता अपने राज्य को विजित होने से बचाने की थी. चारण युग का प्रारंभ यहां से होता है, चन्द और जगनिक आदि कवि इसके प्रमाण हैं.

फिरोज तुगलक के समय तक समाज की दशा अत्यंत खराब हो चुकी थी. शासन का संचालन संकीर्णतापूर्ण, पक्षपातयुक्त और साम्प्रदायिकता के आधार पर होता था. अत: धार्मिक पक्षपात स्वाभाविक थे. हिन्दू जी तोड़कर अपनी समाज व्यवस्था बनाने में लगे थे पर राज्य की ओर से हस्तक्षेप होते थे. समाज में दास प्रथा थी. तैमूरलंग के आक्रमण से असंतुलन उत्पन्न हुआ. रुढ़िवाद और अंध विश्वासों की सघनता बढ़ी. वर्णाश्रम धर्म की कट्टरता इतनी बढ़ी कि एक उपविभाग का व्यक्ति दूसरे उपविभाग के व्यक्ति तके यहां खानपान, रोटी-बेटी का संबंध नही रखता था. विदेशी आक्रमणकारियों से जब भगवान जनता की रक्षा न कर सका तो धर्महीनता की स्थिति भी आने लगी. बुंदेलखंड के समाज को अब पूर्णत: धर्म, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्थाओं के क्षेत्र में शासक का मुखापेक्षी होना पड़ा. राजा के निर्देश कवियों की वाणी का अभिव्यक्त हुए हैं.ऎसा प्रसिद्ध है कि कालिंजर के राजा परमार के यहाँ जगनिक नाम के एक भाट थे जिन्होंने महोबे के दो देश प्रसिद्ध वीरें आल्हा और ऊदल(उदय सिंह) के वीरचरित का विस्तृत वर्णन एक वीरगीतात्मक काव्य के रूप में लिखा था जो उतना सर्वप्रिय हुआ कि उसके वीरगीतों का प्रचार क्रमश: सारे उत्तरी भारत में विशेषत: उन सब प्रदेशों में जो कन्नौज साम्राज्य के अंतर्गत थे-हो गया. जगनिक के काव्य का आज कहीं पता नहीं है पर उसके आधार पर प्रचलित गीत हिंदी भाषा भाषी प्रांतों के गांव गांव में सुनाई पड़ते हैं. ये गीत आल्हा के नाम से प्रसिद्ध हैं और बरसात में गाए जाते हैं.बुंदेलखण्ड में विशेषत: महोबे के आसपास भी इसका चलन बहुत है. इस समय आल्हा और जल समाज के प्रचलित पक्तियां इस प्रकार हैं-

(१) “बारह बरस लौ कूकर जीयें ओ तेरा लौं जियें सियार

बरिस अठारह छत्री जीयें आगे जीवन को धिक्कार.”27

(मौखिक आल्हा परंपरा से)

(२) “जाहि प्रान प्रिया लागिन सौ बैठे लिज धाम.

जो काया पर मूछ वाई सो कर हैं संग्राम.”28

(३) “बाई जित परमाल के बज्जे घोर निसा.

सैन सहित गढ़ मिलियो मल्लखन बलवान.”29

इनसे पता चलता है कि चन्देलों के समय से राजाओं को युद्धरत रहना पड़ता था. समाज का स्थान राज्य के बाद आता है अत: हिन्दू धर्म के अनुसार राजा के लिए मरना जन समाज का धर्म हो गया था. राजा की कल्पना ईश्वर के अंश के रुप में की गई. देशी राजाओं ने हिन्दू जनता की उन्नति के लिये जितने कार्य किये उससे कहीं अधिक अपने स्वार्थों की पूर्ति की.

बुंदेली समाज का प्रतिनिधित्व १२वीं शताब्दी में महोबा के द्वारा, पन्द्रहवीं शताब्दी में ग्वालियर के द्वारा तथा उसके बाद ओरछा और पन्ना के द्वारा होता था. पन्ना के शासकों का गौड़ों और मराठों से संबंध जुड़ता है,तब बुंदेलखंड के समाज में वैविध्य आने लगता है. मुगल शासन का प्रभाव भी समाज की रुढियों और विविध सामाजिक जीवन मूल्यों में परिवर्तन लाता है. अंतिम विदेशी प्रभाव अंग्रेजी समाज का है. जिसमें वर्तमान बुंदेली समाज की संरचना हुई इस प्रकार बुंदेली समाज सामन्तवाद के प्रभाव से प्रारंभ होकर साम्राज्यवाद की अतियों का शिकार भी बनता है.

बुंदेली लोक समाज गीतों, कथाओं और लोक नाट्यों के अतिरिक्त मनोरंजनात्मक बुद्धिपरक ज्ञान की सूक्तियों को सुरक्षित रखे हुये है.ये उपाख्यान,चुटकुले आदि के रुप में,दैनिक व्यवहार में प्रयुक्त होती हैं. चना और चूरन बेचने वाले अपने लटके दीर्घ स्वरों में गाकर बालकों को आकृष्ट कर लेते हैं और साथ ही युवक भी परिहासमयी तुकबंदी सुनकर रस ग्रहण करते हैं.यह ढ़कोशला– ‘चीटीं चढ़ी पहाड़ पर, नौ मन कजरी लगाय.’30 सुनते हैं तब ग्रमीणों की कौतूहलप्रियता का सहज पता चलता है.ग्रामीण जनता में प्रयुक्त मुहावरे अनुभवजन्य ज्ञान के वाक्यांश हैं,जिनमें लक्षणा अथवा व्यंजना व्यहृत होती है और जहाँ मूर्ख को गधा अथवा वैसाख नन्दन की संज्ञा देने में कोई हिचक नहीं. लोकोक्तियाँ संचित अनुभवों की ज्ञानागार होती हैं. वासुदेवशरण अग्रवाल ने इस विषय में ठीक ही कहा है-“उनसे मनुष्य को व्यावहारिक जीवन की गुत्थियों या उलझनों को सुलझाने में बहुत बड़ी सहायता मिलती है.लोकोक्तियों का आशय पाकर मनुष्य की तर्क-बुद्धि शताब्दियों के संचित ज्ञान से आश्वस्त सी बन जाती है.और उसे अंधेरे में उजाला दिखाई पड़ने लगता है,वह अपना कर्तव्य निश्चित करने में तुरन्त समर्थ बन जाता है.”31 ये लोकोक्तियाँ गद्य एवं पद्य दोनों में पाई जाती हैं.

बुन्देली की एक कहावत ‘मरी बछिया वामन के नांव’.32 मनुष्य के प्राकृतिक स्वभाव का सजीव चित्र खींचती है कि वह कितना ही सभ्य और सुसंस्कृत हो गया है. वह सभी काल में निकृष्ट और अनुपयोगी वस्तु को दूसरों के सिर मढ़ना चाहता है. इस कहावत की कहानी उपनिषदकाल में मिलती है. वाजश्रवा नाम के ऋषि ने यज्ञ की दक्षिणा में ब्राहम्णों को अपना सम्पूर्ण गोधन दे दिया था. दान में दी गयी सभी गायें बूढ़ी थीं. दूध एक भी नहीं देती थी. उस समय से सह कहावत चल पड़ी है. बुन्देलखण्ड के भूतपूर्व छोटे से राज्य आलीपुर की अंधेरगर्दी की चर्चा इस कहावत में मिल जाती है-

“तीन में घंटा चलै,तीन में तलवार

तीनइ में पैना चलै,अलीपुर दरबार.”33

यह कहावत अंधेर नगरी के टकासेर भाजी,टकासेर खाजा का स्मरण कराती है.ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजी सेना बुन्देलखण्ड के जिस ग्राम से निकलती थी तो छोटे-बड़ों सबको बेगार और रसद का प्रबंध करना अनिवार्य था.तभी कहावत चल पड़ी- ‘गाँव में आई डोरी,का माते का कोरी.’34 उस समय गाँव की बुढ़ियों को सैलिकों के लिए आटा पीसकर देना पड़ता था.तभी से लोग कहने लगे-

‘तस्कर को का डुकरयई पीसे.’35

इन कहावतों में विदेशी शासन की शोषक नीति का सच्चा परिचय मिलता है.बुन्देलखंडी जनता मुगल अफगानों,मराठों और अंग्रेजों के अत्याचारों से संत्रस्त रही है,तब उसकी करुण भावना लोकगीतों और लोकोक्तियों में आना स्वाभाविक है.

बुन्देली पहेलियाँ ग्रामीणों की जिह्वा पर नाचती रहती हैं.ये बुद्धि परीक्षा के साथ मनोरंजन लक्ष्य समाहित किये हुये होती हैं. ग्रामीणों की कल्पनातीत सूझबूझ देखकर दाँतों तले अँगुली दबानी पड़ती है.कुछ पहेलियाँ गेय होती है,तो कुछ अगेय होती है.ग्रामीणों की बुद्धि-विलास का एक उदाहरण देखिये ,जब वे पहेली बूझते हैं-

“नन्नी जनी और बड़ी जनी,

बड़ी जनी ने खोली तनी

तब नाचन लागी तीनों जनी.”36

ग्रामीण क्या, सुशिक्षित नागरिक भी इनका उत्तर टटोलने के लिए सिर खुजलाता दिखाई देगा. ढोरों की सार के लिए यह पहेली कितनी उपयुक्त है- ‘रात भरी दिन रीती तथा दिन भरी रात रीती’37 अलगनी पर डाले रहते हैं और ओढ़ने बिछाने को रात को उठा लेते हैं.

बुंदेली लोक-साहित्य के विषय में कहा जा सकता है कि- ‘लोक के मौखिक साहित्य ने मानव जीवन के उल्लास और रुदन,उनकी मैत्री और दिलेरी और कायरता के भावों को अभिव्क्त किया है.’38 लोक साहित्य के विशेषज्ञ और प्रशंसक ए.एम.गोर्की कहा करते थे कि- “श्रमिक वर्ग का सच्चा इतिहास बिना उनकी मौखिक कृतियों के नहीं जाना जा सकता है.”39 सर एडवर्ड बी.टेलर ने उचित ही कहा है- “प्राचीन जातियों के विचार का अध्ययन करने के लिए इतिहास की अपेक्षा उनकी पौराणिक गाथाएँ हमारे लिए अधिक शिक्षाप्रद है.”40

बुंदेली लोक गीत-

बुंदेली लोकगीत विभिन्न संस्कारों, ऋतुओं एवं व्रत त्यौहारों आदि के अवसरों पर स्त्री पुरुष सामूहिक रुप में गाते हैं.ये गीत विभिन्न अवसरों पर विभिन्न स्वर लहरियों में गाये जाते हैं.कुछ गीत व्यक्ति परक होते हैं,जिन्हें एक व्यक्ति भी गा सकता है और कुछ गोष्ठी में सम्मिलित स्वरों में गूंज उठते हैं.कुछ गीत बिना वाद्य के भी गाये जाते हैं और किन्हीं में ढोलक,मजीरा,डफ,खड़ताल,चंग,तम्बूरा आदि वाद्य भी प्रयोग मे लाये जाते हैं.गीतों का वर्गीकरण स्थानगत,ऋतुगत,जातिगत तथा संस्कारगत किया जा सकता है.पर्वत निवासियों के गीतों में पर्वतीय जीवन की कठोरता बोलने लगती है,जबकि समतल मैदान के निवासी निर्द्धन्द्ध एवं स्वच्छंद जीवन बिताते हैं. लोक जीवन की स्थानगत विशेषताएं उनके लोकगीतों में पाई जाती है.विभिन्न ऋतुओं के लोकगीत लोक मानस के अन्त:विश्लेषण करने में सक्षम होते हैं.चैत्र मास में रामा देवी की अचरी, वर्षाकाल में कन्हैया, आल्हा, ढोला, बारहमासी आदि पुरुषों के गीत तथा हिडोला गीत,मरमानि ढोला आदि स्त्रियों के गीत बड़े मार्मिक होते हैं.कुँआरमास में बालक बालिकाओं के टेसू के गीत बड़े ही कौतूहलवर्द्धक हैं.फाल्गुन मास में पुरुषों एवं स्त्रियों की फागें जीवन में नवोल्लास भर देती है.जातिगत गीत जातिविशेष के कार्य कलापों से सम्बंधित होते हैं.संस्कारगत गीत विविध संस्कारों पर स्त्रियों द्वारा(मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यपर्यन्त) गेय गीत हैं.इनमें सोहर एवं विवाह के गीत अत्यधिक संख्या में विद्यमान है.

(क) शिशु गीत-

घर की बड़ी,बूढ़ी,दादियां तथा माताएं शिशुओं को पालने में झुलाकर उनको प्रसन्न रखने हेतु जो गीत गाती है,वे लोरी या पालने के गीत कहे जाते हैं.ये गीत बालक को खिलाने तथा सुलाने के समय गाये जाते हैं.बच्चे को सुलाते समय वह गाती है-

“सोजा सोजा बारे वीर

वीरन की बलइयां लै लेउँ जमुना के तीर

बर पै डारौ पालना, पीपर पै डारी डोर

जौ लौं भइया सोउन लागे,तोनों आगई मोर.”41

(ख)किशोर गीत-

विशेष ऋतु एवं काल सम्बन्धी बालकों के गीतों में टेसू के गीत और होली माँगने के गीत सम्मिलित हैं.कुँआर मास की नौरात्रि के पश्चात ग्राम के बालक मिट्टी का टेसू बनाकर,उसके सिर को घर-घर जाकर अन्न,पैसा,इकट्ठा करते हैं.पूर्णमासी के दिन सब मिलकर टेसू का विवाह करते हैं.कुछ स्थानों पर बड़ी धूम धाम प्रीति भोज देकर विवाह सम्पन्न करते हैं.अंत में युद्ध का नकली रुप दिखाकर टेसू का सिर उड़ा ले जाते हैं .टेसू की कथा स्कंद पुराण में दो अध्यायों में वर्णन की गई है.टेसूगीत-

“धांधू तेली की टूटी लाट

ऊ में निकरै बढ़ई साब,

बढ़ई साब ने बनायो पलंग

ऊ पै लेटे टेसू मलंग”42

ऎसॆ गीतों में सामूहिक लय का ध्यान रखा जाता है.ये बालकों के समूह द्वारा सामूहिक रुप मे गाये जाते हैं.इनके चरण लम्बे नहीं होते,जैसे-

“इमली की जड़ में ते निकरी पतंग

नौ से मोती झलकै रंग”43

(ग)होली गीत-

लड़के होली जलाने के लिए लकड़ी इकटठी करने हेतु चन्दा मांगने द्वार-द्वार पर सब मिलकर गाने गाते हैं –

“लाड़ी माई ऊतरा,तेरे घर पै पूतरा

लाल पैसा तेरा,दिया बेटा मेरा

होरी है……होरी है.”44

(घ)सावन गीत-

श्रावण मास लगते ही कुमारियों के टोल के टोल घरों में,बाग बगीचों में झूले डाल लेते हैं और सुमधुर कंठ से निसृत स्वर आसपास के वातावरण को आनन्दसिक्त कर देते हैं.एक गीत में मनिहार(चूड़ीवाला) गलियों में चूड़ियाँ बेचता फिरता है,बीबी जी ने उसे बुलाकर चूड़ियाँ बेचता फिरता है,बीबी जी ने उसे बुलाकर चूड़ियाँ पहनीं.चूडा पहनते समय वह मनिहार से कहती है-

“हरी तो जंगली मनिअर ना पैरौं,

हरे हैं राजा जी के बाग,महाराजा जी के बाग

चूड़ो तो मेरी जान,चूड़ी तो हातीदांत कौ

पीरो रे जंगाली मनिअर,ना पैरौं

पीरे हैं राजाजी के वस्त्र,महाराजा जी के वस्त्र

चूड़ो तो मेरी जान,चूड़ो तो हातीदांत कौ.”45

मनिहार विविध रंग की चूड़ियाँ दिखलाता है परन्तु स्त्री उन रंगों को पति की वस्तुओं से मिलता पाकर अस्वीकार कर देती है.पतिव्रता धर्म का लोक-प्रतिष्ठित विश्वास प्रत्यक्ष हुआ है.

इन सावन गीतों की यह विशेषता है कि स्त्रियों की स्वर-लहरी झूले के पेंग के साथ घटती बढ़ती चलती है.गीत बड़े ही सरस एवं कर्णप्रिय होते हैं.इनमें यौवन के उद्दाम प्रेम का प्रवाह अजस्त्र गति से बहता दिखाई देता है.लोकगीत ने कला का कोई बंधन स्बीकार नहीं किया.उन्होंने तो स्वान्त सुखाय ही रचना की है.यदि इन गीतों में समरसता या सुन्दरता पाई जाती है तो वह अनायास ही सुलभ हुई है.इन कवियों को तो शुद्ध साहित्यिक भाषा का ज्ञान है.और न कवि कर्म के निश्चित सिद्धान्तों का ध्यान है.इन गीतों में सहज सौंदर्य लक्षित होता है,जो बरबस मानव मन को आकृष्ट कर लेता है.

बुंदेली कथा साहित्य-

बुंदेली कथा साहित्य का भंडार भरापूरा है.बुंदेलखण्ड में प्रत्येक दादी या फूफी रात्रि के समय बच्चों के मनोरंजन के लिए एक दो कहानी अवश्य कहती हैं.कहानियों का अन्नत भण्डार समाप्त होने नहीं आता.घर की वृद्धा दादी जब बच्चों को कौआ और रेंहटा की कहानी सुनाती है तब कहानी की पद्यमय पंक्तियाँ बड़ी होती जाती हैं और दादी बड़े आकर्षक ढ़ग से उसे कहती जाती है.आगे चलकर कहानी के अंत में कौआ बढ़ई के पास पहुंचता है और कहता है-

“सुन ले भैया डांग गयौ,

डांग में ते लकड़ी लायौ,

लकड़ी मैंने डुक्को दीनी,

डुक्को मोइ चंदिया दीनी,

कुमरा मोई हंड़िया दीनी,

हँडिया मैंने गूजर दीनी

गूजर मोइ लौंदा दीनो

लौंदा मैनें हरहारे दीनो

हरहारे मोइ बैल दीनो

बैल मैनें राजा दीनो

राजा मोइ रानी दीनी

रानी मैनें तोइ दीनी

तू का मोइ एक रेंहटा नइँ देइगो.”46

रेंहटा पाकर वह प्रसन्न हो उठा और उसे चलाकर कहने लगा-

“चल मेरे रेटा तामक तू,

रानी के बलदै,आयौ तू.”47

यह कहानी बाल सुलभ कल्पनाशक्ति को जगाती है,साथ ही सामाजिक संस्कारों को सुदृढ़ भी करती है.समाज में अन्योन्याश्रित सम्बंधों पर ही सांसारिक कार्य सम्पन्न होते हैं.इस बात को कहानी के सरल माध्यम से सिखाया गया है,जो बाल मानस पर सदा के लिए अंकित हो जाती है.एक दूसरी कहानी पिल्ला की करा-मात है,जिसमें पिल्ला न छोटे बड़े प्राणियों की सहायता की और विपत्ति पड़ने पर उसे सहायता का प्रतिदान मिला तथा राजा की असीम शक्ति को उसने ललकार दिया.कहानी में पारस्परिक मैत्री और सदभावना लाभ का उपदेश छिपा हुआ है और कहानी यह भी संकेत करती है कि छोटे से छोटा प्राणी भी बड़े से बड़े शत्रु को पराजित कर सकता है.प्राचीन हितोपदेश तथा पंचतंत्र की रचना पं.विष्णुशर्मा ने इसीलिए की थी कि उन्होंने इसके द्वारा राजा के मूर्ख पुत्रों को विद्वान बना दिया था.इस प्रकार बाल-कहानियों में बाल मनोरंजन के साथ-साथ बालकों को शिक्षित किया जाता है.

बुन्देली लोक नृत्य

बुन्देलखण्ड की लोकजन संस्कृति में सामाजिक तथा जातीय गुणों को पेशेवर तरीके से सामाजिक परिवेश में जोड़ने के लिए विभिन्न नृत्यों की परम्परा विद्यमान है. सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तन के दौर में संक्रमण काल से गुजर रहे बुन्देली भूभाग में लोक नृत्य अब विलुप्त की कगार पर पहुंच गये है. बुन्देली लोक नृत्य पंरम्पराओं को बचाने के लिए समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो ‘सैरा नृत्य’, ‘डोमरहा नृत्य’, ‘जवारा नृत्य’, ‘कीर्तन नृत्य’, ‘कानड़ा नृत्य’, ‘चांचरा’ या ‘पाइ-डण्डा नृत्य’, ‘झांझिया नृत्य’, ‘मोनिया नृत्य’, ‘देवी नाच’, ‘चमराहा नृत्य’, ‘कहारों का नाच’, ‘राई नृत्य’, ‘ढिमराई नृत्य’, ‘कुम्हराई नृत्य’, ‘दुलदुल घोड़ी नाच’, ‘खशुआ नाच’, ‘चांगलिया नाच’, सिर्फ अतीत का इतिहास बनकर रह जायेगें. ‘कानड़ा नृत्य’ धोबी जाति का परम्परागत नृत्य है.

भगवान कृष्ण या कान्हा से सम्बन्धित इस नृत्य को नया जीवन तथा नया सम्बल और पुर्न प्रतिष्ठा दिलाने वाले सागर के लक्ष्मीनारायण रजक ने कहा था कि किसी जमाने में कानड़ा नृत्यकों को समाज में इतना सम्मान और नेंग मिलता था कि उसे और जीवकोपार्जन के लिए नहीं भटकना पड़ता था पहले विवाह में पग-पग पर कनाड़ियाई होती थी हल्दी चढ़ाते समय, मैहर का पानी भरते समय, मण्डप छापते समय, बारात विदा होते समय, बारात की अगुवानी में कनाड़ियाई होती थी बिना कनड़ा नृत्य की शादी विवाह नहीं होते थे. लेकिन आजकल कानड़ा को कोई बुलाते नहीं है पहले कनड़ा विवाह का अनिवार्य अंग था इसलिए कानड़ा के बहुत से कालाकार होते थे लेकिन आजकल कानड़ा नृत्य के स्थान पर विवाह में लोग बैण्ड बाजों या रेकार्ड़िग से काम निकालने लगें है, इसलिए कानड़ा नृत्य के कलाकार आज न के बराबर है. अब तो कोई शादी विवाह में कानड़ा करवाते हैं. आर्थिक अभाव के कारण ही कानड़ा नृत्य छूटता जा रहा है केवल सांरगी लोटा से कानड़ा नृत्यों का आज पेट नही भरता, वे कानड़ा को छोड़कर अन्य मजदूरी की तलाश में भटकने लगे हैं,इससे हमारे लोक कला जगत की एक महत्वपूर्ण विधा की बहुत बड़ी हानि हुई है। पहले एक ही विवाह में दो-तीन कानड़ा नृत्यक पहुँचते थे वहां प्रतिस्पर्धा होती थी प्रत्येक कानड़ा कलाकार अपनी-अपनी कला के माध्यम से श्रेष्ठता सिद्ध करता था अब तो गणेश उत्सव या नवरात्रि उत्सव ही कानड़ा नृत्य के अवसर रह गये है कभी-कभी शिशु जन्म पर खुशी से कोई-कोई कनिड़ाई गंवाते नचवाते हैं. ऊँचे-परे गांव के किसान जैसी कद-काठी वाले जब लक्ष्मीनारायण रजक कानड़ा की पारम्परिक भेश भूषा और सिंगार कुर्ता, बांगा, कंदिया, सेली, वाजूबंद, पकड़ी, कलगी, लगाए पैरों में घुघरू बांधे हाथ में सांरगी लिये निकलते है तो कानड़ा के इस सज्जन कलाकार को देखकर दर्शक ठगे रह जाते हैं और जब सारंगी मृदंग लोटा, झूला, कसावरी, टिमकी और खजरी की संगत के साथ कानड़ा गीत में बुन्देली शब्द, बिरहा, रमपुरिया, राई सैरा, दादरों की धुन लय ताल में निकालते है तो कानड़ा नृतक की पैरो की थिरकन और कमर की लचक तथा नृत्य की वृत्तीय गतियां देखते ही बनती है. लक्ष्मीनारायण रजक कानड़ा के दक्ष कालाकार हैं. जिन्होंने इस नृत्य को नई गति प्रदान की श्री रजक ने कृष्ण लीला, रामचरित महाभारत की कथाओं श्रृगांर तथा सामाजिक विषयों पर कानड़ा की परम्मपरागत धुनों में बुन्देली की कई रचनाएं की और अन्य कवियों के छन्दों को गाना शुरू किया. लेकिन उनके द्वारा पुर्न प्रतिष्ठित यह कला धीमें-धीमें जा रही हैं.

लोक बाद्य-

बुन्देली लोक बाद्य ‘अलगोजा’, ‘मौहर’, ‘रमतुला’, ‘बीन’, ‘डपला’, ‘दौंड़’, ‘नगाड़ा’, ‘खजली’, ‘अंजलि’, ‘नगडिया’, ‘तांसा’, ‘चंग’, ‘नरगा’, ‘इकतारा’, ‘कसौरा’, ‘जोरी’ या ‘झांझ’, ‘चिमटा’ आदि बाद्य बजाने वाले कलाकार धीरे-धीरे सिमट रहें है. लोक संस्कृति विभाग सिर्फ नाम के आयोजन करके भारी धनराशि लोक संस्कृति के नाम पर व्यय तो कर रही है लेकिन इन नृत्यों को बचाने के लिए कुछ सार्थक प्रयास नहीं हो रहें है झांझिया नृतक द्वारा गाये जाने वाला यह गीत ‘‘हरी री चिरैया, तोरे पियेर रे पंख, सो उड़-उड़ जाये, बबुरा तोरी डार’’ की गति हो रही है राई नृत्य करने वाली बेड़नी की हालत अत्यन्त खराब है राई, बुन्देलखण्ड के श्रेष्ठतम लोक नृत्यों में से हैं. भादों में कृष्ण जन्माष्टमी से प्रारम्भ होकर, यह नृत्य फाल्गुन माह में होली तक चलता है. इस नृत्य का नाम राई क्यों पड़ा, इसका तो कोई निश्चित कारण पता नहीं चल पाया, पर बुन्देलखण्ड की बेड़नियों द्वारा किया जाने वाला और अपनी विशिष्टता में मयूर-मुद्राओं का सौन्दर्य समेटे, यह नृत्य अपने यौवन काल में राज्याश्रृय प्राप्त दरबारी नृत्य रहा है अब इसे अन्य लोग भी करने लगे हैं. बेड़नियाँ यह नृत्य करते हुए, अपने यौवन काल में राज्याश्रृय प्राप्त दरबारी नृत्य रहा है.

बेड़िनियॉ यह नृत्य करते हुए, अपनी शरीर को इस प्रकार लोच और रूप देती है कि बादलों की गड़गड़ाहट पर मस्त होकर नाचने वाले मोर की आकृति का आभास मिलता है. इसका लहंगा सात गज से लेकर सत्तरह गज तक घेरे का हो सकता है. मुख्य नृत्य मुद्रा में अपने चेहरे को घूँघट से ढंककर लहंगे को दो सिरों से जब नर्तकी अपने दोनों हाथों से पृथ्वी के सामानान्तर कन्धें तक उठा लेती है, तो उसके पावों पर से अर्द्ध चन्द्राकार होकर,कन्धे तक उठा यह लहंगा नृत्यमय मयूर के खुले पंखों का आभास देता है. नृत्य में पद संचालन इतना कोमल होता है कि नर्तकी हवा में तैरती सी लगती है. इसमें ताल दादरा होती है. पर अन्त में कहरवा अद्धा हो जाता है साथ में पुरूष वर्ग लोग धुन गाता है.नृत्य की गति धीरे-धीरे तीव्र होती जाती है. राई में ढोलकिया की भी विशिष्ट भूमिका होती है. एक से अधिक ढोलकिए भी नृत्य में हो सकते है. ढोलकिए नाचती हुई नर्तकी के साथ ढोलक की थाप पर उसके साथ आगे-पीछे बढ़ते हैं, बैठते हैं, चक्कर लगाते हैं. नृत्य चरम पर ढोलकिया दोनों हाथों के पंजों पर अपनी शरीर का पूरा बोझ सम्भाले हुए, टांगे आकाश की ओर कर, अर्द्धवक्राकार रेखा बनाकर आगे-पीछे चलता है. इस मुद्रा मे इसे बिच्छू कहा जाता है. राई नृत्य में नर्तकी की मुख्य पोशाक-लहंगा और ओढ़नी होती है. वस्त्र विभिन्न चमकदार रंगों के होते हैं. दोनों हाथों में रूमाल तथा पांवों में घूंघरू होते हैं. पुरूष (वादक) बुन्देलखण्डी पगड़ी, सलूका और धोती पहनते हैं. राई के मुख्य वाद्य ‘ढोलक’, ‘डफला’, ‘झींका’, ‘मंजीरा’, तथा ‘रमतुला’ है.

इस प्रकार बुन्देलखण्ड का लोक साहित्य गहन गंभीर सागर की भाँति मौखिक रुप में यत्र तत्र बिखर गया है,जिसका संकलन कार्य असंभव सा है.बिना पूर्ण संकलन के उसका अध्ययन मनन भी असम्भाव्य है.और फिर यह साहित्य दिनों दिन बढ़ता ही जाता है.नये युग की नई परिस्थतियों और प्रवृत्तियों से प्रभावित होकर नवीन विषयों और विचारों का परिवर्द्धन एवं संवर्द्धन हो रहा है .फिर भी सत्यान्वेषक अथाह सारगर्भित मोती मूंगे खोज ही निकालते हैं. इस लोक नृत्यों को बचाने के लिए बुन्देलखण्ड में ही लोक संस्कृति केन्द्र की स्थापना जरूरी है. तभी बुन्देली लोक गीत,लोक कथा साहित्य, लोक नृत्य, तथा लोक वाद्य सुरक्षित और संरक्षित रह सकेगें.

संदर्भ ग्रंथ

1-डॉ.कृष्णदेव उपाध्याय-लोक साहित्य की भूमिका साहित्य भवन प्रा. लिमिटेड इलाहाबाद संस्करण 2010 पृ.सं.(9)

2- वही. पृ.सं.(9)

3- वही पृ.सं.(10)

4- वही पृ.सं.(10)

5- वही पृ.सं.(10)

6- वही पृ.सं.(10)

7- वही पृ.सं.(11)

8- वही पृ.सं.(22)

9-वही पृ.सं.(16)

10- वही पृ.सं.(16)

11- वही पृ.सं.(18)

12- वही पृ.सं.(19)

13- वही पृ.सं.(20)

14- स्नेही, डॉ. रामस्वरुप श्रीवास्तव,बुंदेली लोक साहित्य,रंजन प्रकाशन आगरा 1976 पृ.सं(27)

15- वही पृ.सं.(27)

16- वही पृ.सं.(27)

17- A balled is the poetry of the people,by the people,for the people.

18- वही पृ.सं. (4) भूमिका

19- शुक्ल,रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास,नागरी प्रचारणी सभा वराणसी पृ.सं.(141)

20- स्नेही,बुंदेली लोक साहित्य,रंजन प्रकाशन आगरा 1976 पृ.सं.(22)

21-वही पृ.सं.(23)

22- वही पृ.सं. (23)

23-वही पृ.सं.(23)

24- वही पृ.सं.(28)

25-वही पृ.सं.(28)

26-वही पृ.सं.(28)

27-शुक्ल, रामचन्द्र, हिंदी साहित्य का इतिहास,नागरीप्रचारणी सभा वराणसी पृ.सं.(29)

28-वही

29-वही

30- स्नेही,बुंदेली लोक साहित्य,रंजन प्रकाशन आगरा पृ.सं.(32)

31-वही पृ.सं.(32)

32-वही पृ.सं.(32)

33-वही पृ.सं.(32)

34-वही पृ.सं.(32)

35-वही पृ.सं.(32)

36-वही पृ.सं.(33)

37-वही पृ.सं.(33)

38-वही पृ.सं.(36)

39-वही पृ.सं.(36)

40-वही पृ.सं.(33)

41- वही पृ.सं.(43)

42-वही पृ.सं. (48)

43-वही पृ.सं.(48)

44-वही पृ.सं.(49)

45-वही पृ.सं.(53)

46-वही पृ.सं.(30)

47-वही पृ.सं.(31)

बिगड़ती हुई आबोहवा

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बिगड़ती हुई आबोहवा

समीक्षक- राहुल देव

समकालीन कविता की एक पीढ़ी वह भी है जो नई कविता आन्दोलन के बाद उभरी। उस पुरानी पीढ़ी के कुछ कवि आज भी कविताएँ लिख रहे हैं। इनकी कविताओं में बदलते हुए समय सन्दर्भों को भी सहज ही लक्षित किया जा सकता है। डॉ रणजीत उसी परम्परा के वरिष्ठ प्रगतिशील कवि हैं। ‘बिगड़ती हुई आबोहवा’ कवि रणजीत का 11वां कविता संग्रह है। जिसे उन्होंने सेल्फ पब्लिशिंग के तहत नोशन प्रेस, चेन्नई से प्रकाशित किया है। इस संग्रह में उनकी सन 2000 से 2020 के बीच लिखी गई कुल 59 कविताएं शामिल की गई हैं।

डॉ रणजीत एक जनपक्षधर कवि रहे हैं। कवि एक लंबे समय से कविता लिखता चला रहा है। उन्होंने प्रतिरोध की कुछ बेहतरीन कविताएं लिखी हैं। नई सदी के आने के बाद मनुष्य के जीवन में जिस तरह बाजार और उत्तरआधुनिकता की घुसपैठ हुई है, जिस तरह विकास के नाम पर सत्ता और पूंजी के गठजोड़ ने मनुष्यता के रास्ते में कांटे बिछाने का ही काम किया है। ऐसे तमाम विषयों की गहराई में जाकर कवि पाठक के सामने अपनी कविता के माध्यम से वैचारिक आधारभूमि निर्मित करता है। संग्रह की पहली कविता प्रश्न करते हुए मानो पूछती है कहां है असली आजादी- ‘विषम खेल है/ नियम उन्हीं के/ वह निर्णायक वही प्रतियोगी/ हैं वही भाग्य विधायक/ शुरू हुआ अब खुला खेल फर्रुखाबादी/ देखे कब तक बचती है अपनी आजादी’

समीक्षा के क्रम में संग्रह की ‘मिल्कियत’ शीर्षक कविता उल्लेखनीय है। यह कविता परंपरागत सामाजिक ताने-बाने की पड़ताल करती हैं। डॉ रणजीत की कविताओं का मुख्य स्वर आक्रोशजनित व्यंग्य प्रतीत होता है लेकिन इसे व्यक्त करते हुए कवि हमेशा विवेकी व संयत मुद्रा में रहे हैं। डॉ रणजीत अपनी छोटी कविताओं में ज्यादा सशक्त रूप से उभर कर सामने आए हैं। संग्रह की अपेक्षाकृत कुछ बड़ी कविताओं में शब्द व्यय के कारण कथ्य की काव्यात्मकता धूमिल सी प्रतीत होती है। संग्रह में कवि की कुछ साधारण कविताएं भी शामिल है जैसे ‘इंसानियत का पैगाम’, ‘दर्द का सम्मान’ तथा ‘परेशान मत करो बच्चों’ जैसी कविताएं। उम्र के इस पड़ाव पर ऐसी कविताओं को संग्रह में शामिल करने का तर्क समझ में नहीं आया। लंबी कविताओं पर भी थोड़ा और काम किया जा सकता था वे सपाटबयानी का शिकार मालूम होती हैं जैसे ‘किन्नरों की जीत पर’,  ‘एक बेलाग बात’ तथा ‘अच्छी बातों की चर्चा’ शीर्षक कविताएं।

यह संग्रह थोड़ा जल्दबाजी में प्रकाशित किया गया है, ऐसा लगता है। प्रूफ रीडिंग की कुछ गलतियां अखरती हैं। जिन पर अगले संस्करण में ध्यान दिया जाना अपेक्षित होगा। इसी तरह भीतरी कंटेंट के फोंट को भी बेहतर रूप दिया जा सकता था। हालाँकि कतिपय त्रुटियों से संग्रह की कविताओं की महत्ता कम नहीं हो जाती। एक छोटी कविता ‘नई पीढ़ी से कवि का आह्वान’ है- ‘न चंट चालाक बनो/ न भोले ना दान बनो/ न रूढ़िवादी हिंदू बनो/ न बंद दिमाग मुसलमान बनो/ नई पीढ़ी के किशोरों और नौजवानों/ बन सकते हो तो/ थोड़े और बेहतर इंसान बनो।‘ कवि का यह मानववादी दृष्टिकोण संग्रह की मूल थीम है। संग्रह की एक और अच्छी कविता है ‘मेरे बस की बात’ जिसमें कवि बिगड़ चुके सामाजिक ताने-बाने को सुधारने के लिए सामूहिक सहयोग का आह्वान करता है। यह किसी एक व्यक्ति के बस की बात नहीं। इसी तरह ‘लोग’ शीर्षक कविता भी परिवेश की विसंगतियों पर भरसक प्रहार करती है। कवि की स्त्रीविषयक संवेदना ‘प्यार करती हुई स्त्री’ शीर्षक कविता में उमड़ पड़ी है। लेकिन कवि अपने सामाजिक उद्देश्य के प्रति सजग है और भावविगलित न होते हुए अगली कविता में वह ‘असली  क्रांति’ की बात करता मिलता है। स्त्री को लेकर ‘एक दुविधाग्रस्त महिला का अंतर्द्वंद’ कविता भी अपने उद्दात्त भावों के कारण बेहद प्रभावी बन पड़ी है।

संग्रह की एक और बेहतरीन कविता का जिक्र करना चाहूंगा जिसका शीर्षक है ‘लोग हैं बेशर्म’। इस कविता में कवि लिखता है- ‘लोग हैं बेशर्म, बोलो क्या करें/ कुटिल इनके कर्म, बोलो क्या करें/ द्वेष इनका देश है और घृणा इन की जाति है/ ढोंग इनका धर्म, बोलो क्या करें/  जीतकर मासूम हिरणों को अरे ये भेड़िए/ ओढ़ते मृगचर्म, बोलो क्या करें/ जुल्म का भांडा लबालब भर चुका/ और लोहा गर्म, बोलो क्या करें?’ जिसे पढ़ने के बाद पाठक के मुंह से यही निकलता है कि शायद यही समय सही है उस गर्म लोहे पर चोट देने का।

कुछ और महत्वपूर्ण कविताएँ को रेखांकित करूँ तो उनमे संग्रह की ‘मौत’ शीर्षक एक छोटी सी कविता दृष्टव्य है- ‘मौत जिंदगी की मंजिल है/ मौत से तो फिर डरना क्यों/ मौत आए तब बैठ कर मरना/ कतरा-कतरा मरना क्यों’। कवि कविता की तथाकथित मुख्यधारा का निर्धारण करने वाले अशोक बाजपेई स्कूल के कलावादियों पर पर भी तंज करता है। कवि के इस संग्रह में जो कविता मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई वह है ‘हो सारा संसार बराबर’ कुछ पंक्तियां देख ले- ‘आर बराबर, पार बराबर/ हो सारा संसार बराबर/ मालिक और मंजूर बराबर/ बामन और चमार बराबर/ एक-एक को दस-दस बंगले/ यह अन्य अपार बराबर/ रोटी, कपड़ा, घर, इलाज पर/  सबका हो अधिकार बराबर’। इसी टक्कर की ‘बयान’ शीर्षक कविता भी है जिसकी अंतिम कुछ पंक्तियां देखते चलें, ‘कैसी विडंबनापूर्ण स्थिति है कि/ सबसे बुरे लोग सबसे ज्यादा संगठित हैं/  कम बुरे कम संगठित/ और अच्छे लोग सबसे कम संगठित’। ‘लष्टम-पस्टम’ शीर्षक कविता और उधृत करने का लोभ संवरण नही हो रहा, इसे भी देखें- ‘सब कुछ लष्टम-पस्टम है/ बिगड़ा पूरा सिस्टम है/ कमजोरों को गोली मारो/ यही यहां का कस्टम है/ सत्य, न्याय, ईमान, अहिंसा/ मूल्य मान सब नष्टम है/ जनसेवा व्यवसाय सियासत/ मुजरिम सब में रुस्तम है/ चोर-लुटेरे प्रथम पंक्ति में/ भले आदमी अष्टम है’। पीढ़ियों के टकराव को सामने रखती कविता ‘अगर आपको’, सत्ता पक्ष के लिए प्रश्न पूछती ‘संसद में कैसे घुस आए’ शीर्षक कविता और ‘लेट जा, भई लेट जा’ शीर्षक जैसी कुछ अन्य रोचक कविताएं भी इस संकलन की उपलब्धि है।

कुल मिलाकर यहां एक महत्वपूर्ण कविता संग्रह है जिसकी कविताएँ आपको भाव और विचार दोनों स्तरों पर उद्वेलित करती हैं। कवि ने अपने समय-समाज के कड़वे सच को कहने से कहीं भी गुरेज नही किया है। वह अपने देश और देश के लोगों से बहुत प्रेम करता है। उसे किसी सर्टिफिकेट की जरुरत नही है, उसकी कविताएँ ही उसका अंतिम बयान हैं; उसका अपना पक्ष हैं। यह कविताएं परिवेश में व्याप्त हर तरह के आडंबर का विरोध करती हैं तथा हमें दिनों दिन कम होते जा रहे हैं इंसानियत का पाठ पढ़ाती हैं।

बिगड़ती हुई आबोहवा/ कविता संग्रह/ डॉ रणजीत/ नोशन प्रेस, चेन्नई/ 2021/ पृष्ठ 99/ मूल्य 150/-

 

बालकृष्ण भट्ट से लेकर आज तक के व्यंग्य रचनाकारों का लगभग 1000 पृष्ठों का संकलन , ‘उत्कृष्ट व्यंग्य रचनाएं’ दो खंडों में: प्रेम जनमेजय

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बालकृष्ण भट्ट से लेकर आज तक के व्यंग्य रचनाकारों का लगभग1000 पृष्ठों
का संकलन
, ‘उत्कृष्ट व्यंग्य रचनाएंदो
खंडों में
, यश प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है। इसकी
डिजिटल प्रति को लोकार्पण विश्व पुस्तक मेले में किया गया। एक वरिष्ठ रचनाकार की
प्रतिक्रिया थी – जो इसमें है वह व्यंग्य लेखन में है और जो इसमें नहीं
, वह व्यंग्य लेखन में नहीं।मित्रों मैं यह दंभ नहीं
पाल रहा हूं। हां प्रयत्नपूर्वक तटस्थ संपादकीय दृष्टि के साथ सार्थक व्यंग्य के
रचनाकारों को सम्मिलित करने का प्रयत्न किया गया है। 

इक्कीसवीं सदी के
द्वार पर
,
पराग प्रकाशन के स्व0 श्रीकृष्ण ने मुझसे अनुरोध किया था कि मैं
उनकी महत्वाकांक्षी योजना
बीसवीं शताब्दी का साहित्य
श्रृंखला के अंतर्गत श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाओं का संकलन तैयार करूं।
संकलन को तैयार करने में मुझे दो वर्ष से अधिक का समय लगा। श्रीकृष्ण अपनी
ईमानदारी के कारण प्रकाशन को अधिक समय तक नहीं चला पाए और उन्होंने
पराग प्र्रकाशनबंद कर दिया।बीसवीं
शताब्दीः व्यंग्य रचनाएं
अनुपलब्ध हो गई। अनेक प्रशंसक पाठक
इसे ढूंढते रहे
, पर …।

यश प्रकाशन
के शर्मा जी के हाथ यह संकलन लगा तो वे इसी प्रस्तुति एवं सामग्री
के प्रशंसक हो गए। उनका कहना था कि पहली बार किसी ने हिंदी व्यंग्य के रचनात्मक
इतिहास को
, पीढ़ियों में विभाजित कर वैज्ञानिक रूप से
प्रस्तुत किया है। उन्होंने अक्टूबर 2013 में मुझसे आग्रह किया कि मैं इसे
उत्कृष्ट व्यंग्य रचनाओं के संकलन के रूप में संशोधित करूं तथा इक्कीसवीं सदी में
लिखी गई व्यंग्य रचनाओं को सम्मिलित करूं। पिछले डेढ़ दशक में न केवल व्यंग्य की
स्वीकर्यता बढ़ी है अपितु उसके रचनकारों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। व्यंग्य की
एक नई पीढ़ी ने जन्म लिया है। इक्कीसवीं के द्वार पर खड़े अनेक युवा व्यंग्यकार आज
प्रौढ़ हो चुके हैं।शर्मा जी इस संशोधित एवं परिवर्द्धित संकलन को फरवरी 2014 के
विश्व पुस्तक मेले में लाना चाह रहे थे। मुझे लगा कि संशोधन और परिवर्द्धन का
कार्य सरल होगा और मैं इसे बाएं हाथ से पूर्ण कर दूंगा। पर कार्य इतना सरल नहीं था।
पिछले डेढ़ दशक में प्रकाशित व्यंग्य रचनाओं से न केवल साक्षात्कार करना था वरना
उसकी जमीन को भी समझना था। जनवरी 2014 में मैंने शर्मा जी से क्षमा मांगते हुए कहा
कि
उत्कृष्ट व्यंग्य रचनाओं के संकलन के लिए मुझे समय भी
उत्कृष्ट चाहिए। शर्मा जी भी साहित्य की उत्कृष्ट प्रस्तुति में विश्वास करते हैं
,
अतः उन्होंने मुझे समय दिया और समय देने का परिणाम यह हुआ कि
संशोद्धित संस्करण अपने परिवर्द्धन के चलते इतना विशालकाय हुआ कि इसकी काया को
एकाकार करना कठिन हो गया। अतः इसे दो खंड में प्रस्तुत करने का विचार किया गया।
पहले खंड में हिंदी व्यंग्य की तीसरी पीढ़ी तक के व्यंग्यकारों की रचनाओं को संकलित
किया गया है। तथा दूसरे खंड में
, चैथीं पांचवी पीढ़ी के साथ
विभिन्न विधाओं में सृजनरत
, हिंदी व्यंग्य धारा के सहयोगी
रचनाकारों की व्यंग्य रचनाओं को सम्मिलित किया गया है।

– प्रेम जनमेजय 

बाल-साहित्य सृजन: नई चुनॊतियां- -दिविक रमेश

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बाल-साहित्य सृजन: नई चुनॊतियां 

-दिविक रमेश
        
सृजन किसी भी समय का क्यों न रहा हो अपने उपजने में वह चुनॊतीपूर्ण ही रहा होगा। हर उचित ऒर अच्छी रचना सजग ऒर जिम्मेदार रचनाकार के समक्ष चुनॊती ही लेकर आती हॆ। लेकिन जब हम सृजन के साथ ’नई चुनॊतियां’ जोड़ते हॆं तो उसका आशय निरन्तर बदलते सामाजिक-प्राकृतिक परिवेश में नई समझ ऒर नए भावबोध की गहरी समझ से लॆस रचनाकार की परम्परा की अगली कड़ी के रूप में अपेक्षित सृजन को संभव करने वाली तॆयारियों से होता हॆ। यूं मेरी समझ में तो हर जिम्मेदार बाल साहित्यकार के सामने उसकी हर अगली रचना नई चुनॊती ही लेकर आती हॆ क्योंकि यहां न कोई ढर्रा काम आता हॆ ऒर न ही कोई सीख। सही मायनों में तो अन्तत: अपना बोना ऒर अपना काटना ही प्राय: काम आता हॆ।चाल या चलन को चुनॊती देते हुए। अपने प्रगति-प्रयोगों के प्रति उपेक्षा के आघात सहते हुए भी। अन्यथा बालक को दो क्षण भी नहीं लगते किसी भी रचना से मुंह फेरते। क्षमा कीजिए मॆं शुरु में ही नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिकी लेखक विलियम फॉकनर ऒर गुलजार के कथनों का जिक्र करना चाहूंगा। विलयम फॉकनर के अनुसार, ’आज सबसे बड़ी त्रासदी यह हॆ कि अब लोगों की समस्याओं का आत्मा या भावना से कोई लेना-देना नहीं रह गया हॆ।अब सबके मन में सिर्फ एक ही सवाल हॆ -मॆं कब मशहूर बनूंगा/बनूंगी।जो भी युवा लेखक ऒर लेखिकाएं हॆं वे अपनी इस चाहत के कारण खुद से द्वद्व कर रहे हॆं। इसी द्वंद्व के कारण वे जमीनी हकीकत ऒर इंसानी भावनाओं को भूल गए हॆं। उन्हें एक बार फिर से जॊवन के शाश्वत सत्य ऒर भावनाओं के बारे में सीखना होगा, क्योंकि इसके बिना कोई भी रचना बेहतर नहीं हो सकती। कविया लेखक की जिम्मेदारी बनती हॆ कि वह ऎसा लिखे जिसे पढ़ने वाले व्यक्ति के मन में साहस, सम्मान, उम्मीद ऒर जज्बा पॆदा हो, जो उसे प्रेरित कर सके अपने जीवन की मुश्किलों के आगे डटे रहने ऒर जीतने के लिए।’ भले ही यह विलियम फॉकनर द्वारा 10 दिसम्बर 1950 को स्टॉकहोम में नोबल पुरस्कार ग्रहण करते समय दिए गए भाषण का अंश हॆ लेकिन मॆं इसे आज भी प्रसंगिक मानता हूं। मॆं इसे बाल साहित्य लेखन पर घटा कर भी देखना चाहूंगा भले ही बालक के रूप में व्यक्ति की बात करते हुए इसमें कुछ ऒर बातें भी जोड़ने की आवश्यक्ता पड़ेगी। मसलन उत्कृष्ट बाल साहित्य लेखन के संदर्भ में हमेशा बाल सुलभ जिज्ञासाओं ऒर उनकी अभिरुचि के अनुसार रचना को मज़ेदार बनाने ऒर बाल सुलभ प्रश्नों को रचनात्मक ढंग से उभारने की भी बहुत बड़ी चुनॊती ऒर जिम्मेदारी निभाए बिना काम नहीं चलता। यदि कोई कविता प्रश्न जगाने में सफल हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि वह सार्थक हॆ, भले ही वह प्रश्न का उत्तर न भी दे पायी हो। अमेरिकी लेखिका ऒर बच्चों के लेखन के लिए अत्यंत प्रसिद्ध मेडेलीन एल एंगल (Madelien L’ Engle, 1918-2007) के शब्दों में, “I believe that good questions are more important than answers, and the best children’s books ask questions, and make the readers ask questions. And every new question is going to distrurb someone’s universe.” सहित्य में प्रश्न उठाना बहुत आसान नहीं होता क्योंकि प्रश्न उठाया ही जब जाता हॆ जब उसके उत्तर की ओर जाने की दिशा का ज्ञान हो। गनीमत हॆ कि हिन्दी ऒर अन्य भारतीय भाषाओं के बाल साहित्यकारों में आज अनेक ऎसे भी हॆं जो ऊपर बतायी गयी लेखकीय जिम्मेदारी की चुनॊती को भलीभांति निभा रहे हॆं। ऒर उन्हीं के लेखन से भारतीय बाल साहित्य लेखन की वॆश्विक ऒर उत्कृष्ट छवि निरंतर बन भी रही हॆ। दूसरा कथन बाल साहित्यकार के रूप में गुलजार का हॆ जिसके द्वारा लेखन की एक अन्य चुनॊती की ओर इशारा किया गया हॆ। । उनके अनुसार,”बच्चों की भाषा सीखना एक चुनौतीपूर्ण काम है। जैसे पीढ़ियां बदलती हैं, वैसे ही भाषा भी परिवर्तित होती हैं।’ इस कथन से सहमत होना ही पड़ेगा ऒर हमारे बहुत से लेखक इस चुनॊती को भी बखूबी स्वीकार किए हुए लिख रहे हॆं।वस्तुत: आज एस.एम.एस , टेलीविजन, नई टेक्नोलोजी, फिल्मों, इंटरनेट युक्त कम्प्यूटर आदि की भाषा, ऒर अब तो समाचार पत्रों की भाषा अपना एक अलग स्वरूप लेकर बालकों की दुनिया में भी प्रवेश करता चला गया हॆ। आज के बाल साहित्यकार को इस ओर ध्यान देना पड़ता हॆ। हिन्दी के स्वरूप में जहां एक ओर महानगरीय भाषा-स्वरूप में अंगेजी का घोल मिलता हॆ वहां लोक की भाषाओं का अच्छा सुखद छोंक भी मिलता हॆ। स्पष्ट हॆ कि इस स्वरूप को सहज रूप में अपनाना भी एक नई चुनॊती हॆ।यहीं यह भी कहना चाहूंगा कि यह ठीक हॆ कि बाल साहित्य म्रें ऎसी भाषा का सहज उपयोग होना चाहिए जो आयु वर्ग के अनुसार बच्चे की शब्द -सम्पदा के अनुकूल हो । लेकिन एक समर्थ रचनाकार उसकी शब्द-सम्पदा में सहज ही वृद्धि करने की चुनॊती भी स्वीकार करता हॆ।
बाल-साहित्य सृजन की चुनॊतियों पर थोड़ा विराम लगाते हुए पहले मॆं अपने मन की एक ऒर दुखद चिन्ता सांझा करना चाहूंगा जो भारतीय समाज में बालक के महत्त्व को लेकर हॆ। क्या हमारे समाज के तमाम बालक उन न्यूनतम सुविधाओं ऒर अधिकारों से भी सम्पन्न हॆं जिनका हमें किताबी या भाषणबाजियों वाला ज्ञान अवश्य हॆ? कहना चाहता हूं कि बालक (नर-मादा, दोनों) हमारी सांस की तरह हॆ। जिस तरह ऊपरी तॊर पर सांस हम मनुष्यों की एक बहुत ही सहज ऒर सामान्य प्रक्रिया हॆ लेकिन हॆ वह अनिवार्य। उसी तरह बालक भी भले ही ऊपरी तॊर पर सहज ऒर सामान्य उपलब्धि हो लेकिन हॆ वह भॊ अनिवार्य। ऒर जब मॆं बालक की बात कर रहा हूं तो मेरे ध्यान में शहरी, कस्बाई, ग्रामीण, आदिवासी, गरीब, अमीर, लड़की, लड़का आदि सब बालक हॆं। न सांस के बिना मनुष्य का जीवित रहना संभव हॆ ऒर न बालक के बिना मनुष्यता का जीवित रहना। यह विडम्बना ही हॆ कि समाज में बालक के अधिकारों की बात तक कही जाती हॆ लेकिन वह अभी तक कागजी सच अधिक लगती हॆ, जमीनी सच कम। आज साहित्य में दलित, स्त्री ऒर आदिवासी विमर्श की तरह ’बालक(जिसमें बालिका भी हॆ) विमर्श’ की भी जरूरत हो चली हॆ। हमारा अधिकांश बाल लेखन महानगर/नगर केन्द्रित हॆ ऒर प्राय:वहीं के बच्चे को केन्द्र में रखकर अधिकतर चिन्तन-मनन किया जाता हॆ तथा निष्कर्ष निकाले जाते हॆं। लेकिन मॆं जोर देकर कहना चाहूंगा कि आज ज़रूरत बड़े-छोटे शहरो ऒर कस्बों के साथ-साथ गावों ऒर जगलों मे रह रहे बच्चों तक भी पहुंचने की हॆ । ऒर उन तक कॆसे किस रूप में पहुंचा जाए, यह भी कम बड़ी चुनॊती नहीं हॆ। मेरी बाल रचनाओं में जो गांव आ जाता हॆ उसका एक सहज कारण मेरा गांव से होना ऒर अभी तक थोड़ा-बहुत गांव से जुड़ा रहना हॆ। यह अलग बात हॆ कि वॆसी रचनाओं के प्रति मसलन नंदन में प्रकाशित मेरी बाल कविता ’चने का साग’ आदि के प्रति खास ध्यान नहीं जा सका हॆ। वस्तुत: आज हमारे बाल-लेखकों की पहुंच ग्रामीण ऒर आदिवासी बच्चों तक भी सहज-सुलभ होनी चाहिए । इसमें साहित्य अकादमी, अन्य अकदमियों ऒर नेशनल बुक ट्रेस्ट आदि की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती हॆ। शिविर लगाए जा सकते हॆं, कार्यशालाएं आयोजित की जा सकती हॆं ।भारतीय बच्चों का परिवेश केवल कम्प्यूटर, सड़कें, मॉल्ज, आधुनिक तकनीकि से सम्पन्न शहरी स्कूल, अंतर्राष्ट्रीय परिवेश ही नहीं हॆ( वह तो आज के साहित्यकार की निगाह में होना ही चाहिए), गांव-देहात तक फॆली पाठशालाएं भी हॆ, कच्चे-पक्के मकान-झोंपड़ियां भी हॆं, उन के माता-पिता भी हॆं, उनकी गाय-भॆंस-बकरियां भी हॆं ।प्रकृति का संसर्ग भी हॆ। वे भी आज के ही बच्चे हॆं । उनकी भी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए जो कि दिख रही हॆ। अत: बाल साहित्यकारों को इस या उस एक ही कोठरी में रहकर नहीं बल्कि समग्र रूप में सोचना होगा । और यह भी एक बड़ी चुनॉती है ऎसा सोचा भी जा रहा हॆ। गांव देहात से जुड़ने की इच्छा रखने वाले एक शहरी बच्चे की कल्पना करते हुए मॆंने कभीअपनी एक कविता में लिखा था-“चिड़िया कभी पंख में भरकर /थोड़ी हवा गांव की लाना/ पंजों में अटकाकर अपने/थोड़ी सी मिट्टी भी लाना …..पुस्तक में ही जिसे पढ़ा हॆ/उसकी थोड़ी झलक दिखाना …..।” यहां मुझे एक कवि अश्वघोष जी की बाल कविताओं की याद हो आयी हॆ ।दृष्टि संपन्न कवि हॆं । उनकी कविताएं विशेष ध्यान चाहती हॆं । क्षमा चाहते हुए यह भी लिखना चाहता हूं कि रूसी बाल कविताओं में कुत्ता-बिल्ली-उल्लू आदि के प्रति आधुनिक अथवा नई दृष्टि संपन्न रचनाएं पढ़्ते पढ़ते खुद मेरे ग्रामीण् मन ने कभी गधे पर एक कविता लिखवा ली थी जिसमें गधा अपने प्रति पारम्परिक व्यवहार का प्रतिकार करते हुए खुद को ’वेटलिफ्टर’ के रूप देखने की समझ देता हॆ-“बहुत नाम हॆ मेरा जग में/इसीलिए सब चिढ़ते बच्चो/अच्छे-भले’वेटलिफ्टर’ को/जलकर कहते ’लद्दु’’ बच्चो” । मॆ समझाता हूं इस प्रकार की सम्यक समझ ऒर लेखन भी एक प्रकार से नई चुनॊती का निर्वाह ही कहा जाएगा। 
ऎसा नहीं हॆ कि बच्चे को लेकर आज चिन्ता ऒर चिन्तन उपलब्ध न हो। बच्चे के स्वतंत्र व्यक्तित्व, उसके बहुमुखी विकास को लेकर गहरा विचार, विशेष रूप से, पिछली सदी से होता आ रहा हॆ। जॆसे-जॆसे सदियों से परतंत्र रह रहे देश आजाद होते गए ऒर नवजागरण के प्रकाश से जगमगाते गए वॆसे-वॆसे बच्चे की ओर भी अपेक्षित ध्यान देने का माहॊल बनाए जाने की कोशिशों का जन्म हुआ। मनुष्य ही नहीं बल्कि राष्ट्र के निर्माण के लिए बच्चे के चतुर्दिक विकास को आवश्यक मानने की समझ उपजी। इस समझ को उपजाने में बाल साहित्यकारों की भूंमिका भी अहं रही हॆ ऒर इसके विकास में भी बाल-साहित्यकार पूरी तरह समर्पित नज़र आ रहे हॆं। लेकिन आज का लेखक इस परम्परा को तभी आगे ले जाने में सक्षम होगा जब वह विलियम फॉकनर द्वारा ऊपर बताए गए मोह से अपने को बचाए रखेगा। वस्तुत:, संक्षेप में कहना चाहूंगा कि बड़ों के लेखन की अपेक्षा बच्चों के लिए लिखना अधिक प्रतिबद्धता, जिम्मेदारी, निश्छलता, मासूमियत जॆसी खुबियों की मांग करता हॆ। इसे लेखक, प्रकाशक अथवा किसी संस्था को बाजारवाद की तरह प्रथमिक रूप से मुनाफे का काम समझ कर नहीं करना चाहिए। बाल साहित्यकार के सामने बाजारवाद के दबाव वाले आज के विपरीत माहॊल में न केवल बच्चे के बचपन को बचाए रखने की चुनॊती हॆ बल्कि अपने भीतर के शिशु को भी बचाए रखने की बड़ी चुनॊती हॆ। कोई भी अपने भीतर के शिशु को तभी बचा सकता हॆ जब वह निरंतर बच्चों के बीच रहकर नए से नए अनुभव को खुले मन से आत्मसात करे। लेकिन यह बच्चों के बीच रहना ’बड़ा’ बनकर नहीं बल्कि जॆसा कोरिया के बच्चों के सबसे बड़े हितॆषी, उनके पितामह माने जाने वाले सोपा बांग जुंग ह्वान (1899-1931) ने बच्चे के कर्तव्यों के साथ उसके अधिकारों की बात करते हुए ’कन्फ्य़ूसियन’ सोच से प्रभावित अपने समाज में निडरता के साथ एक आन्दोलन -“बच्चों का आदर करो” शुरु करते हुए कहा था, ’टोमगू’ या साथी बनकर। अपने को अपने से छोटों पर लादने, बात-बात पर उपदेश झाड़ने, अपने को श्रेष्ठ समझने ऒर मनवाने तथा अपने अंहकार के आदि बड़ों के लिए यह काम इतना आसान नहीं होता। लेकिन जो आसान कर लेते हॆं वे इसका आनन्द भी जानते हॆं ऒर उपयोगिता भी।यदि हम चाहते हॆं कि बाल-साहित्य बेहतर बच्चा बनाने में मदद करे ऒर साथ ही वह बच्चों के द्वारा अपनाया भी जाए तो उसके लिए हमें अर्थात बाल-साहित्यकारों को बाल-मन से भी परिचित होना पड़ेगा। उनके बीच रहना होगा। उनकी हिस्सेदारी को मान देना होगा। अमेरीकी कवि ऒर बाल-साहित्यकार चार्ल्स घिग्न(Charles Ghigna, 1946) के अनुसार, “जब आप बच्चों के लिए लिखो तो बच्चों के लिए मत लिखो। अपने भीतर के बच्चे के द्वारा लिखो।” आज के बाल-साहित्य लेखन के सामने यह भी एक चुनॊती हॆ।हमें, हिन्दी के अत्यंत महत्त्वपूर्ण बाल साहित्यकार ऒर चिन्तक निरंकार देव सेवक से शब्द लेकर कहूं तो ’बच्चों की जिज्ञासाओं, भावनाओं ऒर कल्पनाओं को अपना बनाकर उनकी दृष्टि से ही दुनिया को देखकर जो साहित्य बच्चों को भी सरल भाषा में लिखा जाए, वही बच्चों का अपना साहित्य होता हॆ।’ 
पर एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह भी हॆ कि क्या व्यापक संदर्भ में बच्चे को एक ऎसा पात्र मान लिया जाए जिसमें बड़ों को अपनी समझ बस ठूंसनी होती हॆ। मॆं समझता हूं कि आज जरूरत बच्चे को ही शिक्षित करने की नहीं हॆ, बड़ों को भी शिक्षित करने की हॆ। इसलिए बाल साहित्यकार के समक्ष यह भी एक बड़ी ऒर दोहरी चुनॊती हॆ। वस्तुत: सजग लोगों के सामने मूल चिन्ता यह भी रही हॆ कि कॆसे सदियों की रूढ़ियों में जकड़े मां-बाप ऒर बुजुर्गों की मानसिकता से आज के बच्चे को मुक्त करके समयानुकूल बनाया जाए। साथ ही यह भी कि आज के बच्चे की जो मानसिकता बन रही हॆ उसके सार्थक अंश को कॆसे प्रेरित किया जाए ऒर कॆसे दकियानूसी सोच के दमन से उसे बचाया जाए।गोर्की ने अपने एक लेख ’ऑन थीसस’ (1933) में लिखा था कि हमारे देश में शिक्षा का उद्देश्य बच्चे के मस्तिष्क को उसके पिता ऒर बुजुर्गों की अतीत की सोच से मुक्त कराना हॆ। ध्यान रहे कि अतीत की सोच से मुक्त कराना ऒर अतीत की जानकारी देना दो अलग-अलग बातें हॆं। आवश्यकतानुसार, अपने इतिहास ऒर परंपरा को बच्चे की जानकारी में लाना जरूरी हॆ। आस्ट्रिया की लूसियाबिन्डर ने उचित ही कहा हॆ कि कोई भी राष्ट्र मजबूत नहीं हो सकता, यदि उसके बच्चे अपने देश के इतिहास ऒर रिवाजों की जानकारी नहीं रखते। अपने अनुभवों को नहीं लिख सकते ऒर विज्ञान तथा गणित के बुनियादी सिद्धांतों की समझ नहीं रखते। अर्थात बच्चे में एक वॆज्ञानिक दृष्टि को विकसित करते हुए अपने इतिहास, रिवाजों आदि की आवश्यक जानकारी देनी होती हॆ। आज बड़ों में ’हिप्पोक्रेसी’ भी देखने को मिलती हॆ।ऒर यदि उसके प्रति सजग नहीं किया जाए तो वह सहज ही बच्चों तक भी पहुंचती हॆ। ऒर इस काम की चुनॊती का सामना बाल साहित्यकार अपने लेखन में बखूबी कर सकता हॆ। हमारे यहां ऒर किसी भी समाज में कहने को तो कहा जाता हॆ कि काम कोई भी हो, अच्छा होता हॆ, महत्त्वपूर्ण होता हॆ लेकिन इस सोच या मूल्य को कार्यान्वित करते समय अच्छे- अच्छों की नानी मर जाती हॆ। हर कोई अपने बच्चे को कुछ खास कार्यों ऒर पदों पर देखना चाहता हॆ ऒर अपने बच्चे को वॆसी ही सलाह भी देता हॆ, अन्य कामों को जाने-अनजाने कमतर या महत्त्वहीन मान लेता हॆ। ऒर जब बच्चे को बड़ा होकर किसी भी कारण से तथाकथित कमतर या महत्त्वपूर्ण कार्य ही करना पड़ जाता हॆ तो वह हीन भावना से ग्रसित रहता हॆ। कुंठित हो जाता हॆ। रूसी कवि मयाकोवस्की की एक कविता हॆ ’क्या बनूं’। अपने समय में इस कविता के माध्यम से कवि ने हर काम की प्रतिष्ठा को समानता के आधार पर रेखांकित करते हुए बच्चों पर प्राय: लादे जाने वाले कुछ लक्ष्यों की प्रवृत्तिपरक एक नई चुनॊती का बखूबी सामना किया था। एक अंश देखिए:
बेशक अच्छा बनना डाक्टर,
पर मजदूर ऒर भी बेहतर,
श्रमिक खुशी से मॆं बन जाऊं,
सीख अगर यह धन्धा पाऊं।
…………..
काम कारखाने का अच्छा
पर ट्राम तो उस से बेहतर,
काम अगर सिखला दे कोई
बनूं खुशी से मॆं कंडक्टर।
कंडक्टर तो मॊज उड़ाए
बिना टिकट के वे तो दिन भर
जहां-तहां पर आएं, जाएं।
काम सभी अच्छे, वह चुन लो,
जो हॆ तुम्हें पसन्द। (अनु०:डॉ. मदन लाल ’मधु’)
ऎसी रचनाओं से निश्चय ही बालकों को जहां राहत मिलती हॆ वहीं अभिभावकों को एक नई लेकिन सही-सच्ची समझ भी। 
आजकल (हालांकि थोड़े पहले से) बाल साहित्य लेखन के संदर्भ में एक चर्चा बराबर पढ़ने-सुनने में मिल जाती हॆ जिसे चाहें तो हम परम्परा बनाम आधुनिकता की बहस कह सकते हॆं जिसने एक ऒर तरह की चुनॊती को जन्म दिया हॆ।। एक सोच के अनुसार राजा-रानी, परियां, राक्षस, चूहे, बिल्ली, हाथी, शेर, ऒर यहां तकि की फूल-फल, पेड़-पॊधे आदि आज के लेखन के लिए सर्वथा त्याज्य हॆं क्योंकि इनकी कल्पना बालक के लिए विष बन जाती हॆ। उन्हें अंधविश्वासी ऒर दकियानूसी बनाती हॆ। विरोध पारंपरिक, पॊराणिक थथा काल्पनिक कथाओं का भी हुआ। ऒर यह तब हुआ जब कि सामने प्रसिद्ध डेनिश लेखक हेंस क्रिश्चियन एंडरसन के ऎसा लेखन मॊजूद था जिसमें प्राचीन, पारंपरिक लोककथाओं को अपने समय के समाज की प्रासंगिकता दी गई थी जॆसा कि बड़ों के साहित्य में इतिहास या मिथ आधारित कृतियों में मिलता हॆ। मॆं भी मानता हूं कि राजा-रानी, परियों भूत-प्रेतों को लेकर लिखे जाने वाले ऎसे साहित्य को बाहर निकाल फेंकना चाहिए जो अंधविश्वास, दकियानूसी, कायरता, निराशा आदि अवगुणों का जनक हो। यह सत्य हॆ ऒर इसे मॆं गलत भी नहीं मानता कि आज भारत में बच्चों का एक सॊभाग्यशाली हिस्सा उस अर्थ में मासूम नहीं रहा हॆ जिस अर्थ में उसे समझा जाता रहा हॆ। हालांकि यह कहना कि वह किसी भी अर्थ में मासूम नहीं रहा यह भी ज्यादती होगी। बेशक आज उसके सामने संसार भर की सूचनाओं का अच्छा खासा भण्डार हॆ ऒर उसका मानसिक विकास पहले के बालक से कहीं ज्यादा हॆ। वह बड़ों के बीच उन बातों तक में हिस्सा लेने का अत्मविश्वास रखता हॆ जो कभी प्रतिबंधित मानी जाती रही हॆं।आज का बच्चा प्रश्न भी करता हॆ ऒर उसका विश्वसनीय समाधान भी चाहता हॆ। आज के सजग बच्चे की मानसिकता पुरानी मानसिकता नहीं हॆ जो प्रश्न के उत्तर में ’डांट’ या ’टाल मटोल’ स्वीकार कर ले। वह जानता हॆ कि बच्चा मां के पेट से आता हॆ चिड़िया के घोंसले से नहीं। दूसरे, हमें बच्चे को पलायनवादी नहीं बल्कि स्थितियों से दो-दो हाथ करने की क्षमता से भरपूर होने की समझ देनी होगी। अहंकारी उपदेश या अंध आज्ञापालन का जमाना अब लद चुका हॆ। बात का ग्राह्य होना आवश्यक हॆ। ऒर बात को ग्राह्य बनाना यह साहित्यकार की तॆयारी ऒर क्षमता पर निर्भर करता हॆ। तो भी विज्ञान, नई टेक्नोलोजी, वॆश्विक बोध ऒर आधुनिकता आदि के नाम पर शेष का अंधाधुंध, असंतुलित ऒर नासमझ विरोध भी कोई उचित सोच नहीं हॆ।लंदन में जन्में लेखक जी.के. चेटरसन (G.K. Chesterton -1874-1936) ने जो कहा वह आज भी सोचने को मजबूर कर सकता हॆ -“परी कथाएं (Fairy Tales) सच से ज्यादा होती हॆं: इसलिए नहीं कि वे बताती हॆं ड्रेगन होते हॆं बल्कि इसलिए कि वे हमें बताती हॆं कि उन्हें हराया जा सकता हॆ।”ओड़िया भाषा के सुविख्यात साहित्यकार मनोज दास का मानना हॆ कि बाल ऒर बड़ों का यथार्थ एक नहीं होता।उनके शब्दों में, “His realism is different rom the adult’s. He does not look at the giant and the fairy from the angle of genetic possibility. They are a spontaneous exercise for his imaginativeness–a quality that alone can enable him to look at life as bigger and greater than what it is at the grass plane.” डॉ. हरिकृष्ण देवसरे की एक पुस्तक हॆ ’ऋषि-क्रोध की कथाएं’ जिसमें सुर भी हॆं, असुर भी हॆं ऒर राजा भी हॆ ऒर पुराण भी हॆ। ऎसे ही उन्हीं की एक ऒर पुस्तक हॆ-’इनकी दुश्मनी क्यों” जिसमें कुत्ता भी हॆ, बिल्ली भी हॆ, चूहा भी हॆ, सांप भी हॆ, हाथी भी हॆ ऒर चींटी भी हॆ। ऒर ये मनुष्य की भाषा भी बोलते हॆं। इसी प्रकार अत्यंत प्रतिष्ठित बाल-साहित्यकार ऒर चिन्तक जयप्रकाश भारती की ये पंक्तियां भी देखिए जो आज के बच्चे के लिए हॆं: एक था राजा, एक थी रानी
दोनों करते थे मनमानी
राजा का तो पेट बड़ा था
रानी का भी पेट घड़ा था।
खूब वे खाते छक-छक-छक कर
फिर सो जाते थक-थक-थककर।
काम यही था बक-बक, बक-बक 
नौकर से बस झक-झक, झक-झक
तो क्या बिना यह सोचे कि राजा-रानी आदि का किस रूप में इनका अगमन हुआ हॆ, वह कितना सृजनात्मक हॆ, इनका बहिष्कार कर दिया जाए क्योंकि इनमें न कोई वॆज्ञानिक आविष्कार हॆ ऒर न ही कोई आधुनिक बालक-बालिकाएं या व्यक्ति। दूसरी ओर देवसरे जी की एक ऒर पुस्तक हॆ ’दूरबीन’ जो दूरबीन के जन्म का इतिहास समने लाती हॆ ऒर वह भी कहानी के शिल्प में। लेकिन मुझे इसे रचनात्मक बाल-साहित्य की श्रेणी में लेने में स्पष्ट संकोच हॆ। वस्तुत: यह बालोपयोगी साहित्य की श्रेणी में आती हॆ जिसके अंतर्गत सूचनात्मक या जानाकारीपूर्ण विषय आधारित सामग्री होती हॆ भले ही शिल्प या रूप कविता ,कहानी आदि का ही क्यों न हो। कविता की शॆली में तो विज्ञापन भी होते हॆं पर वे कविता नहीं होते। यह पाठ्य पुस्तक जरूर बन सकती हॆ। यह ’लिखी गई पुस्तक हॆ जो विवरणॊं ऒर तथ्यों से लदी होने के कारण सृजनात्मक बाल साहित्य जॆसी रोचकता, मजेदारी ऒर पठनीयता से वंचित हॆ। गनीमत हॆ कि अंत में स्वयं लेखक ने पात्रों के माध्यम से स्वीकार किया हॆ-“बबलू ऒर क्षिप्रा, दूरबीन के बारे में इतनी मज़ेदार ऒर विस्तृत जानकारी प्राप्त कर बहुत प्रसन्न थे।” लेकिन ऎसे साहित्य के लिखे जाने की भी अपनी बड़ी आवश्यकता हॆ।बालक को ज्ञानवर्धक पुस्तकें भी चाहिए। मेरा मानना हॆ कि बड़ों के रचनात्मक लेखन की रचना-प्रक्रिया ऒर बच्चों के रचनात्मक लेखन की प्रक्रिया समान होती हॆ। रचनाकार किसी भी विषय को ट्रीटमेंट के स्तर पर मॊलिकता ऒर नई मानसिकता प्रदान किया करता हॆ। महाभारत के वाचन ऒर उसकी कथाओं पर आधारित बाद के साहित्य में मॊलिक अंतर होता हॆ। राजा-रानी, हाथी, चिड़िया, चांद, तारे आदि पर नई दृष्टि से लिखा जा सकता हॆ ऒर लिखा जा भी चुका हॆ। मांग यह होनी चाहिए कि राजा-रानी की व्यवस्था की पोषक अथवा परियों की ढ़र्रेदार कल्पना को कायम रखने वाली प्रवृत्ति का बाल-साहित्य से त्याग किया जाए। आज के बाल साहित्य में तथाकथित रंग-रंगीली परियों के स्थान पर ज्ञान ऒर संगीत परी जॆसी परियों की भी कल्पना मिलती है जो बच्चॊं को एक नयी सोच प्रदान करती हॆं। हाल ही में एक समाचार प्रकाशित हुआ था कि हेरी पोटर की एक विचित्र कल्पना को वॆज्ञानिकों ने यथार्थ कर दिखाया। यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि हेरी पोटर ने बिक्री के कितने ही रिकार्ड तोड़े हैं बावजूद तमाम आधुनिताओं के। सच तो यह भी है कि आज परियों, राजा रानी आदि को लेकर और विशेष रूप से उनके पारंपरिक रूप को लेकर लिखना बहुत कम हो गया है और जो है उसे मान्यता भी नहीं मिलती। आज तो नई ललक के साथ वस्तु ऒर अभिव्यक्ति की दृष्टि से बाल साहित्य में नए-नए प्रयोग हो रहे हॆं। वस्तुत: समस्या उन लोगों की सोच की हॆ जो जाने-अनजाने बाल साहित्य को ’विषयवादी’ विषय केंद्रित मानते हॆं। अर्थात जिनका मानना हॆ कि बाल-साहित्य में रचनाकार विषयों पर लिखते हॆं- मसलन पेड़ पर, चिड़िया पर, राजा-रानी पर, दूरबीन,टी.वी पर, इत्यादि। यदि रचना विषय निर्धारित करके लिखी जाती हॆ तब तो उनके मत से सहमत हुआ जा सकता हॆ। लेकिन सृजनात्मक साहित्य, चाहे वह बड़ों के लिए हो या बालकों के लिए, विषय पर नहीं लिखा जाता। वस्तुत: वह विषय के अनुभव पर लिखा जाता हॆ । अर्थात रचना रचनाकार का कलात्मक अनुभव होती हॆ। बात को ऒर स्पष्ट करने के लिए कहूं कि पेड़ या साइकिल को विषय मानकर निबन्ध, लेख आदि लिखा जा सकता हॆ, कविता, कहानी आदि रचनात्मक साहित्य नहीं। पेड़ पर लिखी कविता पेड़ पर विषयगत जानकारी से एकदम अलग हो सकती हॆ, बल्कि होती हॆ। वह पेड़ का कलात्मक अनुभव होता हॆ।आज बाल-साहित्य सृजन में वॆज्ञानिक दृष्टि की आवश्यकता हॆ ऒर यह लेखक के लिए एक चुनॊती भी हॆ। वॆज्ञानिक दृष्टि का अर्थ यह नहीं हॆ कि बच्चे को कल्पना की दुनिया से एकदम काट दिया जाए। कल्पना का अभाव बच्चे को भविष्य के बारे में सोचने की शक्ति से रहित कर सकता हॆ। वॆज्ञानिक दृष्टि ’काल्पनिक’ को भी विश्वसनीयता का आधार प्रदान करने का गुर सिखाती हॆ जो आज के बच्चे की मानसिकता के अनूकूल होने या उसकी तर्क-संतुष्टि की पहली शर्त हॆ। विज्ञान ऒर वॆज्ञानिक दृष्टि में अंतर होता हॆ। विज्ञान मनुष्य के मूल भावों, संवेदनाओं आदि का विकल्प नहीं हॆ जो बालक ऒर मनुष्यता के विकास के लिए जरूरी हॆं।।ओड़िया के प्रसिद्ध लेखक मनोज दास ने अपने एक लेख ‘Talking to Children: The Home And The World’ में लिखा हॆ-’no scientific or technological discovery can alter the basic human emotions, sensations and feelings. Social, economic and policial values amy change, but the evolutionary values ingrained in the consciousness cannot change–values that account for our growth.” आज वॆज्ञानिक दृष्टि को सजग रह कर अपनाने की चुनॊती अवश्य हॆ। मुझे तो युगोस्लाव कथाकार, उपन्यासकार श्रीमती ग्रोजदाना ओलूविच की अपने साक्षात्कार में कही यह बात भी विचारणीय लगती हॆ-“मेरा ख्याल हॆ कि लोगों को सपनों ऒर फन्तासियों की उतनी ही जरूरत हॆ, जितनी कि दाल-रोटी की, यही वजह हॆ कि लोग आज भी परीकथाएं पढ़ते हॆं।”(सान्ध्य टाइम्स, नयी दिल्ली, 16 फरवरी, 1982)| अब मॆं अपने संदर्भ में एक निजी चुनॊती को जरूर सांझा करना चाहता हूं। हम देख रहे हॆं कि इधर यॊन शोषण के हिंसा के स्तर तक पर होने वाली घटनाओं की भरमार हमें कितना विचलित कर रही हॆ ऒर इसमें हमारे बालक भी सम्मिलित हॆं-शिकार के रूप में भी ऒर कभी-कभी शिकारी के रूप में भी। मॆं लाख कोशिश करके भी इस दिशा में अब तक बाल-साहित्य सृजन नहीं कर पाया हूं, बावजूद आमिर खान के टी.वी. पर आए कार्यक्रम के। लेकिन इस नई चुनॊती से जूझ जरूर रहा हूं। 
थोड़ी बात इलॆक्ट्रोनिक माध्यम ऒर टेक्नोलोजी के हॊवे की भी कर ली जाए जिन्होंने विश्व के एक गांव बना दिया हॆ। यह बात अलग हॆ कि भारत में आज भी अनेक बच्चे इनसे वंचित हॆं। इनसे क्या वे तो प्राथमिक शिक्षा तक से वंचित हॆं। कितने ही तो अपने बचपन की कीमत पर श्रमिक तक हॆं। अपने परिवेश ऒर परिस्थितियों के कारण अनेक बुरी आदतों से ग्रसित हॆं। वे भी आज के बाल साहित्यकार के लिए चुनॊती होने चाहिए ? खॆर जिन बच्चों की दुनिया में नई टेक्नोलोजी की पहुंच हॆ उनकी सोच अवश्य बदली हॆ। अच्छे रूप में भी ऒर गलत रूप में भी। विषयांतर कर कहना चाहूं कि मॆं टेक्नोलोजी या किसी भी माध्यम का विरोधी नहीं हूं, बल्कि वे मानव के लिए जरूरी हॆं। उनका जितना भी गलत प्रभाव हॆ उसके लिए वे दोषी नहीं हॆं बल्कि अन्तत: मनुष्य ही हॆ जो अपनी बाजारवादी मानसिकता की तुष्टि के लिए उन्हें गलत के परोसने की भी वस्तु बनाता हॆ।फिर चाहे वह यहां का हो, पश्चिम का हो या फिर कहीं का भी हो। होने को तो पुस्तक के माध्यम से भी बहुत कुछ गलत परोसा जा सकता हॆ। तो क्या माध्यम के रूप में पुस्तक को गाली दी जाए। एक जमाने में चित्रकथाओं की विवादास्पद दुनिया में अमर चित्रकथा ने सुखद हस्तक्षेप किया था। कहना यह भी चाहूंगा कि पुस्तक ऒर इलॆक्ट्रोनिक माध्यमों में बुनियादी तॊर पर कोई बॆर का रिश्ता नहीं हॆ। न ही वे एक दूसरे के विकल्प बन सकते हॆं। दोनों का अस्तित्व एक दूसरे के कारण खतरे में भी नहीं हॆ। आज बहुत सा बाल साहित्य इन्टेरनेट के माधय्म से भी उपलब्ध हॆ।अत: जरूरत इस बात कि हॆ कि दोनों के बीच बहुत ही सार्थक रिश्ता बनाया जाए।किताबों की किताबें भी कम्प्यूटर पर पढ़ी जा सकती हॆं। इसके लिए कितने ही वेबसाइट हॆं। हां बाल साहित्य सृजन के क्षेत्र में बंगाली लेखक ऒर चिन्तक शेखर बसु की इस बात से मॆं भी सहमत हूं कि आज का बालक बदलते हुए संसार की चीज़ों में रुचि लेता हॆ लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हॆ वह अपनी कल्पना की सुन्दर दुनिया को छोड़ना चाहता हॆ। लेखक के शब्दों में,” Children today take active intrest in things of the changed world, but this does not mean leaving their own world of fantasy….They love to read new stories where technology plays a big part. But that is just a fleeting (क्षणिक) phase. They feel comfortable in their eternal all-found land.” . मॆं कहना चाहूंगा कि चुनॊती यह हॆ कि बाल साहित्यकार उसे मजा देने वाले काल्पनिक लोक को कॆसे पिरोए कि वह बे सिर-पॆर का न लगते हुए विश्वसनीय लगे। सजग बच्चे को मूर्ख तो नहीं बनाया जा सकता। ऒर अपनी अज्ञानता से उसे लादना भी नहीं चाहिए। सूझ-बूझ ऒर कल्पना को सार्थक बनाने की योग्यता आज के बाल साहित्यकार के लिए अनिवार्य हॆ। निश्चित रूप से यह विज्ञान का युग हॆ। लेकिन बच्चे की मानसिकता को समझते हुए उसे समाज ऒर विज्ञान से रचना के धरातल पर जोड़ने के लिए कल्पना की दुनिया को नहीं छोड़ा जा सकता। बालक को एक संवेदनशील नागरिक बनाना हॆ तो उस राह को खोजना होगा जो उसके लिए मज़ेदार ऒर ग्राह्य हो, उबाऊ नहीं।जिसे विज्ञान बाल साहित्य कहते हॆं उसे भी बालक तभी स्वीकार करेगा जब उसके पढ़ने में उसे आनन्द आएगा। 
मॆं उन कुछ चुनॊतियों की ओर भी, बहुत ही संक्षेप ऒर संकेत में ध्यान दिलाना चाहूंगा जो आज के कितने ही बाल साहित्यकार के लिए सृजनरत रहने में बाधा पहुचा सकती हॆं। मॆंने प्रारम्भ में बालक के प्रति समाज की उपेक्षा के प्रति ध्यान दिलाया था। सच तो यह हॆ कि अभी बालक से जुड़ी अनेक बातों ऒर चीज़ों जिनमें इसका साहित्य भी मॊजूद हॆ के प्रति समुचित ध्यान ऒर महत्त्व देने की आवश्यकता बनी हुई हॆ। न बाल साहित्यकार को ऒर न ही उसके साहित्य को वह महत्त्व मिल पा रहा हॆ जिसका वह अधिकारी हॆ। उसको मिलने वाले पुरस्कारों की धनराशि तक में भेदभाव किया जाता हॆ। उसके साहित्य के सही मूल्यांकन के लिए न पर्याप्त पत्रिकाएं हॆं ऒर न ही समाचार-पत्र आदि। साहित्य के इतिहास में उसके उल्लेख के लिए पर्याप्त जगह नहीं हॆ।बाल साहित्यकार को जो पुरस्कार-सम्मान दिए जाते हॆं वे उसे प्रोत्साहित करने की मुद्रा में दिए जाते हॆं। साहित्य अकादमी ने बाल साहित्य ऒर बाल साहित्यकारों को सम्मानित करने की दिशा में बहुत ही सार्थक कदम बड़ाएं हॆं लेकिन मेरी समझ के बाहर हॆ कि क्यों नहीं ज्ञानपीठ ऒर नोबल पुरस्कार देने वाली संस्थाएं ’बाल साहित्य’ को पुरस्कृत करने से गुरेज किए हुए हॆ।इसी प्रकार बाल साहित्य की अधिकाधिक पहुंच उसके वास्तविक पाठक तक संभव करने के लिए बहुत कुछ करना बाकी हॆ। हिन्दी के संदर्भ में बाल साहित के अंतर्गत कविता ऒर कहानी के अतिरिक्त अन्य विधाओं में भी सृजन की बहुत संभावनाएं बनी हुई हॆ। भारत के संदर्भ में आज बहुत जरूरी हॆ कि तमाम भारतीय भाषाओं में उपलब्ध बाल साहित्य अनुवाद के माध्यम से एक-दूसरे को उपलब्ध हो। उत्कृष्ट बाल साहित्य के चयन प्रकाशित होते रहने चाहिए। भारतीय बाल साहित्यकारों को समय-समय पर एक मंच पर लाने की आवश्यकता हॆ ताकि बाल-साहित्य सृजन को सही दिशा मिल सके। इस दिशा में साहित्य अकादमी का यह कदम जिसके कारण हम यहां एकत्रित हॆं अत्यंत स्वागत के योग्य हॆ। 
जोर देकर कहना चाहूंगा कि आज साहित्य में बालक(जिसमें बालिका भी सम्मिलित हॆ) विमर्श की बहुत जरूरत हॆ। आज हिन्दी में उत्कृष्ट बाल साहित्य उपलब्ध हॆ, विशेषकर कविता। लेकिन अभी बहुत कुछ ऎसा छूटा हॆ जिसकी ओर काफी ध्यान जाना चाहिए। उचित मात्रा में किशोरों के लिए बाल-साहित्य सृजन की आवश्यकता बनी हुई हॆ। तमाम तरह के अनुभवों को बांटते हुए हमें अपने बच्चों को ऎसे अनुभवों से भी सांझा करना होगा, अधिक से अधिक, जो मनुष्य को बांटने वाली तमाम ताकतों ऒर हालातों के विरुद्ध उनकी संवेदना को जागृत करे। उसके बड़े होने तक इंतजार न करें। मॆं तो कहता हूं कि सच्चा स्त्री विमर्श भी बालक की दुनिया से ही शुरु किया जाना चाहिए। भारत के बड़े भाग में आज भी लड़के-लड़की का दुखदायी ऒर अनुचित भेद किया जाता हॆ। मसलन लड़की को बचपन से ही इस योग्य नहीं समझा जाता कि वह लड़के की रक्षा कर सकती हॆ। एक कविता हॆ, ’जब बांधूंगा उनको राखी’ जिसमें लड़के की ओर से बाराबरी की बात उभर कर आती हॆ:
मां मुझको अच्छा लगता जब
मुझे बांधती दीदी राखी
तुम कहती जो रक्षा करता
उसे बांधते हॆं सब राखी।
तो मां दीदी भी तो मेरी
हर दम देखो रक्षा करती
जहां मॆं चाहूं हाथ पकड़ कर
वहीं मुझे ले जाया करती।
मॆं भी मां दीदी को अब तो
बांधूंगा प्यारी सी राखी
कितना प्यार करेगी दीदी
जब बांधूंगा उनको राखी!
कितने ही घरों में चूल्हा-चॊका जॆसे घरेलू काम लड़की के ही जिम्मे डाल दिए जाते हॆं। लेकिन शायद होना कुछ ऎसा नहीं चाहिए क्या जॆसा इस कविता ’मॆं पढ़ता दीदी भी पढ़ती’ में हॆ। एक अंश इस प्रकार हॆ:
कभी कभी मन में आता हॆ
क्या मॆं सीख नहीं सकता हूं
साग बनाना, रोटी पोना?
मॆं पढ़ता दीदी भी पढ़ती
क्यों मां चाहती दीदी ही पर
काम करे बस घर के सारे?
सबकुछ लिखते हुए बाल साहित्यकारों की ऎसी रचनाएं देने की भी जिम्मेदारी हॆ जिनके द्वारा संपन्न बच्चों की निगाह उन बच्चों की ओर भी जाए जो वंचित हॆं, पूरी संवेदना के साथ। कविता ’यह बच्चा’ का अंश पढ़िए:
कॊन हॆ पापा यह बच्चा जो
थाली की झूठन हॆ खाता ।
कॊन हॆ पापा यह बच्चा जो
कूड़े में कुछ ढूंढा करता ।
पापा ज़रा बताना मुझको
क्या यह स्कू्ल नहीं हॆ जाता ।
थोड़ा ज़रा डांटना इसको
नहीं न कुछ भी यह पढ़ पाता ।
अंत में, संक्षेप में कहना चाहूंगा कि बड़ों के लेखन की अपेक्षा बच्चों के लिए लिखना अधिक प्रतिबद्धता, जिम्मेदारी, निश्छलता, मासूमियत जॆसी खुबियों की मांग करता हॆ। इसे लेखक, प्रकाशक अथवा किसी संस्था को बाजारवाद की तरह प्राथमिक रूप से मुनाफे का काम समझ कर नहीं करना चाहिए। बाल साहित्यकार के सामने बाजारवाद के दबाव वाले आज के विपरीत माहॊल में न केवल बच्चे के बचपन को बचाए रखने की चुनॊती हॆ बल्कि अपने भीतर के शिशु को भी बचाए रखने की बड़ी चुनॊती हॆ। कोई भी अपने भीतर के शिशु को तभी बचा सकता हॆ जब वह निरंतर बच्चों के बीच रहकर नए से नए अनुभव को खुले मन से आत्मसात करे। अकेले होते बच्चे को उसके अकेलेपन से बचाना होगा। लेकिन यह बच्चों के बीच रहना ’बड़ा’ बनकर नहीं, बल्कि जॆसा कोरिया के बच्चों के सबसे बड़े हितॆषी, उनके पितामह माने जाने वाले सोपा बांग जुंग ह्वान (1899-1931) ने बच्चे के कर्तव्यों के साथ उसके अधिकारों की बात करते हुए ’कन्फ्य़ूसियन’ सोच से प्रभावित अपने समाज में निडरता के साथ एक आन्दोलन -“बच्चों का आदर करो” शुरु करते हुए कहा था, ’टोमगू’ या साथी बनकर। अपने को अपने से छोटों पर लादने, बात-बात पर उपदेश झाड़ने, अपने को श्रेष्ठ समझने ऒर मनवाने तथा अपने अंहकार के आदि बड़ों के लिए यह काम इतना आसान नहीं होता। लेकिन जो आसान कर लेते हॆं वे इसका आनन्द भी जानते हॆं ऒर उपयोगिता भी।यदि हम चाहते हॆं कि बाल-साहित्य बेहतर बच्चा बनाने में मदद करे ऒर साथ ही वह बच्चों के द्वारा अपनाया भी जाए तो उसके लिए हमें अर्थात बाल-साहित्यकारों को बाल-मन से भी परिचित होना पड़ेगा। उनके बीच रहना होगा। उनकी हिस्सेदारी को मान देना होगा। अमेरीकी कवि ऒर बाल-साहित्यकार चार्ल्स घिग्न(Charles Ghigna, 1946) के अनुसार, “जब आप बच्चों के लिए लिखो तो बच्चों के लिए मत लिखो। अपने भीतर के बच्चे के द्वारा लिखो।” आज के बाल-साहित्य लेखन के सामने यह भी एक चुनॊती हॆ।हमें, हिन्दी के अत्यंत महत्त्वपूर्ण बाल साहित्यकार ऒर चिन्तक निरंकार देव सेवक से शब्द लेकर कहूं तो ’बच्चों की जिज्ञासाओं, भावनाओं ऒर कल्पनाओं को अपना बनाकर उनकी दृष्टि से ही दुनिया को देखकर जो साहित्य बच्चों को भी सरल भाषा में लिखा जाए, वही बच्चों का अपना साहित्य होता हॆ।’ यहां मुझे महाकवि जिब्रान की कुछ कविता पंक्तियां याद हो आयी हॆं जिनसे मॆं इस प्रपत्र का अंत करना चाहूंगा। पंक्तियां हॆं:
तुम्हारे बच्चे तुम्हारे नहीं हें।
जिन्दगी जीने के वे प्रयास हें।
तुम केवल निमित्त मात्र हो,
वे तुम्हारे पास हॆं, फिर भी-वे तुम्हारे नहीं हें।
उन्हें अपना विचार मत दो,
उन्हें प्रेम चाहिए।
दीजिए उन्हें घर उनके शरीर के लिए
लेकिन, उनकी आत्मा मुक्त रहने दीजिए।
तुम्हारे स्वप्न में भी नहीं,
तुम पहुंच भी नहीं पाओगे–
ऎसे कल से 
उन्हें अपने घर बनने दीजिए
बच्चे बनिए उनके बीच,
लेकिन अपने समान उन्हें बनाइए मत।

बाल मजदूर –

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बाल मजदूर -ओंम प्रकाश नौटियाल

मुझे देखते हो आप
ईंटें ढोते हुए
और नाम दे देते हो
बाल मजदूर
आप शायद नहीं जानते
मैं कभी
“बाल” था ही नहीं
बचपन तो मेरा
खो  गया था
बचपन में ही
धूप की तपन में
सर्द सिहरन में
घुटन में
जूठन में
बर्तन धोते हुए
खेत बोते हुए
बालू ढोते हुए
मैं व्यस्त हूं तभी से
किसी न किसी निर्माण में
क्योंकि मैं ही हूं
इस देश का भविष्य
देश का कर्णधार
इसीलिए निरंतर ढो रहा हूं
देश निर्माण का भार
मैं देश का
भाग्य विधाता हूं
स्वयं को समझाता हूं
कि बचपन तो
चोंचला है अमीरों का
ढकोसला है वक्त का
दोष है जन्मजात रक्त का
बचपन उनका
जिनके पास
समय है खोने को
खेलने सोने को,
जिन्हें निर्माण कर
देश को वैभव देना है
उन्हें शैशव से क्या लेना है ?
———-ओंम प्रकाश नौटियाल
(पुस्तक “पीपल बिछोह में ” से उद्धत -सर्वाधिकार सुरक्षित)

बाल गीत बाल संस्कार

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बाल-गीत
???
बाल-संस्कार

सुबह-सवेरे जल्दी उठकर,
सेहत खूब बनाओ ।
नित्य काज जल्दी निपटाकर ,
और घूमने जाओ ।।1।।

??????
रोज नहाना, शाला जाना,
जीवन शुभ बनाना ।
छेाटे नाखून, केश सुहाने ,
अच्छापन अपनाना ।।2।।

??????
दंत-मुंह की साफ-सफाई ,
चित्त का ध्यान लगाओ ।
सुबह-सवेरे जल्दी उठकर,
सेहत खूब बनाओ ।।3।।

??????
मात-पिता का मान रखे हम,
बात बड़ों की मानें ।
संस्कार और मर्यादा की ,
बात जड़ों की जानें ।।4।।

??????
नम कर सबको आदर देकर,
अपना मान बढ़ाओ ।
सुबह-सवेरे जल्दी उठकर,
सेहत खूब बनाओ ।।5।।

??????
खूब पढ़ाई, मेहनत के बल,
आगे बढ़ते जाएं ।
‘अमन’ प्रीत और मोलजोल का,
जीवन लक्ष्य बनाएं ।।6।।

??????
हरपल जीवन प्यारे बच्चों,
गीत खुशी के गाओ ।
सुबह-सवेरे जल्दी उठकर,
सेहत खूब बनाओ ।।7।।

??????
मुकेश बोहरा ‘अमन’
गीतकार
बाड़मेर राजस्थान
810412334 5
??????