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बुंदेलखण्डी-लोक साहित्य

अनुरुद्ध सिंह

(शोधार्थी) भारतीय भाषा केन्द्र

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय नई दिल्ली

144 झेलम छात्रावास ज.ने.वि.नई दिल्ली

Email-ID-shvmsngh0@gmail.com

लोक साहित्य का अर्थ

बुंदेलखण्डी ‘लोक साहित्य’ को जानने से पहले हमें ‘लोक’ और ‘लोक साहित्य’ को जान लेना चाहिए कि आखिरकार ‘लोक’ और ‘लोक साहित्य’ होता क्या है- ‘लोक’ शब्द संस्कृत के ‘लोकृ दर्शने’ धातु से ‘धञ्’ प्रत्यय करने पर निष्पन्न हुआ है.1 इस धातु का अर्थ देखना होता है. अत: ‘लोक’ शब्द का अर्थ हुआ देखने वाला. इस प्रकार वह समस्त जन समुदाय जो इस कार्य को करता है ‘लोक’ कहलायेगा. साधारण जनता के अर्थ में इसका प्रयोग ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर किया गया है. ऋग्वेद में ‘लोक’ के लिए ‘जन’ का भी प्रयोग उपलब्ध होता है.2

भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र के चौदहवें अध्याय में अनेक नाट्यधर्मी तथा लोकधर्मी प्रवृत्तियों का उल्लेख किया है .महर्षि व्यास ने अपनी शतसाहस्त्री संहिता की विशेषताओं का वर्णन करते हुये लिखा है कि यह ग्रन्थ (महाभारत) अज्ञान रुपी अन्धकार से अन्धे होकर व्यथितलोक (साधारण जनता) की आँखों को ज्ञान रुपी अंजन की शलाका लगाकर खोल देता है-

“अज्ञानतिमिरान्धस्य लोकस्य तु विचेष्टत: ज्ञानांजनशलाकाभिनत्रोन्मीलनकारकम्”3

इसी प्रकार महाभारत में वर्णित विषयों की चर्चा करते हुए लोकयात्रा का उल्लेख किया गया है-

“पुराणानां चैव दिव्यानां कल्पनां युद्धकौशलम्

वाक्यजातिविशेषाश्च लोकयात्राक्रमश्च य:”4

महर्षि व्यास ने लिखा है- “प्रत्यक्षदर्शी लोकानां सर्वदर्शी भवेन्नर:.”5

अर्थात जो व्यक्ति लोक को स्वत: अपने चक्षुओं से देखता है वही उसे सम्यक रुप से जान सकता है .

भगवदगीता में ‘लोक’ तथा ‘लोकसंग्रह’ आदि अनेक शब्दों का प्रयोग अनेक स्थानों पर किया गया है. भगवान श्री कृष्ण ने ‘लोकसंग्रह’ पर बड़ा बल दिया है. वे अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं-

“कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय:

लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि”.6

कहने की आवश्यकता नहीं कि यहाँ लोकसंग्रह का अर्थ साधारण जनता का आचरण व्यवहार तथा आदर्श है.

लोक साहित्य की परिभाषा

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘लोक’ के संबंध में अपने विचार को प्रकट करते हुए लिखा है कि- “लोक शब्द का अर्थ ‘जन-पद’ या ‘ग्राम्य’ नहीं है बल्कि नगरों और गाँवों में फैली हुई वह समूची जनता है जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं. ये लोग नगर में परिष्कृत, रुचि सम्पन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रुचि वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारिता को जीवित रखने के लिए जो भी वस्तुयें आवश्यक होती हैं उनकों उत्पन्न करते हैं.”7

डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय के मत के अनुसार ‘लोक’ की परिभाषा निम्नलिखित है- “आधुनिक सभ्यता से दूर अपने प्राकृतिक परिवेश में निवास करने वाली, तथाकथित अशिक्षित एवं असंस्कृत जनता को लोक कहते हैं जिनका आचार-विचार एवं जीवन परम्परायुक्त नियमों से नियंत्रित होता है.”8

इससे स्पष्टतया ज्ञात होता है कि जो लोग संस्कृत तथा परिष्कृत लोगों के प्रभाव से बाहर रहते हुये अपनी पुरातन स्थिति में वर्तमान है उन्हें ‘लोक’ की संज्ञा प्राप्त है. इन्हीं लोगों के साहित्य को ‘लोकसाहित्य’ कहा जाता है. यह साहित्य प्राय:मौखिक होता है तथा परम्परागत रुप से चला आता है. यह साहित्य जब तक मौखिक रहता है तभी तक इसमें ताजगी तथा जीवन पाया जाता है. लिपि की कारा में कैद करते ही इसकी संजीवनी शक्ति नष्ट हो जाती है.

लोक संस्कृति को अंग्रेजी में ‘फोकलोर’ कहा जाता है. ‘फोकलोर’ दो शब्दों से मिलकर बना है.1- ‘फोक’ तथा 2- ‘लोर’. ‘फोक’ शब्द की उत्पत्ति ऐंग्लो सैक्सन शब्द ‘folc’ से मानी जाती है. जर्मन भाषा में इसे ‘volk’ कहते हैं. डॉ. बार्कर ने ‘फोक’ शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है कि- ‘फोक से सभ्यता से दूर रहने वाली किसी पूरी जाति से बोध होता है परन्तु इसका यदि विस्तृत अर्थ लिया जाय तो किसी सुसंस्कृत राष्ट्र के सभी लोग इस नाम से पुकारे जा सकते है.’9 वहीं ‘पं. रामनरेश त्रिपाठी का ‘फोक’ शब्द के लिए ‘ग्राम’ शब्द पर अत्यधिक आग्रह है. इसी आधार पर उन्होंने फोकसांग का हिन्दी पर्याय ग्राम-गीत स्वीकार किया है.’10 कृष्णदेव उपाध्याय का मानना है कि- “फोकलोर के लिए लोक संस्कृति शब्द का प्रयोग नितांत उपयुक्त एवं समीचीन है. लोक संस्कृति के अंतर्गत जनजीवन से संबंधित जितने आचार-विचार, विधि-निषेध, विश्वास, प्रथा, परम्परा , धर्म, मूढ़ाग्रह, अनुष्ठान आदि हैं वे सभी आते हैं.”11

सोफिया बर्न ने ‘फोकलोर’ के क्षेत्र विस्तार के सम्बंध में लिखा है कि- ‘यह एक जाति वाचक शब्द की भाँति प्रतिष्ठित हो गया है जिसके अंतर्गत पिछड़ी हुई जातियों में प्रचिलित अथवा अपेक्षाकृत समुन्नत जातियों के असंस्कृत समुदायों के अवशिष्ट विश्वास, रीति-रिवाज, कहानियाँ, गीत तथा कहावतें आती हैं. इनके अतिरिक्त इसमें विवाह, उत्तराधिकार, बाल्यकाल तथा प्रौढ़ जीवन में रीति-रिवाज तथा अनुष्ठान और त्यौहार, युद्ध, आखेट पशुपालन आदि विषयों के भी रीति-रिवाज और अनुष्ठान इसमें आते हैं तथा धर्मगाथाएँ अवदान लोक कहानियाँ, बैलेड, गीति, किंवदंतियाँ, पहेलियाँ भी इसके विषय हैं.संक्षेप में लोक की मानसिक संपन्नता के अन्तर्गत जो वस्तु आ सकती है वे सभी इसके क्षेत्र में है.’12

‘सोफिया बर्न ने फोकलोर के विषय को तीन श्रेणियों में विभक्त किया है-

1-लोकविश्वास और अंधपरम्पराएँ

2-रीति-रिवाज तथा प्रथाएँ

3-लोक साहित्य

सोफिया बर्न ने लोक संस्कृति का जो श्रेणी विभाजन किया है उस पर दृष्टि डालने से यह स्पष्ट होता है कि लोक साहित्य लोक संस्कृति का एक भाग है उसका एक अंश है.यदि लोक संस्कृति की उपमा किसी विशाल वट वृक्ष से दी जाय तो लोक साहित्य को उसकी एक शाखा मात्र समझनी चाहिए. यदि लोक संस्कृति शरीर है तो लोक साहित्य इसका एक अवयव है. लोक–संस्कृति का क्षेत्र–विस्तार अत्यंत व्यापक है परन्तु लोक साहित्य का विस्तार संकुचित है. लोक-संस्कृति की व्यापकता जन-जीवन के समस्त व्यापारों में उपलब्ध होती है परन्तु लोक साहित्य जनता के गीतों, कथाओं, गाथाओं मुहावरों तक ही सीमित है.लोक संस्कृति में लोक साहित्य का अंतर्भाव होता है.’13

लेकिन लोक साहित्य का विस्तार अत्यंत व्यापक है. साधारण जनता जिन शब्दों में गाती है, रोती है, हँसती है, खेलती है उन सबको लोक साहित्य के अन्तर्गत रखा जा सकता है.पुत्र जन्म से लेकर मृत्यु तक जिन षोडस संस्कारों का विधान हमारे प्राचीन ऋषियों ने किया है प्राय: उन सभी संस्कारों के अवसर पर गीत गाए जाते हैं. विभिन्न ऋतुओं में प्रकृति में जो परिवर्तन दिखायी पड़ता है उसका प्रभाव जन साधारण के हृदय पर पड़े बिना नहीं रहता. अत: बाह्य जगत में इस परिवर्तन को देखकर हृदय में जो उल्लास या आन्नद की अनुभूति होती है वह लोक गीतों के रुप में प्रकट होती है. गाँव के लोग अपने दैनिक व्यवहार तथा वार्तालाप में सैकड़ों मुहावरों तथा कहावतों का प्रयोग किया करते हैं. छोटे-छोटे बच्चे खेलते समय अनेक प्रकार के हास्याजनक गीत गाते हैं. ये सभी गीत तथा कथाएँ लोक साहित्य के अन्तर्गत आती हैं.

भारतवर्ष का लोक-साहित्य आध्यात्मिकता और धार्मिक विश्वासों से ओतप्रोत है,यह कहने में कोई संदेह नहीं है. देश की प्राचीन सांस्कृतिक परम्पराएँ हमें लोक साहित्य द्वारा आज विरासत के रुप में प्राप्त हुई है.भले ही भाषा और भावों में अन्तर आ गया हो,पर आधुनिक संस्कृति की मूल धारा खोजने में हमें कठिनाई नहीं होती है .डॉ.वासुदेवशरण अग्रवाल ने एक स्थल पर बड़ा ही युक्तियुक्त पूर्ण कहा है-“वेदव्यास ने महाभारत में कहा है ‘गुहंय् ब्रहम् तदिदं ब्रवीमि,नाहि मानुषाच्छेष्ठतरं हि किंचित’ अर्थात रहस्य ज्ञान की एक कुंजी बताता हूँ कि इस लोक में मनुष्य से बढ़कर और कुछ भी नहीं है.मनुष्य से सब नीचे हैं, मनुष्य सबसे बढ़कर है,जो ज्ञान मनुष्य के लिये उपयोगी नहीं,वह दो कौड़ी का है.”14 आगे उन्होंने भारतीयों की सहिष्णुता के विषय में लिखा है- “वनों के निषाद और शवरों के प्रति भी हिन्दूधर्म ने सदा ही सहिष्णुता की आरती सजाई है…चतुर्दिक जीवन के साथ सहानुभूति और सहिष्णुता का भाव इसकी विशेषता रही है.आज का हिन्दू धर्म भारतवर्ष के महाकान्तार दण्डकारण्य की तरह ही विशाल और गम्भीर है,जिसमें अपरिमित जीवन के प्रतीक एक दूसरे के साथ गुंथकर किलोल करते रहे हैं.”15

स्पष्ट है कि ‘लोक साहित्य में किसी देश या जाति की हजारों वर्षों की परम्परा,राष्ट्र के उत्थान-पतन,मानव जाति के सम्पूर्ण जीवन की कहानी गुम्फित है.अतीत से लेकर आज तक की समस्त बौद्धिक,धार्मिक तथा सामाजिक प्रवृत्तियों का विकासशील इतिहास लोक साहित्य में मिलता है. लोक साहित्य समुद्र की भाँति है,जिसकी भाव लहरियों और भाव गह्वरों का पार कर पाना आसान काम नहीं.परन्तु जिन्होंने भाव सागर की गहराई में प्रवेश किया,उन्होंने अनूठे रत्न खोज निकाले हैं. भाव-उर्मियों के बोलते छन्दों के कलरव में देश की गाथाएँ,संस्कृतियाँ जन-जन के कंठों से मुखरित हो रही है.राम,कृष्ण और शिव की अमरता का श्रेय पुराणों और इतिहासों को उतना नहीं है,जितना लोक साहित्य को.इन गीतकारों ने रामत्व और कृष्णत्व को मानव जीवन के साधारण धरातल पर ला खड़ा किया है और उनसे तादात्म्य स्थापित करने में गौरव अनुभव किया है.’16

लौकिक साहित्य समानरूप से नगरों और ग्रामों दोनों की ही सम्पत्ति है.साहित्यिक वर्ग जहाँ परिष्कृत एवं परिमार्जित भाव और भाषा का अध्ययन मनन एवं श्रवण करता है,वहाँ अशिक्षित अथवा अर्द्धशिक्षित मानव समुदाय भी अपने ज्ञान वैभव को प्रदर्शित करने का इच्छुक रहता है.परम्परागत नरसी,ढोला और भरथरी के कथा गीतों को गाकर आत्मानन्द प्राप्त करता है.तभी विद्वान ग्रिम ने कहा है कि-“लोक गीत जनता का,जनता द्वारा ओर जनता के लिए रचा गया काव्य होता है.”17 विदेशी विद्वानों ने भारतीय ग्राम गीतों की प्रशंसा मुक्तकंठ से की है.

बुंदेलखंड का परिचय

बुंदेलखण्ड मध्य भारत का एक प्राचीन क्षेत्र है. इसका विस्तार मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में है. बुंदेली इस क्षेत्र की मुख्य बोली है. भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताओं के बावजूद बुंदेलखण्ड में जो एकता और समरसता है, उसके कारण यह क्षेत्र अपने आप में सबसे अनूठा बन पड़ता है. अनेक शासकों और वंशों के शासन का इतिहास होने के बावजूद बुंदेलखण्ड की अपनी अलग ऐतिहासिक,सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत है. ‘दीवान प्रतिपाल सिंह’ ने बुन्देलखण्ड का इतिहास में ‘राजा छत्रसाल’ के समय के बुन्देलखण्ड की सीमा निम्नलिखित छंद में निर्धारित की है.

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“इत जमुना उत नर्मदा,इत चम्बल उत टौंस

छत्रसाल सों लरन की, रही न काहू हौंस

उत्तर समथल भूमि गंग जमुना सु बहति हैं

प्राची दिशि कैमूर सोंन कासी सु लसति है

दक्खिन रेवा विंध्यांचल तन शीतल करनी

पच्छिम में चम्बल चंचल,सोहति मन हरनी

तिन मधि राजे गिरि, बन सरिता सहित मनोहर

कीर्तिस्थल बुन्देलन को बुन्देलखण्ड बर.”18

बुन्देलखण्ड की भूमि आर्य सभ्यता के आगमन के पूर्व अनार्य कालीन संस्कृति के प्राचीनतम रूपों की क्रीड़ा स्थली रही है. भारद्वाज,याज्ञवल्क्य आदि स्मृतिकारों के आश्रम बुन्देलखण्ड के अन्तर्गत थे. रामायण के अनुसार बाल्मीकि, अत्रि, शरभंग, सुतीक्ष्ण, अगस्त ऋषियों के आश्रम इसी प्रदेश में थे. बुन्देलखण्ड राम के समय में दण्डकारण्य का भाग था. महाराजा रामचन्द्र यमुना को पार करके चित्रकूट आये थे. महाभारत में कालिंजर अगस्त मुनि का स्थान बताया गया है. भवभूति के रामचरित में वाल्मीकि आश्रम के निकच मुरला(नर्मदा) और तमसा (टोंस) नदियों का नाम आया है. बुन्देलखण्ड की तपस्थली में ऋषि मुनियों ने अपार ज्ञान-कोष संग्रह कर सारे देश को प्रकाशित किया. और अनार्यों की संस्कृति का संगम-स्थल यही बुन्देलखण्ड रहा है. निषाद, गुह, खरदूषण, मारीच, आदि राक्षसों का निवासस्थल यहीं था. आज भी द्राविड़ संस्कृति के संरक्षक बैंगा, गोंड तो अपने को रावणवंशीय मानते हैं. ये लोग रावण की पूजा भी करते हैं.

अठारह पुराणों और महाभारत के रचयिता कृष्णद्वैपायन वेदव्यास की जन्मभूमि काल्पी थी,जिसका पौराणिक नाम कालप्रिय था. महाभारत काल में पांडवों के नाना कुन्तलपुर के अधीश्वर थे जो वह कुन्तावर के नाम से प्रसिद्ध है.महर्षि सन्दीपनि का आश्रम इसी भू-भाग में था. विद्याओं के भंडार तपोनिधि पाराशर जी,वीर मित्रोदय,बृहदकोश के रचयिता मित्रमिश्र,चन्द्रोदय के रचयिता पं. कृष्णमिश्र एवं शीघ्रबोध के पं.काशीनाथ मिश्र ने इसी भूमि को अलंकृत किया.कौशाम्बी में भगवान बुद्ध ने बहुत समय तक निवास किया था.

यह पुण्यस्थली विद्वान कवियों एवं साहित्यकारों की लीलाभूमि रही है,जिसकी गोद में पलकर आचार्यों एवं कवियों ने साहित्य सर्जन किया है.चारण कवि चंदबरदाई,जगनिक को यहाँ से प्रतिभा प्राप्त हुई.अकबर के विनोदप्रिय दरबारी बीरबल,प्रसिद्ध अर्थशास्त्री राजा टोडरमल यहीं के थे कविकुल गुरु कालिदास ने यहीं से प्रेरणा पाई है. आचार्य केशवदास ने ओरछा की राजसभा में रहकर साहित्य निर्माण किया है .कविकुल तुलसीदास की जन्भूमि राजापुर रही है.छतरपुर के ठाकुर कवि,पन्ना के लाल ,करन पजनेस कवि दतिया के गदाधर कवि इसी भूमि के हैं. मिश्रबन्धु, पदमाकर ने यहीं साहित्यसेवा की है. यहीं के राजा साहित्यप्रेमी रहें हैं पन्ना छतरपुर विजावरा अजयगढ़ चरखारी दतिया सिमथर के राजा कवियों के आश्रयदाता रहें हैं. राजा छत्रसाल कविता प्रेमी रहे हैं. वे स्वयं कवि थे और पत्र-व्यवहार कविता में करते थे. ओरछा तो साहित्य का केन्द्र रहा है. ये कवियों के आश्रयदाता भी थे. कवि भूषण ने तभी कहा है – “सिवा को बखानौं कि बखानौं छत्रसाल को.”19 छत्रसाल तो पत्र-व्यवहार भी कविता में करते थे. जब बुन्देलों पर मुगलों ने आक्रमण किया तब छत्रसाल ने बाजीराव पेशवा को सौं दोहों का एक पत्र लिख भेजा. अंतिम पंक्तियां बड़ी ही मार्मिक हैं-

“जो गति ग्राह गजेंन्द्र की,सो गति भई है आय

बाजी जात बुन्देल की,राखो बाजीराय.” 20

केशवदास, बलभद्रमिश्र, भूषण, चिन्तामणि आदि यहाँ के प्रसिद्ध कवि हुए हैं .बुन्देलखण्ड के आधुनिक कवि एवं लेखकों ने बड़ी ख्याति प्राप्त की है.राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, डॉ. वृन्दावनलाल वर्मा, पं. बनारसीदास चतुर्वेदी इसी तपोभूमि में पलकर अभिवृद्धि करने में जुटे रहें हैं. बुंदेलखण्ड प्रारंभ से वीरभूमि रहा है. यहाँ के वीर पुरुषों,आल्हा,ऊदल और परमाल आदि का नाम लिया जाता है. बुंदेलखण्ड में आल्हा-ऊदल के वीर गीत भी गाये जाते हैं. वर्तमान बुंदेली साहित्य अर्थात बीसवीं सदी के कवियों में ईसुरी प्रसाद ईसुरी और गंगाधर व्यास के नाम उल्लेखनीय है. ईसुरी की फागें अत्यधिक प्रसिद्ध पा चुकी हैं,जो जनसाधारण में खूब लोकप्रिय हुई हैं. ईसुरी के सम्बन्ध में कहा गया है-

“रामायण तुलसी कही,तानसेन ज्यों राग

सोई या कलिकाल में कही ईसुरी फाग.”21

ईसुरी की फाग की भाषा देखिए-

“करके नेह टोर जिन दइयो,दिन दिन और बड़इयो

जैसे मिलै दूद में पानी,उसई मनै मिलइयो.”22

गंगाधर व्यास की फागें भी ख्याति-प्राप्त हैं.युगलेश जी की फागों में लोकोक्तियों का यथोचित प्रयोग मिलता है.जैसे-

“जुगलेश दबैल की प्रीति बुरी,नहीं कीजिए,बूड़मरै मंझधारौ

मित्र न एसौ करौ सपने,हो,जो खीर में सोंज महेरी में न्यारौ.”23

विन्ध्यांचल की श्रेणियों से घिरा हुआ यह भू भाग काव्य और साहित्य का गढ़ प्राचीनकाल से रहा है. साहित्य में लोक-जीवन की अभिव्यक्ति यहाँ पूर्ण रुप से हुई. लोकगीत ग्राम साहित्य का स्फुरण यहीं हुआ. मन को गुदगुदाने वाली लोकोक्तियों कहनौत, बुझौअल आदि बड़ी मात्रा में यहाँ पाये जाते हैं. चारण भाटों की विनोदशीलता एवं शौर्य वर्णन बुन्देली काव्य में पूर्ण रुप मिलता है,जो जन मनोरंजन की स्वस्थ परंपरा में निरंतर योगदान देता रहता है.

देश के विभिन्न क्षेत्रों के समान ही बुंदेलखंडी भूमि का मानस धरातल भावों की उच्च भूमि पर प्रतिष्ठित है. यहाँ के आचार-विचार, संस्कार, रीतिरिवाज एवं मान्यताएं उसी रुप में प्रचिलित हैं, जैसी अन्य प्रन्तों में भले ही आनुष्ठानिक अभिचारों में थोड़ी-बहुत विभिन्नता हो. यहाँ के धार्मिक व्रत, त्यौहार और उनसे सम्बंधित लौकिक अभिचार तथा कथाएं,बालक और बालिकाओं के खेल तथा खेल गीत, स्त्रियों द्वारा संस्कारों की औपचारिकता तथा तत्संबंधी, सामाजिक रीतियाँ लौकिक विश्वासों की रुढ़िवादिता, कौटुम्बक स्नेह एवं विद्वेश की प्रकृत भावनाएँ भारतीय लोक साहित्य में समान रुप से उदभासित हुई हैं. इस संबंध में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विचार पठनीय है- “यदि सब देशों के लोक गीत संकलित किये जा सकें और उनका तुलनात्मक अध्ययन हो,तो यह प्रत्यक्ष होगा कि उनमें एक ही मन और हृदय छिपा है,जो मनुष्य मात्र के समान है.”24 गीतों के रचनाकाल एवं उनके लेखकों के अज्ञातनामा होने के सम्बंध में वे लिखते हैं- “उन सब कविताओं में चिरत्व है. न मालूम कब किस काल में कौन सी कविता लिखी गई,किसने इन्हें लिखा,ये प्रश्न किसी के मन में उठते ही नहीं.इसी स्वाभाविक चिरत्व गुण के कारण ये आज रचित होने पर भी प्रचीन हैं और एक हजार साल पहले लिखी जाने पर भी नवीन हैं.”25 भारतीय नारी इस मौखिक साहित्य की सृजक एवं संरक्षिका रही है उसने लोक गीतों की रचना में महत्तव-पूर्ण योगदान दिया है.

स्त्रियाँ स्वभावत:भावुक और करुणामयी होती हैं.अत:उनके कंठों में गीतों का अटूट भन्डार फूटता रहता है.जबकि पुरुष कभी-कभी ही गाता है. फिर उनके गीतों में श्रृंगारिक भावना का आधिक्य रहता है.एक तरह से गीतों पर स्त्रियों को एकाधिकार है.मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त विविध संस्कार,विविध कार्यकलाप एवं विविध भआवनाओं के गीत स्त्री समाज द्वारा गाये जाते हैं.उनके कोमल कंठों की स्वर लहरियाँ वायुमंडल को मधुरिमा से भर देती है और उसमें सच्चा रसिक आन्नदरस का आस्वादन करता है. इन गीतों में दाम्पत्य प्रेम की झाँकी पग-पग पर मिलती है.एक नृत्यगीत में गीत की लय नृत्य के ताल के साथ चलती दिखाई देती है जिसमें एक नवौढ़ा बुंदेली बधु पति को रिझाने का सफल प्रयत्न करती जान पड़ती है-

“मैं हूँ नारि नवेली,ओहो रे अलबेली

तुम तो राजा महल अटारी,मैं हूँ कच्ची हवेली

ओ हो रे अलबेली,मैं हूँ नारि नवेली

तुम तो राजा लड्डू पेरा,मैं हूँ गुड़ की डेली.”26

बुंदेलखण्ड का लोक साहित्य बहुत ही विस्तृत है. सन् 1944 ई. में ओरछा के तत्कालीन महाराज के संरक्षण में लोकवार्ता परिषद की स्थापना टीकमगढ़ में हुई थी जिसने बुंदेलखण्ड के लोकगीतों, गाथाओं तथा मुहावरों के संकलन का कार्य वैज्ञानिक पद्धति से प्रारम्भ किया था. इस परिषद के तत्वावधान में लोकवार्ता नामक एक त्रैमासिक पत्रिका भी प्रकाशित होती थी जिसके सम्पादक थे लोकसाहित्य के विद्धान श्री कृष्णा नन्द जी गुप्त.परन्तु स्वतंत्रता के प्राप्ति के पश्चात् ओरछा राज्य के भारतीय संघ में विलयन के साथ ही इस परिषद का भी विलयन हो गया. इसी समय पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने मधुकर पत्र द्वारा बुन्देलखण्डी लोकसाहित्य को प्रकाश में लाने का कार्य किया था. पिछले दो वर्षों से झाँसी जिले के मऊ रानीपुर में ईसुरी परिषद् की स्थापना हुई है जिसके मंत्री हैं श्री नर्मदा प्रसाद जी गुप्त. इस परिषद् का उद्देश्य भी लोकवार्ता परिषद् की ही भाँति बुन्देलखण्डी लोकसाहित्य का संकलन तथा प्रकाशन है.

संस्कृति में बुंदेला शासन के प्रारम्भ होने के बीच एक ऐसा संधिकाल बुंदेलखंड में आता है जिसकी संस्कृति और समाज का चित्रण साहित्य के माध्यम से ही संभव है. जगनिककृत “आल्हा” और विष्णुदास कृत “रामायन कथा” तथा “महाभारत कथा” का आश्रय लेना श्रेष्ठकर है. विदेशी आक्रमणों का ऐसा सिलसिला चला कि राजनैतिक दृष्टि से भारत में स्थिरता नहीं रह पाई. तथापि धार्मिक और सांस्कृतिक परिवेश कठोर नियमों से अनुसासित होने लगा समाज के चारों वर्णों को स्मृतियों के अनुसार चलने के निर्देश धार्मिक नेताओं ने दिए. स्मृतियों के अनुसारण में कट्टरता बढ़ी और जाति और उपजातियों की श्रृंखला बढ़ती ही गई. सवर्णों में पुनर्विवाह वर्जित था परन्तु शूद्रों में इसका प्रचलन था. दास-दासियों के रखने का चलन था. चन्देलों के समय धर्म का जो रुप था उसमें इस काल में कोई लक्षणीय अन्तर नहीं दिखता है. गुजरात के सोलंकी नरेश कुमारपाल के संरक्षण में जैन धर्म अवश्य ही उत्थान पा गया. उड़ीसा के जगन्नाथ,कोणार्क के सूर्य मन्दिर के नमूने तथा भुवनेश्वर समूहों का निर्माण इस समय हुआ. जैन मन्दिरों के नमूने आबू के दैलवाड़े मन्दिरों में दृष्टव्य हैं राजाओं की चिन्ता अपने राज्य को विजित होने से बचाने की थी. चारण युग का प्रारंभ यहां से होता है, चन्द और जगनिक आदि कवि इसके प्रमाण हैं.

फिरोज तुगलक के समय तक समाज की दशा अत्यंत खराब हो चुकी थी. शासन का संचालन संकीर्णतापूर्ण, पक्षपातयुक्त और साम्प्रदायिकता के आधार पर होता था. अत: धार्मिक पक्षपात स्वाभाविक थे. हिन्दू जी तोड़कर अपनी समाज व्यवस्था बनाने में लगे थे पर राज्य की ओर से हस्तक्षेप होते थे. समाज में दास प्रथा थी. तैमूरलंग के आक्रमण से असंतुलन उत्पन्न हुआ. रुढ़िवाद और अंध विश्वासों की सघनता बढ़ी. वर्णाश्रम धर्म की कट्टरता इतनी बढ़ी कि एक उपविभाग का व्यक्ति दूसरे उपविभाग के व्यक्ति तके यहां खानपान, रोटी-बेटी का संबंध नही रखता था. विदेशी आक्रमणकारियों से जब भगवान जनता की रक्षा न कर सका तो धर्महीनता की स्थिति भी आने लगी. बुंदेलखंड के समाज को अब पूर्णत: धर्म, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्थाओं के क्षेत्र में शासक का मुखापेक्षी होना पड़ा. राजा के निर्देश कवियों की वाणी का अभिव्यक्त हुए हैं.ऎसा प्रसिद्ध है कि कालिंजर के राजा परमार के यहाँ जगनिक नाम के एक भाट थे जिन्होंने महोबे के दो देश प्रसिद्ध वीरें आल्हा और ऊदल(उदय सिंह) के वीरचरित का विस्तृत वर्णन एक वीरगीतात्मक काव्य के रूप में लिखा था जो उतना सर्वप्रिय हुआ कि उसके वीरगीतों का प्रचार क्रमश: सारे उत्तरी भारत में विशेषत: उन सब प्रदेशों में जो कन्नौज साम्राज्य के अंतर्गत थे-हो गया. जगनिक के काव्य का आज कहीं पता नहीं है पर उसके आधार पर प्रचलित गीत हिंदी भाषा भाषी प्रांतों के गांव गांव में सुनाई पड़ते हैं. ये गीत आल्हा के नाम से प्रसिद्ध हैं और बरसात में गाए जाते हैं.बुंदेलखण्ड में विशेषत: महोबे के आसपास भी इसका चलन बहुत है. इस समय आल्हा और जल समाज के प्रचलित पक्तियां इस प्रकार हैं-

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(१) “बारह बरस लौ कूकर जीयें ओ तेरा लौं जियें सियार

बरिस अठारह छत्री जीयें आगे जीवन को धिक्कार.”27

(मौखिक आल्हा परंपरा से)

(२) “जाहि प्रान प्रिया लागिन सौ बैठे लिज धाम.

जो काया पर मूछ वाई सो कर हैं संग्राम.”28

(३) “बाई जित परमाल के बज्जे घोर निसा.

सैन सहित गढ़ मिलियो मल्लखन बलवान.”29

इनसे पता चलता है कि चन्देलों के समय से राजाओं को युद्धरत रहना पड़ता था. समाज का स्थान राज्य के बाद आता है अत: हिन्दू धर्म के अनुसार राजा के लिए मरना जन समाज का धर्म हो गया था. राजा की कल्पना ईश्वर के अंश के रुप में की गई. देशी राजाओं ने हिन्दू जनता की उन्नति के लिये जितने कार्य किये उससे कहीं अधिक अपने स्वार्थों की पूर्ति की.

बुंदेली समाज का प्रतिनिधित्व १२वीं शताब्दी में महोबा के द्वारा, पन्द्रहवीं शताब्दी में ग्वालियर के द्वारा तथा उसके बाद ओरछा और पन्ना के द्वारा होता था. पन्ना के शासकों का गौड़ों और मराठों से संबंध जुड़ता है,तब बुंदेलखंड के समाज में वैविध्य आने लगता है. मुगल शासन का प्रभाव भी समाज की रुढियों और विविध सामाजिक जीवन मूल्यों में परिवर्तन लाता है. अंतिम विदेशी प्रभाव अंग्रेजी समाज का है. जिसमें वर्तमान बुंदेली समाज की संरचना हुई इस प्रकार बुंदेली समाज सामन्तवाद के प्रभाव से प्रारंभ होकर साम्राज्यवाद की अतियों का शिकार भी बनता है.

बुंदेली लोक समाज गीतों, कथाओं और लोक नाट्यों के अतिरिक्त मनोरंजनात्मक बुद्धिपरक ज्ञान की सूक्तियों को सुरक्षित रखे हुये है.ये उपाख्यान,चुटकुले आदि के रुप में,दैनिक व्यवहार में प्रयुक्त होती हैं. चना और चूरन बेचने वाले अपने लटके दीर्घ स्वरों में गाकर बालकों को आकृष्ट कर लेते हैं और साथ ही युवक भी परिहासमयी तुकबंदी सुनकर रस ग्रहण करते हैं.यह ढ़कोशला– ‘चीटीं चढ़ी पहाड़ पर, नौ मन कजरी लगाय.’30 सुनते हैं तब ग्रमीणों की कौतूहलप्रियता का सहज पता चलता है.ग्रामीण जनता में प्रयुक्त मुहावरे अनुभवजन्य ज्ञान के वाक्यांश हैं,जिनमें लक्षणा अथवा व्यंजना व्यहृत होती है और जहाँ मूर्ख को गधा अथवा वैसाख नन्दन की संज्ञा देने में कोई हिचक नहीं. लोकोक्तियाँ संचित अनुभवों की ज्ञानागार होती हैं. वासुदेवशरण अग्रवाल ने इस विषय में ठीक ही कहा है-“उनसे मनुष्य को व्यावहारिक जीवन की गुत्थियों या उलझनों को सुलझाने में बहुत बड़ी सहायता मिलती है.लोकोक्तियों का आशय पाकर मनुष्य की तर्क-बुद्धि शताब्दियों के संचित ज्ञान से आश्वस्त सी बन जाती है.और उसे अंधेरे में उजाला दिखाई पड़ने लगता है,वह अपना कर्तव्य निश्चित करने में तुरन्त समर्थ बन जाता है.”31 ये लोकोक्तियाँ गद्य एवं पद्य दोनों में पाई जाती हैं.

बुन्देली की एक कहावत ‘मरी बछिया वामन के नांव’.32 मनुष्य के प्राकृतिक स्वभाव का सजीव चित्र खींचती है कि वह कितना ही सभ्य और सुसंस्कृत हो गया है. वह सभी काल में निकृष्ट और अनुपयोगी वस्तु को दूसरों के सिर मढ़ना चाहता है. इस कहावत की कहानी उपनिषदकाल में मिलती है. वाजश्रवा नाम के ऋषि ने यज्ञ की दक्षिणा में ब्राहम्णों को अपना सम्पूर्ण गोधन दे दिया था. दान में दी गयी सभी गायें बूढ़ी थीं. दूध एक भी नहीं देती थी. उस समय से सह कहावत चल पड़ी है. बुन्देलखण्ड के भूतपूर्व छोटे से राज्य आलीपुर की अंधेरगर्दी की चर्चा इस कहावत में मिल जाती है-

“तीन में घंटा चलै,तीन में तलवार

तीनइ में पैना चलै,अलीपुर दरबार.”33

यह कहावत अंधेर नगरी के टकासेर भाजी,टकासेर खाजा का स्मरण कराती है.ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजी सेना बुन्देलखण्ड के जिस ग्राम से निकलती थी तो छोटे-बड़ों सबको बेगार और रसद का प्रबंध करना अनिवार्य था.तभी कहावत चल पड़ी- ‘गाँव में आई डोरी,का माते का कोरी.’34 उस समय गाँव की बुढ़ियों को सैलिकों के लिए आटा पीसकर देना पड़ता था.तभी से लोग कहने लगे-

‘तस्कर को का डुकरयई पीसे.’35

इन कहावतों में विदेशी शासन की शोषक नीति का सच्चा परिचय मिलता है.बुन्देलखंडी जनता मुगल अफगानों,मराठों और अंग्रेजों के अत्याचारों से संत्रस्त रही है,तब उसकी करुण भावना लोकगीतों और लोकोक्तियों में आना स्वाभाविक है.

बुन्देली पहेलियाँ ग्रामीणों की जिह्वा पर नाचती रहती हैं.ये बुद्धि परीक्षा के साथ मनोरंजन लक्ष्य समाहित किये हुये होती हैं. ग्रामीणों की कल्पनातीत सूझबूझ देखकर दाँतों तले अँगुली दबानी पड़ती है.कुछ पहेलियाँ गेय होती है,तो कुछ अगेय होती है.ग्रामीणों की बुद्धि-विलास का एक उदाहरण देखिये ,जब वे पहेली बूझते हैं-

“नन्नी जनी और बड़ी जनी,

बड़ी जनी ने खोली तनी

तब नाचन लागी तीनों जनी.”36

ग्रामीण क्या, सुशिक्षित नागरिक भी इनका उत्तर टटोलने के लिए सिर खुजलाता दिखाई देगा. ढोरों की सार के लिए यह पहेली कितनी उपयुक्त है- ‘रात भरी दिन रीती तथा दिन भरी रात रीती’37 अलगनी पर डाले रहते हैं और ओढ़ने बिछाने को रात को उठा लेते हैं.

बुंदेली लोक-साहित्य के विषय में कहा जा सकता है कि- ‘लोक के मौखिक साहित्य ने मानव जीवन के उल्लास और रुदन,उनकी मैत्री और दिलेरी और कायरता के भावों को अभिव्क्त किया है.’38 लोक साहित्य के विशेषज्ञ और प्रशंसक ए.एम.गोर्की कहा करते थे कि- “श्रमिक वर्ग का सच्चा इतिहास बिना उनकी मौखिक कृतियों के नहीं जाना जा सकता है.”39 सर एडवर्ड बी.टेलर ने उचित ही कहा है- “प्राचीन जातियों के विचार का अध्ययन करने के लिए इतिहास की अपेक्षा उनकी पौराणिक गाथाएँ हमारे लिए अधिक शिक्षाप्रद है.”40

बुंदेली लोक गीत-

बुंदेली लोकगीत विभिन्न संस्कारों, ऋतुओं एवं व्रत त्यौहारों आदि के अवसरों पर स्त्री पुरुष सामूहिक रुप में गाते हैं.ये गीत विभिन्न अवसरों पर विभिन्न स्वर लहरियों में गाये जाते हैं.कुछ गीत व्यक्ति परक होते हैं,जिन्हें एक व्यक्ति भी गा सकता है और कुछ गोष्ठी में सम्मिलित स्वरों में गूंज उठते हैं.कुछ गीत बिना वाद्य के भी गाये जाते हैं और किन्हीं में ढोलक,मजीरा,डफ,खड़ताल,चंग,तम्बूरा आदि वाद्य भी प्रयोग मे लाये जाते हैं.गीतों का वर्गीकरण स्थानगत,ऋतुगत,जातिगत तथा संस्कारगत किया जा सकता है.पर्वत निवासियों के गीतों में पर्वतीय जीवन की कठोरता बोलने लगती है,जबकि समतल मैदान के निवासी निर्द्धन्द्ध एवं स्वच्छंद जीवन बिताते हैं. लोक जीवन की स्थानगत विशेषताएं उनके लोकगीतों में पाई जाती है.विभिन्न ऋतुओं के लोकगीत लोक मानस के अन्त:विश्लेषण करने में सक्षम होते हैं.चैत्र मास में रामा देवी की अचरी, वर्षाकाल में कन्हैया, आल्हा, ढोला, बारहमासी आदि पुरुषों के गीत तथा हिडोला गीत,मरमानि ढोला आदि स्त्रियों के गीत बड़े मार्मिक होते हैं.कुँआरमास में बालक बालिकाओं के टेसू के गीत बड़े ही कौतूहलवर्द्धक हैं.फाल्गुन मास में पुरुषों एवं स्त्रियों की फागें जीवन में नवोल्लास भर देती है.जातिगत गीत जातिविशेष के कार्य कलापों से सम्बंधित होते हैं.संस्कारगत गीत विविध संस्कारों पर स्त्रियों द्वारा(मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यपर्यन्त) गेय गीत हैं.इनमें सोहर एवं विवाह के गीत अत्यधिक संख्या में विद्यमान है.

(क) शिशु गीत-

घर की बड़ी,बूढ़ी,दादियां तथा माताएं शिशुओं को पालने में झुलाकर उनको प्रसन्न रखने हेतु जो गीत गाती है,वे लोरी या पालने के गीत कहे जाते हैं.ये गीत बालक को खिलाने तथा सुलाने के समय गाये जाते हैं.बच्चे को सुलाते समय वह गाती है-

“सोजा सोजा बारे वीर

वीरन की बलइयां लै लेउँ जमुना के तीर

बर पै डारौ पालना, पीपर पै डारी डोर

जौ लौं भइया सोउन लागे,तोनों आगई मोर.”41

(ख)किशोर गीत-

विशेष ऋतु एवं काल सम्बन्धी बालकों के गीतों में टेसू के गीत और होली माँगने के गीत सम्मिलित हैं.कुँआर मास की नौरात्रि के पश्चात ग्राम के बालक मिट्टी का टेसू बनाकर,उसके सिर को घर-घर जाकर अन्न,पैसा,इकट्ठा करते हैं.पूर्णमासी के दिन सब मिलकर टेसू का विवाह करते हैं.कुछ स्थानों पर बड़ी धूम धाम प्रीति भोज देकर विवाह सम्पन्न करते हैं.अंत में युद्ध का नकली रुप दिखाकर टेसू का सिर उड़ा ले जाते हैं .टेसू की कथा स्कंद पुराण में दो अध्यायों में वर्णन की गई है.टेसूगीत-

“धांधू तेली की टूटी लाट

ऊ में निकरै बढ़ई साब,

बढ़ई साब ने बनायो पलंग

ऊ पै लेटे टेसू मलंग”42

ऎसॆ गीतों में सामूहिक लय का ध्यान रखा जाता है.ये बालकों के समूह द्वारा सामूहिक रुप मे गाये जाते हैं.इनके चरण लम्बे नहीं होते,जैसे-

“इमली की जड़ में ते निकरी पतंग

नौ से मोती झलकै रंग”43

(ग)होली गीत-

लड़के होली जलाने के लिए लकड़ी इकटठी करने हेतु चन्दा मांगने द्वार-द्वार पर सब मिलकर गाने गाते हैं –

“लाड़ी माई ऊतरा,तेरे घर पै पूतरा

लाल पैसा तेरा,दिया बेटा मेरा

होरी है……होरी है.”44

(घ)सावन गीत-

श्रावण मास लगते ही कुमारियों के टोल के टोल घरों में,बाग बगीचों में झूले डाल लेते हैं और सुमधुर कंठ से निसृत स्वर आसपास के वातावरण को आनन्दसिक्त कर देते हैं.एक गीत में मनिहार(चूड़ीवाला) गलियों में चूड़ियाँ बेचता फिरता है,बीबी जी ने उसे बुलाकर चूड़ियाँ बेचता फिरता है,बीबी जी ने उसे बुलाकर चूड़ियाँ पहनीं.चूडा पहनते समय वह मनिहार से कहती है-

“हरी तो जंगली मनिअर ना पैरौं,

हरे हैं राजा जी के बाग,महाराजा जी के बाग

चूड़ो तो मेरी जान,चूड़ी तो हातीदांत कौ

पीरो रे जंगाली मनिअर,ना पैरौं

पीरे हैं राजाजी के वस्त्र,महाराजा जी के वस्त्र

चूड़ो तो मेरी जान,चूड़ो तो हातीदांत कौ.”45

मनिहार विविध रंग की चूड़ियाँ दिखलाता है परन्तु स्त्री उन रंगों को पति की वस्तुओं से मिलता पाकर अस्वीकार कर देती है.पतिव्रता धर्म का लोक-प्रतिष्ठित विश्वास प्रत्यक्ष हुआ है.

इन सावन गीतों की यह विशेषता है कि स्त्रियों की स्वर-लहरी झूले के पेंग के साथ घटती बढ़ती चलती है.गीत बड़े ही सरस एवं कर्णप्रिय होते हैं.इनमें यौवन के उद्दाम प्रेम का प्रवाह अजस्त्र गति से बहता दिखाई देता है.लोकगीत ने कला का कोई बंधन स्बीकार नहीं किया.उन्होंने तो स्वान्त सुखाय ही रचना की है.यदि इन गीतों में समरसता या सुन्दरता पाई जाती है तो वह अनायास ही सुलभ हुई है.इन कवियों को तो शुद्ध साहित्यिक भाषा का ज्ञान है.और न कवि कर्म के निश्चित सिद्धान्तों का ध्यान है.इन गीतों में सहज सौंदर्य लक्षित होता है,जो बरबस मानव मन को आकृष्ट कर लेता है.

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बुंदेली कथा साहित्य-

बुंदेली कथा साहित्य का भंडार भरापूरा है.बुंदेलखण्ड में प्रत्येक दादी या फूफी रात्रि के समय बच्चों के मनोरंजन के लिए एक दो कहानी अवश्य कहती हैं.कहानियों का अन्नत भण्डार समाप्त होने नहीं आता.घर की वृद्धा दादी जब बच्चों को कौआ और रेंहटा की कहानी सुनाती है तब कहानी की पद्यमय पंक्तियाँ बड़ी होती जाती हैं और दादी बड़े आकर्षक ढ़ग से उसे कहती जाती है.आगे चलकर कहानी के अंत में कौआ बढ़ई के पास पहुंचता है और कहता है-

“सुन ले भैया डांग गयौ,

डांग में ते लकड़ी लायौ,

लकड़ी मैंने डुक्को दीनी,

डुक्को मोइ चंदिया दीनी,

कुमरा मोई हंड़िया दीनी,

हँडिया मैंने गूजर दीनी

गूजर मोइ लौंदा दीनो

लौंदा मैनें हरहारे दीनो

हरहारे मोइ बैल दीनो

बैल मैनें राजा दीनो

राजा मोइ रानी दीनी

रानी मैनें तोइ दीनी

तू का मोइ एक रेंहटा नइँ देइगो.”46

रेंहटा पाकर वह प्रसन्न हो उठा और उसे चलाकर कहने लगा-

“चल मेरे रेटा तामक तू,

रानी के बलदै,आयौ तू.”47

यह कहानी बाल सुलभ कल्पनाशक्ति को जगाती है,साथ ही सामाजिक संस्कारों को सुदृढ़ भी करती है.समाज में अन्योन्याश्रित सम्बंधों पर ही सांसारिक कार्य सम्पन्न होते हैं.इस बात को कहानी के सरल माध्यम से सिखाया गया है,जो बाल मानस पर सदा के लिए अंकित हो जाती है.एक दूसरी कहानी पिल्ला की करा-मात है,जिसमें पिल्ला न छोटे बड़े प्राणियों की सहायता की और विपत्ति पड़ने पर उसे सहायता का प्रतिदान मिला तथा राजा की असीम शक्ति को उसने ललकार दिया.कहानी में पारस्परिक मैत्री और सदभावना लाभ का उपदेश छिपा हुआ है और कहानी यह भी संकेत करती है कि छोटे से छोटा प्राणी भी बड़े से बड़े शत्रु को पराजित कर सकता है.प्राचीन हितोपदेश तथा पंचतंत्र की रचना पं.विष्णुशर्मा ने इसीलिए की थी कि उन्होंने इसके द्वारा राजा के मूर्ख पुत्रों को विद्वान बना दिया था.इस प्रकार बाल-कहानियों में बाल मनोरंजन के साथ-साथ बालकों को शिक्षित किया जाता है.

बुन्देली लोक नृत्य

बुन्देलखण्ड की लोकजन संस्कृति में सामाजिक तथा जातीय गुणों को पेशेवर तरीके से सामाजिक परिवेश में जोड़ने के लिए विभिन्न नृत्यों की परम्परा विद्यमान है. सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तन के दौर में संक्रमण काल से गुजर रहे बुन्देली भूभाग में लोक नृत्य अब विलुप्त की कगार पर पहुंच गये है. बुन्देली लोक नृत्य पंरम्पराओं को बचाने के लिए समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो ‘सैरा नृत्य’, ‘डोमरहा नृत्य’, ‘जवारा नृत्य’, ‘कीर्तन नृत्य’, ‘कानड़ा नृत्य’, ‘चांचरा’ या ‘पाइ-डण्डा नृत्य’, ‘झांझिया नृत्य’, ‘मोनिया नृत्य’, ‘देवी नाच’, ‘चमराहा नृत्य’, ‘कहारों का नाच’, ‘राई नृत्य’, ‘ढिमराई नृत्य’, ‘कुम्हराई नृत्य’, ‘दुलदुल घोड़ी नाच’, ‘खशुआ नाच’, ‘चांगलिया नाच’, सिर्फ अतीत का इतिहास बनकर रह जायेगें. ‘कानड़ा नृत्य’ धोबी जाति का परम्परागत नृत्य है.

भगवान कृष्ण या कान्हा से सम्बन्धित इस नृत्य को नया जीवन तथा नया सम्बल और पुर्न प्रतिष्ठा दिलाने वाले सागर के लक्ष्मीनारायण रजक ने कहा था कि किसी जमाने में कानड़ा नृत्यकों को समाज में इतना सम्मान और नेंग मिलता था कि उसे और जीवकोपार्जन के लिए नहीं भटकना पड़ता था पहले विवाह में पग-पग पर कनाड़ियाई होती थी हल्दी चढ़ाते समय, मैहर का पानी भरते समय, मण्डप छापते समय, बारात विदा होते समय, बारात की अगुवानी में कनाड़ियाई होती थी बिना कनड़ा नृत्य की शादी विवाह नहीं होते थे. लेकिन आजकल कानड़ा को कोई बुलाते नहीं है पहले कनड़ा विवाह का अनिवार्य अंग था इसलिए कानड़ा के बहुत से कालाकार होते थे लेकिन आजकल कानड़ा नृत्य के स्थान पर विवाह में लोग बैण्ड बाजों या रेकार्ड़िग से काम निकालने लगें है, इसलिए कानड़ा नृत्य के कलाकार आज न के बराबर है. अब तो कोई शादी विवाह में कानड़ा करवाते हैं. आर्थिक अभाव के कारण ही कानड़ा नृत्य छूटता जा रहा है केवल सांरगी लोटा से कानड़ा नृत्यों का आज पेट नही भरता, वे कानड़ा को छोड़कर अन्य मजदूरी की तलाश में भटकने लगे हैं,इससे हमारे लोक कला जगत की एक महत्वपूर्ण विधा की बहुत बड़ी हानि हुई है। पहले एक ही विवाह में दो-तीन कानड़ा नृत्यक पहुँचते थे वहां प्रतिस्पर्धा होती थी प्रत्येक कानड़ा कलाकार अपनी-अपनी कला के माध्यम से श्रेष्ठता सिद्ध करता था अब तो गणेश उत्सव या नवरात्रि उत्सव ही कानड़ा नृत्य के अवसर रह गये है कभी-कभी शिशु जन्म पर खुशी से कोई-कोई कनिड़ाई गंवाते नचवाते हैं. ऊँचे-परे गांव के किसान जैसी कद-काठी वाले जब लक्ष्मीनारायण रजक कानड़ा की पारम्परिक भेश भूषा और सिंगार कुर्ता, बांगा, कंदिया, सेली, वाजूबंद, पकड़ी, कलगी, लगाए पैरों में घुघरू बांधे हाथ में सांरगी लिये निकलते है तो कानड़ा के इस सज्जन कलाकार को देखकर दर्शक ठगे रह जाते हैं और जब सारंगी मृदंग लोटा, झूला, कसावरी, टिमकी और खजरी की संगत के साथ कानड़ा गीत में बुन्देली शब्द, बिरहा, रमपुरिया, राई सैरा, दादरों की धुन लय ताल में निकालते है तो कानड़ा नृतक की पैरो की थिरकन और कमर की लचक तथा नृत्य की वृत्तीय गतियां देखते ही बनती है. लक्ष्मीनारायण रजक कानड़ा के दक्ष कालाकार हैं. जिन्होंने इस नृत्य को नई गति प्रदान की श्री रजक ने कृष्ण लीला, रामचरित महाभारत की कथाओं श्रृगांर तथा सामाजिक विषयों पर कानड़ा की परम्मपरागत धुनों में बुन्देली की कई रचनाएं की और अन्य कवियों के छन्दों को गाना शुरू किया. लेकिन उनके द्वारा पुर्न प्रतिष्ठित यह कला धीमें-धीमें जा रही हैं.

लोक बाद्य-

बुन्देली लोक बाद्य ‘अलगोजा’, ‘मौहर’, ‘रमतुला’, ‘बीन’, ‘डपला’, ‘दौंड़’, ‘नगाड़ा’, ‘खजली’, ‘अंजलि’, ‘नगडिया’, ‘तांसा’, ‘चंग’, ‘नरगा’, ‘इकतारा’, ‘कसौरा’, ‘जोरी’ या ‘झांझ’, ‘चिमटा’ आदि बाद्य बजाने वाले कलाकार धीरे-धीरे सिमट रहें है. लोक संस्कृति विभाग सिर्फ नाम के आयोजन करके भारी धनराशि लोक संस्कृति के नाम पर व्यय तो कर रही है लेकिन इन नृत्यों को बचाने के लिए कुछ सार्थक प्रयास नहीं हो रहें है झांझिया नृतक द्वारा गाये जाने वाला यह गीत ‘‘हरी री चिरैया, तोरे पियेर रे पंख, सो उड़-उड़ जाये, बबुरा तोरी डार’’ की गति हो रही है राई नृत्य करने वाली बेड़नी की हालत अत्यन्त खराब है राई, बुन्देलखण्ड के श्रेष्ठतम लोक नृत्यों में से हैं. भादों में कृष्ण जन्माष्टमी से प्रारम्भ होकर, यह नृत्य फाल्गुन माह में होली तक चलता है. इस नृत्य का नाम राई क्यों पड़ा, इसका तो कोई निश्चित कारण पता नहीं चल पाया, पर बुन्देलखण्ड की बेड़नियों द्वारा किया जाने वाला और अपनी विशिष्टता में मयूर-मुद्राओं का सौन्दर्य समेटे, यह नृत्य अपने यौवन काल में राज्याश्रृय प्राप्त दरबारी नृत्य रहा है अब इसे अन्य लोग भी करने लगे हैं. बेड़नियाँ यह नृत्य करते हुए, अपने यौवन काल में राज्याश्रृय प्राप्त दरबारी नृत्य रहा है.

बेड़िनियॉ यह नृत्य करते हुए, अपनी शरीर को इस प्रकार लोच और रूप देती है कि बादलों की गड़गड़ाहट पर मस्त होकर नाचने वाले मोर की आकृति का आभास मिलता है. इसका लहंगा सात गज से लेकर सत्तरह गज तक घेरे का हो सकता है. मुख्य नृत्य मुद्रा में अपने चेहरे को घूँघट से ढंककर लहंगे को दो सिरों से जब नर्तकी अपने दोनों हाथों से पृथ्वी के सामानान्तर कन्धें तक उठा लेती है, तो उसके पावों पर से अर्द्ध चन्द्राकार होकर,कन्धे तक उठा यह लहंगा नृत्यमय मयूर के खुले पंखों का आभास देता है. नृत्य में पद संचालन इतना कोमल होता है कि नर्तकी हवा में तैरती सी लगती है. इसमें ताल दादरा होती है. पर अन्त में कहरवा अद्धा हो जाता है साथ में पुरूष वर्ग लोग धुन गाता है.नृत्य की गति धीरे-धीरे तीव्र होती जाती है. राई में ढोलकिया की भी विशिष्ट भूमिका होती है. एक से अधिक ढोलकिए भी नृत्य में हो सकते है. ढोलकिए नाचती हुई नर्तकी के साथ ढोलक की थाप पर उसके साथ आगे-पीछे बढ़ते हैं, बैठते हैं, चक्कर लगाते हैं. नृत्य चरम पर ढोलकिया दोनों हाथों के पंजों पर अपनी शरीर का पूरा बोझ सम्भाले हुए, टांगे आकाश की ओर कर, अर्द्धवक्राकार रेखा बनाकर आगे-पीछे चलता है. इस मुद्रा मे इसे बिच्छू कहा जाता है. राई नृत्य में नर्तकी की मुख्य पोशाक-लहंगा और ओढ़नी होती है. वस्त्र विभिन्न चमकदार रंगों के होते हैं. दोनों हाथों में रूमाल तथा पांवों में घूंघरू होते हैं. पुरूष (वादक) बुन्देलखण्डी पगड़ी, सलूका और धोती पहनते हैं. राई के मुख्य वाद्य ‘ढोलक’, ‘डफला’, ‘झींका’, ‘मंजीरा’, तथा ‘रमतुला’ है.

इस प्रकार बुन्देलखण्ड का लोक साहित्य गहन गंभीर सागर की भाँति मौखिक रुप में यत्र तत्र बिखर गया है,जिसका संकलन कार्य असंभव सा है.बिना पूर्ण संकलन के उसका अध्ययन मनन भी असम्भाव्य है.और फिर यह साहित्य दिनों दिन बढ़ता ही जाता है.नये युग की नई परिस्थतियों और प्रवृत्तियों से प्रभावित होकर नवीन विषयों और विचारों का परिवर्द्धन एवं संवर्द्धन हो रहा है .फिर भी सत्यान्वेषक अथाह सारगर्भित मोती मूंगे खोज ही निकालते हैं. इस लोक नृत्यों को बचाने के लिए बुन्देलखण्ड में ही लोक संस्कृति केन्द्र की स्थापना जरूरी है. तभी बुन्देली लोक गीत,लोक कथा साहित्य, लोक नृत्य, तथा लोक वाद्य सुरक्षित और संरक्षित रह सकेगें.

संदर्भ ग्रंथ

1-डॉ.कृष्णदेव उपाध्याय-लोक साहित्य की भूमिका साहित्य भवन प्रा. लिमिटेड इलाहाबाद संस्करण 2010 पृ.सं.(9)

2- वही. पृ.सं.(9)

3- वही पृ.सं.(10)

4- वही पृ.सं.(10)

5- वही पृ.सं.(10)

6- वही पृ.सं.(10)

7- वही पृ.सं.(11)

8- वही पृ.सं.(22)

9-वही पृ.सं.(16)

10- वही पृ.सं.(16)

11- वही पृ.सं.(18)

12- वही पृ.सं.(19)

13- वही पृ.सं.(20)

14- स्नेही, डॉ. रामस्वरुप श्रीवास्तव,बुंदेली लोक साहित्य,रंजन प्रकाशन आगरा 1976 पृ.सं(27)

15- वही पृ.सं.(27)

16- वही पृ.सं.(27)

17- A balled is the poetry of the people,by the people,for the people.

18- वही पृ.सं. (4) भूमिका

19- शुक्ल,रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास,नागरी प्रचारणी सभा वराणसी पृ.सं.(141)

20- स्नेही,बुंदेली लोक साहित्य,रंजन प्रकाशन आगरा 1976 पृ.सं.(22)

21-वही पृ.सं.(23)

22- वही पृ.सं. (23)

23-वही पृ.सं.(23)

24- वही पृ.सं.(28)

25-वही पृ.सं.(28)

26-वही पृ.सं.(28)

27-शुक्ल, रामचन्द्र, हिंदी साहित्य का इतिहास,नागरीप्रचारणी सभा वराणसी पृ.सं.(29)

28-वही

29-वही

30- स्नेही,बुंदेली लोक साहित्य,रंजन प्रकाशन आगरा पृ.सं.(32)

31-वही पृ.सं.(32)

32-वही पृ.सं.(32)

33-वही पृ.सं.(32)

34-वही पृ.सं.(32)

35-वही पृ.सं.(32)

36-वही पृ.सं.(33)

37-वही पृ.सं.(33)

38-वही पृ.सं.(36)

39-वही पृ.सं.(36)

40-वही पृ.सं.(33)

41- वही पृ.सं.(43)

42-वही पृ.सं. (48)

43-वही पृ.सं.(48)

44-वही पृ.सं.(49)

45-वही पृ.सं.(53)

46-वही पृ.सं.(30)

47-वही पृ.सं.(31)

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