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गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, हिंदी अध्ययन एवं शोध केंद्र द्वारा द्वि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय परिसंवाद: प्रपत्र आमंत्रित

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गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, हिंदी अध्ययन एवं शोध केंद्र द्वारा द्वि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय परिसंवाद: हिंदी कहानी: नई सदी का सृजन और सरोकार-  

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हिन्दी साहित्य सृजन में स्त्रियों की भूमिका विषय पर केन्द्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी

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हिन्दी साहित्य सृजन में स्त्रियों की भूमिका विषय पर केन्द्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
स्थान : हिन्दी विभाग, भाषा एवं मानविकी संकाय , जामिया मिल्लिया इस्लामिया , नई दिल्ली – 110025

दिनांक: 16 – 11 -2016, सायं : 4.00 बजे
उद्घाटन सत्र एवं हिन्दी कथा साहित्य और स्त्री का प्रतिनिधित्व

दिनांक: 17 – 11 -2016,

प्रथम सत्र – प्रातः 9.30 से 11.00 बजे
विषय : हिन्दी उपन्यास और स्त्री चेतना

दूसरा सत्र – पूर्वाहन 11.30 से 1.30 बजे तक
विषय : हिन्दी कहानी और स्त्री छवियां

तृतीय सत्र – पूर्वाहन 2.00 से सायं 4.00 बजे तक
विषय : पितृसत्ता का विद्रूप और स्त्री की कलम

आजतक की एक पहल- ‘साहित्य आजतक’, जिसके द्वारा 12-13 नवंबर को नई दिल्ली के इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर ऑफ आर्ट्स में इस दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन.

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न्यूज-चैनल आजतक द्वारा भारतीय साहित्य को आगे बढ़ाने के लिए ‘साहित्य आजतक’ नाम से एक नई शुरुआत की जा रही है. इसी 12-13 नवंबर को नई दिल्ली के इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर ऑफ आर्ट्स में इस दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन होगा. इस कार्यक्रम में भारतीय साहित्य के कई दिग्गज नामों के साथ-साथ मशहूर कवि, संगीतकार, एक्टर, लेखक और अन्य कलाकार यथा जावेद अख्तर, अनुपम खेर, कुमार विश्वास, प्रसून जोशी, पीयूष पांडे, अनुराग कश्यप, चेतन भगत, कपिल सिब्बल, नजीब जंग, हंस राज हंस, मनोज तिवारी, अनुजा चौहान, रविंदर सिंह, चित्रा मुद्गल, अशोक वाजपेयी, केदार नाथ सिंह, उदय प्रकाश, मालिनी अवस्थी, दारैन शाहदी, उदय महुरकर, हरिओम पंवार, अशोक चक्रधर, पॉपुलर मेरठी, गोविंद व्यास, राहत इंदौरी, नवाज देवबंदी, राजेश रेड्डी, स्वानंद किरकिरे, नसीरा शर्मा, मैत्रेयी पुष्पा, शाजी जमान और देवदत्त पाठक जैसे नाम भी शामिल होंगे. इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के साथ-साथ नए लेखकों को अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करने का मौका भी मिलेगा. इसी के साथ चैनल एक प्रतियोगिता भी आयोजित कर रहा है जिसमें बेहतरीन रचनाओं को 1 लाख तक का पुरस्कार भी दिया जाएगा…


पंजीकरण एवं अधिक जानकारी के लिए लिंक पर जाएँ- http://aajtak.intoday.in/sahitya/

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के श्रेष्ठ निबंध: संपादक-विनोद तिवारी

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“आज हम जो कुछ भी हैं उन्हीं के बनाए हुए हैं । यदि पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिंदी कोसों पीछे होती, समुन्नति की इस सीमा तक आने का अवसर ही नहीं मिलता । उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ प्रदर्शक का भी काम किया । हमारे लिए उन्होने वह तपस्या की है, जों हिंदी-साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी । किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया जितना उन्होंने । वे हिंदी के सरल सुन्दर रूप के उन्नायक बने, हिन्दी-साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाए । जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सेवा कराई । हिंदी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया । हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है |”

– प्रेमचंद

(व्यंग्य) एक बुद्ध और’ उर्फ़ ‘खरीदने जाना पमरेनियन’ – डॉ. हरीश नवल

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मैं पिछले सोलह वर्षों से एक सरकारी स्कूल में हिंदी मध्यम से अर्थशास्त्र पढ़ा
रहा हूँ. हर वर्ष मेरे विद्यार्थी मेरे समक्ष ‘मांग और वितरण’, ‘उत्पादन और
विनिमय’ तथा ‘मंदी और लाभांश’ संबंधी अनेक प्रश्न और शंकाएँ रखते है. परंतु मैं
स्वयं व्यावहारिक रूप से इन सबसे अनभिज्ञ होने की वजह से कभी भी संतोषजनक उत्तर
नहीं दे पाया हूँ. छोटा सा सरकारी स्कूल है, विद्यार्थियों को तलने के तरीके यहाँ
ईज़ाद होते रहते है, जिनका लाभ मैं उठाता रहा हूँ. शायद मेरा यह ज्ञान सदा अल्प
रहता यदि मैं पिछले महीने अपने साले गिरीशजी के लिए उनके साथ राजधानी की सड़कों पर
कुत्ता ख़रीदने नहीं डोलता. हमारे देश की राजधानी भी बहुत विचित्र  है, जो भी बाहर से आता है, यहाँ से कुछ-न-कुछ
ख़रीदना ही चाहता है. भले ही ब्लैक में ख़रीदे जाने वाली मारुती हो अथवा व्हाइट में
ख़रीदा जानेवाला पमरेनियन हो. पमरेनियन समझते हैं आप ? मैं तो पिछले महीने ही समझा
जब गिरीशजी ने बताया कि वह पमरेनियन नस्ल का कुत्ता ख़रीदना चाहते हैं. यह रेशम की
त्वचा वाला छोटा सा एक ख़ूबसूरत कुत्ता होता है, जिसे विदेशी और देशी महिलाएं गोद
में खिलाने को आतुर रहती हैं. अनेक छैला क़िस्म के जीवन हार्दिक इच्छा रखते हैं कि
कभी, उन्हें ही कोई पमरेनियन समझ ले, तभी तो वे दुम हिलाते आगे-पीछे घूमते भी पाए
जाते हैं. बीसवीं सदी के पूर्वार्ध से इंग्लैंड में पमरेनियन पालने का फ़ैशन चला
था, जो अब तक सारी दुनिया में छा गया है, जो फ़ैशन अंग्रेज़ी अंग्रेज़ करें उसे देशी
अंग्रेज़ कैसे न करें? अतः भारत भी इसी दुनिया में है.

  गिरीशजी एक सरकारी इंजीनियर हैं.
भारत सरकार की ओर से उन्हें वेतन, जीप और नौकरों के अतिरिक्त भारी दौर-भत्ता भी
मिलता है. सरकारी कामकाज पुरे भारत में कहीं भी हो सकता है. इस अवसर का लाभ उठाकर
गिरीशजी देश के कोने-कोने में छाए समस्त मित्रों एवं संबंधियों के सभी प्रकार के
छोटे-बड़े उत्सवों में, अपने अमूल्य समय का कुछ-न-कुछ अंश निकालकर अवश्य पधारते
हैं. दिल्ली तो उनके लिए कंपनी बाग़ है, जहाँ उनका घूमना अन्य सरकारी अधिकारियों की
भाँति लगा रहता है. पिछले महीने उनके साले कृपालसिंह जी को फ़्रांस से भारत लौटना
था. उनका पतन दिल्ली विमान-पतन (सरल शब्दों में एयरपोर्ट) पर होना था, अतः उन्हें
लिवाने के लिए ज़ाहिर है कि गिरीशजी का दिल्ली-आगमन बोर सरकारी था. मेरे साले से
साले को आना था अतः मुझे भी स्कूल से तब तक ‘मेडिकल’ लेना ही था. जब तक गिरीशजी
दिल्ली में मौजूद रहते.

 हम दोनों चर्दीन मुँह-अंधेरे उठ-उठकर
अपने घर से चालीस किलोमीटर दूर विमान-पत्तन पर पहुंचकर तीन-तीन घंटे प्रतीक्षा
करते रहे पर कृपालसिंह जी नहीं आये. जो टेलीग्राम उन्होंने दिया था उस पर भारतीय
डाक-तार विभाग की अति कृपा होने से उनके आगमन की तिथि मेरे मोहल्ले के प्रत्येक
सदस्य की दृष्टि से भिन्न थी.

  पांचवें दिन गिरीशजी को हर हालत में
वापस लौटना था, यह उनकी घरेलू सरकार का हुक्म था, जो बिना भत्ते के भी जरुर बजा
फरमाते थे. सुबह उठते ही वह मुझसे बोले, ‘कृपालसिंह तो आये नहीं हैं, मैं एक
कुत्ता ख़रीदकर घर ले जाना चाहता हूँ.’ मेरी आँखों में अनेक प्रश्न उत्तर आये. ‘कृपालसिंह
के बदले कुत्ता? मै समझा नहीं.’ वे बोले, ‘ऐसा है जीजा जी, घर से चलते वक्त संतोष
ने दिल्ली के दो काम बताये थे: एक कृपालसिंह को लिवाना है, दुसरे एक पमरेनियन
कुत्ता ख़रीदना है. कृपालसिंह तो आये नहीं, कुत्ता तो ले ही चलूँ वरना संतोष गुस्सा
करेगी कि दोनों में से किसी को भी नहीं लाये’

   गिरीश जी के आगे मेरे कुत्ता ख़रीदने
विषयक ज्ञान की पोल खुल गयी. पमरेनियन कहाँ मिलेगा? पूछने पर मैंने उनसे अंग्रेज़ी
का समाचार-पत्र देखने को कहा, मेरे घर तो हिंदी का ही अख़बार आता है, जिसे पढ़कर
कुत्ता नहीं ख़रीदा जा सकता. कुत्ते की ख़रीद विषयक विज्ञापन तो अंग्रेज़ी के ही
अख़बार में छपते हैं. जब प्रातः मैंने अख़बार वाले से अंग्रेज़ी का भी अख़बार माँगा तो
उसे घोर आश्चर्य हुआ. ऊपर से नीचे तक मुझे देखते हुए उसने पूछा, ‘आप और अंग्रजी?’
‘हाँ, कुत्ता ख़रीदना है, वो भी पमरेनियन, अंडरस्टैंड?’

मैंने कठोर स्वर में उत्तर दिया. उसने तुरंत दुम और सींग भीतर करते हुए
अंग्रेज़ी का अख़बार पकड़ा दिया. अख़बार के अनुसार उस दिन शहर में तीन विक्रेता कुत्ते
बेच रहे थे, जिनमें बंगाली मार्केट वाले कर्नल साहब के पास पमरेनियन था.
कर्नल साहब ने पते के स्थान पर फ़ोन नंबर दे रखा था. मैं एक अदना-सा शिक्षक,
मेरे यहाँ तो फ़ोन होने का प्रश्न ही नहीं था, अतः मैंने पड़ोसवाले नाई की दुकान से
विज्ञापन में दिए गए नंबर पर फ़ोन करके कर्नल साहब से समय लिया, समय बारह बजे दोपहर
का तय हुआ.
ठीक बारह बजे गिरीश जी ने कर्नल साहब की घंटी बजाई, सफ़ेद बालों वाला भरपूर
मूंछ-युक्त एक चेहरा खिड़की से निकला, कर्नल साहब ही थे.
‘यस?’ उन्होंने बुलंद आवाज़ में पूछा.
‘सर जी, हम कुत्ता ख़रीदने आये हैं- पमरेनियन. आपसे समय लिया था.’
‘ओह! कहते हुए समूचे कर्नल साहब दरवाज़े के बाहर आ गए. सफ़ेद टी शर्ट, सफ़ेद
नेकर, गले में लाल स्कार्फ और पैरों में पड़ा हुआ सफ़ेद फ्लीट (ठीक पमरेनियन की
भांति)

लान में पड़ी कुर्सियों पर हम लोग बैठा दिए गए. कर्नल साहब की पत्नी एक नन्हे
पमरेनियन को ले आई. पीछे-पीछे नौकर पानी का जग लेकर आ रहा था. मेरा गला खुश्क हो
रहा था. गिरीश जी सरकारी अधिकारी हैं, अतः उन पर कोई विशेष रौब नहीं पड़ा. हमें
पानी पूछा नहीं गया बल्कि उससे हमारे हाथ धुलवा दिए गए ताकि हमारे स्पर्श से
पमरेनियन मैला न हो जाये. गिरीश जी ने पिल्ले का पूर्ण निरीक्षण किया. उसे पंजों
से, दुम से पकड़कर उल्टा-सीधा उठाया, नाख़ून गिने आदि-आदि. फिर दाम पूछा, ‘ओनली फाइव
हंड्रेड.’
तोप छूटीं, ‘पांच सौ.’

मैं आश्चर्य से गिरीश जी के कान में फुसफुसाया. उन्होंने कर्नल दंपति की ओर
इशारा करते हुए धीरे से कहा, ‘जीजा जी, ब्रीड देखो ब्रीड. कर्नल और पत्नी कितने
फिट और स्मार्ट हैं.’

मुझे दिल्ली के बाज़ारों की ख़रीद की आदत थी, भाव कम कराना ही चाहता था कि गिरीश
जी ने पर्स निकला और सौ-सौ के पांच कड़कते नोट निकाल लिए. अचानक कर्नल साहब ने
पूछा, तुम क्या करता है?’
‘सर जी, ये अधिशासी अभियंता हैं.’ मैंने शान से कहा.
‘अधिशासी, व्हाट ?’

कर्नल ने मुँह बिगाड़कर पूछा. गिरीश जी ने फ़ौरन बताया, ‘एग्ज़िक्युटिव
इंजीनियर.’ कर्नल बोले, ‘आई एम सारी. मैं यह कुत्ता आपको नहीं दे सकता, सवा बारह
बजे चीफ इंजीनियर आयेंगे, उन्हें दूंगा. आई बिलीव इन इक्वल स्टेटस.’ मैंने पूछा,
‘इक्वल स्टेटस व्हाट?’ कर्नल साहब ने मूंछ पर हाथ रखकर उत्तर दिया, ‘बराबरी का
दर्जा.’ गिरीश जी के हाथों का कुत्ता गिर गया. अपमान-बोध के समस्त चिन्ह लिए हम
कर्नल साहब की कोठी से बाहर आ गए.
मैंने मन-ही-मन प्रण किया कि आज गिरीश जी को पमरेनियन ख़रीदवाकर ही दम लूँगा.

 जब मैं स्कूल में पढता था, सीताराम
बाज़ार में एक मेहता साहब हुआ करते थे, जो कुत्ते बेचते थे. मुझे बरसों बाद कुत्तों
से घिरा उनका व्यक्तित्व याद आ गया. बाल्यपन की स्मृति तेज़ होती है. मैंने गिरीश
जी से सीताराम बाज़ार चलने को कहा. आज कुत्ता ख़रीदकर ही लौटना था. एक गली में
पतले-से जीने वाला मकान मैंने ढूंढ निकाला. कोलंबस भी अमेरिका देखकर इतना खुश नहीं
हुआ होगा, जितना मैं हुआ. जीना चढ़कर हम लोग ऊपर पहुँचे. सब बदल चुका था, एक बड़ी-सी
कपडे की दुकान थी वहाँ पर. एक कर्मचारी से मैंने कहा, ‘यह मेहता साहब की ही दुकान
है न? हमें पमरेनियन चाहिए था.’
‘पमरेनियन!’

कर्मचारी का चेहरा विस्मयादिबोधक हो गया, उसने मालिकनुमा व्यक्ति की ओर देखकर
पूछा. ‘पमरेनियन है, सेठ जी?’ सेठ जी ने वहीं से विनीत स्वर में कहा, ‘माफ़ कीजिये,
हम इम्पोर्टेड आइटम नहीं रखते. आप लट्ठा ख़रीद लीजिये, दो थान दूँ?’
‘दो नहीं, हमें एक ही लेना है, पर पमरेनियन लेना है.’
गिरीश जी ने बताया. दुकान-मालिक समीपस्थ हुआ, ‘पमरेनियन शायद इटली में बनता
है. आप उसी के मुकाबले का हिंदुस्तानी कपड़ा ख़रीद लीजिये. हम इटली की मोहर लगा
देंगे.’
‘हमें कपड़ा नहीं, कुत्ता चाहिए. पमरेनियन नस्ल का कुत्ता. मेहता साहब कहाँ हैं?’
‘कुत्ता!’ दुकान-मालिक का चेहरा वीभत्स रस से भर गया, ‘क्या यहाँ हम कुत्ते
बेचते हैं?’ हमने बिगड़े स्वर में कहा, ‘क्यों, बरसों से तो इस भवन में कुत्ते ही
बिकते थे, अब क्या हो गया? मेहता साहब कहाँ हैं?’ दुकान-मालिक यह सुनकर रौद्र रस
का अवतार हो गया, ‘अभी तुझे वहीं भिजवाता हूँ, जहाँ मेहता साहब तेरह साल पहले से
गए हुए हैं.’ उसने भुजदंड फड़काये. मैंने गिरीश जी ओर देखा- वह करुण रस में नहा रहे
थे. उनके नेत्रों में पलायन के चिन्ह थे. हम लोग भाग निकले.

            गिरीश जी सीताराम बाज़ार से
निकलते हुए भावुक होकर कहा, ‘जीजा जी, आपके होते हुए मुझे दिल्ली में पमरेनियन नही
मिल रहा है. आप एक कुत्ता तक नहीं दिलवा सकते हैं. आपके हजारों विद्यार्थी में से
कोई भी कुत्ता नहीं बेचता क्या? संतोष क्या कहेगी कि न कृपालसिंह ही आये और न
ही…….’

            मुझे यह वाक्य चुनौती-सा
लगा, मैंने दिमाग पर ज़ोर डाला कि कुत्ता कहाँ से मिल सकता है? मुझे याद आया कि
जामा मस्जिद के पास भी जानवर बिका करते थे. हम तुरंत जामा मस्जिद पहुँचे. वहाँ
मछली बिक रही थी, बकरा बिक रहा था, कबूतर आदि-आदि सभी कुछ था, कुत्ता ही नहीं था.
पूछताछ करने पर पता चला कि कुछ पुरानी दुकानें मीना बाज़ार में पहुँच गयी हैं, वहाँ
कोशिश की जा सकती है.

            हम मीना बाज़ार पहुँचे. बहुत
खोजा पर कहीं कुत्ते की पूंछ नज़र नहीं आई. हमारी बेचैनी भांपकर एक तोते वाले ने
हमें राह दिखाई, बोला ‘भाईजान, चेहरे से मुर्दनी हटाइये मर्दानगी लाइये. मैं
कुत्ते बेचने वालों का पता बताता हूँ.’ मैंने लपककर उसके चरण स्पर्श करके विनती की
कि वे तुरंत पता बताएं. तोतेवाले ने कहा, ‘बता तो मैं ज़रूर दूँगा पर मेरी छोटी सी
शर्त है, वह यह कि आप मुझसे एक दर्जन तोते ख़रीद लो.’

            बड़ी मुश्किल से सौदा तीन
तोतों में पटा. मैंने तोते वाले से कहा कि वह तोते दिए बिना ही पैसे ले ले और हमें
कुत्तेवाले का पता तुरंत बता दे. इस बात पर वह बिगड़ गया. ‘हम ईमानदारी और मेहनत की
कमाई खाते हैं. तोते के बदले में ही पैसा लेंगे. आप चाहे तो तोते यहीं उड़ा देना,
हम मेहनत से उन्हें फिर पकड़ लेंगे.’ हमने ऐसा ही किया. पैसे लेकर और तोतों को
पकड़कर पुनः पिंजरे में बंद करते हुए उसने हमें बताया कि कश्मीरी गेट के बाहर गंदे
नाले के किनारे बंजारों की बस्ती है जहाँ हर तरह के कुत्ते बेचे जाते हैं.

कश्मीरी गेट की ओर नाले के किनारे बंजारों का ठिकाना बना हुआ था, खोजबीन करके
हम असली कुत्ता विक्रेता के पास पहुँच ही गए और उसे अपनी मांग बताई. वह व्यक्ति
बोला, ‘आप ठीक जगह आये हैं. मैं पमरेनियन आपको पचास रुपये में दे दूँगा, पर दूँगा
पांच दिन के बाद.’ मैंने पूछा, पांच दिन बाद क्यों?’’उसने बताया, ‘मेरी कुतिया
पिल्ला देने वाली है.’ हमने उससे निवेदन किया कि पांच दिन के बजाय पांच घंटे में
ही किसी तरह से एक पिल्ला दिलवा दे और दोगुने पैसे ले ले. वह तलखी से बोला, ‘मैं
पचास रूपए के पीछे अपनी कुतिया का कैरियर नहीं ख़राब करूँगा, आप पांच दिन बाद ही
आओ.’ अधिक अनुनय करने के बाद उसने कहा, ‘मैं आपको एक आदमी का पता देता हूँ, उसके
पास आपको पमरेनियन मिल सकता है, वहाँ चले जाओ, मेरा नाम लेना, मैं अभी उसका पता
देता हूँ.’

            वह अपनी झुग्गी में गया और
एक छोटा-सा छपा हुआ कार्ड ले आया. नाम पता देखते ही हम चौक पड़े. यह तो बंगाली
मार्केट वाले कर्नल साहब का ही पता था. वह बोला, ‘ये साहब हमारे थोक के ग्राहक
हैं. हर हफ़्ते आते हैं और जितने भी पिल्ले होते हैं, मुंहमांगे दाम में ख़रीदकर ले
जाते हैं, बड़े आदमी हैं, शौक भी बड़ा है.’


            भौंचक्के गिरीश जी का चेहरा
जहाँ बुझ गया वहीं मेरी आँखों के सामने मानो रोशनी के सैकड़ों झरने फूट पड़े. ऐसा
दिव्य प्रकाश हज़ारों वर्ष पूर्व सिद्धार्थ को बोधिवृक्ष के तले जब दिखाई दिया था,
तभी से वह बुद्ध कहलाने लगे थे. मेरे अंदर के अर्थशास्त्र के शिक्षक का अज्ञान
क्षणों में नष्ट हो गया. आवश्यकता और मांग से लेकर वितरण और लाभांश तक के सभी प्रश्न
स्वतः हल हो गए. चंद घंटों की कुत्ता ख़रीदने की तपस्या संभवतः सिद्धार्थ के घर
त्यागकर वर्षों की तपस्या से कहीं अधिक फलीभूत हो गयी थी. मुझे बोध हो गया था कि
मुझे अपने विद्यार्थियों से क्या कहना है और… और…. गिरीश जी सोच रहे थे न तो
कृपालसिंह और न पमरेनियन के मिलने पर, अब उन्हें संतोष को क्या बताना है. 

(जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में प्रकाशित)


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अन्तोन चेख़व की कहानी – ग्रीषा, – मूल रूसी से अनुवाद : अनिल जनविजय

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Vertical Scroll: अनुवाद


Chekhov


दो साल और सात महीने
पहले पैदा हुआ ग्रीषा नाम का एक छोटा और मोटा-सा लड़का अपनी आया के साथ बाहर गली
में घूम रहा है। उसके गले में मफ़लर है
, सिर पर बड़ी-सी टोपी
और पैरों में गर्म जूते। लेकिन इन कपड़ों में उसका दम घुट रहा है और उसे बेहद गर्मी
लग रही है। सूरज बड़ी तेजी से चमक रहा है और उसकी चमक सीधे आँखों में चुभ रही है।
ग्रीषा क़दम बढ़ाता चला जा रहा है। किसी भी नई चीज़ को देखकर वह उसकी तरफ़ बढ़ता है और
फिर बेहद अचरज से भर जाता है।
ग्रीषा ने बाहर की
दुनिया में पहली बार क़दम रखा है। अभी तक उसकी दुनिया सिर्फ़ चार कोनों वाले एक कमरे
तक ही सीमित थी
, जहाँ एक कोने में उसका खटोला पड़ा है और दूसरे कोने में उसकी आया का सन्दूक।
तीसरे कोने में एक कुरसी रखी हुई है और चौथे कोने में एक लैम्प जला करता है। उसके
खटोले के नीचे से टूटे हाथों वाली एक गुड़िया झलक रही थी। वहीं कोने में खटोले के
नीचे एक फटा हुआ ढोलनुमा खिलौना पड़ा हुआ है। आया के सन्दूक के पीछे भी तरह-तरह की
चीज़ें पड़ी हुई हैं जैसे धागे की एक रील
, कुछ उल्टे-सीधे काग़ज़, एक ढक्कनरहित डिब्बा और एक टूटा हुआ जोकर खिलौना।
ग्रीषा की दुनिया
अभी बेहद छोटी है। वह सिर्फ़ अपनी माँ
, अपनी आया और अपनी
बिल्ली को ही जानता है। माँ उसे गुड़िया जैसी लगती है और बिल्ली माँ के फ़र के कोट
जैसी। लेकिन माँ के कोट में न तो दुम ही है और न आँखें ही। ग्रीषा के कमरे का एक
दरवाज़ा भोजनकक्ष में खुलता है। इस कमरे में ग्रीषा की ऊँची-सी कुरसी रखी हुई है और
कमरे की दीवार पर एक घड़ी लगी हुई है
, जिसका पेण्डुलम हर
समय हिलता रहता है। कभी-कभी यह घड़ी घण्टे भी बजाती है। भोजनकक्ष के बराबर वाला कमरा
बैठक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है
, जिसमें लाल रंग की
आरामकुर्सियाँ पड़ी हुई हैं। बैठक में बिछे कालीन पर एक गहरा दाग दिखाई पड़ता है
, जिसके लिए ग्रीषा को आज भी डाँटा जाता है।
बैठक के बाद घर का
एक और कमरा है
, जिसमें ग्रीषा को घुसना मना है। उस कमरे में अक्सर पापा आते-जाते दिखाई
पड़ते हैं। पापा ग्रीषा के लिए एक पहेली ही हैं। उसकी माँ और आया तो उसकॊ कपड़े
पहनाती हैं
, खाना खिलाती हैं, उसको सुलाती हैं।
लेकिन ये पापा किसलिए होते हैं
, यह ग्रीषा को मालूम
नहीं है। ग्रीषा के लिए एक और पहेली हैं उसकी मौसी। वही मौसी
, जिसने उसे वह ढोल उपहार में दिया था, जो अब उसके खटोले के
नीचे फटा हुआ पड़ा है। यह मौसी कभी दिखाई देती है
, कभी लापता हो जाती
है। आख़िर ग़ायब कहाँ हो जाती है
? ग्रीषा पलंग के नीचे, सन्दूक के पीछे और सोफ़े के नीचे झाँककर देख चुका है, लेकिन मौसी उसे कहीं नहीं मिली।
इस नई दुनिया में
जहाँ सूरज की धूप आँखों को चुभ रही है
, इतनी ज़्यादा माँएँ
और मौसियाँ हैं कि पता नहीं वह किसकी गोद में जाए
? मगर सबसे अजीब हैं
घोड़े। ग्रीषा उनकी लम्बी-लम्बी टाँगों को देख रहा है और कुछ समझ नहीं पा रहा। वह
आया की ओर देखता है कि शायद वह उसे कुछ बताएगी। लेकिन आया भी चुप है।
अचानक क़दमों की भारी
और डरावनी आवाज़ सुनाई पड़ती है। सड़क पर लाल चेहरे वाले सिपाहियों का एक दस्ता दिखाई
देता है
, जो धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रहा है। सिपाहियों के हाथों में तौलिए हैं। वे
शायद नहाकर लौटे हैं। ग्रीषा उन्हें देखकर डर गया और काँपने लगा। उसने आया की तरफ़
सवालिया निगाहों से देखा — कहीं कोई खतरा तो नहीं है
? लेकिन आया नहीं डरी
थी। ग्रीषा ने सिपाहियों को आँखों ही आँखों में विदा किया और उन्हीं की तरह क़दमताल
करने लगा। सड़क के उस पार लम्बी थूथनों वाली कुछ बिल्लियाँ इधर-उधर भाग रही हैं।
उनकी जबानें बाहर निकली हुई हैं और पूँछें ऊपर की तरफ़ खड़ी हुई हैं। ग्रीषा सोचता
है कि उसे भी भागना चाहिए और वह बिल्लियों के पीछे-पीछे बढ़ने लगता है।
रूको, ग्रीषा रुको। — तभी आया ने चीख़कर कहा और उसे कन्धों पर से पकड़ लिया —
कहाँ जा रहे हो
? बड़ी शरारत करते हो।
वहीं सड़क पर एक औरत
टोकरी में सन्तरे लेकर बैठी हुई थी। उसके पास से गुज़रते हुए ग्रीषा ने चुपचाप एक
सन्तरा उठा लिया। — यह क्या बदतमीज़ी है
? — आया ने चिल्लाकर कहा
और सन्तरा उससे छीन लिया — तुमने यह सन्तरा क्यों उठाया
?
तभी ग्रीषा की नज़र
काँच के एक टुकड़े पर पड़ी
, जो जलती हुई
मोमबत्ती की तरह चमक रहा था। वह उस काँच को भी उठाना चाहता था
, मगर डर रहा था कि उसे फिर से डाँट पड़ सकती है।
नमस्कार, बहन जी। अचानक ग्रीषा को कोई भारी आवाज़ सुनाई पड़ी। उसने देखा कि भारी
डील-डौल वाला एक आदमी उनकी तरफ़ आ रहा था
, जिसके कोट के बटन
चमक रहे थे। उस आदमी ने पास आकर आया से हाथ मिलाया और वहीं खड़ा होकर उससे बातें
करने लगा। ग्रीषा की ख़ुशी का कोई पारावार नहीं था। सूरज की धूप
, बग्घियों का शोर, घोड़ों के दौड़ने की
आवाज़ें और चमकदार बटन — यह सब देखकर वह बेहद ख़ुश था। ये सब दृश्य ग्रीषा के लिए
नए थे और उसका मन ख़ुशी से भर गया था। वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा था।
चलो ! चल्लो ! — उस
चमकदार बटनवाले आदमी के कोट का एक पल्ला पकड़कर ग्रीषा चिल्लाया।
कहाँ चलें? — उस आदमी ने पूछा।
चल्लो ! — ग्रीषा
ने फिर ज़ोर से कहा। वह कहना चाहता था कि कितना अच्छा हो अगर हम अपने साथ माँ
, पापा और बिल्ली को भी ले लें। मगर वह अभी अच्छी तरह से बोलना नहीं जानता
था।
कुछ देर बाद आया
ग्रीषा को लेकर गली से एक इमारत के अहाते में मुड़ी। अहाते में बर्फ़ अभी भी पड़ी हुई
थी। चमकदार बटनों वाला वह आदमी भी उनके पीछे-पीछे चल रहा था। बर्फ़ के ढेरों और
अहाते में जमा हो गए पानी के चहबच्चों को बड़े ध्यान से पार करते हुए वे इमारत की
गन्दी और अन्धेरी सीढ़ियों पर चढ़कर ऊपर एक कमरे में पहुँच गए।
कमरे में धुआँ भरा
हुआ था। कोई चीज़ तली जा रही थी। ग्रीषा ने देखा कि अँगीठी के पास खड़ी एक औरत
टिक्के बना रही है। ग्रीषा की आया ने उस रसोईदारिन का अभिवादन किया फिर पास ही पड़ी
बेंच पर बैठ गई। दोनों औरतें कुछ बातचीत करने लगीं। गरम कपड़ों से लदे ग्रीषा को
गरमी लगने लगी। उसने अपने आस-पास देखा और सोचा कि इतनी गरमी क्यों है। फिर कुछ देर
वह रसोईघर की काली हो गई छत को ताकता रहा और फिर अँगीठी की तरफ़ देखने लगा।
अम्माँ — उसने कहा।
अरे…अरे…रुको भई
! — आया ने चीख़कर उससे कहा — ज़रा इन्तज़ार करो !
तब तक रसोईदारिन ने
शराब की एक बोतल और तीन जाम समोसों से भरी प्लेट के साथ मेज़ पर रख दिए। दोनों
औरतों और चमकदार बटनों वाले आदमी ने अपने-अपने जाम उठाकर टकराए और वे उन्हें पीने
लगे। उसके बाद उस आदमी ने आया और रसोईदारिन को गले से लगा लिया। फिर तीनों धीमी
आवाज़ में कोई गीत गाने लगे।
ग्रीषा ने अपना एक
हाथ समोसों की प्लेट की तरफ़ बढ़ाया। आया ने एक समोसा तोड़कर उसका एक टुकड़ा ग्रीषा को
पकड़ा दिया। ग्रीषा समोसा खाने लगा। तभी उसने देखा कि आया तो कुछ पी भी रही है। उसे
भी प्यास लग आती है। रसोईदारिन अपने जाम से उसे एक घूँट भरने देती है। घूँट भरने
के बाद वह बुरा-सा मुँह बनाता है और घूर-घूरकर सबकी ओर देखने लगता है। फिर वह धीरे
से खाँसता है और ज़ोर-ज़ोर से अपने हाथ हिलाने लगता है। रसोईदारिन उसे देखकर हँसने
लगती है।
वापिस अपने घर लौटकर
ग्रीषा अपनी माँ को
, दीवारों को और अपने खटोले को यह बताने
लगता है कि आज वह कहाँ-कहाँ गया था और उसने क्या-क्या देखा। इसके लिए वह सिर्फ़
अपनी जबान का ही इस्तेमाल नहीं करता
, बल्कि अपने चेहरे के
भावों और हाथों का भी इस्तेमाल करता है। वह दिखाता है कि सूरज कैसे चमक रहा था
, घोड़े कैसे भाग रहे थे, अँगीठी कैसे जल रही
थी और रसोईदारिन कैसे पी रही थी।
फिर शाम को उसे नींद
नहीं आती। लाल चेहरे वाले सिपाही
, बड़ी-बड़ी बिल्लियाँ, घोड़े, काँच का वह चमकता हुआ टुकड़ा, सन्तरे वाली औरत, सन्तरों की टोकरी, चमकदार बटन… ये
सभी चीज़ें उसके दिमाग में चक्कर काट रही हैं। वह करवटें बदलने लगता है और अपने
खटोले पर ही एक कोने से दूसरे कोने की ओर लुढ़कने लगता है… और आख़िरकार अपनी
उत्तेजना बरदाश्त न कर पाने के कारण रोने लगता है।
अरे, तुझे तो बुख़ार है! — माँ उसके माथे को छूकर कहती है — यह बुख़ार कैसे हो
गया
?
अँगीठी… ग्रीषा रो
रहा है और चीख़ रहा है — जा…जा… अँगीठी…भाग !

शायद इसने आज ज़रूरत
से ज़्यादा खा लिया है
, माँ सोचती है और ग्रीषा को, जो नए दृश्यों के प्रभाव से उत्तेजित था, दवा पिलाने लगती है।

(कहानी)- “रामजी महाराज या आज की सीता”: डॉ. सरस्वती जोशी, पैरिस

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रामजी महाराज  या आज की सीता” (भारत आज भी वाल्मीकि
से गुरू व सीता सी नारियों से विहीन नहीं !)

-डॉ. सरस्वती जोशी, पैरिस
     उनका असली नाम केवल
नीना को ही नहीं अधिकतर लोगों को या तो याद नहीं या ज्ञात नहीं
, पर वे एक महिला थीं, और पुरुषों में कम, स्त्रियों में, विशेष तौर से परंपरावादी स्त्रियों में
अत्यंत लोकप्रिय थीं । उन्हें रामजी महाराज के नाम से पुकारा जाता था । नीना के
मामा एक पढ़ेलिखे उच्च पदाधिकारी थे और उनके आधुनिकवाद से प्रभावित मामी गुरुओं
आदि में विश्वास नहीं किया करती थीं । अपने पिता के गाँव में स्कूल की कमी होने से
नीना ननिहाल में रहकर पढ़ाई कर रही थी और नीना की सही परवरिश की चिंता में मग्न
मामी उसके सामने विभिन्न सामाजिक समस्याओं का वर्णन करती रहती थीं । वही अक्सर
गुरुओं-साधुओं के नकारात्मक किस्से सुनाने वाली मामी अचानक उसे जल्दी-जल्दी होमवर्क
करा पास के मंदिर में कथा-कीर्तन सुनने ले जाने लगीं । जब पहली बार सुना :
“रामजी महाराज की कथा में चलना है
,” तो नीना ने कल्पना
की : कोई पंडितजी होंगे
, पर मंदिर पहुँचने पर
उसे मंच पर एक करीब ३५-३६ वर्ष की परम सुंदरी महिला दिखाई दी
, गहरे गुलाबी वस्त्रों में, जिसके चेहरे पर
अद्वितीय ओज था । उसे उसकी सूरत में पुस्तकों में पढ़ी मीराबाई का आभास होने लगा ।
उसकी वाणी के माधुर्य भरे आकर्षण को नीना जीवन भर नहीं भूल पाई । उन भजनों को वह
आज ५० साल बाद भी गुनगुनाती है भावुक सी हो कर । उसे मोहित सा कर लिया रामजी
महाराज की सौम्यता
, सुंदरता व चेहरे के ओज ने । वह अक्सर
मामी से आग्रह करने लगी मंदिर जाने का ।
 

     उस दिन निर्जला
एकादशी का व्रत था । नीना मंदिर में बैठी थी
, कीर्तन चल रहा था ।
“नटनागर तुम्हारे चरणों में
, भगवान तुम्हारे
चरणों में नित ध्यान मैं अपना लगाया करूँ… ” का भजन गा रहे थे सब । कुछ
मैले से कपड़े पहने एक व्यक्ति जो लुहार था और प्रथम पंक्ति में बैठा था अचानक
फूट- फूट कर रोने लगा । सब लोग चुप हो गये और रामजी महाराज की व उसकी ओर देखने लगे
। कुछ ही क्षणों में सब ने देखा कि रामजी की आँखों से भी धाराएँ बह रही हैं ।
उनहोंने अपनी एक शिष्या को संकेत किया कि उनका उस दिन का सारा चढ़ावा उस व्यक्ति
को दे दिया जाए । वे अक्सर अपना सारा चढ़ावा गरीबों में बाँट दिया करती थीं
, यह कोई नई बात नहीं थी पर वह व्यक्ति गिड़गिड़ाता सा बोला : “मुझे धन
की नहीं आप की ज़रूरत है
, मैं आपको लेने आया
हूँ
, आप मेरी सब चूकें माफ कर दो, मैं आप के लायक नहीं
पर मुझे और इसको क्षमा कर घर चलो… ” उसके पास बैठी एक लुहारिन उठ कर रामजी
के पैरों में पड़ने लगी । रामजी उसे क्षमा प्रदान कर देने जैसी मुद्रा में उठ
, मंच से उतर उन दोनों को शांत करने लगीं । उस समय उनके चेहरे पर अनेकों
विभिन्न रंग एक साथ दिखाई दे रहे थे । मंदिर में सन्नाटा छा गया । सैंकड़ों आँखे
नम हो गईं । रामजी महाराज जो सदा अपना परिचय स्वयं को “परदेसी फकीर” कह
कर दिया करती थीं
, उनका असली परिचय सब को मिल गया था ।
अचानक सब को १५ वर्ष पहले की घूँघट में लिपटी
, नित्य मार खा, फूट-फूट कर रोती पड़ोस की लुहारिन याद आ गई । हाँ यह वही थी ! वही अनपढ़
गँवार सी अबला ! जिसके पति के खड़ूस स्वभाव के कारण कोई उसे छुड़ाने भी नहीं जाता
था । जिसका पति : “अब तेरी छाती पर सौत लाऊँगा
,” कह सच में एक दिन एक
लुहारन को ले आया था । उस रात दोनों ने उसे खूब पीटा था । सर्दी की ठिठुरती रात
में उसका विलाप दूर तक सुनाई दे रहा था । फिर अक्सर ऐसा होने लगा । लोग आदी से हो
गये । पर एक सुबह अचानक सुनने में आया : “पड़ोस की लुहारिन कहीं भाग गई
, घर में नहीं है…” ससुराल वालों ने लांछन लगाए । मैके वालों ने कभी
सफाई दी
, कभी चार गालियाँ । लुहारों में नाता होना आम बात है लोगों ने महत्व नहीं
दिया और धीरे-धीरे सब उसे भूल गये पर सब ने यह मान लिया कि अवश्य उसने दुखी हो
दूसरा घर कर लिया
, उसे कोई मिल गया ।

      रामूड़ी लुहारन उस
रात आत्महत्या करने निकली
, नदी तक गई भी पर
डूबने का साहस नहीं कर पाई । कहाँ जाऊँ
, कहीं भी जाऊँ, पर इस पति के घर अब नहीं जाऊँगी… सोचती-सोचती वह अनायास ही रेलवे स्टेशन
पहुँच गई । टिकिट के पैसे पास में नहीं थे सो बिना टिकिट ही गाड़ी में चढ़ गई । वह
डिब्बा उज्जैन का था । थकान से चूर रामूड़ी को रोते रोते नींद आ गई
, लोगों ने सोचा : “शायद कोई रिश्तेदार मर गया है ।” जब नींद जगी
तो गाड़ी उज्जैन पहुँच चुकी थी । गाड़ी से उतर स्टेशन से बाहर कैसे निकली
, पता नहीं । कहते हैं : कानों के बुंदे टिकिट चेकर को दे दिये थे । पर
प्रश्न था अब
? अब कहाँ जाए ? एक भिखारिन से पूछा कि कुछ खाने की
जुगत कैसे बैठ पाएगी । बातों-बातों में भिखारिन ने एक रामसनेही महाराज के आश्रम का
पता बता दिया । रामुड़ी भूखी-प्यासी आश्रम में पहुँची । वहाँ के महाराज उसकी दुखद
कथा सुन भाव विभोर हो गये । उसकी सुंदर आभा में उन्हें सीता रोती दिखी या शकुंतला
यह तो नहीं पता पर उन्होंने उसे बेटी मान लिया । उस दिन से वह आश्रम में ही रह
ज्ञानार्जन करने लगी । वह आश्रम का सारा काम करती
, और बाकी समय में
गुरूजी के और शिष्यों के साथ बैठ अध्ययन करने लगी । उसकी वेशभूषा
, रहन सहन सब बदल गये, वह वहाँ के साधुओं
से गुलाबी वस्त्र पहनने लगी और अब उसका नाम “रामजी महाराज” हो गया । वह
बहुत प्रतिभाशालिनी थी । कुछ ही वर्षों में शास्त्रों का काफी ज्ञान अर्जित कर
लिया । लोग उसे महाराज की बेटी मानने लगे । धीरे-धीरे वह प्रवचन देने लगी । उसके
व्यक्तित्व व ज्ञान ने लोगों प्रभावित कर लिया और वह एक लोकप्रिय संत की श्रेणी
में गिनी जाने लगी । लोग उसके स्वरचित भजन सुनते समय मंत्रमुग्ध से हो जाते थे ।
पर उसके अपने मुहल्ले में वह आज भी थी : “एक लुहारिन
, कहीं किसी अनजाने के
साथ भागी हुई लुहारिन !” उसके समाज को शिकायत थी कि : “दुखी थी तो
माता-पिता से कह
, उनकी मार्फत दूसरा घर यानी नाता क्यों
नहीं कर लिया
? इस तरह भाग कर पीहर-सासरे की नाक क्यों कटवाई ?” परिवार में उसका
ज़िक्र करना एक प्रकार से मना सा था । वह परिवार के लिये घर की आन या शान नहीं शरम
की वस्तु थी
, एक पापणी-दुष्टणी, कलंकणी…

     उसे आश्रम में रहते
१३ वर्ष बीत चुके थे । एक दिन उसके गुरूजी ने अपनी शिष्या या समझो अपनी दत्तक
पुत्री को आदेश दिया : “अब समय आ गया है तुमको अमुक शहर में जाकर भगवद्
प्रचार करना है ।” यह तो उसके अपने शहर का नाम था । उसने बहुत टालना चाहा पर आदेश
तो आदेश था । रामजी महाराज अपने एक दो आश्रम वासियों के साथ अपने शहर में पहुँच एक
मंदिर में ठहरीं और भगवान की भक्ति का प्रचार करने लगीं । शीघ्र ही लोकप्रिय हो
गईं और हज़ारों लोग उनके प्रवचन व भजन सुनने आने लगे ।

    उनका यश फैलने लगा ।
उनका पति भी आने लगा
, उसने उनहें पहचान लिया । वह अपने मन पर
पड़े बोझ को सह नहीं पाया और उन्हें वापस घर लेजाने का आग्रह कर रहा था ।
 बड़ी विचित्र स्थिति थी । अब तो कई लोगों को ध्यान आ गया । “हाँ हाँ !
यह तो वही लुहारिन है
, अरे यह तो किसी के साथ नहीं भागी !…
पर यह ऐसी विदुषी कैसे बन गई ! आदि आदि
,” पर रामजी ने वापस उस
गृहस्थाश्रम को स्वीकार नहीं किया । वे वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति से मिलीं
, अपने पुराने परिचय को स्वीकार कर लिया, उस दिन का चढ़ावा
अपने पति के घर भिजवा दिया
, और उसी रात वापस
उज्जैन लौट गईं । कहते हैं कि रात में शहर छोड़ने से पहले अपनी ससुराल के मकान के
बाहर जा कर उसे प्रणाम किया था और आगे बढ़ते समय उनकी आँखे झर रही थीं ।
 

    अक्सर सुनते हैं कि
: “अब कलियुग है
, वाल्मीकि का युग अलग था, अब वह युग कहाँ ?” पर हम देखते हैं कि
भारत माता आज भी वाल्मीकि व सीता को जन्म देती है और देती रहेगी पर उनको
 ढूँढ पाना सरल नही !
 

     जय हो उन गुरुओं की ! जिन्होंने अनाथ
की तरह भिक्षा माँगते रामबोला को तुलसी दास बना दिया
, एक मूढ़ से व्यक्ति
को महा कवि काली दास बना दिया
, एक लुहार पीड़ित
अबला को रामजी महाराज बना दिया ।

जावेद उस्मानी की रचनाएं

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जाती है इक
बार तो उस रूप में आती नही कभी

जिंदगी को हुज़ूर अब तो , जुमला बनाईये नहीं 
आप की मंज़िल ख़ास है कि अवाम है 
धोखे में सबकी जान और फंसाईये नही 
घर की ये कोई बात नही बात है मुल्क की
सच सुनिये , सच से मुँह छुपाईये नही
सोचिए जनाब भूख से मौत के मसले का कोई
छत्तीस करोड़ गुण गान पर बहाईये नही
आज कल तो भावनाओं की सौदागरी ही वोट है
लोगो के यकीन पर यूँ चोट पहुंचाइये नहीं
……………………………………………………………..
जबरजस्त
सियासी तड़का लगा
,महका घर मारे छौंक
आश्वासन का बारह मसाला चाहा जितना दिया झोंक
समय चुनावी पर्व मनाने का , कहाँ लगी है कोई रोक 
खुद की कमियों को दूसरों पर चाहो जितना दो ठोक 
चलाओं शब्द वाण बातों का , खंजर गहरा दो भोक 
मातम क्या करना है ,जब नही किसी को कोई शोक 
………………………………………………………………
न उत्तर न
दक्षिण न पूरब न पश्चिम

न मंदिर न मजिस्द न हिंदू न मुस्लिम
हम एक थे कल भी,
आज भी हिंदोस्तां हम है 

तन पर कोई आंच आने लगे गर 
पासबानो की जान जाने लगे गर 
भूल हर आई बीती,
हम-कदम, हमनवा, हम जुबाँ
हम है
 
…………………………………………………………………
जान अपनी , हमारे खातिर है गवाई
शहादत को , सौ सौ सलाम मेरे भाई
सुनहरे गोलगप्पे बातों की रसमलाई
बधाई हो सरकार बहुत बहुत बधाई 
नए पुराने , सारे बयानो की है दुहाई
आगे बढ़ ,अब तो करो कुछ भरपाई 
…………………………………………………
सियासी – योग
––– —-
शासन का , आश्वासन 
आश्वासन का ,
शासन 

राशन पर , भाषण 
भाषण ही , राशन 
जुमला हड्डी स्व आसन
उपलब्धि स्वर्ण सिंहासन
…………………………………
शब्द बोले तो
क्या बोले
, किस सच के
तराजू में किसे तौले
 

हर ओर अजब शोर है, चुप ही रहिए कहीं जाईये नहीं
………………………………………………..
पहले से थे बीमार
हम
, दर्द अब और बढ़ा है
कीमत चुका रहे
जीने की
, न जाने कैसी दवा है
गरीबी के आंसू
वही है वक्त के अमीर कहकहे
पहले देख चुके
सुन रहे अब नए किस्से अनकहे
खुशलिबास पहन
चली कैसी
, ये नयी
सबा है
नाम जीने का
ले
, कर रही मरने की दुआ है
………………………………………………….

दीपक यात्री की रचनाएं

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आँखें मटका कर 
निकलते जा रहे हैं दिन
मुठ्ठियों के रेत-सा
फिसलता जा रहा है – जीवन
शनै: शनै: क्षीण हो रही हैं
तुम्हारी स्मृतियाँ
पाथर होता जा रहा है – मन
प्रेम, हो सके तो
मुझे माफ करना

प्रयोजन में होम हो जाने को, अब
न्योछावर कर दिया – यह जीवन। 
……………………………………..

सूरज ने धूप पूछकर नहीं बाँटे
हवाओं ने भी देखा नहीं चेहरा
चाँदनी हर आँगन उतरती रही
धरा ने भी सबको दिया बसेरा
फिर हमें यह किसने सिखाया
बटवरा रंग-रुप और दिलों का
ऊंच-नीच, झोपड़ी-महलों का
आओ, इंद्रधनुषी रगों की यहाँ
हम एक प्यारी नगरी बसाते हैं
एक सुर एक लय एक ताल में
हम, कोई नया तराना गाते हैं
हम प्रेम पुष्प है, प्रेम पल्लव हैं
प्रेम गुच्छ हैं चलो प्रेम लुटाते हैं।
………………………………………..
वह अभी सफर को निकला है और मुकाम ढूंढ़ता है
कितना पगला है, जो मिट जाऐगा वह नाम ढूंढ़ता
है
यह कैसी हवस जाने कैसी दरिंदगी है उस आदमी में
हर एक घर में माँस का लोथड़ा जिस्मों-जान ढूंढ़ता है
यह रात एक दिन उसे, उस सुबह तक भी
ले जाएगी

जो रास्तों में भटक गया है कदमों के निशान ढूंढ़ता है
दुनिया से भीड़कर भी अकेला खड़ा रहेगा वह आदमी
सूखी रोटी खा कर भी आज जो दीनो-ईमान ढूंढता है।
……………………………………………………………………
लौट जाओ गाँव री
…………
ऐ गंगा 
ऐ माई
कहाँ तोहरा गाँव है री!
के हऊवे तोहर बाउ-मतारी
माई-सी नाक है का तोहरी
ई कपार बाउ सन है का री
कहाँ से खरीदी हो ई साड़ी
केतना हजार किलोमीटर में
पसरल ई तोहार अंचरा है री!
ऐ गंगा, ऐ माई
कहाँ तोहरा गाँव है री!
चुप-चुप काहे बहती रहती है री
ई तोहार पाँव हअ कि विधाता के घड़ी
चलत-चलत थकती नहीं है का री
कहीं थमको, सुस्ताओ थोड़ा आराम करो
तहूँ हमार माई जैसी लगती हो
दिन हो की राती खटती ही रहती हो
ऐ बुढ़िया सुनती नहीं हो का री
ऐ गंगा, ऐ माई कहां तोहरा गाँव है री!
केहु गंध फेके, केहु थूक, केहु लाश
अब गुमसाईन-सी गंहात रहत हो
ऐ थेथर बुढ़िया तोहरा नाक नहीं का री!
काहे बहती हो ई कुत्तवन के बीच
इनका लिए माई-मौगी सब बराबर हैं
सब कसैया हैं, पाठी हैं सब छागर हैं
लौट जाओ बुढ़िया तुम अपना गाम
जहाँ रहो इज्जत से रहो, करो विसराम
ऐ बुढ़िया सुनती नहीं हो कान में तूर है का री!
मत बहो, मत बहो, लौट जाओ
अपना गाँव री!
……………………………………………..
मेरी कविताऐँ 
लाख की चूड़ियाँ हैं
दो अना दो की
उनके हाथ नहीं आए
कलाई जिनकी ढ़ाई
और माथा हाथीपाँव
क्योंकि यह माथे से 
पहनी जाती है
उभरती हैं 
चुभती हैं
कलेजे की कलाई पर
और खईंक बनकर
रह जाती है 
टनकती हुई घाव-सी
मेरी यह
लाख की चूड़ियाँ 
दो अना दो की। 
……………………………..
परिंदे जहाँ से चले थे लौटकर वहीं आकर बैठ गए 
पगली आँखो का धोखा है, सफर में ऐसा होता है
क्या
खंडहर कहकर जिसे हम खंडहर ही समझ लेते हैं
वहाँ भी कोई रहता है खंडहर कभी खंडहर होता है क्या
उथल-पुथल तो यहाँ हर एक घर में रहा करती है
मोहब्बत में झगड़ने का कोई और तरीका होता है क्या
किसी की सोच में कोई पले और जवान होता रहे
पगलों की किस्मत है यह, हरएक को नसीब होता है
क्या।
 
______………………….
गाँव से शहर के बीच की जमीं
बहुत ही दलदल हुआ करती है
भटकाव और घुप अंधरे से भरी
मैं हुँ कि यहीं कहीं भटक गया हूँ
शायद दलदल में धस गया हूँ
पर मैं बाहर आऊंगा
एक दिन

क्योंकि मुझे घुटनेभर पानी में 
खेत जोतना चौकी देना 
धान रोपना आता है
मैं किसान का बेटा हूं
खून जलाकर फसल उगाना
सीखा नहीं है खून में है। 
______………..
मैंने आज तक ऐसी पढ़ी नहीं 
पर मैं लिखना चाहता हूँ
लिखते-लिखते 
एक दिन लिखूँगा ही
छुच्छ भात-सी कविता
जीवन की सारी
व्यंजनाओं से दूर

एकदम निर्वात
शून्य। 
_____
घास-पात, बथुआ-पटुआ, खेसारी-खेरही-मोंसरी
सब लिखो

जब तक धार न आए, दाल-भात-तीमन-तरकारी सब लिखो
शब्द ना बनें तो सीलौटी पर पीस दो, खअल में
रखकर कूट दो

खेत-पथारी, बोईन-पसारी, काकी-दाई,
बाउ-महतारी सब लिखो।
इसलिए मत लिखो कि लिखकर नाम कमाना है, कुछ घर लाना है
लिखो कि लिखकर चैन से सोना है, मिट्टी का होना
है सो सब लिखो
पढ़कर नथुनी कहीं माने ना पुछे, जमुआरी वाली हिज्जे ही ना बुझे
सो मटियातेल में बोरकर, आँगन-पछुआर से जोड़कर-
शब्द सब लिखो।
……………………..

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