विश्वहिंदीजन कोश

एक आदिम रात्रि की महक- फणीश्वरनाथ रेणु Ek Aadim Ratri Ki Mehak -Phanishwar Nath Renu न ...करमा को नींद नहीं आएगी। नए पक्के मकान में उसे कभी नींद नहीं आती। चूना और वार्निश की गंध के मारे उसकी कनपटी के पास हमेशा चौअन्नी-भर दर्द चिनचिनाता रहता है। पुरानी लाइन के पुराने 'इस्टिसन' सब हजार पुराने Read More
एक जीवी, एक रत्नी, एक सपना : अमृता प्रीतम (पंजाबी कहानी) Ek Jeevi, Ek Ratni, Ek Sapna : Amrita Pritam (Punjabi Story) पालक एक आने गठ्ठी, टमाटर छह आने रत्तल और हरी मिर्चें एक आने की ढेरी "पता नहीं तरकारी बेचनेवाली स्त्री का मुख कैसा था कि मुझे लगा पालक के पत्तों की सारी कोमलता, Read More
एक थी गौरा- अमरकांत Ek Thi Gaura- Amarkant लंबे क़द और डबलंग चेहरे वाले चाचा रामशरण के लाख विरोध के बावजूद आशू का विवाह वहीं हुआ । उन्होंने तो बहुत पहले ही ऐलान कर दिया था कि 'लड़की बड़ी बेहया है।' आशू एक व्यवहार-कुशल आदर्शवादी नौजवान है, जिस पर मार्क्स और गाँधी दोनों का गहरा Read More
Kanupriya Dharamvir Bharati कनुप्रिया धर्मवीर भारती पूर्वराग पहला गीत ओ पथ के किनारे खड़े छायादार पावन अशोक-वृक्ष तुम यह क्यों कहते हो कि तुम मेरे चरणों के स्पर्श की प्रतीक्षा में जन्मों से पुष्पहीन खड़े थे तुम को क्या मालूम कि मैं कितनी बार केवल तुम्हारे लिए-धूल में मिली हूँ धरती में गहरे उतर जड़ों Read More
कविता घनानन्द Poetry Ghananand 1. बहुत दिनान को अवधि आसपास परे बहुत दिनान को अवधि आसपास परे, खरे अरबरन भरे हैं उठि जान को। कहि कहि आवन छबीले मनभावन को, गहि गहि राखति ही दै दै सनमान को झूठी बतियानि को पत्यानि तें उदास ह्वै के, अब ना घिरत घन आनंद निदान को। अधर लगे Read More
कविताएँ कुँवर नारायण अगली यात्रा "अभी-अभी आया हूँ दुनिया से थका-मांदा अपने हिस्से की पूरी सज़ा काट कर..." स्वर्ग की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए जिज्ञासु ने पूछा − "मेरी याचिकाओं में तो नरक से सीधे मुक्तिधाम की याचना थी, फिर बीच में यह स्वर्ग-वर्ग कैसा?" स्वागत में खड़ी परिचारिका मुस्करा कर उसे एक सुसज्जित विश्राम-कक्ष में Read More
Qasbe Ka Aadmi Kamleshwar क़सबे का आदमी कमलेश्वर सुबह पाँच बजे गाड़ी मिली। उसने एक कंपार्टमेंट में अपना बिस्तर लगा दिया। समय पर गाड़ी ने झाँसी छोड़ा और छह बजते-बजते डिब्बे में सुबह की रोशनी और ठंडक भरने लगी। हवा ने उसे कुछ गुदगुदाया। बाहर के दृश्य साफ़ हो रहे थे, जैसे कोई चित्रित कलाकृति Read More
कह-मुकरियाँ अमीर खुसरो Kah-Mukriyan Amir Khusro कह-मुकरियाँ अति सुंदर जग चाहे जाको, मैं भी देख भुलानी वाको, देख रूप माया जो टोना । ऐ सखि साजन, ना सखि सोना ।। अति सुरंग है रंग रंगीलो है गुणवंत बहुत चटकीलो राम भजन बिन कभी न सोता ऐ सखि साजन ? ना सखि तोता ।। अर्ध निशा Read More
Kanan-Kusum Jaishankar Prasad कानन-कुसुम जयशंकर प्रसाद 1. प्रभो विमल इन्दु की विशाल किरणें प्रकाश तेरा बता रही हैं अनादि तेरी अन्नत माया जगत् को लीला दिखा रही हैं प्रसार तेरी दया का कितना ये देखना हो तो देखे सागर तेरी प्रशंसा का राग प्यारे तरंगमालाएँ गा रही हैं तुम्हारा स्मित हो जिसे निरखना वो देख Read More
Comrade Kamleshwar कामरेड कमलेश्वर --लाल हिन्द, कामरेड!--एक दूसरे कामरेड ने मुक्का दिखाते हुए कहा। लाल हिन्द--कहकर उन्होंने भी अपना मुक्का हवा में चला दिया। मैं चौंका, और वैसे भी लोग कामरेड़ों का नाम सुन कर चौंकते हैं! वास्तव में किसी हद तक यह सत्य भी है कि कामरेड की 'रेड' से सरकार तक चौंक जाती Read More
Kamayani Jaishankar Prasad कामायनी जयशंकर प्रसाद चिंता सर्ग भाग-1 हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह एक पुरुष, भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह । नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन, एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन । दूर दूर तक Read More
कितनी नावों में कितनी बार अज्ञेय Kitni Navon Mein Kitni Baar Agyeya 1. उधार सवेरे उठा तो धूप खिल कर छा गई थी और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी। मैनें धूप से कहा: मुझे थोड़ी गरमाई दोगी उधार चिड़िया से कहा: थोड़ी मिठास उधार दोगी? मैनें घास की पत्ती से पूछा: तनिक हरियाली दोगी— Read More
Kitne Kamleshwar ! : (Sansmaran) Mannu Bhandari कितने कमलेश्वर ! : मन्नू भंडारी (संस्मरण) कमलेश्वर जी से मेरी पहली मुलाकात 1957 में इलाहाबाद में प्रगतिशील लेखक संघ के एक बड़े आयोजन में हुई थी। मैं तब कलकत्ता में रहती थी और लेखन में बस कदम ही रखा था। राजकमल प्रकाशन से मेरा एक कहानी संग्रह Read More
Kitne Pakistan Kamleshwar कितने पाकिस्तान कमलेश्वर कितना लम्बा सफर है! और यह भी समझ नहीं आता कि यह पाकिस्तान बार-बार आड़े क्यों आता रहा है। सलीमा! मैंने कुछ बिगाड़ा तो नहीं तेरा...तब तूने क्यों अपने को बिगाड़ लिया? तू हँसती है...पर मैं जानता हूं, तेरी इस हँसी में जहर बुझे तीर हैं। यह मेहंदी के Read More
कुकुरमुत्ता । सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' एक थे नव्वाब, फ़ारस से मंगाए थे गुलाब। बड़ी बाड़ी में लगाए देशी पौधे भी उगाए रखे माली, कई नौकर गजनवी का बाग मनहर लग रहा था। एक सपना जग रहा था सांस पर तहजबी की, गोद पर तरतीब की। क्यारियां सुन्दर बनी चमन में फैली घनी। फूलों के पौधे Read More
Kukurmutta Suryakant Tripathi Nirala कुकुरमुत्ता सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला 1. कुकुरमुत्ता (१) एक थे नव्वाब, फ़ारस से मंगाए थे गुलाब। बड़ी बाड़ी में लगाए देशी पौधे भी उगाए रखे माली, कई नौकर गजनवी का बाग मनहर लग रहा था। एक सपना जग रहा था सांस पर तहजबी की, गोद पर तरतीब की। क्यारियां सुन्दर बनी चमन Read More
Kurukshetra Ramdhari Singh Dinkar कुरूक्षेत्र रामधारी सिंह 'दिनकर' प्रथम सर्ग वह कौन रोता है वहाँ- इतिहास के अध्याय पर, जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहु का मोल है प्रत्यय किसी बूढे, कुटिल नीतिज्ञ के व्याहार का; जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष है; जो आप तो लड़ता नहीं, कटवा किशोरों को मगर, आश्वस्त Read More
केशर-कस्तूरी : शिवमूर्ति  “पापा, आपके ए.सी. साहब आए हैं।” बेबी ने कमरे में घुसते हुए सूचित किया। मैं चौंक गया। पूछा - “कहाँ हैं?” “बाहर सड़क पर। जीप में ही बैठे हैं।” “अरे सुनो जी। जरा शीशा-कंघी देना तो। और पैजामा भी।” मैंने कलम और रजिस्टर फेंकते हुए आवाज लगाई और उलटकर बिस्तर से नीचे Read More
Koi Deewana Kehta Hai Kumar Vishwas कोई दीवाना कहता है कुमार विश्वास   पूरा जीवन बीत गया है, बस तुमको गा, भर लेने में— हर पल कुछ कुछ रीत गया है, पल जीने में, पल मरने में, इसमें कितना औरों का है, अब इस गुत्थी को क्या खोलें, गीत, भूमिका सब कुछ तुम हो, अब Read More
कोई दूसरा नहीं कुँवर नारायण उत्केंद्रित ? मैं ज़िंदगी से भागना नहीं उससे जुड़ना चाहता हूँ। - उसे झकझोरना चाहता हूँ उसके काल्पनिक अक्ष पर ठीक उस जगह जहाँ वह सबसे अधिक बेध्य हो कविता द्वारा। उस आच्छादित शक्ति-स्त्रोत को सधे हुए प्रहारों द्वारा पहले तो विचलित कर फिर उसे कीलित कर जाना चाहता हूँ Read More