20.1 C
Delhi
होम ब्लॉग

हे पिता ! तुम्हारी बहुत याद आती है … (कविता)

0

जब जब यह दुनिया ,

पितृ दिवस मनाती है।

जब जब कोई संतान ,

अपने पिता का सानिध्य पाती है ।

वो खुशनसीब है संतान ,

जिनको माता -पिता दोनों की ,

सेवा -सत्कार नसीब होता है।

जब -जब कोई पुत्री /पुत्र

अपना मनचाहा पुरस्कार लेने ,

अपनी ज़िद पूरी करवाने का सौभाग्य पाता है।

जब- जब कोई पिता अपनी संतान को

कंधों पर बैठाकर /उंगली पकड़कर ,

सैर को जाता है।

पितृ दिवस पर अपने पिता को जब कोई तोहफा और

बधाई देता है।

और बदले में अपार स्नेह ,दुलार और आशीष पाता है।

मैं क्या करूँ मुझे हर पल ,हर क्षण तुम्हारी याद आती है।

तुम्हारे स्नेह ,तुम्हारा दुलार और तुम्हारे साथ बिताई ,

जीवन के हर घड़ी की याद आती है।

मैं जानती हूँ ,मुझे एहसास है ,तुम्हारा स्नेह ,दुलार और आशीष ,

अब भी हमारे साथ है ।

तुम न होते  हुए भी आज भी हमारे साथ हो ,

यह भी एहसास है।

मगर फिर भी !! हे पिता ! मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है।

 

 

 

300 से अधिक पत्रिकाओं की सूची

0
साभार: डॉ. राजेश पासवान जी 
Name of the Journal Publisher and Place of publication Editor Hard copies published Yes / No e-publication Yes/No ISSN number Peer/Refree Reviewed Yes/No Indexing status. If indexted, Name of the indexing data base. Impact Factor/Rating. Name of the IF assigning agency. Whether covered by Thompson & Reuter (Y/N) Do you use any exclusion criteria for Research Journals Any other information Phone no Email id
A आलोचन दृष्टि आजाद नगर, बिन्दकी, फतेहपुर, उत्तर प्रदेश-212635 सं. रंगनाथ पाठक/ सुनील कुमार मानस Yes 2455-4219 9580560498 aalochan.p@gmail.com
A आलोचना राजकमल प्रकाश न 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-110002. सम्पा. नामवर सिंह / अपूर्वानंद Yes 2231-6329 011 23274463 rajkamalprakashan.com
A आकार 15/269, सिविल लाइंस, कानपुर-208001. सं. गिरिराज किशोर Yes
A अभिनव भारती हिंदी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ Yes
A अभिनव कदम 223, पावर हाउस रोड, निजामुद्दीनपुरा , मऊनाथ भंजन, मऊ , उ.प्र. 275102 संपादक – जय प्रकाश धूमकेतु Yes No 2229-4767 Yes 9415246755 dhoomketu223@gmail.com
A अनुसंधान हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय , इलाहाबाद. Yes
A अन्यथा 2063, फेज-1, अरवन इन्टेट डुगरी, लुधियाना-141013. सं. कृष्णकिशोर Yes
A अनहद 3/1 बी. के. बनर्जी मार्ग, नया कटरा, इलाहाबाद-211002. सं. संतोश कुमार चतुर्वेदी Yes
A अनुवाद भारतीय अनुवाद परिषद, दिल्ली. Yes
A अनभै सांचा 148, कादम्बरी, सेक्टर-9, रोहिणी, दिल्ली-110085. सं. द्वारिका प्रसाद चारुमित्र Yes 2347-8454 011-27864302 anbhyasanch
A आजकल प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, रचना भवन, लोदी रोड, नई दिल्ली. राकेश रेणु Yes 0971-8478 Yes 011-24362915 ajkalhindi@gmail.com
A आदिवासी साहित्य मीनाक्षी , 1315, पूर्वांचल जे एन यू नई दिल्ली -67 डॉ गंगा सहाय मीणा yes 2394-689X Yes No No 9868489548 adivasipatrika@gmail.com
A अपनी माटी (ई पत्रिका) अपनी माटी संस्थान’ ए -10 कुम्भानगर ,चित्तौड़गढ़ राजस्थान 312001 स. जितेन्द्र यादव 2322-0724 9001092806 info@apnimaati.com
A अरावली उद्घोश 448, टीचर्स कालोनी, अम्बामाता स्कीम, उदयपुर, राजस्थान-313004. Yes
A आरोह हिंदी विभाग, असम विश्वविद्यालय , सिलचर-788001 (असम). सं. कृष्णमोहन झा Yes
A अक्षर पर्व देशबंधु प्रकाशन, देश बंधु परिषद, रायपुर, बिलासपुर. सं.ललित सुरजन Yes
A अम्बेडकर कल्चर नालंदा, 45, शिवम सिटी, निकट सेक्टर-6, जानकीपुरम विस्तार, लखनऊ-226021. सं. प्रो. कालीचरण ’स्नेही’ Yes
A अम्बेडकर इन इंडिया तमकुहीराज, कुषीनगर (उ. प्र.)-274407. सं. दयानाथ निगम Yes
A अनभै सांचा दिल्ली द्वारिका प्रसाद चारूमित्र 2347-8454 011-27864302 anbhya.sancha@yahoo.co.in
A अक्षरा 0755-2660909 hindibhavan.2009@rediffmail.com
A बहुवचन म.गां.अं.हि. विश्वविद्यालय पो.वा.नं. 16 पंचटीला वर्धा-442001. सं.- अशोक मिश्र Yes 2348-4586 Yes 9958226554 bahuvachan.wardha@gmail.com
A अनामा भगवती कॉलोनी हाजीपुर, बिहार आशुतोष पार्थेश्वर Yes 2348-8506 Yes Quarterly 9934260232 anamahindi@gmail.com
A अरुणप्रभा हिन्दी विभाग, राजीव गाँधी वि.वि., ईटानगर 2349-6444
A अन्तिम जन गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति, गाँधी-दर्शन, राजघाट, नयी दिल्ली -110002 2278-1633
A अनुवाद 24 स्‍कूल लेन (बेसमेण्‍ट), बंगाली मार्केट, नई दि‍ल्‍ली 110001 डॉ. हरीश कुमार सेठी Mar-18 9818398269 bhartiyaanuvadparishad@rediffmail.com
A अंतरंग चतुरंग प्रकाशन, मेनकायन, न्‍यू कॉलोनी, उलाव, बेगूसराय 851134 श्री प्रदीप बि‍हारी 2348-9200 9431211543 biharipradip63@gmail.com
A अम्बेडकर मिशन पत्रिका (मासिक पत्रिका) चितकोहरा, अनीसाबाद, पटना बुद्धशरण हंस
A अभिव्यंजना बुंदेली फाउंडेशन शोध कैंद्र, गौशाला, रमेड़ी, हमीरपुर (उत्तरप्रदेश) Dr. ASHOK KUMAR CHAUHAN YES, QUARTERLY JOURNAL, Bilingual 2277-9884 YES 9893886914 abhivyanjanashodh@gmail.com
A अवधारणा रामचंद्र प्रभुशंकर नगर, सीहोर रोड, नीलबड़, भोपाल (मध्यप्रदेश) DR. SUDHIR KUMAR TIWARI YES, QUARTERLY JOURNAL, Bilingual 2350-059X YES 9893637340 avadharana2014@gmail.com
A एसियन जर्नल ऑफ़ अडवांस स्टडी Social Development Welfare Society BHADOHI U.P. Yes No 2395-4965 Yes Multi-Subject and Multi-Disciplinary
A आगमित रूपकंवल प्रकाशन, लुधियाना (पंजाब) डॉ० राजेन्द्र सिंह साहिल yes ANNUALLY) ISSN 2277-520X YES NO 6122541856 editor@nayidhara.com
A अनुशीलन मानवी सेवा समिति , वाराणसी मुकुल राज मेहता yes 9738762 yes Bi Monthly 9415618968 anushilana@rediffmail.com
A अनामिका तकिया रोड, सासाराम (बिहार) विकास कुमार yes 2347-5838 Yearly 9470828492 patrikaanamika@gmail.com
B बहुवचन, गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र, संपादक- अशोक मिश्र yes 2348-4586 bahuvachan.wardha@gmail.com
B भाषिकी सिद्धि विनायक प्रशासन, मानोली, तहसील-मलारना डूंगर, जिला-सवाई माधोपुर-322028 राजस्थान प्रधान संपादक, प्रोफ़ेसर राम लखन मीना Yes 2454-4388 9413300222 bhashiki.research@outlook.com
B बनास जन 393, DDA, Block-C & D, Kanishak Apartment, Shalimar Bagh, Delhi सं. पल्लव Yes 2232-6558 Yes 081-30072004 pallavkidak@gmail.com, banaasjan@gmail.com
B बया Antika Prakashan, Ghaziabad, U.P. सं. गौरीनाथ Yes 2321-9858 Yes 9871856053 antika56@gmail.com
B भारतीय लेखक डी-180. सेक्टर 10, नोएडा-1. सं. मोहन गुप्ता, Yes
B भाषा केन्द्रीय हिन्दी निदेषालय, उच्चतर षिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार पश्चिमी खंड-7,रामकृष्णपुरम, नई दिल्ली-110066. डॉ शशि भारद्वाज Yes 0523-1418 011-23817823 www.hindinideshalaya.nic.in
B बयान बी.जी. 5ए/30 बी. पश्चिम विहार, नई दिल्ली-110063. सं. मोहनदास नैमिशराय Yes
B बैकवर्ड 205, अंबालिका कॉम्पलेक्स, एजी कॉलोनी, मेन रोड, पटना-800023 (बिहार). सं. अरूण कुमार Yes
B भारत-संधान जे-56 साकेत, नई दिल्ली-110017. सं. अनिल विद्यालंकार Yes
B बहुरि नहीं आवना J-5, Yamuna Apartment, Holi Chowk, Devali, New Delhi, Pin- 11008. Editor, Dr. Dinesh Ram yes 2320-7604 9868701556 bahurinahiawana14@gmail.com
B बोधि पथ Buddha Education Foundation (Trust), Maitrya Buddha Vihar, H-2/48, Sector-16,Rohini, Delhi-110089 Dr SanghMitra Baudh Yes 2347-8004 Yes Yet to receive Blind Review and Plaigrism check http://bodhi-path.com/ 9968262935 sanghmb@gmail.com
B बुंदेली बसंत बुंदेली विकास संस्थान, छतरपुर मप्र संपादक डॉ बहादुर सिंह परमार 0975-8011 9425474662 bsparmar1962@gmail.com
B बीज शब्द प्रकाशन संस्थान , दरियागंज नई दिल्ली केदारनाथ सिंह
C चिंतन सृजन आस्था भारती,27/201, ईस्ट ऐण्ड अपार्टमेंट, मयूर विहार फ़ेस–1 विस्तार, दिल्ली–110096 0973-1490 011-22712454 asthabharti1@gmail.com
C चेतांशी 103, नीलगिरि भवन, प.बोरिंग कैनाल रोड, पटना-1 इन्दु भारती
C चिंतन दिशा A-701 Aashirwad -1, Poonam Sagar Complex, Meera Road, Eastm Mumbai सं.शैलेश सिंह Yes 9819615352 chintandisha@gmail.com
D दलित साहित्य वार्षिकी बी-634, डी.डी.ए. फ्लैट्स, ईस्ट ऑफ़ लोदी रोड, दिल्ली – 110093. सं. डॉ.जयप्रकाश कर्दम Yes
D दी डिस्कोर्स द्वारा पीपुल फॉर एकेडमिक रिसर्च एंड एक्सटेंशन, डिजिटल डेस्टिनेशन, टी के टावर्स, घाट किडीह, जमशेदपुर (झारखण्ड). Yes
D दस्तावेज 101, बेतियाहाता, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश. सं. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी Yes 2348-7763 0551-2335067
D दृश्यान्तर दूरदर्शन महानिदेषालय, कमरा नं.-1026, बी. विंग कोपरनिकस मार्ग, नई दिल्ली-110001. सं. अजित राय Yes
D दलित दस्तक 32/3, पश्चिमपुरी, नई दिल्ली-110063. सं. अशोकदास Yes 2347-8357 01141427518/09013942162 dalitdastak@gmail.com
दलित अस्मिता सेन्टर फॉर दलित लिटरेचर एंड आर्ट, IIDS, डी-2/1, रोड नं. 4, एंड्रयूज गंज, नई दिल्ली-110049 सं. विमल थोरात Yes 2278-8077 9811807522 asmita@dalitstudies.org.in
F फ़िलहाल नेहरू नंदा भवन, दरोगा राय पथ, पटना-800001 (बिहार). सं. प्रीति सिन्हा Yes
G गवेषणा केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा. नन्दकिशोर पाण्डेय Yes 0435-1460 w.w.w hindisansthan.org
G गगनांचल भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्, दिल्ली 0971-1430 011-233793 pohindi.iccr.nic.in
G गर्भनाल डीएक्सई-23, मीनाल रेसिडेंसी, जे.के.रोड, भोपाल-462023, म.प्र. भारत सुषमा शर्मा 2249-5967 yes 91-9303337325
G गुंजन इंदौर , मध्य प्रदेश जीतेन्द्र चौहान
G ज्ञान शिखा हिंदी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग , लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ
G ज्ञान स्पंदन डॉ.शारदा प्रसाद,पो०:रामगढ कैंट,जिला रामगढ(झारखण्ड),
पिन-829122
डॉ.शारदा प्रसाद Yes ISSN-2349-8609 Yes 9835900021 gyanspandan2015@gmail.com
H हंस 2/36, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-2 सं. संजय सहाय Yes 2454-4450 011-23270377 editor@hansmonthly.com
H हिन्दी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा. Yes
H हाशिए की आवाज सोशल एक्शन ट्रस्ट, 10 इंस्टीट्यूश नल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली सं. डॉ.जोसेफ Yes 2277-5331 011-49534156/132 hka@isidelhi.org.in
H हिंदी अनुशीलन भारतीय हिन्दी परिषद, इलाहाबाद. सं. रामकमल राय Yes
H हिन्दीटेक Centre for Endangered Languages, Visva-Bharati Santiniketan, Bolpur अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी No 2231-4989 TDIL, MIT GOI 88005459243
H हस्ताक्षर हिन्दू कालेज , नई दिल्ली रचना सिंह
I इंद्रप्रस्थ भारती हिन्दी अकादमी, दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली सरकार, समुदाय भवन, पद्म नगर, किशनगंज, दिल्ली-07. मैत्रेयी पुष्पा Yes
I इतिहास भारतीय इतिहास अनुसंधान परिशद, नयी दिल्ली-110001. सं. इशरत आलम/एस.एम. मिश्रा Yes
I इंडिया एलाइव 4/447, विजयन्त खंड, गामतीनगर, लखनऊ. सं. डॉ. आशीश सिंह Yes
I उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार, लखनऊ 47282/88 011-236931118
I इन्डियन स्कॉलर ग्वालियर म.प्र डॉ जीतेन्द्र अरोलिया No 2350-109X No No No Quarterly 9926223649 researchscholar2013@gmail.com
I जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका जनकृति संस्था, मा.गां.अं.हि.वि. वर्धा, महाराष्ट्र कुमार गौरव मिश्रा NO 2454-2725 NO CITEFACTOR, IFSIJ, DRJI, MONTHLY 8805408656
I इतिहास बोध लाल बहादुर वर्मा -बी-२३९,चंद्र शेखर आजाद नागर,तेलियर गंज,इलाहबाद -211004 लाल बहादुर वर्मा yes
I इस्पात भाषा भारती स्टील अथोरिटी ऑफ़ इंडिया , नई दिल्ली बी आर सैनी
I इंडियन जर्नल ऑफ़ सोशल कंसर्न्स डॉ. राजनारायण शुक्ला,एस.एच,ऐ-5,कवि नगर,गाज़ियाबाद डॉ. राजनारायण शुक्ला yes ISSN-2231-5837 Yes 9910777969 harisharanverma1@gmail.com
J जर्नल ऑफ़ सोशियो एकोनिमिक रिभ्यु ma. kanshi ram sodh peeth, CCS University Meerut U.P. Dr. Dinesh kumar yes, Half Yearly journal 2321-8479 yes
J झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा तेलंगा खड़िया भाशा एवं संस्कृति केन्द्र द्वारा प्यारा केरकेट्टा फाउण्डेशन, चेषायर होम रोड, बरियातु, रांची-834009. सं. वंदना टेटे Yes
J जनपथ सेण्ट्रल को-ऑपरेटिव बैंक, मंगल पाण्डेय पथ, आरा (बिहार)–802301 सं. अनन्त सिंह Yes 2277-6583 Yes 9431847568 janpathpatrika@gmail.com
j जन मीडिया – जन मीडिया -संपादक -अनिल चमड़िआ -सी -२,पीपल वाला मोहल्ला,बादली एक्सटेंशन,दिल्ली -४२. अनिल चमड़िआ yes 2277-2847 janmedia.editor@gmail.com
J जन मीडिया सी -२,पीपल वाला मोहल्ला,बादली एक्सटेंशन,दिल्ली -४२. अनिल चमड़िआ
J जर्नल ऑफ़ ह्युमिनीटीज एंड कल्चर Anil Kumar, Varanasi Yes No 2393-8285 Yes Multi-Subject and Multi-Disciplinary
J जन मीडिया सी-2, पीपलवाला मोहल्ला, बादली एक्सटेंशन दिल्ली-110042 सं. अनिल चमड़िया Yes 2277-2847 Multi-Subject and Multi-Disciplinary
J ज्योतिर्मय Madhumay Educational And Research Foundation,Anand Vihar Colony, House no.- 40, in front of Dr. RMLA universit:y, Faizabad- 224001 (Uttar Pradesh) Editor-in-chief- Dr. Neeraj Tiwari,yes No 2454-6070 yes indexd by- ISI, IIJIF, ISRA, I2OR, SJIF Impact factor – 1.901 (IIJIF) Multi-Subject and Multi-Disciplinary, bilingual, biannual 9305746945 jrjoe24546070@gmail.com
K कथा ए.डी.-2, एकाकी कुंज, 24 म्योर रोड इलाहाबाद-01 सं. मार्कण्डेय Yes
K कथादेश सहयात्रा प्रकाशन प्रा.लि., सी-52/जेड-3 दिलशाद गार्डन, दिल्ली-1100095. सं. हरिनारायण Yes 1143522783 kathadeshnew@gmail.com
K कथाक्रम 3, ट्रांजिस्ट हॉस्टल, वायरलैस चौराहे के पास, महानगर, लखनऊ-226006 सं. शैलेन्द्र सागर Yes
K कृति संस्कृति संधान बी-2/51, रोहिणी सेक्टर-16, दिल्ली, 110085. सं. सुभाष गाताडे Yes
K कथन 107 साक्षर अपार्टमेंट्स ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली-110063. सं. रमेश उपाध्याय, संज्ञा उपाध्याय Yes
K कृति ओर सी-133, वैशाली नगर, जयपुर-302021, राजस्थान. सं. विजेन्द्र Yes
K कदम 12/224, एस.सी.डी. फ्लैट, सेक्टर-20, रोहिणी, नई दिल्ली-110086. स. कैलाश चंद चौहान Yes
K कृतिका उड़यी, जालौन, उत्तर प्रदेश . सं. डॉ.वीरेंद्र सिंह यादव Yes
K कल के लिए जयनारायण, बहराइच. Yes
K कोलाज कला चर्च रोड, जिंसी जहांगीराबाद, भोपाल-462008 (म. प्र.). Yes
K कौटिल्य शासकीय, टी.आर.एस. महाविद्यालय, रीवा, मध्य प्रदेश . Yes
K जनपथ मासिक, सं. अनंत कुमार सिंह, द्वारा सेंट्रल कॉपरेटिव बैंक, मंगल पांडे पथ, आरा, जिला भोजपुर, बिहार 802301. Yes
K कला पूर्णिया , बिहार कलाधर
K कादम्बिनी हिंदुस्तान टाईम्स ग्रुप , नई दिल्ली
K क्रियटिव्ह स्पेस एकलव्य प्रकाशन, 40, रामनगर, टिम्बवाडी बायपास, मधुरम, जुनागढ़ (गुजरात) सं. डॉ.हरेश परमार Yes 2347-1689 Yes 0.678 9408110030 creativespaceip@gmail.com
L लमही 3/343, विवेक खण्ड, गोमती नगर, लखनऊ (226010). सं. विजयराय Yes 2278554X Lemahi Yes 9454501011 vijairai.lamahi@gmail.com
L लोकचेतना विमर्श ई-1, किशोर एन्क्लेव, पटेल नगर, हरमु, राँची, झारखण्ड-834002 रविरंजन Yes (Biannually) 2277-5013 YES NO YES 9470311115 lokchetna.ranchi@gmail.com
L लोकबिंब ई-पत्रिका D-124, GALI NO-6, LAXMI NAGAR, NEW DELHI-110092 गोविन्द यादव Yes Yes प्रवेशांक लोककला एवं लोक साहित्य केन्द्रित त्रैमासिक 9910773493 lokbimbpatrika@gmail.com
M माध्यम हिंदी साहित्य सम्मेलन, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद-211001. Yes
M मित्र महाराजा हाथा, कटिरा, आरा, बिहार राश्ट्रभाशा परिशद, पटना (बिहार). मिथिलेश्वर Yes
M मूक आवाज पांडिचेरी Yes
M मीडिया विमर्श 428, रोहित नगर, फेज प्रथम, भोपाल. सं. डॉ.श्रीकांतसिंह Yes
M मूल प्रश्न 3 न्यू अहिंसापुरी, ज्यांति स्कूल के पास फतेहपुरा, उदयपुर-313001 राजस्थान. Yes
M मुक्तांचल कोलकाता 2350-1065 9831497320 muktanchalquaterly214@gmail.com
M मोर्चा 9990448490 morchahindi@gmail.com
M मूक आवाज़ हिंदी विभाग, पांडिचेरी विश्वविद्यालय प्रमोद मीणा No 2320-835X Yes Quarterly 7320920958 mookaawazhindi@gmail.com
M मध्य भारती डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर अम्बिकादत्त शर्मा
M माध्यम हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद
M मुक्तिबोध साहित्य कुटीर, टिकरीपारा, जिला-राजनांदगाव (छ.ग.) सं. मांघीलाल यादव Yes 07743- 296853 raju.kashyap48@yahoo.com
N नटरंग वी-31, स्वास्थ्य विहार, विकास मार्ग, दिल्ली-1100092. सं. अशोक वाजपेयी, रश्मि वाजपेयी. Yes
N नया पथ जनवादी लेखक संघ, 8 विट्ठल भाई पटेल हाउस, नई दिल्ली-110003. सं. चंचल चौहान Yes 9818859545
N नया ज्ञानोदय भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीटयूटशनल एरिया, लोदी रोड, पो.वो. नं. 3113, नई दिल्ली-110003. लीलाधर मंडलोई Yes 2278-2184 9818291188 nayagyanoday@gmail.com
N नया मानदंड शोध संस्थान, दुर्गाकुंड वाराणसी. कुसुम चतुर्वेदी Yes
N नागफनी दून व्यू कॉलेज, स्प्रिंग रोड, मसूरी-248179 (उत्तराखण्ड). सं. सपना सोनकर Yes
N नारी उत्कर्ष राजीव कुमार, सी-165,पाण्डव नगर,दिल्ली-92 9599444761 nariutkarsh@gmail
N निरुप्रह लखनऊ, उत्तर प्रदेश अरविन्द कुमार Yes 2394-2223 NO Quarterly 9721200282 drdivyanshu.kumar6@gmail.com
N नवनीत भारतीय विद्याभवन, क.मा.मुंशी मार्ग, मुम्बई-400007
N निरंजना ए-2, त्रिभुवन शांति एन्क्लेव, रोड नं. 1, राजेन्द्र नगर, पटना-800016
N नई धारा सूर्यपुरा हाउस, बोरिंग रोड, पटना-800001 शिवनारायण
N नागरी पत्रिका नागरी प्रचारिणी सभा , वाराणसी पद्माकर पाण्डेय
p प्रगतिशील वसुधा मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ, भोपाल राजेन्द्र शर्मा yes 2231-0460 0755-2761253 vasudha.hindi@gmail.com
P पक्षधर बी-2, तीसरा फ्लोर, महेन्द्र एन्क्लेव, स्टेडियम रोड, नई दिल्ली-33. सं. विनोद तिवारी Yes 2231-1173
P पहल पहल, जबलपुर, 101, रामनगर, आधारताल, जबलपुर (मं.प्र.)-482 004 सं. ज्ञानरंजन Yes Yes 9893017853 editorpahal@gmail.com
P प्रतिमान विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सी एस डी एस), 29, राजपुर रोड, दिल्ली-110054. सं. अभय कुमार दुबे Yes
P प्रगतिशील वसुधा निराला नगर, दुष्यंत मार्ग, भदभदा मार्ग भोपाल. सं. राजेन्द्र शर्मा Yes
P पल-प्रतिपल आधार प्रकाशन, एससीएफ 207, सेक्टर-10, पंचकूला-134133, हरियाणा. सं. देश निर्मोही Yes
P पाती टैगोर नगर, सिविल नगर, सिविल लाइन्स, बलिया-277001 (उ. प्र.). सं. अशोक द्विवेदी Yes
P परिचय 909,काशीपुरम कालोनी,सीरगोवर्धन,डाफी, वाराणसी-221011 सं. श्रीप्रकाश शुक्ल Yes 2229-6212 9415890513 parichay909@gmail.com
P पुस्तक वार्ता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा. सं. गिरीश्र्वर मिश्र, विमल झा Yes 2349-1809 Yes 9910186568 pustakvimal@gmail.com
P परिकथा 96, बेसमेंट, फेज-3, इरोज गार्डन, सूरजकुंड, रोड, नई दिल्ली-110044. सं. शंकर Yes 2320-1274 Yes 8826011824 parikatha.hindi@gmail.com
P प्रस्थान ए-317 सूरजपुर कॉलोनी, गोरखपुर (उ.प्र.) सं. दीपक प्रकाश त्यागी Yes 2229-3876 Yes 9415824589 dpt_ddu@yahoo.com
P पारसमाला 3 / 16, कबीर नगर दुर्गाकुंड वाराणसी-221005 सं. : हरिहर प्रसाद चतुर्वेदी Yes 9415269874 parasmalavns@gmail.com
P पाखी इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिऐटिव सोसायटी बी-107, सेक्टर-63, नोएडा-201301, उ.प्र. प्रेम भारद्वाज Yes 2393-8129 0120-4060300 pakhi@pakhi.in
P प्रगतिशील इरावती गाँव बल्ह, डाकघर-मौंहीं, तहसील व ज़िला-हमीरपुर-177030 (हिमाचल प्रदेश). प्रगतिशील इरावती Yes
P पूर्वापर लाहिड़ीपुरम, सिविल लाइंस, गोण्डा-271001 (उ. प्र.). सं. सूर्यपाल सिंह Yes
P पंचशील शोध समीक्षा फिल्म कॉलोनी, चौड़ा रास्ता, जयपुर, राजस्थान हेतु भारद्वाज Yes 0975-2587 Quarterly 0141-2315072,2314172 info@panchsheelprakashan.com
P परिषद् पत्रिका बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, प्रेमचंद मार्ग, पटना, बिहार सत्येन्द्र कुमार Yes 2320-5342 Yes Quarterly
P प्रज्ञा और हिमालयीय संस्कृति सेण्ट्रल इन्स्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन कल्चर स्टडीज़, दाहुंग (अरुणाचल प्रदेश) 2347-8535
P प्रगति‍वार्ता प्रगति‍भवन, साहि‍बगंज, झारखण्‍ड 816109 डॉ. रामजन्‍म मि‍श्र ISSN 2229-5062 9431551682 pragativarta@yahoo.co.in
P परिशोध PANJAB UNIVERSITY PRESS, CHANDIGARH AND DEPARTMENT OF HINDI, PANJAB UNIVERSITY CHANDIGARH DR. ASHOK KUMAR, DR. GURMEET SINGH YES (ANNUALLY) ISSN 2347-6648 YES No No 0172-2534616 hindidep@pu.ac.in
परिन्दे 79 ए, दिलशाद गार्डन, दिल्ली- 95 राघव चेतन राय Yes Bimonthly
p परमिता N1/61-R-1 शाशिनगर कॉलोनी नगवां लंका , वाराणसी-5 डॉ. अवधेश दीक्षित yes 0974-6129 9161122848 parmita.com@gmail.com
p प्रत्यय 134 गालिबपुर मऊनाथ भंजन, उ.प्र. 275101 डॉ. शर्वेश पाण्डेय yes 0975-7821 9415219227 spdck.mau@gmail.com
प्रगतिशील वसुधा मायाराम सुरजन स्मृति भवन शास्त्री नागर, पी एंड ती चौराहा
भोपाल- 462003 सम्पर्क-09425392954
स्वयं प्रकाश yes Trimonthly
p पर्सपेक्टिव ऑफ़ सोशल साइंस एंड ह्युमिनीटीज herambh welfare society Narottam pur,BHU, tikari Road Varanasi-5 Dr. Hemant Kumar Singh yes yes 2322–0325 yes mail@pssh.in
P पाण्डुलिपि विमर्श प्रमोद वर्मा संस्थान, रायपुर विश्वरंजन
P परिशीलन सुरुचि कला समिति, वाराणसी अंजनी कुमार मिश्र yes 0974-7222 yes Quarterly 9450016201 suruchikalas@yahoo.in
भाषा केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, नई दिल्ली
R नटरंग राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली. प्रयाग शुक्ल Yes
नया पथ 42 अशोक रोड नयी दिल्ली-110001 मुरली मनोहर प्रसाद सिंह
युद्धरत आम आदमी 1516,1st Floor,Wazirnagar,Kotla Mubarakpur
New delhi-110003
Ramnika Gupta
R रंगकर्म आठले हाउस, सिविल लाइंस दरोगा, पारा, रायगढ़ (छत्तीसगढ़) सं. उषा आठले, युवराज सिंह Yes
R रचना कर्म आनंद, गुजरात. सं. डॉ.माया प्रसाद पाण्डेय Yes
R रसप्रसंग राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली 011-23389138 rangprasang@gmail.com
R रिसर्च एनालिसिस एंड इवैल्यूएशन ए-215,मोती नगर ,गली नंबर -7,क्वीन्स रोड ,जयपुर ,राजस्थान-302021 सं. डॉ कृष्ण बीर सिंह Yes 0975-3486 Yes
R रिसर्च स्ट्रेटेजी 196, GANGA NAGAR, HOUSING SOCIETY, (Patrakar Puram), Kanpur Dr. R.K. CHAURASIA yes 2250-3927 yes Yes Only Geographical and Environmental Research Paper Accepted Annual Journal, 9450274378 Chaurasiark890@gmail,com
R रिसर्च स्कॉलर Gwalior (M.P.) Dr. Jitendra Arolia No 2320-6101 Yes ROAD COSMOS No No Quarterly 9926223649 jitendraarolia@gmail.com
R रिदम C-97, Rama Park, Utta Nagar, New delhi 110059 बलराज सिंहमार No 2455-9113 Yes Quarterly 9408110030 ridamindia@gmail.com
R रेतपथ रेत पथ, कोथल कलां, महेंद्रगढ़-123028 (हरियाणा) अमित मनोज yes 2347-6702 Half Yearly 9992885959 retpath2013@gmail.com
R रिसर्च डिस्कोर्स South Asia Research And Development Institute,B. 28/70,Behind Manas Mandir,Durgakund,Varanasi(U.P.)221005,India Dr.Anish kumar verma Yes No 2277-2014 yes Multi-Subject and Multi-Disciplinary, bilingual, quarterly, 9453025847 researchdiscourse2012@gmail.com
R रिसर्च लाइन डॉ.उपेन्द्र विश्वास,208,पत्रकार कॉलोनी,विनय नगर सेक्टर ३,ग्वालियर,M.P डॉ.उपेन्द्र विश्वास Yes ISSN-2321-2993 Yes 94065-80200,089826-42665 researchlinejournal@gmail.com/upendra.viswas@gmail.com
वागर्थ भारतीय भाषा परिषद् 36-ए ,शेक्सपीयर सरणी,कोलकाता-17 प्रो. शंभुनाथ yes yes
S स्त्रीकाल थोरात कॉम्प्लेक्स, सेवाग्राम रोड, वर्धा, महाराष्ट्र-442001 सं. संजीव चंदन Yes
S समकालीन भारतीय साहित्य साहित्य अकादमी, रवीन्द्र भवन, 35ए फिरोजशाह रोड, दिल्ली. रणजीत साहा Yes 0970-8367
S समकालीन सृजन 20 बालमुकुंद मक्कर रोड, कोलकाता-700007 सं. डॉ.शंभुनाथ Yes
S संवेद बी-3/44, तीसरा तल, सेक्टर-16, रोहिणी, दिल्ली-110089. सं. किशन कालजयी Yes
S संवाद खरगपुर, झंझौर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश सं. अमित कुमार पाण्डेय Yes 2231-4156 Half yearly 7376563499 samvaad.bhu@gmail.com
साहित्य वर्तिका वाराणसी सं. अमित कुमार पाण्डेय Yes
S सृजन संवाद ई-64, ए साउथ सिटी, गोमती नगर, लखनऊ. सं. ब्रजेश Yes
S शब्दयोग 280, डोभाल वाला, देहरादून (उत्तराखंड). रमण सिन्हा Yes
S शोध-धारा शैक्षिक एवं अनुसंधान संस्थान उरई, जालौन (उ.प्र.). . डॉ.राजेश चंद्र पाण्डेय Yes
S शोध-संचयन 409, शांतिवन अपार्टमेंट, 2 ए/244ए, आजाद नगर, कानपुर (उ.प्र.). डॉ. योगेन्द्रप्रताप सिंह Yes
S संचेतना एच.108, शिवाजी पार्क, पंजाबी बाग, नई दिल्ली. सं. महीप सिंह Yes
S समकालीन सृजन कोलकाता. डॉ.शंभुनाथ Yes
S साक्षात्कार मध्यप्रदेश पत्रिका, बाणगंगा चौक, भोपाल-3. सं. हरि भटनागर Yes
S साहित्य भारती उ.प्र. हिंदी संस्थान, 6-महात्मा गाँधी मार्ग, हजरतगंज, लखनऊ-226001. Yes
S साखी एच – 1/2 नरिया, बी.एच.यू. वाराणसी. सं. केदारनाथ सिंह/सदानंद साही Yes 2231-5187
S संबोधन रवीन्द्र भवन, 35, फिरेाजषाह रोड, नई दिल्ली, 110001. सं. कमर मेवाड़ी, चांदपोल, और प्रभाकर श्रेणिक Yes
S सेतु आश्रय, खलीनी शिमला-171002 (हि. प्र.). सं. डॉ.देवेन्द्र गुप्ता Yes
S समयांतर 79 ए, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-95. सं. पंकज बिष्ट Yes 2249-0469 9868302298 samayantar.monthly@gmail.com
S समन्वय पूर्वोत्तर केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, ओल्ड डी.आई.ऐ.ऐ बिल्डिंग, दीमापुर, नागालैण्ड. Yes
S समालोचन Yes
S सृजन सन्दर्भ बी-2/304 लार्ड शिवा पैराडाइज, कल्याण ( पश्चिम ठाणे )ठाणे सं. सतीश पाण्डेय, संजीव दुबे Yes 0976-7290 Yes 8140241172 dubesanjeev@gmail.com
S समुच्चय अंग्रेजी एवं विदेषी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद. Yes
S संवेद (वाराणसी) 64-डी, गणेश धाम कालोनी, सुंदरपुर, वाराणसी (उ.प्र.). कमला प्रसाद मिश्र Yes
S शुक्रवार के-25, सेक्टर-18, अट्टा मार्केट, नोएडा, गौतमबुद्धनगर (उत्तर प्रदेश )-201301. सं. विष्णु नागर Yes
S शोध संविद राजनीति विज्ञान विभाग, मगध महिला कॉलेज, पटना- ८००००१ सं. डॉ. तेलानी मीना होरो / डॉ. रूपम Yes 2393-980X Yes N.A N.A Hindi / Eng. Half Yearly 9955950162 shodh.samvid@gmail.com
S शोध समीक्षा और मूल्यांकन ए-215, मोतीनगर, स्ट्रीट नं. 7, क्वीन्स रोड, जयपुर, राजस्थान-302021. सं. डॉ.कृष्णवीर सिंह Yes
S समय सरोकार नई दिल्ली सं. प्रेमचंद पातंजलि Yes
S समकालीन तीसरी दुनिया क्यू,-63, सेक्टर-12, नोएडा (गौतमबुद्ध नगर) पिन. 2013101 सं. आनन्द स्वरूप वर्मा Yes
S सम्यक भारत सी1/98, रोहिणी सेक्टर-5, नई दिल्ली-85. सं. के.पी. मौर्य Yes
S संघर्ष/स्ट्रगल # 191, सेक्टर-19 B, DDA मल्टी स्टोरी फ्लैट्स, संस्कृति अपार्टमेन्टस, द्वारका,नई दिल्ली-110075 सं. डॉ. प्रमोद कुमार Yes Yes 2278-3059/2278-3067 2278-3059/2278-3067 Yes 0.793 Multi-Subject and Multi-Disciplinary 9408110030/9868012202 editorsangharsh@gmail.com/hareshgujarati@gmail.com
S समकालीन अभिव्यक्ति फ्लैट नं. 05, तृतीय तल, 984, वार्ड नं. 7, महरौली, नई दिल्ली-30. सं. उपेन्द्र कुमार मिश्र Yes
S समय माजरा राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी, भवन, आगरा, रोड जयपुर, 302003. Yes
S संकल्य हिंदी अकादमी, हैदराबाद Yes
S संचारिका महाराष्ट्र हिंदी प्रचार सभा, एम.के. अग्रवाल, हिंदी भवन, शहागंज, औरंगाबाद (महाराष्ट्र)-431001 संपा. नारायण वाकळे/ डॉ. भारती गोरे Yes 0976-3775 240-2362350 / 9422347678 maharashtrahindi2gmail.com/drbharatigore@gmail.com
S समकालीन जनमत 171, कर्नलगंज (स्वराज भवन के सामने) इलाहाबाद (211002). सं. सुधीर सुमन Yes
S समसामयिक सृजन लॉक, मकान नं. 189, विकासपुरी, नई दिल्ली-110018. सं. महेन्द्र प्रजापति Yes
S सामयिक सरस्वती सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाडा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-110002 सं. महेश भरद्वाज/शरद सिंह Yes 2454-2911 011-23282733 samayikprakashan@gmail.com
S शेष साइकिल मार्केट के पास, लोहारपुर, जोधपुर-342002, राजस्थान. सं. हसन जमाल, पन्ना निवास Yes
S शोध संचार बुलेटिन 448/119/76, कल्याणपुरी, ठाकुरगंज चैक, लखनऊ-226003 (यू.पी.). प्रधान सं. विनय कुमार शर्मा Yes
S साखी 2231-5187 7376647097 saakhee2000@gmail.com
S सदानीरा 2321-1474 7552424126 agneya@hotmail.com
S सत्राची डॉ. रूपम / आनन्‍द बिहारी, केशव कुंज, कदमकुआँ, पटना – ८००००३ सं. डॉ. रूपम / डॉ. आनन्‍द बिहारी Yes 2348-8425 Yes N.A No Hindi / Eng. Quaterly 9470738162 satraachee@gmail.com
S समास 011-46526269
S शीतलवाणी 9412131404 sheetalvani.com
S सार संसार 2320-3277 literature@saarsansar.com
S साहित्य कुंज Sahitya Kunj,3421 FENWICK CRESCENT, MISSISSAUGA, ON, L5L N 7 CANADA सुमन कुमार घई NO 22 92 -97 54 YES garbhanal@ymail.com
S साहित्य यात्रा ई – 112 , श्रीकृष्णपुरी , पटना – 800001 ( बिहार ) डा . कलानाथ मिश्र yes 2349 – 19 06 no
S शोध हस्तक्षेप सोसाइटी फॉर एजुकेशनल एम्पावरमेंट,वाराणसी, उ.प्र. डॉ सत्यपाल शर्मा yes 2231- 4644 yes बहुभाषी और बहुविषयक अर्धवार्षिक शोध जर्नल 9936180064 hastakshep.irj@gmail.com
S 1990, सिग्निफ़ायर ऑफ चेंज 4था क्रास, न्यू बसारगढ़ कॉलोनी, हटिया, रांची, झारखंड सं.धीरज कुमार मिश्रा / उप संपादक प्रकाश चन्द्र yes 2321-4465 in plan for upgarde Multi disciplinery 00821029750139/+917042616767 1990sfc@gmail.com
S शिखर सामयिक शिमला, हिमाचल प्रदेश इंद्र सिंह ठाकुर Yes 2249 – 9199 Yes Half yearly 9418464899 shikharjournals@gmail.com
s शोध सामयिक अलवर, राजस्थान डॉ.अनुपमा यादव, मनीष कुमार यादव yes 2321-6727
S समीक्षा एच-2, यमुना, इग्‍नू, नई दि‍ल्‍ली 110068 प्रो. सत्‍यकाम ISSN 2349-9354 Yes 989682626 satyakamji@gmail.com
S साखी एच-1/2,वीडीए फ्लैट्स,नरिया (बी.एच.यू),वाराणसी,उत्तर प्रदेश-221005 प्रो. सदानन्‍द साही ISSN 2231-5187 9450091420 sadanandshahi@gmail.com
S शोध दिशा हिंदी साहित्य निकेतन,16 कला विहार, बिजनौर(उ.प्र.) गिरिराजशरण अग्रवाल त्रैमासिक 0975-735X yes 01342-263232 shodhdisha@gmail. com
s संधान संधान -लाल बहादुर वर्मा,सुभाष गाताडे -बी-२/५१,सेक्-१६ ,रोहिणी दिल्ली , लाल बहादुर वर्मा,सुभाष गालाल बहादुताडे yes
S सौराष्ट्रीय Saurashtra University, Rajkot R. N. Kathad, Rajkot Yes NO 2249-4383 Yes Multi-Subject and Multi-Disciplinary 9687692951 surashtriya@yahoo.com
S साहित्य सेतु Dr. Naresh Shukl, Ahmedabad No Yes 2249-2372 Yes Multi-Subject and Multi-Disciplinary
S समाज दर्शी 1245 BANK COLONY CHAMARI ROAD HAPUR UP 245101 SAMPDAK DR. BABLU SINGH/DR. AJAY KUMAR YES 2395-0374 9412619392 samajdarshishodhpatrika@gmail.com
s श्री प्रभु प्रतिभा प्रतिभा प्रकाशन, त्रिवेणी सेवा समिति, इलाहाबाद प्रबुद्ध मिश्रा yes 0974-522x 9415646402 shriprabhu@gmail.com
S सामयिक मीमांसा नई दिल्ली विजय मिश्र
S संवदिया अररिया , बिहार
S शोध समवाय स्वपन पब्लिकेशन , नई दिल्ली महेश्वर yes 0976-2010 Quarterly 9968012866 shodhsamavay@gmail.com
S शोध History & History Writing Association,U.P. , Varanasi शैलेन्द्र कुमार yes 9701745 Quarterly 9415256496 shodhjournal@sify.com
S शोध मीमांसा Kusum jankalyan samiti,Deoria,U.P. Dr.Rakesh Kumar Maurya yes no 2348-4624 yes quarterly, bilingual 9415842611 shodhmimansa@gmail.com
S संघर्ष 34/15, प्रथम तल, ईस्ट पटेल नगर, नई दिल्ली-8.
T तद्भव 18-201, इंदिरा नगर, लखनऊ-226016. सं. अखिलेश Yes 0522-2345301 akhilesh_tadbhav@yahoo.com
T तनाव 57- मंगलवारा, पिपरिया-461775. Yes
T तीसरा पक्ष सं. देवेश चैधरी देव मासिक, 3734/23 ए त्रिमूर्तिकार, दमाहेनावा, जवलपुर-482002, म.प्र.. Yes
T ट्रांसफ्रेम प्रवीण सिंह चौहान, 55A/103 एकता नगर कांदीवली वेस्ट मुंबई-400067 मेघा आचार्य, प्रवीण सिंह चौहान no Yes 2455-0310 yes yes DJRI under evaluation JIF BIMONTHLY 9763706428 contact@transframe.in/ transframemagazine@gmail.com
T द दिल्ली जर्नल ऑफ़ ह्युमिनितिज एंड सोशल साइंस Sangharsh, New Delhi Devendra Tanwar Yes No Yes Multi-Subject and Multi-Disciplinary 97167 54057
U उद्भावना (मासिक) ए-21, झिलमिल इंडस्ट्रियल एरिया जी. टी. रोड, शाहदरा, दिल्ली-110095 सं. अजेय कुमार Yes uphin369876 9415554128 editor.udbhav@gmail.com
U उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, पार्क रोड, लखनऊ सं. कुमकुम शर्मा Yes 9453703921 upmasik@gmail.com/sharmak229@gmail.com
U उम्मीद ए-2/604, समरपाम सोसायटी, सेक्टर-86, फरीदाबाद सं. जितेन्द्र श्रीवास्तव Yes 2347-5803 Yes 9818913798 ummeed13@gmail.com/jitendra82003@gmail.com
U उत्‍तरवार्ता 204, डीए9, एनके हाउस, मेन विकास मार्ग, शकरपुर, लक्ष्मीनगर, दिल्ली-110092 अमलेश प्रसाद ISSN 2455-3859 9716314047, 9031943641 uttarvarta@gmail.com/amalesh.article@gmail.com
V वाक् वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली, 110002. सं. सुधीश पचैरी Yes 2320-818k 11232273167 vaniparkashan@gmail.com
V वागर्थ भारतीय भाषा परिषद, 26ए , शेक्सपियर सारणी, कोलकाता-700017. विजय बहादुर सिंह Yes 2394-1723 3322900977 vagarth.hindi@gmail.com
V वचन सं. प्रकाश त्रिपाठी, 52 तुलाराम बाग, इलाहाबाद. सं. प्रकाश त्रिपाठी, Yes
V वर्तमान साहित्य 28 एमआईजी, अवंतिका-1, रामघाट रोड, अलीगढ़ 202001. नमिता सिंह Yes 40342/83 9643890121 vartmansahitya.patrika@gmail.com
V विन्ध्य भारती हिन्दी विभाग, ए.पी.एस. विश्वविद्यालय , रीवा, मध्य प्रदेश . Yes
V परिप्रेक्ष्य न्यूपा, अरविन्द मार्ग, दिल्ली सुभाष शर्मा Yes
V वाद संवाद 103, मनोकामना भवन, गली न-2, कैलाशपुरी] पालम, नई दिल्ली-110045 प्रधान संपादक राम रतन प्रसाद Yes 2348 – 8662 Yes 9871423939 vaadsamvaad@gmail.com
v विमल विमर्श मीरजापुर, उत्तर प्रदेश विनय कुमार शुक्ल yes 2348-5884
v वाक् सुधा रुपेश कुमार चौहान दलवीरसिंह चौहान yes yes Quarterly 8287473549 vaaksudha@gmail.com
V वरिमा लखनऊ नलिन रंजन सिंह
W वाग्प्रवाह लखनऊ, उत्तर प्रदेश डॉ. अनिल कुमार विश्वकर्मा Yes 0975-5403 Yes Half yearly 9412881229 editoranil.hindi@gmail.com
w प्रज्ञा एवं हिमालयीय संस्कृति (विजडम एंड हिमालयन कल्चर) सेन्ट्रल इन्स्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन कल्चर स्टडीज़, दाहुंग, अरुणाचल प्रदेश Geshe Ngawang Tashi Bapu yes 2347-8535 YEARLY 8256903634 cihcspub@gmail.com
w वर्ल्ड ट्रांसलेशन C2 Satendra Kumar Gupta Nagar, Lanka, Varanasi Surendra Kumar Pandey yes 2278-0408 Half Yearly 9454820806 worldtranslation@gmail.com
Y युद्धरत आम आदमी ए-221, डिफेंस, कॉलोनी, भूतल, नई दिल्ली-110021. सं. रमणिका गुप्ता Yes 23200359 8860843164 yudhrataamaadmi@gmail.com
Y युग तेवर 1587/1 उदय प्रताप कालोनी, बढ़ैयावीर, सिविल लाईन्स-2, सुल्तानपुर, 228001. सं. कमल नयन पाण्डेय Yes 2349-7513
Y युवा संवाद सं. ए. के. अरूण Yes
Y युग परिबोध वसंत कुञ्ज , नई दिल्ली आनंद प्रकाश 9811262848 yugpribodhhindi@gmail.com
Y युगशिल्पी डॉ. राजनारायण शुक्ला,एस.एच,ऐ-5,कवि नगर,गाज़ियाबाद डॉ. राजनारायण शुक्ला yes No ISSN-0975-4644 YES 9 9910777969 yug_shilpi@yahoo.com
वीक्षा लोकायत प्रकाशन, वाराणसी सदानंद शाही yes no 0975-3788
संभाष्य अखिल भारतीय साहित्य समन्वय समिति, वाराणसी डॉ. ज्ञानप्रकाश चौबे, डॉ. रविकांत राय yes no 2229-4066
शोध दृष्टि सृजन समिति पब्लिकेशन, वाराणसी डॉ.वशिष्ठ अनूप yes no 0976-6650
International Journal of Hindi Research Gupta Publications (Delhi) Yes Yes 2455-2232 Yes Google Scholar RJIF 5.22
अनुकृति सृजन समिति पब्लिकेशन, वाराणसी डॉ. रामसुधार सिंह yes no 2250-1193
जनपक्ष जनवादी लेखक संघ, वाराणसी इकाई डॉ. रामसुधार सिंह yes no
भारतीय आधुनिक शिक्षा एन.सी.ई.आर.टी, दिल्ली
I माध्यम हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद ्सत्यप्रकाश मिश्र YES NO 2348-1757 YES Indexed 0.565 GIF AUSTRALIA YES YES
T THE OPINION SRIJAN SAMITI PUBLICATION VARANASI YES 2277-9124
J JOURNAL OF SOCIO-EDUCATIONAL & CULTURAL RESEARCH ANJANI JAN SEVA SAMITI VARANASI YES 2394-2878 YES
N NAV JYOTI SRIJAN SAMITI PUBLICATION VARANASI YES 2249-7331
R Research Journal of Indian Cultural Stream 0973-8762
P Parmita Research Journal 0974-6129
P Parsheelan, Research Journal 0974-7222
S Samanbhuti Research Journal 2229-5771
P Punj (Research Journal of Arts and Social Sciences) 2229-7871
अन्वेषिका एन.सी.टी.ई., दिल्ली
अनामा भगवती कॉलोनी हाजीपुर, बिहार आशुतोष पार्थेश्वर Yes 2348-8506 No Yes Quarterly 9934260232 anamahindi@gmail.com
पंचशील शोध समीक्षा फिल्म कॉलोनी, चौड़ा रास्ता, जयपुर, राजस्थान हेतु भारद्वाज Yes 0975-2587 No Quarterly 0141-2315072,2314172 info@panchsheelprakashan.com
परिषद् पत्रिका बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, प्रेमचंद मार्ग, पटना, बिहार सत्येन्द्र कुमार Yes 2320-5342 No Yes Quarterly
मूक आवाज़ हिंदी विभाग, पांडिचेरी विश्वविद्यालय प्रमोद मीणा No 2320-835X YES 2320-835X Yes Quarterly 7320920958 mookaawazhindi@gmail.com
सहचर नई दिल्ली आलोक रंजन पाण्डेय No Yes 2395-2873 No 9313809165 sahcharpatrika@gmail.com
मध्यभारती डॉ.हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,सागर
ग्लोबल रिसर्च कैनवास MANOJ KUMAR ,3 JUNIOR MIG, 2ND FLOOR, ANKUR COLONY, SHIVA JI NAGAR, BHOPAL-462016 MANOJ KUMAR Yes No 2394-5427 No 9425017322 k.manojnews@gmail.com
राजीव गाँधी यूनिवर्सिटी रेफ्रीड जर्नल (RGURJ) राजीव गाँधी वि.वि., रोनो हिल्स, ईटानगर (अरुणाचल प्रदेश)
समागम KRITI AGRAWAL,3 JUNIOR MIG, 2ND FLOOR ANKUR COLONY, SHIVA JI NAGAR, BHOPAL-462016 Manoj Kumar Yes Yes 2231-0479 No 9300469918 samagam2016@gmail.com
कदम पत्रिका 12/224, एम.सी.ड़ी.फ्लैट, सैक्टर-20, रोहिणी, दिल्ली-110086 कैलास चंद चौहान YES YES 2348-5671 YES 9212026999 kadamhindi@gmail.com
Contemparory Social Issues हरियाणा डॉ. राजेश कुमार yes no 2454-6992
AMAR हरियाणाा डॉ. हरिश कुमार रंगा yes no 2348-1323
विश्व हिन्दी पत्रिका विश्व हिन्दी सचिवालय, स्विफ्टलेन, फारेस्ट साइड, मॉरीशस yes
DEEPAK HARYANA S. BHARDWAJ YES NO 2394-6563
सबलोग 14 बी, सूर्या अपार्टमेंट, खसरा नम्बर- 476, शालीमार पैलेस के पास,स्वरूप नगर रोड़, बुराड़ी, दिल्ली- 110084 किशन कालजयी YES NO 2277-5897 YES MONTHLY 9990199514 sablogmonthly@gmail.com
अरुणप्रभा हिन्दी विभाग, राजीव गाँधी वि.वि., रोनो हिल्स, ईटानगर -791112
भाषा भारती राजभाषा प्रकोष्ठ,डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर
चिन्तन-सृजन आस्था भारती, ईस्ट ऐण्ड अपार्टमेंट, मयूर विहार,फ़ेस–1 विस्तार,दिल्ली
वरिमा नलिन रंजन सिंह, लखनऊ
संवाद वाराणसी अमित कुमार पाण्डेय,
अरुणागम जवाहरलाल नेहरु महाविद्यालय, पासीघाट,अरुणाचल प्रदेश –791103
आजकल प्रकाशन विभाग, सूचना भवन, सी. जी.ओ.कॉम्प्लेक्स, लोदी रोड, नई दिल्ली –110003
इतिहासबोध बी-239, चन्द्रशेखर आज़ाद नगर,तेलियरगंज,इलाहाबाद-4 लालबहादुर वर्मा,
समकालीन भारतीय साहित्य
मुक्तांचल आधुनिक अपार्टमेण्ट,6/2/1,आशुतोष मुखर्जी लेन,सलकिया, हावड़ा-711106
साहित्य वर्तिका
फ़ारवर्ड प्रेस साहित्य वार्षिकी नेहरु प्लेस, दिल्ली
शिक्षा-विमर्श दिगन्तर शिक्षा एवं खेलकूद समिति, जगतपुरा,जयपुर
शोधश्री दयालबाग एजुकेशनल इन्स्टीट्यूटआगरा
शीतल वाणी सहारनपुर वीरेन्द्र आज़म
समकालीन तीसरी दुनिया आनन्दस्वरूप वर्मा, क्यू-63,सेक्टर-12,नोएडा-1
अपेक्षा वैशाली, गाज़ियाबाद तेजसिंह
दस्तावेज 101, बेतियाहाता, गोरखपुर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,
कथन 107,साक्षर अपार्टमेण्ट्स, ए-3,पश्चिम विहार, दिल्ली रमेश उपाध्याय
समकालीन भारतीय साहित्य साहित्य अकादेमी, दिल्ली
वागर्थ भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता
शोध सृजन ए.पी. एन . पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज बस्ती 271001 डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव YES NO 9753362 YES N0 NO 9451087259 drbaljeetsrivastava@gmail.com
SHODH SAMIKSHA RESEARCH EDUCATIONAL SOCIATY LUCKNOW, PRASHRAY 610/191 A, KESHAWNAGAR, SITAPUR ROAD LUCKNOW DR. BALJEET KUMAR SRIVASTAVA YES NO 22491597 YES NO NO 9451087259 drbaljeetsrivastava@gmail.com
अभिनव इमरोज सभ्या प्रकाशन, वसन्तकुंज, नई दिल्ली-110064 देवेन्द्र कुमार बहल YES NO 23211105 YES NO NO
9910497972 dk.bahl1942@gmail.com

होमवर्क

0
wapt image 1702
wapt image 1702
लघुकथा -ओंम प्रकाश नौटियाल

संग्राम सिंह जी बरामदे में झूले पर बैठ कर किसी से फोन पर बात कर रहे थे । तभी स्कूल से आकर संजय सीधा कमरे में घुसा और बैग कुर्सी पर पटक कर वापस बरामदे में भरे गले से झल्लाहट और क्रोध भरे स्वर में उनसे बोला :
“पापा आप इतने सालों से राजनीति में हो,आजकल  पार्षद  हो, कितनी बार विधायक का चुनाव लड़ चुके हो पर आपको न तो इस शहर में न कोई जानता है न कोई आपसे डरता है। “
“अरे क्या हो गया। ऐसा क्यों कह रहा है तू “
“कहूँगा पापा सौ बार कहूँगा । आज होम वर्क न करने पर गणित के टीचर मुझ पर बहुत गुस्सा हुए और मुझे दस मिनट के लिये क्लास में पीछे दीवार की तरफ़ मुंह करके खड़े होने की सजा दी और कहा कल अपने पापा को लेकर आना”
” अच्छा , कौन है वह टीचर ?”
” शर्मा सर हैं । पापा आप सुनो तो सही , जब मैंने उनसे कहा कि मैं पार्षद संग्राम सिंह का बेटा हूँ । वह बहुत व्यस्त रहते हैं ।”
“ठीक कहा बेटे , हर छोटी मोटी बात पर मैं काम धंधा छोड़कर स्कूल भागूँगा क्या?”
संजय रोते हुए बोला ,” पापा, पर सर ने कहा ,अच्छा किसी बड़े आदमी का बेटा है जो बेटे के स्कूल नहीं आ सकते ? तो तू ऐसा कर कि पूरे आधा घंटे खड़ा रहना  ” सारी क्लास इस बात पर हँसने लगी । मेरी बड़ी बेइज्जती हुई ।
“चुप हो जा बेटे, मैं अभी आता हूँ ।” कहकर संग्राम सिंह तेजी से बाहर निकल गये । आधे घन्टे बाद जब वह वापस आये तो उनके हाथ में क्रिकेट का बैट था । संजय देखते ही खुशी से उछल कर बोला ,” अरे वाह , पापा, मैं आपको बैट खरीदवाने के लिये कहने की  सोच ही रहा था , आपको कैसे पता चला कि मुझे बैट चाहिये, बड़े अच्छे हैं आप “
” पर पापा आपको ब्रैन्ड़ेड लाना चाहिये था आप बाहर से अमित स्पोर्ट्स से लाये होंगे । वह तो घटिया ,सस्ती चीजें रखते हैं ।”
” यह तुम्हारे लिये नहीं है बेटा । मैं इससे भी अच्छा खेल सकता हूँ ।कल तुम्हारे स्कूल जाकर तुम्हारे शर्मा सर से मिलेंगे फिर शहर तो क्या पूरा देश जानेगा कि संग्राम सिंह कौन है ।”
सुनते ही संजय होम वर्क करना छोड़ कर वर्ल्ड़ कप क्रिकेट मैच देखने बैठ गया ।

-ओंम प्रकाश नौटियाल

हे अर्जुन…

0
gray rocks stacks on brown surface
Photo by Aaron Thomas on Unsplash

हे अर्जुन उठा गांडीव

पोंछ दे मानवता के अश्रु से भींगे नयन

याद कर वो सभा

हारे थे स्वाभिमान तुम्हारे

जब सकुनी के पासों से

खिंचे थे वस्त्र लज्जा के,

जब दुःशासन के हाथों ने

ये वही कर्ण है,जिसके शब्द नही रुके थे

ये वही भीष्म हैं,जिनके शब्द नही निकले थे

ये वही है दुर्योधन

दिया था निमंत्रण द्रोपदी को

जिनके जंघों ने

ये वही द्रोण हैं,कृप हैं

जो बांध रखा था अपने गुरुत्व को

मुठ्ठी भर अनाजों से

ये सब वही हैं,

जो मौन थे,हर्षित थे

द्रोपदी के चीर हरण पे

ये सब भागी हैं दुर्योधन के षड्यंत्रों के

मत सोच कितने कटेंगे सर 

कौन-कौन मारा जाएगा

ये सब हंता हैं मानवता के

फूंक दे संख बजा रणभेनी

तिलकित होगा तेरा ललाट

दुनिया तेरी जय कहेगी

सुन सकता है तो सुन

हो रही विजयनाद

युद्ध के उस पार…।

 

हिन्दी…..

0
wapt image 5207
wapt image 5207

एक लघुकथा……”हिन्दी”
एक विश्विद्यालय में पी.एच.डी. के छात्रों का एक सेमिनार था। विषय था- “हिन्दी में कहानी लिखने की कला”। देश के अलग-अलग राज्यों से पी.एच.डी. के छात्र कहानी लिख कर आए थे। विदेश से हिन्दी के एक विख्यात कहानीकार भी पहुंचे थे, सेमिनार में। कहानियां पढ़ी गई, कुछ को सही, कुछ को गलत बताया गया। सभी ने छात्रों को कहानी लिखने की कला पर कुछ- न – कुछ बताया। सेमिनार अपने समापन की ओर ही बढ़ रहा था कि अचानक एक सज्जन प्रोफेसर मंच पर पहुंचे और बोले- “मैं शर्मिन्दा हूं, ऐसे छात्रों को देखकर……”।
पूरे हॉल में सन्नाटा। और कुछ देर बाद चारों तरफ़ से प्रश्नों की बौछार…….”क्यों? क्या हुआ?” बच्चे हैं, सीख जायेंगे, बड़े-बड़े लेखकों ने भी ऐसे ही शुरुआत की होगी। ऐसे तमाम तरह के जवाब उन्हें दिए जाने लगे, बिना यह जाने कि वे क्यों शर्मिन्दा हैं?
…….. वे शर्मिन्दा थे यह देखकर कि पी.एच.डी. के छात्र हिन्दी भी सही से नहीं लिख पा रहे थे और भाषा के सही प्रयोग का तो खैर कहीं अता- पता ही नही था। वे शर्मिन्दा थे, यह जानकर कि- राष्ट्रभाषा “हिन्दी”वाला देश, हिन्दी भाषा में अपनी पूरी शिक्षा ग्रहण करते हुए पी.एच.डी. तक पहुंचने वाले छात्रों को वर्तनी के विषय में कोई ज्ञान नहीं दे पाया।
इससे पहले कि वे अपनी पूरी बात कह पाते, एक अन्य प्रोफेसर गुस्से से तिलमिलाते हुए बोले- “अरे! जानता हूं कि आप फलां विश्विद्यालय से आए हैं और यह भी जानता हूं कि आपके विश्विद्यालय के छात्र कितनी हिन्दी जानते हैं। अमुक राज्य में पढने के कारण इन बेचारों की हिन्दी अच्छी नहीं है तो आप इनका मनोबल तोड़ रहे हैं”।
………. इसके बाद वे सज्जन प्रोफेसर सदमे में थे कि जब ये बेचारे छात्र हिन्दी के प्रोफेसर बनेंगे तब हिन्दी का क्या हाल होगा!!

हिन्दी-उर्दू का अन्तर्संबंध और निदा फ़ाज़ली की कविता-ग़ज़ल: डॉ. बीरेन्द्र सिंह

0

हिन्दी-उर्दू का अन्तर्संबंध और निदा फ़ाज़ली की कविता-ग़ज़ल

आज हिन्दी और उर्दू दो प्रमुख भाषाओं के रूप में मान्य हैं । सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ इस भाषा-भेद को स्थापित करने में अहम भूमिका अदा करती हैं फलस्वरूप साधारण तौर पर हिन्दी और उर्दू को न केवल दो भाषाओं बल्कि एक हद तक दो विरोधी भाषाओं का दर्जा प्राप्त है । परन्तु यह मान्यता भाषावैज्ञानिक दृष्टि से वास्तविकता से कोसों दूर ठहरती है । आज तक किसी भी भाषावैज्ञानिक ने हिन्दी और उर्दू को दो भिन्न भाषाएँ नहीं माना है ।

लिपिभेद एवं शब्दावली का किंचित अंतर छोड़ हिन्दी और उर्दू में कोई भेद नहीं है । इस संबंध में हिन्दी के मुर्धन्य आलोचक एवं भाषाशास्त्री डा. रामविलास शर्मा लिखते हैं, ‘‘हिन्दी-उर्दू में सबसे पहला भेद लिपि का है । लिपि लिखने के काम आती है न कि बोलने के । इसलिए लिपि-भेद को हम बुनियादी भेद नहीं मानते । हिन्दी-उर्दू में दूसरा भेद है शब्दभंडार का । यह भेद साधारण लोगों की बोलचाल में बिल्कुल नहीं है, पढ़े-लिखे लोगों में बहुत थोड़ा है और भाषा के लिखित रूपों में बहुत ज्यादा है ।’’1 यानी हिन्दी-उर्दू का भेद एक ही भाषा के लिखित रूपों का भेद है, वो भी वहाँ जहाँ साधारण लोगों की बोलचाल की सहज भाषा का प्रयोग नहीं किया जाता । दूसरे शब्दों में हिन्दी-उर्दू का भेद है नहीं, उसे बनाया जाता है । प्रेमचंद भी यही मानते थे और उनका तो लेखन भी इस बात का गवाह है कि अगर बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग लेखन में भी किया जाये तो हिन्दी उर्दू में कहीं कोई भेद है ही नहीं । फिर हिन्दी-उर्दू के बीच यह भेद की दीवार कैसे खड़ी हो गई, इसके पीछे का इतिहास क्या है, अब आइए इस पर भी ज़रा निगाह डालते हैं ।

आमतौर पर माना जाता है कि भारत में उर्दू का जन्म हिन्दुओं और मुसलमानों के आपसी मेलजोल के फलस्वरूप हुआ । दूसरी ओर भाषा के अर्थ में उर्दू शब्द का प्रयोग 18वीं सदी के अंत तक नहीं मिलता है । दरअसल भारतीय व्यापार की उन्नति के साथ-साथ उत्तर भारत के बड़े हिस्से में जिस खड़ी बोली का व्यापक प्रचार हुआ उसे हिन्दी, हिन्दवी या हिन्दुई कहा गया । कवि-रचनाकारों ने भी अपनी भाषा को इसी नाम से पुकारा चाहें वो किसी भी धर्म के रहे हों । इस संदर्भ में डा. रामविलास शर्मा बड़े ही मजेदार ढंग से लिखते हैं, ‘‘हिन्दी-उर्दू का एक सामान्य आधार है, बोलचाल की खड़ीबोली । इस खड़ीबोली में अरबी-फारसी के कुछ या बहुत ज्यादा शब्द आ मिले तो इससे एक नयी भाषा नहीं उत्पन्न हो गयी । यह खड़ीबोली मुसलमानों के आने से पहले भी थी, उनके शासनकाल में रही और आज भी है । एक दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि जितना ही हम पुराने जमाने के उर्दू लेखकों की रचनाएँ पढ़ते हैं, उतनी ही साधारणतः अरबी-फारसी के शब्दों की खपत कम मिलती है और जितना ही बीसवीं सदी की ओर बढ़ते हैं, उतना ही यह खपत बढ़ती जाती है । अगर बारहवीं-तेरहवीं सदी में मेलजोल के लिए पाँच फीसदी अरबी-फारसी शब्दों की जरूरत थी तो 1947 के आसपास यह जरूरत बढ़कर पचासी फीसदी तक पहुँच गयी है । यानी ज्यों-ज्यों मेलजोल बढ़ा, त्यों-त्यों हिन्दी-उर्दू का अलगाव बढ़ता गया । मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की ।’’2

दरअसल हिन्दी और उर्दू का भेद बढ़ना शुरु हुआ भारत में अंग्रेजों के आगमन के बाद । 18वीं सदी के पहले जिस ‘उर्दू’ शब्द का कहीं जिक्र नहीं मिलता अचानक वह एक नयी भाषा कहलाने लगती है । इसके पीछे फोर्ट विलियम कॉलेज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है । जॉन गिलक्राइस्ट हिन्दी-उर्दू भाषी कौम की शक्ति और इसके खतरों को कहीं-न-कहीं महसूस कर सकते थे । उन्होंने फोर्ट विलियम कॉलेज के साथ-साथ पहला काम ही किया, भाषा को मजहब से जोड़कर देखने-दिखाने की प्रवृति का प्रचार । जातीय भाषा के विकास में दरार डालकर भाषा को धर्म से जोड़ा जाने लगा ।

1857 की जनक्रांति में हिन्दू और मुसलमानों ने जिस प्रकार की एकता का परिचय दिया, अंग्रेजी हुकूमत उससे काफी विचलित हुई । अतः हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दूरी बढ़ाने वाले तत्वों पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा । ‘फूट डालो राज करो’ की नीति अहम हो गई । इस सिलसिले में भाषा-भेद को धर्म से जोड़कर भयावह रूप में बढ़ावा दिया गया । फलतः अब तक सामान्य जनता के बीच जिस सामान्य भाषा का प्रयोग होता आ रहा था, वहाँ मुसलमानों ने अपने लेखन में अरबी-फारसी के शब्दों की खपत बढ़ानी शुरु की और संस्कृत तथा सामान्य बोलचाल के शब्दों को जानबूझकर बाहर निकाला गया जिसे मतरुकात का सिद्धांत कहा गया । इसीतरह हिन्दुओं ने संस्कृत शब्दों की ओर ज्यादा ध्यान देना शुरु किया । दुःख की बात है कि इस अलगाववादी मानसिकता के कारण एक ही भाषा दो रूपों में आगे बढ़ी ।

इसतरह इतना तो स्पष्ट होता ही है कि हिन्दी और उर्दू दो भिन्न भाषाएँ न होकर एक ही भाषा की दो भिन्न शैलियाँ हैं । जिनके बीच का भेद बहुत हद तक आधारहीन है । स्वयं राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी हिन्दी और उर्दू में कोई भेद न देखते थे और एक मिली-जुली सामान्य भाषा जिसे उन्होंने हिन्दुस्तानी कहा था,  राष्ट्रभाषा के रूप में चाहते थे । दरअसल मजहब से भाषाएँ तय नहीं हुआ करतीं । यह घोर साम्प्रदायिक दृष्टिकोण है जिसका खामियाजा हम अब तक भुगत रहे हैं । हिन्दी-उर्दू भेद की तमाम व्यावहारिक सच्चाइयों को मानते हुए भी कम-से-कम हमें यह भी मान लेना चाहिए कि भारत में हिन्दी-उर्दू एक ही क्षेत्र के वासिन्दों की – एक कौम की – भाषा है । यह ‘हिन्दी जाति’ की भाषा है । रामविलास शर्मा के शब्दों में फिर एक बार कहना पड़े तो, ‘‘हिन्दी-उर्दू का व्याकरण एक, वाक्य-रचना एक-सी, शब्द भंडार और क्रियाएँ एक-सी – इसीलिए हिन्दी-उर्दू भाषियों की दो कौमें नहीं हैं । उनकी जाति एक है और बोलचाल की भाषा एक है ।’’3

आज के साहित्य में हिन्दी-उर्दू के इस भेद को मिटाकर रख देने वाले रचनाकारों की एक लम्बी फेहरिस्त है – प्रेमचंद, फिराक गोरखपुरी, चकबस्त, राही मासूम रज़ा, शानी, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, मंजूर एहतेशाम आदि-आदि । इन रचनाकारों ने अपने लेखन में हिन्दी-उर्दू के बीच की बेबुनियाद दीवार को लगातार तोड़ा है । इसी परम्परा के प्रमुख शायर निदा फ़ाज़ली को मैंने अपने अध्ययन का आधार बनाया है । निदा फ़ाज़ली मौजूदा दौर के हिन्दी-उर्दू के ऐसे शायर रहे हैं जिनकी लेखनी हिन्दी और उर्दू के बीच फैलाये गए भ्रम की दीवार को ढहा कर रख देती है ।

भाषा का सवाल जातीय एकता से जुड़ा सवाल है । यह साम्प्रदायिकता और अलगाववाद के विरोध का सवाल है । यह हमारे विकास का सवाल है । पाकिस्तान से लौटने के बाद अपनी एक मशहूर नज़्म में निदा लिखते हैं, गौर करें –

‘‘ख़ूँख्वार दरिन्दों के

फ़क़त नाम अलग हैं

शहरों में बयाबान

यहाँ भी है वहाँ भी

रहमान की कुदरत हो

या भगवान की मूरत

हर खेल का मैदान

यहाँ भी है वहाँ भी

हिन्दू भी मज़े में है

मुसलमाँ भी मज़े में

इन्सान परेशान

यहाँ भी है वहाँ भी’’4

इंसान की परेशानी से जूझने वाले इस शायर की शायरी का विश्लेषण करते हुए हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि आज की जटिल परिस्थितियों की अभिव्यक्ति करते हुए किसी रचनाकार की संवेदना किसी भाषा-भेद का ख़्याल रखती है क्या ! एक और नज़्म देखें –

‘‘मस्जिदों मंदिरों की दुनिया में

मुझको पहचानते कहाँ हैं लोग

रोज़ मैं चाँद बन के आता हूँ

दिन में सूरज सा जगमगाता हूँ

खनखनाता हूँ माँ के गहनों में

हँसता रहता हूँ छुप के बहनों में

मैं ही !

मज़दूर के पसीने में

मैं ही !

बरसात के महीने में’’5

            मस्जिद-मंदिर के बीच की खाई से पीड़ित शायर अल्लाह-ईश्वर की उपस्थिति को सूरज-चाँद से लेकर मानवीय संबंधों और संघर्ष की अभिव्यक्ति तक ले जाकर जिस सेतु के निर्माण का प्रयत्न कर रहा है क्या वहाँ आपको किसी हिन्दी-उर्दू का भेद दीख रहा है? ऐसा शायर प्रार्थना करते हुए ईश्वरीय सत्ता के सामने क्या निवेदन रखता है, इसे देखें –

‘‘नील गगन पर बैठे

कब तक

चाँद सितारों से झाँकोगे

पर्वत की ऊँची चोटी से

कब तक

दुनिया को देखोगे

आदर्शों के बन्द ग्रन्थों में

कब तक

आराम करोगे

मेरा छप्पर

टपक रहा है

बनकर सूरज

इसे सुखाओ

खाली है

आटे का कनस्तर

बनकर गेहूँ

इसमें आओ’’6

अब आप ही निर्णय लीजिए यह प्रार्थना किस धर्म वाले की है, किसके लिए है और किस भाषा में है?…

निदा जैसा शायर जब कहता है –

‘‘बच्चा बोला देख कर मस्जिद आलीशान

अल्ला तेरे एक को, इतना बड़ा मकान’’7

तो कहीं ऐसा नहीं लगता कि जो काम कबीर जैसा क्रांतिकारी 14-15वीं सदी में कर रहा था वही अधूरा काम अपने तरीके से कोई रचनाकार आज भी पूरा कर रहा है । आखिर ‘काँकर-पाथर’ जोड़कर अल्लाह के लिए इतना बड़ा मकान बनवाया जाना तो आज भी बदस्तूर जारी है । वहीं दूसरी ओर –

‘‘अन्दर मूरत पर चढ़े घी, पूरी, मिष्ठान

मन्दिर के बाहर खड़ा, ईश्वर माँगे दान’’8

और निदा इन सारे चोंचलों से मुक्ति का जो रास्ता बताते हैं, उसे देखिए –

‘‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये’’9

निदा के यहाँ मासूमियत को बचाये रखने की गहरी अपील देखने मिलती है । बौद्धिकता आदमी को कहीं-न-कहीं खुंखार बना रही है, निदा इसे व्यक्त करते हुए कहते हैं –

‘‘बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो

चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जायेंगे’’10

और यहीं मैं जोड़ना चाहूँगा कि हिन्दी-उर्दू का झगड़ा यही चार किताबें पढ़ चुके लोगों के बीच का झगड़ा है । निदा अपने लेखन में जिसका प्रतिरोध रचते हैं । इसीलिए सिनेमा जैसे माध्यम से, जहाँ हिन्दी-उर्दू का भाषाई भेद लगभग नहीं है क्योंकि वह आम जन का माध्यम है, निदा को विशेष लगाव रहा । उनका साहित्य, कविता-ग़ज़ल सिनेमा में नई ऊँचाई पाता है । निदा उन्हीं के लिए लिखना पसंद करते थे जो –

‘‘दुःख में नीर बहा देते थे, सुख में हँसने लगते थे

सीधे-सादे लोग थे, लेकिन कितने अच्छे लगते थे’’11

और यही कारण है कि आज की दुनिया में सोच-समझवालों के लिए निदा नादानी माँगते हैं –

‘‘दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है

सोच-समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला’’12

निदा आदमी और आदमियत की तलाश के शायर हैं इसीलिए वह आज एक नई ग़ज़ल सुनाना चाहते हैं –

‘‘उठके कपड़े बदल, घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ

रात के बाद दिन, आज के बाद कल जो हुआ सो हुआ

जब तलक साँस है, भूख है प्यास है ये ही इतिहास है

रख के काँधे पर हल , खेत की ओर चल जो हुआ सो हुआ

*          *          *          *          *          *

मन्दिरों में भजन, मस्जिदों में अज़ाँ आदमी है कहाँ?

आदमी के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल जो हुआ सो हुआ’’13

निदा मानते हैं –

‘‘हम सब

एक इत्तिफ़ाक़ के

मुख़्तलिफ़ नाम हैं

मज़हब

मुल्क

ज़बान

इसी इत्तिफ़ाक़ की अनगिनत कड़ियाँ हैं’’14

आज के दौर की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि इन मुख़्तलिफ (भिन्न) चीजों के बीच का ‘लफ़्जों का पुल’ लगातार दरकते-दरकते कहीं टूट चुका है और इसे किसी भी कीमत पर जोड़े जाने की महती आवश्यकता है । अगर हम ऐसा कर सके तभी हम अपनी-अपनी तन्हाई से निजात पा पायेंगे । निदा की नज़्म है – ‘लफ़्जों का पुल’

‘‘मस्जिद का गुंबद सूना है

मंदिर की घंटी ख़ामोश

जुज़दानों में लिपटे

सारे आदर्शों को

दीमक कब की चाट चुकी है

रंग

गुलाबी

नीले

पीले

कहीं नहीं हैं

तुम उस जानिब

मैं उस जानिब

बीच में मीलों गहरा ग़ार

लफ़्जों का पुल टूट चुका है

तुम भी तन्हा

मैं भी तन्हा’’15

यह लफ़्जों का पुल जब तक नहीं जुड़ेगा, अपनी-अपनी तन्हाइयों में हिन्दी-उर्दू के ‘बीच में मीलों गहरा ग़ार’ बदस्तूर कायम रहेगा । निदा ने अपने सम्पूर्ण रचनाकर्म के माध्यम से इस मीलों गहरी खाई को पाटने की एक अदना-सा कोशिश की है और बाकी का एक विस्तृत कार्य हम सभी के लिए छोड़ गए हैं । निःसंदेह यह काम कठिन तो है पर नामुमकिन नहीं । पुनः निदा के ही शब्दों में –

‘‘मुम्किन है सफ़र हो आसाँ अब साथ भी चल कर देखें

कुछ तुम भी बदल कर देखो, कुछ हम भी बदल कर देखें’’16

संदर्भः

  1. शर्मा रामविलास, भाषा और समाज, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पाँचवा संस्करण, 2002, पृ. 331
  2. वही, पृ. 284
  3. वही, पृ. 331
  4. फ़ाज़ली निदा, सफ़र में धूप तो होगी (सं.-शीन काफ़ निज़ाम और नन्दकिशोर आचार्य), वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, प्रथम संस्करण, 2000, पृ. 155
  5. वही, पृ. 129
  6. वही, पृ. 117
  7. वही, पृ. 157
  8. वही, पृ. 158
  9. वही, पृ. 22
  10. वही, पृ. 39
  11. वही, पृ. 54
  12. वही, पृ. 75
  13. वही, पृ. 74
  14. वही, पृ. 139
  15. वही, पृ. 140
  16. वही, पृ. 63

डॉ. बीरेन्द्र सिंह

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग

स्कॉटिश चर्च कॉलेज, कोलकाता

मो.-9331265343

ई-मेल: birendra_scottish@yahoo.in

हिन्दी साहित्येतिहास की समस्याएँ

0
sahityetihas, hindi sahitya

हिन्दी साहित्येतिहास की समस्याएँ

प्रवीन वर्मा

पीएच.डी, हिन्दी,अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली

फोन न. 9899670330,8810341549

ई. मेल vermapraveen452@gmail.com

शोध सारांशइतिहास चाहे साहित्य का हो या देश का, वह सिर्फ तथ्यों से नहीं बनता बल्कि उसमें तथ्यों से अधिक महत्व व्याख्याओं का होता है। इतिहासबोध की परंपरा में सक्रिय परिवर्तन शुक्ल जी ने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में प्रत्यक्षवादी या विधेयवादी दृष्टिकोण से किया। जिसके अंतर्गत जाति, वातावरण तथा क्षण तीन तत्वों को सर्वाधिक महत्व दिया। शुक्लजी के उपरांत कई इतिहासकारों ने इतिहास लिखे। वह सभी इतिहास शुक्ल के इतिहास को केंद्र में रखकर ही लिखे गए है हालांकि इतिहासबोध की दृष्टि से इतने खरे नहीं उतर पाए सिवाए हजारी प्रसाद द्विवेदीजी के।

बीज शब्द – इतिहासबोध, भाषिक संक्रमण, इतिहास, अपभ्रंश, बंधुत्व, साहित्येतिहास, वर्चस्व, पौरुष, तथ्य, संस्कृति, विभाजन, परिकल्पना।

शोध आलेख

इतिहास

इतिहास में अतीत की घटनाओं और प्रवृत्तियों का कालक्रमानुसार विवेचन और विश्लेषण होता है। इतिहास में घटनाओं और तथ्यों का समावेश किया जाता है, किन्तु यह सब मिलकर इतिहास नहीं कहलाता। इतिहास चाहे साहित्य का हो या देश का, वह सिर्फ तथ्यों से नहीं बनता बल्कि उसमें तथ्यों से अधिक महत्व व्याख्याओं का होता है। प्रसिद्ध इतिहासकार ई.एच.कार ने अपनी पुस्तक ‘इतिहास क्या है’ में लिखा है कि, ”इतिहास, इतिहासकार और तथ्यों की क्रिया-प्रतिक्रिया की एक अनवरत प्रकिया है, अतीत और वर्तमान के बीच एक अंतहीन संवाद है।”1 स्पष्ट है कि घटना प्रवाह में एक तर्क स्थापित करना इतिहास कहलाता है।

साहित्येतिहास

यदि हिन्दी साहित्येतिहास की समस्याओं पर विचार करे तो हम पाते है कि उन्नीसवीं शताब्दी से पूर्व भक्तमाल, कालीदास हजारा, कविमाला, चौरासी वैष्णव की वार्ता, दो सौ बावन वैष्णव की वार्ता इत्यादि रचनाओं में इतिहास लेखन की आरंभिक झलक दिखाई पड़ती है, ये सभी रचनाएँ इतिहासबोध के स्तर पर प्रभाव शून्य हैं। उन्नीसवीं सदी में इतिहास लेखन की औपचारिक शुरूआत हुई। जिसमें गार्सा द तासी का ‘इस्तवार द ला लितरेत्युर ऐन्दुई ऐन्दुस्तानी’ शिवसिंह सेंगर का ‘शिवसिंह सरोज’ आदि इतिहासबोध से युक्त नहीं है। जॉर्ज ग्रियर्सन और मिश्रबन्धु के प्रयास में इतिहासबोध के प्रति सजगता दिखाई पड़ती है। लेकिन इनके इतिहास में भी इतिहासबोध की निश्चयात्मक व्याख्या प्रस्तुत नहीं है। इतिहासबोध की परंपरा में सक्रिय परिवर्तन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में प्रत्यक्षवादी या विधेयवादी दृष्टिकोण से किया। जिसके अंतर्गत जाति, वातावरण तथा क्षण तीन तत्वों को सर्वाधिक महत्व दिया। शुक्ल के उपरांत कई इतिहासकारों ने इतिहास लिखे। वह सभी इतिहास शुक्ल के इतिहास को केंद्र में रखकर ही लिखे गए हैं हालांकि इतिहासबोध की दृष्टि से इतने खरे नहीं उतर पाए सिवाए हजारी प्रसाद द्विवेदी के, हमें यह भी ध्यान रखना आवश्यक होगा कि हजारी प्रसाद द्विवेदी का इतिहास कोई इतिहास नहीं है बल्कि भूमिका मात्र है। बच्चन सिंह ने कहा है कि, ”न तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ को लेकर कोई दूसरा इतिहास लिखा जा सकता है और न उसे छोड़कर।“2

विद्वानों में मतभेद

हिन्दी साहित्य के इतिहास के आरंभ को लेकर विद्वानों में काफी मतभेद रहा है। कुछ विद्वान हिन्दी साहित्य को सातवीं शताब्दी से मानते हैं, क्योंकि सातवीं शताब्दी में पूर्ववर्ती अपभ्रंश के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। ऐसे विद्वानों में जॉर्ज ग्रियर्सन, मिश्रबन्धु, शिवसिंह सेंगर, पंडित राहुल सांकृत्यायन, डॉ. नगेंद्र और डॉ. रामकुमार वर्मा शामिल हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी व आचार्य रामचन्द्र शुक्ल दोनों हिन्दी साहित्य का आरंभ दसवीं शताब्दी से मानते हैं। द्विवेदी जी की दृष्टि में इसका कारण भाषिक है, जबकि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अपभ्रंश को पुरानी हिन्दी मानते हैं किन्तु काफी समय तक सांप्रदायिक रचनाएँ होती रही, जिन्हें साहित्य नहीं माना जा सकता। इसीलिए वास्तविक रूप से हिन्दी साहित्य का आरंभ संवत् 1050 या 993 ई. के आस-पास से आरंभ हुआ। गणपति चन्द्रगुप्त और हरीशचन्द्र वर्मा हिन्दी साहित्य का आरंभ बारहवीं शताब्दी से मानते हैं और इसका कारण यह बताते हैं कि बारहवीं सदी के आस-पास अपभ्रंश व अवहट्ट से गुजरते हुए हिन्दी भाषा पुरानी हिन्दी के दौर में प्रवेश कर चुकी थी। वहीं सुनीति कुमार चटर्जी, उदय नारायण तिवारी तथा नामवर सिंह हिन्दी साहित्य का आरंभ भाषा वैज्ञानिक आधार पर चौदहवीं सदी से मानते हैं क्योंकि इस समय तक भाषिक संक्रमण का दौर पूर्णतः समाप्त हो चुका था और हिन्दी अपने वास्तविक रूप में आ चुकी थी। अत: हिन्दी साहित्य का आरम्भ दसवीं शताब्दी के आस-पास माना जाता है क्योंकि दसवीं शताब्दी के आरंभ में भाषिक संक्रमण एक निश्चित समय तक पहुँच चुका था। इसी समय आधुनिक हिन्दी के आरंभिक लक्षण भी दिखाई देने लगे थे।

काल विभाजन एवं नामकरण

हिन्दी साहित्येतिहास में काल विभाजन का सर्वप्रथम प्रयास जॉर्ज ग्रियर्सन ने किया। उन्होंने सम्पूर्ण साहित्य को ग्यारह कालों में विभक्त किया। इस विभाजन की समस्या यह थी कि इसमें कई कालखंड गैर-साहित्यिक आधारों पर स्थापित किए गए थे। चारणकाल का निश्चित समय 700 से 1300 ई. बताया किन्तु शेष कालों का निश्चित विभाजन न कर सके। इसलिए यह विभाजन अव्यवस्थित माना जाता है। मिश्रबंधु ने आदिकाल को आरंभिक काल कहते हुए उसका समय 643 से 1387 ई. बताया है। इस काल विभाजन की मूल समस्या यह है कि यह अत्यंत जटिल एवं अतार्किक है। आचार्य शुक्ल ने आदिकाल को ‘वीरगाथाकाल नाम’ दिया। इसका समय 1050 से 1375 संवत् माना है। उन्होंने इसके पीछे तर्क दिया है जो इस प्रकार है, “परिस्थिति के अनुसार शिक्षित जनसमूह की बदली हुई प्रवृत्तियों को लक्ष्य करके हिन्दी साहित्य के इतिहास के कालविभाग और रचना की भिन्न–भिन्न शाखाओं के निरूपण का एक कच्चा ढ़ाचा खड़ा किया गया था।”3 हजारी प्रसाद द्विवेदी भी शुक्ल की तरह साहित्य का आरंभ दसवीं शताब्दी से मानते हैं। गौरतलब है कि आदिकाल के नामकरण को लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी की वैचारिक दृष्टि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से भिन्न है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘वीरगाथाकाल’ नाम बारह पुस्तकों के आधार पर रखा। जोकि चार रचनाएँ अपभ्रंश की और आठ रचनाएँ देशभाषा (बोलचाल) की हैं। प्रश्न यह उठता है कि जिन बारह पुस्तकों के आधार पर ‘वीरगाथाकाल’ नाम रखा गया उसमें से कई धार्मिक उपदेशपरक रचनाएँ हैं। जिसको वह साहित्य की कोटि से बाहर रखते हैं। जिसका उल्लेख यह बताने के लिए करते है कि अपभ्रंश भाषा का आरंभ कब से हुआ। इसी आधार पर हजारी प्रसाद द्विवेदी विरोध करते हुए कहते हैं कि, “जिन ग्रन्थों के आधार पर इस काल का वीरगाथाकाल नाम रखा गया, उनमें से तो कुछ नोटिस मात्र से बहुत अधिक महत्वपूर्ण नहीं, और कुछ तो पीछे की रचनाएँ है या पहले की रचनाओं के विकृत रूप हैं। इन पुस्तकों को नवीन मान लिया गया है।”4 ‘कीर्तिपताका’ जैसे रचनाएँ आज तक उपलब्ध नहीं हुई हैं। रासो साहित्य की कई रचनाएँ भाषा के आधार पर आदिकाल के बाद सिद्ध होने लगी हैं और कई ऐसी रचनाएँ सामने आने लगी है जो शुक्ल के समय में उपलब्ध नहीं थीं, और यदि होती तो शायद उनके निर्णय को बदल देती। वहीं अमीर खुसरो और विद्यापति को आचार्य शुक्ल फुटकर साहित्य में रखते हैं जबकि उन बारह रचनाओं में अमीर खुसरो, विद्यापति की रचनाएँ सम्मिलित है। अत: द्विवेदी द्वारा आदिकाल नाम पर सहमति बन चुकी हैं क्योंकि इसमें आरंभिक होने के साथ-साथ पूर्वज होने का एहसास भी शामिल है। भक्तिकाल में सगुण साहित्य तक आते-आते आचार्य शुक्ल की दृष्टि में परिवर्तन दिखाई पड़ता है। तुलसीदास, सूरदास को ‘जी’ कहकर सम्मान देते हैं। वही निर्गुण साहित्य में संतों को नाम से ही संबोधित करते हैं। आचार्य शुक्ल रचनाकारों से ज्यादा रचना को महत्व देते हैं। इसी कारण कबीर उनकी आलोचना का पात्र बनते हैं। तुलसीदास का वह बड़ा समर्थन करते है क्योंकि तुलसीदास और शुक्ल जाति से ब्राह्मण है। अगर देखा जाए तो कबीर भी विधवा ब्राह्मणी के अनचाहे गर्भ थे। भाषा के स्तर पर भी आचार्य शुक्ल कबीर को नकार देते हैं। उनकी भाषा को सधुक्कड़ी और फटकार वाली भाषा कहते हैं। कबीर जिस समय समाज से टकरा रहे थे उस समय सभ्य भाषा का प्रयोग उचित नहीं था इसलिए वह जनता के उस बड़े भाग को संभालते है जो प्रेमभाव और भक्तिरस से शून्य पड़ता जा रहा था। बहरहाल भक्तिकाल के उद्भव को लेकर भी द्वंद्व देखा जा सकता है। आचार्य शुक्ल कहते है कि, “देश में मुस्लमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिन्दू जनता के हृदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिए वह अवकाश न रह गया। उसके सामने ही उसके देवमंदिर गिराए जाते थे, देवमूतियाँ तोड़ी जाती थी और पूज्य पुरुषों का अपमान होता था और वह कुछ भी नहीं कर सकते थे। ऐसी दशा में वह अपनी वीरता के गीत न तो वे गा ही सकते थे और न बिना लज्जित हुए सुन ही सकते थे। आगे चलकर जब मुस्लिम साम्राज्य दूर तक स्थापित हो गया तब परस्पर लड़ने वाले स्वतंत्र राज्य भी नहीं रह गए। इतने भारी राजनीति उलटफेर के पीछे हिन्दू जनसमुदाय पर बहुत दिनों तक उदासी सी छाई रही। अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था ?”5 स्पष्ट है कि आचार्य शुक्ल भक्ति काल का उद्भव इस्लाम प्रतिक्रिया के रूप में देखते है। हजारी प्रसाद द्विवेदी एक बार फिर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मत से असहमति जताते हुए कहते है कि, “अगर इस्लाम नहीं आया होता तो भी इस साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।“6 लेकिन द्विवेदी चार आना छोड़ते है, कहीं न कहीं वे भी भक्तिकाल का अद्भव मुसलमानों से मानते हैं।

रीतिकाल का वर्गीकरण भी विवादस्पद रहा है। रीतिकाल को मिश्रबंधु ने ’अलंकृत काल’ विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने ‘शृंगार काल’, रमाशंकर शुक्ल रसाल ने ‘कलाकाल’ और ग्रिर्यसन ने ‘रीतिकाव्य’ नाम से संबोधित किया। यह सभी नाम किसी एक प्रवृत्ति के आधार पर रखे गए इसलिए इन सभी नामों पर असहमति बनती हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा ‘रीतिकाल’ ही मान्य है। गहराई से विचार किया जाए तो यह समस्या हमारे समक्ष उत्पन्न होती हैं कि वीरकाव्य व नीतिकाव्य उस समय लिखे जा रहे थे किन्तु दोनों प्रवृत्ति अतिमहत्वपूर्ण होते हुए भी एकदम गौण बन जाती हैं। रीतिकाल की शुरूआत का प्रसंग भी विवादस्पद है। आचार्य शुक्ल ने केशवदास को रीतिपरम्परा का प्रवर्तक नहीं माना। कारण बताया कि वे अलंकारवादी आचार्य हैं, रसवादी नहीं, बल्कि तथ्य यह है कि केशवदास की रचना ‘रसिकप्रिय’ पूर्णत: रसवादी रचना है। तथा अन्य रसवादी आचार्यो ने भी अलंकारवादी रचनाएँ लिखी हैं। बहरहाल इस बात का जिक्र करना आवश्यक है कि हिन्दी साहित्य के इतिहास की सबसे बड़ी समस्या तथ्यों की प्रामाणिकता हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास में कई तथ्य प्रामाणिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। उदाहरण के लिए कबीर के जन्म-मृत्यु की घटनाएँ, जायसी के रचनाओं की मूल प्रतियाँ, सूरदास के अंधत्व का प्रश्न, रासो साहित्य की प्रामाणिकता तथा घनानन्द की रचनाओं की पूरी सूची जैसे कई प्रश्न हैं जिनके निर्धारण की प्रकिया निरंतर चल रही हैं।

आधुनिक काल

आधुनिकता का आरंभ भारतेन्दु युग से माना जाता है, लेकिन आधुनिकता की शुरुआत एक शताब्दी पूर्व ही हो गई थी। ब्रिटिश शासन ने भारतीय शिक्षा प्रणाली पर ज़ोर दिया। माध्यमिक शिक्षा और विश्वविद्यालय शिक्षा अंग्रेजी भाषा में दी जाने लगी। अंग्रेजो ने भारत में फूट डालो की नीति अपनाकर बंगाल, उड़ीसा और बिहार राज्यों के अलावा पूर्णत: भारत पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। अंग्रेजो की इस कूटनीति का विद्रोह भारतेन्दु युग के कवियों की रचनाओं में स्पष्टत: दिखाई देता हैं। यह विद्रोह पद्य की बजाय गद्य में अधिक देखा जा सकता है। भारतेन्दु युग में काव्य की भाषा ब्रजभाषा और गद्य की भाषा खड़ी बोली रही। उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय संक्रमण के जिस दौर से गुजरा इसे कुछ चिंतक पुनर्जागरण कहते हैं, कुछ पुनरुत्थान कहते है और कुछ अन्य नवजागरण। रामस्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों में, “पुनर्जागरण दो जातीय संस्कृति की टकराहट से उत्पन्न रचनात्मक ऊर्जा है।”7 एक ओर भारतीय संस्कृति है तो दूसरी ओर पाश्चात्य संस्कृति। यह भारतीय संस्कृति अध्यात्म प्रधान व मध्यकालीन दौर से गुजर रही थी। जबकि पाश्चात्य संस्कृति वैज्ञानिक तथा मशीनी क्रांति के आधार पर भौतिकवाद तथा पूंजीवाद का प्रतिनिधित्व कर रही थी। उनका अध्यात्म पक्ष कमजोर जरूर था, लेकिन वैज्ञानिक तार्किक शिक्षा, इहलौकिक मानसिकता, समानता स्वतंत्रता, न्याय व बंधुत्व के आधुनिक आदर्श थे। जो तत्कालीन भारतीय समाज के लिए दुर्लभ थे। इन दोनों की टकराहट से पाश्चात्य संस्कृति अध्यात्म से प्रभावित हुई। वही भारतीय संस्कृति ने आधुनिक शिक्षा व भौतिकता सीखी। द्विवेदी युग में राष्ट्रीयता का स्वर और प्रखर हो गया। अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि छायावाद में राष्ट्रीयता का स्वर मंद रहा। विचार करने पर पाते है कि छायावाद का मूल उत्स भारतीय स्वधीनता संघर्ष में है। ध्यान देने वाली बात है कि कविता में छायावाद और भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी का आगमन लगभग एक ही साथ हुआ। नगेंद्र के अनुसार, “ जिन परिस्थितियों ने हमारे दर्शन और कर्म को अहिंसा की ओर प्रेरित किया, उन्होंने ही भाव (सौन्दर्य) वृत्ति को छायावाद की ओर।”8 इसका मतलब यह नहीं है कि छायावाद और गांधी जी की जीवन दृष्टि समान है या स्वाधीनता संग्राम में जो भूमिका गांधी जी की थी, वही छायावाद की हिन्दी साहित्य के संदर्भ में। लेकिन स्वाधीनता संग्राम में छायावाद और गांधी दोनों की परिकल्पना उस दौर में लगभग समान कही जा सकती हैं। सत्य यह है कि छायावादी काव्य में राष्ट्रीय जागरण सांस्कृतिक जागरण के रूप में आता है। इस सांस्कृतिक जागरण की अभिव्यक्ति निराला की ‘जागो फिर एक बार’, पंत की ‘प्रथम रश्मि’, महादेवी वर्मा की ‘जाग तुझको दूर जाना’ और प्रसाद की ‘प्रथम प्रभात’, ‘अब जागो जीवन के प्रभात’, ‘बीती विभावरी जाग री’ आदि में देखा जा सकता है। छायावाद शब्द को लेकर भी हमारे समक्ष समस्या उत्पन्न होती है। विभिन्न विद्वानों ने छायावाद के संबंध में अपनी मान्यताएँ दी है, लेकिन आज तक कोई निश्चित परिभाषा तय नहीं हुई है। महावीर प्रसाद द्विवेदी मानते है कि, ”छायावाद से लोगों का क्या मतलब है, कुछ समझ में नहीं आता। शायद उनका मतलब है कि किसी कविता के भावों की छाया यदि कही अन्यत्र जाकर पड़े तो उसे छायावादी कविता कहना चाहिए।”9 वहीं शांतिप्रिय द्विवेदी छायावाद को गांधी से जोड़कर पहचान दिलाने की कोशिश करते है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल शुरुआती दिनों तक छायावाद को ‘मधुचर्या’ कहते रहे। बाद में निराला की कृति ‘राम की शक्तिपूजा’ प्रसाद की ‘कामायनी’ से परिचित होने के बाद अपनी धारणा को बदल देते है। जो इस प्रकार है, ”इस रूपात्मक आभास को यूरोप में छाया (फैन्टसमाटा) कहते थे। इसी से बंगाल में ब्रह्मसमाज के बीच उक्त वाणी के अनुकरण पर जो आध्यात्मिक गीत या भजन बनते थे वे ‘छायावाद’ कहलाने लगे। धीरे-धीरे यह शब्द धार्मिक क्षेत्र में वहाँ के साहित्यक्षेत्र में आया और फिर रवीन्द्र बाबू की धूम मचने पर हिन्दी के साहित्य क्षेत्र से भी प्रकट हुआ।”10 इस कथन से स्पष्ट है कि छायावाद पर जितना प्रभाव गांधी जी का पड़ा। उतना ही रवीन्द्रनाथ जी का भी।

हिन्दी साहित्य के इतिहास को नए विमर्शों और नए दृष्टियों का विवेचन करने के लिए शुक्ल के इतिहास से बाहर आना आवश्यक है। आधुनिक काल में हमारे समक्ष नई समस्याएँ आ खड़ी हुई। सबसे बड़ी समस्या भाषाई स्तर पर थी। हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का ज़ोर अपनी लय में था। भारत भाषा और समाज दोनों के लिए लड़ रहा था। भारत को आज़ादी तो मिल गई थी लेकिन हिन्दी भाषा राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई। आज़ादी के बाद हमने जो स्वप्न देखे, वह स्वप्न बनकर ही रह गए। भारत अब अपनों के हाथों का गुलाम बन गया था। रोटी, कपड़ा और मकान जैसी रोज़मर्रा की बुनियादी चीजें, जिसके लिए भारत ने लंबी लड़ाई लड़ी वह भी प्राप्त नहीं हुई। ईश्वर की जगह मनुष्य केंद्र में आ गया था। उनकी समस्याओं और विद्रोह को नागार्जुन, रघुवीर सहाय, धूमिल, आदि साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में व्यक्त किया। सन् 1980 के बाद स्त्री विमर्श और दलित विमर्श साहित्य में स्थान पाने लगे। अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि स्त्री साहित्य को मुख्य धारा के साहित्य से विमुख रखा गया। परंतु विचार करने पर पाते है कि शुरूआती दौर से ही स्त्री साहित्य में बनी हुई है जैसे मीरा, महादेवी वर्मा, मन्नू भण्डारी, मृदुला गर्ग आदि। दलित साहित्य को लेकर भी एक प्रश्न बराबर उठता रहता है कि गैर-दलित साहित्यकार की दलित संबंधी रचना को दलित साहित्य की श्रेणी में रखा जाए या नहीं ? जिस प्रकार पुरुषों द्वारा लिखा गया स्त्री साहित्य को साहित्य की श्रेणी में महत्व दिया जाता है फिर गैर-दलित साहित्यकार की दलित संबंधी रचना पर इतनी बहस क्यों ? एक समस्या यह है कि प्रवासी साहित्य को लेकर रुचि का आभास दिखता है। हिन्दी साहित्य में प्रवासी साहित्यकारों को जो स्थान मिलना चाहिए वह स्थान उन्हे नहीं मिलता। विदेशों में रहकर भी हिन्दी भाषा और साहित्य का झण्डा कई वर्षो से फहराया जा रहा है। वह अतुलनीय है। एक ओर समस्या यह है कि मंचीय कविता को साहित्य की कोटि में रखा जाए या नहीं ? इस संदर्भ में मैनेजर पाण्डेय कहते है कि, “जो भड़ौती और विदूषक की प्रवृति का हास्य व्यंग्य है ऐसे कवियों को आप जानते हैं और मैं भी जनता हूँ कि अपनी पत्नी को पचास गंदी गालियां देकर हास्य पैदा करते हैं। ऐसी कविताओं को कविता कैसे मानेंगें। इसलिए जो हास्य व्यंग्य की गंभीर और विचारणीय कविताएं हैं। उनके लिए जगह हो सकती हैं।”11

अंत में यह कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता से पूर्व जो इतिहास लिखे गए उनकी मूल समस्या में स्वतंत्रता और हमारी परंपरा का सवाल था। स्वतंत्रता के बाद कई साहित्येतिहास लिखे गए उनकी मूल समस्या सामाजिक, सांस्कृतिक और परंपरा थी। जिसको रामस्वरूप चतुर्वेदी, बच्चन सिंह, और सुमन राजे अपने इतिहास में विशेष रूप से व्याख्यायित करते हैं।

संदर्भ ग्रंथ सूची-

1) कार,ई.एच., 2016, इतिहास क्या है, मैकामिलन इंडिया लिमिटेड प्रकाशन, पृष्ठ संख्या: 21

2) सिंह, बच्चन, 2016, हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण प्रकाशन, पृष्ठ संख्या: भूमिका (vii)

3) शुक्ल, रामचंद्र, 2012, हिन्दी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, पृष्ठ संख्या: भूमिका (xv)

4) प्रताप सिंह, योगेंद्र, 2016, हिन्दी साहित्य का इतिहास और उसकी समस्याएँ, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या: 36

5) शुक्ल, रामचंद्र, 2012, हिन्दी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, पृष्ठ संख्या: 39

6) प्रताप सिंह, योगेंद्र, 2016, हिन्दी साहित्य का इतिहास और उसकी समस्याएँ, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या: 90

7) चतुर्वेदी, रामस्वरूप, 2011, हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, पृष्ठ संख्या: 79

8) अमरनाथ, 2018, हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या: 151

9) वही, पृष्ठ संख्या: 151

10) शुक्ल, रामचंद्र, 2012, हिन्दी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, पृष्ठ संख्या: 456

11) समसामयिक सृजन पत्रिका, अप्रैल-जून 2012, वर्ष दो, अंक दो, पृष्ठ संख्या: 145

हिन्दी साहित्य सृजन में स्त्रियों की भूमिका विषय पर केन्द्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी

0
15027808 1228093727248980 459814848615763859 n





हिन्दी साहित्य सृजन में स्त्रियों की भूमिका विषय पर केन्द्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
स्थान : हिन्दी विभाग, भाषा एवं मानविकी संकाय , जामिया मिल्लिया इस्लामिया , नई दिल्ली – 110025

दिनांक: 16 – 11 -2016, सायं : 4.00 बजे
उद्घाटन सत्र एवं हिन्दी कथा साहित्य और स्त्री का प्रतिनिधित्व

दिनांक: 17 – 11 -2016,

प्रथम सत्र – प्रातः 9.30 से 11.00 बजे
विषय : हिन्दी उपन्यास और स्त्री चेतना

दूसरा सत्र – पूर्वाहन 11.30 से 1.30 बजे तक
विषय : हिन्दी कहानी और स्त्री छवियां

तृतीय सत्र – पूर्वाहन 2.00 से सायं 4.00 बजे तक
विषय : पितृसत्ता का विद्रूप और स्त्री की कलम

हिन्दी साहित्य और सिनेमा में एल०जी०बी०टी० समुदाय का मूल्यांकन-सविता शर्मा

0
close up photography of rainbow rays on eye
Photo by Harry Quan on Unsplash

हिन्दी साहित्य और सिनेमा में एल०जी०बी०टी० समुदाय का मूल्यांकन

*सविता शर्मा

हिन्दी साहित्य में लगभग नब्बे के दशक से ही विमर्शों का दौर रहा है। हिन्दी कथा साहित्य में दलित विमर्श, स्त्री विमर्श एवं आदिवासी विमर्श अपनी निर्णांयक भूमिका के साथ अवस्थित हुए। दरअसल ये ऐसे विमर्श हैं जिन्होंनें आज़ादी से पहले ही संघर्ष करना शुरू किया और एक पूरा विमर्श बनते-बनते इन्हें कई साल लगे। किन्तु वर्तमान में हिन्दी साहित्य में ये तीनों विमर्श – दलित विमर्श, स्त्री विमर्श और आदिवासी विमर्श अपने चरम पर हैं।

साहित्य एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा प्रत्येक वर्ग की सुध ली जाती है। दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, स्त्री विमर्श के साथ-साथ समाज में कई अन्य वर्ग भी हैं। जिन्हें हाशिये के भी हाशिये पर जगह नहीं मिली है। इस प्रकार के विमर्श में सबसे मुख्य एल०जी०बी०टी० विमर्श है। एल अर्थात् ‘लेस्बियन‘, जी अर्थात् ‘गे‘, बी०अर्थात् ‘बाएसेक्सुअल‘ तथा टी० अर्थात् ‘ट्रांसजेंडर‘ है। यह एक ऐसा समूह है जिसका अस्तित्व तब से ही समाज में है जब से पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ हुआ।

प्राचीन काल से ही इस एल०जी०बी०टी० वर्ग की उपस्थिति हमारे समाज में रही है और यही नहीं सम्मानीय स्थिति में रही है, जिसके प्रमुख उदाहरण हैं-

वात्सयायन का ‘कामसूत्र‘, वेद व्यास का महाभारत‘, कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र‘ तथा ‘पुराण‘ आदि। वर्तमान में ‘खजुराहों के मंदिर‘ इसका सबसे अच्छा उदाहरण है जो कि यूनेस्को की धरोहर सूची में भी शामिल है। खजुराहों के मंदिर जो कि 11वीं सदी के चन्देलों नें बनवाए थे, तत्कालीन समाज में समलैंगिकता या एल०जी०बी०टी० समुदाय की उपस्थिति का एक जीता-जागता प्रमाण है। अतः इस समुदाय के अस्तित्व को हम मानते तो है किन्तु जाने नहीं।

हैरानी की बात तो यह है कि साहित्य जो कि अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। उसने भी इस समुदाय की ओर ध्यान नहीं दिया। हिन्दी साहित्य में एल०जी०बी०टी० विषय पर लिखे गए ग्रंथ इतने है कि इन्हें आसानी से अंगुलियों पर गिना जा सकता है।

जिनमें से ज्यादातर ग्रंथ हाल ही में लिखे गए हैं। जब उच्चतम न्यायालय द्वारा इन समुदायों को मनुष्य का दर्जा देने की पहल की गई। उच्चतम न्यायालय के ऐसे दो फैसले इस प्रकार हैं-

2014 में ट्रांसजेंडर समुदाय को तृतीय लिंग का दर्जा देते हुए 3 % का आरक्षण दिया तो 6 सितम्बर, 2018 में ‘धारा 377’ जो कि अप्राकृतिक यौन संबंधों के विरूद्ध थी को गैर-कानूनी बताते हुए ‘निजता के अधिकार‘ के तहत स्वेच्छा से 18 वर्ष के व्यस्क व्यक्ति स्त्री या पुरूष के साथ एकांत में संबंध बना सकते हैं मो मान्यता दी है।

ये दो फैसले माननीय उच्चतम न्यायालय ने जब से दिए हैं तब से ही ज़्यादातर हिन्दी जगत भी इन हाशिए के वर्ग के प्रति जागा है। इसमें भी केवल ट्रांसजेंडर के संदर्भ में ही। समलैंगिक समुदाय अभी भी समाज के साथ-साथ साहित्य में भी हाशिये पर ही है। जिस कारण एल०जी०बी०टी० समुदाय का संघर्ष और गहरा ही होता है कम नहीं।

साहित्य के साथ-साथ सिनेमा भी एक ऐसा माध्यम है जो समाज का आईंना होता है। किन्तु विडम्बना यह है कि साहित्य की तरह सिनेमा में भी इन एल०जी०बी०टी० वर्ग को लगभग नगण्य स्थान ही मिला है और मिला भी तो हास्यास्पद या नकारात्मक छवि के रूप में। इस प्रकार की कुछ फिल्में – संघर्ष, मर्डर-2, सड़क, दोस्ताना, कल हो न हो हैं।

किन्तु ऐसा नहीं है कि केवल नकारात्मक सिनेमा ही एल०जी०बी०टी० वर्ग पर बना है। कुछ सकारात्मक फिल्में भी इस वर्ग में हैं जैसे- तमन्ना, बोल, शबनम मौसी, डियर डैड, हनीमून ट्रेवल प्रा० लिमिटेड, शुभ मंगल ज़्यादा सावधान आदि।

दरअसल सिनेमा एक श्रव्य-दृश्य माध्यम है, जिस कारण जो लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं उन पर भी फिल्मों का गहरा असर पड़ता है। जिस कारण सिनेमा को समाज में अपनी भूमिका समझते हुए वृहद स्तर पर ऐसे विषयों को उठाना चाहिए जो हाशिये पर जिंदगी जीने को मजबूर हैं, क्योंकि यदि साहित्य की जगह हमारी स्टडीरूम तक है तो सिनेमा की बैडरूम तक। अतः सिनेमा को चाहिए कि वृहद स्तर पर ऐसे विषय उठाए, क्योंकि इसकी पहुँच प्रत्येक उम्र के व्यक्ति से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक है। जिससे समाज में एल०जी०बी०टी० वर्ग की छवि बदलने तथा उन्हें भी आम मनुष्य की तरह जीवन व्यतीत करने में आसानी होगी।

हिन्दी के प्रख्यात रचनाकार राजकमल चैधरी की बहुचर्चित बहुप्रशंसित कृति है ‘मछली मरी हुई‘। लेखक ने अपनी इस महत्त्वकांक्षी कृति में जहाँ महानगर कलकत्ता के उद्योग जगत की प्रमाणिक और सजीव तस्वीर प्रस्तुत की है, वहीं आनुषंगिक विषय के रूप में समलैंगिक स्त्रियों के रति-आचरण का भी इस उपन्यास में सजीव चित्रण किया है। इसमें ठनकती हुई शब्दावली और मछली के प्रतीक की ऐसी सृजनात्मक है जो लेखक की करूणा सर्वत्र सींचती रहती है।

उपन्यास को स्त्री-समलैंगिकता पर केन्द्रित उपन्यास के रूप में देखा जा सकता है, जो लेखक के इस विषय पर गहन शोध का ही परिणाम है।

समलैंगिकता पर आधारित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का ग्रंथ ‘कुल्लीभाट‘ एक प्रसिद्ध पुस्तक है। कुल्लीभाट अपनी कथावस्तु और शैली-शिल्प के नयेपन के कारण न केवल निराला के गद्य साहित्य की बल्कि हिन्दी के संपूर्ण गद्य-साहित्य की एक विशिष्ट उपलब्धि है। यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि कुल्ली के जीवन-संघर्ष के बहाने इसमें निराला का अपना सामाजिक जीवन मुखर हुआ है और बहुलांश में यह महाकवि की आत्मकथा ही है।

कुल्ली के माध्यम से निराला दिखाते है कि केवल समलैंगिक होने के कारण समाज में वह हेय की दृष्टि से देखा जाता है हालांकि कुल्ली है बड़ा संवेदनशली व्यक्ति। कुल्ली के लिए जात-पात कोई मायने नहीं रखती उसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण चीज है मनुष्यत्व, जिस बात को बाद में बाकी लोग मानते भी हैं। कुल्ली राजनीति में सक्रिय होता है किन्तु उसका अंत इतना दयनीय है, जिससे कि पाठक और स्वयं निराला भी उसकी पीड़ा महसूस करते हैं। समलैंगिकों के विभिन्न क्षेत्र में सक्रियता के बावजूद उनके जीवन का अंत कितना दर्दनाक है यह हम ‘कुल्लीभाट‘ में देख सकते है। गोर्की के शब्दों में – ‘‘जीवन-चरित जैसे आदमियों के बने और बिगड़े, कुल्ली भाट ऐसे आदमी न थे। उनके जीवन का महत्त्व समझे, ऐसा अब तक एक ही पुरूष संसार में आया है, पर दुर्भाग्य से अब वह संसार में नहीं रहा।‘‘ (पृष्ठ सं० 13, कुल्लीभाट, निराला, राजकमल, पेपरबैक्स, नई दिल्ली)

यही नहीं बल्कि ट्रांसजेंडर अर्थात् किन्नर समुदाय पर लिखा गया प्रथम उपन्यास ‘यमदीप‘ भी इस समाज के दुख-दर्द को बेबाकी से बयां करता है। हमारे समाज के घोर अभिशप्त माने जाने वाले किन्नर समुदाय के अंतरंग जीवन की मार्मिक गाथा प्रस्तुत करने वाला यह उपन्यास अपने-आप में एक अद्वितीय कृति है। यह उपन्यास लेखिका नीरजा माधव को एक ओर तो स्त्री-लेखन एवं दलित-लेखन की भीड़ से अलग करता है, तो दूसरी ओर, नारी – अस्मिता और शोषित – उपेक्षित वर्ग के उन अनछुए पहलुओं को भी सामने रखता है, जिनकी ओर आज तक कोई सजग लेखनी उन्मुख ही नहीं हुई।

साथ ही सुप्रसिद्ध कथाकार महेंद्र भीष्म का उपन्यास ‘किन्नर कथा‘ सख्.त भाषा में बेहद गंभीरता के साथ प्रश्न उठाता है कि प्रकृति ने किन्नरों के साथ अन्याय क्यों किया? क्यों हम किन्नरों को मुख्यधारा में शामिल करने से बचते रहे हैं, क्यों यह माना जाता है कि वह हमारी तरह इन्सान नहीं हैं? राजघराने में अपनी जुड़वां बहन के साथ जन्म लेने वाली सोना उर्फ चंदा देखने में अतीव सुन्दर है, उसके बोलने पर ही पता लगता है कि वह किन्नर है। बचपन से ही उसे पिता ने लोकलाज के चलते अपने विश्वस्त दीवान को सौंप दिया था ताकि वह उसे मार डाले। लेकिन वह उसे एक किन्नर गुरू तारा को दे देता है। यहीं से सोना नाम बदलकर चंदा बन जाती है। संयोग से चंदा 15 बरस बाद अपनी ही जुड़वां बहन के विवाह में पहुँचती है। अद्भुत कथा – प्रवाह में बहा ले जाने वाली यह कथाकृति जहाँ महत्त्वपूर्ण प्रश्नों से टकराती है, वहीं कथारस की ऐसी सृष्टि भी करती है कि सांस थामे पाठक पढ़ता ही चला जाए। इसका पाठक संवेदना के उन तंतुओं से स्वतः जुड़ता चलता है जो बताते हैं कि हर किन्नर का एक अतीत होता है। परिवार से विस्थापन का दंश भुगतते हुए उसका अनाम संघर्ष उसे कैसे तपाता रहता है। बेहद गंभीरता के समय किन्नरों की दुनिया की पड़ताल करते हुए महेंद्र भीष्म का यह उपन्यास पाठकों की सोई संवेदना को झिंझोड़कर जगा देता है। किन्नरों की समस्याओं के साथ बाहरी दुनिया को अपने अनूठे अंदाज में परिचित करते हुए यह उपन्यास अपने आपको पढ़ा ले जाने का माद्दा रखता है।

इसी की तरह चित्रा मुद्गल का उपन्यास ‘पोस्ट बॉक्स नं० 203 नाला सोपारा’ भी है जिसमें लेखिका बताती है कि किस प्रकार केवल किन्नर भर होने से विनोद जैसे बच्चे अपने परिवार से दूर जीवन जीने को अभिशप्त हैं। उपन्यास में विनोद बार-बार प्रश्न भी करता है कि यदि आँख की विकलांगता, टांग की विकलांगता या अन्य किसी शरीर के अंग की विकलांगता के कारण आप लोग अपने बच्चे को घर से बाहर नहीं फेकते तो केवल लिंग विकलांगता के बच्चों को इतनी बड़ी सज़ा क्यों? साथ ही लेखिका किन्नरों की समस्याओं के साथ-साथ घर वापसी जैसे समाधान भी उपन्यास में समझातीं हैं।

‘दरमियाना’ सुभाष अखिल का एक किन्नर विषय पर आधारित एक अन्य उपन्यास है, जिसमें लेखक इस समुदाय की व्यथा कहता है। दरअसल ‘दरमियाना’ नाम से 1980 में ‘सारिका’ में इनकी कहानी प्रकाशित हुई जिसे थर्ड जेंडर पर आधारित प्रथम कहानी भी माना जाता है, इसी को लेखक ने उपन्यास के रूप में भी अब लिखा है।

सहानुभूति से अच्छा वर्णन स्वानुभूति में होता है और आत्मकथा इसका सबसे अच्छा माध्यम रहा है। किन्नर समाज पर आधारित ‘मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी‘ (लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी) की आत्मकथा तो है ही साथ ही ‘पुरूष तन में फंसा मेरा नारी मन‘ मानोबी बंधोपाध्याय की एक और आत्मकथा है जिसमें मानोबी बताती हैं कि किस प्रकार उन्होंने किन्नर होने के बावजूद संघर्ष करते हुए पश्चिम बंगाल के एक कॉलेज में प्रिंसिपल का पद प्राप्त किया। अत्यंत बेबाकी से उन्होंने यह आत्मकथा लिखी है। इन आत्मकथाओं से अच्छा माध्यम इन हाशिये के समाज को जानने का शायद ही कुछ और हो।

यही नहीं बल्कि ‘हमख़्याल‘ एक अन्य कहानी संग्रह है जो समलैंगिक समाज के यथार्थ को पकड़ने की कोशिश करता है। एम० फिरोज़ की यह कृति तारीफ के काबिल है तो वहीं प्रदीप सौरभ का उपन्यास ‘तीसरी ताली‘ एक अन्य महत्त्वपूर्ण उपन्यास है जो अपने में सम्पूर्ण एल०जी०बी०टी० समुदाय को न सिर्फ समेटता है बल्कि उनकी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सबसे ज्यादा सांस्कृतिक पक्षों को पाठकों के सामने रख के इस वर्ग की समस्याओं से रूबरू कराता है जो जन्म से लेकर मरण तक चलती ही रहती हैं। यही नहीं बल्कि यह उपन्यास यह भी बताता है कि दुनिया में हर जगह इस वर्ग की उपस्थिति है। एबीसीडी अर्थात् आरा, बलिया, छपरा प्रत्येक स्थान पर यह समुदाय मिल जाएगा। किन्तु हर जगह इस वर्ग की स्थिति ऐसी ही दोयम दर्जे की है।

इन तमाम रचनाओं के द्वारा हिन्दी साहित्य में एल०जी०बी०टी० वर्ग की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक समस्याओं की पड़ताल तो की जा सकती है साथ ही साथ उनके संभावी समाधानों का भी पता लगाया जा सकता है।

दरअसल यह एक ऐसा विषय है जिस पर साहित्य और सिनेमा ने तो कम ध्यान दिया ही है साथ ही शोध की स्थिति भी लगभग नगण्य है। जिस कारण ये समाज निम्नत्तर स्थिति में जीवन जीने को अभिशप्त है। आँकड़ों के मुताबिक एल०जी०बी०टी० वर्ग की लगभग 25 लाख लोगों की जनसंख्या हैं जो कि दयनीय स्थिति में ही हैं। उच्चतम न्यायालय के फैसलों से इनकी स्थिति में सुधार की कुछ उम्मीद है किन्तु समाज इन्हें कहाँ तक अपना पाएगा यह अभी भविष्य के गर्त में हैं।

सन्दर्भ ग्रंथ

  1. माधव, नीरजा, यमदीप, सामयिक पेपरबेक्स, नई दिल्ली, 2017
  2. मुदग्ल, चित्रा, पोस्ट बॉक्स नं० 203 नाला सोपारा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2016
  3. सौरभ प्रदीप, तीसरी ताली, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2011
  4. चैधरी, राजकमल, मछली मरी हुई, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पेपरबैक्स संस्करण, 2009
  5. निराला, सूर्यकांत त्रिपाठी, कुल्ली भाट, राजकमल पेपर बैक्स, नई दिल्ली, पांचवा संस्करण, 2019
  6. सिंह, विजेंद्र प्रताप, कथा और किन्नर, अमन प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 2016
  7. सिंह, विजेंद्र प्रताप, हिन्दी उपन्यासों के आइनें में थर्ड जेंडर, अमन प्रकाशन, कानपुर
  8. खराटे, मधु, हिन्दी उपन्यासों में किन्नर विमर्श, विकार प्रकाशन कानपुर
  9. खान, एम०फिरोज़, थर्ड जेंडर अतीत और वर्तमान, विकार प्रकाशन, कानपुर
  10. खान, एम०फिरोज़, थर्ड जेंडर: हिन्दी कहानियाँ, अनुसंधान पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, कानपुर
  11. खान, एम०फिरोज़, थर्ड जेंडर अनूदित कहानियाँ, अनुसंधान पब्ल्शिर्स एण्ड डिस्टीब्यूटर्स, कानपुर

*शोधार्थी, पीएच.डी. हिन्दी

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

ईमेल- savita3590@gmail.com

 

हिन्दी शोध Hindi shodh

0
eyeglasses with gray frames on the top of notebook
Photo by Dan Dimmock on Unsplash

हिन्दी शोध Hindi shodh

शोध : अर्थपरिभाषा और स्वरूप

एकता रानी

शोध क्या है ?

आज तक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में जो प्रगति हुई है, और जिन सुख-सुविधाओं का हम अनुभव कर रहे हैं उन सब का आधार शोध है। शोध उस प्रक्रिया का नाम है जिसमें बोधपूर्वक प्रयत्न से तथ्यों का संकलन कर सूक्ष्मग्रही बुद्धि से उनका निरीक्षण विश्लेषण करके नए तथ्यों को ज्ञात किया जाता है। अज्ञात वस्तुओं, तथ्यों व सिद्धांतों के निर्माण की बोधपूर्वक क्रिया ही शोध है। शोध मानव-ज्ञान को दिशा प्रदान करता है, ज्ञान-भंडार को विकसित एवं परिमार्जित करता है। विषय विशेष के बारे में बोधपूर्ण तथ्यान्वेषण एवं यथासंभव प्रभूत सामग्री संकलित कर सूक्ष्मतर विश्लेषण-विवेचन और नए तथ्यों, नए सिद्धांतों के उद्घाटन की प्रक्रिया अथवा कार्य शोध कहलाता है।

            “ज्ञान-विज्ञान के सभी क्षेत्र शोध की परिधि में आते हैं। जानने की इच्छा या जिज्ञासा ही नित्य नए ज्ञान या विज्ञान से संबद्ध विकास के उदय का कारण बनती है। खोज, अविष्कार, नूतन विचार या चिंतन नयी उद्भावना, नया समीक्षण, अनुशीलन या मूल्यांकन इसी नैसर्गिक जिज्ञासा-वृत्ति की देन है। ज्ञान या विज्ञान की अज्ञात सामग्री को ज्ञात करना तथा ज्ञात सामग्री का शोधन,, समालोचन, मूल्यांकन करना ही शोध कहलाता है।”1

            मानव सदैव से एक अध्ययनशील प्राणी है। उसमें हर समय कुछ नया सीखने, कुछ नया करने की ललक विद्यमान रहती है। शोध कार्य के पीछे मनुष्य का यही स्वभाव दिखाई पड़ता है। शोध साधना है, जिसे कठिन तपस्या से ही प्राप्त किया जाता है।

            जब सच्चाई अज्ञान के तले दब जाती है तब मिथ्या की परत दर परत उस पर चढ़ती चली जाती है। उन्ही परतों को हटाकर अज्ञान को मिटाकर ज्ञान का पता लगाना और विश्व को सत्य से परिचित करवाना शोध है। ज्ञात तथ्यों का पुन: परीक्षण शोध द्वारा किया जाता है। तथ्य शोध में अनिवार्य और आवश्यक है। प्रत्येक तत्व का निज स्वरूप होता है। जैसे प्रत्येक अध्यापक की अध्यापन प्रणाली भिन्न होती है। उसी प्रकार प्रत्येक तथ्य की अपनी अलग प्रकृति होती है लेकिन तथ्य वायवीय नहीं होने चाहिए। मनगढ़ंत बातों की गुंजाइश सामान्य जीवन में होती है, साहित्य में होती है किंतु शोध में नहीं होती। शोध में विशुद्ध तथ्य होंगे। तथ्य (fact) ऐसा कथन होता है जो वास्तविकता के अनुकूल हो या जिसे साक्ष्य के प्रयोग द्वारा साबित करा जा सके। तथ्य की सच्चाई परखने के लिए उसके लिए प्रमाण प्रस्तुत करे जाते हैं, जिनके लिए मान्य सन्दर्भों व स्रोतों का प्रयोग करा जाता है।

            शरीर और मन की खुराक केवल और केवल विचार है। यदि विचार न हो तो जीवन नष्ट हो जाता है। जैसे भोजन दूषित हो जाता है वैसे ही विचार भ्रष्ट हो जाते हैं। यदि किसी के विचार भ्रष्ट हो जाते हैं तो दूसरों को अपने विचार नहीं बदलने चाहिए। विचारों का हमेशा जीवित रखना चाहिए।  शोध बाह्य जगत से उत्पन्न होती है और अंतःकरण से पोषण प्राप्त करती है। बाह्य जगत दृश्यमान है। मनुष्य के पास ज्ञानेंद्रियां हैं। बाह्य जगत का ज्ञान हम ज्ञानेंद्रियों से प्राप्त करते हैं।

hindi shodh

 मानव की जिज्ञासु प्रवृत्ति ने ही शोध-प्रक्रिया को जन्म दिया है। जिज्ञासा शोध का सबसे प्रमुख तत्त्व है। जिज्ञासा का अर्थ है जानने की इच्छा। मनुष्य के अंदर जिज्ञासा आदिकाल से ही विद्यमान रही है। मनुष्य सदैव से ही क्या, कौन और कैसे के उत्तर खोजने में लगा रहा है। सबसे पहले पहिए का आविष्कार हुआ था, जो जिज्ञासा का ही परिणाम था। जिज्ञासा व्यापक होती रहती है। जिज्ञासा बहुआयामी होती है। जिज्ञासा समाधान चाहती है। जिस तरह भूख लगने पर हम खाना खोजते हैं ठीक उसी तरह पर जिज्ञासा के होने से हम ज्ञान और जानकारी ढूंढते हैं। जिज्ञासा समाजशास्त्रीय अध्ययन एवं विश्लेषण द्वारा शांत होती है। जिज्ञासा तथ्यों एवं विज्ञान के आधार पर खड़ी होती है| जिज्ञासा की व्यापकता श्रमशीलता से जुड़ी है। निठल्ले लोग जिज्ञासा को व्यापक नहीं बना सकते। जिज्ञासु व्यक्ति ही शोध करता है। सत्य की खोज या प्राप्त ज्ञान की परीक्षा हेतु व्यवस्थित प्रयत्न करना ही शोध है। शोध विकास का जनक है। यदि शोध नहीं होगा तो विकास नहीं ह्रास होगा। शोध का उद्देश्य जीवन और जगत का उन्नयन है निरंतर जीवन और जगत के लिए ही शोध होता है। किसी-किसी शोध से कभी-कभी उन्नयन की जगह नाश भी होता है। स्वतंत्रता के बाद शोध को अर्थ का साधन बना लिया गया है। शोध करने वालों की संख्या में वृद्धि हो गई और शोध की जो उन्नत अवस्था थी, वह अवनत हो गई। हर एक व्यक्ति शोध कार्य नहीं कर सकता इसके लिए श्रम चाहिए। जो लोग श्रम से डरते हैं, उन्हें सोच नहीं करना चाहिए।

शोध की परिभाषा

            अंग्रेजी के रिसर्च के अर्थ के द्योतक खोज, अन्वेषक, अनुसंधान, शोध इत्यादि अनेक शब्द प्रचलित है। ‘खोज’ शब्द सामान्य भाषा का है। ‘अन्वेषण’ शब्द से निर्मित अन्वेषक और अन्वेषक प्रबंध शब्द की अभीष्ट आशय की अभिव्यक्ति में असमर्थ है। गवेषणा का वैदिककालीन अर्थ था गाय की इच्छा या खोज। बाद में यह शब्द अपना विशिष्ट अर्थ खोकर सामान्य अर्थ ‘खोज’ के लिए प्रयुक्त होने लगा किंतु यह शब्द स्थूल एवं सतही अर्थ का बोधक है। 1960 तक ‘अनुसंधान’ शब्द ‘शोध’ की अपेक्षा अधिक व्यवहार में आता रहा। किंतु आकार में बड़ा होने के कारण इससे निर्मित शब्द अनुसंधान के प्रचलन में बाधा उपस्थित करने वाले शब्द है। ‘रिसर्च’ के मूल आशय को व्यक्त करने की क्षमता से युक्त होने पर भी अनुसंधान शब्द कालांतर में प्रचलन से हटाया गया और अपना स्थान ‘शोध’ के लिए छोड़ता गया।

संप्रति ‘रिसर्च’ के पर्याय के रूप में सर्वाधिक प्रचलित शब्द ‘शोध’ है। “शोध शब्द ‘शुद्ध’ धातु से बना है। शोध का अर्थ है शुद्ध करना, परिमार्जित करना, संदेह रहित बनाना या प्रमाणिक घोषित करना शोध का व्यापक अर्थ है।”2  

            हिंदी में शोध शब्द स्थूल खोजने की क्रिया से लेकर सूक्ष्म चिंतन मनन और परीक्षण की क्रियाओं तक के आशयों को समाहित किए हुए हैं। “शोध शब्द के तीन अभिप्राय न्यास उभर कर आते हैं- (1) नये तथ्यों की खोज (2) खोजे हुए तथ्य या तत्वों का संशोधन (3) खोजे हुए तथ्यों या तत्त्वों का मंथन और मूल्यांकन। इस प्रकार ‘शोध’ ‘अनुसंधान’ के समान या उससे भी अधिक अर्थ-व्यंजक है। अर्थ-गाम्भीर्य के साथ ही इसकी सबसे अनूठी विशेषता है इसका आकार लाघव। लघु आकार और गहन अर्थवाहकता की विरल विशेषताओं के संयोजन ने ‘शोध’ शब्द के वर्चस्व में वृद्धि की है और उसे ‘रिसर्च’ के पर्याय के रूप में सर्वाधिक स्वीकार्य और ग्राह्य बना दिया है। अब प्राय: सभी विश्वविद्यालयों और शोध-संस्थानों में यही ‘रिसर्च’ के लिए मानक रूप से स्वीकार कर लिया गया है। आकारिक लघुता के कारण इससे निर्मित अन्य शब्द – शोधक, शोधार्थी, शोध-कार्य, शोध-प्रबंध, शोध-गोष्ठी, शोध-लेख, शोध-सामग्री, शोध-विषय, शोध-निष्कर्ष, आदि भी नितांत सुगम और सुग्राह्य बन पड़े हैं। इसलिए शोध शब्द अब ‘रिसर्च’ के अर्थ में रूढ़ हो गया है।”3

सामान्य अर्थ से आगे बढ़कर जब हम शोध के आदर्श स्वरूप और शैक्षणिक सन्दर्भ पर विचार करते हैं तो हमें इसके लिए एक व्यवस्थित परिभाषा की आवश्यकता होती है। ‘वैब्सटर्स डिक्शनरी’ में रिसर्च की परिभाषा निम्न प्रकार से दी गई है :- “Research is a critical and exhaustive investigation or examination having for its aim the discovery of new facts and their correct interpretation, the revision of accepted conclusion, theories and lows.”4

एन्साइक्लोपीडिया ऑफ़ सोशल साइंस में रिसर्च के लिए कहा गया है –“Research is the manipulation of things, concepts or symbols for the purpose generalizing to extend, correct knowledge whether that knowledge aids in the practice or an art.”5

Research is “creative and systematic work undertaken to increase the stock of knowledge, including knowledge of humans, culture and society, and the use of this stock of knowledge to devise new applications.”6 

नए ज्ञान की प्राप्ति हेतु व्यवस्थित प्रयत्न को विद्वानों ने शोध की संज्ञा दी है। एडवांस्ड लर्नर डिक्शनरी ऑफ करेण्ट इंग्लिश के अनुसार, “किसी भी ज्ञान की शाखा में नवीन तथ्यों की खोज के लिए सावधानीपूर्वक किए गए अन्वेषण या जाँच-पड़ताल शोध है।” दुनिया भर के विद्वानों ने अपने-अपने अनुभवों से शोध की परिभाषा दी है–

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार “रिसर्च में ‘रि’ उपसर्ग उतना पुनर्थक नहीं, जितना पौन: पुनीक अभिनिवेश और गंभीर प्रयत्न का द्योतक है। स्थूल अर्थों में वह नवीन और विस्मृत तथ्यों का अनुसंधान है, जिसको अंग्रेजी में ‘डिस्कवरी ऑफ फैक्ट्स’ कहते हैं और सूक्ष्य अर्थ में वह ज्ञात साहित्य के पुनर्मूल्यांकन और नई व्याख्याओं का सूचक है।”

आचार्य विनय मोहन शर्मा के अनुसार “शोध नए तथ्यों की खोज ही नहीं, उनकी तर्क सम्मत व्याख्या है।”

 डॉ. नगेंद्र के अनुसार, “अनेकता में एकता की सिद्धि का नाम ही सत्य है – इसी का अर्थ है आत्मा का साक्षात्कार। अतः शोध का यह रूप सत्य की उपलब्धि अथवा आत्मा के साक्षात्कार के अधिक से अधिक निकट है।”

उपरोक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि आज के जीवन के आंतरिक और बाह्य पक्ष अनुसंधान के द्वारा ही विकसित हो रहे हैं। ये विकास केवल मानव जाति के लिए अच्छे हैं या बुरे यह प्रश्न दूसरा ही है। भौतिक तथा विचार क्षेत्र के विकास के अनेक दुष्परिणामों के बावजूद यह स्वीकार करना पड़ेगा कि शोध वर्तमान मानव जीवन का एक अनिवार्य अंग है।

हम यह कह सकते हैं कि शोध  जगत को सत्य की ओर ले जाती है। सत्य की ओर जाते ही तथ्य गौण होने लगते हैं और निष्कर्ष प्रमुख। तथ्य उसे समकालीन से जोड़तें है और निष्कर्ष, देश काल की सीमा को तोड़ते हुए समाज के अनुभव विवेक में जुड़ते जाते हैं। शोध एक अनोखी प्रक्रिया है जो ज्ञान के प्रकाश और प्रसार में सहायक होता है ।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची :-

1.         वर्मा डॉ. हरिश्चन्द्र, शोध-प्राविधि, पंचकूला, हरियाणा साहित्य अकादमी, 2006, पृ . 2

2.           कौर, जोगेश, हिंदी शोध संदर्भ और इतिहास, दिल्ली, राजेश प्रकाशन, 1987, पृ. 19

3.         वर्मा डॉ. हरिश्चन्द्र, शोध-प्राविधि, पंचकूला, हरियाणा साहित्य अकादमी, 2006, पृ.  5

4.         वर्मा डॉ. हरिश्चन्द्र, शोध-प्राविधि, पंचकूला, हरियाणा साहित्य अकादमी, 2006, पृ.  5

5.         सिंघल; बैजनाथ, शोध, स्वरूप एवं मानक व्यावहारिक कार्यविधि, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली (2008), पृ. 7

6.         विकिपीडिया (Frascati Manual. The Measurement of Scientific, Technological and Innovation Activities).शोधार्थीहिंदी विभागपंजाब विश्वविद्यालयचंडीगढ़संपर्क सूत्र 9814162323Ektaayron5@gmail.com#41, गली न. 1फिरोजपुर छावनी 

[उम्मीद है, कि आपको हमारी यह पोस्ट पसंद आई होगी। और यदि पोस्ट पसंद आई है, तो इसे अपने दोस्तों में शेयर करें ताकि अन्य लोगों को भी इस पोस्ट के बारे में पता चल सके। और नीचे कमेंट करें, कि आपको हमारी यह पोस्ट कैसी लगी।]

हिन्दी रंगमंच और प्रशिक्षण

0
man holding his angkle
Photo by mostafa meraji on Unsplash

हिन्दी रंगमंच और प्रशिक्षण

परवेज़ अख़्तर

किसी व्यक्ति द्वारा कला-सृजन, उस व्यक्ति के रचनात्मक रुझान और उसकी नैसर्गिक* कला-प्रतिभा पर निर्भर करता है। कलात्मकता का प्रशिक्षण कदाचित सम्भव नहीं है। रंगमंच में प्रशिक्षण दरअसल शिल्प का ही होता है। फिर भी रंगमंच के क्षेत्र में सक्रिय कितने प्रतिशत कलाकार संस्थानों से प्रशिक्षित होते हैं, 5% या उससे भी कम। लेकिन प्रशिक्षण केन्द्र कुछ इस तरह का माहौल या hype बनाते हैं, गोया औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त नाट्यकर्मी ही रंगमंच के वास्तविक नायक हैं। जबकि वस्तुस्थिति यह है कि बहुत बड़ी संख्या में अप्रशिक्षित या अनौपचारिक रूप से प्रशिक्षित कलाकर्मी रचनात्मक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान करते और अति-महत्वपूर्ण रचते हुए दीखते हैं और कला-जगत उनका उच्च-मूल्यांकन भी करता है। हालाँकि सभी कलाओं में शिल्प-के-प्रशिक्षण का अत्यधिक महत्व है; इसका विकल्प नहीं है। लेकिन कितने हैं, जिन्हें औपचारिक प्रशिक्षण का अवसर मिल पाता है ? वैसे देखें, तो आप पाएँगे कि अप्रशिक्षित कोई होता नहीं। चन्द रंगकर्मी ही औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर पाते हैं; जबकि अधिकांश हिन्दी-नाट्यकर्मी, नाट्य-दल में अपनी सक्रियता के क्रम में अनौपचारिक रूप से प्रशिक्षित होते रहते हैं।कला प्रशिक्षण केन्द्र, वास्तव में ‘शिल्प’ या ‘क्राफ़्ट’ तथा ‘तकनीक’ का प्रशिक्षण देते हैं, कला अथवा कलात्मकता का नहीं।

person sitting on bench in dark room

रंगमंच कला में, अंतर्शिल्पीय दक्षता की आवश्यकता होती है। नाट्य-शिल्प के अन्तर्गत स्टेज-क्राफ़्ट, लाइटिंग, म्यूजिक, मेक-अप, कास्ट्यूम, सीनिक-डिजाईन आदि-इत्यादि रंगमंच-कला के मुख्य-सर्जक अभिनेता और उसकी कला को उत्प्रेरित करते हैं, उसे सजाते-सँवारते हैं। रंगमंच कला सृजन में चूँकि शिल्प और तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिये प्रशिक्षण का अत्यधिक महत्त्व है। अप्रशिक्षित नाट्यकर्मी ‘ट्रायल एंड एरर’ के ज़रिये शिल्प का ज्ञान प्राप्त करता है, जिसमें समय का अपव्यय होता है। जबकि प्रशिक्षण के दौरान इस समझ को विकसित करने में समय की बचत होती है और शिल्प में दक्षता तथा पेशेवर तकनीक जानने का अवसर नाट्यकर्मी को मिलता है।रंगमंच में शिल्प-तकनीक-डिजाईन के प्रशिक्षण के साथ, जो कुछ महत्वपूर्ण कार्य प्रशिक्षण केन्द्र द्वारा किये जाने होते हैं – वे हैं, उचित परिप्रेक्ष्य में रंगमंच-कला के मूल्यांकन करने की क्षमता विकसित करना और इस समझ को विकसित करना, जो ‘कथ्य’ और ‘शिल्प’ के संतुलन के बुनियादी उसूल से प्रशिक्षुओं को परिचित कराये।आशु-रचना (improvisation) की कला, रंगमंच का सबसे विशिष्ट कौशल है। प्रशिक्षण के दौरान विभिन्न छवि, ध्वनि, विचार, भावना (emotion, sentiment), शब्द और अन्य सभी दृश्य-श्रव्य अवयवों के रंगमंचीय उपयोग के प्रसंग में आशु-रचना के अभ्यास करवाये जाते हैं। इसी क्रम में यह भी बताया जाता है कि परिस्थिति के अनुसार किस प्रकार अपनी नाट्य-रचना को संयोजित किया जाए।सांकेतिकता, प्रतीकात्मकता और कल्पनाशीलता नाट्य-कला की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है। यह, वह विशिष्टता है, जो नाट्य-सृजन को काव्यात्मक ऊँचाई देती है।यह स्पष्ट है कि नाट्य-प्रशिक्षण संस्थान; शिल्प कौशल, डिजाईन और तकनीक के प्रशिक्षण के साथ; नाट्य-कला की विशिष्टताओं से प्रशिक्षुओं को परिचित कराते हैं। उनका यह दायित्व भी है कि भावी नाट्य नेतृत्व अपने क्षेत्र के दर्शकों के रंगमंच की ज़रूरत का अनुमान लगाने और अपने दर्शकों की आशाओं-आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति, उनकी नाट्य-भाषा में करने में सक्षम हों।लेकिन स्थिति ऐसी है नहीं। दुर्भाग्यवश हिन्दी रंगमंच में अभिनेता स्थायी नहीं है, जबकि यह उसीका माध्यम है। हाँ, निर्देशक का वर्चस्व हिन्दी रंगमंच में बढ़ता गया है। इसलिए रंगमंच की त्रयी – नाटककार, दर्शक और अभिनेता के दबाव से मुक्त निर्देशक, ‘शिल्प’ और ‘तकनीक’ के अतिरेक या आतंक के माध्यम से अपनी सत्ता की स्थापना की दिशा में प्रयासरत दीखता है। यह रंगमंच और दर्शकों दोनों के हित में नहीं है।इस विरोधाभास की तुलना फ़िल्म की उस विडम्बना से की जा सकती है, जिसमें वर्चस्व ‘स्टार-एक्टर’ का है और निर्देशक को, फ़िल्म जिसका माध्यम है, वैसा महत्त्व नहीं मिलता। उसी तरह; अभिनेता-का-माध्यम रंगमंच, निर्देशक के नाम से जाना जाने लगा है।*(यहाँ ‘नैसर्गिक’ से मेरा तात्पर्य प्रकृति द्वारा प्रदत्त उन क्षमताओं से है, जो हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकती हैं, बल्कि होती हैं। अभ्यास से मेरे जैसा बेसुरा-व्यक्ति, कोरस गायक तो शायद बन जाए; किन्तु स्वतन्त्र गायक; एक ऐसा गायक जो संगीत-कला में योगदान देने में सक्षम हो, नहीं बन सकता।)