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“कृषकदेव”, हमारी आन, बान शान

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किसान हमारी आन बान शान
इनसे ही है सुरक्षित हिंदुस्तान

(शीर्षक)

‘कृषक देव’ हम सुरक्षित हैं
जब तक तुम्हारा सरमाया है
हर विपत्ति में हर मौसम में
तुमने ही हमें बचाया है !
विश्व युद्ध काल ने दुनियाँ
की आजीविका लूटी थी
तुमसे हमारी उम्मीद उस
हाल में भी न टूटी थी !
सन 1997 का वो
दुर्गम दौर भी हमने देखा था
बाहरी चमक दिखावा था
बस नज़र का धोखा था !
दहाड़ते एशियाई शेर सभी
मुँह के बल गिरे थे
सब एक सरताज के आगे
हाथ जोड़े खड़े थे !
तब तुमने हमें बचाया था
तुमने ही पार लगाया था।
इस कोरोना काल में
जो दुरूह विपत्ति आयी है
तुमने ही हम सबकी कश्ती
फिर से पार लगाई है!
जी-तोड़ मेहनत करके
तुम पेट हमारा भरते हो
कपास उगाकर खेतों में
तुम तन को हमारे ढकते हो!
अपने बेटों को देश पर
निसंकोच न्यौछावर किया
हमें सुरक्षित रखने को
दुश्मनों की फ़ौज से लड़ते हो!
अच्छी फसल हमें सौंपकर
जो बचे वही खुद खाते हो !
हमें पूरी कपास देकर
ख़ुद फटेहाल रह जाते हो !
तुम्हारी ताकत और हिम्मत
को तहे दिल से नमन है
कैसे बेटों के बलिदान पर
चुपचाप अश्रु बहाते हो !
तुम थाती हो, सम्पति हो
और गर्व हो हिंदुस्तान का
पीढ़ियाँ शुक्र करेंगीं हरदम
तुम्हारे हर बलिदान का !!

©’शशि’ सर्वाधिकार सुरक्षित

#जयकिसान #जयजवान
#अनाजमंडी #देशभक्ति #सैनिक #देशप्रेम #हिंदुस्तान #सुरक्षितभारत

‘हिन्द स्वराज’ की पृष्ठभूमि- मृत्युंजय पाण्डेय

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‘हिन्द स्वराज’ की पृष्ठभूमि

मृत्युंजय पाण्डेय

काल मार्क्स की प्रसिद्ध उक्ति है- “दार्शनिकों ने केवल विभिन्न रूपों में दुनिया की व्याख्या ही की है, लेकिन असली काम तो उसे बदलने का है।”1 पर गांधी ऐसे दार्शनिक हैं जिन्होंने दुनिया की व्याख्या करने के साथ ही उसे बदलने की कोशिश भी की। गांधी का सारा जीवन सामाजिक अन्याय, आर्थिक विषमता, शोषण, गरीबी और उंच-नीच के भेद-भाव को खत्म करने की कोशिश में बीत गया। “उन्होंने भारत की हजारों वर्ष की जिंदगी की धड़कन को, उसकी लय को, उसकी सोच और संस्कृति को, उसके सम्पूर्ण सारतत्व को बड़ी गहराई से आत्मसात् किया और अपने जीवन में उसी को मूर्त किया। उन्हें देखकर कहा जा सकता था कि यह आदमी ‘भारत’ है।”2

आज से 106-7 वर्ष पहले गांधी ने “अंतर्राष्ट्रीय समुद्र कि छाती पर बैठकर”3 ‘हिन्द स्वराज’ कि रचना की। समुद्र की लहरों के समान ही गांधी के दिमाग में भी उथल-पुथल मची हुई थी। गांधी अपनी इस आंतरिक बेचैनी को दस दिनों में शब्द-बद्ध करते हैं। जबकि अज्ञेय को अपनी ‘घनीभूत वेदना’ को शब्द-बद्ध करने में दस वर्षों का समय लगा था। गांधी और अज्ञेय दोनों यातना में थे इसलिए वे ‘द्रष्टा’ हो गए।

13 नवम्बर से 22 नवम्बर 1909 के दौरान गांधी लंदन से दक्षिण-अफ्रीका एक पानी के जहाज से लौट रहे थे। गांधी ने ‘हिन्द स्वराज’ को इन्हीं दस दिनों के अंदर लिखा। 11 और 19 दिसम्बर 1909 को दक्षिण-अफ्रीका से निकलने वाले साप्ताहिक अखबार ‘इंडियन ओपीनियन’ के गुजराती संस्करण में यह पुस्तक प्रकाशित हुई थी। जनवरी 1910 में यह पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित हुई। मार्च 1910 में भारत की ब्रिटिश सरकार ने पुस्तक को जब्त कर लिया था। गांधी ने ‘हिन्द स्वराज’ को अपनी मातृभाषा गुजराती में ही लिखा, क्योंकि- “अपना विचार अपनी भाषा में ही व्यक्त हो सकता है।”4 (नामवर सिंह) गांधी जी अपने विचारों से एक साथ आठ हजार लोगों की सोच को झंकृत करते हैं। गांधी जी के ही शब्दों में- “ ‘इंडियन ओपीनियन’ के गुजराती ग्राहक आठ सौ के करीब हैं। हर ग्राहक के पीछे कम-से-कम दस आदमी दिलचस्पी से यह अखबार पढ़ते हैं, ऐसा मैंने महसूस किया है।”5

सौ पन्नों की छोटी-सी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ गांधी के कई वर्षों के चिंतन का परिणाम है। इस बात को स्वीकार करते हुए वे कहते हैं- “जिस तरह हृदय के भर आने पर कोई व्यक्ति बोले बिना नहीं रह सकता। उसी तरह मेरा हृदय भर आने के कारण मैं यह पुस्तक लिखे बिना नहीं रह सका।”6 22॰11॰1909 की प्रास्तावना में भी गांधी जी ने लिखा था- “मुझसे जब रहा नहीं गया तभी मैंने यह लिखा है।”7 इस पुस्तक के बारे में गांधी जी की राय थी- “मेरी राय में यह किताब ऐसी है कि वह बालक के हाथ में दी जा सकती है। वह द्वेषधर्म की जगह प्रेमधर्म सिखाती है; हिंसा की जगह आत्मबल को खड़ा करती है।”8 जबकि गोखले की प्रतिक्रिया थी कि गांधी एक साल भारत में रहने के बाद खुद ही इस पुस्तक को नष्ट कर देंगे। गांधी जी के उत्तराधिकारी पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे पढ़कर कहा कि यह ‘यथार्थ से परे’ है। नेहरू ‘हिन्द स्वराज’ के कट्टर आलोचक थे। निर्मल वर्मा के शब्दों में कहें तो “दोनों (नेहरू-गोखले) ने ही ‘हिन्द स्वराज’ को एक सनकी दिमाग की उपज कहा और इसे अप्रासंगिक समझ कर निरर्थक घोषित कर दीया था।”9 ‘हिन्द स्वराज’ की कटु आलोचना से आहत होकर निर्मल वर्मा ने लिखा कि- “यह देश जो गांधी के आदर्शों से दूर-दूर चला गया है, आज भी एक जरूरत महसूस करता है, एक दबाव, एक अनिवार्यता महसूस करता है कि एक ऐसी पुस्तक जिसके हम अधिकारी नहीं थे, उसके अक्षर को ढूंढें। शब्दों को याद करें, अर्थ और भाव को समझें तथा उन्हें अपने जीवन में जिस रूप में ग्रहण कर सकते हो, उसे समझें।”10 ‘हिन्द स्वराज’ के अर्थ और भाव को समझे बिना ही गोखले तथा नेहरू ने उसे अप्रासंगिक घोषित कर दिया। दूसरी तरफ टॉल्सटॉय ने ‘हिन्द स्वराज’ के अँग्रेजी अनुवाद को पढ़कर अपनी डायरी में लिखा “अद्भुत”। टॉल्सटॉय की यह टिप्पणी भारतीय सोच को प्रश्नचिन्हित करती है।

गांधीजी अपने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और शैक्षिक आदि विचारों को व्यक्त करने के लिए संवाद शैली का सहारा लेते हैं। ऐसा कहा जाता है कि ‘हिन्द स्वराज’ के पाठक लंदन और दक्षिण-अफ्रीका में रह रहे भारतीय हैं और संपादक, विचारक गांधी हैं। लेकिन यह विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस रहस्य का उद्घाटन गांधी कर चुके हैं। बकौल कनक तिवारी- “सेवा संघ की बैठक में 21 फरवरी, 1940 को भाषण देते हुए गांधी ने यह रहस्योद्घाटन किया कि ‘हिन्द स्वराज’ उन्होंने मूलतः अपने प्रिय मित्र स्वर्गीय डॉ॰ प्रणजीवन मेहता के लिए लिखी थी क्योंकि ‘हिन्द स्वराज’ में व्यक्त सभी तर्क और विचारों को लेकर उनका डॉ॰ प्रणजीवन मेहता से पहले ही बहस-मुबाहिसा हो चुका था।”11 कनक तिवारी यहाँ तक संभावना जता देते हैं कि “ ‘हिन्द स्वराज’ के पाठक की भूमिका भी प्राणजीवन मेहता की है जो छात्र जीवन से ही गांधी से इन्हीं विषयों पर तार्किक बहस-मुबाहिसा किया करते थे।”12 यह कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि पाठक की भूमिका में हर एक वह भारतीय है, जो पश्चिमी नीतियों का समर्थक है, जिसके दिमाग में यह बात घर कर गई है कि पश्चिमी सभ्यता ही सबसे उत्तम सभ्यता है। ‘हिन्द स्वराज’ लिखने से पहले ही गांधी के दिमाग में पश्चिमी सभ्यता का एक स्पष्ट खाका था। 30 अक्टूबर 1909 को गांधीजी ने पश्चिमी सभ्यता का पर्दाफाश करते हुये लॉड एम्टहिल को एक पत्र लिखा। ‘इस पत्र को हम ‘हिन्द स्वराज’ कि ‘कुंजी’ कह सकते हैं।’

लॉड एम्टहिल को गांधीजी ने पत्र में लिखा था- “भारत का शोषण विदेशी पूंजीपतियों के स्वार्थ के लिए किया जाता है और केवल इसी कारण भारत अतिरिक्त कष्ट पाता है। मेरी नम्र सम्मति में इसका सच्चा उपाय यह है कि इंग्लैंड आधुनिक सभ्यता का, जो स्वार्थ और भौतिकता की भावना से भरी होने की वजह से उद्देश्यहीन और निरर्थक है और जो ईसाईयत के विरुद्ध है, परित्याग कर दे। लेकिन यह एक दुराशा है। तब यह भी संभव हो सकता है कि भारत के ब्रिटिश शासक कम-से-कम भारतियों की तरह व्यहार करें और उन पर आधुनिक सभ्यता को तो न थोपें। रेलें, मशीनें और उनके साथ बढ़ी हुई आरामतलबी की आदतें यूरोपियों की भांति ही भारतियों के लिए भी दासता के सच्चे चिह्न हैं। इसलिए शासकों से मेरा कोई झगड़ा नहीं है। हाँ, उनके तरीकों से मेरा पूरा विरोध है। मैं पहले मानता था कि लॉड मैकाले ने अपनी शिक्षा-संबंधी रिपोर्ट लिखकर भारत का हित-साधन किया है, लेकिन अब नहीं मानता। मेरा ख्याल यह भी है कि ब्रिटेन ने अपने अधीनस्थ देशों को जो शांति-सुव्यवस्था दी है, उसका बहुत ज्यादा ढिंढोरा पीटा जाता है। मेरे ख्याल से कलकत्ता और बंबई जैसे शहरों का बनना दुख की बात है, बधाई देने की नहीं। भारत को ग्राम-प्रथा के आंशिक उन्मूलन से हानी हुई है। उनकी तरह मुझमें भी राष्ट्रीय भावना है; इसलिए गर्मदलियों या नर्मदलियों के तरीकों से मेरा पूरा मतभेद है। इसका कारण यह है कि दोनों ही दल आखिरकार हिंसा में विश्वास करते हैं। हिंसात्मक तरीकों का अर्थ है आधुनिक सभ्यता को और इस तरह उसी विनाशकारी स्पर्धा को अंगीकार करना, जिसे हम यहाँ देखते हैं। इसका अर्थ है अंत में सच्ची नैतिकता का ध्वंस। कौन शासन करता है, इस बात में मेरी दिलचस्पी नहीं है। मैं तो चाहूँगा कि शासक मेरी इच्छा के अनुसार शासन करें, अन्यथा मैं उन्हें अपने ऊपर शासन करने में सहायता न दूंगा। मैं उनके विरुद्ध अनाक्रामक प्रतिरोध करूंगा। अनाक्रामक प्रतिरोध शरीर-बल के विरुद्ध आत्मबल का प्रयोग है- दूसरे शब्दों में घृणा पर विजय प्राप्त करनेवाले प्रेम का।”13 जब इंग्लैंड की आधुनिक सभ्यता स्वार्थ और भौतिकता से भरी पड़ी है, ऐसी स्थिति में वह सभ्यता भारत तथा भारतवासियों के लिए प्रेरणा स्रोत कैसे हो सकती है। गांधी की दृष्टि में आधुनिक सभ्यता के लिए शरीर-बल की अपेक्षा आत्म-बल पर अधिक ज़ोर देते हैं, क्योंकि शरीर का बल समय के साथ कम होता जाता है, जबकि आत्मा का बल दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है।

कनक तिवारी के अनुसार- “ ‘हिन्द स्वराज’ लिखने के पहले अपने एक और मित्र हेनरी पोलॉक को लंदन से 14 अक्टूबर 1909 को गांधी ने लिखा था कि उनके अंदर विचार खदबदा रहे हैं। ये विचार यधपि नए नहीं हैं, लेकिन उन्होंने एक ठीक स्वरूप ग्रहण कर लिया है और उन पर जबरिया कब्जा कर लिया है।”14 हेनरी पोलॉक को लिखे पत्र में गांधी 16 मुद्दों पर चर्चा करते हैं। ये सभी मुद्दे ‘हिन्द स्वराज’ में हैं। ‘हिन्द स्वराज’ की पृष्ठभूमि जानने के लिए यहाँ इन सभी मुद्दों को दिया जा रहा है। पत्र में गांधीजी ने लिखा था- “मुझसे किए गए प्रश्नों की झड़ी में मेरा उद्देश्य खो गया और तफसील की बातों पर ही गरमा-गरम बहस होती रही। उससे प्राप्त निष्कर्ष इस प्रकार हैं-

(1) पूर्व और पश्चिम के बीच भेद की कोई दुर्लंध्य दीवार नहीं है।

(2) पश्चिम या पूर्वी सभ्यता-जैसी कोई चीज नहीं है। हाँ, एक आधुनिक सभ्यता अवश्य है और वह सर्वथा भौतिकतावादी है।

(3) आधुनिक सभ्यता से प्रभावित होने के पूर्व-यूरोप के लोग बहुत-सी बातों में पूर्व के लोगों से, या कम-से-कम भारतियों से, काफी मिलते-जुलते थे; और आज भी जो यूरोपीय आधुनिक सभ्यता के प्रभाव से अछूते हैं, वे उस सभ्यता के सपूतों की तुलना में भारतियों से बहुत ज्यादा आसानी से घुलमिल सकते हैं।

(4) भारत पर राज्य ब्रिटिश लोग नहीं कर रहे हैं, बल्कि रेल, तार, टेलीफोन और सभ्यता के विजय-भूषण माने जाने वाले लगभग सारे आविष्कारों के माध्यम से यही आधुनिक सभ्यता कर रही है।

(5) बंबई, कलकत्ता औए भारत के अन्य प्रमुख नगर मुसीबत के असली स्थान हैं।

(6) अगर कल ब्रिटिश शासक का स्थान आधुनिक तौर-तरीकों पर आधारित भारतीय शासक ले ले, तो इससे भारत की स्थिति अच्छी नहीं हो जाएगी। तब भारतीय भी यूरोप या अमरीका के दूसरे या पांचवें संस्कारण बनकर रह जाएँगे। हाँ, इतना जरूर होगा कि जो धन बहकर इंग्लैंड चला जाता है, उसका कुछ अंश देश में ही रह जाएगा।

(7) पूर्व और पश्चिम वास्तविक रूप में तभी मिल सकते हैं, जब पश्चिम आधुनिक सभ्यता का लगभग पूर्ण रूप से परित्याग कर दे। दिखावे में तो वे तब भी मिल सकते हैं; जब पूर्व भी आधुनिक सभ्यता को स्वीकार कर ले, लेकिन यह मिलन सशस्त्र-शांति के समान होगा-ऐसी शांति के समान, जैसे उदाहरण के लिए, जर्मनी और इंग्लैंड के बीच है। ये दोनों ही देश एक दूसरे द्वारा लील लिए जाने के खतरे से बचने के लिए मृत्यु के गढ़ में अपने दिन काट रहे हैं।

(8) यदि कोई एक व्यक्ति या व्यक्तियों का संगठन सारी दुनिया को सुधारना शुरू करे या उसकी बात भी सोचे तो यह हिमाकत की होगी। ऊंचे दर्जे की कारीगरी से बने और तेज चलनेवाले वाहनों के सहारे भी ऐसा करने का प्रयत्न असंभव को संभव बनाने का प्रयत्न होगा।

(9) सामान्यत: यह कहा जा सकता है कि भौतिक सुविधाओं की वृद्धि होने से नैतिक विकास में किसी तरह कोई सहायता नहीं मिलती।

(10) चिकित्सा-विज्ञान इस काले जादू का सार है; जिसे उच्च चिकित्सा-कौशल मानते हैं, उससे तो नीमहकीमी लाख दर्जे अच्छी है।

(11) अस्पताल वे साधन हैं जिनका उपयोग शैतान अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए, अपने साम्राज्य पर अपना अधिकार बनाए रखने के लिए करता है। वे दुराचार, दुख, गिरावट और वास्तविक दास्ता को स्थायी बनाते हैं।

(12) जब मैंने चिकित्सा-शास्त्र की शिक्षा लेने की सोची थी तब मैं बिलकुल बहक ही गया था। अस्पताल की घृणित प्रक्रियाओं में भाग लेना मेरे लिए हर तरह से एक पापपूर्ण कृत्य होगा। अगर यौन रोगों के लिए, या क्षय-रोगियों के लिए भी अस्पताल न होते तो हमारे बीच क्षय रोग कम और यौन पाप भी इतने न होते।

(13) भारत की मुक्ति इसी बात में है कि उसने पिछले पचास वर्षों में जो कुछ सीखा है, उसे भूल जाये। रेले, तारे, अस्पताल, वकील, डॉक्टर आदि सबको जाना होगा; और तथाकथित उच्च वर्गों के लोगों को इस बोध के साथ कि किसान का सादा जीवन ही सच्चा सुख देने वाला है, अंतरात्मा को साक्षी बनाकर, धर्म मानकर और मन को वश में करके वह जीवन बिताना सीखना होगा।

(14) भारतियों को मिल के कपड़े नहीं पहनने चाहिए, चाहे वे यूरोपीय मिलों में तैयार हुये हों या भारतीय मिलों में।

(15) इंग्लैंड इसमें भारत का सहायक हो सकता है, और तभी वह भारत पर अपने अधिकार का औचित्य सिद्ध कर पाएगा। आज इंग्लैंड में भी ऐसा सोचनेवाले बहुत लोग दिखाई देते हैं।

(16) पुराने ऋषियों में सच्चा ज्ञान था। तभी तो उन्होंने समाज की व्यवस्था ऐसी की थी कि लोगों की भौतिक स्थिति मर्यादित हो जाए। शायद पाँच हजार साल पुराना आदिम हल आज भी किसान के लिए उपयुक्त हल है। हमारी मुक्ति उसी से होगी। ऐसी हालातों में लोग ज्यादा जीते हैं या ज्यादा शांति से रहते हैं। उसकी तुलना में आधुनिक उद्योगवाद को अपनाने के बाद यूरोप के लोगों की उतनी शांति नहीं मिलती है। मुझे लगता है कि प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति चाहे तो इस सत्य को सीख सकता है और उसके अनुसार आचरण कर सकता है; प्रत्येक अंग्रेज़ भी अवश्य ही ऐसा कर सकता है।

लिखने के लिए बाते बहुत हैं। आज आपको उतना नहीं लिख सकता। लेकिन ऊपर दी गई सामग्री विचार के लिए काफी है। जब आप यह देखें कि मैं गलत कहता हूँ, तो मुझे रोक सकते हैं।”15

हेनरी पोलॉक को लिखे पत्र में गांधी रेल, तार, अस्पताल, डॉक्टर, वकील, मिल आदि सभी की आलोचना करते हैं। वे अस्पताल के साधन को शैतानी साधन कहते हैं। उदय प्रकाश की चर्चित लंबी कहानी ‘…और अंत में प्रार्थना’ के नायक डॉ॰ दिनेश मनोहर वाकणकर के कुछ विचार गांधी के विचारों से मेल खाते हैं। जैसे- डॉक्टर, चिकित्सा और टेकनॉलाजी के संदर्भ में डॉक्टर वाकणकर का मानना है कि- “जिस तरह कुछ धर्मग्रंथ, दर्शन या विचारधाराओं का उपयोग दरअसल शासन व्यसाय या तंत्र को चलते रहने के लिए होता है, उसी तरह मेडिकल साइंस या चिकित्साशास्त्र का भी इस्तेमाल शासन, व्यवसाय और तंत्र को चलते रहने के निमित्त होता है। वे कहते हैं कि सैनिक विज्ञान, रसायनशास्त्र, जैवरसायन या टेकनॉलाजी का ज़्यादातर प्रयोग मनुष्यों की हत्या के लिए होता आया है। भौतिक, इलेक्ट्रानिक्स, गतिकी और अंतरिक्ष विज्ञान या नाभिकीय क्षेत्रों में लगातार होनेवाले अनुसंधानों के फलस्वरूप अब हम ज्यादा व्यापक, प्रभावी और अपेक्षाकृत आसान तरीके से हत्याएं कर सकते हैं। मेडिकल साइंस भी ऐसा ही एक अनुशासन है।”16 उदय प्रकाश की कहानी इस बात की तरफ संकेत करती है कि गांधी 1909 में ही भारत के भविष्य को या यंत्रों के दुस्परिणाम को भली-भांति समझ रहे थे। पर अफसोस उस दुस्परिणाम को उनके उत्तराधिकारी नेहरू ने नहीं समझा और आज सौ वर्ष बाद भी हम उस दुस्परिणाम को समझते हुए भी समझना नहीं चाहते हैं।

20 अध्यायों वाली पुस्तिका ‘हिन्द स्वराज’ में व्यक्त विचार गांधी के मूल-विचार हैं भी और नहीं भी हैं। गांधी के ही शब्दों में – “वे मेरे हैं, क्योंकि उनके मुताबिक बरतने की मैं उम्मीद रखता हूँ; वे मेरी आत्मा के गढे-जुड़े हैं। वे मेरे नहीं हैं, क्योंकि सिर्फ मैंने ही उन्हें सोचा हो सो बात नहीं। कुछ किताबें पढ़ने के बाद वे बने हैं। दिल के भीतर-ही-भीतर मैं जो महसूस करता था, उसका इन किताबों ने समर्थन किया।”17 ‘हिन्द स्वराज’ के अंत में ‘परिशिष्ठ-2’ में गांधी ने 20 पुस्तकों के नाम बताए हैं। इन्हीं पुस्तकों ने गांधी के विचारों का समर्थन किया। या इन्हें पढ़कर गांधी के विचार बने। ‘हिन्द स्वराज’ के अध्याय को आगे बढ़ाने के लिए गांधीजी निम्नलिखित पुस्तकों को पढ़ने की सिफारिश पाठकों से करते हैं- (1) दि किंग्डम ऑफ गॉड इज़ विदिन यू – टॉल्सटॉय (2) व्हाट इज़ आर्ट – टॉल्सटॉय (3) द स्लेवरी ऑफ अवर टाइम्स – टॉल्सटॉय (4) द फस्टॅ स्टेप – टॉल्सटॉय (5) हाऊ शैल वी एस्केप – टॉल्सटॉय (6) लेटर टु ए हिन्दू – टॉल्सटॉय (7) द व्हाइट स्लेट्स ऑफ इंग्लैंड – शेराडॅ (8) सिविलाइजेशन, इट्स कॉज एंड क्योर – कापेंटर (9) द फैलेसी ऑफ स्पीड – टेलर (10) ए न्यू क्रूसेड – ब्लांट (11) आन द ड्यूटी ऑफ सिविल डिसओबेडियेंस – थोरो (12) लाइफ विदाउट प्रिंसिपल – थोरो (13) अन टु दिस लास्ट – रस्किन (14) ए जॉय फॉर एवर – रस्किन (15) ड्यूटीज़ ऑफ मैन – मैजिनी (16) डिफेंस एंड डेथ ऑफ सोक्रेटीज़ – फ्रॉम प्लेटो (17) पैरेडॉक्सेज़ ऑफ सिविलाइजेशन – मैक्स नार्दू (18) पॉवर्टी एंड अन ब्रिटिश रूल इन इंडिया – नौरोजी (19) इकॉनामिक हिस्टरी ऑफ इंडिया – दत्त (20) विलेज कम्युनिटीज़ – मेन।

उपरोक्त 20 पुस्तकों में से मात्र 2 पुस्तकें भारतीय विद्धानों की हैं। पहली दादाभाई नौरोजी की ‘पॉवर्टी एंड अन ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ और दूसरी रमेशचन्द्र दत्त की ‘इकॉनामिक हिस्टरी ऑफ इंडिया’। इसके अतिरिक्त 18 पुस्तकें यूरोपीय विद्धानों की हैं। जिसमे अकेले टॉल्सटॉय की छ: पुस्तकें हैं।

गांधी टॉल्सटॉय के विचारों से बहुत अधिक प्रभावित थे। ‘हिन्द स्वराज’ में टॉल्सटॉय और रस्किन जैसे कुछ प्रमुख यूरोपीय विद्धानों के नाम तो हैं लेकिन- “उनमे विलियम मॉरिस, जॉज बर्नाड शॉ, एनी बेसेंट, जार्ज और मॉरिस हिंडमैन वगैरह के नाम नहीं है, लेकिन वे गांधी के विचारों में समाहित थे। ये वे बुद्धिजीवी थे जो पश्चिम की मुख्य भागमभाग की दौड़ को किनारे बैठकर न केवल देख रहे थे, बल्कि उसके खिलाफ अपनी मानवतावादी राय भी दर्ज कर रहे थे।”18 कनक तिवारी की माने तो गांधी विलियम मॉरिस, जॉज बर्नाड शॉ, एनी बेसेंट वगैरह के विचारों से प्रभावित थे या यूं कहें वे गांधी के विचार में समाहित थे, लेकिन गांधी ने उनका नाम नहीं लिया है।

किल्डोनन कैसल नामक पानी के जहाज पर बैठकर गांधी ने ‘हिन्द स्वराज’ जैसी पुस्तक की रचना की। “दरअसल उनकी जलयात्रा साथ-साथ उस मानसिक पनडुब्बी में बैठकर की जा रही थी, जो ब्रिटिश साम्राज्य के महासागर के नीचे उसकी बुनियाद में विस्फोट करने का बारूद भी बना रही थी।”19 निश्चय ही गांधी ब्रिटिश साम्राज्य की बुनियाद में बारूद लगाने में सफल होते हैं।

गांधी ने यह स्वीकार किया है कि ‘हिन्द स्वराज’ लिखने की प्रेरणा उन्हें मूलतः टॉल्सटॉय के प्रसिद्ध पत्र ‘लेटर टु ए हिन्दू’ से मिली। किल्डोनन कैसल नामक पानी के जहाज पर ‘हिन्द स्वराज’ के अतिरिक्त गांधी ने टॉल्सटॉय के प्रसिद्ध पत्र ‘लेटर टु ए हिन्दू’ का गुजराती अनुवाद भी किया था। परिशिष्ठ की 20 पुस्तकों में से यह छठी पुस्तक है। वस्तुतः टॉल्सटॉय का पत्र हिंसा और अराजकता-समर्थक तारकनाथ दास को संबोधित था। यह युवा बंगाली केनेडा में बस गया था और वैक्कुअर से उसने भारत की आजादी के लिए ‘फ्री हिंदुस्तान’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन किया था।”20 गांधी ने अहिंसा का सिद्धांत यहीं से ग्रहण किया। कनक तिवारी के शब्दों में- “गांधी ने अपनी अहिंसा की थ्योरी को टॉल्सटॉय की थ्योरी से समानान्तर और अनुप्राणित माना है। लेकिन टॉल्सटॉय के रूस में उनकी थ्योरी और गांधी के भारत में उनकी भी थ्योरी को पाश्चातवर्ती पीढ़ियों ने खारिज कर दिया।”21 गांधी टॉल्सटॉय को गुरु के रूप में देखते हैं। अपने जीवन के अंतिम दिनों में गांधी ने टॉल्सटॉय का आभार स्वीकार करते हुये कहा कि- “रूस ने मुझे टॉल्सटॉय के रूप में शिक्षक दिया जिनसे मुझे अपनी अहिंसा के लिए युक्तिसंगत आधार प्राप्त हुआ।”22 “टॉल्सटॉय ने अपने पत्र में (लेटर टु ए हिन्दू) भारतियों को यह सलाह दी थी कि वे अंग्रेजों से अहिंसा के आधार पर ही लड़े, क्योंकि मनुष्य जाति को एक नए तरह का संघर्ष-बोध पैदा करना चाहिए।”23 टॉल्सटॉय से प्रेरणा लेकर ही गांधी ने कहा कि- “अंग्रेजों ने भारतियों को गुलाम नहीं बनाया है। यह तो भारतीय खुद हैं जिन्होंने अंग्रेजों को आमंत्रण दिया है।”24 इस संदर्भ में टॉल्सटॉय ने अपने पत्र में लिखा था- “भारतियों को अंग्रेजों ने गुलाम नहीं बनाया बल्कि वे स्वयं गुलाम बने हैं।”25 क्योंकि 20 करोड़ शक्तिशाली, बुद्धिमान, बलिष्ठ और स्वतंत्रता प्रिय लोगों को एक व्यापारी कंपनी कैसे गुलाम बना सकती है। यह एक रहस्य से कम नहीं है। भारत पर अंग्रेजों ने हिंसा के द्वारा अधिकार नहीं किया, इसलिए उन्हें हिंसा के माध्यम से हटाया भी नहीं जा सकता।

7 सितम्बर 1910 को टॉल्सटॉय ने गांधी को एक पत्र लिखा था। जिसमे “टॉल्सटॉय ने गांधी के द्वारा ट्रांसवाल में चलाए जा रहे अहिंसक आंदोलन की प्रशंसा की थी। 20 नवम्बर 1910 को अपनी मृत्यु से पहले टॉल्सटॉय ने गांधी को अपना आध्यात्मिक उताराधिकारी घोषित कर दिया था। गांधी ने भी इसके दाय स्वरूप अपना पहला सत्याग्रह जिस आश्रम से शुरू किया उसका नाम ‘टॉल्सटॉय आश्रम’ रखा।”26 टॉल्सटॉय के बाद गांधी उसके अहिंसा के सिद्धांत को अपनाते हैं।

प्रसिद्ध कवि विलियम वर्ड्सवर्थ के प्रपौत्र राबर्ट हारबारो शेरार्ड की पुस्तक ‘द व्हाइट स्लेट्स ऑफ इंग्लैंड’ में “इंग्लैंड के औसत औधोगिक मजदूर की जिंदगी का त्रासद चित्रण है। चाहे वे कीलें बनाते हों या चप्पलें या दर्जीगिरी करते हों अथवा ऊन के कारीगर हों या शीशा उधोग के। उनकी हॉरर कथा शेराड ने अद्भुत मानवीय संवेदना के साथ लिखी और मिल मालिकों तथा जमींदारों के अत्याचार बेहद न्यूनतम वेतन से उत्पन्न आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों और स्वास्थ सुविधाओं के अभाव वगैरह का ग्राफिक चित्रण किया है। विशेषकर महिला मजदूरों की भयावह स्थिति का जो चित्रण शेरार्ड ने किया उसने करुणामय गांधी को अत्यधिक विचलित किया। शेरार्ड का मुख्य तर्क यही था कि जब तक उधोगपतियों और फैक्टरी मालिकों में नैतिकता का दृष्टिकोण नहीं होगा, तब तक औधोगिकरण की बांग देना अजान फूंकना नहीं मर्सिया गाने की तरह है। … गांधी ने इन मानवतावादी व्याख्याओं को अपने व्यापक चिंतन का केंद्रीय बिन्दु बनाया और उसे भविष्य के भारत के लिए भी आवृत्त किया।”27 हम देख सकते हैं, गांधी में शेरार्ड रचे-बसे हैं।

एडवर्ड कारपेंटर की पुस्तक ‘सिविलाइजेशन, इट्स कॉज एंड क्योर’ का उल्लेख ‘हिन्द स्वराज’ के छठे अध्याय ‘सभ्यता का दर्शन’ में किया गया है। पश्चिमी सभ्यता की व्याख्या करते हुए गांधी पाठक से कहते हैं- “मेरे हिसाब से ही नहीं, बल्कि अंग्रेजी लेखकों के हिसाब से भी यह सभ्यता बिगाड़ करने वाली है। उसके बारे में बहुत किताबें लिखी गयी हैं। वहाँ सभ्यता के खिलाफ मण्डल भी कायम हो रहे हैं। एक लेखक ने ‘सभ्यता उसके कारण और उसकी दवा’ नाम की किताब लिखी है। उसमें उसने यह साबित किया है कि यह सभ्यता एक तरह का रोग है।”28 यह पुस्तक कारपेंटर की है। गांधी के यहाँ भी आधुनिक सभ्यता एक रोग के रूप में आता है।

थॉमस की पुस्तक ‘द फैलेसी ऑफ स्पीड’ को गांधीजी ने संक्षिप्त करके ‘इंडियन ओपीनियन’ में प्रकाशित किया था। यंत्रों के संबंध में गांधी के जो विचार हैं वे टेलर की अवधारणाओं से मेल खाते हैं। इस अवधारणाओं को मिलाते हुए कनक तिवारी ने लिखा है- “तीन अध्यायों की पुस्तक (द फैलेसी ऑफ स्पीड) में ‘गति और जनसंख्या’, ‘गति और मुनाफा’, और ‘गति और सुख’ में टेलर इस अवधारणा पर हमला करते हैं कि तेज गति से चलना ही बेहतर होना है। गांधी ने रेलगाड़ी के खिलाफ ‘हिन्द स्वराज’ में जो कुछ भी लिखा उसके पीछे थॉमस टेलर की अवधारणाओं की प्रेरणा दिखाई देती है क्योंकि गांधी की तरह टेलर भी मानते थे कि यांत्रिक वाहनों के जरिए ग्रामीण आबादी को शहरों में ढोया जा रहा है। इस बात की किसी को परवाह नहीं है कि इतनी तेज गति से जीवन को संचालित करने में क्या-क्या खतरे उठाने पड़ेंगे। टेलर ने तो यहाँ तक निराशा में कहा कि कुल मिलाकर गति से तो राज्य में स्वस्थ स्थिति तो बनती ही नहीं है जो कि धीमी गति से जीवन में उपलब्ध होती है। टेलर ने भी सवाल पूछा था कि क्या संचलनशील यंत्रों के जरिए जीवन को विश्राम मिल रहा है या वह नष्ट ही किया जा रहा है?”29 गांधी का मानना था कि रेल, वकील और डॉक्टर इन सभी ने मिलकर हिंदुस्तान को कंगाल बनाया। हिंदुस्तान को कंगाल बनाने में यांत्रिक मशीनों की भी विशेष भूमिका रही। गांधी ने ‘हिन्द स्वराज’ में लिखा भी है- “अगर रेल न हो तो अंग्रेजों का काबू हिंदुस्तान पर जितना है उतना तो नहीं ही रहेगा। रेल से महामारी फैली है। … रेल से अकाल बढ़े हैं, क्योंकि रेलगाड़ी की सुविधा के कारण लोग अपना अनाज बेच डालते हैं। जहां महंगाई हो वहाँ अनाज खींच जाता है, लोग लापरवाह बनते हैं और उससे अकाल का दुख बढ़ता है। रेल से दुष्टता बढ़ती है। बुरे लोग अपनी बुराई तेजी से फैला सकते हैं।”30

गॉडफ्रे क्लांट की पुस्तक ‘ए न्यू क्रूसेड’ को भी गांधीजी ने उसके संक्षिप्त रूप में 1905 में ‘इंडियन ओपीनियान’ में प्रकाशित किया था। कनक तिवारी का मानना है कि- “सादगी, कला और महत्वकांक्षा क्लांट के उद्देश्य थे जिन्हें गांधी ने बहुत पसंद किया था। क्लांट कहता था कि समाज की बेहतरी व्यक्ति की बेहतरी पर निर्भर है। ग्रामीण जीवन हमारे समाज का सबसे अच्छा हिस्सा है। हस्तकलाएँ और कृषि मनुष्य मात्र की भलाई के लिए सबसे जरूरी हैं। मशीनें तो शैतान का हथियार हैं। राजनीति सामाजिक सुधारों को बंद कर सकती है, शुरू नहीं कर सकती। काम करना तो पूजा के बराबर है। क्लांट से प्रभावित होकर गांधी ने अपने खादी आंदोलन को अग्रसर किया।”31 क्लांट के विचारों ने गांधी की अवधारणाओं को पुष्ट किया। स्वदेशी के संबंध में गांधी के जो विचार हैं वह क्लांट के ऋणी हैं।

हेनरी डेविड थोरो की पुस्तक ‘आन द ड्यूटी ऑफ सिविल डिसओबेडियेंस’ का गांधी के ऊपर गहरा प्रभाव है। थोरो का सिद्धांत था कि- “राजनीतिक दृष्टि से क्या सही है और क्या गलत-इसका फैसला विवेक को करना चाहिए, बहुमत को नहीं। उसने यह भी कहा की यधपि हर व्यक्ति का दायित्व नहीं है कि वह बुराई का नाश कर दे, लेकिन इतना तो वह कर ही सकता है कि दुष्कर्मों का समर्थन न करे। उसने यह भी कहा कि हालत ऐसी है कि सही व्यक्ति की जगह जेल में हो जाती है जबकि सही व्यक्तियों की स्थापनाएं राज्य सत्ता के लिए आदेशात्मक होनी चाहिए।”32 गांधी के सत्याग्रह का सिद्धांत थोरो के सिद्धांत से मेल खाता है।

थोरो की ही पुस्तक ‘लाइफ विदाउट प्रिंसिपल’ का सिद्धांत है कि- “सद्गुण के बिना राजनीति केवल घास-पात है और नागरिक सद्गुणों की जगह चिकना-चुपड़ा व्यवहार नहीं ले सकता।”33 कहना न होगा कि गांधी इस सिद्धांत के घोर समर्थक हैं। गांधी राजनीति में नीति की बात करते हैं।

19वीं सदी के कई ब्रिटिश आलोचक आधुनिक सभ्यता एंव मशीनी सभ्यता के खिलाफ थे। रस्किन भी इनमें से एक थे। वह मशीनी सभ्यता या औधोगिक सभ्यता का घोर विरोधी था। उसकी पुस्तक ‘ए जॉय फॉर एवर एंड इट्स प्राइस इन दि मार्केट’ तथा ‘दि पोलिटिकल इकोनॉमी ऑफ आर्ट’ का गांधी के ऊपर गहरा असर पड़ा था। “इन पुस्तकों में रस्किन ने औधोगिक सभ्यता की आलोचना की है। उसने कहा कि अपनी तमाम विसंगतियों के साथ-साथ औधोगिक सभ्यता का जीवन के कलात्मक सौंदर्य से कुछ लेना-देना नहीं है। उसने यह भी प्रतिपादित किया कि देश की श्रम शक्ति के प्रबंधन में केवल वैभव को ही लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता। उसमें उसकी जन-उपयोगिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। मसलन श्रमिकों के लिए भोजन, आवास, वस्त्र और जीवन के आमोद-प्रमोद, स्वास्थ और शिक्षा वगैरह की प्राथमिकता के आधार पर आवश्यकता होगी। लेकिन नई राजनीतिक अर्थव्यवस्था तो मुट्ठी भर लोगों के वैभव के प्रति प्रतिबद्ध है। उसे अनगिनत लोगों के जीवन स्तर से कुछ लेना-कर पाए, तब तक अमीरों के जूतों में रेशमी फीते क्यों बंधने चाहिए। ऐसा वैभव जो आम आदमी की आवश्यकताओं की कब्र पर खड़ा होकर अट्टाहास कर रहा हो, उसे जीवन संगीत गाने का कोई अधिकार नहीं है। लोगों को तन ढकने को कपड़े नहीं हैं। उनके पास विस्तर नहीं हैं। कंबल नहीं हैं। तब औधोगिक सभ्यता के नाम पर अमीरों को कितना अमीर बनाया जाय।”34 रस्किन के विचारों का गांधी के ऊपर आश्चर्यजनक असर पड़ा है। गांधी के अर्थशास्त्र के कई सूत्र रस्किन के यहाँ से लिए गए हैं। गांधी भी रस्किन की तरह ही मानते हैं कि औधोगिक सभ्यता गरीबों का शोषण करने का माध्यम है।

गांधी ने अपने ‘सर्वोदय’ के सिद्धांत को रस्किन की ‘अन टु दिस लास्ट’ पुस्तक से ग्रहण किया है। इस पुस्तक का गांधी के ऊपर ज्यादा प्रभाव दिखता है। 1904 में इस पुस्तक को पढ़कर गांधी ने लिखा – बक़ौल कनक तिवारी – “मैं ‘सर्वोदय’ के सिद्धांत को इस प्रकार समझता हूँ-

(1) सबकी भलाई में हमारी भलाई निहित है।

(2) वकील और नाई दोनों के काम की कीमत एक-सी होनी चाहिए, क्योंकि आजीविका का अधिकार सबको समान है।

(3) सादा, मेहनत-मजदूरी का – किसान का जीवन ही सच्चा जीवन है।

पहली बात मैं जानता था, दूसरी को धुंधले के रूप मैं देखता था। तीसरी का मैंने कभी विचार नहीं किया था। ‘सर्वोदय’ ने मुझे दिए की तरह दिखा दिया कि पहली चीज में दूसरी दोनों चीजें समाई हुई हैं। सवेरा हुआ और मैं इन सिद्धांतों का अमल करने के प्रयत्न में लग गया।”35 यहाँ ‘सर्वोदय’ दो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। पहला जो गांधी का ‘सर्वोदय’ है और दूसरा गांधी ने रस्किन की पुस्तक ‘अन टु दिस लास्ट’ के आधार पर ‘सर्वोदय नाम का एक ट्रेक्ट ही निकाला’ था। रस्किन ‘सर्वोदय’ ने गांधी के मार्ग में दिए का काम किया। उसने गांधी को ‘सर्वोदय’ तक पहुँचने का रास्ता दिखाया।

‘सर्वोदय’ के अतिरिक्त भी अन्य संदर्भों में ‘अन टु दिस लास्ट’ पुस्तक का असर गांधी के ऊपर पड़ा था। जैसे “पहला तो यह कि गांधी ने ‘फीनिक्स सेटेलमेंट’ की स्थापना की जो एक आश्रम की प्रतिकृति या पूर्व पीठिका थी। उसके बाद में जोहानिसवर्ग के टॉल्सटॉय फॉर्म, अहमदाबाद के साबरमती आश्रम और वर्धा के सेवाग्राम आश्रम के रूप में मूर्तिमान होने का अवसर मिला।”36 गांधी में रस्किन एक और जगह मिलते हैं। रस्किन ने “उन्नत औधोगिक समाज में भी हस्तकलाओं के महत्व का वैचारिक आग्रह किया था। गांधी ने उसे अपेक्षाकृत अधिक गरीब भारत में चरखे से विकल्पित किया।”37 गांधी और ‘हिन्द स्वराज’ को गढ़ने में

रस्किन की विशेष भूमिका है।

‘हिन्द स्वराज’ में मैजिनी की पुस्तक ‘ड्यूटीज़ ऑफ मैन’ को भी जगह दी गई है। इस पुस्तक के माध्यम से गांधी ने “हिंसा और अराजकता में विश्वास रखानेवाले आप्रवासी भारतियों को चुनौती और संभावना भी प्रेषित की थी कि मैजिनी के राजदर्शन की संभवत: ज्यादा सुसंगत और स्थायी प्रकृति की व्याख्या नैतिक और अहिंसात्मक प्रकृति की है।”38

‘हिन्द स्वराज’ के परिशिष्ट में गांधी ने मैक्स नार्दू को ‘पैरेडॉक्सेज़ ऑफ सिविलाइजेशन’ नामक पुस्तक का लेखक बताया है। कनक तिवारी की माने तो मैक्स नार्दू ने इस शीर्षक से कोई पुस्तक ही नहीं लिखी है। नार्दू ने ‘कान्वेंशनल लाइफ ऑफ सिविलाइजेशन’ (1895) और ‘पैराडॉक्सेस’ (1906) नामक पुस्तकें लिखी है। संभावना यह कि “गांधी ने दोनों पुस्तकों को पढ़ा हो और शीर्षक गड्डमड्ड हो गए हों।”39 सभ्यता के संदर्भ में गांधी के जो विचार हैं वह में प्राचीन भारतीय जीवन की सादगी को लेकर जो स्मरण या प्रलाप हैं, उसे मैक्स नार्दू की किताब से भी भारत के बदले यूरोपीय संदर्भ में और इसलिए वैश्विक संदर्भ में बखूबी समझा जा सकता है। पहले के जीवन में लोग मोटा-झोटा कपड़ा पहनते थे। मकान सर्व सुविधा सम्पन्न नहीं होते थे। खानपान प्राथमिक मनुष्य-वृत्तियों के आसपास था और प्रर्याप्त वर्तन भांडे भी नहीं होते थे। मैक्स नार्दू ने कहा कि आज की शहरी सभ्यता गांवों की कुर्बानी करके विकसित हुई है और वह श्रमरत मनुष्य को ही सभ्यता का केन्द्रबिन्दु मनाने को तैयार नहीं है। गांधी ने इसीलिए नार्दू के सुर-में-सुर मिलाते हुए कहा कि डॉक्टर और वकील जैसे पेशे बहुत महत्वपूर्ण कैसे हो गए, जबकि वे अमीर और गरीब दोनों तरह के लोगों पर पराश्रयी हैं।”40 मैक्स नार्दू की तरह गांधी का भी मानना था कि शहरों की उन्नति गांवों की कुर्बानी पर ही हुई है। गांधी ने लिखा भी है कि “मैंने पाया है कि शहरवासियों ने आमतौर पर ग्रामवासियों का शोषण किया है; सच तो यह है कि वे गरीब ग्रामवासियों की ही मेहनत पर जीते हैं।”41 गांधी का मानना था कि भारत अपने चंद शहरों में नहीं बल्कि सात लाख गांवों में बसा हुआ है।

‘हिन्द स्वराज’ के परिशिष्ट की अंतिम पुस्तक हेनरी समर मेन की ‘विलेज कम्युनिटीज़ इन द ईस्ट एंड वेस्ट’ है। इस पुस्तक से गांधी ने दो उद्देश्य हासिल किए। “पहला तो यक कि उन्होंने दक्षिण-अफ्रीका में निवास कर रहे भारतीयों के लिए मतदान का अधिकार मांगा क्योंकि भारतीय सदियों से प्रजातांत्रिक संस्थाओं को समझते और विकसित करते रहे हैं। दूसरी प्रेरणा उन्होंने यह ग्रहण की कि ग्रामोद्वार को उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा ध्येय बना लिया।”42 गांधी का मानना था कि सच्ची आजादी गांवों की आजादी में निहित है।

‘हिन्द स्वराज’ की रचना में इन सभी पश्चिमी विद्वानों की विशेष भूमिका रही है। “पश्चिम के उन सभी विचारकों से गांधी ने अपने तर्कमहल के लिए खुलकर वैचारिक ऋण लेना स्वीकार किया है, जिनका गांधी के जीवन में अंततः स्थायी सरोकार और सहकार बना।”43 हम देखते हैं कि गांधी ने अपने विचारों को पुष्ट करने के लिए न जाने कितने पश्चिमी विद्वानों को बार-बार और ध्यान से पढ़ा है। ‘हिन्द स्वराज’ के जीतने भी विचार हैं वह मूलतः और मूलतः गांधी के अपने ही हैं।

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संदर्भ-सूची :

(1) विश्वनाथ प्रसाद तिवारी (संपादक), महात्मा गांधी : सहस्त्राब्द का महानायक, लेख– कर्मयोगी महात्मा – विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2009 ई॰ पृष्ठ संख्या- 7

(2) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 10

(3) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 16

(4) दर्पण (हिन्द स्वराज विशेष), संपादक- प्रियंकर पालीवाल, वर्ष : 11, अंक : 8-11, सितम्बर 2009, केंद्रीय काँच एंड सिरामिक अनुसंधान संस्थान, कोलकात्ता, पृष्ठ संख्या- 55

(5) गांधी, हिन्द स्वराज, अनुवादक – अमृतलाल ठाकोरदास नाणावटी, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, आठवाँ संस्करण, जून 2009 ई॰ पृष्ठ संख्या- 3

(6) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 31

(7) गांधी, हिन्द स्वराज, अनुवादक – अमृतलाल ठाकोरदास नाणावटी, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, आठवाँ संस्करण, जून 2009 ई॰ पृष्ठ संख्या- 3

(8) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 6

(9) दर्पण (हिन्द स्वराज विशेष), संपादक- प्रियंकर पालीवाल, वर्ष : 11, अंक : 8-11, सितम्बर 2009, केंद्रीय काँच एंड सिरामिक अनुसंधान संस्थान, कोलकात्ता, पृष्ठ संख्या- 51

(10) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 51

(11) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 32

(12) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 32

(13) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 27-28

(14) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 29

(15) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 29-30-31

(16) उदय प्रकाश, …और अंत में प्रार्थना, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2006 ई॰, पृष्ठ संख्या- 104

(17) गांधी, हिन्द स्वराज, अनुवादक – अमृतलाल ठाकोरदास नाणावटी, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, आठवाँ संस्करण, जून 2009 ई॰ पृष्ठ संख्या- 3

(18) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 127

(19) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 127

(20) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 131-132

(21) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 132

(22) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 133

(23) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 135

(24) गांधी, हिन्द स्वराज, अनुवादक – अमृतलाल ठाकोरदास नाणावटी, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, आठवाँ संस्करण, जून 2009 ई॰ पृष्ठ संख्या- 3

(25) गिरिराज किशोर, हिन्द स्वराज : गांधी का शब्द – अवतार, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण, 2010 ई॰, पृष्ठ संख्या- 53

(26) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 135-136

(27) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 143

(28) गांधी, हिन्द स्वराज, अनुवादक – अमृतलाल ठाकोरदास नाणावटी, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, आठवाँ संस्करण, जून 2009 ई॰ पृष्ठ संख्या- 37

(29) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 141-142

(30) गांधी, हिन्द स्वराज, अनुवादक – अमृतलाल ठाकोरदास नाणावटी, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, आठवाँ संस्करण, जून 2009 ई॰ पृष्ठ संख्या- 47-48

(31) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 141

(32) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 144

(33) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 144

(34) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 137-138

(35) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 138

(36) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 139

(37) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 139

(38) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 145

(39) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 142

(40) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 142-143

(41) गांधी, मेरे सपनों का भारत, राजपाल, दिल्ली, संस्करण, 2008 ई॰, पृष्ठ संख्या- 80

(42) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 141

(43) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 145-146

मृत्युंजय पाण्डेय, 25/1/1, फकीर बागान लेन, पिलखाना,हावड़ा-711101, मोबाइल- +91 9681510596, प्रवक्ता : विद्यासागर कॉलेज फॉर वीमेन, कोलकाता। Email id : pmrityunjayasha@gmail.com

‘स्वप्न’ और ‘स्वप्नभंग’ के कथाकार: प्रभात रंजन – ध्रुव कुमार

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‘स्वप्न’ और ‘स्वप्नभंग’ के कथाकार: प्रभात रंजन

ध्रुव कुमार
शोधार्थी
हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

 वर्तमान दौर में लिखी जा रही कहानियों में सपनों और उसके यथार्थ या कहें स्वप्नभंग की कहानियों के लेखन में प्रभात रंजन एक ‘यूनिक’, यथार्थवादी और एक अलग किस्म के ‘आंचलिक कहानीकार’ हैं। उन्हें ‘रेणु’ आदि की परंपरा का आंचलिक कथाकार मानना तो सही नहीं है पर उनकी बहुधा कहानियों की ‘थीम लोकेशन’, पात्र-वर्ग, परिवेश और घटनाएं इत्यादि ध्यान से देखे जाएं तो एक अंचल विशेष का पूरा वातावरण उनके यहां मौजूद है। उनकी कहानी में सीतामढ़ी है, मुजफ्फरपुर है, चतुर्भुज स्थान है, नेपाल को आने जाने वाले रास्ते हैं, बख्तियारपुर हैं, सुरसंड है, मोरसंड है, बरबरना है, ढेलमरवा गोसाई है, भोजपुरी गाना है, यहाँ तक कि ‘कट्टा’ है वह भी देसी। वर्तमान समय की आंचलिकता ‘रेणु’ की आंचलिकता से भिन्न है। अमृतलाल नागर के बारे में अपने ‘हिंदी साहित्येतिहास की भूमिका’ में डॉ० सूर्य प्रसाद दीक्षित लिखते हैं, ‘नागर जी का तीसरा विशिष्ट प्रयोग है- आंचलिकता का परिविस्तार। रेणु के ‘मैला आंचल’ के बाद आंचलिक उपन्यासों का जो स्वरुप उभरा, वह अज्ञात, या अर्द्धज्ञात कथा-भूमियों से संबंधित था। अर्थात बहुत पिछड़ा और उपेक्षित आदिम या देहाती परिवेश। धीरे-धीरे इसका परिविस्तार कस्बायी जीवन तक हुआ। नागर जी ने आंचलिकता का अभिनिवेश शहरी जीवन में किया।’ अर्थात आंचलिकता की परिभाषा भी समयानुरूप बदली जा सकती है। बदलते हुए ‘अंचल’ के साथ बदलती हुई ‘आंचलिकता’ भी संभव है। नागर जी की आंचलिकता रेणु की आंचलिकता से भिन्न थी और नौवें दशक की आंचलिकता उन दोनों की आंचलिकता से भिन्न है। इस तरह एक पारंपरिक आंचलिकता के चित्रण से भिन्न होते हुए भी प्रभात रंजन के प्राय: सभी कहानियों की जमीन एक अंचल विशेष ही है और उनको नव आंचलिक कहानीकार की संज्ञा दी जा सकती है।

प्रभात रंजन की कहानियों में जो घटनाएं हैं उनका कारण और उनका समय पहचानने के लिए ‘जानकीपुल’ कहानी का यह एक पैरा ही पर्याप्त है, ‘जब तक पक्की सड़क नहीं बनी थी मधुवन गांव के लोग बड़े संतोषपूर्वक रहते और नदी के उस पार के जीवन को शहर का जीवन मानते और अपने जीवन को ग्रामीण और बड़े संतोषपूर्वक अपना सुख-दुख जीते। कोलतार की उस पक्की सड़क ने उनके मन को उम्मीदों से भर दिया था। यहां कोलतार की पक्की सड़क को हम प्रतीक रूप में आधुनिक संचार का पर्याय मान सकते हैं। टी०वी०, कंप्यूटर, इंटरनेट आदि आधुनिक संचार का युग अर्थात भूमंडलीकरण का युग अर्थात पिछली सदी का नवाँ दशक। संचार के इन आधुनिक उपकरणों से मधुबन सीतामढ़ी से जुड़ा, गांव शहरों से जुड़ा, भारत विदेशों से जुड़ा। सभी समानांतर जुड़ते रहे और क्रमिक रूप से अपने से आधुनिक और विशिष्ट शहरों, महानगरों अथवा विदेशी संस्कृति से अवगत और संक्रमित भी होते रहे। संचार की सुगमता से सपनों का जो दौर इस युग में चला वह आज भी बदस्तूर जारी है। ऐसा नहीं है कि इसके पहले सपने नहीं होते थे सपने होते थे पर साथ में उनके पूरा होने तक का धैर्य भी होता था, मेहनत होती थी, लगन होती थी। पर अब के सपनों में धैर्य नहीं होते, अधीरता होती है, व्याकुलता होती है येन केन प्रकारेण उन्हें पा लेने की, पूरा कर लेने की। और यही कारण होता है उनके प्रायः चटख जाने का, टूट जाने का, उनके भंग हो जाने का यानी ‘स्वप्नभंग’ का।

प्रभात रंजन की कहानियों में सपने कहां, किसके पास नहीं है? ‘मोनोक्रोम’ के ‘राहुल’ का सपना, ‘फ्लैशबैक’ के ‘बांकेबिहारी’ का सपना, ‘इजी मनी’ के ‘कल्पांत’ और ‘विशाल’ का सपना, ‘लापता’ के ‘सूरज’ जी का सपना, ‘पर्दा गिरता है’ के ‘शालीन’ और ‘शीरीन’ का सपना, ‘डिप्टी साहब’ के ‘चंद्रमणि’ का सपना, ‘मिस लिली’ की ‘लिली’ का सपना, ‘जानकीपुल’ के मधुबन वासियों का सपना और इसी तरह सुबिमल भगत जी का, चंद्रचूड़ जी का, चितरंजन बाबू का सपना, नयनतारा और मयंक का सपना, बंडा भगत और साजनसिंह का सपना, इंदल सत्याग्रही, बाबू राम खेलावन और अभिरंजन कुमार का सपना, सुमन कुमारी का सपना, पंकज उर्फ ‘पिक्कू’ के ‘बोलेरो क्लास’ में जाने आदि के सपनों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है। साथ में उतनी ही लंबी फ़ेहरिस्त है उनके सपनों के बिखरने की भी। करियर में असफलता के साथ-साथ अपने प्रेम में भी असफलता ‘मोनोक्रोम’ कहानी के ‘राहुल’ को इस दुनिया में ‘कहीं बहुत ही पीछे गुम हो जाने’ का एहसास कराती है। बाँकेबिहारी अपने राजनीतिक जीवन में इतना उतार-चढ़ाव देखने के बाद अंततः गिरफ्तार होकर दिल्ली के अखबारों के समाचार का हिस्सा बन जाते हैं। कंपटीशन देते-देते ‘चंद्रमणि’ अपने दोनों ही सपनों, आईएएस बनने और चंपा टॉकीज के मालिक गणेशी बंका की बेटी महुआ से विवाह करने से महरूम रह जाता है। बेंगलुरू से ‘फ़िल्ममेकर’ का टैग लगा कर वापस आने के बाद भी ‘कल्पांत’ और उसके पुराने सहपाठी ‘विशाल’ को एक नेता के कटआउट में सरकारी कामों की सूची लिखने और उसके प्रूफिंग के काम में संतोष करना पड़ता है। अच्छे भले ‘दिल्ली विश्वविद्यालय’ से पीएचडी कर रहे ‘सूरज’ जी को घर बार छोड़कर भाग जाना पड़ता है। यह अकारण नहीं है कि ये सपने घर घर में टी०वी० आ जाने के बाद अचानक सफल टीवी सीरियल या फिल्म स्क्रिप्ट राइटर बनने, सिंगर बनने, रुतबा हासिल करने के लिए नेता बनने, अच्छा पैसा कमाने, बड़ी गाड़ी में चलने के रूप में लोगों की आंखों में पलने लगे। यह सभी सपने एक निश्चित समय और परिवेश की देन हैं। अपने समय को अपनी रचनाओं में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लाने की सायास चिंता प्रत्येक साहित्यकार को सच्चा बनाती है। वरिष्ठ कथालोचक सूरज पालीवाल के शब्दों में कहें तो, ‘हर रचनाकार अपने समय को रचता है और ऐसे समाज का निर्माण करता है जिसे वह चाहता है। इसीलिए वह उपेक्षित और चिंतित रहता है।’ यही समय प्रभात रंजन की कहानियों का समय है।

इन कहानियों को अपने समय से जोड़कर सुनाने वाला एक वाकसिद्ध किस्सागो है, एक काल्पनिक ‘वाचक’ या ‘नैरेटर’ है, जो मालूम नहीं स्वयं लेखक है या कोई और है, जो सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर का पढ़ा-लिखा, रहने वाला है। जिसने गाजियाबाद के किसी मैनेजमेंट कॉलेज से एमबीए किया है। उसके पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज और हिंदू कॉलेज से भी पढ़ चुका है। मानसरोवर छात्रावास में रह चुका है, जिसने कुछ दिन प्राइवेट नौकरी भी की है और जो वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी कॉलेज में पढ़ाता भी है, और जिसे रोज सवेरे अखबार पढ़ने की आदत है। वह एक असफल प्रेमी भी रहा है, उसके कुछ मित्र मुंबई में फिल्मी दुनिया में जा बसे हैं, उसे सिगरेट, बियर और वाइन की अच्छी जानकारी है और इन सभी कहानियों का सूत्रधार भी वही है। दोनों संग्रह की प्रायः सभी कहानियां कहानियां हैं अथवा इसी वाचक की पुरानी डायरी के कुछ पृष्ठ, पहचानना मुश्किल है। इसी कारण ये कहानी-संग्रह कई अलग-अलग कहानियों का संग्रह न होकर एक ही बड़ी कहानी की छोटी-छोटी कहानियां जान पड़ती हैं। सभी एक दूसरे से गुंथी हुई, एक दूसरे के पूरक, एक दूसरे का विस्तार करती हुई। इन कहानियों का वैविध्य एक ही हाथी के विविध अंगों की भांति देखने में अलग-अलग लगते हुए भी पूर्णता में होती एक ही हैं। टुकड़ों में बंटी ‘जिग्शा’ की पहेलियां की तरह सबको मिला देने पर हमें एक कंप्लीट पिक्चर आसानी से मिल जाती है।

इन संग्रहों की कहानियों के केंद्र में युवा हैं, जिनकी महत्वाकांक्षाओं, सपनों की कोई सीमा नहीं है। अपनी जीवन यात्रा में वह भुलावे में जी रहे होते हैं और अंत में उनके हाथ लगती है घोर निराशा। ध्यातव्य है कि इस निराशा के लिए कहानीकार न तो सरकार को कोसता नजर आता है, न समाज और परिवार को, यहां तक कि खुद पात्र को भी नहीं। इसके पात्रों की असफलताएं मानो उनकी नियति का एक हिस्सा हो जो अनिवार्य रूप से कहानी के अंत होते-होते तक आनी ही हैं। फिर भी सुखद यह है कि असफलता और इतनी निराशा के बावजूद भी कहानी के किसी पात्र की जिजीविषा शक्ति अपना दम तोड़ती नजर नहीं आती। वह जीवन जीने के किसी और रास्ते का वरण कर ही लेती है। मानसिक उलझन और संत्रास के साथ भी वह समाज और दुनिया की नजरों के सामने अपनी एक राह पर चलती चली जाती है। यह इन कहानियों की सफलता ही मानी जाएगी। दूसरी और देखें, उदारीकरण के आगमन के बाद सूचना और संचार के संजाल में उलझे ग्रामीण और कस्बाई युवकों के सपने भी बड़े हुए और उसके साथ-साथ प्रतिस्पर्धा भी बहुत तेजी से बढ़ी। युवा गांव से शहरों, शहरों से महानगरों की ओर रुख करने लगे। शहरों और महानगरों की अपनी समस्या कि वह एकोर से सबको पचा नहीं सकते और युवकों की अपनी समस्या कि एक बार यहां आकर वह वापस गांव जा नहीं सकते। तौहीनी का सवाल था। हर कोई चंद्रमनि डिप्टी साहब तो हो नहीं सकता जो गांव वापस जाकर भी सम्मान के साथ अपना कोई काम शुरू कर सके। ऐसे में उनकी स्थिति उस मध्यवर्ग की हो गई जो उच्च वर्ग में जाने के सपने देखते रहता है और जा नहीं पाता व निम्न मध्यवर्ग में जाना नहीं चाहता और उनसे भी दूरी बनाए रखता है। इसी तरह सरकारी बंगला, गाड़ी का सपना संजोए महानगरों में आने वाले युवा असफलता हाथ लगने के बाद न तो वहां रुक पाता है न ही अपने कस्बे वापस जा पाता है। मजबूरन शहरों में ही वह अपने भविष्य के प्रति सहानुभूतिक होते हुए तरह-तरह के समझौते करते हुए आगे बढ़ता रहता है। ‘इजी मनी’ कहानी का ‘विशाल’ फ़िल्म और सीरियल के स्क्रिप्ट लिखने का सपना लिए हुए, पर कहीं काम न मिल पाने की दशा में नेता के कटआउट के नीचे उनकी सरकार के द्वारा किए गए कामों की सूची लिखने और उसका प्रूफ पढ़ने तक के लिए तैयार हो जाता है। बेरोजगारी में अपने सपनों और मूल्यों से समझौते पर बड़ी ही ‘साइलेंट’ और मार्मिक कटाक्ष करती नजर आती है यह कहानी। ‘लापता’ कहानी अपनी शैली में अनायास ही प्रख्यात कथाकार उदय प्रकाश की कहानी ‘मोहनदास’ की याद दिलाता है। कहानी में सच कितना है और कहानी कितनी है इसी विचार, संशय और उत्सुकता में पाठक एकबारगी पूरी कहानी पढ़ जाता है। कहानी में बीच-बीच में सच से जुड़े ऐसे सुराग भी लेखक देता रहता है कि पाठक बैठे ही बैठे स्वयं को एक खोजी और तफ़्तीशी मानने लगता है। सच का यही सुराग पाठकों की संवेदना को भी अचानक से झकझोरने का काम करता है। सूरज जी के बहाने पूरी कहानी में जो पाठक विश्वविद्यालयी रिसर्च व्यवस्था और रिसर्चरों पर व्यंग्य की अनुभूति में डूब-उतरा रहा होता है, मसलन, ‘बदलने के नाम पर वहां सिर्फ अफवाहें बदलती हैं। वर्षों के थके-हारे शोधार्थी, विश्व-बाजार में बदल चुकी राजधानी दिल्ली के ‘टोले’ सरीखे शोध-तल पर अफवाहों से ही अपनी उबासी और उदासी तोड़ते रहे हैं। अफवाहें ही रही हैं जो बरसों पहले डॉक्टर की उपाधि प्राप्त कर या किसी अन्य कारण से शोध-तल से विदा ले चुके लोगों को, शिक्षण-पत्रकारिता जैसे पेशों में जा चुके लोगों को वहां बासी समोसे और ठंडी चाय पीने के बहाने आने को मजबूर कर देते।’ अथवा ‘मैं भी कहां अपना रोना ले बैठा और उस मनहूस शोध-तल का, जहां बरसों से किलो के भाव से रिसर्च कर के लोग अपनी जवानी बर्बाद करने में लगे हैं।’ वहीं कहानी का अंत होते होते पाठक उन्हीं ‘सूरज’ जी को लेकर यथार्थ के धरातल पर ऐसी पटकनी खाता है कि उसके हास्य व्यंग्य की अनुभूति औचक सहानुभूति में बदल जाती है। एक गंभीर शोधार्थी, फिल्मों-रंगमंच की अच्छी परख और समझ रखने वाले ‘सूरज’ जी किस कदर गांजे और चरस के लती हो जाते हैं और अंततः ‘डिप्रेसिव फीवर’ तक के शिकार हो जाते हैं। वह नशाखोर बनते हैं, ‘ट्रांक्विलाइजर’ की लगातार डोज़ पर आते हैं, और अंतत: सब कुछ छोड़-छाड़ कर ऋषिकेश में साधु के रूप में देखे जाते हैं। इसके पीछे का असली कारण ‘सलोनी’ है अथवा ‘जामिया’ में मास कॉम में एडमिशन न होना है अथवा पटना में व्याख्याता पद पर उनका सिलेक्शन न होना है यह तो अलग से एक मनोविश्लेषण का विषय है पर इतना जरूर है कि लेखक भी इस पर बात करने से बच कर निकल जाता है। यह उसकी शैली है अथवा कहानी के वाचक की अपनी प्रवृत्ति, जो कि पत्रकार है और जो बिना सबूत कुछ लिख नहीं सकता। पर इस कहानी में पात्र अपनी जिजीविषा शक्ति खोते दिखाई देता है। मोहभंग, वह आंतरिक हो अथवा बाह्य, संग्रह की प्राय: सभी कहानियों में है। पर उनकी परिणति ऐसी कहीं नहीं हुई है। उसके पात्र अपनी आजीविका और जीवन का कोई न कोई रास्ता जरूर निकाल लेते हैं। ‘लापता’ कहानी में जितनी रूमानियत है अंत तक आते-आते उसमें उतना ही रौद्र यथार्थ भी है। इसी तरह ‘जानकीपुल’ भी गाँव और शहर को जोड़ने वाला कोई सामान्य पुल न होकर वहाँ के निवासियों के ‘सपनों का पुल’ है, उनके अरमानों का पुल है, जो अंत तक आश्वासन ही बनकर रह जाता है। समाज में आधारभूत संरचनाओं का विकास किस तरह समाज के आर्थिक विकास का परिचायक मात्र न होकर वहाँ के लोगों की उम्मीदों और सपनों का भी माध्यम बन जाता है, इस कहानी में बड़ी रवानगियत के साथ दिखाया गया है। संग्रह की प्राय: कहानियों की तरह संस्मरणात्मक शैली में लिखी गयी यह कहानी भारतीय राजनीति के खोखलेपन को भी बड़ी सहजता से उजागर करती है। इस प्रकार प्रभात रंजन की कहानियों में एक स्वस्थ और आदर्श परिवेश की तलाश है, तलाश है एक ऐसे माहौल की जहां युवा वर्ग लोभ-द्वेष, तृष्णा और बेकारी से दूर होकर अपनी रचनात्मक ऊर्जा को निराशा से बचाकर अपने, समाज और राष्ट्र के उत्थान में लगा सके। पर यह तलाश कब , कैसे पूरी होती है, दोनों कहानी-संग्रह इसी का लघु सामाजिक दस्तावेज़ हैं

चित्र साभार: जानकीपुल वेबसाईट 

संदर्भ

 ‘हिन्दी साहित्येतिहास की भूमिका, भाग-३, डा० सूर्यप्रसाद दीक्षित, पृ०-४२८, २०१०, उ० प्र० हिन्दी संस्थान, लखनऊ।
 जानकीपुल, प्रभात रंजन, पृ०१३३, २००८, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली।
 हिन्दी में भूमंडलीकरण का प्रभाव और प्रतिरोध, सूरज पालीवाल, पृ० ५३, २००८, शिल्पायन, दिल्ली।
 जानकीपुल, प्रभात रंजन, पृ० ६४, २००८, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली।
 जानकीपुल, प्रभात रंजन, पृ० ७५, २००८, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली।



‘वैकल्पिक विकास में जैविक कृषि की भूमिका’-आशीष कुमार

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photo of man standing on rice field
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‘वैकल्पिक विकास में जैविक कृषि की भूमिका’

*आशीष कुमार

सारांश

संसाधनों के उपयोग द्वारा आजीविका की आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही विकास होता है। समाज में व्याप्त बेरोजगारी और पलायन की समस्या के समाधान की आज आवश्यकता है। भारतीय कृषि पद्धति में सदैव ही जल, जंगल, जमीन पर महत्व दिया गया है। वैकल्पिक विकास में जैविक कृषि के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। जिस प्रकार से जैविक कृषि में रोजगार के नए-नए सृजन हो रहे है। जैविक कृषि में लागत कम तथा उत्पादन अधिक प्राप्त होता है। उत्पादों में गुणवत्ता अधिक होने कारण अनेक प्रकार की बीमारियों से बचाव होता है। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। पिछले कुछ वर्षों में तो जैविक कृषि क्षेत्र में लगातार बढ़ोत्तरी भी दर्ज की गई है। यही स्थिति रही तो आने वाले समय में जैविक कृषि रोजगार का महत्वपूर्ण साधन होगी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि जैविक कृषि की वैकल्पिक विकास में अहम भूमिका होती है।

की-वर्ड : जैविक कृषि, बाजार, वैकल्पिक विकास, कृषि क्षेत्र।

भूमिका

भारत कृषि प्रधान व ग्राम्य प्रधान देश है। इसकी आत्मा गांवों में बसती है। और गांव का विकास कृषि पर निर्भर रहता है। भारत देश की लगभग 70% जनसंख्या गांवों में निवास करती है। (2011 की जनगणना के अनुसार) हालांकि इस आंकड़े में वर्तमान में कुछ कमी आई है इसका कारण है तेजी से हो रहा शहरीकरण। इसके बावजूद देश का समुचित विकास बिना कृषि के संभव नहीं है। कृषि को बेहतर और वैकल्पिक विकास में सहायक हो इसके लिए एक सुनियोजित कृषि पद्धति की आवश्यकता है। जैविक कृषि ऐसी पद्धति है जिसमें समग्र लाभ (कृषकों की दृष्टि से, पर्यावरण की दृष्टि से, मृदा की दृष्टि से, मानव की दृष्टि से) अर्जित हो जाते हैं। जैविक कृषि पद्धति से कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। जैविक उत्पादों की बाजार में मांग अधिक होती है, जैविक उत्पादों की कीमत रासायनिक उत्पादों की अपेक्षा अधिक प्राप्त होती है। जब कृषि में उत्पादन अच्छा प्राप्त होता है, तथा कीमत अधिक मिलती है तो किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। जिससे किसी भी देश के विकास में गति प्रदान होती है। स्वास्थ्य लाभ के साथ जैविक कृषि में कम लागत आती है। कम लागत और अधिक उत्पादन से किसान समृद्ध होता है तो गांव का विकास होता है। इस प्रकार गांव के विकास से देश के वैकल्पिक विकास में सहायता प्राप्त होती है। अतः किसी भी देश के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए सबसे पहले गांव और गांव के किसानों को विकसित करने की आवश्यकता होती है। क्योंकि गांव का विकास ही देश के वास्तविक विकास को प्रदर्शित करता है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का प्रमुख साधन कृषि है, इसके बारे में महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि “भारत की वास्तविक प्रगति का तात्पर्य शहरी औद्योगिकरण केंद्रों के विकास से नहीं, बल्कि गांवों के विकास से है।”

“मिट्टी की जुताई करने वाले ही अधिकार के साथ जीते हैं, शृंखला के शेष लोग उनके आश्रय की रोटी खाते हैं”। (थिरूवलूवर)

वैकल्पिक विकास की आवश्यकता

सतत विकास “वह विकास है जो भविष्य की आने वाली पीढ़ियों की क्षमताओं और बेहत्तरी से समझौता किए बिना वर्तमान समय की आवश्यकता को आसानी से पूरा किया जा सके, दूसरे शब्दों में कहा जाए एक ऐसा आर्थिक विकास जिसमें हमारे प्राकृतिक संसाधनों को किसी प्रकार की हानि न पहुंचाई जाए या प्राकृतिक संसाधनों के बर्बाद होने की गुंजाइश ना के बराबर हो”।

किसी भी देश के सतत विकास के लिए या वैकल्पिक विकास के लिए ग्रामीण विकास सबसे अनिवार्य होता है। ग्रामीण विकास की आवश्यकता इसलिए महसूस की गई क्योंकि भारत की ज्यादातर जनसंख्या गांवों में निवास करती है। इसलिए ऐसे विकल्पों की आवश्यकता थी जिससे ग्रामीण लोग समाज के साथ सामंजस्य बिठा सके। भारत जैसे देश में समतामूलक समाज की अवधारणा का विकास हो सकता है। एक तरफ जहां गांव में निवास करने वाले लोगों की खुशहाली एवं विकास जरूरी है वही प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग एवं संरक्षण भी बहुत आवश्यक है।

गांधी जी जब भी विकास की बात करते हैं उनकी बातों के केंद्र में हमेशा गांव रहा है गांव के विकास व गांव के पुनर्निर्माण की बात को मुख्य मुद्दा मानते थे गांधीजी भी मानते थे कि गांव के विकास के बिना भारत देश का विकास संभव नहीं है इसलिए गांधीजी आदर्श गांव की मांग करते हैं और भारत के हर गांव को आदर्श ग्राम बनाने की अपनी मंशा भी जाहिर करते हैं। हरिजन सेवक में 1926 में वह इसको लेकर लिखते हैं “ग्रामीणों श्रम के इस प्रकार उठ जाने से ग्रामवासी कंगाल हो रहे हैं और अमीर लोग अमीर हो रहे हैं अगर यह क्रम ऐसे ही चलता रहा तो किसी प्रत्यय के बगैर ही गांवों का नाश हो जायेगा।”

प्राचीन काल से ही भारत कृषि प्रधान देश रहा है और यहां के लोग सदैव प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहते आए हैं। भारत में आज भी प्रकृति की पूजा का विधान है जिसका जिक्र वेद पुराणों के साथ-साथ अनेक रचनाओं में भी किया गया, परंतु जिस प्रकार से पिछले कुछ दशकों में प्रकृति के साथ लूट मचा रखी गई है और सतत विकास के महत्व को बिल्कुल ही नकार दिया गया है, मौजूदा पीढ़ी सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों की रखवाली है और यह उसकी जिम्मेदारी भी है कि वह आने वाली पीढ़ी को बिना किसी प्रकार के हानि पहुंचाए यह प्राकृतिक संपदा अगली पीढ़ी को सौंपे और देश को एक बेहतर भविष्य प्रदान करें इस जिम्मेदारी को हम सबको मिलकर उठाना होगा और एक संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा।

सच्चिदानंद सिन्हा के अनुसार- “वैकल्पिक विकास के मॉडल की बात करना आज उसी तरह अर्थहीन है जैसे कभी यूटोपिया की बात करना समाजवादी आंदोलन के प्रारंभिक काल में था। कोई भी व्यवस्था सामने की हकीकत के संदर्भ में ही बनती है बनी बनाई कल्पना के अनुरूप नहीं”।

जैविक खेती एवं वैकल्पिक विकास

इसमें किसी भी भारतवासी को संदेह नहीं होना चाहिए कि भारत देश के विकास के लिए ग्रामीण विकास और कृषि विकास सबसे आवश्यक है। इसका प्रमुख कारण है भारत एक कृषि प्रधान व ग्राम प्रधान देश है। यहाँ लोगों की आजीविका का साधन मुख्य रूप से कृषि है। अतः ग्रामवासी जैविक कृषि को अपनाकर बहुत सी समस्याओं का सामना उचित प्रकार से कर सकते है। जनसंख्या में लगातार जिस प्रकार से बढ़ोतरी हो रही है। उससे जैविक कृषि पद्धति में खाद्यान्न समस्या का सामना करना पड़ सकता है ऐसा अनुमान बहुत से समाज शास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों का है। जबकि यह एक भ्रम के शिवाय कुछ नहीं है। साथ ही अक्सर यह भी सुना जाता है कि जैविक कृषि कम उत्पादन देती है, लागत अधिक आती है। जबकि जैविक कृषि खाद्य समस्या से जुड़ी प्रत्येक समस्या का एक बेहतर विकल्प है। जैविक कृषि से जलवायु परिवर्तन में स्थिरता प्राप्त होती है। जैविक कृषि पानी की कमी को दूर करती है, मृदा की जल धारण क्षमता का विकास करती है, किसानों की गरीबी और कुपोषण जैसी समस्याओं का समाधान करती है। अतः जैविक कृषि से संबंधित पहलुओं और मिथकों पर विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता है। यह एक बेहतर विकल्प साबित हो सकती है वैकल्पिक विकास में। आवश्यकता है इसे सुनियोजित तरीके से अपनाने की।

जैविक खेती का परिदृश्य

आज विश्व के लगभग 181 देशों में 698 लाख हेक्टेयर भूमि पर जैविक खेती की जा रही है। पूरे विश्व में जैविक कृषि किसानों की संख्या 30 लाख के आसपास है। अगर भारत देश में जैविक कृषि के विस्तार की बात की जाए तो बीते कुछ वर्षों में बहुत तेजी से हुआ है। वर्ष 2017-18 में लगभग 36 लाख हेक्टेयर में प्रमाणित जैविक कृषि क्षेत्र था। 2017-18 में 17 लाख टन जैविक उत्पादों का उत्पादन किया गया। इस उत्पादन के मुख्य सहयोगी राज्य रहे, सिक्किम, असम, मध्य प्रदेश, केरल, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक आदि राज्य थे। वर्तमान में भारत से जैविक उत्पादों का निर्यात भी किया जा रहा है। इससे निश्चित तौर पर वैकल्पिक विकास में सहायता प्राप्त होगी और भविष्य में जैविक कृषि क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा।

इस सत्य से नकारा नहीं जा सकता है कि विश्व को जैविक कृषि भारत की देन है और जब भी जैविक कृषि का इतिहास टटोला जाएगा तो भारत और चीन ही इसके केंद में आएंगे। भारत और चीन की कृषि परंपरा 4000-5000 वर्ष पुरानी है। इस कारण यहां के किसानों का ज्ञान भी लगभग 5000 वर्ष पुराना है। जब से कृषि का आरंभ हुआ है तभी से भारत में खेती का स्वरूप मानव स्वास्थ्य के अनुकूल तथा प्राकृतिक वातावरण के लिए हितकारी हो इसका विशेष ध्यान रखा गया है। जब इन सभी विषयों पर ध्यान रखकर कृषि की जाती है तो जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान निरंतर चक्र चलता रहता है। जिसके कारण जल, मृदा, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता है।

भारतीय कृषि के इतिहास को देखने से पता चलता है कि यहाँ कृषि के साथ-साथ गोपालन भी किया जाता था जिसके प्रमाण हमारे धर्म ग्रंथों से प्राप्त होते हैं। महाभारत में वर्णित श्री कृष्ण और बलराम जिन्हें गोपाल वह हलधर के नाम से संबोधित किया जाता है। परंतु जैसे-जैसे कृषि का परिवेश बदलता गया वैसे-वैसे गोपालन भी कम होता गया तथा रासायनिक खादों और जहरीले कीटनाशकों के प्रयोग को महत्व बढ़ गया। जिसके कारण संपूर्ण विश्व के जैविक और अजैविक पदार्थों का संतुलन बिगड़ता गया। इसके परिणाम वर्तमान में सभी के सम्मुख हैं।

भारत में जैविक कृषि से रोजगार की संभावनाएं

आज भले ही देश के सीमित कृषि क्षेत्र में जैविक खेती की जा रही हो। परंतु यह संभव है कि आने वाले कुछ वर्षों में देश की कृषि योग्य मृदा पूर्ण रुप से जैविक कृषि में परिवर्तित हो जाए। क्योंकि खाद्य सुरक्षा की निरंतरता बनाए रखने के लिए परंपरागत कृषि पद्धति भी आवश्यक है। आज कुछ खास क्षेत्रों में ही जैविक कृषि की जा रही है। लेकिन समय के साथ इसको बढ़ावा मिलेगा। जैविक कृषि का यही बढ़ावा एक तरह के रोजगार का अवसर उत्पन्न करता है। आने वाले समय में जैविक कृषि से संबन्धित रोजगार के अवसर कुछ इस प्रकार होंगे-

  • जिस प्रकार से जैविक कृषि को विश्व भर में बढ़ावा मिल रहा है उसके अनुसार बीजों की उपलब्धता में कमी है। इसलिए किसान बीजों का उत्पादन कर अच्छी कीमत पर बेच सकते हैं। इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी साथ ही रोजगार की भी प्राप्ति होगी। जिससे रोजगार के और नए अवसर उत्पन्न होंगे।
  • जैविक रेस्टोरेंटस खोलना, जैविक कृषक पाठशाला चलाना आदि।
  • जैविक फार्म तथा प्राकृतिक रूप से रखरखाव के स्थानों पर इको भ्रमण में लोगों की रुचि बढ़ रही है जहां लोग जैविक खाद्य पदार्थ आदि व्यवस्थाओं को पसंद करते हैं। भारत में जैविक कृषि फार्म भ्रमण का प्रचलन बढ़ रहा है।
  • जैविक कृषि संबंधी समझ विकसित करने के लिए विशेष कौशल विकास केंद्र खोले जा सकते हैं।
  • जैविक कृषि में बाजार अनुसंधान, उपभोक्ता सर्वे, प्रीमियम मूल्य, सरकारी प्रोत्साहन कार्यक्रम आदि कि सूचना कृषकों तक जल्दी पहुंचाने के लिए विशेषज्ञ सेवाओं की जरूरत है। इच्छुक एवं निपुण व्यक्तियों के लिए यह एक नया एवं अच्छा व्यवसाय हो सकता है।
  • जैविक दूध संबंधी उत्पादों के क्षेत्र में व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से रोजगार के नए अवसर उत्पन्न किए जा सकते हैं।
  • जैविक कृषि की अच्छी समझ रखने वाला व्यक्ति या संगठन एपीडा से प्रशिक्षण प्राप्त कर जैविक कृषि क्षेत्र में सेवादाता का कार्य कर सकते हैं।
  • जैविक रूप से उत्पादित वस्तुओं के प्रमाणीकरण में भी अनेक व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त होगा।
  • जैविक कृषि में फसल चक्र को अपनाया जाता है इससे कृषि क्षेत्र में वर्ष भर रोजगार के अवसर बने रहते हैं।
  • ग्रामीणों को जैविक कृषि पद्धति के उपयुक्त प्रशिक्षण दिए जाएं जिससे उनके कौशल का विकास हो। तथा बाद में इसी कौशल से किसान रोजगार के नए अवसरों का सृजन कर सकें।
  • जैविक कृषि में अनेक प्रकार की जैविक खादों का प्रयोग होता है, इन खादों के उत्पादन कार्यों से रोजगार के अनेक नए सृजन होते हैं।

जैविक कृषि के उत्पादों की गुणवत्ता

यह तो सर्वविदित सत्य है की जैविक कृषि उत्पादों की गुणवत्ता रासायनिक कृषि उत्पादों की गुणवत्ता से अधिक होती है। अनेक अनुसंधान से भी यह सिद्ध हो गया है। जैविक कृषि से उत्पादित उत्पादों में शुद्ध पदार्थ, खनिज और ऑक्सीकारक विरोधी तत्व पाए जाते हैं। जो मानव स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में सहायक सिद्ध होते हैं। जैविक कृषि उत्पादित वस्तुओं में अम्लीय तत्व कम मात्रा में प्राप्त होते हैं, नाइट्रेड की मात्रा रासायनिक कृषि की अपेक्षा जैविक कृषि में 50% कम होती है जो मानव और पशु-पक्षियों के स्वास्थ्य के लिए हितकारी होती है। जैविक रूप से उत्पादित उत्पादों में स्वाद अधिक होता है। इस प्रकार यह प्रमाणित हो चुका है कि जैविक कृषि उत्पाद रासायनिक कृषि उत्पाद से बेहतर और लाभकारी है।

निष्कर्ष-

भारत प्राचीन काल से कृषि प्रधान देश रहा है, यहाँ पर परंपरागत कृषि या जैविक कृषि प्रारम्भ से होती आ रही है। वर्तमान समय में जैविक कृषि वैकल्पिक विकास में अहम भूमिका का निर्वहन कर रही है, जहां एक तरफ जैविक कृषि के माध्यम से नए-नए रोजगार का सृजन हो रहा है, वहीं जैविक कृषि से उत्पादित उत्पादों की गुणवत्ता रासायनिक कृषि की अपेक्षा श्रेष्ठ होती है। जिससे मानव, पर्यावरण और मृदा स्वास्थ्य के लिए बेहतर है। जब सभी क्षेत्रों में उचित वृद्धि होती है तो वैकल्पिक विकास को एक प्रकार की गति प्राप्त होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जैविक कृषि वैकल्पिक विकास में सहायक होती है।

संदर्भ-सूची

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* पी-एच.डी. (शोध छात्र)

गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय

वर्धा, महाराष्ट्र- 442001

E-mail: ashishpatel3135@gmail.com

Mob. 9839853135

‘‘स्त्री-मुक्ति की राहें’’ सपने और हकीकत-डॉ. रामचन्द्र पाण्डेय

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‘‘स्त्री-मुक्ति की राहें’’ सपने और हकीकत

डॉ. रामचन्द्र पाण्डेय

हमारी परम्परा और संस्कृति में स्त्री सदैव ‘देवि, माँ सहचरि तथा अपने सभी रूपों में सम्मान और श्रद्धा की ही अधिकारिणी रही है। उसके महत्त्व को, उसकी अस्मिता को हमेशा पुरुषों के महत्व और उसकी अस्मिता से ज्यादा तरजीह दी जाती रही है। ‘विनायक’ से पहले ‘वाणी’ (सरस्वती) ‘परमेश्वर’ से पहले ‘पार्वती’, (पार्वती परमेश्वरौ) राम से पहले सीता, कृष्ण से पहले राधा की स्तुति हमारे अपने भारतीय समाज की तथा उसकी परम्परा और संस्कृति की एक ऐसी जीवन्त और प्राणवान चिन्तनधारा रही है जिससे आज समूचे विश्व को आलोक ग्रहण की ज़रूरत है। नारी स्वतंत्रता की बात करने वाले तथा स्वतंत्रता के आधार उसकी देह का बाज़ारीकरण कर उसकी आत्मा, शरीर तथा अस्मिता को रौंदने वाले देह व्यापारी आज अपने आपको विकसित और सभ्य उद्घोषित कर आत्ममुधता के शिकार होकर विश्व को गुमराह कर रहे हैं। नारी की शक्ति को, उसकी रचनात्मक तथा सृजनात्मक भूमिका को उसके पूरे सम्मान के साथ प्रतिष्ठित न करने वाला समाज कभी सभ्य समाज हो ही नहीं सकता, विकसित समझना तो उसकी सबसे बड़ी भ्रान्ति होगी।

यह सच है कि लगातार विदेशियों के आक्रमण और क्रूर दमन के परिणामस्वरूप हमारे अपने समाज में भी ऐसी बहुत सी अधोगामी रूढ़ियाँ प्रचलित हो गयीं थीं जो स्त्रियों के प्रति सर्वथा क्रूर और अमानवीय थीं। तमाम प्रकार के अमानवीय प्रतिबंधों ने भारतीय समाज की स्त्रियों के जीवन को नारकीय तथा यन्त्रणापूर्ण बना दिया था। लेकिन हमारे मनीषियों और युग-प्रेरकों ने अपनी चिन्तनशील तथा वैचारिक ओजस्विता से इन सारी कुप्रथाओं को भस्मीभूत कर दिया जिसके परिणामस्वरूप आज हमारा भारतीय समाज स्त्रियों के सम्मान के लिए, उसकी अस्मिता के महत्त्व तथा स्वीकरण के लिए कृतसंकल्प है। लेकिन चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुईं। हमें और सतर्क और सचेत होने की ज़रूरत है।

इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि समय-समय पर अनेक ऐसी अमानुषिक ताकतें उभरी हैं जो मुक्ति की बात कर परोक्ष रूप से एक भयंकर शोषण के षड्यंत्र चक्र को मजबूत आकार तथा आधार देती रही हैं।

आज बाज़ारवाद ने भी स्त्रियों की स्वतंत्रता की आड़ में उसकी देह को अधिकतम लाभ देने वाली उपभोग की वस्तु बनाकर रख दिया है। एक ऐसा भयंकर षड्यंत्र चल रहा है जो स्त्री की देह तथा उसकी आत्मा का मूल्य लगाकर उन्हें अपनी हवस का शिकार बना रहा है तथा उनसे पूँजी का भी सृजन कर रहा है। और इस पूँजी से युवतियों की एक लम्बी कतार भी खड़ी कर रहा है। इस बाज़ारवाद ने स्त्रियों के बदन से कपड़े भी उतारे हैं और उसकी चेतना तथा आत्मा के लज्जाशील वस्त्रों को भी तार-तार कर दिया है। बाज़ार का दिखावा ऐसा है, दम ऐसा भरा जा रहा है जैसे वे (बाज़ार) कोई समाज सुधारक हों, स्त्री हित के मसीहा हों। बाज़ार ने जो स्त्री को उसके आवरणों से मुक्त किया है वह स्त्री स्वतंत्रता की कामना से नहीं अपितु उसकी देह के अबाध इस्तेमाल के लिए। यह बाज़ारवाद का ही प्रभाव है कि आज स्त्री की चरित्रहीनता को उसकी प्रगतिशीलता का दूसरा रूप ही मान लिया गया है। यह न तो समाज-हित में है और न ही स्त्री-हित में। चरित्रहीनता और पतन चाहे स्त्री का हो या फिर पुरुष का वह कभी स्वीकरणीय नहीं, समाज के लिए हितकारक नहीं। निदा फाज़ली के शब्दों में-

‘‘वो किसी एक मर्द के साथ

ज्यादा दिन नहीं रह सकती

ये उसकी कमजोरी नहीं/सच्चाई है

लेकिन जितने दिन वो जिसके साथ रहती है

उसके साथ बेवफाई नहीं करती

उसे लोग भले ही कुछ कहें

मगर!!

किसी एक घर में

जिन्दगी भर झूठ बोलने से

अलग-अलग मकानों में सच्चाइयां बिखेरना

ज़्यादा बेहतर है।’’1

दाम्पत्य को माधुर्यपूर्ण बनाकर घर, परिवार, समाज और राष्ट्र की शिराओं में स्वच्छ लहू बनकर संचरण करना नारी जीवन का यथार्थ हो सकता है न कि अलग-अलग मकानों में बेहयाई की सच्चाइयाँ बिखेरना।

आज नारियाँ समाज के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी रचनात्मक भूमिका निभा रही हैं। वे पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं बल्कि कई मामलों में तो पुरुषों को कहीं पीछे भी छोड़ रही हैं। समाज और राष्ट्र का भी यह दायित्व है कि वे एक ऐसे स्वस्थ समाज का सृजन करें जिसमें स्त्रियों के आगे बढ़ने के अवसर भी सृजित हों तथा उनकी सुरक्षा का भी पूर्ण प्रबंध हो। आज स्त्रियों के आगे बढ़ने के अनेक अवसर तो उपलब्ध हैं लेकिन उनकी सुरक्षा का पूर्ण प्रबंध नहीं। परिणामतः स्त्रियों के शोषण के कई दरवाजे भी खुल गये हैं। गाँव से लेकर महानगर तक के कैरियर के सफर में कई चरणों में उन्हें अपनी कीमत चुकानी पड़ती है, कई चरणों में उनका भयंकर शोषण होता है। आये दिन राष्ट्र में होती बलात्कार की घटनाएँ हों या हिंसा तथा उत्पीड़न की घटनाएँ किसी भी समाज तथा राष्ट्र के लिए भयंकर कलंक से कम नहीं। समाज के हर व्यक्ति को आगे बढ़कर महिलाओं की सुरक्षा के लिए कृतसंकल्प होना पड़ेगा, उनके आगे बढ़ने के सपने को पूरा तथा उनके सफर को सुरक्षित बनाना पड़ेगा। तभी हम एक सभ्य समाज का सृजन कर पायेंगे और एक विकसित राष्ट्र का भी और यह नारी जीवन में बदलाव लाकर ही संभव हो सकेगा। केवल दिखावे की भाषणबाजी और नकली तालियाँ बटोरने से समाज में कोई बदलाव नहीं आने वाला। निर्मला पुतुल की ये पंक्तियाँ हमें सावधान करने के लिए पर्याप्त हैं-

‘‘…..एक बार फिर

ऊँची नाक वाली अधकटे ब्लाऊज पहने महिलाएँ

करेंगी हमारे जुलूस का नेतृत्व

और प्रतिनिधित्व के नाम

मंचासीन होंगी सामने

एक बार फिर

किसी विशाल बैनर के तले

मंच से खड़ी माइक पर वे चीखेंगी

व्यवस्था के विरुद्ध

और हमारी तालियाँ बटोरते

हाथ उठाकर देंगीं

साथ होने का भरम।।2’’

साथ होने का नकली भरम पैदा करने वालों से सावधान होगा, नहीं तो मानव विरोधी यह बाजारवादी संस्कृति जवान लड़की को अपने गंदे मंसूबों से खेलने का एक खिलौना ही बना लेगी और जवानी ढलते उन्हें सत्ता के अन्य दलालों की रखैल बनाकर तथा खुद के लिए जवान होती लड़कियों की एक नई कतार खड़ी कर लेगी। इससे उनका सुधरा जीवन तो और भी अधिक नारकीय और त्रासदपूर्ण हो जायेगा। ‘त्रिभुवन की एक कविता अवलोकनीय है’ जो बाज़ारीकरण के घिनौने रूप को बयाँ करने में पूर्णतः सक्षम है-

‘‘फार्म हाउस से वह होटल-होटल पहुँचती है

इस लंपट से उस लंपट

इस देह से उस देह के पुल को

पार करती एक गंदगी नदी बनती है

…..और एक दिन

फूटता है इच्छाओं के कण्ठ से आत्र्तनाद

और झाड़़ती है इच्छाएँ अपने अधोवस्त्र

तो पटपट गिरने लगते हैं

सेठ, साहूकार, प्रशासनिक, पुलिस अधिकारी

राजनेता, न्यायाधीश, समाजसेवी,

मीडियाकर्मी धर्माधिकारी।’’3

नारी की स्वतंत्रता का कर्कश स्वरों में उद्घोष करने वाले नकाबपोश भेड़िये पर्दे के पीछे उनकी देह का ही उपभोग कर रहे हैं। इसके पीछे एक लम्बा नेटवर्क काम कर रहा है। आज नारी को उन्नति के सपने दिखाकर गुमराह किया जा रहा है। नारी को अपनी उन्नति के लिए आज ऐसे संकरे रास्तों से गुजरना पड़ रहा है जहाँ आगे बढ़ने के लिए उसे अपने बदन से कपड़े उतारने ही होंगे, कदम-दर-कदम उसे जिस्म के भूखे भेड़ियों को अपना गर्म गोश्त पेश करना ही होगा, तभी ये बाज़ारवादी भेड़िये नारी को प्रगतिशीलता, आधुनिकता (माडर्निटी) तथा स्वतंत्रता का तमगा देते हैं और तकलीफ की बात तो यह है कि कुछ अतिशय महत्त्वाकांक्षी तथा कुछ मज़बूर नारियों ने भी सफलता के इन घिनौने और शार्टकट रास्तों को ही इस प्रकार वाजिब और सही करार दिया है जैसे यह सचमुच उन्हें मुक्ति के द्वार तक ले जाने में सक्षम हो। संकट तब और अधिक भयावह और खतरनाक हो जाता है जब उसे जीवन का सहज अंग तथा वास्तविक नियति ही मान लिया जाये। आज की अधिसंख्य नारियों ने भी अपनी देह के बाज़ारीकरण को अपनी वास्तविक नियति ही मान लिया है और इस पर उन्हें कोई पछतावा नहीं क्योंकि उनकी नज़र में तो यही माडर्निटी है, यही स्वतंत्रता है, यही उनकी मुक्ति की राहे हैं। आज बाज़ारीकरण ने नारी की देह के शोषण-दर-शोषण को इतना अनिवार्य तथा आवश्यक बना दिया है कि उसे अपनी देह ही नहीं आत्मा की गुलामी तक का अहसास नहीं। पैसे की चकाचैंध ने उन्हें इतना अंधा बना दिया है कि वे अपनी अस्मिता को बेंचकर भी अपनी मुस्कान से बाज़ारी संस्कृति को गुलजार कर रहीं हैं। बाज़ारू संस्कृति न केवल नारी देह का उपभोग करती है, उससे पूँजी सृजित करती है बल्कि उसकी मुस्कान, उसकी हँसी, उसके रुदन तथा उसके आँसुओें से भी मुनाफाखोरी करती है।

‘‘अब महज़ बस्ती-भर नहीं रह गया

हमारा कुरूवा

शहर में दूर तक फैले बाजार का

एक हिस्सा बन गया है यह

….यहां दारू, ताड़ी, हड़िया ही नहीं बिकता

ठंडे और गर्म गोश्त भी बिकते हैं

बिकती है हंसी-ठट्ठा और खिलखिलाहटें

ठंडी दिनचर्या से बनी

गर्म-गर्म रातें।4’’

आज नारी को सशक्त बनाने की कामना रखने वाले नीति-निर्देशकों (निर्माताओं) के लिए यह एक बड़़ी चुनौती है कि वे नारी को किस प्रकार बाज़ारीकरण की उपभोगवादी, देह-व्यापारी संस्कृति से सुरक्षित करेंगे, बिना उसकी प्रगति की राहों को अवरुद्ध किये। और नारियों को भी अपनी देह को उपभोग की ‘‘वस्तु’’ बनाने वाले फूहड़ ‘कल्चर’ के ठेकेदारों से खुलकर संघर्ष करना होगा, उनके गंदे मंसूबों को नाकामयाब बनाना होगा, स्वयं को प्रलोभनों से मुक्त रखकर। क्योंकि उपभोक्तावादियों के लिए स्त्री एक शरीर है और उसके शरीर का इस्तेमाल भोग की वस्तु की तरह ही करना है। तभी तो नारी मुक्ति के फायदे हैं।

‘‘अच्छा है मुक्त हो रही हैं/मिल सकेंगी/स्वच्छन्द अब संभोग के लिए’’5 आज हमें जहाँ सामाजिक स्तर पर नारी को तमाम बँधनों से मुक्त करने की ज़रूरत है वहीं स्त्री की स्वच्छन्दता की आड़ में उसकी देह को संभोग का साधन बनाने वाली उपभोक्तावादी बाज़ारीकरण की संस्कृति से भी उसे बचाने की ज़रूरत है। एक तरफ उन्हें गर्भ में ही मार दिये जाने से बचाना होगा तो दूसरी ओर सख्त कानून बनाकर आये दिन होते बलात्कार और छेड़खानी से मुक्त बनाना होगा। उन्हें प्राप्त संवैधानिक अधिकारों का क्रियान्वयन प्रभावशाली तरीके से करना होगा, जिससे नारी प्रगति के स्वर्णिम शिखरों तक की अपनी यात्रा को बिना किसी भय के, बिना किसी अवरोध के तय कर सकें, अपनी सम्पूर्ण रचनात्मक शक्ति के साथ। नारी के सशक्तीकरण से ही राष्ट्र के सशक्तीकरण की प्रक्रिया पूर्ण होगी। आज हमें नारी मुक्ति की ऐसी राहें तलाशनी है जिसमें उनकी ख्व़ाबों की दुनिया एक हकीकत की खू़बसूरत दुनियाँ में तब्दील हो सके।

संदर्भ ग्रन्थ सूची-

  1. सफर में धूप तो होगी, निदा फाज़ली, पृ0सं0-146 ।

  2. आज की कविता, विनय विश्वास, पृ0सं0-187।

  3. इन्द्रप्रस्थ भारती, अप्रैल-जून, 2004, पृ0 सं0-52 ।

  4. अपने ही घर की तलाश में, निर्मला पुतुल (संथाली से अनुवाद अशोक सिंह), पृ0सं0-81 ।

  5. वसुधा 59-60, स्त्री मुक्ति का सपना, अक्टूबर 2003 से मार्च 2004, पृ0सं0-145।

डॉ. रामचन्द्र पाण्डेय

विभागाध्यक्ष

हिन्दी विभाग

ईष्वर सरन डिग्री कालेज

इलाहाबाद

मो. 8853466968

‘‘आवारा लड़की को पता ही नहीं था कि आवारा कैसे हुआ जाता है?”- मैत्रेयी पुष्पा

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‘‘आवारा लड़की को पता ही नहीं था कि आवारा कैसे हुआ जाता है?”- मैत्रेयी पुष्पा

शोध-विषय “समकालीन हिंदी लेखिकाओं की प्रतिनिधि आत्मकथाओं में अन्तर्निहित अनुभूतियाँ” के अन्र्तगत अनुशीलन हेतु चयनित आत्मकथा खण्ड-1 ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ तथा खण्ड-2 ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ की रचनाकार हिंदी साहित्य जगत् में नारी-चेतना की सशक्त वाहिका श्रीमती मैत्रेयी पुष्पा जी से डॉ. वंदना कुमार एवं राजेन्द्र कुमार की पुरखौती मुक्तांगन, नया रायपुर (छ.ग.) में आयोजित रायपुर साहित्य महोत्सव 2014 में हुई बातचीत के प्रमुख अंश

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1. डॉ. वंदना कुमार- आपकी आत्मकथा खण्ड-1 ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ तथा खण्ड-2 ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ के शीर्षक चयन (नामकरण) के क्या कारण रहें हैं, किनसे प्रभावित होकर यह शीर्षक चयन आपने किया; इन शीर्षकों का पाठक द्वारा क्या अर्थ निकाला जावे। शीर्षक से आपका क्या अभिप्राय है ?

श्रीमती मैत्रेयी पुष्पा जी-‘कस्तूरी कुण्डल बसै‘ की तो नायिका ही ‘कस्तूरी‘ है। इसलिए उसका नाम ‘कस्तूरी कुण्डल बसै‘ रखा। वही अंत में अपनी बेटी के अंदरूनी आत्मा में भी बसी हुई है, जबकि बहुत विरोध है आपस में, माँ-बेटी में।

‘गुड़िया भीतर गुड़िया‘ शीर्षक इसलिए दिया कि एक स्त्री होती है, जो ऊपर से दिखाई देती है, जिसको हम गुड़िया जैसी गूँगी समझते हैं, गुड़िया जैसी भोली समझते हैं, गुड़िया जैसी सुन्दर समझते हैं। जहाँ रखो वहीं रह जाएगी, जहाँ उठाओ उठ जाएगी, वहाँ बिठाओ बैठ जाएगी, लेकिन ऐसा होता नहीं है। उसके अंदर एक स्त्री और रहती है, जो सोचती है, समझती है, जो अपनी चेतना की बात करती है। चेतना की बात जब नहीं करने दी जाती, तब विरोध करती है। वो है ‘गुड़िया भीतर गुड़िया‘; इसलिए रखा। उसमंे जो एक लेखिका मैत्रेयी है, एक पत्नी है, वो घर में रहती है, आराम से रह रही है, सुविधा से भी रह रही है जैसे आम औरतें रहतीं हैं, वैसी ही है, लेकिन उसके अंदर जो एक चेतना जागी है। नहीं, मैं ये नहीं हूँ, मैं कुछ और भी हूँ; तो उसको जब दबाया जाता है तब वो गुड़िया के भीतर वो दूसरी गुड़िया जो सोचना भी जानती है, समझना जानती है, जो चेतना संपन्न है, जो कुछ करना चाहती है।

2. डॉ. वंदना कुमार- आपने आत्मकथा का अध्यायीकरण एवं शीर्षक परंपरा विरुद्ध काव्यात्मक एवं मुहावरेदार दिया है, इसके क्या कारण रहे हैं ?

मैत्रेयी पुष्पा- इसके कारण है कि मुझे, जो मैं लिख रही थी, वो जो साफ़गोई, ईमानदारी जो ज़रूरी होती है; कबीर से मिलता-जुलता दिखाई दिया। दोनों आत्मकथा के शीर्षक मैंने कबीर से लिये हैं, उसकी ईमानदारी, साफ़गोई, निडरता।

3. राजेन्द्र कुमार- आपको आत्मकथा लिखने का विचार कब आया? जब आपने आत्मकथा लिखना प्रारंभ किया तो किन समस्याओं से रूबरू होना पड़ा ?

मैत्रेयी पुष्पा- नहीं, उसमें समस्या नहीं आई मुझे। न, बिल्कुल नहीं आई। ये भी नहीं आई कि क्या लिखूँ, क्या नहीं? ऐसा कुछ नहीं था, सब साफ़ था। लिखने का विचार- पाठकों नेे कहा, यूनिवर्सिटीज से प्रोफेसरों ने, शिक्षकों ने, छात्रों ने कहा कि आप लेखिका कैसे बनी? ये बताइए। ये हमारे लिए बहुत लाभदायक होगा। मैं लखनऊ गई एक शादी में, तो वहाँ पर कुछ औरतें मेरे से मिलने आई। मैंने कहा मिलने क्यों आए, मैंने तो बताया ही नहीं किसी को, मैं तो शादी में आई हूँ, वे बोलीं हम आप को देखने आए हैं। मैंने कहा कि किसलिए? कहने लगी कि हम आपको देखने आए हैं और देख भी लिया हमें भी अभी देर नहीं हुआ अगर कुछ करना चाहें तो।

4. राजेन्द्र कुमार– आपकी आत्मकथा प्रकाशित होने पर बोल्ड लेखन का दुष्प्रचार किया गया, जबकि सूक्ष्म अध्ययन से प्रतीत होता है कि उसकी अभिव्यक्ति पारिस्थितिक प्रसंगानुकुल अनिवार्य थी। दुष्प्रचार के लिए कौन जिम्मेदार हैं ?

मैत्रेयी पुष्पाजलने वालों को। नहीं, दुष्प्रचार के लिए उनको जो ये साहस नहीं कर सके, वे हिम्मत नहीं कर सके, कि अपने-आप को ही निशाने पर रख दें, पात्रों को तो हम ख़ूब निशाने पर रखते रहते हैं, उपन्यासों में। अपने-आप को रखो निशाने में, तब पता चलेगा। तो उन लोगों को लगा कि ये सब क्यों लिख रही हैं? लगता है आपस में आपसी ईष्र्या-द्वेष भी तो होते हैं।

5. राजेन्द्र कुमार– प्रायः महिला आत्मकथाओं की विषय-वस्तु घर, परिवार की चारदिवारी होती है। आपकी आत्मकथा में घर-परिवार की समस्याओं का चित्रण कम है, क्या कारण हैं ?

मैत्रेयी पुष्पा-इसलिए कि घर-परिवार में बचपन में रही नहीं। दूसरों-दूसरों के घर-परिवार में रही। नम्बर दो जहाँ से जो लड़कियाँ होती हैं, आपस में सहेलियाँ होती हैं और घर-परिवार की बातें करती हैं। ऐसा मेरे साथ कुछ नहीं था। मैं लड़कों के साथ रहती थी। लड़कों के ही साथ पढ़ती थी। ब्व.मकनबंजपवद में पढ़ी हमेशा और हमें साधन नहीं थे, तो एक कमरा ले लेते थे, तीन-चार लड़के रह जाते थे और एक मैं रह जाती थी। लड़कियाँ, घर-परिवार कहाँ से आ जाए? कोई लड़का जा रहा है और मैं पैदल जा रही होती तो ‘रूक-रूक‘, साईकिल में बैठ जाती थी, मुझे भी ले चल। ये बी.ए., एम.ए. की बात है, कोई छोटेपन की बात नहीं है। तो जो लड़कियाँ उन घरों से आती थीं, जिन्हें तुम कह रहे हो घर-परिवार, सभ्रांत लोग। कहतीं थीं, कितनी आवारा लड़की आ गई है, हमारे काॅलेज में ? मैंने एक वाक्य लिखा है-‘‘आवारा लड़की को पता ही नहीं था कि आवारा कैसे हुआ जाता है?‘‘ मैं तो अपना काम कर रही हूँ। काॅलेज जाना है।

6. डॉ. वंदना कुमार– आपकी आत्मकथा के इन दोनों खण्डों में आपके जीवन के 67 वर्षों का लेखा-जोखा है। बचे जीवन के लिए क्या आत्मकथा के तीसरे खण्ड लिखने की मंशा है?

श्रीमती मैत्रेयी पुष्पा जी- अभी नहीं है। अब बचा ही क्या है? सब तो लिख दिया। रहा-सहा स्टेज में उसे बोल दिया।

 

7. डॉ. वंदना कुमार- ज़्यादातर लेखिकाओं में आत्मकथा लेखन में अरुचि के क्या कारण हैं?

मैत्रेयी पुष्पा- अरूचि नहीं है, डर है। अरूचि क्यों होगी? जब लिख रहीं हैं, अभिव्यक्त कर रहीं हैं तो क्यों होगी? एक डर है, एक अपने परिवार की वो बातें खोलने में डर है, जिससे परिवार की थोड़ी-सी तौहीन होती है। उन चीज़ों को बोलने का डर होता है। अच्छा-अच्छा तो सभी बनना चाहते हैं।

8. राजेन्द्र कुमार- आत्मकथा लेखन के लिए लेखिकाओं को किस प्रकार पे्ररित किया जाए, जिससे उनकेे शोषण एवं दोहन की सच्चाई समाज के सामने आ सके ?

मैत्रेयी पुष्पा- इसके लिए प्रेरित नहीं किया जा सकता। ये तो अगर वो ईमानदार और सच्ची हैं, लेखन के प्रति तो खुद लिखेंगीं। अच्छा! लिखती हैं वो, उपन्यास के जरिए लिखती हैं, ऐसा नहीं है, उन्हीं का चिट्ठा होता है वो, लेकिन वो अपने ऊपर नहीं, उपन्यास के जरिए लिखती हैं। पुरूष लिखते हैं, उपन्यास के जरिए। कितने पुरूषों ने आत्मकथा लिखी? राजेन्द्र यादव ने नाम बदल-बदल के लिखी, हिम्मत नहीं थी। ‘मुड़-मुड़ के देखता हूँ‘।

9. राजेन्द्र कुमार- महिलाओं की आत्मकथाएँ विभिन्न प्रपंचों द्वारा दबा दी जाती है या तो दुष्प्रचारित की जाती है। आपकी आत्मकथा के साथ भी अधिकाधिक दुष्प्रचार किया गया। वर्तमान परिदृृश्य में इससे कैसे निपटा जाना चाहिए ताकि महिलाएँ आत्मकथा लिखने हेतु हिम्मत जुटा सकें ?

मैत्रेयी पुष्पा- दुष्प्रचार तो किसी भी चीज़ का होता है, तो ये थोड़ी है कि हिम्मत हार जाओ। हौसले के साथ खड़े रहो। होना तो ये चाहिए कि अगर एक स्त्री ने लिखी है एक आत्मकथा तो उससे हिम्मत ले लो। क्योंकि हर स्त्री की आत्मकथा एक अपने आप में नया उपन्यास होगा और सच्चा होगा, ईमानदार होगा।

10. राजेन्द्र कुमार- आत्मकथा में आपकी बेबाक अभिव्यक्ति के कारण आत्मकथा सत्यता के अत्यधिक निकट प्रतीत होती है तथा यह विधा समृद्ध हुई है। आपकी इस बेबाक अभिव्यक्ति के पीछे का संबल कौन हैं ?

मैत्रेयी पुष्पा- संबल, लेखन में संबल नहीं हुआ करते। लेखन में तो कलम ही संबल है। और आत्मकथा ऐसी चीज़ है, इसे जब लिखते हैं, तो डर, भय, दहशत इन सबको एक किनारे करके लिखते हैं। कहते हैं ना ‘शीष कटाऊ भई धर्म लाखों उपाय‘ वो सोच लेते हैं। बीच में एक बात कहँूगी, जो मेरे साथ स्त्रियों ने लिखी आत्मकथाएँ, उनके साथ ये दिक्कत नहीं थी, जो कि मैंने लिखा भी है ‘गुड़िया भीतर गुड़िया‘ में कि उन्हें पति की दिक्कत नहीं थी। किसी का पति रहा नहीं, कोई पति से अलग हो गई थीं। एक मैं थी जो पति के साथ थी, मेरे डर तो दोगुने-चैगुने होने चाहिए ना, लेकिन फिर भी हिम्मत बाँधी, जो होगा देखा जाएगा।

11. राजेन्द्र कुमार-आत्मकथा लिखने के लिए आपको किसने प्रेरित किया और किस प्रकार मदद की ?

मैत्रेयी पुष्पा- पहली वाली तो लिखी, ऐसे कि ऐसे ही लिखना था। ‘गुड़िया भीतर गुड़िया‘ का ही सबसे ज़्यादा परेशानी थी। ये मुझे किसी ने प्रेरित नहीं किया, जो मेरी पाठिकाएँ थीं, उन्होंने प्रेरित किया, जिन्होंने ‘कस्तूरी कुण्डल बसै‘ पढ़ा, उनके मेरे पास संदेश आए कि हम देखना चाहते हैं कि आप लेखिका कैसे बनीं। आप लिखिए उन्हें।

12. राजेन्द्र कुमार-आत्मकथा लिखने के लिए परिवार का सपोर्ट एक अनिवार्य कारक है। परिवार में सर्वाधिक मदद किसने की ?

मैत्रेयी पुष्पा- किसी ने नहीं। कोई नहीं करेगा। आत्मकथा लिखने के लिए परिवारी-जन कोई नहीं करेगा, कितना ही प्यारा हो।

13. राजेन्द्र कुमार- समकालीन महिला आत्मकथाओं में से किस रचना को आप ‘मिल का पत्थर’ मानती हैं, जिसकी अभिव्यक्ति से आप प्रभावित हुई हैं ?

मैत्रेयी पुष्पा- किसी को नहीं, सब में चार सौ बीसियाँ लिखीं हैं।

14. राजेन्द्र कुमार-पुरूषों के द्वारा लिखी आत्मकथा में किसकी रचना आपको बेहद पसंद है?

मैत्रेयी पुष्पा- बेचन की ‘अपनी खबर‘।

15. राजेन्द्र कुमार-हिंदी आत्मकथा लिखने वाली लेखिकाओं में किसकी रचना आपको बेहद पसंद आयी ?

मैत्रेयी पुष्पा- कुछ भी नहीं ।

16. राजेन्द्र कुमार- आपके पिता जी का असामयिक निधन (35 वर्ष की उम्र में) होने के वक्त आपकी उम्र महज़ 18 माह थी। क्या इस पितृसत्तात्मक समाज में आपको उनकी कमी नहीं खली? यदि कमी का अहसास हुआ तो इसकी प्रतिपूर्ति किसके माध्यम से हुई?

मैत्रेयी पुष्पा- बहुत खली, कमी तो खलती है, बचपन जो अनाथ हो गया, क्योंकि पिता खतम हो गए। माँ जो है, छोड़ के चली गईं, पढ़ने-लिखने, नौकरी करने। कमी तो खली, लेकिन इसकी पूर्ति किसने की? इसकी पूर्ति कभी माँ ने की, कभी मैंने ख़ुद कर ली। जो बच्चे अनाथ-असहाय जैसे होते हैं, वो मैच्योर भी जल्दी हो जाते हैं, उनका बचपन खतम हो जाता है, जल्दी। अपनी रक्षा करना, अपने को सम्हालना, ख़ुद समझ लेते हैं।

17. राजेन्द्र कुमार- कहते हैं कि हर महिला की सफलता के पीछे किसी पुरुष का हाथ होता है। आप इसका श्रेय किन्हंे देना चाहेंगी? पिता/पुत्र/पति/मित्र।

मैत्रेयी पुष्पा- ऐसा कुछ नहीं। उस पुरूष का तो बिल्कुल नहीं, जिसका लोग कहते हैं। राजेन्द्र यादव का हो सकता है। उन्होंने मेरे साथ बहुत मेहनत की। मुझे पढ़ाया। ना पिता, ना पुत्र, वे मेरे एक गाइड थे।

18. राजेन्द्र कुमार- आपको हिंदी-साहित्य संसार में स्व. श्री फणीश्वरनाथ रेणु तथा श्री रांगेय राघव के समकक्ष स्थान प्राप्त है। ‘आंचलिकता का पुट’ आपके साहित्य की विशेषता है। इसकी प्रेरणा कहाँ से मिली ?

मैत्रेयी पुष्पा- जीवन ऐसा था, ग्रामीण जीवन था, प्रेरणा इसकी कहीं से नहीं मिली। लेकिन जीवन ग्रामीण था, तो ग्रामीण मुहावरे में ही सारा लेखन किया मैंने।

19. राजेन्द्र कुमार-वर्तमान में ‘नारी-विमर्श’ के सबसे बड़े पैरोकार के रुप में आपका नाम लिया जाता है; ‘नारी-विमर्श‘ पर इतना अधिक साहित्य लिखे जाने के बावजूद महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं हो पा रहा है। इसके क्या कारण हैं ?

मैत्रेयी पुष्पा- ‘नारी-विमर्श‘ का नाम तो बेकार लिया जाता है। मैंने ‘नारी-विमर्श‘ के लिए लेखन नहीं किया था। ना मैं जानती थी ‘नारी-विमर्श‘। ‘नारी-विमर्श‘ करने से स्त्रियों की स्थिति बहुत अच्छी हो जाएगी, ऐसा कह नहीं सकते, लेकिन हाँ, थोड़ी सी एक चेतना तो जागती है, उसे पढ़कर कि हमारे अधिकार क्या होने चाहिए? हमारा हक़ क्या होना चाहिए?

20. राजेन्द्र कुमार-आपकी सबसे पसंदीदा रचना कौन-सी है ?

मैत्रेयी पुष्पा- सबसे अच्छी कौन-सी है? ये तो पाठक तय करेंगे। ये तो पाठक ही बता सकते हैं।

21. राजेन्द्र कुमार-आपकी कौन-सी रचना आपको सर्वाधिक प्रिय है, जिसे ख्याति या प्रसिद्धि न मिलने का आपको मलाल है ?

मैत्रेयी पुष्पा- नहीं, मलाल तो नहीं है, पर मैंने कहा था कि चाक पसंद है, सबसे ज़्यादा, लेकिन विवादित रही, बदनाम रही वो किताब और आज भी है, लेकिन सबसे अधिक बिकती भी वही है।

22. राजेन्द्र कुमार-एक पसंदीदा लेखक और लेखिका की रचना जो आपको बेहद पसंद हो।

मैत्रेयी पुष्पा- पसंदीदा लेखक में फणीश्वर नाथ ‘रेणु‘ का उपन्यास ‘मैला आँचल‘ और पसंदीदा लेखिका में बंगाल की हो सकती हैं मैत्रेयी देवी की ‘न हन्यते‘ (उनकी आत्मकथा है)।

23. राजेन्द्र कुमार- समाज में महिलाओं की नारकीय अवस्था के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या आपको नहीं लगता इस क्षेत्र में सरकारी प्रयास का अभाव है ?

मैत्रेयी पुष्पा- नहीं, सरकार वहाँ क्या करेगी? इसके लिए एक तो पितृसत्ता ज़िम्मेदार है, दूसरा जो पितृसत्ता के सरपरस्त हैं, वो स्त्रियाँ जिम्मेदार हैं, कि हम बेटे का पक्ष लें, हम पति को भी रूष्ट नहीं कर सकते। फिर हम आदर्श नारी कैसे बनंेगे? आदर्श नारी तो बनना ही चाहिए। बनी रहो, मैं कब मना कर रही हूँ ?

24. राजेन्द्र कुमार- महिला आरक्षण विधेयक पारित होने से क्या महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा? आरक्षण विधेयक पास नहीं हो पाने का कारण क्या महिला जागरुकता की कमी नहीं है ?

मैत्रेयी पुष्पा- आरक्षण मिलने से होगा, लेकिन बहुत धीमा होगा, क्योंकि आरक्षण मिलने के बाद भी स्त्रियाँ बोल नहीं रही हैं। अभी भी पुरूष ही काम कर रहे हैं। म्अमद हमारे यहाँ देखो, असेम्बली वैगरह में जो चुन के आतीं हैं, संसद में देख लो, कितनी स्त्रियाँ बोल रहीं हैं? सुषमा स्वराज इतनी जोर दहाड़ती थीं, अब चुप हैं। बोलती भी हैं, तो एक-दूसरे पर छिटा-कसी ही करते हैं। कोई भी जनता के लिए कुछ नहीं। आपस में एक-दूसरे की बुराई करते रहते हैं। इसलिए ये सब चीजें सफल नहीं हो पाती।

25. राजेन्द्र कुमार- एक महिला, दूसरी महिला का पक्ष क्यों नहीं लेती? क्योंकि सास एक प्रमुख कारण है जो भ्रुण हत्या, दहेज प्रथा एवं अन्य कुरीतियों की पक्षकार होती हैं।

मैत्रेयी पुष्पा- फिर वही कहूँगी कि वो अपने को बचाने के लिए नहीं करती हैं, ये वही पुरूष सत्ता को बचाने के लिए करती हैं और उसी के पक्ष में बोलती हैं। बहु आने पर सास ऐसी क्यों हो जाती है? क्योंकि बेटे को छिनने का डर लगता है। मान लो बॉस है ऑफिस में, बॉस का पक्ष मेरे को मिले, इसलिए दूसरी स्त्री को नीचे गिराना चाहेगी तो वही हो गया ना सरपरस्ती पुरूषों की हो गई।

26. राजेन्द्र कुमार- प्रायः देखा जाता है कि पुत्र की लालसा में कई पुत्रियों को जन्म दे दिया जाता है। इसका महिलाएँ क्यों विरोध नहीं कर पातीं? बिना सहमति के भ्रुण हत्या का प्रावधान नहीं है।

मैत्रेयी पुष्पा- ठीक बात है तुम्हारी, लेकिन दबाव समाज के इतने होते हैं कि वो नहीं करती मना, क्योंकि उसकी जो जिं़दगी कितनी अवहेलना, कितना अपमान होता है। अब शहरों में नहीं है, लेकिन गाँवों में अभी भी बहुत है। शहरों में भी है कि नहीं ये कह नहीं सकती।

27. राजेन्द्र कुमार- यदि आपको राष्ट्रीय महिला आयोग का अध्यक्ष बनाया जावे तो आपका पहला कदम क्या होगा ?

मैत्रेयी पुष्पा- मैं बनूँगी ही नहीं, नाम चल रह था। फँस गई थी जैसे, उनकी मदद करने के लिए। उन्होंने कहा कि हमारा सहयोग कर दो। कुछ पता ही नहीं था, कितनी तनख़्वाह वैगरह? मैंने कहा-मैं नहीं लूँगी। मना कर दिया था। केजरीवाल ने बयान भी दिया था कि एक रूपया में भी आने को तैयार हूँ। मैंने सोचा कि अगर तनख़्वाह दी इन्होंने तो वो जो चाहेंगे वो कराएँगे। मैं लोभी, लालच की मारी छोडूंगी नहीं, उस नौकरी को। इसलिए भाग लो, अपना थैला उठाके। हम जैसे आदमी के लिए मुश्किल है।

डॉ.वंदना कुमार, शोध-निर्देंशक एवं सहायक प्राध्यापक (हिंदी), शासकीय नागार्जुन स्नातकोत्तर विज्ञान महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.) मो. नं.- 9425207186 E-mail –vkengrani@gmail.com

राजेन्द्र कुमार, शोधार्थी (हिंदी), पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)

मो. नं.- 7489407563 E-mail – rajendrakumar_bhardwaj@yahoo.com

‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की शिक्षक, शिक्षा और शिक्षार्थी ही आधार-प्रदीप सिंह

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‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की शिक्षक, शिक्षा और शिक्षार्थी ही आधार

*प्रदीप सिंह

सन 2015 में सरदार बल्लभ भाई पटेल की 140 वीं जन्म जयंती 31 अक्टूबर को ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’अभियान की शुरुवात देश के विभिन्न राज्यों में सांस्कृतिक एकता ,राष्ट्रीय एकीकरण को कला,संगीत और वाद्य द्वारा सीखने की प्रवृत्ति बढ़ाने हेतु किया गया।एक भारत श्रेष्ठ भारत अभियान मूलतः भारत के राज्यों के लिए है जिसमें प्रतिवर्ष एक राज्य किसी अन्य राज्य का चुनाव करेगा और उस राज्य की भाषा,इतिहास,संस्कृति,ज्ञान विज्ञान आदि को अपनाएगा और उसको पूरे देश के सामने बढ़ाएगा।अगले वर्ष किसी अन्य राज्य का चुनाव किया जाएगा।इस तरह यह योजना पूरे देश में चलती रहेगी जिससे राज्य आपस में संगठित होंगें।एक दूसरे भी भाषा को समझेंगे जिससे अनेकता में एकता का विकास होगा।सरदार पटेल की जीवनी और प्रधानमंत्री जी की प्रेरणा से शिक्षक और छात्र इस अभियान को सफलतम बनाने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास कर रहे हैं।देश सीमाओं तथा राष्ट्र भूमि,जल और संस्कृति के संघात(संयुति) से निर्मित होता है।सरदार पटेल जी ने देश को एकता के सूत्र में पिरोनें का महान कार्य किया था।

प्रेरक प्रसंग:सरदार पटेल के पिताजी किसान थे और सरदार पटेल बाल्यकाल में अपने पिताजी के साथ खेत पर जाते थे।एक दिन सरदार पटेल के पिताजी खेत में हल चला रहे थे और पटेल जी उनके साथ चलते हुए पहाड़े याद कर रहे थे पहाड़े याद करते हुए इतना तन्मय हो गए कि पैर में कांटा चुभने पर भी उनकी तन्मयता में कोई प्रभाव नही पड़ा और वे पहाड़ा याद करते रहे अचानक उनके पिता जी की नजर पटेल जी के पाव पर पड़ी बड़ा कांटा देखकर चौंक गए फिर कांटा निकाला और घाव पर पत्ते बांधकर रक्त बहने से रोका।

सरदार पटेल की इस तरह की एकाग्रता और तन्मयता देखकर उनके पिताजी अत्यंत खुश हुए और उन्हें जीवन में बड़ा करने का आशीर्वाद दिया जिसको उन्होंने अपने जीवन काल में सफल किया।सरदार पटेल जी ने आज़ादी के बाद छोटे-छोटे राज्यों को देश में सम्मिलित कर देश का सुखद एवं शांतिपूर्ण एकीकरण किया था।आज उसी एकीकरण में एक भारत श्रेष्ठ भारत नव ऊर्जा द्वारा देश में शान्ति एवं एकता का संचार कर रहा है।

एक भारत श्रेष्ठ भारत अभियान में 36 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश सम्मिलित रूप से एक दूसरे राज्य कस चुनाव करके उस राज्य की भाषा,संस्कृति,इतिहास,कला,विज्ञान आदि को अपनाएगा और दोनों राज्य इसी तरह से एकता के सूत्र में बंध जाएंगे ।देश की एकता एवं अखण्डता देश के विकास में बहुत सहायक सिद्ध होगी इस तरह की पहल देश के लिए मजबूती का कार्य करेगी।यह सोच बल्लभ भाई पटेल ने देश में बोई थी जिसको फलीभूत करने के लिए यह कदम उठाए जा रहे है जिससे बिना किसी मतभेद के आसानी से राज्यों के बीच संस्कारों का आदान प्रदान होगा जो कि भारत में एकता के रूप में उजागर होगा।पिछले कुछ समय से देश में सांप्रदायिकता का शोर सुनाई दे रहा है जिसे खत्म करना प्रत्येक नागरिक का परम कर्तव्य है लेकिन जेहन में आता है इस प्रकार की योजना एक बेहतर पहल है जो कि सरकार ने बहुत ही व्यवस्थित ढंग से सभी के सामने रखा है।यह अभियान आसानी से देश के भिन्न- भिन्न राज्यों को आपस में जोड़ रहा है। शिक्षकों और छात्रों के माध्यम से त्यौहारों की तरह ही खुशियां फैला रहा है।

मुख्य विशेषता:

1- एक भारत श्रेष्ठ भारत के तहत एक राज्य अन्य राज्य का चुनाव करके उंसकी भाषा ,संस्कृति को अपनाकर आगे बढ़ा रहा है इससे दोनों राज्यों के एक नया रिश्ता बन रहा है।

2-सरकार द्वारा राज्यों के बीच एक समिति का गठन किया गया है जो कि इस योजना को सही तरीके से क्रियान्वयन करने का कार्य कर रही है।

3-इस अभियान में सरकार,नागरिक,सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन,सरकारी एवं निजी क्षेत्र मिलकर कार्य कर रहे हैं।

4-इस योजना के विस्तार के लिए आधुनिक संसाधन एवं मीडिया का उपयोग किया जा रहा है।

5-दो राज्य अपने छात्रों का आदान प्रदान कर रहे हैं जो एक वर्ष तक दूसरे राज्य की संस्कृति को समझ और सीख रहे हैं।

असम के बच्चों द्वारा मध्यप्रदेश के बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले का परधोनी लोकनृत्य,असम का बिहू मध्यप्रदेश के बच्चों द्वारा,गुरुग्राम के छात्रों द्वारा झारखंड के आदिवासी भेषभूसा नृत्य संगीत गुजरात के बच्चों द्वारा ,झारखंड के बच्चों द्वारा डांडिया,दिल्ली के बच्चों द्वारा जम्मू काश्मीर का डोंगरी सीखना एक अभूतपूर्व प्रयोग है।

कहा जाता है कि दिल में उतरने का रास्ता पेट से होकर जाता है।

“जैसा भोजन खाइए, वैसा तन होए,

जैसा पानी पीजिए, वैसी वाणी होए।”

एक भारत श्रेष्ठ भारत अभियान के तहत शिक्षक और छात्रों का खानपान द्वारा एक दूसरे राज्यों के नजदीक आना भारत की एकता को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा।स्कूलों ,कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत(ईबीएसबी) क्लब ‘ द्वारा भाषा व संस्कृति के आधार पर गतिविधियों स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल करने से एक राष्ट्र की अवधारणा को मजबूती मिल रही है।

प्रधानमंत्री जी ने स्पष्ट किया है कि योजना एक भारत श्रेष्ठ भारत देश की अखण्डता के लिए एक बहुत अच्छा प्रयास साबित होगा।इससे लोगों को एक दूसरे से जुड़ने का माहौल मिलेगा जो कि सभी तरह से देश के हित में कार्य करेगा ।उनके द्वारा अपने मासिक प्रोग्राम ‘मन की बात’ में भी इस योजना का जिक्र करते हुए समस्त देशवासियों से बढ़ चढ़कर सहयोग देने और सुझाव देने का आग्रह किया है

निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि जब विश्व के अन्यान्य देश नस्लभेदी और साम्प्रदायिक दंगों की आग में जल रहें हो उस समय भारत को जातीय संघर्ष की आग में झोंकने के प्रयास का सफल न होना भारत के राष्ट्रीय चरित्र का एक होना है।जिसमें ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत अभियान’की भूमिका महत्वपूर्ण रही।इस अभियान को प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक की शिक्षा में अनिवार्य बनाए जाने की आवश्यकता है।जिससे शैक्षणिक प्रक्रिया में संलग्न शिक्षक और छात्र इस अभियान का अभिन्न अंग बनकर भारत को एक और श्रेष्ठ बनाने में अपनी भूमिका सुनिश्चित कर सकेंगे।

प्रदीप सिंह(शिक्षक कुशीनगर उत्तरप्रदेश),ईमेल-psingh.ddu@gmail.com,सम्पर्क सूत्र-9628737874

‘अवगत’ अवार्ड 2021

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‘अवगत’ अवार्ड 2021

अक्षरवार्ता अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका एवं कृष्ण बसंती शैक्षणिक एवं सामाजिक जनकल्याण समिति, उज्जैन, मप्र., भारत

दिनांक – 14 सितंबर 2021

स्थान – उज्जैन, मप्र.

पंजीयन प्रारूप

लिंक- https://docs.google.com/forms/d/1dbYOILxBHMzC6cwQAZC5u3GWpEOMwhpXAPRVgNTzRiQ/edit
महोदय/महोदया,

प्रसन्नता का विषय है कि अक्षरवार्ता अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका एवं कृष्ण बसंती शैक्षणिक एवं सामाजिक जनकल्याण समिति (पंजी.) द्वारा विभिन्न राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्री संगोष्ठियों, विभिन्न समारोहों, कवि सम्मेलनों, पुरस्कार वितरण समारोह, अक्षरवार्ता अवार्ड समारोह की अगली श्रृंखला में 14 सिंतंबर 2021 को अकादमिक/शोध/साहित्य में उत्कृष्ट कार्य हेतु ‘‘अवगत‘‘ अवार्ड 2021 का आयोजन किया जा रहा है।

यह अवार्ड ‘‘अवगत‘‘ अवार्ड 2021 के नाम से देय होगा।

इस अवार्ड हेतु प्रतिभागीता के लिए कुछ सामान्य नियम इस प्रकार हैं।

अकादमिक/शोध/साहित्य के क्षेत्र में यदि आपने कार्य किया है, अर्थात उक्त संदर्भित क्षेत्र में आपके कोई भी प्रकाशन हुए हैं, तब आप इस ‘‘अवगत‘‘ अवार्ड 2021 हेतु पंजीयन कर सकते हैं।

पंजीयन हेतु निर्धारित प्रारूप में फार्म भरकर ईमेल के माध्यम से अपने बायोडाटा के साथ भेजना होगा, जिसमें आपके कार्य का उल्लेख हो। अथवा यहाँ संलग्न पंजीयन प्रारूप भरकर सबमिट करना होगा, जिसके बाद आपको ईमेल से पंजीयन शुल्क जमा करने हेतु लिंक प्राप्त होगी।
पंजीयन शुल्क – 2000/-
‘‘अवगत‘‘ अवार्ड 2021 हेतु गठित समिति द्वारा निर्धारित मापदण्ड के आधार पर आपका चयन किया जावेगा।

चयन के पश्चात निर्धारित पंयीयन शुल्क जमा करना होगा, जिसकी लिंक ईमेल के माध्यम से प्रेषित की जावेगी।

14 सितंबर 2021 को उज्जैन, मप्र. में एक भव्य समारोह में यह अवार्ड दिये जावेंगे, जिसके अंतर्गत प्रमाणपत्र, रिकगनीशन लेटर, शील्ड/मोमेंटो, मेडल, बेज, आदि दिया जावेगा।

चयन का अंतिम अधिकार आयोजन समिति का होगा एवं परिस्थिति अनुरूप अवार्ड समारोह की दिनांक में परिवर्तन किया जा सकता है।

विवरण भेजने हेतु ई मेल -seminar45march@gmail.com

संपर्क
डाॅ. मोहन बैरागी
संपादक- अक्षरवार्ता अंतराष्ट्रीय शोध पत्रिका
व अध्यक्ष, ‘‘अवगत‘‘ अवार्ड 2021 आयोजन समिति, उज्जैन, मप्र.
मोबाईल- 8989547427
आयोजन समिति-
डॉ. शैलेंद्रकुमार शर्मा
कुलानुशासक- विक्रम यूनिवर्सिटी, उज्जैन
डॉ. जगदीश शर्मा, उज्जैन
डॉ. राजश्री शर्मा, उज्जैन
डॉ. मोहसिन खान, महाराष्ट्र
डॉ. अवनिश अस्थाना, उप्र
डॉ. बी. एल. मालवीय, मप्र.
डॉ. ख्याति पुरोहित, गुजरात
डॉ. किरण खन्ना, पंजाब
डॉ. रुपाली सारये, मप्र.
डॉ. श्वेता पंड्या,मप्र.
डॉ. राम सोराष्ट्रीय,मप्र.
डॉ. पराक्रम सिंह,दिल्ली
डॉ. अलका चौहान, मप्र.
डॉ. रेखा कौशल,मप्र.
डॉ. राकेश परमार,मप्र.

 राज्य-हिंसा पर विचार: क्या भारत एक हिंसक राज्य है?-अम्बिकेश कुमार त्रिपाठी

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                                                                         राज्य-हिंसा पर विचार: क्या भारत एक हिंसक राज्य है?

अम्बिकेश कुमार त्रिपाठी
सहायक प्राध्यापक (राजनीति विज्ञान विभाग)
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, द्वाराहाट
अल्मोड़ा, उत्तराखंड
मो. न.- 9450308057

 
राज्य-हिंसा पर विचार करने से पहले हम मुख्यरूप से हिंसा की तीन स्थितियों की कल्पना कर राज्य की भूमिका का स्थापन करने का प्रयास करते हैं।

पहला, कुछ व्यक्तियों का समूह उनके निवास-स्थल के नजदीक लग रहे परमाणु संयंत्र के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रतिरोध कर रहा है, क्योंकि इस परमाणु संयंत्र से होने वाले रेडियोएक्टिव खतरे उनके सुरक्षित जीवन-यापन के विरूद्ध गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकते हैं। राज्य की पुलिस ने उस जनसमूह के खिलाफ लाठीचार्ज किया और लोग गंभीर रूप से घायल हो गए है। दूसरा, बहुसंख्यक वर्ग के लोग सांप्रदायिक उन्माद में अल्पसंख्यक वर्ग के खिलाफ हथियार लेकर सड़कों पर उतर गए हैं और बड़ी मात्रा में अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों की हत्या कर रहे हैं और राज्य की मशीनरी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करने में अनिच्छुक और उदासीन दिखाई पड़ रही है। तीसरा, राज्य में निवास करने वाले किसी खास वर्ग या जाति समूह को उनके मानवाधिकारों से योजनाबद्ध तरीके से वंचित किया जा रहा है तथा दैनिक जीवन की आधारभूत जरूरतों को उनकी पहुँच से दूर रखा जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप वह जाति-समूह मानव-विकास सूचकांक के सभी पैमानों में पिछड़ रहा है और उनकी औसत जीवन-प्रत्याशा राष्ट्रीय औसत जीवन-प्रत्याशा से बेहद नीचे है। 
ये राज्य-हिंसा के आयाम हैं। हिंसा की दशाओं का निरूपण हिंसा की अनुभूति से स्वतंत्र नहीं हो सकता है। समाज में सहज रूप से प्रचलित हिंसा (इंटेर्पेर्सोनल वायलेंस) के अनुपात में राज्य द्वारा की गई हिंसा ज्यादा मात्रात्मक होती है और इसका प्रभाव गुणात्मक होता है। ‘राज्य जीवन के लिए अस्तित्व में आता है और अच्छे जीवन के लिए इसका अस्तित्व बना रहता है; राज्य के समर्थन में अरस्तू का यह कथन राज्य के ऊपर कुछ उत्तरदायित्व भी आरोपित करता है। संभवतः यह लोककल्याणकारी राज्य के विचार का प्रस्थान-बिन्दु था; ऐसा राज्य जो कि अपने नागरिकों के कुशल-क्षेम के लिए उत्तरदायी हो। आधुनिक लोकतान्त्रिक राज्य मुख्य रूप से लोककल्याणकारी राज्य है और संविधान द्वारा यह सुनिश्चित किया गया है कि राज्य अपने नागरिकों को उनकी सुरक्षा और गरिमा को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपनी कल्याणकारी सेवाएँ प्रदान करेगा। यदि राज्य ऐसी सेवाएँ अपने नागरिकों को नहीं देता है या लोगों की वास्तविक जरूरतों का ख़्याल नहीं रखता या नागरिक-अधिकारों का अतिक्रमण करता है और अपने बलमूलक-संस्थाओं का प्रयोग लोकप्रिय मांगों को दबाने में करता है, तो यह राज्य द्वारा की जाने वाली हिंसा माना जाएगा। ‘जब हम हिंसा के बारे में विचार करते हैं तो जो तस्वीर सामान्यतः दिमाग में उभरती है वह गुंडों, बलात्कारियों, हत्यारों और अपराधियों आदि की होती है और राज्य हमें इनसे सुरक्षा प्रदान करता है। फिर भी, हिंसा की सम्पूर्ण परिघटना में पारस्परिक हिंसा का योगदान तुलनात्मक रूप से कम ही है। जब हम पारस्परिक हिंसा से आगे संस्थातगत हिंसा और संरचनात्मक हिंसा पर विचार करते हैं तो हिंसा का क्षेत्र और अनुपात बढ़ता जाता है’; दुर्भाग्य से हिंसा के ये उच्च स्वरूप अकादमिक विमर्शों में कम ही आते हैं और इन्हें हिंसा के रूप में परिभाषित करने के बजाए गैर-समस्यागत और राज्य द्वारा कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए किए जाने वाले दैनिक घटनाक्रम के रूप में देखा और समझा जाता है। लेकिन, अगर हिंसा आधुनिक राज्यों का अविभाज्य गुण है तो इसका आलोचनात्मक परीक्षण किया जाना चाहिए, क्योंकि आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य का मुख्य उद्देश्य व्याप्त हर प्रकार की हिंसाओं का उन्मूलन है लेकिन आज दुनियाभर में लोकतंत्र और हिंसा के बीच, जबकि दोनों विरोधाभासी संकल्पनाएँ हैं, गहरी निकटता देखी जा रही है।   

राज्य-हिंसा का परिचय:
1648 की वेस्ट्फेलिया की संधि के बाद राज्य बेहद शक्तिशाली संस्था के रूप में उभरा जिस पर किसी अन्य संस्था का किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं है। राज्य-हिंसा का विचार दरअसल उसकी इसी असीम संप्रभुता में निहित है, किन्तु इसका यह अर्थ बिल्कुल भी नहीं हैं कि राज्य के संप्रभुता की अवधारणा को खारिज कर दिया जाए। ‘राज्य के पास राजनीतिक नियंत्रण के दो यंत्र हैं; पहला, ‘संप्रभुता’, जिसका प्रयोग राज्य द्वारा किया जाता है, और दूसरा, ‘कानून’, जिसके द्वारा पहला यंत्र प्रयोग में लाया जाता है’। एक लोकतान्त्रिक-संप्रभु राज्य व्यवस्था बनाने के लिए कानून का निर्माण और उनका क्रियान्वयन करता है। कानून-निर्माण की यह शक्ति ही दरअसल राज्य के हिंसा को जन्म देती है; जब राज्य के कानून नागरिकों के साथ भेदभाव करते हैं, जब जन-असंतोष के प्रति संप्रभु हिंसक बल प्रयोग करता है या फिर जब राज्य नागरिकों के कुशल-क्षेम को बढ़ाने के प्रति अनिच्छुक होता है।

वही समाज सभ्य समाज कहा जाएगा जो न्यायपूर्ण हो, और इसके लिए कानून का शासन होना जरूरी है। अतः एक सभ्य और न्यायपूर्ण समाज के लिए कानून आवश्यक हैं और कानून बनाने के लिए राज्य नामक संस्था जरूरी है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि ‘कानून कैसे होने चाहिए?’, ‘उनकी प्रकृति कैसी हो?’ चूंकि समाज में न्याय की स्थापना के लिए ये प्रश्न जरूरी हैं और राज्य कानून बनाता है इसलिए राज्य की भूमिका का इस संदर्भ में बेहद सूक्ष्म परीक्षण किया जाना चाहिए। कानून ऐसे हों जो नागरिकों के कुशल-क्षेम को ठीक ढ़ंग से संज्ञान में रखें, क्योंकि लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में राज्य और कानून की वैधता इसी में निहित होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जो राज्य ऐसे क़ानूनों का सहारा लेता हो जिनसे नागरिक-अधिकारों का अतिक्रमण हो रहा है, या राज्य शांतिपूर्ण प्रतिरोधों को दबाने के लिए बल प्रयोग करता हो, अथवा किसी समाज या समुदाय को योजनाबद्ध रूप से अधिकारों से वंचित कर उनके हाशिएकरण में संलिप्त हो, हिंसक राज्य कहा जाएगा।

वाल्टर बेंजामिन (1986) लिखते हैं कि, ‘कानून-निर्माण शक्ति-निर्माण है, और उस हद तक, हिंसा का अव्यवहित प्रत्यक्षीकरण’; राज्य-हिंसा कानून के व्यवस्थापन और क्रियान्वयन के क्षेत्र में जन्म लेती है- ‘राज्य की एजेंसियों द्वारा कानून का उपयोग और दुरुपयोग’ के संदर्भ में। राज्य की मशीनरी द्वारा हत्या, उत्पीड़न, अपावर्तन, बलात्कार, अभिरक्षी मृत्यु, फर्जी मुठभेड़ और निवारक अवरोध आदि आज सामान्य परिघटना हो गईं हैं। यद्यपि असामाजिक घटकों और विध्वंसकारी तत्वों से निपटने के लिए निवारक अवरोध राज्य के हाथ में एक महत्वपूर्ण हथियार है किन्तु दुनियाभर के राज्यों द्वारा इस प्रावधान के दुरूपयोग के कम उदाहरण नहीं मिलते।

वास्तव में ऐसे किसी राज्य की कल्पना करना मुश्किल है जहां किसी प्रकार की हिंसा मौजूद न हो। अपनी सीमाओं की सुरक्षा तथा कानून का शासन बनाए रखने के लिए सभी राज्य एक सीमा तक हिंसा का प्रयोग करते हैं। किन्तु ऐसा नहीं है कि राज्य की बलमूलक संस्थाएं केवल राष्ट्रीय सुरक्षा और पब्लिक सेफ़्टी का ही ध्यान रखती हैं, इसके साथ ही ये वास्तव में विषमता को जन्म देती हैं, भेदभाव को बढ़ाती हैं और विस्थापन तथा वंचना को प्रेरित करती हैं। जबकि अरस्तू राज्य को अच्छे जीवन के लिए आवश्यक मानते हैं, प्रश्न यह उठता है कि किस प्रकार राज्य सामाजिक-आर्थिक विषमता का जन्मदाता बन जाता है? इसका जवाब अराजकतावादी और मार्क्सवादी चिंतन में मिलता है। वास्तव में राजनीतिक चिंतन के ये स्कूल ही राज्य-हिंसा की दार्शनिक मीमांसा करते है। अराजकतावादी चिंतक प्रूधों कहते हैं कि ‘संपत्ति चोरी है’; अतः निजी संपत्ति बनाने के लिए किया गया किसी भी तरह का प्रयास अराजकतावादियों की दृष्टि में हिंसा है। मार्क्सवादी एक भिन्न दृष्टिकोण से राज्य की हिंसा को देखते है। उनके लिए ‘राज्य शोषण का यंत्र’ है। यद्यपि, उदारवादी तर्क है कि, नागरिकों के जीवन एवं संपत्ति की सुरक्षा के लिए राज्य का अस्तित्व है, फिर भी दुनिया भर में शोषित वर्ग के प्रतिरोधों का इतिहास राज्य के संदर्भ में मार्क्सवादी तर्क को स्थापित करता है कि उदारवादी राज्य कॉर्पोरेट बुर्जुआ के हितों के लिए कार्य करता है। पूंजीपति वर्ग के ऊपर राज्य के इस वरदहस्थ का दूसरा पहलू दबे-कुचले सर्वहारा के उत्पीड़न की कहानी है। स्टीनर (1995) लिखते हैं कि, ‘राज्य श्रम की दासता पर आधारित होता है, अगर श्रम आज़ाद हो जाता है तो राज्य समाप्त हो जाता है’। अतः राज्य द्वारा पूंजी संचयन की प्रक्रिया हिंसा के प्रकटीकरण की प्रक्रिया है। ‘20वीं सदी के उत्तरार्द्ध से राज्य द्वारा [पूरी दुनिया में] कॉर्पोरेट-पूंजीपति हितों के लिए लोगों के जमीन की चोरी जारी है, चाहे कोई भी दल सत्ता में हो’।

राज्य-हिंसा का दायरा सिर्फ सीधी हिंसा तक सीमित नहीं है, जिसमें वह अपने बलमूलक संस्थाओं का प्रयोग करता है। एंडरसन एवं अन्य (2007) ने सही कहा है कि, ‘एक स्थिर और प्रभावी राज्य मानव-विकास एवं मानव-सुरक्षा की पूर्वशर्त है; और जो राज्य अपने नागरिकों को विकास और सुरक्षा प्रदान कर पाने में असमर्थ हैं वे न तो मजबूत और न ही स्थिर राज्य हो सकते हैं। वे कमजोर राज्य है’। आधुनिक लोकतान्त्रिक शासन प्रणालियों के दौर में राज्य की एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। जब ये घटिया तरीके से कार्य करती हैं तो गरीब और पिछड़े लोग सर्वाधिक मात्रा में नकारात्मक रूप में प्रभावित होते है। अतः कहा जा सकता है कि राज्य-हिंसा की संकल्पना के दायरे में कमजोर राज्य या ‘राज्य की अनुपस्थिति’ भी आती है। सुरक्षा संबंधी नए विमर्श, जिसमें व्यक्ति केंद्र में है, ने राज्य की भूमिका पर सवालिया निशान लगाए हैं। राज्य की अनुपस्थिति वास्तव में उन तमाम संरचनात्मक हिंसाओं का कारण बनती है जो चिरस्थायी हिंसा की चक्र शुरू करती हैं। अतः मानव-स्वातंत्र्य और सुरक्षा को राज्य से अलग नहीं किया जा सकता है। राज्य की अनुपस्थिति में समाज के हॉब्स की प्राकृतिक अवस्था में पहुँचने की प्रबल संभावना रहती है जहां मानव जीवन ‘अकेला, गरीब, अप्रिय, पशुवत और संक्षिप्त’ है। अतः राज्य की जरूरत है, लेकिन किस प्रकार के राज्य की? उसके कार्य क्या होने चाहिए? चेनोय और चेनोय (2010) लिखते हैं कि, ‘राज्य का सर्वोच्च कार्य है कि वह ऐसी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और अन्य संरचनाएं विकसित करे और उन्हें बनाए रखे जिसमें नागरिक अपने अधिकारों के साथ बेहतर जीवन जी सकें’।

राज्य-हिंसा की संकल्पना:
जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर (1958) ने कहा है कि राज्य ‘हिंसा के वैध प्रयोग का एकाधिकार’ रखता है। हमें राज्य-हिंसा को समझने के लिए वेबर के इस कथन पर गंभीरता से विचार करना होगा। दरअसल वेबर राज्य को एक ऐसी राजनीतिक संस्था मानते हैं जो शक्ति का प्रयोग करती है और राज्य की यह विशेषता उसे अन्य संघों और संस्थाओं से भिन्न करती है। इस तरह राज्य एक विशिष्ट संस्था है जो किन्ही अन्य संस्थाओं या संघों के नियंत्रण में नहीं बल्कि उनको नियंत्रित करती है। हिंसा के वैध प्रयोग की एकाधिकारिता राज्य को समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए नागरिकों द्वारा प्रदान की जाती है। किन्तु राज्य द्वारा प्रयोग किए गए हिंसा की प्रकृति की वैधता का निर्धारण कैसे किया जाए? कौन तय करेगा कि राज्य द्वारा प्रयोग की गई हिंसा वैध है या अवैध? यह कार्य तब और भी कठिन हो जाता है जब हिंसा के वैध और अवैध प्रयोग के बीच के अंतर का आवरण बहुत झीना हो। ‘कानूनी और गैर-कानूनी के दरम्यान जो फासला है वो पता नहीं चलता कि कब कानून गैर-कानूनी काम कर रहा है। राज्य की इस प्रकार की असंगति में यह पहचान पाना मुश्किल हो जाता है कि यह कानूनी तरीके से या गैर-कानूनी तरीके से काम कर रहा है’।

मिचलोवस्की (1985) लिखते हैं कि, ‘यह हकीकत है कि किसी निश्चित राजनीतिक संदर्भ में राज्य-हिंसा कानूनी है… फिर भी इस वास्तविकता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए कि यह हिंसा ही है’। अतः व्यावहारिक ढंग से हम ये कह सकते हैं कि हिंसा हिंसा ही है, चाहे वह वैध हो या फिर अवैध। अवैध हिंसा तो अकादमिक जगत में विमर्श का विषय रहा है लेकिन तथाकथित वैध हिंसा बहुत कम चर्चा के केंद्र में होती है। बड़ा प्रश्न यह है कि कौन हिंसा की वैधानिकता तय करेगा? पुनः, हिंसा की वैधता तय करने में राज्य एकाधिकारी स्थिति में होता है; वह अपनी हिंसा को कानून-व्यवस्था की स्थापना के संदर्भ में वैध ठहरा सकता है। लेकिन इस कानून-व्यवस्था के नाम पर होने वाली हिंसा को किस परिप्रेक्ष्य में देखा और समझा जाए? इसी स्थिति को मनीषा सेठी (2015) वैधता और अवैधता के बीच परस्पर विरोधाभासी अतिव्यापन कहती हैं। ‘राज्य द्वारा प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए अपने नागरिकों के विरूद्ध भौतिक, संरचनात्मक या सांस्कृतिक हिंसा का प्रयोग राज्य-हिंसा कहलाता है’। चूंकि प्रभुत्व राज्य के प्रकृति में अंतर्निहित है अतः हिंसा राज्य की प्रकृति का अविभाज्य अंग बन जाता है। स्टीनर (1995) लिखते हैं कि, ‘राज्य का एक मात्र उद्देश्य व्यक्ति को, सीमित, दब्बू और अधीन बनाना है… राज्य सभी स्वतंत्र क्रियाकलापों में अपने सेंसरशिप, अपने निरीक्षण, अपनी पुलिस के माध्यम से बाधा डालता है और इस तरह की बाधाओं को बनाए रखता है क्योंकि ये बाधाएँ उसके आत्मरक्षा के लिए जरूरी हैं’।

राज्य-हिंसा की अवधारणा में सबसे पहली जरूरत यह होगी कि हम अपने सरोकार को स्पष्ट करें। अर्थात हम किन मूल्यों पर अपना ध्यान केन्द्रित करे जिनसे ‘राज्य-हिंसा’ की परिधि का निर्धारण हो सके। सरोकारों को स्पष्ट किए बिना हम राज्य-हिंसा की वैध एकाधिकारिता और अवैध प्रयोग के बीच अंतर नहीं कर पाएंगे। निश्चय ही हिंसा किसी-न-किसी के विरूद्ध होती या की जाती है। राज्य-हिंसा का नजदीकी निशाना निश्चित ही ‘व्यक्ति’ होंगे। यहाँ पर राज्य-हिंसा की अवधारणा से कुछ प्रश्न उठते हैं: (1) क्या राज्य-हिंसा के शिकार सिर्फ गरीब और अल्पसंख्यक हैं? (2) क्या यह अमीरों और बहुसंख्यकों के हितों से संबंधित है? यह बहुत दुखद बात है कि हम राज्य-हिंसा के अपने अध्ययन में ज़्यादातर बार इसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य द्वारा किए जाने वाले रोज़मर्रा की कार्यवाई के रूप में देखते हैं; और यही तर्क राज्य को गरीबों, पिछड़ों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए विद्रुप और निरर्थक बना देता है। आश्चर्यजनक रूप से प्रतिनिधिमूलक लोकतांत्रिक शासन प्रणाली अपने 300 वर्षों के इतिहास में पिछड़ों, गरीबों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों का विश्वास जीत पाने में नाकाम रही है। यहाँ हम कम-से-कम तीन ऐसे क्षेत्र चिन्हित कर सकते हैं जिनसे राज्य-हिंसा की अवधारणा की परिधि तय होती है:

  1. राष्ट्रवाद और जातीयता के नाम पर हिंसा;
  2. आंतरिक सुरक्षा के नाम पर हिंसा;
  3. व्यक्ति-अधिकारों के निषेध के रूप में हिंसा

हिंसा के ये प्रारूप आधुनिक राष्ट्र-राज्यों द्वारा अपने प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। राज्य-हिंसा के इन तीनों प्रारूपों में एक बात यह समान है कि राज्य द्वारा निहत्थी और निरीह जनता पर व्यवस्थित रूप से घातक बलों का प्रयोग किया जाता है। हिंसा के उपरोक्त प्रथम दो प्रारूपों के संदर्भ में कोई यह तर्क दे सकता है कि राष्ट्रवाद का विचार राज्य की भौगोलिक एकता और अखंडता के लिए जरूरी है अतः इस प्रकार की हिंसा वैध हिंसा मानी जानी चाहिए। इसी प्रकार जब कोई जातीय समूह या विद्रोहियों का समूह राज्य के विरूद्ध उठ खड़ा हो जाए और राज्य-अधिष्ठान की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती दे तो निश्चय ही राज्य पलटकर जवाब देगा और अपने हिंसक बलों का प्रयोग करेगा। लेकिन पहले दोनों प्रारूपों की हिंसा के पक्ष में ये तर्क नाकाफी हैं।

आधुनिक बहुसांस्कृतिक समाजों में पहले प्रारूप की हिंसा वैध नहीं समझी जाएगी, क्योंकि राज्य की वैधता राष्ट्रवादी विचारों या प्रभुत्वशाली जातीयता के भाषा, संस्कृति और धर्म के अनुरूपता पर निर्भर नहीं करती। राज्य के प्रति निष्ठा को वैचारिक के बजाय व्यावहारिक संदर्भों में परिभाषित किया जाना चाहिए। राष्ट्रवाद का विचार, जो कि राज्य की शक्ति के वैधता का मुख्य आधार बन जाता है, बहुसांस्कृतिक लोकतंत्रों में केवल अल्पसंख्यक वर्गों में असुरक्षा की भावना को जन्म देता है और राज्य की बहुल अस्मिता हमेशा खतरे में रहती है। कई बार तो राज्य राष्ट्रवाद या जातीयता के नाम पर हो रही हिंसा के विरूद्ध, वेबेरियन संदर्भ में, अपनी वैध हिंसा के प्रयोग के एकाधिकार का भी उपयोग नहीं करता है, बल्कि इसके विपरीत यह ऐसी हिंसाओं को सहन करता है या फिर इन्हे बढ़ावा देता है जिसे हम ‘सामाजिक हिंसा’ के रूप में परिभाषित कर सकते हैं। सांप्रदायिक शक्तियों के विरूद्ध राज्य द्वारा हिंसा के एकाधिकार का उपयोग कर पाने में अक्षमता उसके कमजोर राज्य होने का परिणामस्वरूप नहीं है बल्कि ऐसा राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं में लाभ पाने के लिए भी किया जाता है।

राज्य-हिंसा का दूसरा प्रकार राष्ट्रीय-सुरक्षा की संकल्पना से वैधता प्राप्त करता है और इस आधार पर उचित भी ठहराया जाता है। जब कभी विद्रोहियों या अलगाववादियों द्वारा राज्य की एकता और अखंडता को चुनौती दी जाती है तो राज्य उन्हें दबाने और कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपने बलमूलक संस्थाओं का प्रयोग (वैध हिंसा का प्रयोग) करने के लिए मजबूर हो जाता है। लेकिन सिक्के का एक दूसरा स्याह पहलू भी है जो की भयावह है और राज्य के नृशंस और बर्बर चरित्र को सामने लाता है। राज्य अक्सर स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों मे परिवर्तित कर देता है। एक बार राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बन जाने के बाद स्थानीय मुद्दा राजनीति से ऊपर और गंभीर विषय बन जाता है और राज्य अपनी बलमूलक संस्थाओं के प्रयोग के लिए खुली छुट प्राप्त कर लेता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर, जैसा की पैसिफ़ीकी (2009) कहते हैं कि, ‘राज्य हिंसा करता है और उसे आवश्यक तथा अहानिकारक बताता है’।

जहां तक तीसरे प्रकार की राज्य-हिंसा का सवाल है, इसे अधिकारों के निषेध के रूप में समझा जा सकता है- चाहे व्यक्ति-अधिकारों या फिर सामुदायिक अधिकारों का निषेध। हिंसा के प्रारूप-वर्गीकरण पर गहन अध्ययन करने वाले शांति अध्ययन के प्रमुख विद्वान गाल्टुंग (1990) हिंसा को ‘मानव की मूलभूत आवश्यकताओं में सहने की क्षमता तक कमी करने, और जीवन को निम्नतम स्तर पर लाने जहां आवश्यकताओं की संतुष्टि का वास्तविक स्तर संभावित स्तर से नीचे हो’ के रूप में परिभाषित करते है। इस प्रकार की हिंसा ‘सापेक्ष वंचना’ (रेलेटिव डेप्रीवेशन) को जन्म देता है जो कि वास्तविक और संभावित के बीच अंतर में स्पष्ट होती है। किसी समाज में सामाजिक विकास के तमाम सूचकांकों में मौजूद सापेक्षिक भिन्नता को संरचनात्मक हिंसा कहा जाता है। इस संरचनात्मक हिंसा के लिए उत्तरदायी कौन है? वास्तविक और संभावित के मध्य अंतर के लिए जिम्मेदार कौन है- व्यक्ति, समाज या राज्य? प्रो. प्रियंकर उपाध्याय (1995) लिखते हैं कि, ‘आज बहुत से समाज मूलभूत अधिकारों के राज्य द्वारा अतिक्रमण किए जाने से जूझ रहे है’, जबकि द्वितीय और तृतीय पीढ़ी के अधिकारों के संरक्षण और उन्हे बढ़ावा देने के लिए राज्य के सकारात्मक हस्तक्षेप की जरूरत है। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्विकरण के वाहक के रूप में 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और 21वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में उभरे नव-उदारवादी राज्यों में मानवाधिकारों का अतिक्रमण गंभीर मुद्दा है। राज्य द्वारा सामाजिक-आर्थिक अधिकारों, पर्यावरणीय अधिकारों, सांस्कृतिक और सामुदायिक अधिकारों के अतिक्रमण के विरूद्ध अनेक मानवाधिकारवादी आंदोलन ग्लोब पर अलग-अलग जगहों पर देखने को मिल रहे हैं। जबकि दूसरी और तीसरी पीढ़ी के अधिकार राज्य की प्रभावी भूमिका की मांग करते हैं और केवल कानून के शासन में ही सुरक्षित रह सकते हैं, दुनियाभर में चल रहे मानवाधिकारवादी आंदोलन इस मुद्दे के प्रति लोगों की व्यग्रता और राज्य की नकारात्मक भूमिका को प्रकट करते है।

उपरोक्त तीन संकल्पनात्मक परिधि में राज्य-हिंसा को समझा जा सकता है। ऐसा नहीं है की राज्य-हिंसा सदैव प्रभुत्व स्थापना के लिए ही होती है। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ बन जाती हैं जब राज्य हिंसा करने के लिए मजबूर हो जाता है। अतः हम इन्ही तीन संकल्पनात्मक परिधि में रहते हुए राज्य-हिंसा के अभिप्रेरित और अनभिप्रेरित प्रारूप देख सकते हैं। अनभिप्रेरित हिंसा को वैध हिंसा और अभिप्रेरित हिंसा को अवैध हिंसा की श्रेणी में रखा जा सकता है। अगर कोई जातीय समूह बिना किसी खास वजह के राज्य के खिलाफ खड़ा हो जाए और उसकी अखंडता कोई चुनौती दे तो राज्य ऐसे आंदोलनों को हिंसा का प्रयोग करते हुए दबा सकता है और यह अनभिप्रेरित हिंसा होगी। लेकिन यदि राज्य राष्ट्रवाद या संप्रदायवाद के आधार पर किसी जाति या धार्मिक समूह के विरूद्ध हिंसा करता है तो यह अभिप्रेरित हिंसा कही जाएगी। इसी प्रकार आंतरिक सुरक्षा को यदि चुनौती मिल रही है तो राज्य को हिंसा का प्रयोग स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए करना चाहिए। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए राज्य के पास हिंसा के प्रयोग का वैध एकाधिकार है। किन्तु यदि कुछ लोग अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए हिंसक मार्ग का चुनाव करते हैं और राज्य उनके ‘वैध’ मांगों पर विचार करने के बजाए उनके आंदोलन या संघर्ष को आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती मानकर उनके विरूद्ध अपने बलमूलक संस्थाओं का प्रयोग करता है तो इस प्रकार की राज्य-हिंसा अवैध होगी। इसी क्रम में, यदि राज्य के पास संसाधन कम है, लोगों के जीवन का स्तर सामान्य से नीचे है तथा स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवनयापन की परिस्थितियाँ विकट हैं और दैनिक जीवन में हिंसा का स्पष्ट प्रदर्शन हो रहा हो, यह अनभिप्रेरित हिंसा होगी। लेकिन राज्य को इन परिस्थितियों से शीघ्रातिशीघ्र निपटने की कोशिश करनी चाहिए। इसके विपरीत, यदि राज्य में समृद्धि है किन्तु किसी खास वर्ग या जाति समुदाय का योजनाबद्ध तरीके से अपवर्जन या बहिष्करण किया जा रहा है तो यह अभिप्रेरित राज्य-हिंसा की श्रेणी में आएगा। अकालों पर किए गए अपने अध्ययन में प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन (1981) ने यह सिद्ध किया है कि अकाल पड़ते नहीं बल्कि अकाल की स्थिति कृत्रिम रूप से तैयार की जाती है। हिंसा का सहारा लिए बिना राज्य चल ही नहीं सकता, क्योंकि प्रत्येक से न्यायपूर्ण होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। अतः राज्य को कुछ ऐसे कठोर कानूनों एवं उनका पालन करने वाली बलमूलक संस्थाओं की जरूरत होती है ताकि शांतिपूर्ण व्यवस्था बनी रहे। इस तरह हिंसा राज्य की प्रकृति में निहित है, किन्तु ऐसी हिंसा जो अनभिप्रेरित होती है, वैध हिंसा होगी। लेकिन अभिप्रेरित और योजनाबद्ध तरीके से की गई हिंसा को वैध नहीं ठहराया जा सकता।

क्या भारत एक हिंसक राज्य है?

एक औपनिवेशिक राज्य के रूप में भारतीय राज्य द्वारा की गई हिंसाओं से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। जॉन मिर्डल (2012), लिखते हैं कि, ‘भारत कभी भी ‘अहिंसक’ नहीं रहा, चाहे शासकों की ओर से या शासितों की ओर से। शोषकों के खिलाफ आंदोलन के रूप में हिंसा… उत्पीड़ित जनता हमेशा से ही संघर्षरत रही है, उस समय भी और आज भी’। भारत में औपनिवेशिक शासन हिंसा की क्रूर गाथाओं से भरा है। 1857 के समय हिंदुओं को गाय की चर्बी और मुसलमानों को सूअर की चर्बी युक्त कारतूस, जिसे मुंह से खोला जाना होता था, देने जैसी सांस्कृतिक हिंसा से शुरू होकर लगान बढ़ाने और बंधुआ मजदूरी के लिए गिरमिटिया मजदूर के रूप में समुद्र पार भेजने की संरचनात्मक हिंसा और जलियाँवाला बाग कांड जैसी सीधी हिंसाओं के कम उदाहरण भारतीय इतिहास में मौजूद नहीं हैं।

स्वतंत्रता के साथ ही लोगों को यह उम्मीद बंधी कि गुलामी और हिंसा का वह दौर अब दुबारा नहीं आएगा। 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि, जब दुनिया सो रही थी, भारत अपनी नियति से मिलने का वादा करके एक नई यात्रा प्रारम्भ कर रहा था। इस यात्रा का प्रस्थान बिन्दु तो लोगों की आज़ादी से था लेकिन डगर बड़ी कठिन थी, ऊंच-नीच, छुआछूत, सामाजिक गैरबराबरी, अशिक्षा, गरीबी और वंचना के खतरनाक मोड़ वाले इस ऊबड़-खाबड़ सड़क पर सत्तर वर्ष से चल रही भारतीय लोकतंत्र की यात्रा का इतिहास और वर्तमान कभी एकरेखीय नहीं रहा। अपनी पुस्तक ‘इंडिया टुड़े’ के 1970 के संस्करण की भूमिका में रजनी पामदत्त (1977) लिखते हैं कि, ‘भारत की नई सरकार द्वारा प्रकाशित सरकारी आंकड़ों के अनुसार 15 अगस्त 1947 से 1 अगस्त 1950 तक यानि अपने शासन के तीन वर्षों के अंदर उसकी पुलिस या सेना ने कम से कम 1982 बार जनता के प्रदर्शनों पर गोली चलाई, 3,784 व्यक्तियों को भून डाला और लगभग 10,000 व्यक्तियों को घायल किया, 50,000 लोगों को जेल के अंदर डाला और 82 कैदियों को जेल के अंदर गोली मार दी गई’। दुर्भाग्य से यही स्थिति अभी तक बनी हुई है या यूँ कहें तो हालात और नाज़ुक हुए हैं।

‘दुनिया का सबसे बड़ा साम्यवादी विद्रोह, दुनिया का सबसे पुराना नस्लीय विद्रोह। दुनिया भर के इस्लामिक विद्रोहों में से एक सबसे जटिल। दुनिया के टोस्ट, भारत, जहां हर पाँचवाँ नागरिक हथियारबंद विद्रोहों के साये में रहता है, में स्वागत है’। मिश्रा और पंडिता (2010) के ये शब्द हालात के प्रति सपाट बयानी का अच्छा उदाहरण है। 16 अगस्त 1946 ‘डाइरैक्ट एक्शन डे, और आज़ादी के चौखट पर विभाजन की हिंसा, जिसमें हजारों लोग मौत के घाट उतार दिये गए, की त्रासदी से दोनों मुल्क, भारत और पाकिस्तान, अब तक उबर नहीं पाए हैं, हिंसा इन राजनीतिक व्यवस्थाओं का आवश्यक हिस्सा बन गईं है। पाकिस्तान में अबतक लोकतांत्रिक संस्थाएं जड़ तक नहीं जमा पाई हैं। इसके विपरीत भारत में लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत तो हुई हैं लेकिन राज्य-हिंसा का दायरा भी बढ़ा है। ‘भारतीय राज्य चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यासों के चरित्रों की तरह है, जहाँ एक ओर इंसाफ दशकों तक चले वाली कानूनी जंग के अनावश्यक शब्दजालों में फंसा रहता है, तो दूसरी ओर राज्य किसी भी कानूनी सीमा से बंधा हुआ नहीं है। एकाएक उसके क्रूर एवं खुली वर्गीय हिंसा के दांत बाहर निकल आते हैं’। यह फ्रेंच काफ्का के उपन्यासों के चरित्रों सा भी है, जहाँ कानूनी और गई-कानूनी के दरम्यान फ़ासला खत्म सा होता जाता है। एक आंकड़े के अनुसार भारत के कुल 80 प्रतिशत संसाधनों पर मात्र 20 प्रतिशत लोगों का हक़ है। आज के भारतीय समाज के अंतर्विरोध को हम इसी अंतर से समझ सकते हैं। ‘आधिकारिक तौर पर भारत एक स्वतंत्र देश है और भारत के उच्च माध्यम वर्ग के नीचे रहने वाली आबादी आज भी उसी तरह की गरीबी से त्रस्त जीवन जी रही है, जिसके बारे में रजनी पामदत्त ने कहा था, “ऐसी गरीबी जो पश्चिमी दुनिया की स्थितियों से वाकिफ किसी भी व्यक्ति की कल्पना से परे होगा”। लेकिन अमीर लोग पहले की तरह और अमीर होते जा रहे हैं। 36 भारतीय अरबपतियों की संपदा पूरे भारत की सकल घरेलू उत्पाद का एक तिहाई है’। भारत में उत्पीड़ित और भूखे जब अपने अधिकार की मांग करते हैं तब राज्य घृणित रूप से इन कुछ मुट्ठी भर पूंजीपतियों के हितों के पक्ष में खड़ा हो जाता और शोषण की इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सेना, अर्द्ध-सैनिक बलों, पुलिस, और गैर-कानूनी निगरानी समितियों के सहयोग से इनके मांगों को दबा देता है।

भारत में हर साल बड़ी संख्या में लोग सांप्रदायिक हिंसा के शिकार होते हैं। इन हिंसाओं में राज्य की परोक्ष भूमिका से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है। हालांकि, सैद्धांतिक तौर पर आज़ादी के बाद से ही पंथनिरपेक्षता के विचार को बढ़ावा दिया गया और संप्रदायवाद का विरोध किया गया तथा राज्य को धार्मिक राज्य के रूप में परिभाषित नहीं किया गया, परंतु यह कहना जरा कठिन है कि सांप्रदायिक सौहार्द कभी अस्तित्वमान सच्चाई भी रही है। भारत का राजनीतिक अभिजन अपने राजनीतिक लाभों के लिए धर्म के दुरुपयोग से जरा भी हिचके नहीं, परिणामस्वरूप सांप्रदायिकता देश के अंदर हिंसा का सबसे बड़ा स्रोत बन गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2004 से वर्ष 2010 तक पुलिस की गोलीबारी से 2,337 लोगों की जानें जा चुकी हैं। इसी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2006 से 2010 तक सांप्रदायिक दंगों में मरने वालों की संख्या 287 है जबकि इसी समायावधि में पुलिस कस्टडि में 442 लोग मरे।

इसके अलावा आंतरिक सुरक्षा के नाम पर भारत में राज्य-हिंसा लगातार बढ़ रही है। माओवादियों के खिलाफ चल रहे राज्य बनाम माओवादी छ्दम युद्ध में अबतक करीब 6000 लोगों की जानें जा चुकी हैं। लाल गलियारे में सुरक्षा बलों द्वारा फर्जी मुठभेड़ में निर्दोष आदिवासियों की हत्या, महिलाओं के साथ बलात्कार, लूट आदि की घटनाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। राज्य द्वारा संसाधनों की खुली लूट और आदिवासियों की उनके ज़मीन से बेदख़ली बड़े पैमाने पर जारी है। दक्षिणी छत्तीसगढ़ में सरकार द्वारा आदिवासियों की ज़मीनें लूटकर पूँजीपतियों को सौंपने के संबंध में एक कमेटी ने रिपोर्ट ने बड़ा ही दिलचस्प निष्कर्ष लिखा है कि, ‘यह कोलंबस के बाद जमीन हड़पने की सबसे बड़ी घटना है’। इतने बड़े पैमाने पर ज़मीन की हड़प से बेदखल हुए आदिवासियों के पुनर्वास के लिए कोई ठोस व्यवस्था सरकार द्वारा नहीं की गई है, जिसके परिणामस्वरूप विस्थापन का दंश झेल रहे आदिवासी समुदाय की जीविका ही नहीं बल्कि जीवन-संस्कृति भी खतरे में पड़ गई है। मानव-विकास के लगभग सभी महत्वपूर्ण सूचकांकों, मसलन शिक्षा, स्वास्थ्य, शिशु मृत्यु दर, मातृ-मृत्यु दर, बीएमआई सूचकांक आदि में ये आदिवासी समुदाय राष्ट्रीय औसत से बहुत पीछे हैं। राज्य इन क्षेत्रों में काम कर उनके जीवन स्तर को सुधारने के बजाए उनके अधिवास स्थानों में दबे खनिज और महत्वपूर्ण अयस्कों के निर्बाध दोहन में लगी है।

सापेक्षिक वंचना का स्तर इतना नीचा नहीं होना चाहिए कि लोगों को उनसे घिन आने लगे, या वे समाज की शांति पर चोट करने लगे। समाज में अमीरी और गरीबी का ऐसा स्पष्ट विभाजन गरीबों के लिए नहीं बल्कि अमीरों के लिए उस सीमा तक चिंतनीय है जहां से मुर्दा शांति के खिलाफ गरीबों की जिंदा अशांति शुरू हो जाती है। जॉन मिर्डल लिखते हैं कि, ‘गरीबों के खिलाफ अमीरों के इस लंबे अत्याचार में भारतीय जनता कभी भी सिर्फ निष्क्रिय शिकार नहीं रही है। उन्होने पलटकर जवाब दिया है। यह उन्होने अंग्रेजों के भारत आने से पहले भी किया। अंग्रेजों के समय में भी किया और आज भी कर रहे हैं’।

अंत में, भारत कभी भी पूर्णतः सहिष्णु और अहिंसक राज्य नहीं रहा है। प्राचीन वर्ण व्यवस्था से लेकर आधुनिक लोकतंत्र के अपने लंबे इतिहास में भारत में शोषक-शोषित सम्बन्धों की स्पष्ट पड़ताल की जा सकती है। भारत एक लोक-कल्याणकारी राज्य होने के साथ-साथ प्रशमन राज्य (काउंटर-इंसर्जेंसी स्टेट) भी है। निश्चित रूप से भारत ने आर्थिक क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है और दुनिया की महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं में से एक है लेकिन भारत-उदय के इन शानदार आख्यानों के समानान्तर ही उत्तरजीवी-भारत का भी लंबा-चौड़ा आख्यान है। ऐसा नहीं है कि सत्तर वर्षों के जनतांत्रिक इतिहास में भारतीय राज्य सिर्फ हिंसक ही रहा है; विकास के नए आयाम भी तय किए गए है। इस दौरान भारतीय राज्य अपने समक्ष आने वाली हिंसक चुनौतियों के लिए कभी भी सहिष्णु राज्य नहीं रहा, जैसा कि पहले ही कहा भी गया है कि कोई भी राज्य हिंसा से अलग नहीं हो सकता, और हो भी नहीं सकता। लेकिन आधुनिक भारतीय राज्य में अभिप्रेरित हिंसाओं के भी आख्यान पटे पड़े हैं। जरूरी है कि अभिप्रेरित हिंसाओं को गंभीर अकादमिक विमर्श का मुद्दा बनाए ताकि भारत को तमाम अस्मिताओं, जतियों और नस्लों के लिए सुलभ और सहिष्णु बना सकें।

आभार: इस शोध आलेख के लेखन में उज्जयी तिवारी, एम. ए. शांति अध्ययन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, के सहयोग के लिए मैं उनके प्रति आभारी हूँ। सुश्री तिवारी के साथ हिंसा पर हुए विमर्श इस आलेख की रूपरेखा तैयार करने में उल्लेखनीय रूप से महत्वपूर्ण है। इस क्रम में मैं अपने कॉलेज के हिन्दी विभाग के प्राध्यापक, जिन पर ग्रंथालय सम्हालनें का अतिरिक्त दायित्व है, डॉ. प्रकाश भट्ट जी का भी आभारी हूँ, जिन्होने सीमित संसाधनों के बावजूद भी ग्रंथालय को बेहतरीन और अपडेट बनाए रखा है।                   

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