पुष्टिमार्गीय भक्ति का दर्शन शुद्धादैतवाद है जो शंकाराचार्य के अद्वैतवाद के विरोध के फलस्वरूप आया। अद्वैतवाद जहां निर्गुण भक्ति का समर्थन करता है वहीं शुद्धाद्वैतवाद सगुण भक्ति का । पुष्टिमार्गीय भक्ति के आधारभूमि लिए शंकाराचार्य का अद्वैतवाद तो एक कारण बना ही, इसके अलावा तत्कालीन परिस्थितियां भी उतनी ही जिम्मेदार रहीं । इस भक्ति के Read More
Vaajshrava Ke Bahane Kunwar Narayan वाजश्रवा के बहाने कुँवर नारायण प्रथम खंड : नचिकेता की वापसी आह्वान यह 'आज' भी वैसा ही है जैसा कोई 'आज' रहा होगा इस आज से कहीं बहुत पहले। तब भी पूरी दुनिया को जीत लेने की हड़बड़ियों से लैस निकलते होंगे सजेधजे सूरमाओं के झुंड और शाम को घर Read More
Poetry/Vani Sant Namdev शब्द (गुरू ग्रंथ साहिब) संत नामदेव जी रागु गउड़ी चेती बाणी नामदेउ जीउ की ੴ सतिगुर प्रसादि 1. देवा पाहन तारीअले देवा पाहन तारीअले ॥ राम कहत जन कस न तरे ॥1॥रहाउ॥ तारीले गनिका बिनु रूप कुबिजा बिआधि अजामलु तारीअले ॥ चरन बधिक जन तेऊ मुकति भए ॥ हउ बलि बलि जिन Read More
Shabd Bhakt Ravidas Ji शब्द संत रविदास जी 1. बेगम पुरा सहर को नाउ बेगम पुरा सहर को नाउ ॥ दूखु अंदोहु नही तिहि ठाउ ॥ नां तसवीस खिराजु न मालु ॥ खउफु न खता न तरसु जवालु ॥1॥ अब मोहि खूब वतन गह पाई ॥ ऊहां खैरि सदा मेरे भाई ॥1॥ रहाउ ॥ काइमु Read More
Sharandata Agyeya शरणदाता अज्ञेय “यह कभी हो ही नहीं सकता, देविन्दरलालजी!” रफ़ीकुद्दीन वकील की वाणी में आग्रह था, चेहरे पर आग्रह के साथ चिन्ता और कुछ व्यथा का भाव। उन्होंने फिर दुहराया, “यह कभी नहीं हो सकता देविन्दरलालजी!” देविन्दरलालजी ने उनके इस आग्रह को जैसे कबूलते हुए, पर अपनी लाचारी जताते हुए कहा, “सब लोग Read More
Satrange Pankhonwali Nagarjun सतरंगे पंखोंवाली नागार्जुन सतरंगे पंखोंवाली दिये थे किसी ने शाप लाख की कोशिश नहीं बचा पाया उन्हें गल गये बेचारे सहज शुभाशंसा की मृदु-मद्विम आँच में हाय, गल ही गये ! जाने कैसे थे वे शाप जाने किधर से आये थे बेचारे दी थी यद्यपि आशीष नहीं किसी ने फिर भी, हाँ, Read More
Saptparna Mahadevi Verma सप्तपर्णा महादेवी वर्मा सप्तपर्णा सप्तपर्णा में महादेवी वर्मा ने संस्कृत और पालि साहित्य के वेद, रामायण, थेर गाथा, अश्वघोष, कालिदास, भवभूति एवं जयदेव की चयनित कृतियों में से 39 अंशों का हिन्दी काव्यानुवाद प्रस्तुत किया है। इसके सात सोपान हैं: आर्षवाणी, वाल्मीकि, थेरगाथा, अश्वघोष, कालिदास, भवभूति और जयदेव । 1. उषा दिवजाता Read More
ऊनविंश पर जो प्रथम चरण तेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण; तनये, ली कर दृक्पात तरुण जनक से जन्म की विदा अरुण! गीते मेरी, तज रूप-नाम वर लिया अमर शाश्वत विराम पूरे कर शुचितर सपर्याय जीवन के अष्टादशाध्याय, चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण कह - "पित:, पूर्ण आलोक-वरण करती हूँ मैं, यह नहीं मरण, 'सरोज' का ज्योति:शरण - तरण!" Read More
संवदिया- फणीश्वरनाथ रेणु Samvadiya- Phanishwar Nath Renu हरगोबिन को अचरज हुआ - तो, आज भी किसी को संवदिया की जरूरत पड़ सकती है! इस जमाने में, जबकि गांव गांव में डाकघर खुल गए हैं, संवदिया के मार्फत संवाद क्यों भेजेगा कोई? आज तो आदमी घर बैठे ही लंका तक खबर भेज सकता है और वहां Read More
Sansad Se Sarak Tak Sudama Panday Dhoomil संसद से सड़क तक सुदामा पांडेय धूमिल 1. कविता उसे मालूम है कि शब्दों के पीछे कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं और हत्या अब लोगों की रुचि नहीं – आदत बन चुकी है वह किसी गँवार आदमी की ऊब से पैदा हुई थी और एक पढ़े-लिखे आदमी Read More
साकेत: नवम सर्ग [१] दो वंशों में प्रकट करके पावनी लोक-लीला, सौ पुत्रों से अधिक जिनकी पुत्रियाँ पूतशीला; त्यागी भी हैं शरण जिनके, जो अनासक्त गेही, राजा-योगी जय जनक वे पुण्यदेही, विदेही। विफल जीवन व्यर्थ बहा, बहा, सरस दो पद भी न हुए हहा! कठिन है कविते, तव-भूमि ही। पर यहाँ श्रम भी सुख-सा Read More
साखी/दोहे संत दादू दयाल जी Sakhi/Dohe Sant Dadu Dayal Ji श्री गुरुदेव का अंग संत दादू दयाल जी दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरु देवत:। वन्दनं सर्व साधावा, प्रणामं पारंगत:।।1।। परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनं। निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनं।।2।। दादू गैब माँहि गुरुदेव मिल्या, पाया हम परसाद। मस्तक मेरे कर धारया, दख्या अगम Read More
Sandhyageet Mahadevi Verma सांध्यगीत महादेवी वर्मा 1. प्रिय! सान्ध्य गगन प्रिय ! सान्ध्य गगन मेरा जीवन! यह क्षितिज बना धुँधला विराग, नव अरुण अरुण मेरा सुहाग, छाया सी काया वीतराग, सुधिभीने स्वप्न रँगीले घन! साधों का आज सुनहलापन, घिरता विषाद का तिमिर सघन, सन्ध्या का नभ से मूक मिलन, यह अश्रुमती हँसती चितवन! लाता भर Read More
Sandhyageet Mahadevi Verma सांध्यगीत महादेवी वर्मा 1. प्रिय! सान्ध्य गगन प्रिय ! सान्ध्य गगन मेरा जीवन! यह क्षितिज बना धुँधला विराग, नव अरुण अरुण मेरा सुहाग, छाया सी काया वीतराग, सुधिभीने स्वप्न रँगीले घन! साधों का आज सुनहलापन, घिरता विषाद का तिमिर सघन, सन्ध्या का नभ से मूक मिलन, यह अश्रुमती हँसती चितवन! लाता भर Read More
Saaye Mein Dhoop Dushyant Kumar साये में धूप दुष्यंत कुमार 1. कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए Read More
Sikka Badal Gaya Krishna Sobti सिक्का बदल गया -कृष्णा सोबती खद्दर की चादर ओढ़े, हाथ में माला लिए शाहनी जब दरिया के किनारे पहुंची तो पौ फट रही थी। दूर-दूर आसमान के परदे पर लालिमा फैलती जा रही थी। शाहनी ने कपड़े उतारकर एक ओर रक्खे और 'श्रीराम, श्रीराम' करती पानी में हो ली। अंजलि Read More
Sikka Badal Gaya Krishna Sobti सिक्का बदल गया कृष्णा सोबती खद्दर की चादर ओढ़े, हाथ में माला लिए शाहनी जब दरिया के किनारे पहुंची तो पौ फट रही थी। दूर-दूर आसमान के परदे पर लालिमा फैलती जा रही थी। शाहनी ने कपड़े उतारकर एक ओर रक्खे और 'श्रीराम, श्रीराम' करती पानी में हो ली। अंजलि Read More
सुखमय जीवन- चंद्रधर शर्मा गुलेरी परीक्षा देने के पीछे और उसके फल निकलने के पहले दिन किस बुरी तरह बीतते हैं, यह उन्हीं को मालूम है जिन्हें उन्हें गिनने का अनुभव हुआ है। सुबह उठते ही परीक्षा से आज तक कितने दिन गए, यह गिनते हैं और फिर 'कहावती आठ हफ्ते' में कितने दिन घटते Read More
Sujan-Raskhan (Raskhan) सुजान-रसखान (रसखान) 1. सवैया मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥ पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन। जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥ 2. सवैया Read More
सुजान: रसखान सुजान-रसखान (रसखान) भाग (1) 1. सवैया मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥ पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन। जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥ Read More