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भारतीय समाज के बाज़ारों में फुटपाथ दुकानदार : अभिन्न अंग या समस्या

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फुटपाथ दुकानदार

भारतीय समाज के बाज़ारों में फुटपाथ दुकानदार : अभिन्न अंग या समस्या

साजन भारती

सारांश

वर्तमान परिदृश्य में स्ट्रीट वेंडरों की दशा भी बदल गयी है । आज बाज़ार अपने बदलते स्वरूप में समाज के हर पहलू को प्रभावित कर रहा है। जैसे बाज़ार वस्तु विनिमय से मुद्रा विनिमय से लेकर आज ई-कोमर्स तक पहुँच गया है, वैसे स्ट्रीट वेंडरों के व्यवसाय प्रक्रिया में परिवर्तन नहीं आया है। बाज़ार पहले खुले होते थे जिसमें नए विक्रेताओं का स्वागत होता था परंतु बढ़ती जनसंख्या और सीमित क्षेत्र के कारण आज नए विक्रेता, वह भी असंगठित, इसे बाज़ार में अपनी जगह बनाने में बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। यदि स्ट्रीट वेंडर्स कई कठिनाइयों के बाद बाज़ार में अपना व्यवसाय स्थापित कर भी लेता है, तब भी आज की प्रशासन व्यवस्था इन्हें विकास के नाम पर स्वीकार नहीं कर रही है। आज सरकार भी कहीं न कहीं बाज़ारवाद और वैश्वीकरण से प्रभावित है जो असंगठित क्षेत्र को बाज़ार में उसकी पकड़ ढीली करने पर मजबूर कर रही है । जिससे मल्टीनेसनल(Multinational) कंपनियाँ और एफ़डीआई से आई विदेशी कंपनियाँ अपनी पकड़ यहाँ जमा सके। बाज़ार के इन सब कठिनाइयों के बावजूद आज स्ट्रीट वेंडरों के लिए 2014 का कानून एक आशा की किरण के समान है। जिसके लौ के सहारे स्ट्रीट वेंडर अपने जीवन में एक ऐसे आग की कल्पना कर रहे है जो उनके सारे परेशानियों के अंधेरे को खत्म कर खुशियों का प्रकाश लाएगा। बदलते बाज़ार मे स्ट्रीट वेंडरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के विषय मे अध्ययन करने का प्रयास किया गया है। साथ ही स्ट्रीट वेंडरों की सामाजिक स्थिति के आधार पर भारतीय समाज में उनके स्थान को भी जानने का प्रयास इसके माध्यम से किया जा रहा है।

प्रमुख शब्द – स्ट्रीट वेंडर, बाज़ार, स्ट्रीट वेंडर अधिनियम, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, वैश्वीकरण।

शोध आलेख

बाज़ार ऐसी जगह को कहते है जहां किसी भी चीज का व्यापार होता है। आम बाज़ार और खास चीजों के बाज़ार दोनों तरह के बाज़ार अस्तित्व में हैं। बाज़ार में कई बेचने वाले एक जगह पर होते है ताकि जो उन चीजों को खरीदना चाहें वे उन्हें आसानी से ढूंढ सकें।[1] आज बाज़ार के स्वरूप मे जो परिवर्तन हो रहा है उसका असर सिर्फ कुछ लोगों पर नहीं बल्कि पूरे समाज पर होता है। स्ट्रीट वेंडर भी इस बाज़ार और समाज का एक अभिन्न अंग है भले ही वह बाज़ार के असंगठित क्षेत्र का हिस्सा हो परंतु बदलते बाज़ार से स्ट्रीट वेंडर उतना ही प्रभावित होता है जितना की संगठित क्षेत्र के सदस्य। बाज़ार मे परिवर्तन वस्तु विनिमय से मुद्रा विनिमय और अब ई-कॉमर्स तक पहुँच गया है । परंतु इसमें सबसे बड़ा परिवर्तन वैश्वीकरण के कारण आया जिसने बाज़ार को अब स्थानीय से वैश्विक बना दिया जिसमे किसी एक स्थान पर मूल्य निर्धारित होता है और पूरा भारत उसी मूल्य पर वस्तुओं को बेचने पर मजबूर होता है । अतः आज इस बदलते बाज़ार के इस दौर मे असंगठित होने के कारण स्ट्रीट वेंडर कहीं न कहीं इस व्यवस्था पर आघात कर रहे है । फिर भी कहीं न कहीं स्ट्रीट वेंडर भी इस बदलते बाज़ार से प्रभावित होते है और वे भी इसी का एक अभिन्न अंग है।

समाज का एक अभिन्न अंग है- स्ट्रीट वेंडर

फ़ुटपाथ दुकानदार या स्ट्रीट वेंडर आज हमारे समाज का एक अभिन्न अंग है। ये हमारे शहर में गाँव में देश में बल्कि संसार के हर जगह आसानी से देखे जा सकते है। विश्व की लगभग 25% आबादी असंगठित व्यवसाय के रूप में जीविकोपार्जन कर रही है। फुटपाथ दुकानदार देश में असंगठित क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण भाग है। अनुमानतः अनेक शहरों में फुटपाथ दुकानदार आबादी का 2% है। लगभग प्रत्येक शहर में महिलाएं इन फुटपाथ दुकानदारों का एक बड़ा भाग है। फुटपाथ बिक्री शहरों और नगरों में गरीबों के लिए न केवल रोजगार का स्त्रोत है बल्कि इससे निचले तबके के लोगों को रोजगार भी मिलता है, अधिकांश शहरी आबादी और गरीबों को किफ़ायती और सुलभ सेवा प्रदान करने का जरिया है। ये फुटपाथ दुकानदार न सिर्फ सस्ता समान मुहैया कराते है बल्कि लोगों के दरवाजे तक भी वस्तुएँ और सेवाएँ प्रदान करते है। जिससे आज उन्हें वैश्वीकरण और बाजारीकरण के दौर में गरीब और निचले तबके के लोगों को हर सामान के लिए दूर और मॉल में नहीं जाना पड़ रहा।

एक फुटपाथ दुकानदार, एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जाता है जो अपने वस्तु की बिक्री सामान्य जन में करता है परंतु इसके लिए उसके पास कोई स्थायी स्थान नहीं होता जिस स्थान से वह अपने वस्तुओं की बिक्री कर सके । ऐसा नहीं है की ये दुकानदार हमेशा चलते रहते है अपितु कभी-कभी ये स्थायी रूप से एक जगह अपनी दुकान लगाते है लेकिन वह भी अस्थाई ही होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस स्थान पर वह रोज अपनी दुकान लगाता है वह उसकी नहीं होती। अधिकतर समय वह सड़कों के किनारे , दुकानों के आगे या किसी भीड़ भाड़ वाली जगहों पर अपनी दुकाने लगाते है । कई बार वे अस्थाई रूप से भी अपनी चीजों को घूम-घूम कर बेचते है। वे अपनी वस्तुओं को अपने शरीर पर, कंधों पर, धक्का गाड़ियों पर, साइकिलों पर यहाँ तक की अपने सरों के ऊपर टोकरियों में रखकर बेचते है।

A street vendor is broadly defined as a person who offers goods for sale to the public without having a permanent built up structure but with a temporary static structure or mobile stall (or hear load). Street vendors may be stationary by occupying space on the pavements or other public/private area, or may be mobile in the sense that they move from place to place carrying their wares on the push carts or in cycle or baskets on their heads, or may sell their wares in moving trains, bus , etc. in this policy document, the term urban vendor is inclusive of both traders and service providers, stationary as well as mobile vendors and incorporates all other local/region specific terms used to describe them such as hawker, Pheriwala, Rehri-wala, Footpath-dukandar, Sidewalk traders etc.(NCEUS 2006) Definition, as included in the National Policy on Urban Street Vendors, 2004, Department of Urban Employment & Poverty Alleviation, MUPA, GOI.[2]

स्ट्रीट वेंडिंग और वैश्वीकरण

भारत ही नहीं पूरे विश्व के बड़े शहरों और विकासशील देशों में फुटपाथ दुकानदारों की आबादी बढ़ती जा रही है। इसके दो मुख्य कारण, पहला वे लोग जो गरीबी और बेरोजगारी के कारण गावों से शहरों की ओर अपनी बेहतर जिंदगी की तलाश में आ रहे है और उन्हें अशिक्षित और अकुशल होने के कारण कोई संगठित क्षेत्र में काम नहीं मिल पाता। जिससे वे असंगठित क्षेत्र में ही काम तलाश करते है और कुछ फुटपाथ दुकानदार बन जाते है। दूसरा कारण है कि जो लोग बड़े देशों के संगठित क्षेत्रों में काम कर रहे है छटनी के कारण उन्हें भी असंगठित क्षेत्रो में आना पड़ रहा है । दोनों कारण वैश्वीकरण से जुड़े हुए है। आज वैश्वीकरण के कारण ही आज हर शहरों में बड़े बड़े मॉल खुल रहे है जिससे आज कई स्थायी-अस्थाई दुकानदारों के रोजगार छिन रही है।

According to the Bangladeshi delegates who the street vendors of Bangladesh were more vulnerable than these in the neighbouring countries due to poverty, lack of space for vending and lack of awareness about their rights (NASVI 2002)

स्ट्रीट वेंडिंग से उत्पन्न होने वाली सामाजिक समस्याएँ

माना जाता है कि फुटपाथ दुकानदार आज भारत में एक सामाजिक समस्या है। चूंकि अधिकतर फुटपाथ दुकानदार अशिक्षित और ग्रामीण होते है और नौकरी की तलाश में गाँव से शहरों की ओर आते है परंतु प्रयाप्त शिक्षा और कौशल न होने के कारण न तो उन्हें अच्छी नौकरी मिल पाती है और न तो वे कोई अच्छा रोजगार या व्यवसाय कर पाते है। जिससे वे या तो मजदूरी करते है या फिर फुटपाथ दुकानदार बन जाते है क्योंकि इसमें लागत और संसाधन कम लगता है और ये प्रचलन वैश्वीकरण के कारण दिन प्रतिदिन लगातार बढ़ती जा रही है जिससे शहरों में आज फुटपाथ दुकानदारों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है और इनसे होने वाली समस्याओं में भी लगातार इजाफा हो रहा है। इनके कारण आज शहरों के सड़कों, चौराहों, फुटपाथों इत्यादि में हमेशा गंदगी दिखती है। इनकी दुकानें अव्यवस्थित रूप से सड़कों, चौराहों, फुटपाथों इत्यादि में लगे होने के कारण शहरों की यातायात तो बाधित होती ही है साथ में अव्यवस्था भी फैलती है और यहाँ तक की लोगों को पैदल चलने में भी समस्या पैदा होती है। गरीब होने के कारण ये दुकानदार रहने के लिए अक्सर शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों का निर्माण करते है। जिस कारण बाल अपराध, वेश्यावृत्ति, गाली-गलोच, गंदगी से होने वाली बीमारियाँ इत्यादि मे भी इजाफ़ा होता है। यह भी शहरों मे बढ़ रही गंदगी का कारण है जबकि सरकार आज न जाने कितने करोड़ रूपये शहरों के सौंदर्यीकरण में खर्च कर रही है। प्रायः यह माना जाता है कि इन फुटपाथ दुकानदारों के कारण शहरों का विकास भी बाधित हो रहा है।

अपेक्षित उपाय

यहाँ एक बात महत्वपूर्ण है कि फुटपाथ दुकानदार सामाजिक समस्या के रूप में होने के साथ-साथ समाज का एक अभिन्न अंग भी है अतः इसके निपटान या विकास के लिए तीन उपाय हो सकते है :

  1. पूर्णतः उन्मूलन(Fully Abolishment)
  2. पूर्णतः वैधिकरण (Fully Legalized)
  3. मध्यस्थ मार्ग(Middle Way)

फुटपाथ दुकानदार यदि एक सामाजिक समस्या है तो सरकार को चाहिए कि इन्हे पूर्णतः उन्मूलन(Fully Abolishment) कर दिया जाए परंतु यह इससे न जाने और कितनी समस्याएँ सामने आएंगी। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इससे स्ट्रीट वेंडरों के मानवाधिकार का हनन होगा साथ ही लघु उद्योगों का भी हनन होगा जिससे रोजगार की आवश्यकता बढ़ेगी और बाज़ार में अवसर में भी कमी आ जाएगी। परिणामस्वरूप निम्न और मध्य वर्गीय परिवार बाज़ार मूल्यों और मॉल के अधीन हो जाएंगे और उनका झुकाव ब्रांडिंग की और अधिक हो जाएगा। अतः यह उपाय असंभव प्रतीत होता है।

यदि फुटपाथ दुकानदार समाज के अभिन्न अंग है और समाज में इनका ख़ास स्थान है तो इन्हे हमारे समाज में पूर्णतः वैधिकरण(Fully Legalized) कर दिया जाए परंतु इससे भी कई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होंगी। इसमें सबसे बड़ी समस्या तो यह होगी कि फुटपाथ दुकानदारों के अलावे समाज के अन्य लोगों के मानवाधिकार का हनन होना तय है। वैधिकरण के पश्चात ये अपनी मर्जी से अपनी दुकानें कहीं भी लगा देंगे जो कि एक भयावह अतिक्रमण को जन्म देगा जिससे न सिर्फ यातायात में अव्यवस्था आएगी बल्कि लोगों को पैदल चलने में भी समस्या उत्पन्न होंगी, जिसके कारण लोगों को आवागमन में असुविधा होगी। इसका प्रभाव स्थायी दुकानदारों पर भी प्रतिकूल पड़ेगा। अक्सर इनकी दुकाने स्थायी दुकानदारों के आगे लगती है जिससे स्थायी दुकानदारों के बिक्री में कमी आती है और उनमें असंतोष तथा खीज़(फुटपाथ दुकानदारों के प्रति) की भावना भी पनपेगी। अतः यह उपाय भी पूर्णतः लागू करना असंभव प्रतीत होता है।

अंतिम उपाय के रूप में मध्यस्थ मार्ग(Middle Way) बचता है। चूंकि पूर्णतः उन्मूलन(Fully Abolishment) और पूर्णतः वैधिकरण (Fully Legalized) को लागू नहीं किया जा सकता। हमारे देश के किसी भी नागरिक के अधिकारों की रक्षा करना और उनके आजीविका का संसाधन तलाशना हमारे सरकार का कर्तव्य है। चूंकि अधिकतर फुटपाथ दुकानदार गरीब और अशिक्षित होते है तो सरकार को चाहिए की उन्हें भी विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए शिक्षित करे और कौशल बनाए। अतः मध्यस्थ मार्ग को अपनाते हुए सरकार को ऐसी नीति और नियम बनाने चाहिए जिसके द्वारा न तो फुटपाथ दुकानदारों को पूर्णतः समाप्त करना पड़े और न ही अन्य लोगों को फुटपाथ दुकानदारों से कोई परेशानी उठानी पड़े।

इसी के अंतर्गत एक स्वस्थ कानून की मांग करते हुए बहुत से असंगठित स्ट्रीट वेंडर संगठित होकर सामने आए जिसके परिणाम स्वरूप बहुत सालों से कठिनाइयों को झेलने के बाद स्ट्रीट वेंडरों के लिए कानून की मांग के आधार पर तथा एक लंबे संघर्ष के बाद 2004 में पहली राष्ट्रीय स्ट्रीट वेंडर पॉलिसी को पेश किया गया । जिसमें कुछ संसोधन के बाद 2009 में स्ट्रीट वेंडर पॉलिसी (जीविका का संरक्षण और स्ट्रीट वेंडिंग का विनियमन) लोकसभा में पेश किया गया और फिर संसोधन के बाद 6 सितम्बर 2012 में पुनः स्ट्रीट वेंडर पॉलिसी (जीविका का संरक्षण और स्ट्रीट वेंडिंग का विनियमन) लोकसभा में पेश किया गया। 19 फरवरी 2014 को राज्य सभा में यह पारित होकर 1 मई 2014 को एक कानून का रूप ले लिया। जिससे अब स्ट्रीट वेंडरों को कानूनी अधिकार मिल गए है जिससे वे अब निर्भीकता से अपना व्यवसाय चला पाएंगे। इस कानून को लागू करवाने में NASVI (National Association of Street Vendor in India) और सरित भौमिक (TISS) का बहुत बड़ा सहयोग है ।

निष्कर्ष

इस बदलते बाज़ार ने स्ट्रीट वेंडरों को एक ऐसे मोड पर ला कर खड़ा कर दिया है जिसमें स्ट्रीट वेंडर अपने आपको न तो सुरक्षित देख पा रहा है और न ही संकट में क्योंकि एक तरफ नगर पालिका उन्हे अतिक्रमण हटाओ अभियान के नाम पर सड़कों पर से कचरे के तरह हटा देता और दूसरी तरफ सरकार उनके लिए पॉलिसी और कानून का निर्माण कर उन्हे समाज का एक अभिन्न अंग साबित कर रहा है । जिससे आज स्ट्रीट वेंडरों की समाज में स्थिति दयनीय होती जा रही है । इसके लिए न सिर्फ सरकारी संगठनों का हाथ है बल्कि गैर सरकारी संगठन भी अपने उद्देश्यों में नाकाम रहे है। कानून के लागू होने के इतने वर्षों के पश्चात भी उन्हें समाज से अलग समझा जाता है। आज भी भारत के विभिन्न हिस्सों में इसे लागू नहीं किया गया है जिससे स्ट्रीट वेंडरों को स्थिति में सुधार कल्पना मात्र लगती है। आज स्ट्रीट वेंडरों की समाज में लोगों के मध्य एक ऐसी प्रतिबिंब बनी है जो ठीक प्रतीत नहीं होती। क्योंकि आज लोगों में एक ऐसे समाज की परिकल्पना है जो पश्चिमी देशों से प्रभावित है और फिल्मों के काल्पनिक जगत से प्रभावित है। अतः आम लोगों में स्ट्रीट वेंडरों के प्रति उदासीन भावना का जन्म हो गया है जो की पूंजीवादी समाज और सरकार की नीतियों व सोच से प्रभावित दृष्टि है।

भारतीय समाज में बाज़ारों में आज औपचारिक और अनौपचारिक दोनों प्रकार कामगारों का पर्याप्त स्थान है। स्ट्रीट वेंडरों भारतीय समाज के लिए महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ अभिन्न अंग भी है। कई स्तनों पर इनके द्वारा नगरीय समस्याएँ उत्पन्न जरूर हुई है परंतु भारतीय अर्थव्यवस्था में इनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। प्रशासन के द्वारा इनके लिए जो कानून और पालिसियों का निर्माण किया गया है, उसे ही यदि समान रूप से देश के विभिन्न हिस्सों में लागू कर दिया जाए तो इनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में तो सुधार होगा ही साथ ही इनसे उत्पन्न होने वाली समस्याओं में भी कमी आएगी परिणामस्वरूप यह विकास की मुख्यधारा में जुड़कर देश के विकास में अपना योगदान करेंगे।

संदर्भ सूची

  1. Alleviation, G. o.-M. (2014). Street Vendor(Protection of livelihood and regulation of street vending) Act.
  2. bandyopadhyay, R. (2011, September 26). A Critique of the National Policy on Urban Street Vendors in India, 2009.
  3. Bhawmik, S. (2007). Street vending in urban India: The struggle for recognition. londan: Routledge.
  4. bhawmik, s. k. (2015, 03 10). Social security for street vendors. pp. 1-16.
  5. Bhowmik, S. (2010). Street Vendors in the Global Urban Economy. New Delhi: Routledge Taylor & Francis Group.
  6. Bhowmik, S. K. (n.d.). A STUDY OF STREET VENDING IN SEVEN CITIES. PATNA: NASVI.
  7. Bhowmik, S. k. (2003, April 25). National Policy for Street Vendors. Retrieved March 29, 2015, from www.jstore.org: http://www.jstore.org/stable/4413453
  8. hi.wikipedia.org/wiki/बाज़ार
  9. Bhowmik, S. (2010). Street Vendors in the Global Urban Economy. New Delhi: Routledge Taylor & Francis Group. pg. xv

शोधार्थी समाज कार्य

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय

sajanbharti@gmail.com

Ph-7745840779

थर्ड जेंडर –सामाजिक अवधारणा एवं पुनरावलोकन

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थर्ड जेंडर

थर्ड जेंडर –सामाजिक अवधारणा एवं पुनरावलोकन

शोभा जैन

हमारा पूरा समाज दो स्तम्भों पर खड़ा है पुरुष और स्त्री ।  लेकिन हमारे समाज में इन दो लिंगों के अलावा भी एक अन्य प्रजाति का अस्तित्व मौजूद है । समाज में इन्हें ‘थर्ड जेंडर’ और आमतौर सामाजिक रूप से उपनाम ‘किन्नर’ शब्द से भी संबोधित किया जाता है । प्रकृत‌ि में मौजूद ये प्रजाति नर नारी के अलावा एक अन्य वर्ग में गिनी जाती है जो न तो पूरी तरह नर होता है और न नारी। जिसे लोग किन्नर या फिर ट्रांसजेंडर के नाम से संबोधित करते हैं। इसी कारण आम लोगों में उनके जीवन और रहन-सहन को जानने की जिज्ञासा भी बनी रहती है। स्त्री-पुरुष के साथ ही शास्त्रों में किन्नरों का वर्णन भी मिलता है। ‘थर्ड जेंडर’ के अंदर एक अलग गुण पाए जाते हैं। इनमे पुरुष और स्त्री दोनों के गुण एक साथ पाए जाते हैं। संविधान में इन्हें इंटरसेक्स, ट्रांससेक्सुअल और ट्रांसजेंडर के रूप में पहचाना गया और इनकी पहचान को थर्ड जेंडर में ट्रांसजेंडर श्रेणी में रखा गया । न्यायालय द्वारा किन्नर समाज को तीसरे दर्जे का नागरिक एवं आरक्षण दे कर समाज में उनके प्रति सद्भावना का संदेश दिया गया है। दरअसल ये सदैव  समाज में चर्चा का विषय रहें हैं | आज कल इनकी मानसिक स्थिति और सोच पर कई शोध हुए हैं | आखिर हैं तो ये भी ईश्वर के बनाये इंसान ही। दरअसल ‘थर्ड जेंडर’ का संदर्भ हमारे मस्तिष्क से है, यदि कोई बच्चा लड़की पैदा होती है और लड़को की तरह व्यवहार करती है तो यह उसका यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) कहा जाएगा । थर्ड जेंडर एक तरह से न्यूट्रल है जो अन्य जेंडर के भीतर नहीं है । इसमें सभी यौनिकताओं का समावेश संभव है । यौनिकता का आशय यहाँ यौन क्रिया और यौन संबन्धों तक सीमित नहीं है बल्कि यौनिकता से अभिप्राय प्रवृतियों और व्यवहारों से है ।  इनके पैदा होने पर ज्योतिष शास्त्र का मानना है कि चंद्रमा, मंगल, सूर्य और लग्न से गर्भधारण होता है। जिसमें वीर्य की अधिकता होने के कारण लड़का और रक्त की अधिकता होने के कारण लड़की का जन्म होता है। लेकिन जब गर्भधारण के दौरान रक्त और विर्य दोनों की मात्रा एक समान होती है तो बच्चा ‘किन्नर’ पैदा होता है । ‘थर्ड जेंडर’ से जुडी बहुत सी एसी मान्यतायें और बातें रही है जिनकी जानकारी का अभाव अक्सर एक आम इंसान को रहा शायद इसलिए ‘थर्ड जेंडर’ के जीवन के बेहद प्रेरणास्पद और जानने योग्य पहलुओं से आम समुदाय अक्सर अछूता ही रहा या यूँ कहे वे केवल चर्चा,परिचर्चा तक ही सिमित रहे उसके निष्कर्ष और समाज को मिलने वाली सकारात्मक उर्जा को प्रकाश में उस तरह से नहीं लाया गया जिस तरह से आमतौर पर स्त्री –पुरुषों और एक सामान्य इंसान के जीवन से जुड़े पहलुओं को लाया जाता है । जबकि पूरी दुनियाँ में स्त्री –पुरुष के प्रकार एक ही है उनके गुण और विशेषतायें एक ही हैं ये जरुर है की हर कोई अपने स्वभाव में अलग हो सकता है और उसी वजह से दुनियाँ को उन्हें देखने का द्रष्टिकोण भी अलग –अलग हो किन्तु मानव अधिकार तो सभी के लिए जो इंसान के रूप में जन्में है एक समान है। जीने के लिए जितनी चीजे जरुरी है वे हर इन्सान के प्राथमिक अधिकारों का अहम हिस्सा है किन्तु समाज का ये वर्ग आज भी अपने अधिकारों से वंचित यह समुदाय मानव विभेद का प्रतिक इंसानी अधिकारों से मरहूम आमतौर पर सामान्य जन के हर शुभ कार्य की रस्मों से जुड़ा है किन्तु इनका अपना जीवन शुभकामनाओं से दूर क्यों ? यह विषय बहुत अधिक गहन चिन्तन के साथ -साथ इस बात पर सोचने के लिए भी विवश करता है की समाज का ये वर्ग अपने लिए एक बेहतर जिन्दगी तो बहुत दूर अपने अधिकारों के लिए भी अपनी लड़ाई लड़ते है ।

जबकि समाज का ये वर्ग आज से नहीं आदिकाल से बल्कि महाभारत काल से एक प्रेरणा स्त्रोत के रूप में सामने आया है महाभारत में शिखंडी की कथा प्रसिद्ध है वह एक किन्नर थे  उन्हें अबध्य माना जाता था । पौराणिक आख्यानों में रामायण, महाभारत और कौटिल्य के अर्थशास्त्र, कामसूत्रम् उसके बाद मुग़ल इतिहास में बहुत सी घटनाएँ मौजूद हैं । पांडवों को अपने बनवास का आखिरी वर्ष अज्ञात वास से काटना था सब छुप सकते थे पर धनुर्धर अर्जुन ,पूरे आर्यावर्त  में प्रसिद्ध था उसने ब्रह्नल्ला के नाम को धारण कर किन्नर के रूप में राजा विराट की नृत्य शाला में राजा की पुत्री उत्तरा को नृत्य सिखा कर सुरक्षा से बिताये | इसके अतिरिक्त यह भी मान्यता रही हैं की इनकी दुआएं किसी भी व्यक्ति के बुरे समय को दूर कर सकती है । मुगल काल में किन्नरों की पूरी फौज मुगल हरम की रखवाली करते थी | कई किन्नर राजनीति में भी थे सुल्तान अलाउद्दीन का  सलाहकार  मलिक काफूर किन्नर था वह  सुल्तान का दाया हाथ था | अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद वह किंग मेकर भी बना | किन्तु आज ये जानते हुए भी की इंसानी अधिकारों से मरहूम यह समुदाय कई रस्मों और शुभ कार्यों से जुड़ा है इनके लिए जीना एक अभिशाप बन गया है और मरना भी सुकून से बहुत दूर हैं । एसी मान्यता रही है की किन्नर की म्रत्यु किसी भी समय हो किन्तु उनकी शव यात्रा हमेशा रात को ही निकाली जाती थी इतना ही नहीं शव निकालने से पहले शव को जूते- चप्पलों से पीटा जाता है और पूरा समुदाय एक सप्ताह तक भूखा रहता है वास्तविकता में अगर इस द्रश्य को देख लिया जाय तो कठोर से कठोर इन्सान भी रो पड़े किन्तु उनके लिए ये मरने की रस्म भी है और पूरे जीवन पर सवाल उठाता एक कदम भी आखिर किसी का जीना इतना अभिशप्त कैसे हो सकता है? उनके साथ सहानुभूति के अभाव में कहीं न कहीं आज वे आपराधिक मामलों में स्वयं को लिप्त कर रहें है । इसलिए सामाजिक भीड़ में वे अलग- थलग ही हैं जहाँ वे जाते है लोग उनसे कतराकर निकल जाते है किन्तु शादी ब्याह बच्चे के जन्मोत्सव पर दुआए देने भर के लिए वे जरुरी होते है । लोगो से जो वो शगुन मांगते है बस वही उनकी दुआओं की कीमत है। .वे दुआएं जो हर इंसान के लिए बेहद अनमोल होती है हालाँकि न्यायलय द्वारा बहुत बड़ा और अहम फैसला लिया गया है इस समुदाय के प्रति की यह पढ़ लिख कर सामान्य जीवन जी सकेंगे। बस आवश्यकता है समाज के संवेदनशील व्यवहार की और इन्हें भी अपने भीतर अपनी कार्य शैली और सोच में बदलाव को महसूस कर स्वयं को आमजन के जीवनानुरूप स्थापित करने की । जीवन के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए इंसानी अधिकारों का उपयोग सही तरीके से होना आवश्यक है । समाज को इस समुदाय के प्रति अपना नजरियाँ सहानुभूतिपूर्ण होने के साथ- साथ सहयोगी और संवेदन शील भी बनाने की आवश्यकता है । साहित्य में भी ‘थर्ड जेंडर’ को विश्लेषित करते हुए बहुत कुछ लिखा गया जिनमें  उनकी जैविक संरचना से लेकर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक संरचना के भिन्न-भिन्न पहलुओं को सामने लाने का प्रयास किया गया उपन्यास साहित्य में ‘थर्ड जेंडर’ समुदाय को केन्द्रित करते हुए चार उपन्यास यमदीप, तीसरी ताली, किन्नर कथा और गुलाम मंडी थर्ड जेंडर पर केन्द्रित प्रचलित उपन्यास रहें है । और आगे भी अन्तर्द्रष्टि से शोध कर इन पर लिखने की आवश्यकता है जिससे समाज इनके बारे में अधिक से अधिक जान सके । हालाँकि थर्ड जेंडर समुदाय धीरे-धीरे समाज की मुख्यधारा में अपनी जगह बना रहा है किन्तु उन्हें उसके लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है तरह तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है । क़ानूनी रूप से भले ही अधिकार मिल गए हो किन्तु समाज की मानसिकता से इस वर्ग का संघर्ष अभी जारी है ।

सुप्रीम कोर्ट ने थर्ड जेंडर को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा मानते हुए सरकारी भर्तियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण देने के निर्देश दिये है । संविधान की धारा १४,१६ और २१ का हवाला देते हुए थर्ड जेंडर को सामान्य नागरिक अधिकार शिक्षा रोजगार और सामाजिक स्वीकार्यता पर समान अधिकार देने के निर्देश जारी किये गए है इसी के साथ राज्य सरकार ने तृतीय लिंक समुदाय को शासन की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए सभी जिलों में जिला स्तरीय समितियों के गठन के निर्देश जारी किये है । समय के परिवर्तन के साथ क़ानूनी रूप से विकास हो रहा है किन्तु सामाजिक रूप से इंसानियत से बेहद परे आज भी ये समुदाय अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है । समाज ने इंसानियत के जिस तकाजे पर इस समुदाय को मनुष्यता के सामाजिक पैमाने से बाहर किया । वही मनुष्यता मुख्य धारा से अधिक इनमें दिखती है । इतिहास और पौराणिक आख्यानों में कहीं भी इन्हें अनुपयोगी नहीं माना गया है, न ही पुनरउत्पादन की प्रक्रिया में इनकी निष्क्रियता को इनके मनुष्य होने पर ही चिंहित किया गया है,  जैसा कि समाज में होता है । समाज की सोच में शोध चिन्तन की महती आवश्यकता है क्योकि सामाजिक धारणाओं और पौराणिक कथाओं से भिन्न साहित्य में इनकी एक अलग छवि गढ़ी गई है । इस छवि की पड़ताल अनेक संदर्भों के साथ करने की जरुरत है । साथ ही साहित्य की अंतर्दृष्टि  ‘थर्ड जेंडर’ को कैसे देखती है यह समझना व देखना भी आवश्यक होगा । निः संदेह ‘थर्ड जेंडर’ समुदाय के प्रति सामाजिक द्रष्टिकोण जैसे विषयों पर पुनरावलोकन एवं गहन अध्ययन की आवश्यकता है । बहुत काम करना होगा इस विषय पर हर संदर्भ में जाकर खोजना समझना होगा । केवल अवलोकन द्रष्टि या उपरी सतह से सिर्फ उनके उपनामों को परिभाषा ही मिल पायेगी। वास्तविक सम्मान नहीं । किसी भी रूप में इंसान का होना अपने आप में एक जेंडर है उसे हीन भावना से देखना या फिर उसके प्रति अपनी संवेदनशीलता को छद्म कर देना मानवता और इंसानियत दोनों के लिए अभिशाप है । शायद ‘इंसान होने के नाते इन्सान का फर्ज इंसानियत का सम्मान और सुरक्षा होना चाहिए, न की लिंग भेद जैसी ओछेपन से ग्रसित मानसिकता से उनका आंकलन विश्लेष्ण कर समाज को प्रदूषित करना’। मनुष्य के रूप में इन्सान होने के नाते ‘थर्ड जेंडर’ से संबोधित इस समुदाय के प्रति ‘सामाजिक दुर्व्यवहार’ को पनपने से रोकना इंसानियत के लिए एक शुभ कार्य की पहल होगी ।

उज्जैन में आयोजित वर्ष २०१६ का महाकुम्भ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है की ‘थर्ड जेंडर’ के प्रति तुलनात्मक द्रष्टि से समाज में बड़ा परिवर्तन आया है ये समुदाय धीरे-धीरे समाज की मुख्यधारा में अपनी जगह बना रहा है। महाकुम्भ में प्रथम बार ‘थर्ड जेंडर’ संप्रदाय का एक अलग स्थान निर्धारित कर लाखों श्रध्दालुओं ने उनसे आशीर्वाद एवं दुआएं लेकर समाज के इस वर्ग पर पुनरवलोकन कर अंतर्दृष्टि डालने की पहल कर दी है साथ ही उनसे जुड़े विषयों पर आधारित सामाजिक अवधारणा पर चिन्तन और शोध करने हेतु विवश भी किया है ।

नाम –शोभा जैन

स्थान –‘शुभाशीष’, सर्वसम्पन्न नगर,इंदौर

कार्य क्षेत्र –आलेख, कहानी, कविता,शोध पत्र लेखन में संक्रिय मुद्रित एवं अंतर्जाल पत्रिकाओं में प्रकाशन स्वतंत्र लेखन पी-एच.डी.रिसर्च स्कालर –‘हिंदी साहित्य’

संपर्क –mob .-9977744555

e-mail –idealshobha1@gmail.com

कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में प्रकृति-बोध का आधुनिक सन्दर्भ

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kavita mein prakriti

कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में प्रकृति-बोध का आधुनिक सन्दर्भ

डॉ. सन्तोष विश्नोई

सम्पर्क- बुधाराम विश्नोई, आशीष पेट्रोल पम्प के पास,

एनएच 11, मोमासर बास, श्रीडूँगरगढ़ बीकानेर-331803

मो. 9887547908

शोध सारांश

कवि केदारनाथ अग्रवाल का प्रगतिशील कवियों में महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। उनकी कविता ग्रामीण परिवेश एवं जनजीवन को मानवीय आधार प्रदान करती नज़र आती है। दूसरे शब्दों में कहें तो वे लोकजीवन के कवि है। उनकी ‘कविता का प्राणतत्व लोकजीवन’ है। यह बहुत बड़ा सच है कि कविता को अनिवार्यतः लोक से जुड़ना ही पड़ता है। क्योंकि कविता की सामूहिक चेतना लोक से उपजी है, इसी लोक से कविता में सहजता आती है। कविता की रचनात्मक जटिलता के बावजूद वह लोक तत्वों से ही अधिकाधिक संप्रेषणीय बन जाती है।

बीज शब्द – कवि केदारनाथ, प्रकृति-बोध, आधुनिकता, लोकजीवन, प्रकृति की कविता, गाँव एवं प्रकृति

शोध आलेख

प्रकृति और मनुष्य का नाता बहुत पुराना है। सौंदर्य का क्षेत्र मुख्यतः प्राकृतिक उपादानों से बना होता है। मनुष्य के इन्द्रियबोध का विकास प्रकृति के घात-प्रतिघात का परिणाम है। केदारनाथ सहृदय संवेद्य भावबोध के कवि हैं, प्रकृति उनकी कविताओं में पूर्ण सौष्ठव और निखार पाकर गौरवान्वित हुई है। केदारनाथ अग्रवाल की रचनाओं में परम्परागत रूप से लोकतत्वों का निरूपण नहीं हुआ है फिर भी उनका काव्य लोक-जीवन के हर रंग से रंगा गया है। इनकी कविताओं में मानव और प्रकृति के सौंदर्य का सहज, वेगवान और उन्मुक्त रूप मिलता है। गाँव एवं प्रकृति के प्रति उनकी कविता में आत्मीयता दिखाई देती है। गोविन्द प्रसाद कहते हैं कि ‘‘केदारनाथ अग्रवाल की कविता का स्थायी भाव प्रकृति है, उसमें भी प्रकृति का लोक रूप उन्हें सहज ही आकृष्ट करता है। परिणामस्वरूप कभी नारी और प्रकृति का योग चेतन को स्फुरित करता है तो कभी मजदूर किसान का श्रम-संघर्ष और कभी प्रकृति का ताना-बाना कवि के संवेदन को काव्य संस्कार देता चलता है। कवि केदार की अधिकांश कविताएँ इसी पैटर्न पर चलती हैं। अपवाद के रूप में कुछ कविताएँ विशुद्ध प्रकृति पर भी मिल जाएगी।’’[1] सबसे खास बात यह है कि केदारनाथ अग्रवाल के प्रकृति चित्रण में संवेदनात्मक पक्ष कभी उपेक्षित नहीं रहा, बल्कि केदारनाथ के काव्य में प्रकृति का जन-जीवन के बुनियादी सवालों से सीधा सरोकार करती नज़र आती है। इसलिए सच्चे मायने में केदारनाथ लोकधर्मी संवेदना के सर्वश्रेष्ठ कवि है। वे कहते हैं-

‘‘छोटे हाथ/सबेरा होते

लाल कमल से खिल उठते हैं।

करनी करने को उत्सुक हो,

धूप हवा में हिल उठते हैं।

छोटे हाथ/परिश्रम करते

ईंटों पर ईंटें धरते हैं।

मधुमक्खी से तन्मय होकर

मधुकोषों से घर रचते हैं

हर घर में आशा रहती हैं

आशा के बच्चे पलते हैं।’’[2]

केदारनाथ के काव्य में चित्रित प्रकृति की विशेषता बताते हुए नरेन्द्र पुंडरीक लिखते हैं, ‘‘वे अकसर क्षण की अनुभूतियां और चित्र प्रस्तुत करते हैं, लेकिन उनका समर्पण क्षण को नहीं बल्कि युग को है, क्षण को प्रस्तुत करते हुए भी क्षण का मोह छोड़ने में ही केदार का व्यक्तित्व विशद् और अर्थ से भरा हुआ है। सरलता में संश्लिष्टता, सहजता में रूप, बिंब में अर्थ, यथार्थ में कल्पना, क्षण में युग और वर्तमान में भविष्य की अन्वित से समृद्ध केदार के स्वर आधुनिक हिन्दी कविता की बहुत बड़ी उपलब्धि हैं, केदारनाथ अग्रवाल की प्राकृत सौंदर्य की कविताओं में बिंबों का संश्लिष्ट रूप ही नहीं भाषा का वह फोटोजनित सौंदर्य भी है कि एक दम से आँखें रूक एवं टकी-सी रह जाती हैं।’’[3] कवि केदारनाथ के काव्य में ग्रामीण भारत और आम जनजीवन के दैनिक संघर्षों की विविध एवं वास्तविक चित्र खींचा गया है। उनके काव्य में लोक-जीवन और ग्रामीण जीवन की संवेदना का विविध रूपों में चित्रण पाया जाता है। जिसमें खेत की बुवाई, कटाई करते किसान वर्ग है और श्रमिक अपने हक और अधिकार के लिए संगठित होकर मजदूरी करता श्रमिक, गाँव की सुबह, शाम, धूप, बारिश आदि सभी का यथार्थ चित्रण उनकी कविताओं का विषय बने हैं। गाँवों की जीवंतता, नैसर्गिकता को कवि ने सहजता से प्रस्तुत किया है-

‘‘नीम के फूल

दूध की फुटकियों से झरे

मुलायम-मुलायम

कठोर भूमि पर बिखरे

जैसे कोई

प्यार से शरीर स्पर्श करें।’’[4]

केदारनाथ अग्रवाल में बिम्ब विधान की अद्भुत शक्ति है, वे सक्षम बिंब विधायक है। नरेन्द्र पुंडरीक का कथन है कि ‘‘केदार के सौंदर्य बिंबों में एक भी बिंब ऐसा नहीं मिलेगा जिसमें जीवन के प्रति उद्दाम ललक न हो, जीवन होगा और जीवन से जुड़े श्रम का सौंदर्य अनिवार्य रूप से उसमें परिलक्षित होता है।’’[5] लोक-जीवन में प्रकृति और मानव दोनों सहचर हैं। केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में लोक-जीवन के साथ प्रकृति का स्वाभाविक चित्रण मिलता है। कवि के इस चित्रण में प्रगतिशीलता और लोकधर्मी संवेदना का अनोखा रूपायन सहजता से प्रकट हुआ है। प्रकृति और लोक-जीवन की संवेदनाओं का ऐसा चित्रण अन्यत्र मिलना दुर्लभ होता है। प्रकृति के माध्यम से कवि ने होली का जो गत्यात्मक बिंब बुना है, वह लोक प्रचलित बिंब से ग्रहित है। उदाहरण-

‘‘फूलों ने /होली

फूलों से खेली

लाल गुलाबी/ पीत-परागी

रंगों की रंगरेली पेली

काम्य कपोली /कुंज-किलोली

अंगों की अठखेली खेली।’’[6]

डॉ. रवीन्द्रनाथ मिश्र कहते हैं कि, ‘‘कवि केदार की कविता में प्रकृति और लोक परिवेश की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका को अलग करके नहीं देखा जा सकता। कालिदास, तुलसीदास, निराला, नागार्जुन की परम्परा में केदार के घन लोकजन के कल्याण से जुड़े हैं। केदार की लोक-दृष्टि मानववादी है। लोक-जीवन का कोई ऐसा कोना नहीं है जो कि उनकी आँखों से ओझल हो गया है।’’[7] कवि केदारनाथ ने लोक-जीवन का इतना गहराई से चित्र खींचा है कि उनकी आँखों से छोटी-छोटी संवेदनाएँ भी कहीं ओझल नहीं हो पाई हैं। जिस प्रकार वे सहज जीवन बोध के कवि हैं, उसी प्रकार प्रकृति भी उनकी कविता में सहज बोध को व्यक्त करती है। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जन-जीवन की धड़कने बोलती है। सही अर्थों में वे ग्रामीण सामाजिक जीवन के चितेरे हैं। डॉ. रामविलास शर्मा लिखते हैं, ‘‘केदार का गाँव सारे देश की प्रगति-दुर्गति का मानदंड बन जाता है।’’[8] केदारनाथ अग्रवाल मूलतः किसान और श्रम के कवि हैं, उनकी कविताएँ गाँव व किसान का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करती है। इसलिए डॉ. रामविलास शर्मा आगे लिखते हैं कि ‘‘दूर खड़े होकर किसान को देखने वाले कवि और होंगे केदार बहुत नजदीक से उसकी श्रम प्रक्रिया देखते और उसका वर्णन करते हैं…उनकी कविता देखने में बहुत आसान लगती हैं, आकार में भी बहुत छोटी होती है, इसलिए उनकी सरलता भुलावे में डाल देती है। कई बार पढ़ने, ठहर कर विचार करने, कवि की मनोदशा में डूबने से उनकी गहराई का अंदाजा होता है। उनकी भाषा देखकर लगता है कि कोई किसान कविता लिख रहा है।’’[9] कवि संवेद्य बिंबों की रचना से पूरा ग्रामीण जीवन और भारतीय संस्कृति का संस्कार उतार देता हैं-

‘‘ये माटी के दिए/मौन जलते /मुसकाते

अंधकार को मार भगाते/ पावन पर्व प्रकाश मनाते।’’[10]

कवि केदारनाथ ने प्रकृति के सामान्य रूपों में ऋतुओं की सुंदरता का चित्रण बड़ी संजीदगी से अंकित किया है। वे बसंत ऋतु का स्वरूप कुछ इस तरह दिखाते हैं –

‘‘यह बसंत जो

धूप, हवा, मैदान, खेत, खलिहान, बाग में

निराकार मन्मथ मदांध-सा रात-दिवस साँसे लेता हैं

जानी-अनजानी सुधियों के कितने-कितने संवेदों से

सरवर, सरिता

लता गुल्म को, तरु-पातों को छू लेता है

और हजारों फूलों की रंगीन सुगंधित सजी डोलियां

यहां वहां चहुं ओर खोलकर मनोमोहिनी रख देता है

वही हमारे/ और तुम्हारे अंतःपुर में

आज समाए /हमको-तुमको

आलिंगन की मन्मयता में एक बनाए।’’[11]

इस प्रकार शरद को देखकर वे चित्रित करते हैं –

‘‘मुग्ध कमल की तरह /पांखुरी-पलकें खोले

कंधों पर अलियों की व्याकुल

अलकें तोले / तरल ताल से

दिवस श रद के पास बुलाते

मेरे मन में रस पीने की / प्यास जगाते।’’[12]

इनकी अधिकांश कविताओं में प्रकृति के मानवीकरण का दर्शन देखते हैं और वह मनुष्य के साथ, साथी बनकर संघर्ष करती है। केदार ने बादलों के गर्जन, तर्जन और बारिश के श्रव्य बिंब बहुत सुंदर खींचा है जिसमें वर्षा पूर्व और वर्षा बाद के परिवर्तन स्पष्ट झलकते हैं-

‘‘अंबर का छाया मेघालय

तड़-तड़-तड़-तड़ / तड़का टूटा

रोर-रोर ही / फूटा, फैला

चपला चैंकी/ फिर-फिर चैंकी

बाहर आकर/ चम-चम चमकी

गदगद-गदगद/ गिरा दौंगरा

पानी-पानी हुआ धरातल

कल-कल/ छल-छल

लहरा आंचल।’’ [13]

केदारनाथ ने प्रकृति के जीवन उपयोगी सभी उपादानों को अपने काव्य की विषयवस्तु बनाया, उनकी कविता में चित्रात्मकता, तार्किकता और बौद्धिकता के समावेश से भरी होती है,। केदारनाथ अग्रवाल के काव्य चित्रों की विशेषता बताते हुए मंजुल उपाध्याय लिखते हैं, ‘‘केदारनाथ के चित्रों की विशेषता यह है कि वे उनके भावों को स्थापत्य प्रदान करते हैं। इसी कारण उनकी कविता में स्थापत्य-जैसी परिपूर्णता होती है। तरलता अथवा गति की कमी उसमें नहीं होती, लेकिन अपनी ओर कवि उसे एक रूप में बाँध देता है। यह बात केदार की छोटी-छोटी कविताओं में खासतौर से देखी जा सकती है, जिनमें वे एक ही चित्र अंकित करते हैं और उसे तरह से ‘फिनिश’ कर देते हैं।’’[14] उनके काव्य में ऐसी अनेक कविताएँ देखने को मिलती हैं जिनमें न केवल प्रकृति का सुंदर रूप हमारे आता है बल्कि उनके माध्यम से देश की तत्कालीन परिस्थितियों, समस्याओं की व्यंजना भी है। वे लिखते हैं –

‘‘यह धरती है उस किसान की

जो मिट्टी का पूर्ण पारखी

जो मिट्टी के संग साथ है

तपकर/गलकर/जीकर/मरकर/

खपा रहा है जीवन अपना

देख रहा है मिट्टी में सोने का सपना

मिट्टी की महिमा गाता

मिट्टी के ही अंतस्थल में

अपने तन की खाद मिलाकर

मिट्टी को जीवित रखता है

खुद जीता है।’’[15]

कवि केदारनाथ ने अपनी प्राकृतिक कविताओं में लोक-जीवन के गहरे और व्यापक परिप्रेक्ष्य में जन-जीवन और प्रकृति को परस्पर गूंथा है। वे लोक बिंबों और लोक गीतों की सहज लय में ग्रामीण सौंदर्य को अभिव्यक्त किया है। यहीं नहीं, इनके यहां लोक-जीवन के पारिवारिक और सामाजिक संबंध भी प्रकृति के विविध उपादानों द्वारा साकार हो उठे हैं इसलिए केदारनाथ के अनुसार ‘धूप मैके में आई बेटी की तरह मग्न और प्रसन्न है-

‘‘धूप चमकती है चांदी की साड़ी पहने

मैके में आई बेटी की तरह मगन है

फूली सरसों की छाती से लिपट गयी है

जैसे दो हमजोली सखियां गले मिली हैं

भैया की बांहों से छूटी भौजाई-सी

लंहगे को लहराती लचती हवा चली है।’’[16]

प्रस्तुत उदाहरण में कवि ने जिस बिंब को उकेरा है वह लोकजीवन से कवि के निकट परिचय का प्रमाण है। इस बिंब में ग्रामीण प्रकृति अपनी संस्कृति के साथ मिलकर संयुक्त रूप में प्रकट हुई है। ग्रामीण संस्कृति की होली उत्सव की झलक उनकी फाल्गुनी प्रकृति में मिलती है-

‘‘चोली फटी सरस सरसों की

नीचे गिरा फागुनी लहंगा

ऊपर उड़ी चुनरिया नीली

देखो हुई पहाड़ी विवसन।’’[17]

प्रकृति के इन रम्य-मधुर चित्रों द्वारा केदारनाथ ने ग्रामीण लोक जीवन की यथार्थ झांकी बुनी है। लोक-जीवन में प्रचलित रीति-रिवाज, पर्व-त्योहार आदि को सामाजिक -सांस्कृतिक परिवेश के साथ अपनी कविताओं में समेटने का प्रयास किया है। इसलिए कवि की प्रकृति-चित्रण केवल प्रकृति के सौंदर्य का यथातथ्य वर्णन मात्र नहीं है बल्कि वह लोक जीवन की सामाजिकता से समन्वित सौंदर्य का रूपायन है। यही कारण है कि डॉ. रामविलास शर्मा उनकी कविताओं को लोकसंस्कृति की उपज मानते हैं, जो लोक संस्कृति को समृद्ध करती है।’’[18] केदारनाथ अग्रवाल की कविता में प्रकृति भी अपने सौंदर्य के साथ निखरी है। उनकी कविताओं में ‘‘पश्चिमी अस्तित्ववादी ढंग का, अमूर्त और व्यक्तिवादी अजनबीपन दिखाई नहीं देता, तो इसका कारण कवि का देश और जन से सच्चे रूप से जुड़ा होना है। क्योंकि वे स्वयं देश और लोक के बीच अपने को अजनबी महसूस नहीं करते थे और लोगों के बीच जीते थे। अतः उनकी कविताएँ भाववादी अजनबीपन के एहसास से दूर रही है।’’[19] कवि गाँव के वास्तविक रूप को अपनी कविता के माध्यम से चित्रित करते हैं-

‘‘सड़े घर की, गोबर की बदबू से दबकर

महक जिंदगी के गुलाब की मर जाती है।’’[20]

कवि केदारनाथ अग्रवाल प्रकृति के ऐसे चितेरे हैं जो मानव की अनुभूतियों को निसर्ग में स्थापित करते हुए काव्य की रचना की है जिसमें लोक-बोध संवेदना के साथ बखूबी वर्णन किया है। डॉ. रामविलास शर्मा का कथन है कि, ‘‘आकाश, पवन, जल, प्रकाश-इन्हें देखकर केदार की प्रतिक्रिया गणसमाजी की उस आदिम मानव सी होती है, जो उत्पादन का इतना विकास कर चुका हो कि प्रकृति से त्रस्त न हो, देवी-देवताओं को पशुबलि अथवा नरबलि से तुष्ट करने को प्रवृत्त न हो, उगते हुए सूर्य को देखने और उससे प्रसन्न होने की क्षमता उसमें हो।…आज का किसान गणसमाजों के प्रकृति प्रेमी उक्त आदिम मानव का है। आज का किसान गणसमाजों का साम्यवादी संस्कार अपने उप-चेतन में कहीं गहरे संजोये हैं, ठीक वैसे ही प्रकृति से उसका वह हर्ष उल्लास वाला संबंध अब भी कहीं अटूट बना हुआ है। केदार इस अटूट संबंध के कवि हैं, राजनीति के स्तर से और गहरे उतर कर वह अपने देश की जनता के सूक्ष्म, आदिम संस्कार सूत्रों से बंधे हैं।’’[21]

प्रकृति में मनुष्य का हस्तक्षेप बढ़ने से मानव प्रकृति का उपकरण न रहकर प्रकृति को ही उसने अपना उपकरण बना लिया है। प्रकृति चित्रण में कवि ने प्रकृति के किसी भी रमणीय दृश्य के अंकन करने से अपने को वंचित नहीं रखा। केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में प्रकृति का जो वर्णन मिलता है, उसमें वह बोलती हुई दिखाई देती है। केदारनाथ के काव्य में जिस प्राकृतिक सौंदर्य का अंकन हुआ है, वे प्रकृति के कोमल और कठोर दोनों रूपों में देखते हैं। उनकी प्रकृति विषय कविताओं में प्रकृति के लगभग सभी उपादानों पर कविताओं की रचना हुई है। वे बुंदेलखंड की धरती से जुड़े कवि है। उन्होंने वहाँ के खेतों-खलिहानों, पशु-पक्षियों, नदी आदि पर सशक्त कविताओं की रचना की है। इसके अलावा भी कवि की दृष्टि से प्रकृति का कोई अंग ऐसा नहीं है, जो ओझल हुआ हो। उनकी प्रकृति विषयक कविताओं को पढ़कर यह पूरा संसार सुंदर लगने लगता है। उनकी प्रसिद्ध कविता है-

‘‘फूल नहीं/ रंग बोलते हैं

पंखुरियों से/ समुद्र के अंतस्तल के

नील, श्वेत और गुलाबी

शंख बोलते हैं बल्लरियों से

फूल अखंड मौन हैं

रंग अमन्द नाद है/ अखंड मौन

अमन्द नाद

एक ही वृन्त पवर प्रतिष्ठित

धैर्य और उन्माद है।’’[22]

उन्होंने प्रकृति के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े तत्वों का चित्रण अपनी कविताओं में किया है। धरती, आसमान, नदी, झरना, खेत-खलिहान, हवा, सूरज, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, बाग-बगीचे, फूल, पहाड़, पत्थर, बादल, धूप आदि का सुंदर चित्रण उन्होंने अपनी कविताओं में किया है। ग्राम प्रकृति के जितने भी चित्र हो सकते हैं, उन्होंने उन सबको अपनी कविताओं उतारने का प्रयास किया है। ‘‘केदार की कविताओं का असली वैभव उनकी प्रकृतिविषयक कविताओं में प्रकट हुआ है। उनकी प्रकृति स्वतंत्र भी है और वह उनके प्रेम तथा उनकी लोकचेतना अथवा जनचेतना से भी जुड़ी हुई है। छायावादी की तुलना में वह अत्यधिक मूर्त है, यानी उसमें ऐंद्रियता बहुत ज्यादा है। केदार ने ‘फूल नहीं रंग बोलते हैं’ की भूमिका में कहा भी है कि मैंने प्रकृति को चित्र में देखा है।’’[23]

निष्कर्षतः प्रकृति चित्रण में कवि ने प्रकृति के किसी भी रमणीक दृश्य के अंकन करने से अपने को वंचित नहीं रखा। केदारनाथ की प्रकृति रचना में क्षण तो छूटा ही नहीं बल्कि अनंत को भी बांधा गया है। यही प्रकृति के सर्वोत्तम चितेरे कवि की श्रेष्ठतम विशेषता है। केदारनाथ के काव्य में प्रकृति के महत्त्व को बताते हुए डॉ. रणजीत का कथन है-‘‘हिन्दी के प्रगतिशील कवियों में केदारनाथ अपने प्रकृति प्रेम और आँचलिक कविताओं के कारण याद किए जाते रहेंगे।’’[24] निस्संदेह केदारनाथ अग्रवाल की कविता लोक-जीवन की संवेदनाओं की कविता है, जिसमें प्रकृति चित्र भी लोक-जीवन को महकाने के लिए उतरती है। उनके काव्य में प्रकृति चित्रण अनेक बार मनुष्य-जीवन के यथार्थ सत्य का बोध कराने के लिए इनकी कविताओं में प्रकट हुई है। डॉ. खगेंद्र ठाकुर केदारनाथ अग्रवाल की संवेदना के बारे में लिखते हैं ‘वे जीवन की समग्रता के कवि है।’’ [25]

सन्दर्भ सूची:

  1. गोबिंद प्रसाद, कविता के सम्मुख, पृ. 84
  2. केदारनाथ अग्रवाल, गुलमेंहदी, पृ.133
  3. आजकल मासिक, नरेन्द्र पुंडरीक, मई 2011, पृ. 36
  4. केदारनाथ अग्रवाल, फूल नहीं रंग बोलते हैं, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 109
  5. आजकल मासिक, नरेन्द्र पुंडरीक, मई 2011, पृ. 37
  6. केदारनाथ अग्रवाल, खुली आँखे खुले डैने, पृ. 54
  7. डॉ. रवीन्द्रनाथ मिश्र, केदार काव्य की लोकधर्मिता, आलोचना त्रैमासिक, जुलाई-सितंबर 2011, पृ. 66
  8. डॉ. रामविलास शर्मा, प्रगतिशील काव्यधारा और केदारनाथ अग्रवाल, पृ. 46
  9. डॉ. रामविलास शर्मा, प्रगतिशील काव्यधारा और केदारनाथ अग्रवाल, पृ. 47
  10. केदारनाथ अग्रवाल, पुष्पदीप, पृ. 36
  11. केदारनाथ अग्रवाल, फूल नहीं रंग बोलते हैं, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 39
  12. केदारनाथ अग्रवाल, फूल नहीं रंग बोलते हैं, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 62
  13. केदारनाथ अग्रवाल, खुली आँखे खुले डैने, पृ. 86
  14. नंदकिशोर नवल, अथातो काव्य जिज्ञासा, पृ. 100
  15. केदारनाथ अग्रवाल, गुलमेंहदी, पृ. 56
  16. केदारनाथ अग्रवाल, फूल नहीं रंग बोलते हैं, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 63
  17. केदारनाथ अग्रवाल, फूल नहीं रंग बोलते हैं, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 154
  18. डॉ. शशि शर्मा, प्रगतिशील कविता में लोकतत्त्व, पृ. 77
  19. डॉ. मधुछंदा, श्रम का सौंदर्यशास्त्र और केदारनाथ अग्रवाल का काव्य, पृ. 131
  20. केदारनाथ अग्रवाल, गुलमेंहदी, पृ. 63
  21. डॉ. रामविलास शर्मा, प्रगतिशील काव्यधारा और केदारनाथ अग्रवाल, पृ. 58-59
  22. केदारनाथ अग्रवाल, फूल नहीं रंग बोलते हैं, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 107
  23. नंदकिशोर नवल, केदारनाथ अग्रवाल की काव्य-चेतना, बांदा का योगी: केदार, विश्वरंजन (संपा.) पृ. 393
  24. विजेन्द नारायण सिंह, केदार व्यक्तित्व और कृतित्व, पृ. 105
  25. वसुधा पत्रिका, अंक जनवरी-जून 1987, पृ. 70
  1. गोबिंद प्रसाद, कविता के सम्मुख, पृ. 84

  2. केदारनाथ अग्रवाल, गुलमेंहदी, पृ.133

  3. आजकल मासिक, नरेन्द्र पुंडरीक, मई 2011, पृ. 36

  4. केदारनाथ अग्रवाल, फूल नहीं रंग बोलते हैं, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 109

  5. आजकल मासिक, नरेन्द्र पुंडरीक, मई 2011, पृ. 37

  6. केदारनाथ अग्रवाल, खुली आँखे खुले डैने, पृ. 54

  7. डॉ. रवीन्द्रनाथ मिश्र, केदार काव्य की लोकधर्मिता, आलोचना त्रैमासिक, जुलाई-सितंबर 2011, पृ. 66

  8. डॉ. रामविलास शर्मा, प्रगतिशील काव्यधारा और केदारनाथ अग्रवाल, पृ. 46

  9. डॉ. रामविलास शर्मा, प्रगतिशील काव्यधारा और केदारनाथ अग्रवाल, पृ. 47

  10. केदारनाथ अग्रवाल, पुष्पदीप, पृ. 36

  11. केदारनाथ अग्रवाल, फूल नहीं रंग बोलते हैं, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 39

  12. केदारनाथ अग्रवाल, फूल नहीं रंग बोलते हैं, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 62

  13. केदारनाथ अग्रवाल, खुली आँखे खुले डैने, पृ. 86

  14. नंदकिशोर नवल, अथातो काव्य जिज्ञासा, पृ. 100

  15. केदारनाथ अग्रवाल, गुलमेंहदी, पृ. 56

  16. केदारनाथ अग्रवाल, फूल नहीं रंग बोलते हैं, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 63

  17. केदारनाथ अग्रवाल, फूल नहीं रंग बोलते हैं, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 154

  18. डॉ. शशि शर्मा, प्रगतिशील कविता में लोकतत्त्व, पृ. 77

  19. डॉ. मधुछंदा, श्रम का सौंदर्यशास्त्र और केदारनाथ अग्रवाल का काव्य, पृ. 131

  20. केदारनाथ अग्रवाल, गुलमेंहदी, पृ. 63

  21. डॉ. रामविलास शर्मा, प्रगतिशील काव्यधारा और केदारनाथ अग्रवाल, पृ. 58-59

  22. केदारनाथ अग्रवाल, फूल नहीं रंग बोलते हैं, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 107

  23. नंदकिशोर नवल, केदारनाथ अग्रवाल की काव्य-चेतना, बांदा का योगी: केदार, विश्वरंजन (संपा.) पृ. 393

  24. विजेन्द नारायण सिंह, केदार व्यक्तित्व और कृतित्व, पृ. 105

  25. वसुधा पत्रिका, अंक जनवरी-जून 1987, पृ. 70

कठौतिया के शैलचित्र – पाषाण कालीन मानव सभ्यता और संस्कृति के प्रतीक

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कठौतिया के शैलचित्र – पाषाण कालीन मानव सभ्यता और संस्कृति के प्रतीक

योगेन्द्र सिंह चंदेल

शोधार्थी इतिहास

बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल

yschandel24@gmail.com

डा.बी.सी. जोशी

शोध निर्देशक प्राध्यापक

शा. नर्मदा महाविद्यालय, नर्मदापुरम

सारांश

मध्य प्रदेश का सीहोर जिला पाषाण कालीन मानव सभ्यता और संस्कृति का प्रमुख केन्द्र रहा हैं। इस क्षेत्र में पाषाण काल के मानव ने अपने जीवन का बहुत लम्बा समय व्यतीत किया है। मानव सभ्यता की अनमोल घरोहर शैलचित्र यहाँ पर आज भी सुरक्षित है, जिनको हम देख सकते है। सीहोर जिले की इच्छावर तहसील के कठौतिया क्षेत्र में प्राकृतिक चट्टानों, गुफाओं एवं कंदराओं में पाषाण कालीन शैलचित्र उकेरे गये है। पाषाण काल के मानव ने अपनी सभ्यता, संस्कृति, भाव तथा विचारों को शैलचित्रों के माध्यम से व्यक्त किया है। यहाँ से प्राप्त शैलचित्र पाषाण कालीन मानव के रहन-सहन तथा उनकी दैनिक जीवन शैली को प्रदर्शित करते हैं। शैलचित्रों में आकृतियों का निर्माण ज्यामितिय रेखाओं तथा आकारों की सहायता से किया गया हैं। यह शैलचित्र प्राकृतिक खनिज रंगो की सहायता से पाषाण की चट्टानों पर बनाये गये है। यहाँ से प्राप्त शैलचित्रों का विषय आखेट, पशु, पक्षी, मानव आकृति, सर्प आकृति आदि हैं। भारत में सबसे ज्यादा शैलचित्र मध्य प्रदेश से प्राप्त हुए हैं और मध्य प्रदेश में सबसे अधिक पाषाण कालीन शैलचित्र सीहोर जिला और उसके आस-पास के क्षेत्रों से ही मिले हैं।

बीज शब्द:- कठौतिया, पाषाण मानव, पाषाण कालीन, शैलचित्र, आखेट, पशुचित्रण, मानव, आकृति।

शोध आलेख:-

मध्य प्रदेश का सीहोर जिला प्राचीन मानव सभ्यता और संस्कृति का प्रमुख केन्द्र रहा हैं। यहाँ पर पुरापाषाण काल, मध्य पाषाण काल और नवपाषाण काल के मानव ने अपने जीवन का बहुत लम्बा समय व्यतीत किया है। मानव सभ्यता की अनमोल धरोहर यहाँ पर आज भी सुरक्षित है, जिसको हम देख सकते हैं। सीहोर जिले की इच्छावर तहसील के कठौतिया गाँव में पाषाण शिलाओं पर शैलचित्र उकेरे हैं। प्राचीन युग के मानव ने शैलचित्रों के निर्माण में सफेद खड़िया मिट्टी, गेरू और मुरम पावडर का उपयोग इन शैलचित्रों को बनाने में किया होगा, ऐसा अनुमान इनको देखने पर लगता हैं। समय के साथ ही यह रंग इतने गहरे हो गये हैं कि हजारों साल गुजरने के पश्चात भी यह रंग खत्म नहीं हुए हैं।

सीहोर जिले के कठौतिया गाँव के शैलचित्रों का अध्ययन कर पुरातत्ववेताओं द्वारा यह प्रमाणित किया गया कि शैलचित्रों पाषाणकालीन मानव के निवास स्थल थे। अवकाश के समय मानव द्वारा अपनी कल्पना को साकार करने का कार्य किया गया है। सीहोर जिले के कठोतिया में सुन्दर कलात्मक और सृजनात्मक शैलचित्रों की पुरा सम्पदा आज भी पर्यटकों को अपनी और आकृषित करती हैं।

कठौतिया में पाषण की गुफाओं औंर पहाड़ी चट्टानों पर विभिन्न विषयों का चित्राकंन देखने को मिलता है। इन चित्रों को देखकर पाषाणकाल के मानव की कल्पनाशक्ति, विचारशीलता तथा रचनात्मकता का पता चलता है। कठौतिया में प्राप्त शैलचित्रों को उनकी विषयवस्तु के आधार पर निम्न प्रकार से विभाजित करके गहन अध्ययन किया गया है:-

  1. पशुचित्रण शैलचित्र।
  2. आखेट शैलचित्र।
  3. पक्षी शैलचित्र।
  4. सर्पाकन शैलचित्र।
  5. मानव आकृति शैलचित्र।

1 पशुचित्रण शैलचित्र: –

पाषाणकालीन मानव ने कठौतिया क्षेत्र में स्थित चट्टानों, शिलाओं पर पशुओं के शैलचित्र बनाये हैं। इन चित्रों में पशुओं का आखेट चित्रण कुशलता के साथ किया गया है। इन आकृतियों के साथ ही यहाँ के शैलचित्रों में अनेक रूपों में पशुचित्रण देखने को मिलता हैं। इन पशुओं में गाय, वृषभ, हिरण, बारहसिंगा आदि पशु यहाँ पर अकेले तथा समूह के रूप में भी चित्रित किये गये हैं। इस क्षेत्र में अश्व का चित्रण अकेले तथा आरोहियों के साथ में देखा जा सकता है। पाषाण कालीन मानव ने पशु शैलचित्र में उनके यथार्थ रूप को चित्रित करने के साथ ही मानव ने पशुओं की विशेषताओं व गुणों की व्यजंना भी कुशलतापूर्वक कर अपने कला कौशल का सुन्दर परिचय दिया हैं। यहाँ से प्राप्त पशुओं के शैलचित्रों को देखकर प्रतीत होता हैं कि इनमें पशुओं की गति, शक्ति तथा फूर्ति को अत्यन्त कलात्मक रूप में प्रस्तुत किया हैं।

यहाँ का अवलोकन करने से पता चलता हैं कि इस क्षेत्र में पशु चित्रण से सम्बन्धित शैलचित्र अधिक संख्या में हैं। नवपाषाण काल के सन्दर्भ में ज्ञात होता हैं कि मानव पशुपालन तथा खेती बाडी करने लगा था। इस प्रकार यह अनुमान लगाया जा सकता हैं कि मानव इस काल में पशुओं के निरन्तर सम्पर्क में रहा और दैनिक जीवन में पशुओं से प्राप्त होने वाले सहयोग के कारण पशुओं के प्रति मानव का स्नेहभाव पशुचित्रण शैलचित्र के लिए प्रेरणादायक बना।

कठौतिया क्षेत्र से प्राप्त एक शैलचित्र में पशु का समूह के रूप में चित्रण किया गया है। यह शैलचित्र देखने में अत्यंत आर्कषण प्रतीत होता है। लाल तथा सफेद रंग से इसका सुन्दर निर्माण किया गया है। इसको देखकर ऐसा लगता हैं कि पशु साथ-साथ पक्तिबद्ध होकर विचरण कर रहे है। शैलचित्र में सबसे ऊपर गाय के समान एक बड़ा पशु चित्रित किया गया हैं। इसमें नीचे पक्ति के रूप में संयोजित अन्य पशु हिरण तथा बारहसिंगा जैसे दिख रहे हैं, जिनमें से कुछ पूरक शैली तथा अन्य अंलकृत शैली में बनाये गये हैं। यह शैलचित्र अपने रूप संयोजन तथा शैलीभेद से अत्यन्त कलात्मक दिखाई देता है। पाषाण काल के मानव की कलात्मक अभिव्यक्ति का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता हैं ।

कठौतिया के शिलाखण्ड पर उत्कीर्ण एक अन्य विचित्र प्रकार के पशु का चित्रांकन देखने को मिलता है, जो वृषभ के समान तथा सींग बारहसिंगा के जैसे बनाए गये हैं। यह चित्र पूरक शैली में गेरूए रंग से बना हुआ हैं। इसकी पूछ में केश दिखाने के लिए प्रयुक्त छोटी रेखाएँ तथा श्रृंग में विस्तार प्रदर्शित करने हेतु प्रयोग की गई रेखाओं से संगति का प्रभाव दृष्टिगत हो रहा है। इस शैलचित्र में मानव द्वारा विचित्र पशु की कल्पना करके उसको कलात्मक रूप में प्रदर्शित किया गया हैं।

पुरासम्पदा की दृष्टि से प्रसिद्ध सीहोर जिले के कठौतिया क्षेत्र में एक गर्भस्थ पशु का चित्रण भी यहाँ के शैलचित्रों में मिला है। गेरूए रंग से बना यह पशु गाय जैसा लगता है। इस चित्रांकन में पशु के शरीर के मध्य भाग में लम्बवत् रेखा में गर्भ स्थान को अलग किया गया हैं। इस शैलचित्र में गर्भ में बच्चे का चित्रांकन विपरीत स्थिति में किया गया दिखाई दे रहा हैं। बच्चे का मुख गाय के सदृश्य एक ही दिशा में बनाया गया हैं। गेरूए रंग से बने इस रेखीय चित्र में सींग पूरक शैली में बने है। मुख गर्दन तथा पैरों में बारीक रेखाओं का प्रयोग किया गया हैं। शैलचित्र का अवलोकन करने से ज्ञात होता हैं कि पशु के गर्भस्थ स्वरूप का चित्रांकन पाषाण युग के मानव की बौद्धिकता और उसकी कल्पनाशक्ति का प्रतीक हैं। गर्भ में बच्चे का चित्रांकन कर पाषाणकालीन मानव ने जीवन के सृजन को प्रस्तुत किया है। इस शैलचित्र में मातृत्व भाव की अभिव्यंजना इस चित्र की विशेषता तथा कलात्मकता प्रदर्शित करती हैं ।

2-आखेट शैलचित्र:-

पाषाणकाल का मानव जानवरों का शिकार करके अपने जीवन के लिए भोजन की आवश्यकता की पूर्ति करता था। अवकाश के क्षणों में पुरा मानव द्वारा अपने आश्रय स्थलों पर इस विषय से सम्बन्धित चित्रांकन किया जाता था। कठौतिया से आखेट सम्बन्धी शैलचित्र भी प्राप्त हुए हैं। पुरातत्ववेताओं के अनुसार आखेट सम्बन्धी शैलचित्र सर्वाधिक प्राचीन माने गये हैं। इन चित्रों को देखकर लगता है कि प्राचीन मानव ने जंगली पशुओं से अपनी रक्षा करने तथा उस समय की विषय परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करने की भावना को चित्रांकन के माध्यम से व्यक्त किया हैं। सीहोर जिले के पाषाणकालीन स्थल कठौतिया में आखेट सम्बन्धी अनेक शैलचित्रों को देखा जा सकता हैं।

कठौतिया क्षेत्र से आखेट सम्बन्धी जो शैलचित्र मिले हैं उनमें हिरन, शेर, सुअर, बैल आदि पशुओं का आखेट दिखाई देता है। यहाँ पर शेर के शिकार का शैलचित्र प्राप्त हुआ है, जिसमें शेर के आगे तथा पीछे दो-दो मानव आकृतियां धनुष लिए चित्रित की गई हैं। इस शैलचित्र में एक मानव आकृति नीचे की तरफ चित्रित है जिसका अंकन आखेट दृश्य से अलग दिखाई पड़ रहा है। इसमें शेर का चित्रण रेखा शैली किया गया हैं मुख तथा कान पूरक शैली में बने हैं। शरीर का जो भाग है वह भी रेखाओं के माध्यम से बनाया गया है। शेर का सम्पूर्ण चित्रांकन रेखांकन शैली में कलात्मक दिखाई देता है। शेर के मुख के पास रक्त की बून्दे भी चित्रित हैं। मानव की मुद्रा इस क्षेत्र से प्राप्त एक अन्य शैलचित्र में जंगली सुअर के आखेट का चित्रांकन देखने को मिलता है, जिसमें मानव आकृतियाँ भाले से सुअर पर वार कर रही हैं। इस शैलचित्र में सुअर का चित्रण अर्द्धपूरक शैली में किया गया है। उदर भाग में कोणिय रेखाओं का प्रयोग किया गया है। शेष शरीर में रंग भरा गया हैं। इस चित्रांकन में पशु का खुला मुख उसकी पीडा व करूणा के भाव को दिखा रहा है। इस शैलचित्र में सुअर के समीप एक अन्य पशु भी अंकित है। इस शैलचित्र में पशु तथा आखेटक दोनों के पैर की रचना से गति का आभास होता हैं। इन शैलचित्रों को देखने से प्रतीत होता हैं कि पाषाण काल के मानव की रचनात्मक कुशलता तथा रूप ज्ञान की समझ से आखेट की स्थिति का यथार्थ तथा सजीव चित्रांकन कितनी कुशलता से किया गया है। दोनो शैलचित्र लाल रंग से निर्मित है। पुरातत्ववेताओं के अनुसार यह शैलचित्र संभवतः मध्य पाषाण कालीन हैं।

पक्षी शैलचित्र:-

यहाँ पर एक शैलचित्र में सारस पक्षी का विशाल तथा आर्कषक अंकन प्राप्त हुआ है। इस चित्रण में एक बडा सारस पक्षी अपने छोटे बच्चों को दाना (आहार) देता प्रतीत हो रहा है। सारस की लम्बी गर्दन सामने नीचे की और झुकी हुई दिखाई दे रही है। पुरातत्ववेताओं के द्वारा सारस पक्षी की माप चोंच से पंजे तक सात फीट ज्ञात की गई है। सारस पक्षी का यह विशाल शैलचित्र माना जा सकता है। यह गेरूए रंग से बना हुआ है। इसका चित्रण अर्द्धपूरक तथा अंलकृत शैली में किया गया है। सारस पक्षी के शैलचित्र को देखकर लगता हैं कि इसके अंकन में अत्यन्त कुशलता और परिश्रम से इसका निर्माण किया गया है। इस शैलचित्र में रूप-संयोजन तथा भाव-भगिंमा इसको विशिष्ट बनाती हैं। पाषाणकालीन मानव ने इसमें वात्सल्य भावना का कलात्मक चित्रण प्रस्तुत किया है। पुरातत्ववेताओं के अनुसार यह शैलचित्र मध्यपाषाण काल का हो सकता हैं।

सर्पाकन शैलचित्र:-

सीहोर जिले की इच्छावर तहसील के कठौतिया गाँव में शैलाश्रय क्षेत्र में अंलकृत शैली में लाल तथा सफेद रंग से बना सर्प का विशिष्ट चित्रांकन मिला है। यह शैलचित्र लगभग 06 फीट लम्बा है। यह शैलचित्र द्विवर्णीय सुन्दर रंग-संयोजन में चित्रित किया गया है। सर्प चित्रांकन की आकृति को आयताकार खानों में विभाजित करके कुछ खानों को रंग से भरा गया है तथा कुछ आयात में तंरग के समान रेखा से सुन्दर अंलकरण दिखाई देता है। सर्प के मुख भाग में लाल रंग का प्रयोग किया गया हैं। इस शैलचित्र का रूपाकंन बहुत ही अद्भूत तथा कलात्मक प्रतीत होता हैं। यह सुन्दर रंग-संयोजन के साथ ही आर्कषक अंलकरण से परिपूर्ण प्रतीत होता हैं। यह शैलचित्र पाषाणकालीन मानव की कला के प्रति अभिरूचि तथा सृजनात्मकता का प्रतीक हैं।

पुरातत्ववेताओं के अनुसार सर्पाकृति का स्पष्ट शैलचित्र अभी तक सभवतः कहीं से भी प्राप्त नहीं हुआ है। शैलचित्रों के सम्बन्ध में अभी तक की गई खोजों के आधार पर इतिहासकारों का कहना हैं कि इतने दीर्धस्वरूप तथा अंलकृत सर्प शैलचित्र का चित्रण संभवता विश्व में किसी भी क्षेत्र में प्राप्त नहीं हुआ है। इस प्रकार कह सकते हैं कि कठौतिया का सर्प शैलचित्र पाषाण कालीन मानव की चित्रकला का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता हैं।

मानव आकृति शैलचित्र:-

पाषाण कालीन पुरातात्विक स्थल कठौतिया में शैलचित्रों का अध्ययन करने से पता चलता हैं कि यहॉ से अनेक ऐसे शैलचित्र प्राप्त हुए है जिनमें मानव को अनेक प्रकार के क्रियाकलापों में प्रदर्शित किया गया है। शिकार करते हुए मानव का चित्रण तो अधिकांश किया ही गया है, इसके साथ ही मानव नृत्य करते हुए, धार्मिक क्रियाकलाप करते हुए, बजन उठाते हुए तथा युद्ध के दृश्यों में मानव का चित्रण यहाँ के शैलचित्रों में देखने को मिलता है। कठौतिया के शैलचित्रों में पुरूष आकृतियों के साथ ही स्त्री की आकृतियाँ भी चित्रित की गई हैं। स्त्री आकृति का चित्रण अनाज संग्रहण करते हुए, कूटते तथा पीसते हुए, बच्चे को स्तनपान कराते हुए किया गया हैं।

एक शैलचित्र में नृत्य करते हुए मानव समूह का अत्यन्त मनमोहक चित्रण किया गया है। यह चित्र लाल तथा सफेद रंगों से बना है। नृत्यरत् मानव की आकृतियाँ ज्यामितिक आकारों तथा अलंकृत शैली में चित्रित की गई है। शैलचित्र में नीचे दिखाई दे रहे मानव समूहों का हाथों का रेखांकन सयुंक्त रूप से इस प्रकार से किया गया हैं कि समस्त एक-दूसरे का हाथ पकड़कर नृत्य करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इस चित्रण में कुछ मानव आकृतियों के एक पैर का रेखांकन नहीं किया गया है, शायद एक पैर को मोड़कर नृत्य करने की मुद्रा को दिखाने के लिए ऐसा चित्रण किया गया होगा। नृत्य मुद्राओं में मानव आकृति का इतनी कलात्मकता के साथ चित्रांकन करना पाषाणकालीन मानव की चित्रण-निपुणता को दिखाता है। इतिहासकारों के अनुसार यह शैलचित्र मध्य पाषाण काल का प्रतीत होता हैं।

कठौतिया की पाषाण निर्मित शिलाओं पर गायन तथा नृत्य करते हुए मानव आकृतियों का चित्रण प्राप्त होता है। यह चित्रण गेरूए रग से किया गया है, इस चित्रण में मध्य भाग में अंकित एक बड़ी मानव आकृति संभवता कोई वाद्य यन्त्र बजा रही है, जिसकी धुन पर अन्य मानव आकृतियाँ नृत्य करती हुई दिखाई दे रही हैं। चित्रण के दाहिनी तरफ विभिन्न क्रियाओं में रत सूक्ष्म मानव रूप दिखाई देते हैं। इसमें कुछ मानव स्वरूप एक-दूसरे के कन्धे पर बैठकर नृत्य करते दिखाये गये हैं। इस चित्रण में मानव आकृतियों का चित्रण पूरक तथा रेखीय विधि से किया गया है। यह शैलचित्र प्राचीन मानव की खुशी तथा उत्साह को प्रकट करता है। यह चित्र उनकी सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रकट करता है। इस चित्रण में रूपसंयोजन आकर्षक तथा भावना प्रद्यान है। शैलचित्र में गति के साथ लयात्मकता भी पता चलती है। मानव की मुद्राओं का अत्यन्त कलात्मकता के साथ चित्रण किया गया है। पुरातत्ववेताओं के अनुसार यह शैलचित्र प्राचीन ताम्रकालीन समय का प्रतीत होता हैं।

एक शैलचित्र स्त्री मानव आकृति का है। यह स्त्री खाद्य प्रदार्थ को कूटते हुए दिखाई दे रही है। यह सम्पूर्ण चित्रण रेखीय विधि से बना हुआ है। इसको देखकर लगता हैं कि अल्प रेखाओं से समस्त आकृति में मुद्रा तथा भाव का सुन्दर चित्रण किया है। अन्य मानव आकृतियों के शैलचित्र भी यहाँ से प्राप्त हुए हैं।

निष्कर्ष:-

सीहोर जिले के कठौतिया में जो पाषाणकालीन शैलचित्र प्राप्त हुए है उनका विश्लेषण करने से ज्ञात होता हैं कि पाषाण कालीन मानव द्वारा अत्यन्त निपुणता से शैलचित्रों में रेखांकन किया गया है। उकेरे गये चित्रों में विषय वस्तु की विविधता दिखाई देती हैं। शैलचित्रों में उत्तम रूप रचना तथा संयोजन तथा कलात्मकता स्पष्ट दिखाई देती हैं। चित्रांकन में भावों की अभिव्यक्ति इनकी विशेषता है, जिसमें हर्ष, उत्साह, शौर्य और वात्सल्य आदि भाव दृष्टिगत होते हैं।

शैलचित्रों में विभिन्न भावों के साथ ही चित्रांकन में लय, गति, संतुलन, कल्पनाशीलता का सुन्दर समावेश दिखाई देता हैं।

पाषाण कालीन मानव की सभ्यता और संस्कृति के सम्बन्ध में यह शैलचित्र महत्वपूर्ण हैं।

सन्दर्भ सूची :-

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  2. शंकर तिवारी-रॉक आर्ट ऑफ इण्डिया, अर्नाल्ड हायनमैन, दिल्ली, 1984 पृष्ठ 228-238
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  4. एस.के. पाण्डेय-इण्डियन रॉक आर्ट, आर्यन बुक्स इंटरनेशनल, दिल्ली पृष्ठ 1-2
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  7. आर.आर. सिंह-रॉक आर्ट एण्ड आर्कियोलाजी ऑफ इण्डिया, 2008, पुष्ठ 41-42
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  10. आयुक्त, पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय, म.प्र. भोपाल – इतिहास पुरातत्व संस्कृति एवं पर्यटन, 2010, पृष्ठ-23
  11. डा. किशौर अग्रवाल-आधुनिक भारतीय चित्रकला, किताब घर, दिल्ली 1994
  12. डा. दिनेश चन्द्र गुप्ता -भारत की चित्रकला, धर्मा प्रकाशन, इलाहाबाद 2005

अनुवाद और रोजगार की संभावनाएं

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अनुवाद और रोजगार की संभावनाएं

डॉ. श्रीराम हनुमंत वैद्य

श्री शिवाजी महाविद्यालय बार्शी,

तहसील बार्शी, जिला-सोलापूर

पिन- 413411

दूरभाष-9657243507

मेल- svaidya2012@gmail.com

सारांश

आज वैश्वीकरण के इस युग में किसी भी देश, भाषा या व्यक्ति को विश्व की तमाम उपलब्धियों से जुड़ने के लिए अनुवाद से बेहतर मार्ग उपलब्ध नहीं है। वर्तमान में रोजगार की संभावनाओं से संबंधित विमर्श किया जाए तो ज्ञात होता है कि विगत कई वर्षों से सरकारी नौकरियां नहीं निकल रही है। वर्तमान समय की बात करें तो कई जगहों पर सीएचबी (Clock Horse Basic) नीतियों से नियुक्तियां हो रही है या अतिथि और तदर्थ पदों की बातें हो रही है। इन सभी परिस्थितियों से स्पष्ट होता है कि केवल परंपरागत शिक्षा पर निर्भर न होकर व्यवसायिक या रोजगार परक शिक्षा की ओर ध्यान देना आवश्यक है। अनुवाद एकमात्र क्षेत्र है, जिसमें संपूर्ण विश्व समा जाता है। इसलिए उसमें रोजगार की संभावनाएं भी अधिक रही है। अनुवाद व्यवसायिक पाठ्यक्रम की उपाधि प्राप्त करने पर रोजगार की संभावनाएं महसूस होने लगती है, केवल कड़ी मेहनत करने का दृढ़ निश्चय होना चाहिए।

बीज शब्द:- अनुवाद, रोज़गार, वैश्वीकरण, संचार, विज्ञापन, दुभाषी, आशु, डबिंग, अवसर,तदर्थ, भ्रमण

शोध आलेख

आज वैश्वीकरण एवं भूमंडलीकरण के इस युग में अनुवाद की महत्ता एवं प्रासंगिकता बढ़ गई है। वही रोजगार की दृष्टि से अत्यंत कारगर सिद्ध हो रही है। अनुवाद का सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त करने से निम्न रोजगार की संभावनाएं उपलब्ध हो सकती हैं। वह क्षेत्र निम्नानुसार है।

जनसंचार माध्यम

जनसंचार माध्यम का एक विशिष्ट संसार होता है, जिसमें सूचनात्मक साहित्यिक, मनोरंजन, राजनीति, मनोरंजन, बाजार, खेल, वाणिज्य, संपादकीय, ध्वन्यात्मक, दृश्यात्मक आदि विभिन्न विधाओं का समावेश होता है। इन संचार माध्यमों के साथ अनुवाद अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।

भारतीय जनसंचार माध्यमों में अनुवाद अधिकांश अंग्रेजी से हिंदी एवं प्रांतीय भाषाओं में होता है। ताकि मुख्य समाचार एजेंसियों की भाषा अंग्रेजी होती है। आज वर्तमान युग में हिंदी भाषाओं में समाचार एजेंसियां कार्य कर रही है। वस्तुतः आज भारत की अनेक प्रांतीय समाचार, देश- विदेश के समाचार हिंदी या अंग्रेजी एजेंसियों से अनूदित करते हैं। आज भी स्थानीय माध्यमों के लिए अनुवाद ही एक मुख्य गतिविधि है। भोलानाथ तिवारी के अनुसार “समाचार माध्यमों के अनुवाद में संक्षिप्तियों, शिर्षकों के अनुवाद काफी दुष्कर होते हैं क्योंकि यह अधिकांशतः अंग्रेजी की प्रकृति के अधिक नजदीक होते हैं और इनका अनुवाद लक्ष्य भाषा में कई बार एक सीमित शब्द के रूप में होता है।”१

संचार माध्यम में डबिंग भी अनुवाद का महत्वपूर्ण आयाम है। आज भारतीय संचार माध्यमों में केवल भारतीय ही नहीं अपितु विदेशी कार्यक्रमों का डबिंग की सहायता से प्रदर्शन किया जाता है। यहां अच्छे अनुवादक की अत्यंत आवश्यकता होती है। डबिंग में लक्ष्य भाषा प्रकृति के अनुरूप अनूदित किया जाता है। सिनेमा विश्व में भी कई फिल्में डबिंग की सहायता से अन्य भाषाओं में प्रदर्शित की जा रही है। आर्थिक लाभ कमाने हेतु अनेक दिग्दर्शक अन्य फिल्म इंडस्ट्री के श्रेष्ठ फिल्म के डबिंग को प्राधान्य दे रहे हैं। जैसे- बाहुबली। सबसे अधिक धनार्जन करने का रिकॉर्ड इस फिल्म के नाम पर रहा है। आज हिस्ट्री नेशनल ज्योग्राफी, ई.एस.पी.एन,एनिमल, प्लेनेट तथा विभिन्न राष्ट्रों की कला एवं संस्कृतियों का प्रदर्शन करने वाली धारावाहिक कार्यक्रम भारतीय हिंदी भाषा के साथ-साथ अन्य सभी भाषाओं में प्रदर्शित होती है। अर्थात जनसंचार माध्यम में अनुवादक को रोजगार की अनंत संभावनाएं है। वह समाचार संपादक, अनुवादक, भाषांतरणकार, डबिंग संवाददाता प्रस्तुतकर्ता आदि अनेक जगहों पर काम कर सकता है। मार्शल मेक्लुहन के अनुसार “media is a extension of man अनुवादक को मीडिया की भाषा और उसके स्वरूप में अनंत विचरण करने के लिए पर्याप्त अवकाश देता है।”२ अर्थात अनुवादक को संचार माध्यम के क्षेत्रों में रोजगार की अनेक संभावनाएं है।

विज्ञापन

आज भूमंडलीकरण, बाजारवाद के इस युग में विश्व ने एक मंडी का रूप धारण किया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार, बहुराष्ट्रीय कंपनियां, भूमंडलीकरण और पर्यटन व्यवसाय के कारण विभिन्न भाषाओं में विज्ञापनों के अनुवाद की आवश्यकता महसूस हो रही है। आज अनुवाद केवल सामाजिक-संस्कृतिक गतिविधि तक सीमित नहीं बना है। उन्होंने व्यवसायिक रूप धारण किया है। विज्ञापनों के अनुवाद का सीधा संबंध मार्केटिंग बाजार और मुनाफे से रहा है। एक एक विज्ञापन अनुवाद के लाखों रुपए मानधन लिया जाता है। विज्ञापन अनुवाद में ऊपरी तौर पर केवल शब्द दिखाई देते हैं किंतु उसकी गहराई और संवेदना को समझना उतना आसान कार्य नहीं है। विज्ञापन अनुवादक से अपेक्षा होती है कि अनूदित विज्ञापन को लक्ष्य भाषा देश की जनता स्वीकार करें। अनुवाद करते समय लक्ष्य भाषा के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भौगोलिक परिस्थितियों का विशेष ध्यान रखें। आज संपूर्ण विश्व में विज्ञापन अनुवादकों की आवश्यकता है किंतु बाजार में अच्छे अनुवादक की कमी महसूस होती है।

सरकारी कार्यालय

आजादी के बाद हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने के पीछे यही भावना थी कि वह संपर्क की भाषा के रूप में विकसित होकर प्रशासनिक भाषा बनें। उसे सरकारी कामकाज बोलचाल तथा व्यापार की भाषा बना दिया जाए। यह उचित भी था। भारत के अधिकांश लोग हिंदी को जानते थे, समझते थे। लेकिन कुछ भाषावाद या विवाद के कारण अंग्रेजी और हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। तभी से प्रशासनिक कार्य 2 भाषाओं में चलता है।

हमारे देश में अनेक भाषा, उपभाषा एवं उप बोलियों का संगम है । इस विविधता से भरे हुए देश में अनुवादक की आवश्यकता महसूस होती है। सरकारी और गैरसरकारी कार्यालयों में अनुवादक संविधान, अधिनियम अध्यादेश, बिल, नियमावली के अधीन फॉर्म करारों का हिंदी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद करते हैं। भारत सरकार द्वारा विभिन्न सरकारी कार्यालयों में कनिष्ठ अनुवादक, वरिष्ठ अनुवादक, हिंदी राजभाषा अधिकारी, दुभाषी आदि विभिन्न पदों की नियुक्ति भारत सरकार द्वारा की जाती है। कर्मचारी चयन आयोग प्रतिवर्ष लगभग 300-400 पद अनुवादक के लिए विज्ञापित करता है। किंतु केवल 100-150 छात्र परीक्षा में सफल होते हैं। उस का प्रमुख कारण अनुवाद क्षेत्र के प्रति सही मार्गदर्शन का अभाव रहा है। इसलिए अच्छे अनुवादक की कमी सदैव महसूस होती आई है। आज संपूर्ण भारतभर अनेक विभागों में अनुवादक काम कर रहे हैं। भारतीय संसद में अनेक अनुवादक है। उनमें से कई विदेश यात्रा जाते हैं या विदेश से आए प्रमुख व्यक्तियों के संवादों के समय आशु अनुवादक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अर्थात अनुवाद से रोजगार के अनेक अवसर प्राप्त किए जा सकते हैं। केवल योग्य और अच्छे अनुवादक की आवश्यकता है।

विधि एवं न्यायालय के कार्यालयों में अनुवाद की अत्यंत आवश्यकता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 348 में और राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 5 में यह प्रावधान के आधार पर किसी केंद्रीय अधिनियम का हिंदी अनुवाद करके राष्ट्रपति के प्राधिकार से भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है। उच्चतम विधि एवं न्यायालय इन कार्यालयों में प्रकाशन योग्य निर्णय तथा विधि संबंधी साहित्य का अनुवाद विधायी विभाग करता है। इस विभाग में अनुवादक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस विभाग में कानूनी अधिसूचना संविदाओ, बंधपत्रों या सरकारी महत्वपूर्ण पत्रों का हिंदी में तथा प्रादेशिक भाषाओं में अनुवाद किया जाता है।

भारतीय संविधान में संसदीय प्रणाली का महत्वपूर्ण स्थान है। इसके अंतर्गत राष्ट्रपति लोकसभा और राज्यसभा आते हैं। इसे संसद कहा जाता है। लोकसभा और राज्यसभा के सचिवालय में अंग्रेजी और हिंदी अनुवाद कार्य किया जाता है, जिसमें लोकसभा के मंत्रियों तथा संसद सदस्यों के भाषणों का अनुवाद किया जाता है। इस अनुवाद में कच्चे पर अधिक ध्यान देते हुए तत्काल अनुवाद करना आवश्यक रहता है। साथ ही दोनों सदनों ने पारित किए हुए कानून या सभा पटल पर रखे जाने वाले सभी कागज पत्रों का अंग्रेजी और हिंदी में अनुवाद किया जाता है। यह कार्य करने के लिए अनेक अनुवादकों की या हिंदी राजभाषा अधिकारियों की आवश्यकता महसूस होती हैं।

वाणिज्य का महत्वपूर्ण अंग बैंक है। बैंक का सीधा संबंध जनता के साथ लेनदेन के लिए होता है। वहां बैंकों के कामकाज की भाषा एवं अनुवादक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अनुवादक बैंक के मुख्य शाखा उनसे आए सूचना विज्ञापन पत्र टिप्पणी ज्ञापन रिपोर्ट नियम पुस्तिका निविदा आदि का अनुवाद उस प्रदेश की भाषा या हिंदी में करते हैं। वहां बैंक के द्वारा एक राजभाषा अधिकारी या अनुवादक की नियुक्ति की जाती है।

सरकारी कार्यालयों में अनुवादक के रूप में कार्य करने के लिए निम्न शैक्षिक योग्यता आवश्यक है।

  1. किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय अथवा समकक्ष से डिग्री स्तर पर अनिवार्य या वैकल्पिक विषय के रूप में अंग्रेजी या हिंदी में डिग्री या समतुल्य।
  2. हिंदी से अंग्रेजी या अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद में मान्यता प्राप्त डिप्लोमा अथवा प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम अथवा भारत भर सरकार के केंद्र या राज्य सरकार के कार्यालय में हिंदी से अंग्रेजी या अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद कार्य में 2 वर्ष का अनुभव।

पर्यटन

भारत जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक, भौगोलिक विविधता से भरे देश में पर्यटन क्षेत्र में अनुवाद से रोजगार की असीम संभावनाएं रही है। पर्यटन क्षेत्र का महत्व इस जानकारी से स्पष्ट होता है कि विश्व के करीब डेढ़ सौ देशों में विदेशी मुद्रा कमाने वाले कुल पांच क्षेत्रों में पर्यटन का स्थान आता है। अर्थात संपूर्ण विश्व में पर्यटन एक व्यवसायिक क्षेत्र बनकर उभर रहा है। केवल भारतीय ही नहीं तो विदेश के लोग भी भारत में पर्यटन करने आते हैं। भारत की रंग बिरंगी विविधता पर्यटक के आकर्षण का स्थान रहा है। पहाड़ों से बहते झरने, नदियां, अनेक परंपरागत मेले, ऐतिहासिक स्थल, इमारत, समुद्र की लहरें आदि अनेक ऐसे सुंदर पहलू, जो पर्यटकों को आकर्षित करते रहते हैं। उस महत्वपूर्ण स्थलों की जानकारी देने हेतु गाइड एवं मार्गदर्शक के रुप में आशु अनुवादक या अनुवादक की आवश्यकता रहती है। यह अनुवादक पर्यटकों को भ्रमण के दौरान उनकी भाषा में पर्यटन स्थल के ऐतिहासिक, संस्कृतिक जानकारी देते हैं। बदले में उन्हें काफी मानदेय प्राप्त होता है। आज भी पुरातत्व विभाग द्वारा अनेक अनुवादकों के विज्ञापन निकालते हैं। किंतु अच्छे अनुवादक मिलते नहीं है। भारत में अनेक पर्यटन स्थलों पर विदेशी पर्यटकों को अच्छे अनुवादक नहीं मिलते हैं, तो स्थानीय लोगों से काम चलाउ जानकारी प्राप्त की जाती है। यही स्थिति विदेशों में विपरीत है। वहां अनिवार्यता व्यावसायिक अनुवादक की नियुक्ति होती है, जिसका मानदेय प्रवेश के समय ही लिया जाता है।

अनुवाद एजेंसी

वैश्वीकरण के इस युग में अनुवादक अनुवाद एजेंसी की सहायता से घर बैठकर कार्य कर सकता है। आधुनिक तकनीकी संसाधनों के सहयोग से श्रेष्ठ अनुवादकों को साथ लेकर अनुवाद कार्य संपन्न किया जा सकता है। जिससे अनुवादकों कों अच्छा मानधन प्राप्त हो सकता है। हमारे भारत में अनेक ऐसे महापुरुष हैं, जिनका कार्य विशाल एवं भंडार जैसा है। उनके अनेक ऐसे दस्तावेज हैं, जो नष्ट होने की कगार पर है। वह केवल एक भाषा में होने के कारण अन्य भाषा भाषी अपरिचित रहे हैं। उनके कार्य विचार को जीवंत रखने के लिए विभिन्न संस्थाएं और शासन एक साथ कार्य करते हैं तो उन महान व्यक्तियों का कार्य संपूर्ण विश्व में बिखर सकता है। उदाहरण तौर पर महाराजा सयाजीराव गायकवाड का साहित्य और कार्य समृद्ध रहा है। उनका संपूर्ण साहित्य अंग्रेजी, हिंदी, मराठी भाषाओं में प्रकाशन के लिए महाराष्ट्र शासन द्वारा महाराजा सयाजीराव गायकवाड चरित्र साधन समिति की स्थापना की थी। इस अनुवाद कार्य की वजह से अनेक अनुवादकों को प्रति शब्द लगभग एक रुपया के आसपास पैसे मिले थे। ऐसे हमारे भारत में अनेक महान व्यक्ति हुए हैं जो प्रतिभा संपन्न थे। जिन्होंने अपनी कार्यकुशलता, विवेक के आधार पर संपूर्ण विश्व को एक दृष्टि दी है। अनेक पाश्चात्य देशों ने उनके ग्रंथों का अपनी भाषा में अनुवाद करते हुए अपने देश को समृद्ध बनाया है किंतु हमारे भारत में अनुवाद की गति बहुत धीमी गति से रहीं है। या हम कह सकते हैं की इसकी और देखने की दृष्टि आज भी काफी बदली नहीं है। सभी महान व्यक्तियों के साहित्य का अनुवाद करते हैं, तो उनका कार्य विश्व पटल तक जा सकता है। डॉ. पूरणचंद टंडन कहते हैं कि“ अनुवाद वास्तव में जीवन के युद्ध को जीतने का मूल मंत्र है। आत्मविश्वास से प्रदान करने वाला शुद्ध संकल्प है”३

आज भारत भर अनेक अनुवाद एजेंसियों की निर्मिती हो चुकी है। वह व्यावसायिक तौर पर अनेक कंपनियों, संस्थाओं के दस्तावेज पैसा लेकर अनुवाद करवाते हैं। यह कार्य मराठी-हिंदी अनुवाद, अंग्रेजी-हिंदी अनुवाद, अंग्रेजी- मराठी अनुवाद या मांग के अनुरूप सभी भाषाओं में अनुवाद करने की जिम्मेदारी अनुवाद एजेंसियों के माध्यम से पूरी की जाती है।

दुभाषी

“अनुवाद लिखने के स्थान पर बोलकर किया जाए तब उसे तत्काल भाषांतर अथवा आशु अनुवाद की संज्ञा दी जाती है।”४ उस तत्काल भाषण तुरंत करने वाले व्यक्ति को दुभाषी या आशु अनुवादक कहा जाता है। यह दुभाषी दो भाषाओं में बोलने वाली व्यक्तियों के बीच सेतु का कार्य करता है। विश्व में अनेक भाषाएं बोली जाती है, जब एक व्यक्ति एक देश या प्रदेश से दूसरे देश या प्रदेश में जाते हैं तो आपसे संप्रेषण के लिए दुभाषी की आवश्यकता महसूस होती है। वहीं अनुवादकों को रोजगार निर्मिती के अवसर उपलब्ध कराते हैं। आज वैश्वीकरण के इस युग में अनुवाद एजेंशिया, दुभाषी की नियुक्ति करके आवश्यकताओं की पूर्ति करवाते हैं। उस दुभाषी के लिए दो भाषाओं का सुक्ष्म ज्ञान आवश्यक होता है। उन्हें संबंधित भाषाओं के अधिकार के साथ हाजिर जवाबी, श्रवण शक्ति, स्मरण शक्ति, सामान्य ज्ञान, एकाग्र चित्त के साथ आत्मविश्वास होना अत्यंत आवश्यक है। दुभाषी के स्वर उच्चारण शैली गति लहजा आदि अनेक बातें महत्वपूर्ण होती हैं।

साहित्य

विभिन्न राष्ट्रों की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत का आदान-प्रदान अनुवाद के माध्यम से ही संभव है। अनुवाद के माध्यम से ही अन्य भाषा के साहित्य का अध्ययन करने से नई अभिव्यक्ति, संवेदना, विचारधारा एवं शैली का परिचय हुआ है। परिणाम स्वरूप हमारे भारतीय साहित्य पर उसका प्रभाव दिखाई देता है। विश्व ही नहीं तो भारत जैसे बहु भाषीय देश में अनुवाद के माध्यम से ही विविध प्रांतों की सामाजिक, सांस्कृतिक सभ्यता का आदान प्रदान किया जाता है।

आज भूमंडलीकरण के इस युग में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रा साहित्य, डायरी, एकांकी, कहावतें, लोकोक्तियां आदि अनेक क्षेत्र ऐसे हैं, जिनमें विश्व स्तर पर अनुवाद की सहायता से आदान-प्रदान का सिलसिला चल रहा है। विश्व के हर लेखक की इच्छा होती है कि उनकी उपलब्धियों से संपूर्ण विश्व परिचित हो। वहां उन उपलब्धियों को किसी भाषा में बंद नहीं करना चाहते हैं। परिणाम स्वरूप अनुवाद करने के लिए अच्छी राशि अनुवादक को दी जाती है। इससे अनुवादक का नाम विश्व में गूंजता है, तो अनुवादक को भी रोजगार मिलता है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि आज अनुवाद रोजगार की दृष्टि से कारगर सिद्ध हो रहा है। देश-विदेश की अनेक एसी संस्थाएं हैं जो उन अनुवादकों को आजीवन अनुवाद कार्य दे सकते हैं। केवल शुद्ध निष्ठा एवं समर्पण भाव से अनुवाद कार्य होना चाहिए। आज अनेक ऐसे लोग हैं जो अच्छी नौकरियां छोड़कर घर से निरंतर अनुवाद कार्य कर रहे हैं

संदर्भ सूची

  1. अनुवाद की नई परंपरा और आयाम प्रधान संपा.- कृष्ण कुमार गोस्वामी प्रकाशन संस्थान नई दिल्ली, पृ- 173
  2. वहीं – पृ- 179
  3. प्रतिष्ठित अनुवादक- डॉ. पूरणचंद टंडन, संपा. भारतीय अनुवाद परिषद, पृ-193
  4. अनुवाद की नई परंपरा और आयाम:- संपा.कृष्णकुमार गोस्वामी,पृ-187

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संपर्क: डॉ. कुमार गौरव मिश्रा, संपादक, +918805408656



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*_व्यंग्यिका_ *” ब्रेकिंग न्यूज़”*

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व्यंग्यिका

” ब्रेकिंग न्यूज़”

कोई अच्छा सच्चा
काम कर रहा हो
पर इन्हें उससे क्या
बस बनी बनाई न्यूज़ चाहिए
न्यूज़ देने वाला एक रसूख़ चाहिए
इन्हें तो बस ब्रेकिंग न्यूज़ चाहिए।

सच पर शोध और
फॉलोअप ये करते नहीं
फिर भी सच्ची पत्रकारिता का
दम भरने से ये डरते नहीं
हिंदी पेपर है तो क्या
हिंग्लिश प्रयोग करने से
कभी उबरते नहीं।

पेड न्यूज़ बढ़ बढ़ कर छापें
सच्चाई को परे रख, पैसों को जापें
जो सच न दिखा सके ऐसा
आईना चकनाचूर चाहिए
हमें तो पत्रकारिता जहालत
बेईमानी से दूर चाहिए
पर इन्हें ब्रेकिंग न्यूज़ चाहिए।

©️अनुपमा अनुश्री

[लघुकथा] “बोझ”: नाम-निधि “श्री”

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लघुकथा-
“बोझ”
नर्स ने आकर बड़े ही व्यंगात्मक लहजे में कहा-“ज़बरदस्ती हुआ या तुम्हारी मर्ज़ी थी?”
इलाहाबाद के मोती लाल नेहरू हस्पताल का वार्ड नम्बर तीन.. वो इससे पहले यहाँ कभी नहीं आई थी..
“अरे बोलती क्यों नहीं? साँप सूंघ गया है क्या? बाज़ार में इतना कुछ मिलता है जानती नहीं थी? और अब कहाँ गया तेरा आशिक़? भाग गया?देखने से तो भले घर की लगती है.. वो जो बुढ़िया आई थी तेरे साथ कौन थी?
“जी मेरी नानी हैं”
“घर कहाँ है? यहीं इलाहाबाद में?”
“जी नहीं! लखनऊ के रहने वाले हैं!”
“अच्छा तो मुँह छुपाने के लिए लखनऊ से यहाँ आई है.. चल डॉक्टर आ गयी है”
कहते हुए नर्स बाहर निकल गयी..
बात लगभग चार महीने पहले की थी.. 
“तुम मुझे प्यार नहीं करती हो”
“करती हूँ.. कैसे यक़ीन दिलाऊँ”
“तो एक बार हाँ कह दो ना”
“रवि मुझे डर लगता है”
“अरे डर कैसा! मैं हूँ ना.. अब मान भी जाओ..”
कहते हुए रवि ने उसके हाथों को अपने हाथों में ले लिया..
ऋचा ने शरमाते हुए ‘हाँ’ में सर हिला दिया..
उस दिन कॉलेज बंक कर ऋचा रवि की बताई हुई जगह पर पहुँच गयी..रवि ने होटल में एक कमरा बुक कर रक्खा था.. 
“रवि.. ये.. ये तुम्हारे दोस्त यहाँ क्यों? ऋचा ने कुछ घबराकर पूछा था.. पर होटल का बन्द कमरा.. वो तीन थे.. ऋचा अकेली.. दोपहर से रात हो गयी थी.. पर ऋचा घर नहीं लौटी..
नर्स ने आकर फिर चीखा- “अरे खड़ी रहेगी की चलेगी भी?”तो जैसे उसे होश आया.. ऑपरेशन थिएटर के अंदर घुसते ही उसने भयातुर नेत्रों से सभी की ओर देखा.. अंदर तीन-चार नर्सें और थी और एक डॉक्टर.. सब ने उसे बड़े ही हास्यास्पद ढंग से घूरा.. 
“अरे बेटा.. डरती क्यों हो?बड़े बड़े शहरों में ऐसी छोटी मोटी गलतियाँ होती रहती हैं” एक नर्स ने कहा और बाकी सब हँस पड़ी.. 
डॉक्टर के चेहरे पर कोई भाव नहीं था.. एक नर्स ने उसे लेटने को कहा और फिर बायें हाथ में लगा कोई सुइ चुभो रहा है.. इंजेक्शन लगाया जा रहा था शायद उसने समझ लिया.. एक आखिरी बार उसने अपने पेट को सहलाना चाहा.. पर..इससे पहले की उसका हाथ उठता..
एक घना अंधेरा चारों तरफ छा गया..
उस बात को लगभग आठ साल बीत चुके है.. ऋचा अब एक प्राइमरी स्कूल में टीचर है..
अलमारी की सफाई करते हुए एक पुरानी डायरी उसके पैरों के पास गिरी.. ये वही डायरी थी जो ऋचा के दुर्दिनों में उसकी संगिनी बनी थी.. डायरी को उठाकर उसने एक एक पन्ने को फिर से पलटना शुरू किया और उसके साथ ही उसके ज़िन्दगी के पन्ने भी पलटते हुए उसी जगह पर पहुंच गए.. जहाँ से इस डायरी की शुरुआत हुई थी.. ना चाहते हुए भी वो एक एक शब्द पढ़ती जा रही थी..
उस दिन जब होटल के कमरे में अचानक पुलिस आ गयी थी.. और “धंधा वाली” कहते हुए लेडीज़ कॉन्स्टेबल ने उसे घसीटते हुए पुलिस जीप में बिठाया था.. घर लाकर भइया ने बेल्ट से मारा था.. मोहल्ले वालों के तानों से तंग आकर छोटी बहन ने आत्म हत्या कर ली थी.. उसने भी तो खुद को एक कमरे में कैद कर लिया था…
वो एक एक पन्ना पलटती जा रही थी… हर पन्ने पे हाथ फेरती.. आंसुओं को हर बार रोकने की कोशिश करती.. कभी खुली डायरी को सीने से लगा लेती.. कभी मुट्ठियां कस लेती..
तेरह अगस्त 2008.. 
इस दिन को कैसे भूल सकती है.. पिछले दिन चाय बनाते समय चक्कर आ गया था.. देखने में वैसे भी बहुत कमज़ोर हो गयी थी.. आज खून की जांच ने उसके गर्भवती होने की पुष्टि कर दी थी.. और उसी दिन उसे ट्रेन में बैठाकर लखनऊ भेज दिया गया था.. नानी के पास.. 
ईश्वर का ये आशीर्वाद उसकी ज़िन्दगी में किसी अभिशाप से कम ना था.. पर फिर भी हिम्मत जुटाकर नानी से एक बार कह गयी थी-“नानी अगर आप मुझे किसी तरह पढ़ा पाएं तो मैं अपने बच्चे को खुद पाल लूँगी” जिस पर नानी ने रो रो कर उसे गले से लगा लिया था.. 
इतने दिनों में वो एक बार भी ना रोई थी.. हर बार आंसुओं को आँखों के अंदर ही रोक लिया था.. घरवालों ने खूब खरी खोटी सुनाई.. फिर प्यार से समझाया.. कभी जान से मारने की धमकी दी.. तो कभी परिवार की इज़्ज़त का हवाला दिया.. बच्चे के अंधकारमय भविष्य को भी उसे दिखाया गया.. कुल मिलाकर किसी तरह उसे इलाहाबाद के एक सरकारी हस्पताल पहुंचा दिया गया.. मामा जी की जान पहचान थी वहाँ..
अब चेहरा लाल हो गया था.. उसने डायरी को धम्म से ज़मीन पर पटका.. और आईने के सामने खड़ी हो गयी.. कुछ क्षण खुद को निहारती रही.. फिर लौटकर डायरी के पास आई.. उसे उठाया और बड़े प्यार से सहलाया.. बिल्कुल वैसे जैसे कोई माँ अपने बीमार बच्चे को सहलाती है… उसने डायरी को अपने सीने से लगा लिया.. आठ सालों से जिस तूफान को हृदय में समेटे हुए थी, आज अचानक उसका नियंत्रण खो बैठी.. वो आँखें जो इतने समय से शुष्क पड़ी थीं आज किसी उफनती हुई नदी सी बह पड़ीं.. आज मानों जैसे आँखों में आँसुओं का कोई बाँध टूटा हो.. आज उसने खुद को नहीं रोका.. आज उसके आँसुओं पर ना कोई हँसने वाला था.. और ना ही कोई ताने कसने वाला..
होटल के बन्द कमरे में जो चीखें कभी दब कर रह गयीं थीं.. आज टीचर्स क्वार्टर में उन्होंने हाहाकार मचा रक्खा था..

नाम-निधि “श्री”
छात्रा(महिला महाविद्यालय)
काशी हिन्दू विश्विद्यालय,वाराणसी।
ईमेल-nimi3799@gmail.com

[रंग समीक्षा] अमीर निजार जुआबी का नाटक और मोहित ताकलकर का निर्देशन: समीक्षक प्रज्ञा

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गोलियां रोटी पर तिलों सी फैलती हैं। कैसा लगता है जब कोई रोटी आधी बांटने के लिये कदम बढ़ाता है?कभी भूख के लिये लड़ने का जज़्बा जागता है तो सब चुकने के बाद भूख ही मर जाती है। कैसा महसूस हो जब कोई आपसे आपका एक सीधा हाथ और उल्टा पाँव मांगने लगे ?जैसे कोई मिट्टी बाँट रहा हो। कैसा लगे जब जड़ों से उखड़ने के दुःख को आप अपने कांधे पर लाद चलें। अपने उगाये सींचे पेड़ का बोझ ढोते चलें? ऐसे बहुत से प्रतीकों को घटनाओं में गुम्फित करके नाटक में देख पाना एक साथ बहुत से आक्रोश, उत्तेजना और सिसकियों में ढलता जाता है। जब मंच का आधा भूभाग अतीत और आधा वर्तमान में डूबा हो और धीरे धीरे दूरी पाट कर अतीत वर्तमान में ढल जाए। ऐसा वर्तमान जो ठिठक गया हो , ऐसा अतीत जो मौत के मुहाने पर खड़ा हो। फिलिस्तीन की धरती और उसका रक्तरंजित इतिहास लिये नाटक मैं हूँ युसूफ और ये है मेरा भाई देखना इन्हीं एहसासों से गुजरना था। अतीत और वर्तमान को एक सूत्र में पिरोती दो भाइयों की इस कहानी ने प्रेम,राजनीति,जड़ों से उखड़ने की दिल चीरती पीड़ा थी और साथ ही मंच पर डेढ़ घण्टे के कड़े आंगिक संचालन और भाव मुद्राओं के पल पल परिवर्तित रूप की सशक्त अदायगी। गजब की फुर्ती में दो भाइयों की लाड भरी तरंग पूरे मंच पर बिछ जाती है। एक कोलाहल और उसके बीच से उठती युसूफ के भाई अली और उसकी प्रेमिका नदा की प्रेम कहानी। बहुत कम किरदार और बहुत सारी कहानियां। तबाह फिलिस्तीन के दुःख की पूरी लहर मंच से तैरती हम सबके इर्द गिर्द छाती गयी। हम डूब रहे थे। प्रेक्षागृह फिलिस्तीन लगने लगा था। बहुत सी फिलिस्तीनी कविताएं चारों और बिखर रही थीं उन्हें किसी अनुवाद की जरूरत न थी। पीड़ा की ध्वनि और अर्थ हर जगह एक से हैं। मंच से एक लंबी कविता कानो से उतरकर सांसों संग धड़कने लगती है। बचपन में अनजाने ही अपने भाई युसूफ को कुंए में धकेलने वाले बडे भाई का मौत की अंतिम घड़ी में कन्फेशन और उसके बेहरकत जिस्म को जिलाये रखने वाले युसूफ का रोना और उसे माफ़ करना। दोनों का गहरा प्यार और मौत की बना दी गयी दूरी। ऐसी दूरी जहाँ न प्रेमिका नदा है न प्यारा भाई युसूफ मंच पर काले सफेद कपड़ों में ढके कुछ गिद्ध नाच रहे हैं जो अली के निस्पंद होने की राह तकते हैं। अपने चन्द सिक्कों से बेइंतहा मोहब्बत रखने वाला युसूफ भाई के लिये सिक्के भी कुर्बान करता है। पर उसकी मौत को रोक नहीं पाता। बचपन में कुएं से अर्धविक्षिप्त होकर निकला युसूफ ,अली के बाद एक और बड़े कुएं में गिरता है। दुनिया की नज़र में वह अहमक, पागल इंसान खोज लेता है नदा को। अली की प्रेमिका नदा को दो साल तक केम्प में ढूंढता है। सालों साल का एक रिश्ता है युसूफ,नदा का। ऐसी औरत जो कभी अपने शौहर संग न रही उसके भाई की देखभाल उसके जीवन का पहला निर्णय बन जाता है। एक औरत के जीवन का ठोस निर्णय।एक वादा अपने अली सेे -” मैं और तुम साथ रहेंगे पूरी जिंदगी।” यूसुफ़ के संग ज़िन्दगी बिताना , उसे बच्चों सा पालना, उसकी जिद्द मानना नदा को खलता ही नहीं। अली कहीं नहीं है पर अली को नदा और युसूफ जिन्दा रखते हैं। मंच पर एक टेबल पर सिर्फ रौशनी नहीं उतरती तीन प्यारी जिंदगियों का खूबसूरत रिश्ता उतरता है। ज़िंदा युसूफ को अपनी गोद में सुलाती नदा मन के सामने बैठे अली से कहती है “सो जाओ मेरी जान” …..रात घिरती है, अँधेरा बढ़ता है और सारे दर्शक खड़े होकर बस तालियों और बहती आँखों सेअपने जज़्बात निकालकर रख देते हैं। एक दर्शक का सर मंच पर झुका ही रह गया, ये प्रस्तुति कभी भुलाई न जा सकेगी। (अमीर निजार जुआबी का नाटक और मोहित ताकलकर का निर्देशन)