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विचार-विमर्श

मराठी रंगमंच का पूर्वार्ध; स्त्रियॉं के सर्जनात्मक प्रतिरोध के विशेष संदर्भ में-डॉ. सतीश पावड़े

मराठी रंगमंच का पूर्वार्ध कुछ विद्रोही स्त्रियॉं के सर्जनात्मक प्रतिरोधी स्वर से दीप्तिमान हुआ है। किन्तु इस इतिहास को मुख्य धारा के इतिहास ने कभी प्रकाश में ही नहीं आने दिया ।

वैश्विक परिदृश्य में दलित साहित्य-अनिता जायसवाल

दलित साहित्य का प्रेरणा-स्त्रोत बाबा साहब ने जातिविर्दान और वर्ग विहीन समाज के रूप में ऐसे समाज की कल्पना की जो समता,न्याय, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व पर आधारीत हो उँच-नीच छुआछुत आदि के लिए कोई जगह नहीं हो हिन्दी में ऐसे कई दलित कहानियाँ मिलती है

दलित कहानी की वैचारिकी-ओमप्रकाश मीना

हिंदी में दलित साहित्य नब्बे के दशक में एक साहित्यिक आंदोलन के रूप में सामने आता है, जिनमें दलित साहित्यकारों ने अपनी अग्रणी भूमिका निभाई। इस तरह पारम्परिक साहित्य से अलग होकर अपने समाज की अस्मिता को लेकर दलित वर्ग के लेखकों ने सशक्त भूमिका निभाई।

हिंदी मराठी दलित उपन्यासों के संदर्भ में एक तुलनात्मक विवेचन-माधनुरे श्यामसुंदर

उत्तर भारत में जिसे चमार और डोम कहते है वही महाराष्ट्र में महारों के नाम से जाने जानी वाली दलित बस्तियां गाँव की सीमा के बाहर होती है। एक तरफ सवर्ण रहते है तो एक तरफ दलित।

हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की कहानियों में दलित स्त्री का चित्रण और सामाजिक परिवेश-डॉ॰ स्वाति श्वेता

दलित साहित्य नकार का साहित्य है जो संघर्ष से उपजा है तथा जिसमे समता,स्वतंत्रता और बंधुता का भाव है और वर्ण व्यवस्था से उपजे जातिवाद का विरोध है

हिंदी दलित साहित्य का इतिहास और विकास-डॉ० श्रीमती तारा सिंह

हिंदी में 1980, बाद दलितों द्वारा रचित अनेक आत्म-कथानक साहित्य आईं, जिनके कुछ नाम इस प्रकार हैं _ मोहनदास, नैमिशराय, ओमप्रकाश, बाल्मीकि, सूरजपाल, चौहान आदि । 1999 में दलित पत्रिका का प्रकाशन हुआ, इसके बाद दलित उपन्यासों की रचना हुई । इतना ही नहीं, हिंदी साहित्य का दलित विमर्ष की दृष्टि से पुनर्पाठ भी आरम्भ हुआ, जिसके परिणाम स्वरूप, भक्ति-साहित्य को नई दॄष्टि से व्याख्यापन किया गया ।

महिला मानवाधिकारों के पुरोधा डॉ.आंबेडकर-डॉ. चित्रलेखा अंशु

मेरी नजर में आंबेडकर इसलिए एक विशाल हृदय के नेता थे क्योंकि उन्होने हिन्दू कोड बिल बनाते वक्त इस तरह के कोई निर्देश नहीं दिए कि इसमें किस जाति या किस वर्ग की महिलाओं के अधिकारों की बात की जा रही है।

भूमंडलीकरण और स्त्रीविमर्श-पूजा तिवारी

नारीवाद या स्त्री विमर्श किसी एक देश विशेष की पूँजी नहीं है बल्कि यह सम्पूर्ण विश्व की स्त्रियों की मुक्ति का दस्तावेज है. यह मुक्ति है पितृसत्तात्मक सोच से मुक्ति, परम्परा से मुक्ति और उस बने-बनाये ढांचे से मुक्ति जिसमें स्त्रियों को सदैव पुरुषों की दासी के रूप में देखा गया है

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका-सुबोध कुमार गुप्ता

रायगढ़ की रानी अवंती बाई ने अंग्रेजों की नीतियों से चिढ़कर उनके विरुद्ध संघर्ष का ऐलान कर दिया और मंडला के खेटी गाँव में मोर्चा जमाया. उन्होंने अंग्रेज सेनापति वार्टर के घोड़े के दो टुकड़े कर दिए और उसके वो छक्के छुड़ाए कि वार्टर रानी के पैरों पर गिरकर प्राणों की भीख मांगने लगा

बौद्ध धर्म और थेरी गाथाएँ –स्त्री मुक्ति का युगांतकारी दस्तावेज़: डॉ हर्ष बाला शर्मा

स्त्री मुक्ति और अभिव्यक्ति की चर्चा सर्वप्रथम थेरी गाथाओं में मिलती है| महात्मा बुद्ध की इच्छा न होने पर भी आनन्द द्वारा बल दिए जानेके कारण इन स्त्रियों को संघ में प्रवेश प्राप्त हो सका| इसकी रचना को लेकर भी इतिहासकारों में मत-मतांतर है|

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