29 C
Delhi
होम ब्लॉग पेज 23

हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की कहानियों में दलित स्त्री का चित्रण और सामाजिक परिवेश-डॉ॰ स्वाति श्वेता

0
grayscale photo of woman in floral dress standing on water
Photo by Belle Maluf on Unsplash

हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की कहानियों में दलित स्त्री का चित्रण और सामाजिक परिवेश

-डॉ॰ स्वाति श्वेता

मोहनदास नैमिषराय के अनुसार — “दलित शब्द मार्क्स प्रणीत सर्वहारा शब्द के समानार्थक लगता है, लेकिन इन दोनों में पर्याप्त भेद हैं दलित की व्याप्ति सीमित है, तो सर्वहारा की अधिक सर्वहारा के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति आ सकता है,लेकिन दलित के अंतर्गत प्रत्येक सर्वहारा नहीं आ सकता “1

दलित-विमर्श समाज- व्यवस्था में परिवर्तन के लिए वैचारिक आह्वान है दलित साहित्य प्रतिबद्ध साहित्य है उसका अपना समाज दर्शन है दलित साहित्य काल्पनिक साहित्य नहीं है वह यथार्थ की धरती से जुड़ा है अदम गोंडवी कहते है–‘आइए,महसूस करिए ज़िंदगी के ताप को,मै चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको ‘ पर यदि हमने चमारों की गली ही नहीं देखी तो जिंदगी के ताप को कैसे समझ पाएंगे

समीक्षक डॉ॰एन॰सिंह के अनुसार–‘दलित साहित्य दलित लेखकों द्वारा लिखित वह साहित्य है जो सामाजिक,धार्मिक और मानसिक रूप से उत्पीड़ित लोगों की बेहतरी के लिए लिखा गया हो ‘2

ओम प्रकाश बाल्मीकि के अनुसार—‘ दलित साहित्य नकार का साहित्य है जो संघर्ष से उपजा है तथा जिसमे समता,स्वतंत्रता और बंधुता का भाव है और वर्ण व्यवस्था से उपजे जातिवाद का विरोध है ‘3 दलित कहानियों में तथाकथित सवर्ण पुरुषों द्वारा घर के भीतर स्वयं की स्त्रियों के शोषण की दासता और मुक्ति के स्वर सुने जा सकते हैं असमानता और अन्याय का पुरज़ोर विरोध और उसका खात्मा दलित कहानियों की विषयवस्तु है दलित कहानी की संवेदना और सरोकार को साहित्य के परम्परागत ढाँचे पर निर्मित मानदंडों के आधार पर समझना या परखना तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता दलित साहित्य की वैचारिक तथा पृष्ठभूमि को समझना अपरिहार्य है दलित कहानियों की कथावस्तु का मूल आधार — असमानता,अन्याय और शोषण का खात्मा तथा अहिंसा पर आधारित समतापरक समाज की स्थापना करना,स्वतंत्रता और भाई-चारे के लिए माहौल बनाना आदि है

हिन्दी में ओम प्रकाश वाल्मीकि की कहानी ‘जिनावर‘ दलित स्त्री के साथ हो रहे अत्याचारों का चित्रण करती है कहानी में बिरजू की बहू का शोषण उसका अपना ससुर करता है पूरी हवेली में बिरजू की बहू के दर्द को सुनने वाला कोई नहीं सतवीर की किसनी का तीन महीने तक शारीरिक-मानसिक शोषण के बाद उसकी लाश मिलती है जिसकी गवाह अकेली बिरजू की बहू है बिरजू की बहू द्वारा विरोध के बाद निकाल दिया जाता है वह अपने मायके चली जाती है उसका वही मायका जहाँ उसके मामा ने दस साल की अवस्था में ही उसके अबोध शरीर को बर्बाद कर दिया था बिरजू की बहू का कथन है -‘यह सुनसान जंगल हवेलियों से ज़्यादा सुरक्षित है कम से कम भेड़िये आवेंगे तो रूप-रंग बदल कर तो नहीं आवेंगे ‘

ओम प्रकाश वाल्मिकी की एक और कहानी ‘यह अंत नहीं’ ग्रामीण दलित स्त्री चेतना की प्रामाणिक कहानी है जो कुदृष्टि रखने वाले पर साहसिक ढंग से पुरजोर वार करती है और दुश्मन की बेहयाई को कायरता में तब्दील कर देती है गाँव का बिसन दलित है, लेकिन वह वह गाँव के सामंतों के हाथों का मोहरा बन कर रह जाता है ऐसे में दलित स्त्री बिरमा को न्याय की आशा व्यर्थ दिखती है परंतु बिरमा की मुखरता ने सभी में आशा का संचार कर दिया — ‘ ना बिरमा यह अंत नही है तुमने हमें ताकत दी है हार को जीत में बदलेंगे, लोगों में विश्वास जगाकर, ताकि कोई बिसन मोहरा न बने ‘

डॉ॰ सुशीला टाकरे की कहानी – ‘ सिलिया ‘ एक दलित लड़की के बाल्यावस्था से युवती के बनने के बीच के अपमान अंतर्द्वंद्व और संघर्ष की कहानी है जिसे आत्मविश्वास है कि शिक्षा से ही सम्मान के शिखर तक पहुँचा जा सकता है कहानी धर्म के खोखलेपन पर प्रहार करती है भेड़ों और बकरियों का व्यवसाय करने वाले गाडरी के मुहल्ले के कुएँ से पानी पीने और सिलिया की ममेरी बहन मालती द्वारा कुएँ की बाल्टी और रस्सी छू जाने से बवेला मच जाता है और

मामी के हाथों मालती की पिटाई होती है यह उसके सामने अपमान का पहला दृश्य था सिलिया के सामने दूसरा दृश्य तब उठता है जब सहेली हेमलता ठाकुर के बहन की ससुराल में सास द्वारा जाति जान लेने के बाद उसके सामने से पानी का गिलास हटा लिया जाता है उस समय उसे बेहद प्यास लगी होती है और इस तरह बचपन के यह घावों को सहती सिलिया बड़ी होती है और समाज को बदलने का संकल्प लेती है — ‘ सिलिया ने तस किया, वह जीवनभर कोशिश करेगी कि समाज इन बातों को समझें, उनके मर्म को जाने सम्मान और अपमान के भेद को समझे और सही रूप में सम्मान का हकदार बने ‘

नीरा परमार की ‘ वैतरणी ‘, कावेरी की ‘ सुमंगली ‘, कहानी दलित स्त्री की बेबसी, लाचारी की वजहों को समझने समझाने की कोशिश करती नज़र आती है ये कहानियाँ दलित स्त्रियों द्वारा भारतीय समाज की भोगी गई विद्रूपताओं और विडंबनाओं की कहानियाँ हैं कहना न होगा कि ये कहानियाँ दलित स्त्रियों के दर्द का दस्तावेज़ हैं

कावेरी की कहानी ‘ सुमंगली ‘ के सुगिया की जीवन कथा मानो शारीरिक शोषण की एक डाक्यूमेंट्री ही है सुगिया जब बारह साल की थी तब उसे औरत बना दिया गया और चौदह बरस में वह माँ बन गई उसके बाद भी न जाने किस-किस के दोहन का शिकार होती रही — ‘ सुगिया फफकने लगती आसूँ की बूँद टप-टप चू पड़ती वह कैसे समझाए कि उजड़ी हुई गृहस्थी को वह अब हरा-भरा नहीं देख सकती ॰॰॰॰॰ जवानी भर उसके शरीर के ठेकेदारों ने अपनी हवस का शिकार बनाया ‘4

कुसुम मेघवाल की कहानी ‘अंगारा’ की जमना अपने बलात्कारियों को नहीं छोड़ती है प्रतिशोध की आग में जल रही जमना जुल्मी को ऐसी सजा देती है कि वह जीते जी मरे के समान रह जाता है — ‘ जमना आँखें फाड़े अपनी इज्जत लूटने वाले नर- पिशाच को देख रही थी अब उसकी बारी थी अंगारा बनी जमना दौड़ी-दौड़ी घर में गई और कोने में पड़ी दराती उठा लाई, सरकार और पुलिस जिसे सजा नहीं दे पाई, उसे जमना न दे दी अपना प्रतिशोध पूरा किया ‘5

राजेश कुमार बौद्ध की कहानी ‘ आतंक ‘ की विमला भी बलात्कारियों को मृत्युदंड देती है इन स्त्रियों में इस चेतना या उग्रता का एक आयाम तो दलित जागृति है ही वहीं वे पूरी स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती दिखाई देती है

दलित स्त्री के शोषण और जुल्म की अत्यंत मर्मस्पर्शी कहानी है ‘ उसका फैसला’ कहानीकार कालीचरण अपनी कहानी में दिखाते है कि बिंदो जो कहानी की नायिका है पर अत्याचार और प्रताड़णा उसका अपना पति और ससुर करते हैं,—” उसके ससुर महाशय जी ने जमकर दारू पी और आधी रात को सोती हुई बिंदो पर राक्षस की भाँति टूट पड़ा ॰॰॰॰॰ साली हरमजादी, तेरा जवानी का जोश थम नहीं रहा है चंदर से तो होता-हवाता नहीं है मै ही तेरी आग ठंडी करूँगा ”6 उस रात बिंदो

का जैसे सब कुछ खत्म हो गया

मराठी कहानियों में ज्योति लांजवार की कहानी ‘गिद्ध ‘ परिवार में होने वाले यौन उत्पीड़न पर प्रकाश डालती नज़र आती है कहानी में शब्बों की माँ सोचती है कि मर्दों की इस दुनिया में मर्द कहलाने वाला नामर्द कैसे हो सकता है? औरत ही तो इन मर्दों को जन्म देती है फिर मर्द का उसकी ओर देखने का नज़रिया ऐसा क्यूँ?

मराठी कहानी ‘ आयदान ‘दलित स्त्री लेखन में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है उर्मिला पवार इस कहानी की रचयिता है आपकी एक और कहानी ‘ कवच ‘ चर्चा में रही इस कहानी में पुरुष का स्त्री की ओर देखने का दृष्टिकोण कभी खुली भाषा में तो कभी सांकेतिक भाषा में बखूबी व्यक्त किया गया है

मराठी कथाकार प्रज्ञा दया पवार की कहानी ‘ पैडीक्योर ‘ ब्राह्मणवादी मानसिकता में जीती माया का सुखी दलित दंपत्ति का एक दूसरे के प्रति समर्पित प्रेम देख ईर्ष्या से भर उठने की कहानी है

गुजरती कहानी ‘ दरी’ दलित स्त्री और उसके सामाजिक परिवेश का चित्रण करती नज़र आती है लेखिका हास्यदा पंडया की यह कहानी एक दलित किशोरी के साथ उसके शिक्षक द्वारा किए जाने वाले बलात्कार को दिखती है कहानी जहाँ इस पर प्रकाश डालती है कि दलित की इज्जत-विज्ज्त कुछ नहीं होती वहीं इस पर भी प्रकाश डालती है कि बलात्कार के बारे में लड़की मुँह नहीं खोलेगी कहानी में आक्रोश के स्वर को न्यायोचित रूप से हिंसा और प्रतिरोध तक पहुँचता दिखाया गया है इस कहानी का कथानक आहत दलित अस्मिता के अपमान और बलात्कार का है

कहना न होगा कि दलित कहानियाँ दलित स्त्री परिवर्तन की इच्छा के साथ समानता , आत्मबोध, संवेदनशीलता की आवाज़ों को मुखर करती नज़र आती है रमणिका गुप्ता के शब्दों में — ‘ये कहानियाँ सामाजिक बदलाव लाने का आह्वान करती हैं इन कहानियों में आक्रोश है, आग है , गुस्सा है तो साथ-साथ संवेदना , मानवीयता और सब्र भी है न्याय की उत्कृष्ट लालसा है समानता की तीव्र ललक है भाईचारे की भावना है ‘7

संदर्भ

1॰ ओम प्रकाश वाल्मिकी, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र,पृ॰ 0-21

2॰ डॉ॰ एन॰ सिंह, अंतिम दो दशक का हिन्दी साहित्य ,संपादक मीरा गौतम

3॰ ओम प्रकाश वाल्मिकी, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र,पृ॰ 0-24

4॰ कावेरी , दलित साहित्य कहानी संचयन ,सं॰ रमणिका गुप्ता , पृ॰ 120

5॰ कुसुम मेघवाल ,दलित साहित्य कहानी संचयन ,सं॰ रमणिका गुप्ता , पृ॰ 141 6॰ काली चरण प्रेमी,नई सदी की पहचान,श्रेष्ठ दलित कहानियाँ, सं॰मुद्राराक्षस, पृ॰103

7॰ दूसरी दुनिया का यथार्थ, रमणिका गुप्ता,नवलेखन प्रकाशन , हजारीबाग ,1997

डॉ॰ स्वाति श्वेता

सहायक प्रोफेसर

swat.shweta@ymal.com गार्गी महाविध्यालय

(M) 9818434369 दिल्ली विश्वविद्यालय

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

हिंदी दलित साहित्य का इतिहास और विकास-डॉ० श्रीमती तारा सिंह

0
woman in black top with brown bowl on head
Photo by Ron Hansen on Unsplash

हिंदी दलित साहित्य का इतिहास और विकास

– डॉ० श्रीमती तारा सिंह

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में दलित का अभिप्राय उन लोगों से है, जिन्हें जन्म, जाति या वर्णगत भेदभाव के कारण हजारों सालों से सामाजिक न्याय और मानव अधिकारों से वंचित रहना पड़ा है । शुद्रों की भी हालत कोई खास अच्छी नहीं रही है, सवर्ण आज भी शुद्रों के साथ बैठकर खाने में,या उसकी बिरादरी में शादी-ब्याह से कतराते हैं । यह विडंबना ही है, कि समस्त प्राणियों में एक ही तत्व के दर्शन करने वाला, वर्ण-व्यवस्था को गुण और कर्म के आधार पर निर्धारित करनेवाला समाज, इतना कट्टर कैसे हो गया कि निम्न वर्ण या जाति में जन्म लेने वालों को सब प्रकार के अवसरों से वंचित किया जाता रहा और इन सड़ी-गली सोच के लिए ’मनुस्मृति’ को जिम्मेदार ठहरा दिया गया । हमारे देश का लम्बे अरसों तक गुलाम रहने का यह भी एक मुख्य कारण रहा है । हमारे स्वतंत्रता आन्दोलन के पुराधाओं ने भारत को इस कलंक पूर्ण प्रथा से मुक्त कराने का यथासाध्य प्रयास किया । भारत के संविधान अनुच्छेद 15 ( 2 बी ) के अंतर्गत यह प्रावधान रखा गया कि जाति के आधार पर, भारत के किसी भी नागरिक के साथ भेद-भाव नहीं किया जायगा ; लेकिन यह सब संविधान के पन्नों में सीमित रह गया । आज भी सवर्ण के कुएं से दलितों का पानी लेना मना है । दलितों की बस्तियाँ, सवर्णों से बिल्कुल अलग होती है, जहाँ से सवर्ण गुजरने से आज भी बचने की कोशिश करता है ।

इसके अलावा लम्बे समय तक, सामाजिक शोषण और दमन की शिकार रही, हरिजन और गिरिजन जातियों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचिबद्ध किया गया, ताकि इनके लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सके । उनके प्रयासों का परिणाम कुछ-कुछ तो अब दीखने लगे हैं, लेकिन पूर्णतया अभी दूर है । सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्रों में चली मानवाधिकारों की हवा ने दलित चेतना को प्रवाहित करने में बड़ा योगदान किया है । यही कारण है कि अब दलित साहित्यकार परम्परागत काव्य-शास्त्र और सौन्दर्य-शास्त्र को अपर्याप्त मानते हुए साहित्य की नई कसौटी की खोज में जुट गये हैं । दूसरी ओर ये लोग अफ़्रिका और अमेरिका की अश्वेत जातियों के साहित्य से भी प्रेरणा ले रहे हैं, जिससे दलितों का काव्य-शास्त्र केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज को झकझोड़ने और जगाने के लिए भी हो । म्लेच्छ, अछूत, दास तथा न जाने और कितने गाली-वाचक शब्दों से पुकारे जाने दलितों द्वारा रचित ” दलित चेतना साहित्य ” में अपने अनुभव को उच्चवर्ण के साहित्यकारों के अनुमान की तुलना में अधिक मार्मिक अभिव्यक्ति प्रदान करने में सक्षम हो रहा है, लेकिन इसे आत्मकथात्मक साहित्य ही कहा जा सकता है ।

हिंदी में 1980, बाद दलितों द्वारा रचित अनेक आत्म-कथानक साहित्य आईं, जिनके कुछ नाम इस प्रकार हैं _ मोहनदास, नैमिशराय, ओमप्रकाश, बाल्मीकि, सूरजपाल, चौहान आदि । 1999 में दलित पत्रिका का प्रकाशन हुआ, इसके बाद दलित उपन्यासों की रचना हुई । इतना ही नहीं, हिंदी साहित्य का दलित विमर्ष की दृष्टि से पुनर्पाठ भी आरम्भ हुआ, जिसके परिणाम स्वरूप, भक्ति-साहित्य को नई दॄष्टि से व्याख्यापन किया गया । सरस्वती में प्रकाशित ( 1914 में ) हीरा डोम की कविता, ’अछूत की शिकायत’ को दलित हिन्दी साहित्य की प्रथम रचना के रूप में स्वीकृति मिली ।

—– 2 —–

दलित साहित्य को आगे ले जाने में फ़ुले और अम्बेडकर का बहुत बड़ा हाथ रहा । सर्वप्रथम यह मराठी साहित्य के रूप में आया । उसके बाद तेलगु, कन्नड़, मलयालम और तामिल में आया । बाकी भाषाओं में 20 वीं शदी के अंतिम दो दशकों में आया, लेकिन मलयालम दलित चिंतक कंचाइल्लय्या जब तक यह घोषणा करते हैं कि कुछ ही वर्षों बाद देखना, अंग्रेजी भारत की राष्ट्रभाषा बन जायगी, और हिन्दू-धर्म नष्ट हो जायगा ; वेद, उपनिषद तथा गीता से प्रेरणा प्राप्त करने वाले साहित्य के स्थान पर अम्बेडकरवादी दलित साहित्य सर्वव्यापी हो जायगा, तब वे वास्तव में दलित-विमर्ष को स्वार्थ और घृणा की राजनीति का शिकार बनाने की कोशिश करते हैं । ऐसे चिंतक दलित-साहित्य को आधुनिक विमर्ष के बजाय हिदू-विमर्ष के रूप में प्रस्तुत करते हैं । बावजूद यह सत्य है कि अम्बेडकर का साहित्य, दलित-मुक्ति की खोज, ग्यान की मुक्ति के रूप में करते हैं । जब भगवान बुद्ध आये तब उन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था से ग्यान को उच्च वर्णों के शिकंजे से मुक्त कराया था । आज भी दलित इसी कार्य को करने की कोशिश कर रहे हैं । इसके लिए संविधान में इन्हें संवैधानिक शक्ति भी प्राप्त है । यद्यपि मणिपुर में शेष भारत की तरह, यहाँ न तो वर्ण-व्यवस्था की विकृतियाँ पहले थीं, न ही आज है । कहते हैं, मणिपुरी समाज में 13 वीं,14 वीं शदी में मणिपुर में वैष्णव धर्म का जब प्रवेश हुआ, तब यहाँ सर्वप्रथम —

” जाति-पाति पूछे नहीं कोय”;

”हरि को भजे सो हरि के होय”

मानने वाले रामानंदी सम्प्रदाय आये । लगता है, मणिपुरी सम्प्रदाय को ये रामानंदी भा गये, तभी यहाँ वैष्णव धर्म का प्रचार हो सका । इतना ही नहीं, बंगाल के गौड़ीय सम्प्रदाय को भी यहाँ फ़लने-फ़ूलने का मणिपुर सम्प्रदाय ने भरपूर माहौल दिया । उसके प्रचारकों ने यहाँ जाति-व्यवस्था चलाने का भी प्रयास किया । मगर मणिपुरी समाज अपने संस्कार में इतने प्रबल थे,कि यहाँ जातिगत भेदभाव जड़ नहीं जमा सका । मणिपुर की तरह अरूणाचल प्रदेश, मिजोराम, मेघालय और नागालैंड में भी जाति-भेद न होने के कारण, वहाँ के साहित्य में दलित-विमर्ष नहीं है ।

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि भारतीय साहित में दलित विमर्ष के व्यापक प्रचलन का मूल कारण जाति और वर्ण पर आधारित सामाजिक भेदभाव रहा है । जिस कारण बीसवीं शदी के अंत तक दलित वर्ग समाज में सर उठाकर खुद को दलित-वर्गीय कहने का भी हिम्मत नहीं उठा नहीं पाता था । लेकिन जब हिन्दू-धर्म के खोखले आदर्शों व संस्कृति को वे समझने लगे, तब इस व्यवस्था के विरुद्ध खड़े होने की हिम्मत करने लगे । आज दलित-साहित्य का उभार भारतीय समाज व्यवस्था के परिवर्तन का द्योतक ही नहीं, बल्कि एक प्रकार से सवर्ण समाज पर श्वेत-पत्र सा लगता है । यदि देखा जाय, तो दलित चेतना को इस जीवंत स्तर के तह पहुँचाने के लिए महात्मा ज्योति राव फ़ुले ( सन 1890 एवं सावित्री वाई फ़ुले 1831 ) जैसे समर्पित दंपति का योगदान विस्मृत नहीं किया जा सकता । इन्होंने 1848 में पहली कन्या पाठशाला खोली । 1851 में अछूतों के लिए पहली पाठशाला खोली और 1864 में विधवा विवाह सम्पन्न कराया । सावित्री वाई फ़ुले को दलित समाज की पहली भारतीय शिक्षिका बनने का गौरव प्राप्त है । कुल मिलाकर देखा जाय, तो दलित-समाज के सभी तबके के लोगों का स्वर, मुख्य धारा से अलग रहने की छ्टपटाहट अभिव्यक्ति करता है । हम उम्मीद कर सकते हैं, कि दलित चेतना का यह संघर्ष एक दिन उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए बाध्य करेगी ।

महिला मानवाधिकारों के पुरोधा डॉ.आंबेडकर-डॉ. चित्रलेखा अंशु

0
unknown persons walking outdoors
Photo by Abhishek Shintre on Unsplash

महिला मानवाधिकारों के पुरोधा डॉ.आंबेडकर

डॉ. चित्रलेखा अंशु
असिस्टेंट प्रोफेसर
महिला अध्ययन,
मिथिला वि वि, बिहार

कुछ यक्ष प्रश्नों के उत्तर कभी दिए नहीं जाते और यदि उत्तर मिल भी गया हो तो व्यवस्था ऐसा दिखावा करती है कि उसे कुछ मालूम ही नहीं। यह बात महिला आरक्षण के संदर्भ में कहा गया है। क्योंकि आज भी महिला आरक्षण का प्रश्न यक्ष प्रश्न बनकर निरुत्तर है। हम पिछले कई वर्षों से महिला मुक्ति की संकल्पना देखते और उसे प्राप्त करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। लेकिन ऐसे क्या कारण हैं कि महिलाओं की प्रस्थिति रिपोर्ट के तीन दशकों के बीत जाने के बाद भी राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से महिलाओं के पिछड़ेपन का कोई एक निश्चित कारण या उसका निदान हमें नहीं मिल पा रहा या फिर हम उसे ढूँढना नहीं चाह रहे। आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन से लड़ने के लिए सरकारी महकमों के प्रयासों के बावजूद राजनीतिक और सामाजिक पिछड़ापन महिलाओं को वैश्विक स्तर तक पिछड़ेपन की श्रेणी में लेकर पटक दे रहा है। महिलाएँ जिस वजूद से सियासी दाव-पेंच को सीखने की कोशिश करके आगे बढ़ाना चाहती हैं वैसे ही शासन और निर्देशन का सवाल पैदा हो जाता है। क्योंकि आज भी हमारे देश में यह माना जाता है कि महिलाएँ किसी भी संस्था और परिवार की मुखिया नहीं हो सकतीं फिर राजनीति में शासन तंत्र तक पहुँचने की बात हम सोच भी नहीं सकते।

सामाजिक और राजनीतिक रूप से महिलाओं का पिछड़ापन तथा भेदभाव केवल भारत में है ऐसी बात नहीं। तमाम विकसित देशों में पितृसत्तात्मक सवाल महिलाओं का पीछा दशकों दशक से करते आयें हैं और करते रहेंगे। इसका कारण महिलाओं के प्रति आज भी ‘ब्रेडविनर’ का पारंपरिक सवाल कई देशों में काम कर रहा है। अमेरिका जैसे देश में फर्स्ट अर्नर के सवाल तो बदले हैं पर व्यवस्था नहीं। इसका उदाहरण हम अभी हाल में हुए अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में देख सकते हैं कि हिलेरी जैसी राजनीतिक सुदृढ़ महिला के होने के बावजूद वहाँ की विकसित बुद्धि वाली जनता डोनाल्ड ट्रम्प जैसे गैरराजनीतिक और नौसिखिया राष्ट्रपति को चुनती है। इस सोच के पीछे राजनीतिक कारण जो भी रहें हों पर किसी देश के नेतृत्व का सवाल एक पुरुष के पक्ष में जाकर समाप्त हो जाता है और परंपरा की जीत भी हो जाती है। अमरीका वही देश है जहाँ नारीवाद की कई शाखाओं ने अपनी शुरुआत से दशकों तक बराबरी का संघर्ष किया है पर परिणाम नदारद हैं।

बहरहाल भारत में महिलाओं के अधिकार के लिए सामाजिक आंदोलन तो चले ही और बहुत हद तक कामयाब भी रहे। इसके साथ ही उनके अधिकारों की लड़ाई को आंबेडकर ने संविधान में हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया है क्योंकि बिना कानूनी अधिकारों के कोई भी लड़ाई लड़ना और जीतना आसान नहीं होता। हम सभी जानते हैं कि स्त्रियों के लिए हिन्दू कोड बिल पास करवाने के लिए आंबेडकर को क्या नहीं सहना और क्या नहीं झेलना पड़ा था। उनकी चिंता महिलाओं के लिए स्वाभाविक ही थी क्योंकि स्त्री और शूद्रों की परिस्थिति समाज में एक जैसी थी। और यदि समाज में दोनों की परिस्थिति एक जैसी है तो उसका निदान भी एक जैसा ही होना चाहिए था।

भारत के परिप्रेक्ष्य में महिला अधिकारों के प्रश्न कई स्तरों पर चलते हैं किन्तु सबका विलय महिला मुक्ति और समानता जैसे विचारों पर आकर मिल जाते हैं। यह साफ करना इसलिए आवश्यक है कि मार्ग चाहे जो भी हों पर पहुँचना सभी को एक ही मंजिल पर है। मेरी नजर में आंबेडकर इसलिए एक विशाल हृदय के नेता थे क्योंकि उन्होने हिन्दू कोड बिल बनाते वक्त इस तरह के कोई निर्देश नहीं दिए कि इसमें किस जाति या किस वर्ग की महिलाओं के अधिकारों की बात की जा रही है। उनकी दृष्टि में स्त्रियों का शोषण हर जाति, धर्म और वर्गों में होता है इसलिए उन्होने सावयवी रूप से कहीं भी अधिकारों को खंड-खंड में बाँटने की बात नहीं कही। हम सभी लोग परिवार और जाति में जेण्डर के सवालों से परिचित हैं कि स्त्रियाँ भले ही किसी भी जाति और वर्ग की हों पर जब उनकी तुलना उनके ही घरों में मर्द के साथ की जाती है तो उन्हें दोयम दर्जा मिलता है। उन्हें प्राथमिक दर्जा इसलिए नहीं मिलता कि वे सवर्ण या महिला हैं। दलित महिलाओं के तृ-स्तरीय शोषण की बात तो है ही। इसीलिए जब आज के संदर्भों में भी हम स्त्रियों की बात करते हैं तो उन्हें हम जाति और वर्गों की नजर से देखते हैं। बराबरी के प्रश्नों को पाटने के लिए महिला आरक्षण सभी जाति, वर्ग तथा धर्मों की महिलाओं को मिलना चाहिए। क्योंकि जिन महिलाओं के प्रतिनिधित्व को किसी जाति विशेष में देखते हुए हम स्तरों में बाँट देते हैं वहीं इसके विरोध में पितृसत्ता अपनी जाति और वर्ग को भूलकर महिला आरक्षण के विरोध में एक हो जाती हैं। और हम महिलाएँ अपने ही अधिकारों को जाति और वर्ग के आधार पर बाँटने के लिए एक दूसरे के सामने आ जाते हैं। शायद यही कारण रहा है कि महिला आरक्षण विधेयक 1994 से संसद में ठंडेबस्ते में पड़ी है।

महिला चेतना का निर्माण और आंबेडकर

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक कई महिला संगठनों की उत्पत्ति हो चुकी थी। ‘‘इन संगठनों ने सामाजिक सुधारों के साथ-साथ मत देने का अधिकार भी मांगा। 1929 में, बाल विवाह पर रोक कानून को पास करवाने के बाद ये संगठन तलाक, उत्तराधिकार तथा संपत्ति के अधिकार के मामले उठाने लगे। 1934 में, ऑल इंडिया वीमेंस कांफ्रेंस ने हिंदूकोड का प्रस्ताव पास किया। सन् 1937 में हिंदू वीमेंस राइट टू प्रॉपर्टी कानून पास हुआ। सन् 1934 से 1951 तक हिंदू कोड पर बहस चलती रही। अत्यधिक विरोध के कारण नेहरु को कानून बनाने की प्रक्रिया रोकनी पड़ी। प्रथम चुनाव में भारी जीत के बाद सन् 1955 में हिंदू विवाह कानून, सन् 1956 में हिंदू उत्तराधिकार कानून हिंदू अल्पव्यस्क और संरक्षण कानून तथा हिंदू गोद लेने तथा पालने का कानून बना।’’[1] महिलाओं के स्वायत्त संगठन तथा डॉ. बाबा साहब अंबेडकर के प्रयास से महिला मानवाधिकार के प्रथम अध्याय की भारत में ‘हिंदू कोड बिल’ के रूप में शुरूआत हो चुकी थी। इसी आलोक में रेखा कस्तवार लिखती हैं कि, ‘‘स्त्रीवादी आंदोलनों की सशक्त पृष्ठभूमि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तैयार हो चुकी थी। उन्नीसवीं शताब्दी में पुरुषों द्वारा स्त्रियों की स्थिति में सुधार से शुरू(जिसे शुरूआती तौर पर ब्रिटिश आकाओं की प्रसन्नता के लिए स्वीकारा गया था)आंदोलन बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में समानता के अधिकारों द्वारा स्त्री को समाज का उपयोगी सदस्य बनाने से होता हुआ बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में स्वनिर्णय के अधिकार तक विस्तृत हुआ।’’[2]

महिला तथा मानव अधिकार के अंतर्गत स्त्री की चेतना जागृति का उद्देश्य बीसवीं सदी में पुष्ट होने लगा था। वर्ना उनकी स्वयं के बारे में कोई दृष्टि पैदा नहीं हुई थी। बीच-बीच में अधिकारों की मांगें उठ रही थीं किंतु उसे अधिक तवज्जों नहीं दिया जा रहा था। कारण यह था कि कुछ चुनिंदा महिलाएं ही उस संकीर्ण पितृसत्तात्मक समाज में अपने अधिकारों की मांग कर रही थीं। बाकी का पूरा का पूरा समाज अभी भी वैचारिक रूप से कुंद था। स्त्रियों को पुरूषों द्वारा दिखाई गई अपनी ‘माता, पत्नी तथा बहन की अच्छी तथा घरेलू छवि तक सीमित थी। जिसे उन्नीसवीं शताब्दी के समाज सुधारकों ने तथा स्वतंत्रता के समय गांधी ने पुष्ट किया था। इस परिप्रेक्ष्य में राधा कुमार लिखती हैं कि, ‘‘भारतीय नारी के आत्मबलिदानी स्वभाव के बारे में गांधी की संस्तुति कोई मौलिक नहीं थी क्योंकि उसकी प्रशंसा पहले ही समाज सुधारकों तथा पुनरूत्थानवादियों द्वारा की जा चुकी थी। वस्तुतः उन्होंने नारी स्वभाव का पुनर्रूपण ही किया। समाज सुधारकों ने जहाँ स्त्री की आत्मबलिदानी प्रकृति को सांस्कृतिक दबावों के चलते कष्टप्रद रूप में देखा वहीं पुनरूत्थानवादियों ने महिलाओं के संस्कारात्मक बलिदान को हिंदू स्त्री के गौरव की संज्ञा दी, परंतु गांधी ने स्त्री के आत्मबलिदानी स्वभाव को हिंदू संस्कारों के इतर माँ के रूप में भारतीय स्त्रीत्व के विशेष गुणों को परिभाषित किया। गांधी की दृष्टि में स्त्रियों द्वारा शांति और अहिंसा के प्रसार के लिए उनकी गर्भधारण एवं मातृत्व का अनुभव ही विशेष योग्यता है। अगर वे प्रसव की वेदना सह सकती हैं तो वे कुछ भी सह सकती हैं, कोई भी कष्ट उठा सकती हैं।’’[3]

राधा कुमार की इस टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि स्त्री की परंपरागत छवि को बनाए रखना समाज में न केवल उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखेगा बल्कि इससे उनकी खुद के बारे में नारीवादी दृष्टि का विकास कभी नहीं हो पाएगा। स्त्रियों को रूढ़ि तथा संस्कार की बेड़ियों में जकडे़ रहने के कारण पितृसत्ता उसका शोषण अनवात जारी रखेगी। स्त्रियों को मानवाधिकार की प्राप्ति तभी हो सकेगी जब घरेलू जीवन के परंपरागत बोझ से बाहर निकालकर वह स्त्री मुक्ति के नए आयामों को देख सकेंगी।

उपनिवेशिक काल में स्त्री अधिकारों की चेतना नारीवाद की पहली पीढ़ी की महिलाओं के मस्तिष्क में उभरी। जिसमें पंडिता रमाबाई तथा सावित्री बाई फुले के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। जाति प्रथा विरोधी तथा स्त्री शिक्षा की समर्थक इन महिलाओं ने उस बंद समाज में शिक्षा की अलख जलाकर समाज को रोशनी दिखाने की चेष्टा की। तद्पश्चात दूसरी पीढ़ी के रूप में कमलादेवी चटोपाध्याय, मार्गेट कजिंस, भीकाजी कामा, सरोजिनी नायडू, एनी बेसेंट आदि का नाम आता है। जिन्होंने स्त्री शिक्षा, महिलाओं के वोट का अधिकार तथा राजनीति में महिलाओं की भी सक्रिय भूमिका की बात छेड़ी। इसके साथ ही राजनीति में पुरुषवादी वर्चस्व को तोड़ने का भी काम किया जब कांग्रेस के चुनाव में ‘‘श्रीमती बेसेंट को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया और वे कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनी।’’[4]

आशा शुक्ल तथा कुसुम त्रिपाठी अपनी पुस्तक में लिखती हैं कि, ‘‘हमारे इतिहास की किताबों में सरोजनी नायडू, ऐनी बेसेंट, अरूणा आसफ अली और उषा मेहता जैसी महिलाओं के योगदान का उल्लेखनीय विवरण है, लेकिन ऐसी हजारों अनजानी, अनसुनी महिलाऐं हैं जो अनेकों निषेधों व अवरोधों को पार कर सड़कों पर उमड़ पड़ी थीं। उन्होंने उपने को समूह में संगठित किया था, वे देशभक्ति गीत गाते हुए प्रभात फेरी निकालती थीं, प्रचारात्मक कार्यक्रम संचालित करती थीं तथा विदेशी शराब व विदेशी कपडे़ बेचने वाली दुकानों का घेराव करती थीं। वे उदारता के साथ कांग्रेस को कपड़े और गहने दान करती थीं। वे घरों में खादी बुनती थीं, इसके उपयोग के लिए प्रचार करती थीं एवं पुलिस आक्रमण तथा कैद को भी झेलती थीं।’’[5] विश्व का इतिहास इन अनदेखी, अनजानी महिलाओं के अविस्मरणीय योगदान को हमेशा याद रखेगा। उन महिलाओं के प्रति मैं अपने शोध के द्वारा आभार प्रकट करती हूँ जिन्होंने अनजाने में ही सही सिद्धांतों के परे जाकर व्यावहारिक जीवन में अपने अधिकारों के प्रति संगठित तथा जागरूक हुई भले ही वह पूरे भारत की स्वतंत्रता की कामना थीं। यह एक मानवतावादी विचार है जिसमें मनुष्य सभी की मुक्ति की बात करता है।

महिला अधिकारों की मांग के लिए उन्नीसवीं सदी के समाज-सुधार आन्दोलन की उदारवादी धारा से अपनी ‘आल इंडिया वुमन कमिटी’, (जिसका गठन 1927 में हुआ था), का बहुत बड़ा योगदान है। ‘‘1945 तक ए.आई. डब्ल्यू. सी ने ‘भारतीय महिलाओं के अधिकार का घोषणापत्र’ सूत्रबद्ध किया, जिसे निजी कानून में सुधार के लिए महिलाओं के लिए समान विरासत अधिकार, एक पत्नी प्रथा, तलाक का अधिकार, विवाह के लिए वर-वधू दोनों की सहमति, अंतरजातीय व अर्न्तविश्वासी विवाह और बच्चों पर समान अभिभावकत्व का अधिकार, जैसी सलाहों के द्वारा ठोस बनाया गया था।’’[6] आगे चलकर ‘हिंदू कोड बिल’ के रूप में ये सारे महिला अधिकार उसमें शामिल हुए जिसे अंबेडकर के द्वारा मौलिक बनाकर संविधान सभा में प्रस्तुत किया गया। तमाम कट्टरपंथी ताकतों तथा पुनरूत्थानवादियों के विरोध के बावजूद यह बिल अंततः महिला अधिकारों के हित में पूर्णतः तो नहीं किंतु अंशतः पारित हुआ। ‘‘जो चार कानून बनाए गए थे वे क्रमशः हिंदू उत्तराधिकार कानून। हिंदू अल्पवयस्कता एवं अभिभावकत्व कानून तथा हिंदू गोद एवं गुजारा कानून के रूप में जाने गए।’’[7] इन कानूनों के पारित होने से स्त्री के मूलभूत अधिकारों में वृद्धि अवश्य हुई। जिससे महिलाएं कानूनी रूप से संपत्ति, अभिभावकत्व, गोद तथा विवाह व्यस्क होने पर कर सकती थीं।

स्वतंत्रता के पश्चात उभरे जमीन, कृषि तथा मिल्कियत से उभरे श्रमिकों के बीच असंतोष ने उन्हें संगठित होने का मौका दिया। उस समय चीन में कम्युनिस्ट क्रांति हो चुकी थी। जिसका भारत के कम्युनिस्ट विचारकों पर जबरदस्त प्रभाव पड़ा था। फलस्वरूप श्रमिक, खेतिहर तथा किसान कम्युनिस्टों के नेतृत्व में रैलियां, हड़तालों तथा प्रदर्शन जमींदारों तथा सरकार की वादा खिलाफी के विरोध में होने लगी थी। महिला आंदोलन स्वायत्त रूप से अपने पंख विभिन्न मुद्दों के बरक्स फैलाने लगा था जिसमें दहेज का विरोध, मूल्य वृद्धि का विरोध, बलात्कार विरोध, पर्यावरण आंदोलन, पर्यावरण आंदोलन, गर्भपात के अधिकार, कन्या भ्रूण हत्या आदि का विरोध शामिल हैं। समाज के कुछ जागरूक पुरुष वर्ग के द्वारा महिला आंदोलन तथा उनकी मांगों से संबंधित कानूनों को बनाने की वकालत भी की गई तथा कानून बनाए भी गए। किन्तु वह समाज में कितनी सख़्ती से लागू हुए यह हम सभी को पता है।

वर्तमान स्थिति

बीच-बीच में इन बातों पर भी ध्यान दिया जाता रहा कि महिलाओं की समस्याओं को महिलाओं के नजरिए से देखा जाना चाहिए। साथ ही महिलाओं को भी यह हक हो कि वे अपने अधिकारों पर ठोस निर्णय या तो स्वयं लें या सशक्त कानून बनाने की सिफारिश कर सकें। यह दौर महिलाओं की सामाजिक, राजनीतिक भागीदारी का भी था क्योंकि उनके पैरों को हिन्दू कोड बिल बनाकर डॉ. आंबेडकर के द्वारा मजबूत किया जा चुका था। महिलाओं ने चारों ओर से महिला अधिकारों की चेतना को बल देने की ठानी जिसमें अकादमिक रूप से सशक्त बनना, योजनाओं और जागरूकता क माध्यम से उन्हें सशक्त बनाना शामिल था। महिलाअध्ययन विभागों के द्वारा अकादमिक रूप से मजबूती मिल रही थी किंतु एक स्थान अभी भी पूरी तरह से भरा नहीं गया था। वह था महिलाओं का राजनीति में प्रवेश। राजनीतिक सशक्तिकरण की बात पर बल दिया जाना इसलिए आवश्यक है क्योंकि महिलाओं ने लगभग सभी क्षेत्रों में मजबूत स्थिति बनाने की शुरुआत कर दी है। पिछले कई दशकों से वैश्विक तथा राष्ट्रीय राजनीति में माहिलाओं की बेदख़ली कहीं न कहीं महिला अधिकारों के रास्ते में काँटे की तरह है जिसे 1994 में महिला आरक्षण विधेयक के रूप में वर्ष 2017 तक मसलन 20 वर्षों तक दबाकर रखा गया है। कभी इसे जातीय राजनीति के कारण रोकना पड़ा, कभी पुरुषवादी चिंताओं के कारण तो कभी तरह तरह के पूर्वाग्रहों के कारण कि महिला आरक्षण के आ जाने से पुरुषों का स्थान छीन लिया जाएगा। महिला आरक्षण का विरोध वर्तमान में दिल्ली की सड़कों से उत्तर-पूर्व के वैस राज्यों तक फ़ैल गया है जिन राज्यों को हम जेण्डर समान राज्य के रूप में चिन्हित करते थे। नागालैंड के एक नेता ने कहा कि ‘राजनीति में महिला आरक्षण भ्रष्टाचार को बढ़ावा देगा’[8] तमाम मीडिया मोगल के द्वारा फैलाया गया प्रोपेगेंडा हो कि महिला आरक्षण से कहीं ‘परिवारवाद’ को ही बढ़ावा न मिले’[9]। इन तरह-तरह की भ्रामक अफवाहों के कारण महिला आरक्षण को कानून बनाकर मजबूत करने में एक और बढ़ा सामने आ खड़ी होती है।

हम सभी जानते हैं कि भारत में महिलाओं को आधी आबादी का दर्जा प्राप्त है अर्थात पूरी जनसंख्या का आधा भाग हैं। ऐसी स्थिति में सभी वैसे स्थानों पर जो महिला और पुरुषों को बराबरी के आधार पर मिलनी चाहिए, उसमें हमारा कुछ प्रतिशत तो इसी नाते होना चाहिए कि हम भी भारत के लोकतंत्र में निर्णायक महत्व रखते हैं। सभी आँकड़े पुष्ट करते हैं कि राजनीति, शिक्षा, रोजगार आदि के क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति क्या है। हमारे ऊपर अंतर्राष्ट्रीय दबाव भी है कि देश में महिलाओं की स्थिति में सुधार हो। साथ ही महिलाएँ स्वयं ये महसूस कर रही हैं कि समानता के अधिकार में उनका हक है फिर भी महिला आरक्षण जैसे मुद्दे को जातीय-पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रहों की भेंट चढ़ा दी जाती है। समस्या तो तब पैदा होती है कि जातीय आरक्षण के आधार पर महिला आरक्षण भी हो जिससे महिला के सामने पुरुषवादी समाज एक महिला को खड़ा कर देता है। हमें हर हालत में सवर्ण महिला और दलित महिला की सोच से निकालना होगा वर्ना हम इसी तरह से मुद्दों से भटका दिए जायेंगे। यह सच है कि महिलाओं में भी शोषण के स्तर अलग-अलग जातियों में अलग-अलग होते हैं किन्तु हर महिला अपनी ही जाति में कहीं अधिक तो कहीं कम शोषित जरूर है। वैसे भी महिला आंदोलन वर्तमान में इतने खंडों में बंट चुका है कि पितृसत्तात्मक ताकतों को और भी मजबूती मिली है। और हमारी पूर्वाग्रह बाहरी मानसिकता कहीं यह मौका भी न खो दे क्योंकि किसी भी जाति और वर्ग की महिला का राजनीति में नेतृत्व का प्रतिशत आधी आबादी का प्रतिनिधित्व कर पाने में सक्षम नहीं है।

यही वजहें हैं कि डॉ. भीम राव आंबेडकर की कमी इस परिप्रेक्ष्य में बहुत खलती है जब उन्होंने हिन्दू कोड बिल बनाते वक्त सभी स्त्रियों के लिए सोचा था। उसे जाति और वर्ग में खंड-खंड नहीं किया था। क्योंकि वह महिला शोषण के केंद्र को अच्छी तरह से जानते थे कि परिवार में महिलाओं का द्वितीयक स्थिति में होना ही सबसे बड़ी समस्या है। जहाँ आज भी महिलाएँ नागरिकता के प्राथमिक पैरामीटर में नीचे हैं, आज तक वे घर की प्रमुख आय उपार्जक नहीं बन पाईं है, आज भी वे पुरुषों की पहचान को अपनी पहचान बनाकर घूमती हैं। वैवाहिक प्रतीकों को आज भी वही ढोती हैं, बलत्कृत हैं, दहेज की बली चढ़ रही हैं, कन्या समझकर मार दी जा रही हैं, एसिड डालकर पुरुषवाद की हीनग्रंथी का शिकार आज भी हैं। और दुख इस बात का है कि इसका स्तर समाज में गहरा होता जा रहा है और हम सभी महिलाएँ एक-दूसरे को समर्थन देने की जगह एक-दूसरे में उलझे हुए हैं। यहाँ पर पाकिस्तान का उदाहरण देना चाहूंगी जिस देश को हम महिला हिंसा के क्षेत्र में अग्रणी समझते हैं वहाँ ‘एसिड हमला’[10] पर 2012 में ही कानून बनाया जा चुका है। और उसपर कानून बनानेवाली सभी राजनीतिज्ञ महिलाएँ हैं जिन्होंने महिलाओं को मानव की नजर से पहले और दलित-सवर्ण के नजरिए से बाद में देखा। उनकी नजर में स्त्री हिंसा दलित और सवर्ण होने के कारण बाद में पुरुषों की ‘हीन ग्रंथी’ के कारण पहले होता है। यदि भारत में भी महिलाओं का राजनीति में प्रभुत्व बढ़ेगा तो सकारात्मक बदलाव ही आएगा। रही बात महिला आरक्षण के मिल जाने से परिवारवाद और भ्रष्टाचार बढ़ने की तो वर्तमान में क्या ये कम हो रहा है!

संदर्भ ग्रंथ:

1.बउआर,द सीमोन; अनु. खेतान,प्रभा, (2003),स्त्री उपेक्षिता,राजकमल प्रकाशन, नईदिल्ली

  1. अरोड़ा, सुधा,(2009) आम औरत जिंदा सवाल, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली

3.कुमार, राकेश, (2001), नारीवादी विमर्श, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा

4.कस्तवार, रेखा,(2006),स्त्री चिंतन की चुनौतियां, राजकमल प्रकाशन प्र.लि., नई दिल्ली

5.नेमा, डॉ. पी.पी. शर्मा, डॉ. के.के., मानवाधिकार सिद्धांत तथा व्यवहार, कालेज बुक डिपो, जयपुर

6.जोशी डॉ. गोपा, (2006), भारत में स्त्री असमानता एक विमर्श, हिन्दी माध्यम कार्यन्वय निदेशालय, दि.वि.वि., नई दिल्ली

7.ग्रीयर, जर्मेन, (अनु.) मधु. बी.जोशी, (2001),विद्रोही स्त्री, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

8.कुमार, राधा, (2002), स्त्री संघर्ष का इतिहास, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली

9.शुक्ला, प्रो. आशा, त्रिपाठी कुसुम, (2004), स्त्री संघर्ष के मुद्दे, स्त्री अध्ययन विभाग, बरकतुल्ला वि.वि., भोपाल

समाचार पत्र:

1.हिन्दुस्तान टाइम्स ई पेपर, 4 फरवरी 2017

2.बीबीसी हिन्दी, 17 फरवरी 2017

Documentry

Saving face, 2012, pakistan

  1. जोशी, गोपा, (2006),भारत में स्त्री असमानता, पृ.-48
  2. कस्तवार, रेखा, (2006), स्त्री चिंतन की चुनौतियां, पृ.-99
  3. कुमार, राधा(2002), स्त्री संघर्ष का इतिहास, पृ.-174
  4. वही, पृ.-108
  5. शुक्ला, प्रो. आशा, त्रिपाठी कुसुम, (2004),स्त्री संघर्ष के मुद्दे, पृ.-4
  6. वही, पृ.-6
  7. कुमार, राधा, (2002), स्त्री संघर्ष का इतिहास, पृ.-202
  8. हिन्दुस्तान टाइम्स ई पेपर, 4 फरवरी 2017
  9. बीबीसी हिन्दी, 17 फरवरी 2017
  10. ‘Saviing face, ducumentry, 2012, Pakistan

भूमंडलीकरण और स्त्रीविमर्श-पूजा तिवारी

0
two girl holding umbrella while walking beside graffiti
Photo by Nick Fewings on Unsplash

‘भूमंडलीकरण और स्त्रीविमर्श’

 पूजा तिवारी 
शोधार्थी
हिंदी विभाग
हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय

”स्त्री के अधिकारों की चर्चा करने पर पूछा जाता है कि वह किस राष्ट्र की नागरिक है? उसका धर्म, उसकी जाति, उसका सम्प्रदाय क्या है? इन सवालों का जवाब यह है कि नारीवाद को राष्ट्रीय सीमा में बंद नहीं किया जा सकता.”[1]

– प्रभा खेतान

प्रभा खेतान के उपरोक्त कथन से स्पष्ट है कि नारीवाद या स्त्री विमर्श किसी एक देश विशेष की पूँजी नहीं है बल्कि यह सम्पूर्ण विश्व की स्त्रियों की मुक्ति का दस्तावेज है. यह मुक्ति है पितृसत्तात्मक सोच से मुक्ति, परम्परा से मुक्ति और उस बने-बनाये ढांचे से मुक्ति जिसमें स्त्रियों को सदैव पुरुषों की दासी के रूप में देखा गया है.

भूमंडलीकरण बीसवीं शताब्दी की ऐसी घटना है जिसने समस्त विश्व को आर्थिक दृष्टिकोण प्रदान किया. प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक विमर्श यहाँ तक कि मनुष्य को भी आर्थिक दृष्टि से देखा जाने लगा. कह सकते हैं भूमंडलीकरण ने दुनिया को ‘अर्थ’ नामक चश्मा दिया जिससे सभी को यह विश्व बाज़ार जैसा दिखने लगा. इसी बीच भूमंडलीकरण के साथ-साथ ‘उदारीकरण’ और ‘निजीकरण’ की अवधारणा ने भी जन्म लिया. इस तिकड़ी ने विश्व के विभिन्न देशों के पारस्परिक सम्बन्ध को व्यापक रूप में प्रभावित किया. व्यापार और आर्थिक आदान-प्रदान ने संस्कृतियों, भाषाओँ, समाजों, कलाओं आदि के आदान-प्रदान का भी मार्ग प्रशस्त किया. किन्तु इस सत्य से मुंह नहीं फेरा जा सकता कि विकसित देशों की अपेक्षा भूमंडलीकरण से विकासशील देश अधिक प्रभावित हुए. इस प्रभाव के साथ विकासशील देशों में विकसित देशों की विचारधारा भी आयातित हुई.

तीन शब्द उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण आपस में जुड़कर आधुनिक समाज के प्रतीक ही बन बैठे हैं. किन्तु जिस आर्थिक सन्दर्भ में इन तीन शब्दों विशेषकर भूमंडलीकरण को देखा जाता है उससे भिन्न भी इसके कई आयाम हैं. 90 के दशकों में भूमंडलीकरण केवल ‘अर्थव्यवस्था’ का ही नहीं हुआ बल्कि विचारों, समाजों, साहित्यों और संस्कृतियों का भी हुआ. भूमंडलीकरण की प्रक्रिया विश्व के विभिन्न समाजों से रिसती परिवर्तित और विकसित सोच का परिणाम रही है. इस प्रक्रिया को विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न चरणों में विकसित होते हुए देखा है. वस्तुतः इसकी प्राचीनता ग्रीक और रोमन सभ्यताओं के दौरान व्यापार के लिए निर्मित ‘सिल्क रूट’ तक देखी जाती है. यह भूमंडलीकरण का प्रथम दौर था जिसमें एक-दूसरे देश को जानने की प्रक्रिया चल रही थी. दूसरा दौर, औद्योगीकरण और तकनीकी विकास का है. इस दौर में, विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियों की स्थापना और उनके स्थापित होते आपसी आर्थिक सम्बन्ध को देखा जा सकता है. तीसरा और समकालिक दौर ‘व्यक्तिगत भूमंडलीकरण’ का है जिसने विश्व के व्यक्ति विशेष के विचार को प्रभावित किया. इस चरण में मानव किसी एक स्थान, गाँव, शहर या देश या प्रदेश का नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व का हो गया और समस्त विश्व उसके लिए एक घर की तरह है. इस तरह ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा ने जन्म लिया. यह ‘ग्लोबल’ अब ‘लोकल’ हो गया और जो कुछ भी ‘लोकल’ था वह ‘ग्लोबल’ हो गया.

भूमंडलीकरण के सन्दर्भ में प्रभा खेतान का मानना है,”भूमंडलीकरण तो वह बिजली है जिससे आपका घर रौशन भी हो सकता है और आपके घर में आग भी लग सकती है.”[2] यह वाक्य भूमंडलीकरण के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों को दिखाता है. भूमंडलीकरण को किसी एक दृष्टिकोण विशेष से देखने पर उसके अन्य पक्षों से वंचित रह जाने की समस्या बनी रहती है. थॉमस फ्रीडमेन ने भूमंडलीकरण शब्द का स्पष्टीकरण करने के लिए ‘ल्क्सेस’ यानी कीमती गाड़ी और ‘ऑलिव ट्री’ अर्थात् परम्परा और उसके मूल्य की उपमा दी.[3] प्रत्येक व्यक्ति भूमंडलीकरण के दौर में ल्क्सेस यानी विलासिता चाहता है और विलासिता रुपी गाड़ी चलाने के लिए नये रास्ते बनाने के लिए परम्परा रुपी ऑलिव ट्री को काटना पड़ता है. इस परम्परा का त्याग ही भूमंडलीकरण की सबसे बड़ी विशिष्टता है.

भूमंडलीकरण ने स्त्री विमर्श को भी इसी परम्परा के त्याग का मार्ग दिखाया. 1960-70 के दौरान स्त्रियों को एक जुट करने के उद्देश्य से ‘सिस्टरहुड इज पावरफुल’ का नारा दिया गया. यह सिस्टरहुड की भावना भूमंडलीकरण के साथ-साथ बढ़कर ‘स्त्रीविमर्श’ का रूप लेती चली गयी. स्त्रियों के अस्तित्व या यों कहें पुरुष के साथ सहस्तित्व की अवधारणा की स्थापना करने वाला स्त्री विमर्श अब स्त्री की स्वतंत्र आर्थिक सत्ता की मांग करने लगा. हालाकि ममता कालिया का मानना है,”संसार में जब से स्त्री के जीवन और संघर्ष पर विचार प्रारभ हुआ, तब से नारी विमर्श आरम्भ हुआ.”[4] किन्तु विश्व के विभिन्न स्थानों पर स्त्री के हित में किये जा रहे आन्दोलनो ने विचारधारा के स्तर पर उतरकर धीरे-धीरे ‘स्त्री विमर्श’ का रूप बहुत बाद में धारण किया. स्त्री विमर्श की अवधारणा को रोहिणी अग्रवाल कुछ इस तरह से स्पष्ट करती हैं, ”हिंदी में विमर्श शब्द अंग्रेजी के discourse शब्द से आया है जिसका अर्थ है वर्ण्य विषय पर सुदीर्घ एवं गंभीर चिंतन. इस प्रकार स्त्री विमर्श का अर्थ है स्त्री को केंद्र में रखकर समाज, संस्कृति, परम्पराएँ और इतिहास का पुनरीक्षण करते हुए स्त्री की स्तिथि पर मानवीय दृष्टि से अनवरत विचार प्रक्रिया…स्त्री विमर्श स्त्री चेतना के प्रसार का आख्यान है.”[5]

स्त्री विमर्श का स्वरूप इस भूमंडलीकरण के दौर में काफी परिवर्तित हुआ है. जहाँ पहले यह स्त्री के अधिकारों, उसे एक मानव का दर्जा दिए जाने, उसे पुरुष के समान मानने के लक्ष्य को लेकर चल रहा था, वहीँ भूमंडलीकरण के विभिन्न चरणों से गुजरते हुए इसके उद्देश्यों में परवर्तन हुआ. संवैधानिक समानता के लक्ष्य को तो प्राप्त कर लिया गया किन्तु व्यवहारिक समानता से स्त्रियाँ अभी भी वंचित हैं. तसलीमा इस सम्बन्ध में लिखती हैं,” नारी वाद एक राजनीतिक थ्योरी और प्रेक्टिस है जो औरत को मुक्त करने के संग्राम में लिप्त है…नारीवाद की एक आसान संज्ञा है,”औरत भी इन्सान है’ यह बात जोर देकर कहना. ‘फेमेनिजम इज अ रेडिकल नोशन दैट विमेन आर ह्यूमन बीइंग.”[6]

नव उदारतावाद, उत्तर आधुनिकतावाद, अंतर्राष्ट्रीयकरण से बहु- राष्ट्रीयकरण की ओर बढ़ते समाज में स्त्रियों की स्तिथि में परिवर्तन तो हुआ है किन्तु यह अभी भी संतोषजनक स्तिथि तक नही पहुँच सका है. 1995 में स्त्रियों पर आयोजित पेइचिंग कॉन्फ्रेस में यूनिसेफ के निदेशक नालिन हाइज़र ने कहा कि दुनिया के 1.3 अरब लोग नितांत गरीब हैं. इसमें स्त्रियों की संख्या 70 प्रतिशत है. जबकि स्त्री दुनिया के कामकाज के घंटों में दो-तिहाई समय काम करती है. लेकिन दुनिया की आय से उसे केवल एक बटे दसवां भाग ही मिलता है. दुनिया की सारी संम्पत्ति के एक बटे दसवें भाग की ही वह मालकिन है.”[7] 10 वर्ष बाद यह तो कहा जा सकता है कि इन आंकड़ों में परिवर्तन हुआ है किन्तु यह परिवर्तन विश्व की आधी आबादी को उसके आधे हिस्से तक पहुँचाने में अभी भी सफल नही हो सका है. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्त्रियों की स्तिथि पर आधारित 2015 की रिपोर्ट के अध्ययन करने पर यह साफ़ पता चलता है कि अभी भी इस सन्दर्भ में बहुत सी खामियां और बहुत कुछ किया जाना बाकी है. तभी निर्धारित ‘मिलेनियम डेवलपमेंट गोल’ को प्राप्त किया जा सकता है. इस सर्वे आधारित रिपोर्ट के अनुसार अभी भी विश्व में औरतों की आमदनी पुरुषों से 24 प्रतिशत कम हैं जबकि औरतें पुरुषों से दो तिहाई अधिक काम करती हैं. उनके काम करने का क्षेत्र पुरुषों की अपेक्षा असंगठित है जिसके कारण उनको कोई नियमित आय भी नहीं प्राप्त होती. दूसरी ओर, यद्यपि विश्व की विभिन्न संसद में महिलाओं की भागीदारी 22 प्रतिशत तक पहुँच गयी है किन्तु यह एक तिहाई से अधिक कहीं भी नहीं है. स्पष्ट है, राजनीतिक निर्णय में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने से समाज कतरा रहा है. स्त्री शिक्षा का स्तर भी सुधरा है किन्तु अंतर अभी भी बाकी है. जहाँ युवाओं (स्त्री एवं पुरुष) की शिक्षा 1990 में 83 प्रतिशत थी वहीँ 2010 तक यह 89 प्रतिशत पहुँच चुकी है. किन्तु यह प्रश्न बार-बार उठता है कि यह अंतराल क्यों रह जा रहा है? वर्त्तमान स्त्री विमर्श ने इस अंतराल की तह में जाने और उसके लिए पर्याप्त विचार और चिंतन करने का मार्ग प्रशस्त किया है. और अनुराधा बेनिवाल के शब्दों में देखें तो पुरुष सबसे पहले सहूलियत प्राप्त करने का माहौल अपने लिए बनाता है इसलिए स्त्रियाँ सदैव पीछे रह जाती हैं.अनुराधा बेनीवाल के शब्दों में, ”सहूलियत के अनुसार सबसे पहले आदमी ढलता है, संस्कृति का बोझ औरतों को सौंपकर. फिर धीरे-धीरे महिलाएं भी बदलती हैं, लड़-झगड़कर.”[8]

वैश्वीकरण के स्त्री के सन्दर्भ में कुछ सकारात्मक तो कुछ नकारात्मक पक्ष नजर आते हैं. वैश्वीकरण ने भौतिकतावादी समाज का प्रचार किया. इस भौतिकतावादी समाज, ने स्त्री को वस्तु और बाज़ार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. स्त्री विमर्श स्त्री समता के जिस उद्देश्य को लेकर चला था वह अभी भी बना हुआ है क्योंकि समाज का स्वरूप तो बदला है किन्तु उसमें रहने वालों की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं हो सका है. स्त्रियों को लेकर अभी भी कहीं न कहीं भेदभाव की भावना काम कर रही है. यद्यपि भूमंडलीकरण ने स्त्रियों के लिये कई संभावनाओं के द्वार खोले हैं किन्तु इससे कई जोखिम भी बढ़ गये हैं. औरतों की तस्करी, किराये की कोख, बाज़ार की रौनक आदि के रूप में स्त्रियों का शोषण बढ़ रहा है. ‘सेक्स’ को लेकर समाज में जो खुलापन भूमंडलीकरण के कारण आया है उसने स्त्रियों को एक सेक्स का खिलौना बना दिया है. उसकी देह का इस्तेमाल पुरुषवादी मानसिकता वाला समाज तरह-तरह से कर रहा है.

वर्तमान स्त्री विमर्श समाजवादी, मार्क्सवादी और उग्र उन्मूलनवादी, उदारवादी और मनोविश्लेषणवादी स्त्री विमर्श आदि में बंटा हुआ है किन्तु सभी के मूल में एक उद्देश्य है और वह है स्त्री देह की मुक्ति. उसका उद्देश्य स्त्री को स्त्रीत्व से बाहर लाना है. उसे रूढ़ छवि से निकालना है. उसे अन्या के कलंक से उबारना है. वर्तमान स्त्री विमर्श का मूल स्वर प्रतिरोध का है. स्त्री विमर्श का उद्देश्य देह मुक्ति हो गया है. इस देह के कारण ही समस्त शुचिताएं और नैतिकताओं के ढकोसले बने हैं. किन्तु यह देह मुक्ति औरत को बाज़ार का शिकार बना देती है. बाज़ार की चकाचौंध में डूबी स्त्री आगे चलकर परित्यक्त किये जाने पर दोहरी सामाजिक और मानसिक प्रताड़ना झेलती हैं. इसका चित्रण लता शर्मा के उपन्यास ‘सही नाप के जूते’ में बहुत ही सटीक ढंग से किया गया है. स्त्री विमर्श का मूल उदेश्य स्त्री को ‘मेसोकिज्म’ (आत्म त्याग) की प्रवृत्ति से बाहर लाना है. वर्तमान स्त्री विमर्श इस देह के इस्तेमाल किये जाने से मुक्ति की मांग करता है. स्त्री अपनी देह की स्वामी है अतः उसे यह अधिकार होना ही चाहिए कि वह अपनी देह, अपनी कोख का प्रयोग किस तरह से करे. इसमें किसी का, किसी भी प्रकार का, हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है. इस सन्दर्भ में तसलीमा नसरीन का मत है,” स्त्री अपने शरीर में बच्चेदानी धारण करती है, लेकिन बच्चेदानी की स्वतंत्रता धारण नहीं करती. बच्चेदानी में संतान धारण करने या न करने की स्वतंत्रता स्त्री को नहीं है. स्त्री के लिए कहा जाता है ‘मातृत्व में ही स्त्री की सार्थकता है.’ स्त्री भी यही मानती है. एक झूठ को स्त्री ज़िन्दगी भर अपने अन्दर पाल कर जीती है.”[9]

किन्तु जिन समाजों ने स्त्री को अपनी कोख का इस्तेमाल करने की छूट दी, वहां भी किराये की कोख के रूप में स्त्री का बार-बार शोषण किया जाता है. जहाँ स्त्री को छूट मिली उसने अपने शरीर को अपनी मजबूरी में बेचना शुरू किया किन्तु वहां भी पुरुष दलाल के रूप में सामने आ खड़ा हुआ. हर जगह पुरुष किसी न किसी रूप में स्त्रियों के लिए रोड़ा बनकर खड़ा होता रहा है. अब प्रश्न यह उठता है कि देह मुक्ति प्राप्त हो जाने पर भी क्या स्त्री वास्तव में स्वतंत्र हो जायेगी ? इसका उत्तर देना बहुत कठिन नहीं है. जब तक पुरुषों को ‘पुरुषोचित मनोवृत्ति’ से बाहर नहीं लाया जाएगा तब तक किसी भी तरह से स्त्री विमर्श अपने अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता. शेक्सपियर ने पुरुष की प्रवृत्ति को भली-भांति समझते हुए कहा भी है,”मेन आर अप्रैल वेन दे वू, दिसम्बर वेन दे वेड’ (मुहब्बत के वक्त पुरुष अप्रैल की तरह तपता है और शादी के बाद दिसम्बर की तरह सर्द हो जाता है).”

स्त्री विमर्श अब ‘उत्तर स्त्रीवाद’ के चरण में प्रवेश कर चुका है. उत्तर स्त्रीवाद के दो ध्रुव् हैं पहला जहाँ स्त्री स्वतंत्र दिखती है और दूसरा जहाँ स्त्री अभी भी जमीनी समस्याओं से ही नही उबर पायी है. एक तरफ सम्भ्रांत वर्ग की महिलायें हैं जो शिक्षा प्राप्त कर आत्मनिर्भर हैं और दूसरी ओर हैं निम्न और दलित वर्ग की महिलाएं जिनके लिए चूल्हे-चौके की दुनिया से आगे कोई दुनिया नहीं है. ऐसे दौर में स्वतंत्रता के मानदंडों को प्राप्त करने वाली स्त्रियों ने लेखिकाओं, समाज सेविकाओं आदि के रूप में अन्य स्त्रियों को स्वतंत्र करने या यों कहें अपनी स्वतंत्रता के प्रति जागरूक करने का बीड़ा उठाया है. अपने लेखन से स्त्री को विमर्श तक पहुंचा दिया है और विमर्श से आगे वास्तविक स्वतंत्रता तक पहुँचाने के प्रयास में लगी हुई हैं. उदहारण के लिये :- यूरोपीय देशों में सीमोन द बोउआर, बैटी फ्राइडेन, वर्जिनिया वोल्फ, रेबेका वेस्ट, डेलस्पेंडर, एलिज़ाबेथ फिशर, शुलमिथ फायस्टोन, नैंसी चोदोरोव, इरिगरे, सिक्सू, जूलिया क्रिस्टोवा, जर्मन ग्रीयर, ग्लोरिया स्टाईनेम, मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट आदि भारत में राजा राममोहन राय, विद्यासागर, महर्षि कर्वे, स्वामी दयानान्द सरस्वती, ज्योतिबा फूले, पेरियार, बाबा साहेब अम्बेडकर, सरोजिनी नायडू, हंस मेहता, राजकुमारी अमृत कौर, कमलादेवी चट्टोपाध्याय आदि के प्रयास उल्लेखनीय हैं. सूर्यबाला, चन्द्रकान्ता, प्रभा खेतान, मंजुल भगत, राजी सेठ, मैत्रेयी पुष्पा, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, मन्नू भंडारी, दीप्ति खंडेलवाल, शिवानी, निरुपमा सेवती, मेहरुन्निसा परवेज़, आनामिका, राजेंद्र यादव, उषा प्रियंवदा, मंजुला भगत, नीलिमा सिंह, मृणाल पाण्डेय, कात्यायनी, क्षमा शर्मा, जया जादवानी, अलका सरावगी, गगन गिल आदि हिंदी की लेखिकाएं अपनी रचनाओं के माध्यम से स्त्री विमर्श की परम्परा को नये सन्दर्भों के साथ निरंतर आगे बढ़ा रही हैं. आनामिका स्त्री विमर्श के व्यापक होते पटल के संदर्भ में लिखती हैं,”आधुनिक विमर्शों पर मुख्य अभियोग यह है कि ये प्रत्याख्यान्मूलक हैं, पलटकर जवाब देते हैं, विचार या मेटानैरेटिव्स या वैचारिक आग्रहों या दूसरे बने-बनाये खांचों से भी अपना पल्ला ये झाड़ चुके हैं….बारिश-तूफ़ान में दोनों हांथों से ‘अस्मिता’ की छतरी ताने खड़ा हर ‘विमर्श’ सड़क के उस पार होने की कोशिश तो कर ही रहा है, कोशिश तो कर ही रहा है छतरी का घेरा बड़ा करने की.”[10]

भूमंडलीकरण के दौर का स्त्री विमर्श स्त्री के साथ-साथ समलैंगिकता, एकल अभिभावक, अविवाहित स्त्री, सहवासी समाज (लिव इन रिलेशन), आदि मुद्दों पर विचार कर रहा है. नव नारीवाद ‘बुद्धि के लिंग’ जैसी किसी अवधारणा में विश्वास नही करता. भूमंडलीकरण ने निश्चय ही स्त्री विमर्श और स्त्री लेखन की दिशा और दशा को बदला है. वर्त्तमान स्त्री विमर्श फ्रायड की मान्यता है कि ‘पुरुष को अपने मातृत्वबोध से अलग होकर कड़ा स्वाभाव बनाना होता है जबकि स्त्रियों को ऐसा नहीं करना पड़ता’ का विरोध करता है. देरिदा के संरचनावाद और लाका के मनोविश्लेषणवाद को आधार बानकर यह स्वीकार करता है कि स्त्रियों की स्थिति के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी उनकी भाषा है जो पितृसत्ता द्वरा गढ़ी गयी है अतः स्त्रियों को अपनी मुक्ति के लिए अपनी भाषा स्वयं गढ़नी चाहिए. तात्पर्य यह है कि वर्तमान स्त्री विमर्श केवल संभ्रांत स्त्रियों का विमर्श नहीं है बल्कि यह हर वर्ग, जाति और क्षेत्र की स्त्री का संघर्ष है जिसके लिए प्रयास का स्तर भले ही अलग-अलग हो सकता है किन्तु उसके उद्देश्य सभी जगह एक ही हैं. स्त्री को समाज के प्रतिरोध के लिए स्वयं अपनी भाषा गढ़नी चाहिए न कि पुरुषों द्वारा निर्धारित भाषा का प्रयोग करना चाहिए.

स्त्री विमर्श के लिए धर्म अभी भी रोड़ा बना हुआ है. यद्यपि समाज ‘नैनोटेक्नोलोजी’ के युग में जी रहा है और उसका निरंतर उपयोग भी कर रहा है किन्तु धर्म के सन्दर्भ में उसकी सोच अभी भी पुरातनपंथी ही है जिसके कारण वह अपनी दुरुह्ताओं को नहीं त्याग नहीं पा रहा है. कुरान, हिन्दू धर्म के ग्रन्थ आदि में आस्था और स्त्री उद्धार की बात साथ-साथ नहीं चल पा रही है. क्योंकि ये धर्म स्त्री को बार-बार संयमित और पुरुष के अधीन होने का निर्देश देते हैं जो स्त्री विमर्श के विरुद्ध है. उदहारण के लिए कुरान का सूरा : बकर, आयत : 223 में स्त्री को उसके पति द्वारा चरने वाला अनाज कहा गया है. हिन्दू धर्म के आपस्तम्ब धर्म सूत्र, ऐतरेय ब्राह्मण, तैतरीय ब्राह्मण सभी में स्त्रियों के उत्तरदायित्व गिनाये गये हैं जिसमें से सर्वोपरि है पति की इच्छाओं की तुष्टि और उसकी आज्ञा का पालन करना. यह उत्तरदायित्व गिनाना या नियमों का व्याख्यान केवल स्त्रियों के सन्दर्भ में ही है. यह समाज की बर्बरता का प्रतीक है जो स्त्री को मानव न मानकर उसे गुलाम की श्रेणी में रखना चाहता है और आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग करने से भी नहीं कतराता. कब उसे देवी के स्तर पर बैठा दिया जाय और कब पैरों की जूती घोषित कर दिया जाय, यह अवसर और जरूरत पर निर्भर करता है. इसी कारण ममता कालिया मानती हैं, ‘वर्त्तमान समय प्रागैतिहासिक काल से भी ज्यादा पिछड़ा तथा स्त्री के प्रति आक्रामक है.’[11] समाज की बर्बरता और स्त्री विमर्श के बदलते पहलुओं को सुधा अरोड़ा की कहानी ‘रहोगी तुम वही’, चित्रा मुद्गल के उपन्यास ‘आंवा’, नासिरा शर्मा की कहानियों ‘कुंइया जान’, ‘सरहद के इस पार’, ‘तारीखी सनद’, प्रभा खेतान की कहानी ‘छिन्नमस्ता’, मैत्रेयी पुष्पा की ‘फैसला’ कहानी और ‘चाक’ उपन्यास आदि स्त्री रचनाकारों की रचनाओं में देखा जा सकता है. हालाकि स्त्री विमर्श के सन्दर्भ में बहुत से पुरुष रचनाकारों और विचारकों जिनमें जॉन स्टुअर्ट मिल और राजेन्द्र यादव का नाम लिया जा सकता है, लेखन किया है किन्तु स्त्री समस्या का वास्तविक धरातल स्त्री लेखिकाओं की रचनाओं में ही महसूस किया जा सकता है. इसका कारण शायद यही है कि स्त्री इस त्रासदी की स्वयं भोक्ता रही है. और इस सन्दर्भ में हम सीमोन द बोउआर का वह कथन कैसे भूल सकते हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘अब तक लिखे गये सम्पूर्ण साहित्य पर शक किया जाना चाहिए क्योंकि लेखक और निर्णायक दोनों पुरुष ही है.’

यद्यपि वैश्वीकरण ने स्त्री समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया है किन्तु स्थानीय समस्याओं से स्थानीय तरीके से ही निपटा जा सकता है. उनका समाधान किसी अन्य देश से आयातित सोच के आधार पर नहीं किया जा सकता है. वस्तुतः कह सकते हैं कि स्त्री विमर्श को सही रूप में केवल स्त्रियाँ ही प्रस्तुत कर सकती हैं क्योंकि वे उस समस्या की स्वयं भोग्या हैं. किन्तु इसके लिए उन्हें किसी एकांगी दृष्टिकोण से बचकर चलना होगा. इसी सन्दर्भ में अनामिका का मत है,”विचारों का, श्रम का, रिवायतों का और पूँजी का विश्वायन अपने आप में अमंगलकारी नहीं ! अमंगलकारी है इसकी एक ध्रुवीय, एकांगी, एक पक्षीय प्रवृत्ति.”[12]. इस एक पक्षीयता से बचते बचाते स्त्री को अपने को बहुआयामी बनाना होगा. उसे अपने बीच से ही उन महान व्यक्तित्व को सामने लाना होगा जो पुरुषों के बीच से अब तक आते रहे हैं. तभी जाकर स्त्रियों की मानसिक प्रतिभा से भी यह संसार परिचित होगा जो अब तक इस भ्रम में रहा है कि केवल पुरुष ही अच्छा सोच और लिख सकता है. डॉ. सुधा बालाकृष्णन के अनुसार, ”स्त्री को अब जागरूक और व्यावहारिक होना ही है. श्रद्धा बनकर विश्वास रजत पग तल में बहते रहने से कुछ होने वाला नहीं है. अतः उसे श्रद्धा से इड़ा बनना है. अपनी व्यथा को गोपनीयता से नहीं खुल कर व्यक्त करना है. अथ अन्ना केरेनिना और शकुन्तला की व्यथा कथा टालस्टॉय या कालिदास नहीं स्वयं अन्ना और शकुन्तला को लिखनी है.”[13] यह स्त्री जीवन की विडंबना ही तो है कि वह मानव की श्रेणी में न होकर विमर्श के दायरे में फंसी है. वस्तुतः ज़रुरत तो अब यह आ पहुंची है कि स्त्री अब विमर्श के खांचे से बाहर आकर स्वयं अन्य विमर्शों के सम्बन्ध में निर्णय करे. इसी मंशा को नीलेश रघुवंशी अपनी कविता स्त्री विमर्श में कुछ इस तरह व्यक्त करती हैं,” मिल जानी चाहिये अब मुक्ति स्त्रियों को/ आखिर कब तक विमर्श में रहेगी मुक्ति?’

सन्दर्भ सूची

पुस्तकें

  • प्रभा खेतान : बाज़ार के बीच और बाज़ार के खिलाफ (भूमंडलीकरण और स्त्री प्रश्न), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली : 2004.
  • ममता कालिया : भविष्य का स्त्री विमर्श, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2015.
  • मैत्रेयी पुष्पा : सुनों मालिक सुनो, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2006.
  • रोहिणी अग्रवाल : साहित्य की ज़मीन और स्त्री मन के उच्छ्वास, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2014.
  • डॉ. सुधा बालकृष्णन : नारी अस्तित्व की पहचान, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2013.
  • मन्मथनाथ गुप्त: स्त्री पुरुष संबंधों का रोमांचकारी इतिहास, वाणी प्रकाशन :नई दिल्ली, 2005.
  • प्रभा खेतान : स्त्री उपेक्षिता, हिंदी पॉकेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड : नई दिल्ली, 2002.
  • अनामिका : स्त्री विमर्श के लोकपक्ष, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2012.
  • तसलीमा नसरीन : औरत का कोई देश नहीं, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2009.
  • तसलीमा नसरीन : औरत के हक़ में, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 19 वां संस्करण, 2008.
  • अनुराधा बेनीवाल : आजादी मेरा ब्रांड, राजकमल प्रकाशन : नई दिल्ली, 2016.
  • प्रभा खेतान : उपनिवेश में स्त्री : मुक्ति कामना की दस वार्ताएं, राजकमल प्रकाशन : नई दिल्ली, 2003.
  • पत्रिकाएं :-
  • हंस, सम्पादक – राजेन्द्र यादव, वर्ष 24, अंक-4, अक्षर प्रकाशन : नयी दिल्ली, नवम्बर 2009.
  • हंस, संपादक – राजेन्द्र यादव, वर्ष 14, अंक 6-7, अक्षर प्रकाशन :नई दिल्ली, जनवरी-फ़रवरी 2000

अंतर्जालिक स्त्रोत :

  • http://www.unwomen.org/en/digital-library/publications/2016/2/gender-chart-2015
  1. प्रभा खेतान : उपनिवेश में स्त्री :मुक्ति कामना की दस वार्ताएं, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003.

  2. प्रभा खेतान : बाजार के बीच बाज़ार के खिलाफ़, पृष्ठ-24.

  3. प्रभा खेतान : बाजार के बीच बाज़ार के खिलाफ़, पृष्ठ-14

  4. ममता कालिया : भविष्य का स्त्री विमर्श, वाणी प्रकशन :नई दिल्ली, संस्करण :2015, पृष्ठ -7.

  5. रोहिणी अग्रवाल : साहित्य की जमीन और स्त्री मन के उच्छ्वास, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2014, पृष्ठ – 11.

  6. तसलीमा नसरीन : औरत का कोई देश नहीं : वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2009, पृष्ठ -94.

  7. प्रभा खेतान :बाजार के बीच बाज़ार के खिलाफ़ पृष्ठ-50

  8. अनुराधा बेनीवाल : आजादी मेरा ब्रांड, राजकमल प्रकाशन :नई दिल्ली, 2016, पृष्ठ-177.

  9. तसलीमा नसरीन :औरत के हक़ में, वाणी प्रकाशन :नई दिल्ली : 19 वां संस्करण, 2008, पृष्ठ-191.

  10. अनामिका : स्त्री विमर्श के लोकपक्ष, वाणी प्रकाशन :नई दिल्ली, 2012, पृष्ठ-22.

  11. ममता कालिया : भविष्य का स्त्री विमर्श, वाणी प्रकशन :नई दिल्ली, संस्करण :2015, पृष्ठ- 10

  12. अनामिका : स्त्री विमर्श के लोकपक्ष, वाणी प्रकाशन :नई दिल्ली, 2012, पृष्ठ -18.

  13. डॉ सुधा बालाकृष्णन: नारी : अस्तित्व की पहचान, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2013, भूमिका.

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका-सुबोध कुमार गुप्ता

0
2 people riding horses on brown sand during daytime
Photo by FRAMEFABLE on Unsplash

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका

सुबोध कुमार गुप्ता
शोधार्थी
इतिहास विभाग 
टी.एम. भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर
इमेल- mr.subodhkumar2012@gmail.com
मोबाईल- 9939743304

आजादी की लड़ाई में महिलाओं ने न सिर्फ अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया बल्कि क्रांति की जो आग लगाई उसी से घबड़ाकर अंग्रेजों ने अपने कदम पीछे हटाए.

इतिहास के पन्नो को पलटते हुए ज्यों-ज्यों हम पीछे जायेंगे महिलाओं के साहस से भरी कई कहानियाँ हमारे देश के गौरव को बढ़ाती दिखाई दे जाएगी. भारतीय वीरांगनाओं का जिक्र किए बिना 1857 से 1947 तक की स्वाधीनता की दास्तान शायद अधूरी रह जाएगी. यह भारत की नारी ही थी जिन्होंने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए.

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी स्वतंत्रता आन्दोलन में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते है. उन्होंने परतंत्र भारत से आह्वाहन किया था कि देश को आज़ाद कराने के लिए माताएं, बहिने सामने आये.

हम इतिहास उठाकर देखें तो ज्ञात होता है कि स्वतंत्रता आन्दोलन की सुगबुगाहट सन् 1857 से पहले ही आरंभ हो चुकी थी. इस सुगबुगाहट को विचारों और कर्तव्यों से पुष्ट करने के उत्तर दायित्व को महिलाओं ने निभाया था. सर्वप्रथम स्वतंत्रता की जंग लड़ने वाली स्त्रियों में बेगम हजरत महल का नाम आता है. बेगम युद्ध क्षेत्र का दौरा हाथी पर सवार होकर करती जिससे अंग्रेज चिढ़ जाते. इनकी सेना का नाम भी मुक्तिसेना था जिसने अंग्रेजों की लखनऊ रेजीडेंसी को घेर लिया था. लखनऊ पर जब अंग्रेजों ने अपना अधिपत्य जमा लिया तो वे नेपाल से भी सेना संचालन करती रही. स्वतंत्रता की भावना उनके भीतर कैसी थी, बेगम हजरत की कविता से ज्ञात हो जाता है:-

साथ दुनिया ने न दिया न मुकद्दर ने दिया,

रहने जंगल ने कब दिया जो शहर ने न दिया,

एक तमन्ना थी कि आज़ाद वतन हो जाए,

जिसने जीने दिया न चैन से मरने न दिया,

जमीन से आग बुझाने ये घटा उमड़ी थी,

हाँ, मगर उल्टी हवाओं ने ठहरने न दिया,

बिखर चला वो काफिला मकामें बौडी से,

चाल दुश्मन की कुछ ऐसी कि उभरने न दिया,

जुल्म की आंधियाँ बढ़ती रही लम्हा-लम्हा,

फिर भी परचम को आसमा से उतरने न दिया.

इतिहास में और पीछे चले तो एक और नाम सुनने को मिलेगा, वह नाम है वर्ष 1824 में फिरंगियों भारत छोड़ों का बिगुल बजाने वाली कित्तूर (कर्नाटक) की रानी चेनम्मा का.

जिन्होंने रणचंडी का रूप घरकर अपने अदम्य साहस व फौलादी संकल्प की बदौलत अंग्रेजी से छक्के छुड़ा दिए.

रायगढ़ की रानी अवंती बाई ने अंग्रेजों की नीतियों से चिढ़कर उनके विरुद्ध संघर्ष का ऐलान कर दिया और मंडला के खेटी गाँव में मोर्चा जमाया. उन्होंने अंग्रेज सेनापति वार्टर के घोड़े के दो टुकड़े कर दिए और उसके वो छक्के छुड़ाए कि वार्टर रानी के पैरों पर गिरकर प्राणों की भीख मांगने लगा.

रानी ने उसे माफ़ तो किया पर फिर उसी के हाथों धोखा खा गई. फिर उन्होंने जंगलों में रहते हुए सैन्य संचालन किया. जब ऐसा लगा कि अब तो अंग्रेजों की विशाल सेना से समक्ष समर्पण करना ही होगा. तो उन्होंने समर्पण करने के बजाय तलवार अपने सीने में उतार ली और प्राणोंत्सर्ग किए.

वीरांगनाओं की सूची को आगे बढ़ाये तो मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफ़र की बेगम जीनत महल का नाम भी सामने आएगा जिन्होंने दिल्ली और आस-पास के क्षेत्रों में योद्धाओं को संगठित किया और देश प्रेम का परिचय दिया.

“खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी|” अस्त्र-शस्त्र चलाने में माहिर रानी लक्ष्मी बाई नाना साहेब और तात्या टोपे के कुशल निर्देशन में साहसी रानी की परवरिश हुई थी.

“मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी” एस कथन का उद्धोष करने वाली रानी लक्ष्मी बाई ने अंग्रेजों की जमकर खबर ली थी. झाँसी का नेतृत्व करते हुए रानी लक्ष्मी बाई तमाम विपरीत परिस्थितियों के होते हुए भी कर्तव्य पथ से विमुख नहीं हुई. अपने छोटे से पुत्र को पीठ पर बाँधकर एक हाथ से घोड़े की रास संभाले तथा एक हाथ से तलवार भांजती रानी की तस्वीर आँख के सामने उभर जाती है. रानी को केवल अंग्रेजों का ही नहीं अपने ही भू-भाग के अन्य राजाओं का भी विरोध झेलना पड़ा था जो अंग्रेजों से मिले हुए थे या जिनकी झाँसी पर नजर थी. रानी लक्ष्मी बाई ने महिलाओं की एक अलग टुकड़ी- “दुर्गा दल” बनायी हुई थी. इसका नेतृत्व कुश्ती, घुड़सवारी और धनुर्विधा में माहिर झलकारी बाई के हाथों में था. झलकारी बाई ने कसम उठायी थी, कि जब तक झाँसी स्वतंत्र नहीं होगी, न ही मैं श्रृंगार करुँगी और न ही सिंदूर लगाऊँगी. अंग्रेजों ने जब झाँसी का किला घेरा तो झलकारी बाई जोशो-खरोश से साथ लड़ी. चूँकि उसका चेहरा और कद-काठी रानी लक्ष्मी बाई से काफी मिलता जुलता था, सो जब उसने रानी लक्ष्मी बाई को घिरते देखी तो उन्हें महल से बाहर निकल जाने को कही और स्वयं घायल सिंहनी की तरह अंग्रेजों पर टूट पड़ी और शहीद हो गई. कानपुर 1857 की क्रांति का प्रमुख गवाह रहा है. पेशे से तवायफ अजीजन बाई ने यहाँ क्रांतिकारियों की संगत में 1857 की क्रांति में लौ जलाई. 01 जून 1857 को जब कानपुर में नाना-साहेब ने नेतृत्व में तात्या टोपे, अजीमुल्लाह खान, बाला साहेब, सूबेदार टीका सिंह और शमसुद्दीन खान क्रांति की योजना बना रहे थे, तो उनके साथ उस बैठक में अजीजन बाई भी थी. इन क्रांतिकारियों की प्रेरणा से अजीजन ने मस्तानी टोली के नाम से 400 महिलाओं की एक टोली बनाई जो मर्दाना भेष में रहती थी. बिठुर के युद्ध में पराजित होने पर नाना साहेब और तात्या टोपे तो पलायन कर गए लेकिन अजीजन पकड़ी गई. युद्ध बंदी के रूप में उसे जनरल हैवलॉक के समक्ष पेश किया गया. जनरल हैवलॉक उसके सौन्दर्य पर रीझे हुए बिना न रह सका और प्रस्ताव रखा कि यदि वह क्षमा माँग ले तो उसे माफ़ कर दिया जायेगा. किन्तु अजीजन ने प्रस्ताव ठुकरा दिया और पलट कर कही कि माफ़ी तो अंग्रेजों को माँगनी चाहिए, जिन्होंने इतने जुल्म ढाये. इतने पर आग बबूला हो हैवलॉक ने अजीजन को गोली मारने के आदेश दे दिए. क्षणभर में अजीजन को गोली मार दी गई. कानपुर के स्वाधीनता संग्राम में मस्तानी बाई की भूमिका भी कम नही है. सौंदर्य कि मल्लिका मस्तानी बाई अंग्रेजों का मनोरंजन करने के बहाने उनसे ख़ुफ़िया जानकारी हासिल करती थी.

यह भी कम ही लोगो को पता होगा कि बैरकपुर में मंगल पाण्डेय को चर्बी वाले कारतूसों के बारे में सर्वप्रथम मातादीन ने बताया और मातादीन को इसकी जानकारी उसकी पत्नी लज्जों ने दी. लज्जों अंग्रेज अफसरों के यहाँ काम करती थी, जहाँ उसे यह सुराग मिला कि अंग्रेज गाय की चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने जा रहे है. इतना ही अगर यह कहा जाए कि 1857 की जंग की चिंगारी भड़काने और उसे हवा देने का काम नारीशक्ति ने किया तो यह भी अतिश्योक्ति नहीं होगी.

ऐसी ही वीरांगना ऊदा देवी थी, जिन्होंने पीपल के घने पेड़ पर छिपकर लगभग 32 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया. अंग्रेज असमंजस में पड़ गए और जब हल-चल होने पर कैप्टन वेल्स ने पेड़ पर गोली चलायी तो ऊपर से एक मानवाकृति गिरी. नीचे गिरने से उसकी लाल जैकट का उपरी हिस्सा खुल गया, जिससे पता चला कि वह महिला है. उस महिला का साहस देख कैप्टन वेल्स की आँखे नम हो गई, तब उसने कहा कि यदि मुझे पता होता कि वह महिला है तो मैं कभी गोली नहीं चलाता. नाना साहेब की पुत्री नैना देवी के त्याग को भला कौन विस्मृत कर सकता है? मैना को क्रांति का एक महत्वपूर्ण कार्य सौपा गया था. एक दिन मैना अंग्रेजों के द्वारा पकड़ ली गई. उसे बहुत प्रताड़ना दी गई वह अपने साथियों के नाम बता दें. किन्तु मैना देवी ने नहीं बताया. परिणामतः मैना देवी को अंग्रेजों ने जिन्दा जला डाला था. ऐसी कितनी वीरांगनाएँ है जिनका नाम तक इतिहास को पता नहीं है, पर इन सब लोगों ने अपना मूक त्याग किया है. इतना ही नहीं, अपरोक्ष रूप से अपने कपड़े जेवर आदि के द्वारा सिपाहियों को सहयोग देने वाली स्त्रियों को तो हम नामवार जानते भी नहीं है. खाना, कपड़ा देना ही नहीं सैनिकों के लिए कपड़े सिलना, बुनना भी एक महत्वपूर्ण प्राथमिक कार्य था जिसे महिलाओं ने देश की आजादी के लिए किया.

इतिहास गवाह है कि महिलाओं ने समय-समय पर अपनी बहादुरी और साहस का प्रयोग कर पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चली है, आजादी की लड़ाई में जो महिलाएं बढ़-चढ़ कर हिस्सा ली है उसमें सावित्री बाई फूले, दुर्गा बाई देशमुख, अरुणा आसफ अली, सुचेता क्रिपलानी, विजय लक्ष्मी पंडित, कमला नेहरु, सरोजनी नायडी, कस्तूरबा गाँधी, मैडम भिकाजी कामा, एनी बेसेंट, डॉ० लक्ष्मी सेहगल के नाम को भुला नहीं जा सकता.

गाँधी की आजीवन संगिनी कस्तूरबा की पहचान सिर्फ यह नहीं थी, आजादी की लड़ाई में उन्होंने हर कदम पर अपने पति का साथ दी थी. आजादी की लड़ाई में पर्दें के पीछे रहकर सराहनीय कार्य की. कस्तूरबा गाँधी तथा कमला नेहरु के संघर्ष भी तो बेहद महत्वपूर्ण थे. इनका त्याग मूक था. इंदिरा गाँधी ने जब अंग्रेजों के विरुद्ध लोहा लेना चाही तो उनकी टोलको वानर सेना का नाम दिया गया जो विदेशी कपड़ो की होली जलने में सहयोगी सिद्ध हुई.

इतिहास के पन्नो में न जाने ऐसी कितनी दास्तान है, जहाँ वीरांगनाओं ने अपने साहस और जीवटता के दम पर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए. 1857 की ग़दर में भारतीय महिलाओं में गजब की देश भक्ति देखने को मिली. अंग्रेजों की गुलामी से देश को आजाद कराने में न जाने कितने महिलाओं ने जान की बजी लगा दी अपना लहू बहायी और शहीद हो गई.

आजादी के 69 वर्षों के बाद भी भारतीयों के दिलों में उन वीरांगनाओं के लिए इज्जत कम नहीं हुई है, जिन्होंने भारत को आजाद करवाने में अहम भूमिका निभाई थी इन वीरांगनाओं से जुडी सम्मान, साहस और देशभक्ति की कहानियाँ आज भी हमारी आँखों को नम कर देती है.

बौद्ध धर्म और थेरी गाथाएँ –स्त्री मुक्ति का युगांतकारी दस्तावेज़: डॉ हर्ष बाला शर्मा

0
Buddha statue
Photo by olaf scheffers on Unsplash

बौद्ध धर्म और थेरी गाथाएँ –स्त्री मुक्ति का युगांतकारी दस्तावेज़

डॉ हर्ष बाला शर्मा 
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर(वरिष्ठ प्रवक्ता)
इन्द्रप्रस्थ कॉलेज 
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

यह आलेख थेरी कही जाने वाली स्त्रियों द्वारा गाए गए गीतों (जिनकी भाषा मूलत: पालि है) के भीतर छिपे उनके साहस और उनकी अन्तर-वेदना की खोज प्रस्तावित करता है. प्राय: प्राचीन भारत के सन्दर्भ में गार्गी, अहल्या और लोमशा के जिक्र के पश्चात स्त्रियों के स्वर विशेषकर साहसी स्वर की चर्चा नहीं मिलती| यहाँ भाषा के स्तर पर भी एक परिवर्तन दृष्टव्य है| जब तक संस्कृत उच्च वर्ग की भाषा के रूप में स्थापित रहती है तब तक स्त्री तथा अन्य वर्णों का प्रवेश उस भाषा के भीतर नहीं होता ज्यों-ज्यों भाषा वैदिक रूप से लौकिक रूप की ओर अग्रसर होती है त्यों त्यों स्त्री तथा अन्य वर्णों के रचनाकार भाषिक संसार में प्रवेश करते दिखाई देते हैं| थेरी गाथाओं के अंतर्गत 73 थेरियों द्वारा गाए गए गीतों का संग्रह है जिसमें ब्राह्मण से लेकर निम्नतम वर्ण की स्त्रियों के उदाहरण हैं| कुछ कष्टों से घबराकर, कुछ परिवार द्वारा जबरन तो कुछ समस्त सुखों को छोड़कर स्वयं अपनी इच्छा से संघ में दीक्षित हुईं| कभी इन स्त्रियों की उपस्थिति को अवांछनीय माना गया तो कभी चमत्कारी! परन्तु ये स्त्रियाँ समस्त आलोचना सहकर भी संघ को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुईं|

यहाँ कई प्रश्न एक साथ उत्पन्न होते हैं—-

प्रथम यह कि क्या ये स्त्रियाँ सचमुच शिक्षित थी जो अपनी बात को लेखन में अभिव्यक्त कर सकीं?

यदि नहीं तो थेरी गाथाओं का संकलन किसके द्वारा किया गया? यदि हाँ तो शिक्षित समाज में स्त्रियों के संघ में प्रवेश को लेकर किस प्रकार की प्रतिक्रिया हुई?

महात्मा बुद्ध स्वयं स्त्रियों के संघ में प्रवेश को लेकर सहज नहीं थे, ऐसे में हम सब जानते हैं कि आनंद द्वारा बुद्ध से इस प्रवेश की अनुमति ली गई. फिर इतना साहस इन स्त्रियों के भीतर किस प्रकार मिलता है कि वे अपनी बात को न केवल सुस्पष्ट शब्दों में कह सकीं बल्कि अर्हत बनने की योग्यता भी हासिल कर सकीं?

80 ई.पू. त्रिपिटक में इसका लिखित रूप मिलता है. क्या उससे पूर्व ये गीत मौखिक साहित्य में प्रचलित रहे होंगें? मौखिक साहित्य के रूप में उपलब्ध ये गीत क्या सचमुच इन स्त्रियों के लिए समय काटने का साधन रहे होंगे अथवा जैसा कि ये थेरियाँ बार-बार कहती हैं— सुमुत्तिका सुमुत्तिका साधु मुत्तिकाम्हि तो क्या वे वास्तव में मुक्ति के स्वरूप को पहचान चुकी थीं|

थेरी गाथाओं के भीतर समाज, परिवार, दास प्रथा, वेश्यावृत्ति से लेकर समपूर्ण सामाजिक- आर्थिक प्रणाली को देखने की जिन दृष्टियों का विकास किया गया है, उनका इस प्रपत्र में अध्ययन किया गया है| लगभग 73 थेरियों के 522 गीतों के भीतर की दुनिया में प्रवेश करने का यह एक छोटा सा प्रयास है जिसमें थेरियों के माध्यम से उस समय की सामाजिक संरचना को समझा जाएगा, साथ ही संघ के प्रति थेरियों के दृष्टिकोण को भी समझने की कोशिश होगी क्योंकि आश्चर्यजनक रूप से इन स्त्रियों ने जिस संघ को मुक्ति के दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया, आवश्यकता पड़ने पर उस संघ की भी आलोचना करने से भी उन्होंने परहेज नहीं किया|

इस साहस की और संघर्ष की उस यात्रा को मैं रेखांकित करना चाहती हूँ जिसने आने वाले युग में स्त्रियों को रचने और सोच का साहस प्रदान किया| यह भी रेखांकित करने की आवश्यकता है कि समस्त साहस पाश्चात्य शास्त्र से ही प्राप्त नहीं होता, थेरी स्त्रियाँ भारत की स्त्रियों के प्रयास और दमघोटूं वातावरण से निकलने के प्रयास की भी प्रतीक हैं जिन्हें रेखांकित किया जाना चाहिए|

की-वर्ड्स –थेरी-गाथा, थेरियाँ, गीत, संघ, मुक्ति, हिन्दी भाषा, पाली साहित्य, सामाजिक मुक्ति, साहस,प्रतीकात्मकता, त्रिपिटक

आलेख

किसी भी काल को समझने के लिए दो दृष्टियाँ सहायक होती हैं—एक जो उस काल और परिस्थिति से उपजी हैं और दूसरी जो लम्बे संघर्ष के दौरान निर्मित हुई है. दोनों की दृष्टियों की अपनी सीमाएं और संभावनाएं हैं परन्तु इन दोनों को मिलाजुला कर इतिहास ही एक समझ तैयार की जा सकती है|

स्त्री मुक्ति और अभिव्यक्ति की चर्चा सर्वप्रथम थेरी गाथाओं में मिलती है| महात्मा बुद्ध की इच्छा न होने पर भी आनन्द द्वारा बल दिए जानेके कारण इन स्त्रियों को संघ में प्रवेश प्राप्त हो सका| इसकी रचना को लेकर भी इतिहासकारों में मत-मतांतर है| न्यूमेन का मनना है कि थेरी गाथाओं की रचना स्त्री समाज द्वारा नहीं बल्कि पुरुषों द्वारा की गई है! बाद में कैथरीन ब्लैक स्टोन ने सिद्ध किया कि ये रचनाएँ स्त्रियों की है| क्षमा शर्मा ‘औरतें और औरतें’ नामक पुस्तक में लिखती हैं—“स्त्रियों को जब-जब अपनी बात कहने का मौका मिला है, उसने पूरी निडरता और साहस से अपनी बात को रखा है. भिक्षुणियों द्वारा ढाई हजार साल पहले लिखी गई ये गाथाएँ इस बात की प्रमाण हैं कि स्त्रियों के मन में अपनी स्थितियों को लेकर काफी असंतोष रहा होगा”1

कुल 73 थेरियों के संवाद इस ग्रन्थ में समाहित हैं तथा कुल 522 गाथाओं का संकलन किया गया है. थेरियों की पहचान और प्रशंसा का मूल मन्त्र पालि में लिखित उनके वे उदगार हैं जहाँ वे सामाजिक मुक्ति के लिए संघर्ष करती हुई नजर आती है| थेरियों की इन कथाओं के केंद्र में मुक्ति का प्रश्न है—यह ध्यातव्य है कि मूसल से मुक्ति हो या सांसारिक राग द्वेष के दुश्चक्र से, स्त्रियाँ इससे मुक्ति के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं—सामाजिक दृष्टि से ये स्त्रियाँ ब्राह्मण वर्ग से लेकर दास और शूद्र समाज से भी हैं परन्तु उच्च से निम्न तक उनकी दशा और दिशा में कोई भिन्नता नहीं दिखाई देती-थेरी समाज की स्त्रियाँ अधिकांशत: ब्राह्मण वर्ग से आती हैं—वैदिक धर्म के प्रति अनास्था तथा पारिवारिक स्थितियों के भीतर दमघोंटू वातावरण के प्रति विरोध भाव से भरकर ये स्त्रियाँ बौद्ध धर्मं के प्रति आकर्षित होती हैं| इन गाथाओं में मार( काम)के प्रति विरोध भाव भी मिलता है तथा मार के साकार रूप में आकर इन स्त्रियों को प्रलोभित करने के प्रसंग भी मिलते हैं—–

प्रसंगत: यह विचार करना उचित ही होगा कि ऐसे प्रलोभन स्त्रियों के समक्ष किसी मार ने तो नहीं परन्तु समाज के उन लोलुप पुरुषों ने ही रखे होंगे जो उनके रूप और यौवन पर अधिकार की चेष्टा कर रहे थे| यह अंदाज लगाना कतई कठिन नहीं कि अनेक रूपवती स्त्रियाँ स्वयं अपनी इच्छा से नहीं बल्कि उन तथाकथित मार(कामी पुरुष) से बचने और अपनी रक्षा करने में असमर्थता बोध से घिर कर भी संघ में प्रव्रजित हुई थीं, तथा अपने भीतर की इच्छाओं को सांसारिक तृष्णा मानकर उसका त्याग भी अचानक किसी विशेष क्षण में नहीं किया बल्कि मन को समझाने में एक लम्बे समय तक संघर्ष किया तब उन सांसारिक कहे जाने वाले मार्ग से वे स्वयं को मुक्त कर सकी|

दूसरी संख्या उन स्त्रियों की है जो पति अथवा संतान को खोकर अथवा अपने किसी प्रिय के मृत्यु शोक से विह्वल होकर संघ की ओर आकर्षित हुई अथवा मुक्ति के लिए आई| पटाचारा का उल्लेख अर्हत्व प्राप्त थेरी के रूप में मिलता है| यदि पृष्ठभूमि की ओर दृष्टिपात किया जाए तो संतानों और पति की मृत्यु के पश्चात् स्वगृह की ओर रोती – बिलखती जाती स्त्री को माता-पिता की मृत्यु की भी सूचना मिलती है| विह्वलता के इन चरम क्षणों में उसे बुद्ध की वाणी में शान्ति प्राप्त होती है!

इस सन्दर्भ में दो कथाओं की चर्चा अत्यंत महत्वपूर्ण है— एक कथा श्रावस्ती के श्रेष्ठि कुल की कन्या-उत्पल वर्णा तथा दूसरी वैशाली की नगरवधू आम्रपाली|

यह स्वयं में अत्यंत शोचनीय और विचारणीय तथ्य है कि आम्रपाली(अम्बपाली) की सुन्दरता से अभिभूत होकर वैशाली के राजकुमारों ने उससे विवाह करने की इच्छा जाहिर की| यह इच्छा इतनी बलवती हो गई कि परस्पर कलह की स्थिति उत्पन्न हो गई| इस कलह से मुक्ति पाने के लिए पंचायत ने निर्णय सुनाया कि राजकुमारों के मध्य परस्पर कलह चूंकि समाज के हित के लिए उचित नहीं इसलिए आम्रपाली को सभी की समान्य पत्नी( उप पत्नी-वेश्या) बना दिया गया!—‘सब्बेसं होतु’ आम्रपाली को गणिका बनाने के लिए कितना सरल तथ्य! समाज ने उस स्त्री की इच्छा और अनिच्छा को जाने बिना पितृसत्ता का कितना भयावह प्रयोग किया? आम्रपाली के सम्बन्ध में यह विचार भी किया जाना चाहिए कि उसे अपने शरीर से वितृष्णा बुद्ध के प्रव्रज्या सन्देश मात्र से हुई अथवा इतने पुरुषों द्वारा उसके शरीर के निरंतर उपभोग के कारण !

आम्रपाली लिखती है—

एदिसो अहू अयं समुस्स्यो, जज्जरो बहुदुखानमालयो /सोपलेप पतितो जराघरो….”

अर्थात एक समय यह शरीर सौन्दर्ययुक्त और शक्तिवान था, आज यह जर्जर और अनेक दुखों का घर है| आज वर्ष 2017 में इस तथ्य की उपेक्षा नहीं की जा सकती कि धर्म में दीक्षित होने के अतिरिक्त इन स्त्रियों के समक्ष और कोई रास्ता नहीं था! बौद्ध धर्म का वैशिष्ट्य उस संदर्भ में रेखांकित करना आवश्यक है कि इस धर्म ने उन स्त्रियों के लिए मार्ग बंद नहीं किए जिन्हें समाज ने या तो पतित मान लिया था अथवा पतित कर दिया था| यहाँ बौद्ध धर्मं में भी आनन्द की भूमिका और अधिक क्रांतिकारी रही होगी जिसने बुद्ध से तर्क करके भी स्त्रियों के लिए धर्म में स्वीकृति दिलवाई|

दूसरी स्त्री श्रावस्ती के श्रेष्ठि कुल की कन्या उत्पल-वर्णा है| इस कन्या की उम्र विवाह योग्य होने पर राजकुमारों ने इसके पिता को सन्देश दिए कि ‘उत्पलवर्णा को हमें दे दो’| धन और सम्मान होते हुए भी पिता सभी राजकुमारों को संतुष्ट करने में असमर्थ था( कितना भयावह होगा वह समाज जहाँ स्त्री के पास अपना सम्मान बचाने के लिए धर्म में दीक्षित होने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं था) ऐसे में उस स्त्री के समक्ष प्रव्रज्या के अतिरिक्त कौन सी राह थी? उत्पल-वर्णा ने दीक्षा ली और ऋद्धि प्राप्त भिक्षुणियों में अग्रणी मानी गई| बुद्धि की तीक्ष्णता से ही उसे यह योग्यता प्राप्त हुई होगी, यह कहने की आवश्यकता नहीं! सौन्दर्य और बुद्धि की योग्यता से पूर्ण यह स्त्रियाँ जीवन और सुख न चाहती रही हों, ऐसा प्रतीत नहीं होता परन्तु समाज के यौनाचार के समक्ष प्रव्रज्या लेने के अतिरिक्त कोई और राह इनके समक्ष दिखाई नहीं देती|

संघ में प्रव्रज्या लेने के पश्चात् भी ये स्त्रियाँ समाज की दूषित निगाहों से निरंतर बच सकी हों, ऐसा प्रतीत नहीं होता! परन्तु अपने अर्हत्व, बुद्धि और विश्वास के बल पर इस थेरियों ने उन कामी पुरुषों (जिन्हें मार कहकर सम्बोधित किया गया है) की कुटिल दृष्टि का सामना किया|

एक बड़ी संख्याँ उन स्त्रियों की है- जिन्होंने पारिवारिक त्रासदी के पश्चात संघ में दीक्षा ग्रहण की| पटाचारा अर्हत्व प्राप्त थेरियों में अत्यंत विशिष्ट मानी जाती है पर दीक्षा से पूर्व का जीवन उसके लिए अत्यंत कष्टकारक रहा| पारिवारिक मान्यताओं के विरोध में अपने घर के सेवक से विवाह करने का साहस जुटाने वाली स्त्री के रूप में वह सामाजिक और पारिवारिक कष्टों का सामना करती है –पति, सन्तान, माता पिता, भाई की मृत्यु कुछ ही दिनों के अन्तराल में होने से उसने अनेक कष्टों का सामना किया| अंतत: संघ में दीक्षित होकर उसने मन और मस्तिष्क को नियंत्रित किया| कथा सुनने में जितनी सरल लगती है—उससे अधिक आत्मपीडन और कष्ट की है| मन पर बुद्धि का नियंत्रण करने वाली ये स्त्रियाँ यदि वास्तव में ऐसा करने में सक्षम हो सकीं तो यह अत्यन्त आश्चर्य का विषय है| ऐसा नहीं कि बुद्धि पर व्यंग्य इन स्त्रियों को न सुनने पड़े हों— एक स्थान पर सोमा को सम्बोधित करते हुए मार(पितृसत्ता का प्रतीक) कहता है—

यं तं इसीहि पत्त्ब्बं ठानं दुरभि संभवं /न तं द्वयन्गुलपन्न्य, सक्का पप्पोतुमित्थिया ति | अर्थात जो स्थान ऋषियों को भी दुर्लभ है उसे दो अंगुली मात्र ज्ञान वाली स्त्री कैसे प्राप्त कर सकती है? यह उदाहरण मात्र सोमा के सन्दर्भ में नहीं बल्कि पुरुष समाज के स्त्री के प्रति दृष्टिकोण के सन्दर्भ में पढ़ा जाना चाहिए| इस अंगुली मात्र को स्पष्ट करते हुए भरत सिंह उपाध्याय लिखते हैं—“ सात-आठ वर्ष की अवस्था से ही स्त्रियाँ भात पकाना शुरू कर देती हैं किन्तु भात कब पाक गया, इसका वे ठीक से निर्णय तक नहीं कर सकती| जब तक दो-एक चावल हाथ से उठाकर अपनी आँखों से नहीं देख लेतीं| इसलिए उनकी प्रज्ञा को दो अंगुलि मात्र कहा गया है”2

ऐसे विचार आज भी देखने के लिए मिल जाते हैं पर सोमा उस युग और काल में भी जब स्त्रियों की शिक्षा दीक्षा के उदाहरण नहीं मिलते, मार का न केवल सामना करती है बल्कि प्रज्ञा को स्त्री-पुरुष संदर्भ से परे सिद्ध करती है| इस कथन के आलोक में यह कहना और स्वीकार करना अत्यन्त कठिन है कि ये स्त्रियाँ शिक्षित नहीं थी! सोमा का उत्तर है—

इत्थिभावो नो कि कयिरा चित्तम्ही सुसमाहिते…सम्मा धम्म विपस्ततो अर्थात स्त्री और पुरुष होना ज्ञान प्राप्ति से किस प्रकार सम्बद्ध है?

इसी प्रकार पूर्णा का उदाहरण भी समय और युग के सन्दर्भ में अत्यंत क्रांतिकारी है जहाँ वह एक ब्राह्मण से तर्क-वितर्क करते हुए उसे जल में स्नान करने से शुद्धि प्राप्त करने के संदर्भ में मार्ग दर्शाती है| उसका स्पष्ट मत है कि यदि जल में स्नान करने से मुक्ति मिले और पाप समाप्त हो जाएँ तो सभी पशु और पशु समान कर्म करने वाले मनुष्यों के लिए भी मुक्ति प्राप्त करना कितना सरल होगा! ब्राह्मण उसके मत से प्रभावित होकर न केवल संघ में दीक्षा लेता है बल्कि अब आचरण और कर्म के आधार पर स्वयं को ब्राह्मण स्वीकार भी करता है… पुन: इस बात पर बल देना होगा कि मुक्ति के पथ प्रदर्शन को भले ही धार्मिक पुस्तकों में मात्र बुद्ध की कृपा से इन स्त्रियों को ज्ञान प्राप्त होनी की चर्चा की गई है परन्तु मेरा स्पष्ट मत है कि बिना शिक्षा और आत्मिक ज्ञान के मुक्ति और ज्ञान का ऐसा समन्वय देखना सम्भव नहीं! यह स्त्रियाँ मुक्ति के सौन्दर्य का अनुभव कर चुकी हैं, इसीलिए तो मुत्ता थेरी कहती है—

So freed! So thoroughly freed am I! —

from three crooked things set free:

from mortar, pestle,

& crooked old husband.

Having uprooted the craving

that leads to becoming,

I’m set free from aging & death.3

मात्र कुबड़े पति से मुक्त होने की चर्चा नहीं बल्कि जीवन-मरण से भी मुक्ति का यहाँ उल्लेख है| आगे अपभ्रंश साहित्य में भी हमें इस इस मुक्ति का विकास दिखता है—मुंडे मुंडे मुंडिया /सिर मुंडे चित्तहु मुंडिया/चित्त्त्हम मुण्डनं जिम कियु /संसार हम खंडनं तिम कियु ….. चित्त की जिस मुक्ति के लिए संसार साधना करता आया है, ये थेरियाँ उसी मुक्ति का आस्वाद प्राप्त कर चुकी हैं—बुद्ध के सौजन्य से? अथवा भीतरी अंतर-राग-विराग से मुक्त होकर? अथवा संसार के प्रति भाव शून्य होकर? जो भी हो परन्तु आत्म पीड़ा से पर पीड़ा तक का साक्षात्कार करने वाली इन थेरियों के जीवन से स्त्री समाज का वह इतिहास आरम्भ होता दिखाई देता है जिसकी सिद्धि को पश्चिम का आभार न मानकर भारतीय परम्परा में देखे जाने की आवश्यकता है| यह लेख उसी दिशा में एक विनम्र प्रयास है|

ऐसी अनेक थेरी स्त्रियों की चर्चा यहाँ की जा सकती है जिन्होंने कभी समाज को ज्ञान का सन्देश दिया तो कभी कामी पुरुषों से मुक्ति पाने के लिए स्वयं का ही अंग-भंग कर लिया| शुभा नाम की थेरी ने भ्रष्ट युवक के समक्ष समर्पण करने की अपेक्षा अपने नेत्र भंग करने को बेहतर मार्ग माना| सुमेधा अपनी इच्छा से प्रव्रजित हुई, कृशा पुत्र की मृत्यु के पश्चात पीड़ित और विह्वल होकर बुद्ध की शरण में गई, अनुपमा ने अपने तोल के बराबर आठ गुना सोना और रत्न पुरुषों से लेने की अपेक्षा संघ में दीक्षा लेना स्वीकार किया|

यह उदाहरण स्त्री संघर्ष की कथा कहते हैं—जिस समाज में स्त्री की देह-यष्टि के अतिरक्त कोई उपयोगिता न समझी गई वहाँ स्त्रियों ने न केवल प्रज्ञा सिद्धि प्राप्त की बल्कि कामी पुरुषों से लेकर सभ्य कहे जाने वाले समाज को भी मार्ग दिखाया| अभिरूपा नंदा जैसे उदाहरण भी मिलते हैं जिसे होने वाले पति की मृत्यु के कारण प्रव्रज्या लेने पर विवश किया गया! महाप्रजापति गौतमी ने इन स्त्रियों को दीक्षा दी और पटाचारा की भी अनेक शिष्याएँ बनीं| गुरु शिष्य परम्परा से बनी ये स्त्रियाँ आने वाले न जाने कितने युगों और सदियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी रहेंगीं| साथ हेई इतिहास में झाँक कर देखने के लिए भी विवशा करेंगी कि अक्सर लिखित शब्दों के परे साहित्य कुछ वाचिक प्रतिध्वनियों का भी निर्माण करता है,जिसके लिए शब्दों के भीतर झांक कर देखना भी जरूरी है|

धन्यवाद

सन्दर्भ ग्रन्थ:

1 .औरतें और औरतें, क्षमा शर्मा, पृष्ठ 34

2 . थेरी गाथा, भरत सिंह उपाध्याय, पृष्ठ 57

3 . http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/thig/thig.01.00x.than.html#sutta-3

4 . सभी पालि उदाहरण उपरोक्त पुस्तक से

मेहरून्निसा परवेज़ की कहानियों में आदिवासी स्त्री-आरती

0
person wearing black leather strap watch
Photo by Aditi Gautam on Unsplash

मेहरून्निसा परवेज़ की कहानियों में आदिवासी स्त्री

नाम- आरती (शोधार्थी)
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,नई दिल्ली.
पता- बी-136,विकास विहार(ईस्ट) विकास नगर, उत्तम नगर, नई दिल्ली, 110059.
मोबाईल न.- 9716668064
ईमेल- Aartichaudhari1991@gmail.com

21 वीं सदी को विमर्शों की सदी कहे तो गलत न होगा। जिसमें अनेक विमर्श हमारे समक्ष मौजूद है जैसे दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श इत्यादि। दलित विमर्श और स्त्री विमर्श के समान ही आदिवासी विमर्श की गूँज भी सुनाई देने लगी। भारत भले ही समृद्ध विकासशील देश की श्रेणी में शामिल है, लेकिन आदिवासी अब भी समाज की मुख्यधारा से कटे नज़र आते हैं। आज भी आदिवासी अपने ही देश में हाशिये पर स्थित है। रचनाकारों ने इन्हीं हाशिये पर स्थित आदिवासियों को अपनी रचनाओं के केंद्र में लाने का प्रयास किया है। जिसमें उन्होंने विकास के नाम पर सरकारी तंत्र द्वारा किया गया उनका शोषण, आदिवासी समाज की गरीबी-लाचारी, उनके विडम्बनापूर्ण जीवन आदि को अभिव्यक्त किया है। समकालीन कहानीकारों में जिन्होंने इन सब समस्याओं को केंद्र बनाकर कहानी लिखीं, उनमें मेहरून्निसा परवेज़ का विशिष्ट स्थान है। मेहरून्निसा परवेज़ की कहानियों का एक बड़ा भाग बस्तर क्षेत्र के आदिवासी समाज और उनकी संस्कृति को चित्रित करता है। लेखिका का जन्म और बचपन आदिवासियों के बीच ही हुआ और गुजरा। उन्होंने आदिवासी जीवन को बहुत करीब से देखा ही नहीं बल्कि जिया भी है। इसलिए उनके साहित्य में आदिवासी समाज मौजूद है। वह लिखती हैं, “बस्तर। जिसे मैं कभी भूल नहीं पाई। जिंदगी का पहला पाठ, यथार्थ का पहला शब्द मैंने यही गढ़ा था। बस्तर की माटी में खेलकर मेरे नन्हें पैर जवान हुए थे। बस्तर का भयानक जंगल आज भी मेरे मन में बसा हुआ है…..”1 उनकी आदिवासी कहानियों के केंद्र में आदिवासी स्त्रियों के शोषण, उनके जीवन-संघर्षों और उनकी समस्याओं आदि का यथार्थ चित्रण हुआ है।

जब हम आदिवासी स्त्री की बात करते हैं तो हमारे ज़हन में उनकी स्वच्छ्न्द, स्वतंत्र, संघर्षशील, आत्मनिर्भर छवि सामने आती है। भारतीय समाज और संस्कृति की तुलना में आदिवासी स्त्रियाँ आरम्भ से ही स्वतंत्र और स्वछंद रही है। चाहे प्रेम करने की स्वतंत्रता हो या फिर वर के चयन करने की स्वतंत्रता हो, आदिवासी स्त्रियाँ आरम्भ से ही आत्मनिर्भर रही है। यही विशेषता है जो आदिवासी स्त्रियों को अन्य स्त्रियों से विशिष्ट बनाती है। मेहरून्निसा परवेज़ ने अपनी कहानियों में इन्हीं आदिवासी स्त्रियों को चित्रित किया है। आदिवासी स्त्रियाँ स्वावलंबी होती है। वे खट-कमाकर अपना और अपने पूरे परिवार का भरण-पोषण करने में समक्ष होती है। मेहरून्निसा परवेज़ की कहानी ‘कानीबाट’ में दुलेसा और उसकी माँ जंगलों में काम करती है और उसका पिता खेतों में काम करता है। वह और उसकी माँ जंगलों से लकड़ी काटना, बोड़ा लाना, मछलियाँ पकड़ना जैसे कार्य करती है साथ ही मुर्गी पालन का कार्य भी करती है। इसी प्रकार का कार्य ‘जंगली हिरनी’ में लच्छो और उसकी माँ भी करती है। ‘शनाख्त’ कहानी में बत्ती का बाप शराबी है। वह उनके साथ नहीं रहता है। कभी-कभी आता है। ऐसी स्थिति में बत्ती की माँ और वह घर-घर अण्डे बेचकर अपनी गृहस्थी चलाती हैं। आदिवासी स्त्रियाँ अपने पति पर निर्भर नहीं रहती हैं। वह घर से बाहर निकल कर जंगलों और खेतों में काम करती हैं और अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करके अपने पति के साथ परिवार का भरण-पोषण करने में सहायता करती है।

आदिवासी समाज में लड़की के होने पर परिवार वाले खुशियाँ मनाते हैं। आदिवासी समाज में ऐसी मान्यता है कि बेटी का जन्म होने से परिवार में धन-दौलत में वृद्धि होती है। ‘कानीबाट’ कहानी में जोनी और लिकेन की लड़की होने पर वह गाँव वालों को दावत देते हैं, “लड़की होना रईसी का सूचक माना जाता है, क्योंकि लड़की घर में धन लाती है।”2 हिंदू समाज की तरह आदिवासी समाज में बेटा और बेटी में भेदभाव नहीं करते हैं। इसके विपरित आदिवासी समाज में बेटी को ज्यादा मान-सम्मान और महत्व दिया जाता है। आदिवासी समाज में जहाँ बेटी को विशेष स्थान है वहीं त्यौहार, मेला, हाट आदि में स्त्रियों की प्रमुख भूमिका होती है। नाच-गाने में भी आदिवासी स्त्रियाँ बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती हैं। त्यौहारों, घोटुल और विवाह में स्त्रियाँ नृत्य और संगीत करती हैं। ‘जंगली हिरनी’ कहानी में दियारी त्यौहार पर लच्छो नाचने के साथ-साथ सुरीली आवाज़ में गाती है, “देवी बलों में दन्तेसरी,देवी बले में माता मावती, बड़े देवी आस आया, तुई बड़े देवी आस।”3 आदिवासी समाज में लड़की को प्रेम करने, वर चुनने और शादी करने की स्वतंत्रता है। ‘कानीबाट’ और ‘जंगली हिरनी’ में प्रेम करने की स्वतंत्रता को व्यक्त किया है। यह अलग बात है कि दोनों कहानी की नायिका अपने-अपने प्रेम में असफल होती है।

उपर्युक्त वर्णन सिक्के का एक पहलू है लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि आदिवासी स्त्रियाँ स्वतंत्र और आत्मनिर्भर तो है परंतु इसके बावजूद, उनके अपने समाज में कुछ ऐसे नियम और कानून है जो स्त्री को पुरूष से कमतर आंकने के लिए बनाये गये है। आदिवासी स्त्रियाँ अपने समाज के साथ ही मुख्यधारा के समाज द्वारा भी शोषित और प्रताड़ित होती आयी है।

मुख्यधारा का समाज आदिवासी स्त्री को मात्र मनोरंजन और भोग का साधन मानते हैं। उनकी नज़र में आदिवासी स्त्री को कोई अस्तित्व नहीं है। उनके अनुसार वह सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक रूप से कमजोर और असहाय होती है। उनके भोलेपन और मासूमियत का मुख्यधारा का समाज गलत फायदा उठाकर शोषण करता है। मेहरून्निसा परवेज़ की कहानी ‘जंगली हिरनी’ बाहरी व्यक्ति द्वारा भोली-भाली आदिवासी स्त्री को छलने की कथा का यथार्थ चित्रण व्यक्त किया है। प्रस्तुत कहानी में मेंगन को जंगलों में लकड़ी तोड़ते समय एक अंग्रेज शिकारी उसकी इज्जत का शिकार करता है। उसे जब बेटी लच्छो होती है तो हूबहू वह अंग्रेजी शिकारी की तरह होती है। मेंगन के पति को भी शक होता है। बुधु बड़बड़ाता है, “न जाने कहाँ से आ मरते हैं खुले साँड की तरह हमारी इज्जत लूटने। मैं देखता उसे तो टँगिया से एक बार में ही काट देता।”4 लेकिन वह लाचार है। लच्छो भी बड़ी होती है तो उसे बस्ती में स्कूल चलाने आये मास्टर से प्रेम हो जाता है। लच्छो भी सपने देखती है। मास्टर भी उससे शादी का वादा करता है लेकिन स्कूल बंद होने के कारण मास्टर भी शहर चला जाता है और वह अकेली रह जाती है। इस प्रकार जो पीड़ा मेंगन भोग चुकी है वही पीड़ा उसकी बेटी के भाग्य में भी आ जाती है। वहीं ‘कानीबाट’ कहानी में आदिवासी स्त्रियाँ अपने ही समाज द्वारा शोषित है। दुलेसा की शादी उसके माता-पिता रामू नामक युवक से करना चाहते हैं। जिसके लिए वह रामू को कुछ दिनों के लिए अपने घर रखते हैं। दुलेसा को यह रिश्ता बिल्कुल पसंद नहीं क्योंकि वह जिलेन नाम के युवक से सच्चा प्रेम करती है और उसी से शादी करना चाहती है। वह जिलेन के बच्चे की माँ बनने वाली है जबकि जिलेन उसे धोखा देकर अन्य लड़की से शादी कर लेता है। इसी कहानी में दुलेसा की सहेली जलयारी वह भी अपनी शादी से खुश नहीं है, क्योंकि उसकी मंगनी बचपन में ही हो गयी थी। बड़े होने पर वह किसी ओर से प्रेम करती है और मौका देखकर भाग जाती है। आदिवासी समाज में लड़की के भागने पर उन्हें कठोर दण्ड दिया जाता है, “पहली बार गाँववाले भागी हुई लड़की को पकड़कर लाते हैं और उसे खूब मारते हैं, बाँध देते हैं। लड़की मौका पाकर फिर भाग जाती है, दूसरी बार उसे पकड़कर लाते हैं और उसे आग से दागते हैं, मारते हैं। तीसरी बार यदि लड़की फिर भाग जाती है, तो गाँववाले उसे पकड़कर लाते हैं और एक पैर चक्के के बीच डाल देते हैं या बाँध देते हैं। उसके बाद उसे तेजी से घुमाते हैं। लड़की पीड़ा से चीखती है, उसका पैर सूज जाता है और वह कष्ट से बुरी तरह चिल्लाती है और बेहोश हो जाती है।”5 इस प्रकार आदिवासी लड़कियों को शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार का दण्ड भुगतना पड़ता है। इस दण्ड की प्रक्रिया में कई लड़कियाँ इस कष्ट को सहन भी कर लेती हैं और फिर मौका पाकर भाग जाती है। इस बार गाँव वाले स्वयं उसे उसके प्रेमी के पास पहुँचा देते है। जिस प्रकार कहा जाता है कि आदिवासी स्त्रियों को अपने समाज में प्रेम करने और शादी करने की स्वतंत्रता होती है लेकिन वहीं कई आदिवासी समाज ऐसे भी हैं जहाँ लड़कियों को प्रेम और शादी करने की स्वतंत्रता नहीं है और ऐसा करने पर उन्हें असहनीय दण्ड भी भुगतना प‌ड़ता है। यह कहानी हमारे उस भ्रम को तोड़ती है कि आदिवासी स्त्रियों को प्रेम और विवाह करने की स्वतंत्रता होती है। ‘देहरी की खातिर’ कहानी में मेहरून्निसा परवेज़ ने आदिवासी स्त्री के दोहरे शोषण की व्यथा को व्यक्त किया है कि किस प्रकार मुख्यधारा के समाज के साथ-साथ उसका स्वयं का समाज भी उसको प्रताड़ित और शोषित करता है। जिसके कारण उसे दोहरे शोषण की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। कहानी की नायिका पापा (नायिका का नाम) शहर के मास्टर से प्रेम करने लगती है तब नानीआया उससे कहती है, “कहीं प्यार तो नहीं कर बैठी?जानती है वह प्यार में फँसकर तेरी जिंदगी बरबाद करेगा। तुझे घर नहीं बैठायेगा, इतनी हिम्मत शहर वालों में नहीं है। हंडी चाटेंगे पर घर के पलँग पर बिरादरी की बराबर घराने की लड़की को ही बैठायेंगे।”6 गर्भवती होने पर शहरी मास्टर उसे पहचानने से इंकार कर देता है। पापा के गर्भवती होने की बात पिता को पता चली तो उसे घर से बाहर निकाल दिया और वह काका-काकी के पास रहने चली गयी लेकिन वहाँ भी काका की वासनापूर्ण नजर हमेशा उस पर रहती। इस प्रकार मुख्यधारा के समाज के लोग अपने प्रेम में फँसा कर झूठे वादों से भोली-भाली आदिवासी स्त्री को फंसाते है तो वहीं उसके पिता समान काका स्वयं उसे अपनी हवस का शिकार बनाना चाहता है।

मेहरून्निसा परवेज़ ने आदिवासी स्त्रियों के शोषित रूप को ही चित्रित नहीं किया है अपितु उससे एक कदम आगे जाकर उन्होंने आदिवासी स्त्रियों में विरोध करने की क्षमता को भी व्यक्त किया है। आदिवासी समाज की स्त्रियाँ अपने ऊपर हो रहे शोषण, अतयाचार को अपनी नियति नहीं समझ कर नहीं बैठ जाती है बल्कि उसके प्रति विद्रोह प्रकट करती है। ‘देहरी की खातिर’ में जब पापा को घर से निकाल देते हैं। तब गाँव की एक काकी उसे अपने घर में आश्रय देती है। चूँकि वह माँ बनने वाली थी, काका-काकी उसे बहुत स्नेह और दुलार से अपने पास रखते हैं। बच्चे के जन्म के बाद काकी ही उसके और उसके बच्चे का ख्याल रखती है। लेकिन काका की नीयत में खोट आ जाता है। वह बेटी जैसी लड़की को अपने हवस का शिकार बनाना चाहता है लेकिन काकी सही समय पर पहुँचकर उसे बचा लेती है। एक लड़की की अस्मिता को बचाये रखने के लिए काकी टँगिया से अपने ही पति का खून कर देती है। ‘शनाख्त’ कहानी में पिता सेक्स का इतना भूखा रहता है कि अपनी ही बेटी पर उसकी बुरी नजर रहती है। शराब के नशे में अपनी बेटी को ही वासना का शिकार बनाने का प्रयास करता है। और इसी मानसिकता को लिये पिता बेटी के बिस्तर तक पहुँच जाता है, “बच्ची का सारा शरीर सुन्न पड़ गया तो क्या उसके पास वह (पिता) ‘नीच, पापी कुत्ते’, उसे माँ ने गुस्से से फनफनाते हुए उसका हाथ पकड़कर उठा दिया। बच्ची घबड़ायी सी उठकर बैठ गयी। भय के मारे उसका चेहरा सफेद पड़ गया था।”6 माँ गुस्से से अपने पति को घर से बाहर निकाल देती है। कुछ दिनों के बाद उसके मरने पर वह उसे पहचानने से भी इंकार कर देती है। ‘सूकी बयड़ी’ में थोरा का पति जब दूसरी औरत को घर पर लाता है लेकिन थोरा अपने पत्नी होने के अधिकार को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। वह अपने पति का विरोध करती है, “…..जा, चले जा, कोठरी में खाली नी करूँ। म्हारे बापू ने ब्याह कराया हैं फेरे लेकर लाया है। ब्याहवाली हूँ। म्हारी इज्जत है।”7 इस प्रकार आदिवासी स्त्रियाँ भी अपनी अस्मिता और अधिकारों के लिये आवाज उठा रही है।

लम्बी संस्कृति की परम्परा कोई भी हो उसमें कुप्रथाएँ, कुरीतियाँ, अपने तरह के कर्मकांड और अंधविश्वास पनपते हैं। आदिवासी समाज भी इनसे मुक्त नहीं है। यह कहा जा सकता है कि अन्य समाज की अपेक्षा आदिवासी समाज में अंधविश्वास की प्रधानता है। इस अंधविश्वास के केंद्र में आदिवासी स्त्री है। ‘टोना’ कहानी में खोड़ी पटेल के साथ शादी करके जब उसके घर आती है, तो पटेल की बड़ी पत्नी को देखकर सहम जाती है। बाद में पता चलता है कि पटेल की बड़ी पत्नी के सिर के बाल नहीं है तथा वह ‘टोनही’ है। उसके विषय में पूर गाँव में यह बात फैली हुई है कि मंत्र की शक्ति से वह अपने दुश्मनों का नाश करती हैं। उसकी आकृति इतनी भयावह है कि खोड़ी उसके बारे में देख और सुन कर सहम जाती है, “बड़ी के सिर में बाल नहीं है, उसका राज जब खुला तो वह कांप-सी गयी। बड़ी पंगनीन(टोनही) थी। वह रात को घर से चली जाती थी और पौ फटने के पहले आदमी का खून पी कर लौटती थी।”8 आदिवासी समाज में किसी स्त्री के मन:स्थिति और आकांक्षा को न समझ कर उसे डायन, पिशाच, कलंकिनी जैसे शब्दों से पुकारा जाता है। पूरा गाँव उसे प्रताड़ित करता है और कभी-कभी ऐसी स्थिति में उसे गाँव से बेदखल कर दिया जाता है। ‘टोना’ कहानी में पटेल की बड़ी पत्नी के बारे में इस प्रकार की जो भी अफवाहें प्रचलित हैं। उसे तथा उस स्त्री को देखकर यही कहा जा सकता है कि पति की उपेक्षा और संतानोत्पत्ति के अभाव में, वह समाज का सबसे घृणित रूप अपनाने को बाध्य होती है, जिससे कि लोग उसकी तरह आकृष्ट हो तथा उसके विषय में करें। इस प्रकार, लेखिका ने आदिवासी समाज में व्याप्त जादू- टोना जैसे कार्यों में स्त्रियों की स्थिति को चित्रित करने का प्रयास किया है।

भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति में काफी सुधार आया है। समाज में स्त्री की स्थिति पहले की तरह द्वितीय स्तर के प्राणी की नहीं रह गयी है। आज स्त्रियाँ अपने अधिकारों को पहचानती है और अपने हक के लिए संघर्ष कर रही है। स्त्रियाँ प्रत्येक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। आज बहुत से संगठन स्त्रियों के अधिकारों, सुरक्षा, स्वास्थ्य आदि के लिए कार्यरत है। लेकिन ठीक इसके विपरित आदिवासी स्त्रियों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। आरम्भ से आदिवासी स्त्रियाँ स्वतंत्र और आत्मनिर्भर है लेकिन यह भी सच है कि आदिवासी स्त्रियाँ भी सदियों से शोषित होती आयी है। मेहरून्निसा परवेज़ ने आदिवासी स्त्री के स्वतंत्र, आत्मनिर्भर, संघर्षशील आदि रूपों के साथ उनके शोषित और प्रताड़ित रूप का यथार्थ चित्रण किया है। वहीं उन्होंने आदिवासी स्त्रियों के विरोध के स्वर को भी कहानियों में मुखरित किया है।

……………………..

संदर्भ सूची –

1.मेहरून्निसा परवेज़, मेरी बस्तर की कहानियाँ, वाणी प्रकाश्न, नई दिल्ली, 2006, भूमिका

2.मेहरून्निसा परवेज़, मेरी बस्तर की कहानियाँ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006, पृ.सं.-18.

3.मेहरून्निसा परवेज़, गलत पुरूष, नेशनल पब्लिशिंग हाऊस, दिल्ली, 1978, पृ.सं.-97.

4.मेहरून्निसा परवेज़, गलत पुरूष, नेशनल पब्लिशिंग हाऊस, दिल्ली, 1978, पृ.सं.-96.

5.मेहरून्निसा परवेज़, मेरी बस्तर की कहानियाँ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006, पृ.सं.-23-24.

6.मेहरून्निसा परवेज़, मेरी बस्तर की कहानियाँ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006, पृ.सं.-50.

7.मेहरून्निसा परवेज़, समर, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली,1999, पृ.सं.-144.

8.मेहरून्निसा परवेज़, गलत पुरूष, नेशनल पब्लिशिंग हाऊस, दिल्ली, 1978, पृ.सं.-8.

 

वैदिक साहित्य में स्त्री महिमामंडन का सच-चित्रलेखा अंशु

0
man in red t-shirt and brown pants standing on the crowd
Photo by Prado on Unsplash

वैदिक साहित्य में स्त्री महिमामंडन का सच

चित्रलेखा अंशु
chitra.anshu4@gmail.com
मो-8180079752

वैदिक साहित्य के विषय में यह कहा जाता है कि यह अत्यधिक संपन्न तथा विविध है एवं इसमें मानव कल्याण की बात, एकता की शक्ति, किसी भी धर्म को मानने की आजादी, जिस भाषा में सुविधा हो, उसमें बात करने की स्वतंत्रता, उस साहित्य की सामान्य जन के प्रति लोकतान्त्रिक व्यवहार को दर्शाता है। किन्तु आगे चलकर कुछ विशेष सत्तालोलुपता से वशीभूत उच्च वर्गीय लोगों के द्वारा जब इसे धर्म से जोड़ा गया एवं इसकी धार्मिक व्यख्या की गई तो कुछ वर्गों को वैदिक साहित्य को पढ़ने या उन्हें व्यवहार में लाने से वंचित कर दिया गया। उन वर्गों में श्रमजीवी समूह, महिलाएं एवं दलित (शूद्र) वर्ग शामिल थे। कारण यह था कि सत्ता एवं संसाधन को प्राप्त करने के लिए आतुर वे लोग नहीं चाहते थे कि संसाधनों का बँटवारा बराबरी में हो इससे उन्हें भी एक समान होना पड़ेगा। जबकि वे विशेषाधिकार प्राप्त एवं संसाधनों से लैस होना चाहते थे। अत: उन्होंने मानसिक एवं शारीरिक गुलामी करवाने हेतु शूद्रों, स्त्रियों तथा सर्वहारा वर्गों को वैदिक साहित्य को सुनने तथा पढ़ने से वंचित कर दिया ताकि न तो ये लोग वेद को पढ़ सकें और न ही उसमें लिखी गई मानवतावादी विचारों को अपनाकर लोकतांत्रिक व्यावहार में शामिल हो सकें। साजिश यहीं समाप्त नहीं हुई बल्कि स्त्रियों तथा शूद्रों के वेद में तथा इतिहास बनाने में दिए गए योगदान को ही खारिज करने का प्रयास किया गया। ये साजिश धर्म का विश्लेष्ण करने वाले ठेकेदारों के माध्यम से संभव हो सका। इस सच्चाई से पर्दा उठाने का काम डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने किया। 1946 में शूद्रों पर प्रकाशित अपनी पुस्तक में शूद्रों के बारे में प्रचलित बहुत सी धारणाओं का उचित खंडन करते हुए अम्बेडकर ने लिखा है, “शूद्रों के लिए कहा जाता है कि वे अनार्य थे, आर्यों के शत्रु थे। आर्यों ने उन्हें जीता था और दास बना लिया था। ऐसा था तो यजुर्वेद और अथर्ववेद के ऋषि शूद्रों के लिए गौरव की कामना क्यों करते हैं? शूद्रों का अनुग्रह पाने की इच्छा क्यों प्रकट करते हैं? शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें वेद के अध्ययन का अधिकार नहीं है। ऐसा था तो शूद्र सुदास ऋग्वेद के मन्त्रों के रचनाकार कैसे हुए? शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें यज्ञ करने का अधिकार नहीं है। ऐसा था तो सुदास ने अश्वमेघ यज्ञ कैसे किया था? शतपथ ब्राम्हण शूद्र को यज्ञकर्ता के रूप में कैसे प्रस्तुत करता है? और उसे कैसे संबोधन करना चाहिए, इसके लिए शब्द भी बना है। शूद्रों के लिए कहा जाता है कि वे संपत्ति संग्रह नहीं कर सकते। ऐसा था तो मैत्रायणी और कठक संहिताओं में धनी और समृद्ध शूद्रों का उल्लेख कैसे है? शूद्रों के लिए कहा जाता है कि सेवक के रूप में तीन वर्णों की सेवा करना उसका काम है। यदि ऐसा था तो शूद्र राजा कैसे हुए जैसाकि सुदास के उदाहरण से, तथा सायण द्वारा दिए अन्य उदाहरणों से मालूम होता है?”[1]

प्रारंभ में वैदिक साहित्य में शामिल शूद्रों की तथाकथित मजबूत स्थिति को बाबा साहब ने अपनी पुस्तक के माध्यम से दिखाने की चेष्टा की है जिसे इतिहासकारों ने हाशियाकृत कर दिया था। अब महिला प्रश्नों की बारी थी क्योंकि समाज में दोनों की स्थिति एक जैसी होने के कारण दोनों को एक ही वर्ग में शामिल किया गया था। वैदिक साहित्यों को लेकर इतिहास में एक संशय की स्थिति बनी रही है लगभग हर ऐतिहासिक पुस्तक में महिला की वैदिक काल में अच्छी स्थिति को दर्शाया गया है। उन्नीसवीं शताब्दी के बुद्धिजीवियों द्वारा भी इस ऐतिहासिक तथ्य को उभारने की कोशिश की गई कि भारतीय स्त्रियों की स्थिति वैदिक काल में अच्छी थी। प्रश्न यह उठता है कि उन्नीसवीं सदी के बुद्धिजीवियों द्वारा ऐसा कहने के पीछे कोई रणनीति तो नहीं थी जिसमें वे वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति अच्छी होने की बात कर रहे थे। इसके पीछे एक लम्बी बहस छुपी हुई है। प्रश्न यह है कि ऐसी बातें समाज में इसलिए तो नहीं की गई क्योंकि उपनिवेशिक काल में पश्चिम के लेखकों के द्वारा भारतीय महिला की निम्न स्थिति की बातें लगातार की जा रही थी। उसी के प्रतिरोधस्वरूप भारतीय बुद्धिजीवियों ने वैश्विक फलक पर वेद में कुछ अनुश्रुतियाँ लिखने वाली महिलाओं की अच्छी स्थिति (काल्पनिक) दिखाने की कोशिश की। ताकि स्त्रियों की निम्न स्थिति को अच्छी बताकर उसका सामान्यीकरण किया जा सके। तथा उस काल में उन महिलाओं का प्रतिनिधित्व संपूर्ण समाज पर अधिरोपित किया जा सके।

नारीवादी दृष्टि से जो भी जानकारियाँ हासिल की गई हैं वे इस बात को प्रमाणित करती हैं कि उन्नीसवीं सदी के स्त्री सुधारवादी आन्दोलन पश्चिमी ताने के प्रतिरोध फलस्वरूप ही उभरे और उन्होंने वास्तव में स्त्रियों की निम्न स्थिति को महसूस किया। इस शोध लेख में ऋग्वेद काल में स्त्री की स्थिति का विश्लेषण किया गया है। विशेष रूप से जिन स्त्रियों की स्थिति अच्छी बताकर स्त्री सशक्तिकरण का दावा वेदकालीन समाज में किया जाता रहा है। क्योंकि ऐसी बातें प्रचारित की जाती हैं कि वेदकाल में स्त्रियाँ उच्च स्थान पर थी बाद के कालों में उनकी स्थिति का ह्वास हुआ है। ऋग्वेद सबसे प्राचीन ग्रन्थ है अत: इसके अध्ययन से ही जांच शुरू करनी होगी।

यह बात साबित हो चुकी है कि सत्ता तथा वर्चस्व का सीधा संबंध अर्थोपार्जन से जुड़ा हुआ है और अर्थ से पितृसत्ता जुड़ी हुई है इसीलिए आर्थिक ढांचे के समानांतर समाज की पितृसत्तात्मक मनोवृत्ति का अध्ययन करते हुए समाज में स्त्री की प्रस्थिति का मूल्यांकन करना होगा। ऋग्वेदिक कालीन समाज मुख्यत: पशुपालन पर केन्द्रित थी। जनजातीय युद्ध बहुधा गाय-बैल के लिए लड़े जाते थे और इंद्र[2] का एक प्रमुख कार्य था शत्रुओं से अपने समर्थ के गे-बैल पुन: प्राप्त करना। ऐसा प्रतीत होता है कि मवेशी ‘गण’ तथा ‘परिषद’ कही जाने वाली जनजातीय इकाइयों के होते थे। अनुमान यह लगाया जाता है कि अनेक पीढ़ियों तथा सगोत्र सम्बन्धियों से युक्त विशाल परिवारों का मवेशियों पर स्वामित्व होता था। “जनजातीय सन्दर्भों में स्त्रियों को उत्पादकों का उत्पादक”[3] कहा गया है। “इस कारण उनके लिए युद्ध लादे जाते थे”[4]

पशुचारी अर्थव्यवस्था पर आश्रित तथा सदा ही युद्धरत और लूटपाट पर आधारित इस समाज में स्त्रियों की भागीदारी क्या रही उसे ऋग्वेद की कुछ ऋचाओं के माध्यम से विश्लेषित किया जा सकता है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मानव सभ्यता की उत्पत्ति तथा इसके विकास में स्त्री तथा पुरुष की बराबर की भूमिका रही है किन्तु स्त्रियों द्वारा की गई भागीदारी को इतिहास बनाने वालों ने उपेक्षित कर दिया। इसी कारण जब-जब नारीवादी दृष्टि से सत्य की पड़ताल की गई तो वस्तुस्थिति प्रकट हो गई। स्त्री उपेक्षा की शुरुआत ऋग्वेद के काल से ही हो गई थी जब उसके परवर्ती मंडल में उल्लिखित वर्णव्यवस्था का दैवीय सिद्धांत केवल पुरुषों के वर्ण का निर्धारण करता दिखता है। बहरहाल दैवीय सिद्धांत की सर्वविदित आलोचना होती है क्योंकि यह वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं किन्तु प्राचीन धरोहर होने के नाते इसका भी विश्लेष्ण करना महत्वपूर्ण है। स्त्री की उत्पत्ति कैसे और किस वर्ण में हुई इस विषय में इसमें कोई जानकारी नहीं दी गई है अर्थात उसे एक मानव की श्रेणी में रखा ही नहीं गया है। “स्त्री की उत्पत्ति पर पुरुष सूक्त में कुछ नहीं लिखा गया है”[5]। फिर भी स्त्रियाँ समाज के पुनरुत्पादन में अपनी सक्रिय भूमिका निभाती रही।

कोई व्यक्ति कितना शक्तिशाली है यह उसकी पूंजी संबंधित सम्पन्नता से तय होता है। पितृसत्ता का आधार निजी संपत्ति के बाद ही अस्तित्व में आया। यदि ऐतिहासिक तथ्यों के माध्यम से इस बात की पुष्टि की जाती है कि वैदिक कालीन समाज में स्त्री उच्च स्थान पर थी तो स्वयं वैदिक तथ्य इस बात को प्रमाणिक क्यों नहीं करते! हम स्त्री की अच्छी स्थिति का मूल्यांकन उसके हाथ में संपत्ति, संसाधन तथा उसके निर्णय लेने के अधिकार से करेंगे किन्तु ऋग्वेद में ‘स्त्रीधन’ के विषय में कोई स्पष्ट संकेत प्रस्तुत नहीं किया गया है। “न केवल ऋग्वेद बल्कि सम्पूर्ण वैदिक साहित्य स्त्री के संपत्ति संबंधी अधिकार एवं उत्तराधिकार के सवाल पर मौन है”[6]

समाज पशुचारी होने के कारण जमीन जैसी किसी संपत्ति का स्थान न था। किन्तु युद्ध पशुओं के लिए लड़े जाते थी क्योंकि उस समय पशु ही संपत्ति के स्रोत थे अत: युद्ध में कुछ स्त्रियों की भागीदारी के उल्लेख हमें ऋग्वेद की ऋचाओं में प्राप्त होते हैं। पहले[7], पांचवे[8] तथा दसवें[9] मंडल की ऋचाएँ काफी महत्वपूर्ण हैं जिसमें उन स्त्रियों का वर्णन किया गया है जिन्होंने पशुओं के लिए युद्ध किए। पहले मंडल में पिश्वपला[10] नमक स्त्री के न केवल युद्ध में भाग लेने बल्कि घायल होने के संकेत भी प्राप्त होते हैं। पांचवे मंडल में शाशीयसी[11] के परम साहस एवं योग्यता का वर्णन किया गया है। उसी प्रकार दसवें मंडल में मुद्गलानी[12] का रथ के सारथी के रूप में युद्ध में उपस्थित होने के प्रमाण मिलते हैं। तीन स्त्रियों के उदाहरण महत्वपूर्ण अवश्य हैं किन्तु सम्पूर्ण स्त्रियों का प्रतिनिधित्व एवं सशक्तिकरण इससे नहीं प्रमाणित होता है। वैदिक साहित्य की स्त्री द्वेष से संबंधित ऋचाएँ[13] यह बताती हैं कि पशुचारी पृष्ठभूमि वाले इस समाज में पितृसत्ता की जड़े कितनी मजबूत थीं। ऋग्वेद के तीसरे मंडल[14] में इंद्र की उपासना में जो ऋचाएँ लिखी गई हैं उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ‘पुत्री अपने विवाह के पश्चात पितृकुल का त्याग कर देती है अत: पैतृक संपत्ति पर उसका कोई अधिकार नहीं’। ऋग्वेद के दसवें मंडल में ‘द्यूतक्रीड़ा’ पर लिखी गई ऋचा में पति द्वारा पत्नी को दाव पर लगाने की उल्लेख मिलता है।

“न मा मिमेथ जिहील एषा शिवा सखिभ्य उत मह्र्यमासीत।

अक्षस्याहमेकपरस्य हेतोरामुव्रतामप जायामरोधम”[15]

समाज में महिलाओं के मानवाधिकार क्या और किस प्रकार हैं इसे विभिन्न परिप्रेक्ष्यों में समझने की आवश्यकता है। आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षणिक तथा विशेषाधिकार के रूप में प्रजनन संबंधी अधिकार के रूप में हम मानवाधिकारों को स्पष्ट कर सकते हैं। किसी समाज में यदि ये अधिकार महिलाओं को प्राप्त न हो तो उससे असमान लैंगिक संबंधों के प्रमाणिक संकेत प्राप्त होते हैं। उपरोक्त उदाहरणों से महिलाओं के आर्थिक, राजनैतिक एवं सामाजिक अधकारों का स्पष्टीकरण मिल चुका है कि महिलाओं को किसी प्रकार के अधिकार प्राप्त न थे। जेंडर को लेकर भेद-भाव के संकेत भी प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद में पुरुष संतान की प्राप्ति की कामना की जाती थी। “दिलेर, पराक्रमी तथा साहसी संतान (पुत्र) प्राप्ति की प्रार्थना”[16]। “स्त्री संतान (पुत्री) के लिए कोई प्रार्थना नहीं है”[17]

ऋग्वेद में लिखी गई ऋचाओं में से अधिकतर रचना ऋषियों द्वारा की गई हैं। उसमें अधिकतर मन्त्र शैली की रचनाएँ की गई हैं जिसके द्वारा लोग देवताओं से सदैव अपने आवश्यक संसाधनों की पूर्ती हेतु प्रार्थना करते रहते थे। किन्तु उसमें कुछ मन्त्रों अर्थात ऋचाओं की रचना ऋषिकाओं[18] के द्वारा भी की गई हैं। पांचवें, आठवें और दसवें मंडल में शामिल ऋषिकाओं के विषयवस्तु लगभग एक जैसे लगते हैं। विश्वतारा, आत्रेयी, रात्रि, जरिता, श्रद्धा कामायनी, इन्द्रमातर, गोधा द्वारा रचित मन्त्र सामान्य प्रकृति के हैं। किन्तु रोमाशा, लोपामुद्रा[19], अपाला[20], यमी के मन्त्र अपनी यौन अभिव्यक्ति के ऊपर केन्द्रित हैं जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधों के परे जाकर ये अपनी यौन स्वतंत्रता की उद्घोषणा कर रही हैं। “इस क्रम में यमी का उल्लेख किया जा सकता है जो अपने भाई यम को यौन संबंधों के लिए आमंत्रित करती है[21]। संभवत: इस तरह के संबंधों की उस समाज में स्वीकृति हो तथा वे अधिक उत्पादक माने जाते हों! “इंद्र तथा उनके मित्र वृषाकपि और पत्नी इन्द्रनी के बीच हुए संवाद स्त्री यौनिकता, उसकी अभिव्यक्ति एवं उसे नियंत्रित तथा संचालित करने पर केन्द्रित है”[22]। “उर्वशी का पुरुरवा के साथ सशर्त संबंध बनाना और शर्त टूटने पर पुरुरवा को ठुकरा देना उल्लेखनीय है[23]। “अपाला द्वरा रचित आठवें मंडल का सूक्त सं.91 एक स्त्री के मनोभावों की चर्चा करता है अत: यह अति विशिष्ट है[24]। “इंद्राणी और शची पौलोमी की ऋचाएँ सौतनों का उल्लेख करती हैं। प्रेम में इंद्र द्वारा एकनिष्ठता दिखाए जाने तथा सौतनों से मुक्ति पाने के लिए इन्द्राणी द्वारा रचित सूक्त अत्यंत रोचक है क्योंकि इसमें जादू-टोन का विस्तार से वर्णन है[25]। इस प्रकार के उदाहरण महिलाओं को यौन पिपासु की तरह दर्शाने की चेष्टा कर रहें हैं। इससे यह संकेत प्राप्त हो रहा है कि ये महिलाऐं समाज में यौनाभिव्यक्ति से संबंधित ऋचाएँ लिखकर कोई बौद्धिक योगदान नहीं कर रही हैं बल्कि अपने यौन संसाधनों की पूर्ती हेतु ही इनके द्वारा सभी युक्तियाँ की जा रही है। ये भी लग रहा है कि केवल महिलाऐं ही अपने यौनिक संबंधों हेतु परेशान हैं, पुरुषों की ऐसी कोई इच्छा नहीं। या तो पुरुष बहुत महान हैं जिन्हें अपनी यौनिकता पर नियंत्रण को लेकर महारत हासिल है और महिलाऐं अपनी यौनिकता को लेकर अनियंत्रित और संभवत: सशंकित भी लगती हैं। महिलाओं की इस नैसर्गिक इच्छा को यौन पिपासु दिखाना कहाँ तक उचित है? क्या नैसर्गिक इच्छाओं की अभिव्यक्ति करना बौद्धिक रूप से लोगों को सतही साबित कर सकता है! इन ऋषिकाओं द्वारा यौनाभिव्यक्ति से संबंधित श्रुतियों का उचित मूल्यांकन न करते हुए इतिहासकारों तथा बुद्धिजीवियों द्वारा आलोचना करना उन महिलाओं द्वारा की गई किसी भी प्रकार की अभिव्यक्ति को नकारना है। केवल इन श्रुतियों को ही नहीं बल्कि यौनाभिव्यक्ति के इतर भी जिन महिलाओं ने श्रुतियों की रचना की उन श्रुतियों को भी सामाजिक उपयोगिता के लिहाज से नजरअंदाज कर दिया गया।

ऋग्वेद से जो भी तथ्य प्राप्त हुए हैं वह महिलाओं के वेदकालीन समाज में अच्छी स्थिति का दावा करने वाले लोगों के ऊपर एक प्रश्न खड़ा करते हैं कि क्या महिलाओं की सशक्त स्थिति केवल यौनिकता के मुद्दे से जोड़कर देखी जा रही थी? यदि यह सत्य है तो स्वतंत्र इच्छा को अभिव्यक्त करने वाली ये महिलाऐं पितृसत्ता को ग्राह्य क्यों नहीं थीं? क्यों इनके द्वारा रचित ऋचाओं को समाज द्वारा उपयोगी ऋचाओं में नहीं गिना जाता? आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षणिक अधिकारों की आवश्यकता महिलाओं को नहीं थी? जिन महिलाओं की स्थिति अच्छी थी भी तो वे किस वर्ग और श्रेणी की थीं, उसपर भी ध्यान देना आवश्यक है। ऋचाएं लिखने वाली महिलाऐं उच्च वर्ग तथा सभी प्रकार के संसाधनों से लैस थीं जो सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहीं थीं। इसके साथ ही यौनिकता का मुद्दा भारतीय समाज में हमेशा से एक दबी हुई परिकल्पना के रूप मौजूद रही है। जब-जब लोगों ने खुल कर अपनी यौनिकता को प्रदर्शित किया है कि हमें अमुक जाति, अमुक व्यक्ति या अमुक धर्म के व्यक्ति के साथ विवाह करना है या संबंध में जाना है तो समाज ने सदा उसे उपेक्षित किया क्योंकि यौनिकता के मुद्दे को तय करने की जिम्मेदारी या तो परिवार या फिर जाति तथा धर्म संस्कृति के ठेकेदारों की है। इन्हीं लोगों ने समाज की संरचना विभन्न जाति, वर्ग, धर्म और समुदाय के नाम पर की है। विवाह संस्था के माध्यम से यौनिकता निर्धारण करने की जिम्मेदारी पारिवारिक पितृसत्ता के द्वारा की जाती है। तभी तो विवाह संस्था आज तक कायम है। विवाह के माध्यम से परिवार यह तय करता है कि किसी स्त्री को या पुरुष को किसके साथ और कब संबंध स्थापित करना है। इस नियमों को स्थापित करने के लिए कानून और रीति रिवाज का सहारा लिया गया है। कई समाजों में यौनिकता संबंधी स्वायत्त निर्णय लेने पर फतवा और ऑनर किलिंग जैसे अमानवीय कृत्य तक हो जाते हैं जो मनुष्यों के जीवन जीने के अधिकार में एक सेंघ की तरह है।

समकालीन समय में समलिंगी संबंधों के लिए अपनी यौनिकता अभिव्यक्त करने वाले लोगों पर कानून द्वारा इसे अवैध कर दिया गया है। जबकि यौनिकता का मसला, जात-पात, लिंग, नस्ल एवं प्रकृति से परे है। समाज में यौनिकता को अभिव्यक्त करने वाले लोगों को बुरे लोगों की श्रेणी में रखा जाता है और समाज के मानकों के अनुसार यह घृणित अभिव्यक्ति है। पहले भी यही बात वैदिक समाज में अपनी यौनाभिव्यक्ति को प्रदर्शित करनेवाली महिलाओं के लिए मानी जाती थी और आज यह मसला समाज, धर्म और यहाँ तक कानून के लिए भी अवैध ही है? तो क्या यह मानवों के जीवन जीने के अधिकारों का यह हनन नहीं? क्या हमारा समाज अपने को आधुनिक कहने का हकदार है? दो हजार साल प्राचीन मानसिकता आज भी हमारे समाज में मौजूद है क्या यह मानवाधिकार हनन का परिचायक नहीं? क्या यह स्त्री अधिकार हनन का परिचायक नहीं? यहीं पर वेदकालीन समाज की स्त्रियों के सशक्तिकरण का दावा करनेवाले और आधुनिक समाज में स्त्री अधिकारों की वकालत करनेवाले लोगों की कलई खुल जाती है।

संदर्भ ग्रंथ

अंबेडकर,डॉ. बी.आर(2007), सम्पूर्ण वांग्मय, वो.7,सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली

इंद्र का उल्लेख ऋग्वेद में सर्वाधिक महत्वपूर्ण देवता के रूप में मिलता है|

शर्मा,आर.एस(1993),प्राचीन भारत में भौतिक प्रगति एवं सामाजिक संरचनाएं, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

चटोपाध्याय,अन्नपूर्णा(2009), स्टडींग द इकानामिक पोजीशन आफ वुमन इन धर्मशास्त्राज, रावत प्रकाशन, नई दिल्ली

वृहदारन्यक उपनिषद,

ऋग्वेद से हमें 16 ऋषिकाओं के नाम मिलते हैं| उदा.रोमशा(ऋ.वे.1.126.7),लोपामुद्रा(ऋ.वे.i.179.1-6),विश्वतारा अत्रेयी(ऋ.वे.v.28.1-6),अपाला(ऋ.वे.viii.91.1-7),यमी(ऋ.वे.x.10.1-14),घोषा(ऋ.वे.x.40),सूर्या(ऋ.वे.x.85.1-47)उर्वशी(ऋ.वे.x.95.1.18),रात्रि(ऋ.वे.x.127.1-8),जरिता(ऋ.वे.x.142.1-2),इन्द्राणी(ऋ.वे.x.145.1-6)श्रद्धा कामायनी(ऋ.वे.x.151.1-5),इन्द्र्मातर(ऋ.वे.x.153.1-5),शची पौलोमी(ऋ.वे.x.159.1-6)गोधा(ऋ.वे.x.134.7),सरमा देव्शुनी(ऋ.वे.x.108.2,4,6,8,10-11).

  1. अंबेडकर,डॉ. बी.आर(2007), सम्पूर्ण वांग्मय, वो.7, पृ.207-208

  2. .इंद्र का उल्लेख ऋग्वेद में सर्वाधिक महत्वपूर्ण देवता के रूप में मिलता है|

  3. .शर्मा,आर.एस(1993),प्राचीन भारत में भौतिक प्रगति एवं सामाजिक संरचनाएं, पृ.60

  4. वही, पृ.72

  5. ऋ.वे.x.90.1-16

  6. चटोपाध्याय,अन्नपूर्णा(2009), स्टडींग द इकानामिक पोजीशन आफ वुमन इन धर्मशास्त्राज, पृ.203

  7. ऋ.वे.I.112.10;ऋ.वे.I.116.15

  8. ऋ.वे.V.30.9;ऋ.वे.V.61.5-8

  9. ऋ.वे.x.102;1-2

  10. ऋ.वे.I.112.10

  11. ऋ.वे.V.61.6

  12. ऋ.वे.x.102.2

  13. ऋ.वे.vii.104.17;viii.33.17;viii.33.17;x.95.15

  14. ऋ.वे.iii.31.2

  15. ऋ.वे.x.34.2

  16. ऋ.वे.i.23.24;54.ii;85.12;94.8;iii.2;117.25;129.7(सभी प्रथम मंडल में)

  17. वृहदारन्यक उपनिषद,vi.4.17

  18. ऋग्वेद से हमें 16 ऋषिकाओं के नाम मिलते हैं| उदा.रोमशा(ऋ.वे.1.126.7),लोपामुद्रा(ऋ.वे.i.179.1-6),विश्वतारा अत्रेयी(ऋ.वे.v.28.1-6),अपाला(ऋ.वे.viii.91.1-7),यमी(ऋ.वे.x.10.1-14),घोषा(ऋ.वे.x.40),सूर्या(ऋ.वे.x.85.1-47)उर्वशी(ऋ.वे.x.95.1.18),रात्रि(ऋ.वे.x.127.1-8),जरिता(ऋ.वे.x.142.1-2),इन्द्राणी(ऋ.वे.x.145.1-6)श्रद्धा कामायनी(ऋ.वे.x.151.1-5),इन्द्र्मातर(ऋ.वे.x.153.1-5),शची पौलोमी(ऋ.वे.x.159.1-6)गोधा(ऋ.वे.x.134.7),सरमा देव्शुनी(ऋ.वे.x.108.2,4,6,8,10-11).

  19. ऋ.वे.i.126.7

  20. ऋ.वे.i.179.1

  21. ऋ.वे.x.10.7

  22. ऋ.वे.x.86.1-23

  23. ऋ.वे.x.95.1-18

  24. ऋ.वे.viii.91.2,ऋ.वे.viii.91.4

  25. ऋ.वे.x.145.1,195.2

‘‘स्त्री-मुक्ति की राहें’’ सपने और हकीकत-डॉ. रामचन्द्र पाण्डेय

0
selective focus photography of walking crowd
Photo by Dewang Gupta on Unsplash

‘‘स्त्री-मुक्ति की राहें’’ सपने और हकीकत

डॉ. रामचन्द्र पाण्डेय

हमारी परम्परा और संस्कृति में स्त्री सदैव ‘देवि, माँ सहचरि तथा अपने सभी रूपों में सम्मान और श्रद्धा की ही अधिकारिणी रही है। उसके महत्त्व को, उसकी अस्मिता को हमेशा पुरुषों के महत्व और उसकी अस्मिता से ज्यादा तरजीह दी जाती रही है। ‘विनायक’ से पहले ‘वाणी’ (सरस्वती) ‘परमेश्वर’ से पहले ‘पार्वती’, (पार्वती परमेश्वरौ) राम से पहले सीता, कृष्ण से पहले राधा की स्तुति हमारे अपने भारतीय समाज की तथा उसकी परम्परा और संस्कृति की एक ऐसी जीवन्त और प्राणवान चिन्तनधारा रही है जिससे आज समूचे विश्व को आलोक ग्रहण की ज़रूरत है। नारी स्वतंत्रता की बात करने वाले तथा स्वतंत्रता के आधार उसकी देह का बाज़ारीकरण कर उसकी आत्मा, शरीर तथा अस्मिता को रौंदने वाले देह व्यापारी आज अपने आपको विकसित और सभ्य उद्घोषित कर आत्ममुधता के शिकार होकर विश्व को गुमराह कर रहे हैं। नारी की शक्ति को, उसकी रचनात्मक तथा सृजनात्मक भूमिका को उसके पूरे सम्मान के साथ प्रतिष्ठित न करने वाला समाज कभी सभ्य समाज हो ही नहीं सकता, विकसित समझना तो उसकी सबसे बड़ी भ्रान्ति होगी।

यह सच है कि लगातार विदेशियों के आक्रमण और क्रूर दमन के परिणामस्वरूप हमारे अपने समाज में भी ऐसी बहुत सी अधोगामी रूढ़ियाँ प्रचलित हो गयीं थीं जो स्त्रियों के प्रति सर्वथा क्रूर और अमानवीय थीं। तमाम प्रकार के अमानवीय प्रतिबंधों ने भारतीय समाज की स्त्रियों के जीवन को नारकीय तथा यन्त्रणापूर्ण बना दिया था। लेकिन हमारे मनीषियों और युग-प्रेरकों ने अपनी चिन्तनशील तथा वैचारिक ओजस्विता से इन सारी कुप्रथाओं को भस्मीभूत कर दिया जिसके परिणामस्वरूप आज हमारा भारतीय समाज स्त्रियों के सम्मान के लिए, उसकी अस्मिता के महत्त्व तथा स्वीकरण के लिए कृतसंकल्प है। लेकिन चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुईं। हमें और सतर्क और सचेत होने की ज़रूरत है।

इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि समय-समय पर अनेक ऐसी अमानुषिक ताकतें उभरी हैं जो मुक्ति की बात कर परोक्ष रूप से एक भयंकर शोषण के षड्यंत्र चक्र को मजबूत आकार तथा आधार देती रही हैं।

आज बाज़ारवाद ने भी स्त्रियों की स्वतंत्रता की आड़ में उसकी देह को अधिकतम लाभ देने वाली उपभोग की वस्तु बनाकर रख दिया है। एक ऐसा भयंकर षड्यंत्र चल रहा है जो स्त्री की देह तथा उसकी आत्मा का मूल्य लगाकर उन्हें अपनी हवस का शिकार बना रहा है तथा उनसे पूँजी का भी सृजन कर रहा है। और इस पूँजी से युवतियों की एक लम्बी कतार भी खड़ी कर रहा है। इस बाज़ारवाद ने स्त्रियों के बदन से कपड़े भी उतारे हैं और उसकी चेतना तथा आत्मा के लज्जाशील वस्त्रों को भी तार-तार कर दिया है। बाज़ार का दिखावा ऐसा है, दम ऐसा भरा जा रहा है जैसे वे (बाज़ार) कोई समाज सुधारक हों, स्त्री हित के मसीहा हों। बाज़ार ने जो स्त्री को उसके आवरणों से मुक्त किया है वह स्त्री स्वतंत्रता की कामना से नहीं अपितु उसकी देह के अबाध इस्तेमाल के लिए। यह बाज़ारवाद का ही प्रभाव है कि आज स्त्री की चरित्रहीनता को उसकी प्रगतिशीलता का दूसरा रूप ही मान लिया गया है। यह न तो समाज-हित में है और न ही स्त्री-हित में। चरित्रहीनता और पतन चाहे स्त्री का हो या फिर पुरुष का वह कभी स्वीकरणीय नहीं, समाज के लिए हितकारक नहीं। निदा फाज़ली के शब्दों में-

‘‘वो किसी एक मर्द के साथ

ज्यादा दिन नहीं रह सकती

ये उसकी कमजोरी नहीं/सच्चाई है

लेकिन जितने दिन वो जिसके साथ रहती है

उसके साथ बेवफाई नहीं करती

उसे लोग भले ही कुछ कहें

मगर!!

किसी एक घर में

जिन्दगी भर झूठ बोलने से

अलग-अलग मकानों में सच्चाइयां बिखेरना

ज़्यादा बेहतर है।’’1

दाम्पत्य को माधुर्यपूर्ण बनाकर घर, परिवार, समाज और राष्ट्र की शिराओं में स्वच्छ लहू बनकर संचरण करना नारी जीवन का यथार्थ हो सकता है न कि अलग-अलग मकानों में बेहयाई की सच्चाइयाँ बिखेरना।

आज नारियाँ समाज के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी रचनात्मक भूमिका निभा रही हैं। वे पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं बल्कि कई मामलों में तो पुरुषों को कहीं पीछे भी छोड़ रही हैं। समाज और राष्ट्र का भी यह दायित्व है कि वे एक ऐसे स्वस्थ समाज का सृजन करें जिसमें स्त्रियों के आगे बढ़ने के अवसर भी सृजित हों तथा उनकी सुरक्षा का भी पूर्ण प्रबंध हो। आज स्त्रियों के आगे बढ़ने के अनेक अवसर तो उपलब्ध हैं लेकिन उनकी सुरक्षा का पूर्ण प्रबंध नहीं। परिणामतः स्त्रियों के शोषण के कई दरवाजे भी खुल गये हैं। गाँव से लेकर महानगर तक के कैरियर के सफर में कई चरणों में उन्हें अपनी कीमत चुकानी पड़ती है, कई चरणों में उनका भयंकर शोषण होता है। आये दिन राष्ट्र में होती बलात्कार की घटनाएँ हों या हिंसा तथा उत्पीड़न की घटनाएँ किसी भी समाज तथा राष्ट्र के लिए भयंकर कलंक से कम नहीं। समाज के हर व्यक्ति को आगे बढ़कर महिलाओं की सुरक्षा के लिए कृतसंकल्प होना पड़ेगा, उनके आगे बढ़ने के सपने को पूरा तथा उनके सफर को सुरक्षित बनाना पड़ेगा। तभी हम एक सभ्य समाज का सृजन कर पायेंगे और एक विकसित राष्ट्र का भी और यह नारी जीवन में बदलाव लाकर ही संभव हो सकेगा। केवल दिखावे की भाषणबाजी और नकली तालियाँ बटोरने से समाज में कोई बदलाव नहीं आने वाला। निर्मला पुतुल की ये पंक्तियाँ हमें सावधान करने के लिए पर्याप्त हैं-

‘‘…..एक बार फिर

ऊँची नाक वाली अधकटे ब्लाऊज पहने महिलाएँ

करेंगी हमारे जुलूस का नेतृत्व

और प्रतिनिधित्व के नाम

मंचासीन होंगी सामने

एक बार फिर

किसी विशाल बैनर के तले

मंच से खड़ी माइक पर वे चीखेंगी

व्यवस्था के विरुद्ध

और हमारी तालियाँ बटोरते

हाथ उठाकर देंगीं

साथ होने का भरम।।2’’

साथ होने का नकली भरम पैदा करने वालों से सावधान होगा, नहीं तो मानव विरोधी यह बाजारवादी संस्कृति जवान लड़की को अपने गंदे मंसूबों से खेलने का एक खिलौना ही बना लेगी और जवानी ढलते उन्हें सत्ता के अन्य दलालों की रखैल बनाकर तथा खुद के लिए जवान होती लड़कियों की एक नई कतार खड़ी कर लेगी। इससे उनका सुधरा जीवन तो और भी अधिक नारकीय और त्रासदपूर्ण हो जायेगा। ‘त्रिभुवन की एक कविता अवलोकनीय है’ जो बाज़ारीकरण के घिनौने रूप को बयाँ करने में पूर्णतः सक्षम है-

‘‘फार्म हाउस से वह होटल-होटल पहुँचती है

इस लंपट से उस लंपट

इस देह से उस देह के पुल को

पार करती एक गंदगी नदी बनती है

…..और एक दिन

फूटता है इच्छाओं के कण्ठ से आत्र्तनाद

और झाड़़ती है इच्छाएँ अपने अधोवस्त्र

तो पटपट गिरने लगते हैं

सेठ, साहूकार, प्रशासनिक, पुलिस अधिकारी

राजनेता, न्यायाधीश, समाजसेवी,

मीडियाकर्मी धर्माधिकारी।’’3

नारी की स्वतंत्रता का कर्कश स्वरों में उद्घोष करने वाले नकाबपोश भेड़िये पर्दे के पीछे उनकी देह का ही उपभोग कर रहे हैं। इसके पीछे एक लम्बा नेटवर्क काम कर रहा है। आज नारी को उन्नति के सपने दिखाकर गुमराह किया जा रहा है। नारी को अपनी उन्नति के लिए आज ऐसे संकरे रास्तों से गुजरना पड़ रहा है जहाँ आगे बढ़ने के लिए उसे अपने बदन से कपड़े उतारने ही होंगे, कदम-दर-कदम उसे जिस्म के भूखे भेड़ियों को अपना गर्म गोश्त पेश करना ही होगा, तभी ये बाज़ारवादी भेड़िये नारी को प्रगतिशीलता, आधुनिकता (माडर्निटी) तथा स्वतंत्रता का तमगा देते हैं और तकलीफ की बात तो यह है कि कुछ अतिशय महत्त्वाकांक्षी तथा कुछ मज़बूर नारियों ने भी सफलता के इन घिनौने और शार्टकट रास्तों को ही इस प्रकार वाजिब और सही करार दिया है जैसे यह सचमुच उन्हें मुक्ति के द्वार तक ले जाने में सक्षम हो। संकट तब और अधिक भयावह और खतरनाक हो जाता है जब उसे जीवन का सहज अंग तथा वास्तविक नियति ही मान लिया जाये। आज की अधिसंख्य नारियों ने भी अपनी देह के बाज़ारीकरण को अपनी वास्तविक नियति ही मान लिया है और इस पर उन्हें कोई पछतावा नहीं क्योंकि उनकी नज़र में तो यही माडर्निटी है, यही स्वतंत्रता है, यही उनकी मुक्ति की राहे हैं। आज बाज़ारीकरण ने नारी की देह के शोषण-दर-शोषण को इतना अनिवार्य तथा आवश्यक बना दिया है कि उसे अपनी देह ही नहीं आत्मा की गुलामी तक का अहसास नहीं। पैसे की चकाचैंध ने उन्हें इतना अंधा बना दिया है कि वे अपनी अस्मिता को बेंचकर भी अपनी मुस्कान से बाज़ारी संस्कृति को गुलजार कर रहीं हैं। बाज़ारू संस्कृति न केवल नारी देह का उपभोग करती है, उससे पूँजी सृजित करती है बल्कि उसकी मुस्कान, उसकी हँसी, उसके रुदन तथा उसके आँसुओें से भी मुनाफाखोरी करती है।

‘‘अब महज़ बस्ती-भर नहीं रह गया

हमारा कुरूवा

शहर में दूर तक फैले बाजार का

एक हिस्सा बन गया है यह

….यहां दारू, ताड़ी, हड़िया ही नहीं बिकता

ठंडे और गर्म गोश्त भी बिकते हैं

बिकती है हंसी-ठट्ठा और खिलखिलाहटें

ठंडी दिनचर्या से बनी

गर्म-गर्म रातें।4’’

आज नारी को सशक्त बनाने की कामना रखने वाले नीति-निर्देशकों (निर्माताओं) के लिए यह एक बड़़ी चुनौती है कि वे नारी को किस प्रकार बाज़ारीकरण की उपभोगवादी, देह-व्यापारी संस्कृति से सुरक्षित करेंगे, बिना उसकी प्रगति की राहों को अवरुद्ध किये। और नारियों को भी अपनी देह को उपभोग की ‘‘वस्तु’’ बनाने वाले फूहड़ ‘कल्चर’ के ठेकेदारों से खुलकर संघर्ष करना होगा, उनके गंदे मंसूबों को नाकामयाब बनाना होगा, स्वयं को प्रलोभनों से मुक्त रखकर। क्योंकि उपभोक्तावादियों के लिए स्त्री एक शरीर है और उसके शरीर का इस्तेमाल भोग की वस्तु की तरह ही करना है। तभी तो नारी मुक्ति के फायदे हैं।

‘‘अच्छा है मुक्त हो रही हैं/मिल सकेंगी/स्वच्छन्द अब संभोग के लिए’’5 आज हमें जहाँ सामाजिक स्तर पर नारी को तमाम बँधनों से मुक्त करने की ज़रूरत है वहीं स्त्री की स्वच्छन्दता की आड़ में उसकी देह को संभोग का साधन बनाने वाली उपभोक्तावादी बाज़ारीकरण की संस्कृति से भी उसे बचाने की ज़रूरत है। एक तरफ उन्हें गर्भ में ही मार दिये जाने से बचाना होगा तो दूसरी ओर सख्त कानून बनाकर आये दिन होते बलात्कार और छेड़खानी से मुक्त बनाना होगा। उन्हें प्राप्त संवैधानिक अधिकारों का क्रियान्वयन प्रभावशाली तरीके से करना होगा, जिससे नारी प्रगति के स्वर्णिम शिखरों तक की अपनी यात्रा को बिना किसी भय के, बिना किसी अवरोध के तय कर सकें, अपनी सम्पूर्ण रचनात्मक शक्ति के साथ। नारी के सशक्तीकरण से ही राष्ट्र के सशक्तीकरण की प्रक्रिया पूर्ण होगी। आज हमें नारी मुक्ति की ऐसी राहें तलाशनी है जिसमें उनकी ख्व़ाबों की दुनिया एक हकीकत की खू़बसूरत दुनियाँ में तब्दील हो सके।

संदर्भ ग्रन्थ सूची-

  1. सफर में धूप तो होगी, निदा फाज़ली, पृ0सं0-146 ।

  2. आज की कविता, विनय विश्वास, पृ0सं0-187।

  3. इन्द्रप्रस्थ भारती, अप्रैल-जून, 2004, पृ0 सं0-52 ।

  4. अपने ही घर की तलाश में, निर्मला पुतुल (संथाली से अनुवाद अशोक सिंह), पृ0सं0-81 ।

  5. वसुधा 59-60, स्त्री मुक्ति का सपना, अक्टूबर 2003 से मार्च 2004, पृ0सं0-145।

डॉ. रामचन्द्र पाण्डेय

विभागाध्यक्ष

हिन्दी विभाग

ईष्वर सरन डिग्री कालेज

इलाहाबाद

मो. 8853466968

आर्थिक दुर्बलता के कारण सामंती व्यवस्था का शिकार होती दलित स्त्रियाँ-माधनुरे श्यामसुंदर

0
woman in yellow shirt standing beside green plants during daytime
Photo by Deepak kumar on Unsplash

‘आर्थिक दुर्बलता के कारण सामंती व्यवस्था का शिकार होती दलित स्त्रियाँ’

माधनुरे श्यामसुंदर

समाज में जो आज दलित स्त्रियों की दुरावस्था है आए दिन उनके साथ हत्या बलात्कार उत्पीडन की त्रासद घटनाएं घटती रहती है। इसके पीछे जितनी संवेदन शून्य जन समाज रहा है उस में कम उत्तरदाई हमारे प्राचीन शास्त्र रुढ़िवादी विचारधाराओं के पोषक व्यक्ति भी रहे हैं। इसी का परिणाम आज की दलित स्त्री भोग रही है। नीरा परमार का मानना है कि- “शास्त्रों ने स्त्री की अस्मिता, गरिमा और स्वतंत्रता को नकारते हुए अपने गंदे वसूलों से उसका कद छोटा ही किया है। कोई भी लड़की जब जन्म लेती है तब वह संपूर्ण व्यक्ति होती है। जैसे-जैसे वह बड़ी होती है उसे शास्त्र, रीति-रिवाज, लिंग, भेद के खांचों में कसकर औरत बनाया जाता है। यह मत करो, यह मत कहों, ऐसे मत उठो-बैठों, ऐसे मत बरतो की धाराएं फैलते-फैलते स्त्री मनुष्य की विकास यात्रा से बहुत दूर छिटक जाती है। हमारे धर्म और शास्त्रों ने स्त्रियों का शोषण योजनाबद्ध रूप से किया है। जब-जब स्त्रियों का दमन करना होता ऐसे ही ग्रंथों का हवाला देकर उसकी अस्मिता को कुचल ने का प्रयास किया जाता रहा है। हमारे धर्म ने स्त्रियों का आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को कुंठित कर दिया है”। इसलिए परंपरागत व्यवस्था में स्त्री को कोई अधिकार प्राप्त नहीं थे। इस कारण स्त्री पर दमन शोषण होता रहा।

भारतीय समाज में कई ऐसी परम्पराए हैं जो अपनी विकृति के कारण आज अभिशाप बन गई है। दहेज़ भी एक ऐसी ही कुरीति है जिसके कारण प्रतिवर्ष हजारों स्त्रियां इसकी बलि वेदी पर चढ़ जाती है। विवाह एक धार्मिक अनुष्ठान है जिसमे प्राचीन काल से ही सभी पिता पूरी सामर्थ्य से अधिकाधिक धन, वस्तुएं आदि अपनी विवाहित पुत्री को देते आएं है ताकि उसका भावी जीवन समृद्ध शाली हो सके व उपहार के रूप में शुरू हुई यह दहेज़ की परम्परा आज एक अनिवार्य समाज का अंग बन गई है। प्राचीन काल से चली आ रही यह परम्परा आज के आर्थिक युग में व्यक्ति की स्वार्थी महत्त्वाकांक्षाओं के बोझ तले तब गई है। दहेज़ अकेला ऐसा नासूर है जिसके कारण भारतीय समाज में कन्या का जन्म होने पर अधिकरत परिवार खुशियां नहीं मनाते हैं। कन्या जन्म को अभिशाप माना जाने लगा। कन्या के जन्म के साथ ही माँ बाप उसके विवाह की चिंता करने लगते है। इसी का उदाहरण ‘थमेगा नहीं विद्रोह’ उपन्यास में देख सकते है। यद्यपि देवी की जात लगाने के लिए हजारों के कर्जदार बनकर खेतों में बेगारी करते है। देवी के ख़ुशी के नाम पर अपने परिवार का सत्यानाश करके आर्थिक मज़बूरी में बड़ी बेटी भागों का विवाह एक तपेदिक के मरीज से करते है। मां द्वारा इस बेमेल विवाह पर सवाल उठाने पर पुरुष अहंकार गालियाँ देकर पिटाई करते हुए उसे ही बेटियां पैदा करने का दोष देता है। “धडाधड हुआ कोठारी में घुसा और दो तीन चपेड लगाकर सोना को चुप कर दिया, लौंडिया ही लौंडिया की लैन लगा दी जन-जन कै, जब ना सोची यू बात, कै इनके ब्याह भी करनै पडौगो चुप हराम जादी जो एक ही सबद मूं सू लिकाडौ तौ।” इस तरह आर्थिक मज़बूरी में भागों का विवाह करना पड़ता है।

इस के बाद दलित स्त्री को इस सामन्ती व्यवस्था में गाँव के भू मालिको एवं संपन्न वर्ग द्वारा दलित महिलाओं के प्रति जुल्म व दुर्व्यवहार होते आए हैं। ‘थमेगा नहीं विद्रोह’ उपन्यास में तीन महिलाओं के साथ बलात्कार होता है जिस में अबोध चावली, रामबती गंगा की बहु आदि। इनके साथ दुष्कर्म भी होता है और एखाद हत्या भी कर दी जाती है। इस तरह अपराध जगण्य और क्रूरतम अपराध है। ऐसे विभिन्न कारणों से महिलाओं को इन अपराधो का सामना कारन पड़ता है। कई बार बलात्कार करने के बाद अपनी पहचान छिपाए रखने के लिए बलात्कारी पीड़ित स्त्री की हत्या कर देता है। इसका उदाहरण हम जस तस भय सवेर उपन्यास में देख सकते हैं। चौधरी देविपाल गाँव के सामंती वर्ग का प्रतिनिधि है। घांस लेने देविपाल के खेतों में गई रामरती, घुसिया, सन्नों बारिश में भीगने से बचने के लिए झोपड़ी में चली आई उनका पिछा करते हुए वह वही पहुँच जाता है। चौधरी देविपाल इन्हीं महिलाओं को डरा धमकाकर उनका यौन शोषण करता है। आपसी एकता के अभाव में घुसिया दोनों स्त्रियों को अकेला छोड़कर भाग आती है इस पर लेखक कहते हैं- ‘घुसिया पूरी शक्ति लगाकर प्रतिरोध करती रही, बेबस अवस्था में वह रोती कलपती रही, चिकती चिल्लाती रही। जैसी जी में आई गालियां भी बकती रही परन्तु कोई वहा उसकी पुकार सुननेवाला नहीं था क्योंकि वह नारी तो थी परन्तु थी तो दलित ही’। इसके बाद घुसिया का बलात्कार कर उसे छोड़ देता। लेकिन बलात्कार करते समय उसका मुन्ना देख लेता हैं ‘तभी उसी दंशती से चौधरी ने मुन्ना की गर्दन कुए की मन पर रख कर काट दी’। इस तरह चौधरी देविपाल दलित महिलाओं पर अत्याचार करता है। ऐसी विकृत मानसिकता से जुडे व्यक्ति पर टिप्पणी करते हुए निशांत सिंह कहते हैं- “कुछ व्यक्ति स्वभाव से ही विकृत मानसिकता के होते हैं दूसरों को सताकर उनको दुःख पहुंचाकर ऐसे व्यक्तियों को अजीब सा सुख मिलता है, संतोष मिलता है। कुछ व्यक्तियों की मानसिकता इतनी विकृत होती है कि वे चिकती चिल्लाती स्त्री से बलात्कार करना पसंद करते है”। यह पुरुष द्वारा किया जानेवाला सबसे घिनोना तथा अमानवीय कू कृत्य है। इसका विरोध करते हुए सुमेधा कहती है ऐसे जगण्य अपराध को खत्म करना ही होगा तभी दलित महिलाएं सर उठाकर जी सकेगी। “वर्षा और धीरे-धीरे मिट्ठी बहकर उस खाई में बह जाएगी वह तो युगों-युगों की कहानी है। जीवन अनित्य है कल किसने देखा। इसलिए आज ही इस खाई को करवट बदलनी होगी और जिस दिन यह खाई निश्चय पूर्वक करवट बदलेगी उसी दिन पडौस के उच्चे टीले को अपने में आत्मसात कर लेगी अर्थात जब मेहनत कश वर्ग इस कटु सत्य को समजेगा कि अर्थात निर्धन के साथ कथित रूप से समान रोटी-बेटी व्यवहार करनेवाले उसकी महिलाओं की इज्जत, अबरू, शील और लज्जा को अपनी वासना पूर्ति व वासना तृप्ति का साधन समजनेवाले उसका पेट काटकर उसका शोषण करनेवाले, उसे कीड़े मकौड़े जैसी जिंदगी देनेवाले ये सुविधाभोगी, सामन्तवादी एवं शोषक तथा कथित योग्य और दक्ष एशोआराम कर रहा है उसका पेट काटकर रंगरेलियां मनाई जा रही है। कुत्तों को मक्खन उसके मेहनत से खिलाया जा रहा है। जिस दिन गरीबी की परिभाषा बदल जाएगी उसी दिन निर्धनता का दुष्चक्र टूट जाएगा। उसी दिन मेहनतकशों का शोषण बंद होगा। इसके लिए उनमे इच्छा शक्ति जागृत करनी होगी, मार्क्स ने तो कहा भी था कि दुनिया के मजदूर एक हो जाओं क्योंकि तुम्हारे पास गुलामी की जंजीरों के अलावा खोने के लिए कुछ है ही नहीं।” इसलिए दलितों को अब ज्ञात हो रहा है कि ऐसी सामन्ती व्यवस्था का विरोध करना है तो इसके लिए हमें संघटित होना ही होगा।

ऐसा ही मिट्ठी की सौगंध उपन्यास में देख सकते हैं सामाजिक न्याय के पक्षधर और उपन्यास के नायक विजेंद्र सिंह के साथ हरिया सूरज और अंकुर है। मदन सिंह अत्याचारों के खिलाफ दलित इन्स्पेक्टर जगजीवनराम को शीला के साथ बलात्कार की गवाही देते और मदन सिंह के जुल्मों को ख़त्म करने के लिए मिट्ठी की सौगंध खाते है। उपन्यास का आरंभ गाँव के जमीदार ठाकुर मदन सिंह से होता है शीला अपने माँ के साथ घर बैठी कुछ काम कर रही है, ठाकुर मदन सिंह आता है और उसकी माँ के सामने ही जबरदस्ती बलात्कार करता है। दोनों चीख चिल्लाकर उसका विरोध करते है पर उसकी मदत करने के लिए कोई नहीं आता। शीला की इज्जत लुट जाती है और उसकी असाय माँ कुछ नहीं कर पाती। अपनी बेटी के साथ हुई इस दुखद घटना का बड़ा अघात लगता है। परिणाम कुछ ही दिनों बाद माँ की मृत्यु हो जाती है। पिता का साया तो पहले ही उठ चुक था अब माँ भी नहीं रही। वह बिल्कुल अनाथ हो जाती है। उसकी दूर की मौसी से सहारा ले लेती है। वही उसे आगे जीने के लिए प्रेरित करती है। और ठाकुर मदन सिंह से बदला लेने के लिए उकसाती है- “मैं तेरा दर्द समजती हूँ बिटियां लेकिन तूने हिम्मत हारी तो कल को दूसरी शीला की इज्जत भी लुट जाएगी। किसी से बदला लेने के लिए अपने अन्दर ताकत इक्कटा करनी होती है। तू इस जमात तक पढ़ी है इसे तू टकरा सकती है उस ठाकुर रूपी कुत्ते से”। शीला जमुनी मौसी से सहमत है इसलिए ठाकुर से बदला लेने का मन बना लेती है। इस गाँव में शीला ही ऐसी अकेली लड़की नहीं है जिसके साथ बलात्कार हुआ है। ऐसी कितनी स्त्रियाँ है जो इस तरह के अत्याचारों से गुजरती है। इस संदर्भ में वीरेन्द्र सिंह यादव का कहना हैं कि- “शीला जैसी अनेक लड़कियां, गंगा, रधिया, शीला की मौसी जमुना इसी बलात्कार की शिकार है। उपन्यास कार ने जुल्मी ठाकुर के खिलाफ उसी के लड़के विजेंद्र सिंह को खड़ा किया जो दलित युवती शीला के सारे कष्ट उठाकर भी शादी करता है। इस के माध्यम से उपन्यासकार ने जाति बंधन तोड़ने की भी बात की है, लेकिन खतरे भी होते यह भी नहीं भूला। किस तरह शीला और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को ख़त्म करने की ठाकुर मदन सिंह एवं उसकी माँ विजेंद्र सिंह की दादी माँ प्रयास करते हैं। और इंस्पेक्टर जनजीवन पर कातिलाना हमला करते है”। इस तरह शीला को न्याय दिलाने विजेंद्र सिंह खड़ा हो जाता है। ऐसा कम ही देखने को मिलता है जो अपने ही परिवार के खिलाफ ज्याता हुआ। ऐसे लोग कम ही मिलते है लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो न्याय के पक्षधर है। उनमे छप्पर उपन्यास की कमला को भी देखा सकते है। कमला के संदर्भ में माताप्रसाद का कहना है- “लेखक ने इस उपन्यास में कमला के माध्यम से बलात्कार और उत्पीडित जाति की दलित लड़कियों की करुण गाथा को उकेरा है। वही समाज को भी यह सन्देश दिया है कि ऐसी बेबस ललनाओं के साथ सहानुभूति रखकर उन्हें अपनाया जाए। उपन्यास में सामंत हरनाम सिंह की सुशिक्षित लड़की रजनी के असमानता के विरुद्ध आक्रोश फिर से दूर करने के लिए स्वयं भी उस संघर्ष में कूद पड़ना एक क्रांतिकारी कदम है जो समाजवाद की तरफ ले जाने में सहायक होता है। इस में हरनाम सिंह अपनी भूमि गरीबों में बाट देना आर्थिक समस्या का एक समाधान प्रस्तुत करता है”। इस तरह सामाजिक संतुलन बनाने के लिए क्रान्ति के साथ-साथ सवर्णों की मानसिकता में भी परिवर्तन होना जरुरी है तब जाकर महिलाओ पर अत्याचार होना बंद होगा।

जिस तरह हमने अत्यचार को हिंदी उपन्यासों में देखा उसी प्रकार मराठी उपन्यासों में भी कोई कमी नहीं है फिर भी हम हाडकी हाडवला को उदाहरन के रूप में देखे तो सामन्ती व्यवस्था का शिकार यहाँ भी अनेक महिलाएं हो चुकी हैं। बायजा का पति अपने घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण काम की तलास में मुंबई जाता है और काम मिलने पर कुछ पैसे घर भेजते रहता है। लेकिन भेजे हुए पैसे से घर पूर्ण रूप से नहीं चलता। यही सोचते हुए बायजा अपने बेटे सावला को भूखा तडपता हुआ नहीं देख सकती। इसलिए वह बाजू के खेत में सब्जी लाने जाती है तभी किसी ने आवाज दी- “ये…तेरी माँ का भोसड़ा क्या करती है उधर” तर्रर से उसके ऊपर आता है यह सब देखकर बायजा घबरा जाती है और कहती है- “कुछ नहीं पटेल थोड़ी सी सब्जी ले रही थी”। तभी घुस्से वह कहता है ‘तेरे माँ के पति ने रखा है क्या’? ऐसे कहते ही उसके दोनों हातों को पकड़कर जमीन पर लेट दिया। ऐसे अचानक प्रहार से बायजा डरने लगी। यह सब सावला देख रहा था। उसे रहा नहीं गया और अपने हाथों में पत्थर उठाकर उसे मारने लगा। यह पत्थर किसको लग रहे थे इसकी उसे चिंता नहीं थी पर माँ पर होने वाले अत्याचारों का विरोध कर रह था। बायजा चिकने चिल्लाने लगी पर सावला के अलावा उसकी आवाज सुननेवाला कोई नहीं था। सावला को रहा नहीं गया एक बड़ा सा पत्थर उठाकर उसके सिर में जोर से डाल देता हैं तभी सिर से खून बहने लगता है। यह देखकर बायजा को हिम्मत मिलती है और उसकी चंगुल से छुट जाती है। उसके बाद बायजा ने ही उसे पत्थरों से मारना चालू किया तभी बायजा और सावला दोनों को उस से छुटकारा मिला”। इस तरह स्वाभिमानी बायजा अपनी इज्जत बचाती है। बायजा के व्यक्तित्व पर टिपण्णी करते हुए डॉ. हनमंत रामचन्द्र पोल का कहना है- “नामदेव ढसाल में हाडकी हाडवला में एक स्वाभिमानी स्त्री की कथा को कहा है”। एक दलित स्त्री जानबुजकर अपनी इज्जत गवाना नहीं चाहती। चाहे वह बायजा हो या मिट्ठी की सौंगंध की शीला हो या अन्य स्त्री। वह आर्थिक मज़बूरी के कारण सामंतों के खेतों में जाते हैं और समय आने पर बायजा जैसा प्रतिकार भी करते हैं।

इस तरह हम देख सकते है कि दोनों भाषाओं के दलित उपन्यासों में सामन्ती व्यवस्था का शिकार होती दलित महिलाओं को देखा जा सकता है। ऐसा नहीं कि सामन्ती व्यवस्था में सारे सामंत बुरे है कुछ अच्छे भी है जो दलित समाज के दर्द को समज सकते है और उनको सहारा देते हैं। इसको हम अन्ना भाऊ के उपन्यास फकीरा में देख सकते है। जब रानोजी जोगनी का कटोरा लेकर गाँव आया था तभी उसकी जान जाती है अब घर का कर्ता व्यक्ति चले जाने के कारण उसकी पत्नी मजदूरी करने लगती है उसको देखकर रावसाहब पटेल को लगता है कि गाँव के खातिर उसने अपनी जान गवाई है और उसी के घर वाले मजदूरी कर रहे हैं। यह कैसा न्याय, तभी रावसाहब पटेल कहता है- “राधा मजदूरी कर रही है, ऐसा जब रानोजी को पता लगेगा तो वह मेरा सीर काट डालेगा। इसको कभी मजदूरी के लिए भेजना नहीं, घर में अनाज नहीं है यह ले कितना चाहिए एक दो तीन …और कितना चाहिए ले जा”। इस तरह समाज में रावसाहब, वीरेंद्र सिंह, कमला आदी जैसे लोग भी है जो सामाजिक समता के पक्षधर है। इसलिए जयप्रकाश कर्दम को भी लगता है कि- “सजा कोई समाधान नहीं रजनी। सजा देने की बजाय व्यक्ति की सुधार का प्रयास होना चाहिए। हिंसा का जवाब अहिंसा से दिया जाना चाहिए हमारा संघर्ष न्याय और समानता के लिए है। अतीत में हमारे साथ कैसा सलूक किया गया है, हम उस पर जाना नहीं चाहते क्योंकि उस से अच्छा परिणाम निकलने की आशा नहीं है, हम विरोध नहीं सामंजस्य चाहते है”। इस से हम यह देख सकते है कि हम सामाजिक न्याय के पक्षधर तो है पर हिंसा के पक्षधर नहीं। इसलिए दलित साहित्य बुद्ध के विचारों से प्रेरित है।

सन्दर्भ :-

1 दलित अस्मिता – सं.विमला थोरात – पृ.सं. 28 अप्रैल – जून 2013

2 थमेगा नहीं विद्रोह – उमराव सिंह जाठव – पृ.सं. 144

3 जस तस भय सवेर – सत्यप्रकाश – पृ.सं. 13

4 जस तस भय सवेर – सत्यप्रकाश – पृ.सं. 49

5 औरत अस्मिता और अपराध – डॉ. निशांत सिंह – पृ.सं. 50

6 जस तस भय सवेर – सत्यप्रकाश – पृ.सं. 47

7 मिट्ठी की सौगंध – प्रेम कपाड़िया – पृ.सं. 70

8 दलित विमर्श के विविध आयाम – वीरेन्द्र सिंह यादव – पृ.सं. 254

9 दलित अभिव्यक्ति संवाद और प्रतिवाद – जयप्रकाश कर्दम – पृ.सं. 62

10 हाडकी हाडवला – नामदेव ढसाल – पृ.सं. 22

11 अस्मितादर्श – सं. डॉ. गंगाधर पानतावने – वार्षिक वेशेषांक 2013 : वर्ष 46, अंक 3, पृ.सं. 17

12 फकिरा – अन्ना भाऊ साठे – पृ.सं. 21

13 दलित अभिव्यक्ति संवाद और प्रतिवाद – डॉ. जयप्रकाश कर्दम – सं. रूपचंद गौतम – पृ.सं. 61

संपर्क:-

NRS HOSTEL

K (WING) ROOM NO. 107

UNIVERSITY OF HYDERABD

500046

+919493014850