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हिन्दी यात्रा-वृत्तान्त और समाज: डॉ. मुकुल रंजन झा

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हिन्दी यात्रा-वृत्तान्त और समाज

सारांश

पूरी दुनिया आज जहां खड़ी है उनमें विभिन्न विषयों व क्षेत्रों पर केन्द्रित यात्रा वृतान्त हमारे ज्ञान बर्द्धन और सामाजिक विकास के लिए धुरी का काम करती हैं। विभिन्न विषयों व क्षेत्रों की तरह ही साहित्य में भी यात्रा वृतान्त एक महत्वपूर्ण विधा के रुप में स्थापित हैं। लेकिन साहित्य का क्षेत्र समाज किसी निश्चित गतिविधि का क्षेत्र नहीं है। उसके आयाम इतने हैं जितने की साहित्यकार क्षमता रखते हैं। इसे असीमित कह सकते है। हर साहित्यिक यात्रा की  अपनी विशेषता होती है। साहित्यिक यात्राएं प्राकृतिक सौदर्यकेन्द्रित हो सकती है तो जन जीवन के व्यवहारों पर भी केन्द्रित हो सकती है। दरअसल साहित्य की किसी भी विधा  के विषयों व पात्रों एवं परिस्थितियों का निर्धारण तात्कालिक वजहों से भी होती है। समाज में चलने वाले विविध आंदोलनों का प्रभाव विषयों के निर्धारण पर स्वबाविक रुप से होता है।

बीज शब्द: यात्रा, साहित्य, विषय, क्षेत्र, ज्ञान

शोध आलेख                                                        

गति के नियमों की खोज विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। यह माना जाता है कि गति ही जीवन हैं। समाज ने गतिशीलता के विविध आयामों की पहचान की है जो कि अकादमिक स्तर पर विषय व क्षेत्र के रुप में परिभाषित होती है। राजनीतिक, इतिहास, सामाजिक विज्ञान आदि विषयों व क्षेत्रों में गतिशीलता का अध्ययन किया जाता है। इस गतिशीलता की पड़ताल और उन क्षेत्रों में गतियों को और विकसित करने के लिए संबंधित क्षेत्रों में शोध किए जाते हैं। शोध के अपने निश्चित नियम हैं। उनमें गति के ठहराव, उनके कारणों की खोज के बाद उन्हें और गतिवान बनाने के लिए शोधार्थी अपने अनुभवों व अनुभूतियों एवं कल्पनाओं को बतौर सुझाव पेश करते हैं। इस तरह से शोध की ही एक विधा यात्रा है। इसीलिए हम पाते हैं कि विभिन्न विषयों व क्षेत्रों के लिए  यात्राओं को बहुत महत्व दिया जाता है। महात्मा गांधी ने दांडी तक की यात्रा की। इस यात्रा ने भारतीय राजनीति के ठहराव को तोड़ा और राष्ट्र के भीतर  एक नई राजनीतिक उर्जा का संचार किया। अलबिरूनी ने भारत की यात्रा करके उसकी जटिलताओं और उस भूभाग में संभावनाओं की खोज अपनी यात्राओं के दौरान की। इस तरह हम यह पाते हैं कि पूरी दुनिया आज जहां खड़ी है उनमें विभिन्न विषयों व क्षेत्रों पर केन्द्रित यात्रा वृतान्त हमारे ज्ञान बर्द्धन और सामाजिक विकास के लिए धुरी का काम करती हैं।

विभिन्न विषयों व क्षेत्रों की तरह ही साहित्य में भी यात्रा वृतान्त एक महत्वपूर्ण विधा के रुप में स्थापित हैं। लेकिन साहित्य का क्षेत्र समाज किसी निश्चित गतिविधि का क्षेत्र नहीं है। उसके आयाम इतने हैं जितने की साहित्यकार क्षमता रखते हैं। इसे असीमित कह सकते है। हर साहित्यिक यात्रा की  अपनी विशेषता होती है। साहित्यिक यात्राएं प्राकृतिक सौदर्यकेन्द्रित हो सकती है तो जन जीवन के व्यवहारों पर भी केन्द्रित हो सकती है। दरअसल साहित्य की किसी भी विधा  के विषयों व पात्रों एवं परिस्थितियों का निर्धारण तात्कालिक वजहों से भी होती है। समाज में चलने वाले विविध आंदोलनों का प्रभाव विषयों के निर्धारण पर स्वबाविक रुप से होता है।

भारत में साहित्यक यात्राओं का समाज शास्त्रीय  अध्ययन का अभाव दिखता हैं। पिछली सदी के आखिरी वर्षों से समाज शास्त्रीय विषय भारतीय समाज में विमर्शों के केन्द्र में हैं। साहित्य के विभिन्न विधाओं को भी इस विमर्श ने गहरे स्तर पर प्रभावित किया हैं। लिहाजा साहित्य के क्षेत्र में यह शोध बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि साहित्यिक यात्राओं में समाज शास्त्रीय दृष्टिकोण पर आधारित साहित्य की उपलब्धता किस रुप में है और यदि हैं तो उसकी सीमाएं क्या हैं। हर साहित्य का एक सामाजिक सरोकार होता है और भारत जैसे विभिन्नताओं व विविधताओं वाले समाज के लिए यह महत्वपूर्ण होता है कि किसी भी साहित्यिक रचनाकर्म के सरोकार की सीमाएं कहां जाकर रुकती है। साहित्य यात्राएं साहित्य के क्षेत्र में सृजनात्मकता को विस्तार देती है, यह तो सही है लेकिन उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि साहित्यिक यात्राएं अन्य क्षेत्रों व विषयों के लिए भी खिड़कियां होती है। साहित्यिक यात्रा वृतांतों का समाज शास्त्रीय अध्ययन को एक नई पहल के रुप में देखा जा सकता हैं। 

इस प्रकार समाज और यात्रा-वृत्तान्त का घनिष्ठ सम्बन्ध है। यात्रा-वृत्तान्त में समाज किसी न किसी रूप में अवश्य प्रतिबिंबित होती है। इसलिए समाज के साथ यात्रा-वृत्त भी बदलता और विकसित होता है। किसी भी यात्रा-वृत्त को समझने के लिये उस समय के समाज को समझना आवश्यक होता है। जिस किसी भी यात्रा-वृत्तान्तकार का विषय जितना व्यापक होता है वह अपनी रचनाओं में भी उतनी ही विविधताओं से प्रकट होता है। यात्रा-वृत्तान्तकार एक सजग और संवेदनशील व्यक्ति होता है। इसलिए यात्रा-क्रम में उन्हें जितने प्रकार के अनुभव प्राप्त होते हैं वह अपनी यात्रा-वृत्तान्त में उन्हें शब्द देने का प्रयास करते हैं। यात्रा-वृत्तान्तकार का रचना भी उनके व्यक्तित्त्व के समान ही बहु आयामी है। इसलिए उनके यात्रा-वृत्तांत में जीवन के  कई मोड़ मिलते हैं।

यात्रा-वृत्तान्तकार ने समकालीन समाज की मान्यताओं  का अध्ययन बड़े ही स्वाभाविक रूप में किये हैं। इन मान्यताओं के कारण ही यात्रा-वृत्तान्तकार को लिखने की प्रेरणा मिली। इसी ने उनके ह्रदय में मानवता का झरना भी बहाया और वे समाज की भलाई के लिए कुछ सोचने-समझने और कुछ करने के लिए कदम –कदम पर आगे बढ़ते हुए दिखाई दिए।

हम पाते हैं कि यात्रा-वृत्तान्तकार कला की धनी होने के साथ-साथ समाजसेवी भी हैं। यात्रा-वृत्तान्त में भी उनका यह रूप उभर कर सामने आया है। लेखक के लिये यात्रा-वृत्त का प्रत्येक क्षण अमूल्य है। इसलिए गरीबों का जीवन भी यात्री के ह्रदय को द्रवित कर देता है। बड़ी कठिनाई से लेखक प्रतिदिन जीवन के कार्यों का और गरीबी का चित्रण करते हैं। अध्ययन बताते हैं कि लेखक को कितनी छोटी-छोटी बातें और चीजें रोक लेती है और अपनी तरफ खींचती है। और इन छोटी –छोटी बातों से उनकी सम्पूर्ण जीवन दृष्टि बनती है।

यात्रा-वृत्तान्तकार जीवन के विभिन्न पक्ष को संवेदित करते हैं। एक यात्रा-वृत्तान्तकार जो कुछ देखते–सुनते , ग्रहण करते हैं  सबका उन पर प्रभाव पड़ता है। उनके मन पर सबकी छाप पड़ती है। वह हर चोट से झंकृत होते हैं। उनकी कुछ न कुछ प्रतिक्रिया अवश्य होती है। वह दुखी होते हैं, खुश होते हैं , चिन्ता, भय, रोमांच आदि सब अनुभव उन्हें होती है। वह हँसते भी हैं। गुस्सा भी होते हैं। ये सारे भाव उनमें उत्पन्न होते हैं।यात्रा के संपर्क से उनमें जो कुछ घटित होता है उसे एक साथ व्यक्त करते हैं।

उनके यात्रा-वृत्तान्त में अनेक संवेदन मिलते हैं। जीवन के अनेक रूप और स्थितियाँ मिलती है। जैसे – नदी, पहाड़, मानव-जीवन, संघर्ष, आशा-निराशा सब कुछ यहाँ मिलता है। इनके यात्रा-वृत्तान्त में संवेदना के अनेक स्थल मिलते हैं। यही लेखक की श्रेष्ठता है। यही उनकी यात्रा-वृत्तान्त की शक्ति है।यात्रा-वृत्तान्तकार न तो सिर्फ समाजशास्त्री है न राजनीतिक लेखक बल्कि सम्पूर्ण जीवन के यात्री हैं।

यात्रा-वृत्तान्तकार की रचनाओं  में जीवन के प्रश्नों के साथ ही उनके समाधान की भी  अभिव्यक्ति हुई है। उनके यात्रा-वृत्तान्तों के अध्ययन को समझने के लिये उनके सामाजिक चिंतन को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। वे दुःख का केवल यात्रा चित्रण करके नहीं रह जाते हैं बल्कि उसके कारक का अध्ययन करते हुए उसके समाधान का मार्ग भी प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। वे प्रश्न भी करते हैं  और इन प्रश्नों के उत्तर के लिये वे जीवट की तरह दुःख की तह में भी जाते हैं।

आगे विस्तार की यह स्थिति समाज और उसके समूचे परिवेश में रमते हुए देश और विश्व के व्यापक छोरों को स्पर्श करते है।यात्रा-वृत्तान्तकार केवल दुखी के प्रति सहानुभूति दिखा कर ही नहीं रह जाता बल्कि एक सामाजिक सरोकार से युक्त यात्रा-वृत्तान्तकार के रूप में पाठक के लिए मनुष्य के कर्म के रूप को प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। यात्रा-वृत्तान्तकार ने यात्रा-वृत्तान्त का चित्रण करते समय बाहरी वातावरण, स्थान विशेष  और सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का अध्ययन किया है। इसके अंतर्गत यात्रा-वृत्तान्तकार ने बाहरी चित्रण में व्यक्तियों की वेश-भूषा, कार्य-व्यवहार, नाम, रूप-रंग, भाव-भंगिमा, विचारों का आदान-प्रदान आदि का अध्ययन किया  है।रचनाकार ने इन सब बातों को बहुत सुन्दर ढ़ंग से व्यक्त किया है। इस प्रकार यात्रा-वृत्तान्तकार बाहरी यात्रा चित्रण का समाजशास्त्रीय अध्ययन निम्नांकित रूप में किये हैं। यात्रा-वृत्तान्तकार समाज के जिस जाति की प्रवृत्तियाँ, रहन-सहन  या स्वभाव के बारे में जानना चाहते हैं उसके सम्बन्ध में कुछ जानने का सबसे अच्छा अवसरस्थान विशेष यात्रा का होता है। जैसे – “ मालूम हुआ कि जिस होटल में हम ठहराए गए हैं वह पीकिंग के बढ़िया होटलों में दूसरे नंबर पर है। लेकिन इस दस मंज़िले होटल कि इमारत में या कि इसके कमरों में ऐसा कुछ भी नहीं जिसे भव्य कहा जा सके। बड़े होटलों में सर्वथा अभाव था। कर्मचारी मेहनती थे, विशेष प्रशिक्षित नहीं। पूछताछ करने पर पता चला कि चीन में होटल विद्या सीखने कि कोई समुचित व्यवस्था अभी तक नहीं रही है। होटल के अधिकतर कर्मचारी आठवीं, दसवीं तक पढे लिखे लड़के-लड़कियां थे।”1  लेखक आधुनिक शहरों के भी यात्री हैं। उनकी यात्राओं में आधुनिक सभ्यता और विज्ञान की देन के बीच बड़े शहर के युवाओं की स्थिति का सुंदर वर्णन किये हैं। जैसे – “भारत और चीन के युवक इंजीनियर अमेरिका में जो काम दो हजार डॉलर में आसानी से कर देते हैं वही अमेरिकी कंप्यूटर इंजीनियर कम-से-कम पाँच हजार डॉलर में मुश्किल से करेंगे। शारीरिक और बौद्धिक दोनों ही प्रकार के काम गरीब देशों के लोग सस्ते में कर देते हैं। इसका एक कारण तो यह भी है कि अमेरिकी युवकों की प्रवृत्ति प्रोद्योगिकी शिक्षा, गणित और भौतिकी आदि में नहीं हो रही है। भारतीय और चीनी युवक प्रोद्यौगिकी में उनसे ज्यादा कुशल हैं। इसी प्रकार गरीब देशों के अकुशल मजदूर उनकी तुलना में श्रमिक श्रम करते हैं। क्या इससे यह भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अति समृद्धि बच्चों को गैर जिम्मेदार और अकर्मण्य बनाती है बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि अमेरिका जब तक स्वयं अपने देश में अकुशल और कुशल दोनों प्रकार के श्रम करने वालों की संख्या नहीं बढ़ाएगा, बाहर से जाने वालों को रोक नहीं पाएगा। चाहे वह इससे कितना भी परेशान क्यों न हो ?”2 

पिछले कुछ वर्षों में समाज की अवधारणा और लोकतन्त्र के प्रति चिंता ने यात्राओं में एक महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है। तात्पर्य यह है कि आज दुनिया विकास के एक महत्त्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। लेकिन यात्रा वृत्तान्तकार सामाजिक जीवन के विशेष पक्षों पर प्रकाश डालने की कोशिश कार रहे हैं।  प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘आकाश ऐसे खुलता है ! शीर्षक यात्रापरक संस्मरण से उद्धृत है। “ गुवाहाटी से चलकर मेघालय की ओर आने वाला मार्ग आदिवासियों की जीवनरेखा की तरह है। शहर पीछे छूटते ही जनजातियों की दुनिया आकार लेने लगती है। थोड़ी-थोड़ी दूर पर सड़क से फूटकर दायें-बाएँ की ऊँची-नीची पहाड़ियों में गुम हो जाने वाले सँकरे कच्चे रास्ते बरबस गाँवों की पतली पतली गलियों की याद दिला देते हैं। इन पहाड़ियों के उस पार, जहाँ तक विकासशील भारत का पहुँचना आज तक संभव नहीं हुआ है, आदिवासियों के गाँव बसे हुए हैं। पहाड़ियों की पीठ पर और निचली संकीर्ण घाटियों में बसी हुई इनकी दुनिया आज भी आधुनिकता की आहट से निपट अनजान और 21 वीं सदी के विश्व से न जाने कितनी दूर है।”3 

शायद कहने की आवश्यकता नहीं है कि यात्राओं की दुनिया में सबसे अहम विषय समाज का ही है।  इस प्रकार हम पाते हैं कि यात्रा वृत्तान्तकार किसी न किसी सामाजिक संदर्भ से जुड़े हुए होते हैं। आचार्य श्री काकासाहेब कालेलकर के शब्दों में, “ हम करसियांग, दार्जिलिंग और कालीमपोंग इन तीनों स्थानों से भेंट करने आये हैं। रात में कलकत्ता से निकले और सारी रात उत्तर की यात्रा करते हुए सबेरे सिलिगुड़ी आ पहुँचे। पार्वतीपुर रात में कब निकल गया, इसका कुछ पता भी नहीं चला। कलकत्ता से सिलिगुड़ी तक की मसाफिरी किसी भी ऋतु में आह्लाद दायक ही होती है। हरे भरे खेत, उनके बीच सिर ऊंचा करने वाले पेड़, संगमरमर के समान बादलों को प्रतिबिम्बित करने वाले जलाशय और उनके बीच अपनी सुघडता से सुहाने वाली झोपड़ियाँ सभी कुछ देखने वाले को प्रसन्न करते हैं। इस आद्र मुल्क में रहने वाले को तो यह आँखों के लिए बिछी हुई दावत के समान ही प्रतीत होता है।”4   

इस प्रकार यात्री एक समाजशास्त्रीय विचारक की तरह उस सामाजिक परिवेश के बारे में प्रतिक्रिया करते हैं जिसमें वह रहते हैं। यह परिवेश अंदरूनी और बाहरी दोनों तरह का होता है। अंदरूनी संदर्भ में उसकी पृष्ठभूमि और व्यक्तिगत सोच होती है। जबकि बाहरी संदर्भ में समाज के अस्तित्तव को बनाए रखने वाला सम्पूर्ण परिवेश होता है। इस प्रकार यात्रा वृत्तान्तकार की लेखनी बहुआयामी है। जिसमें उन्होने सामाजिक तथ्यों का अध्ययन किया है। वह अपने अध्ययन में व्यक्ति के बजाए समाज पर विशेष ज़ोर देते हैं और यह बताने की कोशिश करते हैं कि सामाजिक घटनाएँ ही व्यक्ति को प्रभावित करती है। इस तरह यात्रा वृत्तान्तकार समाजशास्त्रीय दृष्टि से सामाजिक वस्तुओं को देखने परखने का काम करते हैं। चाहे समाज में सामाजिक स्थिति की बात हो या राजनीतिक स्थिति की बात। इस प्रकार यात्रा वृत्तान्तकार समाज में केवल अग्रणी की भूमिका में रहते हैं।  यात्रा वृत्तान्तकार केवल ऐसी सच्चाई को खोजने की चेष्टा करते हैं जो यात्रा को प्रासंगिक बना सके और सामाजिक मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करके ऐसा बदलाव ला सके जिससे समाज के सभी हिस्सों को लाभ मिल सके। प्रस्तुत पंक्तियाँ नीलेश रघुवंशी द्वारा लिखित ‘यात्रा अजंता की’ नामक यात्रा-संस्मरण से ली गई है। “ अजंता की हर गुफा को देखकर उसकी बदहाली पर कुछ टूटता है भीतर ही भीतर बिना आवाज। ऐसे क्षण चट्टान के पिघलने और ढहने के क्षण होते हैं। यह बेआवाज रोना किसके लिए है – किस पर रोना है यह। अजंता… अजंता … अजंता … जब भी अखबार या टी. वी. पर खूबसूरत लुभावना वह विज्ञापन देखती हूँ जिसमें फोकस होता है “इनक्रेडिबल इंडिया”अद्भुत भारत, अतुल्य भारत – तब रोता है कोई मेरे भीतर। अजंता के शिल्प और चित्रों के अधमिटे बदरंग रंग रात भर सिसकते हैं मेरे संग। अद्भुत भारत की अतुलनीय विश्व धरोहर अजंता तुम्हें इतने बरसों बाद क्यों देखा मैंने। वो भी इस हाल में। काश मैं तुम्हें तुम्हारे चरम उत्कर्ष में देख पाती। एकदम चुप सन्नाटे को चीरते तुम्हारे मौन के साथ गुजार पाती कुछ दिन, कुछ रात।”5  इन यात्रा वृत्तान्तकारों में राहुल सांकृत्यायन के भी कई उदाहरण है। एक अन्य उदाहरण विलियम मूरक्रोफ्ट के ‘अलमोड़ा से टिहरी’ नामक यात्रा के अंश से –

“ हमलोग 12 दिसम्बर 1819 को अलमोड़ा से जोशीमठ पहुँचे। न कुली और न याक ही पर्याप्त संख्या में उपलब्ध थे। फिर यह पता चला कि नीती दर्रा भी पार करने लायक नहीं है। हमें दो सप्ताह पहले यहाँ आना चाहिए था। 21 दिसम्बर को हुणिये नीती दर्रे से तिब्बत वापस आ गये थे। मैंने प्रस्ताव रखा कि हम समान यहीं कुलियों के पास छोड़कर दर्रा पार करने का प्रयास करें। लेकिन कुलियों ने मना कर दिया और कहा कि हम नष्ट होने को तैयार नहीं हैं। अतः हमने दर्रा पार करने का इरादा त्याग दिया। तय किया कि या तो अगली गर्मी की शुरुआत तक यहीं रहें या लद्दाख की यात्रा करें।”6          

यात्रा वृत्तान्तकारों ने अंतर निर्भरता और अंतर संबद्धता पर भी ज़ोर दिया है। जिसमें यात्री स्थिति को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं के रूप में एक साथ देखते हैं। उसमें उनकी विशेष रुचि रही है। इसमें उनके कार्य उल्लेखनीय है। इससे हमारे समाज में हो रहे सामाजिक परिवर्तन की प्रवृत्तियाँ का भी पता चलता है। इसलिए यात्रा वृत्तान्तकार परंपरा और आधुनिकता के विषयों पर भी ध्यान केन्द्रित करने की कोशिश करते हैं। जैसा कि हम अवगत हैं परंपरा और आधुनिकता को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता और दोनों एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। अध्ययन में पाते हैं कि जंगली इलाकों में रहने वाले और अपने सामाजिक जीवन के प्रत्येक पहलू में स्वतन्त्रता का जीवन बिताने वाले समाज आधुनिक विकास से कुल मिलाकर अछूते रहे हैं और आधुनिकीकरण का प्रभाव वहाँ कुछ खास कारणों से ही पहुंचा है। इन कारणों में वन और खनिज संसाधनों का दोहन ही शामिल है। अनिल यादव के शब्दों में, “एक आदिवासी ने कहा, “जिस दिन परेश बरुआ नहीं रहेगा इस इलाके में एक हवा अलग से आएगा।”7

 बाहरी दुनिया के संपर्क में आते ही वहाँ के लोगों को अपने अधिकारों और जमीन से हाथ धोना पड़ जाता है और वे एक नए और अजनबी सामाजिक परिवेश में जीने के लिए विवश हो जाते हैं। वहाँ के समाज पर आधुनिकीकरण का प्रभाव कई रूपों में पड़ा है। कुछ लोगों को आधुनिकीकरण से काफी लाभान्वित हुई है जबकि अधिकांश घाटे में रही हैं। इस तरह अनिल यादव समाज की बड़ी गंभीर समस्या पर कुछ इस तरह विचार कर रहे हैं। उनके ही शब्दों में,

“ देश के कुल उत्पादन का चौथाई हिस्सा असम के कुओं से निकाला जाता है। उसके बदले केन्द्र से मिलने वाली बहुत कम रॉयल्टी यहाँ की राजनीति का पुराना मुद्दा है। दिल्ली से चाय, तेल, कोयला ले जाती है बदले में सेना भेजती है – किसी भी दिल्ली विरोधी आंदोलन के आहवाहन का यह मंत्र है।”8   एक और उदाहरण

“एक और सरकारी योजना थी जिसमें रबड़ बोर्ड ने आदिवासियों की ज़मीनें सात साल के लिए लीज पर लेकर प्लांटटेशन किया था। यहाँ ज़मीनों के मालिक ही मजदूर थे जिन्हें प्लांटेशन और मार्केटिंग के हुनर सीख लेने के बाद बाकायदा एक प्रोसेसिंग यूनिट के उफार के साथ रबड़ इस्टेट वापस किए जाने थे। उस वक्त त्रिपुरा में करीब बीस हजार हेक्टेयर में रबड़ ईस्टेट थे और उत्पादन में केरल के बाद दूसरा नंबर हो चुका था। रबड़ बोर्ड ने सर्जिकल दस्ताने, सैडिल, टायर, रबड़ बैंड बनाने के कई प्रोजेक्ट तैयार किए थे जिनसे आगामी दिनों में उत्पादन होना था।… विजय हरांगखाल ने बताया, बहुत कम लोग जानते हैं कि देश का लगभग आधा शहद रबड़ के बगानों से पैदा होता है। रबड़ के फूलों पर मधुमक्खियाँ आती हैं। एक हेक्टेयर प्लांटेशन से औसतन दो कुंतल शहद तैयार होता है। रबड़ के फूलों पर बैठने वाली मधुमक्खियाँ के डंक झर तो नहीं जाते, मेरी इस जिज्ञासा पर वे देर तक हँसते रहे।”9

ध्यान देने की बात है कि केवल आधुनिकीकरण से समूची समाज में परिवर्तन नहीं आता है। कहने का तात्पर्य यह है कि सामाजिक परम्पराओं में इस प्रकार का गुणात्मक परिवर्तन नहीं आता है। लेकिन परंपरागत समाज में सामाजिक-धार्मिक आचार-व्यवहार का जारी रहना आवश्यक है। हमें यह समझना होगा की जो लोग आंदोलन के लिए सिर उठाते रहते हैं उन्हें तभी रोका जा सकता है जब आधुनिकीकरण या विकास के लाभों का समान वितरण किया जाये। क्योंकि आधुनिकता का स्वरूप किसी समाज के ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर भी निर्धारित होता है। शायद कहने की जरूरत नहीं है कि यात्रा में आधुनिकता आर्थिक रूप में अधिक दिखती है जबकि परंपरा सामाजिक रूप से कम दिखती है।                    

संदर्भ सूची

  1. मनोहर श्याम जोशी, क्या हाल हैं चीन के, पृष्ठ – 21
  2. तिवारी,विश्वनाथ प्रसाद, अमेरिका और यूरप में एक भारतीय मन,पृष्ठ-27
  3. प्रियंकर पालीवाल (संपादक),यात्राओं का जिक्र, पृष्ठ – 139 
  4. आचार्य श्रीकाकासाहेब  कालेलकर, पृष्ठ – 1 यात्रा का आनन्द.
  5. प्रियंकर पालीवाल (संपादक),यात्राओं का जिक्र, पृष्ठ –107
  6. शेखर पाठक (संपादक), पहाड़ -11, पृष्ठ – 26
  7. अनिल यादव, वह भी कोई देस है महराज, पृष्ठ -127
  8. वही, पृष्ठ -127
  9. वही, पृष्ठ -157-58

हिन्दी दलित साहित्य में दलित जीवन-मुक्ति का संघर्ष: कामिनी

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हिन्दी दलित साहित्य में दलित जीवन-मुक्ति का संघर्ष
कामिनी
            प्राचीन काल से ही शूद्रों को दास और गुलाम समझा जाता रहा है। जहाँ उसे अपना
स्वतंत्र व्यक्तित्व दिखाई ही नहीं देता है। दलित साहित्य का यही भाव लिए प्रथम
चरण था
महाकाव्यों का युग
जब महान दलित साहित्यकार बाल्मीकि और व्यास ने रामायण
महाभारत
जैसे काव्यों की रचना की। दूसरा चरण था जब गौतम बुद्ध ने
शूद्रों का मनुष्य के रूप में आदर किया। ब्राह्मणयुग का जो मीठा जहर मानवता की
नसों में फैल गया था उसका अनुभव कराया उसी का तीसरा चरण था सिद्ध काल। जब ब्राह्मणवाद
से इतर समाज के निचले तबके के सिद्ध पुरुषों ने एक नया संदेश दिया।
            सात्र्र ने कहा था:- लेखन केवल लिखना ही नहीं है एक कार्यवाही है और बुराई के खिलाफ मनुष्य के सतत
संघर्ष में लेखन सायास हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहिए।
            आज हम अगर प्रचीन साहित्य पर दृष्टिपात करे तो हम पाते है कि वैदिक काल से
लेकर आज तक दलित को विभिन्न रूपों में निरूपित किया गया है। पहले यह शूद्र के रूप
दीन-हीन और वर्जनाओं से पीड़ित फिर शोषित एवं उपेक्षित के रूप में समाज से तिरस्कृत
हुआ। दलितों के लिए प्रारम्भ में दास
, दस्यु, शूद्र,
चंडाल, आत्मज, अस्पृश्य जैसे अनेक शब्दों का प्रयोग होता है और ऐसे ही शब्दों के माध्यम से
दलित वर्ग की विशेष पहचान होती है। भारत की चातुष्वण्र्य व्यवस्था में प्राचीन
प्रजातियों को शूद्रों की चतुर्थ श्रेणी में रखा जात था। समाज में बहिष्कृत
शूद्रों को स्पर्श करने से व्यक्ति अपवित्र हो जाता था। इस मान्यता के आधार पर
शूद्रों को अस्पृश्य कह कर पुकारा जाने लगा।
संस्कृत शब्दकोश के अनुसार:- चैथे
वर्ण का पुरुष हिन्दुओं के चार मुख्य वर्णो में से अन्तिम वर्ण का पुरुष
, उसका मुख्य कर्तव्य अपने से उच्च तीनों वर्णो की सेवा करना है।2
मानक अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश में
दलित शब्द का अर्थ
डिप्रेस्ड
दिया गया है। जिसका अर्थ है – दबाना, नीचा करना,
झुकना, विनती करना, नीचे लाना,
स्वर नीचा करना, धीमा करना, दिल तोड़ना है तथा दलित वर्ग
का अर्थ नीची जातियों के लोग, अछूत,
हरिजन, पीड़ित, दबाए हुए,
पद दलित, कुचले-सताए हुए लोग।’3
डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन
दलित शब्द की व्याख्या करते हुए कहते हैं- दलित वह है जिसे भारतीय संविधान ने अनुसूचित जाति का दर्जा दिया है।’4
कंवल भारती का मानना है :- दलित वह जिस पर अस्पृश्यता का नियम लागू किया गया है, जिसे कठोर और गन्दे कार्य करने के लिए बाध्य किया गया है, जिसे शिक्षा ग्रहण करने और स्वतन्त्र व्यवसाय करने से मना किया गया है और जिस
पर सवर्णों ने सामाजिक निर्योग्यताओं की संहिता लागू की है वह दलित है। इसके
अन्र्तगत वही जातियाँ आती हैं जिन्हें अनुसूमित जातियाँ कहा जाता है।
5
डॉ. बी0आर0 अम्बेडकर:- अस्पृश्य,
पिछड़ा वर्ग, घुमक्कड़ जाति व
पद दलित इन सारे शब्दों को समानार्थी माना जाता है और उसका ही नया अर्थ आगे चलकर
दलित बन गया है।
’6
डॉ. धर्मवीर भारती:- दलित हिन्दू नहीं है,
न ही किसी हिन्दू धर्म ग्रन्थ को मानते हैं, न ही कोई धर्मग्रन्थ दलितों का हो सकता है। दलित हिन्दू नहीं हो सकते क्योंकि
हिन्दू एक नया शब्द है दलितों का धार्मिक इतिहास इससे पुराना है।
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श्री मि.शि. शिन्दे ने दलित शब्द की
विस्तृत एवं सार्थक परिभाषा प्रस्तुत की हैः-
1.         भारतीय समाज
जिन्हें अस्पृश्य या अछूत कहता है और जिनका आज भी गांवों में प्रवेश नहीं है।
2.         बहुत ही कम वेतन
में चैबीस घंटे खेतों में श्रम करने के लिए मजबूर हैं जो शोषित हैं।
3.         दुर्गम पहाड़ों, वनों,
जंगलों में जीने के लिए मजबूर जन-जातियाँ, आदिवासी समाज।
4.         पूंजीवादी
व्यवस्था के कारण आर्थिक दृष्टि से जो दुर्बल हैं
, वह बहुजन समाज।
5.         अराष्ट्रीय कहकर
जिन्हें हमने नकारा है वह अल्पसंख्यक समाज।
8
डॉ. कुसुमलता मेघवाल के दृष्टिकोण से
दलित की परिभाषा इस प्रकार हैः-
दलित का शाब्दिक अर्थ है
कुचला हुआ। अतः दलित वर्ग का सामाजिक संदर्भो में अर्थ होगा, वह जाति समुदाय जा अन्यायपूर्वक सवर्णों या उच्च जाति के द्वारा दमित किया गया
हो
, रौंदा गया हो। दलित शब्द व्यापक रूप से पीड़ित के अर्थ में आता है पर दलित वर्ग
का प्रयोग हिन्दू समाज व्यवस्था के अन्र्तगत परम्परागत रूप में शूद्र माने वाले
वर्णों के लिए रूढ़ हो गया है। दलित वर्ग में वे सभी जातियाँ सम्मिलित हैं जो जाति
सोपान में निम्न स्तर पर हैं और जिन्हें सदियों से दबाकर रखा गया है।
9
            इन तथ्यों से स्पष्ट होता है कि दलित शब्द ऐसे लोगों के लिए प्रयोग किया जाता
है जिन्हें वर्ण-व्यवस्था में अछूत की श्रेणी में रखा गया और समाज-व्यवस्था में
सबसे निचले पायदान पर। उनका दलन और शोषण हुआ। संविधान में इस समूह को अनुसूचित
जातियां कहा गया और ये अछूत हैं। उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि दलित शब्द का
अर्थ समाज के ऐसे व्यक्ति के लिए मान्य है जिसे शारीरिक
, मानसिक तथा आर्थिक दृष्टि से प्रताड़ित किया गया है। समाज का निम्न वर्ग हमेशा
शोषित होता रहा और उसे दलित के नाम से जाना गया। समाज में इनको अमानवीय जीवन यापन
करने लिए विवश होना पड़ा।
            दलित साहित्य आनंद के लिए नहीं, बल्कि परिवर्तन
के लिए लिखा गया साहित्य है। यह साहित्य परिवर्तन और संघर्ष करने के लिए प्रतिबद्ध
है। सामाजिक
,
आर्थिक, धार्मिक और मानसिक शोषण
के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए प्रेरित करने वाला साहित्य
दलित साहित्य
है। आज का दलित साहित्यकार भाग्य-अभाग्य, स्वर्ग-नर्क,
मूर्तिपूजा, बाहरी ढोंग आदि
को नहीं मानता। पुराणों या अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों में लिखी गयी अवैज्ञानिक बातों
का विरोध करता है। आज अगर हम हिन्दी साहित्य में मध्यकाल की बात करते है तो
मध्यकाल के पूर्वाद्ध भाग को
भक्तिकालके नाम से अभिहित किया जाता है। यह मध्यकाल भारत की दीनता, धार्मिक अंधविश्वासों एवं सामाजिक विकृतियों का काल था। यह वह समय था जब समाज
में तेजी से परिवर्तन हो रहा था। विदेशों से आये मुस्लिम शासक बन गये थे।
ब्राह्मणवाद की जड़ें जो बुद्ध के समय में हिल गयी थीं
, अब उखड़ने लगीं थीं। भक्तिकाल में अनेक कवि जो अधिकतर संत थे उन्होंने वैष्णवों
की मान्यताओं को दरकिनार कर शैव
, बुद्ध के विचारों को
स्वीकार किया। मंदिर जो कि ब्राह्मणों द्वारा दलित के लिए वर्जित कर दिये थे
सन्तों ने उनका महत्व ही समाप्त कर दिया। सच ही है जब-जब भारत भूमि पर विनाशकारी
शक्तियों का प्रभाव बढ़ा है तब ही किसी न किसी महापुरुष का जन्म हुआ है। ऐसे ही समय
में दीन-हीन भारत की दुखी जनता को सामाजिक स्वास्थ्य के लिए समता की संजीवनी
पिलाने के लिए भारत-भूमि पर दलित संत शिरोमणि रविदास का अविर्भाव हुआ था।
                        चैदह सौ तैतीस की माघ सुदी प्रदास।
                        दुखियों के कल्याण हित प्रकटे श्री रैदास।।
            माघ की पूर्णिमा को ही समस्त भारत में रैदास सम्प्रदायको लोग बड़ी धूमधाम से संत रविदास की जयन्ती मनाते हैं। संत रविदास की माँ का
नाम
करमाबाई
तथा पिता का नाम राघवदासथा जो चमड़े से जूते बनाने का काम करते थे। संत रविदास भी जीवन-भर अपन पैतृक
पेशा ही करते रहे।
            संत रविदास व्यक्ति-व्यक्ति की समानता के हामी थे। वे मानते थे कि प्रत्येक
व्यक्ति जन्मतः एक समान है। सबमें एक ही रंग का रक्त
, एक प्रकार का मांस,
और अस्थियाँ हैं। फिर इस संसार में आकर व्यक्ति धर्म, जाति,
वर्ण आदि के नाम पर क्यों बंटे। संत रविदास ने इस बुनियादी
तथ्य को निम्न प्रकार अभिव्यक्ति दी है।–
            ‘हिन्दू,
तुरक नहीं कुछ भेदा, सभ मह एक रक्त और
मासा।
            दोऊ एकह दूजा कोऊ नाही,
पेख्या सोध रैदासा!!
            संत रविदास ने तत्कालीन समाज को उचित दिशा देने के लिए धार्मिक अन्ध विश्वासों
का भण्डाफोड़ करके समस्त मनुष्यों को भेद-भाव भुलाकर एक होने का जो संदेश दिया। वह
तत्कालीन परिस्थितियों में जितना आवश्यक था
, सामयिक सन्दर्भो
में भी उतन ही प्रासंगिक है क्योंकि भौतिक दृष्टि से इतनी वैज्ञानिक उन्नति कर
लेने के बाबजूद धार्मिक अन्ध-विश्वास पूर्वतः नष्ट नहीं हो पाये हैं। अत- इस समय
की समस्त प्रचलित रूढ़ियों पर संत रविदास ने दृष्टिपात किया है। वर्ण-व्यवस्था को
हिन्दू-धर्म का कोढ़ माना जाता है और इसी वर्ण-व्यवस्था का अभिशाप चैथे वर्ण
अर्थात्
शूद्र
को ही सहना पड़ा। प्रारम्भ में वर्ण जन्मतः नहीं कर्मतः
निर्धारित किये जाते थे किन्तु मध्यकाल तक आते-आते इस मान्यता ने रूढ़ रूप ले लिया।
संत रविदास इसी वर्ण से सम्बद्ध थे। अतः उन्हें उच्च वर्ण का उपहास सहना ही पड़ा।
कभी कभी प्रतिरोध का शिकार भी होना पड़ता था। इसलिए उन्होने इन सड़ी-गली मान्यताओं
के पुर्नमूल्यांकन की आवश्यकता समझी। अतः इन्होने इन मान्यताओं का सैद्धान्तिक
स्तर पर विरोध किया।
            रैदास एक बूंद सौ,
सब ही भयो वित्यार।
            मूरिख हैं जो करत हैं वरन अवरन विचार।।
रैदास एक ही नूर ते जिमि, उपजों संसार।
ऊँच-नीच किहि विध भये, ब्राह्मण और चमार।।
            संत रविदास ने स्पष्ट घोषणा की, कोई भी व्यक्ति
जन्म के कारण ऊँच नीच नहीं हो सकता क्योंकि मनोवांछित जन्म लेकर किसी के भी हाथ की
बात नहीं है
,
बल्कि व्यक्ति के अच्छे कर्म ही व्यक्ति की श्रेष्ठता अथवा
निकृष्टता को निर्धारित करते है।
            रैदास जन्मे के कारणै,
होत न कोई नीच।
            नर को नीच करि डारि है,
औछे करम की कीच।।
            यदि हम वर्तमान में साहित्य के संदर्भ में बात करते हैं तो आज का दलित
साहित्यकार यह स्वीकार करता है कि ब्राह्मणों ने जो भी धर्मग्रन्थों पर
धर्मशास्त्रों की रचना की है वह अपने वर्गीय स्वार्थों की रक्षा के लिए की है।
जिनमें अछूतों और दलितों के लिए निर्योग्यताएं एवं प्रतिबंधों को ईश्वरीय विधान
एवं ऋषि प्रणीत बताकर शास्त्रों की सत्ता को स्थापित कर दिया गया। एक उच्च वर्ग
विशेष में समाज के उत्पादक
,
शिल्पी एवं श्रमिक वर्ग को अस्पृश्य एवं दलित की श्रेणी में
रखकर मानवीय अधिकारों से वंचित कर दिया तथा उनका मानसिक
, शारीरिक शोषण करना शुरु कर दिया। धर्म एवं नियति के नाम पर अनेक वर्जनायें थोप
दी। एक ओर सृष्टि के प्रत्येक जीव को परमात्मा का अंश बनाया जाता है तो दूसरी ओर
एक वर्ण को दलित
,
अस्प्श्य एवं प्रतिबंधित कर उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया
जाता है। दलित समाज ने इन विडम्बनाओं
, तिरस्कारां और
विसंगतियों को भोगा और अपनी आंखों से देखा। इसलिए वह अन्याय और अनीति के विरुद्ध
स्वानूभूति के कारण संघर्ष करने के लिए मजबूर हुआ। इसी संघर्ष के
परिणामस्वरूप  तथागत भगवान बुद्ध और
महामानव डॉ. अम्बेडकर जैसे महापुरुष का अवतार हुआ जिन्होंने हमारे जीवन का मार्ग
प्रशस्त किया।
            भारतीय समाज में वर्ण-व्यवस्था के आधार पर श्रम विभाजन और श्रम विभाजन के आधार
पर समाज का गठन हुआ। इसी श्रम विभाजन के परिणामस्वरूप 
जाति-व्यवस्थाअस्तित्व में आई,
जिसने समाज के लोगों को जातियों एवं उपजातियों में विभाजित
कर दिया। दलित संत रविदास भी स्वीकार करते हैं कि जब तक इस देश में जाति-प्रथा
समाप्त नहीं हो जाती तब तक इसमें किसी भी प्रकार के सुधार की बात करना बेबुनियाद
है। –
            जात-पात में जात है,
ज्यों केलन के पात।
            रैदास न मानुष जुड़ सके,
ज्यों लौ जात न जात।।
            अतः भारत का यह दुर्भाग्य रहा है कि यहाँ पर जाति ही व्यक्ति का सामाजिक स्तर
निर्धारित करती रही है। उसे ऊँच और नीच मानने और मनवाने पर बाध्य करती रही है। संत
रविदास ऐसी जाति प्रथा को जो व्यक्ति-व्यक्ति को जोड़ती नहीं बल्कि तोड़ती है एक
रोग
की तरह मानते है।
            दलित संत रविदास में तत्कालीन सामज में प्रचलित इन सड़ी-गली मान्यताओं का विरोध
कर वैज्ञानिक मान्यताओं का प्रचार किया है। वे मानते हैं कि जब ब्राह्मण
, क्षत्रिय,
वैश्य और शूद्र को बनाने वाला एक ही सृजनहार है उसकी एक
बूँद का विस्तार यह सारा संसार है। फिर किस आधार पर ब्राह्मण को श्रेष्ठ तथा शूद्र
को निष्कृष्ट ठहराया जाये उनहोंने जड़मति समाज को समझाते हुए कहते हैं-
            एक माटी के सभै भांडे,
सबका एकै सिरजनहारा।
            रैदास व्यापै एकै घट भीतर, सभ को एकै घड़ै कुम्हार।।
            रैदास एकै ब्राह्म का होई रहयों सगल पसार।
            एकै माटी सब घर सरजे,
एकै सभ कूं सरजनहारा।।
आज का दलित साहित्यकार समाज में
भेदभावपूर्ण व्यवस्था को समाप्त कर एक ऐसे समाज की स्थापना करना चाहता है जिससे
व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान उनके गुणों के आघार पर हो न कि जाति से। दलित
साहित्यकार मनुष्य की स्वतन्त्रता
, समता और बन्धुत्व
की भावना को सर्वोपरि मानता है। वह मानवाधिकार की बात उठाता है और समाज में
व्याप्त उन बुराइयों को समाप्त करने का प्रयास करता है जिनसे मानवाधिकार का हनन
होता है। वहीं दलित संत रविदास ने भी अपने पदों में
बेगमपुरा शहर
का उल्लेख किया है। उस शहर का जो वैशिष्ट्य उन्होंने बताया
है
, उससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने तत्कालीन अराजकतापूर्ण शासन व्यवस्था के
समान्तर आदर्श शासन व्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत की थी। उनके
बेगमपुरा शहर
में न दुःख है न चिन्ता। वहां जन-जन के लिए समान सुख
प्राप्त है।
बेगमपुरा शहर
विषयक उनकी अवधारणा उनके समरसतावादी मूल्यबोध का द्योतक है।
दलित संत रविदास का यह मूल्यबोध आज के लिए अच्छा पाठ है। इसके आलोक में लोकतंत्र
को सार्थक बनाया जा सकता है। सार्वकालिक एवं सार्वभौमिक प्रासंगिकता वाला संत
रविदास का
बेगमपुरा
विषयक पद अग्रांकित है।
            बेगमपुरा सहर को नाउ। दूरतु अंदोहू नहीं तिहि ठाउ
            न तसवीर खिरोजु। खउफु न खता न तरषु जवालु।।
            अब मोहि खूब वतन गह पाई। उहां खैरी सदा मेरे भाई।
            कइमु दाइमु सदा पाति साही। दोम न सेम एक सो आहि
            आबादानु सदा मसहूर। उहां गनी बसहि मासूर
            तिउ तिउ सैल कहरि जिउ भावें। महरम महल न को अटकावै
            कहि रविदास खलाज चमारा। जो हम सहरी सु मीत हमारा।। (17)
अंत संत रविदास मानव को सुखी देखना
चाहते थे। सबको समान सुख की प्राप्ति हो ऐसी उनकी कामना थी।
दलित संत रविदास का जीवन-दर्शन
मानवतावादी था। उनकी वाणी में मानवता के लिए आवश्यक सदाचारों के शाश्वत
सैद्धान्तिक मूल्यों का अक्षय भण्डार है
, जिसमें व्यक्ति
अपने लिए सुंदर-सुंदर मोतियों का चुनाव सुगमता से कर सकता है। संत रविदास की
विचारधारा आज भी प्रचलित सामाजिक अंतर्विरोधों एवं समस्याओं का समाधान निकालने में
सहयोग देती है विशेषतः उनका जीवन
, विचारधारा तथा
अभिव्यक्ति शैली यदि आज के परिप्रेक्ष्य में समझी जाये तो आजकल के समज सुधाराकों
एवं अग्रणी व्यक्तियों के प्रति वह प्र्याप्त मार्गदर्शन बन सकती है। उनकी वाणी
में दीन-हीन और शोषितों के प्रति एक विकल पीड़ा
, अपमान के विरुद्ध
समाधान में प्रतिपल घुटन और समस्याओं के प्रति एक जागरुक दृष्टि थी तथा वे यह भली
प्रकार जानते थे कि पुरतनता से किस प्रकार ग्रहण किया जाए
, परम्परा को किस स्थान तक सुरक्षित रखा जाये और नवीन परिस्थितियों के अनुरूप
किस प्रकार मार्ग बनाया जाये। उनकी वाणी में आज के दलित साहित्यकारों ने मुक्ति और
मुख्यधारा के संपूर्ण साहित्य जगत को झकझोरा है
, उन्हें जगाया है,
चेताया है और उन्हें कुरेदकर सोचने एवं पुनर्मूल्यांकन के
लिए विवश किया है। आज दलितों ने दलित साहित्य की अंतःधारा में दलित चेतना को एक
प्रमुख और महत्वपूर्ण तत्व माना है। जिसका आधार बुद्ध
, डॉ. अम्बेडकर और ज्यातिबा फुले हैं। बुद्ध ने प्रज्ञा, शील और करुणा को मानवीय जीवन के लिए आधारभूत मूल्य मानते हैं। इन्हीं मूल्यों
से सम्वेदनशीलता पैदा होती है जो दलित साहित्य के लिए ऊर्जा का काम करती है। आज
दलित साहित्यकारों का एक ही लक्ष्य है एक ऐसे समाज का निर्माण करना जिसमें जातिगत
घृणा
, अपमान,
उपेक्षा, अस्पृश्यता, वर्ग-विभेद,
असमानता, अन्याय का कोई स्थान न
हो बल्कि एक ऐसा समाज जो
सर्वजन सुखाय
के सिद्धान्तों पर आधारित हो बिल्कुल संत रविदास के बेगमपुरा शहर
की तरह………..
संदर्भ ग्रन्थ सूची
1.         दलित साहित्य का
सौंदर्यशास्त्र – ओमप्रकाश बाल्मीकि
, प्रकाशन – सामयिक
प्रकाशन
,
नयी दिल्ली, पटना संस्करण, 2014, पृष्ठ सं0
16
2.         हिन्दी दलित
साहित्य और चिन्तन
,
डॉ. ललिता कौशल, प्रकाशन-साहित्य
संस्थान
,
गाजियाबाद, प्रथम संस्करण, 2011, पृष्ठ सं0
15
3.         वही पृष्ठ सं0 15
4.         वही पृष्ठ सं0 15
5.         वही पृष्ठ सं0 15
6.         वही पृष्ठ सं0 15
7.         हिन्दी दलित
साहित्य का इतिहास
,
प्रियदर्शी प्रकाशन, साहित्य संस्थान, गाजियाबाद,
प्रथम संस्करण 2014, पृष्ठ सं0 18
8.         वही पृष्ठ सं0 18
9.         हिन्दी दलित
साहित्य और चिन्तन
,
डॉ. ललित कौशल, प्रकाशन- साहित्य
संस्थान
,
गाजियाबाद प्रथ्म संस्करण, 2011, पृष्ठ सं0
16
10.       वही पृष्ठ सं0 16
11.       दलित चिन्तन
अनुभव और विचार
,
डॉ. एन0 सिंह, वाणी प्रकाशन,
नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ सं0
175
12.       वही पृष्ठ सं0 180
13.       वही पृष्ठ सं0 181
14.       वही पृष्ठ सं0 182
15.       वही पृष्ठ सं0 182
16.       दलित-चिन्तन की
दिशाएँ
,
डॉ. सुरेश चन्द्र, क्वालिटी बुक्स
पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीव्यूटर्स
, कानपुर, प्रथम संस्करण,
2013,
पृष्ठ सं0 15
     
(
हिन्दी विभाग)
                                                                      लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ

                                          मो0नं0
09721853889
[जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के अंक 23 में प्रकाशित आलेख]
[चित्र साभार: http://aygrt.isrj.org/ArchiveArticleList.aspx?id=54]

हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की कहानियों में दलित स्त्री का चित्रण और सामाजिक परिवेश: डॉ॰ स्वाति श्वेता

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rr 1

हिन्दी तथा अन्य भारतीय
भाषाओं की कहानियों में दलित स्त्री का चित्रण और सामाजिक परिवेश
                                 –डॉ॰ स्वाति श्वेता
मोहनदास
नैमिषराय
के अनुसार “दलित
शब्द मार्क्स प्रणीत सर्वहारा शब्द के समानार्थक लगता है
,
लेकिन इन दोनों में पर्याप्त भेद हैं  दलित
की व्याप्ति सीमित है
, तो सर्वहारा की अधिक  सर्वहारा के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति आ सकता है,लेकिन दलित के अंतर्गत प्रत्येक सर्वहारा नहीं आ सकता “1
दलित-विमर्श
समाज- व्यवस्था में परिवर्तन के लिए वैचारिक आह्वान है  दलित साहित्य प्रतिबद्ध साहित्य है  उसका अपना समाज दर्शन है  दलित साहित्य काल्पनिक साहित्य नहीं है  वह यथार्थ की धरती से जुड़ा है  अदम गोंडवी कहते है–
आइए,महसूस करिए ज़िंदगी के ताप को,मै चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको पर यदि हमने
चमारों की गली ही नहीं देखी तो जिंदगी के ताप को कैसे समझ पाएंगे

समीक्षक
डॉ॰एन॰सिंह के अनुसार–
दलित साहित्य दलित लेखकों
द्वारा लिखित वह साहित्य है जो सामाजिक
,धार्मिक और मानसिक
रूप से उत्पीड़ित लोगों की बेहतरी के लिए लिखा गया हो
‘2
ओम
प्रकाश बाल्मीकि
के अनुसार— दलित साहित्य नकार का साहित्य है जो संघर्ष से उपजा है तथा जिसमे समता,स्वतंत्रता और बंधुता का भाव है और वर्ण व्यवस्था से उपजे जातिवाद का
विरोध है
‘3                                          दलित
कहानियों में तथाकथित सवर्ण पुरुषों द्वारा घर के भीतर स्वयं की स्त्रियों के शोषण
की दासता और मुक्ति के स्वर सुने जा सकते हैं 
असमानता और अन्याय का पुरज़ोर विरोध और उसका खात्मा दलित कहानियों की
विषयवस्तु है  दलित कहानी की संवेदना और
सरोकार को साहित्य के परम्परागत ढाँचे पर निर्मित मानदंडों के आधार पर समझना या
परखना तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता  दलित
साहित्य की वैचारिक तथा पृष्ठभूमि को समझना अपरिहार्य है  दलित कहानियों की कथावस्तु का मूल आधार —
असमानता
,अन्याय और शोषण का खात्मा तथा अहिंसा पर आधारित
समतापरक समाज की स्थापना करना
,स्वतंत्रता और भाई-चारे के लिए
माहौल बनाना आदि है
हिन्दी
में ओम प्रकाश वाल्मीकि की कहानी
जिनावर दलित स्त्री  के साथ हो रहे
अत्याचारों का चित्रण करती है  कहानी में
बिरजू की बहू का शोषण उसका अपना ससुर करता है पूरी हवेली में बिरजू की बहू के दर्द
को सुनने वाला कोई नहीं सतवीर की किसनी का तीन महीने तक शारीरिक-मानसिक शोषण के
बाद उसकी लाश मिलती है जिसकी गवाह अकेली बिरजू की बहू है  बिरजू की बहू द्वारा विरोध के बाद निकाल दिया
जाता है  वह अपने मायके चली जाती है उसका
वही मायका जहाँ उसके मामा ने दस साल की अवस्था में ही उसके अबोध शरीर को बर्बाद कर
दिया था  बिरजू की बहू का कथन है –
यह सुनसान जंगल हवेलियों से ज़्यादा सुरक्षित है  कम से कम भेड़िये आवेंगे तो रूप-रंग बदल कर तो
नहीं आवेंगे
ओम
प्रकाश वाल्मिकी
की एक और कहानी यह अंत नहीं ग्रामीण दलित स्त्री चेतना की
प्रामाणिक कहानी है जो कुदृष्टि रखने वाले पर साहसिक ढंग से पुरजोर वार करती है और
दुश्मन की बेहयाई को कायरता में तब्दील कर देती है गाँव का बिसन दलित है
, लेकिन वह वह गाँव के सामंतों के हाथों का मोहरा बन कर रह जाता है  ऐसे में दलित स्त्री बिरमा को न्याय की आशा
व्यर्थ दिखती है परंतु बिरमा की मुखरता ने सभी में आशा का संचार कर दिया
  ना बिरमा
यह अंत नही है तुमने हमें ताकत दी है  हार
को जीत में बदलेंगे
, लोगों में विश्वास जगाकर, ताकि कोई बिसन मोहरा न बने
डॉ॰
सुशीला टाकरे
की कहानी – सिलिया
एक दलित लड़की के बाल्यावस्था से युवती के बनने
के बीच के अपमान अंतर्द्वंद्व और संघर्ष की कहानी है जिसे आत्मविश्वास है कि
शिक्षा से ही सम्मान के शिखर तक पहुँचा जा सकता है कहानी धर्म के खोखलेपन पर
प्रहार करती है  भेड़ों और बकरियों का
व्यवसाय करने वाले गाडरी के मुहल्ले के कुएँ से पानी पीने और सिलिया की ममेरी बहन
मालती द्वारा कुएँ की बाल्टी और रस्सी छू जाने से बवेला मच जाता है और
 मामी के हाथों मालती की पिटाई होती है  यह उसके सामने अपमान का पहला दृश्य था  सिलिया के सामने दूसरा दृश्य तब उठता है जब
सहेली हेमलता ठाकुर के बहन की ससुराल में सास द्वारा जाति जान लेने के बाद उसके सामने
से पानी का गिलास हटा लिया जाता है  उस समय
उसे बेहद प्यास लगी होती है  और इस तरह
बचपन के यह घावों को सहती सिलिया बड़ी होती है और समाज को बदलने का संकल्प लेती है
सिलिया ने तस किया, वह जीवनभर कोशिश करेगी कि समाज
इन बातों को समझें
, उनके मर्म को जाने  सम्मान और अपमान के भेद को समझे और सही रूप में
सम्मान का हकदार बने 
नीरा
परमार
की वैतरणी
‘, कावेरी की सुमंगली ‘, कहानी दलित स्त्री की बेबसी, लाचारी की वजहों को समझने समझाने की कोशिश करती नज़र आती है  ये कहानियाँ 
दलित स्त्रियों द्वारा भारतीय समाज की 
भोगी गई विद्रूपताओं और विडंबनाओं की कहानियाँ हैं  कहना न होगा कि ये कहानियाँ दलित स्त्रियों के
दर्द का दस्तावेज़ हैं 
कावेरी
की कहानी
सुमंगली के सुगिया की जीवन कथा मानो शारीरिक शोषण की एक डाक्यूमेंट्री ही है  सुगिया जब बारह साल की थी तब उसे औरत बना दिया
गया और चौदह बरस में वह माँ बन गई  उसके
बाद भी न जाने किस-किस के दोहन का शिकार होती रही —

सुगिया फफकने लगती  आसूँ की बूँद टप-टप चू
पड़ती  वह कैसे समझाए कि उजड़ी हुई गृहस्थी
को वह अब हरा-भरा नहीं देख सकती  ॰॰॰॰॰
जवानी भर उसके शरीर के ठेकेदारों ने अपनी हवस का शिकार बनाया
‘4
कुसुम
मेघवाल
की कहानी अंगारा  की
जमना अपने बलात्कारियों को नहीं छोड़ती है 
प्रतिशोध की आग में जल रही जमना जुल्मी को ऐसी सजा देती है कि वह जीते जी
मरे के समान रह जाता है —
जमना आँखें फाड़े अपनी
इज्जत लूटने वाले नर- पिशाच को देख रही थी 
अब उसकी बारी थी  अंगारा बनी जमना
दौड़ी-दौड़ी घर में गई और कोने में पड़ी दराती उठा लाई
, सरकार
और पुलिस जिसे सजा नहीं दे पाई
, उसे जमना न दे दी अपना
प्रतिशोध पूरा किया
‘5
राजेश
कुमार बौद्ध
की कहानी आतंक
की विमला भी बलात्कारियों को मृत्युदंड देती है  इन स्त्रियों में इस चेतना या उग्रता का एक
आयाम तो दलित जागृति है ही वहीं वे पूरी स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती दिखाई
देती है 
दलित
स्त्री के शोषण और जुल्म की अत्यंत मर्मस्पर्शी कहानी है
उसका फैसला कहानीकार कालीचरण अपनी
कहानी में दिखाते है कि बिंदो जो कहानी की नायिका है पर अत्याचार और प्रताड़णा उसका
अपना पति और ससुर करते हैं
,—” उसके ससुर महाशय जी ने
जमकर दारू पी और आधी रात को सोती हुई बिंदो पर राक्षस की भाँति टूट पड़ा ॰॰॰॰॰ साली
हरमजादी
, तेरा जवानी का जोश थम नहीं रहा है  चंदर से तो होता-हवाता नहीं है  मै ही तेरी आग ठंडी करूँगा ”6 उस रात बिंदो
का
जैसे सब कुछ खत्म हो गया
मराठी
कहानियों में ज्योति लांजवार  की
कहानी
गिद्ध
परिवार में होने वाले यौन उत्पीड़न पर प्रकाश डालती नज़र आती है  कहानी में शब्बों की माँ सोचती है कि मर्दों की
इस दुनिया में मर्द कहलाने वाला नामर्द कैसे हो सकता है
? औरत ही तो इन मर्दों को जन्म देती है 
फिर मर्द का उसकी ओर देखने का नज़रिया ऐसा क्यूँ
?
मराठी
कहानी
आयदान दलित स्त्री लेखन में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है  उर्मिला पवार इस कहानी की रचयिता
है  आपकी एक और कहानी
कवच चर्चा में रही  इस कहानी में पुरुष का स्त्री की ओर देखने का
दृष्टिकोण कभी खुली भाषा में तो कभी सांकेतिक भाषा में बखूबी व्यक्त किया गया है
मराठी
कथाकार प्रज्ञा दया पवार की कहानी
पैडीक्योर
ब्राह्मणवादी मानसिकता में जीती माया का सुखी दलित दंपत्ति का एक दूसरे
के प्रति समर्पित प्रेम देख ईर्ष्या से भर उठने की कहानी है
गुजरती
कहानी
दरी दलित
स्त्री और उसके सामाजिक परिवेश का चित्रण करती नज़र आती है  लेखिका हास्यदा पंडया की यह कहानी एक
दलित किशोरी के साथ उसके शिक्षक द्वारा किए जाने वाले बलात्कार को दिखती है  कहानी जहाँ इस पर  प्रकाश डालती है कि दलित की इज्जत-विज्ज्त कुछ
नहीं होती वहीं इस पर भी प्रकाश डालती है कि बलात्कार के बारे में लड़की मुँह नहीं
खोलेगी  कहानी में आक्रोश के स्वर को
न्यायोचित रूप से हिंसा और प्रतिरोध तक पहुँचता दिखाया गया है  इस कहानी का कथानक आहत दलित अस्मिता के अपमान
और बलात्कार का है  
कहना
न होगा कि दलित कहानियाँ दलित स्त्री परिवर्तन की इच्छा के साथ समानता
, आत्मबोध, संवेदनशीलता की आवाज़ों को मुखर करती नज़र
आती है  रमणिका गुप्ता के शब्दों में —
ये कहानियाँ सामाजिक बदलाव लाने का आह्वान करती हैं  इन कहानियों में आक्रोश है, आग है , गुस्सा है तो साथ-साथ संवेदना , मानवीयता और सब्र भी है  न्याय की
उत्कृष्ट लालसा है  समानता की तीव्र ललक
है  भाईचारे की भावना है
 ‘7
 संदर्भ
1॰  ओम प्रकाश वाल्मिकी, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र,पृ॰ 0-21
2॰  डॉ॰ एन॰ सिंह, अंतिम
दो दशक का हिन्दी साहित्य
,संपादक मीरा गौतम
3॰  ओम प्रकाश वाल्मिकी, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र,पृ॰ 0-24
4॰  कावेरी , दलित साहित्य
कहानी संचयन
,सं॰ रमणिका गुप्ता , पृ॰
120
5॰  कुसुम मेघवाल ,दलित
साहित्य कहानी संचयन
,सं॰ रमणिका गुप्ता , पृ॰ 141 6॰  काली चरण प्रेमी,नई सदी की पहचान,श्रेष्ठ दलित कहानियाँ, सं॰मुद्राराक्षस,                पृ॰103
7॰
दूसरी दुनिया का यथार्थ
, रमणिका गुप्ता,नवलेखन प्रकाशन , हजारीबाग ,1997
                                             डॉ॰ स्वाति श्वेता
                                             सहायक प्रोफेसर                                                                                                                                      
    swat.shweta@ymal.com                  
गार्गी
महाविध्यालय
    (M) 9818434369
                          दिल्ली विश्वविद्यालय
                                        
    [लेख साभार: जनकृति पत्रिका] [चित्र साभार: फॉरवर्ड प्रेस]
                                         
                                     
                                     
                                     
                                        
                                                                                                                                                                           
                                          
                                          
                                      
                                          

हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की कहानियों में दलित स्त्री का चित्रण और सामाजिक परिवेश-डॉ॰ स्वाति श्वेता

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grayscale photo of woman in floral dress standing on water
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हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की कहानियों में दलित स्त्री का चित्रण और सामाजिक परिवेश

-डॉ॰ स्वाति श्वेता

मोहनदास नैमिषराय के अनुसार — “दलित शब्द मार्क्स प्रणीत सर्वहारा शब्द के समानार्थक लगता है, लेकिन इन दोनों में पर्याप्त भेद हैं दलित की व्याप्ति सीमित है, तो सर्वहारा की अधिक सर्वहारा के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति आ सकता है,लेकिन दलित के अंतर्गत प्रत्येक सर्वहारा नहीं आ सकता “1

दलित-विमर्श समाज- व्यवस्था में परिवर्तन के लिए वैचारिक आह्वान है दलित साहित्य प्रतिबद्ध साहित्य है उसका अपना समाज दर्शन है दलित साहित्य काल्पनिक साहित्य नहीं है वह यथार्थ की धरती से जुड़ा है अदम गोंडवी कहते है–‘आइए,महसूस करिए ज़िंदगी के ताप को,मै चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको ‘ पर यदि हमने चमारों की गली ही नहीं देखी तो जिंदगी के ताप को कैसे समझ पाएंगे

समीक्षक डॉ॰एन॰सिंह के अनुसार–‘दलित साहित्य दलित लेखकों द्वारा लिखित वह साहित्य है जो सामाजिक,धार्मिक और मानसिक रूप से उत्पीड़ित लोगों की बेहतरी के लिए लिखा गया हो ‘2

ओम प्रकाश बाल्मीकि के अनुसार—‘ दलित साहित्य नकार का साहित्य है जो संघर्ष से उपजा है तथा जिसमे समता,स्वतंत्रता और बंधुता का भाव है और वर्ण व्यवस्था से उपजे जातिवाद का विरोध है ‘3 दलित कहानियों में तथाकथित सवर्ण पुरुषों द्वारा घर के भीतर स्वयं की स्त्रियों के शोषण की दासता और मुक्ति के स्वर सुने जा सकते हैं असमानता और अन्याय का पुरज़ोर विरोध और उसका खात्मा दलित कहानियों की विषयवस्तु है दलित कहानी की संवेदना और सरोकार को साहित्य के परम्परागत ढाँचे पर निर्मित मानदंडों के आधार पर समझना या परखना तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता दलित साहित्य की वैचारिक तथा पृष्ठभूमि को समझना अपरिहार्य है दलित कहानियों की कथावस्तु का मूल आधार — असमानता,अन्याय और शोषण का खात्मा तथा अहिंसा पर आधारित समतापरक समाज की स्थापना करना,स्वतंत्रता और भाई-चारे के लिए माहौल बनाना आदि है

हिन्दी में ओम प्रकाश वाल्मीकि की कहानी ‘जिनावर‘ दलित स्त्री के साथ हो रहे अत्याचारों का चित्रण करती है कहानी में बिरजू की बहू का शोषण उसका अपना ससुर करता है पूरी हवेली में बिरजू की बहू के दर्द को सुनने वाला कोई नहीं सतवीर की किसनी का तीन महीने तक शारीरिक-मानसिक शोषण के बाद उसकी लाश मिलती है जिसकी गवाह अकेली बिरजू की बहू है बिरजू की बहू द्वारा विरोध के बाद निकाल दिया जाता है वह अपने मायके चली जाती है उसका वही मायका जहाँ उसके मामा ने दस साल की अवस्था में ही उसके अबोध शरीर को बर्बाद कर दिया था बिरजू की बहू का कथन है -‘यह सुनसान जंगल हवेलियों से ज़्यादा सुरक्षित है कम से कम भेड़िये आवेंगे तो रूप-रंग बदल कर तो नहीं आवेंगे ‘

ओम प्रकाश वाल्मिकी की एक और कहानी ‘यह अंत नहीं’ ग्रामीण दलित स्त्री चेतना की प्रामाणिक कहानी है जो कुदृष्टि रखने वाले पर साहसिक ढंग से पुरजोर वार करती है और दुश्मन की बेहयाई को कायरता में तब्दील कर देती है गाँव का बिसन दलित है, लेकिन वह वह गाँव के सामंतों के हाथों का मोहरा बन कर रह जाता है ऐसे में दलित स्त्री बिरमा को न्याय की आशा व्यर्थ दिखती है परंतु बिरमा की मुखरता ने सभी में आशा का संचार कर दिया — ‘ ना बिरमा यह अंत नही है तुमने हमें ताकत दी है हार को जीत में बदलेंगे, लोगों में विश्वास जगाकर, ताकि कोई बिसन मोहरा न बने ‘

डॉ॰ सुशीला टाकरे की कहानी – ‘ सिलिया ‘ एक दलित लड़की के बाल्यावस्था से युवती के बनने के बीच के अपमान अंतर्द्वंद्व और संघर्ष की कहानी है जिसे आत्मविश्वास है कि शिक्षा से ही सम्मान के शिखर तक पहुँचा जा सकता है कहानी धर्म के खोखलेपन पर प्रहार करती है भेड़ों और बकरियों का व्यवसाय करने वाले गाडरी के मुहल्ले के कुएँ से पानी पीने और सिलिया की ममेरी बहन मालती द्वारा कुएँ की बाल्टी और रस्सी छू जाने से बवेला मच जाता है और

मामी के हाथों मालती की पिटाई होती है यह उसके सामने अपमान का पहला दृश्य था सिलिया के सामने दूसरा दृश्य तब उठता है जब सहेली हेमलता ठाकुर के बहन की ससुराल में सास द्वारा जाति जान लेने के बाद उसके सामने से पानी का गिलास हटा लिया जाता है उस समय उसे बेहद प्यास लगी होती है और इस तरह बचपन के यह घावों को सहती सिलिया बड़ी होती है और समाज को बदलने का संकल्प लेती है — ‘ सिलिया ने तस किया, वह जीवनभर कोशिश करेगी कि समाज इन बातों को समझें, उनके मर्म को जाने सम्मान और अपमान के भेद को समझे और सही रूप में सम्मान का हकदार बने ‘

नीरा परमार की ‘ वैतरणी ‘, कावेरी की ‘ सुमंगली ‘, कहानी दलित स्त्री की बेबसी, लाचारी की वजहों को समझने समझाने की कोशिश करती नज़र आती है ये कहानियाँ दलित स्त्रियों द्वारा भारतीय समाज की भोगी गई विद्रूपताओं और विडंबनाओं की कहानियाँ हैं कहना न होगा कि ये कहानियाँ दलित स्त्रियों के दर्द का दस्तावेज़ हैं

कावेरी की कहानी ‘ सुमंगली ‘ के सुगिया की जीवन कथा मानो शारीरिक शोषण की एक डाक्यूमेंट्री ही है सुगिया जब बारह साल की थी तब उसे औरत बना दिया गया और चौदह बरस में वह माँ बन गई उसके बाद भी न जाने किस-किस के दोहन का शिकार होती रही — ‘ सुगिया फफकने लगती आसूँ की बूँद टप-टप चू पड़ती वह कैसे समझाए कि उजड़ी हुई गृहस्थी को वह अब हरा-भरा नहीं देख सकती ॰॰॰॰॰ जवानी भर उसके शरीर के ठेकेदारों ने अपनी हवस का शिकार बनाया ‘4

कुसुम मेघवाल की कहानी ‘अंगारा’ की जमना अपने बलात्कारियों को नहीं छोड़ती है प्रतिशोध की आग में जल रही जमना जुल्मी को ऐसी सजा देती है कि वह जीते जी मरे के समान रह जाता है — ‘ जमना आँखें फाड़े अपनी इज्जत लूटने वाले नर- पिशाच को देख रही थी अब उसकी बारी थी अंगारा बनी जमना दौड़ी-दौड़ी घर में गई और कोने में पड़ी दराती उठा लाई, सरकार और पुलिस जिसे सजा नहीं दे पाई, उसे जमना न दे दी अपना प्रतिशोध पूरा किया ‘5

राजेश कुमार बौद्ध की कहानी ‘ आतंक ‘ की विमला भी बलात्कारियों को मृत्युदंड देती है इन स्त्रियों में इस चेतना या उग्रता का एक आयाम तो दलित जागृति है ही वहीं वे पूरी स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती दिखाई देती है

दलित स्त्री के शोषण और जुल्म की अत्यंत मर्मस्पर्शी कहानी है ‘ उसका फैसला’ कहानीकार कालीचरण अपनी कहानी में दिखाते है कि बिंदो जो कहानी की नायिका है पर अत्याचार और प्रताड़णा उसका अपना पति और ससुर करते हैं,—” उसके ससुर महाशय जी ने जमकर दारू पी और आधी रात को सोती हुई बिंदो पर राक्षस की भाँति टूट पड़ा ॰॰॰॰॰ साली हरमजादी, तेरा जवानी का जोश थम नहीं रहा है चंदर से तो होता-हवाता नहीं है मै ही तेरी आग ठंडी करूँगा ”6 उस रात बिंदो

का जैसे सब कुछ खत्म हो गया

मराठी कहानियों में ज्योति लांजवार की कहानी ‘गिद्ध ‘ परिवार में होने वाले यौन उत्पीड़न पर प्रकाश डालती नज़र आती है कहानी में शब्बों की माँ सोचती है कि मर्दों की इस दुनिया में मर्द कहलाने वाला नामर्द कैसे हो सकता है? औरत ही तो इन मर्दों को जन्म देती है फिर मर्द का उसकी ओर देखने का नज़रिया ऐसा क्यूँ?

मराठी कहानी ‘ आयदान ‘दलित स्त्री लेखन में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है उर्मिला पवार इस कहानी की रचयिता है आपकी एक और कहानी ‘ कवच ‘ चर्चा में रही इस कहानी में पुरुष का स्त्री की ओर देखने का दृष्टिकोण कभी खुली भाषा में तो कभी सांकेतिक भाषा में बखूबी व्यक्त किया गया है

मराठी कथाकार प्रज्ञा दया पवार की कहानी ‘ पैडीक्योर ‘ ब्राह्मणवादी मानसिकता में जीती माया का सुखी दलित दंपत्ति का एक दूसरे के प्रति समर्पित प्रेम देख ईर्ष्या से भर उठने की कहानी है

गुजरती कहानी ‘ दरी’ दलित स्त्री और उसके सामाजिक परिवेश का चित्रण करती नज़र आती है लेखिका हास्यदा पंडया की यह कहानी एक दलित किशोरी के साथ उसके शिक्षक द्वारा किए जाने वाले बलात्कार को दिखती है कहानी जहाँ इस पर प्रकाश डालती है कि दलित की इज्जत-विज्ज्त कुछ नहीं होती वहीं इस पर भी प्रकाश डालती है कि बलात्कार के बारे में लड़की मुँह नहीं खोलेगी कहानी में आक्रोश के स्वर को न्यायोचित रूप से हिंसा और प्रतिरोध तक पहुँचता दिखाया गया है इस कहानी का कथानक आहत दलित अस्मिता के अपमान और बलात्कार का है

कहना न होगा कि दलित कहानियाँ दलित स्त्री परिवर्तन की इच्छा के साथ समानता , आत्मबोध, संवेदनशीलता की आवाज़ों को मुखर करती नज़र आती है रमणिका गुप्ता के शब्दों में — ‘ये कहानियाँ सामाजिक बदलाव लाने का आह्वान करती हैं इन कहानियों में आक्रोश है, आग है , गुस्सा है तो साथ-साथ संवेदना , मानवीयता और सब्र भी है न्याय की उत्कृष्ट लालसा है समानता की तीव्र ललक है भाईचारे की भावना है ‘7

संदर्भ

1॰ ओम प्रकाश वाल्मिकी, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र,पृ॰ 0-21

2॰ डॉ॰ एन॰ सिंह, अंतिम दो दशक का हिन्दी साहित्य ,संपादक मीरा गौतम

3॰ ओम प्रकाश वाल्मिकी, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र,पृ॰ 0-24

4॰ कावेरी , दलित साहित्य कहानी संचयन ,सं॰ रमणिका गुप्ता , पृ॰ 120

5॰ कुसुम मेघवाल ,दलित साहित्य कहानी संचयन ,सं॰ रमणिका गुप्ता , पृ॰ 141 6॰ काली चरण प्रेमी,नई सदी की पहचान,श्रेष्ठ दलित कहानियाँ, सं॰मुद्राराक्षस, पृ॰103

7॰ दूसरी दुनिया का यथार्थ, रमणिका गुप्ता,नवलेखन प्रकाशन , हजारीबाग ,1997

डॉ॰ स्वाति श्वेता

सहायक प्रोफेसर

swat.shweta@ymal.com गार्गी महाविध्यालय

(M) 9818434369 दिल्ली विश्वविद्यालय

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता-श्‍याम कश्‍यप

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हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता हिन्दी साहित्य के विकास का अभिन्न अंग है। दोनों परस्पर एक-दूसरे का दर्पण हैं। इस दृष्टि से दोनों में द्वन्द्वात्मक (डायलेक्टिकल) और आवयविक (ऑर्गेनिक) एकता सहज ही लक्षित की जा सकती है। वस्तुतः हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता हमारे आधुनिक साहित्यिक इतिहास का अत्यंत गौरवशाली स्वर्णिम पृष्‍ठ है। स्मरणीय है कि हिन्दी के गद्य साहित्य और नवीन एवं मीलिक गद्य-विधाओं का उदय ही हिन्दी पत्रकारिता की सर्जनात्मक कोख से हुआ था।

यह पत्रकारिता ही आरंभकालीन हिन्दी समाचार पत्रों के पृष्‍ठों पर धीरे-धीरे उभरने वाली अर्ध-साहित्यिक पत्रकारिता से क्रमश: विकसित होते हुए, भारतेन्दु युग में साहित्यिक पत्रकारिता के रूप में प्रस्फुटित हुई थी।

भारतेन्दु हरिशचन्द्र (सन्1850-1885 ई0) की पत्रिकाओं कविवचनसुधा (1867ई0), हरिशन्द्र मैगज़ीन (1873ई0) और हरिशचन्द्र चंद्रिका (1874ई0) से ही हमें वास्तविक अर्थों में हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के दर्शन होते हैं। हिन्दी की आरंभकालीन साहित्यिक पत्रकारिता से ही हिन्दी गद्य का चलता हुआ रूप निखर कर सामने आया और भारतेन्दु युग से गद्य-विधाओं और गद्य साहित्य की अखंड परंपरा का अबाध आविर्भाव हुआ।

पृष्‍ठभूमि: छापेखानों की और पत्रों की शुरुआत

अठारहवीं शताब्दी में भारत के कई नगरों ,गोआ, बंबई, सूरत, कलकत्ता और मद्रास में अनेक छापेखाने (प्रिंटिंग प्रेस) कायम हो गए थे स हालाँकि, हालैंड में 1430 ई0 में पहले प्रिंटिंग प्रेस के लगभग सवा सदी बाद, गोआ में 1556 ई0 में भारत का पहला प्रेस कायम हुआ था। परमेश्‍वरन थंकप्पन नायर के शब्दों में न केवल, “हिन्दी और उर्दू की पत्रकारिता का जन्म कलकत्ता में हुआ,“ बल्कि “कलकत्ता को पूरे दक्षिण-पूर्व एषिया में पत्रकारिता का जन्म स्थान माना जा सकता है। कलकत्ता से ही 1765 ई0 में एक डच विलियम बोल्ट ने पत्रकारिता के आरंभिक प्रयास किए थे और अंततः 1766 में अपना पहला “नोटिस“ छापा था।

कुछ विद्वानों की मान्यता है कि, “भारत में पत्रकारिता का आरंभ 1774 ई0 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार की ओर से मुद्रित एवं प्रकाशित “कैलकेटा गज़ेट“ से हुआ था। जो कि सही नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह स्वतंत्र पत्रकारिता नहीं थी। इसलिए अधिकांश विद्वानों का मत है, जो प्रायः स्वीकार्य भी है, कि भारत में पत्रकारिता की शुरुआत एक आयरिश जेम्स ऑगस्टस हिकी ने 27 जून,1780 ई0 को अंग्रेज़ी में “बंगाल गज़ेट ऑफ कैलकेटा एडवरटाइज़र्स“ नामक साप्ताहिक निकाल कर की।

हिन्दी का स्वरूप और हिन्दी पत्रों का आरंभ

डॉ0 शिवमंगल राय के अनुसार ”सन्1779 आते-आते प्रथम भारतीय बाबू राम ने भी कलकत्ता में अपना प्रेस खड़ा कर लिया। हालाँकि प्रिओल्कर और नाइक ने देवनागरी में छपाई का समय 1796 में निर्धारित किया है, जबकि कुछ विद्वान इसे और भी पहले बताते हैं। लेकिन तथ्य यह है कि 1786 से पहले तक तो कलकत्ता में देवनागरी टाइप ही उपलब्ध नहीं था। परमेश्‍वरन नायर के अनुसार “देवनागरी लिपि में छपाई के काम की शुरुआत कलकत्ता से ही हुई थी“ और वहीं से आरंभकालीन हिन्दी का साहित्य भी प्रचुर मात्रा में लिखा गया था तथा “1827 तक पूरे उत्तर भारत में हिन्दी का स्वरूप उभर कर सामने आ गया था।

इससे स्‍पष्‍ट है कि अंग्रेज़ों द्वारा फोर्ट विलियम से हिन्दी गद्य के तथाकथित ”निर्माण” और देवनागरी लिपि में फारसी-बोझिज्ञ तथाकथित ”हिन्दुस्तानी” भाषा के ”विकास” एवं उसकी ”लोकप्रियता” के दावे निराधार और झूठे प्रमाणित होते हैं। श्रीरामपुर (सीरामपुर) के मिशनरियों के हिन्दी मासिक ”दिग्दर्शन” (1817-18) के दो माह के भीतर ”बेंगाल ग्याजेट” और ”समाचार दर्पण” दो बाँग्ला साप्ताहिक पत्र निकले तथा 30 मई, 1826 को पहला हिन्दी समाचार पत्र साप्ताहिक ”उदंतमार्त्तंड” उदित हुआ। इसके संपादक, मुद्रक और प्रकाशक पं0 युगलकोशोर शुक्ल स्वयं एक सहृदय कवि एवं सुलेक्जक थे; अतः आरंभ से ही इस पत्र का रुझान लगभग अर्ध- साहित्यिक था।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी अपने ”हिन्दी साहित्य का इतिहास” (मुद्रण: सं0 1995) में इसे हिन्दी का पहला पत्र बताते हुए लिखते हैं ”उदंतमार्त्तांडके बाद काशी के ”सुधाकर” और आगरा के ”बुद्धिप्रकाश” आदि के प्रयासों से “अदालती भाषा उर्दू बनाई जाने पर भी, वुक्रम की 20वीं शताब्दी के आरंभ के पहले से ही (यानी सन् 1840-45ई0 के पहले से ही) हिन्दी खड़ी बोली गद्य की परंपरा हिन्दी साहित्य में अच्छी तरह चल पड़ी ; उसमें पुस्तकें छपने लगीं, अखबार निकलने लगे। कहना ना होगा कि इन अखबारों के अर्ध-साहित्यिक रूप से ही क्रमश: साहित्यिक प्तरकारिता का विकास हुआ।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इस पत्रकारिता, नवोदित गद्य-साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता का स्वरूप आरंभ से ही राजनीतिक और विचारधारात्मक रहा है। अर्थात उपनिवेशवाद- विरोधी और लोकोन्मुख भले ही उन पत्रकारों और लेखकों ने औपनिवेशिक विदेशी सत्ता, उसके कठोर सेंसरशिप और दमनकारी पेअशासन-तंत्र की आँखों में धूल झोंकते हुए कैसे भी संकेतात्मक, छद्म और प्रतीकवादी तरीके क्यों न अपनाएँ हो। हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के जनक भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र ने अपनी आँखों से सन् 1857 का ”गदर”, उसके असफल रहने पर उन प्रथम स्वाधीनता-संग्रामियों का निर्मम नरसंहार और सामान्य भारतवासियों का नृशंस दमन देखा था।

आचार्य शुक्ल 1857 के प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम से गद्य-साहित्य की परंपरा का संबंध जोड़ते हुए ”इतिहास” में लिखते हैं कि “गद्य-रचना की दृष्टि से ……… संवत 1914 (अर्थात 1857ई0) के बलवे (गदर) के पीछे ही हिन्दी गद्य-साहित्य की परंपरा अच्छी चली“ । इस तरह हम देखते हैं कि हिन्दी पत्रकारिता से ही साहित्यिक पत्रकारिता और गद्य साहित्य का विकास होता है और दूसरे, आरंभकाल से ही जुझारू गद्य-साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता का संबंध हमारे साम्राज्यवाद-विरोधी संग्राम से भी बड़ा प्रत्यक्ष और गहरा था

हिन्दी गद्य का निर्माण

डॉ0 नामवर सिंह इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि “पत्रकारिता को ही लें। सही है कि हिन्दी गद्य का निर्माण स्वाधीनता संग्राम के जुझारु और लड़ाकूपन के बीच हुआ। संघर्ष के हथियार के रूप में निस्संदेह, साहित्य के पहले उसका यह रूप हिन्दी पत्रकारिता, सबसे पहले और सबसे ज़्यादा भारतेन्दु की पत्रकारिता में प्रस्फुटित और विकसित हुआ था।

अशोक वाजपेयी के शब्दों में, “गद्य के निर्माण में पत्रकारिता का भी कुछ न कुछ हाथ होता है। पुराने जमाने से ही था, जो बहुत अच्छे गद्यकार थे ,वे बहुत अच्छे पत्रकार भी थे। इन्हीं तथ्यों को उजागर करते हुए डॅा0 रामविलास शर्मा बहुत पहले यह लिख चुके थे कि “भारतेन्दु से लेकर प्रेमचन्द तक हिन्दी साहित्य की परंपरा में यह बात ध्यान देने योग्य है कि सभी बड़े साहित्यकार पत्रकार भी थे। पत्रकारिता उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गई थी। यह पत्रकारिता एक सजग और लड़ाकू पत्रकारिता थी। प्रेमचंद भी “एक सफल संपादक थे और ”हंस” के ज़रिये उन्होंने साहित्यकारों की एक नई पीढ़ी को शिक्षित किया। कहना न होगा कि साहित्यिक पत्रकारिता की यह भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

भारतेन्दु और प्रेमचंद के अलावा यही बात पं0 महावीरप्रसाद द्विवेदी, निराला, मुक्तिबोध, यशपाल, हरिशंकर परसाई, नामवर सिंह और नंदकिशोर नवल के बारे में भी कही जा सकती है। साहित्य और पत्रकारिता के इन घनिष्‍ठ संबंधों की ओर संकेत करते हुए प्रो0 सूर्यप्रसाद दीक्षित लिखते हैं कि “हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में पत्रकारिता की अनन्य देन रही है। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से युग-प्रवृत्तियों का प्रवर्तन हुआ है, विभिन्न विचारधाराओं का उन्मेश हुआ है और विशिष्‍ट प्रतिबाओं की खोज हुई है। वस्तुतः साहित्य और पत्रकारिता परस्पर पूरक और पर्याय जैसे हैं। शायद इसीलिए लोग पत्रकारिता को ”जल्दी में लिखा हुआ साहित्य” और साहित्य को ”पत्रकारिता का श्रेष्‍ठतम रूप” भी कहते हैं। साहित्यिक पत्रकारिता के प्रसंग में तो यह मणि-काँचन-योग और भी प्रत्यक्ष है ।

एक रोचक घटना: संदर्भ यूरोप का — साहित्यिक पत्रकारिता का उदय

सेंट फॉक्स साहित्यिक पत्रकारिता के आरंभ का बड़ा दिलचस्प विवरण देते हुए बताते हैं कि रेनाडो नामक पेरिस के एक डॉक्टर अपने अस्पताल के रोगियों के मन-बहलाव के लिए अद्भुत घटनाओं, रोचक किस्सों, अलौकिक विवरणों और दिलचस्प खबरों को जमा करके बीमारों को पढ़ने देने लगे। डॉ रेनाडो का विशवास था कि ऐसे मनोरंजन से रोगियों को शांत और प्रसन्न रखा जा सकता है और उन्हें शीघ्र निरोग भी किया जा सकता है। कहना न होगा कि उन्हें इसमें आशातीत सफलता भी मिली।

इससे उत्साहित होकर, पेरिस प्रशासन की अनुमति से, रेनाडो ने 1632 ई0 से ऐसी सामग्री संकलित कर एक नियमित साप्ताहिक पत्रिका शुरु कर दी, जो आम लोगों में भी खासी लोकप्रिय हो गई। रेनाडो के अनुकरण पर पेरिस से ही सांसद डेनिस द” सैलो ने 1650ई0 में ”जर्नल द” सैवेंत्रास“ नामक एक साहित्यिक पत्र आरंभ किया। आइज़क डिज़रेज़ी के मतानुसार साहित्य और समालोचना की यही सबसे पहली पत्रिका है। ऐसी ही दूसरी पत्रिका 1684 में बेल ने निकाली इसका नाम “वावेत्स द“ ला रिपब्लिक द” लेटर्स“ था।

फॉअस के बाद इंग्लैंड से भी अनेक साहित्यिक पत्र निकलने लगे। इनमें डेनियल डेफो का ”द रिव्यू” पहला अंग्रेज़ी पत्र था, जिसके लिए उन्हें 1703 में जेल भी जाना पड़ा था। तत्पश्‍चात रिचर्ड स्टील का ”द टैटलर”, फिर स्टील और ऐडिसन द्वारा मार्च,1711 से मिलकर निकाला गया ”द स्पेक्टेटर” तथा साहित्य समालोचना की विख्यात पत्रिका ”द मंथली रिव्यूज़” के नाम विशेश उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त, “जेंटिलमेन्स मैगज़ीन”, ”द क्रिटिकल” तथा डॉ0 सैम्युल जॉनसन की दोनों सुप्रसिद्ध पत्रिकाओं ”द रैम्बलर” और ”द आइडलर“ का भी विशेश ऐतिहासिक महत्तव है। अंग्रेज़ी साहित्य के विकास में इनका अमूल्य योगदान माना जाता है

वस्तुतः फ्राँसीसी क्रांति के बाद 1749-50 से तो यूरोप के प्रायः सभी देशों से अनेक साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित और लोकप्रिय होने लगीं सयूरोपीय ”रेनाँसाँ” (पुनर्जागरण), मध्य वर्ग के उदय और जातीय चेतना (नैशनेल्टी की चेतना के बोध) के विकास से इस साहित्यिक पत्रकारिता की शुरुआत का सीधा संबंध था, ठीक वैसे ही, जैसे कि कालांतर में भारतीय भाषाओं में —-

विशेष रूप से हिन्दी में, साहित्यिक पत्रकारिता का गहरा संबंध नवोदित भारतीय मध्य वर्ग की उत्तरोत्तर क्रमश: होती हुई लोकतांत्रिक चेतना, जातीय नवोन्मेश और साम्राज्य-विरोधी राश्ट्रीय मुक्ति-संग्राम से भलीभाँति परिलक्षित किया जा सकता है।

संदर्भ

1) ”हिन्दी नवजागरण: बंगीय विरासत” (खंड दो), सं0 शम्भुनाथ और रामनिवास द्विवेदी ;

प्रकाशक: कोल इंडिया लि0, कलकत्ता (1993), पृष्‍ठ 919

2) उपर्युक्त, पृ0 905

3) उपर्युक्त, पृ0 919

4) उपर्युक्त, पृ0 920

5) उपर्युक्त।

6) उपर्युक्त।

7) उपर्युक्त, 907

8) उपर्युक्त, 911

9) ”समाचारपत्रों का इतिहास”, अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी ; ज्ञानमण्डल लि0, वाराणसी (द्वितीय सं0

1953), पृ0 33-34

10) ”हिन्दी साहित्य का इतिहास”, रामचन्द्र शुक्ल ; सं0 2005, प्रकाशन सण्स्थान, नयि दिल्ली, पृ0 309

11) उपर्युक्त, पृ0 312

12) उपर्युक्त, पृ0 307

13) ”पूर्वग्रह”,सं0 अशोक वाजपेयी, अंक 44-45 (मई-अगस्त,1981), नामवर सिंह

14) उपर्युक्त, पृ0 14

15) ”प्रेमचंद और उनका युग”, रामविलास शर्मा ; राजकमल प्रकाशन ;पृ0130

16) उपर्युक्त, पृ0159

17) ”हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता”, सं0 प्रो0 सूर्यप्रसाद दीक्षित , पृ0 3

18) यूरोप के उपरलिखित सभी विवरण, लखनऊ विश्‍वविद्यालय की ”जन-संचार एवं पत्रकारिता” के विशय कौ प्रथम पी0एच0डी0 डिग्री के षोध-प्रबंध (डॉ0ष्याम कष्यप) से लिए गए हैं।

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (2)

साहित्य में आधुनिक चेतना, स्वच्छंद आत्माभिव्यक्ति और व्यक्तिगत पाठक समुदाय के विकास के साथ ही साहित्यिक पत्रकारिता का उदय हुआ था। यूरोप ही नहीं, कुछ अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में, हिन्दी में कतिपय विलंब से यहाँ तक कि अपनी सहोदर उर्दू की तुलना में भी कुछ विलंब से इसका कारण यह था कि अन्य भारतीय भाषाओं और उर्दू की तुलना में हिन्दी में गद्य का विकास देर से हुआ था। भारतेन्दु युग से पहले तक कविता की भाषा ब्रजभाषा और गद्य की भाषा खड़ी बोली हिन्दी के इस प्रचलित विभाजन से भी हिन्दी गद्य के स्वाभाविक विकास में बाधा नज़र आती है, लेकिन एक बार उन्नीसवीं षताब्दी के उत्तरार्ध में गति पकड़ लेने के बाद, हिन्दी गद्य और प्रकारांतर से हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता ने अभी हिन्दी के अतिरिक्त दुनिया की किसी भी भाषा में कभी भी ऐसा विभाजन नहीं था और न ही उसे ”धर्म” से जोड़ने की अवैज्ञानिक सोच अपने तीव्र विकास में सबको पीछे छोड़ दिया और वह उत्तरोत्तर प्रगति-पथ पर अग्रसित हो गई। शीग्र ही हम हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता को आधुनिक साहित्य के सर्जनात्मक विकास में प्रेरक भूमिका निभाते हुए देखते हैं।

यहाँ इस महत्वपूर्ण तथ्य को भी दृष्टिगत रखना चाहिए कि इस आधुनिक साहित्य और उसकी विविध विधाओं को लोकप्रिय बनाते हुए सामान्य पाठकों और जनसाधारण तक संप्रेशित करने में साहित्यिक पत्रकारिता की लगभग केंद्रीय भूमिका है, लोग एकदम ही साहित्यिक गद्य-विधाओं, विशेष रूप से ब्रजभाषा की तुलना में खड़ी बोली हिन्दी की आधुनिक कविता के पाठक नहीं बन गए थे, खास तौर से मुक्त-छंद और छंद-मुक्त कविता के, किताबों से पहले जनसाधारण, खासकर मध्यम वर्ग के पढ़े-लिखे लोग, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के नियमित पाठक बने थे ; जैसे कि उपन्यासों के पाठक बनने से पहले वे साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले छोटे-छोटे निबंधों, एकांकी नाटकों, प्रहसनों, टिप्पणियों,राजनीतिक व्यग्य-स्तंभों और छोटी कहानियों के नियमित पाठक बने थे स यह अनायास ही नहीं है कि राल्फ फाक्स उपन्यास को बुर्जुआ समाज में ”मध्य वर्ग का महाकाव्य” कहते हैं। इसकी शुरुआत, जैसा कि पहले भी संकेत किया जा चुका है, उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक (”उदंतमार्तंड ;1826ई0) में हो चुकी थी।

भारतेन्दु पूर्व की अर्ध-साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं से उभरने वाली रचनाओं ने खबरों के प्रति उत्सुकता के साथ ही, लोगों में मनोरंजक और साहित्यिक रूझान वाली रचनाओं में भी रुचि जाग्रत करने में बड़ी भूमिका निभायी थी। भारतेन्दु-युग की श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रकारिता ने लोगों की रुचि पढ़ने की ओलृ अधिकाधिक मोड़ते हुए उन्हें हिन्दी साहित्य के जागरूक पाठक बनाया, लोगों ने गंभीर साहित्य पढ़ने की आदत डाल ली, उन्हें टीका-टिप्पणी करने की ओर प्रेरित करके सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से जागरूक बनाया।

साहित्य और पत्रकारिता

साहित्यिक पत्रकारिता और साहित्य की लोकरंजनकारी भूमिका के कारण हि सामान्य पत्र-पत्रिकाएँ भी साहित्यिक विषयों को बराबर स्थान देती थीं। बीसवीं शतब्दी के उत्तरार्ध में भूमंडलीकरण के दौर की शुरुआत से, खास तौर से 1995 के बाद से निजी टेलीविज़न चैनलों और चौबिसों घंटे के न्यूज़ चैनलों के विस्फोट और फलस्वरूप हिन्दी के दैनिक अखबारों द्वारा भी, उनकी रंगारंग अंधी दौड़ की फूहड़ नकल की प्रवृत्ति ने ज़रूर आज यह स्थिति बदल दी है, जिस पर हम आगे यथावसर चर्चा करेंगे स यहाँ यह समझने की आवश्‍यकता है कि अपने आरंभकाल से ही साहित्य और पत्रकारिता का चोली-दामन का संबंध रहा है।

पत्रकारिता का साहित्य के साथ अपने जन्मकाल से बहुत गहरा संबंध बताते हुए राकेश वत्स लिखते हैं कि मानव-यात्रा के “इसी पड़ाव पर (यानी मध्य-वर्गीय लोकतांत्रिक आंदोलनों, राजनीतिक और विचारधारात्मक विकास के पड़ाव पर) आकार साहित्य के संबल की ज़रुरत महसूस हुई स चूँकि पत्र-पत्रिकाएँ ही उसे पाठकों के उस वर्ग तक पहुँचा सकती थीं, ……. पत्रकारिता ने उसकी इस ज़रूरत को पूरा किया। वे आगे बताते हैं कि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ तो मूलतः साहित्य के प्रति समर्पित होती ही हैं, बल्कि शायद ही कोई ऐसा पत्र या पत्रिका होगी जिसमें किसी न किसी रूप में साहित्य के लिए स्थान सुरक्षित नहीं किया जाता होगा। यानी, कविता, कहानी, गज़ल, गीत, निबंध, नाटक, एकांकी, संस्मरण, यात्रा-वृतांत, शब्दचित्र, रोपोर्ताज़, पुस्तक समीक्षा, आलोचना, उपन्यास- सभी कुछ प्रायः सभी पत्र-पत्रिकाओं में छपता रहा है। उनका रूप और आकार भले भिन्न-भिन्न रहा हो।

जिन गैर साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का गंभीर साहित्य की ओर रूझान नहीं था, वे भी, खासकर दैनिक और साप्ताहिक या पाक्षिक अखबार और पत्रिकाएँ भी ”फिलर” के रूप में लघु-कथाएँ, क्षणिकाएँ और व्यंग्य के नाम पर चुटकुलेबाजी, यानी ”साहित्य” के नाम पर रची जाने वाली सारी सामग्री धड़ल्ले से छापते रहे हैं। यहाँ तक कि फिल्मी समाचार पत्र-पत्रिकाएँ भी इन सबको नज़रंदाज़ नहीं करतीं थीं। कहना न होगा कि साहित्य के नाम पर छपने वाला बड़े पैमाने का यह सारा कूड़ा और स्तरहीन रचनाओं का अंबार श्रेष्‍ठ साहित्य तथा स्तरीय और प्रभावि रचनाओं का स्थान नहीं ले सकता, क्योंकि हर छपा हुआ शब्द साहित्य नहीं होता! फिर भी इससे एक माहौल बनता है, एक वातावरण निर्मित होता है। इससे साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता की लोकप्रियता का विस्तार होता है। लोगों में कम-से-कम पढ़ने की ललक और पाठकीय संस्कृति विकसित होती है। लोगों में साहित्य पढ़ने की आदत पड़ती है।

साहित्यिक पत्रकारिता और ”मास-लिटरेचर” यह समझ लीजिए कि स्वयं श्रेष्‍ठ साहित्य न होते हुए भी ऐसी स्तरहीन रचनाओं का ढेर श्रेष्‍ठ रचनाओं के लिए खाद बनता है। ऐसा साहित्य खुद निकृष्‍ठ होते हुए भी पाठक-संस्कृति और साहित्यिक पत्रकारिता के विकास को गति प्रदान करता है। इसी श्रेणी में आप सस्ते और भावुकतापूर्ण रोमैंटिक उपन्यास तथा तिलिस्मी-ऐयारी और जासूसी उपन्यासों को भी शामिल कर सकते है। आचार्य शुक्ल भी इसी तथ्य को अपने ”हिन्दी साहित्य इतिहास” में रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि, “हिन्दी साहित्य के इतिहास में बाबू देवकीनंदन (खत्री) का स्मरण इस बात के लिए सदा बना रहेगा कि जितने पाठक उन्होंने उत्पन्न किए उतने और किसी ग्रंथकार ने नहीं ”चंद्रकांता” पढ़ने के लिए न जाने कितने उर्दू जीवी लोगों ने हिन्दी सीखी ”चंद्रकांता” पढ़कर वे हिन्दी की और प्रकार की साहित्यिक पुसतकें भी पढ़ चले और अभ्यास हो जाने पर कुछ लिखने भी लगे इसीलिए प्रायः पत्र-पत्रिकाएँ धारावाहिक रूप से उपन्यास और ऐसी कहानियाँ बराबर छापते हैं। इस किस्म के साहित्य को ”मास-लिटरेचर” कहा जाता है और यूरोप तथा अमरीका के समाजशास्त्रियों ने इसकी उपयोगिता और लोकप्रियता पर अनेक दिलचस्प अध्ययन किए हैं।

पहले ”धर्मयुग”, ”साप्ताहिक हिन्दुस्तान”, ”कादंबिनी” और ”सारिका” या विभिन्न दैनिक और साप्ताहिक समाचारपत्रों के रविवारीय पृष्‍ठों में छपने वाली चालू और स्तरहीन रचनाओं तथा ”इंडिया टुडे” (हिन्दी)- जैसी समाचार पत्रिकाओं में छपने वाली बाज़ारू रचनाओं के नियमित पाठक ही, उनकी चेतना में धीरे-धीरे विकास और साहित्यिक रुचि के क्रमषः परिश्कार के अबाद ”कल्पना”, ”प्रतीक”, ”कवि”, ”कृति”, ”कहानी”, ”नई कहानियाँ”, ”लहर”, ”पहल”,”धरातल”, ” आलोचना”,”कथा”, ”समारम्भ”, ”पूर्वग्रह”, ”कसौटी”, ” बहुवचन”, ”समस”, और ”पुस्तकवार्ता” जैसी श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं के पाठक भी बनते हैं। कहना न होगा कि इस विशाल पाठक-समुदाय की चेतना में यह विकास और उनकी साघित्यिक रुचि में परिश्कार भी ऐसी साहित्यिक पत्रिकाओं के पठन-पाठन से ही आता है। यहाँ एक विशेश बात यह भी स्मरणीय है कि ”हिन्दी साहित्य का इतिहास” इन श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं में से ही उभरकर सामने आता है। साहित्यिक पत्रकारिता की इस संदर्भ में ऐसी ही द्वंद्वात्मक भूमिका होती है।

साहित्यिक रचनाओं का मूल्यांकन

ध्यान रहे कि साहित्यिक पत्रकारिता, रुचि का यह परिश्कार कृतियों, रचनाओं और रचनाकारों के मूल्यांकन के माध्यम से ही करती है स इस प्रकार साहित्यिक पत्रकारिता रचनाओं का स्तर निर्धारित करते हुए, अच्छी और श्रेष्‍ठ रचनाओं को स्तरहीन बाज़ारू रचनाओं के भारी-भरकम कूड़े से अलगाती है। वास्तव में, यह छँटा हुआ श्रेणीकरण के बाद साहित्य का भावी इतिहास बनता है।

शॅापेन हॉवर ने साहित्यिक पत्रकारिता की इस अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “साहित्यिक पत्रों का कर्त्तव्य है कि वे युग की युक्तिहीन और निरर्थक रचनाओं की बाढ़ के विरुद्ध मज़बूत बाँध का काम करें। … यों कहें कि नब्बे फीसदी रचनाओं पर निर्दयतापूर्वक प्रहार करने की ज़रूरत है। साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ तभी अपने कर्त्तव्य का पालन कर सकेंगे। इसी प्रसंग में वे आगे लिखते हैं कि,“ अगर एक भी ऐसा पत्र है, जो उपर्युक्त आदर्शों का पालन करता हो, तो उसके डर के मारे प्रत्येक अयोग्य लेखक, हरेक बौड़म कवि, प्रत्येक साहित्यिक चोर, हरेक अयोग्य पद-लोभी, प्रत्येक छंद दार्शनिक और हरेक मिथ्याभिमानी तुक्कड़ काँपेगा ; क्योंकि उसे इस बात का डर रहेगा कि छपने के बाद उसकी घटिया रचना खरी आलोचना की कसौटी पर ज़रूर कसी जाएगी और उपहासास्पद सिद्ध होगी। शॅापन हॉवर की यह मान्यता है निकीक इससे घटिया लेखकों को, जिनकी उँगलियों में लिखने की खुजली उठती है, लकवा मार जाएगा। इससे साहित्य का बड़ा हित होगा, क्योंकि साहुत्य में जो चीज़ बुरी है, वह केवल निरर्थक ही नहीं, बल्कि सचमुच बड़ी हानिकारक भी है, कहना न होगा कि हिन्दी की श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं और हमारे श्रेष्‍ठ समालोचकों ने ठीक यही भूमिका निभाई है।

साहित्य का इतिहास और पत्रकारिता इस प्रकार, साहित्यिक पत्रकारिता, जो आज साहित्य के इतिहास की स्रोत-सामग्री और कल का साहित्येतिहास है, दृढ़तापूर्वक अच्छी और बुरी रचनाओं, प्रवृत्तियों तथा साहित्यिक आंदोलनों के बीच निर्णायक फर्क दिखाकर साहित्य के इतिहास के निर्माण में भी अपनी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, साहित्यिक पत्रकारिता, इस तरह, स्तरहीन रचनाओं से स्तरीय और अप्रासंगिक कृतियों से प्रासंगिक लेखन को अलग करती है।

वस्तुतः युग-विशेश की साहित्यिक पत्रकारिता से ही उस युग के साहित्यिक आंदोलनों, बहस-मुबाहिसों, साहित्यिक समस्याओं, प्रश्‍नों और चुनौतियों तथा इन सबके फलस्वरूप उस युग की नई-से-नई साहित्यिक प्रवृत्तियों के उभरने, उनके क्रमश: विकास तथा विभिन्न साहित्यिक प्रवृत्तियों के आपसी अंतर्विरोधों और अंतर्द्वंद्वों का भी अंतरंग परिचय हम पा सकते हैं। यह युग-विशेश की साहित्यिक पत्रकारिता ही है, जो हमारे समक्ष उस युग-विशेश का भरा-पूरा और कलात्मक प्रतिबिंब प्रस्तुत करती है। इससे हमें अपनी समकालीन समस्याओं और चुनौतियों को समझने में मदद मिलती है तथा भविष्‍य के सर्जनात्मक संघर्षों का परिप्रेक्ष्य भी।

संदर्भ:–

1) ”उपन्यास और लोकजीवन”, राल्फ फाक्स ; पीपीएच, नई दिल्ली, पृ0 31

2) ”जनसंचार”, (सं0) राधेष्याम शर्मा ; राकेश वत्स का लेख ; हरियाणा साहित्य अकादमी, पृ0 201

3) उपर्युक्त , पृ0 205-06

4) उपर्युक्त, पृ0 206

5) ”हिन्दी साहित्य का इतिहास”, रामचन्द्र शुक्ल ; प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली, प्र0 356-57

6) ”हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता”, शीर्षक लखनऊ विश्‍वविद्यालय की जन-संचार एवं पत्रकारिता

विषय की प्रथम पी-एच0डी0 डिग्री के शोध-प्रबंध (प्रो0 श्‍याम कश्‍यप) से।

7) उपर्युक्त

8) उपर्युक्त

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हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (3)

साहित्यिक पत्रकारिता का सामान्य पत्रकारिता से अंतर और उसका विशिष्‍ट स्वरूप अब तक कुछ उभर आया होगा। समाचारपत्र (या समाचार पत्रिकाएँ) जहाँ सूचना पर बल देते हुए सामान्य ज्ञान प्रेषित करते हैं, वहीं साहित्यिक पत्रकारिता का उद्देष्य सांस्कृतिक चेतना और परिवेश में परिश्कार लाते हुए पाठक को विषिश्ट ज्ञान प्रशिष्‍ट करना होता है। इसलिए इस क्षेत्र में प्रशिष्‍ट साहित्य-विवेक और विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सूक्ष्म एवं अंतरंग परिचय की आवश्‍यकता होती है। साहित्य और पत्रकारिता का अंतर रेखांकित करते हुए नेमिशरण मित्तल बताते हैं कि, “साहित्य का मूल लक्षण उसका शास्वत स्वरूप तथा चिरंतन तत्व है, किन्तु पत्रकारिता तात्कालिकता, सामयिकता और क्षणभंगुरता के आयामों में कैद होती है, वैसे तो साहित्य में भी सरसता और सुबोधता पर बल दिया जाता है, लेकिन उसके प्रशिष्‍ट काला-चरित्र के कारण जटिलता तथा दुर्बोधता और अनेकार्थकता को भी दुर्गुण नहीं माना जाता, साहित्यिक पत्रकारिता की भाषा शैली पर इसका कुछ-न-कुछ असर तो पड़ता ही है।

सामान्य पत्रकारिता जहाँ लोकमत के निर्माण और उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम होती है, वहीं साहित्यिक पत्रकारिता लोकरंजन, लोक-शिक्षण और जनरुचि के परिश्कार का प्रयास करती है स इसीलिए उसका स्वरूप वैचारिक, संवेदनात्मक और मनोरंजनपरक होता है, लेकिन यहाँ ”संवेदनात्मक” का अर्थ तथाकथित ”शुद्ध साहित्य” के झंडावरदारों की समाज-निरपेक्ष और विचारधारा से परहेज प्रचारित करने वाली कृत्रिम और रहस्यात्मक संवेदना से नहीं है। इसी तरह ”मनोरंजन” का अर्थ व्यावसायिक और बाजारू पत्रिकाओं के फूहड़ और विकृतिपूर्ण समाज-विरोधी और सस्ते मनोरंजन से नहीं है। कहना न होगा कि साहित्यिक पत्रकारिता का उद्देश्‍य मुक्तिबोध की ”ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान” की अवधारणा को अपना आदर्श मान कर चलना चाहिए स श्रेष्‍ठ-साहित्य के आदर्शों और उद्देश्‍यों से भिन्न आदर्श और उद्देश्‍य साहित्यिक पत्रकारिता के हो ही नहीं सकते। दोनों एक न होते हुए भी अन्योन्याश्रित हैं।

साहित्यिक पत्रकारिता का चरित्र स्वरूप

साहित्यिक पत्रकारिता के चरित्र-निरूपण और उसके प्रशिष्‍ट स्वरूप पर विचार करेत हुए हमें गंभीर साहित्यिक पत्रिकाओं को फिल्म, संगीत, राजनीति और धर्म आदि की तरह ”साहित्य” का भी धंधा करने वाली व्यावसायिक पत्रिकाओं से अलगाकर देखना चाहिए। यह अंतर आज़ादी के पहले से रहा है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि ऐसा अंतर साहित्यिक पत्रकारिता के जन्म के समय से ही रहा है। शुरु से ही साहित्यिक पत्रिकाएँ सदैव सत्ता-तंत्र और व्यवसाय-तंत्र से जुड़ी या उनकी हितपोशक प्रतिष्‍ठानी और सेठाश्रित पत्रिकाओं से अलग, बल्कि विरोधी रही हैं, भले ही इस विरोध तथा प्रतिरोध की शैली उसका स्वरूप कितना ही भिन्न-भिन्न क्यों न हो।

यह अंतर ”उदंतमार्तंड”. ”सुधाकर”, ”प्रजाहितैशी” या ”पयाम-ए-आज़ादी” का ”बनारस अखबार” जैसे पत्रों से साफ झलकता है। यह अंतर भारतेन्दु की ”कविवचनसुधा” और धड़फले के हाथ में जाने के बाद की स्तरहीन और पतित ”कविवचनसुधा” में और भी प्रत्यक्ष है। यह अंतर ”सरस्वती” (महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन-काल की), ”माधुरी”, ”मतवाला”, ”सुधा”, ”चाँद”, ”हंस”(प्रेमचंद के संपादन-काल से लेकर अमृत राय-रामविलास शर्मा-शिवदानसिंह चौहान के प्रगतिवादी-काल तक का), ”विप्लव”, ”नय साहित्य”, ”रूपाभ” सहित ऐसी ही अनेक छोटी-बड़ी साहित्यिक पत्रिकाओं तथा बाजारू और व्यावसायिक पत्रिकाओं के बीच सदैव रहा है। कहना न होगा कि हमारा ” हिन्दी साहित्य का इतिहास” इन महत्वपूर्ण पत्रिकाओं से ही अस्तित्व में आया है।

आज़ादी के बाद यह अंतर ”कल्पना”, (बदरी विशाल पित्ती एवं अन्य), ”समालोचक” (रामविलास शर्मा), ”प्रतीक” (अज्ञेय), ”नया पथ” (यशपाल एवं अन्य), ”कृति” (श्रीकांत वर्मा), ”आलोचना” (नामवर सिंह), ”वसुधा” (हरिशंकर परसाई), ”कहानी” (श्रीपत राय), ”लहर” (प्रकाश जैन और मनमोहिनी) और ”नई कहानियाँ” (कमलेश्‍वर, फिर भीष्‍म साहनी) जैसी श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं तथा व्यावसायिक घरानों की प्रतिष्‍ठानी और सेठाश्रयी पत्रिकाओं –”धर्मयुग”, ”साप्ताहिक हिन्दुस्तान”, ”ज्ञानोदय”, ”सारिका”, ”निहारिका” और ”कादम्बिनी” आदि के बीच बड़ा स्पष्‍ट रहा है। यह अंतर सारी दुनिया में और विश्‍व की प्रायः अभी भाषाओं की साहित्यिक पत्रिकाओं और राजसत्ता (भले ही उसे ”जनसत्ता” का झूठा नाम दें) या धनसत्ता की होतपोशक प्रतिष्‍ठानी पत्रिकाओं में रहा है। इस अंतर के कारण ही दुनिया-भर में साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में ”लघुपत्रिका” या ” लिटिल मैगज़ीन” आंदोलन होते रहे हैं।

लघु-पत्रिका आंदोलन

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के संदर्भ में जब उपर्युक्त अंतर और फलस्वरूप विचारधारात्मक संघर्ष बहुत तीव्र हो गया तो सन् 60 के बाद साहित्यिक और व्यावसायिक पत्रिकाएँ एक-दूसरे के विरुद्ध एक बड़ी लड़ाई में भिड़ गईं, यह लड़ाई कमोबेश आज भी जारी है, इस सातवें दशक के मध्य में ही हिन्दी में ”लघु-पत्रिका” आंदोलन के रूप में ऐसा जबर्दस्त साहित्यिक विस्फोट हुआ कि सेठाश्रयी और व्यावसायिक प्रतिष्‍ठानी पत्र-पत्रिकाओं का पूरी तरह भट्ठा बैठ गया। उनमें श्रेष्‍ठ रचनाओं और श्रेष्‍ठ साहित्यकारों का टोटा पड़ गया।

हिन्दी के युवा और युवतर लेखकों-कवियों और आलोचकों ने इन पत्रिकाओं के खिलाफ सफल्क और ज़ोरदार ”बहिष्‍कार” अभियान चलाया, यहाँ तक कि प्रतिष्ठित बुजुर्ग कवि-लेखक भी इन पत्रिकाओं में छपने से हिचकिचाने लगे, इनमें छपने वाले लेखक साहित्यिक मान्यता और साहित्यिक प्रतिष्‍ठा के लिए तरसते रह गए, जो प्रतिष्ठित और लोकप्रिय लेखक इनमें छपता था, उसे पूरे साहित्य-जगत का विरोध और बहिष्‍कार झेलना पड़ता था।

हिन्दी का यह लघु-पत्रिका आंदोलन इतना लोकप्रिय और प्रभावी सिद्ध हुआ कि प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में साहित्यिक लघु-पत्रिकाओं का ज्वार आ गया। स्मरणीय है कि ऐसे ही विचारधारात्मक और सर्जनात्मक संघर्ष में से ही यूरोप में ”प्रोटेस्ट मूवमेंट” उभरकर सामने आए थे तथा विश्‍व-भर में छा गए थे, हिन्दी में उभरा यह ”लघु-पत्रिका आंदोलन” अब तो एक तरह से साहित्येतिहास और साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास का भी अंग बन चुका है। कालांतर में साहित्यिक पत्रिकाओं के च्वरूप में भारी परिवर्तनों के बाद भी उनके लिए ”लघु-पत्रिका” या ”अव्याओकर लोक-प्रचलितवसायिक” पत्रिका नाम ही सर्वमान्य और रूढ़ होकर लोक-प्रचलित हो चुका है। वास्तव में, ऐसी पत्रिकाएँ ही साहित्यिक पत्रिकाएँ हैं, मानी जाती हैं।

नया दौर: ”वाम वाम वरम दिशा …….”

सन् साठ के बाद एक जबर्दस्त आंदोलन की तरह आरंभ हुआ लघु-पत्रिकाओं का यह अभियान अनेक उतार-चढ़ावों के बाद, सत्तर और अस्सी के दशकों में प्रगतिशील और वामपंथी रुख अख्तियार कर लेता है। इसकी परिणति इस रूप में होती है कि एक ओर जहाँ उपर्युक्त प्रतिष्‍ठानी पत्रिकाएँ या तो बंद हो जाती हैं अथवा अप्रासंगिक होकर अपना प्रभाव खो देती हैं, वहीं ” आलोचना” (नामवर सिंह एवं नंद किशोर नवल) के अलावा ”पहल” (ज्ञानरंजन), ”लहर” (प्रकाश जैन और मनमोहिनी), ”प्रगतिशील वसुधा” (कमला प्रसाद), ”उत्तरार्ध” (सव्यसाची), ”कथा” (मार्कण्डेय), ”कलम” (चंद्रबली सिंह), ” ओर” (विजेन्द्र्), ”क्यों” (मोहन श्रोत्रिय और स्वयं प्रकाश),” आरम्भ” (नरेश सक्सेना और विनोद भारद्वाज),”धरातल” (नंदकिशोर नवल), ”कथा” (मार्कण्डेय), ”समासम्भ” (भैरवप्रसाद गुप्त),”इसलिए” (राजेश जोशी) और ”कसौटी” (नंदकिशोर नवल)– जैसी श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाएँ अपने दौर की साहित्यिक पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व करती हैं। कुछ पुरानी और प्रतिष्ठित लघु-पत्रिकाएँ तथा कई नई पत्रिकाएँ चंद अविस्मरणीय विशेषांक प्रकाशित कर धीरे-धीरे पृष्‍ठभूमि में चली गईं।

दैनिक समाचारपत्रों में साहित्यिक पत्रकारिता

प्रायः सभी दैनिक, पाक्षिक और साप्ताहिक अखबारों में हमें छिट-पुट साहित्यिक रूझान उनके रविवारीय संसकारणों में तो दिखता है, लेकिन इस क्षेत्र में उनका कोई महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय योगदान नहीं दिखता, अपवाद स्वरूप, प्रमुख प्रगतिशील दैनिक ”जनयुग” में न केवल यह साहित्यिक-विचारधारात्मक रूझान स्पशष्‍ट नज़र आता है, बल्कि उसका रविवारीय परिशिष्‍ट मुख्यतः साहित्य को ही समर्पित होता था, कुल चार पृष्‍ठों के इस परिषिष्‍ट में एक विचारधारत्मक अग्रलेख और छोटे से बच्चों के कोने के अलावा शेष प्रायः तीन-साढ़े तीन पृष्‍ठ साहित्य को ही समर्पित होते थे।

”जनसत्ता” ने भी अपने रविवारीय परिषिश्ट में इस परंपरा का मंगलेश डबराल के संपादन में निर्वाह किया। इसीतरह जब तक राजेंद्र माथुर रहे ”नवभारत टाइम्स” ने भी कुछ स्थान साहित्यिक पत्रकारिता के लिए दिया। लेकिन कालांतर में इस श्रेष्‍ठ परंपरा का अवसान हो गाया, नब्बे के दशक के मध्य तक भूमंडलीकरण की आँधी में साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता के पैर उखड़ने लगे स धीरे-धीरे आज हम एक ऐसे विचार-शून्य — या कहें प्रायोजित मीडिया के प्रायोजित विचारों में डूबते -उतराते अपढ़ समाज और सांस्कृतिक-शून्‍यता की ओर बह रहे हैं, एक ऐसा समाज जहाँ उपभोक्तावाद के दलदल की ओर ढकेलती अपसंस्कृति की गहरी ढलान है।

अंतिम उल्लेखनीय प्रयास

इस स्थिति से निकलने की कोशिश में देश भर के उत्तर भारत के हिन्दीभाषी, प्रमुख साहित्यकारों-संपादकों की 29-30 अगस्त,1992 को कलकत्ता में साहित्यिक लघु-पत्रिकाओं की पहली राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी हुई। इसी कड़ी में 14-15 मई, 1991 को जमशेदपुर में राष्‍ट्रीय समन्वय समिति गठित की गई। लेकिन साहित्यिक पत्रकारिता को पुनः उसके श्रेष्‍ठ और उच्चतर धरातलों पर प्रतिष्ठित कर पाने के सभी प्रयास आशातीत रूप में फलप्रद नहीं हो पाए।

मुख्य बात यह है कि ये सभी साहित्यिक पत्रिकाएँ अपने कलेवर, आकार और साज-सज्जा में भले ही ”लघु” पत्रिकाएँ थीं, अपने प्रभावी साहित्यिक मूल्यांकन, श्रेष्‍ठ रचनाओं के प्रकाशन और प्रतिभाशाली नए लेखकों की नई से नई पीढ़ियाँ तैयार करके उन्हें प्रशिक्षित करने की दृष्टि से बिल्कुल भी लघु या छोटी नहीं कही जा सकतीं स ये अपनी अंतर्वस्तु (कन्टेन्ट) और वैचारिक प्रतिबद्धता की दृष्टि से निस्संदेह बड़ी- बहुत बड़ी पत्रिकाएँ ही कही जाएँगी। अपने युग की प्रतिनिधि और भावी साहित्येतिहास का कच्चा माल, एक तरह से साहित्य रचना और मूल्यांकन के प्रशिक्षण के संस्थान, विश्‍वविद्यालय !!

वास्तव में, ये सभी पत्र-पत्रिकाएँ सत्ता-तंत्र और व्यवसाय-तंत्र की तथाकथित ”बड़ी” और रंगीन, सेठाश्रयी, बाजारू पत्रिकाओं से भिन्न, यथार्थ में साहित्यिक पत्रिकाएँ हैं, चाहे इन्हक पत्रिकाएँ ”गैर-व्यावसायिक पत्रिकाएँ” कहा जाए या ”प्रतिष्‍ठान-विरोधी” और ”श्रमजीवा पत्रिकाएँ” कहा जाए अथवा लोक-प्रचलित ”लघु-पत्रिकाएँ” , साहित्यिक पत्रकारिता के श्रेष्‍ठ और सच्चे प्रतिमान हमें इन्हीं पत्र-पत्रिकाओं में दृष्टिगोचर होते हैं।

संदर्भ:-

1) ”पत्रकारिता और संपादन कला”, (सं0 डॉ0 रामप्रकाश) में नेमिशरण का लेख, पृ0 116

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (4)

अब तक के विवेचन से यह तो स्पष्‍ट हो ही जाता है कि साहित्यिक पत्रकारिता मात्र तकनीक नहीं, बल्कि भाषिक और विचारधारात्मक चेतना भी है। भाषिक संवेदना और वैचारिक चेतना के साथ ही वह साहित्य और अन्य ललित कलाओं की तरह खुद भी एक सर्जनात्मक और कलात्मक रूप है।

कला भी और विज्ञान भी

जैसा कि ऊपर कहा गया है, साहित्यिक पत्रकारिता एक कला है— एक ऐसी कला जो अपने सर्वोच्च स्तरों पर सर्जनात्मक साहित्य से होड़ करती है। कह सकते हैं कि कला और सर्जनात्मक संगठन का समन्वित प्रयास लेखक अगर लिख कर सृजन करता है, तो एक श्रेष्‍ट साहित्यिक पत्रकार अपनी संगठनात्मक क्षमता, संपादन सामर्थ्य और वस्तुनिष्‍ट आलोचनात्मक विवेक से साहित्य को कलात्मक गतिशील रूप, नवोन्मेश की चेतना और लोकोन्मुख प्रगतिशील दिशा दे सकता है। कहना न होगा कि इन कलात्मक और संगठनात्मक साहित्यिक प्रयासों को भी व्यापक अर्थ में सर्जनात्मक ही कहा जाएगा।

इस दृष्टि से देखें तो भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, निराला, रामविलास शर्मा, यशपाल, हरिशंकर पएासाई और नामवर सिंह की साहित्यिक पत्रकारिता किस लेखक के सर्जनात्मक और कलात्मक प्रयासों से कम है, इसीलिए, और ठीक इन्हीं अर्थों में, श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रकारिता एक विज्ञान भी है। कहना न होगा कि अपने खास अर्थों में आज के संचार क्रांति के उत्तर-औद्योगिक परिदृश्‍य में साहित्यिक पत्रकारिता भी— सामाजिक चेतना को एक सुनिश्चित रूप एवं दिशा देने में तथा साथ ही लोकमत की सूक्ष्म प्रक्रिया को प्रभावित करने में अपना विशेष योगदान देती है। सामान्य पत्रकारिता की तुलना में साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता की यह भूमिका, प्रक्रिया के स्तर पर, अधिक जटिल एवं सूक्ष्म तथा प्रभाव की दृष्टि से अधिक स्थायी किन्तु लगभग अदृश्‍य होती है। साहित्यिक पत्रकारिता लोकमत-निर्माण और लोक-शिक्षण का कार्य भी परोक्ष ढंग से करती है। इस प्रकार वह समाज की विचार-चेतना के विकास में और व्यापक सांस्कृतिक एवं सामाजिक जनरुचि के परिश्कार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है स वह भी संचार-क्रांति की कार्य प्रणाली और नियमों – अवधारणाओं का कमोबेश अनुसरण करती है।

एक सामान्य पत्रकार और संपादक की तरह साहित्यिक पत्रकार और संपादक को भी आज की अधुनातन प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी, कलात्मक रूप-सज्जा और मूल्यांकन में वैज्ञानिक वस्तुपरकता का अभ्यस्ज्ञान की जात तथा विज्ञान की जानकारी से लैस होना चाहिए। एक कुशल साहित्य संपादक और साहित्यिक पत्रकार के पास वैज्ञानिक की वस्तुनिष्‍ठता और सर्जक कलाकार की अंतष्चेतना, दोनों का होना लगभग अनिवार्य है।

साहित्यिक पत्रकारिता के विविध रूप और भेद

साहित्यिक पत्रकारिता के इस स्वरूप-विस्लेशण और चरित्र-निरुपण के बाद, उसके उन प्रमुख भेदों पर भी विचार करना प्रासंगिक होगा जिनके आधार पर हम उसकी विभिन्न शाखाओं अथवा अलग- अलग क्षेत्रों के आधार पर उसका विभाजन इस प्रकार किया जा सकता है —-

1) प्रस्तुतिकरण के आधार पर ;(2) अवधिपरक विभाजन ; (3) विधापरक विभाजन ; (4) भाषिक आधार पर ; (5) प्रकाशकीय आधार पर ; तथा (6) विचारधारापरक विभाजन

1)प्रस्तुतिकरण के आधार पर विभाजन

यह सुज्ञात है कि आज समूची पत्रकारिता का विभाजन प्रस्तुति के आधार पर, दो अलग- अलग सर्वथा स्वतंत्र क्षेत्रों में हो चुका है: (क) प्रिंट मीडिया ; और (ख) इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। इसी तरह, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी, इसी आधार पर तीन भिन्न क्षेत्रों में सक्रिय है: (क) रेडियो (ख) टेलीविज़न और वेब-मीडिया (न्यू-मीडिया)। समग्र जनसंचार और पत्रकारिता का ही एक अभिन्न अंग होने के कारण साहित्यिक पत्रकारिता का भी प्रस्तुतिकरण के आधार पर इन स्वतंत्र क्षेत्रों में विभाजन किया जा सकता है। इन क्षेत्रों में प्रस्तुत की जाने वाली श्रव्य ( ऑडियो) और दृश्‍य-श्रव्य (ऑडियो- विज़ुअल) साहित्यिक सामग्री साहित्यिक पत्रकारिता है।

इनके अंतर्गत विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। पहले यह सामग्री पत्र-पत्रिकाओं में छपती थी ; अब रचना पाठ और पुस्तक समीक्षा से लेकर साहित्यिक सभा-सम्मेलनों की रपटें, साहित्यकारों के बीच वाद-विवाद या संवाद और बहस या विमर्ष तहा प्रतिष्ठित बड़े लेखकों से साक्षात्कार, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर कार्यक्रम आदि रेडियो, टेलीविज़न और इंटरनेट पर प्रसारित होते हैं। यू-ट्यूब आदि पर स्थायी रूप से भी उपलब्ध रहते हैं।

2) अवधिपरक विभाजन:

इसी तरह साहित्यिक पत्रकारिता का अवधिपरक विभाजन भी किया जा सकता है। दैनिक और साप्ताहिक समाचारपत्रों के विपरीत साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रायः मासिक, द्विमासिक, त्रैमासिक और कभी छमाही या सालाना संकलनों के रूप में ही होती हैं। साप्ताहिक ”मतवाला”- जैसे कुछ अपवाद भी होते हैं, जैसे कि पहले दैनिक ”जनयुग” और अब ”जनसत्ता” के साप्ताहिक साहित्यिक परिशिष्‍टों के रूप में दैनिक अखबारों में भी हमें अपवाद-स्वरूप गंभीर साहित्यिक पत्रकारिता के दर्शन होते हैं। अवधि के आधार पर साहित्यिक पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रकारिता का विभाजन मुख्यतः तीन तरह से किया जा सकता है: मासिक, द्विमासिक और त्रैमासिक।

लेकिन यह विभाजन केवल नियमित रूप से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं पर ही लागू हो सकता है। लघु-पत्रिका आंदोलन के दौरान जो हज़ारों नहीं भी , तो सैंकड़ों साहित्यिक पत्रिकाएँ निकलीं, वे प्रायः ”अनियतकालीन” ही निकलीं स जो निश्चित अवधि वाली नहीं थीं, वे भी आगे चलकर अनियतकालीन बन गईं और अंततः बंद भी हो गईं स जो निश्चित अवधि में अब भी नियमित रूप से निकल रही हैं, उनमें मासिक ”हंस” (हाल ही में मृत्यु से पूर्व तक सं0 राजेन्द्र यादव) तथा ”पखी” (सं0 प्रेम भारद्वाज) तथा द्विमासिक ”पुस्तकवार्ता” (सं0 भारत भारद्वाज) और त्रैमासिक ” आलोचना”(प्र0सं0 नामवर सिंह)–जैसी प्रतिनिधि पत्रिकाओं का उल्लेख किया जा सकता है। उसी तरह अनियतकालीन पत्रिकाओं के प्रतिनिधित्व में ”पहल” (सं0 ज्ञानरंजन) और ”दस्तावेज़” (सं0 विस्वनाथ प्रसाद तिवारी) का ज़िक्र अकिया जा सकता है। इनमें से ”पहल” का हाल ही में 98 वाँ अंक आया है और ”दस्तावेज़” का 145 वाँ।

3) विधापरक विभाजन:

विापरक विभाजन के अंतर्गत साहित्यिक का विभाजन मुख्यतः चार तरह से किया जा सकता है: (अ) कहानी पत्रिका, (ब) कविता संबंधी पत्रिका, (स) आलोचना और पुस्तक समीक्षा संबंधी पत्रिका तथा (द) सर्वविशय- संग्रह परक पत्रिका। आजकल साहितय की सभी विधाओं को कम या ज़्यादा स्थान देने वाली पत्रिकाएँ ही अधिक हैं। फिर भी, किसी एक मुख्य विधा को प्रमुखता देने के साथ थोड़ी बहुत अन्य सामग्री या कसी दूसरी विधा की चंद रचनाओं को भी शामिल करने वाली साहित्यिक पत्रिकाएँ भी खासी बड़ी संख्या में हैं। लेकिन पुस्तक समीक्षाएँ तो प्रायः प्रत्येक पत्रिका का अनिवार्य अंग हैं।

किसी एक ही विधा दृढ़ता से केंद्रित पत्रिकाएँ अपवादस्वरूप ही कही जा सकती हैं ; जेसे कि पुस्तक समीक्षाओं की पत्रिकाएँ, ”समीक्षा” (सं0 गोपाल राय) और ”पुस्तकवार्ता” तथा कहानी की पत्रिकाएँ ”कहनी” और ”नई कहानियाँ”। कमलेश्‍वर के संपादन में निकलने वाली ”सारिका” भी कहानी-केंद्रित पत्रिका ही थी, जो बंद हो चुकी है। इसी तरह कविता-केंद्रित पत्रिका ”कविता” (सं0 जुगमिंदर तायल और भगीरथ), नेमिचंद्र जैन की ”नटरंग” नाटक” केंद्रीय पत्रिका में थी। आलोचना” है तो मुख्यतः समालोचनाओं और पुस्तक समीक्षाओं की पत्रिका, लेकिन उसमें प्रायः साहित्य, संस्कृति और राजनीति से संबंधित देशी-विदेशी विद्वानों के लेख ( अनुवाद भी) तथा कभी-कभार कोई साक्षात्कार या चंद मौलिक अथवा अनूदित कविताएँ भी स्थान पा जाती हैं।

4) भाषिक आधार पर विभाजन:

कुछ साहित्यिक पत्रिकाएँ हिन्दी के साथ हिन्दी के साथ ही उसकी जनपदीय बोलियों, यथा बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, अवधी, बघेली, भोजपुरी, मैथिली, ब्रज, नेमाड़ी, पहाड़ी, हरियाणवी, मारवाड़ी और राजस्थानी आदि की रचनाएँ भी छपती हैं। कुछ पत्रिकाएँ इन जनपदीय उपभाषाओं-बोलियों में निकलती हैं, जिन्हें हम विशाल हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता की व्यापक परिधि में गिन सकते हैं। कुछ पत्रिकाएँ हिन्दी के साथ ही उर्दू और अंग्रेज़ी के भी हिस्सों के साथ द्विभाषी निकलती हैं। पहली मिसाल ”शेष” (सं0 और दूसरी महात्मा गाँधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय की पत्रिका ”हिन्दी: ”भ्प्छक्प्” (सं0 ममता कालिया) कही जा सकती हैं।

5) प्रकाशकीय आधार पर विभाजन:

प्रकाशकीय आधार पर भी साहित्यिक पत्रिकाओं का विभाजन इस तरह किया जा सकता है:

अ) दृढ़्तापूर्वक पूर्णतः साहित्य को समर्पित पत्रिकाएँ, जो मुख्यतः प्रायः ”लघु पत्रिकाओं” की श्रेणी में

आती हैं और इन पर विस्तार से चर्चा की भी जा चुकी है।

ब) प्रकाशकों, विश्‍वविद्यालयों, साहित्यिक संस्थाओं या ऐसे ही प्रतिष्‍ठानों से निकलने वाली साहित्यिक

पत्रिकाएँ। मिसाल के लिए ”आलोचना” (राजकमल प्रकाशन), ”पुस्तक वार्ता” और ”बहुवचन” (म0गाँ0

अं0 वि0वि0वर्धा), ”माध्यम” (हिन्दी साहित्य सम्मेलन) तथा ”नटरंग (नटरंग मटरंग प्रतिश्ठान)- जैसी

पत्रिकाएँ,।

स) उद्योग के स्तर पर व्यावसायिक इज़ारेदार घरानों की मिल्कियत ( ओनरशिप) में निकलने वाली

पत्रिकाएँ, मिसाल सपम ”ज्ञानोदय” ( अब ”नया ज्ञानोदय” नाम से सारिका और ”धर्मयुग” (साहू

जैन का ”टाइम्स गु्रप”), ”साप्ताहिक हिन्दुस्तान” (बिड़ला गु्रप) तथा

द) सरकारी पत्रिकाएँ, लेकिन इस श्रेणी में प्रायः निकृष्‍ट किस्म की पत्रिकाएँ होती है। फिर भी जब कोई अच्छा साहित्यकार उनका संपादक बन जाता है तो कुछ अंक अच्छे निकल जाते हैं। मिसाल के लिए ”पूर्वग्रह” (सं0 अषोक वाजपेयी), ”साक्षात्कार” (सं0 सोमदत्त) और ”आजकल” (सं0 पंकज बिष्‍ट) का नाम उल्लेख किया जा सकता है। साहित्य अकादमी की ”समकालीन भारतीय साहित्य” भी

6) विचारधारापरक विभाजन:

विचारधारा के आधार पर भी साहित्यिक पत्रिकाओं का विभाजन दो तरह का विभाजन है —-

1) राजनीतिक तौर पर ; जैसे कि भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़े लेखकों की ”पहल”, ”वसुधा”, ”क्यों”, ” ओर”, आदि पत्रिकाएँ माकपा से जुड़ी ”उत्तरार्ध”, ”कलम” और ”नया पथ” बहुत पहले भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (अविभाजित) ने हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में ”नया साहित्य”, ”नया अदब” और ”इंडियन लिटरेचर” नाम से अत्यंत श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रकाशित की थीं। लेकिन ये सभी अल्पायु ही साबित हुईं।

दूसरी तरफ, (ख) साहित्यिक आंदोलनों के आधार पर भी विभाजन किया जा सकता है। जैसे कि प्रगतिवादियों का ”हंस” ( अमृत राय), ”विप्लव” (यशपाल), ”वसुधा” (हरिशंकर परसाई) और समालोचक (रामविलास शर्मा)–जैसी साहित्यिक पत्रिकाएँ तो थीं, तो प्रगति-विरोधिायों की ”प्रतीक” (अज्ञेय्), ”निकश” (धर्मवीर भारती) और अन्य परिमलीय, ”नयी कविता” (जगदीश गुप्त एवं अन्य परिमलीय गुट) आजकल विचारधारात्मक आधार पर साहित्यिक पत्रिकाओं का विभाजन पाश्‍चात्‍य अस्तित्ववादी, विखंडनवादी, रूपवादी–जैसी तमाम विचारधाराओं और आंदोलनों से प्रभावित और उनकी प्रचारक पत्रिकाओं तथा प्रगतिशील वामपंथी और भूमंडलीकरण की विरोधी तथा प्रतिबद्ध और प्रतिरोध की संघर्षधर्मी साहित्यिक पत्रिकाओं के बीच किया जा सकता है।

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हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (5)

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता की शुरुआत, जैसा कि पहले भी उल्लेख किया जा चुका है, भारतेन्दु हरिश्‍चंद्र की पत्रिका ”कविवचनसुधा” के 15 अगस्त, 1861 ई0 से, बनारस से प्रकाशन के साथ होती है। भारतेन्दु न केवल आरंभकर्ता थे, बल्कि उन्होंने अपनी नेतृत्वकारी प्रतिभा से साहित्य और पत्रकारिता के बिखरे हुए सारे सूत्रों को समेट कर एक नए युग का सूत्रपात किया। भारतेन्दु की साहित्यिक पत्रकारिता से ही हिन्दी साहित्य की नई-से-नई गद्य-विधाओं की शुरुआत हुई। ”भारतेन्दु-समग्र” के संपादक हेमंत शर्मा ने यह ठीक लिखा है कि, “आज की पत्रकारिता का ऐसा कोई रूप नहीं जिसका बीज भारतेन्दु में न हो’’। उन्होंने साहित्य को देशहित से जोड़कर, अपनी पत्रकारिता के माध्यम से, भाषा-शैली और लोकप्रियता के ऊँचे तथा कलात्मक मानदंड स्थापित किए।

साहित्यिक पत्रकारिता के हमारे अब तक के विवेचन से, सबसे महत्वपूर्ण बात यह उभरकर सामने आती है कि वह प्राचीनकाल के यूनानियों की उस दोधारी कटार की तरह पैदा हुई थी जिसे ग्रीक भाषा में ”स्तिलुस” (STILUS) कहा जाता था। यह लिखने और घोंपने, दोनों कामों में प्रयुक्त होती थी। हमारे 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी चेतना के साथ विकसित इस साहित्यिक पत्रकारिता की एक धार यदि देश को गुलाम बनाने वाले ब्रिटिश साम्राज्यवाद की ओर तनी थी, तो दूसरी धार उनके पिट्ठुओं, देषी रजवाड़ों, ज़मींदारों, महाजनों और धर्म के ठेकेदार पाखंडियों, रूढ़ियों तथा सामाजिक कुरीतियों की ओर तनी थी। हमारे अब तक के वर्णन, विश्‍लेषण और विवेचना से साहित्यिक पत्रकारिता का स्वरूप, उसके क्षेत्र और वर्गीकरण के साथ ही, उसके इतिहास की भी एक हल्की सी रूपरेखा उभरती हुई दृष्टिगोचर हुई होगी। वस्तुतः हमारे इस प्रबंध के प्रस्तुत पाँचवें और अंतिम खंड की विषय-वस्तु भी यही है।

साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास

साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास हमरे साहित्य के इतिहास का अभि का अभिन्न अंग है ; और साहित्य का इतिहास हमारे समग्र साँस्कृतिक और सामाजिक इतिहास का अंग है। इनमें उठने वाली परिवर्तनों की लहरें एक-दूसरे से प्रभावित होती हैं और परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। लेकिन साहित्य के इतिहास की कुछ धीमी गति की तुलना में साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास की गति कुछ तीव्रतर होती है। इसीतरह सा से उस पर तामान्य पत्रकारिता के इतिहास का एक हिस्सा होने की वजह से उस पर तात्कालिकता और एक हद तक समसामयिक दवाबों का भी तुलनात्मक रूप से अधिक असर दिखता है, फिर भी अपने खास चरित्र के कारण साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास, उसके काल-विभाजन, भाषा-शैलीगत विविध परिवर्तनों और प्रवृत्तियों के टकराव या सामंजस्य आदि का अपना वैशिष्‍टय तो होता ही है, मोटे तौर पर हम हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास को मुख्यतः दो बड़े कालखंडों में विभाजित कर सकते हैं: (क) आज़ादी से पहले की साहित्यिक पत्रकारिता ; और (ख) आज़ादी के बाद की साहित्यिक पत्रकारिता, भारत्येन्दु युग से आरंभ करते हुए, हम भारतेन्दु-युग से पहले के कालखंड को इस इतिहास की पृश्ठभूमि भी मान सकते हैं अर्थात ”उदंतमार्त्तांड” के प्रकाशन (30 मई, 1826) से लेकर ”कविवचनसुधा” के प्रकाशन (15 अगस्त, 1867) तक ”भारतेन्दु-पूर्व युग या हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास की ”पृष्‍ठभूमि” से आगे के दोनों प्रमुख युगों के भीतर भी हम इस प्रकार कालविभाजन कर सकते हैं —-

क) स्वतंत्रता पूर्व की साहित्यिक पत्रकारिता (1867-1947 ई0)

1) भारतेन्दु-बालमुकुन्द गुप्त युग ; (1867-1902)

2) द्विवेदी-प्रेमचंद युद ; (1900-1935)

3) प्रगतिवादी युग ; तथा (1936-1950-53)

ख) स्वातंत्र्योत्तर साहित्यिक पत्रकारिता (1947 से लेकर आज तक)

1) प्रगति-प्रयोग का द्वंद्व तथा प्रगति-विरोधी विचारधराओं का दौर (1947-1964)

2) लघु पत्रिका आंदोलन का दौर ; (1964- 1974)

3) आपात्काल और उसके बाद का दोर ; तथा (1975-1995)

4) भूमंडलीकरण और उसके प्रतिरोध अन औरका समकालीन दौर (1995 …….)

कालविभाजन का वैज्ञानिक आधार

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के संदर्भ में छिट-पुट काम तो हुए हैं, लेकिन उसके समग्र विवेचन, वैज्ञानिक काल विभाजन और प्रामाणिक दस्तावेज़ीकरण के आधार पर कोई बड़ा काम अभी तक नहीं हुआ है। कहना न होगा कि इस लिहाज़ से हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता का अभी तक कोई इतिहास है ही नहीं ! लेकिन ”इतिहास” न होने पर भी साहित्यिक पत्रकारिता तो रही है और अब भी अस्तित्व में है ; सक्रिय है, गतिशील है। दरअसल, इसे वस्तुनिष्‍ठ ढंग से और प्रामाणिक तथ्यों एवं कालविभाजन की वैज्ञानिक पद्धति से कालक्रमानुसार (क्रॉनोलौजिकली) लिपि-बद्ध करने की ज़रुरत है। मौजूदा पतनशील दौर में तो और भी ज़रूरत है ; ताकि इस ”इतिहास” की क्रांतिधर्मी चेतना से प्रेरणा लेकर एक नए वनजागरण की मशाल जलाई जा सके।

इतिहास में हम एक नए युग की समाप्ति और नए युग के आरंभ की कोई तिथि निर्धारित करते हैं तो उसका अर्थ यह नहीं कि ठीक उसी दिन से युग बदल गया और तदनुरूप उसकी प्रवृत्तियाँ भी एक से दूसरे युग के दरम्यान एक संक्रमणकाल (ट्राँज़ीशनल पीरियड) होता है ; और कभी-कभी तो यह दौर खासा लंबा खिंच जाता है। दूसरे, एक युग के दौरान ही आगे आने वाले युग की कतिपय प्रवृत्तियाँ, कुछ लक्षण उभरने लगते हैं। इसी तरह युग परिवर्तन हो जाने पर भी पिछले युग या युगों की कुछ-न-कुछ प्रवृत्तियाँ जारी रहती हैं ; धीरे-धीरे तिरोहित होती हैं फिर भी, हम किसी ऐतिहासिक घटना, किसी खास आंदोलन, साहित्यिक पत्रिका या युगांतरकारी व्यक्ति-विशेष और उनकी किन्हीं निश्चित तिथियों को आधार बनाकर कालविभाजन करते हैं ; यथा, स्वाधीनता-पूर्व और स्वातंत्र्योत्तर से इसी तरह ”कविवचनसुधा” की प्रकाशन-तिथि या ”सरस्वती” का वह अंक जिससे पं0 महावीर प्रसाद द्विवेदी ने संपादन संभाला अथवा आपात्काल और उसमें सेंसरशिप लागू होने का वर्श या देश में तथाकथित ”नयी आर्थिक नीति” लागू होने से बदली हुई परिस्थितियाँ आदि से इन सबका आधार सामाजिक- आर्थिक परिवर्तन और उनसे प्रभावित राजनीतिक, साँस्क्रतिक और साहित्यिक परिवर्तन आदि होते हैं।

अब हम ”हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास” की अत्यंत संक्षिप्त रूपरेखा, उपर्युक्त सात शीर्षकों के अंतर्गत प्रस्तुत करते हुए, युगानुरूप प्रवृत्तियों, आंदोलनों, प्रतिनिधि पत्रिकाओं और इन परिवर्तनों के प्रेरक या वाहक युगांतरकारी व्यक्तियों की भूमिका रेखांकित करने का प्रयास करेंगे। स्मरणीय है कि कोई भी ”इतिहास” पत्र-पत्रिकाओं और व्यक्तियों की नामावली की लंबी-चौड़ी ”सूचि” नहीं होती, ऐसा होने पर वह ”इतिहास” नहीं, रेलवे टाइमटेबल या टेलीफोन डायरेक्टरी बन कर रह जाएगा।

1) भारतेन्दु-बालमुकुन्द गुप्त युग (1867-1902)

”कविवचनसुधा” से हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का सूत्रपात करते हुए, भारतेन्दु ने 15 अक्टूबर, 1873 से पाक्षिक ”हरिश्‍चंद्र मैगज़ीन” का प्रकाशन शुरु किया। ”सुधा” 15 अगस्त, 1867 में मासिक निकली थी। प्रकाशन के दूसरे वर्ष से वह पाक्षिक, फिर 5 सितंबर, 1873 से साप्ताहिक रूप में निकलने लगी थी। ”मैगज़ीन” भी पाक्षिक थी तथा 8 अंकों के बाद जनवरी, 1874 से उसका नाम ”हरिश्‍चंद्र चंद्रिका” हो गया। भारतेन्दु ने स्त्रियों के लिए भी एक पत्रिका ”बाला-बोधिनी” निकाली थी। डॉ0 रामविलास शर्मा ने ”सुधा” को ”एक युग का सजीव इतिहास” और “भारतेन्दु युग का दर्पण” निरूपित करते हुए लिखा है कि वह सच्चे अर्थों में “जनता के हितों के लिए लड़ने वाले निर्मम सैनिक की तरह थी। कहने की आवश्‍यकता नहीं कि ”सुधा” के बाद यही काम ”मैगज़ीन” और ”चन्द्रिका” ने किया। हिन्दी साहित्य की सभी गद्य-विधाएँ इसी युग में प्रस्फुटित हुईं।

डॉ0 शर्मा ने लिखा है कि भारतेन्दु की पत्रिकाओं का “मूल स्वर देशोन्नति और अंग्रज़ी शासन की नुक्ताचीनी का था और उन्होंने “विभिन्न साँस्कृतिक विषयों को एक ही जगह समेटकर पत्रिका की ऐसी पद्धति चलाई जिसका अनुसरण आगे चलकर हिन्दी की अधिकांश पत्रिकाएँ करती रहीं। भारतेन्दु की पत्रिकाओं के अलावा ”आनंदकादंबिनी” (प्रेमघन), ”भारतेन्दु” (राधाचरण गोस्वामी), ”ब्राह्मण” (प्रतापनारायण मिश्र), ”हिंदी प्रदीप” (बालकृष्‍ण भट्ट), ”सारसुधानिधि” (दुर्गाप्रसाद मिश्र और सदानंद मिश्र) तथा ”भारतमित्र” (बालमुकुन्द गुप्त) इस युग के प्रतिनिधि पत्र-पत्रिकाएँ और उनके यशस्वी संचालक और संपादक हैं, जो भारतेन्दु की इस राह पर दृढ़तापूर्वक जीवनपर्यन्त चले परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का भरोसा मत रखो। अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो।

बाबू बालमुकुंद गुप्त, पं0 महावीर प्रसाद द्विवेदी के समकालीन थे। डॉ0 शर्मा के अनुसार वे भारतेन्दु युग के ऐसे सिपाही थे जिन्होंने हरिश्‍चंद्र की मृत्यु के बाद सेनापति की कमान संभाली। वे बताते हैं कि ”भारतमित्र” के साथ गुप्त जी का नाम वैसे ही जुड़ा है जेसे ”सरस्वती” के साथ द्विवेदी जी का। डॉ0 शर्मा लिखते हैं कि गुप्तजी “हिन्दी-उर्दू की बुनियादी एकता के प्रबल समर्थक थे। अपनी उग्र राजनीतिक चेतना के कारण वे भारतेन्दु से अधिक बालकृष्‍ण भट्ट के निकट हैं। उनका गद्य ललित और सरस है, इस दृष्टि से वे भारतेन्दु हरिश्‍चंद्र और प्रतापनारायण मिश्र की शैली के अनुवर्ती हैं। किन्तु उनका-सा व्यंग्य उस युग के किसी अन्य लेखक में नहीं है। वाद-विवाद को कलात्मक बना देने में वे अनुपम थे। गुप्त जी इस क्षेत्र में आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में हास्य-व्यंग्य के सिरमौर हरिशंकर परसाई के पूर्वज कहे जा सकते हैं।

2) द्विवेदी-प्रेमचंद युग (1900-1935)

द्विवेदी जी के संपादन काल की ”सरस्वती” को “आधुनिक हिन्दी साहित्य का ज्ञान-कांड“ बताते हुए डॉ0 शर्मा ने इस युग की साहित्यिक पत्रकारिता का उच्च मूल्यांकन किया है। वे लिखते हैं कि ”सरस्वती मर्यादा तथा हिन्दी की अन्य पत्र-पत्रिकाओं में इस समय जो सामग्री निकली, उससे यदि सुधा और हंस में निराला और प्रेमचंद के लेखों की तुलना करें तो यह तथ्य स्पष्‍ट हो जाएगा कि प्रेमचंद की यथार्थवादी धारा और निराला की छायावादी धारा, दोनों द्विवेदी युग से जुड़ी हुई हैं। इसी तरह भाई के भारतेन्दुकालीन लेखकों के भावबोध से द्विवेदी जी के भाव-बोध का अंतर दिखाई देता है। अंतर विचारधारा में नहीं है, अंतर है भाषा और साहित्य की परख में महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनकी ”सरस्वती” का मह्त्व यह है कि उन्होंने हिन्दी नवजागरण की बिखरी हुई असंगठित शक्ति को एक जगह एकताबद्ध और संगठित किया।

स्मरणीय है कि ”सरस्वती” द्वारा द्वेवेदी जी के संपादन में 1903 ई0 से यह ऐतिहासिक युगांतर शुरु करने से पहले यह भूमिका माधवराव सप्रे के संपादन में ”छत्तीसगढ़ मित्र” (सन 1900से) आरंभ कर चुका था। डॉ0 नारद के शब्दों में, “माधवदास सप्रे का कृतित्व हिन्दी लेखकों की एक पूरी पीढ़ी तैयार कर देने के लिए भी दृष्‍टव्‍य रहेगा। पं0 महावीर प्रसाद द्विवेदी, पं0 श्रीधर पाठक, पं0 कामताप्रसाद गुरु, पं0 गंगाप्रसाद अग्निहोत्री, पं0 जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल, पं0 रामदास गौड़ तथा पं0 नागीश्‍वर मिश्र प्रभुति अन्य अनेक लेखक ऐसे थे जिनकी प्रारंभिक रचनाओं को ”छत्तीसगढ़ मित्र” ने बड़े ही उत्साह से प्रकाशित किया। कहना न होगा कि सप्रे जी बाद में भी ”सरस्वती” में द्विवेदी जी के एक नियमित सहयोगी लेखक के रूप में हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता और हिन्दी नवजागरण में अपना बहुमूल्य योगदान देते रहे। आलोचक रामचन्द्र शुक्ल का ”इतिहास” और उपन्यासकार और पत्रकार प्रेमचंद तथा हिन्दी कविता में छायावाद, नए यथार्थवाद और छन्द-मुक्त प्रगतिवादी नयी कविता का सूत्रपात करने वाले, साथ ही एक प्रखर पत्रकार सूर्यकान्त त्रिपाठी ”निराला” इसी युग की देन हैं। प्रेमचंद के संपादन काल की ”माधुरी” भी (जिसके संपादक मंडल में प्रेमचंद थे) इस हिन्दी नवजागरण के ”ज्ञान कांड” में ”सरस्वती” और ”छत्तीसगढ़ मित्र” की सहोदर पत्र-पत्रिकाएँ थीं।

इनके अलावा, इस युग की अन्य महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में पं0 चंद्रधर शर्मा गुलेरी का अल्पायु ”समालोचक” (1901-02) जयशंकर प्रसाद की ”इंदु” पहले माखनलाल चतुर्वेदी, फिर गणेश शंकर विद्यार्थी, बालकृष्‍ण शर्मा ”नवीन” के संपादन में ”प्रभा”, ”रामरख सहगल की क्रांतिकारी पत्रिका ”चाँद ” (जिसमें छ: नामों, यथा बलवंत सिंह, से भगतसिंह लिखते थे और जिसके जब्तषुदा ”फाँसी” अंक को उन्होंने ही तैयार किया था), अल्पायु ”साहित्य”, ”साहित्य समालोचक”, ”श्री शारदा” और वीणा के नाम उल्लेखनीय हैं। इन साहित्यिक पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रकारों-लेखकों के अलावा दैनिक ”वर्तमान” के संपादक रमाशंकर अवस्थी, शिवपूजन सहाय, राधामोहनद गोकुल जी, सत्यभक्त, इतिहासज्ञ काशीप्रसाद जायसवाल, श्‍यामाचरण राय, जनार्दन भट्ट, डॉ0 बेनीप्रसाद, बैरिस्टर मन्निलाल, रामनारायण शर्मा, नाथूराम प्रेमी, कृष्‍णानंद जोशी, गंगाधर पंत, ईश्‍वरदास मारवाड़ी, नवजादिकलाल श्रीवास्तव, शिवप्रसाद गुप्त, त्रिमूर्ति शर्मा, गिरिजा प्रसाद द्विवेदी, देवीप्रसाद गुप्त, सुंदरराज, सत्यदेव, जगन्नाथ खन्ना, गिरीन्द्रमोहन मिश्र, मधुसूदन शर्मा, वीरसेन सिंह, बदरीदत्त पांडे, संतराम, सीताराम सिंह, शिवप्रसाद शर्मा, धनीराम बख्‍शी, द्वारिकानाथ मैत्र, सिद्धेश्‍वर शर्मा, पृथ्वीपाल सिंह, गुलजारीलाल चतुर्वेदी, श्‍यामसुंदर वर्मा, प्रेम वल्लभ जोशी, रामनारायण मिश्र, कामताप्रसाद गुरु और मिश्र बंधु के नाम उल्लेखनीय हैं। डॉ0 बेनीप्रसाद और राधामोहन गोकुल जी अपने नामों के अलावा ”सत्यशोधक” और ”प्रत्यक्षदर्शी” के नामों से भी लिखते थे।

अंत में, जैसे हम भारतेन्दु-युग के बारे में डॉ0 रामविलास शर्मा की पुस्तकों ”भारतेन्दु हरिश्‍चंद्र और हिन्दी नवजागरण” तथा ”भारतेन्दु-युग और हिन्दी भाषा की विकास परंपरा” से जान सकते हैं, ठीक उसी प्रकार, द्विवेदी-प्रेमचंद युग का भरा-पूरा जीवंत चित्र हमें डॉ0 शर्मा की ”महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण” तथा ”प्रेमचंद और उनका युग” पुस्तकों में मिलेगा। ये चारों कालजयी कृतियाँ हिन्दी साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास की अमूल्य धरोहर तथा अनिवार्यतः पठनीय हैं।

3) प्रगतिवादी युग (1936-1950-53)

साहित्य के इतिहासकार प्रगतिवादी के युग को अप्रैल, 1936 से 1953 तक मानते हैं। इसका आधार प्रेमचंद की अध्यक्षता में 9-10 अप्रैल, 1936 को लखनऊ में सम्पन्न प्रगतिशील लेखक संघ (PWA) का स्थापना सम्मेलन है। कुछ लोग 1949-50 तक तो कुछ 1953 तक इसकी कालावधि मानने के पीछे यह तर्क देते हैं कि आज़ादी के बाद कम्युनिस्टों और प्रगतिशील लेखकों के सरकारी दमन और पार्टी की रणदिवे लाइन के संकीर्णवादी दौर में आंतरिक कलह तथा गुटबाजी की वजह से प्रलेसं0 का निष्क्रिय हो जाना स दूसरे लोग, इसके विपरीत मार्च,1953 में दिल्ली सम्मेलन में रामविलास शमजार्ने के नेतृत्व और महासचिव पद से हट जाने के बाद संगठन वास्तव में समाप्त हो गया था और सभी प्रगतिशील पत्र-पत्रिकाएँ भी एक-एक करके बंद हो गईं थीं। अपवाद स्वरूप, सिर्फ हरिशंकर परसाई की ”वसुधा” अवश्‍य 1958 तक निकलती रही।

इसमें कोई संदेह नहीं कि साहित्यिक पत्रकारिता का सबसे क्रांतिकारी, तेजस्वी और साथ ही कलत्मक रूप हमें प्रगतिशील दृष्टिकोण वाली पत्र-पत्रिकाओं और उनके लेखकों-संपादकों के कृतित्व में ही नज़र आता है। ऐसी पत्र-पत्रिकाएँ भारतेन्दु की पत्रिकाओं से लगातार प्रलेसं0 की स्थापना (1936) तक बराबर निकलती रही हैं। इनकी मुख्य विषयवस्तु ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की गुलामी से देश की आज़ादी और स्वतंत्र भारत को एक जनवादी, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी गणतंत्र बनाने के उद्देश्‍य से मज़दूरों, किसानों और तमाम मेहनतकशों से प्रतिबद्धता तथा उनकी समस्याओं को उठाना रही। शोषण-विहीन समाज के स्वप्न और हर तरह के शोषण और दमन का यथार्थ चित्रण करते हुए उसका प्रतिरोध तथा फासीवाद एवं युद्ध के विरोध में शांति और सोवियत संघ का समर्थन ”प्रगतिवादी” साहित्य तथा पत्रकारिता का उद्देश्‍य रहा है। इस दृष्टि से जिन महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं का नामोल्लेख किया जा सकता है, उनमें ”हंस” (प्रेमचंद, उनकी मृत्यु के बाद अमृतराय), ”विप्लव” (यशपाल), ”रूपाम” (पंत), ”नया साहित्य” ,”लोकयुद्ध”, ”जनयुग”, (तीनों कम्युनिस्ट पार्टी), ”चकल्लस”, ”उच्छृंखल” (दोनों अमृतलाल नागर), ”जनता”, ”संघर्ष”, ”नया सवेरा” ,”उदयन” ”वसुधा” (परसाई), ”समालोचक” (राम विलास शर्मा), ”नया पथ” (यशपाल एवं अन्य) और मुक्तिबोध के संपादन में सोख्ताजी का साप्ताहिक ”नया खून” आदि प्रमुख हैं। सभी पत्र-पत्रिकाएँ ठेठ प्रगतिवादी थीं।

4) प्रगति का द्वंद्व तथा प्रगति-विरोधी विचारधाराओं का दौर (1947-1964)

दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद यूरोप और अमेरिका में अंध-कम्युनिस्ट विरोध के साथ ही अस्तित्ववाद, रूपवाद, नयी समीक्षा, संरचनावाद और ऐसी ही तरह-तरह की दार्शनिक, साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में भी आज़ादी के बाद इन आंदोलनों और विचारधाराओं का खासा असर दिखाई देने लगा था। साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में ”प्रगति” और ”प्रयोग” का द्वंद्व तो 1943 में अज्ञेय के संपादन में ”तारसप्तक” के प्रकाशन से ही परिलक्षित होने लगा था ; लेकिन 1947 से अज्ञेय के ”प्रतीक” के प्रकाशन के साथ ही इस संघर्श का स्वरूप भी बदलने लगा था।

पहले जहाँ (”तारसप्तक” और कुछ बाद तक) एक ही प्रगतिवादी परिधि में दो विरोधी दृष्टिकोणों में टकराव था ; जिसे ”प्रगति” बनाम ”प्रयोग” के द्वंद्व का नाम दिया जाता है। इस टकराव का केंद्र आलोचना और कविता के क्षेत्र बने स बाद में नयी कहानी भी षामिल हो गई स एक ही प्रगतिशील धारा के अंतर्गत एक ओर जहाँ रामविलास शर्मा, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन आदि थे ; तो दूसरी ओर ”प्रगतिवाद” की रूढ़ समझ के विरोध में मुक्तिबोध, शमषेर बहादुर सिंह, हरिषंकर परसाई और नामवर सिंह थे, जो नए-नए प्रयोगों को ज़ोरदार वकालत करते थे ।

आज़ादी के बाद अज्ञेय ने ”दूसरा सप्तक” और ”तीसरा सप्तक” के माध्यम से नए ”प्रयोगों” की वकालत को खींचकर ”प्रयोगवाद” के सिद्धांतों और आंदोलन में बदल दिया। दुनिया भर में जिस शीत युद्ध की अंध-कम्युनिस्ट-विरोधी लहर का प्रभाव छाने लगा था, हिन्दी में भी कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम” के प्रवक्ता के तौर पर ”प्रतीक” और ” अज्ञेय” के नेतृत्व में इसकी गोलबंदी होने लगी। जल्दी ही ”नयी कविता” पत्रिका (सं0 जगदीश गुप्त) और ”परिमल” संस्था ( अज्ञेय, जगदीश गुप्त, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीकांत वर्मा, विजयदेव नारायण साही आदि) ने भी इस मोर्चे में शामिल होकर ज़ोरदार प्रगति-विरोधी अभियान छेड़ दिया।

प्रगतिशील लेखक संघ, उसकी विचारधारा से जुड़े मंचों, पत्र-पत्रिकाओं के अवसान के बाद इन प्रगति-विरोधियों को खुला मैदान मिल गया। राजनीतिक सत्ता और धनसत्ता के परोक्ष और प्रत्यक्ष समर्थन तथा तमाम प्रतिष्‍ठानी सेठाश्रयी पत्र-पत्रिकाओं के विशाल मंच उपलब्ध होने पर एकबारगी तो साहित्यिक पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्रों में इनकी ही सर्वत्र विजय-पताका लहराने लगी। लेकिन तब भी सतह के नीचे प्रगतिशील साहित्य की एक शक्तिशाली सृजनात्मक अंतर्धारा प्रवाहित रही जो समय पाकर कालांतर में एक बार फिर उभरी।

5) लघु-पत्रिका आंदोलन का दौर (1964-74)

भारत पर 1962 में चीन के हमले और 1964 में नेहरू जी कि मृत्यु के बाद एक ओर जहाँ हरेक क्षेत्र में स्वतंत्र्योत्तर व्यामोह से मोह-भंग हो रहा था, वहीं दूसरी ओर नेहरूवादी एकछत्र सत्ता के बुर्जुआ लोकतंत्र में अंतर्विरोध और दरारें पड़ने लगी थीं तथा समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की विरोधी तमाम तरह की दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी- अवसरवादी ताकतें, मुख्यतः साम्प्रदायिक और हिह्दुत्ववादी-पुराणपंथी शक्तियाँ गोलबंद होकर शक्तिशाली हो रही थीं। उन्हें अमरीका के नेतृत्व में पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों, उनकी बहुराष्‍ट्रीय पूंजी तथा देशी इज़ारेदार पूंजीपति घरानों और उनकी पत्र-पत्रिकाओं का भरपूर समर्थन था। इसका असर तमाम साँस्कृतिक क्षेत्रों और साहित्यिक पत्रकारिता पर भी प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था। सरकारी, अर्ध-सरकारी और प्रतिष्‍ठानी पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही ”धर्मयुग”, ”सारिका”, ”साप्ताहिक हिम्दुस्ताम”, ”ज्ञानोदय” जैसी सेठाश्रयी पत्रिकाओं ने प्रगतिशील सोच के लेखकों, विशेष रूप से नए लेखकों के लिए प्रकाशन के अपने सभी दरवाज़े बंद कर दिए। इसी के विरोध में हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं में 1964-65 से जबर्दस्त लघु-पत्रिका आंदोलन चला; जिसकी विस्तृत चर्चा पिछले पृष्‍ठों में की जा चुकी है।

इस दौर में विशेष बात यह हुई कि 1967 में नक्सलवादी आंदोलन के साँस्कृतिक क्षेत्रों खासकर साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में उसका ज़ोरदार असर देखा गया। लघु-पत्रिकाओं का खासा बड़ा हिस्सा तथा नौजवान लेखकों-संस्कृतिकर्मियों का बहुमत इस ओर आकर्शित होने लगा। उधर कम्युनिस्ट पार्टी में 1964 में विभाजन के बाद माकपा और भाकपा से जुड़े लेखकों-पत्रकारों की पत्र-पत्रिकाओं ने भी नए सिरे से अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाया। फलस्वरूप 1969-70 से लघु-पत्रिका आंदोलन के इस दूसरे दौर ने एक शक्तिशाली नामपंथी मोड़ ले लिया। इस दौर की परिणति मई,1975 में गया में ”राष्‍ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ” के नाम से देश की सभी भाषाओं के प्रगतिशील लेखकों के मंच का पुनर्गठन हुआ। इसके बाद तो प्रायः 1995 तक मुख्यतः और प्रायः 2000 तक प्रायः साहित्यिक पत्रकारिाता में मार्क्सावादी विचारधारा तथा व्यापकतथा प्रगतिशील और वामपंथी दृष्टिकोण से प्रतिबद्ध लेखकों, संपादकों तथा पत्र-पत्रिकाओं का ही वर्चस्व कायम रहा। इस दौर की साहित्यिक पत्रकारिता का विस्तृत उल्लेख भी हम पिछले पृष्‍ठों में कर चुके हैं।

6) आपात्काल और परवर्ती दौर (1975-95)

देश में जून, 1975 में आपातकाल और फलस्चरूप कठोर ”सेंसरशिप” लागू होने के बाद हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता ने एक बार फिर भारतेन्दु युगीन पत्रकारिता की कलात्मक संकेतधर्मिता, प्रतीकवाद और कूटनीति का सहारा लिया। इसमें भी मुख्यतः तीन धाराएँ दिखाइ देती हैं। एक तो उन दक्षिणपंथी-साम्प्रदायिक पक्ष के लेखकों-पत्रकारों की धारा, जो आपात्काल, सेंसरशिप औएा इंदिरा-विरोध के तेवरों के साथ मुख्यतः अंध-कम्युनिस्ट विरोध और सोवियत-विरोध की नीतियों की प्रचारक थी।

दूसरी धारा कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े लेखकों, पत्रकारों और संपादकों की थी, जो आपात्काल, सेंसरशिप और तत्कालीन सत्ता के विरोध के साथ ही दक्षिणपंथी, साम्प्रदायिक और सत्ता-लोलुप फासिस्ट शक्तियों को भी बेनकाब कर रही थी। लेकिन सबसे ज़्यादा तादाद उन अवसरवादी लेखकों-पत्रकारों और साहित्यिक पत्रिकाओं की थी जो सत्ता की चापलूसी और जी-हज़ूरी में झुक गईं थीं। तमाम प्रतिष्‍ठानी और सेठाश्रयी पत्र-पत्रिकाएँ इसी रीढ़-विहीन तीसरी धारा में थीं। उनके लेखकों में भी ऐसे ही अवसरवादी तत्वों का बहुमत था।

स्मरणीय है, कि हर तरफ से चौतरफा हमलों की शिकार भाकपा से जुड़ी पत्रिका ”पहल” ही हुई स उधर ”जनयुग” ने ”प्री-सेंसरशिप” को मानने से इनकार कर दिया तथा सेंसरशिप के विरोध में कोरे पृष्‍ठों और काली पट्टियों के साथ सारिका” छापने की वजह से भाकपा से जुड़े संपादक कमलेश्‍वर को टाइम्स ऑफ इंडिया ने बर्खास्त कर दिया। यही नहीं, इससे कुछ अर्सा पहले, प्रगतिशील लेखक संघ के राष्‍ट्रीय अध्यक्ष तथा भाकपा से जुड़े महान व्यंग्यलेखक और पत्रकार हरिशंकर परसाई पर राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( आर0एस0एस) के हुदुत्व सैनिकों ने उनके घर में घुसकर दिन-दहाड़े लाठियों से संघातक हमला किया था। इस प्रकार हम देखते हैं कि तमाम तरह के अवसरवादियों , पाखंडी कायरों और नकली शहादत का मुखौटा पहनने वाले नौटंकीबाज़ लेखक-पत्रकारों तथा साहित्यिक पत्रिकाओं के विपरीत, वामपंथी और प्रगतिशील क्षेत्रों की साहित्यिक पत्रकारिता ने ही, इस दौर में भी अपनी सच्ची संघर्शशील भूमिका निभाई !

7) भूमंडलीकरण और उसके प्रतिरोध का समकालीन दौर (1995 ……)

आज हमारा समाज भूमंडलीकरण के ऐसे दोर से गुज़र रहा है जहाँ, मनुष्‍य एक श्रोता या पाठक से बदलकर मात्र उपभोक्ता और साथ ही स्वयं उपभोग की ”वस्तु” में …. वह भी बाज़ार की एक ”पण्य-वस्तु” के रूप में बदल चुका है। इसके विस्तार में न जाते हुए, यहाँ हम यही कहना चाहेंगे कि अब संस्कृति की जगह पतित अप-संस्कृति ने ले ली है और ज्ञान की जगह ”सूचना” मात्र में से वह भी वही सूचना, जो दुनिया में ”सूचना-नियंत्रण” करने वाली बहुराष्‍ट्रीय सूचना-सत्ताएँ तय करती हैं। दूसरे, सूचना की जगह ”गलत सूचना” (डिस-इन्फोरमेशन) और दुश्‍प्रचार तथा प्रायोजित आम-राय और विश्‍व- अभिमत से इस तरह अब आपके मस्तिष्‍क को, आपके विचारों को भी नियंत्रित किया जा रहा है और फूहड़ मनोरंजन की आदत डाली ज रही है। इस तरह धीरे-धीरे हम एक अपढ़ समाज की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में साहित्यिक पत्रकारिता के आगे सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह लोगों में सांस्कृतिक विवेक, स्वतंत्र कला-चेतना और विचारोत्तेजक,किन्तु संवेदनात्मक साहित्य के प्रति रुचि पैदा करे। इसके लिए वह प्रिंट ही नहीं, बल्कि ”इलेक्ट्रॉनिक” विशेष रूप से ”न्यू मीडिया” के वैकल्पिक साधनों के प्रयोगात्मक अवसर तलाश करे। भूमंडलीकरण और बाज़ारवाद के इस दौर में साहित्यिक पत्रकारिता को भी संगठित और व्यापक वैकल्पिक शक्ति बनकर प्रतिरोधाओं का शस्त्र बनना होगा। एक नए नवजागरण का लोकप्रिय अग्रदूत !!

संदर्भ:–

1) ”पत्रकारिता और संपादन कला”, (सं0 रामप्रकाश), में नेमिशरण मित्तल का लेकह, पृ0 116

2) ”भारतेन्दु-समग्र”,(सं0 हेमन्त शर्मा), की भारतेन्दु को पढ़ने के बाद शीर्षक ”भूमिका”

3) उपर्युक्त

4) ”परंपरा का मूल्यांकन”, रामविलास शर्मा ; राजकमल प्रकाशन, पृ0110

5) ”महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण, रामविलास षर्मा ,राजकमल प्रकाशन, पृ0 381

6) उपर्युक्त, पृ0 72

7) उपर्युक्त, पृ0 281

8) उपर्युक्त, पृ0 366

9) म0 प्र0 में हिन्दी पत्रकारिता: एक शताब्दी, डॉ0 कैलाश नारद, पृ0 39

10) भूमंडलीकरण और बाज़ार के बारे में विस्तृत अध्ययन के लिए प्रो0 (डॉ0) कमल नयन काबरा तथा

प्रो0 (डॉ0) पुष्पेश पंत की पुस्तकें देखिए

[लेख साभार एवं स्रोत: न्यूज़ राईटर]

हिन्दी कहानी का सौन्दर्य : चिंतन और विश्लेषण डॉ. प्रवीण कुमार

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हिन्दी कहानी का सौन्दर्य : चिंतन और विश्लेषण

डॉ. प्रवीण कुमार
हिंदी विभाग,
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय,
अमरकंटक मध्यप्रदेश-484887
मो- 09424895615/9752916192
ई-मेलः pravinkmr05@gmail.com

सारांशः

प्रस्तुत शोधपत्र हिन्दी कहानी के बदलते सौन्दर्य को रेखांकित करता है। कहानी की संवेदना अपनी आरंभिक काल से जनचेतना को कैसे प्रभावित करती रही है और उसका विकास मौखिक से लिखित होने की प्रक्रिया में कैसे हुआ। इसकी रूपरेखा इस शोधपत्र में दिया गया है। प्रेमचंदपूर्व, प्रेमचंदयुगीन और प्रेमचंदोत्तर हिन्दी कहानी की न केवल संवेदना बदली है बल्कि उसका सौन्दर्यबोध भी बदलता गया है। प्रस्तुत शोधपत्र में इसकी खोज का एक प्रयास किया गया है।

की वर्डः सौन्दर्य, सौन्दर्यबोध, जीवनमूल्य, अनुभूति, संवेदना, प्रेम, आदर्शवाद, यथार्थवाद, मानवतावाद।   

विषय विस्‍तारः

रचना की प्रक्रिया और संवेदना सौन्दर्य की चेतना पैदा करती है। रचना की प्रकृति, संवेदना, स्वरूप और सौन्दर्य समय सापेक्ष समाज में होने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन और बौद्धिक प्रकृति पर निर्भर करता है। रचना में निजी अनुभव न केवल रचना की प्रामाणिकता को रेखांकित करता है बल्कि उसके सौन्दर्य को प्रौढ़ता प्रदान करता है वहीं संवेदना की निजता सहृयता की भावना पैदा करती है। समय सापेक्ष विकास क्रम में कहानी की संवेदना लगातार बदलती रही है। इसी ऐतिहासिक विकास यात्र में हिन्दी कहानी के सौन्दर्य का अध्ययन किया जा सकता है। कहानी की परंपरा मानव सभ्यता-संस्कृति में आदिकाल से ही है। प्रत्येक देश के साहित्य में यह परंपरा अक्षुण रूप से विद्यमान है। हिन्दी गद्य साहित्य के जन्म के साथ ही हिन्दी कहानी का उदय आधुनिक चेतना के साथ हुआ है। प्रारंभ में हिन्दी कहानी का सौन्दर्य व्यवस्थित नहीं रहा है। हिन्दी कहानी की प्रारंभिक अवस्था के सौन्दर्य को इस बात से भी समझा जा सकता है। जैसा कि गोपाल राय लिखते हैं कि ‘‘उन्नीसवीं सदी के अंत तक साहित्यिक विधा के रूप में कहानी की कोई पहचान नहीं बनी थी। उसके लिए काई निश्चित संज्ञा भी स्थिर नहीं हुई थी।’’1 अर्थात किसी भी विधा की अस्थिरता के कारण उसकी जो संवेदना और सौन्दर्य होता है वही स्थिति कहानी के प्रारंभिक अवस्था में देखी जा सकती है। तदंतर पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से 20वीं शताब्दी के प्रथम दशक में हिन्दी कहानी की लेखन परंपरा शुरू होती है। इसी क्रम में हिंदी कहानी के सौन्दर्य की खोज का एक प्रयास इस शोधपत्र में किया जा रहा है।  

प्रारंभिक हिन्दी कहानी का स्वरूप मनोरंजनात्मक था। इंशा अल्ला खां कृत ‘रानी केतकी की कहानी’, मुंशी नवल किशोर द्वारा सम्पादित ‘मनोहर कहानी’ (1880), और चण्डी प्रसाद सिंह कृत ‘हास्य रतन’ (1886), आदि कहानी संग्रह मनोरंजन प्रधान, स्वप्न कथाओं के रूप में पाठक के सम्मुख आते हैं। इस काल खण्ड (भारतेन्दु युग2) की कहानियों के माध्यम से नीतिप्रद शिक्षा, पाप-पुण्य, पुनःजन्म आदि की व्याख्या की जाती थी। कहानी की संवेदना के विकास और उसकी प्रवृत्तियां का युग सापेक्ष अध्ययन ही किया जा सकता है। ‘‘कथा आनादि काल से ही काल्पनिक और मौखिक होती थी। लिखित रूप प्राप्त करने के बाद उसका यह नाम बना, यद्यपि आख्यान उपाख्यान, चरित, वृतांत, पुराण आदि संज्ञाएं भी प्रयोग में आयीं। बाद में एक ऐसा कथा रूप भी सामने आया, जिसका आधार ख्यात अथवा ऐतिहासिक वृत्त होता था। ऐसे ही कथा रूप को आख्यायिका की संज्ञा दी गयी।’’3 सरस्वती में कथा विधा के लिए इसी ‘आख्यायिका’ शब्द का चयन किया गया था। आख्यायिका की संवेदना प्रेमचन्द के शब्दों में ‘‘प्राचीन आख्यायिका कुतूहल होती थी या अध्यात्म-विषयक।’’4 आख्यायिका की संवेदना संघर्ष का सौन्दर्य नहीं उत्पन्न करती है। ‘‘मौखिक रूप से चली आती कथा का कथ्य केवल केवल कौतूहलजन्य मनोरंजन, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से व्यंजित या कथित उपदेश और यत्किंचित भाव बोध होता था। अख्यायिका संज्ञा से अभिहित और प्रकाशित होने वाली रचनाओं में कौतूहलजन्य मनोरंजन गौण होन लगा और उपदेश के स्थान पर विचार, भावबोध और यथार्थ चित्रण को केन्द्रीयता प्राप्त होने लगी। यह प्रक्रिया एक दो दशक तक ही नहीं बहुत बाद तक चलती रही और आज भी चल रही है। भाव बोध को संवेदना का क्षण बनने में तो और भी देर हुई।’’5 इस प्रकार कहा जा सकता है कि कहानी भावबोध की संवेदना के क्षण की अभिव्यक्ति होती है। यह भावबोध ही वर्तमान कहानी को प्राचीन कहानी से अलग करती है। प्रेमचन्द के अनुसार ‘‘वर्तमान कहानी(आख्यायिका) मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और जीवन के यथार्थ और स्वाभाविक चित्रण का अपना ध्येय समझती है। उसमें कल्पना की मात्र कम और अनुभूतियों की मात्र अधिक होती है। इतना ही नहीं बल्कि अनुभूतियां ही रचनाशील भावना से अनुरंजित होकर कहानी बन जाती है।’’6 इसी से कहानी की संवेदना और सौन्दर्य की अवधारण स्पष्ट होती है। हिन्दी में कहानी की ऐसी अवधारणा का स्वरूप प्रेमचन्द और उनके समकालीन कहानीकारों के लेखन में स्पष्ट अभिव्यक्त और परिमार्जित होता है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि प्रथम दो दशक के बीच की कहानियों में कहानी की संवेदनात्मक अवधारणा नहीं थी। वह बनने की प्रक्रिया में सक्रिय थी। इस दशक की कहानियों में साहित्यिक, राजनीतिक और राष्ट्रीय जागरण का स्वर दिखाई देता हैै। इसी दशक में जयशंकर प्रसाद की पहली कहानी ‘ग्राम’ (1911ई) और 1915 में चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कालजीवी कहानी ‘उसने कहा था’, प्रकाशित हुई। मार्के की बात है कि प्रेमचंद की पहली हिन्दी कहानी ‘सौत’ भी इसी दशक में 1915 में प्रकाशित हुई है। यह दशक भारतीय समाज में बहुत ही उल्लेखनीय है। राजनीतिक में गांधी और डॉ- अम्बेडकर का प्रवेश होता है और हिन्दी साहित्य में प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद का आगमन होता है। राजनीतिक संदर्भ में राष्ट्रीय जागरण की लहर थी। जिसका स्वर हिन्दी साहित्य में भी सुनाई पड़ता है। इस दशक की कहानियां न केवल राजनीतिक दृष्टि से बल्कि साहित्यिक दृष्टि से भी उल्लेखनीय रही है।

समय सापेक्ष विकास क्रम में कहानी की संवेदना लगातार बदलती रही है। कहानी की संवेदना के बदलते स्वरूप में कहानीपन का लोप कभी नहीं हुआ है। वह गंभीरता से साथ उभरती रही है। आधुनिक कहानी से पूर्व कहानी में यथार्थ की अभिव्यक्ति काल्पनिक तौर पर भी हुआ है। पुष्पपाल सिंह के शब्दों में, ‘‘इससे पूर्व के साहित्य में भी यथार्थ-चित्रण के महत्व को एक भिन्न दृष्टिकोण के साथ स्वीकारा गया है। वहां जीवन की वास्तविकता यथार्थ न होकर कल्पित है।’’7 अर्थात विकासक्रम में कहानी की संवेदना समय-सापेक्ष बदलती चली गई और उसका सौन्दर्य यथार्थवाद से संबद्ध होता चला गया। कहानियां कहानीकार की निजी और विशिष्ट दृष्टि के अनुरूप अपना स्वरूप बदलती रही। अब वह ‘‘मनुष्य के सामने कल्पना के बल पर आदर्शों का लोक एवं तिलस्म का कुतूहल खड़ा नहीं करती, अपितु वह जीवन-संघर्ष में समस्याओं से जूझते मनुष्य की सहगामिनी अथवा सहयात्री है। आधुनिक कहानी मनुष्य की जिंदगी की संपूर्ण विसंगतियों, भावनाओं एवं विवशताओं के साथ अपने पाठक का साक्षात्कार कराती है।’’8 इस प्रकार कहानियां यथार्थवाद की ओर झुकती चली गई। कहानी यथार्थ की प्रामाणिक अनुभूति की उपज बनती चली गई। यथार्थ के प्रामाणिक चित्रण पर बल देने के कारण जीवन के शाश्वत मूल्यों और आस्थाओं की प्रस्थापनाओं की कमी नई कहानी के सफर तक में देखने को मिलने लगी। अपितु केवल वर्तमान और जीवन की तत्कालिक स्थितियों से साक्षात्कार कराना ही कहानी का ध्येय हो गया। ‘‘आज वह हमें आदर्श का पाठ पढ़ाकर एक नया मनुष्य बनाने का उपक्रम नहीं करती अपितु यह जीवन की समस्त विसंगतियों एवं भयावह यथार्थ से गहरी पहचान कराकर उन स्थितियों पर चोट करती है, जो इन विसंगतियों एवं यथार्थ की भयावहता के लिए उत्तरदायी हैं और अपने इसी रूप में वह जीवन को या मनुष्य को बेहतर बनाने, उदात्त की ओर ले जाने का प्रयत्न सिद्ध होती है।’’9 अर्थात कहानी का सौन्दर्य लगातार विकास क्रम में परिमार्जित व परिष्कृत होता रहा है।

‘‘प्रेमचंद पूर्व युग की आधुनिक हिन्दी कहानी गुण और परिमाण, दोनों ही दृष्टियों से विशेष महत्वपूर्ण नहीं है। इस युग की कहानी आदर्शवादी रही है। वह कहानी में संस्कृत कथाओं के समान ही उपदेशात्मक वृति और नीति कथाओं जैसे निष्कर्ष और आदर्श प्रस्तुत करने की चेष्टा करता है। किंही निश्चित सिद्धांतों, उपदेशों और निष्कर्ष की संपूर्ति और संपुष्टि के निमित्त ही कहानी गढ़ी जाती थी। यहां किसी आदर्श को निश्चित करके उसी को सिद्ध करने के लिए कहानी का निर्माण होता था, सृजन नहीं।’’10 इस सृजन और गढ़ने की प्रक्रिया के कारण हिन्दी कहानी में सौन्दर्य का स्वरूप भिन्न रहा है। वह यथार्थवादी न हो कर आदर्शवादी रहा है। कल्पना से गढ़ा हुआ रहा है, अनुभूति की प्रामाणिक अभिव्यक्ति का सृजन नहीं। हरा ‘‘संस्कृत कथाओं और लोककथाओं के अनुकरण पर लिखी इन कहानियों में अलौकिक और आकस्मिक संयोग, अद्भुत तत्व और कुतूहल का प्राधान्य है। निश्चित सिद्धांतों और आदर्शों की पूर्ति के निमित्त कहानी गढने के कारण कल्पना का प्राधान्य होता था। कल्पना के इसी प्राधान्य के कारण कहानी में विश्वसनीयता नहीं थी, अपितु झूठ की हद तक कल्पना का प्रयोग होता था।’’11 वहीं परमानंद श्रीवास्तव ‘हिन्दी कहानी की रचना प्रक्रिया’ में लिखते हैं कि ‘‘वस्तुतः सामाजिक यथार्थ का वह बोध इन कहानियों में है ही नहीं, जो सामयिक जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा कर सकता है।’’12 यथार्थबोध की कमी के कारण हिन्दी कहानी में जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा नहीं हो सकी। जिसकी दरकार कहानी में होती है।

साहित्य जगत में प्रेमचंद के आगमन ने हिन्दी साहित्य के स्वरूप और उसकी संवेदना के साथ-साथ उद्देश्य तथा सौन्दर्य को भी परिवर्तित किया है। साहित्य सामाजिक यथार्थ के साथ-साथ मानव मन की वृत्तियों से जुड़ने लगा। दूसरे शब्दों में साहित्य और मनोविज्ञान का समन्वय होने लगा। यही समन्वय कहानी को पूर्व से अलग करता है। डॉ- रामचन्द्र तिवारी के अुनसार ‘‘हिन्दी की प्रारंभिक कहानियों में कथानक का विकास आकस्मिक एवं दैवी घटनाओं पर निर्भर करता था। विकास-युग में यह कथा विकास चरित्रें की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं द्वारा होने लगा। मनोवैज्ञानिक कथानकों का सूत्रपात प्रेमचंद की प्रथम कहानी ‘पंचमेश्वर’ से होता है।’’13 सन् 1925 ई तक हिन्दी कहानियों की दो स्पष्ट धाराएं परिलक्षित होने लगीं। प्रथम धारा यथार्थवादी दृष्टिकोण को स्पर्श करती हुई जीवन के व्यावहारिक पक्ष को भी लेकर विकसित हुई। इस धारा के अंतर्गत प्रेमचंद, सुदर्शन, विश्वभरनाथ शर्मा ‘कौशिक’, ज्वालादत्त शर्मा तथा चंद्रधर शर्मा गुलेरी प्रमुख हैं। दूसरी धारा आदर्श प्रधान प्रवृत्ति से प्रेरित होकर भाव-सत्य को लेकर आगे बढ़ी। इस धारा के अंतर्गत जयशंकर प्रसाद, चंडीप्रसाद ”दयेश तथा राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह आदि प्रमुख हैं।

प्रेमचन्द युग में आकर कहानी की सवंदेना और स्वरूप दोनों बदल गया। प्रेमचन्द ने सर्वप्रथम कहानी को काल्पनिकता से मुक्त कर सामाजिकता से संसिक्त किया। इस कारण हिन्दी कहानी का रूख अपने परिवेश और यथार्थ की ओर उन्मुख हुआ। अब कहानी में कल्पना या स्वर्णिम अतीत के इतिहास का लोक नहीं अपितु कहानीकार के चारों ओर फैला लोक, समाज और परिवेश चित्रित होने लगा। साहित्य में बौद्धिकता का प्रवेश होने लगा। बौद्धिकता के कारण कहानी स्वतः ही पूर्णतः काल्पनिक पात्रें एवं चरित्रें को अस्वीकृत करने लगी। उसमें मनोवैज्ञानिक विश्लेषण अनुभूति, प्रवणता और यथार्थ के तत्वों का समाहार होने लगा। प्रेमचन्द यथार्थ को कहानी में पूर्णतः यथावत रूप में उतार देने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं। वे यथार्थ को निजत्व की परिधि में लाकर पुनर्सृजित करने की बात प्रकारांतर से कहते हैं।, ‘‘अगर हम यथार्थ को हू-ब-हू खींचकर रख दें तो उसमें कला कहां है? कला केवल यथार्थ की नकल का नाम नहीं है। कला दिखती तो यथार्थ है, पर यथार्थ होती नहीं। उसकी खूबी यही है कि वह यथार्थ न होते हुए भी यथार्थ मालूम हो।’’14 बाद के वर्षों में प्रेमचन्द की कहानी में आदर्श से मोहभंग दिखता है। आदर्श से यथार्थ की जमींन की अभिव्यक्ति होती है। यही से कहानी में ‘नई’ की शुरूआत होती है। यह नई अलग दुनिया की नहीं है, बल्कि इसी समाज में नवीनता का बोध है। जहां एक था राजा से एक है आदमी का सफर दास्तान शुरू होता है।

आधुनिक कहानी की संवेदना प्राचीन कहानी की संवेदना से बिल्कुल भिन्न है। आधुनिक कहानी की संवेदना उद्देश्य, कथावस्तु, रचनातंत्र, शैली, ढंग, सभी कुछ बदल चुका है। अब कहानी का क्षेत्र अतीत में ‘क्या हुआ था’ की जगह आज हमारे बाह्य और आंतरिक जीवन में क्या हो रहा है, कैसे हो रहा है, क्यों हो रहा है आदि हो गया है। मुख्य रूप से कथा कहना और यत्किंचित उपदेश देना या किसी भाव को व्यक्त करना ही प्रथम और दूसरे दशक की कहानियों का लक्ष्य रहा है। गोपाल राय के शब्दों में 20वीं सदी के प्रथम दशक की हिन्दी कहानी का सौन्दर्य इस प्रकार है। ‘‘किसी विधा के आरंभिक दौर में कथ्य और शिल्प विषयक जो अस्थिरता हो सकती है, वह इस दशक की कहानियों में भी देखने को मिलती है। कहानीकारों के सामने अंग्रेजी की छोटी कहानी का आदर्श तो शायद था, पर उसके अनुरूप न तो कथा भाषा विकसित हुई थी न ही यथार्थ की संवेदना।’’15 औपनिवेशिक काल में हिन्दी कहानी का सौन्दर्य राजनीतिक मुक्ति की आकांक्षा की रही है। प्रेमचन्द और उनके समकालीन रचनाकारों में औपनिवेशिक शासनव्यवस्था से मुक्ति की संघर्ष देखा जा सकता है। इसी मुक्ति की अवधारणा के तहत रचनाकारों ने नाम बदलकर रचना कर रहे थे। औपनिवेशिकसत्ता व्यवस्था में शायद यही एक तरीका था मुक्ति के लिए। क्योंकि औपनिवेशिक सत्ता यह चाहती थी आम जनता में मुक्ति की अवधारणा किसी भी हालत में न पहुंच सके। 20वीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक के बीच की कहानियों में राष्ट्रीय चेतना का भाव दिखाई पड़ता है। प्रेमचन्द का ‘सोजेवतन’ इसका उदाहरण है। गोपाल राय के अनुसार ‘‘यहां प्रेमचन्द राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति के लिए उस प्रच्छन्न तरीके का इस्तेमाल करने लगते हैं, जिसे अंग्रेजी में विकेरियन नेशनलिज्म कहा जाता है। दमन और आतंक के सहारे चलनेवाले औपनिवेशिक शासन में लेखकों के लिए अपनी राष्ट्रीय भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए यही रास्ता बचा रहता है।’’16 जनमानस को जागृत करना इस काल की कहानियों का मुख्य लक्ष्य रहा है।

मुक्ति की अवधारणा में मानव मात्र की कल्पना अतिआवश्यक था। भारत में पुनर्जागरण ब्रिटिश शासन व्यवस्था के साथ शुरू होता है। जिसमें एक तरफ राजा महाराजाओं, जमींदार, महाजन और उस समय के बुद्धिजीवियों आदि के अपने स्वार्थ जरूर था लेकिन औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति की आंकाक्षा में आमजन का स्वर भी निहित था। वे भी अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे। ‘‘प्रेमचन्द भारतीय पुनर्जागरण को उसके व्यापक संदर्भ में देखते थे। वे समझते थे कि देश को औपनिवेशिक गुलामी से तभी मुक्ति मिल सकती है, जब पूरा देश सामाजिक दृष्टि से, लिंग-भेद, धर्म-भेद, जाति-भेद आदि के अंतर्विरोधों से मुक्त हो। उस समय के समाज में स्त्री, पुरुष की तुलना में, हर प्रकार से हीनतर स्थिति में जीवनयापन करती थी। पारिवारिक सम्पत्ति में अधिकार की दृष्टि से, शिक्षा की दृष्टि से, अपने बारे में निर्णय लेने की दृष्टि से, नैतिक संहिता की दृष्टि से, उसकी स्थिति पुरुष की तुलना में दासों जैसी थी। वही स्थिति दलितों की सवर्णों की तुलना में थी। हिन्दू-मुसलमान का साम्प्रदायिक भेद भी अपने चरम पर था। औपनिवेशिक शासन अपनी सुदृढ़ स्थिति के लिए भारतीय समाज के इन अंतर्विरोधों को बरकरार ही नहीं रखना चाहता था, बल्कि इन्हें और भी बढ़ाने में प्रयत्नशील था।’’17 

प्रेमचन्द्र आदर्शोन्मुख यथार्थवादी रचनाकार रहे हैं। जीवन के यथार्थ सत्य की शोध करना और उसका कलात्मक आकलन करना ही उनका उद्देश्य रहा है। वह समग्र जीवन के चितेरा हैं, इसलिए उन्होंने हर वर्ग और सामाजिक स्थिति के लोगों की कहानियां लिखी हैं। हर शैली का प्रयोग किया है लेकिन मनुष्य के अंतर्बाह्य जीवन की मार्मिक स्थितियों का चित्रण उन्होंने यथार्थवादी प्रणाली के अनुसार ही किया। उनकी पंच परमेश्वर, आत्माराम, बड़े घर की बेटी, शतरंज के खिलाड़ी, बज्रपात, रानी सारंधा, अलग्योझा, ईदगाह, सद्गति, अग्नि-समाधि, कामना-तरु, पूस की रात, सुजान भगत, कप़फ़न आदि अधिक विख्यात कहानियां हैं। इन कहानियों में उनकी संवेदना आदर्श से चल कर वर्ग संघर्ष के यथार्थ की ओर बढ़ती रही है। शिवदान सिंह चौहान के शब्दों में, ‘‘आर्यसमाजी समाज-सुधारक से बढ़ते-बढ़ते वह अपने अंतिम दिनों में वर्ग संघर्ष की अनिवार्यता को पहचानने लग गए थे और पूंजीवादी समाज और संस्कृति की निस्सारता और प्रतिगामिता के बारे में उनके मन में कोई भ्रम या संदेह न रहा था। उनकी अपनी प्रगति की छाप उनकी कहानयिों पर भी अंकित होती गई है।’’18 रामविलास शर्मा के अनुसार ‘‘उनकी सबसे सफल कहानियां वे हैं जिनमें उन्होंने किसानों के जीवन का चित्रण किया है।’’19 

प्रेमचन्द ने कहानी को जिस मनोविज्ञान से संबद्ध कर जीवन की व्याख्या की है। उसका विकास एक स्वतंत्र प्रवृत्ति के तौर पर हिन्दी कहानी के इतिहास में होता है। जैनेन्द्र कुमार, इलाचंद्र जोशी, अज्ञेय आदि की कहानियां मानव मन के सत्य का उद्घाटन करती हैं। इसलिए जैनेन्द्र कुमार, इलाचन्द्र जोशी और अज्ञेय को हिन्दी साहित्य में मनोविश्लेषणात्मक रचनाकार कहा जाता है। लेकिन तीनों की मनोवैज्ञानिकता में पफ़र्क है। ‘‘जैनेन्द्र की मनोवैज्ञानिक चित्रण की प्रणाली अपने जीवनानुभव और भाव-चेतन मानस की उपज है जबकि इलाचन्द्र जोशी और अज्ञेय में मनुष्य की मनोगत दिशाओं और अंतर्द्वंद्वों का चित्रण कम, फ्रायड की प्रणाली से किया गया मनोविकारों का विश्लेषण अधिक है। इसलिए जैनेन्द्र जहां उच्च मानसिक भूमि पर मनुष्य की चारित्रिक विशेषताओं का अंकन और अंतर्द्वंद्वों के माध्यम से उसकी उदात्त, मानवीय सहानुभूतियों और मनोभावनाओं को जीवन की गहराई में उतरकर अभिव्यक्ति देने की कोशिश करते हैं, वहां ये दोनों कहानीकार अपने कुंठाग्रस्त पात्रें के विक्षिप्त मानस को मनोवैज्ञानिक औचित्य प्रदान करके उनके जघन्य और असामाजिक कृत्यों को अपनी ओर से महिमा-मंडित करने का प्रयत्न करते हैं_ साथ ही पाठकों से भी उनके प्रति सहानुभूतिशील होने की अपेक्षा करते हैं। इसके अतिरिक्त, इन लेखकों में मनोविश्लेषण के प्रति इतना प्रबल आग्रह है कि वे मानसिक रुग्णताओं को ही मानवीय सत्य मानकर, अपने पात्रें के कृत्यों का यथातथ्य प्रकृतिवादी आकलन करते हैं जिससे उनकी रचनाओं का अंतःस्वर तो कैशोर-उद्धत, अविवेकी, अनुदात्त और अहम्मन्यतापूर्ण होता ही है, उनके पात्र भी अपनी असामाजिकता, स्वार्थपरता और आत्मकेन्द्रित उत्तरदायित्वहीनता को ही सामाजिक विद्रोह और क्रांतिकारी जीवनदर्शन का पर्याय मान लेते हैं। पर कहानी कभी ही साधारणता के तल से ऊपर उठ पाती है। क्रांति और सामाजिक भावना का ऐसा विद्रूप हिन्दी में अन्यत्र नहीं मिलता। अपनी उदात्त मानवीय संवेदना के अभाव और जीवन सत्य की कलात्मक प्रतीति से वंचित होने की पूर्ति ये लेखक अपनी अपनी क्षमता के अनुसार उक्ति-वैचि=य, संकेत-कथन, भाषा के बनाव-सिंगार और अभिनव रूपविन्यास से करते हैं। परंतु उनके पात्र सजीव नहीं हो पाते, फ्रायड की स्थापनाओं के दृष्टांत स्वरूप गढे़ गए, कृत्रिम और बनावटी लगते हैं और मनुष्य और मनुष्यता का उपहास मात्र प्रतीत होते हैं। इन लेखकों की कहानियों में शैली-भेद चाहे कितना हो, किंतु जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण मूलतः एक सा है और जैनेन्द्र से भिन्न है।’’20 शिवदान सिंह चौहान के अनुसार ‘‘अब तक हिन्दी कहानी की परंपरा मूलतः मानववादी थी। समाज के वैषम्य से कुंठित-पीडि़त मनुष्य के अंतःकरण में मनुष्य और मनुष्यता का निवास है, मानव जीवन में इस विश्वास को लेकर ही कहानीकार सामाजिक विषमताओं पर आक्रमण करते थे और मनुष्य की समाज-खंडित प्रतिमा को पुनःपूर्णत्व देने के लिए उसके अंतःसत्य और अंतःसौन्दर्य, यानी उसकी अखंडित मानवीयता का उद्घाटन करते थे। परंतु ये लेखक इस परंपरा के विपरीत फ्रायडी अर्धसत्यों को कबूल करके मनुष्य को परिस्थितियों का ही नहीं, स्वयं अपनी अर्धचेतन काम-वासनाओं का निरुपाय दास और सभ्यता के बाह्यावरण में ढके-छिपे पर मूलतः हिंस्र, पाशविक और स्वार्थी ही चित्रित करते हैं।’’21 तत्पश्चात हिन्दी कहानी का सौन्दर्य मार्क्सवाद से प्रभावित दिखाई देता है। हिन्दी में मार्क्सवाद की अवधारणाओं को लेकर प्रगतिशील साहित्य की रचना की जाती रही। जिसमें यशपाल का नाम प्रमुख है। यशपाल ने हिन्दी कहानी की सामान्य मानववादी परंपरा को नई सामाजिक राजनीतिक चेतना देकर ऊंचे धरातल पर उठाया है। अपनी कहानियों में सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन के विविध चित्रें द्वारा मौलिक समस्याएं उठाते हैं और एक कलाकार की रीति से उनका समाधान भी खोजते हैं। ये समस्याएं मौलिक हैं क्योंकि मनुष्य-जीवन के व्यापक सत्य से उद्भूत हैं। उनका मार्क्सवादी दृष्टिकोण इन समस्याओं के मूल कारणों तक पहुंचने में सहायक होता है और उनकी विशेषता यह है कि वे आद्यंत कलाकार बने रहते है, परिस्थितियों और उनके मध्य संघर्ष करने वाले चरित्रें के कार्य व्यापार के स्वाभाविक उद्घाटन से वह सामाजिक जीवन और मनुष्य के मनोगत भावों और द्वंद्वों का चित्रण करते हैं। ‘‘यशपाल की मूल समस्या यह है कि समाज के विषम संगठन ने मनुष्य जाति को ही दो विरोधी वर्गों में नहीं बांटा है, बल्कि मनुष्य के विचार और व्यवहार या आचरण में भी एक द्वैत या वैषम्य पैदा कर दिया है। इस द्वैत या वैषम्य के प्रति पाठकों को सचेत करना ही यशपाल का प्रधान उद्देश्य है। यह चेतना जनता में उस सामाजिक क्रियाशीलता को जन्म देगी जो सामाजिक वैषम्य का तो अंत करेगी ही, ऊंचे विचार नीच करतूती के वैषम्य का भी अंत कर देगी। तभी मनुष्य का बाह्य और आंतरिक जीवन पूर्ण स्वास्थ्य का लाभ कर सकेगा। इस समस्या का उन्होंने विविध ढंगों से अपनी कहानियों में उठाया है और साधारण अथवा शिष्ट समाज की ऊंचे विचारों में आवेष्टित नीच करतूतों पर तीखे प्रहार किए हैं।’’22 समस्याओं को प्रगतिशील दृष्टिकोण से उठाने वाले कहानीकारों में से चंद्र किरण सौनरेक्सां, उपेन्द्रनाथ अश्क आदि का नाम प्रमुखता से लिया जाता  सकता है।

प्रेमचन्द और उनके समकालीन कहानीकारों की कहानियों की खासियत यह रही है कि वे समसामयिकता से दूर नहीं होते है। समकालीनता की गतिविधियों को उजागर करने का काम कहानियां करती रही हैं। इसी संदर्भ में देखा जाए तो आद्यतन अस्मितावादी विमर्श का स्वर भी प्रेमचन्द और उनके समकालीन कहानियों में देखा जा सकता है। उस समय की कहानियां अपने अंदाज में इसका बयान करती रही हैं। प्रेमचन्द ने स्त्री और दलित दोनों समाजों के जीवन को करीबी से पहचानने का काम किया है और अपनी रचनाओं में उसे उठाया है। डॉ- सुभाष चन्द्र के अनुसार ‘‘उनकी रचनाओं में दलितों के प्रति सहानुभूति, करुणा एवं संवेदना के साथ शोषण, अन्याय, उत्पीड़न से मुक्ति और मानवीय गरिमा व पहचान के लिए संघर्ष है। वे दलित जीवन के विभिन्न पक्षों के अन्तःसूत्रें को पहचाना व प्रतिबद्धता से व्यक्त किया है।’’23 प्रेमचन्द की कहानियां -‘दूध का दाम’, मंदिर, गुल्ली डंडा, ठाकुर का कुंआ, मंत्र, सद्गति, कफन आदि में दलित जीवन के चित्र प्रस्तुत करती हैं। प्रेमचन्द किस प्रकार दलित जीवन के त्याग को दर्शाते हैं। यह उनकी कहानी ‘दूध का दाम’ में अभिव्यक्त होता है। इस कहानी में ‘भुंगी भंगिन महेश बाबू के बेटे सुरेश को अपना दूध पिलाती है जिस कारण उसका अपना बेटा मंगलू भूखा भी रहता है।’24 इस दूध का दाम किस रूप में दलित समाज को मिलता है। इसे भी प्रेमचन्द ने दिखाया है। ‘दूध का दाम’ कहानी में मंगल और टम्मी के संवाद में इसे समझा जा सकता है। ‘‘देखा, पेट की आग ऐसी होती है। यह लात मारी हुई रोटियां भी न मिलतीं, तो क्या करते? —लोग कहते हैं, दूध का दाम कोई नहीं चुका सकता और मुझे दूध का यह दाम मिल रहा है।’’25 इसके बाद भी ब्राह्मणवादी मानसिकता कभी भी अपनी निर्जिविता से अलग नहीं होती है। इस संदर्भ में ‘दूध के दाम’ के महेशनाथ का यह कथन द्रष्टव्य है- ‘‘दुनिया में और चाहे जो कुछ हो जाए, भंगी, भंगी ही रहेंगे। इन्हें आदमी बनाना कठिन है।’’ क्या सचमुच में ऐसा है? इसका प्रत्युत्तर भी कहानी में बयान है। भुंगी कहती है- ‘‘मालिक, भंगी तो बड़ों-बड़ों को आदमी बनाते हैं, उन्हें कोई क्या आदमी बनाए। यह गुस्ताखी करके किसी दूसरे अवसर पर भला भुंगी के सिर के बाल बच सकते थे? लेकिन आज बाबू साहब ठठाकर हंसे और बोले-भुंगी बात बड़े पते की कहती है।’’26 इस प्रकार प्रेमचन्द दलित जीवन और भारतीय समाज का चित्रण करते हैं। जिसमें एक तरफ मानवता है तो दूसरी तरफ ब्राह्मणवाद है। भुंगी के बातों में जहां दलित समाज की मानवता है, वहीं महेशनाथ के माध्यम से ब्राह्मणवाद को पहचाना जा सकता है। महत्वपूर्ण बात है कि जिस प्रकार से महेशनाथ भुंगी की बातों को स्वीकार करते हैं। क्या भारतीय समाज दलितों की इस मानवता को स्वीकार कर पाए हैं? रामविलास शर्मा के शब्दों में कहा जा सकता है कि प्रेमचन्द के यहां देश की जनता के प्रति प्र्रेम और सहानुभूति की गहरी संवेदना है। वे गरीबी और अंधविश्वासों को आदर्श कह कर नहीं चित्रित करते। वह दिखलाते हैं कि इतने अंधेरे में भी मनुष्यता का दीपक कैसे जल रहा है, उनकी लौ धनी आदमियों के घर से यहां कितनी ऊंची उठ रही है।27

हिन्दी कहानी में प्रेम की संवेदना का मार्मिक चित्रण मिलता है। प्रेम का यह सौन्दर्य विभिन्न रूपों में व्याप्त है। प्रेम के इस विविध रूपता में राष्ट्रप्रेम से लेकर स्त्री-पुरुष का प्रेम सौन्दर्य भी निहित है। स्वयं प्रेमचन्द की कहानियां प्रेम सौन्दर्य का चित्रण करती है। गोपाल राय प्रेमचन्द की प्रेम संवेदना को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि प्रेमचन्द की कहानियां ‘‘उस प्रेम का चित्रण करती हैं जो नैतिकता बोध से नियंत्रित होता है। यह प्रेमचन्द पर आर्य समाज के प्रभाव का द्योतक भी हो सकता है।’’28 प्रेम सौन्दर्य का रोमांनियत स्वरूप चित्रण जयशंकर प्रसाद की कहानियों में मिलता है। प्रसाद की कहानियां ‘अतीत स्तुत्य’ की सांस्कृतिक पक्ष पर आधारित होते हुए भी रोमानित भाव से लबरेज है।29 प्रेम की संवेदना का चित्रण चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानियों में देखा जा सकता है। ‘उसने कहा था’ प्रेम की संवेदना के साथ युद्ध की पृष्ठभूमि आधारित कहानी है। ‘‘युद्ध और प्रेम की साथ साथ चलनेवाली संवेदना के चित्रण की दृष्टि से यह कहानी हिन्दी में आज भी अकेली है। दोनों ही संवेदनाओं के चित्रण में कहानीकार ने अद्भुत अवलोकन क्षमता और प्रामाणिक अनुभव का परिचय दिया है।—यद्यपि इस कहानी की केन्द्रीय संवेदना प्रेम ही है, पर इसका एक पाठ युद्धविरोधी संवेदना के रूप में भी संभव है। युद्ध आदमी को कितना नृशंस बना देता है, फिर भी मानवीय संवेदनाएं उसमें किस प्रकार जीवित बची रहती है, यह कहानी इसकी पुष्टि करती है।’’30 thee

औपनिवेशिक सत्ता की क्रूरता का चित्रण भी हिन्दी कहानियों मिलता है। इसमें औपनिवेशिक नीतियों का विरोध कहानी का मुख्य ध्येय रहा है और हृदय परिवर्तन की संवेदना हिन्दी कहानी का सौन्दर्य रहा है। औपनिवेशिक शासन व्यवस्था में किसानों, जमींदारों और महाजनों का ऐसा त्रिकोणीय संबंध निर्मित किया गया, जिसमें फंसी आम जनता, किसान आदि का निकलना मुश्किल था। किसानों से जमीन की लगान, जो बेहद ऊंची थी, वसूल करने के लिए जमींदार वर्ग का सृजन किया गया था और लगान चुकाने के लिए असमर्थ किसानों को कर्ज लेकर लगान चुकाने के योग्य बनाने के लिए साहूकारों को अनेक सुविधाएं प्रदान की गई थीं। इसके फलस्वरूप किसान कर्ज के बोझ से लदते जा रहे थे, जिसका अंतिम परिणाम उनके भूमिहीन कृषक मजदूर बदलने में होता था। इसके फलस्वरूप ‘अनुपस्थित जमींदारों’ की एक अलग श्रेणी पैदा हो गयी थी, जो किसानों के लिए और भी तकलीफदेह थी। ऐसे शहरी जमींदारों की गांव में जमींदारी होती थी, जो कभी कभार गांव जाते थे और किसानों पर कारिन्दों और पुलिस के अत्याचार की अनदेखी कर देते थे। जो छोटे जमींदार गांव में किसानों के बीच रहते थे, उनके यहां किसानों पर ऐसा अत्याचार नहीं होता था। प्रेमचन्द युग की कहानियों में किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण है। साथ ही औपनिवेशिक सत्ता के साथ-साथ देशी साम्राज्यवाद के अत्याचार का वर्णन मिलता है। प्रेमचन्द की कहानी ‘सवा सेर गेहू’ और जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘ग्राम’ में इसे सहज ही समझा जा सकता है। ‘‘सवा सेर गेहूं’ में कर्ज की वजह से गुलामी करने वाले शंकर की करुण कथा है। वह एक बार सवा सेर गेहूं उधार लेता है और उसे पाटते-पाटते बीस साल लग जाते हैं, फिर भी वह गुलामी करता हुआ मरता है। कहानी के अंत में प्र्रेमचन्द कहते हैं -पाठक! इस वृतांत को कपोल कल्पित न समझिए। यह सत्य घटना है। ऐसे शंकरों और ऐसे विप्रों से दुनिया खाली नहीं है।’’31 इसके साथ ही उस युग की कहानियों में हृदय परिवर्तन की बात हुई है। गोपाल राय लिखते हैं कि ‘‘प्रेमचन्द बुर्जुआ जमींदारों का हृदय परिवर्तन भी दिखाने से बाज नहीं आते। कदाचित वे चाहते थे कि ऐसा हो पाता। जमींदारों के प्रति उनका मोहभंग अभी नहीं हुआ था।’’32 इस संवेदना को प्रेमचन्द की कहानियां, ‘उपदेश’, बलिदान, बैंक का दिवाला’ में सहज ही देखा जा सकता है। वहीं ‘पशु से मनुष्य’ कहानी प्रेमचन्द की समाजवाद या सहयोगवाद में आस्था को रेखांकित करती है।  इसी प्ररिप्रेक्ष्य में गोपाल राय प्रेमचन्द के वैचारिक सौन्दर्य को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि प्रेमचन्द आदर्शवाद की स्थापना करते हैं जिसमें एक तरफ गांधीवाद है तो दूसरी तरफ समाजवाद है। ‘‘प्रेमचन्द गांधीवादी और समाजवादी विचारधारा के द्वंद्व में फंसे हुए हैं।’’33 

दलित संवेदना के साथ-साथ स्त्री संवेदना भी हिन्दी कहानी का सौन्दर्यबोध रहा है। प्रेमचन्द की कहानियों में यह अशिक्षित, रूढि़यों और अंधविश्वासों में जकड़ी, सदियों से पुरुष-व्यवस्था की मार झेलती, स्वाभाविक मानवीय अधिकारों से भी वंचित, किसी प्रकार की भी स्वतंत्रता से रहित, मूक-बधिर और दशक के अंत में अपनी सीमाओं को तोड़ती, मनुवादी व्यवस्था से विद्रोह करती स्त्री बार-बार सामने आती है। ग्रामीण सामाजिक संरचना का बहुत ही प्रामाणिक अंकन उनकी कहानियों में देखने को मिलता है। इस संरचना की नींव संयुक्त परिवार के परम्परागत मूल्यों पर आधारित थी। दाम्पत्य संबंध, दहेज प्रथा, विधवा विवाह, बहुविवाह, बिरादरी, कुल मर्यादा आदि इस संरचना की नींव थे। आत्मसमर्पण और सेवा धर्म को प्रेमचन्द दाम्पत्य जीवन का मूल तत्व मानते हैं। ‘दो सखियां’ कहानी द्वारा प्रेमचन्द आदर्श दाम्पत्य जीवन की एक रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। प्रेमचन्द विवाहित जीवन में स्वतंत्रता की छूट नहीं देते। विवाह जैसी संस्था या प्रथा पर उनकी अलग ही द्दृष्टि है। ‘‘दाम्पत्य मूल्य को प्रेमचन्द की कहानियों में पारिवारिक संरचना का आधार के रूप में देखा जा सकता है।’’34 यह दाम्पत्य जीवन ‘शारीरिक सौन्दर्य की तुलना में आत्मिक सौन्दर्य’ के प्रेम पर आधारित है। प्रेमचन्द समाज में इसी प्रेम सौन्दर्य को स्थापित करना चाहते थे। भारतीय समाज में इसी प्रेम सौन्दर्य पर बल भी दिया गया है। ‘अलग्योझा’, ‘घरजमाई’ आदि कहानी में संयुक्त परिवार की परस्पर प्रेम पर आधारित संरचना का और ग्रामीण समाज की संरचना में घरजमाई की स्थिति मान-सम्मान आदि का चित्रण बहुत ही मार्मिक है। लोकमत का सम्मान, निम्नवर्गीय समाज की आर्थिक और नैतिक अंधविश्वासों, सामाजिक नैतिक रूढि़यों, धार्मिक विश्वासों, यहां तक कि ईश्वर के अस्तित्व में भी संदेह प्रकट हुआ हैं, वहीं उनकी कुछ कहानियों में भूत प्रेत, पुनर्जन्म, तर्कहीन अलौकिकताओं के प्रति स्वीकार का भाव लक्षित होता है। विध्वंस, मूठ, गुप्त धन, नाग पूजा, भूत, खूनी, पिसनहारी का कुआं, मंत्र, प्रतिशोध आदि कहानियां इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं।’’35 

सेक्युलर मूल्यों की स्थापना हिन्दी कहानी का सौन्दर्यबोध रहा है। हिन्दू मुस्लिम सद्भाव प्रेमचन्द की रचना का केन्द्रीय विषय रहा है। तत्कालीन औपनिवेशिक शासन व्यवस्था में समय की ऐसी मांग थी। ‘मंदिर और मस्जिद’, ‘हिंसा परमो धर्म आदि कहानियों में हिन्दू मुस्लिम सद्भाव का विचार व्यक्त हुआ है। ‘शुद्धि’, ‘जिहाद’ आदि भी अंधधार्मिकता के विरोध में लिखी गई कहानियां है। ‘शुद्धि’ का कहानी का यह कथन ही भारतीय समाज की धर्मनिर्पेक्षता को रेखांकित है। ‘‘मैं शुद्धि का हामी नहीं हूं। हिन्दू समाज में अब भी ऐसे बेशुमार आदमी पड़े हुए हैं जिनके हाथ का पानी पीना गवारा न होगा। हमारा समाज ऐसे ही आदमियों से भरा हुआ है’’। इसलिए गोपाल राय लिखते हैं कि प्रेमचन्द सच्चे अर्थों में सेक्युलर मूल्यों के समर्थक लेखक थे।’’36 प्रेमचन्द की यह धर्मनिर्पेक्षता उस समय की अन्य कहानीकारों की कहानियों में व्यक्त हुआ है। बेचनशर्मा ‘उग्र’ ने सांप्रदायिकता के विभिन्न पक्षों पर मानवीय संवेदना से विचार किया गया है। ‘दोजख!नरक!’ नामक उनकी कहानी में सेक्युलर मूल्यों की स्थापना की गई है-‘‘जो जामा मस्जिद में है, वही विश्वनाथ मंदिर में। वही खुदा, वही गॉड, वही ईश्वर।—मस्जिद, मंदिर, गिरजाघर आदि मनुष्य की कल्पना हैं। मनुष्य की कल्पना के लिए ईश्वर की कल्पना का नाश करना इतना बड़ा पाप है, जिसका कोई पर्याप्त दंड नहीं है।’’37 इस प्रकार कहा जा सकता है कि हिन्दी कहानी का सौन्दर्य एक धर्मनिर्पेक्ष मूल्यों की स्थापना करता है। यह दीगर बात है कि समाज में यह मूल्य आज भी विघटित हो रहा है।

प्रेमचन्द के समकालीन उग्र की कहानियों का सौन्दर्य भी औपनिवेशिक दासता के प्रति विद्रोह और मुक्ति की है। गोपाल राय के अनुसार ‘‘प्रेमचन्द और उग्र की कहानियां फ्रैंक ओ कॉनर की उस परिभाषा पर एकदम खरी उतरती हैं, जिसके अनुसार कहानी की प्रकृति दबे, उपेक्षित और अल्पसंख्यकों के, वर्चस्वसम्पन्न और बहुसंख्यकों के विरूद्ध, छापामार युद्ध की है। वह चाहे उपनिवेशवाद के विरूद्ध पराधीन देश की, पुरुषवादी व्यवस्था के खिलाफ स्त्री समाज की, उच्चवर्ग के विरूद्ध दलित वर्ग की अथवा जड़ नैतिक व्यवस्था के विरूद्ध अल्पसंख्यक रचनाकार का विद्रोह हो, कहानी उसकी आवाज बनकर प्रकट होती है। प्रेमचन्द और उग्र की कहानियां इसकी पुष्टि करती हैं।’’38 वहीं संवेदना और प्रवृत्ति की दृष्टि से विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक, बद्रीनाथ भट्ट सुदर्शन, उपेन्द्रनाथ अश्क, रशीदुल खैरी और अली अब्बास हुसैनी आदि की कहानियों का विशेष महत्व है। गोपाल राय के अनुसार ‘‘यद्यपि इनकी कहानियां न तो व्यवस्था के विरूद्ध छापामार युद्ध की दृष्टि से और न ही संवेदना और शिल्प प्रयोग की दृष्टि से बहुत उल्लेखनीय है, पर साहित्य के इतिहास में उल्लेखनीयता की दृष्टि से कमजोर कहानियों का भी स्थान होता है।’’39

हिन्दी कहानी के इतिहास में स्त्री जीवन को लेकर कई कहानीकारों ने कहानी की रचना की है। इसी संदर्भ में वेश्या के जीवन से भी संबंधित रचनाएं मिलती है। प्रेमचन्द की कहानियों में स्त्री जीवन के विविध रूपों को सहज ही देखा-समझा जा सकता है। उनका जीवन ‘संघर्ष प्रायः प्रेम की प्राकृतिक संवेदना और समाज की रूढि़यों मान्यताओं के बीच होता है_ पर प्रसाद की कहानियों में यह संघर्ष शुद्ध परस्पर विरोधी संवेदनाओं का होता है।’ ‘आकाशदीप’ जो प्रसाद की सर्वोत्तम कहानियों में से एक है, इसका अनोखा उदाहरण है। ‘‘प्रेम और घृणा का ऐसा द्वंद्व और परस्पर स्पर्द्धिता शायद ही हिन्दी की किसी और कहानी में मिले। इस कहानी में विसंवादी संवेदनाओं के संघर्ष से करुणा की जो चिनगारी निकलती है, वह किसी भी सहृदय पाठक को अभिभूत करने के लिए पर्याप्त है। कहानी का वातावरण पूर्णतः रूमानी, साहसिक अभियान, कल्पना प्रसूत परिवेश और वैसे ही कल्पनालोक के प्राणियों से भरा हुआ है।’’40 वहीं ‘चूड़ीवाली’ में एक वेश्या पुत्री को कुलवधू बनने के स्वप्न को दिखाया गया है। पर सफलता उसे तब मिलती है, जब वह एक आदर्श प्रतिव्रता हिन्दू स्त्री और तपस्विनी की दिनचर्या ग्रहण कर लेती है। ‘रमला और बिसाती’ में प्रेम की संवेदना सामाजिक परिस्थितियों के संघात से टकराकर प्रेमी प्रेमिका के अनन्त वियोग का रोमानी स्वरूप ले लेती है। गोपाल राय के अनुसार ‘‘प्रसाद समकालीन जीवनधारा से बिलकुल कटे हुए नहीं थे, पर उनकी कम ही कहानियों ऐसी हैं जो उनकी यथार्थपरक संवेदना को कलात्मक प्रौढ़ता के साथ व्यक्त करती हों।’’41 ‘घीसू, ‘ग्रामगीत’, ‘पुरस्कार’ आदि कहानियों में प्रेम के विविध रूप देखने को मिलता है। अतीत एवं वर्तमान के समसामयिकता के संदर्भ में प्रेम की संवेदना प्रकट हुई है। ‘‘प्रसाद जी की कहानियों में प्रेम का आदर्श आध्यात्मिक स्तर पर उठ जाता है। उनकी आरंभिक कहानियों में प्रेम का भावुकतापूर्ण और अत्यधिक रोमानी रूप मिलता है, किन्तु धीरे धीरे उनमें औदात्य और गरिमा का समावेश होता गया है। उनकी दृष्टि त्याग और समर्पण की भावना से दीप्त, कल्पना से रंगीन और सूक्ष्म आदर्श से मंडित है। वह एकांगी नहीं है। उसमें दूसरी भावनाओं के साथ द्वंद्वात्मकता की स्थिति भी है। उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियां तो वे ही हैं जिनमें प्रेम की भावना का टकराव दूसरी भावनाओं के साथ होता है और इस टकराहट में पात्र बुरी तरह से झकझोर जाते हैं।’’42 गिरमिटिया मजदूर और शूद्र समाज के ऊपर पर भी कहानियां लिखी गई। प्रसाद की ‘नीरा’ और प्रेमचन्द की ‘शूद्रा’ कहानी ऐसी ही कहानी है। ‘‘नीरा की पृष्ठभूमि गिरमिटिया मजदूरों के मॉरिशस जाने की ऐतिहासिक घटना से जुड़ी हुई है, पर कथ्य उससे एकदम अलग हो गया है। अनास्था पर आस्था की जीत इस कहानी का मुख्य प्रतिपाद्य हो गया है।’’43 देहज प्रथा और उससे जुड़ी समस्याओं को प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों में सशक्त रूप में उठाया है। यह संवेदना शिवपजून सहाय की कहानी ‘कहानी का प्लॉट’ में भी देखी जा सकती है। इस कहानी का कथ्य तत्कालीन समाज में प्रचलित दहेज प्रथा के कारण किसी प्रौढ़ पुरुष का किशोरी कन्या से विवाह है, जो अंततः स्त्री विवशता और सामाजिक अनाचार में परिणत होता है।’

हिन्दी कहानी की संवेदना इतिहास की सांस्कृति विरासत को भी रेखांकित करती है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री की कहानियां भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ को ऐतिहासिक दंत कथाओं के माध्यम से चित्रित करती है। ‘‘कथ्य की दृष्टि से उनकी अधिकतर कहानियां ऐतिहासिक दंतकथाओं और अर्धप्रामाणिक घटनााओं या प्रसंगो पर आधारित हैं।—जिनका समय गौतम बुद्ध से लेकर 1857 के विद्रोह तक फैला हुआ है। तर्कसंगत ऐतिहासिक दृष्टि और वैज्ञानिक इतिहासबोध के अभाव में ये कहानियां प्रबुद्ध पाठक को प्रभावित करने में असमर्थ है।—सांस्कृतिक चेतना के नाम पर शास्त्री जी ने प्राचीन हिन्दू संस्कृति और परम्परागत सामाजिक नैतिक मूल्यों के प्रतिपादन पर अधिक जोर दिया है। परम्परा पर इनकी दृष्टि आलोचनात्मक नहीं है। कहीं-कहीं तो इन्होंने अपने तथाकथित सांस्कृतिक विचारों का प्रतिपादन सपाट वर्णन या पात्रें के संवादों के रूप में करने का प्रयास किया है।’’44

जैनेन्द्र हिन्दी कहानी संसार में एक अलग कथ्य को लेकर कहानी की रचना करते हैं। ‘‘जैनेन्द्र के कथा संसार में प्रवेश करते ही हमें महसूस होने लगता है कि वह प्रेमचन्द की तुलना में बिल्कुल बदला हुआ है_ वह गांव से नगर में और किसानों-मजदूरों की जिंदगी से उच्च मध्यवर्ग और अभिजात वर्ग की जिंदगी में आ गया है  उसमें किसान मजदूर वर्ग के पात्र मुश्किल से मिलते हैं।’’ समाज के प्रति जैनेन्द्र की प्रतिबद्धता अलग तरह की है। गोपाल राय के शब्दों में, ‘‘जैनेन्द्र प्रेमचन्द की यथार्थवादी कथा परम्परा से अलग एक भाववादी कथा परम्परा के पुरस्कर्ता बन जाते हैं। यह तनिक आश्चर्य की बात है कि राजनीतिक पृष्ठभूमि होते हुए भी जैनेन्द्र की कहानियों में स्वाधीनता आंदोलन की कोई साफ झलक नहीं दिखाई देती है।’’45 जैनेन्द्र के यहां मध्यवर्ग की आर्थिक मजबूरियां और नैतिक अंतर्विरोध सबसे ज्यादा जगह ली है। प्रेम के लिए आत्मबलिदान देने वाली स्त्री जैनेन्द्र की कहानी की खास विशेषता रही है। उनकी ‘जाह्नवी’ कहानी ऐसी है जिसमें ‘दो नैना मत खाइयो—पिया मिलन की आस’ की संवेदना रची-बसी है और उसी इंतजार में वह आजीवन शादी नहीं करती है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है एक अंतहीन प्रेेम की कहानी है। वह पारंपरिक विवाह नामक संस्था का विरोध प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष विरोध करती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि जैनेन्द्र की कहानियों का सौन्दर्य प्रेमपरक है खासकर मध्यवर्ग के प्र्रेम जो पारंपरिक विवाह संस्थान को चुनौती देता है। हिन्दी कहानी का सौन्दर्य इस प्रकार एक विकासक्रम में विविध फलक को प्राप्त करता है। गोपाल राय ने सही ही लिखा है कि ‘‘संरचना की दृष्टि से चौथे दशक में हिन्दी कहानी प्रौढ़ता पर पहुंच गयी, जिसका श्रेय प्रेमचन्द के साथ जैनेन्द्र और अज्ञेय को है। पांचवे दशक में मंटो और बेदी ने और छठे दशक मे अमरकांत, मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, शेखर जोशी, इंतिजार हुसैन, निर्मल वर्मा, रेणु आदि ने कहानी की संरचना को अपेक्षित ऊंचाई पर पहुंचा दिया।’’46 अर्थात हिन्दी कहानी एक क्रमिक विकासक्रम में विकसित होती रही है। समय सापेक्ष उसके मूल्यों में परिवर्तन होता रहा है। डॉ नंद किशोर नीलम के शब्दों में कहें तो, ‘‘हिन्दी कहानी में प्रेमचन्द के आस-पास जो सौन्दर्यबोध विकसित हो रहा था वह बहुत कुछ सौंदर्यशास्त्र की आत्मवादी, भाव-वादी और आध्यात्मिक विचारणा पर आधारित था। आशय यह कि वह सौन्दर्यबोध अधिकांशतः भारतीय काव्यशास्त्र और दरबारी मानसिकता का पोषक करने वाला था।—कहना न होगा कि इन कहानियों का सौन्दर्यशास्त्र भी निष्क्रिय और कुंठित जीवन दशर्न का पर्याय बन गया। अगर कोई इजाफा आगे जाकर हुआ तो वह यह कि कलावाद, रूपवाद और रीतिवाद नए अभिजनीय स्वरूप में सामने आ गए। उनका यह नया अभिजनीय स्वरूप था आधुनिकतावादी।’’47 

साहित्य की बदलती संवेदना के आधार पर ही प्रेमचन्द ने ‘साहित्य की कसौटी48 बदलने की बात की थी। ‘‘जब से भारतीय साहित्य में, विशेषकर हिन्दी साहित्य में जातीय अस्मिता की खोज की बात उठी, जनजीवन से गहरे सरोकार और सहकार वाली साहित्य चिंता की बात उठी तथा मार्क्स के सौन्दर्य-कला चिंता के प्रतिमानों का प्रभाव हमारे साहित्य पर पड़ा तब से सौन्दर्यशास्त्र के आयाम भी बदले और सौन्दर्यशास्त्र की भाववादी, आत्मवादी, अलौकिक, अतिमानवीय और अवैज्ञानिक निष्पत्तियों की पुनर्व्याख्या भी की जाने लगी।—आज सौन्दर्य के उद्घाटन का तात्पर्य रचना के संपूर्ण मूल्यों और गुणों का उद्घाटित करना है। किसी भी रचना (कलाकृति) के सुंदर आनंदकारी या उजले पक्ष को ही नहीं उसके करूणा, जुगुप्सा, वीभत्सता में डूबे काले पक्ष को उद्घाटित करना और उसके प्रतिकार के लिए जन सामान्य के भीतर क्षोभ और संघर्ष की भावना उत्पन्न करना भी सौन्दर्य का उद्घाटन ही है।’’49 डॉ नंदकिशोर नीलम के अनुसार ‘‘भारतीय परिवेश, परिस्थितियों, विवके परंपरा और चिंता धारा के अनूकूलन में हिन्दी कहानी का एक खाका निर्मित होना चाहिए। जातीय अस्मिता की खोज, पहचान और विकास उसके केन्द्र में रहना चाहिए। कहानी की स्थापत्य, नक्शा, रूप, शिल्प और विषय-वस्तु यानी उसका संपूर्ण कहानी के विन्यास में ही खोजा जाना चाहिए। वह आरोपित, थोपा हुआ और पूर्व निर्धारित नहीं होना चाहिए। इस तरह कहानी का एक जातीय चरित्र प्रस्तुत किया जा सकता है। कहना न होगा कि मेरा यह प्रयास लोक जीवन और लोक प्रकृति से जुड़े उस जातीय और जनवादी सौन्दर्य बोध के आधार पर विकास पाता है जो समकालीन कहानी की मूल धारा है।’’50 ‘हिस्ट्री आफ माइंड’ और इतिहास दशर्न ही साहित्य-कहानी का सौन्दर्यशास्त्र है और इसी सौन्दर्यशास्त्र की जरूरत हिन्दी साहित्य की आलोचना के लिए सबसे अधिक है। ‘‘सौन्दर्य भाव, विचार और इन्द्रियबोध की संगति से उत्पन्न होता है। भाव, विचार और इन्द्रियबोध से ही रचना का मूल्य और वैिशष्ट्य निरूपित होता है। आलोचक को इसी आधार पर रचना का मूल्यांकन भी करना चाहिए। सौन्दर्यशास्त्र का साहित्य में विवेचन करने के लिए आलोचक की गहरी पकड़ यथार्थवाद पर होनी चाहिए। साहित्य में यथार्थ का चित्रण कितना सटीक और कितना सजीव रूप में हुआ है इस पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। यही कृति के सौन्दर्य की कसौटी भी है। सौन्दर्य का स्रोत जनजीवन है और उसका उत्कर्ष है जीवन संग्राम।’’51 

सौन्दर्य का उत्कर्ष जीवन संग्राम में ही देखा जा सकता है। संकीर्ण दृष्टि को बदले बिना वास्तविक सौन्दर्यबोध की अनुभूति संभव नहीं है। जीवन-जगत के प्रत्यक्ष अनुभव का सशक्त माध्यम है इन्द्रियबोध। समकालीन कहानी में इन्द्रियबोध की व्यापकता स्पष्टतः देखी जा सकती है। इन्द्रियबोध और भाव दो अलग अलग चीज है समस्या तब होती है जब दोनों को एक समझ लिया जाता है। भावों का आशय भीतर के सौन्दर्य से है, उनका उदय मन में होता है जबकि इन्द्रिय बोध तक बाह्य, प्रत्यक्ष जगत का अनुभव है, इन्द्रियों से इस जगत का बोध होता है। भाव जगत और इन्द्रिय बोध एक ही यथार्थ के दो पक्ष हैं जो पूर्णतः स्वतंत्र न होकर परस्पर संबद्ध हैं। सौन्दर्यबोध भावबोध को प्रभावित करता है और भावबोध से विचार बनते हैं। यह प्रक्रिया दोहरी मिश्रित और संश्लिष्ट है।

स्वाधीन भारत में समाज का परिदृश्य बदला है। समाज का बदलता परिदृश्य साहित्य से अछूता नहीं रहा है। कहानी का यथार्थ और यथार्थ की काल्पनिक जमीन समय सापेक्ष जमीन की हकीकत और यथार्थ में बदल गयी। कहानी की संवदेना का बदलता हुआ यह स्वरूप आंदोलनधर्मिता का रूप ग्रहण किया है। ‘नई कहानी’ में इसी अवधारणा के तहत यथार्थ की प्रामाणिकता और अनुभूत यथार्थ की अभिव्यक्ति हुई है। ‘‘नयी कहानी का अभिप्राय यह है कि इसने कहानी को वस्तु और शिल्प की दृष्टि से एक नया रूप दिया जिसमें नयेपन का सचेत आग्रह था। यह परिवेश और रचनाशीलता के द्वंद्व से उपजा था क्योंकि स्वतंत्रता के बाद कथाकार जीवन के बदलते यथार्थ को एक नये परिवेश में देख रहा था और यह अभिव्यक्ति की नई भंगिमाओं को तलाशने की भी कोशिश कर रहा था। कहानी में परिवर्तन की आवाजें आ रही थी।’’52 परिवर्तन की इसी आवाज में नई कहानी आंदोलन की शुरूआत होती है और कहानी की प्रवृतियां आंदोलनधर्मी होती जाती है।

कहानी या किसी भी विधा का कोई भी आंदोलन विकास की एक प्रक्रिया से जुड़ा होता है और उसकी एक पृष्ठभूमि भी होती है। यह पृष्ठभूमि हिन्दी कहानी में भी मिलती है जिसमें सामाजिक और व्यक्तिवादी चेतना दोनों का ही आधार रहा है। प्रेमचन्द ने वर्ग संघर्ष को समन्वय कर उसे भारतीय दर्शन से जोड़ा है और उनके सामाजिक यथार्थ की परंपरा में यशपाल, रांगेय राघव, भैरवप्रसाद गुप्त, उपेन्द्रनाथ अश्क, अमृतराय और अन्य प्रगतिवादी मार्क्सवादी रचनाकार वर्ग चेतना के संदर्भ में वर्ग विशेषता पर प्रहार करते हुए दिखते हैं। इसी प्रकार व्यक्तिवादी या मनोवादी चेतना के संदर्भ में जैनेन्द्र, इलाचंद्र जोशी और अज्ञेय तथा अन्य कहानीकार भी हैं। जिन्होंने व्यक्ति मन की अतल गहराईयों को मनोवैज्ञानिक धरातल पर आत्मसंघर्ष के रूप में व्यक्त किया है। स्वतंत्रता के बाद देश में अनेक घटनाएं घटी हैं और स्वतंत्रता एक राजनैतिक मूल्य से भी बढकर नयी विचार क्रांति के रूप में सामने आयी है। स्वतंत्रता में जो स्वप्न देखे गये थे वे कलांतर में बिखर कर टूटे हैं और जीवन में अनेक समस्याओं का विकास हुआ है। महंगाई के बढ़ने से जीना कठिन हुआ है और देश की बहुत बड़ी जनसंख्या अब भी बेरोजगारी और बेकारी के बीच जी रही है। समाजवादी अर्थव्यवस्था में भी पूंजी का कुछ लोगों के हाथों में केन्द्रीकरण हो गया है। भारतीय राजनीति ने सत्ता के लिए प्रांतीयता, जातीयता और क्षेत्रीयता को बढ़ाया है। सबसे अधिक समस्या मध्यवर्ग को आई है और उसका मोहभंग हुआ है। स्वतंत्रता और यांत्रिकाएं, राजनीतिक भ्रष्टाचार और परिवारों का विघटन अनेक प्रकार के भीतरी और बाहरी संकटों से भरा रहा हैै। इस तरह एक और राजनीतिक स्तर पर अनेक प्रक्रार की हलचल और आर्थिक विकास और समाजिक निर्माण की तेज प्रक्रिया के बीच नई पीढ़ी ने नैतिकता के इस पतन को देखा है। नई पीढ़ी के जो भी कहानीकार हैं वे इन समस्याओं के बीच व्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल उठाते हैं।

नई कहानी में यथार्थ की प्रामाणिकता पर बल दिया गया है। यह भोगे हुए यथार्थ तक ही सीमित नहीं है बल्कि अनुभूति की प्रामाणिकता और प्रामाणिकता की यथार्थवादी प्रस्तुती है। कहानी अब जीवन का प्रतिबिंब नहीं, जीवन की एक फांक, अनुभव या खंड मात्र बन गई है। इसलिए कमेलश्वर ‘नई कहानी की भूमिका’ में लिखते हैं कि ‘‘पूर्व कहानी जीवन का चित्र मात्र थी, चित्र में जीवन की वास्तविकता नहीं होती, थोड़ी कृत्रिमता या बनावटीपन होता है। नई कहानी इस बनावटीपन और चित्र की जीवनगत दूरी को मिटाकर जिंदगी के किसी हिस्से के रूप में आती है। यानि नई कहानी पहले और मूल रूप में जीवनानुभव है, उसके बाद कहानी है।’’53 इस प्रकार कहा जा सकता है कि नई कहानी का सौन्दर्य जीवन का अनुभव का सौन्दर्य है। उसमें विश्वसनीयता का संकट नहीं के बराबर रहा है। कहानी के केन्द्र में व्यक्ति और उसका समाज है। सामाजिकता और वैयक्तिकता का समन्वय कहानी की संवेदना में है। यही कारण है कि नई कहानी मानवीय रिश्तों, संबेधों पर बहुत अधिक लिखा गया है। राजेन्द्र यादव के शब्दों में, यह ‘‘व्यक्तिगत सामाजिकता’’54 है। इस सामाजिकता में विविधता और व्यापकता तो बहुत है लेकिन वह मुख्यतः संबंधों के यथार्थ पर आधारित है। मोहन राकेश के अनुसार ‘‘नई कहानी में यथार्थ अपेक्षाकृत ठहरे हुए— पारिवारिक और वैयक्तिक यथार्थ है।’’55 वस्तुतः नई कहानी में विविधता और व्यापकता का कारण व्यक्ति के जीवन के विभिन्न यथार्थ और उसका सामाजिक सरोकार हैं। यह यथार्थ व्यक्ति की निजी अनुभूति और दृष्टिकोण है। पुष्पपाल सिंह के अनुसार ‘‘भोगे हुए या अनुभूत यथार्थ की अभिव्यक्ति में किसी प्रकार के निषेधभाव ( इन्हिबिशन्स) न होने के कारण यह यथार्थ बहुआयामी और अत्यंत व्यापक है। इसीलिए नई कहानी में एक प्रकार का अपूर्व वैविध्य दिखाई देता है।’’56 यह विविधता व्यक्ति की प्रवृत्तियों से लेकर समाज, गांव, शहर, कस्वा और महानगर तक सभी स्तरों पर विद्यमान है। सन् 1950 से लेकर 1960 के बीच की कहानियों को नई कहानी नाम से जाना जाता है, अभिहित किया जाता है। इसमें ‘व्यक्ति के संदर्भ में समाज को देखने की प्रवृत्ति है।’ रामचन्द्र तिवारी के शब्दों में ‘‘कहानी पढ़ते हुए पहले हमारा ध्यान व्यक्ति पर जाता है। व्यक्ति खोया-खोया, टूटा-टूटा या अपने को अजनबी अनुभव करता हुआ दिखाई पड़ता है। उसकी इस मनःस्थिति का कारण सामाजिक विघटन है। इस प्रकार व्यक्ति से हो कर समाज तक पहुंचते हैं।’’57 

हिन्दी कहानी में गांव और आंचलिकता का चित्रण एवं उसका सौन्दर्य बहुत ही मार्मिक ढंग से हुआ है। जहां गांव का मतलब होता है विभिन्न जातियों व समुदायों के जीवन के बारे वर्णन। ‘भारतीय गांव अलग से सामाजिक इकाई है। उसमें भिन्न-भिन्न जातियां होती है।’ इसका विशद वर्णन प्रेमचन्द की रचनाओं में मिलता है। वहीं आंचलिकता की शुरूआत फणीश्वरनाथ रेणु की ‘मैला आंचल’ से होती है। उनकी कहानियों में अंचल विशेष की जिंदगी सचित्र झांकती है। फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियां ‘लाल पान की बेगम’ और ‘तीसरे कदम उर्फ ‘मारे गये गुलफाम’ इसकी सशक्त उपस्थिति हैं। शेखर जोशी की कहानी ‘कोसी का घटवार’ और शिवप्रसाद सिंह की कहानी ‘कर्मनाशा की हार’ में गांव की छवि पूरी की पूरी उतर कर आयी है। लेकिन नई कहानी तक आते-आते कहानी का कथ्य गांव से अलग कस्बा, नगर और महानगरीय जीवन का हो जाता है। नगरीय जीवन का चित्रण नई कहानी के केन्द्र में रहा है। मोहन राकेश की कहानी ‘ग्लासटैंक’ और कमलेश्वर की कहानी ‘खोई हुई दिशाएं’ में महानगरीय जीवन का सफल चित्रण हुआ है। जिसमें जीवन को विभिन्न संदभों और स्थितियों में दर्शाया गया है। नई कहानी में चित्रित कथा और पात्रें के जीवन के संदर्भ में राजेन्द्र मिश्र ने लिखा है कि ‘‘नई कहानी में स्थितियों का संदर्भ व्यापक रूप से मिलता है और वे केवल पात्र केंद्रित कथाएं नहीं है। जीवन के व्यापक स्तर पर इन पात्रें को रचा गया है।’’58 अर्थात जीवन के विभिन्न संदर्भों में पात्रें को रचा गया है। वह अपनी कमजोरियों के साथ स्थिति एवं परिस्थितियेां के बीच घिरा होता है। नई कहानी की संवेदना मध्यवर्गीय जीवन की संवदेना है। व्यापक फलक पर नई कहानी के पात्र मध्यवर्गीय जीवन से ताल्लुक रखता है। मध्यवर्गीय जीवन के संघर्ष की कहानी ही नई कहानी की संवेदना में व्यापकता से उजागर होती है।

नई कहानी की प्रवृत्तियों को इस प्रकार देखा जा सकता है। यह प्रवृत्तियां कथ्यगत और शिल्पगत दोनों है-कथ्यगत विशेषताएं यथार्थ के प्रति नया रूख, संबंधों के बदलाव का बिन्दु, दांपत्यगत दूरियों की ईमानदार स्वीकृति, नारी पुरूष के प्रकृत काम संबंधों का स्पष्ट स्वीकार, मध्यवर्गी य जीवन और व्यक्ति कहानी के केन्द्र में, महानगरीय जीवन बोध, मूल्यों और मान्यताओं में परिवर्तन, विद्रोह भाव, विदेश से आयातित विचारदर्शनों का प्रभाव मार्क्सवाद, अस्तित्ववाद, पूंजीवाद, व्यक्तिवाद आदि, वैयक्तिक चेतना का प्रकाशन, वैज्ञानीकरण, औद्योगिकीकरण और तकनीकी उन्नति के प्रभाव, विदेशी सभ्यता और संस्कृति का प्रभाव, परिवेश के प्रति जागरूकता, प्रत्येक स्तर पर रोमानीबोध से मुक्ति आदि हैं। वहीं शिल्पगत विशेषताएं भाषा की समर्थ अभिव्यंजना, भाषा का स्वाभाविक अलंकरण, सशक्त बिंब विधान, प्रतीकात्मकता, कथानक के स्थान पर वातावरण परिवेश चित्रण का महत्व, पूर्व दीप्ति पद्धति, समानांतर एवं दुहरे कथानक, पात्रें के नाम और वर्ग का लोप (व्यक्तिवाची संज्ञाओं के स्थान पर सर्वनामों का प्रयोग), निष्कर्षहीन कहानियां(नीति कथाओं जैसे निष्कर्ष नहीं है), कहानी में गद्य की अन्य विधाओं की अंतर्भुक्ति, कहानी में लघुता या दीर्घता (आकार-सीमा) का निषेध आदि हैं।59

नई कहानी के संदर्भ में कमलेश्वर का यह कथन मार्मिक है कि ‘‘स्वतंत्रता के बाद पहली बार नई कहानी ने आदमी को आदमी के संदर्भ में प्रस्तुत किया है, शाश्वत मूल्यों की दुहाई देकर नहीं, बल्कि उस आदमी को उसी के परिवेश में सही आदमी या मात्र आदमी के रूप में अभिव्यक्ति देकर।’’60 अर्थात नई कहानी में व्यक्ति आदमी किसी शाश्वत मूल्यों को लेकर उपस्थिति नहीं हुआ है। वह परिस्थिति और परिवेश से बंधा हुआ है। वह ‘‘मनुष्य को उसके परिवेश में अन्वेषित करती है। और मानव नियति एवं उसके संकट के द्वंद्व को व्यक्त करती है।’’61 ‘‘नई कहानी में मात्र सामान्य मनुष्य ही अवतरित हुआ है, अपनी सारी खामियों, कमियों और अच्छाईयों के संदर्भ में।—नई कहानी का व्यक्ति (या मनुष्य)इन सब विविध अनुभवों के संदर्भ में ज्यादा प्रौढ़ और संयत है, ज्यादा सही और सच्चा औसत आदमी है।’’62 कमलेश्वर के अनुसार ‘‘नई कहानी आग्रहों की कहानी नहीं है, प्रवृत्तियों की हो सकती है और उसका मूल स्रोत है-जीवन का यथार्थबोध और इस यथार्थ को लेकर चलने वाला वह विराट मध्य और निम्न वर्ग है जो अपनी जीवन शक्ति से आज के दुर्दांत संकट को जाने-अनजाने झेल रहा है। उसका केन्द्रीय पात्र है (अपने विविध रूपों और परिवेशों में) जीवन को वहन करने वाला व्यक्ति।’’63 इस प्रकार कहा जा सकता है कि जटिल जीवन यथार्थ की व्यापक स्वीकृति नई कहानी की केन्द्रीय प्रवृत्ति है। जिसमें व्यक्ति की प्रतिष्ठा, छिछली भावुकता का ह्रास, मध्यवर्गीय जीवन चेतना, आधुनिकता बोध, सांकेतिकता आदि को सहज ही पहचान की जा सकती है।

किसी भी विषय वस्तु का सौन्दर्य उसकी सार्थकता में निहित होता है। हिन्दी कहानी की सार्थकता की बात करते हुए नामवर सिंह लिखते हैं कि ‘‘कहानी का यह दुर्भाग्य है कि वह मनोरंजन के रूप में पढ़ी जाती है और शिल्प के रूप में आलोचित होती है। मनोरंजन उसकी सफलता है तो शिल्प सार्थकता। यदि शास्त्रीय आलोचक कहानी को केवल साहित्य रूप समझते हैं तो मूल्यवादी आलोचक उसे जीवन की सार्थक अनुभूतियों के लिए असमर्थ मानते हैं।—आज कहानी की सफलता का अर्थ है कहानी की सार्थकता। आज किसी कहानी का शिल्प की दृष्टि से सफल होना ही काफी नहीं है बल्कि वर्तमान वास्तविकता के सम्मुख उसकी सार्थकता भी परखी जानी चाहिए। जीवन के जिन मूल्यों की कसौटी पर हम कविता, उपन्यास आदि साहित्य रूपों की परीक्षा करते हैं, उन्हीं पर कहानी की भी परीक्षा होनी चाहिए। इससे कहानी समीक्षा का एक ढांचा तो तैयार होगा ही_ साथ-साथ मानवीय मूल्यों के संबंध में हमारा ज्ञान भी बढेगा और संपूर्ण साहित्य के मानों की अपर्याप्तता भी क्रमशः कम होगी।’’64 

हिन्दी कहानी की आलोचना में कहानी के भाषा-शिल्प सौन्दर्य पर लगातार बल दिया जाता रहा है। नामवर सिंह के अनुसार, ‘‘कहानी शिल्प संबंधी आलोचनाओं ने कहानी की जीवनी शक्ति का अपहरण कर उसे निर्जीव ‘शिल्प’ ही नहीं बनाया है बल्कि उस शिल्प को विभिन्न अवयवों में काटकर बांट दिया है। लिहाजा, हम कहानी को ‘कथानक’, ‘चरित्र’, वातावरण’, भावनात्मक प्रभाव’, विषयवस्तु’, आदि अलग-अलग अवयवों के रूप में देखने के अभ्यस्त हो गये है।’’65 वर्तमान कहानियों में जहां कहीं शिल्पवादी प्रवृत्ति का अतिरेक दिखाई पड़ता है, उसका संबंध किसी न किसी रूप में कहानी की विभक्त धारणा से अवश्य है। ‘‘यदि कोई कहानीकार शिल्प के किसी विशेष अवयव की रचना करके सफलता का ढोल पीटता है तो यही समझना चाहिए कि वह कहानी को एक शिल्प समझता है।’’66 नामवर सिंह के अनुसार ‘‘कहानी का मूल तत्व कहानीपन है। लय की तरह कहानी कहना मनुष्य की काफी पुरानी कलात्मक वृत्ति है और इसकी रक्षा अपने आप में स्वयं भी एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्य है और इतिहास से प्रमाणित होता है कि नीति, लोक-व्यवहार, धर्म, राजनीति आदि विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस कला का उपयोग करते हुए भी मानव-जाति ने आज तक इसकी रक्षा की है। निःसंदेह इस कला का चरम विकास आधुनिक युग में हुआ जब उद्देश्य और कहानीपन दोनों घुल-मिलकर इस तरह हो गये कि उद्देश्य से अलग कहानी के रूप की कल्पना भी कठिन हो गई।’’67 अर्थात कहानी के उद्देश्य में ही उसका सौन्दर्य छिपा होता है। कहानीपन उसका अनिवार्य तत्व है। ‘कहानी की कहानीपन की सफलता का अर्थ है उनकी अर्थवत्ता या सार्थकता।’ कहानियों का अध्ययन केवल सोद्देश्यकता की पृष्ठभूमि में ही किया जा सकता है।68 अंतर्विरोध को उसकी संपूर्ण तीव्रता में ग्रहण करके ही किसी कहानी को सफल और सार्थक बनाया जा सकता है।69 

नई कहानी में संप्रेषणीयता का सवाल महत्वपूर्ण सवाल बन कर उभरा है। संप्रेषणीयता’ की कठिनाई केवल भाषा या साहित्यिक माध्यम की कठिनाई नहीं है, बल्कि किसी गहरे सांस्कृतिक संकट का लक्षण है। नामवर सिंह के अनुसार ‘‘नई कहानी का समूचा रूपगठन(स्ट्रक्चर) और शब्द गठन(टैक्स्चर) ही सांकेतिक है।’’70 ‘प्रभावान्विति’ कहानी में उतनी पुरानी है जितनी स्वयं आधुनिक कहानी। किंतु प्रभाव की संपूर्ण अन्विति को सांकेतिक बनाने का श्रेय एकदम नई कहानी को है। नई कहानी संकेत करती नहीं, बल्कि स्वयं संकेत है।’ नई कहानी में वातावरण अंतःकरण है। वातावरण निर्माण में नये कहानीकार प्रायः बिम्ब विधान का सहारा लेते हैं। नामवर सिंह के अनुसार ‘‘नई कहानी के प्रसंग में यदि ‘संप्रेषणीयता’ का कोई अर्थ हो सकता है, तो रस-बोध के विविध स्तरों की प्रेषणीयता।’’71 ‘कहानी में प्रतीक और संकेत का एक दूसरा पहलू यह भी है कि वह कहानी को विचार शून्य करता है। यह एक बड़ा संकट है साहित्य में कहानी के लिए।’72 ‘प्रतीक संकेत की पद्धति से भाषा में जहां एक ओर अर्थवत्ता आयी है, वहां दूसरी ओर उस पर अनावश्यक काव्यात्मकता का लदाव भी हुआ है।’’73 

इस प्रकार हिन्दी कहानी में नई कहानी के बाद आंदोलन के तौर पर, अकहानी, सहज कहानी, सक्रिय कहानी, जनवादी कहानी और समकालीन आदि की अवधारणा आती है। राजेन्द्र मिश्र के अनुसार ‘‘वस्तुतः 1950 से नयी कहानी का स्वरूप सामने आया है। 20वीं शताब्दी के अंतिम 50 वर्षों में कविता के समान कहानी के भी अनेक आंदोलन चले हैं। यदि गहराई से देखा जाये तो वे सभी नयी कहानी का ही अलग-अलग रूपों में विस्तार है। सामाजिक स्थितियों और व्यक्ति मनोविज्ञान के आधार पर उन्हें रचा गया है। भारत जैसे गरीब देश में आर्थिक विषमता बहुत गहरी है और कहानियों के माध्यम से उसे विभिनन आंदोलनों का नाम देकर भी वर्ग संघर्ष को उभारा गया है। रोमानी भाव की वजाय कहानियों में वर्ग संघर्ष को अधिक चित्रित करने का प्रयास उसे सामाजिक यथार्थवाद से जोड़ने का ही उपक्रम है। कहानी के आंदोलनों का आधार शिल्पगत उतना नहीं है जितना कि वह विचारगत है। कहानी का विषय भी व्यापक होता गया है और निम्न-से-निम्न वर्ग के जीवन पर भी कहानी लिखी जाती है। आभिजात्य की बजाय वह यथार्थ से जुड़ी है। अतः कहानी के विभिन्न आंदोलन अलग-अलग न होकर उस नयी कहानी का ही विस्तार हैं जिसे हम आज की कहानी भी कह सकते हैं।’’74

समकालीन कहानी आंदोलन के पृष्ठभूमि में 1965 की राजनैतिक चेतना है और उसकी चुनौतियां हैं। समकालीन कहानी का उद्देश्य ‘‘समाजवाद की स्थापना के लिए वर्तमान चरण में मजदूर किसान की मित्रता के आधार पर सच्चे जनतंत्र की स्थापना। समकालीन कहानी इसे समझते हुए इसके लिए संघर्षरत है। यह साम्प्रदायिक संकीर्णता, जातिवाद, विघटनवाद और अंध राष्ट्रवाद और भाषा तथा क्षेत्रीयता के नाम पर हमारी जनता और राष्ट्र की एकता को तोड़नेवाली शक्ति का पूरी शिद्दत से विरोध करता है।’’75 समकालीन भारतीय समाज धर्म, जाति, उपजाति, नस्ल जैसे संकीर्ण खानों में बांटता जा रहा है। इन खानों को मिटाने की कोशिश हम सालों से कर रहे हैं। इसका प्रत्यक्ष उत्तरदायी हमारे राजनीतिक एवं धार्मिक नेताओं की स्वार्थता और तंग दृष्टि ही है। ‘‘समकालीन कहानी के केंन्द्र में जो आम आदमी है, उनकी दुनिया धर्म और साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वालों से अलग है, उनसे घृणा करती है, उनकी नैतिकता पर शक करती है, उनके देशप्रेम की वास्तविकता की पड़़ताल करती है और साथ ही उनकी ईमानदारी की धज्जियां उड़ाती है।’’76 अर्थात समकालीन विमर्श के दौर में धर्म और साम्प्रदायिकता की राजनीति की पड़ताल करती है हिन्दी कहानी का सौन्दर्य और एक मानुषसत्य की ओर बढ़ने की चाहत पैदा करती है।

निष्कर्षः

इस प्रकार देखा जा सकता है कि हिन्दी कहानी का सौन्दर्य एक विकास प्रक्रिया में लगातार बदलता रहा है। इस बदलाव की प्रक्रिया में प्रेमचन्द की संवेदना और रचनात्मक कला की भूमिका अहम रही है। लेकिन उसके बाद कहानी की संवेदना मध्यवर्गीय जीवन से जुड़ती गई। उनकी इच्छा, आकांक्षाओं को ही व्यक्त करती है। ‘‘प्रेमचन्दोत्तर कहानी विशेषकर नई कहानी मूलतः मध्यवर्गीय नगरीय जीवन के यथार्थ से जुड़ी रही है। इस कहानी का संसार मानव-मानव के बनते बिगड़ते संबंधी और उनके बदलते मूल्यों की तलाश, परंपराबोध और आधुनिकता की टकराहट, सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों से उत्पन्न मानवीय विकृतियों को भोगे हुए यथार्थ के धरातल पर चित्रित करता है। इतना होते हुए भी दलित इन कथाकारों द्वारा नजर अंदाज कर दिया गया। सातवें दशक की कहानी में भी दलित चेतना को उभारने का प्रयास नहीं किया गया। हिन्दी कथा साहित्य में दलित चेतना की अभिव्यक्ति के दृष्टिकोण से आठवां दशक महत्वपूर्ण है।’’77 अर्थात हिन्दी में दलित चेतना का लेखन सन् 1980 के आस-पास से शुरू होता है। दलित जीवन से संबंधित रचनाएं हिन्दी साहित्य में मिलती रही हैं लेकिन उसकी संवेदना सहानुभूति की रही है दलित चेतना की नहीं। दलित जीवन से संबंधित रचनाएं जिसकी विरासत प्रेमचन्द ने आने वाली पीढ़ी को सौंपा उसका वहन परवर्ती हिन्दी लेखकों की रचनाओं में नहीं के बराबर मिलती हैं। राजनीति स्तर पर दलितों की समस्याएं उजागर होती रही हैं लेकिन हिन्दी में रचनात्मक स्तर पर दलितों की समस्याओं का चित्रण मुकम्मल तौर पर नहीं हुआ है। यदि कहीं हुआ भी है तो सहानुभूति के स्तर पर उसका चित्रण हुआ है। उनमें चेतना की कमी है। दलित लेखन दलित चेतना और आंदोलन की उपज है। प्रेमचन्द साहित्य में जिस सौन्दर्य की कसौटी बदलने की बात कर रहे थे, उसकी कमी हिन्दी कहानी लेखन में है, उसका सौन्दर्य जरूर बदल गया है लेकिन उसकी तीव्रता प्रेमचन्द की साहित्य की कसौटी नहीं रही है। प्रेमचन्द साहित्य में जिस सौन्दर्य मूल्यों की स्थापना करते रहे और साहित्य की कसौटी को बदलने की बात करते रहे हैं। जिन साहित्यिक मूल्यों को आने वाली पीढ़ी को सौपा, वह वहीं के वहीं रह गया। प्रेमचन्द की विरासत उनकी लेखनी की अंतिम सांसों के साथ ही थम गई। आने वाला समय अपने ढंग से साहित्य की संवेदना और सौन्दर्य को रेखांकित करने लगा। उसे संचित करने लगा। कहानी का सौन्दर्य जिस व्यापकता में प्रेमचन्द की रचना में रचा-बसा है। उसका विकास हिन्दी में नहीं हो सका। सौन्दर्य की जिन कसौटी को प्रेमचन्द ने साहित्य में जगह दी थी, उसका ह्रास प्रेमचन्द युग में देखा जा सकता है। नई कहानी का सौन्दर्य स्वाधीनता के मोहभंग और आर्थिक निर्भरता या फिर स्त्री-पुरुष संबंधों में खो गया। सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास सामाजिक जड़ता की ओर संकेत है और हिन्दी कहानी का सौन्दर्य स्वाधीनता के साथ इसी का शिकार है। नई कहानी का सौन्दर्य वैचारिकता की दृष्टि से बहुत ही कमजोर रही है। राजनीति विचारों का नई कहानी में जगह नहीं मिलना उसी का परिणाम है। सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों एवं विचारों की दृष्टि से नई कहानी और उसके बाद की कहानी का सौन्दर्य सामाजिक फूहड़ता का शिकार रहा है। यही कारण है सामाजिक-सांस्कृतिक संसाधनों पर ब्राह्मणवादी मानसिकता की कब्जा रही है और वे मूल्यों के नियंता रहे हैं। कहानी का सौन्दर्य इस जड़ता, फूहड़ता और नियंता को समाप्त कर सकता था लेकिन ऐसा करने में सक्षम नहीं रहा। समय सापेक्ष कहानी की संवेदना का स्वरूप बदलता रहा है लेकिन सौन्दर्यबोध सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों की सामाजिकता से बाहर रहा है। जिसकी पूरी संभावना थी कि स्वाधीन भारत में समाज के सभी समुदाय की संवेदनाएं, समस्याएं, इच्छाएं, आकांक्षाएं और स्वप्नों की अभिव्यक्ति होगी और उसके मूल्यों का सौन्दर्य भारत को नये क्षितिज पर पहुंचाएगा। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कहानी के सौन्दर्यबोध में इतिहासबद्ध समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना हो रही है।

 

संदर्भ ग्रंथसूची:

1- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 45

2- रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी, संवत, 2058, पृ- 267 भारतेन्दु मंडल मनोरंजक साहित्यनिर्माण द्वारा हिन्दी गद्य साहित्य की स्वतंत्र सत्ता का भाव ही प्रतिष्ठित करने में अधिकतर लगा रहा।

3- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 55

4- प्रेमचन्द, साहित्य का उद्देश्य, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 2001, पृ- 47

5- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 55

6- प्रेमचन्द, साहित्य का उद्देश्य, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 2001, पृ- 47

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8- वही, पृ- 80

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23- डॉ- सुभाष चन्द्र दलित मुक्ति आंदोलनःसीमाएं और संभावनाएं, आधार प्रकाशन, पंचकूला, 2010, पृ- 30

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30- वही, पृ- 77

31- रामविलास शर्मा, प्रेमचन्द और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1989, पृ- 115

32- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 85

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47- डॉॅ- नंद कि}ाोर नीलम, सौन्दर्य}ाास्त्र के बदलते प्रतिमान और समकालीन कहानी का चरित्र, दस्तक, बारह, पृ- 95

48- प्रेमचन्द, साहित्य का उद्देश्य, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 2001, पृ- 20

49- डॉॅ- नंद कि}ाोर नीलम, सौन्दर्य}ाास्त्र के बदलते प्रतिमान और समकालीन कहानी का चरित्र, दस्तक, बारह, पृ- 96-97

50- वही, पृ- 98

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52- डॉ- राजेन्द्र मिश्र, कहानी आंदोलन और प्रवृत्तियां, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009, पृ- 11

53- कमलेश्वर, नई कहानी की भूमिका, अक्षर प्रकाशन, दिल्ली 1969, पृ- 32

54- राजेन्द्र यादव, कहानी स्वरूप और संवेदना, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृ- 79

55- महोन राकेश, नया बादल, भारतीय ज्ञानपीठ, काशी, 1957, पृ- 7

56- पुष्पपाल सिंह, समकालीन कहानी: नया परिप्रेक्ष्य, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, 2011, पृ- 89

57- डॉ- रामचन्द्र तिवारी, हिन्दी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 2009, पृ- 302

58- डॉ- राजेन्द्र मिश्र, कहानी आंदोलन और प्रवृत्तियां, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009, पृ- 14

59- पुष्पपाल सिंह, समकालीन कहानी: नया परिप्रेक्ष्य, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, 2011, पृ- 117

60- कमलेश्वर, नई कहानी की भूमिका, अक्षर प्रकाशन, दिल्ली, 1969, पृ 70

61- वही, पृ- 143

62- वही, पृ- 171

63- कमलेश्वर, मांस का दरिया, आत्मकत्य, पृ- 7

64- नामवर सिंह, कहानी नयी कहानी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2002, पृ- 19

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72- वही, पृ- 35

73- वही, पृ- 36

74- डॉ- राजेन्द्र मिश्र, कहानी आंदोलन और प्रवृत्तियां, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009, पृ- 35

75- डॉ राजेन्द्र कुमार साव, समकालीन हिन्दी कहानी में सांप्रदायिकता के प्रतिरोधी स्वर, कथाक्रम, जुलाई सितम्बर 2013, पृ- 62

76- वही, पृ- 65-66

77- एन- सिंह, दूसरी दुनिया का यथार्थ, सं- रमणिका गुप्ता, नवलेखन प्रकाशन, हजारीबाग, 1997 पृ- 15

 

हिन्दी कहानी का सौन्दर्य : चिंतन और विश्लेषण – डॉ. प्रवीण कुमार

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हिन्दी कहानी का सौन्दर्य : चिंतन और विश्लेषण

डॉ. प्रवीण कुमार
हिंदी विभाग,
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय,
अमरकंटक मध्यप्रदेश-484887
मो- 09424895615/9752916192
ई-मेलः pravinkmr05@gmail.com

सारांशः

प्रस्तुत शोधपत्र हिन्दी कहानी के बदलते सौन्दर्य को रेखांकित करता है। कहानी की संवेदना अपनी आरंभिक काल से जनचेतना को कैसे प्रभावित करती रही है और उसका विकास मौखिक से लिखित होने की प्रक्रिया में कैसे हुआ। इसकी रूपरेखा इस शोधपत्र में दिया गया है। प्रेमचंदपूर्व, प्रेमचंदयुगीन और प्रेमचंदोत्तर हिन्दी कहानी की न केवल संवेदना बदली है बल्कि उसका सौन्दर्यबोध भी बदलता गया है। प्रस्तुत शोधपत्र में इसकी खोज का एक प्रयास किया गया है।

की वर्डः सौन्दर्य, सौन्दर्यबोध, जीवनमूल्य, अनुभूति, संवेदना, प्रेम, आदर्शवाद, यथार्थवाद, मानवतावाद।   

विषय विस्‍तारः

रचना की प्रक्रिया और संवेदना सौन्दर्य की चेतना पैदा करती है। रचना की प्रकृति, संवेदना, स्वरूप और सौन्दर्य समय सापेक्ष समाज में होने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन और बौद्धिक प्रकृति पर निर्भर करता है। रचना में निजी अनुभव न केवल रचना की प्रामाणिकता को रेखांकित करता है बल्कि उसके सौन्दर्य को प्रौढ़ता प्रदान करता है वहीं संवेदना की निजता सहृयता की भावना पैदा करती है। समय सापेक्ष विकास क्रम में कहानी की संवेदना लगातार बदलती रही है। इसी ऐतिहासिक विकास यात्र में हिन्दी कहानी के सौन्दर्य का अध्ययन किया जा सकता है। कहानी की परंपरा मानव सभ्यता-संस्कृति में आदिकाल से ही है। प्रत्येक देश के साहित्य में यह परंपरा अक्षुण रूप से विद्यमान है। हिन्दी गद्य साहित्य के जन्म के साथ ही हिन्दी कहानी का उदय आधुनिक चेतना के साथ हुआ है। प्रारंभ में हिन्दी कहानी का सौन्दर्य व्यवस्थित नहीं रहा है। हिन्दी कहानी की प्रारंभिक अवस्था के सौन्दर्य को इस बात से भी समझा जा सकता है। जैसा कि गोपाल राय लिखते हैं कि ‘‘उन्नीसवीं सदी के अंत तक साहित्यिक विधा के रूप में कहानी की कोई पहचान नहीं बनी थी। उसके लिए काई निश्चित संज्ञा भी स्थिर नहीं हुई थी।’’1 अर्थात किसी भी विधा की अस्थिरता के कारण उसकी जो संवेदना और सौन्दर्य होता है वही स्थिति कहानी के प्रारंभिक अवस्था में देखी जा सकती है। तदंतर पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से 20वीं शताब्दी के प्रथम दशक में हिन्दी कहानी की लेखन परंपरा शुरू होती है। इसी क्रम में हिंदी कहानी के सौन्दर्य की खोज का एक प्रयास इस शोधपत्र में किया जा रहा है।  

प्रारंभिक हिन्दी कहानी का स्वरूप मनोरंजनात्मक था। इंशा अल्ला खां कृत ‘रानी केतकी की कहानी’, मुंशी नवल किशोर द्वारा सम्पादित ‘मनोहर कहानी’ (1880), और चण्डी प्रसाद सिंह कृत ‘हास्य रतन’ (1886), आदि कहानी संग्रह मनोरंजन प्रधान, स्वप्न कथाओं के रूप में पाठक के सम्मुख आते हैं। इस काल खण्ड (भारतेन्दु युग2) की कहानियों के माध्यम से नीतिप्रद शिक्षा, पाप-पुण्य, पुनःजन्म आदि की व्याख्या की जाती थी। कहानी की संवेदना के विकास और उसकी प्रवृत्तियां का युग सापेक्ष अध्ययन ही किया जा सकता है। ‘‘कथा आनादि काल से ही काल्पनिक और मौखिक होती थी। लिखित रूप प्राप्त करने के बाद उसका यह नाम बना, यद्यपि आख्यान उपाख्यान, चरित, वृतांत, पुराण आदि संज्ञाएं भी प्रयोग में आयीं। बाद में एक ऐसा कथा रूप भी सामने आया, जिसका आधार ख्यात अथवा ऐतिहासिक वृत्त होता था। ऐसे ही कथा रूप को आख्यायिका की संज्ञा दी गयी।’’3 सरस्वती में कथा विधा के लिए इसी ‘आख्यायिका’ शब्द का चयन किया गया था। आख्यायिका की संवेदना प्रेमचन्द के शब्दों में ‘‘प्राचीन आख्यायिका कुतूहल होती थी या अध्यात्म-विषयक।’’4 आख्यायिका की संवेदना संघर्ष का सौन्दर्य नहीं उत्पन्न करती है। ‘‘मौखिक रूप से चली आती कथा का कथ्य केवल केवल कौतूहलजन्य मनोरंजन, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से व्यंजित या कथित उपदेश और यत्किंचित भाव बोध होता था। अख्यायिका संज्ञा से अभिहित और प्रकाशित होने वाली रचनाओं में कौतूहलजन्य मनोरंजन गौण होन लगा और उपदेश के स्थान पर विचार, भावबोध और यथार्थ चित्रण को केन्द्रीयता प्राप्त होने लगी। यह प्रक्रिया एक दो दशक तक ही नहीं बहुत बाद तक चलती रही और आज भी चल रही है। भाव बोध को संवेदना का क्षण बनने में तो और भी देर हुई।’’5 इस प्रकार कहा जा सकता है कि कहानी भावबोध की संवेदना के क्षण की अभिव्यक्ति होती है। यह भावबोध ही वर्तमान कहानी को प्राचीन कहानी से अलग करती है। प्रेमचन्द के अनुसार ‘‘वर्तमान कहानी(आख्यायिका) मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और जीवन के यथार्थ और स्वाभाविक चित्रण का अपना ध्येय समझती है। उसमें कल्पना की मात्र कम और अनुभूतियों की मात्र अधिक होती है। इतना ही नहीं बल्कि अनुभूतियां ही रचनाशील भावना से अनुरंजित होकर कहानी बन जाती है।’’6 इसी से कहानी की संवेदना और सौन्दर्य की अवधारण स्पष्ट होती है। हिन्दी में कहानी की ऐसी अवधारणा का स्वरूप प्रेमचन्द और उनके समकालीन कहानीकारों के लेखन में स्पष्ट अभिव्यक्त और परिमार्जित होता है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि प्रथम दो दशक के बीच की कहानियों में कहानी की संवेदनात्मक अवधारणा नहीं थी। वह बनने की प्रक्रिया में सक्रिय थी। इस दशक की कहानियों में साहित्यिक, राजनीतिक और राष्ट्रीय जागरण का स्वर दिखाई देता हैै। इसी दशक में जयशंकर प्रसाद की पहली कहानी ‘ग्राम’ (1911ई) और 1915 में चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कालजीवी कहानी ‘उसने कहा था’, प्रकाशित हुई। मार्के की बात है कि प्रेमचंद की पहली हिन्दी कहानी ‘सौत’ भी इसी दशक में 1915 में प्रकाशित हुई है। यह दशक भारतीय समाज में बहुत ही उल्लेखनीय है। राजनीतिक में गांधी और डॉ- अम्बेडकर का प्रवेश होता है और हिन्दी साहित्य में प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद का आगमन होता है। राजनीतिक संदर्भ में राष्ट्रीय जागरण की लहर थी। जिसका स्वर हिन्दी साहित्य में भी सुनाई पड़ता है। इस दशक की कहानियां न केवल राजनीतिक दृष्टि से बल्कि साहित्यिक दृष्टि से भी उल्लेखनीय रही है।

समय सापेक्ष विकास क्रम में कहानी की संवेदना लगातार बदलती रही है। कहानी की संवेदना के बदलते स्वरूप में कहानीपन का लोप कभी नहीं हुआ है। वह गंभीरता से साथ उभरती रही है। आधुनिक कहानी से पूर्व कहानी में यथार्थ की अभिव्यक्ति काल्पनिक तौर पर भी हुआ है। पुष्पपाल सिंह के शब्दों में, ‘‘इससे पूर्व के साहित्य में भी यथार्थ-चित्रण के महत्व को एक भिन्न दृष्टिकोण के साथ स्वीकारा गया है। वहां जीवन की वास्तविकता यथार्थ न होकर कल्पित है।’’7 अर्थात विकासक्रम में कहानी की संवेदना समय-सापेक्ष बदलती चली गई और उसका सौन्दर्य यथार्थवाद से संबद्ध होता चला गया। कहानियां कहानीकार की निजी और विशिष्ट दृष्टि के अनुरूप अपना स्वरूप बदलती रही। अब वह ‘‘मनुष्य के सामने कल्पना के बल पर आदर्शों का लोक एवं तिलस्म का कुतूहल खड़ा नहीं करती, अपितु वह जीवन-संघर्ष में समस्याओं से जूझते मनुष्य की सहगामिनी अथवा सहयात्री है। आधुनिक कहानी मनुष्य की जिंदगी की संपूर्ण विसंगतियों, भावनाओं एवं विवशताओं के साथ अपने पाठक का साक्षात्कार कराती है।’’8 इस प्रकार कहानियां यथार्थवाद की ओर झुकती चली गई। कहानी यथार्थ की प्रामाणिक अनुभूति की उपज बनती चली गई। यथार्थ के प्रामाणिक चित्रण पर बल देने के कारण जीवन के शाश्वत मूल्यों और आस्थाओं की प्रस्थापनाओं की कमी नई कहानी के सफर तक में देखने को मिलने लगी। अपितु केवल वर्तमान और जीवन की तत्कालिक स्थितियों से साक्षात्कार कराना ही कहानी का ध्येय हो गया। ‘‘आज वह हमें आदर्श का पाठ पढ़ाकर एक नया मनुष्य बनाने का उपक्रम नहीं करती अपितु यह जीवन की समस्त विसंगतियों एवं भयावह यथार्थ से गहरी पहचान कराकर उन स्थितियों पर चोट करती है, जो इन विसंगतियों एवं यथार्थ की भयावहता के लिए उत्तरदायी हैं और अपने इसी रूप में वह जीवन को या मनुष्य को बेहतर बनाने, उदात्त की ओर ले जाने का प्रयत्न सिद्ध होती है।’’9 अर्थात कहानी का सौन्दर्य लगातार विकास क्रम में परिमार्जित व परिष्कृत होता रहा है।

‘‘प्रेमचंद पूर्व युग की आधुनिक हिन्दी कहानी गुण और परिमाण, दोनों ही दृष्टियों से विशेष महत्वपूर्ण नहीं है। इस युग की कहानी आदर्शवादी रही है। वह कहानी में संस्कृत कथाओं के समान ही उपदेशात्मक वृति और नीति कथाओं जैसे निष्कर्ष और आदर्श प्रस्तुत करने की चेष्टा करता है। किंही निश्चित सिद्धांतों, उपदेशों और निष्कर्ष की संपूर्ति और संपुष्टि के निमित्त ही कहानी गढ़ी जाती थी। यहां किसी आदर्श को निश्चित करके उसी को सिद्ध करने के लिए कहानी का निर्माण होता था, सृजन नहीं।’’10 इस सृजन और गढ़ने की प्रक्रिया के कारण हिन्दी कहानी में सौन्दर्य का स्वरूप भिन्न रहा है। वह यथार्थवादी न हो कर आदर्शवादी रहा है। कल्पना से गढ़ा हुआ रहा है, अनुभूति की प्रामाणिक अभिव्यक्ति का सृजन नहीं। हरा ‘‘संस्कृत कथाओं और लोककथाओं के अनुकरण पर लिखी इन कहानियों में अलौकिक और आकस्मिक संयोग, अद्भुत तत्व और कुतूहल का प्राधान्य है। निश्चित सिद्धांतों और आदर्शों की पूर्ति के निमित्त कहानी गढने के कारण कल्पना का प्राधान्य होता था। कल्पना के इसी प्राधान्य के कारण कहानी में विश्वसनीयता नहीं थी, अपितु झूठ की हद तक कल्पना का प्रयोग होता था।’’11 वहीं परमानंद श्रीवास्तव ‘हिन्दी कहानी की रचना प्रक्रिया’ में लिखते हैं कि ‘‘वस्तुतः सामाजिक यथार्थ का वह बोध इन कहानियों में है ही नहीं, जो सामयिक जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा कर सकता है।’’12 यथार्थबोध की कमी के कारण हिन्दी कहानी में जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा नहीं हो सकी। जिसकी दरकार कहानी में होती है।

साहित्य जगत में प्रेमचंद के आगमन ने हिन्दी साहित्य के स्वरूप और उसकी संवेदना के साथ-साथ उद्देश्य तथा सौन्दर्य को भी परिवर्तित किया है। साहित्य सामाजिक यथार्थ के साथ-साथ मानव मन की वृत्तियों से जुड़ने लगा। दूसरे शब्दों में साहित्य और मनोविज्ञान का समन्वय होने लगा। यही समन्वय कहानी को पूर्व से अलग करता है। डॉ- रामचन्द्र तिवारी के अुनसार ‘‘हिन्दी की प्रारंभिक कहानियों में कथानक का विकास आकस्मिक एवं दैवी घटनाओं पर निर्भर करता था। विकास-युग में यह कथा विकास चरित्रें की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं द्वारा होने लगा। मनोवैज्ञानिक कथानकों का सूत्रपात प्रेमचंद की प्रथम कहानी ‘पंचमेश्वर’ से होता है।’’13 सन् 1925 ई तक हिन्दी कहानियों की दो स्पष्ट धाराएं परिलक्षित होने लगीं। प्रथम धारा यथार्थवादी दृष्टिकोण को स्पर्श करती हुई जीवन के व्यावहारिक पक्ष को भी लेकर विकसित हुई। इस धारा के अंतर्गत प्रेमचंद, सुदर्शन, विश्वभरनाथ शर्मा ‘कौशिक’, ज्वालादत्त शर्मा तथा चंद्रधर शर्मा गुलेरी प्रमुख हैं। दूसरी धारा आदर्श प्रधान प्रवृत्ति से प्रेरित होकर भाव-सत्य को लेकर आगे बढ़ी। इस धारा के अंतर्गत जयशंकर प्रसाद, चंडीप्रसाद ”दयेश तथा राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह आदि प्रमुख हैं।

प्रेमचन्द युग में आकर कहानी की सवंदेना और स्वरूप दोनों बदल गया। प्रेमचन्द ने सर्वप्रथम कहानी को काल्पनिकता से मुक्त कर सामाजिकता से संसिक्त किया। इस कारण हिन्दी कहानी का रूख अपने परिवेश और यथार्थ की ओर उन्मुख हुआ। अब कहानी में कल्पना या स्वर्णिम अतीत के इतिहास का लोक नहीं अपितु कहानीकार के चारों ओर फैला लोक, समाज और परिवेश चित्रित होने लगा। साहित्य में बौद्धिकता का प्रवेश होने लगा। बौद्धिकता के कारण कहानी स्वतः ही पूर्णतः काल्पनिक पात्रें एवं चरित्रें को अस्वीकृत करने लगी। उसमें मनोवैज्ञानिक विश्लेषण अनुभूति, प्रवणता और यथार्थ के तत्वों का समाहार होने लगा। प्रेमचन्द यथार्थ को कहानी में पूर्णतः यथावत रूप में उतार देने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं। वे यथार्थ को निजत्व की परिधि में लाकर पुनर्सृजित करने की बात प्रकारांतर से कहते हैं।, ‘‘अगर हम यथार्थ को हू-ब-हू खींचकर रख दें तो उसमें कला कहां है? कला केवल यथार्थ की नकल का नाम नहीं है। कला दिखती तो यथार्थ है, पर यथार्थ होती नहीं। उसकी खूबी यही है कि वह यथार्थ न होते हुए भी यथार्थ मालूम हो।’’14 बाद के वर्षों में प्रेमचन्द की कहानी में आदर्श से मोहभंग दिखता है। आदर्श से यथार्थ की जमींन की अभिव्यक्ति होती है। यही से कहानी में ‘नई’ की शुरूआत होती है। यह नई अलग दुनिया की नहीं है, बल्कि इसी समाज में नवीनता का बोध है। जहां एक था राजा से एक है आदमी का सफर दास्तान शुरू होता है।

आधुनिक कहानी की संवेदना प्राचीन कहानी की संवेदना से बिल्कुल भिन्न है। आधुनिक कहानी की संवेदना उद्देश्य, कथावस्तु, रचनातंत्र, शैली, ढंग, सभी कुछ बदल चुका है। अब कहानी का क्षेत्र अतीत में ‘क्या हुआ था’ की जगह आज हमारे बाह्य और आंतरिक जीवन में क्या हो रहा है, कैसे हो रहा है, क्यों हो रहा है आदि हो गया है। मुख्य रूप से कथा कहना और यत्किंचित उपदेश देना या किसी भाव को व्यक्त करना ही प्रथम और दूसरे दशक की कहानियों का लक्ष्य रहा है। गोपाल राय के शब्दों में 20वीं सदी के प्रथम दशक की हिन्दी कहानी का सौन्दर्य इस प्रकार है। ‘‘किसी विधा के आरंभिक दौर में कथ्य और शिल्प विषयक जो अस्थिरता हो सकती है, वह इस दशक की कहानियों में भी देखने को मिलती है। कहानीकारों के सामने अंग्रेजी की छोटी कहानी का आदर्श तो शायद था, पर उसके अनुरूप न तो कथा भाषा विकसित हुई थी न ही यथार्थ की संवेदना।’’15 औपनिवेशिक काल में हिन्दी कहानी का सौन्दर्य राजनीतिक मुक्ति की आकांक्षा की रही है। प्रेमचन्द और उनके समकालीन रचनाकारों में औपनिवेशिक शासनव्यवस्था से मुक्ति की संघर्ष देखा जा सकता है। इसी मुक्ति की अवधारणा के तहत रचनाकारों ने नाम बदलकर रचना कर रहे थे। औपनिवेशिकसत्ता व्यवस्था में शायद यही एक तरीका था मुक्ति के लिए। क्योंकि औपनिवेशिक सत्ता यह चाहती थी आम जनता में मुक्ति की अवधारणा किसी भी हालत में न पहुंच सके। 20वीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक के बीच की कहानियों में राष्ट्रीय चेतना का भाव दिखाई पड़ता है। प्रेमचन्द का ‘सोजेवतन’ इसका उदाहरण है। गोपाल राय के अनुसार ‘‘यहां प्रेमचन्द राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति के लिए उस प्रच्छन्न तरीके का इस्तेमाल करने लगते हैं, जिसे अंग्रेजी में विकेरियन नेशनलिज्म कहा जाता है। दमन और आतंक के सहारे चलनेवाले औपनिवेशिक शासन में लेखकों के लिए अपनी राष्ट्रीय भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए यही रास्ता बचा रहता है।’’16 जनमानस को जागृत करना इस काल की कहानियों का मुख्य लक्ष्य रहा है।

मुक्ति की अवधारणा में मानव मात्र की कल्पना अतिआवश्यक था। भारत में पुनर्जागरण ब्रिटिश शासन व्यवस्था के साथ शुरू होता है। जिसमें एक तरफ राजा महाराजाओं, जमींदार, महाजन और उस समय के बुद्धिजीवियों आदि के अपने स्वार्थ जरूर था लेकिन औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति की आंकाक्षा में आमजन का स्वर भी निहित था। वे भी अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे। ‘‘प्रेमचन्द भारतीय पुनर्जागरण को उसके व्यापक संदर्भ में देखते थे। वे समझते थे कि देश को औपनिवेशिक गुलामी से तभी मुक्ति मिल सकती है, जब पूरा देश सामाजिक दृष्टि से, लिंग-भेद, धर्म-भेद, जाति-भेद आदि के अंतर्विरोधों से मुक्त हो। उस समय के समाज में स्त्री, पुरुष की तुलना में, हर प्रकार से हीनतर स्थिति में जीवनयापन करती थी। पारिवारिक सम्पत्ति में अधिकार की दृष्टि से, शिक्षा की दृष्टि से, अपने बारे में निर्णय लेने की दृष्टि से, नैतिक संहिता की दृष्टि से, उसकी स्थिति पुरुष की तुलना में दासों जैसी थी। वही स्थिति दलितों की सवर्णों की तुलना में थी। हिन्दू-मुसलमान का साम्प्रदायिक भेद भी अपने चरम पर था। औपनिवेशिक शासन अपनी सुदृढ़ स्थिति के लिए भारतीय समाज के इन अंतर्विरोधों को बरकरार ही नहीं रखना चाहता था, बल्कि इन्हें और भी बढ़ाने में प्रयत्नशील था।’’17 

प्रेमचन्द्र आदर्शोन्मुख यथार्थवादी रचनाकार रहे हैं। जीवन के यथार्थ सत्य की शोध करना और उसका कलात्मक आकलन करना ही उनका उद्देश्य रहा है। वह समग्र जीवन के चितेरा हैं, इसलिए उन्होंने हर वर्ग और सामाजिक स्थिति के लोगों की कहानियां लिखी हैं। हर शैली का प्रयोग किया है लेकिन मनुष्य के अंतर्बाह्य जीवन की मार्मिक स्थितियों का चित्रण उन्होंने यथार्थवादी प्रणाली के अनुसार ही किया। उनकी पंच परमेश्वर, आत्माराम, बड़े घर की बेटी, शतरंज के खिलाड़ी, बज्रपात, रानी सारंधा, अलग्योझा, ईदगाह, सद्गति, अग्नि-समाधि, कामना-तरु, पूस की रात, सुजान भगत, कप़फ़न आदि अधिक विख्यात कहानियां हैं। इन कहानियों में उनकी संवेदना आदर्श से चल कर वर्ग संघर्ष के यथार्थ की ओर बढ़ती रही है। शिवदान सिंह चौहान के शब्दों में, ‘‘आर्यसमाजी समाज-सुधारक से बढ़ते-बढ़ते वह अपने अंतिम दिनों में वर्ग संघर्ष की अनिवार्यता को पहचानने लग गए थे और पूंजीवादी समाज और संस्कृति की निस्सारता और प्रतिगामिता के बारे में उनके मन में कोई भ्रम या संदेह न रहा था। उनकी अपनी प्रगति की छाप उनकी कहानयिों पर भी अंकित होती गई है।’’18 रामविलास शर्मा के अनुसार ‘‘उनकी सबसे सफल कहानियां वे हैं जिनमें उन्होंने किसानों के जीवन का चित्रण किया है।’’19 

प्रेमचन्द ने कहानी को जिस मनोविज्ञान से संबद्ध कर जीवन की व्याख्या की है। उसका विकास एक स्वतंत्र प्रवृत्ति के तौर पर हिन्दी कहानी के इतिहास में होता है। जैनेन्द्र कुमार, इलाचंद्र जोशी, अज्ञेय आदि की कहानियां मानव मन के सत्य का उद्घाटन करती हैं। इसलिए जैनेन्द्र कुमार, इलाचन्द्र जोशी और अज्ञेय को हिन्दी साहित्य में मनोविश्लेषणात्मक रचनाकार कहा जाता है। लेकिन तीनों की मनोवैज्ञानिकता में पफ़र्क है। ‘‘जैनेन्द्र की मनोवैज्ञानिक चित्रण की प्रणाली अपने जीवनानुभव और भाव-चेतन मानस की उपज है जबकि इलाचन्द्र जोशी और अज्ञेय में मनुष्य की मनोगत दिशाओं और अंतर्द्वंद्वों का चित्रण कम, फ्रायड की प्रणाली से किया गया मनोविकारों का विश्लेषण अधिक है। इसलिए जैनेन्द्र जहां उच्च मानसिक भूमि पर मनुष्य की चारित्रिक विशेषताओं का अंकन और अंतर्द्वंद्वों के माध्यम से उसकी उदात्त, मानवीय सहानुभूतियों और मनोभावनाओं को जीवन की गहराई में उतरकर अभिव्यक्ति देने की कोशिश करते हैं, वहां ये दोनों कहानीकार अपने कुंठाग्रस्त पात्रें के विक्षिप्त मानस को मनोवैज्ञानिक औचित्य प्रदान करके उनके जघन्य और असामाजिक कृत्यों को अपनी ओर से महिमा-मंडित करने का प्रयत्न करते हैं_ साथ ही पाठकों से भी उनके प्रति सहानुभूतिशील होने की अपेक्षा करते हैं। इसके अतिरिक्त, इन लेखकों में मनोविश्लेषण के प्रति इतना प्रबल आग्रह है कि वे मानसिक रुग्णताओं को ही मानवीय सत्य मानकर, अपने पात्रें के कृत्यों का यथातथ्य प्रकृतिवादी आकलन करते हैं जिससे उनकी रचनाओं का अंतःस्वर तो कैशोर-उद्धत, अविवेकी, अनुदात्त और अहम्मन्यतापूर्ण होता ही है, उनके पात्र भी अपनी असामाजिकता, स्वार्थपरता और आत्मकेन्द्रित उत्तरदायित्वहीनता को ही सामाजिक विद्रोह और क्रांतिकारी जीवनदर्शन का पर्याय मान लेते हैं। पर कहानी कभी ही साधारणता के तल से ऊपर उठ पाती है। क्रांति और सामाजिक भावना का ऐसा विद्रूप हिन्दी में अन्यत्र नहीं मिलता। अपनी उदात्त मानवीय संवेदना के अभाव और जीवन सत्य की कलात्मक प्रतीति से वंचित होने की पूर्ति ये लेखक अपनी अपनी क्षमता के अनुसार उक्ति-वैचि=य, संकेत-कथन, भाषा के बनाव-सिंगार और अभिनव रूपविन्यास से करते हैं। परंतु उनके पात्र सजीव नहीं हो पाते, फ्रायड की स्थापनाओं के दृष्टांत स्वरूप गढे़ गए, कृत्रिम और बनावटी लगते हैं और मनुष्य और मनुष्यता का उपहास मात्र प्रतीत होते हैं। इन लेखकों की कहानियों में शैली-भेद चाहे कितना हो, किंतु जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण मूलतः एक सा है और जैनेन्द्र से भिन्न है।’’20 शिवदान सिंह चौहान के अनुसार ‘‘अब तक हिन्दी कहानी की परंपरा मूलतः मानववादी थी। समाज के वैषम्य से कुंठित-पीडि़त मनुष्य के अंतःकरण में मनुष्य और मनुष्यता का निवास है, मानव जीवन में इस विश्वास को लेकर ही कहानीकार सामाजिक विषमताओं पर आक्रमण करते थे और मनुष्य की समाज-खंडित प्रतिमा को पुनःपूर्णत्व देने के लिए उसके अंतःसत्य और अंतःसौन्दर्य, यानी उसकी अखंडित मानवीयता का उद्घाटन करते थे। परंतु ये लेखक इस परंपरा के विपरीत फ्रायडी अर्धसत्यों को कबूल करके मनुष्य को परिस्थितियों का ही नहीं, स्वयं अपनी अर्धचेतन काम-वासनाओं का निरुपाय दास और सभ्यता के बाह्यावरण में ढके-छिपे पर मूलतः हिंस्र, पाशविक और स्वार्थी ही चित्रित करते हैं।’’21 तत्पश्चात हिन्दी कहानी का सौन्दर्य मार्क्सवाद से प्रभावित दिखाई देता है। हिन्दी में मार्क्सवाद की अवधारणाओं को लेकर प्रगतिशील साहित्य की रचना की जाती रही। जिसमें यशपाल का नाम प्रमुख है। यशपाल ने हिन्दी कहानी की सामान्य मानववादी परंपरा को नई सामाजिक राजनीतिक चेतना देकर ऊंचे धरातल पर उठाया है। अपनी कहानियों में सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन के विविध चित्रें द्वारा मौलिक समस्याएं उठाते हैं और एक कलाकार की रीति से उनका समाधान भी खोजते हैं। ये समस्याएं मौलिक हैं क्योंकि मनुष्य-जीवन के व्यापक सत्य से उद्भूत हैं। उनका मार्क्सवादी दृष्टिकोण इन समस्याओं के मूल कारणों तक पहुंचने में सहायक होता है और उनकी विशेषता यह है कि वे आद्यंत कलाकार बने रहते है, परिस्थितियों और उनके मध्य संघर्ष करने वाले चरित्रें के कार्य व्यापार के स्वाभाविक उद्घाटन से वह सामाजिक जीवन और मनुष्य के मनोगत भावों और द्वंद्वों का चित्रण करते हैं। ‘‘यशपाल की मूल समस्या यह है कि समाज के विषम संगठन ने मनुष्य जाति को ही दो विरोधी वर्गों में नहीं बांटा है, बल्कि मनुष्य के विचार और व्यवहार या आचरण में भी एक द्वैत या वैषम्य पैदा कर दिया है। इस द्वैत या वैषम्य के प्रति पाठकों को सचेत करना ही यशपाल का प्रधान उद्देश्य है। यह चेतना जनता में उस सामाजिक क्रियाशीलता को जन्म देगी जो सामाजिक वैषम्य का तो अंत करेगी ही, ऊंचे विचार नीच करतूती के वैषम्य का भी अंत कर देगी। तभी मनुष्य का बाह्य और आंतरिक जीवन पूर्ण स्वास्थ्य का लाभ कर सकेगा। इस समस्या का उन्होंने विविध ढंगों से अपनी कहानियों में उठाया है और साधारण अथवा शिष्ट समाज की ऊंचे विचारों में आवेष्टित नीच करतूतों पर तीखे प्रहार किए हैं।’’22 समस्याओं को प्रगतिशील दृष्टिकोण से उठाने वाले कहानीकारों में से चंद्र किरण सौनरेक्सां, उपेन्द्रनाथ अश्क आदि का नाम प्रमुखता से लिया जाता  सकता है।

प्रेमचन्द और उनके समकालीन कहानीकारों की कहानियों की खासियत यह रही है कि वे समसामयिकता से दूर नहीं होते है। समकालीनता की गतिविधियों को उजागर करने का काम कहानियां करती रही हैं। इसी संदर्भ में देखा जाए तो आद्यतन अस्मितावादी विमर्श का स्वर भी प्रेमचन्द और उनके समकालीन कहानियों में देखा जा सकता है। उस समय की कहानियां अपने अंदाज में इसका बयान करती रही हैं। प्रेमचन्द ने स्त्री और दलित दोनों समाजों के जीवन को करीबी से पहचानने का काम किया है और अपनी रचनाओं में उसे उठाया है। डॉ- सुभाष चन्द्र के अनुसार ‘‘उनकी रचनाओं में दलितों के प्रति सहानुभूति, करुणा एवं संवेदना के साथ शोषण, अन्याय, उत्पीड़न से मुक्ति और मानवीय गरिमा व पहचान के लिए संघर्ष है। वे दलित जीवन के विभिन्न पक्षों के अन्तःसूत्रें को पहचाना व प्रतिबद्धता से व्यक्त किया है।’’23 प्रेमचन्द की कहानियां -‘दूध का दाम’, मंदिर, गुल्ली डंडा, ठाकुर का कुंआ, मंत्र, सद्गति, कफन आदि में दलित जीवन के चित्र प्रस्तुत करती हैं। प्रेमचन्द किस प्रकार दलित जीवन के त्याग को दर्शाते हैं। यह उनकी कहानी ‘दूध का दाम’ में अभिव्यक्त होता है। इस कहानी में ‘भुंगी भंगिन महेश बाबू के बेटे सुरेश को अपना दूध पिलाती है जिस कारण उसका अपना बेटा मंगलू भूखा भी रहता है।’24 इस दूध का दाम किस रूप में दलित समाज को मिलता है। इसे भी प्रेमचन्द ने दिखाया है। ‘दूध का दाम’ कहानी में मंगल और टम्मी के संवाद में इसे समझा जा सकता है। ‘‘देखा, पेट की आग ऐसी होती है। यह लात मारी हुई रोटियां भी न मिलतीं, तो क्या करते? —लोग कहते हैं, दूध का दाम कोई नहीं चुका सकता और मुझे दूध का यह दाम मिल रहा है।’’25 इसके बाद भी ब्राह्मणवादी मानसिकता कभी भी अपनी निर्जिविता से अलग नहीं होती है। इस संदर्भ में ‘दूध के दाम’ के महेशनाथ का यह कथन द्रष्टव्य है- ‘‘दुनिया में और चाहे जो कुछ हो जाए, भंगी, भंगी ही रहेंगे। इन्हें आदमी बनाना कठिन है।’’ क्या सचमुच में ऐसा है? इसका प्रत्युत्तर भी कहानी में बयान है। भुंगी कहती है- ‘‘मालिक, भंगी तो बड़ों-बड़ों को आदमी बनाते हैं, उन्हें कोई क्या आदमी बनाए। यह गुस्ताखी करके किसी दूसरे अवसर पर भला भुंगी के सिर के बाल बच सकते थे? लेकिन आज बाबू साहब ठठाकर हंसे और बोले-भुंगी बात बड़े पते की कहती है।’’26 इस प्रकार प्रेमचन्द दलित जीवन और भारतीय समाज का चित्रण करते हैं। जिसमें एक तरफ मानवता है तो दूसरी तरफ ब्राह्मणवाद है। भुंगी के बातों में जहां दलित समाज की मानवता है, वहीं महेशनाथ के माध्यम से ब्राह्मणवाद को पहचाना जा सकता है। महत्वपूर्ण बात है कि जिस प्रकार से महेशनाथ भुंगी की बातों को स्वीकार करते हैं। क्या भारतीय समाज दलितों की इस मानवता को स्वीकार कर पाए हैं? रामविलास शर्मा के शब्दों में कहा जा सकता है कि प्रेमचन्द के यहां देश की जनता के प्रति प्र्रेम और सहानुभूति की गहरी संवेदना है। वे गरीबी और अंधविश्वासों को आदर्श कह कर नहीं चित्रित करते। वह दिखलाते हैं कि इतने अंधेरे में भी मनुष्यता का दीपक कैसे जल रहा है, उनकी लौ धनी आदमियों के घर से यहां कितनी ऊंची उठ रही है।27

हिन्दी कहानी में प्रेम की संवेदना का मार्मिक चित्रण मिलता है। प्रेम का यह सौन्दर्य विभिन्न रूपों में व्याप्त है। प्रेम के इस विविध रूपता में राष्ट्रप्रेम से लेकर स्त्री-पुरुष का प्रेम सौन्दर्य भी निहित है। स्वयं प्रेमचन्द की कहानियां प्रेम सौन्दर्य का चित्रण करती है। गोपाल राय प्रेमचन्द की प्रेम संवेदना को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि प्रेमचन्द की कहानियां ‘‘उस प्रेम का चित्रण करती हैं जो नैतिकता बोध से नियंत्रित होता है। यह प्रेमचन्द पर आर्य समाज के प्रभाव का द्योतक भी हो सकता है।’’28 प्रेम सौन्दर्य का रोमांनियत स्वरूप चित्रण जयशंकर प्रसाद की कहानियों में मिलता है। प्रसाद की कहानियां ‘अतीत स्तुत्य’ की सांस्कृतिक पक्ष पर आधारित होते हुए भी रोमानित भाव से लबरेज है।29 प्रेम की संवेदना का चित्रण चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानियों में देखा जा सकता है। ‘उसने कहा था’ प्रेम की संवेदना के साथ युद्ध की पृष्ठभूमि आधारित कहानी है। ‘‘युद्ध और प्रेम की साथ साथ चलनेवाली संवेदना के चित्रण की दृष्टि से यह कहानी हिन्दी में आज भी अकेली है। दोनों ही संवेदनाओं के चित्रण में कहानीकार ने अद्भुत अवलोकन क्षमता और प्रामाणिक अनुभव का परिचय दिया है।—यद्यपि इस कहानी की केन्द्रीय संवेदना प्रेम ही है, पर इसका एक पाठ युद्धविरोधी संवेदना के रूप में भी संभव है। युद्ध आदमी को कितना नृशंस बना देता है, फिर भी मानवीय संवेदनाएं उसमें किस प्रकार जीवित बची रहती है, यह कहानी इसकी पुष्टि करती है।’’30 thee

औपनिवेशिक सत्ता की क्रूरता का चित्रण भी हिन्दी कहानियों मिलता है। इसमें औपनिवेशिक नीतियों का विरोध कहानी का मुख्य ध्येय रहा है और हृदय परिवर्तन की संवेदना हिन्दी कहानी का सौन्दर्य रहा है। औपनिवेशिक शासन व्यवस्था में किसानों, जमींदारों और महाजनों का ऐसा त्रिकोणीय संबंध निर्मित किया गया, जिसमें फंसी आम जनता, किसान आदि का निकलना मुश्किल था। किसानों से जमीन की लगान, जो बेहद ऊंची थी, वसूल करने के लिए जमींदार वर्ग का सृजन किया गया था और लगान चुकाने के लिए असमर्थ किसानों को कर्ज लेकर लगान चुकाने के योग्य बनाने के लिए साहूकारों को अनेक सुविधाएं प्रदान की गई थीं। इसके फलस्वरूप किसान कर्ज के बोझ से लदते जा रहे थे, जिसका अंतिम परिणाम उनके भूमिहीन कृषक मजदूर बदलने में होता था। इसके फलस्वरूप ‘अनुपस्थित जमींदारों’ की एक अलग श्रेणी पैदा हो गयी थी, जो किसानों के लिए और भी तकलीफदेह थी। ऐसे शहरी जमींदारों की गांव में जमींदारी होती थी, जो कभी कभार गांव जाते थे और किसानों पर कारिन्दों और पुलिस के अत्याचार की अनदेखी कर देते थे। जो छोटे जमींदार गांव में किसानों के बीच रहते थे, उनके यहां किसानों पर ऐसा अत्याचार नहीं होता था। प्रेमचन्द युग की कहानियों में किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण है। साथ ही औपनिवेशिक सत्ता के साथ-साथ देशी साम्राज्यवाद के अत्याचार का वर्णन मिलता है। प्रेमचन्द की कहानी ‘सवा सेर गेहू’ और जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘ग्राम’ में इसे सहज ही समझा जा सकता है। ‘‘सवा सेर गेहूं’ में कर्ज की वजह से गुलामी करने वाले शंकर की करुण कथा है। वह एक बार सवा सेर गेहूं उधार लेता है और उसे पाटते-पाटते बीस साल लग जाते हैं, फिर भी वह गुलामी करता हुआ मरता है। कहानी के अंत में प्र्रेमचन्द कहते हैं -पाठक! इस वृतांत को कपोल कल्पित न समझिए। यह सत्य घटना है। ऐसे शंकरों और ऐसे विप्रों से दुनिया खाली नहीं है।’’31 इसके साथ ही उस युग की कहानियों में हृदय परिवर्तन की बात हुई है। गोपाल राय लिखते हैं कि ‘‘प्रेमचन्द बुर्जुआ जमींदारों का हृदय परिवर्तन भी दिखाने से बाज नहीं आते। कदाचित वे चाहते थे कि ऐसा हो पाता। जमींदारों के प्रति उनका मोहभंग अभी नहीं हुआ था।’’32 इस संवेदना को प्रेमचन्द की कहानियां, ‘उपदेश’, बलिदान, बैंक का दिवाला’ में सहज ही देखा जा सकता है। वहीं ‘पशु से मनुष्य’ कहानी प्रेमचन्द की समाजवाद या सहयोगवाद में आस्था को रेखांकित करती है।  इसी प्ररिप्रेक्ष्य में गोपाल राय प्रेमचन्द के वैचारिक सौन्दर्य को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि प्रेमचन्द आदर्शवाद की स्थापना करते हैं जिसमें एक तरफ गांधीवाद है तो दूसरी तरफ समाजवाद है। ‘‘प्रेमचन्द गांधीवादी और समाजवादी विचारधारा के द्वंद्व में फंसे हुए हैं।’’33 

दलित संवेदना के साथ-साथ स्त्री संवेदना भी हिन्दी कहानी का सौन्दर्यबोध रहा है। प्रेमचन्द की कहानियों में यह अशिक्षित, रूढि़यों और अंधविश्वासों में जकड़ी, सदियों से पुरुष-व्यवस्था की मार झेलती, स्वाभाविक मानवीय अधिकारों से भी वंचित, किसी प्रकार की भी स्वतंत्रता से रहित, मूक-बधिर और दशक के अंत में अपनी सीमाओं को तोड़ती, मनुवादी व्यवस्था से विद्रोह करती स्त्री बार-बार सामने आती है। ग्रामीण सामाजिक संरचना का बहुत ही प्रामाणिक अंकन उनकी कहानियों में देखने को मिलता है। इस संरचना की नींव संयुक्त परिवार के परम्परागत मूल्यों पर आधारित थी। दाम्पत्य संबंध, दहेज प्रथा, विधवा विवाह, बहुविवाह, बिरादरी, कुल मर्यादा आदि इस संरचना की नींव थे। आत्मसमर्पण और सेवा धर्म को प्रेमचन्द दाम्पत्य जीवन का मूल तत्व मानते हैं। ‘दो सखियां’ कहानी द्वारा प्रेमचन्द आदर्श दाम्पत्य जीवन की एक रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। प्रेमचन्द विवाहित जीवन में स्वतंत्रता की छूट नहीं देते। विवाह जैसी संस्था या प्रथा पर उनकी अलग ही द्दृष्टि है। ‘‘दाम्पत्य मूल्य को प्रेमचन्द की कहानियों में पारिवारिक संरचना का आधार के रूप में देखा जा सकता है।’’34 यह दाम्पत्य जीवन ‘शारीरिक सौन्दर्य की तुलना में आत्मिक सौन्दर्य’ के प्रेम पर आधारित है। प्रेमचन्द समाज में इसी प्रेम सौन्दर्य को स्थापित करना चाहते थे। भारतीय समाज में इसी प्रेम सौन्दर्य पर बल भी दिया गया है। ‘अलग्योझा’, ‘घरजमाई’ आदि कहानी में संयुक्त परिवार की परस्पर प्रेम पर आधारित संरचना का और ग्रामीण समाज की संरचना में घरजमाई की स्थिति मान-सम्मान आदि का चित्रण बहुत ही मार्मिक है। लोकमत का सम्मान, निम्नवर्गीय समाज की आर्थिक और नैतिक अंधविश्वासों, सामाजिक नैतिक रूढि़यों, धार्मिक विश्वासों, यहां तक कि ईश्वर के अस्तित्व में भी संदेह प्रकट हुआ हैं, वहीं उनकी कुछ कहानियों में भूत प्रेत, पुनर्जन्म, तर्कहीन अलौकिकताओं के प्रति स्वीकार का भाव लक्षित होता है। विध्वंस, मूठ, गुप्त धन, नाग पूजा, भूत, खूनी, पिसनहारी का कुआं, मंत्र, प्रतिशोध आदि कहानियां इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं।’’35 

सेक्युलर मूल्यों की स्थापना हिन्दी कहानी का सौन्दर्यबोध रहा है। हिन्दू मुस्लिम सद्भाव प्रेमचन्द की रचना का केन्द्रीय विषय रहा है। तत्कालीन औपनिवेशिक शासन व्यवस्था में समय की ऐसी मांग थी। ‘मंदिर और मस्जिद’, ‘हिंसा परमो धर्म आदि कहानियों में हिन्दू मुस्लिम सद्भाव का विचार व्यक्त हुआ है। ‘शुद्धि’, ‘जिहाद’ आदि भी अंधधार्मिकता के विरोध में लिखी गई कहानियां है। ‘शुद्धि’ का कहानी का यह कथन ही भारतीय समाज की धर्मनिर्पेक्षता को रेखांकित है। ‘‘मैं शुद्धि का हामी नहीं हूं। हिन्दू समाज में अब भी ऐसे बेशुमार आदमी पड़े हुए हैं जिनके हाथ का पानी पीना गवारा न होगा। हमारा समाज ऐसे ही आदमियों से भरा हुआ है’’। इसलिए गोपाल राय लिखते हैं कि प्रेमचन्द सच्चे अर्थों में सेक्युलर मूल्यों के समर्थक लेखक थे।’’36 प्रेमचन्द की यह धर्मनिर्पेक्षता उस समय की अन्य कहानीकारों की कहानियों में व्यक्त हुआ है। बेचनशर्मा ‘उग्र’ ने सांप्रदायिकता के विभिन्न पक्षों पर मानवीय संवेदना से विचार किया गया है। ‘दोजख!नरक!’ नामक उनकी कहानी में सेक्युलर मूल्यों की स्थापना की गई है-‘‘जो जामा मस्जिद में है, वही विश्वनाथ मंदिर में। वही खुदा, वही गॉड, वही ईश्वर।—मस्जिद, मंदिर, गिरजाघर आदि मनुष्य की कल्पना हैं। मनुष्य की कल्पना के लिए ईश्वर की कल्पना का नाश करना इतना बड़ा पाप है, जिसका कोई पर्याप्त दंड नहीं है।’’37 इस प्रकार कहा जा सकता है कि हिन्दी कहानी का सौन्दर्य एक धर्मनिर्पेक्ष मूल्यों की स्थापना करता है। यह दीगर बात है कि समाज में यह मूल्य आज भी विघटित हो रहा है।

प्रेमचन्द के समकालीन उग्र की कहानियों का सौन्दर्य भी औपनिवेशिक दासता के प्रति विद्रोह और मुक्ति की है। गोपाल राय के अनुसार ‘‘प्रेमचन्द और उग्र की कहानियां फ्रैंक ओ कॉनर की उस परिभाषा पर एकदम खरी उतरती हैं, जिसके अनुसार कहानी की प्रकृति दबे, उपेक्षित और अल्पसंख्यकों के, वर्चस्वसम्पन्न और बहुसंख्यकों के विरूद्ध, छापामार युद्ध की है। वह चाहे उपनिवेशवाद के विरूद्ध पराधीन देश की, पुरुषवादी व्यवस्था के खिलाफ स्त्री समाज की, उच्चवर्ग के विरूद्ध दलित वर्ग की अथवा जड़ नैतिक व्यवस्था के विरूद्ध अल्पसंख्यक रचनाकार का विद्रोह हो, कहानी उसकी आवाज बनकर प्रकट होती है। प्रेमचन्द और उग्र की कहानियां इसकी पुष्टि करती हैं।’’38 वहीं संवेदना और प्रवृत्ति की दृष्टि से विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक, बद्रीनाथ भट्ट सुदर्शन, उपेन्द्रनाथ अश्क, रशीदुल खैरी और अली अब्बास हुसैनी आदि की कहानियों का विशेष महत्व है। गोपाल राय के अनुसार ‘‘यद्यपि इनकी कहानियां न तो व्यवस्था के विरूद्ध छापामार युद्ध की दृष्टि से और न ही संवेदना और शिल्प प्रयोग की दृष्टि से बहुत उल्लेखनीय है, पर साहित्य के इतिहास में उल्लेखनीयता की दृष्टि से कमजोर कहानियों का भी स्थान होता है।’’39

हिन्दी कहानी के इतिहास में स्त्री जीवन को लेकर कई कहानीकारों ने कहानी की रचना की है। इसी संदर्भ में वेश्या के जीवन से भी संबंधित रचनाएं मिलती है। प्रेमचन्द की कहानियों में स्त्री जीवन के विविध रूपों को सहज ही देखा-समझा जा सकता है। उनका जीवन ‘संघर्ष प्रायः प्रेम की प्राकृतिक संवेदना और समाज की रूढि़यों मान्यताओं के बीच होता है_ पर प्रसाद की कहानियों में यह संघर्ष शुद्ध परस्पर विरोधी संवेदनाओं का होता है।’ ‘आकाशदीप’ जो प्रसाद की सर्वोत्तम कहानियों में से एक है, इसका अनोखा उदाहरण है। ‘‘प्रेम और घृणा का ऐसा द्वंद्व और परस्पर स्पर्द्धिता शायद ही हिन्दी की किसी और कहानी में मिले। इस कहानी में विसंवादी संवेदनाओं के संघर्ष से करुणा की जो चिनगारी निकलती है, वह किसी भी सहृदय पाठक को अभिभूत करने के लिए पर्याप्त है। कहानी का वातावरण पूर्णतः रूमानी, साहसिक अभियान, कल्पना प्रसूत परिवेश और वैसे ही कल्पनालोक के प्राणियों से भरा हुआ है।’’40 वहीं ‘चूड़ीवाली’ में एक वेश्या पुत्री को कुलवधू बनने के स्वप्न को दिखाया गया है। पर सफलता उसे तब मिलती है, जब वह एक आदर्श प्रतिव्रता हिन्दू स्त्री और तपस्विनी की दिनचर्या ग्रहण कर लेती है। ‘रमला और बिसाती’ में प्रेम की संवेदना सामाजिक परिस्थितियों के संघात से टकराकर प्रेमी प्रेमिका के अनन्त वियोग का रोमानी स्वरूप ले लेती है। गोपाल राय के अनुसार ‘‘प्रसाद समकालीन जीवनधारा से बिलकुल कटे हुए नहीं थे, पर उनकी कम ही कहानियों ऐसी हैं जो उनकी यथार्थपरक संवेदना को कलात्मक प्रौढ़ता के साथ व्यक्त करती हों।’’41 ‘घीसू, ‘ग्रामगीत’, ‘पुरस्कार’ आदि कहानियों में प्रेम के विविध रूप देखने को मिलता है। अतीत एवं वर्तमान के समसामयिकता के संदर्भ में प्रेम की संवेदना प्रकट हुई है। ‘‘प्रसाद जी की कहानियों में प्रेम का आदर्श आध्यात्मिक स्तर पर उठ जाता है। उनकी आरंभिक कहानियों में प्रेम का भावुकतापूर्ण और अत्यधिक रोमानी रूप मिलता है, किन्तु धीरे धीरे उनमें औदात्य और गरिमा का समावेश होता गया है। उनकी दृष्टि त्याग और समर्पण की भावना से दीप्त, कल्पना से रंगीन और सूक्ष्म आदर्श से मंडित है। वह एकांगी नहीं है। उसमें दूसरी भावनाओं के साथ द्वंद्वात्मकता की स्थिति भी है। उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियां तो वे ही हैं जिनमें प्रेम की भावना का टकराव दूसरी भावनाओं के साथ होता है और इस टकराहट में पात्र बुरी तरह से झकझोर जाते हैं।’’42 गिरमिटिया मजदूर और शूद्र समाज के ऊपर पर भी कहानियां लिखी गई। प्रसाद की ‘नीरा’ और प्रेमचन्द की ‘शूद्रा’ कहानी ऐसी ही कहानी है। ‘‘नीरा की पृष्ठभूमि गिरमिटिया मजदूरों के मॉरिशस जाने की ऐतिहासिक घटना से जुड़ी हुई है, पर कथ्य उससे एकदम अलग हो गया है। अनास्था पर आस्था की जीत इस कहानी का मुख्य प्रतिपाद्य हो गया है।’’43 देहज प्रथा और उससे जुड़ी समस्याओं को प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों में सशक्त रूप में उठाया है। यह संवेदना शिवपजून सहाय की कहानी ‘कहानी का प्लॉट’ में भी देखी जा सकती है। इस कहानी का कथ्य तत्कालीन समाज में प्रचलित दहेज प्रथा के कारण किसी प्रौढ़ पुरुष का किशोरी कन्या से विवाह है, जो अंततः स्त्री विवशता और सामाजिक अनाचार में परिणत होता है।’

हिन्दी कहानी की संवेदना इतिहास की सांस्कृति विरासत को भी रेखांकित करती है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री की कहानियां भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ को ऐतिहासिक दंत कथाओं के माध्यम से चित्रित करती है। ‘‘कथ्य की दृष्टि से उनकी अधिकतर कहानियां ऐतिहासिक दंतकथाओं और अर्धप्रामाणिक घटनााओं या प्रसंगो पर आधारित हैं।—जिनका समय गौतम बुद्ध से लेकर 1857 के विद्रोह तक फैला हुआ है। तर्कसंगत ऐतिहासिक दृष्टि और वैज्ञानिक इतिहासबोध के अभाव में ये कहानियां प्रबुद्ध पाठक को प्रभावित करने में असमर्थ है।—सांस्कृतिक चेतना के नाम पर शास्त्री जी ने प्राचीन हिन्दू संस्कृति और परम्परागत सामाजिक नैतिक मूल्यों के प्रतिपादन पर अधिक जोर दिया है। परम्परा पर इनकी दृष्टि आलोचनात्मक नहीं है। कहीं-कहीं तो इन्होंने अपने तथाकथित सांस्कृतिक विचारों का प्रतिपादन सपाट वर्णन या पात्रें के संवादों के रूप में करने का प्रयास किया है।’’44

जैनेन्द्र हिन्दी कहानी संसार में एक अलग कथ्य को लेकर कहानी की रचना करते हैं। ‘‘जैनेन्द्र के कथा संसार में प्रवेश करते ही हमें महसूस होने लगता है कि वह प्रेमचन्द की तुलना में बिल्कुल बदला हुआ है_ वह गांव से नगर में और किसानों-मजदूरों की जिंदगी से उच्च मध्यवर्ग और अभिजात वर्ग की जिंदगी में आ गया है  उसमें किसान मजदूर वर्ग के पात्र मुश्किल से मिलते हैं।’’ समाज के प्रति जैनेन्द्र की प्रतिबद्धता अलग तरह की है। गोपाल राय के शब्दों में, ‘‘जैनेन्द्र प्रेमचन्द की यथार्थवादी कथा परम्परा से अलग एक भाववादी कथा परम्परा के पुरस्कर्ता बन जाते हैं। यह तनिक आश्चर्य की बात है कि राजनीतिक पृष्ठभूमि होते हुए भी जैनेन्द्र की कहानियों में स्वाधीनता आंदोलन की कोई साफ झलक नहीं दिखाई देती है।’’45 जैनेन्द्र के यहां मध्यवर्ग की आर्थिक मजबूरियां और नैतिक अंतर्विरोध सबसे ज्यादा जगह ली है। प्रेम के लिए आत्मबलिदान देने वाली स्त्री जैनेन्द्र की कहानी की खास विशेषता रही है। उनकी ‘जाह्नवी’ कहानी ऐसी है जिसमें ‘दो नैना मत खाइयो—पिया मिलन की आस’ की संवेदना रची-बसी है और उसी इंतजार में वह आजीवन शादी नहीं करती है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है एक अंतहीन प्रेेम की कहानी है। वह पारंपरिक विवाह नामक संस्था का विरोध प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष विरोध करती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि जैनेन्द्र की कहानियों का सौन्दर्य प्रेमपरक है खासकर मध्यवर्ग के प्र्रेम जो पारंपरिक विवाह संस्थान को चुनौती देता है। हिन्दी कहानी का सौन्दर्य इस प्रकार एक विकासक्रम में विविध फलक को प्राप्त करता है। गोपाल राय ने सही ही लिखा है कि ‘‘संरचना की दृष्टि से चौथे दशक में हिन्दी कहानी प्रौढ़ता पर पहुंच गयी, जिसका श्रेय प्रेमचन्द के साथ जैनेन्द्र और अज्ञेय को है। पांचवे दशक में मंटो और बेदी ने और छठे दशक मे अमरकांत, मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, शेखर जोशी, इंतिजार हुसैन, निर्मल वर्मा, रेणु आदि ने कहानी की संरचना को अपेक्षित ऊंचाई पर पहुंचा दिया।’’46 अर्थात हिन्दी कहानी एक क्रमिक विकासक्रम में विकसित होती रही है। समय सापेक्ष उसके मूल्यों में परिवर्तन होता रहा है। डॉ नंद किशोर नीलम के शब्दों में कहें तो, ‘‘हिन्दी कहानी में प्रेमचन्द के आस-पास जो सौन्दर्यबोध विकसित हो रहा था वह बहुत कुछ सौंदर्यशास्त्र की आत्मवादी, भाव-वादी और आध्यात्मिक विचारणा पर आधारित था। आशय यह कि वह सौन्दर्यबोध अधिकांशतः भारतीय काव्यशास्त्र और दरबारी मानसिकता का पोषक करने वाला था।—कहना न होगा कि इन कहानियों का सौन्दर्यशास्त्र भी निष्क्रिय और कुंठित जीवन दशर्न का पर्याय बन गया। अगर कोई इजाफा आगे जाकर हुआ तो वह यह कि कलावाद, रूपवाद और रीतिवाद नए अभिजनीय स्वरूप में सामने आ गए। उनका यह नया अभिजनीय स्वरूप था आधुनिकतावादी।’’47 

साहित्य की बदलती संवेदना के आधार पर ही प्रेमचन्द ने ‘साहित्य की कसौटी48 बदलने की बात की थी। ‘‘जब से भारतीय साहित्य में, विशेषकर हिन्दी साहित्य में जातीय अस्मिता की खोज की बात उठी, जनजीवन से गहरे सरोकार और सहकार वाली साहित्य चिंता की बात उठी तथा मार्क्स के सौन्दर्य-कला चिंता के प्रतिमानों का प्रभाव हमारे साहित्य पर पड़ा तब से सौन्दर्यशास्त्र के आयाम भी बदले और सौन्दर्यशास्त्र की भाववादी, आत्मवादी, अलौकिक, अतिमानवीय और अवैज्ञानिक निष्पत्तियों की पुनर्व्याख्या भी की जाने लगी।—आज सौन्दर्य के उद्घाटन का तात्पर्य रचना के संपूर्ण मूल्यों और गुणों का उद्घाटित करना है। किसी भी रचना (कलाकृति) के सुंदर आनंदकारी या उजले पक्ष को ही नहीं उसके करूणा, जुगुप्सा, वीभत्सता में डूबे काले पक्ष को उद्घाटित करना और उसके प्रतिकार के लिए जन सामान्य के भीतर क्षोभ और संघर्ष की भावना उत्पन्न करना भी सौन्दर्य का उद्घाटन ही है।’’49 डॉ नंदकिशोर नीलम के अनुसार ‘‘भारतीय परिवेश, परिस्थितियों, विवके परंपरा और चिंता धारा के अनूकूलन में हिन्दी कहानी का एक खाका निर्मित होना चाहिए। जातीय अस्मिता की खोज, पहचान और विकास उसके केन्द्र में रहना चाहिए। कहानी की स्थापत्य, नक्शा, रूप, शिल्प और विषय-वस्तु यानी उसका संपूर्ण कहानी के विन्यास में ही खोजा जाना चाहिए। वह आरोपित, थोपा हुआ और पूर्व निर्धारित नहीं होना चाहिए। इस तरह कहानी का एक जातीय चरित्र प्रस्तुत किया जा सकता है। कहना न होगा कि मेरा यह प्रयास लोक जीवन और लोक प्रकृति से जुड़े उस जातीय और जनवादी सौन्दर्य बोध के आधार पर विकास पाता है जो समकालीन कहानी की मूल धारा है।’’50 ‘हिस्ट्री आफ माइंड’ और इतिहास दशर्न ही साहित्य-कहानी का सौन्दर्यशास्त्र है और इसी सौन्दर्यशास्त्र की जरूरत हिन्दी साहित्य की आलोचना के लिए सबसे अधिक है। ‘‘सौन्दर्य भाव, विचार और इन्द्रियबोध की संगति से उत्पन्न होता है। भाव, विचार और इन्द्रियबोध से ही रचना का मूल्य और वैिशष्ट्य निरूपित होता है। आलोचक को इसी आधार पर रचना का मूल्यांकन भी करना चाहिए। सौन्दर्यशास्त्र का साहित्य में विवेचन करने के लिए आलोचक की गहरी पकड़ यथार्थवाद पर होनी चाहिए। साहित्य में यथार्थ का चित्रण कितना सटीक और कितना सजीव रूप में हुआ है इस पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। यही कृति के सौन्दर्य की कसौटी भी है। सौन्दर्य का स्रोत जनजीवन है और उसका उत्कर्ष है जीवन संग्राम।’’51 

सौन्दर्य का उत्कर्ष जीवन संग्राम में ही देखा जा सकता है। संकीर्ण दृष्टि को बदले बिना वास्तविक सौन्दर्यबोध की अनुभूति संभव नहीं है। जीवन-जगत के प्रत्यक्ष अनुभव का सशक्त माध्यम है इन्द्रियबोध। समकालीन कहानी में इन्द्रियबोध की व्यापकता स्पष्टतः देखी जा सकती है। इन्द्रियबोध और भाव दो अलग अलग चीज है समस्या तब होती है जब दोनों को एक समझ लिया जाता है। भावों का आशय भीतर के सौन्दर्य से है, उनका उदय मन में होता है जबकि इन्द्रिय बोध तक बाह्य, प्रत्यक्ष जगत का अनुभव है, इन्द्रियों से इस जगत का बोध होता है। भाव जगत और इन्द्रिय बोध एक ही यथार्थ के दो पक्ष हैं जो पूर्णतः स्वतंत्र न होकर परस्पर संबद्ध हैं। सौन्दर्यबोध भावबोध को प्रभावित करता है और भावबोध से विचार बनते हैं। यह प्रक्रिया दोहरी मिश्रित और संश्लिष्ट है।

स्वाधीन भारत में समाज का परिदृश्य बदला है। समाज का बदलता परिदृश्य साहित्य से अछूता नहीं रहा है। कहानी का यथार्थ और यथार्थ की काल्पनिक जमीन समय सापेक्ष जमीन की हकीकत और यथार्थ में बदल गयी। कहानी की संवदेना का बदलता हुआ यह स्वरूप आंदोलनधर्मिता का रूप ग्रहण किया है। ‘नई कहानी’ में इसी अवधारणा के तहत यथार्थ की प्रामाणिकता और अनुभूत यथार्थ की अभिव्यक्ति हुई है। ‘‘नयी कहानी का अभिप्राय यह है कि इसने कहानी को वस्तु और शिल्प की दृष्टि से एक नया रूप दिया जिसमें नयेपन का सचेत आग्रह था। यह परिवेश और रचनाशीलता के द्वंद्व से उपजा था क्योंकि स्वतंत्रता के बाद कथाकार जीवन के बदलते यथार्थ को एक नये परिवेश में देख रहा था और यह अभिव्यक्ति की नई भंगिमाओं को तलाशने की भी कोशिश कर रहा था। कहानी में परिवर्तन की आवाजें आ रही थी।’’52 परिवर्तन की इसी आवाज में नई कहानी आंदोलन की शुरूआत होती है और कहानी की प्रवृतियां आंदोलनधर्मी होती जाती है।

कहानी या किसी भी विधा का कोई भी आंदोलन विकास की एक प्रक्रिया से जुड़ा होता है और उसकी एक पृष्ठभूमि भी होती है। यह पृष्ठभूमि हिन्दी कहानी में भी मिलती है जिसमें सामाजिक और व्यक्तिवादी चेतना दोनों का ही आधार रहा है। प्रेमचन्द ने वर्ग संघर्ष को समन्वय कर उसे भारतीय दर्शन से जोड़ा है और उनके सामाजिक यथार्थ की परंपरा में यशपाल, रांगेय राघव, भैरवप्रसाद गुप्त, उपेन्द्रनाथ अश्क, अमृतराय और अन्य प्रगतिवादी मार्क्सवादी रचनाकार वर्ग चेतना के संदर्भ में वर्ग विशेषता पर प्रहार करते हुए दिखते हैं। इसी प्रकार व्यक्तिवादी या मनोवादी चेतना के संदर्भ में जैनेन्द्र, इलाचंद्र जोशी और अज्ञेय तथा अन्य कहानीकार भी हैं। जिन्होंने व्यक्ति मन की अतल गहराईयों को मनोवैज्ञानिक धरातल पर आत्मसंघर्ष के रूप में व्यक्त किया है। स्वतंत्रता के बाद देश में अनेक घटनाएं घटी हैं और स्वतंत्रता एक राजनैतिक मूल्य से भी बढकर नयी विचार क्रांति के रूप में सामने आयी है। स्वतंत्रता में जो स्वप्न देखे गये थे वे कलांतर में बिखर कर टूटे हैं और जीवन में अनेक समस्याओं का विकास हुआ है। महंगाई के बढ़ने से जीना कठिन हुआ है और देश की बहुत बड़ी जनसंख्या अब भी बेरोजगारी और बेकारी के बीच जी रही है। समाजवादी अर्थव्यवस्था में भी पूंजी का कुछ लोगों के हाथों में केन्द्रीकरण हो गया है। भारतीय राजनीति ने सत्ता के लिए प्रांतीयता, जातीयता और क्षेत्रीयता को बढ़ाया है। सबसे अधिक समस्या मध्यवर्ग को आई है और उसका मोहभंग हुआ है। स्वतंत्रता और यांत्रिकाएं, राजनीतिक भ्रष्टाचार और परिवारों का विघटन अनेक प्रकार के भीतरी और बाहरी संकटों से भरा रहा हैै। इस तरह एक और राजनीतिक स्तर पर अनेक प्रक्रार की हलचल और आर्थिक विकास और समाजिक निर्माण की तेज प्रक्रिया के बीच नई पीढ़ी ने नैतिकता के इस पतन को देखा है। नई पीढ़ी के जो भी कहानीकार हैं वे इन समस्याओं के बीच व्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल उठाते हैं।

नई कहानी में यथार्थ की प्रामाणिकता पर बल दिया गया है। यह भोगे हुए यथार्थ तक ही सीमित नहीं है बल्कि अनुभूति की प्रामाणिकता और प्रामाणिकता की यथार्थवादी प्रस्तुती है। कहानी अब जीवन का प्रतिबिंब नहीं, जीवन की एक फांक, अनुभव या खंड मात्र बन गई है। इसलिए कमेलश्वर ‘नई कहानी की भूमिका’ में लिखते हैं कि ‘‘पूर्व कहानी जीवन का चित्र मात्र थी, चित्र में जीवन की वास्तविकता नहीं होती, थोड़ी कृत्रिमता या बनावटीपन होता है। नई कहानी इस बनावटीपन और चित्र की जीवनगत दूरी को मिटाकर जिंदगी के किसी हिस्से के रूप में आती है। यानि नई कहानी पहले और मूल रूप में जीवनानुभव है, उसके बाद कहानी है।’’53 इस प्रकार कहा जा सकता है कि नई कहानी का सौन्दर्य जीवन का अनुभव का सौन्दर्य है। उसमें विश्वसनीयता का संकट नहीं के बराबर रहा है। कहानी के केन्द्र में व्यक्ति और उसका समाज है। सामाजिकता और वैयक्तिकता का समन्वय कहानी की संवेदना में है। यही कारण है कि नई कहानी मानवीय रिश्तों, संबेधों पर बहुत अधिक लिखा गया है। राजेन्द्र यादव के शब्दों में, यह ‘‘व्यक्तिगत सामाजिकता’’54 है। इस सामाजिकता में विविधता और व्यापकता तो बहुत है लेकिन वह मुख्यतः संबंधों के यथार्थ पर आधारित है। मोहन राकेश के अनुसार ‘‘नई कहानी में यथार्थ अपेक्षाकृत ठहरे हुए— पारिवारिक और वैयक्तिक यथार्थ है।’’55 वस्तुतः नई कहानी में विविधता और व्यापकता का कारण व्यक्ति के जीवन के विभिन्न यथार्थ और उसका सामाजिक सरोकार हैं। यह यथार्थ व्यक्ति की निजी अनुभूति और दृष्टिकोण है। पुष्पपाल सिंह के अनुसार ‘‘भोगे हुए या अनुभूत यथार्थ की अभिव्यक्ति में किसी प्रकार के निषेधभाव ( इन्हिबिशन्स) न होने के कारण यह यथार्थ बहुआयामी और अत्यंत व्यापक है। इसीलिए नई कहानी में एक प्रकार का अपूर्व वैविध्य दिखाई देता है।’’56 यह विविधता व्यक्ति की प्रवृत्तियों से लेकर समाज, गांव, शहर, कस्वा और महानगर तक सभी स्तरों पर विद्यमान है। सन् 1950 से लेकर 1960 के बीच की कहानियों को नई कहानी नाम से जाना जाता है, अभिहित किया जाता है। इसमें ‘व्यक्ति के संदर्भ में समाज को देखने की प्रवृत्ति है।’ रामचन्द्र तिवारी के शब्दों में ‘‘कहानी पढ़ते हुए पहले हमारा ध्यान व्यक्ति पर जाता है। व्यक्ति खोया-खोया, टूटा-टूटा या अपने को अजनबी अनुभव करता हुआ दिखाई पड़ता है। उसकी इस मनःस्थिति का कारण सामाजिक विघटन है। इस प्रकार व्यक्ति से हो कर समाज तक पहुंचते हैं।’’57 

हिन्दी कहानी में गांव और आंचलिकता का चित्रण एवं उसका सौन्दर्य बहुत ही मार्मिक ढंग से हुआ है। जहां गांव का मतलब होता है विभिन्न जातियों व समुदायों के जीवन के बारे वर्णन। ‘भारतीय गांव अलग से सामाजिक इकाई है। उसमें भिन्न-भिन्न जातियां होती है।’ इसका विशद वर्णन प्रेमचन्द की रचनाओं में मिलता है। वहीं आंचलिकता की शुरूआत फणीश्वरनाथ रेणु की ‘मैला आंचल’ से होती है। उनकी कहानियों में अंचल विशेष की जिंदगी सचित्र झांकती है। फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियां ‘लाल पान की बेगम’ और ‘तीसरे कदम उर्फ ‘मारे गये गुलफाम’ इसकी सशक्त उपस्थिति हैं। शेखर जोशी की कहानी ‘कोसी का घटवार’ और शिवप्रसाद सिंह की कहानी ‘कर्मनाशा की हार’ में गांव की छवि पूरी की पूरी उतर कर आयी है। लेकिन नई कहानी तक आते-आते कहानी का कथ्य गांव से अलग कस्बा, नगर और महानगरीय जीवन का हो जाता है। नगरीय जीवन का चित्रण नई कहानी के केन्द्र में रहा है। मोहन राकेश की कहानी ‘ग्लासटैंक’ और कमलेश्वर की कहानी ‘खोई हुई दिशाएं’ में महानगरीय जीवन का सफल चित्रण हुआ है। जिसमें जीवन को विभिन्न संदभों और स्थितियों में दर्शाया गया है। नई कहानी में चित्रित कथा और पात्रें के जीवन के संदर्भ में राजेन्द्र मिश्र ने लिखा है कि ‘‘नई कहानी में स्थितियों का संदर्भ व्यापक रूप से मिलता है और वे केवल पात्र केंद्रित कथाएं नहीं है। जीवन के व्यापक स्तर पर इन पात्रें को रचा गया है।’’58 अर्थात जीवन के विभिन्न संदर्भों में पात्रें को रचा गया है। वह अपनी कमजोरियों के साथ स्थिति एवं परिस्थितियेां के बीच घिरा होता है। नई कहानी की संवेदना मध्यवर्गीय जीवन की संवदेना है। व्यापक फलक पर नई कहानी के पात्र मध्यवर्गीय जीवन से ताल्लुक रखता है। मध्यवर्गीय जीवन के संघर्ष की कहानी ही नई कहानी की संवेदना में व्यापकता से उजागर होती है।

नई कहानी की प्रवृत्तियों को इस प्रकार देखा जा सकता है। यह प्रवृत्तियां कथ्यगत और शिल्पगत दोनों है-कथ्यगत विशेषताएं यथार्थ के प्रति नया रूख, संबंधों के बदलाव का बिन्दु, दांपत्यगत दूरियों की ईमानदार स्वीकृति, नारी पुरूष के प्रकृत काम संबंधों का स्पष्ट स्वीकार, मध्यवर्गी य जीवन और व्यक्ति कहानी के केन्द्र में, महानगरीय जीवन बोध, मूल्यों और मान्यताओं में परिवर्तन, विद्रोह भाव, विदेश से आयातित विचारदर्शनों का प्रभाव मार्क्सवाद, अस्तित्ववाद, पूंजीवाद, व्यक्तिवाद आदि, वैयक्तिक चेतना का प्रकाशन, वैज्ञानीकरण, औद्योगिकीकरण और तकनीकी उन्नति के प्रभाव, विदेशी सभ्यता और संस्कृति का प्रभाव, परिवेश के प्रति जागरूकता, प्रत्येक स्तर पर रोमानीबोध से मुक्ति आदि हैं। वहीं शिल्पगत विशेषताएं भाषा की समर्थ अभिव्यंजना, भाषा का स्वाभाविक अलंकरण, सशक्त बिंब विधान, प्रतीकात्मकता, कथानक के स्थान पर वातावरण परिवेश चित्रण का महत्व, पूर्व दीप्ति पद्धति, समानांतर एवं दुहरे कथानक, पात्रें के नाम और वर्ग का लोप (व्यक्तिवाची संज्ञाओं के स्थान पर सर्वनामों का प्रयोग), निष्कर्षहीन कहानियां(नीति कथाओं जैसे निष्कर्ष नहीं है), कहानी में गद्य की अन्य विधाओं की अंतर्भुक्ति, कहानी में लघुता या दीर्घता (आकार-सीमा) का निषेध आदि हैं।59

नई कहानी के संदर्भ में कमलेश्वर का यह कथन मार्मिक है कि ‘‘स्वतंत्रता के बाद पहली बार नई कहानी ने आदमी को आदमी के संदर्भ में प्रस्तुत किया है, शाश्वत मूल्यों की दुहाई देकर नहीं, बल्कि उस आदमी को उसी के परिवेश में सही आदमी या मात्र आदमी के रूप में अभिव्यक्ति देकर।’’60 अर्थात नई कहानी में व्यक्ति आदमी किसी शाश्वत मूल्यों को लेकर उपस्थिति नहीं हुआ है। वह परिस्थिति और परिवेश से बंधा हुआ है। वह ‘‘मनुष्य को उसके परिवेश में अन्वेषित करती है। और मानव नियति एवं उसके संकट के द्वंद्व को व्यक्त करती है।’’61 ‘‘नई कहानी में मात्र सामान्य मनुष्य ही अवतरित हुआ है, अपनी सारी खामियों, कमियों और अच्छाईयों के संदर्भ में।—नई कहानी का व्यक्ति (या मनुष्य)इन सब विविध अनुभवों के संदर्भ में ज्यादा प्रौढ़ और संयत है, ज्यादा सही और सच्चा औसत आदमी है।’’62 कमलेश्वर के अनुसार ‘‘नई कहानी आग्रहों की कहानी नहीं है, प्रवृत्तियों की हो सकती है और उसका मूल स्रोत है-जीवन का यथार्थबोध और इस यथार्थ को लेकर चलने वाला वह विराट मध्य और निम्न वर्ग है जो अपनी जीवन शक्ति से आज के दुर्दांत संकट को जाने-अनजाने झेल रहा है। उसका केन्द्रीय पात्र है (अपने विविध रूपों और परिवेशों में) जीवन को वहन करने वाला व्यक्ति।’’63 इस प्रकार कहा जा सकता है कि जटिल जीवन यथार्थ की व्यापक स्वीकृति नई कहानी की केन्द्रीय प्रवृत्ति है। जिसमें व्यक्ति की प्रतिष्ठा, छिछली भावुकता का ह्रास, मध्यवर्गीय जीवन चेतना, आधुनिकता बोध, सांकेतिकता आदि को सहज ही पहचान की जा सकती है।

किसी भी विषय वस्तु का सौन्दर्य उसकी सार्थकता में निहित होता है। हिन्दी कहानी की सार्थकता की बात करते हुए नामवर सिंह लिखते हैं कि ‘‘कहानी का यह दुर्भाग्य है कि वह मनोरंजन के रूप में पढ़ी जाती है और शिल्प के रूप में आलोचित होती है। मनोरंजन उसकी सफलता है तो शिल्प सार्थकता। यदि शास्त्रीय आलोचक कहानी को केवल साहित्य रूप समझते हैं तो मूल्यवादी आलोचक उसे जीवन की सार्थक अनुभूतियों के लिए असमर्थ मानते हैं।—आज कहानी की सफलता का अर्थ है कहानी की सार्थकता। आज किसी कहानी का शिल्प की दृष्टि से सफल होना ही काफी नहीं है बल्कि वर्तमान वास्तविकता के सम्मुख उसकी सार्थकता भी परखी जानी चाहिए। जीवन के जिन मूल्यों की कसौटी पर हम कविता, उपन्यास आदि साहित्य रूपों की परीक्षा करते हैं, उन्हीं पर कहानी की भी परीक्षा होनी चाहिए। इससे कहानी समीक्षा का एक ढांचा तो तैयार होगा ही_ साथ-साथ मानवीय मूल्यों के संबंध में हमारा ज्ञान भी बढेगा और संपूर्ण साहित्य के मानों की अपर्याप्तता भी क्रमशः कम होगी।’’64 

हिन्दी कहानी की आलोचना में कहानी के भाषा-शिल्प सौन्दर्य पर लगातार बल दिया जाता रहा है। नामवर सिंह के अनुसार, ‘‘कहानी शिल्प संबंधी आलोचनाओं ने कहानी की जीवनी शक्ति का अपहरण कर उसे निर्जीव ‘शिल्प’ ही नहीं बनाया है बल्कि उस शिल्प को विभिन्न अवयवों में काटकर बांट दिया है। लिहाजा, हम कहानी को ‘कथानक’, ‘चरित्र’, वातावरण’, भावनात्मक प्रभाव’, विषयवस्तु’, आदि अलग-अलग अवयवों के रूप में देखने के अभ्यस्त हो गये है।’’65 वर्तमान कहानियों में जहां कहीं शिल्पवादी प्रवृत्ति का अतिरेक दिखाई पड़ता है, उसका संबंध किसी न किसी रूप में कहानी की विभक्त धारणा से अवश्य है। ‘‘यदि कोई कहानीकार शिल्प के किसी विशेष अवयव की रचना करके सफलता का ढोल पीटता है तो यही समझना चाहिए कि वह कहानी को एक शिल्प समझता है।’’66 नामवर सिंह के अनुसार ‘‘कहानी का मूल तत्व कहानीपन है। लय की तरह कहानी कहना मनुष्य की काफी पुरानी कलात्मक वृत्ति है और इसकी रक्षा अपने आप में स्वयं भी एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्य है और इतिहास से प्रमाणित होता है कि नीति, लोक-व्यवहार, धर्म, राजनीति आदि विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस कला का उपयोग करते हुए भी मानव-जाति ने आज तक इसकी रक्षा की है। निःसंदेह इस कला का चरम विकास आधुनिक युग में हुआ जब उद्देश्य और कहानीपन दोनों घुल-मिलकर इस तरह हो गये कि उद्देश्य से अलग कहानी के रूप की कल्पना भी कठिन हो गई।’’67 अर्थात कहानी के उद्देश्य में ही उसका सौन्दर्य छिपा होता है। कहानीपन उसका अनिवार्य तत्व है। ‘कहानी की कहानीपन की सफलता का अर्थ है उनकी अर्थवत्ता या सार्थकता।’ कहानियों का अध्ययन केवल सोद्देश्यकता की पृष्ठभूमि में ही किया जा सकता है।68 अंतर्विरोध को उसकी संपूर्ण तीव्रता में ग्रहण करके ही किसी कहानी को सफल और सार्थक बनाया जा सकता है।69 

नई कहानी में संप्रेषणीयता का सवाल महत्वपूर्ण सवाल बन कर उभरा है। संप्रेषणीयता’ की कठिनाई केवल भाषा या साहित्यिक माध्यम की कठिनाई नहीं है, बल्कि किसी गहरे सांस्कृतिक संकट का लक्षण है। नामवर सिंह के अनुसार ‘‘नई कहानी का समूचा रूपगठन(स्ट्रक्चर) और शब्द गठन(टैक्स्चर) ही सांकेतिक है।’’70 ‘प्रभावान्विति’ कहानी में उतनी पुरानी है जितनी स्वयं आधुनिक कहानी। किंतु प्रभाव की संपूर्ण अन्विति को सांकेतिक बनाने का श्रेय एकदम नई कहानी को है। नई कहानी संकेत करती नहीं, बल्कि स्वयं संकेत है।’ नई कहानी में वातावरण अंतःकरण है। वातावरण निर्माण में नये कहानीकार प्रायः बिम्ब विधान का सहारा लेते हैं। नामवर सिंह के अनुसार ‘‘नई कहानी के प्रसंग में यदि ‘संप्रेषणीयता’ का कोई अर्थ हो सकता है, तो रस-बोध के विविध स्तरों की प्रेषणीयता।’’71 ‘कहानी में प्रतीक और संकेत का एक दूसरा पहलू यह भी है कि वह कहानी को विचार शून्य करता है। यह एक बड़ा संकट है साहित्य में कहानी के लिए।’72 ‘प्रतीक संकेत की पद्धति से भाषा में जहां एक ओर अर्थवत्ता आयी है, वहां दूसरी ओर उस पर अनावश्यक काव्यात्मकता का लदाव भी हुआ है।’’73 

इस प्रकार हिन्दी कहानी में नई कहानी के बाद आंदोलन के तौर पर, अकहानी, सहज कहानी, सक्रिय कहानी, जनवादी कहानी और समकालीन आदि की अवधारणा आती है। राजेन्द्र मिश्र के अनुसार ‘‘वस्तुतः 1950 से नयी कहानी का स्वरूप सामने आया है। 20वीं शताब्दी के अंतिम 50 वर्षों में कविता के समान कहानी के भी अनेक आंदोलन चले हैं। यदि गहराई से देखा जाये तो वे सभी नयी कहानी का ही अलग-अलग रूपों में विस्तार है। सामाजिक स्थितियों और व्यक्ति मनोविज्ञान के आधार पर उन्हें रचा गया है। भारत जैसे गरीब देश में आर्थिक विषमता बहुत गहरी है और कहानियों के माध्यम से उसे विभिनन आंदोलनों का नाम देकर भी वर्ग संघर्ष को उभारा गया है। रोमानी भाव की वजाय कहानियों में वर्ग संघर्ष को अधिक चित्रित करने का प्रयास उसे सामाजिक यथार्थवाद से जोड़ने का ही उपक्रम है। कहानी के आंदोलनों का आधार शिल्पगत उतना नहीं है जितना कि वह विचारगत है। कहानी का विषय भी व्यापक होता गया है और निम्न-से-निम्न वर्ग के जीवन पर भी कहानी लिखी जाती है। आभिजात्य की बजाय वह यथार्थ से जुड़ी है। अतः कहानी के विभिन्न आंदोलन अलग-अलग न होकर उस नयी कहानी का ही विस्तार हैं जिसे हम आज की कहानी भी कह सकते हैं।’’74

समकालीन कहानी आंदोलन के पृष्ठभूमि में 1965 की राजनैतिक चेतना है और उसकी चुनौतियां हैं। समकालीन कहानी का उद्देश्य ‘‘समाजवाद की स्थापना के लिए वर्तमान चरण में मजदूर किसान की मित्रता के आधार पर सच्चे जनतंत्र की स्थापना। समकालीन कहानी इसे समझते हुए इसके लिए संघर्षरत है। यह साम्प्रदायिक संकीर्णता, जातिवाद, विघटनवाद और अंध राष्ट्रवाद और भाषा तथा क्षेत्रीयता के नाम पर हमारी जनता और राष्ट्र की एकता को तोड़नेवाली शक्ति का पूरी शिद्दत से विरोध करता है।’’75 समकालीन भारतीय समाज धर्म, जाति, उपजाति, नस्ल जैसे संकीर्ण खानों में बांटता जा रहा है। इन खानों को मिटाने की कोशिश हम सालों से कर रहे हैं। इसका प्रत्यक्ष उत्तरदायी हमारे राजनीतिक एवं धार्मिक नेताओं की स्वार्थता और तंग दृष्टि ही है। ‘‘समकालीन कहानी के केंन्द्र में जो आम आदमी है, उनकी दुनिया धर्म और साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वालों से अलग है, उनसे घृणा करती है, उनकी नैतिकता पर शक करती है, उनके देशप्रेम की वास्तविकता की पड़़ताल करती है और साथ ही उनकी ईमानदारी की धज्जियां उड़ाती है।’’76 अर्थात समकालीन विमर्श के दौर में धर्म और साम्प्रदायिकता की राजनीति की पड़ताल करती है हिन्दी कहानी का सौन्दर्य और एक मानुषसत्य की ओर बढ़ने की चाहत पैदा करती है।

निष्कर्षः

इस प्रकार देखा जा सकता है कि हिन्दी कहानी का सौन्दर्य एक विकास प्रक्रिया में लगातार बदलता रहा है। इस बदलाव की प्रक्रिया में प्रेमचन्द की संवेदना और रचनात्मक कला की भूमिका अहम रही है। लेकिन उसके बाद कहानी की संवेदना मध्यवर्गीय जीवन से जुड़ती गई। उनकी इच्छा, आकांक्षाओं को ही व्यक्त करती है। ‘‘प्रेमचन्दोत्तर कहानी विशेषकर नई कहानी मूलतः मध्यवर्गीय नगरीय जीवन के यथार्थ से जुड़ी रही है। इस कहानी का संसार मानव-मानव के बनते बिगड़ते संबंधी और उनके बदलते मूल्यों की तलाश, परंपराबोध और आधुनिकता की टकराहट, सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों से उत्पन्न मानवीय विकृतियों को भोगे हुए यथार्थ के धरातल पर चित्रित करता है। इतना होते हुए भी दलित इन कथाकारों द्वारा नजर अंदाज कर दिया गया। सातवें दशक की कहानी में भी दलित चेतना को उभारने का प्रयास नहीं किया गया। हिन्दी कथा साहित्य में दलित चेतना की अभिव्यक्ति के दृष्टिकोण से आठवां दशक महत्वपूर्ण है।’’77 अर्थात हिन्दी में दलित चेतना का लेखन सन् 1980 के आस-पास से शुरू होता है। दलित जीवन से संबंधित रचनाएं हिन्दी साहित्य में मिलती रही हैं लेकिन उसकी संवेदना सहानुभूति की रही है दलित चेतना की नहीं। दलित जीवन से संबंधित रचनाएं जिसकी विरासत प्रेमचन्द ने आने वाली पीढ़ी को सौंपा उसका वहन परवर्ती हिन्दी लेखकों की रचनाओं में नहीं के बराबर मिलती हैं। राजनीति स्तर पर दलितों की समस्याएं उजागर होती रही हैं लेकिन हिन्दी में रचनात्मक स्तर पर दलितों की समस्याओं का चित्रण मुकम्मल तौर पर नहीं हुआ है। यदि कहीं हुआ भी है तो सहानुभूति के स्तर पर उसका चित्रण हुआ है। उनमें चेतना की कमी है। दलित लेखन दलित चेतना और आंदोलन की उपज है। प्रेमचन्द साहित्य में जिस सौन्दर्य की कसौटी बदलने की बात कर रहे थे, उसकी कमी हिन्दी कहानी लेखन में है, उसका सौन्दर्य जरूर बदल गया है लेकिन उसकी तीव्रता प्रेमचन्द की साहित्य की कसौटी नहीं रही है। प्रेमचन्द साहित्य में जिस सौन्दर्य मूल्यों की स्थापना करते रहे और साहित्य की कसौटी को बदलने की बात करते रहे हैं। जिन साहित्यिक मूल्यों को आने वाली पीढ़ी को सौपा, वह वहीं के वहीं रह गया। प्रेमचन्द की विरासत उनकी लेखनी की अंतिम सांसों के साथ ही थम गई। आने वाला समय अपने ढंग से साहित्य की संवेदना और सौन्दर्य को रेखांकित करने लगा। उसे संचित करने लगा। कहानी का सौन्दर्य जिस व्यापकता में प्रेमचन्द की रचना में रचा-बसा है। उसका विकास हिन्दी में नहीं हो सका। सौन्दर्य की जिन कसौटी को प्रेमचन्द ने साहित्य में जगह दी थी, उसका ह्रास प्रेमचन्द युग में देखा जा सकता है। नई कहानी का सौन्दर्य स्वाधीनता के मोहभंग और आर्थिक निर्भरता या फिर स्त्री-पुरुष संबंधों में खो गया। सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास सामाजिक जड़ता की ओर संकेत है और हिन्दी कहानी का सौन्दर्य स्वाधीनता के साथ इसी का शिकार है। नई कहानी का सौन्दर्य वैचारिकता की दृष्टि से बहुत ही कमजोर रही है। राजनीति विचारों का नई कहानी में जगह नहीं मिलना उसी का परिणाम है। सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों एवं विचारों की दृष्टि से नई कहानी और उसके बाद की कहानी का सौन्दर्य सामाजिक फूहड़ता का शिकार रहा है। यही कारण है सामाजिक-सांस्कृतिक संसाधनों पर ब्राह्मणवादी मानसिकता की कब्जा रही है और वे मूल्यों के नियंता रहे हैं। कहानी का सौन्दर्य इस जड़ता, फूहड़ता और नियंता को समाप्त कर सकता था लेकिन ऐसा करने में सक्षम नहीं रहा। समय सापेक्ष कहानी की संवेदना का स्वरूप बदलता रहा है लेकिन सौन्दर्यबोध सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों की सामाजिकता से बाहर रहा है। जिसकी पूरी संभावना थी कि स्वाधीन भारत में समाज के सभी समुदाय की संवेदनाएं, समस्याएं, इच्छाएं, आकांक्षाएं और स्वप्नों की अभिव्यक्ति होगी और उसके मूल्यों का सौन्दर्य भारत को नये क्षितिज पर पहुंचाएगा। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कहानी के सौन्दर्यबोध में इतिहासबद्ध समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना हो रही है।

 

संदर्भ ग्रंथसूची:

1- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 45

2- रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी, संवत, 2058, पृ- 267 भारतेन्दु मंडल मनोरंजक साहित्यनिर्माण द्वारा हिन्दी गद्य साहित्य की स्वतंत्र सत्ता का भाव ही प्रतिष्ठित करने में अधिकतर लगा रहा।

3- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 55

4- प्रेमचन्द, साहित्य का उद्देश्य, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 2001, पृ- 47

5- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 55

6- प्रेमचन्द, साहित्य का उद्देश्य, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 2001, पृ- 47

7- पुष्पपाल सिंह, समकालीन कहानी: नया परिप्रेक्ष्य, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, 2011, पृ- 83

8- वही, पृ- 80

9- वही, पृ- 81

10- वही, पृ- 83

11- वही, पृ- 84

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13- डॉ- रामचन्द्र तिवारी, हिन्दी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 2009, पृ- 294

14- प्रेमचन्द, मानसरोवर भाग -1 प्राकथन, पृ- 6

15- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 60

16- वही, पृ- 69

17- वही, पृ- 71

18- शिवदान सिंह चौहान, हिन्दी साहित्य के अस्सी वर्ष, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृ- 154

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20- शिवदान सिंह चौहान, हिन्दी साहित्य के अस्सी वर्ष, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृ- 158

21- वही, पृ- 159

22- वही, पृ- 160

23- डॉ- सुभाष चन्द्र दलित मुक्ति आंदोलनःसीमाएं और संभावनाएं, आधार प्रकाशन, पंचकूला, 2010, पृ- 30

24- प्रेमचन्द की संपूर्ण कहानियां, (खंड-1), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ- 342

25- वही, पृ- 347

26- वही, पृ- 343

27- रामविलास शर्मा, प्रेमचन्द और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1989, पृ- 114

28- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 74

29- वही, पृ- 76

30- वही, पृ- 77

31- रामविलास शर्मा, प्रेमचन्द और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1989, पृ- 115

32- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 85

33- वही, पृ- 89

34- वही, पृ- 135

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41- वही, पृ- 168

42- वही, पृ- 169

43- वही, पृ- 170

44- वही, पृ- 175

45- वही, पृ- 181

46- वही, पृ- 31

47- डॉॅ- नंद कि}ाोर नीलम, सौन्दर्य}ाास्त्र के बदलते प्रतिमान और समकालीन कहानी का चरित्र, दस्तक, बारह, पृ- 95

48- प्रेमचन्द, साहित्य का उद्देश्य, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 2001, पृ- 20

49- डॉॅ- नंद कि}ाोर नीलम, सौन्दर्य}ाास्त्र के बदलते प्रतिमान और समकालीन कहानी का चरित्र, दस्तक, बारह, पृ- 96-97

50- वही, पृ- 98

51- वही, पृ- 100

52- डॉ- राजेन्द्र मिश्र, कहानी आंदोलन और प्रवृत्तियां, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009, पृ- 11

53- कमलेश्वर, नई कहानी की भूमिका, अक्षर प्रकाशन, दिल्ली 1969, पृ- 32

54- राजेन्द्र यादव, कहानी स्वरूप और संवेदना, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृ- 79

55- महोन राकेश, नया बादल, भारतीय ज्ञानपीठ, काशी, 1957, पृ- 7

56- पुष्पपाल सिंह, समकालीन कहानी: नया परिप्रेक्ष्य, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, 2011, पृ- 89

57- डॉ- रामचन्द्र तिवारी, हिन्दी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 2009, पृ- 302

58- डॉ- राजेन्द्र मिश्र, कहानी आंदोलन और प्रवृत्तियां, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009, पृ- 14

59- पुष्पपाल सिंह, समकालीन कहानी: नया परिप्रेक्ष्य, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, 2011, पृ- 117

60- कमलेश्वर, नई कहानी की भूमिका, अक्षर प्रकाशन, दिल्ली, 1969, पृ 70

61- वही, पृ- 143

62- वही, पृ- 171

63- कमलेश्वर, मांस का दरिया, आत्मकत्य, पृ- 7

64- नामवर सिंह, कहानी नयी कहानी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2002, पृ- 19

65- वही, पृ- 20

66- वही, पृ- 21

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69- वही, पृ- 27

70- वही, पृ- 32

71- वही, पृ- 34

72- वही, पृ- 35

73- वही, पृ- 36

74- डॉ- राजेन्द्र मिश्र, कहानी आंदोलन और प्रवृत्तियां, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009, पृ- 35

75- डॉ राजेन्द्र कुमार साव, समकालीन हिन्दी कहानी में सांप्रदायिकता के प्रतिरोधी स्वर, कथाक्रम, जुलाई सितम्बर 2013, पृ- 62

76- वही, पृ- 65-66

77- एन- सिंह, दूसरी दुनिया का यथार्थ, सं- रमणिका गुप्ता, नवलेखन प्रकाशन, हजारीबाग, 1997 पृ- 15

 

हिन्दी कविता की परम्परा में ग़ज़ल-डा. जियाउर रहमान जाफरी

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green and yellow leaf trees
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हिन्दी कविता की परम्परा में ग़ज़ल

डा. जियाउर रहमान जाफरी
हाई स्कूल माफ़ी +2, वाया -अस्थावां
जिला -नालंदा 803107, बिहार
9934847941, 6205254255
Zeaurrahmanjafri786@gmail. Com

सारांश

गजल हिंदी की बेहद लोकप्रिय विधा है. यह जब उर्दू से हिंदी में आई तो इसने अपना अलग लहजा अख्तियार किया. उर्दू का यह प्रेम काव्य हिंदी में जन समस्याओं से जुड़ गया. ग़ज़ल की परंपरा भले खुसरो कबीर या भारतेंदु होते हुए आगे बढ़ी हो, लेकिन ग़ज़ल को एक विधा के तौर पर स्थापित करने का काम दुष्यंत ने किया. आलोचना के स्तर पर भी आज ग़ज़ल को स्वीकारा जा रहा है. हिंदी के कई गजलगो दुष्यंत के बाद की इस परंपरा को संभाले हुए हैं.

बीज शब्द: ग़ज़ल, छांदसिकता, नुमाइंदगी, सत्ता, बगावत, विषमता, तकनीक, संगीतात्मकता, लयात्मकता, शिल्प, परिवेश.

आमुख

हिंदी साहित्य की विधाओं में कविता की परंपरा सबसे प्राचीन है. मनुष्य ने जब से बोलना शुरू किया था तब से गुनगुनाने की भी प्रवृति जागृत हुई और इसी गुनगुनाहट के रास्ते से कविता का जन्म हुआ. हिंदी साहित्य का एक तिहाई इतिहास कविता की परंपरा से भरा हुआ है. हर दौर में सबसे ज्यादा संख्या में कविताएं लिखी गईं. उसकी वजह यह थी कि कविता का असर जनसामान्य पर ज्यादा होता था. वीरगाथा कालीन कवि राजा की प्रशस्ति के लिए सबसे प्रभावोत्पादक माध्यम कविता ही समझते थे.

किसी भी रचना का कविता होने के साथ ही यह लाजिम हो जाता है कि उसके प्रस्तुतीकरण, उसके स्वभाव के अनुकूल हो उसमें छांदसिकता, गीतात्मकता प्रवाह,लयऔर छंदशास्त्र का पालन किया गया हो. रहीम कबीर और वृंद के दोहे इसलिए प्रसिद्ध हुए के इसमें छंद का निर्वाह किया गया था साथ थी उसमें ज्ञान उपदेश और जीवन गुजारने के तौर तरीके को भी समझाया गया था.

कालांतर में खासकर छायावाद के समय से कविता को छंद मुक्त करने की प्रवृत्ति चली. निराला ने जूही की कली में यह प्रयोग किया यह अलग बात है कि सरस्वती पत्रिका ने इस कविता को वापस कर दिया था. इसे वापस करने के पीछे उसका प्रस्तुतीकरण तो था ही सुधारवादी दौर की यह कविता रीतीकालीन घोर श्रृंगारिकता की तरफ वापस जा रही थी. छायावाद में छंद मुक्त और छंद युक्त दोनों प्रकार की कविताएं लिखी गईं. छायावाद के बाद प्रयोगवाद का दौर शुरू हुआ. फिर प्रयोगवाद नई कविता का जामा पहनकर प्रबुद्ध जनों की ओर पहुंच गई.अज्ञेय ने तार सप्तक का प्रकाशन किया और यह वह दौर था जहां कविताएं छंद से पूरी तरह आजाद हो गई थी इसे नई कविता का नाम दिया गया.

कविता जबसे छंद से दूर हुई वह आम जनों से कट गई थी. साधारण लोगों को इससे ने कविता का स्वाद मिलता था और ने उसकी भाषा और शैली समझ आती थी. प्रगतिवाद में जिस मजदूर की बात की जा रही थी वह कविता मजदूरों को समझ ही नहीं आ रही थी. ऐसा भी नहीं था कि मुक्त छंद की कविताएं छंद से बिल्कुल मुक्त थीं लेकिन उसमें छांदसिकता का कोई नियम नहीं था. जो नियम दोहे चौपाई, गीत, या गजलों में दिखलाई देते हैं. समकालीन हिंदी कविता ने माना के बातें महत्वपूर्ण है छंद द्वितीय चीज है. छंद के बंधन से अभिव्यक्ति में बंदिशआती है इसलिए इस कालखंड में जो कविताएं लिखी गईं वह किसी नियम कायदे से शुरू नहीं होती थी अगर तुक मिल गया तो ठीक है अगर नहीं भी है तो वह कविता है क्योंकि उसमें रस की प्राप्ति हो रही है. इस संदर्भ में समकालीन हिंदी कविता के कुछ महत्वपूर्ण हस्ताक्षर की पंक्तियां देखी जा सकती हैं –

आँखें मुंद गईं

सरलता का आकाश था

जैसे त्रिलोचन की रचनाएं

नींद ही इच्छाएं

-शमशेर

मत ब्याहना उस देश में

जहां आदमी से ज़्यादा

ईश्वर बसते हों

-निर्मला पुतुल

तुम्हारी देह से छूटा हुआ

पहला बच्चा

रो रहा था तुम्हारी देह के किनारे

और तुम्हारी छाती से

दूध नहीं छूट रही थी

-अरुण कमल

माँ मेरे अकेलेपन के बारे में सोच रही है

पानी गिर नहीं रहा

पर गिर सकता है किसी भी समय

-केदारनाथ सिंह

आजकल कबीरदास जख्म

शहर और आदमी नींव के पत्थर

-कुंवर नारायण

जाहिर है यह कविताएं कविता होने के बावजूद अपने समय की नुमाइंदगी तो कर रही थी. पर कवि जिस तौर से अपने को अभिव्यक्त कर रहे थे पाठक वर्ग उस रूप में उसे अख्तियार नहीं कर पा रहा था. कविता एक तरह से आम लोगों से कट गई थी. यह पढ़े-लिखे प्रबुद्ध वर्ग तक सीमित गई थी. कबीर के सीधे-सादे दोहे समझने वाली जनता नए कवि की इस कविता को नहीं समझ पा रही थी कि कवि क्या कहना चाह रहा है.

ऐसे ही नाजुक वक्त के नब्ज़ को दुष्यंत ने टटोला, और गजल के साथ उन्होंने एक प्रकार से छंद की वापसी की. पाठकों ने समझा कि ग़ज़ल ही वह माध्यम है जिसमें मेरी बात मेरी ही जुबान में कही जा रही है. दुष्यंत के सिर्फ एक संकलन साये में धूप ने ग़ज़ल का वह माहौल पैदा किया के समकालीन अन्य कविताओं की प्रवृतियां वह असर पैदा नहीं कर सकीं. दुष्यंत ने नई कविता, गीत और हिंदी कहानी से गजल में पदार्पण किया था. उन्होंने महसूस किया कि ग़ज़ल के लहजे में ही हिंदी कविता की वापसी हो सकती है. उन्होंने जो शेर लिखे वह तमाम लोगों के दर्द की कहानियां कह रहे थे. लोगों को लग रहा था ये भले दुष्यंत के शेर हों बातें तो उनकी ही है. उनका शेर सत्ता से बगावत कर रहा था वह भी यहां तक के पंडित नेहरू को भी इसकी नोटिस लेनी पड़ी. दुष्यंत के कुछ ऐसे शेर देखे जा सकते हैं जो आपने दौर के नाजुक लम्हों को पूरी जिम्मेवारी से रखते हैं-

कैसे मशाल ले के चले तीरगी में आप

जो रोशनी थी वह भी सलामत नहीं रही

यह ज़ुबाँ हमसे सी नहीं जाती

जिंदगी है कि जी नहीं जाती

अब नई तहज़ीब के पेशे नज़र हम

आदमी को भूनकर खाने लगे हैं

पक गई है आदतें बातों से सर होगी नहीं

कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं

समकालीन कविता जो एक समय अपनी भाषा शैली, असहजता और अतिशयोक्ति के कारण समाज से कट गई थी. उस वातावरण में गजल ने अपने खूबसूरत लहजे में हर सामाजिक शोषण और विषमता के खिलाफ अपनी उपस्थिति दर्ज की. गजल में प्रेम की भी बात थी और प्रकृति की भी प्रेम और प्रकृति छायावाद की कविताओं में भी था, लेकिन छायावादी कवि मिट्टी से जुड़े हुए नहीं थे इसलिए दिनकर ने भी छायावाद के खिलाफ स्वच्छंदतावाद की बुनियाद रखी और मिट्टी की ओर लौटने का आग्रह किया.ग़ज़ल अपने लबो लहजा अपनी तकनीक अपने मुहावरे, कहन और गीतात्मकता के कारण पाठकों की पसंद बन गई. उर्दू गजल में जिस प्रेम का जिक्र था हिंदी गजल में आकर वह मानव प्रेम में बदल गया.यही वजह है कि भारतेन्दु भी इसे नजरअंदाज नहीं कर सके और उन्होंने ग़ज़ल शैली में कई रचनाएं लिखी . हिंदी गजल मधुचर्या से दूर थी. वहां जो प्रेम था उसमें पाकीज़गी थी प्रयोगवादी कविता की तरह वहां रक्त खोला देने वाला चुंबन नहीं था वह यह नहीं कहती थी कि-

काम है अभिशप्त

तुम कहां हो नारि

बल्कि वह प्रेम में पर्दे की हिमायती थी. गजल की फितरत ही है कि वह पूरी खुल नहीं पाती. वह इशारों में बात करती है. इसलिए वह अपने प्रेम का बयान बस इतना कह कर कर देता था कि

कोई भी ख़त हो लेकिन मुख़्तसर अच्छा नहीं लगता

लिफाफे में महल तितली का पर अच्छा नहीं लगता

मेरी चाहत पर शक करते हुए यह भी नहीं सोचा

तुम्हारे पास क्यों आते अगर अच्छा नहीं लगता

हिंदी कविता से अलग ग़ज़ल की यह विशेषता थी कि उसका हर शेर अपने आप में पूर्ण होता था एक शेर को समझने के लिए दूसरे शेर को पढ़ने की कतई जरूरत नहीं थी पर कविता की स्थिति थोड़ी भिन्न है. बिना पूरी कविता पढ़े इस निष्कर्ष पर पहुंचना कठिन होता है कि कवि क्या कहना चाह रहा है? गजल का सौंदर्य, उसका लचीलापन, भाव भंगिमा, संगीतात्मकता और प्रवाह ने इसे एक कविता की जरूरी विधा के तौर पर स्थापित कर दिया. आलोचक गजल को कविता मानने से इनकार करते रहे, पर पाठकों की स्वीकृति उसे मिलती रही. आज स्थिति यह है कि कविता का मतलब ही ग़ज़ल समझा जाने लगा है, और ग़ज़ल का मतलब दुष्यंत कुमार हैं जैसा के नचिकेता ने भी लिखा है दुष्यंत की ग़ज़लें आज हमें बेचैन और प्रेरित करती हैं.1

गजल के साथ कविता छंद के रूप में वापस होती है गीत दोहे भी छान्दसिक विधा हैं लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं. गीत का मर्म बिना सुर ताल के समझ नहीं आता. दोहा का लहजा उपदेश और नीतिपरक है, लेकिन हिंदी गजल की अपनी क्षमता है इसका शरीयत हमें मुतासिर करता है. ग़ज़ल हर सुख दुख को हर्ष विषाद को आशा आकांक्षा को अपना विषय बनाती है. आर पी शर्मा महर्षि के अनुसार गजल समसामयिक जीवन उपयोगी तथा अपनी धरती और परिवेश से जुड़ी हुई है.2 हम कह सकते हैं कि हिंदी गजल जिस सामाजिक चिंता से गुजरती है वह उसे दीर्घ जीवी बनाती है. किसी भी कविता का जनजीवन का सरोकार जितना गहरा होता है वह रचना उतनी प्रभावी होती है. ग़ज़ल के बारे में डॉक्टर इंद्रनाथ सिंह का मानना है छांदसिकता, गीतात्मकता आदि कारकों के साथ जीवन के सभी पक्षों को सहजता के साथ अभिव्यक्त करने की अद्भुत क्षमता ने ही हिंदी कविता में ग़जल के मार्ग को सुगम किया.3 असल में ग़ज़ल लिखना इतना सरल भी नहीं है उसका अपना ढांचा है, और अगर वह प्रभावित न कर सके तो ग़ज़ल भी नहीं है. डॉक्टर नरेश ने ग़ज़ल को एक कष्ट साध्य विधा माना है.4 ग़ज़ल का अपना एक शिल्प है, और उस शिल्प में ही ग़ज़ल ग़ज़ल बनती है हिंदी कविता में ग़ज़ल ने अपने तौर तरीके से ही लोगों को प्रभावित किया है. डॉक्टर सरदार मुजावर का विचार है कि नई कविता की छंदमुक्तता, गद्यमयता और सपाट बयानी से निजात दिलाने का काम गजल ने किया.5 वास्तव में हिंदी कविता में गजल वह काव्य विधा है जिसमें सबसे पहले युगीन परिवेश और सामाजिक जीवन का यथार्थ साक्षात्कार हुआ. अनिरुद्ध सिन्हा ने लिखा है कि ग़ज़ल मनुष्यता को केंद्र में रखकर सामने आती है.6

ग़ज़ल ने हर तरह से एक लंबा सफर तय किया है. वह अमीर खुसरो, कबीर भारतेंदु और दुष्यंत होते हुए विनय मिश्र तक पहुंची है. उसने हर हालात का जायजा लिया है. ग़ज़ल कभी बादशाहों की महफिलों में रही फिर नवाबों और रईसों तक पहुंची, लेकिन यह ग़ज़ल जब भी हिंदी में आई तो वो दरबार से निकलकर घर बार तक पहुंच गई. यही कारण है कि चानन गोविंदपुरी को कहना पड़ा कि गजल वह जानदार बूटा है जो हर प्रकार की जमीन में उगने और हर मौसम में विकसित होने का सामर्थ्य रखता है.7

आज हिंदी गजल आंदोलन के रूप में ख़डी है. हिंदी में अच्छी ग़ज़लें लिखी जा रही हैं जिसमें शिल्पगत सौंदर्य भी है, और भावगत सौंदर्य भी. हिंदी के कई गज़लगो हैं जिन्होंने दुष्यंत की परंपरा को सलीके से संभाल रखा है. समकालीन हिंदी के समृद्ध ग़ज़लकारों में जहीर कुरैशी, विनय मिश्र विज्ञान व्रत, राजेश रेड्डी, रामकुमार कृषक, मधुवेश आदि के नाम महत्वपूर्ण हैं.

हिंदी कविता में ग़ज़ल आज अपनी ताकत, संप्रेषण कौशल, प्रस्तुतीकरण और गहराई के कारण फल फूल रही है. हर आदमी ग़ज़ल का दीवाना है ग़ज़ल के हर शेर में उन्हें अपनी आवाज सुनाई देती है. हिंदी के कुछ महत्वपूर्ण ग़ज़लकारों के शेर भी इस संदर्भ में देखे जा सकते हैं-

जीने की मुश्किल राहों में रफ्तार से होकर गुजरेंगे

उस पार उतरना है जिनको मंझधार से होकर गुजरेंगे8

-विनय मिश्र

जब जब जोड़ लगाता हूं

अक्सर खुद घट जाता हूं9

-विज्ञान व्रत

बरखा की स्याह रात में उम्मीद की तरह

निर्भीक जुगनू ओं का चमकना भी देखिए

ज़हीर कुरैशी

इस जहां से जंग की कब रात काली जाएगी

भूख से घबरा के क्या बारूद खा ली जाएगी

– किशन तिवारी

पहले जैसी बात कहां इन बेमौसम की फसलों में

ख्वाबों की भरमार ने मिट्टी का सौंधापन छीन लिया

-एम. एफ़ नज़र

आज अपने हैं वही दूर भी हो सकते हैं

ख्वाब इन आंखों के बेनूर भी हो सकते हैं

रामबाबू रस्तोगी

कब कहां किसी की भी अर्ज़ियां समझती हैं

बिजलियां गिराना बस बिजलियां समझती हैं

रामनाथ बेखबर

मैं इस समय के मौन को पढ़ता गया हूं

सूक्ष्म से संवाद भी करता गया हूं

मांगन मिश्र मार्तंड

मिलेगा न्याय कैसे तुम बताओ

सबूतों को मिटाया जा रहा है

जगदीश तिवारी

जिंदगी में यह काम कर देना

तुम किसी सिर पर हाथ रख देना10

भानु मित्र

झुलसा हुआ है धूप में हर आदमी यहां

आखिर नई वह चांदनी तानी कहां गई

मधुवेश

निष्कर्ष – कहना न होगा कि अपनी इसी विशेषताओं के कारण हिंदी कविता में ग़ज़ल अपना स्थान बनाए हुए है.इसका लबो लहजा, अंदाज़ प्रस्तुतीकरण, मुहावरा, और बुनियादी ढांचा इसे सबसे अलग और सबसे पुर असर बनाती है.

संदर्भ

  1. नचिकेता वर्ष 2014, अष्टछाप पृष्ठ 8, फोनिम पब्लिकेशन दिल्ली 53
  2. आरपी शर्मा महर्षि, वर्ष 2005, ग़ज़ल लेखन कला, पृष्ठ 15, मीनाक्षी प्रकाशन दिल्ली 92
  3. इंद्रनारायण सिंह, वर्ष 2007, हिंदी ग़ज़ल शिल्प एवं कला, पृष्ठ 112, रोहतास जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन बिहार
  4. डॉ नरेश, वर्ष 2004, हिंदी गजल दशा और दिशा पृष्ठ 85, वाणी प्रकाशन दिल्ली 2
  5. सरदार मुजावर, वर्ष 2007, हिंदी की छायावादी गजल, वाणी प्रकाशन दिल्ली2
  6. अनिरुद्ध सिन्हा वर्ष 2009 हिंदी ग़ज़ल का सौंदर्यात्मक विश्लेषण, पृष्ठ 20, जवाहर पब्लिकेशर्स नई दिल्ली 16
  7. चानन गोविंदपुरी, वर्ष 1996, व ग़ज़ल एक अध्ययन पृष्ठ 49, सीमांत प्रकाशन नई दिल्ली 2
  8. ककसाड, अक्टूबर 2020, पृष्ठ 28 पटपड़गंज दिल्ली 92
  9. विज्ञान व्रत, 2018, जैसे कोई लौटेगा पृष्ठ 76 अयन प्रकाशन नई दिल्ली
  10. भानु मित्र, वर्ष 2017, गजल ग्रंथ पृष्ठ 195 त्रिवेणी पब्लिकेशन जोधपुर
  11. दुष्यंत कुमार वर्ष 2014 साए में धूप पृष्ठ18 राधाकृष्ण प्रकाशन दिल्ली

हिंदी सिनेमा में हाशिये के लोग – शबनम मौसी के संदर्भ में: वैष्णव पी वी

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हिंदी सिनेमा में हाशिये के लोग – शबनम मौसी के संदर्भ में

वैष्णव पी वी

सामाजिक व्यवस्था के अनुसार तीसरी दुनिया का होना बेमतलब है। मानव जाति की पूर्वधारणा है कि लिंग के दो घटक है। वे हैं– स्त्री और पुरुष। जब कोई बच्चा माँ की कोख से नवलोक में पाव रखता है तब उस पर लिंग–व्यवस्था का अतिक्रमण हो जाता है। निरीह एवं बेसुध मन में चिंता उगती है कि वह पुरुष है या स्त्री। अगर कोई हमारे अस्तित्व पर उँगली उठाएँगे तो हमें कैसा लगेगा? जहाँ हमें कोई स्त्री और पुरुष के रूप में नहीं मानते तो हमारी मानसिक–दशा कैसी होगी? यह एक अलग दुनिया की कहानी नहीं है। किन्नर सामाजिक यथार्थ और सच्चाई है। यह पुराण से लेकर वर्तमान तक का सच है। अगर पुरुष पहली श्रेणी है, स्त्री दूसरी है तो इनको लिंग व्यवस्था में तीसरी श्रेणी का दर्जा प्राप्त होना ज़रूरी है। किन्नर अलग दुनिया का प्राणी नहीं बल्कि इसी समाज का अटूट हिस्सा है।

तृतीय लिंग के व्यक्ति को ‘किन्नर’ या ‘ट्रांसजेंडर’ के रूप में अभिहित किया गया है। किन्नर विभाग की समस्या वर्तमान समय में स्त्री–पुरुष वर्ग के सामने एक प्रश्न चिन्ह के रूप में खड़ा रहता है। अपनी अस्मिता की तलाश और अस्तित्व को कायम रखने के लिए समाज में अपनों के बीच संघर्ष कर रहे हैं।

फिल्म निर्माण नई विचारधारा और नवीन विषय को उजागर करके लोकप्रिय होने लगे। नारी समस्या, दलित समस्या, निम्न वर्ग की समस्याएँ एवं प्राकृतिक समस्याएँ फिल्म के केंद्र में आई। स्त्री, दलित, निर्वासित वर्ग, पिछड़े वर्ग आदि पर फिल्म निर्माताओं की नज़र जल्दी पहुँच गयी। लेकिन सामाजिक रूढ़ियों से त्रस्त किन्नर या ट्रांसजेंडर को फिल्म निर्माताओं ने नज़र-अंदाज़ किया। अगर नज़र गयी भी तो गौण रूप में स्थान दिया जाता रहा।

वर्तमान समय में किन्नर जीवन को लेकर हिंदी साहित्य जगत में अनेक प्रकार की साहित्यक रचनाएँ लंबे अंतराल के बाद पुनः विकास की पथ पर है। साहित्य से अधिक हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा की फिल्म में किन्नर या ट्रांसजेंडर की मानसिकता और जीवन संघर्ष का चित्रण होने लगा है। किन्नर समाज सामाजिक व्यवस्था के लिए वर्जित होने के कारण फिल्म ने भी उनकी यथार्थ को अनदेखा किया। इक्कीसवीं सदी में साहित्य से अधिक मीडिया सामाजिक समस्याओं को ध्यान देने लगा। पुराने ज़माने में साहित्य में व्याप्त किन्नर समुदाय अचानक लुप्त हो गया। लेकिन मीडिया और फिल्म इनकी समस्याओं को उजागर करने लगे। फिल्म और मीडिया के आरंभिक दशक में इन्हें गलत रूप में चित्रित करने का प्रयास किया गया। इनकी हँसी-मज़ाक करके इन्हें उपहास का पात्र बनाया गया। कभी उनको क्रूर चित्रित किया गया। उन्हें छोटे किरदार दिए जाते थे। जैसे- बच्चे के जन्म की खुशी में नाचकर पैसे कमाने वाले, ट्रेन से पैसे हड़पने वाले के रूप आदि। इसी वजह से किन्नर के प्रति जो नकारात्मक भाव मीडिया ने शुरुआती दौर पर अपनाया था उससे किन्नर के प्रति समाज का विद्रोह और नापसंदी बढ़ गयी। समाज में पितृसत्तात्मक एवं मातृसत्तात्मक व्यवस्था होने के कारण किन्नर या ट्रांसजेंडर पर उसका प्रभाव तथा विचार हर कहीं छा गया। इसी वजह से फिल्म में किन्नर विमर्श काफ़ी कम पाया गया। भारतीय समाज में बॉलीवुड फिल्म का महत्वपूर्ण स्थान है। बॉलीवुड में परंपरागत विषयों से हटकर काम करने का बहुत अवसर है। लेकिन ट्रांसजेंडर, गे, लेस्बियन, बेयसेकश्युल के विषयों पर गंभीर सोच न के बराबर है।

विश्व फिल्म में किन्नर से संबंधित काफ़ी फ़िल्में बनी हैं। इसकी तुलना में उसी समय भारतीय फिल्मों में किन्नर समस्या को जितना महत्व मिलना था वह न के बराबर रह गया। लेकिन समय के साथ-साथ फिल्म निर्माताओं की सोच में भी बदलाव आया और हाल में जितनी फिल्म निकली है उसमें किन्नर के प्रति सकारात्मक विचार देखने को मिला है। इनकी जीवन-गाथा को चित्रित करते हुए सामाजिक स्तर पर होने वाली समस्याओं का चित्रण गंभीरता के साथ होने लगा है। समाज की पूर्व परंपरा और अलिखित नियमों के प्रति उनका रोष, सामाजिक हक की लड़ाई का चित्रण फिल्मों में होने लगा।

सन् 1991 में किन्नर समाज के सान्निध्य की घोषणा के रूप में महेश भट्ट के निर्देशन में ‘सड़क’ नामक फिल्म दर्शकों के सामने आई। प्रमुख अभिनेता ‘सदाशिव अमरापरकार’ ने खलनायक, जो एक किन्नर की भूमिका अदा किया था। फिल्म के हिजड़ा पात्र महारानी खलनायक के रूप में अभिनेता रवि और अभिनेत्री पूजा के प्रेम में बाधा डालता है। महारानी की भूमिका तथा उनकी लफ्ज स्त्री-पुरुष और रूढ़िगत विचारधारा पर प्रश्न चिन्ह है। सन् 1996 में अमूल पाटेकर की फिल्म ‘दायरा’ बनी। इसमें निर्मल पांडे ने एक ट्रांसजेंडर चरित्र को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। सन् 1997 में चित्रित ‘दरमियाँ’ कल्पना लाजमी की फिल्म है जिसमें किन्नर के प्रति सहानुभूति दिखाया है। किन्नर होने के कारण समाज और परिवार से निष्कासित मन की व्यथा है। महेश भट्ट की फिल्म ‘तमन्ना’ (1997) किन्नर संवेदना का प्रतिफलन है। किन्नर के प्रति सामान्य जनता की अवधारणा का पोल खोलने का प्रयास फिल्म के ज़रिए निर्देशक ने किया है। फिल्म के दो किन्नर पात्र है- ‘टीकू’ और ‘तमन्ना’, वे समाज फैली लिगंगत अवधारणा पर प्रश्न चिन्ह उठाते हैं। समाज की अनदेखेपन के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद किया है। इसकी पटकथा मुंबई के एक हिजड़े समुदाय की वास्तविक कहानी पर आधारित है। हमारी संस्कृति एवं परंपरा प्राचीन काल से ही गौरवान्वित रही है। हमारे वातावरण और संस्कृति को अलग नहीं किया जा सकता। समाज की रूढ़िगत मान्यताओं को मजबूत बनाने के प्रयास से हिजड़ों के प्रति भेदभाव हो रहा है। इन्हें बचपन से लेकर जीवनपर्यंत रूढ़िग्रस्त समाज के अन्याय का शिकार होना पड़ता है। इसमें किन्नरों की समस्याओं का खुला चित्रण है। अशुतोष राना किन्नर की भूमिका में ‘संघर्ष’ (1999) नामक फिल्म में दर्शकों के सामने आते हैं। लज्जा शंकर पाण्डे नामक एक ट्रांसवुमन की किरदार इसमें अदा किया है जो काली माता की पूजा करती है। इसके अतरिक्त और भी हिंदी फिल्मों में किन्नरों का चित्रण मिलता है लेकिन वह कुछ समय के दृश्य तक सीमित है। इन फिल्मों में ‘क्या कूल है हम’ (1995), ‘स्टाइल’ (2001), ‘मस्ती’ (2004), ‘पार्टनर’ (2007) आदि महत्वपूर्ण हैं। हाल ही में निकली फिल्म ‘अलिग्रह’ और ‘कपूर आण्ट सन्स’ में एलजीबीटी का भूमिका है।

सन् 2005 में योगेश भारद्वाज द्वारा चित्रित फिल्म ‘शबनम मौसी’ किन्नर के यथार्थ जीवन पर आधारित है। मध्यप्रदेश के सुहागपुर विधानमंडल से जीतकर विधायक बनी। ‘शबनम मौसी’ समाज में होने वाले अन्याय, किन्नर के प्रति लोगों की मानसिकता, राजनीतिक चाल पर खुला व्यंग है। सन् 2008 में श्याम बेनेगाल द्वारा चित्रित फिल्म ‘वेलकम टु सज्जनपुर’ हिजड़ा समस्या को उजागर करने वाली फिल्म है। इसमें फिल्म निर्माता किन्नर समाज की समस्या को नया मोड़ देकर, उस पर सोचने के लिए दर्शक को मजबूर करते हैं। राजनीति में हिजड़ा लोग वर्जित होते जा रहे हैं। राजनीति में इन्हें नहीं अपनाया गया जिसे जेंडर पोलिटिक्स के नाम से पुकारा जाता है। फिल्म के पात्र महादेव और मुन्नी भाई के बीच होने वाले संवाद से समाज में व्याप्त जेंडर पोलिटिक्स की गंभीर समस्या हमारे सामने आती है- “तुझे सपोर्ट किस जात से मिलेगा, मतलब ब्राह्मण? पटेल? दलित? इस्लाम? कौन? कौन है तेरे साथ।”

हिंदी में ‘बुलेट राजा’, ‘रज्जो’, ‘एस. एम.’, ‘क्यून द डेस्टिनी ऑफ डांस’, ‘राजा हिंदुस्तानी’, ‘नटरंग’, ‘नर्तकी’, ‘ट्राफिक सिग्नल’ आदि फिल्म में भी किन्नर की भूमिका है। ‘क्यून द डेस्टिनी ऑफ डान्स’ पूरी तरह किन्नर पर आधरित है। नाच को फोकस में रखकर बहुसंख्यक समाज से लड़ने वाली अल्पसंख्यकीय किन्नर जीवन की त्रासदीय क्षणों को प्रस्तुत किया गया है।

सन् 2005 में योगेश भरद्वाज के निर्देशन में शबनम मौसी नामक फिल्म दर्शकों के सामने आयी। फिल्म मध्यप्रदेश के सुहागपुर के पूर्व विधायक किन्नर शबनम बानु के निजी और भौतिक जीवन पर आधारित है। शबनम बानु के जन्म से लेकर चुनाव तक की समस्याओं का चित्रण इसमें किया गया है। एक पात्र को केंद्र में रखकर अत्यंत गंभीरता एवं रोचकता के साथ कथा आगे बढ़ती है। फिल्म की शुरुआत में पच्चीस साल तक मुबंई में शबनम के जीवन और बाद के अनूपपुर के जीवन का विवेचनात्मक अध्ययन हमारे सामने रखने का प्रयास किया है। जिस गर्भ से पूर्ण स्त्री और पूर्ण पुरुष का जन्म होता उसी गर्भ से किन्नर शबनम का भी जन्म हुआ। शहर के पुलिस अफसर के घर में जन्म शबनम की बधाई में आए किन्नर उसे जबरदस्ती लेकर जाते हैं क्योंकि हलीमा और संघ समझ गया था कि जिसके बधाई के लिए वह नाचने आए हैं वह एक किन्नर है। बच्चे को बिरादरी में ले जाने के बाद हलीमा बच्चे का पालन पोषण करती है। हलीमा उसको शबनम नाम रखती है। जब बच्चे को पालने का सौभाग्य मिल जाता है उसके अंदर छुपी मातृत्व की भावना धारा की तरह फूट निकलती है। हलीमा गुरु से कहती है- “हलीमा को आज तुमने वह दर्जा दिया, जो दर्जा खुदा भी देने में बेबस्ता है। माँ का दर्जा हलीमा माँ तेरे इज़्जत के से खयामत तक शुक्र गुज़ारेगी अम्मा।” आधी औरत और आधा मर्द होने के कारण बच्चा पैदा करना इनके वश की बात नहीं है। यह भी दूसरों की तरह मन में माँ बनने की, बच्चे-वच्चे पालने की चाह रखती है।

शबनम की देख-रेख बिरादरी में अच्छी तरह हुई। शिक्षा, संगीत एवं नृत्य में तालीम दिया। तालीम की पूर्ति के बाद कहीं काम नहीं मिला क्योंकि वह किन्नर थी। जहाँ भी गया उनको यही जवाब मिला- “कभी हिजड़े को किसी ऑफिस में काम करते देखा है।” इसलिए वह अपनी परंपरागत काम करने के लिए मजबूर हो जाती है। शबनम को इकबाल से हुए प्यार को त्याग देना पड़ता है क्योंकि इनके प्यार को समाज की मान्यता नहीं मिलेगी।

आज के सामाजिक जीवन में धन को महत्वपूर्ण पहलू के रूप में मान्यता मिल चुकी है। अपने परंपरागत पेशे से ऊबकर पैसे के लालच में किन्नर गलत मार्ग की ओर जाता है। बिरादरी के गुरु शबनम को पैसे की लालच देने का प्रयास करती हैं, इससे हलीमा रुठ जाती है- “मैं इतनी गिरी नहीं हूँ कि अपनी बेटी की पीठ बेचकर अपनी अपनी भूख मिटाऊँ।” बीच में हुई धक्का-मुक्की के कारण हलीमा का जान चली जाती है। गुरु आत्म-रक्षा हेतु मौत के ज़िम्मेदार शबनम को टहलाकर पुलिस से गिरफ्तार करवाती है। हलीमा के दाह संस्कार पर आए शबनम सच्चाई को सामने लाती है और पुलिस को धोखा देकर भाग जाती है। पुलिस से बचकर वह मध्यप्रदेश के अनूपपुर गाँव में पहुँचती है। गँवार राघव की बेटी की जान बचाकर उसके घर में रहने लगती है। विधायक रतन सिंह के आदमी पर हाथ रखने पर शबनम को मारने के लिए लल्लू नामक गुण्डा आज्ञा अनुसार गाँव आ जाता है। वह शबनम को नंगा करके पीटने की कोशिश करता है। अपनी मान को कलंकित करने की कोशिश करने वाले लल्लू पर प्रतिवार करती हुई लोगों की मानसिकता पर शबनम व्यंग्य करती है- “मैं इस उम्मीद के साथ मार खायी थी, शायद एक हिजड़े को पिटता देखकर इन मर्दों की मर्दानगी जाग जाए।” शबनम आम जनता की निकृष्ट सोच और उनके डर एवं सहानुभूति पर वार करती है ताकि उनमें मानवता जाग उठे। शबनम लोगों की मानसिकता को निहारती हुई कहती है- “अपने डर और कायरता को सहनशीलता का नाम देकर पहले जागने वालों, आज यह हिजड़ा तुम लोगों में अपना अंश देख रहा है। मैं अपनी बिरादरी छोड़कर आयी थी यह सोचकर कि तुम जैसे इंसान के बीच रहूँगी, मगर मुझे क्या पता था कि मेरी किस्मत में हिजड़ों के बीच रहना ही लिखा था। अगर मैं तन से हिजड़ा हूँ तो तुम मन से हिजड़ा हो। तन का हिजड़ा तो फिर भी ताली पीटकर जीवन जी लेता है, लेकिन मन का हिजड़ा ताली पीटते हुए भी डरता है।” लल्ला अपना आदमी होकर भी रतन सिंह शबनम मौसी को बधाई देता है। ताकि चुनाव में गाँव वालों को अपने साथ रख सके। रतन सिंह को पार्टी उम्मीदवार बनाने के कारण विनोद कुपित होकर उसके खिलाफ़ चाल चलता है। शबनम मौसी को अपने वश में करके रतन सिंह के खिलाफ खड़ा लेता है। स्वार्थी विनोद के मामले को कैसे निपटाए यह रतन बाबू अच्छी तरह जानता था। विनोद दुबारा आकर शबनम से नामांकन वापस लेने को कहता है। शबनम को राजनीति की कुतंत्रो का पता होने से वह पीछे हटने से हिचकती है। शबनम विनोद और सिंह साहब को सख्त जवाब देती है- “मैं जानना चाहता हूँ राजनीति कुत्ती है या राजनेता।” शबनम की राजनीति में उन्नति और लोगों के साथ की हेल-मेल से रतन सिंह अपनी हार को सामने देखता है। इसी डर के मारे शबनम को मारने की सुपारी मदन पंडित को देता है। मारने की उम्मीद रखकर आए मदन शबनम की वाणी की सच्चाई से रूबरु हो जाता है और धंधा छोड़कर शबनम के साथ जुड़ जाती है। शबनम की उन्नति से देखकर गुरु अपने किए पर पछतावा करता है। गुरु और पिता शबनम से मिलते हैं। चुनाव में रतन सिंह की हार हो जाती है। किन्नर की जीत के साथ एक नया इतिहास बन जाता है।

भारतीय फिल्म में कितनी शबनम है? अगर किन्नर की कथा हो रही है तो उसमें कितने किन्नर भूमिका पेश करती है। हिंदी फिल्म में हाशिये समाज कभी-कभी स्थान पा रहा है। लेकिन स्थायित्व कहाँ है। समाज में किन्नर की समस्या को पेश करने में भरद्वाज जी ने जो प्रयास किया है वह सराहनीय है। हाशिये लोग की दशा को फिल्म में प्रस्तुत करने के साथ किन्नर का सान्निध्य भी पक्का करना है। फिल्म की बातों से परे इनकी जीवन क्या है इसे परखना ज़रूरी है। हिंदी फिल्म में किन्नर का चित्रण कम हुआ है। लेकिन समय के साथ बदलाव ज़रूर है। सशक्त रूप में इनकी जीवन पलों को फिल्म अंकित किया है। जो अंकन किन्नर को लेकर हुआ है इसकी वास्तविकता को भी परखना ज़रूरी है।

हिंदी फिल्म के साथ अन्य मीडिया में भी किन्नर का चित्रण आने लगा। ध्यान देने की बात ‘रेड लेबल’ चाय पत्ती के विज्ञापन में किन्नरों ने खुद अभिनय किया है। फिल्म अभिनेता के रूप में किन्नर अंजली का नाम रोशन हुआ है जो केरल से है। इसी तरह हिंदी फिल्म में किन्नर का छाप दिखने लगा है। मीडिया में चित्रित किन्नर जीवन की दुहरा चेहरा है उसे परखने का दात्यित्व हरेक सहृदय का है। किन्नर जो समाज में हाशिये में धकेले गए हैं उसे समाज की मुख्यधारा में स्थान दिलाने में फिल्म अपने ओर से कोशिश कर रहे हैं।समाज की नज़िरए बदल रही है। इसका उदाहरण है- किन्नर जीवन पर आधारित बॉलीवुड़ फिल्म ‘हंसा एक सहयोग’ में अंबिकापुर के ‘किन्नर मुस्कान’ को एक किरदार मिला है। इसी फिल्म की गान में शबनम बानु भी किरदार पेश कर रही है। समाज के विकास में किन्नर भी अपना योगदान दे सकता है। लेकिन समाज की नीच दृष्टि से ये परेशान है। इन हाशिये ज़िंदगी की व्यथा को जनता तक पहुँचाने में साहित्य के साथ फिल्म भी अपना योगदान दे रहा है। किन्नर की हक और जिंदगी का जीवंत चित्र जनता तक पहुँचाने की कोशिश में हैं।

वैष्णव पी वी, एम० ए० हिंदी, स्थान-कण्णूर, केरला, मोबाइल नं- 9496248718

ई मेल – vyshnavpvknr1705@gmail.com

हिंदी सिनेमा में जातिः एक अनछुआ पहलू- शानू कुमार

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हिंदी सिनेमा में जातिः एक अनछुआ पहलू

भारत एक बहुसंस्कृति वाला देश है, इसकी यह विशेषता इसके गौरव का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। लेकिन इसके साथ ही यह बहुत अफसोस की बात है कि भारत एक जाति आधारित समाज है। जातियों के आधार पर यह पदानुक्रम में बंटा हुआ है। जाति प्रथा भारतीय समाज की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है। भारतीय समाज की यह जाति व्यवस्था हजारों वर्ष पुरानी है और यह गंभीर सामाजिक भेदभाव और शोषण का सबसे अच्छा उदाहरण है। जाति का विचार देखने में बहुत स्पष्ट प्रतीत होता है लेकिन यह बहुत से प्रश्न खड़े करता है जिनके जवाब इतने आसान और सरल नहीं हैं।

अतः प्रस्तुत लेख हिंदी सिनेमा में जाति से संबंधित प्रश्नों को ढूँढ़ने का प्रयास करता है। जाति व्यवस्था भारतीय सामाजिक संरचना की बहुत ही महत्त्वपूर्ण विशेषता है। समाज का कोई भी पहलू इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा है। लेकिन क्या जाति के प्रश्न को हिंदी सिनेमा में पर्याप्त स्थान मिला? यही प्रस्तुत लेख का मुख्य प्रश्न है। यहाँ प्राकल्पना के रूप में मेरा मानना यह है कि हिंदी सिनेमा में जाति, एक अनछुआ पहलू है।

मुख्य शब्द – जाति, सिनेमा, पदानुक्रम, भारतीय समाज, शौषण, उच्च और निम्न जातियाँ।

सिद्धांत रूप में जाति व्यवस्था चार-वर्ण, गुण-कार्य के अनुसार है। ब्राह्मण का कार्य ज्ञान-दान, क्षत्रिय का रक्षा, वैश्य का व्यापार और शुद्र का श्रम है। किंतु यथार्थ व्यवस्था इतनी सरल नहीं है। वास्तविक स्थिति बहुत जटिल है। जाति जन्मजात होती है और विवाह संबंध जाति के अंदर ही होता है। इसे अम्बेड़कर ने जाति व्यवस्था का मुख्य लक्षण भी माना है। भारत में ज्यादातर जातियाँ स्थानीय या एक क्षेत्र में सीमित हैं। यद्यपि अनेक जातियाँ दूर-दूर तक भी फैली हैं। इस प्रकार जातियों की संख्या चार नहीं हजारों में है। हर जाति की अपनी पंचायत होती है, जो जाति के नियम और आचार-विचार का नियमन करती है। ऊँची जातियों से भिन्न, निम्न स्तर का कार्य करने वाले लोग अछूत समझे जाते हैं जो अनुसूचित जातियों से संबंधित हैं।

भारत में जाति व्यवस्था का प्रारंभ से ही सत्ता और वर्चस्व की अवधारणा से घनिष्ठ संबंध रहा है जिसे औजार बनाकर हजारों वर्षों तक उच्च जातियों ने निम्न जातियों का शोषण कर उनके श्रम पर एक आनंदमय जीवन व्यतीत किया है। ये उच्च जातियाँ जाति के आधार पर अपना सामाजिक प्रभुत्व बनाये रखने में कामयाब रहीं, इसे हाल ही में प्रदर्शित आर्टिकल-15 फिल्म के संदर्भ में अच्छे तरीके से समझा जा सकता है। इस पर व्यापक चर्चा हम आगे करेंगे। इस स्थिति से आधुनिक युग में भी जाति व्यवस्था के महत्त्व का पता चलता है। उच्च जातियाँ आज भी अपना सामाजिक प्रभुत्त्व कायम रखना चाहती हैं और इसके लिए वे आज भी निम्न जातियों को निचले पायदान पर ही रखना चाहती हैं कि कहीं उनका वर्चस्व समाप्त न हो जाए। अतः यह कहा जा सकता है कि जाति प्रथा का प्रभाव भारतीय समाज में काफी व्यापक रूप में रहा है। इस व्यवस्था में उच्च जातियों की स्थिति काफी सुदृढ़ है, वहीं निम्न जातियों की बहुत ही दयनीय।

भारत में जाति व्यवस्था में संसाधनों के आबंटन की सामाजिक प्रक्रिया धार्मिक व सांस्कृतिक आधार पर रही है। संसाधनों के आबंटन की इस प्रक्रिया को समाज के तीन वर्गों को केंद्र में रखकर योजनाबद्ध किया गया था। ब्राहमण, क्षत्रिय, व वैश्य। इन तीन वर्गों का ज्ञान, राजशक्ति एवं वाणिज्य इन तीन महत्त्वपूर्ण सामाजिक संपत्ति पर आधिपत्य था। प्राचीन काल में जब से यह व्यवस्था अस्तित्व में आई तभी से समाज के इन तीन प्रमुख वर्गों में आपसी प्रतियोगिता नहीं थी, बल्कि पारस्परिक अंत-निर्भरता थी। तीनों ही वर्ग अपनी-अपनी सामाजिक संपत्ति के स्वामित्व के अनुसार एक-दूसरे पर निर्भर थे। इस व्यवस्था में चौथा वर्ग संपत्तिहीन होने के कारण इन तीनों वर्गों का सेवार्थी रहा। इस व्यवस्था में चौथे वर्ग को सदैव सेवार्थी बनाये रखने के लिए उपरोक्त तीनों वर्गों ने आपस में गठबंधन स्थापित किया जिसके अंतर्गत उपरोक्त वर्गों की आपसी अंतर्निर्भरता की अंतर्क्रिया से एक उच्च वर्ग की प्रधानता बन गई और यह तीनों वर्ग सामाजिक प्रभुत्त्व कायम कर अन्य वर्ग पर शासन करते रहे। फलस्वरूप तीनों वर्गों की यही प्रधानता सांस्कृतिक व धार्मिक श्रेष्ठता के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी वैधता प्राप्त करती जाने लगी।

वर्तमान में लोकतंत्र, आधुनिकीकरण व औद्योगिकरण के दौर में भी यह व्यवस्था अपने उसी स्वरूप को बनाए रखना चाहती है।

अतः साधन सम्पन्न तथा शक्ति सम्पऩ्न ऊच्च जातियों द्वारा साधनहीन निम्न जातियों का शोषण आरंभ से ही होता आया है। समाज के निचले पायदान पर रहने के कारण निम्न जातियाँ प्रत्येक स्तर पर शोषण का शिकार रहती हैं। उदाहरण के लिए, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक। धार्मिक आधार पर उन्हें हिन्दू समाज में सबसे निम्न दर्जे पर रखा गया है। उन्हें मंदिर, हवन-कीर्तन, पर्व-त्यौहार मनाने की छूट अवश्य मिल गई है किंतु आज भी ऐसा समझा जाता है कि ये इन कार्यों के योग्य नहीं हैं। आर्थिक आधार पर देखा जाए तो निम्न जातियों की अर्थव्यवस्था मजदूरी पर आधारित होती है लेकिन उन्हें उनकी जाति के कारण उचित मजदूरी नहीं दी जाती। इस कारण उनका आर्थिक शोषण होता है। काम के अभाव में वे अपने श्रम का मोल-तोल नहीं कर पाते। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए उन्हें जो कुछ भी मिलता है उसी पर काम करना पड़ता है। राजनीतिक क्षेत्र में भी उत्पीड़ित ही रहे हैं, अधिक संख्याबल होने के बावजूद समाज में प्रबल जाति के रूप में इन्हें मान्यता नहीं मिलती। उनके ऊपर समाज में प्रबल स्थान वाली जातियों का शासन रहा है। राजनीतिक दृष्टि से निर्बल तथा शक्तिहीन होने के कारण निम्न जातियाँ अभी भी उत्पीड़न का शिकार होती हैं। सांस्कृतिक रूप से अभी भी उन पर उच्च जातियों का प्रभुत्व बना हुआ है, उच्च जातियाँ अपने इसी प्रभुत्त्व को निरंतर बनाए रखने के लिए प्राचीनकालीन वर्णव्यवस्था को पुनर्जीवन प्रदान करने के लिए भरपूर प्रयासरत्त हैं।

अब यहाँ यह देखना बहुत ही महत्त्वपूर्ण होगा कि सिनेमा जो हमारे समाज के वास्तविक स्वरूप को प्रदर्शित करता है, जो हमारे समाज का एक आईना है उसमें जाति के प्रश्न को कहाँ तक उठाया गया है। इस प्रश्न पर चर्चा करने से पहले सिनेमा पर थोड़ा प्रकाश ड़ालना सार्थक रहेगा कि सिनेमा की समाज में क्या भूमिका है, यह किस प्रकार से समाज को प्रभावित करता है।

भारतीय लोकतांत्रिक संस्कृति में हिंदी सिनेमा का योगदान सबसे प्रमुख रहा है। हिंदी सिनेमा भारतीय समाज में सबसे ज्यादा अनुगमन किया जाने वाला दृश्य संस्कृति का हिस्सा है। हिंदी सिनेमा भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, पारम्परिक और ऐतिहासिक आयामों को दर्शाने का एक मुख्य माध्यम है। आज सिनेमा जनसंचार और मनोरंजन का एक लोकप्रिय माध्यम है। जिस तरह साहित्य समाज का दर्पण होता है, उसी तरह सिनेमा भी समाज को प्रतिबिंबित करता है। सिनेमा और समाज में दोहरा सम्बंध होता है। समाज सिनेमा को प्रभावित करता है, सिनेमा समाज को। ये एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

सिनेमा एक ऐसा प्रभावकारी माध्यम है, जिसके बारे में सुनते ही व्यक्ति विभिन्न परिकल्पनाओं, आकांक्षाओं तथा सपनों में खो जाता है। सिनेमा ने आरंभ से लेकर वर्तमान तक दर्शकों को उत्साहित करने का काम किया है। सिनेमा समाज का एक अहम् हिस्सा बन चुका है।

भारतीय समाज पर सिनेमा की गहरी छाप देखने को मिलती है। सिनेमा को समाज का दर्पण कहा जाता है क्योंकि लोग सिनेमा में अभिनेताओं और अभिनेत्रियों द्वारा निभाए गए किरदारों में स्वयं की तथा समाज की छवि देखते हैं, समाज उसी रंगरूप में ढ़लने का प्रयास करने लगता है।

भारतीय युवाओं में प्रेम के प्रति आकर्षण उत्पन्न करने की बात हो या सिनेमा के कलाकारों के पहनावे के अनुरूप फैशन का प्रचलन, ये सभी समाज पर सिनेमा के ही प्रभाव हैं। सिनेमा की शुरूआत से ही इसका समाज के साथ गहरा सम्बंध रहा है। प्रारंभ में इसका उद्देश्य मात्र लोगों का मनोरंजन करना भर था। अभी भी अधिकतर फिल्में इसी उद्देश्य को लेकर बनाई जाती हैं, इसके बावजूद सिनेमा का समाज पर गहरा प्रभाव रहा है। अतः कहा जा सकता है कि सिनेमा भारतीय संस्कृति का परिचायक रहा है क्योंकि सिनेमा ने हमेशा ही संस्कृति के विषयों को पर्दे के माध्यम से चित्रित किया है।

सिनेमा समाज को परिवर्तन की दिशा देता है। यह समाज में क्रांति लाने का महत्त्वपूर्ण उपकरण है। जब से सिनेमा का प्रादुर्भाव हुआ है इसने समाज में विद्मान बुराइयों का, जैसे- महिला असमानता, दहेज प्रथा, बहुविवाह, भ्रष्टाचार आदि को आधार बनाकर फिल्मों का निर्माण किया है। इस प्रयास में फिल्मकारों ने सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्मों का निर्माण भी किया है और क्रूर से क्रूर घटनाओं को बड़ी सहजता से पर्दे पर उतारकर फिल्मों द्वारा यथार्थता दिखाने की कोशिश की है। इस संबंध में छपाक फिल्म जो हाल में प्रकाशित हुई है एक उदाहरण है। ऐसी फिल्मों के निर्माण का उद्देश्य यही है कि समाज पर इनका सकारात्मक प्रभाव पड़े। समाज की गंभीर बुराइयों के प्रति लोगों का दृष्टिकोण भी सकारात्मक हो।

ज्वलंत सामाजिक विषयों को पर्दों पर दिखाने का यह प्रयास कोई नया नहीं है, बल्कि पहले भी ऐसे प्रयास किये जाते रहे हैं। 1933 में शांताराम की फिल्म अमर ज्योति एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है, जिसमें स्त्री-पुरूष के अधिकारों की समानता के विषय को प्रमुखता से उठाया गया था। हालाँकि आरम्भिक दौर में भारत में पौराणिक एवं ऐतिहासिक फिल्मों का बोल-बाला रहा, परंतु समय के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक एवं साहित्यिक फिल्मों ने समाज पर अपना गहरा प्रभाव ड़ाला।

पिछले कुछ दशकों से भारतीय समाज में राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक भ्रष्टाचार में वृद्धि हुई है, इसका असर इस दौरान निर्मित फिल्मों पर भी दिखाई पड़ा है। गुलाल (2009), नायक (2001), राजनीति (2010), डर्टी पोलिटिक्स (2015), सत्याग्रह (2013) आदि प्रमुख फिल्में हैं जिनमें राजनीति की वास्तविकता को प्रदर्शित किया गया है।

यहाँ यह महत्त्वपूर्ण है कि हिंदी सिनेमा ने समाज की लगभग सभी बुराईयों को प्रदर्शित किया है जिससे समाज में उन बुराइयों के प्रति जागरूकता भी आई है लेकिन यह बहुत अफसोसजनक है कि हिंदी सिनेमा में भारतीय समाज की प्रमुख बुराई जाति, जिसके कारण समाज में एक वर्ग सदैव शोषण का शिकार रहा और दयनीय जीवन जीने को मजबूर रहा है, उसे पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया। सिनेमा का इतिहास है कि वह कभी समाज के संवेदनशील मुद्दों पर आधारित फिल्मों से दूर नहीं भागा है। समय-समय पर सामाजिक मुद्दों पर आधारित फिल्में दर्शकों के लिए पेश की गई हैं और आज भी ऐसी फिल्मों का निर्माण जोरों पर है जिसके जरिए देश के लोगों को जागरूक कर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।

हिंदी सिनेमा में राष्ट्रभक्ति, बेरोजगारी, मजदूर आंदोलन, नारी उत्पीड़न, नारी सशक्तिकरण, राजनीतिक बुराई, आतंकवाद जैसे विषयों को पर्याप्त स्थान दिया गया है। आये दिन इन विषयों पर फिल्में बनती रहती हैं। इन विषयों पर फिल्मों की कोई कमी नहीं है, जैस- राष्ट्रभक्ति पर बहुत सी फिल्में हैं, जिनमें बार्डर (1997), द लेजेंड आफ भगत सिंह (2002), रंग दे बसंती (2006), चक दे इंडिया (2007), लगान (2001), मंगल पांडे (2005), 1942 ए लव स्टोरी (1994), स्वदेश (2004), लक्ष्य (2004), प्रहार (1991), क्रांतिवीर (1994), दीवार (1975), हकीकत (1995), पूरब और पश्चिम (1970), नेताजी सुभाष चन्द्र बोस (2004), मदर इंडिया (1957), नया दौर (1957), हिंदुस्तानी, सात हिंदुस्तानी (1969), गदरः एक प्रेम कथा (2001), पुकार (2000) प्रमुख हैं।

इसी प्रकार हिंदी सिनेमा में बेरोजगारी जैसे विषय को भी खूब जगह मिली है, जैसे- दोस्त (1974), बी.ए.पास (2012), नौकरी (1978), प्यासा (1957), श्री420 (1955), अंकुश (1986), रोटी, कपड़ा और मकान (1974), आज का दौर (1985), फेरी (2000) ये फिल्में प्रदर्शित करती हैं कि स्वतंत्रता के बाद भी भारत बेकारी, बेरोजगारी और भूख से जूझ रहा था।

भारत की आबादी का एक बड़ भाग मजदूर है जो घोर परिश्रम करता है और देश के निर्माण में बहुमूल्य भूमिका निभाता है। मजदूरों के बिना किसी भी औद्योगिक ढ़ाँचे के खड़े होने की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए श्रमिकों का समाज में अपना ही एक स्थान है, लेकिन, ये बड़े पैमाने पर शोषण का शिकार रहे हैं जिसे हिंदी सिनेमा ने बखूबी पेश किया है। सत्तर के दशक में ऐसी बहुत सी फिल्में बनी जो मजदूरों के शोषण और उनकी समस्याओं को दर्शाती हैं। इनमें नया दौर (1957), पैगाम (1959), नमक हराम (1973), दीवार (1975), काला पत्थर (1979), कूली (1983), मजदूर (1983), लाड़ला (1974), मजदूर जिंदाबाद (1976), कोयला (1997) प्रमुख स्थान रखती हैं। इन फिल्मों ने मजदूरों की समस्याओं को बड़े पर्दे पर उकेरा। उनकी रोजी-रोटी से लेकर पारिवारिक परेशानियों को इन फिल्मों ने बड़ी ही खूबसूरती से दिखाया। इसका प्रभाव समाजवाद के रूप में दिखाई दिया। मजदूरों के कल्याण के लिए कई नीतियाँ व कानून बने।

उपरोक्त विवरण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिंदी सिनेमा में समाज में फैली समस्याओं, चाहे वह बेरोजगारी हो या मजदूरों से जुड़ी हो, राजनीतिक भ्रष्टाचार हो या आतंकवाद। हर विषय पर फिल्मों की भरमार है। महिलायें प्राचीन समय से ही शोषण का शिकार रही हैं। उनके अधिकारों को महत्व नहीं दिया जाता। महिलाओं से जुड़े इस पहलू पर भी फिल्मों की भरमार है और इन फिल्मों की वजह से समाज में सकारात्मक बदलाव भी आया है। महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता आई है, साथ ही समाज ने भी उन्हें बेहतर ढ़ंग से स्वीकार किया है। आज समाज में उन्हें अधीनस्थ के रूप में नहीं देखा जाता। अब महिलाओं की रचनात्मक भूमिका को स्वीकारा व सराहा जाता है।

अतः यहाँ मुख्य बिंदु यह है जिस प्रकार हिंदी सिनेमा के माध्यम से महिलाओं की स्थिति में सुधार आया है उसी प्रकार अगर हिंदी सिनेमा जाति के प्रश्न पर भी उत्साह दिखाता तो क्या पता हमारे समाज से जाति समाप्त ही हो जाती।

सामाजिक सरोकारों को लेकर स्वाधीनता आंदोलन और इसके बाद नेहरू की मृत्यु तक भारत में ढेरों फिल्में बनी, परंतु इनमें सदियों से प्रचलित वर्ण एवं जाति व्यवस्था का चित्रण नहीं के बराबर हुआ है।

जाति सवर्णों का एक हथियार है जिसका उपयोग कर इन्होंने दलितों और पिछड़ों के प्रति सदैव उपेक्षा और अपमान का व्यवहार किया है। उन्हें कभी भी अपने बराबर का मनुष्य नहीं माना। गैर-बराबरी के प्रति मुखरित होने वाला भारतीय जाति के प्रश्न पर मौन साध लेता है। जबकि इसी जाति व्यवस्था के कारण निम्न तबका शोषित व अधिकार रहित रहा है। प्राचीन काल से लेकर अब तक उनकी स्थिति वैसी की वैसी है। वे कल भी शोषण का शिकार थे और आज भी शोषण का शिकार हैं, और हिंदी सिनेमा का नजरिया भी इसी संदर्भ में दलितों के प्रति कुछ खास भिन्न नहीं है। समाज की ही तरह हिंदी सिनेमा ने भी इनके साथ उपेक्षित व्यवहार किया है। दलितों के प्रति करूणा दिखाकर वह अछूत कन्या (1936), आदमी (1993), अछूत (1940), सुजाता (1959), बूटपालिस (1954), अंकुर (1974), और सदगति (1981) जैसी फिल्मों का निर्माण तो करता है किंतु जिस तल्खी और सिद्दत से जाति के प्रश्न को उठाए जाने की जरूरत है, उस तरह से नहीं उठाता।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् ऐसा समझा गया था कि संविधान में अस्पृश्यता का अंत, जिसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद-17 में शामिल किया गया है, उससे जाति भारतीय समाज में अदृश्य हो जाएगी, किंतु यह एक कटु सच्चाई है कि आजादी के इतने साल बाद भी जाति हमारे समाज की प्रमुख विशेषता बनी हुई है। अभी तक जाति का पूरी तरह से सफाया नहीं हो सका है। आज भी समाचार-पत्रों में जाति-आधारित वैवाहिक विज्ञापन देखने को मिलते हैं। हिंदी सिनेमा में जाति का प्रश्न हाशिये पर ही रहा है। हालाँकि यहाँ बैंडिट क्विन और गोड़ मदर फिल्में प्रमुख रहीं, जिसमें जाति के प्रश्न को पर्याप्त स्थान दिया गया और दलित चेतना भी दिखाई दी। इस संदर्भ में एक अन्य फिल्म शायद वेलकम टू सज्जनपुर भी एक अहम् फिल्म है, जिसमें शायद पहली बार किसी नायक का नाम महादेव कुशवाहा है और नायिका का नाम कमला कुम्हारन है। इस फिल्म में जाति का चित्रण देखने को मिलता है। वह इस संदर्भ में, नायक की माँ जाति नाम के अनुरूप सब्जी कि दुकान चलाती है और नायिका के यहाँ मिट्टी के बर्तन बनाने का काम होता है।

लेकिन अफसोस की बात यह है कि हिंदी सिनेमा में इस प्रकार की फिल्मों का निर्माण केवल नाम-मात्र का ही मिलता है। हिंदी सिनेमा ने समाज के हर हिस्से को अपनी आवाज दी, तो फिर क्यों यह जाति के प्रश्न पर मौन है। क्यों जाति सम्बंधित फिल्मों का निर्माण नहीं किया जाता। इन सवालों के जवाब क्या हैं। क्या सवर्ण समाज इस विषय पर बनी फिल्मों को स्वीकृति नहीं देता? क्या इस प्रकार की फिल्मों के निर्माण से समाज में स्थापित उनका प्रभुत्त्व खतरे में पड़ जायेगा? ये सब कुछ ऐसे अहम् सवाल हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए। लगान व मंगल पांड़े फिल्म में कचरा व नैनसुख किरदार जाति प्रथा के स्वरूप को अवश्य प्रकट करते हैं लेकिन सिर्फ कुछ ही क्षणों के लिए। आखिर कब तक हिंदी सिनेमा ऐसी फिल्मों के निर्माण से बचता रहेगा।

नंगेली क्रूर और अमानवीय मूलाकरम के खिलाफ कुर्बानी देने वाली एक नीची जाति की महिला थी जिसके बलिदान से समाज में एक आंदोलन शुरू हो गया और आखिरकार विवश होकर मूलाकरम को हटाना पड़ा। जहां आज जीवनी आधारित इतनी फिल्मों का निर्माण हिंदी सिनेमा में हो रहा है वहां इस बेहद वीर महिला को केंद्र में रखकर एक भी फिल्म अभी तक नहीं बनी है।

निष्कर्ष- भारत दुनिया में सबसे अधिक फिल्मों का निर्माण करने वाला देश है और हिंदी सिनेमा अपनी भारतीय संस्कृति को केंद्र में रखकर फिल्मों का निर्माण करने के लिए प्रसिद्ध है। हिंदी सिनेमा में प्रत्येक वर्ष हजारों फिल्मों का निर्माण होता है जिसमें भारत के इतिहास व संस्कृति से संबंधित फिल्में भी शामिल हैं। अभी हाल ही में भारतीय इतिहास पर कई फिल्में बनी हैं, जैसे- तानाजी, पद्मावत, पानीपत, भारत, बाजीराव मस्तानी, मणिकर्णिकाः द क्वीन आफ झाँसी और केसरी, लेकिन इन सबके बीच जाति के प्रश्न पर केवल एक ही फिल्म आई, आर्टिकल-15।

आर्टिकल-15 में आयुष्मान खुराना प्रमुख भूमिका में हैं। यह फिल्म अनुभव सिन्हा के निर्देशन में जाति के विषय पर बनी फिल्म है। इन घटनाओं में 2014 में बदायूँ सामूहिक बलात्कार और 2016 में ऊना में हुई दलित अत्याचार तथा अन्य घटनाएं शामिल हैं। लेकिन यह फिल्म चर्चा के साथ-साथ विवाद का विषय भी बन गई। सवर्णों के एक संगठन ने इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। जयपुर में भी ब्राह्मण समाज ने इस फिल्म का विरोध किया। डीएनए की खबर के अनुसार उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के एक संगठन ने इल्जाम लगाया है कि फिल्म के ट्रेलर में उन्हें बुरा दिखाया जा रहा है। ब्राह्मण, पशुराम सेना ने फिल्म को लेकर अपनी नाराजगी प्रकट की है और आरोप लगाया कि फिल्म के मेकर्स ने बदायूँ रेप केस के तथ्यों को बदलने और अपराधियों को ब्राह्मण समाज का दिखाने का प्रयास किया है। उनका कहना है कि इस फिल्म के तथ्यों को इसलिए बदला गया ताकि ब्राह्मण समाज को दुनिया के सामने बुरा दिखाया जा सके।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि सवर्ण समाज नहीं चाहता कि जाति के प्रश्न पर कोई फिल्म बने क्योंकि इससे उनकी प्रतिष्ठा और सम्मान को ठेस पहुँचती है। साथ ही अनेक सदियों से स्थापित सामाजिक प्रभुत्त्व पर भी खतरा मंड़राने लगता है। सवर्णों ने सदियों तक दलितों का शोषण किया है जिसके परिणामस्वरूप दलित आज तक भी उस उत्पीडन से उभर नहीं पाये हैं और न ही पूर्ण रूप से अपना विकास कर पाऐं है। उनकी वास्तविक स्थिति को सवर्णों ने हमेशा नजरअंदाज किया है। समाज में वह हाशिये पर पड़े अपना जीवन गुजार रहे हैं।

हिंदी सिनेमा उनकी इस स्थिति में सुधार लाने का एक अच्छा माध्यम बन सकता है, लेकिन फिल्म निर्माता ऐसी फिल्मों के निर्माण से बचते हैं। केवल कुछ ही ऐसे फिल्म निर्माता हैं जिन्होंने समाज के इस वर्ग को ध्यान में रखकर फिल्मों का निर्माण किया है। उस पर भी सवर्ण समाज विरोध जताने लगता है, क्योंकि इस प्रकार की फिल्मों से समाज में उनकी प्रतिष्ठा का ग्राफ प्रभावित होता है।

संदर्भ सूची-

1.Ghurey, G.S. (1961) ‘Caste, Class and Occupation’, Popular Prakashan Bombay.

2.Spivak, G. Chakravorty, Can the subaltern speak.

3.Jodhka, S.S. (2015) ‘Caste in Contemporary India’, Routledge, Delhi.

4.Sharma, Renu. ‘History of Indian cinema’, Diamond Books.

5.Saxena, A. (2014) ‘Indian cinema society and culture’, Kanishka Pulishing House.

6.https://aajtak.intoday/lite/story/ayushmann-khurrana-reacts-on-article- 15-being-called-antibrahmin.

शानू कुमार

पीएच.डी.

बौद्ध अध्ययन विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय