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विभिन्न कविता आंदोलनों की अनिवार्यता और अवधारणात्मकता-ऋषिकेश सिंह

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विभिन्न कविता आंदोलनों की अनिवार्यता और अवधारणात्मकता

ऋषिकेश सिंह
पीएच. डी. (हिंदी)
जामिया मिल्लिया इस्लामिया
सम्पर्क 9911115885

हिंदी साहित्येतिहास के आरंभिक 750 वर्षों का इतिहास प्रायः कविता का ही इतिहास है। जिसे आदिकाल, भक्तिकाल, व रीतिकाल के रूप में बांटकर देखा जाता है, परंतु इस दौर की काव्य प्रवृत्तियां साहित्यिक युगों का निर्माण करती हैं न कि आंदोलनों का, क्योंकि इस काल की कविताओं का सम्बन्ध युगीन परिस्थितियों की संप्रेषणीयता में अधिक रहा है विचारधारा के अभिव्यक्ति की यहाँ अनुपस्थिति है, इसीलिए ये काल का निर्धारण अधिक करती हैं। हालांकि इसके अपवाद के रूप में भक्तिकालीन काव्य को देखा जा सकता है,परंतु पूर्ण रूप से आंदोलनों को केंद्र में रखकर काव्य निर्माण का श्रेय आधुनिककाल को ही जाता है। यहाँ यह भी ध्यान रखने योग्य है कि विचारधारा को केंद्र में रखने वाले आंदोलन का कालिक स्वरूप सीमित होता है और वह युग की सीमा में समाहित हो जाता है, इसी कारण एक युग में कई आंदोलन हो सकते हैं किंतु एक आंदोलन में कई युग नहीं।

आधुनिक काल और कविता आंदोलन

आधुनिक काल में भारतेंदु, द्विवेद्वी, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, अकविता, तथा समकालीन कविता जैसे काव्यान्दोलनों का उभार हुआ जिसे स्वतंत्रता पूर्व और पश्यात दो भागों में भी बाँट सकते हैं। इन काव्यान्दोलनों के उद्भव में सबसे प्रमुख भूमिका नवजागरण एवं आधुनिकता के विचारधारा की उत्पत्ति का है। औद्यौगिक क्रांति और पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के परिचय से 19वीं शताब्दी में भारत में नवजागरण की लहर आई जिससे भारत के प्रत्येक क्षेत्र में बुद्धिवाद, मानवतावाद, व्यक्तिवाद, लोकतंत्र, समानता, स्वतंत्रता, न्याय जैसे मूल्यों को महत्त्व दिया जाने लगा, जो रीतिकालीन राज्याश्रय और रीतिवादी मानसिकता से बिल्कुल विपरीत था। डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में कहें तो “आधुनिक काल अपने ज्ञान-विज्ञान और प्रविधियों के कारण मध्यकाल से अलग हुआ। यह काल औद्योगीकरण, नगरीकरण, और बौद्धिकता से सम्बद्ध है, जिससे नवीन आशाएं उभरी और भविष्य का नया स्वप्न देखा जाने लगा।”1 परंतु यह दौर भारत के लिए औपनिविशेविक भी था अर्थात एक तरफ तो स्वतंत्रता आंदोलन का चरण दर चरण विकास हो रहा था वहीं दूसरी ओर इसके समानांतर नवजागरणकालीन मूल्य विकसित हो रहे थे इनके सांक्रमणिक समन्वय में ही हिंदी काव्यांदोलनों का विकास हुआ है, और इसी की पृष्ठभूमि में ही इसके अनिवार्यता और अवधारणात्मकता को समझ जा सकता है।

इन काव्यान्दोलनों में सर्वप्रथम भारतेंदु युग है जिसके प्रणेता भरतेंदु हरिश्चन्द्र स्वयं हैं। 1850-1900ई. का यह दौर कंपनी शासन के अंत, ब्रिटिश सरकार द्वारा शासन की शुरुआत के रूप में देखा जाता है, अतः इस काल की कविता की अनिवार्यता के केंद्र में उपरोक्त नवजागरणकालीन औपनिवेशिक परिस्थितियां ही हैं परंतु अवधारणा के रूप में इस युग का साहित्य अंतर्विरोधों का ही साहित्य है जैसे- राजभक्ति बनाम राष्ट्रभक्ति, राजभक्ति बनाम राजविरोध, ब्रज भाषा बनाम खडी बोली आदि। रामविलास शर्मा के शब्दों में कहें तो “ अंग्रजों ने भारतीयों को राजभक्ति सिखाई, उनके अंदर फुट की आग सुलगाई……एक ऐसे आदमी की जरूरत थी जो अंग्रेजी शासकों और उनके मुसाहिबों की झूठी लफ्फाजी का पर्दाफाश करके उनकी असलियत बयां कर दे, जो जनता के उभरते हुए असन्तोष को प्रकट करे और जिन्हें अंग्रेजी राज्य से बहुत बड़ी आशाएं थीं उनकी आँखे खोल दे।”2 इसके उपरांत काव्यान्दोलन का अगला चरण 1900-1920ई. का है जिसे द्विवेद्वी युग के रूप में जाना जाता है, इस युग में जहाँ एक तरफ स्वदेशी आंदोलन, असहयोग आंदोलन से पूरे राष्ट्र में स्वाधीनता की चेतना की एक लहर आई जिससे सांस्कृतिक पुनरूत्थान की प्रकिया को बल मिला वहीं नवजागरणकालीन मूल्यों से एक लोकोन्मुखी दृष्टि पनपी और साथ ही महावीर प्रसाद द्विवेद्वी के भाषाई द्वैत को समाप्त करने में भाषा के परिमार्जन और परिष्करण के साथ विषयों के वैविध्य पर जोर देने जैसे प्रयासों ने कविता के स्वरूप को बदला लोगों ने विचार करना शुरू किया कि “हम कौन थे क्या हो गए और क्या होंगे अभी/ आओ मिलकर विचारें ये समस्याएं सभी।” गणपति चंद्र गुप्त ने उचित ही कहा है “काव्यपरम्पराओं की दृष्टि से यह युग पूर्ववर्ती युग से अविभाज्य है, पूर्ववर्ती युग की ही परंपराओं एवं प्रवृत्तियों का विकास इस युग में हुआ। परिवर्तन केवल दो क्षेत्रों में हुआ- एक नेतृत्व में और दूसरे रचना पद्धति और काव्यभाषा में।”3

आर्दशवाद एवं अनुशासनबद्ध धारा के प्रतिक्रिया के रूप में स्वच्छंदतावादी तौर पर छायावादी काव्यान्दोलन का विकास हुआ, रामस्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों में कहें तो “स्वछंदतावाद की प्रमुख विशेषताओं में है- वन का महत्त्व, प्रकृति पर्यवेक्षण, प्रेम का स्वच्छंद भंगिमाओं में चित्रण और बैलैड या कथा गीत का प्रयोग, और काव्यभाषा के रूप में खड़ी बोली की स्वीकृति। सबसे बड़ी बात यह कि इस स्वच्छंदतावादी काव्य धारा ने जीवन से लगाव की एक भूमिका तैयार की जो आगे चलकर छायावाद में और गहरी हो जाती है।”4 इस काव्यान्दोलन की अनिवार्यता के रूप में जहाँ एक तरफ पश्चिम में उदित स्वच्छंतावाद को देखा जा सकता है वहीं दूसरी ओर भाषा, छंद, बिम्ब आदि शिल्पगत रूपों में परम्परावादी ढांचे के विखंडन को भी शामिल किया जा सकता है। इस अनिवार्यता से उपजी अवधारणा के अनुरूप इस धारा का कवि “तोड़ो तोड़ो तोड़ो कारा, निकले फिर गंगाजल धारा” कहकर परिवर्तन की चाह के रूप में स्वातन्त्र्य चेतना को प्रकट करता है, इसके लिए शक्ति की मौलिक कल्पना पर भी जोर देता है, और साथ ही ‘मैंने मैं शैली अपनाई’ कहकर स्वातन्त्र्य चेतना में वैयक्तिकता को प्रमुखता भी देता है। उसकी सौंदर्य चेतना इतनी उदार है कि वह मानव के साथ-साथ प्रकृति को भी इसमें शामिल करते हुए कहता है “सुन्दर हैं सुमन,विहग सुंदर, मानव तुम सबसे सुन्दरतम”। कुल मिलाकर यह काव्यान्दोलन मानव मुक्ति की प्रबल भावना से निर्मित है जिसके बारे में नामवर सिंह ने ठीक कहा है “छायावाद उस राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है जो एक ओर पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता है और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से।”5

अब तक के उपरोक्त तीनों काव्यान्दोलनों में अनिवार्यता और अवधारणात्मकता को प्रवृत्तिगत विकास के रूप में ही देखा जा सकता है क्योंकि इनमें आंदोलन के प्रमुख तत्व विचारधारा की अनुपस्थिति ही रही है परंतु परंपरा के रूप में इन्हें नाकारा भी नहीं जा सकता है। वास्तविक रूप में काव्यांदोलन की शुरुआत प्रगतिवाद के रूप में देखी जा सकती है। मार्क्सवाद को केंद्र में रखने वाली इस धारा की उत्पत्ति भारत में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के साथ मानी जाती है जो1936-43 का दौर है। इस काव्यान्दोलन की अनिवार्यता को वैश्विक स्तर पर व्याप्त मार्क्सवाद के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, वर्ग संघर्ष, तथा अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत के रूप में समझा जा सकता है जो साहित्य को उत्पादन प्रणाली का एक उपउत्पाद मनाता है जिसका उद्देश्य शोषितों को शोषण के प्रति जागरूक बनाना है इस रूप में वह रचना के कथ्य पर ज्यादा जोर देता है शिल्प के बजाय। अवधारणा के रूप में यह काव्यान्दोलन आध्यात्मिकता के बजाय भौतिकतावाद पर अधिक जोर देता है इस रूप में यह समाजवादी यथार्थवाद पर बल देते हुए कहता है “दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद, चमक उठीं घर भर की आँखे कई दिनों के बाद”। साम्यवाद को आदर्श मानते हुए इस धारा का कवि मार्क्सवाद में विश्वास रखते हुए मजदूरों एवं क्रांति करने वाली सेना के स्त्री पुरुषों को लाल सलाम कहता है, वह पूंजीवादी व्यवस्था से घृणा करते हुए उसे मरण, रिक्त और व्यर्थ कहता है और शोषितों के प्रति सहानुभूति रखते हुए उसे लोहे के रूप में निरूपित करते हुए कहता है “मैंने उसको जब जब देखा, लोहा देखा, लोहा जैसे तपते देखा, ढलते देखा”। सहज भाषा, साफगोई, और लोक धुनों और बिम्बों को आधार बनाने वाली इस धारा के बारे में रेखा अवस्थी ने उचित टिप्पणी की है “प्रगतिवाद ने रचनाकारों की सौन्दर्यवृत्ति, विचारदृष्टि और रचना सामर्थ्य को उन अवरोधों से मुक्त किया जो आध्यात्मवाद, रहस्यवाद, आदर्शवाद, कलावाद आदि के नाम पर उन्हें कुंठित कर रहे थे। नए यथार्थवादी सौंदर्य, समाजवादी विचारधारा, मानववाद और जनसंस्कृति के उपादानों से कविता को समृद्ध करने के प्रयास आरम्भ हुए।”6

जिस प्रकार स्थूल के प्रति सूक्ष्म के विद्रोह से छायावाद आया उसी प्रकार वैचारिक प्रतिबद्धता के विरोध में स्वानुभूति की प्रामाणिकता को केंद्र में रखकर प्रयोगवाद आया। तारसप्तक की भूमिका में अज्ञेय ने इसे जीवन सत्यों के अन्वेषण का माध्यम माना है। बच्चन सिंह के शब्दों में कहें तो “तारसप्तक की निषेधात्मक प्रवृति है छायावाद से मुक्ति पाने का प्रयास और प्रयोगों के द्वारा नए राग सत्य की अभिव्यक्ति।”7 अवधारणा के रूप में इस धारा में भावुकता और बौद्धिकता के संश्लेषण पर जोर देते हुए कवि कहता है “सुनो कवि, भावनाएं नहीं हैं सोता, भावनाएं खाद हैं केवल”। नवीन राहों का अन्वेषण करते हुए वह प्रदत्त सत्यों को नकारते हुए टूटने के सुख को महसूस करता है, नदी के द्वीप के रूप में व्यक्ति को महत्त्व देता है तो “बस उतना ही क्षण अपना, तुम्हारी पलकों का कँपना” कहकर क्षण की महत्ता को भी उजागर कर देता है। प्रयोगवादी कवि शहरी है उसका प्रेम बौद्धिक है, जीवन की एक जरूरत है इसीलिए वह फूल को प्यार करने को तो कहता है लेकिन उसको झड़े तो झड़ जाने देने को भी कहता है। कथ्य के बजाय वः शिल्प पर जोर देता है और मानता है कि जितनी हमारी भाषा होती है, हम उतना ही सोच सकते हैं इसी कारण उपमान और प्रतीक उसे प्रिय हैं।

प्रयोगवादी काव्य अंदोलन के निर्माण में स्वतंत्रता पूर्व के अकाल, आंदोलन, विश्वयुद्ध आदि की प्रमुख भूमिका रही है और उतना ही योगदान स्वतंत्रता पश्चात की परिस्थितियों का भी है इसी की अगली कड़ी के रूप में स्वतंत्रता प्राप्ति के आरंभिक दौर में नई कविता आंदोलन का जन्म हुआ जिसके केंद्र में भी प्रयोगवादी प्रेरणा स्रोत की तरह मनोविश्लेषणवाद, निर्वैयक्तिकता सिद्धांत, क्षणवादी मानसिकता, नई समीक्षा आंदोलन, और अस्तित्ववाद की प्रमुख भूमिका रही है। रामविलास शर्मा के शब्दों में कहें तो “हिंदी के अधिकांश नई कविता लिखने वालों का हाल रोकान्तै जैसा है। ऊब, ऊबकाई, अकेलापन, बुरे बुरे सपने, त्रास, आत्महत्या की चाह…… आदि आदि लक्षण इनमे मिलाता हैं।”8 दरअसल इस काव्यान्दोलन के अनिवार्यता के पीछे आजादी के बाद पैदा विषमता, मशीनीकरण, शहरीकरण, यांत्रिकता, अकेलापन और आत्मनिर्वासन का भाव प्रमुख है। इससे उतपन्न अवधारणा के फलस्वरूप नया कवि लघुमानव की धारणा पर जोर देता है, वह भोगे हुए यथार्थ पर बल देते हुए कहता है कि “मैं नया कवि हूँ, इसीसे जानता हूँ, सत्य की चोट कितनी गहरी होती है” आधुनिक भावबोध के इस कवि की संवेदना भी आधुनिक है वह महानगरीय जीवन की विषंगतियां और त्रासदियां बताते हुए कहता है कि “आदमी से ज्यादा लोग पोस्टरों को पहचानते है, वे आदमी से बड़े सत्य हैं” नामवर सिंह ने इस बदलते काव्य स्वरूप पर उचित टिप्पणी की है कि “नई कविता ने कविता के नए मूल्यों को प्रतिष्ठित करने के साथ ही कविता पढ़ने की नई पद्धति की आवश्यकता भी प्रदर्शित की है।”9 शिल्प के तौर पर इस धारा का कवि भाषा पर अधिक बल देता है नए भाव बोध के लिए वह नए नए उपमानों का प्रयोग करता है, जगदीश गुप्त नई कविता के इस पक्ष पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि “नया कवि छंद को संवारने की अपेक्षा वस्तु तत्व को व्यवस्थित करने, उसके रूप को उभारने और अनभूति के मूल ढांचे को सशक्त बनाने का विशेष प्रयत्न करता है।”10

नई कविता के बाद के समय को काव्यान्दोलन के तौर पर समकालीन कविता के रूप में जाना जाता है वैसे छठें दशक से लेकर वर्तमान तक को समेटने वाले इस काव्यांदोलन का निर्माण आजादी से प्राप्त मोहभंग, आपातकाल, नक्सलबाड़ी आंदोलन, तथा 90 के बाद आए उदारीकरण, वैश्वीकरण, तथा निजीकरण जैसी परिस्थितियों में हुआ है इस कारण इसके अंतर्गत कई प्रकार की प्रवृत्तियों का विकास हुआ जिससे इस काव्यान्दोलन के भीतर भी कई काव्य धाराओं का विकास हुआ जिसे अकविता, जनवादी कविता, नवगीत, आज की कविता, युयुत्सुवादी कविता आदि नामों से पुकारा गया वास्तविक रूप में समकालीन कविता इन्हीं का ही समुच्चय है, जिसमें अकविता का कवि अवधारणा के रूप में अवांगार्द तथा एंटी पोएट्री आंदोलन से प्रभावित होकर सभी विचार और आदर्शों का विध्वंस करता हुआ कहता है कि “पर जब सभी कुछ, ऊल ही जुलूल है, सोचना फिजूल है”। वह मानवीय सम्बन्धों के प्रति अनास्था को प्रकट करते हुए प्रेम को रोग कहता है और उसे भट्टी में झोंक देने का आपेक्षी है। वहीं जनवादी कवि में संसदीय लोकतंत्र के प्रति तीव्र आक्रोश है वह संसद को आधे तेल और आधे पानी मिश्रित तेली की घानी घोषित करता है। वह आमूलचूल परिवर्तन के लिए हंगामे के बजाय सूरत बदलने वाली कोशिश पर भी जोर देने की बात करता है, साथ ही नवगीत के रूप में वह क्रांतिकारी मानसिकता को प्रदर्शित करते हुए लोहे की छड़ों में बंद युग के सवेरे के मुक्ति की बात भी करता है और उसके साथ-साथ भीड़तंत्र में तब्दील होती जा रही लोकतान्त्रिक व्यवस्था के प्रति भी असन्तोष का भाव प्रकट करता है। रामविलास शर्मा के शब्दों में कहें तो “यह मूल्यों के विघटन का युग है। हर चीज टूट रही है, कवि टूट रहा है, कविता टूट रही है। फासिस्ट तानाशाही के पनपने के लिए वह हवा बहुत मुफीद होती है जिसमें मनुष्य के लिए हत्या और आत्महत्या में ज्यादा फर्क न रहे।”11 वहीं आठवें और नवें दशक की कविता में कवि उत्तराधुनिकता से पैदा उपभोक्तावादी संस्कृति, अस्मितापरक मूल्यों, और नव उदारीकरण के तत्वों की गहनता से निरन्तर पड़ताल कर रहा है। मदन कश्यप के शब्दों में कहें तो “नए कवियों के पाथेय की चर्चा तो पिछले प्रश्न में ही विस्तार से कर चुका हूँ। मैं उसमें साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता, और उदारीकरण से पैदा हुई बाजार की तानाशाही के विरोध को भी शामिल करना चाहूंगा।”12

इस प्रकार विभिन्न काव्यान्दोलनों की अनिवार्यता और अवधारणात्मकता को समझा जा सकता है और यह भी कहा जा सकता है कि साहित्य की विधाओं और समाज के आंदोलनों के बीच एक अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है जो एक दूसरे के स्वरूप निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं ।

सन्दर्भ परिचय

1. पृ.स.- 416, हिंदी साहित्य का इतिहास, डॉ. नगेन्द्र

2. पृ.स.- 65, भारतेंदु हरिश्चन्द्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएं,रामविलास शर्मा

3. पृ.स.- 40, हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, गणपति चंद्र गुप्त

4. पृ.स.- 94, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी

5. पृ.स.- 17, छायावाद, नामवर सिंह

6. पृ.स.- 114, प्रगतिवाद और समानांतर साहित्य, रेखा अवस्थी

7. पृ.स.- 258, आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास, बच्चन सिंह

8. पृ.स.- 115, नयी कविता और अस्तित्ववाद, रामविलास शर्मा

9. पृ.स.- 35, कविता के नए प्रतिमान, नामवर सिंह

10. पृ.स.- 23, नई कविता सैद्धांतिक पक्ष, जगदीश गुप्त

11. पृ.स.- 120, नयी कविता और अस्तित्ववाद, रामविलास शर्मा

12. पृ.स.- 20, हिंदी कविता 80 के बाद (वागर्थ), सं.- एकांत श्रीवास्तव

संदर्भ ग्रन्थ परिचय

1. डॉ. नगेन्द्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपरबैक्स, पैंतीसवां पुनर्मुद्रण, 2009

2. रामविलास शर्मा, भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएं, राजकमल प्रकाशन, पहली आवृत्ति, 2014

3. गणपति चंद्र गुप्त, हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, बारहवां संस्करण, 2010

4. रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, तेइसवां संस्करण, 2010

5. नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, ग्यारहवीं आवृति, 2011

6. रेखा अवस्थी, प्रगतिवाद और समानांतर साहित्य, राजकमल प्रकाशन, पहला संस्करण, 2012

7. बच्चन सिंह, आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, संशोधित संस्करण, 2005

8. रामविलास शर्मा, नयी कविता और अस्तित्ववाद, राजकमल प्रकाशन, आवृति, 2010

9. नामवर सिंह, कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, नौवीं आवृति, 2010

10. जगदीश गुप्त, नयी कविता सैद्धांतिक पक्ष, लोकभारती प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 2010

11. एकांत श्रीवास्तव और कुसुम खेमानी(सं.), वागर्थ (अंक-209) (हिंदी कविता : 80 के बाद), भारतीय भाषा परिषद, दिसम्बर 2012

हिन्दी कविता की परम्परा में ग़ज़ल-डा. जियाउर रहमान जाफरी

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हिन्दी कविता की परम्परा में ग़ज़ल

डा. जियाउर रहमान जाफरी
हाई स्कूल माफ़ी +2, वाया -अस्थावां
जिला -नालंदा 803107, बिहार
9934847941, 6205254255
Zeaurrahmanjafri786@gmail. Com

सारांश

गजल हिंदी की बेहद लोकप्रिय विधा है. यह जब उर्दू से हिंदी में आई तो इसने अपना अलग लहजा अख्तियार किया. उर्दू का यह प्रेम काव्य हिंदी में जन समस्याओं से जुड़ गया. ग़ज़ल की परंपरा भले खुसरो कबीर या भारतेंदु होते हुए आगे बढ़ी हो, लेकिन ग़ज़ल को एक विधा के तौर पर स्थापित करने का काम दुष्यंत ने किया. आलोचना के स्तर पर भी आज ग़ज़ल को स्वीकारा जा रहा है. हिंदी के कई गजलगो दुष्यंत के बाद की इस परंपरा को संभाले हुए हैं.

बीज शब्द: ग़ज़ल, छांदसिकता, नुमाइंदगी, सत्ता, बगावत, विषमता, तकनीक, संगीतात्मकता, लयात्मकता, शिल्प, परिवेश.

आमुख

हिंदी साहित्य की विधाओं में कविता की परंपरा सबसे प्राचीन है. मनुष्य ने जब से बोलना शुरू किया था तब से गुनगुनाने की भी प्रवृति जागृत हुई और इसी गुनगुनाहट के रास्ते से कविता का जन्म हुआ. हिंदी साहित्य का एक तिहाई इतिहास कविता की परंपरा से भरा हुआ है. हर दौर में सबसे ज्यादा संख्या में कविताएं लिखी गईं. उसकी वजह यह थी कि कविता का असर जनसामान्य पर ज्यादा होता था. वीरगाथा कालीन कवि राजा की प्रशस्ति के लिए सबसे प्रभावोत्पादक माध्यम कविता ही समझते थे.

किसी भी रचना का कविता होने के साथ ही यह लाजिम हो जाता है कि उसके प्रस्तुतीकरण, उसके स्वभाव के अनुकूल हो उसमें छांदसिकता, गीतात्मकता प्रवाह,लयऔर छंदशास्त्र का पालन किया गया हो. रहीम कबीर और वृंद के दोहे इसलिए प्रसिद्ध हुए के इसमें छंद का निर्वाह किया गया था साथ थी उसमें ज्ञान उपदेश और जीवन गुजारने के तौर तरीके को भी समझाया गया था.

कालांतर में खासकर छायावाद के समय से कविता को छंद मुक्त करने की प्रवृत्ति चली. निराला ने जूही की कली में यह प्रयोग किया यह अलग बात है कि सरस्वती पत्रिका ने इस कविता को वापस कर दिया था. इसे वापस करने के पीछे उसका प्रस्तुतीकरण तो था ही सुधारवादी दौर की यह कविता रीतीकालीन घोर श्रृंगारिकता की तरफ वापस जा रही थी. छायावाद में छंद मुक्त और छंद युक्त दोनों प्रकार की कविताएं लिखी गईं. छायावाद के बाद प्रयोगवाद का दौर शुरू हुआ. फिर प्रयोगवाद नई कविता का जामा पहनकर प्रबुद्ध जनों की ओर पहुंच गई.अज्ञेय ने तार सप्तक का प्रकाशन किया और यह वह दौर था जहां कविताएं छंद से पूरी तरह आजाद हो गई थी इसे नई कविता का नाम दिया गया.

कविता जबसे छंद से दूर हुई वह आम जनों से कट गई थी. साधारण लोगों को इससे ने कविता का स्वाद मिलता था और ने उसकी भाषा और शैली समझ आती थी. प्रगतिवाद में जिस मजदूर की बात की जा रही थी वह कविता मजदूरों को समझ ही नहीं आ रही थी. ऐसा भी नहीं था कि मुक्त छंद की कविताएं छंद से बिल्कुल मुक्त थीं लेकिन उसमें छांदसिकता का कोई नियम नहीं था. जो नियम दोहे चौपाई, गीत, या गजलों में दिखलाई देते हैं. समकालीन हिंदी कविता ने माना के बातें महत्वपूर्ण है छंद द्वितीय चीज है. छंद के बंधन से अभिव्यक्ति में बंदिशआती है इसलिए इस कालखंड में जो कविताएं लिखी गईं वह किसी नियम कायदे से शुरू नहीं होती थी अगर तुक मिल गया तो ठीक है अगर नहीं भी है तो वह कविता है क्योंकि उसमें रस की प्राप्ति हो रही है. इस संदर्भ में समकालीन हिंदी कविता के कुछ महत्वपूर्ण हस्ताक्षर की पंक्तियां देखी जा सकती हैं –

आँखें मुंद गईं

सरलता का आकाश था

जैसे त्रिलोचन की रचनाएं

नींद ही इच्छाएं

-शमशेर

मत ब्याहना उस देश में

जहां आदमी से ज़्यादा

ईश्वर बसते हों

-निर्मला पुतुल

तुम्हारी देह से छूटा हुआ

पहला बच्चा

रो रहा था तुम्हारी देह के किनारे

और तुम्हारी छाती से

दूध नहीं छूट रही थी

-अरुण कमल

माँ मेरे अकेलेपन के बारे में सोच रही है

पानी गिर नहीं रहा

पर गिर सकता है किसी भी समय

-केदारनाथ सिंह

आजकल कबीरदास जख्म

शहर और आदमी नींव के पत्थर

-कुंवर नारायण

जाहिर है यह कविताएं कविता होने के बावजूद अपने समय की नुमाइंदगी तो कर रही थी. पर कवि जिस तौर से अपने को अभिव्यक्त कर रहे थे पाठक वर्ग उस रूप में उसे अख्तियार नहीं कर पा रहा था. कविता एक तरह से आम लोगों से कट गई थी. यह पढ़े-लिखे प्रबुद्ध वर्ग तक सीमित गई थी. कबीर के सीधे-सादे दोहे समझने वाली जनता नए कवि की इस कविता को नहीं समझ पा रही थी कि कवि क्या कहना चाह रहा है.

ऐसे ही नाजुक वक्त के नब्ज़ को दुष्यंत ने टटोला, और गजल के साथ उन्होंने एक प्रकार से छंद की वापसी की. पाठकों ने समझा कि ग़ज़ल ही वह माध्यम है जिसमें मेरी बात मेरी ही जुबान में कही जा रही है. दुष्यंत के सिर्फ एक संकलन साये में धूप ने ग़ज़ल का वह माहौल पैदा किया के समकालीन अन्य कविताओं की प्रवृतियां वह असर पैदा नहीं कर सकीं. दुष्यंत ने नई कविता, गीत और हिंदी कहानी से गजल में पदार्पण किया था. उन्होंने महसूस किया कि ग़ज़ल के लहजे में ही हिंदी कविता की वापसी हो सकती है. उन्होंने जो शेर लिखे वह तमाम लोगों के दर्द की कहानियां कह रहे थे. लोगों को लग रहा था ये भले दुष्यंत के शेर हों बातें तो उनकी ही है. उनका शेर सत्ता से बगावत कर रहा था वह भी यहां तक के पंडित नेहरू को भी इसकी नोटिस लेनी पड़ी. दुष्यंत के कुछ ऐसे शेर देखे जा सकते हैं जो आपने दौर के नाजुक लम्हों को पूरी जिम्मेवारी से रखते हैं-

कैसे मशाल ले के चले तीरगी में आप

जो रोशनी थी वह भी सलामत नहीं रही

यह ज़ुबाँ हमसे सी नहीं जाती

जिंदगी है कि जी नहीं जाती

अब नई तहज़ीब के पेशे नज़र हम

आदमी को भूनकर खाने लगे हैं

पक गई है आदतें बातों से सर होगी नहीं

कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं

समकालीन कविता जो एक समय अपनी भाषा शैली, असहजता और अतिशयोक्ति के कारण समाज से कट गई थी. उस वातावरण में गजल ने अपने खूबसूरत लहजे में हर सामाजिक शोषण और विषमता के खिलाफ अपनी उपस्थिति दर्ज की. गजल में प्रेम की भी बात थी और प्रकृति की भी प्रेम और प्रकृति छायावाद की कविताओं में भी था, लेकिन छायावादी कवि मिट्टी से जुड़े हुए नहीं थे इसलिए दिनकर ने भी छायावाद के खिलाफ स्वच्छंदतावाद की बुनियाद रखी और मिट्टी की ओर लौटने का आग्रह किया.ग़ज़ल अपने लबो लहजा अपनी तकनीक अपने मुहावरे, कहन और गीतात्मकता के कारण पाठकों की पसंद बन गई. उर्दू गजल में जिस प्रेम का जिक्र था हिंदी गजल में आकर वह मानव प्रेम में बदल गया.यही वजह है कि भारतेन्दु भी इसे नजरअंदाज नहीं कर सके और उन्होंने ग़ज़ल शैली में कई रचनाएं लिखी . हिंदी गजल मधुचर्या से दूर थी. वहां जो प्रेम था उसमें पाकीज़गी थी प्रयोगवादी कविता की तरह वहां रक्त खोला देने वाला चुंबन नहीं था वह यह नहीं कहती थी कि-

काम है अभिशप्त

तुम कहां हो नारि

बल्कि वह प्रेम में पर्दे की हिमायती थी. गजल की फितरत ही है कि वह पूरी खुल नहीं पाती. वह इशारों में बात करती है. इसलिए वह अपने प्रेम का बयान बस इतना कह कर कर देता था कि

कोई भी ख़त हो लेकिन मुख़्तसर अच्छा नहीं लगता

लिफाफे में महल तितली का पर अच्छा नहीं लगता

मेरी चाहत पर शक करते हुए यह भी नहीं सोचा

तुम्हारे पास क्यों आते अगर अच्छा नहीं लगता

हिंदी कविता से अलग ग़ज़ल की यह विशेषता थी कि उसका हर शेर अपने आप में पूर्ण होता था एक शेर को समझने के लिए दूसरे शेर को पढ़ने की कतई जरूरत नहीं थी पर कविता की स्थिति थोड़ी भिन्न है. बिना पूरी कविता पढ़े इस निष्कर्ष पर पहुंचना कठिन होता है कि कवि क्या कहना चाह रहा है? गजल का सौंदर्य, उसका लचीलापन, भाव भंगिमा, संगीतात्मकता और प्रवाह ने इसे एक कविता की जरूरी विधा के तौर पर स्थापित कर दिया. आलोचक गजल को कविता मानने से इनकार करते रहे, पर पाठकों की स्वीकृति उसे मिलती रही. आज स्थिति यह है कि कविता का मतलब ही ग़ज़ल समझा जाने लगा है, और ग़ज़ल का मतलब दुष्यंत कुमार हैं जैसा के नचिकेता ने भी लिखा है दुष्यंत की ग़ज़लें आज हमें बेचैन और प्रेरित करती हैं.1

गजल के साथ कविता छंद के रूप में वापस होती है गीत दोहे भी छान्दसिक विधा हैं लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं. गीत का मर्म बिना सुर ताल के समझ नहीं आता. दोहा का लहजा उपदेश और नीतिपरक है, लेकिन हिंदी गजल की अपनी क्षमता है इसका शरीयत हमें मुतासिर करता है. ग़ज़ल हर सुख दुख को हर्ष विषाद को आशा आकांक्षा को अपना विषय बनाती है. आर पी शर्मा महर्षि के अनुसार गजल समसामयिक जीवन उपयोगी तथा अपनी धरती और परिवेश से जुड़ी हुई है.2 हम कह सकते हैं कि हिंदी गजल जिस सामाजिक चिंता से गुजरती है वह उसे दीर्घ जीवी बनाती है. किसी भी कविता का जनजीवन का सरोकार जितना गहरा होता है वह रचना उतनी प्रभावी होती है. ग़ज़ल के बारे में डॉक्टर इंद्रनाथ सिंह का मानना है छांदसिकता, गीतात्मकता आदि कारकों के साथ जीवन के सभी पक्षों को सहजता के साथ अभिव्यक्त करने की अद्भुत क्षमता ने ही हिंदी कविता में ग़जल के मार्ग को सुगम किया.3 असल में ग़ज़ल लिखना इतना सरल भी नहीं है उसका अपना ढांचा है, और अगर वह प्रभावित न कर सके तो ग़ज़ल भी नहीं है. डॉक्टर नरेश ने ग़ज़ल को एक कष्ट साध्य विधा माना है.4 ग़ज़ल का अपना एक शिल्प है, और उस शिल्प में ही ग़ज़ल ग़ज़ल बनती है हिंदी कविता में ग़ज़ल ने अपने तौर तरीके से ही लोगों को प्रभावित किया है. डॉक्टर सरदार मुजावर का विचार है कि नई कविता की छंदमुक्तता, गद्यमयता और सपाट बयानी से निजात दिलाने का काम गजल ने किया.5 वास्तव में हिंदी कविता में गजल वह काव्य विधा है जिसमें सबसे पहले युगीन परिवेश और सामाजिक जीवन का यथार्थ साक्षात्कार हुआ. अनिरुद्ध सिन्हा ने लिखा है कि ग़ज़ल मनुष्यता को केंद्र में रखकर सामने आती है.6

ग़ज़ल ने हर तरह से एक लंबा सफर तय किया है. वह अमीर खुसरो, कबीर भारतेंदु और दुष्यंत होते हुए विनय मिश्र तक पहुंची है. उसने हर हालात का जायजा लिया है. ग़ज़ल कभी बादशाहों की महफिलों में रही फिर नवाबों और रईसों तक पहुंची, लेकिन यह ग़ज़ल जब भी हिंदी में आई तो वो दरबार से निकलकर घर बार तक पहुंच गई. यही कारण है कि चानन गोविंदपुरी को कहना पड़ा कि गजल वह जानदार बूटा है जो हर प्रकार की जमीन में उगने और हर मौसम में विकसित होने का सामर्थ्य रखता है.7

आज हिंदी गजल आंदोलन के रूप में ख़डी है. हिंदी में अच्छी ग़ज़लें लिखी जा रही हैं जिसमें शिल्पगत सौंदर्य भी है, और भावगत सौंदर्य भी. हिंदी के कई गज़लगो हैं जिन्होंने दुष्यंत की परंपरा को सलीके से संभाल रखा है. समकालीन हिंदी के समृद्ध ग़ज़लकारों में जहीर कुरैशी, विनय मिश्र विज्ञान व्रत, राजेश रेड्डी, रामकुमार कृषक, मधुवेश आदि के नाम महत्वपूर्ण हैं.

हिंदी कविता में ग़ज़ल आज अपनी ताकत, संप्रेषण कौशल, प्रस्तुतीकरण और गहराई के कारण फल फूल रही है. हर आदमी ग़ज़ल का दीवाना है ग़ज़ल के हर शेर में उन्हें अपनी आवाज सुनाई देती है. हिंदी के कुछ महत्वपूर्ण ग़ज़लकारों के शेर भी इस संदर्भ में देखे जा सकते हैं-

जीने की मुश्किल राहों में रफ्तार से होकर गुजरेंगे

उस पार उतरना है जिनको मंझधार से होकर गुजरेंगे8

-विनय मिश्र

जब जब जोड़ लगाता हूं

अक्सर खुद घट जाता हूं9

-विज्ञान व्रत

बरखा की स्याह रात में उम्मीद की तरह

निर्भीक जुगनू ओं का चमकना भी देखिए

ज़हीर कुरैशी

इस जहां से जंग की कब रात काली जाएगी

भूख से घबरा के क्या बारूद खा ली जाएगी

– किशन तिवारी

पहले जैसी बात कहां इन बेमौसम की फसलों में

ख्वाबों की भरमार ने मिट्टी का सौंधापन छीन लिया

-एम. एफ़ नज़र

आज अपने हैं वही दूर भी हो सकते हैं

ख्वाब इन आंखों के बेनूर भी हो सकते हैं

रामबाबू रस्तोगी

कब कहां किसी की भी अर्ज़ियां समझती हैं

बिजलियां गिराना बस बिजलियां समझती हैं

रामनाथ बेखबर

मैं इस समय के मौन को पढ़ता गया हूं

सूक्ष्म से संवाद भी करता गया हूं

मांगन मिश्र मार्तंड

मिलेगा न्याय कैसे तुम बताओ

सबूतों को मिटाया जा रहा है

जगदीश तिवारी

जिंदगी में यह काम कर देना

तुम किसी सिर पर हाथ रख देना10

भानु मित्र

झुलसा हुआ है धूप में हर आदमी यहां

आखिर नई वह चांदनी तानी कहां गई

मधुवेश

निष्कर्ष – कहना न होगा कि अपनी इसी विशेषताओं के कारण हिंदी कविता में ग़ज़ल अपना स्थान बनाए हुए है.इसका लबो लहजा, अंदाज़ प्रस्तुतीकरण, मुहावरा, और बुनियादी ढांचा इसे सबसे अलग और सबसे पुर असर बनाती है.

संदर्भ

  1. नचिकेता वर्ष 2014, अष्टछाप पृष्ठ 8, फोनिम पब्लिकेशन दिल्ली 53
  2. आरपी शर्मा महर्षि, वर्ष 2005, ग़ज़ल लेखन कला, पृष्ठ 15, मीनाक्षी प्रकाशन दिल्ली 92
  3. इंद्रनारायण सिंह, वर्ष 2007, हिंदी ग़ज़ल शिल्प एवं कला, पृष्ठ 112, रोहतास जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन बिहार
  4. डॉ नरेश, वर्ष 2004, हिंदी गजल दशा और दिशा पृष्ठ 85, वाणी प्रकाशन दिल्ली 2
  5. सरदार मुजावर, वर्ष 2007, हिंदी की छायावादी गजल, वाणी प्रकाशन दिल्ली2
  6. अनिरुद्ध सिन्हा वर्ष 2009 हिंदी ग़ज़ल का सौंदर्यात्मक विश्लेषण, पृष्ठ 20, जवाहर पब्लिकेशर्स नई दिल्ली 16
  7. चानन गोविंदपुरी, वर्ष 1996, व ग़ज़ल एक अध्ययन पृष्ठ 49, सीमांत प्रकाशन नई दिल्ली 2
  8. ककसाड, अक्टूबर 2020, पृष्ठ 28 पटपड़गंज दिल्ली 92
  9. विज्ञान व्रत, 2018, जैसे कोई लौटेगा पृष्ठ 76 अयन प्रकाशन नई दिल्ली
  10. भानु मित्र, वर्ष 2017, गजल ग्रंथ पृष्ठ 195 त्रिवेणी पब्लिकेशन जोधपुर
  11. दुष्यंत कुमार वर्ष 2014 साए में धूप पृष्ठ18 राधाकृष्ण प्रकाशन दिल्ली

गजल

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तुम

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“तुम”

हर नज़्म में तुम , 

हर लफ्ज़ में तुम 

मैं तो ठहरा काफिर 

पर मुझे निखारती 

 नायाब फरिश्ता तुम ।

हर अक्श में तुम ,

हर ख्वाब में तुम 

मैं तो ठहरा बंजर जमी 

पर मुझे भिंगाती 

 शबनमी बूंद तुम 

हर सवाल में तुम ,

हर जवाब में तुम 

मैं तो ठहरा फकीर 

पर मुझे चमकाती 

नायाब कोहिनूर तुम ।

हर प्यास में तुम ,

हर तलब में तुम 

मैं तो ठहरा खामोश दरिया

पर मुझे डुबोती मधुर रस तुम 

हर नज़्म में तुम ,

हर लफ्ज़ में तुम 

मैं तो ठहरा काफिर 

पर मुझे निखारती 

 नायाब फरिश्ता तुम ।
कुनाल कंठ
कामिल कवि

भारतीय भाषाओं का हिंदी में अनुवाद : स्वप्न और संकट  (गुजराती के संदर्भ में)- डॉ. नयना डेलीवाला

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भारतीय भाषाओं का हिंदी में अनुवाद : स्वप्न और संकट  (गुजराती के संदर्भ में)

                                                          डॉ. नयना डेलीवाला, हिंदी विभाग,

                                                       एफ.डी.आर्ट्स कॉलेज, अहमदाबाद(गुजरात)

अनुवाद रचना का पुनर्जीवन है। साहित्य और कला में जीवन के यथार्थ अनुभवों का लेखा-जोखा अभिव्यक्ति पाता है। यूं देखा जाय तो हमारा जीवन राजनीति एवं विचारधाराओं के तहत ही जिया जा रहा है। हमारे आस-पास जो गूंथा-बुना जा रहा है उस प्रभाव से हम अछूते नहीं रह पाते। कला में जो अभिव्यक्त होता है, अनुवाद के द्वारा उसी संवेदना को अन्यान्य तक संप्रेषित किया जा सकता है। भाषा  विचारों की संवाहिका है तो अनुवाद विविध भाषाओं एवं विविध संस्कृतियों से साक्षात्कार करानेवाला साधन। अनुवाद अपने भगीरथ प्रयास से दो विभिन्न एवं अपरिचित संस्कृतियों,परिवेशों एवं भाषाओं की सौंदर्य चेतना को अभिन्न और परिचित बना देता है। पॉल एंजिल का यह कथन पूर्णतया सही है कि— इक्कीसवीं सदी में प्रत्येक देश में दो साहित्य उपलब्ध हो सकेंगे। पहला, उसके अपने लेखकों का रचा गया साहित्य और दूसरा विश्व भाषाओं से अनूदित साहित्य।

  भारत वर्ष के अपने आंतरिक परिवेश में तो भारतीय मानक धर्म ग्रन्थों, साहित्य कृतियों के पारस्परिक अनुवाद तो बडी तेजी से आपस में होते चले आए हैं। रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत,मेघदूतम् और गीत गोविंद जैसी महान कृतियाँ हैं जिनके अनुवादों की एक लम्बी परंपरा-सी एक भाषा से दूसरी भाषा में विकसीत होती चली गई है। लगभग सभी भारतीय भाषाओं के साहित्यिक इतिहास के दौर में अनुवादों का बोलबाला रहा है। चूँकि प्रायः सर्वत्र ही पद्य-रचना साहित्य की एक मात्र सरणि थीं अतः स्वाभाविक रुप से अनुवाद भी प्राय़ः पद्य-बध्ध हुए हैं।

  भावों के अभिव्यक्तिकरण की पद्धतियों में  स्थूल से सुक्ष्म की ओर चलें तो वास्तुशिल्प,मूर्तिकला और चित्रकला तथा संगीत का अनुवाद तो संभव ही नहीं है। इनका अनुकरण कर एक अनुकृति तैयार हो सकती है या प्रभावा -न्वितिपरक एक स्वतंत्र कृति तैयार की जा सकती है परंतु इनका भाषातंरण,रुपांतरण या अनुवाद नहीं हो सकता।

  भाव भाषा में व्यक्त होते हैं, तभी अनुवाद की सीमा में आते हैं। यूँ भाषा में— कविहिं अरथ आखर बल साँचा के अनुसार बात से अक्षर, अक्षर से बने शब्द और अर्थ के सहयोग से जो भावाभिव्यक्ति एक भाषा में होती है, वह उस भाषा की सामर्थ्य की सीमा के कारण पूरी तरह न हो पाने के पर भी  भाषा के संगीत प्रवाह, प्रौढ़ोक्ति परंपरा-निजंधरी कथाओं-आख्यान-अप्रस्तुत योजना-मुहावरेदानी-लोकोक्ति-कवि समर्थ आदि के माध्यम से उस भाषा की सीमा रेखा के भी पार की अभिव्यक्ति करवा देती है।

  चरित्र के रुप में समूचा मानव सदेह अपने सांस्कृतिक वेश में उपस्थित होता है। साहित्य की विधाओं में न सिर्फ अनुभूतियों का संश्लेषण होता है अपितु जीवन-गाथा का संस्पर्श, फैलाव एवं विश्लेषण होता है।

  अनुवाद को लेकर सबसे पहले जिस कठिनाई का सामना करना पड़ता है वह है कृति के चुनाव की समस्या, जिसके लिए जूझना पड़ता है। अनुवाद के लिए किसी रचना के चुनाव का मानदण्ड क्या हो सकता है, क्या वह रचना जो एक पाठक के रुप में हमें अच्छी लगती है या वह जिसकी प्रशंसा समीक्षकों ने की है या वह जो मूल भाषा के पाठक वर्ग में सबसे अधिक लोक प्रिय हुई है, या वह जिसे पुरस्कार मिला हो ? और क्या ये सही नहीं है कि किसी कृति का ठीक-ठीक मूल्यांकन तो लंबी समयावधि में  समय की छलनी में छनने के बाद ही होता है। तब हमें समय के निर्णय की प्रतीक्षा करना चाहिए।

  अर्थ के संप्रेषण की समस्या भी अनुवाद का महत्वपूर्ण पक्ष है। इसके अभाव में पाठक सही रुप में बात को न समझ सकता है न ही पकड़ सकता है। अनुवाद को अगर मूल के समान विश्वनीयता प्रदान करनी हो तो अर्थ का संप्रेषण अहम बात बन जाती है। इसमें अर्थ के साथ किसी भी प्रकार के खिलवाड़ की कोइ गुंजाईश नहीं रहती। मूल के अर्थ को लक्ष्य भाषा में क्षति पहुँचाना अनुवाद में स्वीकार्य नहीं है। उदा. સારૂં, તો હવે આપણે શરુ કરીએ,  का हिंदी  अच्छा,तो अब हम शुरू करें। सही नहीं है,  परंतु होना ये चाहिए कि ठीक है, तो अब हम चलेंगे। उदा. घणी गोळीनां पाणी पीवा अर्थात बहुत से मटके से पानी पीना। नहीं होता, अपितु  भाँति-भाँति के अनुभव  होना। उदा. बजारमां गरमी छे अर्थात बाजार में कहीं आग नहीं लगी परंतु चीजों के दाम ऊँचे है, महंगाई तेजी पर है।

  कथ्य का संप्रेषण भी अनुवाद का जानदार पहलु है,जिसके अभाव में सामग्री अर्थहीन हो जाती है। फिर चाहे सामग्री किसी भी क्षेत्र की क्यों न हो, चाहे साहित्य,वैज्ञानिक,व्यावसायिक,विधि,कार्यालयी,प्रशासनिक।

 गुजराती से हिंदी में मैंने विविध साहित्यिक विधाएं—जैसे कि ललितनिबंध,कविताएँ, कविता संबंधी समी- क्षात्मक लेख, कहानी, नाटक, पुस्तक की भूमिका आदि के अनुवाद किए हैं। उसीके आधार पर होनवाली समस्याओं की बात करना चाहुँगी।

 आ. जयेन्द्र त्रिवेदी द्वारा रचित कीडिओ निबंध के अनुवाद को मैंने चुना। चींटिंयां निबंध का शीर्षक है। एक सुक्ष्म जीव और उसके क्रियाकलाप के माध्यम से लेखक ने गुजराती के उत्तर आधुनिक युग के रचनाकार सुरेश जोशी की कलम की प्रखरतम शक्ति, उनके स्पष्ट वक्ता होने का वैयक्तिक पक्ष, अत्यंत हल्की-फुल्की शैली में गंभीर बातें कहने की एक अनोखी छटा का परिचय करवाया है। आ.त्रिवेदीजी के निवास स्थान से जोशीजी का लगाव आदि की बात करते हुए, निबंध में चींटी का संदर्भ कवि पंत की लिखी कविता से जोड़ते हुए उसे पिपिलिका पांति भी कहा है। पंतजी द्वारा चींटी के लिए कहा गया संबोधन—तम का तागा अर्थात अंधकार का धागा उपमान का प्रयोग करके चींटी का महत्व स्थापित किया है। आगे ऊधई अर्थात दीमक की सामाजिकता की बात एक गुजराती के रचनाकार मशरुवाला ने की है उसका हवाला देते हुए पंतजी भी चींटी को सामाजिक प्राणी का दरज्जा देते हैं। पंतजी चींटी का वंश, उपज, गढ़ आदि का नूतन उपमानों द्वारा विस्तृत परिचय करवाते है। उदा—प्रयुक्त शब्द—फळीयुं—आंगन, गौशाळा—गौशाला,  कोठार—कोठार(गुजरातीभाषा से लिया शब्द) जिसमें अनाज आदि साल भरकी चीजें संजोयी जाती है। घोडियाघर—-बालघर(पालने में रखे जानेवाले बच्चे का स्थान)  डेली—-ड्यौढी,  शेरी—पौरी,  राजमार्ग—- राजपथ

घो मरवानी थाय त्यारे वाघरी वाडे जाय—- गोह जब मरने की होती है तब वाघरियों की बस्ती की ओर भागती है। ( गीदड़ की मौत आती है तो शहर की ओर भागता है।

गढ़ीमां—चींटीयों के रहने का स्थान—गढ़,  संघराखोर—परिग्रही।

उपर्युक्त उदाहरणों से हम जान सकते हैं कि कई शब्द यथातथ प्रांतिय भाषा से, तो कई शब्दों की अर्थछाया बनाये रखने के लिये फूटनोट देकर व्य़ाख्यायित कर दिए जाते हैं। यहीं पर इसके मर्म को, मूल को संप्रेषित करने का उत्तम मार्ग नज़र आता है।

  मानव जीवन को सुगंधित, आनंद से परिपूर्ण और संगीतमय बनाने के लिए पुष्पों की क्यारियाँ, फुहार, शहनाई एवं गीत का महत्व होता है वैसे ही कविता भी अति महत्वपूर्ण है। भावात्मक एकता की संपूर्ति, भाव-भावनाओं का उन्नयन एवं हृदयपक्ष की समृद्धि हेतु काव्यानुवाद अनिवार्य है, उसमें भी गज़ल के अनुवाद बड़ी जोर-शोर से हो रहे है। जो भावों से ओतप्रोत है, प्रायः एक फैशन भी है और लोगों के आकर्षण का केंद्र भी है। साहित्य की सर्वाधिक भावपूर्ण विधा कविता है।

  काव्यनुवाद सर्वाधिक कठिन कार्य है, फिरभी तथ्य यह है कि आज काव्यानुवाद संपन्न अवश्य हो रहे हैं। समस्या ये है कि मूल के ध्वनिसौंदर्य को बरकरार रखना होता है, लय,तुक,प्रभावान्विति,शब्द-योजना,शब्द-शक्ति, प्रतीक-बिंब,मुहावरें, रुप, अलंकार, छंद, एवं रसात्मकता को अक्षुण्ण रखना अनिवार्य हो जाता है। गति,संगति,गेयता,संगीतात्मकता का निर्वाह भी सुरक्षितता की अपेक्षा रखता है। अतः कह सकते हैं कि काव्यानुवाद  के माने  रवि-रश्मियों को तृण-रज्जु में बद्धमूल करना।

 गुजराती के मूर्धन्य ज्ञानपीठ पुरस्कर्ता कवि श्री राजेन्द्रशाह की कविताओं के अनुवाद करते समय उपर्युक्त   बातों का सामनाकरना पड़ा था। उनकी कविता खालीघर के कुछ बंध पेश है—

उदा—अब खुले

   द्वार में से,

  संघर्षरत अंधकार के बीच टिमटिमाती

 तेजस्वी दो तारिकाओं का समुत्सुक स्वागत नहीं,

 बंध है द्वार।

इसमें  अंधकार के लिए संघर्षरत विशेषण का प्रयोग, तथा अपने प्रिय के स्वागत हेतु नेत्र द्वय के लिए उपमा है तेजस्वी दो तारिकाएँ।

उदा—

आले पर टिकी पात्र-छायाएँ,

तिरछे मुख से करे चिक्-चिक् गूढ़ हँसी।

 इसमें कवि ने मूल को अखंड रखकर संप्रेषित किया है—छायाएँ हैं पर वही पात्रों की जो उनके मानसपट पर आज भी यथावत अंकित है, और वे एक विशेष प्रकार से गूढ़ हँसी के साथ चिक्-चिक् कर रही हैं।

यहाँ कवि की मनोजगत को खोलने की अद्भूत छटा द्रश्यमान होती है। ये कविता की विशेषता है कि अछांदस में भी एक लय अवश्य निहित रहता है।

  प्रतिक्षणबोध काव्य में कवि अपनी प्रेयसी को सुक्ष्म रुप में खुद के भीतर अनुभूत करते है,यहाँ अलौकिकता को वर्णित करते हुए जिन शब्दों का प्रयोग किया है देखिए— बेठो छुं आंखो बंध करी— का आसीन हूँ मैं नेत्र– निमीलित।

 एक  जगह पर कवि प्रेमथी फर्या करे का रमण करे, किस प्रेम से में एक आत्मीय ऐक्य का दर्शन करवाते हैं। रुपरिक्त, अपरोक्ष, अगोचर आदि शब्दों का अनुवाद एक गहरी अनुभूति का साक्ष्य बनता है।

 इस संदर्भ में भोलानाथ तिवारी कथन सही है—जिस व्यक्ति में कविता करने की सहज प्रतिभा नहीं होगी, वह  कविता का अच्छा अनुवाद भी नहीं कर सकता, क्योंकि काव्य का अनुवाद भी एक सृजन है।

   गुजराती भाषामें भी सौराष्ट्र-कच्छ प्रदेश में आंचलिकता की बहुलता द्रष्टिगत होती है। कहावत है न—बार गांवे बोली बदलाय—हिंदी में दस कोस पर बोली बदले के अनुसार गुजरात को ही देखें तो उत्तर गुजरात, मध्य गुजरात, दक्षिण गुजरात उसमें भी आदिवासी प्रजा की बोली, सौराष्ट्र-कच्छ की बोली में रचा गया साहित्य अनूठा होता है। उसके मूल उत्स को बनाये रखकर भावों के संप्रेषण में बाधाएँ आती है। फिरभी अनुवाद पूरा होकर  जन-जन तक पहुँचता है पर अपनी महक को बरकरार रखते हुए।

उत्तर गुजरात की बोली में लिखा गया गुजराती के मूर्धन्य साहित्यकार ऊमाशंकर जोशी का नाटक—बारणे टकोरा। शीर्षक सुनते ही लगता है क्या टकोरा माने घड़ी की टिक्-टिक्, क्या दरवाजे पर ये टिक्-टिक् कभी संभव है ?  पर ये गुजराती बोली का शब्द है। औऱ हिंदी में है—दरवाजे पर दस्तक (कोइ पथिक के आगमन पर जो दरवाजा खटखटाया जाता है उसी संकेत को उजागर किया है। मर्म ये है कि छोटे से गांव का पंडित उदार मन से गांव में आने-जानेवालों की आवभगत करता है,उसमें पंडिताईन भी भरपूर सहयोग करती है। परिवार में दो बेटे हैं। पंडित की मृत्यु के पश्चात बड़ा बेटा पिता की परंपरा को जारी रखता है। और छोटा शहर में पढ़ाइ प्रारंभ करता है। कोइ बीमारी का इलाज़ कराने, कोइ(हटाणुं) चीजें खरीदने, कोइ रिश्तेदारी को निभाने के लिए आते है और पंडिताइन के घर(वाळुं) सांध्य-भोजन करके जाते है। देर-सवेर, आधी रात भी पथिक आते है, पर पंडिताइन की उम्र का तकाज़ा की उनका शरीर साथ नहीं देता। वह काम नही कर पाती। अपने पति के न रहने पर उनके गुण-गान करती है और दिन गुजारती है। इतने में एक रात को उस स्टेशन पर आनेवाली रेल के चले जाने पर देर रात को एक मुसाफिर दरवाजे पर लगातार दस्तक देता है, वह उठ नहीं पाती, छोटे बेटे को कहती है, वह पढ़ाइ के लिए बैठा है, अतः पंडिताइन खुद धीरे से उठकर दरवाजा खोलती है तब तक (वटेमार्गु) पथिक आगे निकल जाता है, जो उनका ही मृत पति-सा लगता है। उन्हें आवाज़ देती हुइ कहती है— लौट आइए !  आपका तो खुद का ही घर है, और पूछते फिर रहे हैं। अपने बेटे से कहती है —अब हमारे दरवाजे पर कोई नहीं आएगा।

उदा—मोडा उनाळा नी सांज़—-ढ़लते ग्रीष्म की शाम,  पडाळ—ओसारा,

खापोटीओ—खपच्चियों,  लबाचा—फटे-पुराने,  आंगणुं—ड्यौढ़ी,  ऊंचो-नीचो—टेढ़ा-मेढ़ा,

झोड़—वळगाड—लप(गुजराती) अनमने मन से बात करना। अमळाइने—चक्कर खाकर,  इंयाने—यहाँ का,

हींडता— चल पड़ना, आवजे घर ढूंकडुं— मानो घर करीब आ गया,  नावानीय सगाइ नइ—किसी भी

प्रकार का रिश्ता न होना,  मेरथी—ओर से, इंमने नु वे बधुंय फल्लं-फल्ला—- उनके न रहते सब खाली खम्म।

 गुजराती के जानेमाने लेखक धूमकेतु जिनकी कहानी का शीर्षक है पोस्टऑफिस। इस कहानी का संवेदन अत्यंत मार्मिक,दिल को छू जानेवाला है। प्रमुख चरित्र कोचमैन अली डोसा, जो बहुत अच्छा शिकारी था,खरगोश के शिकार में उसकी महारत थी। उसकी जी जान से प्यारी बेटी थी मरियम,जिसकी शादी फौज़ी जवान से हुई थी, और फौज़ी उसे लेकर पंजाब चला जाता है। अली हर दिन बेटी के खत के इंतजार में पोस्टऑफिस की पायरी पर बैठकर इंतजार करता है। एक दिन थकहार कर पोस्टमेन लक्ष्मणदास को सोने की तीन गिनियां देकर कहता है मरियम का खत आये तो जरूर पहुँचाना। पोस्टमेन पूछता है कहाँ—अली उत्तर देता है मेरी कबर पर और पोस्टमेन आश्चर्यविमूढ रह जाता है। एक पिता की सब्र का इम्तेहान मनुष्य को कैसे विगलित करता है यही करूण अंत इस कहानी का है कि जब पोस्टमास्टर की बेटी विदेश ब्याही जाती है और खत-खबर नहीं आता तब वह डोसा अली की वेदना को अनुभूत कर पाता है।

इसमें शिकार के संदर्भ में लेखक ने पीला राँप और कांस शब्दों का प्रयोग घास के विशेष नाम के रुप में किया है। ये सौराष्ट्र के गांवों में खेत- खलिहान में प्रयुक्त साधनों के नाम है। अनुवाद करते समय पाद-टिप्प्ण में व्याख्यायित किया गया है। क्योंकि इसके समान हिंदी में उचित शब्द उपलब्ध नहीं हो पाया।

 उदा–पीला राँप अर्थात ऐसा घास जो पतला करीब सात-आठ फूट लंबा घास जो खेतों के  किनारे पर उगता है, उसे काटकर गोबर लिंपण किये कमरों में से जाडू निकालने के लिये उपयोग में लिये जाते है।

कांस वह घास है जो काफी लंबाई में उगता है खेतो के आसपास। उसको काटकर छोटे-बड़े जाडू बनाये जाते हे, जिसका उपयोग शहर के लोग घरों को साफ-सूथरा रखने के लिए करते हैं।

  एक अवसर ये प्राप्त हुआ  जिसमें उपर्युक्त साहत्यिक विधाओं के अतरिक्त पुस्तक संपादन के संपादक की प्रस्तावना का अनुवाद किया। गुजराती साहित्य जगत के महान दैदिप्यमान दिवाकर तुल्य श्री सितांशुयशश्चंद्र द्वारा संपादित एवं नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित पुस्तक  रंग छे…… स्वातंत्र्योत्तर गुजराती नाटक में गुजराती नाटक 1947 से 2007 तक की अवधि में रचे गये नाटकों में से चयन करके संपादन किया है। इस पुस्तक की प्रस्तावना का कार्य करते हुए लग रहा था की स्वात्र्यंत्तोतर की पहली साठी के नाटक एवं रंगमंच का(सरवैयुं) लेखा-जोखा नाप-तोल के साथ प्रस्तुत किया है। उच्चतम दरज्जे की गुजराती रंगमंच की, साहित्यिक भाषा का चुस्ति से प्रयोग किया है।

उदा के लिये देखिए—-

प्रारंभ का गौण शीर्षक—– विमुक्त वर्तमान की तलाश में। तलाश है पर वर्तमान की मुक्ति की।

अपटीक्षेप—यथावत हिंदी में ले लिया है।  ताबामां राखवुं—अधिकार में करना,   दोरीसंचार, भांडवामां-गरियाया, गणतरीबाज, लांबीखेपो। यथातथ  रखा गया है कि जो तकनीकी शब्द है।

रत्नपुंजमांथी अलग-अलग झांयना,झबकारनां—- अलग-अलग झांय एवं चमकयुक्त।    मातबर—सशक्त,

किसी कवि की पंक्ति—-होडे होडे जुद्धे नव चढ़ीए, चढ़ीए तो कटका थई पडीए—— देखा-देखी के जोश में युद्ध न करें, अगर करें युद्ध तो फना होने की चाह रखें।

  आंधळुकियां—अविचारी, । काठुं—- क्लिष्ट,ढांचा। झीले छे—ग्रहण करता है। गुंगळावतो पडदो—–श्वास अवरुद्ध करनेवाला पर्दा। वटेमारगुओ,  केडी कंडारनारा,  लसोटेला,  घूंटेली श्याहीमां  कित्तो झबोळी, मुहावरे का प्रयोग—-बार हाथनुं चीभडुं ने तेर हाथनुं बी—– दूसरे की रेखा छोटी करने के लिए अपनी रेखा बड़ी करना

  अनुवाद करते समय  भाषाकीय भूलों के लिये सज्ज रहना अति आवश्यक होता है। इसमें  ध्वनि,शब्द, रूप वाक्य शब्द, अर्थ, अर्थ छवियाँ आदि समस्याओ का एहतियात न बरता जाय तो अनुवाद अनुवाद न रहकर  कुछ ओर ही स्वरुप धारण करता है।

उदा—गुजराती में ळ  स्वतंत्र ध्वनि है—देखिए  मळवुं, जाळववुं, हळवुं। जबकि हिंदी में ळ ध्वनि के लिए ल ध्वनि ही है। तब ऐसे शब्दों को मिलना,सम्हालना,हलका—लिखा जाएगा

शब्द में भी हम देखें तो—- संधी — जोडावुं—-समझौता, घावा— हमला—- हुमलो, संशोधन—अनुसंधान—शोध, आदि

रूप के संदर्भ में देखें तो मूल धातु के कई शब्द बनते है उदा—गमन से गामी, अनुगामी—क्रोध से क्रोधी, क्रोधित,क्रोधाग्नि,क्रोधवश। इस प्रकार अनेक शब्दों के कारण समस्या पैदा होती है। किसी शब्द का रूप कैसे बना है, प्रत्यय,उपसर्ग,परसर्ग आदि का ज्ञान यहाँ अपेक्षित रहता है।

वाक्य के कुछ उदा—(1)ख्रिस्तीओनो धार्मिक ग्रंथ बाइबल छे—इसका हिंदी होगा—-बाइबिल ईसाइयों का पवित्र ग्रंथ है। (2) तेणे त्रण गोळीओ मारी—-उसने तीन गोलियां चलाई।

शब्द-शक्ति के उदा—-युधष्ठिर के अवतार—अर्थ है—धर्मात्मा, सत्य का प्रतीक, अत्यंत झूठा, मिथ्याभाषी, बनिया—-वैश्य, व्यापारी, कंजूस, कुंभ कर्ण की सखी—–कुंभ कर्ण की पत्नी, नींद, चैन, सूर्यपुत्र—-कर्ण, उदारमना, मक्कीचूस आदि

गुजराती में लिंग तीन है—अतः अनुवाद करते समय इसकी सजगता होना अनिवार्य है। उदा—पुस्तक तो गुजराती में केवुं कहा जाता है, हिंदी में पुस्तक कैसी, स्त्रीलिंग, अवाज—केवो हिंदी में ध्वनि कैसी कहा जाता है।

हिज्जे के उदा पेश है—वाळ—वार,पाळ—पार,कमळ—कमर, यहाँ क्रमशः अर्थ है केश—मारना, तालाब का किनारा—उसपार, पुष्प—कटिप्रदेश। अनुवाद करते समयशब्दों में ह्रस्व-दीर्घ और हिज्जे महत्पूर्ण होते है—दिन—का दीन, पिता का पीता, माता का मीत,अभिमान का अभीमान।

यूं तो गुजराती- हिंदी भगिनी भाषाएं है फिरभी अर्थ बदल जाते है—

 उदा—अकस्मात- हिंदी—अचानक, गुजराती—दुर्घटना, उपाधि—पदवी,—-दुःख, राजीनामा—-त्यागपत्र—सुलेहपत्र,  सही—शुद्ध—हस्ताक्षर,  सत्तर—70—17।

मुहावरों, कहावतों,लोकोक्तियों की द्रष्टि से भी कभी-कभी दिक्कत होती है। फिरभी हमने देखा है कि कई सारी ककहावतें इन दोनों भाषाओ में समान रुप से मिल जाती है।कुछ उदाहरण इस प्रकार हो—-

गुजराती में कहते हे— (1)काका-मामा केवाना ने घरमां होय तो खावाना।

                  (2) गरज पडे गधेडानेय बाप करवो पडे।

                  (3) जानमां कोइ जाणे नहीं ने हुँ लाडा नी फोई।

हिंदी में कहते हैं— (1)बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया, सारी पैसे की सगाई है।

                (2) जरूरत के वक्त गधे को भी बाप बनाना पड़ता है।

                (3) बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना।

  प्रशासनिक,कार्यालयी अनुवाद के संबंध में डॉ.राजमणि तिवारी का कथन— कार्यालयीन अनुवाद करते समय अनुवादक को छूट लेने की स्वतंत्रता नहीं है। उसे प्रत्येक शब्द का अनुवाद करने की बाध्यता सी प्रतीत होती है।  इसका परिणाम यह होता है कि अनुवाद की भाषा कृत्रिम और अटपटी बनजाती है।

स्पष्ट है साहित्यिक अनुवाद कार्यलयीन अनुवाद से अलग है अतः उसकी समस्याएँ भी भिन्न हैं। भाषा की प्रकृति, संरचना, लंबे-लंबे संश्लिष्ट वाक्य, पारिभाषिक शब्दावली, अनेक पर्यायों का प्रचलन, कार्यशालाओं का अभाव, सीमितसाधन आदि।

यहाँ पर मैं कुछ गुजराती हिंदी की शब्दावली एवं वाक्यांश प्रस्तुत कर रही हूँ जिससे हमें पता चलता है कि किस प्रकार की समस्या सही मायने में उद्भव होती है—

            गुजराती                                           हिंदी

  1. कार्यसिध्धि-हिसाब तपासणी कार्य सिद्धि हिसाबी-लेखा परीक्षा
  2. नामुं                                                      हिसाबी लेखन,लेखा-कर्म,लेखा-शास्त्र.
  3. जे नामे शेरो करायेल होय ते व्यक्ति. पृष्ठांकित,जिसके नाम से बेचा गया हो
  4. आ बाबत सरकारना हुकमो माटे सादर करवी.    मामला सरकारी आदेस हेतु प्रस्तुत करें
  5. राज्यपालश्रीना हुक्मथी अने तेना नामे.  राज्यपालश्री के आदेशानुसार,उनके ही नाम से.
  6. वसूलात पात्र चूकवणी.   वसूली योग्य अदायगी.
  7. कह्या प्रमाणे नक्की करायु.   तदनुसार निश्चित किया गया है
  8. हुकमनी तामिल थाय,   आदेश दारी किया जाय.
  9. अनधिकार उपयोग.                           अनधिकृत उपयोग.
  10. विवरण तुरंत मोकलो,बाबत ब जरूरी छे विवरण तत्काल भेजें,मामला अति आवश्यक है.
  11. पत्र मळ्यानी जाण करी दीधेल छे.     पत्र प्राप्ति की सूचना भेज दी गई है।

    संरचना संबंध में  चाहिए कि अनुवादक मूल सामग्री के प्रत्येक शब्द का पर्याय खोज लें, और दोनों भाषाओं की संरचना को लक्ष्य करते हुए  अनुवाद करें। उदा—  मने  आपने जणाववा कहेवामां आवे छे— हिंदी में— मैं आपको सूचित करता हूँ,  अथवा  मुझे आपको सूचित करना है, होगा।

  गुजरात सरकार भारत सरकार तथा अन्य हिंदीभाषी राज्यों से पत्राचार करने के लिए करारानुबद्ध है। पर गुजराती-हिंदी, एवं हिंदी-गुजराती शब्दकोश अधिक न होने के कारण भी समस्या खड़ी होती है। उदा—एक पत्र नुं शीर्षक हतुं—गृहकर समंक संग्रहण अर्थात घरवेराना आँकडा एकत्रित करवा, इसमें समंक का अर्थ स्टेटिक्स—आंकडा ये शब्द रघुवीर के अलावा अन्य शब्दकोश में प्राप्त नहीं हुआ।

उदा—सिमेन्ट के लिए वज्रचूर्ण शब्द का प्रयोग हुआ था। तब वज्रचूर्ण के दाम में वढ़ोतरी,  ये समजकर दवाइ या औषध के चूर्ण  मानकर उसे आयुर्वेद विभाग में भेज दिया, हालांकि ये था रचना निर्माण विभाग का पत्र। उदा. ऐसा ही एक अंग्रेजी शब्द—-रेकेमेन्डेशन, जिसका भारत सरकार के शब्दकोश में अर्थ है—सिफ़ारिश, संस्तुति,अनुशंसा,  राजस्थान के कोश में— सिफ़ारिश, संस्तुति,  उत्तर प्रदेश के कोश में—- सिफ़ारिश, अभिसंशा, गुजरात के वहीवटी कोश में सिर्फ सिफ़ारिश है।

 इन सब में एकरूपता की आवश्यकता निहायत ज़रूरी है। जो कार्य आज भारत सरकार की शब्दावली समन्वय समिति कर रही है।

  अनुवाद केवल गुजराती से हिंदी में हो या भारतीय आर्य भाषा से हिंदी में हो, भारतीय भाषाओं की इन रचनाओं के साथ-साथ कुछ विशिष्टताएँ भी जुड़ी हुई हैं। विभिन्न्ता होते हुए भी ये भाषाएँ अन्ततः एक ही मूल भाषा से विकसित भाषाएँ हैं। इसीलिए समानता के कुछ तत्व इन भाषाओं मे मिलते हैं। इसी प्रकार भौगोलिक अंतर होने के बावजूद एक आम भारतीय की चेतना, एक मूल सांस्कृतिक चेतना से परिचालित है। अनुवाद के लिए ये स्थितियां शुभ है।

  आधुनिक यन्त्रीकरण की प्रक्रिया जैसे-जैसे हमारी मौलिक पहचानों के संकेतों को धुँधला कर रही है, हमारी सांस्कृतिक भूमि से हमें दूर ले जा रही है, वैसे-वैसे साहित्य में भाषागत अन्तराल के बावजूद समानता के लक्षण दिखाई देने लगे हैं।

   इस समूची प्रक्रिया में पाठक की भी अहम भूमिका होगी। वह परायी भाषा की  अनूदित कलाकृति को  किस प्रकार लेता है। अपने बौद्धिक और मानसिक स्तर को पाठक ने कितना प्रौढ़ किया है। अनुवाद को आत्मसात करने के लिए, बाकी तमाम चीजों के साथ-साथ एक प्रणयभाव भी अनिवार्य है कि पाठक उसे तर्क की जगह संवेदना सहित ग्रहण करें। इस तरह गुजराती—हिन्दी के पारस्परिक अनुवाद के तन्तु अधिक मजबूती से एक-दूसरे से जुड़ेंगे।

 कुल मिलाकर परस्पर भारतीय भाषाओं के अनुवाद के माध्यम से मनुष्य सांस्कृतिक,राष्ट्रीय, सामाजिक एकत्व की दिशा में अग्रसर होते हुए, भाइचारा और बंधुत्व की भावना से ओतप्रोत होता है। राष्ट्रीयता उजागर होती है।

           

   संपर्क—0-9727881031, 9327064948.  n.deliwala13@gmail.

 संदर्भ ग्रंथ सूची

1 सरकारी लेखन पद्धति—-भाषा नियामक कचहरी, गुजरात राज्य.

2 त्रिभाषी वहीवटी शब्दकोश——-भाषा नियामक कचहरी, गुजरात राज्य.

3  अनुवादः समस्याएँ अवं समाधान— डॉ.अर्जुन चव्हाण.

4  अनुवाद कला (आलेख) पूर्व निदेशक— भाषा नियामक कचहरी, गुजरात राज्य.

5  अनुवाद – कार्यदक्षता — संपादन— डॉ. महेन्द्रनाथ दुबे.

6  राजेन्द्र शाह की कविताएँ— संपा—डॉ किशोर काबरा, डॉ चीनू मोदी.

7  गुजराती ललित निबंध—-डॉ.भगवतशरण अग्रवाल, डॉ रधुवीर चौधरी

8  आधुनिक गुजराती एकांकी—- संपा—डॉ.गोवर्घन शर्मा, डॉ. चन्द्रसेन नावाणी

9  नटरंग(पत्रिका) अंक93-94— संपा—अशोक वाजपेयी, रश्मि वाजपेयी.

10  अनुवाद एवं संचार —- डॉ पूरनचंद टंडन.

11  निसर्गलीला अनंत— आ. जयेन्द्र त्रिवेदी

कोश विज्ञान की उपादेयता- डॅा. गीता नायक, श्रीमती अंजू श्रीवास्तव

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कोश विज्ञान की उपादेयता

शोध निर्देशकः- डॅा. गीता नायक

शोधार्थीः- श्रीमती अंजू श्रीवास्तव

भाषा विज्ञान किसी भी ज्ञान में सबसे अधिक भूमिका निभाता है । दरअसल शिक्षण, अध्यापन या ज्ञान प्राप्ति का माध्यम ही भाषा है। बिना भाषा के मानव समाज कभी वर्तमान स्वरूप तक नहीं पहुंच सकता था और नहीं वह अपने संचित अनुभव को परंपराओं तक संजो सकता था। इसीलिये किसी भी भाषा में रचा गया ज्ञान जानने के लिये भाषा का ज्ञान होना बहुत जरूरी होता है । और यह ज्ञान भाषा विज्ञान के माध्यम से ही समझा जा सकता है। जैसा कि स्पष्ट है कि भाषा का ज्ञान भी अपने आप में विज्ञान है अर्थात् उसको समझने के लिये विशेष तरीको  पद्धतियों एवं नियमों का पालन करना होता है। इस अध्ययन के अंतर्गत भाषा नामक इकाई की परिभाषा पहचान ] उसके अस्तित्व में आने और विस्तार के तथा उसके घटक तत्वों के बारे में अध्ययन किया जाता है।

भाषा यद्यपि ध्वनि के रूप में नैसर्गिक रूप से विद्यमान रही किंतु उसे अभिव्यक्ति का नियमित माध्यम बनाने के लिये ध्वनि विशेष को संचित करके वर्ण और फिर सभी को संज्ञा देने के लिये शब्दों का निर्माण किया गया है। अतः भाषा के संपूर्ण विस्तार में शब्दों का अत्याधिक महत्व है और किसी भाषा में सेंकडों वर्षो के प्रयोग के बाद जितने भी शब्दों का निर्माण किया गया हैं उसे जानने के लिये शब्दकोश का निर्माण बहुत जरूरी है। अन्यथा कम उपयोग या उपयोग न होने के कारण शब्द भाषा से गायब हो सकता है जो कि भाषा के लिये अमूल्य संपत्ति होता है।

इसी कोश निर्माण और उसके अध्ययन को कोश विज्ञान के रूप में जाना जाता है। कोश विज्ञान सिर्फ शब्दों का बेतरतीब भंडार या संग्रह नहीं है बल्कि उसे व्यवस्थित बनाकर ही संपूर्ण भाषा को जाना जा सकता है। अतः कोश निर्माण भी अपने आप में अत्यंत श्रमसाध्य प्रक्रिया है अंग्रेजी में केाश विज्ञान को (lexicology) कहा जाता है । कुछ विद्धान इसे (lexicography) भी कहते है। जिसका हिन्दी पर्याय कोश कला है । वास्तव में ये दोनो एक दूसरे के पूरक हैं। एक सैद्धतिक रूप है दूसरा व्यवहारिक या प्रायोगिक रूप है।

कोश विज्ञान तो कोश बनाने का विज्ञान है। इस में उन सिद्धांतों का विवेचन करते है जिनके आधार पर कोश बनते है दूसरी ओर कोश कला उसके प्रयोग को अधिक सुंदरता से प्रयोग करने का तरीका हैं। भाषा विज्ञान के सभी विद्वानां ने दोनो को एक दूसरे का पूरक माना है।

कोश विज्ञान की उत्पत्तिः-

भाषा के जन्म और उसके ज्ञान के विभिन्न घटकों के ज्ञान की भी उत्पत्ति भारत में हुई । वैदिक साहित्य में शब्द कोश या कोश विज्ञान के लिये निघण्टु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इतिहासकारों ने उसे 1000 ई- पू- का माना है यद्यपि वेदिक काल की कल्पना को इतिहास के काल खंड में नहीं बांटा जा सकता है क्योंकि यह वस्तुतः साहित्य में वार्णित सभ्यता के आधार पर माना गया है। तथापि 1000 ई-पू- से 1000 ई- के दो हजार वर्षो में भारत में अनके कोशों का निर्माण किया गया जिनमें से कई आज भी उपलब्ध हैं। यूरोप में कोश विज्ञान का आरभ सन 1000 ई- के बाद हुआ परंतु अंग्रेजी भाषा के उल्लेखनीय कोश सोलहवी सदी में ही निर्मित हुऐ जो आज भी काफी प्रचलित है। इन कोशो के अंतर्गत उस भाषा में अब तक प्रयुक्त हुऐ लगभग सभी शब्दों का संग्रह किया गया है किन्तु फिर भी उन्हें अंग्रिम या पूर्ण संग्रह नहीं कहा जा सकता है। इतना अवश्य है कि कोश के ज्ञान के बाद भाषा का लगभग संपूर्ण स्वरूप जाना जा सकता है। किसी भी भाषा को अगर सीखना या समझना है तो उसके तीन घटकों को सीखना पड़ता है। तभी हम उसके विद्वान बन सकते हैं ।

1 व्याकरणः- इसके अंतर्गत उस भाषा के कर्ता ] कर्म] क्रिया और कारकों को लिखने] बोलने का उचित अनुक्रम और विभिन्न कालों और वाक्यों में उसके भीतर परिवर्तन की सीखा जाता है।

2 शब्द कोशः- व्याकरण से भली भांति परिचित होकर शब्द कोश का ज्ञान किया जाता है। यह एक अत्यंत कठिन प्रक्रिया है। शब्द का ज्ञान ] शब्दों के अर्थ] वर्तनी का प्रयोग आदि इस में सीखे जाते हैं।

3- शब्दों के विभिन्न प्रयोग या प्रयोग कलाः- इसके माध्यम से हम भाषा के विभिन्न प्रयोग] प्रभावी प्रयोग और विभिन्न भावों को दर्शाने के लिये जो विभिन्न तरीके जैसे पर्यायवाची] मुहावरे ] गूढ प्रयोग या रहस्यपरक चमत्कारी प्रयोग आदि आते है। इन तीनों प्रकारों को हम प्रतिभा] व्युत्पत्ति और अभ्यास में भी रख सकते है। प्रतिभा अर्थात भाषा संरचना का ज्ञान] व्युत्पत्ति अर्थात शब्द कोश का ज्ञान एवं अभ्यास अर्थात भाषा के विभिन्न प्रयोग के अंतर्गत रख सकते हैं।

कोश निर्माण विधिः-

कोश निर्माण के लिये डॅा. भोलानाथ तिवारी और डॅा. द्वारिका प्रसाद सक्सैना दोनों ने 10 बातों को महत्वपूर्ण माना है।

1- शब्द संग्रह- शब्द संग्रह का आशय भाषा के शब्दों को एकत्रित करके प्रस्तुत करना है। कोशकार का प्रयत्न यह रहता है कि सभी शब्दों का वह संग्रह कर सके किन्तु यह पूर्णतः संभव नहीं है। प्रत्येक भाषा में कई विषयों के शब्द होते हैं जिन्हें एकत्र करने के लिये कोशकार को उस भाषा के विभिन्न विषयों के विद्वानों से भी सहायता लेना हेाता है । शब्द संग्रह काफी श्रम साध्य प्रक्रिया है और इसके लिये काफी शोध और मूल्यांकन की आवश्यकता रहती है। एक ही तरीके से उच्चारित होने वाले शब्द विभिन्न भाषाओं में हो सकते हैं ऐसे में उन्हें अलग करना और सभी अर्थों को बताना भी आवश्यक है कुल मिलाकर कोश निर्माण के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण शब्द संग्रह ही है।

2- वर्तनीः- कोश निर्माण में वर्तनी अर्थात् शब्द को किस प्रकार लिखने से प्रचलित अर्थ प्रकट होता है। वर्तनी में जितनी स्पष्टता होगी] भाषा उतनी ही उपयोगी होगी। देवनागरी लिपि में हर ध्वनि के लिये लिपिचिन्ह की पूर्णता है परंतु अंगे्जी में वर्तनी की समस्या काफी है जिसमें उच्चारण भिन्न हैं किन्तु वर्तनी भिन्न हो जाती है । शब्द कोश में वर्तनी का जो रूप शुद्ध माना है उसका कारण भी बताना चाहिये ताकि उसका शुद्ध रूप ही प्रयुक्त हो। चूंकि कोश प्रमाणित ग्रंथ है। अतः वर्तनी पर विशेष ध्यान होना चाहिये ताकि शब्दों में स्पष्टता बनी रहे।

3- शब्द निर्णय: शब्द निर्णय भी एक आवश्यक प्रक्रिया है । कई बार एक ही तरीके से उच्चरित होने वाले शब्द या सूक्ष्म अंतर रखने वाले शब्द या एक ही भाषा में या भिन्न भाषाओं में प्रयुक्त शब्द होते हैं। ऐसे में किस शब्द को प्राथमिक रखा जाये यह भी आवश्यक है । प्रायः उसी भाषा के शब्द को प्रथम रखा जाता है। यदि एक ही भाषा का शब्द हो तो प्रचलित अर्थ वाले शब्द को ही रखा जाता है।

4- व्युत्पत्ति : – शब्द कोश मे प्रमाणिकता रखने के लिये शब्द की मूल उत्पत्ति] उसका रूप तत्सम] तदभव] देशज या विदेशी को भी बताना चाहिये । हिन्दी की उत्पत्ति संस्कृत से है संस्कृत शब्द धातुओं से बनते हैं जिनमें उपसर्ग प्रत्यय द्वारा कई शब्द बन जाते है । शब्द का प्रयोग करने के लिये व्युत्पत्ति का ज्ञान आवश्यक है।

5- व्याकरण : शब्द कोश में एक ही शब्द शब्दकोश में एक ही शब्द संज्ञा] सर्वनाम] विशेषण आदि के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। कोश में शब्द की प्रकृति के आधार पर स्पष्ट करना होता है कि यह एक सर्वनाम] क्रिया आदि किस में आता है और उसका भिन्न प्रयोग किन परिस्थितियों में होता है, यह भी बताना चाहिये; साथ ही व्याकरण तत्व के लिये भिन्न रूपों का भी वर्णन होना चाहिये ।

6- उच्चारण : कोश में उच्चारण भी स्पष्ट किया जाना चाहिये ताकि उसका व्यवहार उचित रूप में हो । अंग्रेजी में भिन्न अक्षर के भिन्न उच्चारण किये जाते हैं कभी ध्वनि शांत भी रहती है हिन्दी में भी अ ऐ औ ऋ श ज्ञ श्र आदि के संबंध में उच्चारण स्पष्ट किया जाना चाहिये । मिलती जुलती बनावट वाले वर्णों में भी स्पष्टता के लिये उच्चारण करना आवश्यक हैं ।

7- अर्थः- शब्दकोश में शब्द का संचय भिन्न अर्थ को दर्शाने के लिये ही होता है। डॅा. भोलानाथ तिवारी ने वर्णनात्मक कोश में दो प्रकार के अर्थ माने हैं। पर्यायवाची और ऐतिहासिक l डॅा. द्वारिका प्रसाद सक्सैना ने ऐतिहासिक आधार पर शब्द के परिवर्तित रूप के भिन्न अर्थ के आधार पर भी कोश में उसे बताना आवश्यक माना है। प्रत्येक शब्द का अर्थ शब्दकोश में बताना अत्यंत आवश्यक है।

8- प्रयोग : – जहा शब्द के अर्थ में प्रयोग के आधार पर अस्पष्टता हो वहा उस शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुऐ वाक्यों में प्रयोग करके उस शब्द का प्रयोग स्पष्ट करना चाहिये । जहां आवश्यक हो संदर्भों का प्रयोग भी करना चाहिये साथ ही प्रयोग में कालक्रम का संयोजन भी रखना चाहिये ।

9- चित्र : कई शब्दो के लिये उदाहरण देना भी कठिन होता है ऐसे में चित्र के रूप में पहचान करने के लिये चित्र का प्रयोग किया जाना चाहिये । अच्छे शब्दकोश में आवश्यकता रूप से चित्र होना चाहिये ।

10- शब्द क्रमः- शब्दकोश में शब्दों की संख्या काफी अधिक होती है। अतः आवश्यक होने पर उस शब्द को खोजने के लिये शब्दों का संयोजन पद्धति अनुसार होना चाहिये । ताकि शब्द को खोजने वाला अध्येता उसे आसानी से खोज सके ।

डॅा. भीलानाथ तिवारी और द्वारिका प्रसाद सक्सैना ने पाच प्रकार के शब्द क्रम माने है।

1- वर्णानुक्रमः- जिस भाषा में कोश का निर्माण किया जाना है उस भाषा में वर्णमाला के अनुसार ही शब्दों का संचयन किया जाता है । इसमें न सिर्फ प्रथम अक्षर को क्रम से रखा जाता है अपितु शब्द में प्रथम वर्ण के बाद आने वाले शब्दों को भी वर्णमाला के अनुसार रखा जाता है हिंदी में मात्राओं की व्यवस्था है अतः मात्रा के अनुसार भी शब्दों को वर्णक्रम से रखा जाता है। इससे स्वर के साथ ही व्यंजनों को भी सुगमता से खोजा जा सकता है । यह पद्धति काफी सुविधा जनक है और सामान्यतः भाषा के वृहत् कोश में इसी प्रयोग होता है।

2- अक्षर संख्या : इस पद्धति में शब्द में आने वाले वर्ण की संख्या के आधार पर रखा जाता है प्राचीन भारत में इस प्रकार के कोश मिलते हैं। अक्षर संख्या वाली पद्धति में वर्णानुक्रम का प्रयोग किया जाता है। यह पद्धति काफी जटिल है और तकनीकी पद्धति में समस्या भी आती है।

3- विषयक्रमः- कुछ कोशों में विषय के अनुसार शब्दों को रखा जाता है। संस्कृत का अमर कोश इसी श्रेणी का है। इस पद्धति में शब्दों की पुनरावृत्ति हो सकती है क्योंकि कई शब्द विभिन्न विषयों में आ सकते हैं। इस प्रकार के कोश विषय विशेष के लिये उपयुक्त हैं। बृहद्कोश में यह पद्धति त्रुटिपूर्ण है।

4- सुरक्रम : जो भाषाये सुर प्रधान होती है उनके कोशों की रचना इसी प्रकार होती है । इस प्रकार के कोश में एक ही शब्द जो कई प्रकार से बोला जाता है क्रम अनुसार रख दिया जाता है।

5- व्युत्पत्ति के आधार पर-: इस कोश में व्युत्पत्ति के अनुसार शब्दों का क्रम रखा जाता है । अरवी भाषा के कोशों ये यह पद्धति है।

कोश के भेद :

डॅा. द्वारिका प्रसाद सक्सैना ने कोश के चार भेद माने है।

1- व्यक्ति कोश: व्यक्ति कोश में किसी व्यक्ति विशेष के संपूर्ण साहित्य या पुस्तकों में प्रयुक्त शब्दों को रखा जाता है प्रत्येक शब्द का पुस्तक] स्थान] पृष्ठ पर उल्लेख और प्रयुक्त अर्थ रखा जाता है इससे व्यक्ति विशेष के साहित्य और व्यक्तित्व दोनों का ही ज्ञान होता है ।

2- पुस्तक कोशः- इस कोश में किसी पुस्तक में प्रयुक्त सभी शब्दों का संदर्भानुसार उल्लेख किया जाता है।

3- विषयकोशः- इस कोश में किसी विषय के अध्ययन में प्रयुक्त होने वाले सभी शब्दों को संकलित किया जाता है। प्रायः इनमें पारिभाषिक शब्दों का विस्तृत कोश होता है और विषय के अध्ययन में यह काफी महत्वपूर्ण होता है।

4- भाषा कोश: भाषा कोश में संपूर्ण भाषा कोश का संकलन किया जाता है। यह एक भाषा] दो भाषा या अनेक भाषाओं का हो सकता है । प्रायः दूसरी भाषा सीखने सिखाने के लिये द्विभाषा या बहुभाषा कोश ही बनाये जाते है इससे दोनो भाषा का विस्तृत ज्ञान गहन रूप से किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त सुविधा के लिये विभिन्न प्रकार के कोश भी निर्मित होते हैं या किये जा सकते हैं यथा शब्द परिवार कोश] पर्यायवाची कोश] लोकोक्ति मुहावरा कोश] प्रयोगकोश] लोक भाषा कोश ]पारिभाषिक कोश ] विश्व कोश आदि ।

डॅा. भोलानाथ तिवारी ने भी व्यक्ति कोश, पुस्तक कोश, भाषा कोश, के अतिरिक्त वर्णनात्मक कोश, ऐतिहासिक कोश, तुलनात्मक कोश को भी स्थान दिया है ।

उक्त वर्णन से स्पष्ट होता है कि शब्द कोश का अध्ययन और निर्माण एक कठिन और तकनीकी कार्य है जो काफी श्रमसाध्य एवं महत्वपूर्ण है।

भाषा वि़ज्ञान का महत्व

भाषा विज्ञान के क्षेत्र में हम पूरी तरह शब्द कोश पर ही निर्भर हैं। बिना उसके भाषा का प्रयोग असंभव है। भाषा विज्ञान के अध्ययन के तहत कोश विज्ञान का भी अध्ययन किया जाता है बल्कि देखा जाये तो शब्दकोश का ज्ञान भाषाविज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।

  1. किसी भाषा का निर्माण] संरचना] परिवर्तन और उसके महत्व आदि का अध्ययन भाषाविज्ञान में किया जाता है किन्तु उस भाषा के विस्तार ] संपूर्ण रचनात्मक प्रयोग का ज्ञान कोश के माध्यम से ही किया जाता है । वस्तुतः आदर्श कोश में भाषाविज्ञान के सभी तत्वों के आधार पर ही उसका निर्माण किया जाता है अर्थात देखा जाये तो कोश के अंतर्गत भाषा विज्ञान के सभी का अध्ययन किया जा सकता है ।
  2. साहित्य में तो सदा ही नवीन शब्द या पर्याय शब्दों का प्रयोग किया जाता है। आवश्यकता के अनुसार शब्द की व्यवस्था तुकान्तता भाव विशेष की अभिव्यक्ति और व्यक्त करने की शैली आदि विभिन्न कारकों के लिये विभिन्न शब्दों की आवश्यकता होती है जो भले ही एक अर्थ प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में समृद्ध भाषा में शब्दों का असीम संसार होना आवश्यक है।
  3. कोश विज्ञान का भाषा के साथ साथ संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में भी अपरिहार्य योगदान है। कोश के माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपने अभिव्यक्ति के संसार को विस्तार प्रदान कर सकता है। शिक्षा व्यवस्था] ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों को प्राप्त करना बहुविध कलाओं, शिक्षाओं ओैर विषयों के ज्ञान के लिये उसके शब्दों को जानना आवश्यक है । विभिन्न भाषायें] विभिन्न अनुभव] ज्ञान के साथ ही अपनी पृथक विशेषता भी रखती है ऐसे में भाषाओं की सीमा से परे जाने के लिये विभिन्न भाषाओं को जानना भी जरूरी होता है । विभिन्न प्रकार का ज्ञान संपूर्ण रूप से लेने के लिये सही व स्पष्ट शब्दों का ज्ञान जरूरी है।
  4. प्रायः शब्द का गलत प्रयोग या उच्चारण] अर्थ को पूरी तरह बदल देता है। अतः शब्द के उच्चारण के संबंध में ज्ञान होना अनिवार्य है।
  5. कई बार व्यक्ति को अपनी सुविधा अनुसार शब्दों का निर्माण करना होता है। ऐसे में शब्दों का ज्ञान आवश्यक हो जाता है।
  6. कई बार ऐसी संज्ञाओं] वस्तु का ज्ञान करने के लिये जो देखी नहीं गई हो किन्तु उसका प्रयोग करना हो या सुना हो तब चित्र के माध्यम से अपने ज्ञान को स्पष्ट किया जा सकता है।
  7. किसी भाषा में कई शब्द सुगम होते हैं या अभिव्यक्ति के लिये उपयुक्त होते हैं किंतु प्रयोग न होने के कारण अप्रचलित हो जाते हैं। साथ ही एक ही अर्थ को दर्शाने वाले विभिन्न शब्दों का ज्ञान रखने और कथन विशेष को दर्शाने के लिये विशेषोक्ति के लिये पर्यायवाची और मुहावरा कहावतों का प्रयोग अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

उपर्युक्त सभी परिस्थितियों में शब्दकोश की अत्यंत आश्यकता होती है और बिना किसी बृहद् कोश के हम अपने लक्ष्य में सफल नहीं हो सकते अतः शब्दकोश की ज्ञान प्राप्ति ]व्यक्त्वि निर्माण और सभी क्षेत्रों में सफल होने के लिये या सामान्य से हट कर विशेष स्थान पाने के लिये महती आवश्यकता होती है ।

अंततः विस्तृत विवेचन से समझा जा सकता है कि कोश विज्ञान न सिर्फ भाषा विज्ञान में अपितु ज्ञान के समस्त क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थान और उपादेयता है।

लेखिका

शोध निर्देशकः- डॅा. गीता नायक। शोधार्थीः- श्रीमती अंजू श्रीवास्तव

हिन्दी अध्ययनशाला विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन म-प्र-

C/O LIG/53 शिवानगर शिवपुरी म-प्र- 473551 7566605253

महात्मा गांधी की दृष्टि में स्त्री–आशीष कुमार

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महात्मा गांधी की दृष्टि में स्त्री

-आशीष कुमार

आदमी जितनी बुराइयों के लिए जिम्मेदार है उनमें सबसे ज्यादा घटिया, बीभत्स और पाशविक बुराई उसके द्वारा मानवता के अर्धांग अर्थात नारी जाति का दुरुपयोग है। वह अबला नहीं, नारी है। नारी जाति निश्चित रूप से पुरुष जाति की अपेक्षा अधिक उदात्त है; आज भी नारी त्याग, मूक दुख-सहन, विनम्रता, आस्था और ज्ञान की प्रतिमूर्ति है। (यंग, 15-9-1921, पृ. 292)

स्त्री को चाहिए कि वह स्वयं को पुरुष के भोग की वस्तु मानना बंद कर दे। इसका इलाज पुरुष की अपेक्षा स्वयं स्त्री के हाथों में ज्यादा है। उसे पुरुष की खातिर, जिसमें पति भी शामिल है, सजने से इंकार कर देना चाहिए। तभी वह पुरुष के साथ बराबर की साझीदार बन सकेगी। मैं इसकी कल्पना नहीं कर सकता कि सीता ने राम को अपने रूप-सौंदर्य से रिझाने पर एक क्षण भी नष्ट किया होगा। ( यंग, 21-7-1921, पृ. 229)

यदि मैंने स्त्री के रूप में जन्म लिया होता तो मैं पुरुष के इस दावे के विरुद्ध विद्रोह कर देता कि स्त्री उसके मनबहलाव के लिए ही पैदा हुई है। स्त्री के हृदय में स्थान पाने के लिए मुझे मानसिक रूप से स्त्री बन जाना पडा है। मैं तब तक अपनी पत्नी के हृदय में स्थान नहीं पा सका जब तक कि मैंने उसके प्रति अपने पहले के व्यवहार को बिलकुल बदल डालने का निश्चय नहीं कर लिया। इसके लिए मैंने उसके पति की हैसियत से प्राप्त सभी तथाकथित अधिकारों को छोड दिया और ये अधिकार उसी को लौटा दिए। आप देखेंगे कि आज वह वैसा ही सादा जीवन जीती है जैसा कि मैं। गाँधी पुत्र और पुत्री के साथ एक समान व्यवहार करने में विश्वास करते थे। महिलाओं से संबंधित मुद्दों को उठाने वाले महात्मा गाँधी पहले व्यक्ति नहीं थे। उनसे पहले अनेक समाज – सुधारकों ने समाज में स्त्रियों की स्थिति सुधारने के प्रयत्न किए। सांस्कृतिक पुनर्जागरण और भारत में स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक आंदोलन सदी के अंत में ही शुरू हो गया था। गाँधी के पर्दापण से पहले महिलाओं के प्रति समाज – सुधारकों का रवैया सहानुभूतिपूर्ण होने के साथ-साथ संरक्षणात्मक था। भारतीय राजनीति में गाँधी के पर्दापण के साथ महिलाओं के विषय में एक नए नजरिये की शुरूआत हुई। नारी के संबंध में गाँधी की समन्वित सोच व सम्मानपूर्ण भाव का आधार उनकी माँ और बहन रही। गाँधी ने अपनी रचनाओं में अपनी माँ का सर्वाधिक जिक्र किया है। बारबर साउथर्ड के अनुसार गाँधी की नारीवादी सोच में दो तत्वों की सर्वाधिक भूमिका है – पहला, “हर स्तर पर तथा हर मायने में स्त्री-पुरूष समानता तथा दोनों के विशिष्ट लैंगिक भिन्नता के मद्देनजर उनके सामाजिक दायित्वों में भिन्नता”

धर्मग्रंथों में स्त्रियों की स्वतंत्रता से संबंधित बातों का गाँधी विरोध करते है। उनके अनुसार इन ग्रन्थों में कही गई बातें देवताओं की नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे ग्रंथ भी एक पुरूष द्वारा ही लिखे गए है। धर्मग्रन्थों पर टिप्पणी करते हुए गाँधी ने कहा कि स्मृतियों में लिखी सारी चीजे दैव वाणी नहीं है तथा उनमें भटकाव व त्रुटियों का होना सहज संभाव्य है। गाँधी के अनुसार पुरूषों ने स्त्री को अपनी कठपुतली के रूप में इस्तेमाल किया है। निस्संदेह इसके लिए पुरूष ही जिम्मेदार है लेकिन अंतत: महिलाओं को यह स्वयं निर्धारित करना होगा कि वह किस प्रकार रहना चाहती है उनका मानना है कि ‘यदि महिलाओं को विश्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है तो उन्हें पुरूषों को आकर्षित एवं खुश करने के लिए सजना-संवरना बंद कर देना चाहिए और आभूषणों से दूर रहना चाहिए। भारतीय स्त्रियों का पुनरुत्‍थान’ लेख में गांधी जी ने महिलाओं के अधिकारों की वकालत करते हुए लिखा है कि अहिंसा की नींव पर रचे गये जीवन की रचना में जितना और जैसा अधिकार पुरुष को अपने भविष्‍य की रचना का है, उतना और वैसा ही अधिकार स्‍त्री को भी अपने भविष्‍य तय करने का है।”

ग्रामीण महिलाओं के बारे में उन्‍होंने लिखा – “मैं भली भंति जानता हूं कि गांवों में औरतें अपने मर्दों के साथ बराबरी से टक्‍कर लेती हैं। कुछ मामलों में उनसे बढ़ी-चढ़ी हैं और हुकूमत भी चलाती हैं। लेकिन हमें बाहर से देखने वाला कोई भी तटस्‍थ आदमी यह कहेगा कि हमारे समूचे समाज में कानून और रूढ़ी की रू से औरतों को जो दर्जा मिला है, उसमें कई खामियां हैं और उन्‍हें जड़मूल से सुधारने की जरूरत है।”

स्त्रियों के अधिकारों के बारे में गांधी जी के विचार इस प्रकार थे – “स्त्रियों के अधिकारों के सवाल पर मैं किसी तरह का समझौता स्‍वीकार नहीं कर सकता। मेरी राय में उन पर ऐसा कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए जो पुरुषों पर न लगाया गया हो। पुत्रों और कन्‍याओं में किसी तरह का कोई भेद नहीं होना चाहिए। उनके साथ पूरी समानता का व्‍यवहार होना चाहिए।”

महिला शिक्षा के वे प्रबल समर्थक थे और उन्‍होंने अपने इस विचार को रेखांकित करते हुए कहा कि मैं स्त्रियों की समुचित शिक्षा का हिमायती हूं, लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि स्‍त्री दुनिया की प्रगति में अपना योग पुरुष की नकल करके या उसकी प्रतिस्‍पर्धा करके नहीं दे सकती। गांधी जी का यह स्‍पष्‍ट मत रहा है कि स्‍त्री को पुरुष की पूरक बनना चाहिए। स्त्री का सबसे बड़ा अस्त्र उसकी अहिंसा, पीड़ा सहने की क्षमता, उसकी पवित्रता और उसका त्याग तथा सेवा-भाव है। स्त्री को अपने साहस का परिचय देने के लिए झाँसी की रानी बनने की आवश्यकता नहीं है। अर्थात आत्मिक शक्ति उसका अमोघ अस्त्र है, उन्होने कांग्रेस कर्मियों का आवाहन किया और कहा कि यदि उसका विश्वास है कि स्वतंत्रता हर राष्ट्र तथा व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, तो उन्हें अपने घरों से शुरुवात करनी चाहिए। स्त्री को शिक्षित करें और युगों से चली आ रही उन रूढ़ियों तथा परम्पराओं का अंत करें, जो महिलाओं के सम्पूर्ण विकास में बाधक हैं।

अब तक महिलाओं को पुरूष अपना खिलौना समझते रहें हैं और महिला भी इस भूमिका में संतुष्ट रही है। उन्होने जेवरात कि हथकड़ियों और बेड़ियों कि संज्ञा दी तथा कन्या-विवाह के प्रतिरोध के लिए महिलाओं को आगे आने के लिए कहा। महिलाओं कि भूमिका में गांधी जी कहते हैं- महिलाएं पुरूषों के भोग की वस्तु नहीं हैं, जीवन पाठ पर वे कर्तव्य निर्वाह के लिए संगिनी हैं, मेरा मानना है कि स्त्री आत्मत्याग की मूर्ति है, लेकिन दुर्भाग्य से आज वह यह नहीं समझ पा रही कि वह पुरुष से कितनी श्रेष्ठ है। जैसा कि टाल्सटॉय ने कहा है, वे पुरुष के सम्मोहक प्रभाव से आक्रांत है। यदि वे अहिंसा की शक्ति पहचान लें तो वे अपने को अबला कहे जाने के लिए हरगिज राजी नहीं होंगी। ( यंग इंडिया, 14-1-1932, पृ.19)

भारतीय समाज में आज भी पुत्रियों से ज्यादा पुत्रों को महत्व दिया जाता है। आज भी कन्या – शिशु की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है। यह सामाजिक विषमता महात्मा गाँधी को बहुत कष्ट पहुँचाती थी। उनके अनुसार पारिवारिक संपत्ति में बेटा और बेटी दोनों का एक समान हक होना चाहिए। उसी प्रकार, पति की आमदनी को पति और पत्नी की सामूहिक संपत्ति समझा जाना क्योंकि इस आमदनी के अर्जन में स्त्री का भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से योगदान रहता है। भारतीय समाज में विवाह के समय लड़कियों का कन्यादान यानी दान किया जाता है। गाँधी ने इस विचारधारा की काफी आलोचना की है। उनके अनुसार एक बेटी को किसी की संपत्ति समझा जाना सही नहीं है।

एक समाज-सुधारक के रूप में, गाँधी ने स्त्री – उत्थान के लिए भरसक प्रयत्न किए। उन्होंने बार-बार यही स्पष्ट करने का प्रयत्न किया कि स्त्रियाँ किसी भी दृष्टि में पुरूषों से हीन नहीं है। और ‘यह झूठी अफवाह प्राचीन रचनाओं द्वारा उड़ाई गई है जिसके लेखक भी पुरूष ही थे। गाँधी जी दहेज – प्रथा के खिलाफ थे, बाल विवाह के खिलाफ थे, विधवा पुनर्विवाह के समर्थक थे गांधी जी का कहना था अगर कोई महिला पुनर्विवाह करना चाहती है तो उसे करने की आजादी होनी चाहिए, उसका बहिष्कार नहीं किया जाना चाहिए। शायद इसीलिए गांधी जी के एक बार कहने पर कुछ महिलाओं ने चरखा को अपनी जीविका का साधन बना लिया था। परंतु गांधी जी इन महिलाओं को कांग्रेस में शामिल करने के विरोध में थे। उनके अनुसार पहले महिलाओं की स्थिति में सुधार ज्यादा आवश्यक था। भारत की महिलाओं के प्रति गाँधी का सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि उन्होंने भारतीय – महिलाओं को राजनीतिक आंदोलन का एक मुख्य हिस्सा बनाया।1921 के असहयोग आंदोलन में गाँधी ने महिलाओं को अपने साथ जोड़ा। गाँधी के अनुसार चूँकि महिलाएँ त्याग और अहिंसा की अवधारणा है इसलिए वे खादी काटने जैसे शांत और धीमी गति के कार्य के लिए ज्यादा उपयुक्त है।

निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि गाँधी स्त्री – पुरूष के आपसी संबंधों, समानता पर सूक्ष्म दृष्टि रखते है। गाँधी ने महिलाओं की राजनीतिक, सामाजिक स्वतंत्रता पर अपने विचार प्रकट किए है। गाँधी के अनुसार स्त्री और पुरूषों में कर्मों का विभाजन पुराने समय से चल रहा है। उनके अनुसार महिलाओं का काम है घर संभालना और पुरूषों का काम है कमाना। आज के समय स्त्रियाँ उनके इस विचार से सहमत नहीं होंगी। महिलाओं के अधिकारों के बारे में संवेदनशील होने के बावजूद गाँधी ने महिलाओं की समस्याओं को राजनीतिक मंच प्रदान नहीं किया। कोई संगठन नहीं बनाया। परन्तु गाँधी ने महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए जो प्रयास किए थे, उनका कभी महत्व कम नहीं हो सकता। उन्होंने भारत में महिलाओं को एक नई दिशा दिखाई। हमें उसी दिशा में चलते हुए बदलते समय में उनके विचारों को अपनाना आर समझना होगा।

संदर्भ-ग्रंथ

  1. अहमद, डॉ. राजी. (सं). महात्मा गांधी की स्वदेश वापसी के 100 वर्ष. नई दिल्ली, प्रभात प्रकाशन. पृ. सं. 195
  2. गाँधी, एम. के.. (1946). रचनात्मक कार्यक्रम. अहमदाबाद, नवजीवन पब्लिकेशन हाउस. पृ. सं. 33,34
  3. गाँधी, एम. के.. (1947). मेरे सपनों का भारत. अहमदाबाद, नवजीवन पब्लिकेशन हाउस. पृ. सं. 125
  4. गुजरात नवजीवन, 12 अक्टूबर, 1919
  5. जोशी, पुष्पा. (1988). गाँधी ऑन वूमन, अहमदाबाद, नवजीवन पब्लिकेशन हाउस. पृ. सं. 30-311
  6. यंग इंडिया, 21/07/1921,15/09/1921, 14/01/1932,.
  7. सर्वेद, सुरेश. (सं) 2017. विचार वीथी. (सुमन जी का आलेख: गांधी : नारी विषयक दृष्टिकोण).
  8. सिन्हा, मनोज. (2008). गाँधी अध्ययन. दिल्ली, Orient Black Swan. पृ. सं. 120
  9. http://zameense.blogspot.in/2013/03/blog-post_4823.html महात्मा गांधी जी की नजर में….. नारी आलेख

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) के विकास एवं शांति अध्ययन विभाग में पी-एच.डी. शोधार्थी हैं ।

संपर्क – 09604454556, 7020185580 ई-मेल – shanpatel501@gmail.com

नाट्यशास्त्रोक्त लक्षण एवं नाटक में उसकी उपादेयता: आशुतोष कुमार

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नाट्यशास्त्रोक्त लक्षण एवं नाटक में उसकी उपादेयता

आशुतोष कुमार

पी. एच. डी., शोधार्थी

संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

दिल्ली – 110007

मो० – 9013271218

Email:  ashutoshjnu64@gmail.com

 

सारांश

नाट्य में वाचिक अभिनय का महत्त्वपूर्ण स्थान है इसे नाट्य का शरीर कहा गया है, क्योंकि नाटककार इसी के माध्यम से अपनी कथावस्तु को दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत करता है। नाट्यशास्त्र में  वाचिक अभिनय के अन्तर्गत ही षट्त्रिंशत् लक्षण वर्णित है। इनकी संयोजना से वाणी में वैचित्र्य की सृष्टि होती है, जिससे प्रेक्षागृह में बैठे दर्शक विस्मित तथा आनन्द विभोर हो जाते हैं। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र के 16 वें अध्याय में 36 लक्षण बताया है। इन्हीं लक्षणों से परवर्ती काल में अलंकारों का भी विकास हुआ। अलंकार काव्य के बाह्य सौन्दर्य को बढाता है तो लक्षण उसके आन्तरिक सौन्दर्य में वृद्धि करता है। प्रस्तुत शोध प्रपत्र के माध्यम से नाट्यशास्स्त्र में निरूपित लक्षण एवं इसके स्वरूप तथा नाट्य में इसकी उपयोगीता को बताया गया है।

 

कूटशब्द

वाचिकाभिनय, लक्षण, काव्यबन्ध, भूषणसम्मित, भावार्थगत

 

आमुख

नाट्यशास्त्र काव्य एवं कला कला का विश्वकोश है साथ ही सिद्धान्त एवं व्यवहार दोनों पक्षों की विराट चेतना का अप्रतिम संग्रह है। नाट्यशास्त्र कोपंचम वेदभी कहा जाता है।[1] इसमें नाट्य सम्बन्धी ज्ञान के अतिरिक्त प्राचीन भारत की कला एवं संस्कृति का विस्तृत परिचय प्राप्त होता है। नाट्य में प्रयुक्त अभिनय , संगीत, नृत्य, वाद्य, वास्तु, मूर्ति, चित्र, पुस्तक आदि विविध कलाओं एवं अनेक प्रकार के शिल्पों का भी परिनिष्ठित एवं व्यापक विवेचन नाट्यशास्त्र में हुआ है। साथ ही प्रसंगानुसार नाट्याभिनय एवं नाट्यलेखन के साधनभूत, सौन्दर्यशास्त्र, काव्य तथा व्याकरण इन विषयों पर भी विचार हुआ है। भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र में चार प्रकार के अभिनय[2] बताये गये हैं- (i) आङ्गिक, (ii) वाचिक, (iii) सात्त्विक तथा (iv) आहार्य।[3] इनमें वाचिक अभिनय के प्रसङ्ग में ३६ लक्षण वर्णित हैं। नाट्य में वाणी के माध्यम से संवादों का कथन और काव्य की प्रस्तुति को वाचिक अभिनय कहते हैं। यह अभिनय पूरी अभिनय कला का प्राण है। वाचिक अभिनय काव्यार्थ या नाट्यार्थ की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति में सहायक होता है। आचार्य भरतमुनि का कथन है कि कवि के द्वारा काव्यादि निर्माण तथा अभिनेता के द्वारा प्रयोग के अवसर पर शब्दों पर विशेष प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि यही सम्पूर्ण नाट्य प्रदर्शन का कलेवर है। अंग, नेपथ्य रचना तथा सत्वाभिनय वाक्यार्थों को ही अभिव्यक्त करते हैं। वाचिक अभिनय में रस और भावों के अनुरूप वाणी का अनुकरण किया जाता है। भरतमुनि ने वाचिक अभिनय के सन्दर्भ में पाठ्य पर विशेष ध्यान दिया है। उन्होंने वाचिक अभिनय के आरम्भ में दो प्रकार के पाठ्य बताया है- i) संस्कृत पाठ्य एवं ii)  प्राकृत पाठ्य। संस्कृत पाठ्य के अन्तर्गत वर्ण निरूपण, व्यञ्जन और उनके स्थान स्वर तथा उनका परिमाण, शब्दों के विभेद, छन्द, अलङ्कार, नाट्य रचना के अङ्गीभूत छत्तीस लक्षण और काव्य के गुण, दोष का विस्तृत विवेचन किया गया है। वाचिक अभिनय के प्रसंग में ही काव्यबन्ध के स्वरूप का विवेचन किया है। काव्यबन्ध का तात्पर्य नाट्यकृति से है, जिसे पाठ्य नाम से भी अभिहित किया जाता है। यह पाठ्य (नाट्यकृति) वस्तुत: कविकृत एक प्रसिद्ध या कल्पित वर्णन होता है, जिसे संवाद के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। दर्शकदीर्घा (Auditorium) में बैठे हुए प्रेक्षकवर्ग (Audience) का इस पाठ्य (नाटक) के प्रति अनुराग हो, अथवा पाठ्य के माध्यम से उनके हृदय में आनन्दातिरेक की सृष्टि की जा सके, उसके लिए पाठ्य का सुसज्जित एवं सुसंगठित होना अत्यावश्यक है। पाठ्य को सुसज्जित एवं उत्कृष्ट बनाने के लिए काव्य के उत्कर्षक तत्त्वों का निर्देश दिया गया है। ये संख्या में मुख्यत: तीन बताये गये हैं- (i) लक्षण, (ii) अलंकार एवं (iii)गुण।

नाट्यशास्त्रकार आचार्य भरतमुनि की दृष्टि में काव्यलक्षण काव्यबन्ध के अति महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं। काव्यबन्ध अर्थात् नाटक को लक्षणों से युक्त होना ही चाहिए।[4] उन्होंने काव्यलक्षण की कोई निश्चित परिभाषा प्रदान नहीं की, किन्तु नाट्यशास्त्र के 16 वें अध्याय के आरम्भ में षट्त्रिंशत् लक्षणों के नाम परिगणना के पश्चात् इसे “भूषणसम्मित” एवं “भावार्थगत” कहकर इसके रसानुकूल प्रयोग का प्रतिपादन किया है।[5] अर्थात् ये लक्षण नाटक में रस मे बाधक न हों अपितु रसनिष्पत्ति में सहायक हों।

नाट्यशास्त्र के टीकाकार आचार्य अभिनवगुप्त काव्यलक्षण की महत्ता बताते हुए कहते हैं कि- “लक्षण काव्यरूपी भवन की भित्तियां हैं। छन्दोयोजना इस भवन की आधार भूमि है, गुण और अलंकार इस भित्ति के चित्र हैं तथा दशरूपक इसकी खिडकियां हैं।”[6] उनके अनुसार लक्षण काव्यभवन के भित्तिस्वरूप हैं। इस पर गुण एवं अलंकार भित्तिचित्र की भांति हैं। स्पष्ट है कि लक्षण का अलंकार से पूर्व वर्णन किया जाना, लक्षण की प्रमुखता को प्रदर्शित करता है। आधुनिक संस्कृत विद्वान प्रो० रेवाप्रसाद द्विवेदी ने अभिनवगुप्त के विचार की समीक्षा करते हुए कहा है कि “लक्षण को भित्ति न मानकर भित्ति पर किया गया सुधालेप मानना चाहिए। यह लेप ही चित्र का मूल आधार होता है। इसके बिना चित्र फलक चित्र रचना के योग्य नहीं बन पाता है”।[7]

जिस प्रकार अलंकार से सुसज्जित रमणी सुन्दर एवं आकर्षक होती है उसी प्रकार इन लक्षणों से युक्त काव्य सुन्दर एवं रोचक होता है। इनकी संयोजना से वाणी में वैचित्र्य की सृष्टि होती है, जो सामाजिक को विस्मित और आनन्द विभोर कर देता है। नाट्यशास्त्रकार ने वाचिक अभिनय के इन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखकर नाट्यशास्त्र के 14 से 19 वें अध्याय तक वाचिक अभिनय का वर्णन किया है। पूरे 16वें (कतिपय संस्करणों में 17 वें) अध्याय में सिर्फ लक्षण ही वर्णित है। नाट्यशास्त्र में वर्णित षट्त्रिंशत् लक्षण निम्नलिखित हैं[8]

1.विभूषण, 2.अक्षरसंघात, 3.शोभा, 4.अभिधान, 5.गुणकीर्तन, 6.प्रोत्साहन, 7.उदाहरण, 8.निरुक्त, 9.गुणानुवाद, 10.अतिशय, 11.हेतु, 12.सारूप्य, 13.मिथ्याध्यवसाय, 14.सिद्धि, 15.पदोच्चय, 16.आक्रन्द, 17.मनोरथ, 18.आख्यान, 19.याञ्चा, 20.प्रतिषेध, 21.पृच्छा, 22.दृष्टांत, 23.निर्भासन, 24.संशय, 25.आशी:, 26.प्रियवचन, 27.कपटसंघात, 28.क्षमा, 29.प्राप्ति, 30.पश्चाताप, 31.अनुवृत्ति, 32.उपपत्ति, 33.युक्ति, 34.कार्य अर्थापत्ति, 35.अनुनीति तथा 36.परिवेदन।

शोभा’ नामक लक्षण

सिद्धैरर्थै:   समं कृत्वा ह्यसिद्धोऽर्थ: प्रसाध्यते।

यत्र श्लक्ष्णविचित्रार्था: सा शोभेत्यभिधीयते॥[9]

अर्थात् जहां सिद्ध पदार्थों से तुलना कर असिद्ध पदार्थ को भी सिद्ध किया जाता है, तदनन्तर उससे जो आह्लादक व विचित्र अर्थ निकलता है वह शोभा नामक लक्षण है। जैसे अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के द्वितीय अङ्क में मृगयाविहार के अवसर पर सेनापति राजा दुष्यन्त से कहता है-

मेदश्छेदकृशोदरं        लघु भवत्युत्थानयोग्यं   वपु:,

सत्त्वानामपि    लक्ष्यते  विकृतिमच्चितं  भयक्रोधयो:

उत्कर्ष: स च धन्विनां यदिषव: सिध्यन्ति लक्ष्ये चले,

मिथ्यैव व्यसनं  वदन्ति  मृगयामीदृग्विनोद: कुत:[10]

अर्थात् (मृगया के श्रम से) व्यक्ति चर्बी कम हो जाने के कारण पतले उदर वाला शरीर हल्का और फुर्तीला होकर उद्योग करने योग्य हो जाता है। जीवों के भय और क्रोध में विकृत हुये मन का भी परिज्ञान हो जाता है(अर्थात् निरन्तर देखते रहने से जीवों की चेष्टाओं को देखकर उनकी भय युक्त अथवा क्रोध युक्त अवस्था का ज्ञान हो जाता है)। धनुर्धारियों के लिये यह उत्कर्ष की बात है कि उनके बाण चल लक्ष्य पर भी सफल होते हैं अर्थात् चुकते नहीं (और यह निपुणता मृगया के अभ्यास से ही आती है)। अत: लोग व्यर्थ ही मृगया को व्यसन कहते हैं; भला ऐसा मनोरञ्जन अन्यत्र कहां। परिश्रम से लाभ सिद्ध है, उसके योग से मृगया रूप व्यसन को भी सिद्ध रूप में दिखलाया गया है। इस प्रकार यहां परिश्रम सिद्ध कर्म से मृगया (शिकार करना) असिद्ध (त्याज्य) कर्म की तुलना करके असिद्ध को भी सिद्ध किया गया है। यहां किसी अलंकार के कारण नहीं अपितु कवि ने शब्द-व्यापार योजना इस प्रकार की है जिससे मनोरम हृदय आह्लादक अर्थ निष्पन्न हो रहा है।[11] अतएव स्पष्ट है कि उक्त पद्य में शोभा नामक लक्षण के अनुप्रयोग से ही चारूता उत्पन्न हुई हैं।

            आचार्य भरतमुनि के उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि लक्षण काव्य और नाट्य दोनों के महत्त्वपूर्ण अङ्ग थे। ये काव्यलक्षण प्रारम्भ में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थे किन्तु शनै: – शनै: अलंकार, गुण, रीति, वृत्ति आदि के प्रभाव में धूमिल होते चले गये। अभिनवगुप्त के अनुसार रीति, वृत्ति, गुण, अलंकार  आदि जिस रूप में काव्य के अंग है लक्षण उस रूप में नहीं आते हैं। भोज, शारदातनय, शिंगभूपाल, विश्वनाथ, और राघवभट्ट जैसे अनेक प्रमुख काव्याचार्यों ने भी इन लक्षणों के महत्त्व को स्वीकार किया है, इनसे भरतोक्त छत्तीस काव्य लक्षणों का महत्त्व और अधिक बढ जाता है। आचार्य अभिनवगुप्त ने अपने पूर्ववर्त्ती दस आचार्यों का मत इस सम्बन्ध में उद्धृत किया है[12], जो  संक्षेप में इस प्रकार हैं-

  • लक्षण काव्य का शरीर है। इनके द्वारा कथावस्तु के शरीर में वैचित्र्य का प्रादुर्भाव होता है। ये लक्षण गुण और अलंकार के बिना ही अपने सौभाग्य से सुशोभित होते हैं। यह अलंकार के समान सौन्दर्य के अधायक तत्त्व है। यही काव्य शरीर की निसर्ग सुन्दरता है। लक्षण अलंकार की निरपेक्ष सौन्दर्य का प्रसार करते हैं।
  • नाट्यकथा के संध्यंग रूप अंश ही ये काव्यलक्षण हैं। लक्षण का संबन्ध नाटकादि के इतिवृत्त से है, काव्य मात्र से नहीं।
  • अभिधा का त्रिविध व्यापार ही लक्षण का विषय होता है। कवि किसी विशिष्ट विचार और कल्पना को दृष्टि में रखकर काव्य की रचना करता है। यह आवश्यक नहीं कि काव्य का भरत सम्मत प्रत्येक लक्षण प्रत्येक दशा में या प्रत्येक काव्य रचना का लक्षण बने। क्योंकि नारी के स्तनों की स्थूलता उसका सौन्दर्यधायक लक्षण है, किन्तु जब यही मोटाई कटि में हो तो वह कुलक्षणा हो जाती है।

आगे इन छत्तीस लक्षणों पर विचार करते हुए अभिनवगुप्त ने कहा है कि ये लक्षण काव्य या नाट्य के अंगभूत हैं। जैसे महापुरुष के अंगों में महानता के लक्षण होते हैं उनसे पुरुष का स्वाभाविक सौन्दर्य निखरता है, जो पुष्पमाला आभूषणादि से भिन्न होते हैं।

            इस प्रकार स्पष्ट है कि नाट्यशास्त्र मे  बताये गये 36 लक्षण काव्य या नाट्य के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। इसी के द्वारा काव्य में सौन्दर्य की वृद्धि होती है जो नाटक को सहृदय आह्लादकारी बनाती है। वर्तमान नाट्ककार या काव्यकार के लिए भी आज उतना ही प्रासङ्गिक है यदि इन ३६ लक्षणों को ध्यान में रखकर नाटकादि लिखा जाए तो अवश्य ही विशिष्ट रचना होगी जिससे पाठक अथवा दर्श आनन्द-विभोर होंगे। अतएव भरतमुनि द्वारा प्रतिपादित ३६ लक्षण वर्तमान में भी अत्यन्त उपयोगी है।

सन्दर्भ ग्रन्थसूची

  • कुमार, कृष्ण. अलंकारशास्त्र का इतिहास. मेरठ: साहित्य भण्डार, 2010
  • द्विवेदी, दशरथ, संस्कृत काव्यशास्त्र में अलंकारों का विकास. नई दिल्ली: राधा पब्लिकेशन्स, 2003
  • दीक्षित, सुरेन्द्रनाथ. भरत और भारतीय नाट्य परम्परा. दिल्ली: नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 1973
  • नारायण, जयप्रकाश. नाट्यशास्त्र में काव्यलक्षण. दिल्ली: अमर ग्रन्थ पब्लिकेशन्स, 2014
  • भरतमुनि, नाट्यशास्त्र. सम्पा. रविशंकर नागर, दिल्ली: परिमल पब्लिकेशन्स, 1984
  • भरतमुनि, नाट्यशास्त्र. सम्पा. बाबुलालशुक्ल शास्त्री, वाराणसी: चौखम्बा संस्कृत सीरिज, 1978
  • भरतमुनि, नाट्यशास्त्र. अभिनवभारती टीका सहित. सम्पा. पारसनाथ द्विवेदी, वाराणसी: सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, 2001
  • विश्वनाथ, साहित्यदर्पण. हिन्दी व्या. शालिग्राम शास्त्री, दिल्ली: मोतीलाल बनारसी दास, 1977

[1] न वेद व्यवहारोऽयं संश्राव्य: शूद्रजातिषु।

  तस्मात् सृजापरं वेदं पञ्चमं सार्ववर्णिकम्॥ नाट्यशास्त्र, १.९२

[2] अभिपूर्वस्य णीञ् धातुराभिमुख्यार्थनिर्णये।

 यस्मात् प्रयोगं नयति तस्मादभिनय: स्मृत:॥ नाट्यशास्त्र, 8.6

[3] आङ्गिको वाचिकश्चैव ह्याहार्य: सात्विकस्तथा।

  चत्वारोऽभिनया ह्येते विज्ञेया नाट्यसंश्रया:॥ वही, 6.24

[4] काव्यबन्धास्तु कर्त्तव्या: षट्त्रिंशल्लक्षणान्विता:।

[5] षट्त्रिंशदेतानि तु लक्षणानि प्रोक्तानि भूषणसम्मितानि।

  काव्येषु भावार्थगतानि तज्ज्ञै: सम्यक् प्रयोज्यानि यथारसं तु॥ नाट्यशास्त्र, 16.42

[6] नाट्यशास्त्र, अभिनवभारती टीका, 15.227

[7] नारायण, जयप्रकाश, नाट्यशास्त्र में काव्यलक्षण, पृ० 54

[8] विभूषणञ्चाक्षरसंहितश्च शोभाभिमानौ गुणकीर्तनञ्च।

प्रोत्साहनोदाहरणे निरुक्तं गुणानुवादोऽतिशय: सहेतु:॥१॥

सारूप्य-मिथ्याध्यवसायसिद्धि-पदोच्चयाक्रन्दमनोरथाश्च।

आख्यानयाञ्चाप्रतिषेधपृच्छादृष्टान्तनिर्भासनसंशयाश्च॥२॥

आशी: प्रियोक्ति: कपट: क्षमा च प्राप्तिश्च पश्चात्तपनं तथैव।

अथानुवृत्तिर्ह्युपपत्तियुक्ती कार्योऽनुनीति: परिवेदनञ्च॥३॥

षट्त्रिंशदेतानि तु लक्षणानि प्रोक्तानि वै भूषणसम्मितानि।

काव्येषु भावार्थगतानि तज्ज्ञै: सम्यक्प्रयोज्यानि यथारसं तु॥४॥नाट्यशास्र् १६.१-४

[9] नाट्यशास्त्र, 16.6

[10] अभिज्ञानशाकुन्तलम्, 2.5

[11] न चात्रालङ्कार: कश्चिदपि तु कविव्यापारेण य: शब्दार्थव्यापारादेवार्थघटनात्मा तत्कृतं हृद्यं लक्षणमेव। अशोभनोऽप्यर्थोऽमुना न्येन शोभेत इति शोभेयमुक्ता। अभिनवभारती, 16.7

[12] नाट्यशास्त्र, अभिनवभारती टीका- 16.1

नजीबाबाद के झरोखे से नित्यानंद मैठाणी- देवराज

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नजीबाबाद के झरोखे से नित्यानंद मैठाणी

देवराज

आपात-काल चल ही रहा था। चतुर्दिक भय, तनाव और अतिरिक्त सावधानी का वातावरण्। नजीबाबाद में कोतवाली मार्ग पर एक भवन का निर्माण होना शुरु हुआ। हम लोग साहू जैन महाविद्यालय से अपनी एम. ए. कक्षाएँ पढ़ कर पैदल ही लौटते और तेजी से ऊपर उठते उस भवन के बारे में आपस में चर्चा करते। वह आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद्र का भवन था। हम लोगों ने पता नहीं कहाँ से सुन लिया, कि चीन हमारे गढ़वाल और कुमाऊँ (तब उत्तराखंड का उदय नहीं हुआ था) सीमांत के लोगों के बीच गलत-सलत प्रचार करने के लिए अपने संचार-माध्यमों का प्रयोग करता है, उसी का मुकाबला करने के लिए भारत सरकार ने 100 किलो हर्ट्ज़ का यह अति शक्तिशाली आकाशवाणी केंद्र (तब वह उत्तर प्रदेश के सबसे शक्तिशाली केंद्र के रूप में अस्तित्व में आ रहा था) स्थापित करने का निश्चय किया है। सुन कर पहले-पहल हम सभी आतंकित हो गए, लगा कि चीन के साथ युद्ध शुरु होने वाला है और सरकार उसी की तैयारी कर रही है, पता नहीं क्या हो! वह भवन बन भी रहा था, जंगल में। रेलवे फाटक के बाद केवल एक चंद्रा कत्त्था उद्योग था और एक भजनलाल का कत्त्था उद्योग, पाली बदलने पर जब इनके भौंपू बजते थे, तो आसपास की हवा में फैला सन्नाटा थोड़ी देर के लिए जागता था। हमारा महाविद्यालय कुछ और आगे कोतवाली (यह एक जगह का नाम है, जो नजीबाबाद से अठारह कि. मी. दक्षिण में है) जाने वाली सड़क पर था। इसके आलावा न आज की हिमालयन कॉलोनी थी, न सावित्री एंक्लेव और न आदर्श नगर, इन सबकी जगह एक बड़ा पुराना आम का बाग था, शेष यहाँ-वहाँ गहरे-गहरे गड्ढे थे, पास ही काले अजगर-सा एक बदबूदार नाला बहता था। लंबा रास्ता न नापना हो, तो कीचड़-पानी से बचते हुए उसके किनारे-किनारे चल कर भी महाविद्यालय जाया जा सकता था। हम लोगों के शुरुआती आतंक का —अतार्किक ही सही— एक आधार तो यही भौगोलिक क्षेत्र था, जहाँ आकाशवाणी भवन आकार लेता जा रहा था और दूसरा उसके साथ चीन वाले प्रसंग के जुड़े होने की बात थी। सन् बासठ के चीनी आक्रमण के समय हम सभी सहपाठी सात-आठ बरस के रहे होंगे, इसलिए स्वाभाविक रूप से अपने मानस पर उस युद्ध के तनाव को अनुभव करते थे।
आकाशवाणी भवन के निर्माण का ठेका नजीबाबाद के नामधारी रईस, सुरेशचंद्र जैन को मिला था और अपनी उन्मुक्त हँसी तथा आतिथ्य के लिए विख्यात, जगतनारायण मुष्टिक समस्त निर्माण गतिविधियों के प्रभारी थे। अनुशासन-पर्व (?) का दबाव रहा हो या कोई और कारण, इन लोगों ने बहुत कम समय में ही कोतवाली मार्ग पर मुख्य प्रसारण-भवन (रिकार्डिंग स्टूडियो तथा प्रशासनिक एकक) और कोटद्वार मार्ग पर समीपुर गाँव के निकट तकनीकी (प्रसारण-टावर) केंद्र बना कर खड़ा कर दिया। यही नित्यानंद मैठाणी के नजीबाबाद आने का समय है। उन्होंने आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी के रूप में कार्यभार ग्रहण किया था। उन्हीं के आने के बाद यह जानकरी हुई, कि आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद्र की स्थापना मुख्य रूप से गढ़वाली और कुमाऊँनी भाषाओं, साहित्य, ऐतिहासिक वैशिष्ट्यों, इन क्षेत्रों की सांस्कृतिक परंपराओं, जन-जीवन, कृषि और शिल्प-कलाओं, पर्यटन आदि की खोजपूर्ण जानकारी व्यापक स्तर पर सुलभ बनाने तथा भाषा, साहित्य व संस्कृति के संरक्षण के प्रयासों को बढावा देने वाले कार्यक्रमों का प्रसारण करने के उद्देश्य से की गई है। इसी के साथ इस केंद्र से हिंदी भाषा और साहित्य संबंधी कार्यक्रम भी प्रसारित किए जाएँगे। गढ़वाल और कुमाऊँ के सुदूरवर्ती क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए ही इसे प्रसारण-तकनीक की दृष्टि से एक शक्तिशाली केंद्र भी बनाया गया था। इसके पूर्व भारतीय रेडियो की प्रसारण सेवाएँ इन क्षेत्रों में नहीं पहुँच पाती थीं, इसीलिए लोग चीन से प्रसारित होने वाले कार्यक्रम सुनने को बाध्य थे। बात साफ थी, कि चीन कहीं न कहीं था, लेकिन उस रूप में नहीं, जिस रूप में मैठाणी जी के आने के पहले हम लोगों के मस्तिष्क में बैठ गया था।
मैठाणी जी से सीधे मेरा परिचय नहीं हुआ था, होना कठिन भी था, क्योंकि तब मैं विद्यार्थी ही था, जबकि वे गढ़वाली भाषा के जाने-माने लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुके थे और हमारे कस्बे में भारतीय प्रसारण-सेवा के एक बड़े सरकारी अधिकारी के रूप में आए थे। कस्बे में उनका पहला परिचय गुरुजी (डॉ. प्रेमचंद्र जैन) से हुआ था, वह भी एक विशेष संयोग के चलते। उन दिनों अपनी सेवा-भावना से नजीबाबाद के सामाजिक-जीवन में गहरी लोकप्रियता प्राप्त कर चुके चिकित्सक, डा. महाराजकृष्ण घिल्डियाल सरकारी अस्पताल के निकट ई. एस. आई. के आवास में रहते थे। गुरुजी के साथ उनकी गहरी छनती थी, इतनी कि दोनों प्रति दिन अवश्य मिलते थे और साथ-साथ कस्बे की गलियों में घूमते थे। डा. घिल्डियाल नित्यानंद मैठाणी की चेचेरी बहन के पुत्र थे, लेकिन यह सामाजिक नाते-रिश्ते की समीकरण तक ही चहेरी बहन के पुत्र और चचेरे मामा वाली बात थी, वास्तव में यह सगे मामा-भानजे वाला रिश्ता था। डा. घिल्डियाल अत्यधिक सम्मान-भावना से नित्यानंद मैठाणी के चरण-स्पर्श करते थे और मैठाणी जी उतने की स्नेह के साथ उनके साथ व्यवहार करते थे। घिल्डियाल जी के पिताजी भी मैठाणी जी को सगे साले से भी कुछ अधिक अपनापे भरा सम्मान ही देते थे तथा उनकी माताजी भी मैठाणी जी को अपने सगे भाई का मान देती थीं। उधर मैठाणी जी भी इन सारे रिश्तों को एकदम अपनेपन की चाशनी में लपेट कर निभाते थे। नित्यानंद मैठाणी का गुरुजी के साथ पहला परिचय इन्हीं डा. घिल्डियाल के आवास पर हुआ था। मैत्री की घनिष्ठता कुछ ऐसी थी, कि गुरुजी डा. घिल्डियाल के पिताजी को हमेशा पिताजी कह कर ही संबोधित करने लगे और मिलने पर पूरी श्रद्धा के साथ उनके चरण स्पर्श भी करने लगे; इसी नाते जब वे घिल्डियाल जी के मामा जी से मिले, तो उन्होंने उन्हें भी ‘मामा जी’ ही संबोधित किया, सो नित्यानंद मैठाणी डॉ. प्रेमचंद्र जैन के मामा जी हो गए और श्रीमती मैठाणी (उमा (गैरोला) मैठाणी) मामी जी। मैठाणी परिवार के साथ उनका यह रिश्ता आजीवन चला। इस रिश्ते की पारिवारिक-स्वीकृति का हाल यह था, कि गुरुआइन (श्रीमती आशा जैन) भी मैठाणी जी को हमेशा ‘मामा जी’ (तथा उमा जी को मामी जी) ही संबोधित करती रहीं।
नित्यानंद मैठाणी के व्यक्तित्व और व्यवहार कुशलता के भीतर झाँकने से एक बड़े काम की बात यह पता चलती है, कि गुरुजी और उनके परिवार के साथ मैठाणी जी की घनिष्ठता चाहे जितनी बढती चली गई हो, लेकिन उन्होंने अपने व्यवहार में इस रिश्ते को दो रूपों में निभाया। एक रूप यह, कि जब भी वे गुरुजी के परिवार में आते थे, तो गुरुआइन तथा ममता, श्रद्धा, हिमांशु के साथ इस प्रकार का व्यवहार करते थे, जिसे देख कर लगता था कि जैसे सचमुच गुरुजी के मामा जी आए हैं। शुरु में मैठाणी जी कस्बे में ही डा. घिल्डियाल के साथ उनके ई. एस. आई. वाले आवास में रहते थे। तब गुरु जी भी किराए पर ही अग्रवाल धर्मशाला के निकट दरबाराशाह मुहल्ले में थे। उन्हीं दिनों मैठाणी जी गुरुजी के परिवार के साथ घुलमिल गए थे। बाद में मैठाणी जी को आकाशवाणी-भवन के परिसर वाला सरकारी आवास मिल गया और गुरु जी भी साहू जैन महाविद्यालय परिसर स्थित आवास संख्या-चार में चले आए। वहाँ सुबह टहलने की बड़ी सुविधा थी, दोनों ओर छतनार वृक्षों से भरी चौड़ी निर्जन सड़क, जितना मन हो, उतनी दूर तक चलते चले जाओ। मैठाणी जी अक्सर टहलना पूरा करने के बाद सुबह छ: बजे के कुछ बाद महाविद्यालय के आवास संख्या-चार पर पहुँच जाते थे। जाते ही उनके लिए चाय आ जाती थी। गुरुजी ‘मामा जी, नमस्ते’ के बाद प्रात: सात बजे से शुरु होने वाली अपनी कक्षा में जाने के लिए नहाना-धोना करने लगते थे और तैयार होकर चुपचाप निकल जाते थे। मैठाणी जी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था, कि प्रेमचंद्र जी घर में हैं या नहीं, वे बडे इत्मिनान के साथ चाय खतम करते थे और अगर उन्हें एक कप से संतुष्टि नहीं मिली तो, कहते थे, ‘भई आशा जी, मन भरा नहीं, एक कप और बनाइए तो काम चले’। आशा जी भी शायद यह सुनने के लिए ही कान लगाए रहती थीं, रसोई की व्यस्तता के बीच भी उनकी आवाज़ आती, ‘अभी लाई मामा जी’ और कुछ देर बाद ही मामा जी के सामने भनज-बहू चाय का कप लिए उपस्थित्। मैठाणी जी यह चाय-अध्याय संपन्न करके अपने आवास की ओर निकल जाने को उठ खड़े होते थे, ‘अच्छा आशा जी, चलता हूँ, दरवाज़ा बंद कर लीजिए, प्रेमचंद्र जी से कहिए, शाम को भेंट होगी’। इसके बाद गुरुजी कक्षा से लौटते, तो उनका पहला सवाल होता, ‘आशा, मामा जी को चाय के दूसरे कप के लिए पूछ्ना याद रह गया था?’ गुरुआइन जवाब देतीं, ‘हाँ, हाँ, मामा जी ने खुद ही बोल दिया था, मैंने तुरत बना कर दे दी थी। कह रहे थे, शाम को आएँगे।’
शाम की भेंट में कभी-कभी मैठाणी जी का मन चाय के साथ पकौड़ियाँ खाने का होता था, ‘भई आशा जी, चाय तो आप बहुत अच्छी बनाती ही हैं, इसमें तो कोई दो राय हैं ही नहीं, लेकिन आज मन चाय के साथ ज़रा पकौड़ियाँ खाने का भी है, बरसात का मौसम है, बादल भी हैं, इस मौसम में पकौड़ियों के साथ चाय का आनंद ही कुछ और है….. सामान-वामान है या नहीं, ज़रा देखिए!’ गुरुआइन को तो बनाने-खिलाने का पहले से ही इतना शौक है कि पूछिए मत! उन्हें जैसे कढ़ाई चढ़ाने का मौका मिल जाता, ‘सामान-वामान सब है मामाजी, अभी बनाती हूँ, पहले चाय ले आती हूँ, पी लीजिए।’ मैठाणी जी का मन होता तो चाय के लिए हामी भर देते (जो अक्सर हो जाता था) और न होता, तो कहते, ‘अभी चाय रहने ही दीजिए, साथ में ही ले आइए’। इसके बाद निश्चिंत होकर गुरुजी की ओर मुड़ते और कार्यालय की वे घटनाएँ सुनाते, जिनमें किसी अधीनस्थ को नियम न मानने अथवा किसी काम में अनावश्यक विलंब करने के लिए बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से जीवन भर के लिए सबक सिखाया गया हो। इस काम में उन्हें महारत हासिल थी। वे अपने अधीनस्थों पर बहुत कम गुस्सा होते थे, लेकिन उनमें से किसी को भी कार्यालयी अनुशासन की मर्यादा भंग करने की अनुमति नहीं देते थे। उन्हें अपने सहयोगियों के साथ अद्भुत भाईचारा बरतते हुए समयबद्ध रूप में और कस कर सरकारी काम-काज करवाना आता था। और, जो कर्मचारी जाने-अनजाने उनके भाईचारे का गलत अर्थ निकाल कर अवांछित स्वतंत्रता लेना चाहता था, उसे बहुत करीने से पाठ पढाना भी वे अच्छी तरह जानते थे। अपने विलक्षण संप्रेषण-कौशल के बल पर वे रसलीन अवस्था में ऐसी घटनाओं का वर्णन आवास संख्या-चार की सांध्यकालीन बैठकी में करना नहीं भूलते थे। समाहार में कहते थे, ‘डॉक्टर सा’ब, प्रमचंद्र जी, तो इसे कहते हैं— प्रशासन-रस, समझे आप!’ कहते हुए उनके चेहरे पर मुस्कान के रंग चढ़ते-उतरते रहते थे और उनकी आँखें कत्थई रंग के पुराने से फ्रेम वाले चश्में के भीतर से चंचल-शांत-भाव में सराबोर रहस्यमयी मुद्रा में बाहर झाँकने लगती थीं। इस बीच पकौड़ियाँ और चाय उदरस्थ हो जाती थीं, मैठाणी जी उठते हुए कहते थे, ‘ठीक है, अब जब सारी इच्छा पूरी हो ही गई है, तो क्या करना बैठ कर, अब चलना ही ठीक होगा’। गुरुआइन भीतर काम में लगी होतीं, उन्हें शायद ही पता चलता कि मामा जी अपने घर के लिए निकल गए, गुरुजी अपना बेंत लेकर मामा जी के साथ हो लेते। आकाशवाणी-भवन के निकट (जहाँ बाद में तिराहे पर शिव-मूर्ति स्थापित हुई और वह जगह शिव-मूर्ति चौराहा कहलाने लगी) पहुँच कर मैठाणी जी कहते, ‘अच्छा डॉक्टर सा’ब, प्रेमचंद्र जी, आपकी सीमा समाप्त, यहाँ से हमारी सीमा शुरु, अब आप लौट जाइए।’ गुरुजी प्रणाम निवेदन करके आवास संख्या-चार की ओर मुड़ जाते, उन दिनों के उस निर्जन में शायद अपनी ही कविता गुनगुनाते हुए, ‘आज की दैनंदिनी का पृष्ठ भी पूरा हुआ लो…’। जब तक मैठाणी जी नजीबाबाद में रहे, इस तरह की शामें बराबर आती रहीं, विलक्षण मामा जी के साथ अति विलक्षण भानजे का अगाध निजता से भरा अपरिभाषेय अपनापन निरंतर प्रगाढ़ होता रहा, भारत की खाँटी देसी पारिवारिकता के नए-नए अर्थ प्रकट होते रहे, मैठाणी जी हँसते रहे, सबको हँसाते रहे, कहीं कोई छल नहीं, कोई दुराव नहीं, केवल दूर तक फैले हरी घास के मैदान सा खुलापन— व्यवहार में भी, भाषा में भी, यहाँ तक कि उठने-बैठने और चलने में भी।
इस रिश्ते का दूसरा रूप यह था, कि नित्यानंद मैठाणी ने कभी भी गुरुजी को एक बड़े विद्वान से कम का सम्मान नहीं दिया। उनके साथ वे अपनी बात हमेशा ‘डॉक्टर सा’ब’ और ‘प्रेमचंद्र जी’ से शुरु करते थे और अपने लेखन के संबंध में उनके परामर्श पर ध्यान देते थे। मैठाणी जी के बिना गढ़वाली भाषा का साहित्यिक-परिदृश्य पूरा नहीं होता, यह उनके महत्वपूर्ण लेखक होने का प्रमाण है। वे ‘निमाणी’ जैसे उपन्यास और ‘रामदेई’ जैसे कविता-संग्रह के रचनाकार थे। उन्होंने ‘न्याय द्वारकी’ जैसे दो-सौ कड़ियों के कालजयी रेडियो-धारावाहिक का लेखन और प्रसारण किया था। ये सभी (और अन्य बहुत-सी) रचनाएँ गढ़वाली भाषा को प्रतिष्ठा दिलाने वाली हैं। हिंदी में उन्होंने ‘याद-ए-राहत अली’ और ‘गज़ल साम्राज्ञी बेगम अख्तर’ जैसी अपने ढंग की अनूठी पुस्तकें लिख कर हिंदी साहित्य के सृजन-कैनवस का विस्तार किया। गढ़वाली और हिंदी में उनके और भी दर्जन भर नाटक तथा विविध विषयों पर अनेक महत्वपूर्ण लेख हैं। लेकिन अपनी इधर-उधर बिखरी रचनाओं को समेट कर पुस्तकाकार प्रकाशित करने के प्रति उनमें न कोई कभी कोई जल्दबाज़ी रही और न बेचैनी। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में लखनऊ में रहते हुए भी वे एक पुस्तक भर लेख खोजने-छाँटने में लगे रहे, लेकिन जल्दी तब भी नहीं थी, और अब जल्दी हो या देर, सामग्री मिले या कहीं इधर-उधर हो जाए, क्या होना-जाना है! गुरुजी उन्हें इस आलस्य के विरुद्ध सावधान करते रहते थे या कहिए तिकतिकाते रहते थे, उनके लखनऊ चले जाने और गुरुजी के ग्रेटर नोएडा आ जाने के बाद भी फोन पर यह क्रम बना रहा। जब ये दोनों नजीबाबाद में ही थे, तभी मैठाणी जी रामदेई की कविताएँ हिंदी में लाना चाहते थे। गुरुजी बोले, ‘मामा जी, आप तो हिंदी के मर्मज्ञ हैं, क्या परेशानी है, आप बोलते जाइए, मैं कविताओं का अनुवाद लिखता जाता हूँ’। कुछ काम ऐसे हुआ भी, उसके बाद पता नहीं क्या हुआ! गुरुजी की टोकाटाकी का यह हाल था, कि जब मैठाणी जी लखनऊ से फोन करते, तो वार्तालाप की प्रारंभिक औपचारिकता के तुरंत बाद कहने लगते, ‘डॉक्टर सा’ब, प्रेमचंद्र जी एक किताब भर लेख तो मिल गए हैं, लेकिन कुछ और भी हैं, जिन्हें छपना चाहिए, बस उन्हीं को खोजने में जुटा हूँ, लेख मिले और किताब यूँ गई प्रेस में’, गुरुजी हँसते हुए कहते, ‘मामा जी, किताब लायक सामग्री हो गई है, तो भेजिए छपने, जब दूसरे लेख मिलेंगे, तो वे दूसरी किताब में चले जाएँगे’। यह एक कारण था, जिसके चलते भानजा लेखक, मामा लेखक के लिए आदर का पात्र बना रहा। अपनी अंतिम पुस्तक, ‘गज़ल साम्राज्ञी बेगम अख्तर’ की भूमिका में भी उन्होंने लिखा है, “लेखक के दो शब्द केवल एक शब्द तक ही सीमित रह जाएँगे, अगर डॉ. प्रेमचंद्र जैन का उल्लेख नहीं करूँगा। आप नजीबाबाद के साहू जैन पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष रहे हैं। डॉ. प्रेमचंद्र जैन ही ऐसे व्यक्ति रहे हैं, जिन्होंने लेखक को लेखक बनाने में सहयोग दिया है”।
इस अपनापे भरे सम्मानजनक रिश्ते की एक्रिलिक-पेंटिंग की एक और गहराई भी है, दोनों का कड़क स्वभाव्। नित्यानंद मैठाणी आकाशवाणी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों के संबंध में किसी की सिफारिश सुनते नहीं थे और प्रेमचंद्र जैन किसी की संस्तुति करते नहीं थे। उन्होंने शुरु में ही कह दिया था, ‘मामा जी मुझे आकाशवाणी का कोई कार्यक्रम नहीं चाहिए और मैं कभी किसी को कार्यक्रम में बुलाने के लिए भी नहीं कहूँगा, आप इस बात को गाँठ बांध लीजिए, ताकि आपको मुझसे कोई डर-भय न रहे, तब हमारा संबंध चलता रहेगा, बाकी मैं आपको मामा जी कह चुका हूँ, वह संबंध हमेशा बना रहेगा।’ यह सुन कर मैठाणी जी कुछ अधिक नहीं बोले, लेकिन उनके चेहरे के भावों से साफ लगा, कि वे भीतर-ही-भीतर आश्वस्त हुए, उन्होंने बस इतना कहा, ‘ठीक है, डॉक्टर सा’ब, मेरा भी मानना है, कि सिफारिशी कार्यक्रमों का आकाशवाणी की प्रतिष्ठा पर बुरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए मैं खुद सिफारशियों से दूर भागता हूँ, लेकिन आप इतना ज़रूर मान कर चलिए, कि आपको जो कार्यक्रम दिए जाएँगे, वे नियमानुसार ही दिए जाएँगे, आप उन्हें अन्यथा मत लीजिए।’ इसके बाद ये दोनों चाहे एक-दूसरे के घर मिलें या आकाशवाणी भवन के कार्यालय में या फिर चाहे आसपास के नगरों के साहित्यिक समारोहों में भाग लेने साथ-साथ जाएँ, किसी के चेहरे पर किसी प्रकार का तनाव नहीं रहता था।
एक बार मैठाणी जी ने एक दूसरी तरह की सिफारिश अवश्य की थी। नजीबाबाद के जैन समाज ने भगवान महावीर का पच्चीस-सौवाँ निर्वाणोत्सव बहुत धूमधाम से मनाया था। उसके मुख्य आधार वीरेंद्र जैन पहाड़वाले, डॉ. प्रेमचंद्र जैन, साहू जगत प्रसाद जैन, साहू सुरेशचंद्र जैन आदि थे। उस अवसर पर ऐतिहासिक महत्व का एक कार्य, ‘मध्यकालीन हिंदी संत साहित्य के विकास में जैन दर्शन का योगदान’ विषय पर तीन दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन था, जिसमें आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, विजयेंद्र स्नातक, कस्तूरचंद कासलीवाल, बाबू वृंदावनदास, नर्मदेश्वर चतुर्वेदी जैसे स्वनाम धन्य विद्वान नजीबाबाद पधारे थे। भगवान महावीर के पच्चीस-सौवें निर्वाणोत्सव के उपलक्ष्य में होने वाले आयोजनों की शृंखला की अंतिम कड़ी के रूप में एक कवि-सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इसका मूल प्रस्ताव साहू जगत प्रसाद जी का था, ‘डॉक्टर सा’ब, बरसों से नगर में कोई बड़ा कवि-सम्मेलन नहीं हुआ है, इस अवसर पर जैन समाज की तरफ से करा देना चाहिए’। अनेक कठिनाइयों की छाया में यह प्रस्ताव फलीभूत हुआ और कवि-सम्मेलन के मुख्य अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन शिक्षा-मंत्री, शिवानंद नौटियाल को आमंत्रित करने का निर्णय किया गया। इसमें भी एक कठिनाई आ खड़ी हुई। समय बहुत कम था और आयोजकों को ऐसा कोई समर्थ स्रोत नहीं मिल रहा था, जो नौटियाल जी को इस आयोजन में ला सके। कवि सम्मेलन का संयोजक होने के नाते सबसे अधिक परेशान गुरुजी थे। ऐसे संकट की घड़ी में नित्यानंद मैठाणी आगे आए। उन्होंने गुरुजी को आश्वस्त किया, ‘डॉक्टर सा’ब, आप बिल्कुल परेशान मत होइए, यह काम मुझ पर छोड़िए, मैं पूरी कोशिश करूँगा।’ वे लखनऊ गए, शिवानंद नौटियाल से मिले और उनके कार्यालयीन पत्र-शीर्ष पर आयोजन में आने की स्वीकृति लाकर गुरुजी के हाथ पर रख दी, ‘लीजिए प्रेमचंद्र जी, नौटियाल जी आपके आयोजन में आ रहे हैं, निश्चिंत होकर आगे की कार्यवाही कीजिए।’ उनकी सिफारिश पर शिवानंद नौटियाल कवि-सम्मेलन के मुख्य अतिथि के रूप में नजीबाबाद में उपस्थित हुए और इस विलक्षण सिफारिश के कारण नित्यानंद मैठाणी नजीबाबाद के और भी अपने हो गए।
नित्यानंद मैठाणी को कई बार लगता था, कि यह काम होना चाहिए, और वे उसे परिणाम तक पहुँचा कर ही दम लेते थे। घटना उस समय की है, जब कोतवाली मार्ग पर मुख्य प्रसारण स्टूडियो ने विधिवत काम करना प्रारंभ नहीं किया था। वह परीक्षण-अवस्था में था और एक-दो लोगों को बुला कर बिना किसी औपचारिकता के सीधा प्रसारण करवा कर देखा जा रहा था। उस समय अत्यावश्यक प्रसारण कोटद्वार मार्ग पर ट्रांसमिशन टावर वाले छोटे से भवन से किया जाता था। आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद्र का विधिवत उद्घाटन 27 जनवरी, 1978 को हुआ। इसके पहले ही 28 दिसंबर, 1977 को सूचना मिली, कि हिंदी काव्य-जगत में छायावाद की त्रयी के प्रमुख स्तंभ, कवि सुमित्रानंदन पंत का निधन हो गया है। मैठाणी जी को आकाशवाणी की स्थिति की जानकारी थी और वे चाहते, तो आकाशवाणी लखनऊ से रिले होने वाले श्रद्धांजलि-कार्यक्रम को भी सुनवा सकते थे, लेकिन उन्हें धुन सवार हुई, कि नजीबाबाद केंद्र भी अपना श्रद्धांजलि कार्यक्रम उसी दिन प्रसारित करेगा। समय बहुत ही कम था। न कोटद्वार से किसी को बुलाना संभव था, न बिजनौर से और न ही धामपुर, हरिद्वार या रुड़की से। जो भी संभव था, वह नजीबाबाद कस्बे के बल पर ही किया जा सकता था। मैठाणी जी के भीतर बैठे जुझारु मैठाणी ने कहा होगा, ‘वही किया जाए’। उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर संपर्क करना शुरु किया और कुछ ही घंटों में वे अपनी टीम बनाने में सफल हो गए। प्रकृति और मनुष्य को अगाध प्रेम करने वाले कविवर सुमित्रानंदन पंत को आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद्र ने सीधे-प्रसारण (लाइव-ब्रॉडकास्ट) के माध्यम से श्रद्धा-सुमन अर्पित किए। यह श्रद्धांजलि कार्यक्रम न केवल पर्याप्त प्रभावशाली बन गया, बल्कि भारत के आकाशवाणी केंद्रों के उन कार्यक्रमों में भी स्थान पा गया, जिन्होंने उसी दिन कवि पंत को सबसे पहले अपनी भावपूर्ण श्रद्धा अर्पित की होगी। नित्यानंद मैठाणी और आकाशवाणी के समर्पित कार्यकर्ताओं के साथ ही इसका श्रेय नजीबाबाद कस्बे को भी है, उसी नजीबाबाद को. जिस पर मैठाणी जी जीवन भर प्य्रार-दुलार बरसाते रहे।
आकाशवाणी जैसा सरकारी संस्थान किस प्रकार साधारण जनता के सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थान की भूमिका निभा सकता है, इसका अनुकरणीय उदाहरण नित्यानंद मैठाणी ने आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद्र पर पहले कार्यक्रम अधिकारी और फिर केंद्र निदेशक के रूप में कार्य करते हुए प्रस्तुत किया। वे गढ़वाल और कुमाऊँ के दूर-दूर के क्षेत्रों के जन-जीवन को आकाशवाणी से जोड़ते थे, पुराने और नए लोक-कलाकारों से संपर्क-संवाद करते थे, कितनी भी कठिनाइयाँ झेल कर दूरस्थ क्षेत्रों के साहित्य और संगीत कार्यक्रमों की रिकार्डिंग करने अपनी टीम के साथ जाते थे और किसी बहाने नजीबाबाद आए लेखकों-कलाकारों के साक्षात्कार लेने तथा उनकी रचनाओं को रिकार्ड करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते थे। उनके समय में शिवप्रसाद डबराल ‘चारण’, सुंदरलाल बहुगुणा, गिरदा, पीतांबर देवरानी, योगेश पांथरी, पार्थसारथी डबराल, विपिन उनियाल, शेखर जोशी, कमल जोशी श्रीविलास डबराल, हर्ष पर्वतीय आदि गढ़वाली-कुमाऊँनी इतिहासकारों-पर्यावरणविदों-साहित्यकारों-कलाकारों के साथ ही बाबू सिंह चौहान, विष्णुदत्त राकेश, कमलकांत बुधकर, योगेंद्रनाथ शर्मा ‘अरुण’, देव भारती, ज्ञानेशदत्त हरित, निश्तर खानकाही, चरण सिंह ‘सुमन’, सरोज मार्कंडेय, हुक्का बिजनौरी, पद्मा शर्मा, रमेश रायज़ादा, ओमप्रकाश अश्वघोष, कमलेश सारथी, वाचस्पति, मेघा सिंह चौहान, जलीस नजीबाबादी, गिरिराजशरण अग्रवाल, भोलानाथ त्यागी आदि— आकाशवाणी की सीमा में आने वाले क्षेत्र के— हिंदी के प्रखर और चर्चित लेखकों-पत्रकारों की वार्ताएँ, कविताएँ, लोक-संगीत रचनाएँ, कहानियाँ, साक्षात्कार आदि सुनने को मिलते थे। इनके अतिरिक्त मैठाणी जी नई पीढ़ी के संभावनाशील रचनाकारों-कलाकारों को बिना किसी भेदभाव के प्रसारण के अवसर प्रदान करने में भी विशेष सुख प्राप्त करते थे। इनमें से अमन त्यागी ने आगे चल कर काफी नाम कमाया। कहानियों के साथ ही आकाशवाणी से प्रसारित उनके रूपक श्रोताओं द्वारा काफी पसंद किए गए। मुकेश सुमन, रजनी शर्मा, प्रदीप डेज़ी मुकेश नादान आदि इसी प्रकार के दूसरे नाम है। इनके अलावा भी नई पीढ़ी के अनेक रचनाकारों को आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद्र ने आगे बढ़ने में सहायता की। कभी न भुलाई जा सकने वाली एक बात यह है, कि उस काल में आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद्र के साथ लेखकों-कलाकारों के साथ ही साधारण लोगों को भी गहरा अपनापन अनुभव होता था।
जनकवि नागार्जुन वाचस्पति जी के पास जहरीखाल आते-जाते हफ्ता-दस दिन के लिए नजीबाबाद में गुरुजी के पास ठहर जाते थे। मैठाणी जी उनसे प्रति दिन मिलने जाते थे और इशारों ही इशारों में कोशिश करते थे कि वे अपनी कुछ कविताएँ और एक साक्षात्कार रिकार्ड करवाने के लिए तैयार हो जाएँ, लेकिन नागा-बाबा आकाशवाणी आने की बत सुनते ही बिदक जाते थे। अंत में उन्होंने नागार्जुन को रिकार्डिंग के लिए तैयार करने का दायित्व गुरुजी को दिया। वे कोशिश करने लगे, लेकिन बात बनती नज़र नहीं आई। एक दिन मैठाणी जी ने फोन पर पूछा, ‘काम कुछ बना?’ उस समय गुरुजी बाबा के सामने ही बैठे थे, इसलिए खुल कर कुछ नहीं कह सकते थे, वे केवल बोले, ‘निल’। मैठाणी जी समझ गए और हँसते हुए कहा, ‘डॉक्टर सा’ब इस ‘निल’ को ‘अनिल’ बनाइए’। बात फिर भी नहीं बनी, तो एक दिन मैठाणी जी ने कहा, ‘डॉक्टर सा’ब प्रेमचंद्र जी, आप तो बस एक काम कर दीजिए, आप नागा-बाबा को आकाशवाणी केंद्र तक ले आइए, फिर देखिए, मैं कुछ कोशिश करता हूँ।’ गुरुजी ने आकाशवाणी नजीबाबाद के कार्यों की प्रशंसा करते हुए नागा-बाबा को विशेष रूप से बताया कि वहाँ दूर-दूर गाँवों तक से लोक-कलाकार बुलाए जाते हैं और किसानों के लिए भी उपयोगी कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। इसके बाद अवसर पाते ही प्रस्ताव कर दिया, कि अगर बाबा चाहें, तो आज शाम को यूँ ही आकाशवाणी केंद्र घूमने चला जा सकता है। नागा-बाबा पता नहीं किस धुन में थे, उनके मुँह से निकल गया, देख आते हैं। इसके बाद की कथा का एक अंश ‘निरभै होई निस्संक कहि’ ग्रंथ के पृष्ठ संख्या 68 से पढ़ें— “हम सब सबसे पहले मैठाणी जी के कार्यालय में जाकर बैठे, उसके बाद गुरुजी ने कहा, ‘बाबा, कुछ घूम कर देख लेते हैं, उसके बाद चाय पिएँगे।’ कुछ देर यों ही इधर-उधर घुमा कर बाबा को स्टूडियो लाया गया। मैठाणी जी उत्साह में आ गए और जल्दी कर बैठे, बोले, ‘बाबा, आप अपनी कुछ कविताएँ रिकार्ड करवा दीजिए, हम अपने श्रोताओं के लिए प्रसारित करना चाहते हैं।‘ सुनते ही बाबा की गोल-गोल आँखें बड़ी होकर कोटरों से बाहर निकल आईं, हाथ कुहनियों से कुछ चौड़े हो गए, वे जहाँ खड़े थे, वहीं से पीछे घूमते हुए बोले, ‘तो आप इसलिए आकाशवाणी-फाकासवाणी की रट लगा रहे थे, हम क्या भुट्टे का पेड़ हैं, कि जब चाहा तोड़ लिया, छील लिया, चबा लिया, चलिए यहाँ से।’ मैठाणी जी और गुरुजी को काटो तो खून नहीं, जहाँ थे, वहीं खड़े रह गए। मैं सबसे छोटा था, बाबा गाली भी देते, तो चिंता नहीं थी, सो आगे बढ़ा और डरते-डरते कहा, ‘बाबा चलिए हम बाहर चलते हैं’, और उन्हें मैठाणी जी के कार्यालय में ले जाकर बैठा दिया। बाबा कुछ देर बाद शांत हो गए। चाय आने तक गुरुजी और मैठाणी जी भी आ पहुँचे। दोनों ने कुछ देर पहले घटी घटना का अहसास न देते हुए बातें शुरु कीं और मौका देख कर गुरुजी ने चर्चा का रुख गढ़वाली साहित्य की ओर मोड़ दिया। बाबा को रस आने लगा। वे गढ़वाली, फिर मैथिली, फिर बंगला और फिर कालिदास की चर्चा करने लगे। होते-होते यह हुआ, कि बाबा ने अपनी कविताओं के अंश बोलने शुरु कर दिए। और, बाद में पता चला कि मैठाणी जी ने चोरी से अपने प्रोडक्शन-एसिस्टेंट से मेज के एक कोने के नीचे जो टेप-रिकॉर्डर रखवा दिया था, उसमें बाबा नागार्जुन कैद हो गए।” इस कथा में जो अंश छूट गया है, वह यह है कि बाबा नागार्जुन जो बातचीत कर रहे थे, उससे भेंटवार्ता टाइप कार्यक्रम बना और पूरी कार्यवाही को विधिक बनाने के लिए मैठाणी जी व गुरुजी ने अति कौशलपूर्वक बाबा से कॉन्ट्रेक्ट साइन कराने में भी सफलता हासिल कर ली। यह समझना तो कठिन होना ही नहीं चाहिए, कि मैठाणी जी ने समय रहते ही ‘प्लान-ए’ के साथ ‘प्लान-बी’ भी तैयार कर रखा था, अन्यथा मेज के नीचे टेप-रिकॉर्डर कहाँ से आता! कालजयी हिंदी कथाकार, शिवप्रसाद सिंह अपने शिष्य, ‘प्रेम’ (डॉ. प्रेमचंद्र जैन) के मनुहार पर नजीबाबाद पधारे। मैठाणी जी को उनसे निकटता स्थापित करने और उन्हें रिकार्ड करने में अधिक परेशानी नहीं उठानी पड़ी। बाद में कभी गुरुजी उनसे भेंट करने बनारस गए, तो वे एक प्रसंग में बोले, ‘प्रेम, तुम्हारे मैठाणी जी बहुत अच्छे और विद्वान आदमी हैं’, मैठाणी जी के साहित्य और संगीत के ज्ञान ने शिवप्रसाद सिंह को प्रभावित करने में सफलता प्राप्त कर ली थी।
नित्यानंद मैठाणी संगीत, संगीतकारों और गायकों पर निरंतर शोध करते रहे और लिखते रहे। उनकी सन् 2017 में प्रकाशित पुस्तक, ‘गज़ल साम्राज्ञी बेगम अख्तर’ पढ़ कर भारतीय संगीत और गायन की भारतीय परंपरा संबंधी उनके गहन अध्ययन का पता चलता है। अपने इस ग्रंथ में उन्होंने सिद्धेश्वरी देवी, गिरिजा देवी और रसूलन बाई के गायन-वैशिष्ट्य के परिप्रेक्ष्य में बेगम अख्तर के गायन वैशिष्ट्य का विवेचन किया है, काफी दूर तक इन तीनों महान कलाकारों के मध्य समानता के सूत्र खोजे हैं, लेकिन बेगम अख्तर का इन तीनों से भिन्न जो गायन-वैशिष्ट्य है, उसे सामने लाना नहीं भूले हैं। बेगम अख्तर किस प्रकार ‘कई रागों का मिश्रण करके अपना एक अनूठा मिश्रण तैयार कर देती थीं’, किस प्रकार ‘रागेतर प्रयोग करती थीं’, उन्होंने किस प्रकार अपने संगीत में ‘ठुमरी, दादरा, चैती आदि विधाओं का प्रयोग किया है’, उन्होंने कैसे ‘पूरब अंग और पंजाब अंग के मनोहारी तालमेल से एक नई शैली को जन्म दिया’ आदि का सूक्ष्म और सूत्रबद्ध विवेचन उन्होंने अपनी पुस्तक में किया है। यह कम लोगों को पता होगा, कि प्रख्यात प्रगतिशील शायर, कैफी आज़मी और मैठाणी जी के बीच मित्रता थी, इतनी गहरी मित्रता कि जिन दिनों मैठाणी जी आकाशवाणी के गोरखपुर केंद्र पर कार्यरत थे, उन दिनों कैफी साहब जब भी मेजवाँ (आज़मगढ़) आए, मैठाणी जी से मिलने गोरखपुर अवश्य गए। वे बेगम अख्तर एकेडेमी, लखनऊ के चेयरमेन भी थे। मैठाणी जी ने अपनी इस पुस्तक में यह जानकारी दी है कि कैफी आज़मी मानते थे, कि ‘गज़ल के दो नाम हैं, एक- गज़ल और दूसरा- बेगम अख्तर्’। उन्होंने कैफी आज़मी का यह मूल्यांकन-वाक्य भी एक जगह उद्धृत किया है, कि “बेगम अख्तर के सामने गज़ल देखने को मिलती है।” दो और अति रोचक प्रसंग इस पुस्तक में हैं। एक यह, कि बेगम अख्तर की दो गंडाबंद शिष्याएँ थीं, अंजलि बनर्जी और शांति हीरानंद्। इनमें से शांति हीरानंद के समर्पण का हाल यह था कि वे अपने को बेगम अख्तर की ‘आत्मा की छाया’ मानती थीं। एक बार उन्होंने यह इच्छा व्यक्त की, कि वे मृत्यु के बाद अपनी उस्ताद, बेगम अख्तर की मजार की बगल में ही जगह पाना चाहती हैं। बेगम अख्तर बहुत नाराज़ हो गईं और बोलीं, ‘शांति, ऐसा कभी मत सोचना, तुम्हारा अपना धर्म है, याद रखो, तुम्हें तुम्हारे धर्म की परंपरा के अनुसार जलाया जाएगा।’ यह थी एक कलाकार की अनुकरणीय महानता। दूसरा प्रसंग यह, कि एक बार हारमोनियम पर संकट आ खड़ा हुआ था। मैठाणी जी याद करते हैं कि जब वे रेडियो की अपनी नौकरी के प्रारंभिक दिनों में आकाशवाणी के जम्मू केंद्र पर कार्यरत थे, तो उन्होंने स्टाफ ट्रेनिंग स्कूल में ठाकुर जयदेव सिंह को भाषण देते सुना था। उन्होंने अपने भाषण में हारमोनियम को ‘डिस्टैंपर्ड स्केल वाद्य’ बताया था, क्योंकि उसे बजाते समय एक रीड के पर्दे से दूसरे पर जाने में अवरोध उत्पन्न होता है तथा उसमें ‘मीड़ का प्रावधान नहीं है’, अंत: संगीत-ध्वनि में व्यवधान पैदा होता है। ठाकुर जयदेव के साथ ही संगीतज्ञ केसकर जी के विचार भी इसी प्रकार के थे। दूसरे लोगों की तरह मैठाणी जी भी इन विचारों से प्रभावुत हुए थे। लेकिन हारमोनियम को संगीतज्ञों की नाराज़ी से मुक्त करने का ऐतिहासिक कार्य बेगम अख्तर ने किया। उन्होंने बिना हारमोनियम के गाने से इंकार कर दिया। कभी-कभी संगत के लिए एक के बदले दो हारमोनियम मांगे और यह सिद्ध किया कि संगीत की महफिल हारमोनियम के बिना अधूरी है। इन घटनाओं ने मैठाणी जी के मन में हारमोनियम को गहराई से जानने की चुनौती पैदा की। अंतत: 1985 में ‘पूना फिल्म इंस्टीट्यूट’ में प्रशिक्षण के समय नित्यानंद मैठाणी ने ‘हारमोनियम-परिचय’ शीर्षक वृत्त-चित्र का निर्माण किया। इस वृत्त-चित्र का नंबर वे हमेशा याद रखते थे। अपनी पुस्तक में उन्होंने स्वीकार किया है, कि ‘उन्हें हारमोनियम पर कार्य करने की मूल प्रेरणा बेगम अख्तर ने दी थी’। पुस्तक पढ़ने पर पाया, कि इनमें से अनेक प्रसंग मैठाणी जी ने नजीबाबाद की शाम की बैठकियों में सुनाए थे, एकाध तो चंद्रा कत्था उद्योग के सामने टूटी मड़ैया वाली चाय की दुकान में भी।
सन् 1987 में नित्यानंद मैठाणी ने केंद्र-निदेशक के रूप में आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद्र पर कार्य-भार ग्रहण कर लिया। तब वे दूसरी बार इस केंद्र पर आए थे। उसी वर्ष 17 जून को ‘माता कुसुमकुमारी हिंदीतरभाषी हिंदी साधक सम्मान’ समारोह की नींव रखी गई। नित्यानंद मैठाणी ने इसका रेडियो-कवरेज संभव बनाया। आगामी वर्षों में यह आयोजन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘साहित्यिक कुंभ’ नाम से जाना गया और मैठाणी जी प्रति वर्ष इसकी विस्तृत रिपोर्टिंग आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद्र से प्रसारित करवाते रहे। वे आयोजन प्रारंभ होने के पर्याप्त समय पूर्व ही न केवल रेडियो की रिकॉर्डिंग-टीम ही भेज देते थे, बल्कि स्वयं भी आकर देख लेते थे, कि तैयारी सही-सही हो गई है या नहीं। इससे आयोजकों को बड़ी आश्वस्ति मिलती थी। नित्यानंद मैठाणी एक बड़ा काम पुरस्कृत रचनाकारों से भेंट करने के साथ ही उनमें से अनेक को आकाशवाणी में आमंत्रित करके उनके साक्षात्कार, सामूहिक चर्चाओं तथा उनकी रचनाओं को भविष्य में प्रसारित करने के उद्देश्य से रिकॉर्ड करवाने का भी करते थे। ‘माता कुसुम कुमारी हिंदीतरभाषी हिंदी साधक सम्मान : अतीत और संभावनाएँ’ ग्रंथ में आकाशवाणी नजीबाबाद के कार्यालय भवन के प्रवेश द्वार के ठीक सामने लेखकों का एक चित्र प्रकाशित हुआ है, जिसमें चेक गण्रराज्य के भारत में तत्कालीन राजदूत, प्रख्यात हिंदी विद्वान ओदोलेन स्मेकल तथा भारतीय हिंदी विद्वानों में कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, बी. आर. नारायण, पांडुरंग ढगे, महेंद्रप्रताप सिंह, के. ए. जमुना, मालती पांडेय, प्रेमचंद्र जैन आदि हैं। इनके बीच एक कुर्सी पर नित्यानंद मैठाणी विराजमान हैं। पीछे वीरेंद्र जैन भी दिखाई दे रहे हैं। यह चित्र 27 अक्तूबर, 1991 का है। सम्मान-आयोजन के तुरंत बाद मैठाणी जी ने इन सभी को आकाशवाणी आमंत्रित किया था। इस प्रकार आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद्र को बड़ी संख्या में प्रतिष्ठित हिंदीतरभाषी हिंदी विद्वानों के कार्यक्रम प्रसारित करने का अवसर प्राप्त होता रहा। मैठाणी जी यह कार्य सन् 1992, अर्थात अपने सेवा-निवृत्त होने तक करते रहे। एक सुखद संयोग यह रहा, कि आगामी वर्षों में उनके उत्तराधिकारी केंद्र-निदेशक, विजय दीक्षित भी बड़े जतन और मनोयोगपूर्वक इस परंपरा का निर्वाह करते रहे।
सेवा-निवृत्त होने के बाद भले ही लखनऊ में रहने लगे हों, लेकिन नजीबाबाद से नित्यानंद मैठाणी का संबंध कभी टूटा नहीं। वे जब भी लखनऊ से देहरादून आते थे, तो उनके कार्यक्रम में अनिवार्य रूप से नजीबाबाद शामिल रहता था। उनका पड़ाव पहले आवास संख्या-चार में और बाद में जब गुरुजी अपने मकान, ‘आशा निलय’ में आ गए, तो वहाँ होने लगा, कभी एक-दो दिन के लिए और कभी समय न हो, तो कुछ घंटों के लिए भी। वह समय पुरानी स्मृतियों में गोते लगाने, नजीबाबाद के तमाम लोगों के साथ ही कोटद्वार की मित्र-मंडली का मूल्यांकन करने और नाते-रिश्तों को जीने में व्यतीत होता था। उन यात्राओं में वे पढ़ने-लिखने की अपनी अधूरी योजनाओं को पूरा करने की बेचैनी भी दर्शाते थे और अनछपे लेखों को जल्दी से जल्दी पुस्तकाकार प्रकाशित करवा लेने के ऐसे वादे भी करते थे, जिनके बारे में सभी को पता था, कि उन्हें कोई जल्दी नहीं है। शायद, यह कहना एक सीमा तक सही हो, कि वे अपना लिखा सभी कुछ पुस्तक के रूप में प्रकाशित तो करवा देना चाहते थे— इसीलिए अस्वस्थ होते हुए भी उनका खोज-अभियान चलता रहता था— लेकिन वे कभी यह विश्वास नहीं कर पाए कि व्यक्ति को जल्दी हो या न हो, किंतु समय हमेशा निष्ठुरता पूर्वक समय का पालन करता है।
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15 सितंबर, 2020 को रात्रि 9 बज कर 54 मिनट पर गुरुजी ने फोन-संदेश भेजा, ‘फोन नहीं कर रहा हूँ, अभी-अभी जया बेटी ने लखनऊ से फोन पर सूचना दी, डैडी (मैठाणी जी) नहीं रहे।’ अध्ययन की व्यस्तता के कारण मैंने यह संदेश आधी रात को सोने की तैयारी करते हुए सुबह का अलार्म लगाते समय देखा। उसके बाद नींद क्या आनी थी! करवटें बदलते हुए महसूस करता रहा, मैं भी नजीबाबाद में हूँ, गुरुजी भी नजीबाबाद में हैं, मैठाणी जी भी नजीबाबाद में हैं, हम लोग कभी आवास संख्या-चार में हैं, कभी आशा-निलय में हैं, कभी आकाशवाणी भवन में उनके आवास पर हैं, कभी उनके कार्यालय में हैं, कभी साहित्यिक कुंभ के शोर में हैं, कभी सन्नाटे भरी देर रात कोतवाली मार्ग पर हैं, कभी चाय की मड़ैया में हैं, कभी कहीं हैं, कभी कहीं हैं!….. लेकिन पिछले कई दिन से तो वे मेरी और गुरुजी की लंबी-लंबी फोन-चर्चाओं में हैं। उन्हें वर्धा से कई बार फोन करता था, सेवा-निवृत्त होकर लौट आया, तो भी उनसे संपर्क बनाए रखा, हर बार लखनऊ जाकर उनसे भेंट करने के बारे में चर्चा होती थी, सुन कर आनंदित हो जाते थे, अंत में कोरोना-संकट टलते ही लखनऊ जाकर उनसे मिलने की बात तय हुई थी, लेकिन नित्यानंद मैठाणी तो 14 सितंबर को ही लखनऊ छोड़ कर अबूझ-अनंत यात्रा पर निकल गए, पता नहीं इस बार क्या जल्दी थी!…………..
संपर्क : सी-112, अलकनंदा अपार्टमेंट्स
रामपुरी (सूर्यनगर पुलिस स्टेशन के सामने)
पो. चंदेरनगर- 201 011 (दिल्ली एनसीआर)
मोबा. 7599045113
ई-मेल : dr4devraj@gmail.com

मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता- देवराज

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2020-10-06 (1)-b0dba175

2020 10 06 1 5da123c5

हिंदीतरभाषी क्षेत्रों में हिंदी पत्रकारिता
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मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता

देवराज

पृष्ठभूमि :
मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता की पृष्ठभूमि का गहरा संबंध ‘आज़ाद हिंद फौज’ के विजय अभियान और दूसरे विश्व-युद्ध से है। दक्षिण-पूर्व एशिया के जिस हिस्से में विश्व-युद्ध लड़ा गया, उसमें भारत का मणिपुर-अंचल भी आता है। आज़ाद हिंद फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत को अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद से मुक्त कराने के लिए म्यांमार की ओर से अभियान शुरू किया था। सन 1944 में आज़ाद हिंद फौज के कर्नल शौक़तअली मलिक ने मणिपुर के प्रसिद्ध सांस्कृतिक नगर, मोइराङ् पहुँच कर स्वतंत्रता-ध्वज फहरा दिया था। भारत के किसी अंचल के, साम्राज्यवाद से मुक्त होकर स्वतंत्रता की वायु में साँस लेने की यह पहली घटना थी।
कहा जाता है कि साम्राज्यवाद से मुक्ति के अपने ऐतिहासिक-अभियान की जानकारी जनता तक पहुँचा कर सुभाषचंद्र बोस स्वतंत्रता-संग्राम का विस्तार करना चाहते थे। लेकिन उनके पास ऐसे लोग नहीं थे, जो मणिपुरी तथा जनजातीय भाषाओं में सामग्री निर्मित कर सकें। तब उन्होंने हिंदी भाषा में पर्चे छपवा कर बँटवाने का निश्चय किया। आज़ाद हिंद फौज के सैनिक अभियान के काफी पहले ही मणिपुर के दक्षिणी भू-भाग के गाँवों-नगरों में ये पर्चे पहुँच चुके थे। सुभाषचंद्र बोस की इस सूझबूझ का यह लाभ हुआ कि म्यानमार से सटे दक्षिण मणिपुर के गांवों और कस्बों में अनेक लोग आज़ाद हिंद फौज का सहयोग करने को तैयार हो गए। मणिपुर के लोगों द्वारा हिंदी का कामचलाऊ ज्ञान प्राप्त करने के मूल में कुछ रोचक कारण हैं।
हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने सन 1928 में मणिपुर में हिंदी प्रचार आंदोलन प्रारम्भ कर दिया था। उसके बाद सन 1939 में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की राज्य-शाखा के रूप में इम्फाल में मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना हुई। इन दोनों संस्थाओं के भी बहुत पहले धार्मिक यात्राओं के कारण मणिपुर में हिंदी का प्रवेश हो चुका था। इस प्रकार आज़ाद हिंद फौज के आने के पूर्व ही मणिपुर के अधिकांश नगरों और गाँवों में हिंदी जानने वाले कुछ-न-कुछ लोग मिलने लगे थे। इन्होंने ही सुभाषचंद्र बोस के हिंदी पर्चों की सामग्री का मणिपुरी तथा जनजातीय भाषाओं में अनुवाद करके अपने आसपास के लोगों को स्वाधीनता-संग्राम की जानकारी दी। इससे जो जागरण आया, उसने साधारण जनता के मन में विश्वयुद्ध के समाचारों के लिए ललक भी जगाई, जिसने अद्भुत ढंग से हिंदी पत्रकारिता की पृष्ठभूमि का निर्माण किया। उस समय मणिपुरी पत्रों का क्षेत्र सीमित था, जबकि अँग्रेजी समाचारपत्र ब्रिटिश सत्ता के प्रभाव में होने के चलते निष्पक्ष समाचार नहीं दे पा रहे थे। इसका लाभ हिंदी को मिला। प्रारंभिक हिंदी-सेवी, पं. ललिता माधव शर्मा मुंबई से ‘श्रीवेंकटेश्वर समाचार’ मंगा कर लोगों को सुनाने लगे। जो हिंदी पूरी तरह समझ नहीं पाते थे, उनके लिए वे समाचारों का मणिपुरी में अनुवाद कर देते थे। मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की सामग्री की खोज में मैं पं. ललितामाधव शर्मा की सुपुत्री किरणमाला शर्मा से मिला था। उन्होंने प्रयाग में महादेवी वर्मा के घर रह कर हिंदी का अध्ययन किया था और मणिपुर लौट कर आजीवन हिंदी-शिक्षण से जुड़ी रही थीं। किरणमाला शर्मा ने बताया था कि श्रीवेंकटेश्वर समाचार डाक से आता था । शाम को आस-पास के अनेक लोग ललितामाधव शर्मा के घर एकत्र हो जाते थे और शर्माजी उन्हें समाचार पढ़कर सुनाते थे। प्रारंभ में उन्होंने अनुवाद पद्धति का सहारा लिया, थोड़े दिनों बाद अनुवाद करने की आवश्यकता नहीं रही। समाचार जानने की व्याकुलता ने हिंदी शब्दों के अर्थ आसानी से लोगों के मस्तिष्क में बैठा दिए। इससे लोगों ने हिंदी सीखने की प्रेरणा भी ली और हिंदी पत्रकारिता की भूमिका भी बनी।

इतिहास :
मणिपुर में हिंदी की पहली पत्रिका द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों में प्रकाश में आई। यह हस्तलिखित रूप में प्रारंभ हुई थी । दुर्भाग्य का विषय है कि वर्षों की श्रमसाध्य खोज के पश्चात् भी न तो इस पत्रिका का नाम पता चल सका और न इसके संपादक का ही पूरा नाम ज्ञात हो सका। छोटी और महत्वहीन ही सही, लेकिन हमारा ध्यान हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की एक त्रासदी की ओर जाना चाहिए। यह बताने की आवश्यकता नहीं कि विश्वयुद्ध के कारण मणिपुर का जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था, जिसके चलते सैकड़ों घटनाओं के ठोस प्रमाण और संस्थाओं के पुराने अभिलेख पूरी तरह नष्ट हो गए। उन्हीं में, इस प्रथम हिंदी पत्रिका के अंक भी हमेशा के लिए काल के गाल में समा गए । इम्फाल के पाओना बाज़ार स्थित ठाकुरबाड़ी के स्वामी हिंदी और संस्कृत के प्रकांड विद्वान पं. पूर्णानंद सरस्वती उस पत्रिका के प्रकाशन में सहयोगी थे। मैं उनके जीवन की संध्या में उनसे मिल सका। नियति का यह क्रूर परिहास रहा कि तब तक पंडित जी पर वार्धक्य प्रहार कर चुका था और उनकी स्मृति बहुत क्षीण हो चुकी थी। मैं दिन-दिन भर उनके पास बैठता था। आशा थी कि उन्हें किसी न किसी क्षण मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता का प्रारंभ करने वाली पत्रिका के संबंध में सही-सही और पूर्ण जानकारी की स्मृति हो आएगी, किंतु यह आशा पूरी तरह सफल नहीं हो सकी। किसी-किसी क्षण तड़ित-कौंध की तरह एक-एक कर जो बातें उन्हें याद आई, उनसे केवल इतनी ही इतिहास-शृंखला बन सकी कि द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम वर्षों में इम्फाल से एक हस्तलिखित पत्रिका प्रकाशित होनी प्रारंभ हुई थी। उसके संपादक एक जैन सज्जन थे। वे पाओना बाजार, इम्फाल के जैन मंदिर में पुरोहित का कार्य करते थे। उन्होंने समाचार तथा सामाजिक पक्षों पर लोगों को जानकारी देने के लिए यह प्रयास किया था। पत्रिका के प्रथम अंक की केवल पच्चीस प्रतियाँ प्रकाशित की गई थीं। ठाकुरबाड़ी जैन मंदिर के एकदम निकट है, अत: पूर्णानंद सरस्वती का जैन-पुरोहित से परिचय होना स्वाभाविक था। दोनों की रुचियाँ भी समान थीं, इसलिए जब एक हिंदी पत्रिका प्रारंभ करने की योजना बनी, तो पूर्णानंद जी ने सामग्री संकलन के साथ-साथ हस्त-लिखित प्रतियाँ तैयार करने और वितरण के कार्य में सहयोग का दायित्व निभाया। पत्रिका के अंक भी सहयोग के आधार पर, अर्थात एक पाठक द्वारा दूसरे पाठक को देकर पढ़े जाते थे। विश्व-युद्ध और साम्राज्यवाद के विरुद्ध सामाजिक जागरण तथा हिंदी पत्रकारिता के इस संबंध को समझा जाना चाहिए।
मणिपुर से दूसरी हिंदी पत्रिका सन् 1954-55 में ‘साइक्लोस्टाइल्ड’ रूप में प्रकाशित हुई। इसके प्रकाशन का श्रेय मोहनबिहारी, सिद्धनाथ प्रसाद, रामनाथ प्रसाद और झाबरमल जैन को है। पत्रिका का अधिकांश भार श्री मोहनबिहारी के कंधों पर था, किंतु संपादन में मुख्य भूमिका सिद्धनाथ प्रसाद की थी। सामग्री एकत्र हो जाने पर साइक्लोस्टाइल्ड की जाती थी। मुखपृष्ठ कभी सिद्धनाथ प्रसाद और कभी रामनाथ प्रसाद बनाते थे। इस पत्रिका का नाम ‘’कामाख्या न्यूज एक्सप्रेस’’ था। मोहनबिहारी और सिद्धनाथ प्रसाद कविता-कहानियाँ रचते थे, जिन्हें इस पत्रिका में स्थान दिया जाता था। इसी के साथ समाचार और सामाजिक विषयों पर जानकारी रहती थी। पत्रिका के वितरण और भागदौड़ के कार्य मुख्यत: झाबरमल जैन के जिम्मे थे। ‘कामाख्या न्यूज एक्सप्रेस’ द्वि-भाषी (हिंदी-अंग्रेजी) साप्ताहिक पत्रिका थी। कभी-कभी इसमें अनूदित सामग्री का प्रकाशन भी होता था और कभी राजस्थानी (मुख्यत: मारवाड़ी) की सामग्री भी दी जाती थी। खोजकर्ता को झाबरमल जैन, सिद्धनाथ प्रसाद और रामनाथ प्रसाद ने पत्रिका की सामग्री की प्रकृति के साथ यह जानकारी भी दी थी कि इसके मुखपृष्ठ पर कभी ‘त्रिशूल’ और कभी ‘कामाख्या’ का रेखाचित्र भी दिया जाता था।
मणिपुर में प्रथम मुद्रित पत्रिका 15 अगस्त, सन् 1960 में नागरी लिपि प्रचार सभा द्वारा प्रकाशित की गई। ‘आधुनिक’’ नामक इस साप्ताहिक पत्रिका को तरूण प्रेस (स्वराज प्रेस, उरिपोक, इम्फाल) में छापे जाने का निश्चय किया गया। इसके संपादक बी. नयन शर्मा एवं सी-एच. निशान सिंह थे। प्रारंभ में प्रकाशन-संस्था और संपादक मंडल को आर्थिक कठिनाइयों का अनुमान नहीं था, किंतु जब धन की व्यवस्था नहीं हो सकी, तो इसका दूसरा अंक मासिक के रूप में और तीसरा त्रैमासिक के रूप में प्रकाशित किया गया। इन अंकों के धन की व्यवस्था निशान सिंह ने अपने प्रयास से की। शायद इसका प्रकाशन ही निशान सिंह ने अपने उत्साह के कारण, ‘घर फूँक तमाशा’ देखने की राह पर करवाया था, सो साप्ताहिक से त्रैमासिक तक आते-आते उन्होंने सचमुच अपना घर फूँक लिया और जब छावन भी बाकी न रहा, तो हताश निशान सिंह संपादकी छोड़कर हिंदी-मणिपुरी अनुवाद कार्य में जुटकर राष्ट्र और राष्ट्रभाषा की सेवा करने लगे। आधुनिक का एक अंक खोजकर्ता को मिला था, जिसे उसने सन 1985 में उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद नगर में आयोजित लेखक-सम्मेलन के अवसर पर लगी प्रदर्शनी में बाबा नागार्जुन और सम्मेलन-संयोजक प्रेमचंद्र जैन के कहने पर दर्शनार्थ रखा था। वहाँ से कोई उत्साही पाठक वह अंक अपने साथ ले गया, जो संभवत: उसके व्यक्तिगत पुस्तकालय की शोभा बढ़ा रहा होगा।
सन् 1964 में ’मणिपुर शुध्दि संगठन शिक्षा सम्मेलन’’ द्वारा ‘’सम्मेलन गजट’’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया गया। इसके संपादक के. ब्रजमोहन देव शर्मा थे और इसका उद्देश्य हिंदी के माध्यम से मणिपुरी जीवन व संस्कृति को सारे भारत के सामने लाना था। ‘सम्मेलन गजट’ का प्रवेशांक तीन भाषाओं –हिंदी, मणिपुरी व अंग्रेजी में छापा गया था। कुछ अंक प्रकाशित होने के बाद यह पत्रिका भी बंद हो गई । के. ब्रजमोहन देव शर्मा ने ही सन् 1972 में ‘नागरिक-पंथ’ नाम से एक हिंदी-मणिपुरी दैनिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। यह बी.डी. प्रेस उरिपोक, इम्फाल से प्रकाशित किया गया। काफी वर्ष तक वहाँ से प्रकाशित होने के बाद यह नाओरेमथोड़् इम्फाल से प्रकाशित होने लगा। नागरिक पंथ, दैनिक होने के कारण मणिपुर के जीवन में अपेक्षाकृत अधिक हस्तक्षेप कर सका। इसके माध्यम से थोड़ी मात्रा में ही सही, प्रतिदिन हिंदी की सामग्री पाठकों को मिलने लगी। इस लेखक ने अपने दीर्घकालीन मणिपुर प्रवास में सन् 1990 के पश्चात् मणिपुरी भाषा की फिल्मों की समीक्षा प्रारंभ की थी। इनमें से अधिकांश समीक्षाएँ नागरिक पंथ में प्रकाशित हुई थीं। हिंदी फिल्म-समीक्षा की तर्ज़ पर मणिपुरी फिल्मों के विषय में हिंदी में किया जानेवाला यह प्रथम प्रयास था। गुवाहाटी (असम) और अन्य स्थानों से प्रकाशित होने वाले सभी दैनिक समाचारपत्र सातवें दशक के बाद ही अस्तित्व में आए, अंत: नागरिक पंथ को पूर्वोत्तर भारत में दैनिक हिंदी पत्रकारिता के प्रारंभ का श्रेय भी दिया जाना चाहिए।
सन् 1973 में इम्फाल की साहित्यिक संस्था ‘चिंतना’ ने एक पत्रिका प्रकाशित की। इस पत्रिका का नाम ‘चिंतक’ था तथा इसके संपादक आकाशवाणी इम्फाल में कार्यरत डॉ. सुशीलकांत सिन्हा थे। इसके प्रकाशन का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाना और एक वैचारिक आंदोलन की शुरुआता करना घोषित किया गया था। प्रथम अंक से इस दृष्टिकोण की पुष्टि भी होती है। आशा थी कि यह अभियान गति पकड़ेगा, किंतु एक अंक के पश्चात् यह पत्रिका आगे नहीं चल सकी।
सन् 1976 में राधागोविन्द थोङ्गाम के प्रयास से उन्हीं के संपादन में ‘हिंदी शिक्षक दीप’ नामक पत्रिका का प्रकाशन ‘’अखिल मणिपुर हिंदी शिक्षक संघ’’ ने किया। इस पत्रिका का मुद्रण ‘दि मणिपुर गीता प्रेस, शिङजमै बाजार, इम्फाल’ में होता था । इसका मुख्य उद्देश्य हिंदी भाषा का प्रचार और मणिपुर राज्य के हिंदी शिक्षकों की समस्याओं को प्रकाश में लाना था। मणिपुर से प्रकाशित हिंदी पत्रिकाओं में यह पहली थी, जिसमें पर्याप्त मात्रा में कविताएँ, भाषा संबंधी लेख, कला व संस्कृति संबंधी सामग्री और सामाजिक समस्याओं पर आलोचनात्मक सामग्री का प्रकाशन किया गया। प्रवेशांक की भव्यता के अनुरुप ही ‘हिंदी शिक्षक दीप’ का दूसरा अंक भी प्रकाशित हुआ, किंतु विपरीत परिस्थितियों के कारण तीसरा अंक प्रकाशित होने का अवसर नहीं आया । फिर भी इस पत्रिका ने उस सपने को एक सीमा तक अवश्य पूरा किया, जिसे ललितामाधव शर्मा ने बिना कोई पत्रिका निकाले और जैन मंदिर के पुरोहित उन अज्ञातनामा जैन सज्जन ने हस्तालिखित पत्रिका निकाल कर देखा था।
सन् 1977 में फुराइलातपम गोकुलानंद शर्मा के संपादन में ‘पर्वती वाणी’ नाम से एक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसका प्रथम अंक दिसंबर, 1977 में छपा । प्रवेशांक का मुद्रण ‘मॉडर्न प्रिंटर्स, गांधी एवेन्यु, इम्फाल’ के लिए ‘आदिम जाति हिंदी प्रेस, मिनुथोड़् इम्फाल’ द्वारा किया गया। ‘पर्वती वाणी’ मणिपुर से प्रकाशित ऐसी पहली पत्रिका थी, जिसने अपना केंद्रीय लक्ष्य हिंदी भाषा का प्रचार घोषित किया। यह मणिपुर राज्य की जनजातियों और अनुसूचित जातियों के लोगों के मध्य हिंदी का प्रचार-प्रसार करना चाहती थी। उन दिनों इसके संपादक गोकुलानंद शर्मा ‘नागा हिंदी विद्यापीठ’ के माध्यम से हिंदी प्रचार अभियान में जुटे हुए थे। यह पत्रिका तीन अंको तक छापी जाती रही, किंतु भारत सरकार ने इसके नाम को स्वीकृत नहीं दी। शर्माजी पत्रिका निकालने का संकल्प कर चुके थे, अत: उन्होंने इसका नाम बदलकर अपने मार्ग पर बढ़ने का निश्चय किया। मार्च/अप्रैल 1978 से पर्वती वाणी के स्थान पर ‘पूर्वी वाणी’ नामक पत्रिका प्रकाशित होने लगी । संपादक, प्रकाशक, मुद्रक, उद्देश्य आदि वही के वही रहे। यह पत्रिका सन् 1980 तक छपती रही। इसके पश्चात किसी कारण इसका प्रकाशन स्थगित हो गया।
सन् 1980 में फुराइलात्पम गोकुलानंद शर्मा के संपादन में ‘युमशकैश’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। ‘मणिपुरी हिंदी शिक्षक संघ, इम्फाल’ द्वारा प्रकाशित यह पत्रिका हिंदी प्रचार के साथ-साथ साहित्य और संस्कृति के विकास को भी समर्पित थी। यह प्रवेशांक (1980) से लेकर संपादक के देहांत (2017) तक प्रकाशित होती रही। इस लेखक ने मणिपुर पहुँचने (1985) के बाद से ही इस पत्रिका के सलाहकार के रूप में कार्य किया। युमशकैश ने मणिपुर राज्य में हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में सैंतीस वर्सः तक निरंतर प्रकाशित होते रहने का कीर्तमान स्थापित किया। फुराइलात्पम गोकुलानंद शर्मा ने इसका नाम अपने जन्मवार (युमशकैश, अर्थात बुधवार) के आ्रधार पर रखा था। यह मासिक रूप में प्रकाशित होने वाली ऐसी पत्रिका बनी, जिसने भाषा-शिक्षण का कार्य भी किया। इस पत्रिका के माध्यम से पारिभाषिक शब्दावली तैयार करने की योजना पर भी कार्य किया गया। युमशकैश को मणिपुर की कुछ हिंदी प्रचार संस्थाओं में घुस आई अनियमितताओं और उन्हें विकसित करने में मुख्य भूमिका निभाने वाले केंद्र सरकार के हिंदी से जुडे अधिकारियों के विरुद्ध आंदोलन प्रारंभ करने का श्रेय भी प्राप्त है। हिंदी क्षेत्रों में युमशकैश को पर्याप्त सम्मान मिला और उसके संपादक को अंतरराष्ट्रीय कला एवं संस्कृति परिषद, नजीबाबाद, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा द्वारा सम्मानित किया गया।
सन् 1983 में ‘अखिल मणिपुर हिंदी शिक्षक संघ’ द्वारा ‘कुंदो परेङ’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया गया। कुंदो परेड़् का अर्थ है—कुंद पुष्प की माला। यह पत्रिका अपने नाम के अनुरूप भाषा रूपी पुष्पों की माला में हिंदी भाषा पुष्प को विशेष स्थान प्रदान करते हुए अपने मार्ग पर आगे बढ़ रही है। यह प्रारंभ में षट्मामिक थी। बाद में इसे त्रैमासिक कर दिया गया और कुछ वर्षों बाद यह अनियतकालीन हो गई। इसका कारण आर्थिक साधनों का अभाव है। ‘कुंदो परेङ’ के प्रवेशांक का संपादकीय मणिपुरी भाषा में प्रकाशित हुआ था। यह क्रम दो वर्ष तक चला। इस पत्रिका का ‘हिंदी सेवक समान अंक’ पर्याप्त चर्चित हुआ। कुंदो परेङ के पहले और दूसरे अंक का संपादन एस. कुलचंद्र शर्मा शास्त्री ने किया था। बाद में श्री बी. नोदियाचाँद सिंह इसका संपादन करने लगे।
14 सितंबर 1985 को ‘मणिपुर हिंदी परिषद पत्रिका’ (मासिक) के प्रकाशन के साथ मणिपुर राज्य की हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत हुई । इसकी योजना इस लेखक सहित इबोहल सिंह काङजम, राधागोविन्द थोङाम और सिद्धनाथ प्रसाद ने तैयार की थी। राधागोविंद थोङाम इसके प्रथम संपादक बने। उनके सहयोग के लिए एक संपादक मंडल का भी गठन किया गया। ‘मणिपुर हिंदी परिषद पत्रिका’ ने हिंदी प्रचार के साथ-साथ हिंदी और मणिपुरी भाषाओं के साहित्य की उन्नति को अपना मूल उद्देश्य बनाया। इस पत्रिका के प्रत्येक अंक में मणिपुरी से हिंदी में अनुदित सामग्री प्रकाशित होने लगी। कभी-कभी कविताओं के हिंदी अनुवाद के साथ मूल-पाठ नागरी लिपि में भी प्रकशित किया जाने लगा। इस पत्रिका ने हिंदी और मणिपुरी के रचनाकारों पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित किए, जो पाठकों में चर्चित हुए। हिंदी के मैथिलीशरण गुप्त और तुलसीदास तथा मणिपुरी के लमाबम कमल, नीलवीर शास्त्री, हिजम अड़ाड़्ह, कवि चाओबा आदि पर केंद्रित अंक ऐसे ही हैं। इस पत्रिका के माध्यम से हिंदी और मणिपुरी भाषाओं का परिचय बढ़ा और साहित्यिक आदान-प्रदान को गति मिली । रचनाकारों पर केंद्रित विशेषांकों के अतिरिक्त यह पत्रिका विभिन्न रचनाकारों के साक्षात्कार और उनकी रचनाएँ भी प्रकाशित करती रहती है। इस पत्रिका ने मणिपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की माँग को लेकर चल रहे आंदोलन के अवसर पर ‘मणिपुरी भाषा माँग विशेषांक’ प्रकाशित किया था। इससे सारे देश के सामने मणिपुरी भाषा व साहित्य का इतिहास तथा भाषा-माँग का औचित्य प्रस्तुत किया जा सका। ‘मणिपुर हिंदी परिषद पत्रिका’ मासिक के रूप में प्रकाशित हुई थी । सन् 1991 में इस लेखक को इसका संपादक बनाया गया, तब से यह ‘महिम पत्रिका’ नाम से त्रैमासिक के रूप में प्रकाशित होने लगी। सन 2001 से महिप का संपादन इबोहल सिंह काङजम द्वारा किया जाने लगा।
मई सन् 1988 में ‘मणिपुर महिला समाज’ नामक मासिक पत्रिका प्रकाशित हुई। इसका प्रकाशन ‘महिला विकास क्रेंद्र इम्फाल’ द्वारा किया गया। इस पत्रिका का उद्देश्य संपूर्ण महिला जागृति घोषित किया गया। इसका प्रवेशांक हिंदी व मणिपुरी में छपा। दूसरे अंक में अंग्रेजी भाषा को भी स्थान दिया गया। ‘मणिपुर महिला समाज’ में दहेज, विवाह-विच्छेद, नारी-उत्पीड़न और अन्य नारी समस्याओं को सुलझाने वाली सामग्री का प्रकाशन हुआ। इसके संपादन का भार फुराइलात्पम गोकुलानंद शर्मा ने सँभाला। इस लेखक ने मणीपुर महिला समाज के परामर्शदाता के रूप में कार्य किया।
एक जनवरी सन् 1991 को एस. गोपेन्द्र शर्मा के संपादन में ‘जगदम्बी’ नामक साप्ताहिक समाचार-पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह साप्ताहिक जनोपयोगी समाचारों का प्रकाशन करता था। दस अंकों तक गोपेन्द्र शर्मा ने इसे उत्साहपूर्वक प्रकाशित किया, किंतु आर्थिक दृष्टि से निश्चिंत न हो पाने के कारण उन्हें इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा। बाद में वे इसे हिंदी के बदले मणिपुरी दैनिक के रूप में प्रकाशित करने लगे।
जुलाई सन् 1993 में ‘नगर राज-भाषा कार्यान्वयन समिति, इम्फाल’ द्वारा ‘नीलकमल’ नाम से एक अर्धवार्षिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया गया। इसे साइक्लोस्टाइल्ड रूप में निकाला गया। इसका संपादन-कार्य वेंकटलाल शर्मा, के.सी. शर्मा और ए.के. बक्सी ने सँभाला। इस पत्रिका का उद्देश्य मणिपुर के सरकारी कार्यालयों में राजभाषा के रूप में हिंदी के व्यवहार की जानकारी देने के साथ-साथ कार्यालय कर्मियों में लेखन व पठन की प्रवृत्ति का विकास करना भी था। इसके अतिरिक्त नीलकमल में स्थानीय साहित्यकारों की हिंदी रचनाओं व अनुवाद को भी स्थान दिया गया था।
अगस्त, सन् 1999 श्री एस. गोपेन्द्र शर्मा ने ‘चयोल-पाउ’ नामक हिंदी साप्ताहिक का प्रकाशन प्रारंभ किया। इसका मोटो लालबहादुर शास्त्री द्वारा निर्मित उद्घोष में अटलबिहारी वाजपेयी द्वारा किए गए परिवर्धन के फलस्वरूप नव-निर्मित उद्घोष के शब्दों का क्रम बदल कर ‘जय किसान जय जवान जय विज्ञान’ रखा गया। मुखपृष्ठ पर इस समाचार साप्ताहिक का नाम मीतैलिपि में छापा जाता था। इसमें ‘दिवा स्वप्न’ नाम से समसामयिक घटनाओं पर संक्षिप्त टिप्पणी करते हुए एक स्थायी स्तंभ भी प्रारंभ किया गया। समाचार साप्ताहिक होने के कारण इस पत्र में मणिपुरी जन-जीवन को प्रभावित करने वाली घटनाओं का विवरण मूल रूप से देना प्रारंभ किया गया। इसका एक पृष्ठ साहित्य को भी समर्पित किया गया, जिसके अंतर्गत मौलिक, अनूदित और समीक्षा सामग्री प्रकाशित की जाने लगी। दिनांक 9. 8. 2000 को इस पत्र की वर्षगाँठ पर इसका विशेषांक निकाला गया। एस. गोपेन्द्र शर्मा की मृत्यु के पश्चात् भी यह साप्ताहिक समाचार पत्र चलता रहा। अज्ञात कारणों से 3 जून सन् 2007 से चयोल-पाउ का नाम ‘मणिपुरी चायोल-पाउ’ कर दिया गया और डॉ. आर गोविन्द इसके मुख्य संपादक बन गए। गोपेंद्र शर्मा की पुत्री, एस. निर्मला देवी ने संपादक के रूप में कार्य करना प्रारंभ किया। परिवर्तित नाम वाले समाचार साप्ताहिक के प्रस्तुतीकरण में सभी विशेषताएँ चयोल पाउ जैसी ही रहीं।
‘नागरिक पंथ’ की परंपरा में सन् 2002 में मोइराङ से एक हिंदी दैनिक का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। मणिपुर की विश्व प्रसिद्ध झील, ‘लोकताक’ के नाम पर इसका नाम ‘लोकताक एक्सप्रेस’ रखा गया। इस दैनिक के संपादक और प्रकाशक रामानंद सिंह कैशाम थे। यह केवल एक पन्ने का था और इस दैनिक के कुछ ही अंक प्रकाशित हो सके। बाद में इसके प्रकाशन का अधिकार सीएच. निशान सिंह ने प्राप्त कर लिया, किंतु वे कोई अंक प्रकशित नहीं कर पाए।
सन् 2007 में ‘नागा हिंदी विद्यापीठ, इम्फाल’ द्वारा ‘लट-चम’ नाम से एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया गया। इसके प्रधान संपादक एस. खङ्मैदुन कबुई बने। लट-चम कबुई जनजाति की भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है भाषा-शिक्षण, संवाद, आपस की बातचीत या समाचार। मणिपुर के किसी जनजातीय व्यक्ति द्वारा संपादित यह प्रथम हिंदी पत्रिका है।
सन 2008 में चारहजारे नामक स्थान से मासिक पत्रिका ‘भारती’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसके मुख पृष्ठ पर कोष्ठक में लिखा गया— “निष्पक्ष, निर्भीक एवं भ्रष्टाचार विरोधी मासिक पत्रिका”। भारती के संपादक हरिमोहन पोख्रेल थे। इसके प्रवेशांक (सितंबर, 2008) में भारत सरकार और भूमिगत कुकी वर्गों के बीच वार्ता के बारे में समाचार दिया गया, जिससे पत्रकारिता के बदलते स्वरूप का संकेत मिलता है।
25 सितंबर सन् 2011 को थोंड़ाम भारती ‘कविराज’ के संपादन में ‘मणि कुसुम’ नामक एक पत्रिका (त्रैमासिक) का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। जुलाई-सितंबर, 2011 के प्रवेशांक में यह लोक मंगल उद्बोधनी समिति, इम्फाल द्वारा स्थापित ‘हिंदी विश्व सेवा संघ’ की मुख पत्रिका बताई गई है।
मणिपुर की हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में मणिपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग का भी योगदान है। हिंदी विभाग द्वारा संचालित ‘हिंदी परिषद’ ने 30 नवंबर 1987 को एक हस्तलिखित दीवार-पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। यह पत्रिका विद्यार्थियों द्वारा तैयार की जाती और परिषद के निर्देशक की स्वीकृति के बाद पाठकों के लिए दीवार पर चिपका दी जाती थी। यह क्रम तीन वर्ष तक चलता रहा। इसके पश्चात सन् 1992 में विभाग की हिंदी परिषद ने ‘प्रयास’ नाम से एक साइक्लोस्टाइल्ड पत्रिका प्रकाशित करनी प्रारंभ की। यह अनियतकालीन थी। इसके प्रवेशांक की एक सौ प्रतियाँ तैयार हुई थीं और अधिकांश सामग्री छात्रों द्वारा तैयार की गई थी। इस अंक में मणिपुर के समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों को एकत्र करके उमावती और इबेहाइबी नामक छात्राओं ने दो सर्वेक्षण प्रकाशित कराए थे। इनमें से एक सर्वेक्षण मणिपुरी समाज में व्याप्त समस्याओं/अपराधों और दूसरा साहित्यिक-सांस्कृतिक चेतना पर केंद्रित था। दोनों सर्वेक्षणों द्वारा तत्कालीन मणिपुर राज्य के यथार्थ को उजागर किया गया था। मणिपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा प्रकाशित सभी पत्रिकाओं का संपादन इस लेखक द्वारा किया गया था।

[खोजकर्ता की घोषणा : प्रस्तुत आलेख के लेखक ने सन 1985 में मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की खोज प्रारंभ की थी। बाद के वर्षों में संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत तक इस खोज का विस्तार हुआ। मणिपुर की हिंदी पत्रकारिता के इतिहास पर केंद्रित इस लेखक का पहला आलेख राजेंद्र अवस्थी के संपादन में प्रकाशित कादम्बिनी पत्रिका (वर्ष 36, अंक 4, फरवरी 1996) में प्रकाशित हुआ था। यह आलेख कुछ नवीन तथ्यों के आधार पर परिवर्धित होकर सन 2001 में सुरेश गौतम और वीणा गौतम के संपादन में प्रकाशित ग्रंथ, भारतीय पत्रकारिता : कल, आज और कल (सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली) में प्रकाशित हुआ। इस बीच खोज जारी रही और अन्य नवीन तथ्य उपलब्ध हुए। फलस्वरूप इसका एक परिवर्धित रूप सन 2014 में अरिबम ब्रजकुमार शर्मा की पुस्तक, हिंदी को मणिपुर की देन (यश पब्लिकेशंस, दिल्ली) में सम्मिलित किया गया। तब से अब तक जो तथ्य उपलब्ध हुए, उन्हें सम्मिलित करते हुए इस आलेख का नवीनतम परिवर्धित रूप प्रस्तुत किया जा रहा है। सूचनीय है कि खोजकर्ता को प्रारंभ से लेकर अब तक अपने खोजे मात्र एक तथ्य में संशोधन करना पड़ा है, शेष प्रत्येक परिवर्धन में नवीन तथ्य जोड़े गए हैं।]