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हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता-श्‍याम कश्‍यप

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हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता हिन्दी साहित्य के विकास का अभिन्न अंग है। दोनों परस्पर एक-दूसरे का दर्पण हैं। इस दृष्टि से दोनों में द्वन्द्वात्मक (डायलेक्टिकल) और आवयविक (ऑर्गेनिक) एकता सहज ही लक्षित की जा सकती है। वस्तुतः हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता हमारे आधुनिक साहित्यिक इतिहास का अत्यंत गौरवशाली स्वर्णिम पृष्‍ठ है। स्मरणीय है कि हिन्दी के गद्य साहित्य और नवीन एवं मीलिक गद्य-विधाओं का उदय ही हिन्दी पत्रकारिता की सर्जनात्मक कोख से हुआ था।

यह पत्रकारिता ही आरंभकालीन हिन्दी समाचार पत्रों के पृष्‍ठों पर धीरे-धीरे उभरने वाली अर्ध-साहित्यिक पत्रकारिता से क्रमश: विकसित होते हुए, भारतेन्दु युग में साहित्यिक पत्रकारिता के रूप में प्रस्फुटित हुई थी।

भारतेन्दु हरिशचन्द्र (सन्1850-1885 ई0) की पत्रिकाओं कविवचनसुधा (1867ई0), हरिशन्द्र मैगज़ीन (1873ई0) और हरिशचन्द्र चंद्रिका (1874ई0) से ही हमें वास्तविक अर्थों में हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के दर्शन होते हैं। हिन्दी की आरंभकालीन साहित्यिक पत्रकारिता से ही हिन्दी गद्य का चलता हुआ रूप निखर कर सामने आया और भारतेन्दु युग से गद्य-विधाओं और गद्य साहित्य की अखंड परंपरा का अबाध आविर्भाव हुआ।

पृष्‍ठभूमि: छापेखानों की और पत्रों की शुरुआत

अठारहवीं शताब्दी में भारत के कई नगरों ,गोआ, बंबई, सूरत, कलकत्ता और मद्रास में अनेक छापेखाने (प्रिंटिंग प्रेस) कायम हो गए थे स हालाँकि, हालैंड में 1430 ई0 में पहले प्रिंटिंग प्रेस के लगभग सवा सदी बाद, गोआ में 1556 ई0 में भारत का पहला प्रेस कायम हुआ था। परमेश्‍वरन थंकप्पन नायर के शब्दों में न केवल, “हिन्दी और उर्दू की पत्रकारिता का जन्म कलकत्ता में हुआ,“ बल्कि “कलकत्ता को पूरे दक्षिण-पूर्व एषिया में पत्रकारिता का जन्म स्थान माना जा सकता है। कलकत्ता से ही 1765 ई0 में एक डच विलियम बोल्ट ने पत्रकारिता के आरंभिक प्रयास किए थे और अंततः 1766 में अपना पहला “नोटिस“ छापा था।

कुछ विद्वानों की मान्यता है कि, “भारत में पत्रकारिता का आरंभ 1774 ई0 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार की ओर से मुद्रित एवं प्रकाशित “कैलकेटा गज़ेट“ से हुआ था। जो कि सही नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह स्वतंत्र पत्रकारिता नहीं थी। इसलिए अधिकांश विद्वानों का मत है, जो प्रायः स्वीकार्य भी है, कि भारत में पत्रकारिता की शुरुआत एक आयरिश जेम्स ऑगस्टस हिकी ने 27 जून,1780 ई0 को अंग्रेज़ी में “बंगाल गज़ेट ऑफ कैलकेटा एडवरटाइज़र्स“ नामक साप्ताहिक निकाल कर की।

हिन्दी का स्वरूप और हिन्दी पत्रों का आरंभ

डॉ0 शिवमंगल राय के अनुसार ”सन्1779 आते-आते प्रथम भारतीय बाबू राम ने भी कलकत्ता में अपना प्रेस खड़ा कर लिया। हालाँकि प्रिओल्कर और नाइक ने देवनागरी में छपाई का समय 1796 में निर्धारित किया है, जबकि कुछ विद्वान इसे और भी पहले बताते हैं। लेकिन तथ्य यह है कि 1786 से पहले तक तो कलकत्ता में देवनागरी टाइप ही उपलब्ध नहीं था। परमेश्‍वरन नायर के अनुसार “देवनागरी लिपि में छपाई के काम की शुरुआत कलकत्ता से ही हुई थी“ और वहीं से आरंभकालीन हिन्दी का साहित्य भी प्रचुर मात्रा में लिखा गया था तथा “1827 तक पूरे उत्तर भारत में हिन्दी का स्वरूप उभर कर सामने आ गया था।

इससे स्‍पष्‍ट है कि अंग्रेज़ों द्वारा फोर्ट विलियम से हिन्दी गद्य के तथाकथित ”निर्माण” और देवनागरी लिपि में फारसी-बोझिज्ञ तथाकथित ”हिन्दुस्तानी” भाषा के ”विकास” एवं उसकी ”लोकप्रियता” के दावे निराधार और झूठे प्रमाणित होते हैं। श्रीरामपुर (सीरामपुर) के मिशनरियों के हिन्दी मासिक ”दिग्दर्शन” (1817-18) के दो माह के भीतर ”बेंगाल ग्याजेट” और ”समाचार दर्पण” दो बाँग्ला साप्ताहिक पत्र निकले तथा 30 मई, 1826 को पहला हिन्दी समाचार पत्र साप्ताहिक ”उदंतमार्त्तंड” उदित हुआ। इसके संपादक, मुद्रक और प्रकाशक पं0 युगलकोशोर शुक्ल स्वयं एक सहृदय कवि एवं सुलेक्जक थे; अतः आरंभ से ही इस पत्र का रुझान लगभग अर्ध- साहित्यिक था।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी अपने ”हिन्दी साहित्य का इतिहास” (मुद्रण: सं0 1995) में इसे हिन्दी का पहला पत्र बताते हुए लिखते हैं ”उदंतमार्त्तांडके बाद काशी के ”सुधाकर” और आगरा के ”बुद्धिप्रकाश” आदि के प्रयासों से “अदालती भाषा उर्दू बनाई जाने पर भी, वुक्रम की 20वीं शताब्दी के आरंभ के पहले से ही (यानी सन् 1840-45ई0 के पहले से ही) हिन्दी खड़ी बोली गद्य की परंपरा हिन्दी साहित्य में अच्छी तरह चल पड़ी ; उसमें पुस्तकें छपने लगीं, अखबार निकलने लगे। कहना ना होगा कि इन अखबारों के अर्ध-साहित्यिक रूप से ही क्रमश: साहित्यिक प्तरकारिता का विकास हुआ।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इस पत्रकारिता, नवोदित गद्य-साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता का स्वरूप आरंभ से ही राजनीतिक और विचारधारात्मक रहा है। अर्थात उपनिवेशवाद- विरोधी और लोकोन्मुख भले ही उन पत्रकारों और लेखकों ने औपनिवेशिक विदेशी सत्ता, उसके कठोर सेंसरशिप और दमनकारी पेअशासन-तंत्र की आँखों में धूल झोंकते हुए कैसे भी संकेतात्मक, छद्म और प्रतीकवादी तरीके क्यों न अपनाएँ हो। हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के जनक भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र ने अपनी आँखों से सन् 1857 का ”गदर”, उसके असफल रहने पर उन प्रथम स्वाधीनता-संग्रामियों का निर्मम नरसंहार और सामान्य भारतवासियों का नृशंस दमन देखा था।

आचार्य शुक्ल 1857 के प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम से गद्य-साहित्य की परंपरा का संबंध जोड़ते हुए ”इतिहास” में लिखते हैं कि “गद्य-रचना की दृष्टि से ……… संवत 1914 (अर्थात 1857ई0) के बलवे (गदर) के पीछे ही हिन्दी गद्य-साहित्य की परंपरा अच्छी चली“ । इस तरह हम देखते हैं कि हिन्दी पत्रकारिता से ही साहित्यिक पत्रकारिता और गद्य साहित्य का विकास होता है और दूसरे, आरंभकाल से ही जुझारू गद्य-साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता का संबंध हमारे साम्राज्यवाद-विरोधी संग्राम से भी बड़ा प्रत्यक्ष और गहरा था

हिन्दी गद्य का निर्माण

डॉ0 नामवर सिंह इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि “पत्रकारिता को ही लें। सही है कि हिन्दी गद्य का निर्माण स्वाधीनता संग्राम के जुझारु और लड़ाकूपन के बीच हुआ। संघर्ष के हथियार के रूप में निस्संदेह, साहित्य के पहले उसका यह रूप हिन्दी पत्रकारिता, सबसे पहले और सबसे ज़्यादा भारतेन्दु की पत्रकारिता में प्रस्फुटित और विकसित हुआ था।

अशोक वाजपेयी के शब्दों में, “गद्य के निर्माण में पत्रकारिता का भी कुछ न कुछ हाथ होता है। पुराने जमाने से ही था, जो बहुत अच्छे गद्यकार थे ,वे बहुत अच्छे पत्रकार भी थे। इन्हीं तथ्यों को उजागर करते हुए डॅा0 रामविलास शर्मा बहुत पहले यह लिख चुके थे कि “भारतेन्दु से लेकर प्रेमचन्द तक हिन्दी साहित्य की परंपरा में यह बात ध्यान देने योग्य है कि सभी बड़े साहित्यकार पत्रकार भी थे। पत्रकारिता उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गई थी। यह पत्रकारिता एक सजग और लड़ाकू पत्रकारिता थी। प्रेमचंद भी “एक सफल संपादक थे और ”हंस” के ज़रिये उन्होंने साहित्यकारों की एक नई पीढ़ी को शिक्षित किया। कहना न होगा कि साहित्यिक पत्रकारिता की यह भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

भारतेन्दु और प्रेमचंद के अलावा यही बात पं0 महावीरप्रसाद द्विवेदी, निराला, मुक्तिबोध, यशपाल, हरिशंकर परसाई, नामवर सिंह और नंदकिशोर नवल के बारे में भी कही जा सकती है। साहित्य और पत्रकारिता के इन घनिष्‍ठ संबंधों की ओर संकेत करते हुए प्रो0 सूर्यप्रसाद दीक्षित लिखते हैं कि “हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में पत्रकारिता की अनन्य देन रही है। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से युग-प्रवृत्तियों का प्रवर्तन हुआ है, विभिन्न विचारधाराओं का उन्मेश हुआ है और विशिष्‍ट प्रतिबाओं की खोज हुई है। वस्तुतः साहित्य और पत्रकारिता परस्पर पूरक और पर्याय जैसे हैं। शायद इसीलिए लोग पत्रकारिता को ”जल्दी में लिखा हुआ साहित्य” और साहित्य को ”पत्रकारिता का श्रेष्‍ठतम रूप” भी कहते हैं। साहित्यिक पत्रकारिता के प्रसंग में तो यह मणि-काँचन-योग और भी प्रत्यक्ष है ।

एक रोचक घटना: संदर्भ यूरोप का — साहित्यिक पत्रकारिता का उदय

सेंट फॉक्स साहित्यिक पत्रकारिता के आरंभ का बड़ा दिलचस्प विवरण देते हुए बताते हैं कि रेनाडो नामक पेरिस के एक डॉक्टर अपने अस्पताल के रोगियों के मन-बहलाव के लिए अद्भुत घटनाओं, रोचक किस्सों, अलौकिक विवरणों और दिलचस्प खबरों को जमा करके बीमारों को पढ़ने देने लगे। डॉ रेनाडो का विशवास था कि ऐसे मनोरंजन से रोगियों को शांत और प्रसन्न रखा जा सकता है और उन्हें शीघ्र निरोग भी किया जा सकता है। कहना न होगा कि उन्हें इसमें आशातीत सफलता भी मिली।

इससे उत्साहित होकर, पेरिस प्रशासन की अनुमति से, रेनाडो ने 1632 ई0 से ऐसी सामग्री संकलित कर एक नियमित साप्ताहिक पत्रिका शुरु कर दी, जो आम लोगों में भी खासी लोकप्रिय हो गई। रेनाडो के अनुकरण पर पेरिस से ही सांसद डेनिस द” सैलो ने 1650ई0 में ”जर्नल द” सैवेंत्रास“ नामक एक साहित्यिक पत्र आरंभ किया। आइज़क डिज़रेज़ी के मतानुसार साहित्य और समालोचना की यही सबसे पहली पत्रिका है। ऐसी ही दूसरी पत्रिका 1684 में बेल ने निकाली इसका नाम “वावेत्स द“ ला रिपब्लिक द” लेटर्स“ था।

फॉअस के बाद इंग्लैंड से भी अनेक साहित्यिक पत्र निकलने लगे। इनमें डेनियल डेफो का ”द रिव्यू” पहला अंग्रेज़ी पत्र था, जिसके लिए उन्हें 1703 में जेल भी जाना पड़ा था। तत्पश्‍चात रिचर्ड स्टील का ”द टैटलर”, फिर स्टील और ऐडिसन द्वारा मार्च,1711 से मिलकर निकाला गया ”द स्पेक्टेटर” तथा साहित्य समालोचना की विख्यात पत्रिका ”द मंथली रिव्यूज़” के नाम विशेश उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त, “जेंटिलमेन्स मैगज़ीन”, ”द क्रिटिकल” तथा डॉ0 सैम्युल जॉनसन की दोनों सुप्रसिद्ध पत्रिकाओं ”द रैम्बलर” और ”द आइडलर“ का भी विशेश ऐतिहासिक महत्तव है। अंग्रेज़ी साहित्य के विकास में इनका अमूल्य योगदान माना जाता है

वस्तुतः फ्राँसीसी क्रांति के बाद 1749-50 से तो यूरोप के प्रायः सभी देशों से अनेक साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित और लोकप्रिय होने लगीं सयूरोपीय ”रेनाँसाँ” (पुनर्जागरण), मध्य वर्ग के उदय और जातीय चेतना (नैशनेल्टी की चेतना के बोध) के विकास से इस साहित्यिक पत्रकारिता की शुरुआत का सीधा संबंध था, ठीक वैसे ही, जैसे कि कालांतर में भारतीय भाषाओं में —-

विशेष रूप से हिन्दी में, साहित्यिक पत्रकारिता का गहरा संबंध नवोदित भारतीय मध्य वर्ग की उत्तरोत्तर क्रमश: होती हुई लोकतांत्रिक चेतना, जातीय नवोन्मेश और साम्राज्य-विरोधी राश्ट्रीय मुक्ति-संग्राम से भलीभाँति परिलक्षित किया जा सकता है।

संदर्भ

1) ”हिन्दी नवजागरण: बंगीय विरासत” (खंड दो), सं0 शम्भुनाथ और रामनिवास द्विवेदी ;

प्रकाशक: कोल इंडिया लि0, कलकत्ता (1993), पृष्‍ठ 919

2) उपर्युक्त, पृ0 905

3) उपर्युक्त, पृ0 919

4) उपर्युक्त, पृ0 920

5) उपर्युक्त।

6) उपर्युक्त।

7) उपर्युक्त, 907

8) उपर्युक्त, 911

9) ”समाचारपत्रों का इतिहास”, अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी ; ज्ञानमण्डल लि0, वाराणसी (द्वितीय सं0

1953), पृ0 33-34

10) ”हिन्दी साहित्य का इतिहास”, रामचन्द्र शुक्ल ; सं0 2005, प्रकाशन सण्स्थान, नयि दिल्ली, पृ0 309

11) उपर्युक्त, पृ0 312

12) उपर्युक्त, पृ0 307

13) ”पूर्वग्रह”,सं0 अशोक वाजपेयी, अंक 44-45 (मई-अगस्त,1981), नामवर सिंह

14) उपर्युक्त, पृ0 14

15) ”प्रेमचंद और उनका युग”, रामविलास शर्मा ; राजकमल प्रकाशन ;पृ0130

16) उपर्युक्त, पृ0159

17) ”हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता”, सं0 प्रो0 सूर्यप्रसाद दीक्षित , पृ0 3

18) यूरोप के उपरलिखित सभी विवरण, लखनऊ विश्‍वविद्यालय की ”जन-संचार एवं पत्रकारिता” के विशय कौ प्रथम पी0एच0डी0 डिग्री के षोध-प्रबंध (डॉ0ष्याम कष्यप) से लिए गए हैं।

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (2)

साहित्य में आधुनिक चेतना, स्वच्छंद आत्माभिव्यक्ति और व्यक्तिगत पाठक समुदाय के विकास के साथ ही साहित्यिक पत्रकारिता का उदय हुआ था। यूरोप ही नहीं, कुछ अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में, हिन्दी में कतिपय विलंब से यहाँ तक कि अपनी सहोदर उर्दू की तुलना में भी कुछ विलंब से इसका कारण यह था कि अन्य भारतीय भाषाओं और उर्दू की तुलना में हिन्दी में गद्य का विकास देर से हुआ था। भारतेन्दु युग से पहले तक कविता की भाषा ब्रजभाषा और गद्य की भाषा खड़ी बोली हिन्दी के इस प्रचलित विभाजन से भी हिन्दी गद्य के स्वाभाविक विकास में बाधा नज़र आती है, लेकिन एक बार उन्नीसवीं षताब्दी के उत्तरार्ध में गति पकड़ लेने के बाद, हिन्दी गद्य और प्रकारांतर से हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता ने अभी हिन्दी के अतिरिक्त दुनिया की किसी भी भाषा में कभी भी ऐसा विभाजन नहीं था और न ही उसे ”धर्म” से जोड़ने की अवैज्ञानिक सोच अपने तीव्र विकास में सबको पीछे छोड़ दिया और वह उत्तरोत्तर प्रगति-पथ पर अग्रसित हो गई। शीग्र ही हम हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता को आधुनिक साहित्य के सर्जनात्मक विकास में प्रेरक भूमिका निभाते हुए देखते हैं।

यहाँ इस महत्वपूर्ण तथ्य को भी दृष्टिगत रखना चाहिए कि इस आधुनिक साहित्य और उसकी विविध विधाओं को लोकप्रिय बनाते हुए सामान्य पाठकों और जनसाधारण तक संप्रेशित करने में साहित्यिक पत्रकारिता की लगभग केंद्रीय भूमिका है, लोग एकदम ही साहित्यिक गद्य-विधाओं, विशेष रूप से ब्रजभाषा की तुलना में खड़ी बोली हिन्दी की आधुनिक कविता के पाठक नहीं बन गए थे, खास तौर से मुक्त-छंद और छंद-मुक्त कविता के, किताबों से पहले जनसाधारण, खासकर मध्यम वर्ग के पढ़े-लिखे लोग, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के नियमित पाठक बने थे ; जैसे कि उपन्यासों के पाठक बनने से पहले वे साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले छोटे-छोटे निबंधों, एकांकी नाटकों, प्रहसनों, टिप्पणियों,राजनीतिक व्यग्य-स्तंभों और छोटी कहानियों के नियमित पाठक बने थे स यह अनायास ही नहीं है कि राल्फ फाक्स उपन्यास को बुर्जुआ समाज में ”मध्य वर्ग का महाकाव्य” कहते हैं। इसकी शुरुआत, जैसा कि पहले भी संकेत किया जा चुका है, उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक (”उदंतमार्तंड ;1826ई0) में हो चुकी थी।

भारतेन्दु पूर्व की अर्ध-साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं से उभरने वाली रचनाओं ने खबरों के प्रति उत्सुकता के साथ ही, लोगों में मनोरंजक और साहित्यिक रूझान वाली रचनाओं में भी रुचि जाग्रत करने में बड़ी भूमिका निभायी थी। भारतेन्दु-युग की श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रकारिता ने लोगों की रुचि पढ़ने की ओलृ अधिकाधिक मोड़ते हुए उन्हें हिन्दी साहित्य के जागरूक पाठक बनाया, लोगों ने गंभीर साहित्य पढ़ने की आदत डाल ली, उन्हें टीका-टिप्पणी करने की ओर प्रेरित करके सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से जागरूक बनाया।

साहित्य और पत्रकारिता

साहित्यिक पत्रकारिता और साहित्य की लोकरंजनकारी भूमिका के कारण हि सामान्य पत्र-पत्रिकाएँ भी साहित्यिक विषयों को बराबर स्थान देती थीं। बीसवीं शतब्दी के उत्तरार्ध में भूमंडलीकरण के दौर की शुरुआत से, खास तौर से 1995 के बाद से निजी टेलीविज़न चैनलों और चौबिसों घंटे के न्यूज़ चैनलों के विस्फोट और फलस्वरूप हिन्दी के दैनिक अखबारों द्वारा भी, उनकी रंगारंग अंधी दौड़ की फूहड़ नकल की प्रवृत्ति ने ज़रूर आज यह स्थिति बदल दी है, जिस पर हम आगे यथावसर चर्चा करेंगे स यहाँ यह समझने की आवश्‍यकता है कि अपने आरंभकाल से ही साहित्य और पत्रकारिता का चोली-दामन का संबंध रहा है।

पत्रकारिता का साहित्य के साथ अपने जन्मकाल से बहुत गहरा संबंध बताते हुए राकेश वत्स लिखते हैं कि मानव-यात्रा के “इसी पड़ाव पर (यानी मध्य-वर्गीय लोकतांत्रिक आंदोलनों, राजनीतिक और विचारधारात्मक विकास के पड़ाव पर) आकार साहित्य के संबल की ज़रुरत महसूस हुई स चूँकि पत्र-पत्रिकाएँ ही उसे पाठकों के उस वर्ग तक पहुँचा सकती थीं, ……. पत्रकारिता ने उसकी इस ज़रूरत को पूरा किया। वे आगे बताते हैं कि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ तो मूलतः साहित्य के प्रति समर्पित होती ही हैं, बल्कि शायद ही कोई ऐसा पत्र या पत्रिका होगी जिसमें किसी न किसी रूप में साहित्य के लिए स्थान सुरक्षित नहीं किया जाता होगा। यानी, कविता, कहानी, गज़ल, गीत, निबंध, नाटक, एकांकी, संस्मरण, यात्रा-वृतांत, शब्दचित्र, रोपोर्ताज़, पुस्तक समीक्षा, आलोचना, उपन्यास- सभी कुछ प्रायः सभी पत्र-पत्रिकाओं में छपता रहा है। उनका रूप और आकार भले भिन्न-भिन्न रहा हो।

जिन गैर साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का गंभीर साहित्य की ओर रूझान नहीं था, वे भी, खासकर दैनिक और साप्ताहिक या पाक्षिक अखबार और पत्रिकाएँ भी ”फिलर” के रूप में लघु-कथाएँ, क्षणिकाएँ और व्यंग्य के नाम पर चुटकुलेबाजी, यानी ”साहित्य” के नाम पर रची जाने वाली सारी सामग्री धड़ल्ले से छापते रहे हैं। यहाँ तक कि फिल्मी समाचार पत्र-पत्रिकाएँ भी इन सबको नज़रंदाज़ नहीं करतीं थीं। कहना न होगा कि साहित्य के नाम पर छपने वाला बड़े पैमाने का यह सारा कूड़ा और स्तरहीन रचनाओं का अंबार श्रेष्‍ठ साहित्य तथा स्तरीय और प्रभावि रचनाओं का स्थान नहीं ले सकता, क्योंकि हर छपा हुआ शब्द साहित्य नहीं होता! फिर भी इससे एक माहौल बनता है, एक वातावरण निर्मित होता है। इससे साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता की लोकप्रियता का विस्तार होता है। लोगों में कम-से-कम पढ़ने की ललक और पाठकीय संस्कृति विकसित होती है। लोगों में साहित्य पढ़ने की आदत पड़ती है।

साहित्यिक पत्रकारिता और ”मास-लिटरेचर” यह समझ लीजिए कि स्वयं श्रेष्‍ठ साहित्य न होते हुए भी ऐसी स्तरहीन रचनाओं का ढेर श्रेष्‍ठ रचनाओं के लिए खाद बनता है। ऐसा साहित्य खुद निकृष्‍ठ होते हुए भी पाठक-संस्कृति और साहित्यिक पत्रकारिता के विकास को गति प्रदान करता है। इसी श्रेणी में आप सस्ते और भावुकतापूर्ण रोमैंटिक उपन्यास तथा तिलिस्मी-ऐयारी और जासूसी उपन्यासों को भी शामिल कर सकते है। आचार्य शुक्ल भी इसी तथ्य को अपने ”हिन्दी साहित्य इतिहास” में रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि, “हिन्दी साहित्य के इतिहास में बाबू देवकीनंदन (खत्री) का स्मरण इस बात के लिए सदा बना रहेगा कि जितने पाठक उन्होंने उत्पन्न किए उतने और किसी ग्रंथकार ने नहीं ”चंद्रकांता” पढ़ने के लिए न जाने कितने उर्दू जीवी लोगों ने हिन्दी सीखी ”चंद्रकांता” पढ़कर वे हिन्दी की और प्रकार की साहित्यिक पुसतकें भी पढ़ चले और अभ्यास हो जाने पर कुछ लिखने भी लगे इसीलिए प्रायः पत्र-पत्रिकाएँ धारावाहिक रूप से उपन्यास और ऐसी कहानियाँ बराबर छापते हैं। इस किस्म के साहित्य को ”मास-लिटरेचर” कहा जाता है और यूरोप तथा अमरीका के समाजशास्त्रियों ने इसकी उपयोगिता और लोकप्रियता पर अनेक दिलचस्प अध्ययन किए हैं।

पहले ”धर्मयुग”, ”साप्ताहिक हिन्दुस्तान”, ”कादंबिनी” और ”सारिका” या विभिन्न दैनिक और साप्ताहिक समाचारपत्रों के रविवारीय पृष्‍ठों में छपने वाली चालू और स्तरहीन रचनाओं तथा ”इंडिया टुडे” (हिन्दी)- जैसी समाचार पत्रिकाओं में छपने वाली बाज़ारू रचनाओं के नियमित पाठक ही, उनकी चेतना में धीरे-धीरे विकास और साहित्यिक रुचि के क्रमषः परिश्कार के अबाद ”कल्पना”, ”प्रतीक”, ”कवि”, ”कृति”, ”कहानी”, ”नई कहानियाँ”, ”लहर”, ”पहल”,”धरातल”, ” आलोचना”,”कथा”, ”समारम्भ”, ”पूर्वग्रह”, ”कसौटी”, ” बहुवचन”, ”समस”, और ”पुस्तकवार्ता” जैसी श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं के पाठक भी बनते हैं। कहना न होगा कि इस विशाल पाठक-समुदाय की चेतना में यह विकास और उनकी साघित्यिक रुचि में परिश्कार भी ऐसी साहित्यिक पत्रिकाओं के पठन-पाठन से ही आता है। यहाँ एक विशेश बात यह भी स्मरणीय है कि ”हिन्दी साहित्य का इतिहास” इन श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं में से ही उभरकर सामने आता है। साहित्यिक पत्रकारिता की इस संदर्भ में ऐसी ही द्वंद्वात्मक भूमिका होती है।

साहित्यिक रचनाओं का मूल्यांकन

ध्यान रहे कि साहित्यिक पत्रकारिता, रुचि का यह परिश्कार कृतियों, रचनाओं और रचनाकारों के मूल्यांकन के माध्यम से ही करती है स इस प्रकार साहित्यिक पत्रकारिता रचनाओं का स्तर निर्धारित करते हुए, अच्छी और श्रेष्‍ठ रचनाओं को स्तरहीन बाज़ारू रचनाओं के भारी-भरकम कूड़े से अलगाती है। वास्तव में, यह छँटा हुआ श्रेणीकरण के बाद साहित्य का भावी इतिहास बनता है।

शॅापेन हॉवर ने साहित्यिक पत्रकारिता की इस अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “साहित्यिक पत्रों का कर्त्तव्य है कि वे युग की युक्तिहीन और निरर्थक रचनाओं की बाढ़ के विरुद्ध मज़बूत बाँध का काम करें। … यों कहें कि नब्बे फीसदी रचनाओं पर निर्दयतापूर्वक प्रहार करने की ज़रूरत है। साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ तभी अपने कर्त्तव्य का पालन कर सकेंगे। इसी प्रसंग में वे आगे लिखते हैं कि,“ अगर एक भी ऐसा पत्र है, जो उपर्युक्त आदर्शों का पालन करता हो, तो उसके डर के मारे प्रत्येक अयोग्य लेखक, हरेक बौड़म कवि, प्रत्येक साहित्यिक चोर, हरेक अयोग्य पद-लोभी, प्रत्येक छंद दार्शनिक और हरेक मिथ्याभिमानी तुक्कड़ काँपेगा ; क्योंकि उसे इस बात का डर रहेगा कि छपने के बाद उसकी घटिया रचना खरी आलोचना की कसौटी पर ज़रूर कसी जाएगी और उपहासास्पद सिद्ध होगी। शॅापन हॉवर की यह मान्यता है निकीक इससे घटिया लेखकों को, जिनकी उँगलियों में लिखने की खुजली उठती है, लकवा मार जाएगा। इससे साहित्य का बड़ा हित होगा, क्योंकि साहुत्य में जो चीज़ बुरी है, वह केवल निरर्थक ही नहीं, बल्कि सचमुच बड़ी हानिकारक भी है, कहना न होगा कि हिन्दी की श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं और हमारे श्रेष्‍ठ समालोचकों ने ठीक यही भूमिका निभाई है।

साहित्य का इतिहास और पत्रकारिता इस प्रकार, साहित्यिक पत्रकारिता, जो आज साहित्य के इतिहास की स्रोत-सामग्री और कल का साहित्येतिहास है, दृढ़तापूर्वक अच्छी और बुरी रचनाओं, प्रवृत्तियों तथा साहित्यिक आंदोलनों के बीच निर्णायक फर्क दिखाकर साहित्य के इतिहास के निर्माण में भी अपनी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, साहित्यिक पत्रकारिता, इस तरह, स्तरहीन रचनाओं से स्तरीय और अप्रासंगिक कृतियों से प्रासंगिक लेखन को अलग करती है।

वस्तुतः युग-विशेश की साहित्यिक पत्रकारिता से ही उस युग के साहित्यिक आंदोलनों, बहस-मुबाहिसों, साहित्यिक समस्याओं, प्रश्‍नों और चुनौतियों तथा इन सबके फलस्वरूप उस युग की नई-से-नई साहित्यिक प्रवृत्तियों के उभरने, उनके क्रमश: विकास तथा विभिन्न साहित्यिक प्रवृत्तियों के आपसी अंतर्विरोधों और अंतर्द्वंद्वों का भी अंतरंग परिचय हम पा सकते हैं। यह युग-विशेश की साहित्यिक पत्रकारिता ही है, जो हमारे समक्ष उस युग-विशेश का भरा-पूरा और कलात्मक प्रतिबिंब प्रस्तुत करती है। इससे हमें अपनी समकालीन समस्याओं और चुनौतियों को समझने में मदद मिलती है तथा भविष्‍य के सर्जनात्मक संघर्षों का परिप्रेक्ष्य भी।

संदर्भ:–

1) ”उपन्यास और लोकजीवन”, राल्फ फाक्स ; पीपीएच, नई दिल्ली, पृ0 31

2) ”जनसंचार”, (सं0) राधेष्याम शर्मा ; राकेश वत्स का लेख ; हरियाणा साहित्य अकादमी, पृ0 201

3) उपर्युक्त , पृ0 205-06

4) उपर्युक्त, पृ0 206

5) ”हिन्दी साहित्य का इतिहास”, रामचन्द्र शुक्ल ; प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली, प्र0 356-57

6) ”हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता”, शीर्षक लखनऊ विश्‍वविद्यालय की जन-संचार एवं पत्रकारिता

विषय की प्रथम पी-एच0डी0 डिग्री के शोध-प्रबंध (प्रो0 श्‍याम कश्‍यप) से।

7) उपर्युक्त

8) उपर्युक्त

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हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (3)

साहित्यिक पत्रकारिता का सामान्य पत्रकारिता से अंतर और उसका विशिष्‍ट स्वरूप अब तक कुछ उभर आया होगा। समाचारपत्र (या समाचार पत्रिकाएँ) जहाँ सूचना पर बल देते हुए सामान्य ज्ञान प्रेषित करते हैं, वहीं साहित्यिक पत्रकारिता का उद्देष्य सांस्कृतिक चेतना और परिवेश में परिश्कार लाते हुए पाठक को विषिश्ट ज्ञान प्रशिष्‍ट करना होता है। इसलिए इस क्षेत्र में प्रशिष्‍ट साहित्य-विवेक और विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सूक्ष्म एवं अंतरंग परिचय की आवश्‍यकता होती है। साहित्य और पत्रकारिता का अंतर रेखांकित करते हुए नेमिशरण मित्तल बताते हैं कि, “साहित्य का मूल लक्षण उसका शास्वत स्वरूप तथा चिरंतन तत्व है, किन्तु पत्रकारिता तात्कालिकता, सामयिकता और क्षणभंगुरता के आयामों में कैद होती है, वैसे तो साहित्य में भी सरसता और सुबोधता पर बल दिया जाता है, लेकिन उसके प्रशिष्‍ट काला-चरित्र के कारण जटिलता तथा दुर्बोधता और अनेकार्थकता को भी दुर्गुण नहीं माना जाता, साहित्यिक पत्रकारिता की भाषा शैली पर इसका कुछ-न-कुछ असर तो पड़ता ही है।

सामान्य पत्रकारिता जहाँ लोकमत के निर्माण और उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम होती है, वहीं साहित्यिक पत्रकारिता लोकरंजन, लोक-शिक्षण और जनरुचि के परिश्कार का प्रयास करती है स इसीलिए उसका स्वरूप वैचारिक, संवेदनात्मक और मनोरंजनपरक होता है, लेकिन यहाँ ”संवेदनात्मक” का अर्थ तथाकथित ”शुद्ध साहित्य” के झंडावरदारों की समाज-निरपेक्ष और विचारधारा से परहेज प्रचारित करने वाली कृत्रिम और रहस्यात्मक संवेदना से नहीं है। इसी तरह ”मनोरंजन” का अर्थ व्यावसायिक और बाजारू पत्रिकाओं के फूहड़ और विकृतिपूर्ण समाज-विरोधी और सस्ते मनोरंजन से नहीं है। कहना न होगा कि साहित्यिक पत्रकारिता का उद्देश्‍य मुक्तिबोध की ”ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान” की अवधारणा को अपना आदर्श मान कर चलना चाहिए स श्रेष्‍ठ-साहित्य के आदर्शों और उद्देश्‍यों से भिन्न आदर्श और उद्देश्‍य साहित्यिक पत्रकारिता के हो ही नहीं सकते। दोनों एक न होते हुए भी अन्योन्याश्रित हैं।

साहित्यिक पत्रकारिता का चरित्र स्वरूप

साहित्यिक पत्रकारिता के चरित्र-निरूपण और उसके प्रशिष्‍ट स्वरूप पर विचार करेत हुए हमें गंभीर साहित्यिक पत्रिकाओं को फिल्म, संगीत, राजनीति और धर्म आदि की तरह ”साहित्य” का भी धंधा करने वाली व्यावसायिक पत्रिकाओं से अलगाकर देखना चाहिए। यह अंतर आज़ादी के पहले से रहा है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि ऐसा अंतर साहित्यिक पत्रकारिता के जन्म के समय से ही रहा है। शुरु से ही साहित्यिक पत्रिकाएँ सदैव सत्ता-तंत्र और व्यवसाय-तंत्र से जुड़ी या उनकी हितपोशक प्रतिष्‍ठानी और सेठाश्रित पत्रिकाओं से अलग, बल्कि विरोधी रही हैं, भले ही इस विरोध तथा प्रतिरोध की शैली उसका स्वरूप कितना ही भिन्न-भिन्न क्यों न हो।

यह अंतर ”उदंतमार्तंड”. ”सुधाकर”, ”प्रजाहितैशी” या ”पयाम-ए-आज़ादी” का ”बनारस अखबार” जैसे पत्रों से साफ झलकता है। यह अंतर भारतेन्दु की ”कविवचनसुधा” और धड़फले के हाथ में जाने के बाद की स्तरहीन और पतित ”कविवचनसुधा” में और भी प्रत्यक्ष है। यह अंतर ”सरस्वती” (महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन-काल की), ”माधुरी”, ”मतवाला”, ”सुधा”, ”चाँद”, ”हंस”(प्रेमचंद के संपादन-काल से लेकर अमृत राय-रामविलास शर्मा-शिवदानसिंह चौहान के प्रगतिवादी-काल तक का), ”विप्लव”, ”नय साहित्य”, ”रूपाभ” सहित ऐसी ही अनेक छोटी-बड़ी साहित्यिक पत्रिकाओं तथा बाजारू और व्यावसायिक पत्रिकाओं के बीच सदैव रहा है। कहना न होगा कि हमारा ” हिन्दी साहित्य का इतिहास” इन महत्वपूर्ण पत्रिकाओं से ही अस्तित्व में आया है।

आज़ादी के बाद यह अंतर ”कल्पना”, (बदरी विशाल पित्ती एवं अन्य), ”समालोचक” (रामविलास शर्मा), ”प्रतीक” (अज्ञेय), ”नया पथ” (यशपाल एवं अन्य), ”कृति” (श्रीकांत वर्मा), ”आलोचना” (नामवर सिंह), ”वसुधा” (हरिशंकर परसाई), ”कहानी” (श्रीपत राय), ”लहर” (प्रकाश जैन और मनमोहिनी) और ”नई कहानियाँ” (कमलेश्‍वर, फिर भीष्‍म साहनी) जैसी श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं तथा व्यावसायिक घरानों की प्रतिष्‍ठानी और सेठाश्रयी पत्रिकाओं –”धर्मयुग”, ”साप्ताहिक हिन्दुस्तान”, ”ज्ञानोदय”, ”सारिका”, ”निहारिका” और ”कादम्बिनी” आदि के बीच बड़ा स्पष्‍ट रहा है। यह अंतर सारी दुनिया में और विश्‍व की प्रायः अभी भाषाओं की साहित्यिक पत्रिकाओं और राजसत्ता (भले ही उसे ”जनसत्ता” का झूठा नाम दें) या धनसत्ता की होतपोशक प्रतिष्‍ठानी पत्रिकाओं में रहा है। इस अंतर के कारण ही दुनिया-भर में साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में ”लघुपत्रिका” या ” लिटिल मैगज़ीन” आंदोलन होते रहे हैं।

लघु-पत्रिका आंदोलन

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के संदर्भ में जब उपर्युक्त अंतर और फलस्वरूप विचारधारात्मक संघर्ष बहुत तीव्र हो गया तो सन् 60 के बाद साहित्यिक और व्यावसायिक पत्रिकाएँ एक-दूसरे के विरुद्ध एक बड़ी लड़ाई में भिड़ गईं, यह लड़ाई कमोबेश आज भी जारी है, इस सातवें दशक के मध्य में ही हिन्दी में ”लघु-पत्रिका” आंदोलन के रूप में ऐसा जबर्दस्त साहित्यिक विस्फोट हुआ कि सेठाश्रयी और व्यावसायिक प्रतिष्‍ठानी पत्र-पत्रिकाओं का पूरी तरह भट्ठा बैठ गया। उनमें श्रेष्‍ठ रचनाओं और श्रेष्‍ठ साहित्यकारों का टोटा पड़ गया।

हिन्दी के युवा और युवतर लेखकों-कवियों और आलोचकों ने इन पत्रिकाओं के खिलाफ सफल्क और ज़ोरदार ”बहिष्‍कार” अभियान चलाया, यहाँ तक कि प्रतिष्ठित बुजुर्ग कवि-लेखक भी इन पत्रिकाओं में छपने से हिचकिचाने लगे, इनमें छपने वाले लेखक साहित्यिक मान्यता और साहित्यिक प्रतिष्‍ठा के लिए तरसते रह गए, जो प्रतिष्ठित और लोकप्रिय लेखक इनमें छपता था, उसे पूरे साहित्य-जगत का विरोध और बहिष्‍कार झेलना पड़ता था।

हिन्दी का यह लघु-पत्रिका आंदोलन इतना लोकप्रिय और प्रभावी सिद्ध हुआ कि प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में साहित्यिक लघु-पत्रिकाओं का ज्वार आ गया। स्मरणीय है कि ऐसे ही विचारधारात्मक और सर्जनात्मक संघर्ष में से ही यूरोप में ”प्रोटेस्ट मूवमेंट” उभरकर सामने आए थे तथा विश्‍व-भर में छा गए थे, हिन्दी में उभरा यह ”लघु-पत्रिका आंदोलन” अब तो एक तरह से साहित्येतिहास और साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास का भी अंग बन चुका है। कालांतर में साहित्यिक पत्रिकाओं के च्वरूप में भारी परिवर्तनों के बाद भी उनके लिए ”लघु-पत्रिका” या ”अव्याओकर लोक-प्रचलितवसायिक” पत्रिका नाम ही सर्वमान्य और रूढ़ होकर लोक-प्रचलित हो चुका है। वास्तव में, ऐसी पत्रिकाएँ ही साहित्यिक पत्रिकाएँ हैं, मानी जाती हैं।

नया दौर: ”वाम वाम वरम दिशा …….”

सन् साठ के बाद एक जबर्दस्त आंदोलन की तरह आरंभ हुआ लघु-पत्रिकाओं का यह अभियान अनेक उतार-चढ़ावों के बाद, सत्तर और अस्सी के दशकों में प्रगतिशील और वामपंथी रुख अख्तियार कर लेता है। इसकी परिणति इस रूप में होती है कि एक ओर जहाँ उपर्युक्त प्रतिष्‍ठानी पत्रिकाएँ या तो बंद हो जाती हैं अथवा अप्रासंगिक होकर अपना प्रभाव खो देती हैं, वहीं ” आलोचना” (नामवर सिंह एवं नंद किशोर नवल) के अलावा ”पहल” (ज्ञानरंजन), ”लहर” (प्रकाश जैन और मनमोहिनी), ”प्रगतिशील वसुधा” (कमला प्रसाद), ”उत्तरार्ध” (सव्यसाची), ”कथा” (मार्कण्डेय), ”कलम” (चंद्रबली सिंह), ” ओर” (विजेन्द्र्), ”क्यों” (मोहन श्रोत्रिय और स्वयं प्रकाश),” आरम्भ” (नरेश सक्सेना और विनोद भारद्वाज),”धरातल” (नंदकिशोर नवल), ”कथा” (मार्कण्डेय), ”समासम्भ” (भैरवप्रसाद गुप्त),”इसलिए” (राजेश जोशी) और ”कसौटी” (नंदकिशोर नवल)– जैसी श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाएँ अपने दौर की साहित्यिक पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व करती हैं। कुछ पुरानी और प्रतिष्ठित लघु-पत्रिकाएँ तथा कई नई पत्रिकाएँ चंद अविस्मरणीय विशेषांक प्रकाशित कर धीरे-धीरे पृष्‍ठभूमि में चली गईं।

दैनिक समाचारपत्रों में साहित्यिक पत्रकारिता

प्रायः सभी दैनिक, पाक्षिक और साप्ताहिक अखबारों में हमें छिट-पुट साहित्यिक रूझान उनके रविवारीय संसकारणों में तो दिखता है, लेकिन इस क्षेत्र में उनका कोई महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय योगदान नहीं दिखता, अपवाद स्वरूप, प्रमुख प्रगतिशील दैनिक ”जनयुग” में न केवल यह साहित्यिक-विचारधारात्मक रूझान स्पशष्‍ट नज़र आता है, बल्कि उसका रविवारीय परिशिष्‍ट मुख्यतः साहित्य को ही समर्पित होता था, कुल चार पृष्‍ठों के इस परिषिष्‍ट में एक विचारधारत्मक अग्रलेख और छोटे से बच्चों के कोने के अलावा शेष प्रायः तीन-साढ़े तीन पृष्‍ठ साहित्य को ही समर्पित होते थे।

”जनसत्ता” ने भी अपने रविवारीय परिषिश्ट में इस परंपरा का मंगलेश डबराल के संपादन में निर्वाह किया। इसीतरह जब तक राजेंद्र माथुर रहे ”नवभारत टाइम्स” ने भी कुछ स्थान साहित्यिक पत्रकारिता के लिए दिया। लेकिन कालांतर में इस श्रेष्‍ठ परंपरा का अवसान हो गाया, नब्बे के दशक के मध्य तक भूमंडलीकरण की आँधी में साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता के पैर उखड़ने लगे स धीरे-धीरे आज हम एक ऐसे विचार-शून्य — या कहें प्रायोजित मीडिया के प्रायोजित विचारों में डूबते -उतराते अपढ़ समाज और सांस्कृतिक-शून्‍यता की ओर बह रहे हैं, एक ऐसा समाज जहाँ उपभोक्तावाद के दलदल की ओर ढकेलती अपसंस्कृति की गहरी ढलान है।

अंतिम उल्लेखनीय प्रयास

इस स्थिति से निकलने की कोशिश में देश भर के उत्तर भारत के हिन्दीभाषी, प्रमुख साहित्यकारों-संपादकों की 29-30 अगस्त,1992 को कलकत्ता में साहित्यिक लघु-पत्रिकाओं की पहली राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी हुई। इसी कड़ी में 14-15 मई, 1991 को जमशेदपुर में राष्‍ट्रीय समन्वय समिति गठित की गई। लेकिन साहित्यिक पत्रकारिता को पुनः उसके श्रेष्‍ठ और उच्चतर धरातलों पर प्रतिष्ठित कर पाने के सभी प्रयास आशातीत रूप में फलप्रद नहीं हो पाए।

मुख्य बात यह है कि ये सभी साहित्यिक पत्रिकाएँ अपने कलेवर, आकार और साज-सज्जा में भले ही ”लघु” पत्रिकाएँ थीं, अपने प्रभावी साहित्यिक मूल्यांकन, श्रेष्‍ठ रचनाओं के प्रकाशन और प्रतिभाशाली नए लेखकों की नई से नई पीढ़ियाँ तैयार करके उन्हें प्रशिक्षित करने की दृष्टि से बिल्कुल भी लघु या छोटी नहीं कही जा सकतीं स ये अपनी अंतर्वस्तु (कन्टेन्ट) और वैचारिक प्रतिबद्धता की दृष्टि से निस्संदेह बड़ी- बहुत बड़ी पत्रिकाएँ ही कही जाएँगी। अपने युग की प्रतिनिधि और भावी साहित्येतिहास का कच्चा माल, एक तरह से साहित्य रचना और मूल्यांकन के प्रशिक्षण के संस्थान, विश्‍वविद्यालय !!

वास्तव में, ये सभी पत्र-पत्रिकाएँ सत्ता-तंत्र और व्यवसाय-तंत्र की तथाकथित ”बड़ी” और रंगीन, सेठाश्रयी, बाजारू पत्रिकाओं से भिन्न, यथार्थ में साहित्यिक पत्रिकाएँ हैं, चाहे इन्हक पत्रिकाएँ ”गैर-व्यावसायिक पत्रिकाएँ” कहा जाए या ”प्रतिष्‍ठान-विरोधी” और ”श्रमजीवा पत्रिकाएँ” कहा जाए अथवा लोक-प्रचलित ”लघु-पत्रिकाएँ” , साहित्यिक पत्रकारिता के श्रेष्‍ठ और सच्चे प्रतिमान हमें इन्हीं पत्र-पत्रिकाओं में दृष्टिगोचर होते हैं।

संदर्भ:-

1) ”पत्रकारिता और संपादन कला”, (सं0 डॉ0 रामप्रकाश) में नेमिशरण का लेख, पृ0 116

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (4)

अब तक के विवेचन से यह तो स्पष्‍ट हो ही जाता है कि साहित्यिक पत्रकारिता मात्र तकनीक नहीं, बल्कि भाषिक और विचारधारात्मक चेतना भी है। भाषिक संवेदना और वैचारिक चेतना के साथ ही वह साहित्य और अन्य ललित कलाओं की तरह खुद भी एक सर्जनात्मक और कलात्मक रूप है।

कला भी और विज्ञान भी

जैसा कि ऊपर कहा गया है, साहित्यिक पत्रकारिता एक कला है— एक ऐसी कला जो अपने सर्वोच्च स्तरों पर सर्जनात्मक साहित्य से होड़ करती है। कह सकते हैं कि कला और सर्जनात्मक संगठन का समन्वित प्रयास लेखक अगर लिख कर सृजन करता है, तो एक श्रेष्‍ट साहित्यिक पत्रकार अपनी संगठनात्मक क्षमता, संपादन सामर्थ्य और वस्तुनिष्‍ट आलोचनात्मक विवेक से साहित्य को कलात्मक गतिशील रूप, नवोन्मेश की चेतना और लोकोन्मुख प्रगतिशील दिशा दे सकता है। कहना न होगा कि इन कलात्मक और संगठनात्मक साहित्यिक प्रयासों को भी व्यापक अर्थ में सर्जनात्मक ही कहा जाएगा।

इस दृष्टि से देखें तो भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, निराला, रामविलास शर्मा, यशपाल, हरिशंकर पएासाई और नामवर सिंह की साहित्यिक पत्रकारिता किस लेखक के सर्जनात्मक और कलात्मक प्रयासों से कम है, इसीलिए, और ठीक इन्हीं अर्थों में, श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रकारिता एक विज्ञान भी है। कहना न होगा कि अपने खास अर्थों में आज के संचार क्रांति के उत्तर-औद्योगिक परिदृश्‍य में साहित्यिक पत्रकारिता भी— सामाजिक चेतना को एक सुनिश्चित रूप एवं दिशा देने में तथा साथ ही लोकमत की सूक्ष्म प्रक्रिया को प्रभावित करने में अपना विशेष योगदान देती है। सामान्य पत्रकारिता की तुलना में साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता की यह भूमिका, प्रक्रिया के स्तर पर, अधिक जटिल एवं सूक्ष्म तथा प्रभाव की दृष्टि से अधिक स्थायी किन्तु लगभग अदृश्‍य होती है। साहित्यिक पत्रकारिता लोकमत-निर्माण और लोक-शिक्षण का कार्य भी परोक्ष ढंग से करती है। इस प्रकार वह समाज की विचार-चेतना के विकास में और व्यापक सांस्कृतिक एवं सामाजिक जनरुचि के परिश्कार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है स वह भी संचार-क्रांति की कार्य प्रणाली और नियमों – अवधारणाओं का कमोबेश अनुसरण करती है।

एक सामान्य पत्रकार और संपादक की तरह साहित्यिक पत्रकार और संपादक को भी आज की अधुनातन प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी, कलात्मक रूप-सज्जा और मूल्यांकन में वैज्ञानिक वस्तुपरकता का अभ्यस्ज्ञान की जात तथा विज्ञान की जानकारी से लैस होना चाहिए। एक कुशल साहित्य संपादक और साहित्यिक पत्रकार के पास वैज्ञानिक की वस्तुनिष्‍ठता और सर्जक कलाकार की अंतष्चेतना, दोनों का होना लगभग अनिवार्य है।

साहित्यिक पत्रकारिता के विविध रूप और भेद

साहित्यिक पत्रकारिता के इस स्वरूप-विस्लेशण और चरित्र-निरुपण के बाद, उसके उन प्रमुख भेदों पर भी विचार करना प्रासंगिक होगा जिनके आधार पर हम उसकी विभिन्न शाखाओं अथवा अलग- अलग क्षेत्रों के आधार पर उसका विभाजन इस प्रकार किया जा सकता है —-

1) प्रस्तुतिकरण के आधार पर ;(2) अवधिपरक विभाजन ; (3) विधापरक विभाजन ; (4) भाषिक आधार पर ; (5) प्रकाशकीय आधार पर ; तथा (6) विचारधारापरक विभाजन

1)प्रस्तुतिकरण के आधार पर विभाजन

यह सुज्ञात है कि आज समूची पत्रकारिता का विभाजन प्रस्तुति के आधार पर, दो अलग- अलग सर्वथा स्वतंत्र क्षेत्रों में हो चुका है: (क) प्रिंट मीडिया ; और (ख) इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। इसी तरह, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी, इसी आधार पर तीन भिन्न क्षेत्रों में सक्रिय है: (क) रेडियो (ख) टेलीविज़न और वेब-मीडिया (न्यू-मीडिया)। समग्र जनसंचार और पत्रकारिता का ही एक अभिन्न अंग होने के कारण साहित्यिक पत्रकारिता का भी प्रस्तुतिकरण के आधार पर इन स्वतंत्र क्षेत्रों में विभाजन किया जा सकता है। इन क्षेत्रों में प्रस्तुत की जाने वाली श्रव्य ( ऑडियो) और दृश्‍य-श्रव्य (ऑडियो- विज़ुअल) साहित्यिक सामग्री साहित्यिक पत्रकारिता है।

इनके अंतर्गत विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। पहले यह सामग्री पत्र-पत्रिकाओं में छपती थी ; अब रचना पाठ और पुस्तक समीक्षा से लेकर साहित्यिक सभा-सम्मेलनों की रपटें, साहित्यकारों के बीच वाद-विवाद या संवाद और बहस या विमर्ष तहा प्रतिष्ठित बड़े लेखकों से साक्षात्कार, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर कार्यक्रम आदि रेडियो, टेलीविज़न और इंटरनेट पर प्रसारित होते हैं। यू-ट्यूब आदि पर स्थायी रूप से भी उपलब्ध रहते हैं।

2) अवधिपरक विभाजन:

इसी तरह साहित्यिक पत्रकारिता का अवधिपरक विभाजन भी किया जा सकता है। दैनिक और साप्ताहिक समाचारपत्रों के विपरीत साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रायः मासिक, द्विमासिक, त्रैमासिक और कभी छमाही या सालाना संकलनों के रूप में ही होती हैं। साप्ताहिक ”मतवाला”- जैसे कुछ अपवाद भी होते हैं, जैसे कि पहले दैनिक ”जनयुग” और अब ”जनसत्ता” के साप्ताहिक साहित्यिक परिशिष्‍टों के रूप में दैनिक अखबारों में भी हमें अपवाद-स्वरूप गंभीर साहित्यिक पत्रकारिता के दर्शन होते हैं। अवधि के आधार पर साहित्यिक पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रकारिता का विभाजन मुख्यतः तीन तरह से किया जा सकता है: मासिक, द्विमासिक और त्रैमासिक।

लेकिन यह विभाजन केवल नियमित रूप से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं पर ही लागू हो सकता है। लघु-पत्रिका आंदोलन के दौरान जो हज़ारों नहीं भी , तो सैंकड़ों साहित्यिक पत्रिकाएँ निकलीं, वे प्रायः ”अनियतकालीन” ही निकलीं स जो निश्चित अवधि वाली नहीं थीं, वे भी आगे चलकर अनियतकालीन बन गईं और अंततः बंद भी हो गईं स जो निश्चित अवधि में अब भी नियमित रूप से निकल रही हैं, उनमें मासिक ”हंस” (हाल ही में मृत्यु से पूर्व तक सं0 राजेन्द्र यादव) तथा ”पखी” (सं0 प्रेम भारद्वाज) तथा द्विमासिक ”पुस्तकवार्ता” (सं0 भारत भारद्वाज) और त्रैमासिक ” आलोचना”(प्र0सं0 नामवर सिंह)–जैसी प्रतिनिधि पत्रिकाओं का उल्लेख किया जा सकता है। उसी तरह अनियतकालीन पत्रिकाओं के प्रतिनिधित्व में ”पहल” (सं0 ज्ञानरंजन) और ”दस्तावेज़” (सं0 विस्वनाथ प्रसाद तिवारी) का ज़िक्र अकिया जा सकता है। इनमें से ”पहल” का हाल ही में 98 वाँ अंक आया है और ”दस्तावेज़” का 145 वाँ।

3) विधापरक विभाजन:

विापरक विभाजन के अंतर्गत साहित्यिक का विभाजन मुख्यतः चार तरह से किया जा सकता है: (अ) कहानी पत्रिका, (ब) कविता संबंधी पत्रिका, (स) आलोचना और पुस्तक समीक्षा संबंधी पत्रिका तथा (द) सर्वविशय- संग्रह परक पत्रिका। आजकल साहितय की सभी विधाओं को कम या ज़्यादा स्थान देने वाली पत्रिकाएँ ही अधिक हैं। फिर भी, किसी एक मुख्य विधा को प्रमुखता देने के साथ थोड़ी बहुत अन्य सामग्री या कसी दूसरी विधा की चंद रचनाओं को भी शामिल करने वाली साहित्यिक पत्रिकाएँ भी खासी बड़ी संख्या में हैं। लेकिन पुस्तक समीक्षाएँ तो प्रायः प्रत्येक पत्रिका का अनिवार्य अंग हैं।

किसी एक ही विधा दृढ़ता से केंद्रित पत्रिकाएँ अपवादस्वरूप ही कही जा सकती हैं ; जेसे कि पुस्तक समीक्षाओं की पत्रिकाएँ, ”समीक्षा” (सं0 गोपाल राय) और ”पुस्तकवार्ता” तथा कहानी की पत्रिकाएँ ”कहनी” और ”नई कहानियाँ”। कमलेश्‍वर के संपादन में निकलने वाली ”सारिका” भी कहानी-केंद्रित पत्रिका ही थी, जो बंद हो चुकी है। इसी तरह कविता-केंद्रित पत्रिका ”कविता” (सं0 जुगमिंदर तायल और भगीरथ), नेमिचंद्र जैन की ”नटरंग” नाटक” केंद्रीय पत्रिका में थी। आलोचना” है तो मुख्यतः समालोचनाओं और पुस्तक समीक्षाओं की पत्रिका, लेकिन उसमें प्रायः साहित्य, संस्कृति और राजनीति से संबंधित देशी-विदेशी विद्वानों के लेख ( अनुवाद भी) तथा कभी-कभार कोई साक्षात्कार या चंद मौलिक अथवा अनूदित कविताएँ भी स्थान पा जाती हैं।

4) भाषिक आधार पर विभाजन:

कुछ साहित्यिक पत्रिकाएँ हिन्दी के साथ हिन्दी के साथ ही उसकी जनपदीय बोलियों, यथा बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, अवधी, बघेली, भोजपुरी, मैथिली, ब्रज, नेमाड़ी, पहाड़ी, हरियाणवी, मारवाड़ी और राजस्थानी आदि की रचनाएँ भी छपती हैं। कुछ पत्रिकाएँ इन जनपदीय उपभाषाओं-बोलियों में निकलती हैं, जिन्हें हम विशाल हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता की व्यापक परिधि में गिन सकते हैं। कुछ पत्रिकाएँ हिन्दी के साथ ही उर्दू और अंग्रेज़ी के भी हिस्सों के साथ द्विभाषी निकलती हैं। पहली मिसाल ”शेष” (सं0 और दूसरी महात्मा गाँधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय की पत्रिका ”हिन्दी: ”भ्प्छक्प्” (सं0 ममता कालिया) कही जा सकती हैं।

5) प्रकाशकीय आधार पर विभाजन:

प्रकाशकीय आधार पर भी साहित्यिक पत्रिकाओं का विभाजन इस तरह किया जा सकता है:

अ) दृढ़्तापूर्वक पूर्णतः साहित्य को समर्पित पत्रिकाएँ, जो मुख्यतः प्रायः ”लघु पत्रिकाओं” की श्रेणी में

आती हैं और इन पर विस्तार से चर्चा की भी जा चुकी है।

ब) प्रकाशकों, विश्‍वविद्यालयों, साहित्यिक संस्थाओं या ऐसे ही प्रतिष्‍ठानों से निकलने वाली साहित्यिक

पत्रिकाएँ। मिसाल के लिए ”आलोचना” (राजकमल प्रकाशन), ”पुस्तक वार्ता” और ”बहुवचन” (म0गाँ0

अं0 वि0वि0वर्धा), ”माध्यम” (हिन्दी साहित्य सम्मेलन) तथा ”नटरंग (नटरंग मटरंग प्रतिश्ठान)- जैसी

पत्रिकाएँ,।

स) उद्योग के स्तर पर व्यावसायिक इज़ारेदार घरानों की मिल्कियत ( ओनरशिप) में निकलने वाली

पत्रिकाएँ, मिसाल सपम ”ज्ञानोदय” ( अब ”नया ज्ञानोदय” नाम से सारिका और ”धर्मयुग” (साहू

जैन का ”टाइम्स गु्रप”), ”साप्ताहिक हिन्दुस्तान” (बिड़ला गु्रप) तथा

द) सरकारी पत्रिकाएँ, लेकिन इस श्रेणी में प्रायः निकृष्‍ट किस्म की पत्रिकाएँ होती है। फिर भी जब कोई अच्छा साहित्यकार उनका संपादक बन जाता है तो कुछ अंक अच्छे निकल जाते हैं। मिसाल के लिए ”पूर्वग्रह” (सं0 अषोक वाजपेयी), ”साक्षात्कार” (सं0 सोमदत्त) और ”आजकल” (सं0 पंकज बिष्‍ट) का नाम उल्लेख किया जा सकता है। साहित्य अकादमी की ”समकालीन भारतीय साहित्य” भी

6) विचारधारापरक विभाजन:

विचारधारा के आधार पर भी साहित्यिक पत्रिकाओं का विभाजन दो तरह का विभाजन है —-

1) राजनीतिक तौर पर ; जैसे कि भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़े लेखकों की ”पहल”, ”वसुधा”, ”क्यों”, ” ओर”, आदि पत्रिकाएँ माकपा से जुड़ी ”उत्तरार्ध”, ”कलम” और ”नया पथ” बहुत पहले भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (अविभाजित) ने हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में ”नया साहित्य”, ”नया अदब” और ”इंडियन लिटरेचर” नाम से अत्यंत श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रकाशित की थीं। लेकिन ये सभी अल्पायु ही साबित हुईं।

दूसरी तरफ, (ख) साहित्यिक आंदोलनों के आधार पर भी विभाजन किया जा सकता है। जैसे कि प्रगतिवादियों का ”हंस” ( अमृत राय), ”विप्लव” (यशपाल), ”वसुधा” (हरिशंकर परसाई) और समालोचक (रामविलास शर्मा)–जैसी साहित्यिक पत्रिकाएँ तो थीं, तो प्रगति-विरोधिायों की ”प्रतीक” (अज्ञेय्), ”निकश” (धर्मवीर भारती) और अन्य परिमलीय, ”नयी कविता” (जगदीश गुप्त एवं अन्य परिमलीय गुट) आजकल विचारधारात्मक आधार पर साहित्यिक पत्रिकाओं का विभाजन पाश्‍चात्‍य अस्तित्ववादी, विखंडनवादी, रूपवादी–जैसी तमाम विचारधाराओं और आंदोलनों से प्रभावित और उनकी प्रचारक पत्रिकाओं तथा प्रगतिशील वामपंथी और भूमंडलीकरण की विरोधी तथा प्रतिबद्ध और प्रतिरोध की संघर्षधर्मी साहित्यिक पत्रिकाओं के बीच किया जा सकता है।

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हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (5)

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता की शुरुआत, जैसा कि पहले भी उल्लेख किया जा चुका है, भारतेन्दु हरिश्‍चंद्र की पत्रिका ”कविवचनसुधा” के 15 अगस्त, 1861 ई0 से, बनारस से प्रकाशन के साथ होती है। भारतेन्दु न केवल आरंभकर्ता थे, बल्कि उन्होंने अपनी नेतृत्वकारी प्रतिभा से साहित्य और पत्रकारिता के बिखरे हुए सारे सूत्रों को समेट कर एक नए युग का सूत्रपात किया। भारतेन्दु की साहित्यिक पत्रकारिता से ही हिन्दी साहित्य की नई-से-नई गद्य-विधाओं की शुरुआत हुई। ”भारतेन्दु-समग्र” के संपादक हेमंत शर्मा ने यह ठीक लिखा है कि, “आज की पत्रकारिता का ऐसा कोई रूप नहीं जिसका बीज भारतेन्दु में न हो’’। उन्होंने साहित्य को देशहित से जोड़कर, अपनी पत्रकारिता के माध्यम से, भाषा-शैली और लोकप्रियता के ऊँचे तथा कलात्मक मानदंड स्थापित किए।

साहित्यिक पत्रकारिता के हमारे अब तक के विवेचन से, सबसे महत्वपूर्ण बात यह उभरकर सामने आती है कि वह प्राचीनकाल के यूनानियों की उस दोधारी कटार की तरह पैदा हुई थी जिसे ग्रीक भाषा में ”स्तिलुस” (STILUS) कहा जाता था। यह लिखने और घोंपने, दोनों कामों में प्रयुक्त होती थी। हमारे 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी चेतना के साथ विकसित इस साहित्यिक पत्रकारिता की एक धार यदि देश को गुलाम बनाने वाले ब्रिटिश साम्राज्यवाद की ओर तनी थी, तो दूसरी धार उनके पिट्ठुओं, देषी रजवाड़ों, ज़मींदारों, महाजनों और धर्म के ठेकेदार पाखंडियों, रूढ़ियों तथा सामाजिक कुरीतियों की ओर तनी थी। हमारे अब तक के वर्णन, विश्‍लेषण और विवेचना से साहित्यिक पत्रकारिता का स्वरूप, उसके क्षेत्र और वर्गीकरण के साथ ही, उसके इतिहास की भी एक हल्की सी रूपरेखा उभरती हुई दृष्टिगोचर हुई होगी। वस्तुतः हमारे इस प्रबंध के प्रस्तुत पाँचवें और अंतिम खंड की विषय-वस्तु भी यही है।

साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास

साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास हमरे साहित्य के इतिहास का अभि का अभिन्न अंग है ; और साहित्य का इतिहास हमारे समग्र साँस्कृतिक और सामाजिक इतिहास का अंग है। इनमें उठने वाली परिवर्तनों की लहरें एक-दूसरे से प्रभावित होती हैं और परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। लेकिन साहित्य के इतिहास की कुछ धीमी गति की तुलना में साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास की गति कुछ तीव्रतर होती है। इसीतरह सा से उस पर तामान्य पत्रकारिता के इतिहास का एक हिस्सा होने की वजह से उस पर तात्कालिकता और एक हद तक समसामयिक दवाबों का भी तुलनात्मक रूप से अधिक असर दिखता है, फिर भी अपने खास चरित्र के कारण साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास, उसके काल-विभाजन, भाषा-शैलीगत विविध परिवर्तनों और प्रवृत्तियों के टकराव या सामंजस्य आदि का अपना वैशिष्‍टय तो होता ही है, मोटे तौर पर हम हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास को मुख्यतः दो बड़े कालखंडों में विभाजित कर सकते हैं: (क) आज़ादी से पहले की साहित्यिक पत्रकारिता ; और (ख) आज़ादी के बाद की साहित्यिक पत्रकारिता, भारत्येन्दु युग से आरंभ करते हुए, हम भारतेन्दु-युग से पहले के कालखंड को इस इतिहास की पृश्ठभूमि भी मान सकते हैं अर्थात ”उदंतमार्त्तांड” के प्रकाशन (30 मई, 1826) से लेकर ”कविवचनसुधा” के प्रकाशन (15 अगस्त, 1867) तक ”भारतेन्दु-पूर्व युग या हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास की ”पृष्‍ठभूमि” से आगे के दोनों प्रमुख युगों के भीतर भी हम इस प्रकार कालविभाजन कर सकते हैं —-

क) स्वतंत्रता पूर्व की साहित्यिक पत्रकारिता (1867-1947 ई0)

1) भारतेन्दु-बालमुकुन्द गुप्त युग ; (1867-1902)

2) द्विवेदी-प्रेमचंद युद ; (1900-1935)

3) प्रगतिवादी युग ; तथा (1936-1950-53)

ख) स्वातंत्र्योत्तर साहित्यिक पत्रकारिता (1947 से लेकर आज तक)

1) प्रगति-प्रयोग का द्वंद्व तथा प्रगति-विरोधी विचारधराओं का दौर (1947-1964)

2) लघु पत्रिका आंदोलन का दौर ; (1964- 1974)

3) आपात्काल और उसके बाद का दोर ; तथा (1975-1995)

4) भूमंडलीकरण और उसके प्रतिरोध अन औरका समकालीन दौर (1995 …….)

कालविभाजन का वैज्ञानिक आधार

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के संदर्भ में छिट-पुट काम तो हुए हैं, लेकिन उसके समग्र विवेचन, वैज्ञानिक काल विभाजन और प्रामाणिक दस्तावेज़ीकरण के आधार पर कोई बड़ा काम अभी तक नहीं हुआ है। कहना न होगा कि इस लिहाज़ से हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता का अभी तक कोई इतिहास है ही नहीं ! लेकिन ”इतिहास” न होने पर भी साहित्यिक पत्रकारिता तो रही है और अब भी अस्तित्व में है ; सक्रिय है, गतिशील है। दरअसल, इसे वस्तुनिष्‍ठ ढंग से और प्रामाणिक तथ्यों एवं कालविभाजन की वैज्ञानिक पद्धति से कालक्रमानुसार (क्रॉनोलौजिकली) लिपि-बद्ध करने की ज़रुरत है। मौजूदा पतनशील दौर में तो और भी ज़रूरत है ; ताकि इस ”इतिहास” की क्रांतिधर्मी चेतना से प्रेरणा लेकर एक नए वनजागरण की मशाल जलाई जा सके।

इतिहास में हम एक नए युग की समाप्ति और नए युग के आरंभ की कोई तिथि निर्धारित करते हैं तो उसका अर्थ यह नहीं कि ठीक उसी दिन से युग बदल गया और तदनुरूप उसकी प्रवृत्तियाँ भी एक से दूसरे युग के दरम्यान एक संक्रमणकाल (ट्राँज़ीशनल पीरियड) होता है ; और कभी-कभी तो यह दौर खासा लंबा खिंच जाता है। दूसरे, एक युग के दौरान ही आगे आने वाले युग की कतिपय प्रवृत्तियाँ, कुछ लक्षण उभरने लगते हैं। इसी तरह युग परिवर्तन हो जाने पर भी पिछले युग या युगों की कुछ-न-कुछ प्रवृत्तियाँ जारी रहती हैं ; धीरे-धीरे तिरोहित होती हैं फिर भी, हम किसी ऐतिहासिक घटना, किसी खास आंदोलन, साहित्यिक पत्रिका या युगांतरकारी व्यक्ति-विशेष और उनकी किन्हीं निश्चित तिथियों को आधार बनाकर कालविभाजन करते हैं ; यथा, स्वाधीनता-पूर्व और स्वातंत्र्योत्तर से इसी तरह ”कविवचनसुधा” की प्रकाशन-तिथि या ”सरस्वती” का वह अंक जिससे पं0 महावीर प्रसाद द्विवेदी ने संपादन संभाला अथवा आपात्काल और उसमें सेंसरशिप लागू होने का वर्श या देश में तथाकथित ”नयी आर्थिक नीति” लागू होने से बदली हुई परिस्थितियाँ आदि से इन सबका आधार सामाजिक- आर्थिक परिवर्तन और उनसे प्रभावित राजनीतिक, साँस्क्रतिक और साहित्यिक परिवर्तन आदि होते हैं।

अब हम ”हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास” की अत्यंत संक्षिप्त रूपरेखा, उपर्युक्त सात शीर्षकों के अंतर्गत प्रस्तुत करते हुए, युगानुरूप प्रवृत्तियों, आंदोलनों, प्रतिनिधि पत्रिकाओं और इन परिवर्तनों के प्रेरक या वाहक युगांतरकारी व्यक्तियों की भूमिका रेखांकित करने का प्रयास करेंगे। स्मरणीय है कि कोई भी ”इतिहास” पत्र-पत्रिकाओं और व्यक्तियों की नामावली की लंबी-चौड़ी ”सूचि” नहीं होती, ऐसा होने पर वह ”इतिहास” नहीं, रेलवे टाइमटेबल या टेलीफोन डायरेक्टरी बन कर रह जाएगा।

1) भारतेन्दु-बालमुकुन्द गुप्त युग (1867-1902)

”कविवचनसुधा” से हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का सूत्रपात करते हुए, भारतेन्दु ने 15 अक्टूबर, 1873 से पाक्षिक ”हरिश्‍चंद्र मैगज़ीन” का प्रकाशन शुरु किया। ”सुधा” 15 अगस्त, 1867 में मासिक निकली थी। प्रकाशन के दूसरे वर्ष से वह पाक्षिक, फिर 5 सितंबर, 1873 से साप्ताहिक रूप में निकलने लगी थी। ”मैगज़ीन” भी पाक्षिक थी तथा 8 अंकों के बाद जनवरी, 1874 से उसका नाम ”हरिश्‍चंद्र चंद्रिका” हो गया। भारतेन्दु ने स्त्रियों के लिए भी एक पत्रिका ”बाला-बोधिनी” निकाली थी। डॉ0 रामविलास शर्मा ने ”सुधा” को ”एक युग का सजीव इतिहास” और “भारतेन्दु युग का दर्पण” निरूपित करते हुए लिखा है कि वह सच्चे अर्थों में “जनता के हितों के लिए लड़ने वाले निर्मम सैनिक की तरह थी। कहने की आवश्‍यकता नहीं कि ”सुधा” के बाद यही काम ”मैगज़ीन” और ”चन्द्रिका” ने किया। हिन्दी साहित्य की सभी गद्य-विधाएँ इसी युग में प्रस्फुटित हुईं।

डॉ0 शर्मा ने लिखा है कि भारतेन्दु की पत्रिकाओं का “मूल स्वर देशोन्नति और अंग्रज़ी शासन की नुक्ताचीनी का था और उन्होंने “विभिन्न साँस्कृतिक विषयों को एक ही जगह समेटकर पत्रिका की ऐसी पद्धति चलाई जिसका अनुसरण आगे चलकर हिन्दी की अधिकांश पत्रिकाएँ करती रहीं। भारतेन्दु की पत्रिकाओं के अलावा ”आनंदकादंबिनी” (प्रेमघन), ”भारतेन्दु” (राधाचरण गोस्वामी), ”ब्राह्मण” (प्रतापनारायण मिश्र), ”हिंदी प्रदीप” (बालकृष्‍ण भट्ट), ”सारसुधानिधि” (दुर्गाप्रसाद मिश्र और सदानंद मिश्र) तथा ”भारतमित्र” (बालमुकुन्द गुप्त) इस युग के प्रतिनिधि पत्र-पत्रिकाएँ और उनके यशस्वी संचालक और संपादक हैं, जो भारतेन्दु की इस राह पर दृढ़तापूर्वक जीवनपर्यन्त चले परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का भरोसा मत रखो। अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो।

बाबू बालमुकुंद गुप्त, पं0 महावीर प्रसाद द्विवेदी के समकालीन थे। डॉ0 शर्मा के अनुसार वे भारतेन्दु युग के ऐसे सिपाही थे जिन्होंने हरिश्‍चंद्र की मृत्यु के बाद सेनापति की कमान संभाली। वे बताते हैं कि ”भारतमित्र” के साथ गुप्त जी का नाम वैसे ही जुड़ा है जेसे ”सरस्वती” के साथ द्विवेदी जी का। डॉ0 शर्मा लिखते हैं कि गुप्तजी “हिन्दी-उर्दू की बुनियादी एकता के प्रबल समर्थक थे। अपनी उग्र राजनीतिक चेतना के कारण वे भारतेन्दु से अधिक बालकृष्‍ण भट्ट के निकट हैं। उनका गद्य ललित और सरस है, इस दृष्टि से वे भारतेन्दु हरिश्‍चंद्र और प्रतापनारायण मिश्र की शैली के अनुवर्ती हैं। किन्तु उनका-सा व्यंग्य उस युग के किसी अन्य लेखक में नहीं है। वाद-विवाद को कलात्मक बना देने में वे अनुपम थे। गुप्त जी इस क्षेत्र में आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में हास्य-व्यंग्य के सिरमौर हरिशंकर परसाई के पूर्वज कहे जा सकते हैं।

2) द्विवेदी-प्रेमचंद युग (1900-1935)

द्विवेदी जी के संपादन काल की ”सरस्वती” को “आधुनिक हिन्दी साहित्य का ज्ञान-कांड“ बताते हुए डॉ0 शर्मा ने इस युग की साहित्यिक पत्रकारिता का उच्च मूल्यांकन किया है। वे लिखते हैं कि ”सरस्वती मर्यादा तथा हिन्दी की अन्य पत्र-पत्रिकाओं में इस समय जो सामग्री निकली, उससे यदि सुधा और हंस में निराला और प्रेमचंद के लेखों की तुलना करें तो यह तथ्य स्पष्‍ट हो जाएगा कि प्रेमचंद की यथार्थवादी धारा और निराला की छायावादी धारा, दोनों द्विवेदी युग से जुड़ी हुई हैं। इसी तरह भाई के भारतेन्दुकालीन लेखकों के भावबोध से द्विवेदी जी के भाव-बोध का अंतर दिखाई देता है। अंतर विचारधारा में नहीं है, अंतर है भाषा और साहित्य की परख में महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनकी ”सरस्वती” का मह्त्व यह है कि उन्होंने हिन्दी नवजागरण की बिखरी हुई असंगठित शक्ति को एक जगह एकताबद्ध और संगठित किया।

स्मरणीय है कि ”सरस्वती” द्वारा द्वेवेदी जी के संपादन में 1903 ई0 से यह ऐतिहासिक युगांतर शुरु करने से पहले यह भूमिका माधवराव सप्रे के संपादन में ”छत्तीसगढ़ मित्र” (सन 1900से) आरंभ कर चुका था। डॉ0 नारद के शब्दों में, “माधवदास सप्रे का कृतित्व हिन्दी लेखकों की एक पूरी पीढ़ी तैयार कर देने के लिए भी दृष्‍टव्‍य रहेगा। पं0 महावीर प्रसाद द्विवेदी, पं0 श्रीधर पाठक, पं0 कामताप्रसाद गुरु, पं0 गंगाप्रसाद अग्निहोत्री, पं0 जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल, पं0 रामदास गौड़ तथा पं0 नागीश्‍वर मिश्र प्रभुति अन्य अनेक लेखक ऐसे थे जिनकी प्रारंभिक रचनाओं को ”छत्तीसगढ़ मित्र” ने बड़े ही उत्साह से प्रकाशित किया। कहना न होगा कि सप्रे जी बाद में भी ”सरस्वती” में द्विवेदी जी के एक नियमित सहयोगी लेखक के रूप में हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता और हिन्दी नवजागरण में अपना बहुमूल्य योगदान देते रहे। आलोचक रामचन्द्र शुक्ल का ”इतिहास” और उपन्यासकार और पत्रकार प्रेमचंद तथा हिन्दी कविता में छायावाद, नए यथार्थवाद और छन्द-मुक्त प्रगतिवादी नयी कविता का सूत्रपात करने वाले, साथ ही एक प्रखर पत्रकार सूर्यकान्त त्रिपाठी ”निराला” इसी युग की देन हैं। प्रेमचंद के संपादन काल की ”माधुरी” भी (जिसके संपादक मंडल में प्रेमचंद थे) इस हिन्दी नवजागरण के ”ज्ञान कांड” में ”सरस्वती” और ”छत्तीसगढ़ मित्र” की सहोदर पत्र-पत्रिकाएँ थीं।

इनके अलावा, इस युग की अन्य महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में पं0 चंद्रधर शर्मा गुलेरी का अल्पायु ”समालोचक” (1901-02) जयशंकर प्रसाद की ”इंदु” पहले माखनलाल चतुर्वेदी, फिर गणेश शंकर विद्यार्थी, बालकृष्‍ण शर्मा ”नवीन” के संपादन में ”प्रभा”, ”रामरख सहगल की क्रांतिकारी पत्रिका ”चाँद ” (जिसमें छ: नामों, यथा बलवंत सिंह, से भगतसिंह लिखते थे और जिसके जब्तषुदा ”फाँसी” अंक को उन्होंने ही तैयार किया था), अल्पायु ”साहित्य”, ”साहित्य समालोचक”, ”श्री शारदा” और वीणा के नाम उल्लेखनीय हैं। इन साहित्यिक पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रकारों-लेखकों के अलावा दैनिक ”वर्तमान” के संपादक रमाशंकर अवस्थी, शिवपूजन सहाय, राधामोहनद गोकुल जी, सत्यभक्त, इतिहासज्ञ काशीप्रसाद जायसवाल, श्‍यामाचरण राय, जनार्दन भट्ट, डॉ0 बेनीप्रसाद, बैरिस्टर मन्निलाल, रामनारायण शर्मा, नाथूराम प्रेमी, कृष्‍णानंद जोशी, गंगाधर पंत, ईश्‍वरदास मारवाड़ी, नवजादिकलाल श्रीवास्तव, शिवप्रसाद गुप्त, त्रिमूर्ति शर्मा, गिरिजा प्रसाद द्विवेदी, देवीप्रसाद गुप्त, सुंदरराज, सत्यदेव, जगन्नाथ खन्ना, गिरीन्द्रमोहन मिश्र, मधुसूदन शर्मा, वीरसेन सिंह, बदरीदत्त पांडे, संतराम, सीताराम सिंह, शिवप्रसाद शर्मा, धनीराम बख्‍शी, द्वारिकानाथ मैत्र, सिद्धेश्‍वर शर्मा, पृथ्वीपाल सिंह, गुलजारीलाल चतुर्वेदी, श्‍यामसुंदर वर्मा, प्रेम वल्लभ जोशी, रामनारायण मिश्र, कामताप्रसाद गुरु और मिश्र बंधु के नाम उल्लेखनीय हैं। डॉ0 बेनीप्रसाद और राधामोहन गोकुल जी अपने नामों के अलावा ”सत्यशोधक” और ”प्रत्यक्षदर्शी” के नामों से भी लिखते थे।

अंत में, जैसे हम भारतेन्दु-युग के बारे में डॉ0 रामविलास शर्मा की पुस्तकों ”भारतेन्दु हरिश्‍चंद्र और हिन्दी नवजागरण” तथा ”भारतेन्दु-युग और हिन्दी भाषा की विकास परंपरा” से जान सकते हैं, ठीक उसी प्रकार, द्विवेदी-प्रेमचंद युग का भरा-पूरा जीवंत चित्र हमें डॉ0 शर्मा की ”महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण” तथा ”प्रेमचंद और उनका युग” पुस्तकों में मिलेगा। ये चारों कालजयी कृतियाँ हिन्दी साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास की अमूल्य धरोहर तथा अनिवार्यतः पठनीय हैं।

3) प्रगतिवादी युग (1936-1950-53)

साहित्य के इतिहासकार प्रगतिवादी के युग को अप्रैल, 1936 से 1953 तक मानते हैं। इसका आधार प्रेमचंद की अध्यक्षता में 9-10 अप्रैल, 1936 को लखनऊ में सम्पन्न प्रगतिशील लेखक संघ (PWA) का स्थापना सम्मेलन है। कुछ लोग 1949-50 तक तो कुछ 1953 तक इसकी कालावधि मानने के पीछे यह तर्क देते हैं कि आज़ादी के बाद कम्युनिस्टों और प्रगतिशील लेखकों के सरकारी दमन और पार्टी की रणदिवे लाइन के संकीर्णवादी दौर में आंतरिक कलह तथा गुटबाजी की वजह से प्रलेसं0 का निष्क्रिय हो जाना स दूसरे लोग, इसके विपरीत मार्च,1953 में दिल्ली सम्मेलन में रामविलास शमजार्ने के नेतृत्व और महासचिव पद से हट जाने के बाद संगठन वास्तव में समाप्त हो गया था और सभी प्रगतिशील पत्र-पत्रिकाएँ भी एक-एक करके बंद हो गईं थीं। अपवाद स्वरूप, सिर्फ हरिशंकर परसाई की ”वसुधा” अवश्‍य 1958 तक निकलती रही।

इसमें कोई संदेह नहीं कि साहित्यिक पत्रकारिता का सबसे क्रांतिकारी, तेजस्वी और साथ ही कलत्मक रूप हमें प्रगतिशील दृष्टिकोण वाली पत्र-पत्रिकाओं और उनके लेखकों-संपादकों के कृतित्व में ही नज़र आता है। ऐसी पत्र-पत्रिकाएँ भारतेन्दु की पत्रिकाओं से लगातार प्रलेसं0 की स्थापना (1936) तक बराबर निकलती रही हैं। इनकी मुख्य विषयवस्तु ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की गुलामी से देश की आज़ादी और स्वतंत्र भारत को एक जनवादी, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी गणतंत्र बनाने के उद्देश्‍य से मज़दूरों, किसानों और तमाम मेहनतकशों से प्रतिबद्धता तथा उनकी समस्याओं को उठाना रही। शोषण-विहीन समाज के स्वप्न और हर तरह के शोषण और दमन का यथार्थ चित्रण करते हुए उसका प्रतिरोध तथा फासीवाद एवं युद्ध के विरोध में शांति और सोवियत संघ का समर्थन ”प्रगतिवादी” साहित्य तथा पत्रकारिता का उद्देश्‍य रहा है। इस दृष्टि से जिन महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं का नामोल्लेख किया जा सकता है, उनमें ”हंस” (प्रेमचंद, उनकी मृत्यु के बाद अमृतराय), ”विप्लव” (यशपाल), ”रूपाम” (पंत), ”नया साहित्य” ,”लोकयुद्ध”, ”जनयुग”, (तीनों कम्युनिस्ट पार्टी), ”चकल्लस”, ”उच्छृंखल” (दोनों अमृतलाल नागर), ”जनता”, ”संघर्ष”, ”नया सवेरा” ,”उदयन” ”वसुधा” (परसाई), ”समालोचक” (राम विलास शर्मा), ”नया पथ” (यशपाल एवं अन्य) और मुक्तिबोध के संपादन में सोख्ताजी का साप्ताहिक ”नया खून” आदि प्रमुख हैं। सभी पत्र-पत्रिकाएँ ठेठ प्रगतिवादी थीं।

4) प्रगति का द्वंद्व तथा प्रगति-विरोधी विचारधाराओं का दौर (1947-1964)

दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद यूरोप और अमेरिका में अंध-कम्युनिस्ट विरोध के साथ ही अस्तित्ववाद, रूपवाद, नयी समीक्षा, संरचनावाद और ऐसी ही तरह-तरह की दार्शनिक, साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में भी आज़ादी के बाद इन आंदोलनों और विचारधाराओं का खासा असर दिखाई देने लगा था। साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में ”प्रगति” और ”प्रयोग” का द्वंद्व तो 1943 में अज्ञेय के संपादन में ”तारसप्तक” के प्रकाशन से ही परिलक्षित होने लगा था ; लेकिन 1947 से अज्ञेय के ”प्रतीक” के प्रकाशन के साथ ही इस संघर्श का स्वरूप भी बदलने लगा था।

पहले जहाँ (”तारसप्तक” और कुछ बाद तक) एक ही प्रगतिवादी परिधि में दो विरोधी दृष्टिकोणों में टकराव था ; जिसे ”प्रगति” बनाम ”प्रयोग” के द्वंद्व का नाम दिया जाता है। इस टकराव का केंद्र आलोचना और कविता के क्षेत्र बने स बाद में नयी कहानी भी षामिल हो गई स एक ही प्रगतिशील धारा के अंतर्गत एक ओर जहाँ रामविलास शर्मा, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन आदि थे ; तो दूसरी ओर ”प्रगतिवाद” की रूढ़ समझ के विरोध में मुक्तिबोध, शमषेर बहादुर सिंह, हरिषंकर परसाई और नामवर सिंह थे, जो नए-नए प्रयोगों को ज़ोरदार वकालत करते थे ।

आज़ादी के बाद अज्ञेय ने ”दूसरा सप्तक” और ”तीसरा सप्तक” के माध्यम से नए ”प्रयोगों” की वकालत को खींचकर ”प्रयोगवाद” के सिद्धांतों और आंदोलन में बदल दिया। दुनिया भर में जिस शीत युद्ध की अंध-कम्युनिस्ट-विरोधी लहर का प्रभाव छाने लगा था, हिन्दी में भी कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम” के प्रवक्ता के तौर पर ”प्रतीक” और ” अज्ञेय” के नेतृत्व में इसकी गोलबंदी होने लगी। जल्दी ही ”नयी कविता” पत्रिका (सं0 जगदीश गुप्त) और ”परिमल” संस्था ( अज्ञेय, जगदीश गुप्त, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीकांत वर्मा, विजयदेव नारायण साही आदि) ने भी इस मोर्चे में शामिल होकर ज़ोरदार प्रगति-विरोधी अभियान छेड़ दिया।

प्रगतिशील लेखक संघ, उसकी विचारधारा से जुड़े मंचों, पत्र-पत्रिकाओं के अवसान के बाद इन प्रगति-विरोधियों को खुला मैदान मिल गया। राजनीतिक सत्ता और धनसत्ता के परोक्ष और प्रत्यक्ष समर्थन तथा तमाम प्रतिष्‍ठानी सेठाश्रयी पत्र-पत्रिकाओं के विशाल मंच उपलब्ध होने पर एकबारगी तो साहित्यिक पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्रों में इनकी ही सर्वत्र विजय-पताका लहराने लगी। लेकिन तब भी सतह के नीचे प्रगतिशील साहित्य की एक शक्तिशाली सृजनात्मक अंतर्धारा प्रवाहित रही जो समय पाकर कालांतर में एक बार फिर उभरी।

5) लघु-पत्रिका आंदोलन का दौर (1964-74)

भारत पर 1962 में चीन के हमले और 1964 में नेहरू जी कि मृत्यु के बाद एक ओर जहाँ हरेक क्षेत्र में स्वतंत्र्योत्तर व्यामोह से मोह-भंग हो रहा था, वहीं दूसरी ओर नेहरूवादी एकछत्र सत्ता के बुर्जुआ लोकतंत्र में अंतर्विरोध और दरारें पड़ने लगी थीं तथा समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की विरोधी तमाम तरह की दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी- अवसरवादी ताकतें, मुख्यतः साम्प्रदायिक और हिह्दुत्ववादी-पुराणपंथी शक्तियाँ गोलबंद होकर शक्तिशाली हो रही थीं। उन्हें अमरीका के नेतृत्व में पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों, उनकी बहुराष्‍ट्रीय पूंजी तथा देशी इज़ारेदार पूंजीपति घरानों और उनकी पत्र-पत्रिकाओं का भरपूर समर्थन था। इसका असर तमाम साँस्कृतिक क्षेत्रों और साहित्यिक पत्रकारिता पर भी प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था। सरकारी, अर्ध-सरकारी और प्रतिष्‍ठानी पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही ”धर्मयुग”, ”सारिका”, ”साप्ताहिक हिम्दुस्ताम”, ”ज्ञानोदय” जैसी सेठाश्रयी पत्रिकाओं ने प्रगतिशील सोच के लेखकों, विशेष रूप से नए लेखकों के लिए प्रकाशन के अपने सभी दरवाज़े बंद कर दिए। इसी के विरोध में हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं में 1964-65 से जबर्दस्त लघु-पत्रिका आंदोलन चला; जिसकी विस्तृत चर्चा पिछले पृष्‍ठों में की जा चुकी है।

इस दौर में विशेष बात यह हुई कि 1967 में नक्सलवादी आंदोलन के साँस्कृतिक क्षेत्रों खासकर साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में उसका ज़ोरदार असर देखा गया। लघु-पत्रिकाओं का खासा बड़ा हिस्सा तथा नौजवान लेखकों-संस्कृतिकर्मियों का बहुमत इस ओर आकर्शित होने लगा। उधर कम्युनिस्ट पार्टी में 1964 में विभाजन के बाद माकपा और भाकपा से जुड़े लेखकों-पत्रकारों की पत्र-पत्रिकाओं ने भी नए सिरे से अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाया। फलस्वरूप 1969-70 से लघु-पत्रिका आंदोलन के इस दूसरे दौर ने एक शक्तिशाली नामपंथी मोड़ ले लिया। इस दौर की परिणति मई,1975 में गया में ”राष्‍ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ” के नाम से देश की सभी भाषाओं के प्रगतिशील लेखकों के मंच का पुनर्गठन हुआ। इसके बाद तो प्रायः 1995 तक मुख्यतः और प्रायः 2000 तक प्रायः साहित्यिक पत्रकारिाता में मार्क्सावादी विचारधारा तथा व्यापकतथा प्रगतिशील और वामपंथी दृष्टिकोण से प्रतिबद्ध लेखकों, संपादकों तथा पत्र-पत्रिकाओं का ही वर्चस्व कायम रहा। इस दौर की साहित्यिक पत्रकारिता का विस्तृत उल्लेख भी हम पिछले पृष्‍ठों में कर चुके हैं।

6) आपात्काल और परवर्ती दौर (1975-95)

देश में जून, 1975 में आपातकाल और फलस्चरूप कठोर ”सेंसरशिप” लागू होने के बाद हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता ने एक बार फिर भारतेन्दु युगीन पत्रकारिता की कलात्मक संकेतधर्मिता, प्रतीकवाद और कूटनीति का सहारा लिया। इसमें भी मुख्यतः तीन धाराएँ दिखाइ देती हैं। एक तो उन दक्षिणपंथी-साम्प्रदायिक पक्ष के लेखकों-पत्रकारों की धारा, जो आपात्काल, सेंसरशिप औएा इंदिरा-विरोध के तेवरों के साथ मुख्यतः अंध-कम्युनिस्ट विरोध और सोवियत-विरोध की नीतियों की प्रचारक थी।

दूसरी धारा कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े लेखकों, पत्रकारों और संपादकों की थी, जो आपात्काल, सेंसरशिप और तत्कालीन सत्ता के विरोध के साथ ही दक्षिणपंथी, साम्प्रदायिक और सत्ता-लोलुप फासिस्ट शक्तियों को भी बेनकाब कर रही थी। लेकिन सबसे ज़्यादा तादाद उन अवसरवादी लेखकों-पत्रकारों और साहित्यिक पत्रिकाओं की थी जो सत्ता की चापलूसी और जी-हज़ूरी में झुक गईं थीं। तमाम प्रतिष्‍ठानी और सेठाश्रयी पत्र-पत्रिकाएँ इसी रीढ़-विहीन तीसरी धारा में थीं। उनके लेखकों में भी ऐसे ही अवसरवादी तत्वों का बहुमत था।

स्मरणीय है, कि हर तरफ से चौतरफा हमलों की शिकार भाकपा से जुड़ी पत्रिका ”पहल” ही हुई स उधर ”जनयुग” ने ”प्री-सेंसरशिप” को मानने से इनकार कर दिया तथा सेंसरशिप के विरोध में कोरे पृष्‍ठों और काली पट्टियों के साथ सारिका” छापने की वजह से भाकपा से जुड़े संपादक कमलेश्‍वर को टाइम्स ऑफ इंडिया ने बर्खास्त कर दिया। यही नहीं, इससे कुछ अर्सा पहले, प्रगतिशील लेखक संघ के राष्‍ट्रीय अध्यक्ष तथा भाकपा से जुड़े महान व्यंग्यलेखक और पत्रकार हरिशंकर परसाई पर राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( आर0एस0एस) के हुदुत्व सैनिकों ने उनके घर में घुसकर दिन-दहाड़े लाठियों से संघातक हमला किया था। इस प्रकार हम देखते हैं कि तमाम तरह के अवसरवादियों , पाखंडी कायरों और नकली शहादत का मुखौटा पहनने वाले नौटंकीबाज़ लेखक-पत्रकारों तथा साहित्यिक पत्रिकाओं के विपरीत, वामपंथी और प्रगतिशील क्षेत्रों की साहित्यिक पत्रकारिता ने ही, इस दौर में भी अपनी सच्ची संघर्शशील भूमिका निभाई !

7) भूमंडलीकरण और उसके प्रतिरोध का समकालीन दौर (1995 ……)

आज हमारा समाज भूमंडलीकरण के ऐसे दोर से गुज़र रहा है जहाँ, मनुष्‍य एक श्रोता या पाठक से बदलकर मात्र उपभोक्ता और साथ ही स्वयं उपभोग की ”वस्तु” में …. वह भी बाज़ार की एक ”पण्य-वस्तु” के रूप में बदल चुका है। इसके विस्तार में न जाते हुए, यहाँ हम यही कहना चाहेंगे कि अब संस्कृति की जगह पतित अप-संस्कृति ने ले ली है और ज्ञान की जगह ”सूचना” मात्र में से वह भी वही सूचना, जो दुनिया में ”सूचना-नियंत्रण” करने वाली बहुराष्‍ट्रीय सूचना-सत्ताएँ तय करती हैं। दूसरे, सूचना की जगह ”गलत सूचना” (डिस-इन्फोरमेशन) और दुश्‍प्रचार तथा प्रायोजित आम-राय और विश्‍व- अभिमत से इस तरह अब आपके मस्तिष्‍क को, आपके विचारों को भी नियंत्रित किया जा रहा है और फूहड़ मनोरंजन की आदत डाली ज रही है। इस तरह धीरे-धीरे हम एक अपढ़ समाज की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में साहित्यिक पत्रकारिता के आगे सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह लोगों में सांस्कृतिक विवेक, स्वतंत्र कला-चेतना और विचारोत्तेजक,किन्तु संवेदनात्मक साहित्य के प्रति रुचि पैदा करे। इसके लिए वह प्रिंट ही नहीं, बल्कि ”इलेक्ट्रॉनिक” विशेष रूप से ”न्यू मीडिया” के वैकल्पिक साधनों के प्रयोगात्मक अवसर तलाश करे। भूमंडलीकरण और बाज़ारवाद के इस दौर में साहित्यिक पत्रकारिता को भी संगठित और व्यापक वैकल्पिक शक्ति बनकर प्रतिरोधाओं का शस्त्र बनना होगा। एक नए नवजागरण का लोकप्रिय अग्रदूत !!

संदर्भ:–

1) ”पत्रकारिता और संपादन कला”, (सं0 रामप्रकाश), में नेमिशरण मित्तल का लेकह, पृ0 116

2) ”भारतेन्दु-समग्र”,(सं0 हेमन्त शर्मा), की भारतेन्दु को पढ़ने के बाद शीर्षक ”भूमिका”

3) उपर्युक्त

4) ”परंपरा का मूल्यांकन”, रामविलास शर्मा ; राजकमल प्रकाशन, पृ0110

5) ”महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण, रामविलास षर्मा ,राजकमल प्रकाशन, पृ0 381

6) उपर्युक्त, पृ0 72

7) उपर्युक्त, पृ0 281

8) उपर्युक्त, पृ0 366

9) म0 प्र0 में हिन्दी पत्रकारिता: एक शताब्दी, डॉ0 कैलाश नारद, पृ0 39

10) भूमंडलीकरण और बाज़ार के बारे में विस्तृत अध्ययन के लिए प्रो0 (डॉ0) कमल नयन काबरा तथा

प्रो0 (डॉ0) पुष्पेश पंत की पुस्तकें देखिए

[लेख साभार एवं स्रोत: न्यूज़ राईटर]

हाइकु- डॉ अर्चना सिंह

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gray scale photo of woman and man

हाइकु- डॉ अर्चना सिंह

बेटियाँ-

प्रसव पीड़ा

नहीं, ये तड़प तो

बेटी होने की |

बेटी होने की,

सुन खबर

मुरझाया है, मुख |

पाँव पसार

अब सोयेगा पिता

बेटी ब्याह दी |

लाडली बेटी

बढ़ी दूरी इतनी

बनी बहू जो |

पाँव पूजते

बेटी हुयी पराई

वाह री रीत

विडम्बना-

चाह मुझसे

पूर्ण समर्पण की ?

स्वयं स्वार्थी |

तारे गिनते

देखती रही राह,

तुम न आये |

बाट जोहती

सूरज उगने की

बदली छाई |

कराहती माँ

दे रही आवाज

बेटा है धुत |

सूखी धरती

हो उठेगी व्याकुल

पानी न डालो |

डॉ अर्चना सिंह

गोमती नगर एक्सटेंशन

लखनऊ,

मेल- drarchanasumant@gmail.com

हाइकु-सत्या शर्मा ‘ कीर्ति ‘

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grayscale photography of human skull sketch

मेरे चन्द हाइकु

सत्या शर्मा ‘ कीर्ति ‘

गुजरे पल

उग आती झुर्रियाँ

उम्र डाली पे ।।

दौड़ता अश्व

जीवन पथ पर

मन सारथी ।।

पूछते बच्चे

आँगन औ तुलसी

मिलते कहाँ ।।

दिन गौरैया

चुगती जाती दानें

उम्र खेत का ।।

नये सृजन

रचे परमेश्वर

धरा चाक पे ।।

हमारा मन

कमजोर पथिक

उदास आत्मा ।।

किसान

चिलचिलाती

जीवन की ये धूप

वर्षा तू कहाँ ।।

जीवन पथ

सिर्फ संघर्षरत

रोये किसान ।।

सूखी है आँखे

धरती है उदास

इंद्र नाराज ।।

फटी जमींन

फसल हुए नष्ट

जीवन व्यर्थ ।।

गीला है मन

बस एक उपाय

खुद की हत्या ।।

कड़वा सच

होते ही हैं अनाथ

सारे किसान ।।

टपके लहू

आसमानी गोद से

हैरान आँखे ।।

सत्या शर्मा ‘ कीर्ति ‘

नाम :– सत्या शर्मा ‘ कीर्ति ‘

शिक्षा :- एम . ए , एल एल . बी

विधा :– हाइकु , छंदमुक्त , लघुकथा , लेख

सम्प्रति :– स्वतंत्र लेखन

पता :– राँची ( झारखण्ड )

उषा गांगुली से साक्षात्कार

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उषा गांगुली, जन्म- 1945, जोधपुर आप कोलकाता में रहकर हिंदी रंगकर्म करती हैं। आपने 1976 में ‘रंगकर्मी’नामक अपनी नाट्य –संस्था की स्थापना की। उषा गांगुली द्वारा अभिनीत एवं निर्देशित प्रमुख नाटकों में महाभोज, लोककथा, होली,खोज, वामा, बेटी आई, मय्यत, रुदाली, मुक्ति और काशीनामा इसके अलावा आपने ब्रेख्त के नाटक ‘मदर करेज’ को ‘हिम्मतमाई’ के नाम से निर्देशित एवं स्वयं माँ की भूमिका को निभाया। ‘माँ’ की सजीव भूमिका के लिए 1982 -83 में सरकार द्वारा आपको ‘लेबदेब’ पुरस्कार से नवाजा गया। आपको 1998 में आपको संगीत नाटक अकादमी ने श्रेष्ठ निर्देशक के रूप में पुरस्कृत किया साथ ही उ.प्र.संगीत नाटक अकादमी ने सफ़दर हाशमी पुरस्कार से नवाजा।

सुरभि: आप ब्रेख्तीय थियेटर की तकनीक और वैचारिकी के विशेषज्ञ रहीं हैं, उनपर काम करते समय आपकी खुद की अंतःप्रक्रिया के अनुभवों को साझा कीजिये।

उषा गांगुली: मैं करीबन 45 वर्षों से थियेटर से जुड़ी हुई हूँ हर दौर से कुछ सीखा है, आज भी मैंकितना परिपक्व हुई हूँ पता नहीं। ये जो आप ब्रेख्त की तकनीक की बात कर रहीं हैं तो मैंने ब्रेख्त को खूब पढ़ा है, उनके नाटक देखें हैं और मैंने खुद भी किया है। ब्रेख्त का जो सबसे बड़ा थियेटर करने का तरीका था वह था लोगो से जुड़ने का, वह मानवीय राजनीति और human roots पर बहुत विश्वास करते थे। लेकिन जब हम थियेटर की बात करते हैं तो सामूहिकता एवं जन माध्यम की बात करते हैं कि नाटक जन माध्यम का सबसे सशक्त साधन है। लेकिन आज हम इस जन माध्यम से जन को छोड़ते जा रहें हैं। ब्रेख्त ने पहली बार उस जगह को पकड़ने की कोशिश की है। ब्रेख्त को किसी भी वैचारिकी से बांध नहीं सकते वह खुले हुये हैं। कभी -कभी दिक्कत तब होती है जब ब्रेख्त को करते समय उनकी शैली को हम भूल जाते हैं। जैसे ढेर सारा साज–सज्जा, आलीशान सेट इत्यादि के बीच कहानी घुट कर रह जाती है। सही मायने में ब्रेख्त ने सब कुछ जन को केंद्र में रखकर किया है। मैंने शुरू से तो नहीं लेकिन बाद में जब ब्रेख्त के नाटक को देखा और पढ़ा तब से कहीं न कहीं उन्हें अपने नाटकों का हिस्सा मानने लगी।मैंने लगभग 50 लोगों को लेकर पहला नाटक ‘महभोज’ किया था, उसकी साज-सज्जा में इतनी सादगी थी मैं खुद भी कभी-कभी सोचने की कोशिश करती हूँ कि मेरे अंदर ये कला कहाँ से आ गई। चूंकि मैं नृत्य सीखी हूँ इसलिए मैं स्पेस का इस्तेमाल समझती हूँ, मैं चित्र समझती हूँ,इसलिए आप मेरे अधिकतर नाटकों में देखेंगी कि संगीत, नृत्य, लय आपको दिखेगा साथ ही साथ अभिनेता के शरीर का प्रयोग भी अभिव्यक्त होगा। जिससे वे सीधे-सीधे दर्शक से जुड़े।‘रंगकर्मी’ नाट्य दल अब तक जितने भी नाटक किए सभी अलग-अलग रहें उनमें से किसी भी नाटक को दोहराया नहीं है। हर नाटक नया मुद्दा कभी युवा की समस्या है तो कभी रुदाली जैसे नाटक जो बिल्कुल भिन्न हैं। मैं सच बोलू तो ब्रेख्त को करने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी मैं अपने नाटकों में अंदर ही अंदर ब्रेख्त की शैली को अपना रही थी। लेकिन सीधे तौर पर उनकी स्क्रिप्ट को नहीं कर पा रही थी। एम.के. रैना ने जब ‘माँ’ नामक नाटक किया तो मैंने उसमें माँ का चरित्र निभाया, उस चरित्र ने मुझे अंदर से आंदोलित कर दिया था, जिसका प्रभाव आगे चलकर दिखता है। फिर मैंने ‘Mother Courage’ ‘हिम्मतमाई’ जिसे नीलाभ जी ने अनुवाद किया है, उसे करने की ठानी और एक बेहतर प्रोडक्शन तैयार हुआ। जिसकी प्रस्तुति ढाका से लेकर कई देशों में हुई। उसमें भी ब्रेख्त की सादगी को बरकरार रखा।

 

सुरभि: आपने जब ‘हिम्मतमाई’ को मंचित किया तो उसमें ब्रेख्तीय शैली को कितना लागू किया?

उषा गांगुली: मैं ऐसा नहीं सोचती हूँ कि ये ब्रेख्त की तकनीक है या ब्रेख्त की शैली है या मुझे इसी ढांचे में बंध कर करना चाहिए। मेरे ख्याल से ब्रेख्त भी ऐसा नहीं चाहते थे। मेरे नाटक को फ्रिट्ज़ बेनेविच ने देखा। मैंने उनसे कहा कि ब्रेख्त को पढ़ा है, उनकी तकनीक को जाना है, जो मेरे नाटक की सहजता में दिखाई देता है। मैं अपने नाटकों से समाज में एक प्रश्न खड़ा करती हूँ और दर्शकों को धक्का देती हूँ। अपने नाटकों के विषय से, उद्देश्य से उन्हे डिस्टर्ब करती हूँ कि वे भी सोचें।

सुरभि: आपके अनुसार ब्रेख्त का वैश्विक रंगमंच पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उषा गांगुली:मुझे ऐसा लगता है कि प्रगतिशील खेमे के व्यक्ति जो ब्रेख्त थे, उन्होने व्यवस्था के खिलाफ धक्का देने की कोशिश की।इस सच को कोई भी झुठला नहीं सकता। सारी दुनिया के मनुष्य में प्रगतिशीलता का चिंतन नहीं रह सकता तब तक ब्रेख्त को नहीं समझा जा सकता है। इसीलिए आप सारी दुनिया में देखिये जहां-जहां ब्रेख्त के नाटक गंभीरता से हुए हैं, वहाँ-वहाँ तीर की तरह प्रभाव डाला है और जहां सिर्फ संगीत पक्ष को लिया गया है वहाँ सिर्फ मनोरंजन बनकर रहा गया है। दर्शकों का सिर्फ मनोरंजन करना ब्रेख्त नहीं है, मैं बहुत ही खरी और सच बात कहती हूँ। ट्रीटमेंट में बहुत कुछ निर्भर करता है। ब्रेख्त के नाटक दुनिया को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। कई लोग ये भी कहते है कि ब्रेख्त का जमाना गया, मैं कहती हूँ नहीं थियेटर की यात्रा सागर की तरह होता है जो लहर की तरह आती और जाती है इसी तरह आज जिस तरह बजारवाद सारी दुनिया पर हावी है इस पर कौन प्रहार कर सकता है, कौन अपनी बात कह सकता है? सिर्फ ब्रेख्त के नाटकों में छिपे हुये तथ्य ही है जो इन सब पर प्रहार कर सकते हैं। वही अस्त्र की तरह लड़ सकते हैं। बशर्ते यदि कोई उन्हे अच्छे तरीके से प्रस्तुत कर सके। ब्रेख्त का एलियनेशन क्या है? जो द्वन्द्वात्मक सत्ता हमारे भीतर है, उस भीतरी मुखौटे को वे निकालने की कोशिश करते हैं। जिससे समाज का सत्य है और मैं भी ऐसी ही हूँ मुझे हेपोक्रेसी पसंद नहीं है। मैं दो रूप नहीं देख सकती। मेरे साथ ब्रेख्त के चिंतन में कहीं न कहीं बहुत मेल है जो मेरे हर नाटक में उभर कर आया है।

विगत 40 सालों से थियेटर करते हुये मुझे लगा है कि थियेटर की भाषा क्या होती है? क्या वह जर्मन होती है, या हिन्दी, गुजरती, मराठी, या बंगला होती है? मुझे लगता है थियेटर की अपनी भाषा होती है। मैं जब जर्मनी में ‘काशीनामा’ नाटक लेकर गई थी कुछ देर बाद दर्शकों ने subtitle देखना छोड़ दिया था और सिर्फ नाटक को ही देख रहें थे जबकि जर्मनी में लोग हिन्दी नहीं समझते हैं। फिर भी सभी ने बहुत सराहा। जहां तक बंगाल की बात है मेरे नाटकों के दर्शक हिन्दी से ज्यादा बंगाली हैं इसलिए मुझे लगता है की भाषा की रुकावट नहीं होती।

सुरभि: ब्रेख्त का प्रभाव पूरे भारत में पड़ा, आप इसे बांग्ला रंगमंच के संदर्भ में कैसे देखती हैं?

उषा गांगुली:बंगाल में तो 60,70,80 में भयानक रूप से ब्रेख्त हो रहे थे, ब्रेख्त की लहर थी। उस समय ‘गुड वुमेन ऑफ सेत्जुवन’ के तीन तरह की प्रस्तुति देखी है। बंगाल में रुद्र बाबू, विभाष दा, अजितेश बंधोपाध्याय एवं सोहाग सेन ने भी ब्रेख्त को खूब किया।

सुरभि: ब्रेख्त को विचार और शैली के रूप में आप कैसे देखती हैं?

उषा गांगुली: ब्रेख्त के नाटक कथ्य,वैचारिक और शैलीगत रूप से मानवीय अनुप्रेरणा के लायक हैं। ब्रेख्त जिस तरह उधेड़ देते थे वैसे ही उधेड़ना आना चाहिए।

सुरभि: ब्रेख्त से प्रभावित भारतीय नाटककार,निर्देशक कौन हैं /

उषा गांगुली:भारत में बहुत सारे निर्देशक हैं जैसे एम. के. रैना, बंसी कौल, हबीब तनवीर, विजया मेहता, जब्बार पटेल, रुद्र दा, विभाष दा आदि सभी ने ब्रेख्त को किया है। और आज भी कर रहे हैं।

सुरभि:वर्तमान भारतीय सामाजिक,राजनीतिक,आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य में ब्रेख्त की उपयोगिता के विषय में बताएं।

उषा गांगुली:भारत वर्ष का वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक ढांचा जब तक रहेगा लोग ब्रेख्त के नाटक करते रहेंगे और कामयाब होते रहेंगे। क्यों कि यह सीधे-सीधे इस पर प्रहार करता है। कहानी की तरह सहजता से ब्रेख्त ने जब एशिया के लोक से सब कुछ लिया चाहे वह चीन हो,वर्मा हो तो जहां से उन्होने लोक तत्व लिया वहाँ तो ब्रेख्त को तो सफल होना ही था। और सबसे ज्यादा सफल जर्मनी के बाहर हुये। पूरे विश्व ने ब्रेख्त को स्वीकारा और अपनी-अपनी भाषा में किया।

सुरभि:आप मेरा शोध विषय-‘ब्रेख्त का भारतीय रंगमंच पर प्रभाव, विशेष संदर्भ हिन्दी, बांग्ला और मराठी’ को कैसे देखती हैं?

उषा गांगुली: आप इस विषय पर शोध कर रही हैं, यह बहुत ही बड़ा काम है, नहीं तो थियेटर पर लिखा कहाँ जाता है, कौन थियेटर की बात करता है, प्रकाश की बात करता है? क्योंकि कई बच्चे नाटक अच्छा करते हैं लेकिन सैद्धांतिकी उन्हें पता नहीं होती है। यह जानकारी यदि आप से मिले तो बहुत ही अच्छी बात है। आपको बहुत-बहुत धन्यवाद जो अपने इस विषय को लिया।अब तक मेरे पास बहुत सारे लोग साक्षात्कार लेने आए लेकिन यह पहला विषय है जो ब्रेख्त से संबन्धित है। आप इतना गहन विषय पर शोध कर रहीं है मुझे बहुत अच्छा लगा।यह काम नयी पीढ़ी के लिए लाभकारी होगा। आपको बहुत-बहुत बधाई।

सुरभि:1976 से लेकर अब तक आपने जितने भी नाटक किए, किसी न किसी छोर पर ब्रेख्त से मिलती हैं?

उषा गांगुली:मैं यह कहना चाहती हूँ कि मैं सामाजिक हूँ। मैं जितना ज्यादा ब्रेख्त से अनुप्रेरित हुई हूँ किसी से नहीं हुई।मैं ब्रेख्त के टेक्स्ट का बहुत ही सम्मान और पसंद करती हूँ। यही कारण है कि मैंने उनके विचारों को अपनाया है।

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इक्कीसवीं सदी में आदिवासी अस्मिता के प्रश्न-डॉ.विजय कुमार प्रधान

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green leafed trees covered by fog during daytime

-डॉ.विजय कुमार प्रधान, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, वनस्थली विद्यापीठ (राजस्थान)

जंगल के साथ-साथ कम पड़ते जा रहे हैं जंगल के लोग/ बढती जा रही है संख्या दिनोदिन बाहरी लोगों की/ पसरते जा रहे हैं कंक्रीट के जंगल/ उग रहे हैं कूड़े-करकट और पथरीली धूल से बने/ नित नए दुखों के कृत्रिम पहाड़। (संताल परगना का दुःख कविता में से —अशोक सिंह) इक्कीसवीं सदी में आदिवासी अस्मिता के संकट को यह कविता जीवन्तता के साथ अभिव्यक्त करती है। कविता भले ही संताल परगना के आदिवासियों पर केन्द्रित है परन्तु यह भारत के समस्त आदिवासियों के दुःख हैं क्योंकि विकास के दुष्परिणाम सभी को एक समान रूप से भुगतने होते हैं। विकास और विनाश साथ-साथ कदम मिलाकर चलते हैं। विकसित राष्ट्र दोमुहें अजगर की तरह समस्त सृष्टि को निगलते जा रहे हैं। एक तरफ अपने देश में प्रकृति का सम्पूर्ण दोहन कर लेने के बाद प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर विकासशील और अविकसित देशों को व्यापार की आड़ में बर्बाद करने के लिए निकल पड़े। दूसरी तरफ प्रकृति एवं पर्यावरण की चिंता प्रकट करने के लिए अन्तराष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन कर अपने मानवीय उत्तरदायित्वों का रोना रोते हैं। यह मनुष्य जाति के लिए अत्यंत दुर्भाग्य का विषय है कि एक शक्तिशाली समुदाय दूसरे समुदाय को छल, बल और कौशल के द्वारा आदिम जनजातियों का शोषण कर विकास का पाठ पढ़ा रहा है।

१९९१ के बाद भारत वैश्विक अर्थनीति के साथ जुड़ गया जिसने भारत के सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन को पूर्णतः परिवर्तित कर दिया है। विकास के नाम पर हमने प्रकृति का सम्पूर्ण दोहन किया –जंगलों को नष्ट किया, पहाड़ों को खोद दिया, नदियों को गंदे नालों में बदल दिया, यहाँ तक कि वायु प्रदूषण के द्वारा समूर्ण वायुमंडल को भी दूषित कर दिया। इसके बाद जब हमने सब कुछ नष्ट कर दिया तब कृत्रिम चिंता करने बैठे हैं कि इसे ठीक कैसे किया जाए। हम कहाँ जा रहे हैं यह तय नहीं है। विकास और विनाश में से एक को चुनने की बजाय दोनों को साथ लेकर चल रहे हैं और यह शोध कर रहे हैं कि तेजाबी बर्षा क्यों हो रही है, ग्लेशियर क्यों पिघल रहे हैं, हवा को प्रदूषण से कैसे रोका जाए, तापमान क्यों बढ़ रहे हैं, समुद्र का जलस्तर क्यों बढ रहा है, अतिवृष्टि–अनावृष्टि क्यों हो रही है आदि। इन प्राकृतिक समस्याओं के अलावा यहाँ पर सदियों से निवास कर रहे आदिवासियों के साथ भी हमने खिलवाड़ किया है जिसके वजह से भारत वर्ष के प्रायः समस्त प्रान्तों के आदिवासी, अस्मिता के संकट से जूझ रहे हैं।

आर्थिक उदारीकरण की नीति ने भारत में निजीकरण, बाजारवाद, उपभोक्तावाद की संस्कृति को जन्म दिया, फलतः एक विशेष वर्ग में सम्पन्नता आई और साथ-साथ बेरोज़गारी, अपराध, मुनाफाखोरी, भ्रष्टाचार, जैव-सम्पदा की चोरी, प्रकृति का शोषण, देहवाद, अप-संस्कृति आदि समस्याएँ लेकर आयीं। इनके कारण यहाँ के मूल निवासियों को जल, जमीन और जंगल के लिए संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया। जंगल के मूल निवासियों (आदिवासी) को अपने ही जगह या तो गुलाम बना दिया या फिर विस्थापित जीवन जीने के लिए विवश किया गया। विकास के नाम पर भारत सरकार जमीन अधिग्रहित कर लेती है और आदिवासियों को मूल स्थान से विस्थापित होना पड़ता है। बाजारवाद के युग में प्राकृतिक संसाधनों पर ही सबकी नज़र है किसी को भी आदिवासियों की फ़िक्र नहीं है। आदिवासी विविध जंगलों, पर्वतों, पठारों आदि निर्जन क्षेत्रों में निवास करने के कारण अन्य उन्नत समाजों से भिन्न होते हैं। उनका रहन-सहन, जीवन-शैली, पर्व-त्यौहार साथ ही उनकी समस्याएँ भी अन्य आदिवासी समूह से भिन्न होते हैं। ”लगभग ९० प्रतिशत आदिवासी अपनी जीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं। इसके अलावा शिकार और बनोपज जमा करना भी उनके जीवन का आधार है लेकिन जैसे-जैसे आदिवासियों को उनकी जीविका के साधन के स्रोतों से दूर किया जा रहा है, वैसे-वैसे उनके आधारभूत कार्यकलापों में कमी आती जा रही है। आदिवासियों से उनके वनों और आवास भूमि छिनी जा रही है।”१

आदिवासी आजीविका के संकट से जूझ रहे हैं। भौतिक विकास के दौड़ में प्राकृतिक स्रोतों का दोहन हो रहा है जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव आदिवासियों पर पड़ता है। उदाहरण के लिए ओडिशा के आदिवासियों को देखा जा सकता है, यहाँ के बिंझाल, सउरा, कंध आदि आदिवासी आजीविका के तलाश में विस्थापित होने के लिए मजबूर हैं। अपने गाँव को छोड़कर जो बाहर राज्यों में मजदूर के रूप में काम करने जाते हैं। उन्हें ओडिशा में दादन श्रमिक कहा जाता है। वे अपनी अस्मिता को लेकर संघर्षरत हैं। २०११ के जनगणना के अनुसार ओडिशा की जनसंख्या ४, १९, ७४, २१८ है। उनमें ९५, ९०, ७५६ आदिवासी हैं। जिनमे पुरुषों की संख्या ४७, २७, ७३२ एवं महिलाओं की संख्या ४८, ६३, ०२४ है। यहाँ के ३० जिलों में शबर, बोंडा, परजा, गोंड, बिंझाल, डंगरिया कंध, मुंडा, भूयान, कोल, किशान, खड़िया, एवं ओराम आदि आदिवासी निवास करते हैं। इन आदिवासियों के लिए आजीविका की समस्या प्रमुख है। जंगलों के आदिवासी पहले अपनी आजीविका जंगलात द्रव्यों में तलाश लेते थे परन्तु डेम निर्माण, औद्योगिक विकास, शहरीकरण आदि के कारण जंगल समाप्त प्रायः हैं। खेत हैं परन्तु जलाभाव के कारण खेती संभव नहीं है। आजीविका की समस्या बढ़ी और ये पलायन करने के लिए विवश हुए एवं भारत के विभिन्न प्रान्त में मजदूरी के लिए जाना पड़ा। यहाँ के आदिवासियों के पास स्थानीय काम-धंधे न होने के कारण दक्षिण भारत में बंधुआ मजदूरी के लिए जाना पड़ता है। वहाँ पर इन भोले-भाले आदिवासियों का शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक शोषण दलाल एवं मालिकों द्वारा होता है। इनकी सुरक्षा के लिए कानून तो है परन्तु उनका अनुपालन नहीं होता। ”संविधान में अनुसूचित जनजातियों से सम्बधित कई प्रावधान है। मुख्यतः इन्हें दो भागों में बाँटा जाता है— (१)सुरक्षा (२) विकास। अनुच्छेद २३ मानव शरीर की सौदेबाजी , बेगार, बंधक मजदूर तथा अन्य प्रकार के जबरन श्रम का निषेध करता है। जहाँ तक अनुसूचित जनजातियों का प्रश्न है,यह प्रावधान बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनमे से अधिकांश लोग बंधक मजदूर के रूप में नियोजित है।” २ परन्तु चिंता का विषय यह है कि आदिवासियों के लिए बनाये गए क़ानून की जानकारी उन्हें नहीं है, इसलिए उनका शोषण होता है। वस्तुतः सारी लड़ाई जल, जंगल और जमीन की है। एक तरफ आदिवासियों से विकास के नाम पर सबकुछ छीना जा रहा है तो दूसरी तरफ वहाँ के आदिम आदिवासी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। हम महाशक्तिशाली राष्ट्रों में अपना नाम दर्ज करा रहे हैं परन्तु प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर ओडिशा के जाजपुर और केउँझर जिले के बच्चे कुपोषण के कारण मारे जा रहे हैं। किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपे जुलाई १०, २०१६ के समाचार के अनुसार जाजपुर एवं केउँझर जिले के जंगल के पहाड़ों में रहने वाले १०,००० जूआंग आदिवासी पलायन कर चुके हैं। न तो जंगल और न ही प्राकृतिक सम्पदा के ऊपर उनका कोई अधिकार रह गया है इसीलिए आजीविका के तलाश में वे बाहर जा चुके हैं । यही कारण है कि बाह्य शहरी समाज के द्वारा वे शारीरिक, मानसिक रूप से शोषित हैं।

सरकारी योजनायें केवल कागज पर या सत्ताकेंद्रित राजनेताओं की सम्पत्ति में ही दिखाई देते हैं। ओडिशा के तीन जिलों– कालाहांडी, बलांगीर और कोरापुट को उदहारण के लिए देखा जा सकता है। इन पिछड़े जिलों के लिए स्वर्गीय पी.वी.नरसिंह राव की सरकार ने अत्यंत संवेदनशील मान कर केबीके परियोजना की शुरुआत की थी और यहाँ के उत्थान के लिए करोड़ों रुपयों की सहायता राशि दी गई थी। समय-समय पर अन्य सरकारें भी सहायता करती आई हैं परन्तु इन क्षेत्रों के लोगों का विकास आज तक नहीं हो सका है। आज भी मनरेगा, पीडीएस आदि सरकारी योजनायें होने के वावजूद पलायन जारी है। केबीके इलाकों में आदिवासी दादन, दिन मजदूर और बंधुआ मजदूर बनने के लिए विवश हैं। ओडिशा टाइम्स के अनुसार “दादन समस्या एक व्याधि का रूप धारण कर चुकी है, सरकारी योजनायें केवल कागजों तक सीमित है, जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान कर रही है। गरीब आदिवासियों की मानव तस्करी, दलाल एवं दलाल एवं मिल मालिक सरकार की आँखों में धूल झोंक रहे हैं। इन क्षेत्रों के बुद्धिजीवियों का यह कहना है कि जब तक आँध्रप्रदेश के मिल मालिकों एवं दलालों को रोकने के लिए कड़े कदम नहीं उठाये जायेंगे तब तक इन समस्याओं से मुक्ति नहीं मिलेगी।”३

इक्कीसवीं सदी में भी अगर आदिवासी बंधुआ मजदूर बनते रहें तो यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एच.एल.दत्तू का कहना है कि ”किसी भी सभ्य समाज में बंधुआ मजदूरी एक कलंक है । भारत में लम्बे समय से यह बुराई कायम रही है और इसे खत्म करने के सरकारों के तमाम दावों के बावजूद कई जगह पर यह अब भी बदस्तूर जारी है।”४ अक्तूबर ५,२०१६ के ओडिया दैनिक समाचार पत्र ‘संवाद’ के अनुसार आदिवासी बहुल जिलों की स्थिति दयनीय है। आदिवासी श्रमिक गाँव छोड़कर जाने के लिए विवश हैं। अल्पवृष्टि के कारण खेती नहीं हो पाती, किसान चिंतामग्न है। मनरेगा योजना असफल है, राज्य में रोजगार के अवसर नहीं है। इसलिए दादन के रूप में, बंधुआ मजदूर के रूप में राज्य के बाहर जाने के लिए मजबूर हैं। अक्तूबर २८, २०१६ में प्रकाशित ‘समाज’ के अनुसार मुख्यमंत्री का यह कहना है कि २०१८ तक दादन समस्या को संपूर्णतः दूर कर दिया जाएगा परन्तु वस्तुस्थिति यह है कि बलांगीर, कालाहांडी, कोरापुट के आदिवासी राज्य के बाहर जा रहे हैं। ”अध्ययन के दौरान यह भी पाया गया कि पलायित होने वाले बंधुआ मजदूर अधिकांशतः अनुसूचित जाति या जनजाति के हैं, जिनमे बहुतों के पास न तो घर के जमीन का पट्टा है, न ही खेत का, जंगल की जमीन पर रहते हैं।”५

आदिवासियों का सतत विकास कैसे हो किसी भी सरकार के पास कई योजनायें हैं परन्तु नाकाफी हैं। जंगल की सुरक्षा के नाम पर वन विभाग द्वारा वृक्षारोपण का कार्य किया जाता है परन्तु प्राकृतिक दूरदर्शिता के अभाव में आदिवासियों के आजीविका का ख़याल नहीं किया जाता। ओडिशा के कंधमाल जिले में अत्यंत संवेदनशील आदिम कुटिया कंध जनजाति बुनियादी अनाज और फल एवं अन्य खाद्य पदार्थ से वंचित हो गए हैं क्योंकि वहां के जंगलों में टीक क पेड लगा दिए गए, जो उनके किसी काम के नहीं हैं। उन आदिवासियों का मानना है कि वे जंगल को भगवान मानते हैं एवं जंगल उनके लिए खाद्य, औषधि एवं जल के स्रोत हैं, इन आवश्यकताओं की पूर्ति टीक के पेड़ नहीं कर सकते । (टाइम्स ऑफ़ इंडिया, २ अगस्त, २०१६)

इक्कीसवीं सदी में विदेशी निवेश से ही देश आगे बढ़ सकता है यह धारणा बना दी गयी है। वैश्वीकरण के दौर में भारत का आर्थिक विकास के साथ-साथ आदिवासियों का सतत विकास कैसे हो इसकी चिंता सरकारों को नहीं है। आदिवासी विस्थापन की समस्या, नक्सलवाद की समस्या, शिक्षा, भाषा एवं संस्कृति की समस्या के साथ-साथ महत्वपूर्ण है प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग, जिससे समग्र मानवीय विकास हो सके तथाकथित विकास के भस्मासुर से अगर दुनिया को बचाना है तो सर्वोदय या सर्वनाश में से किसी एक को चुनना पड़ेगा।

आधुनिक समाज में विकास का अर्थ केवल भौतिक विकास तक ही सीमित है। जल, जमीन और जंगल की सुरक्षा कैसे हो उसके लिए केवल कागज़ी क़ानून और उनके क्रियान्वयन का दिखावा ही है। विदेशी पूँजी निवेश ही भारत को आगे ले जाने का एकमात्र रास्ता है, यह धारणा विगत दो तीन दशकों से सरकारों द्वारा निर्मित है। प्रकृति पर उसका क्या प्रभाव पड़ रहा है इसको लेकर अनंत वैठकें आयोजित किये जाते हैं जो किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँचते। वैश्विक व्यापार नीति का खूब का ढिंढोरा खूब पीटा जाता है परन्तु सारी दुनिया में बेरोज़गारी बढती जा रही है और महंगाई किसी के काबू में नहीं आ रही है। इसके वावजूद आदिवासियों के सतत विकास संभव है जब सरकारी योजनाओं को ऐसे तैयार किया जाए कि जिससे उन्हें प्रत्यक्ष लाभ हो। इसका रास्ता भी कालाहांडी के आदिवासियों ने दिखाया है– जिसमे जल संरक्षण, जमीन को समतल करना, शस्य की विविधता, जैविक खेती, जैविक सार उत्पादन तैयार करना आदि कुछ कार्य इसके उदहारण है। झरने के पानी को खेती के जमीन तक पहुँचाया गया है, ताकि यहाँ के आदिवासियों को काम करने के लिए बाहर न जाना पड़े। वस्तुतः आदिवासी संकट सरकारी उदासीनता एवं संवेदनहीनता के कारण ही है। विकास और विनाश में से एक को चुन कर सतत विकास के लिए ठोस कार्य करने होंगे अन्यथा आजादी के ७० वर्ष बीत जाने के बाद भी यहाँ के मूल आदिवासी बुनियादी सुविधा, मौलिक अधिकार से वंचित होंगे और गुलामी की जिंदगी जीने के विवश होंगे।

सन्दर्भ :

१. रत्नाकर भेंगरा, सी.आर.बिजोय और शिमरी चौन लुइथुई, ‘माय नौरिटी राइट्स ग्रुप इंटरनेशनल, पृष्ठ-२६

२. हरिश्चंद्र शाक्य, आदिवासी और उनका इतिहास, अनुराग प्रकाशन, नई दिल्ली, २०११, पृष्ठ-१०७

३. ओडिशा टाइम्स, नवम्बर २,२०१६

४. आउटलुक, फ़रवरी १५, २०१७

५. चन्द्रिका, जनादेश, फ़रवरी ७, २०१७

२१ वीं सदी की कवयित्रियों के काव्य में स्त्री विमर्श –  हरकीरत हीर 

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woman covering her face with her hand

२१ वीं सदी की कवयित्रियों के काव्य में स्त्री विमर्श –  हरकीरत हीर

‘२१ वीं सदी  में सबसे ज्यादा चर्चित विषय रहा है स्त्री विमर्श।  समाजशास्त्रियों के लिए, राजनीतिज्ञों के लिए और साहित्य के लिए पिछले ५०-६० वर्षों से यह स्त्री विमर्श, ‘नारी मुक्ति आन्दोलन’ के नाम पर एक नए रूप में सार्वजानिक रूप से एक ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है. सामान्य रूप से ‘ विमर्श ‘ अंग्रेजी के ‘ डिस्कोर्स ‘ शब्द के पर्याय के रूप में प्रचलित है , जिसका अर्थ उक्त विषय पर दीर्घ एवं गंभीर चिंतन करना है।  नारी विमर्श पश्चिमी देशों से आयातित एक संकल्पना (सामान्य विचार) है. इंग्लॅण्ड और अमेरिका में उन्नीसवीं शताब्दी में फेमिनिस्ट मूवमेंट से इसकी शुरुआत हुई. यह आन्दोलन लैंगिक समानता के साथ-साथ समाज में बराबरी के हक के लिए एक संघर्ष था, जो राजनीति से होते हुए साहित्य, कला, एवं संस्कृति तक आ पहुँचा ,देखा जाये तो २१ वीं सदी की कविताओं में  क्रिया-प्रतिक्रिया के रूप में इस विमर्श के पक्ष और विपक्ष में रह-रह कर उच्च स्वर उठते रहे हैं और लगभग एक दशक से यह विमर्श ‘नारी सशक्तिकरण’ के नाम से लगातार चर्चा और लेखन का प्रमुख विन्दु रहा है जिसमें कविताओं ने आग में घी का कार्य किया। खासकर महिलाओं की लेखनी ने।जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से महिलाओं की शोषित सामाजिक और पारिवारिक छवि को सार्वजनिक किया. स्त्रियों पर होते अत्याचार और उनकी मार्मिक दशा पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया. निश्चित तौर पर इस दौरान महिलाओं की दमित और शोषित परिस्थितियां उल्लेखनीय ढंग से परिमार्जित हुईं. जहां एक ओर महिलाओं को पुरुषों के ही समान कुछ आवश्यक और मूलभूत अधिकार मिलने लगे, वहीं शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कारण महिलाएं भी स्वयं अपनी महत्ता को समझने लगीं.लेकिन अभी भी स्त्री शोषित होती है ,इसलिए इसमें विमर्श की अति आवश्यकता है।
औरत की आजादी को लेकर हमेशा ही वाद विवाद और संवाद होते रहे हैं.  एक ओर पुरुष वर्चस्व है और दूसरी ओर स्त्री-मुक्ति की चुनौतियाँ और स्त्री के आधआरभूत सम्मान का प्रश्न भी। इस शोध का मंतव्य है कि स्त्री-संघर्ष के विविध पहलुओं को सामने रखते हुए भूमंडलीकृत समय में स्त्री-मुक्ति की दिशा की सही तस्वीर सामने रखला है।
आज की औरत कितनी आजाद है, इस पर विधिवत विमर्श कम ही हुआ है। समाज को एक नारी के प्रति नये दृष्टि कोण को अपनाना होगा।  इस सच्चाई से भी इनकार नही किया जा सकता कि नारी आज भी प्रताड़ित है। इसके लिए हम देखेंगे २१ वीं सदी की कवयित्रियों की कविताओं में उठ रहे विद्रोह के स्वर को।  क्योंकि साहित्य में स्त्री विमर्श के अन्तर्गत स्त्री द्वारा लिखा गया और स्त्री के विषय में लिखा गया साहित्य ‘साहित्यिक स्त्री विमर्श’ माना जाता है।  स्त्री होने के नाते स्त्री ही स्वानुभूति पर आधारित प्रामाणिक व विश्वसनीय साहित्य की रचना कर सकती है। पुरुष लेखक संवेदना के स्तर पर, समानानुभूति के आधार पर स्त्री पीडा को व्यक्त करने में सक्षम रहे हों, लेकिन स्त्री-पीडा का यथार्थ चित्र्ण उतनी ईमानदारी से नहीं कर सके हैं।

स्त्री विमर्श अब अपने परंपरागत स्वरुप तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि संसद तक को भी गुंजायमान कर चुका है  और दिल्ली की ‘दामिनी प्रकरण’ से तो न्यायपालिका भी परोक्ष रूप से इस विमर्श में सम्मिलित हो गयी थी।
‘दामिनी प्रकरण” पर हजारों कविताएं लिखी गयीं जिसमें से वरिष्ठ कथाकार और कवयित्री सुधा आरोड़ा के लहू खौलाते शब्द  मैं यहां पेश करना चाहूंगी –

दामिनी ! / जीना चाहती थी तुम / कहा भी था तुमने बार बार  / दरिंदों से चींथी हुई देह से जूझते हुए  / मौत से लडती रही बारह दिन  / कोमा में बार बार जाती  / लौट लौट आती  / कि शायद / साँसे संभल जाएँ ……. / आखिर हत्यारे जीते  / तुम्हारा जीवट थम गया  / और तुम चली गयी दामिनी !  / लेकिन तुम कहीं नहीं गयी दामिनी / अब तुम हमेशा रहोगी  / सत्ता के लिए चुनौती बनकर ,  / कानून के लिए नई इबारत बनकर , / स्त्री के लिए बहादुरी की मिसाल बनकर ,  / कलंकित हुई इंसानियत पर सवाल बनकर , /सदियों से कुचली जा रही स्त्रियों का सम्मान बनकर !

महादेवी वर्मा के अनुसार — “..नारी के स्वभाव में कोमलता के आवरण में जो दुर्बलता छिप गयी है वही उसके शरीर की सुकुमारता बन गयी जिसका लाभ पुरुष वर्ग ने उठाया है । छेड़ छाड़ एवम बलात्कार उन कुत्सित मनोवृत्तियों का परिणाम है जो कुंठित हो चुकी हैं ।और याद दिलाता है कि वह एक स्तर पर जानवरों से भिन्न नहीं है..।” इस कविता ने सचमुच स्त्री उत्पीडन का इतिहास ज़िंदा कर दिया ,यह कविता वर्तमान समय में बहुत ही प्रासंगिक है !  यह कविता एक उत्पीड़ित स्त्री के दर्द को जिस ढंग से सामने लाती है, वह नि:संदेह इस कविता को अन्य कविताओं से अलग करता है और स्त्री विमर्श को नई चुनौती देता है।

पाश्चात्य देशों की तरह, भारत भी नारी-अपमान, अत्याचार एवं शोषण के अनेकानेक निन्दनीय कृत्यों से ग्रस्त है। उनमें सबसे दुखद ‘कन्या भ्रूण-हत्या’ से संबंधित अमानवीयता, अनैतिकता और क्रूरता की वर्तमान स्थिति हमारे देश की ही ‘विशेषता’ है…उस देश की, जिसे एक धर्म प्रधान देश, अहिंसा व आध्यात्मिकता का प्रेमी देश और नारी-गौरव-गरिमा का देश होने पर गर्व है।
वैसे तो प्राचीन इतिहास में नारी पारिवारिक व सामाजिक जीवन में बहुत निचली श्रेणी पर भी रखी गई नज़र आती है, लेकिन ज्ञान-विज्ञान की उन्नति तथा सभ्यता-संस्कृति की प्रगति से परिस्थिति में कुछ सुधर अवश्य आया है, फिर भी अपमान, दुर्व्यवहार, अत्याचार और शोषण की कुछ नई व आधुनिक दुष्परंपराओं और कुप्रथाओं का प्रचलन हमारी संवेदनशीलता को खुलेआम चुनौती देने लगा है। साइंस व टेक्नॉलोजी ने कन्या-वध की सीमित समस्या को, अल्ट्रासाउंड तकनीक द्वारा भ्रूण-लिंग की जानकारी देकर, समाज में कन्या भ्रूण-हत्या को व्यापक बना दिया है। दुख की बात है कि शिक्षित तथा आर्थिक स्तर पर सुखी-सम्पन्न वर्ग में यह अतिनिन्दनीय काम अपनी जड़ें तेज़ी से फैलाता जा रहा है।
इस व्यापक समस्या को रोकने के लिए गत कुछ वर्षों से साहित्य में  चिंता व्यक्त की जाने लगी है। जब हम हिंदी साहित्य में काव्य के माध्यम से ‘भविष्य की नारी’ पर विचार-विमर्श करते हैं तो दृष्टि पटल पर सहसा हमारा ध्यान आकृष्ट करता है, पिछले वर्ष २०१४ में प्रकाशित सम्वेदनशील कवयित्री हरकीरत हीर का काव्य संग्रह ‘दीवारों के पीछे की औरत ‘ जिसमे कवयित्री ने नारी-अस्मिता, नारी चेतना के विषय में समाज के विभिन्न वर्गों से तो वार्तालाप किया ही है, कन्या भ्रुण हत्या जैसे मसले  पर भी खुल कर कलम चलाई है ,  कवयित्री ने गर्भ  में ही बेटियों को मारे जाने पर सवाल उठाये हैं . यह सवाल भावी स्त्री विमर्श, स्त्री की दशा और दिशा को नए रूप, नए अंदाज, नए तेवर और नयी योजना-परिकल्पना के रूप में एक शोधित, संशोधित, परिवर्तित समाज की रूपरेखा प्रस्तुत करता है जो ‘भविष्यत की नारी’ के रूप में ‘स्त्री विमर्श’ की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है.उनकी ‘अजन्मी चीख के सवाल ‘ शीर्षक कविता के कुछ अंश उल्लेखनीय हैं , जिसमें कोख की बेटी अपनी माँ से सवाल करती है और अपना कसूर जानना चाहती है –
मुझे आज भी याद है / वह भयानक दिन  / उस दिन खूब जोरों से बिजली कड़की थी  / कोई बादल फट पड़ा था आसमां में  / इक भयानक सी आकृति का चेहरा  / बढ़ आया था मेरी ओर  ….  / उस दिन मान मैं खूब चीखी थी  / जोर -जोर  चिल्लाई थी  / तुझे न जाने कितनी बार पुकारा माँ  / पर तुम नहीं आई  ….  / धीरे -धीरे कोई तेज धार से  / मेरे अंगों को काटने लगा था  / मैं पीड़ा से कराहती तुझे पुकारती रही माँ  / पर तू नहीं आई  … / मेरे नन्हें -नन्हें हाथ पैरों को  / टुकड़ों टुकड़ों में काट दिया गया  / फिर आँख , कान , गला भी रेत दिया गया  / मुझे  अजन्मी को ही  / मार दिया गया माँ   ……

हमारे शास्त्रों-पुराणों में ऐसे हजारों संदर्भ भरे पडे है जिनमें स्त्री को एक वस्तु या सम्पत्ति की तरह पुकारा गया है। धर्म के ठेकेदारों ने भी ईश्वर के पश्चात पूरा ध्यान स्त्री पर ही केन्द्रित किया तथा सारे नियम कायदों से स्त्रियों को लाद दिया गया । मेरा मानना है कि असंयमित वासना प्राप्ति संघर्ष से बचने के लिए पूरूष प्रधान समाज ने ही विवाह जैसी संस्था का निर्माण किया और उसके यौन मामलों को लज्जा की संज्ञा देकर एक बेहद कीमती और नाजुक कांच की दीवार बना दिया। इससे स्त्री जाति को एक बड़ी हानि हुई, वह है- विवाह पश्चात ही स्त्री का सामाजिक मूल्य खत्म हो गया । वह सिर्फ भोग्या बन गई।  वह दिनभर घर का काम करती , बच्चों की देखभाल करती और पति की सेवा में तत्पर रहती , किसी ने कभी जरुरत नहीं समझी कि उसकी जरूरतों को , उसकी तकलीफों को भी समझा जाये, उसके मनोभावों को भी समझा जाये । वह सिर्फ एक मशीनी वस्तु बन कर रह गई जो सबकी जरूरतें तो पूरी करती है पर अपने लिए जीना भूल जाती है। पति भी उसे सिर्फ अपनी थकान मिटाने का साधन समझता है।  यहां हरकीरत ‘हीर ‘ के ही अन्य एक काव्य संग्रह ‘खामोश चीखें ‘ का उदहारण देना चाहूंगी जिसमें ‘औरत  …’ शीर्षक कविता में वे लिखती हैं –

वह मेरे जिस्म से खेला   / होंठों को निचोड़ा  / और छाती पर सर रख कर सो गया  / किसी को खबर भी न हुई  / कब मेरी पलकों पर ठहरी हुई बून्द  / बर्फ में तब्दील हो गई  … / उस ने उतार ली  / मेरे जिस्म की खूंटी से  / अपनी दिन भर की थकान  / पर मैं कैसे झाड़ू हुई  / कैसे बर्तन बनी  / और कैसे फ्रिज बन उसका बिस्तर बनी  / किसी को खबर भी न हुई   …

हांलाकि वैवाहिक संबंध प्राकृतिक नियमों के अनुरूप है लेकिन उसके पीछे की रूढ़ियॉ एवं कायदे इस नियम को अप्राकृतिक बनाते है । जो स्त्री की स्वतंत्रता का हनन करते है उसे सिर्फ भोग्या  बना देते हैं।  हमें सोचना होगा कि समाज में यह विकृति कैसे आई ? सृष्टि का आधार नारी जो समाज और घर का आधार शृंगार है वो अचानक भोग की वस्तु क्यों बन गई ? विश्व की इस अद्वितीय भारतीय संस्कृति में ही हम स्त्री को पूजनीय कहते आये हैं तभी तो पुरुष उनकी ही बदौलत आज भी महिमा मंडित  है ! भारतीय दर्शन में सृष्टि का मूल कारण अखंड मातृसत्ता अदिति भी नारी है और वेद माता गायत्री है ! नारी की महानता का वर्णन करते हुये ”महर्षि गर्ग” कहते हैं कि :-
यद् गृहे रमते नारी लक्ष्‍मीस्‍तद् गृहवासिनी।

देवता: कोटिशो वत्‍स! न त्‍यजन्ति गृहं हितत्।।

( जिस घर में सद्गुण सम्पन्न नारी सुख पूर्वक निवास करती है उस घर में लक्ष्मी जी निवास करती हैं। हे वत्स! करोड़ों देवता भी उस घर को नहीं छोड़ते। )

भारत में हमेशा से ही नारी को उच्च स्थान दिया गया । भारतीय संस्कृति में नारी का उल्लेख ‘श्री’, ‘ज्ञान’ तथा ‘शौर्य’ की अधिष्ठात्री नारी रूप में किया गया है !आदिकाल से ही हमारे देश में नारी की पूजा होती आ रही है। आज भी आदर्श-रूप में भारतीय नारी में तीनों देवियाँ सरस्वती,लक्ष्मी और दुर्गा की पूजा होती है ! भला ‘अर्द्धनारीश्वर’ का आदर्श को कौन नहीं जानता ? किसी भी मंगलकार्य में नारी की उपस्थिति को अनिवार्य माना गया है ! नारी की अनुपस्थिति में किये गए कोई भी मांगलिक कार्य को अपूर्ण माना गया। उदहारण के लिए हम सत्यनारायण भगवान् की कथा को ही ले लेते है ! वेदों के अनुसार सृष्टि के विधि-विधान में नारी सृष्टिकर्ता ‘श्रीनारायण’ की ओर से मूल्यवान व दुर्लभ उपहार है। नारी ‘माँ’ के रूप में ही हमें इस संसार का साक्षात दिग्दर्शन कराती है, जिसके शुभ आशीर्वाद से जीवन की सफलता फलीभूत होती है। फिर वह पुरुष की नज़र में सिर्फ भोग्या कैसे बन गई ?

डॉ रमा द्विवेदी जी ने २०१३ में प्रकाशित अपने हाइकु संग्रह ”साँसों की सरगम’’ में नारी-चेतना, नारी-अस्मिता और नारी-जीवन के दुःख-दर्द को युक्ति और तर्क के साथ निर्भीक और निडर होकर रेखांकित किया है. बढ़ती हुयी कन्या भ्रूण हत्या के प्रति उनकी घृणित मानसिकता के लिए समाज को ही नहीं, अपने परिवार और पति को भी कठघरे में खड़ा किया है. सोच और कथ्य की दृष्टि से यह एक अनूठा कार्य है. वे लिखती हैं  – “जीवनदाता/ बन गया राक्षस/ सुरक्षा कहाँ?” क्योकि बाहर तेरा सबसे बड़ा शत्रु तो वही है, जिसका तू अंश है. वे सभी को ललकारते हुए आगे कहती है- “जन्मदात्री हूँ/ बेटी भी मैं जनूंगी/ रोकेगा कौन?”. कवयित्री एक सामान्य नारी को उसकी वास्तविक शक्ति से परिचित करना चाहती है, इसी को लक्षित कर वे लिखती हैं –“आग का गुण/ केवल जलना नहीं/ जलाना भी है”,भ्रूण हत्या पर वे  स्त्री भ्रूण हत्या/ बिगाड़ा संतुलन/ सृष्टि का नाश”,फिर तर्क करती हैं – “बिगड़ेगा जो/ सृष्टि का संतुलन/ ब्याहोगे किसे?” आहत होकर असहाय सी अपनी वेदना प्रकट करती है – “गर्भ सुरक्षा/ दे सकती हूँ बेटी/ बाहर नहीं”

विवाह संबंध विच्छेद या विधवापन की सूरत में तो एक स्त्री का जीवन और भी कष्टप्रद है , क्योंकि टूटी कांच की दीवार को कोई घर में नही सजाता , न वह ससुराल की रह पाती है न मायके की . एक तलाकशुदा औरत के लिए समाज में अकेले जीवन यापन इतना कठिन हो जाता कि कई बार ऐसी स्थिति में वह आत्महत्या तक कर बैठती है।  इसी विषय पर दीपिका रानी की झकझोरती हुई कविता मुझे मिली रश्मि प्रभा द्वारा सम्पादित पुस्तक ”शब्दों के अरण्य में ” में।  कवयित्री लिखती हैं –

पति  बिछुड़ी औरत  / एक घायल सिपाही है / उसके हथियार छीन लिए गए हैं  / सिंदूर चूड़ियाँ बिछुवे / इनके बगैर वह लड़ नहीं सकती  / उसे दिखाया नहीं गया  / कोई और रास्ता  / उसके घर में  / बाहर की ओर खुलने वाला दरवाजा  / बंद हो गया है  / धक गए हैं रोशनदान खिड़कियाँ  / परम्परा के मोटे पर्दों से  / पति से बिछुड़ी औरत  / एक जिन्दा सती है  / उसके सपनों का दाह – / संस्कार नहीं हुआ  / अपने अरमानों की राख़  / किसी गंगा में प्रवाहित नहीं की उसने  / अब उसे कामनाओं की अग्नि -परीक्षा में  तप कर कुंदन बनना है ….

हमारे समाज में आज भी विधवा विवाह, पुर्नविवाह जैसे कोई अपराध हो । इस पर समाज में पाबंदी जैसी स्थिति है । हम स्वयं अपनी संस्कृति पर गर्व करते हुए फूले नही समाते है किन्तु जब स्त्री पुनर्विवाह या विधवा विवाह जैसी बात आती है तो हमारे संस्कार आड़े आने लगते हैं।

भारतीय नारियों में त्याग, सेवाभाव, सहिष्णुता एवं निष्ठा के गुण विद्यमान हैं। नारी प्राचीन काल से ही अपनी अद्भुत शक्ति प्रतिभा, चातुर्य, स्नेहशीलता, धैर्य, समझ, सौन्दर्य के कारण हर मोर्चे पर पुरुष से आगे नहीं तो पीछे भी नहीं रही है। जहाँ वह पति को पूज्य व देवता के समतुल्य मानती है, वहाँ पति को भी उसे गृहलक्ष्मी या किसी देवी से कम नहीं समझना चाहिए .
यद् गृहे रमते नारी लक्ष्मीस्तद गृहवासिनी।
देवता कोटिशो वत्स न त्यज्यंति ग्रहहितत्।।
अर्थात् जिस घर में सद्गुण सम्पन्न नारी सुखपूर्वक निवास करती है उस घर में लक्ष्मी जी निवास करती हैं। हे वत्स ! करोड़ों देवता भी उस घर को नहीं छोड़ते।
नर-नारी दोनों गृहस्थी रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। स्त्री के बिना तो किसी घर की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इसीलिए कहा गया है—‘बिन घरनी घर भूत समाना।’ इसी सिलसिले में हम देखेंगे पूनम मटिया की एक कविता ‘ फिर क्यों सहूँ अत्याचार ‘ जो प्रकाशित हुई है बोधि प्रकाशन से डॉ लक्ष्मी शर्मा के संपादन में आये काव्य संग्रह ”स्त्री होकर सवाल करती है  …. !” में , यह संग्रह एक मुक्त स्त्री का सशक्त स्वर है।  जिसकी कवितायेँ पारिवारिक ,आर्थिक , दाम्पत्य , सामाजिक जैसी पारम्परिक शृंखलाओं के साथ ही नवीन स्त्री की चुनौतियों पर भी प्रश्न उठती हैं , उनसे मुक्ति की मांग करती हैं —
नारी में नर समाया / जानकर भी तनिक उसका मन न भरमाया  / माँ , बहन और पत्नी हर रूप में सिर्फ उसका ही भला चाहा  / फिर क्यों उसने इक पल भी सोचा नहीं  / सिर्फ हाथ उठाया और आक्षेप ही लगाया / कोमल , भावुक हूँ यह जान उसने हर अवसर पर मुझे दबाया  / अबला हूँ पर कमजोर नहीं , चुप हूँ पर शब्दों की कमी नहीं  / प्रणय सूत्र में बंधी चली आई , तात्पर्य इसका यही  / कि गयी है कोई गाय -भैंस ब्याही  …

अपने एक लेख ‘स्त्री विमर्श ऒर हिन्दी स्त्री लेखन’ में श्रीमती धर्मा यादव ने कुछ ऐसा मत व्यक्त किया है कि   -“कहानी में जितनी स्त्रियां गतिशील हॆं उतनी कविता में नहीं हॆं ।”  अर्थात कविता में व्यक्त संवेदना की अपेक्षा स्त्री चेतना की कथा साहित्य में व्यापकता मिलती हॆ. मेरा ऐसा मानना है कि ऐसा नहीं है।  आज बहुत सी युवा कवयित्रियों के स्त्री चेतना के स्वर अंतर्जाल पर धड़ल्ले से उभरते देखे जा सकते हैं।  जब -जब भी स्त्री पर कोई अनाचार ,अत्याचार हुआ विरोध में फेसबुक पर कविताओं की बाढ़ सी आ गई  चाहे वह निर्भया कांड हो या कोई अन्य स्त्री विषयक घटना , अंतर्जाल पर तुरंत विरोध के स्वर उठने लगते हैं।  खासकर फेसबुक पर।  जब २०१२ में धनबाद की सोनाली नामक महिला पर तेजाब फेंका गया और उसका खूबसूरत चेहरा बुरी तरह से तेजाब से जला दिया गया तब फेसबुक की चर्चित कवयित्री वंदना गुप्ता की ये दहकते शोलों सी कविता ने दिल हिला कर रख दिया –

मुझमें उबल रहा है एक तेज़ाब / झुलसाना चाह रही हूँ खुद को / खंड- खंड करना चाहा खुद को / मगर नहीं हो पायी / नहीं ….नहीं छू पायी  / एक कण भी तेजाबी जलन की / क्योंकि  / आत्मा / को उद्वेलित करती तस्वीर / शायद बयां हो भी जाए / मगर जब आत्मा भी झुलस जाए / तब कोई कैसे बयां कर पाए / देखा था कल तुम्हें  / नज़र भर भी नहीं देख पायी तुम्हें / नहीं देख पायी हकीकत / नहीं मिला पायी आँख उससे / और तुमने झेला है वो सब कुछ / हैवानियत की चरम सीमा /शायद और नहीं होती / ये कल जाना / जब तुम्हें देखा / महसूसने की कोशिश में हूँ / नहीं महसूस पा रही / जानती हो क्यों / क्योंकि गुजरी नहीं हूँ उस भयावहता से / नहीं जान सकती उस टीस को / उस दर्द की चरम सीमा को / जब जीवन बोझ बन गया होगा / और दर्द भी / शर्मसार हुआ होगा

स्त्री चाहे पॊराणिक काल की हो या आधुनिक युग की, वह सदॆव ऎसे प्रश्नों से जूझती रही हॆ, जिनका उत्तर मांगने तक का उपक्रम, दुस्साहस कहलाता हॆ।  नारी में त्याग एवं उदारता है, इसलिए वह देवी है। परिवार के लिए तपस्या करती है इसलिए उसमें तापसी है। उसमें ममता है इसलिए माँ है। क्षमता है, इसलिए शक्ति है। किसी को किसी प्रकार की कमी नहीं होने देती इसलिए अन्नपूर्णा है।नारी की कोमलता, सुन्दरता और मोहकता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। नारी का प्रेम सृजनात्मक है।  नारी सृष्टि सर्जक है। वह संकट-काल में भी साक्षात् काली बनकर संहार करने में समर्थ है। किन्तु समाज में जब इसी नारी का निरादर होता है , अनाचार होता है तो उसे एक शिक्षित व सभ्य समाज के  हितकर नहीं मन जायेगा।  किसी समाज या परिवार के विकास के लिए नारी का हर तरह से योगदान होता है , यदि वही दबी कुचली जाएगी तो फिर किसी प्रगतिशील समाज की संकल्पना भी नहीं की जा सकती।   ऐसे समय में अपनी एक बिलकुल अलग तरह की कविताओं के माध्यम से पूर्वोत्तर की कवयित्री डॉ तोंब्रम रीता रानी देवी अपने काव्य संग्रह ‘ अँधेरे कमरे में बंद औरत ‘ में  ‘मुक्त कर दो उसे ‘ शीर्षक कविता में कहती हैं–

अय पुरुष  …!/ स्त्री का तुमने / आज तक किया है शोषण / कभी माँ के नाम पर /  कभी पत्नी के नाम पर / कभी बेटी के नाम पर / तो कभी बहू के नाम पर / और तुम  कहाते रहे / पुरुषार्थी  …. ! / स्त्री का शोषण / क्या  पुरुषार्थ का काम है ? / क्या वास्तव में तुम पुरुषार्थ हो ?/जिसके मन में लहराता है पुरुषार्थ / जो होता है स्वामी सहस का / दूसरों को ऊपर उठाता है वो / रखकर प्राण हथेली पर / देकर अपना सर्वस्व / ओ पुरुषार्थी !/ तुमने तो जलाया है मुझे / बार -बार ….

भारतीय वैदिक साहित्य में नारी को देवी का स्वरुप माना गया है | वह जन्मदात्री है | उसकी अस्मिता की रक्षा करना समाज का नैतिक दायित्व बनता है।  वह मायके में अपनी उड़ान , भाई बहन  सब छोड़ कर ससुराल आती है , आते ही उस पर अंकुश लगा दिए जाते हैं , उसकी स्वतंत्रता छीन ली जाती है , उसे एक बोनसाई बनाकर रख दिया जाता है , जो खिलता तो है पर उसमें कभी परिपक्वता नहीं आती।  हरकीरत हीर के संपादन में बोधि प्रकाशन से आई पुस्तक ‘ अवगुंठन की ओट से सात बहने ‘ ने स्त्री विमर्श के उस अनछुए पहलू को हमारे सामने रखा है  | नारी शक्ति को समर्पित इस कृति की कविताओं का आस्वाद बिलकुल भिन्न है |  इसी काव्य संग्रह में असमिया की एक कवयित्री कुंतला दत्त की ”बोन्साई ” शीर्षक कविता की इसी संदर्भ में कुछ पंक्तियाँ हैं –

बोन्साई की तरह रोपा गया हमें / एक ‘शो पीस ‘ की तरह / सजाया गया हमें / बस एक निश्चित परिधि तक / पलने और बढ़ने दिया गया हमें / हाथ और पाँव / फ़ैलाने की स्वतंत्रता /होती हमें / बढ़ने लगें तो / निश्चित अवधि पर काट -छाँट दिया जाता है हमें / और निश्चित अन्विति पर फल प्राप्ति की /  की जाती है आशा हमसे / पर उन फलों में / वह खासियत / वह परिपक्वता नहीं होती / जो आम फलों में होती है / जिनसे इक बलवान पौधा / फिर दोबारा जन्म ले सके / बोन्साई उम्र भर के लिए /  होकर रह जाते हैं बौने  ….

२१ वीं सदी की कवयित्रियों  की रचनाओं में यह साफ प्रदर्शित होता है कि भारतीय समाज ने  हमेशा से ही महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा दूसरे दर्जे का स्थान दिया है. उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति शोषित और असहाय से अधिक नहीं देखी गई. महिलाओं को हमेशा और हर क्षेत्र में कमतर ही आंका गया जिसके परिणामस्वरूप उनके पृथक अस्तित्व को कभी भी पहचान नहीं मिल पाई. उसे बचपन से ही उसके स्त्री होने आभास दिला दिया जाता है , उसकी संपूर्णता के विषय में गंभीरता से चिंतन करना किसी ने जरूरी नहीं समझा।  डॉ मालिनी गौतम अपने काव्य संग्रह ”बूँद -बूँद का अहसास ” में ‘काव्य कोकिला ‘ शीर्षक कविता में लिखती हैं –

मैं हूँ औरत / सर से पाँव तक औरत / पालने में ही घिस -घिस कर / पिला दी जाती है मुझे घुट्टी / मेरे औरत होने की /  उसी पल से मुझे / कर दिया जाता है विभक्त / अलग -अलग भूमिकाओं में / बना दिया जाता है मुझे / नाज़ुक , कोमल ,  लचीली / ताकि मैं ज़िन्दगी भर / उगती रहूँ उधार के आँगन में / पनपती रहूँ अमर बेल बनकर / किसी न किसी तने का सहारा लिए / कुछ भी तो नहीं होता मेरा अपना / न जड़ें  …. न आँगन / और न आसमान ……

इस पुरुष प्रधान समाज ने हमेशा ही स्त्री को घर की चारदीवारी में कैद रखा है ।  पुराने समय से ही देवदासी प्रथा ,  सती प्रथा , दहेज प्रथा , पर्दा प्रथा ने स्त्रियों की स्थिति को दयनीय बना दिया है।  इस पुरुष प्रधान समाज में स्त्री बचपन में पिता , जवानी में पति  और बुढ़ापे में पुत्रों की अवहेलना का शिकार होती आई है। कभी धोखे से जायदाद लेकर बेटा माँ को एयरपोर्ट पर अकेला छोड़ विदेश चला जाता है , तो कभी जायदाद के लिए उसकी हत्या तक कर देता है , उसे घर से निकाल  देता है , या उसके मरने का इंतजार करता है ताकि जल्द से जल्द उसकी जायदाद पर कब्जा कर सके।  जो माँ बेटे के जन्म पर खुशियाँ मानाती नहीं थकती  वही माँ अपने अंतिम दिनों में उसी बेटे की आँखों में खटकने लगती है।  इसी दृष्ट्व्य को हरकीरत हीर के सम्पादन में बोधि प्रकाशन से आई पुस्तक ‘माँ की पुकार ‘ में आशमा कौल  ने अपनी ‘विडंबना ‘ शीर्षक कविता में बखूबी दिखाया है –

कितनी खुश हुई थी तुम / पुत्र के जन्म पर / थाल पिटवाए थे / लड्डू बंटवाए थे / गली के हर घर में / छिपाए रखती थी तुम / उसे सीने में / एक चीख पर उसकी / दौड़ी चली आती थी / काला टिका लगाकर /नज़र से उसे बचाती थी / बाँहों से उतरता न था / वह दिन रात / और तुम उसकी ख़ुशी /  जाती थी भूल / थकी बाहों का दर्द / उसकी खातिर लड़ा करती थी सबसे / उसके हक के लिए / भीड़ जाती थी तुम  …. / पर समय की चल ने बदला है आज / सबका ही हाल / अब जवान नहीं रही तुम / वह भी अब बच्चा नहीं है / आज वह बहुत स्याना हो गया है / छिपा कर रखता है तुम्हें / तुम्हारे  के पिछले कोने में / कराहती हो दर्द में जब तुम / दरवाजा अपने कमरे का बंद करके / कहता है बीवी से / और कितने  जियेगी बुढ़िया / यह सुनकर / कान बंद कर लेती हो तुम / कि कहीं बेटे के लिए कोई / बददुआ न निकल जाये  …

भारत में विधवाओं की स्थिति भी बदतर है। विधवाओं को अशुभ माना जाता है. तमाम कानूनों के बाद आज भी उन्हें पति की संपत्ति से बेदखल कर दिया जाता है और वे दर-दर भटकने के लिए मजबूर हो जाती हैं। भारत में हर साल हजारों विधवाएं उत्तर प्रदेश के वृंदावन का रुख़ करती हैं. परिवारवालों ने उन्हें छोड़ दिया है और अब इस दुनिया में वे अकेली हैं। लोग स्त्री के विधवा होते ही लांछन और प्रताड़ना कर शिकार बना देते हैं। उसे घर से धक्के मार कर निकाल देते हैं। भले ही उसके पास जीने, रहने का कोर्इ आसरा न हो। इस 21वीं सदी में भारतीय स्त्री की प्रगति का दंभ करने से पहले एक बार गंभीरतापूर्वक खंगालना होगा उन कारणों को जो विधवाओं को आश्रमों में शोषित होने के लिए विवश कर रहे हैं। विधवा की स्थिति का कमलेश शर्मा ने अपने काव्य -संग्रह ‘कल्पना ‘ के अंतर्गत ‘विधवा ‘ शीर्षक कविता में बखूबी वर्णन किया है  —

” विधवा बेचारी का जीवन क्या रह जाता है / उसके पति के मरते ही सभी खत्म हो जाता है / उसके सभी रंग फीके पड़ जाते हैं / जीने के सभी अधिकार छीन लिए जाते हैं / दे दिए जाते हैं सफेद कपड़े पहनने को / कोई नहीं मौका दिया जाता उसे हँसने चहकने को  …”

देखा जाये तो विश्व में आधी आबादी स्त्रियों की है।  लेकिन उसकी पहचान माँ , पत्नी , बहन , बेटी , प्रेमिका आदि से ही की जाती है , एक स्वतंत्र और स्वावलंबी स्त्री की हैसियत से नहीं।  नारी की इस दुखद स्थिति एवं विडंबनापूर्ण नियति के लिए सांस्कृतिक मान्यताएं एवं धारणाएं जिम्मेदार हैं वरना नारी तो अकेले ही समय के तूफानों से मुकाबला करने का साहस रखती है . आज नारी अपनी पहचान स्वयं बनाने को तत्पर है।  हवाओं में चिराग़ जलाने वाली , तूफानों में किश्ती बहाने वाली नारी आज पुरुष से किसी भी मायने में कम नहीं। लंदन की कवयित्री ‘कमलेश शर्मा ‘ अपने काव्य संग्रह ‘वंदना ‘ में ‘नारी ‘ शीर्षक कविता में लिखती हैं —

इतना कमजोर न समझो नारी वह चट्टान है / हिला न सकोगे , माथा पटकोगे , दो टूक हो जाओगे / बिखर जाओगे छोटे कंकड़ों की तरह / नारी तो चट्टान है उसे हिला न पाओगे / ममता की मूर्त है , तन मन धन लुटा देती है / अपने पराये , सभी आँचल में छिपा लेती है / वह साक्षात है प्यार की देवी /अपनी पराये सब पर प्यार न्योछावर कर देती है . …

सच है स्त्री अपने हर रूप को कर्तव्यता से जीती है , चाहे वह माँ रूप में हो , बहन रूप में या बेटी रूप में , वह अपनी पीड़ा भूलकर भी सबके सुख के लिए तत्पर रहती है।   अपने इसी काव्य संग्रह में कवयित्री ‘बेटी ‘ शीर्षक कविता में कहती हैं —
” बेटी वह ,  जो हमेशा हर समय साथ देती है / लेने की इच्छा है उसे , सदैव मायके के लिए जान देती है / सदा दुआएं मांगती रहती माँ के घर की /मायके से जाकर भी , क़ुरबानी कर देती है अपने तन की। ”

आज नारी ने स्वयं को ‘वस्तु’ मानने से इंकार कर दिया है , अपने शरीर के ख़िलाफ़ शोषण का वैचारिक मोर्चा उठा लिया है और इस पुरुष प्रधान समाज की ज्यादतियों , पारंपरिक रीति -रिवाज़ों एवं विवाह प्रणाली के विरुद्ध विद्रोही रुख़ अख्तियार कर लिया है।  वह इस पुरुष प्रधान समाज से जानना चाहती है कि शरीर की पवित्रता के सारे प्रमाण पत्र उसी से ही क्यों ? कभी पुरुष से उसकी पवित्रता के लिए क्यों प्रश्न नहीं उठाये जाते ? क्यों उस पर कोई रोक -टोक लक्ष्मण रेखाएं नहीं खींची जाती।  कंचन शर्मा अपने काव्य संग्रह ‘ तालाब में कंकड़ ‘ की ‘नारी ‘ शीर्षक कविता में कुछ इसी तरह के प्रश्न उठाती हैं , देखिये —

कौन हो ? कहाँ  से आई ?/ क्या नाम है ?/कौन पिता , कौन पति तुम्हारा ?/ सुहागन , पतिता या कुमारी ?/प्रश्न ये सभी / क्यों पुरुष से नहीं ? / पिता , पति , पुत्र /सर्वत्र पुरुष ही /नारी का परिचय ?/पवित्रता का प्रमाण पत्र ? भाग्यविधाता ?/और -/ पुरुष के लिए – / ऐसा कुछ भी नहीं ; / क्यों ?
इस ‘क्यों’ में स्त्री के भीतर की समस्त आक्रोश छिपा है।  स्त्री होने के गुनाह स्वरूप जो उस पर पाबंदियां लगाई गयी हैं उनके विरुद्ध उठी उसकी ये आवाज़ समाज से जवाब चाहती है।  अब वह इस झूठे संस्कार रीति -रिवाज़ों, लज्जा के तमाम आवरण तोड़ पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहती है।  इसी काव्य- संग्रह में कंचन शर्मा ने अपनी भूमिका काव्य रूप में लिखते हुए कहती हैं –

ढहा दे झूठे संस्कारों / रीति -रिवाज़ों / लज्जा और पवित्रता की दीवारें ! / जो चारों ओर खड़ी हैं / और तुम – / घूँघट ताने , छाती झाँपे / कब तक बकरी बन मिमयाओगी ?

औरत ,औरत पैदा नहीं होती उसे औरत बना दिया।   बचपन से ही उसके अंदर लड़के और लड़की का भेद -भाव भर दिया जाता है और बड़ी होते -होते वह अपना भाग्य पुरुष के हाथों सौंप देती है।  कौमार्य में पिता , यौवन में पति और बुढ़ापे में पुत्र के आगे लाचार बनकर रह जाती है।  उसका  स्वयं का कोई वजूद नहीं कोई अस्तित्व नहीं , कोई पहचान नहीं। इसी बात को कवयित्री शशि प्रभा अत्रि अपने काव्य -संग्रह ‘ आस्था , एहसास और स्वीकृति ‘ में ‘पहचान ‘ शीर्षक कविता में बखूबी कहती हैं —

मैं / आंसुओं की लौ में / मोमबत्ती से / लगातार / पिघलती चली गई  / और / अपना आकर खो दिया / आश्चर्य / मेरे अस्तित्व की लाश पर / तुमने अपनी पहचान कायम की

जैसे-जैसे समाज में नारी की निरीह स्थिति में बदलाव आया है और वह अबला से सबला बनने की तरफ अग्रसर हुई है, वैसे-वैसे वह अपने अधिकारों के प्रति सजग और सचेत भी हुई है। परिणामस्वरूप पुरूष प्रधान समाज के बंधनों के खिलाफ उसने विद्रोह किया है। स्त्री के क्रांतिवीर तेवरों से परिवार की बुनियादें हिल गयी हैं और पारिवारिक विघटन भिन्न-भिन रूपों में समाज में पसरता जा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि पुरूष का परम्परागत मध्ययुगीन मानस स्त्री के मौलिक अधिकारों को स्वीकार नहीं कर पाता। वह उसे दबाना चाहता है और स्त्री अपनी गुलाम मानसिकता वाली सती-साध्वी, प्रेयसी या पति-परमेश्वरी छवि को तोड़कर अपना स्वतंत्र वजूद बनाना चाहती है। सामंती समाज में स्त्री माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, दासी आदि के रूप में थी-उसका अपना अलग वजूद नहीं था। आधुनिकता और बौद्धिकता के कारण वह अपने निजी स्वरूप और अपनी भावनों एवं इच्छाओं के प्रति सचेत हुई है।वह भी खुले आकाश उड़ान भरना चाहती है , अपनी पहचान बनाना चाहती है।  ऐसे में मुझे पूर्वोत्तर की कवयित्री कुसुम लता जैन की  ‘खुले आकाश में ‘ शीर्षक कविता याद आती है –

रोको मत मुझे भी उड़ने की मोहलत दो / उन्मुक्त हो खुले आकाश में ताकि / पहुंच सकूँ गगन के उस छोर पर / जहां खुशियों के उगते इन्द्रधनुष पर झूम सकूँ / सपनों के हकीकत के मुस्कुराते चाँद पर नाच सकूँ /उमंगों  के झिलमिलाते सितारों पर कूक सकूँ / जहाँ न हो पुरुषों द्वारा खींची गई / लक्ष्मण रेखा के सारहीन संदर्भ / न हो मनपाखों  जबरन रखी गई / बेनामी कर्तव्यों  और जिम्मेदारियों की भारी गठरी / न हो अनकही  पीड़ाओं का बेहिसाब भार / घुटती साँसे , उपेक्षाओं के दंश / न  वर्जनाओं की ऊँची -दीवार / कदम – समझौतों की मार , क़हर ढाते अत्याचार / न न हो त्याग व संयम की परीक्षाएं  ……

इक्कीसवीं सदी की महिलाओं ने अपने लेखन में जीवन एवं समाज के सभी रंगों को अपनी कुशल तूलिका रूपी लेखनी से बड़ी भावात्मकता एवं कलात्मकता से उकेरा है। इसमें कहीं वृद्ध समस्या है तो कही लौकिक प्रेम अलौकिकता पर न्योछावर कहीं पुरानी मान्यताओं का खंडन, बड़े परिवार की समस्या, आधुनिक जीवन का बनावटी खोखला जीवन, पाश्चात्य संस्कृति में भटकती हमारी युवा पीढ़ी का ’सह-जीवन’ आज भावुकता से कोसों दूर….. संवेदना शून्य विशुद्ध व्यापारिक रिश्ते पर टिका मानवीय संबंध और उस विषमय वातावरण में दिनों दिन जकड़ता हमारा समाज एवं परिवार के उन सभी के तीखे रंग हमें इस सदी के लेखन में पूर्ण रूप से मिलता है।

निष्कर्षतः कहना चाहूंगी कि २१ वीं सदी की कवयित्रियों का लेखन अनंत संभावनाओं से युक्त है। यह भी सच है कि मुश्किलें हैं भेदभाव हैं, दमन है और भी विकटतम प्रतिकूलताओं के बावजूद वे अपनी पहचान स्थापित करना चाहती है। स्त्री लेखन का उद्देश्य मानवीय समाज की स्थापना है अपने यथार्थ बोध की अनुरूपता में उसका मूल्यबोध भिन्न है, इस भिन्नता की पहचान को समझना होगा।इस सदी ने औरत को नया चेहरा दिया अपनी अलग सी पहचान दी। इस जमाने का साहित्य लेखन-महिलाओं का लेखन बहुत बड़ा परिवर्तन लेकर आता है।उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि, इक्कीसवीं शताब्दी की कवयित्रियों का लेखन उच्चकोटि का होकर वैविध्य पूर्ण है, वर्तमान में नारी लेखन में यथार्थोन्मुख आदर्शबाद के स्वरूप को स्पष्ट करने का प्रयास है।’नारी शोषण’ की जगह अब ’नारी स्वातंत्र्य’ पुरुषों की होड़ में वह हर जगह अपना अधिकार जमाने की क्षमता रखने लग गयी है। पर्वतारोहण, सेना, पुलिस, अंतरिक्ष, वायुयान चलाने आदि कितने ही ऐसे क्षेत्र हैं, जहां नारी का बीसवीं सदी के पहले, मात्र पुरुषों का अधिकार था, बड़े साहस, हिम्मत और दिलेरी का परिचय दे सफलता के शिखर पर आरूढ़ हुई है। आज नारी अपनी अस्मिता को लेकर जागरूक है परंतु वह सामाजिक, पारिवारिक और नैतिक जिम्मेदारियों का निर्वहन बखूबी कर रही है। वह विद्रोही है परंतु यह विद्रोह उसका रचनात्मक कहा जाए तो अच्छा होगा क्योंकि सास, ससुर, ननद, देवर, पति बच्चे सब रिश्तों को वह लेकर चल रही है। आज की कवयित्रियाँ इस बात को बखूबी समझती हैं। वह अपनी समस्याओं से लड़ना जानती है रिश्तों को निभाते हुए लेखन कार्य कर रही हैं . उन्होंने अपने लेखन से नारी जीवन के प्रत्येक कोने में लगे जाले को हटाने का प्रयास किया है  आज नारी अपने जीवन का निर्णय किसी दूसरे के हाथ में नहीं देना चाहती और न बोझिल रिश्तों की डोर जबरन पकड़े रहना चाहती है।

संदर्भ  ग्रन्थ सूचि  –
(१) सुधा आरोड़ा , vaatayan.blogspot.com , 09757494505
(२) हरकीरत हीर ,  दीवारों के पीछे की औरत (हापुड़ , उ. प्र ), आगमन प्रकाशन (२०१४ ), पृष्ठ -६५
(३) हरकीरत ‘हीर’ ,खामोश चीखें , आगमन प्रकाशन (हापुड़ , उ. प्र ) (२०१४ ) , पृष्ठ – ८५
(४) डॉ. रमा द्विवेदी : साँसों की सरगम, हिन्द युग्म प्रकाशन, नई दिल्ली, २०१३
(५) दीपिका रानी ,  रश्मि प्रभा (संपा) : ‘शब्दों के अरण्य में’, हिन्द युग्म प्रकाशन, नई दिल्ली, २०१२.
(६) डॉ लक्ष्मी शर्मा (संपा ) ‘स्त्री होकर सवाल करती है ‘ , बोधि प्रकाशन , जयपुर ,२०१२ , पृष्ठ – ३६३
(७) फेसबुक Vandana Gupta November 26, 2012
(८) डॉ तोंब्रम रीता रानी देवी, अँधेरे कमरे में बंद औरत , तोंब्रम  प्रकाशन ,इम्फाल ,२००८ , पृष्ठ -३९
(९) कुंतला दत्त , हरकीरत हीर (संपा ) , अवगुंठन की ओट से सात बहने ‘ बोधि प्रकाशन , जयपुर , २०१३ , पृष्ठ – ६३
(१०) डॉ मालिनी गौतम , अयन प्रकाशन , नई दिल्ली , २०१३ , पृष्ठ – ७७
(११) आशमा कौल , हरकीरत हीर (संपा), माँ की पुकार ,बोधि प्रकाशन , जयपुर (२०१४ ) , पृष्ठ -१३४ , १३५
(१२) कमलेश शर्मा , कल्पना , सुभाष मित्तल प्रिंटिंग प्रैस , बठिंडा ,२००६  , पृ -३८
( १३ ) कुसुम लता जैन , खुले आकाश में , ओमेगा बुक्स , दिल्ली , २००९ , पृष्ठ – ३३ ,फोन – ९८१०९८७६५५
(१४ ) कमलेश शर्मा , वंदना , सुभाष मित्तल प्रिंटिंग प्रैस , बठिंडा ,२००५ , पृ – ६९ , ७५
(१५) कंचन शर्मा , तालाब में कंकड़ ,सहयोगी प्रकाशन , दुर्गापुर ,वर्धमान , २००८ , पृ –  ४१ , ४
(१६) शशि प्रभा अत्रि , आस्था ,एहसास और स्वीकृति , निर्मल बुक ऐजन्सी , कुरुक्षेत्र ,२००७ ,पृ- ३०

शोधार्थी: हरकीरत ‘हीर’
एम.ए. (हिंदी ), डी सी एच
सुंदरपुर , हाउस न -५
गुवाहाटी -५ (असम )
मोब – ९८६४१७१३००
ई मेल – harkirathaqeer@gmail.com

इक्कीसवीं सदी की पहले दशक की कहानियाँ और मुस्लिम जीवन

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इक्कीसवीं सदी की पहले दशक की कहानियाँ और मुस्लिम जीवन

ज्योतिष कुमार यादव

एम.फिल. पीएच.डी. (शोध छात्र)

हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद

ई-मेल -jyotishyadav1990@gmai।.com

हिन्दी साहित्य में बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध का समय विमर्शों के उभरने का समय रहा है, जिसमें क्रमशः स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श आदि प्रमुख हैं । इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ होते ही एक नए विमर्श के रूप में अल्पसंख्यक विमर्श भी सामने आता है । अल्पसंख्यक विमर्श में विशेष रूप से मुस्लिम-समुदाय की बात की जाती है ।

आज जबकि मुस्लिम समुदाय का एक तबका अच्छी स्थिति में है तो वहीं दूसरा तबका जिसे ‘पसमांदा समाज’ के नाम से जाना जाता है, वह हाशिये पर है । ‘पसमांदा’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-‘पस’ और ‘मांदा’, ‘पस’ का अर्थ -पीछे और ‘मांदा’ का अर्थ है-जो छूट गया, अर्थात वह समाज जो पीछे छूट गया है । मुस्लिम समुदाय में उच्च वर्ग (अशरफ) और निम्न वर्ग (अरजाल) के बीच बहुत बड़ी दीवार है । उच्च वर्ग अपने लाभ के लिए निम्न वर्ग की समस्याओं को सामने न रखकर ऐसी समस्या रखते हैं, जिनसे निम्न वर्ग का कोई लेना-देना नहीं रहता है, जैसे-बाबरी कांड, हिन्दी, उर्दू की समस्या, धर्म आदि ।

मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को इक्कीसवीं सदी की पहले दशक के कहानीकारों ने बेजोड़ ढंग से सम्प्रेषित किया है, जिनमें अब्दुल बिस्मिल्लाह, असगर वजाहत, अनवर सुहैल, शमोएल अहमद, नासिरा शर्मा, मंजूर एहतेशाम, नीलाक्षी सिंह, गीतांजलि श्री, नसरीन बानो, रशीद जहाँ, हसन जमाल, अलिफा रियात, हबीब कैफ़ी, जेबा रशीद, नीला प्रसाद, शकील, रंजन जैदी, विजय, रणेंद्र, अनुज आदि चर्चित हैं । इन कहानीकारों की कहानियों में मुस्लिम जनजीवन की पूरी झलक परिलक्षित होती है । अब्दुल बिस्मिल्लाह की कहानी ‘जीना तो पड़ेगा’ प्रमुख रूप से मुस्लिम समाज में मनुष्य की पीड़ा को उकेरती है । कहानी का एक प्रसंग है -“ अक्किल मामा उर्फ़ आकिल साहब उर्फ़ अब्दुल गफ्फार एक झिलगी-सी खटिया पर पड़े थे । पूरे जिस्म में सूजन थी और आवाज़ बैठी हुई । गुड्डन मियाँ को देखते ही उन्होंने उठने की कोशिश की मगर गुड्डन मियाँ ने उन्हें दोनों हाथों का सहारा देकर लिटा दिया ! “तबियत कैसी है मामू ?” गुड्डन मियाँ ने बातचीत शुरू की ! “देख ही रहे हो गुड्डन ! अब आखिरी है ।”1 ‘अरजाल’ जिसे ‘पसमांदा समाज’ के नाम से भी जाना जाता है, उनकी समाज में अच्छी स्थिति न होने के बावजूद भी उनके अंदर जिजीविषा देखने को मिलती है । हिन्दू समाज में जहाँ निचले तबके के लोगों को ‘अस्पृश्य’ कहा जाता है, वहीं मुस्लिम समाज में ‘अरजाल’ के नाम से शुमार किए जाते हैं । फ़र्क है तो सिर्फ़ धर्म का, लेकिन इन दोनों में कोई भेद नहीं है, अली अनवर के शब्दों में -“मैला वो भी फेका करते, मैला हम भी साफ़ करते । अंतर सिर्फ़ इतना था कि उन्हें डोम और भंगी कहा जाता और हमें मेस्तर और खाकरोब या हलालखोर नाम से जाना जाता । इस तरह लालबेगी, हलालखोर, मोची, पासी, भांट, भटियारा, पमरिया, नट, बक्खो, डफाली, नालबन्द, धोबी, साईं वगैरह दर्जनों जातियाँ ऐसी हैं, जिसका धर्म भले अलग-अलग (हिन्दू-मुस्लिम) हो लेकिन पेशा तथा सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति एक जैसी है ।”2

असगर वजाहत की कहानियों में राजनीतिक व्यंग्य ज्यादा मिलता है । वे एक अलग शैली के माध्यम से कहानियों को गढ़ते हैं । ‘मैं हिन्दू हूँ’ कहानी-संग्रह की सारी कहानियाँ व्यंग्य प्रधान कहानियाँ हैं । इस संग्रह की कुछ कहानियाँ मुस्लिम जीवन पर भी आधारित हैं l इनकी ‘वस्ताद जमूरा बदकही’ शीर्षक कहानी में व्यंग्य के माध्यम से मुस्लिम-समाज की सच्चाईयों को सम्प्रेषित किया गया है । अनवर सुहैल की कहानियों में कथावस्तु के तौर पर अल्पसंख्यक मनोग्रंथि से ग्रस्त मुस्लिम परिदृश्य, समाज में स्त्री और वृद्धों के प्रति अमानवीय व्यवहार, मनुष्य का लोभी होना, उपभोक्तावादी संस्कृति का आम-आदमी पर पड़ता प्रभाव, निर्मम संवेदनाएँ आदि को देखा जा सकता है । इनकी ‘दहशतगर्द’ शीर्षक कहानी में साम्प्रदायिकता की समस्या को उकेरा गया है । गुजरात के गोधरा कांड से जोड़कर इस कहानी को देखा जा सकता है । इस कहानी में मुस्लिम समाज में व्याप्त अंधविश्वास की प्रवृत्ति को भी उद्घाटित किया गया है । कहानी का एक प्रसंग है -“लड़कियाँ कम उम्र में ब्याह दिए जाने के कारण रक्ताल्पता, टीवी और अन्य असाध्य रोगों से पीड़ित हो जाती हैं । हारी-बीमारी की दशा में मेडिकल जाँच न कराकर मियां भाई झाड़-फूंक, गंडा-तावीज़, मन्नत-मनौतियों के चक्कर में बर्बाद हो जाता है ।”3

शमोएल अहमद की कहानियों के विषय में बहुत ही वैविध्य नहीं है । इनकी कहानियों का विषय प्रमुख रूप से नारी-शोषण, साम्प्रदायिकता और मज़हबी आड़ में हो रहे गलत कार्य के इर्द-गिर्द रहता है । मुस्लिम समुदाय में व्याप्त नारी शोषण पर आधारित कहानियों में ‘बदलते रंग’, ‘ऊँट’, ‘मृगतृष्णा’, ‘मिश्री की डली’, ‘बहराम का घर’ आदि महत्वपूर्ण हैं । ‘बदलते रंग’ शीर्षक कहानी वेश्या स्त्री पर आधारित है । ‘ऊँट’ कहानी में एक ऐसी स्त्री का चित्रण है, जो आर्थिक तंगी के कारण इमाम के हवस का शिकार बन जाती है । ‘मृगतृष्णा’ कहानी दम्पत्ति के बीच के टकराव को सम्प्रेषित करती है । ‘मिश्री की डली’ कहानी में मुस्लिम समाज में स्त्री शोषण को उकेरा गया है । नासिरा शर्मा का रचना-संसार बहुत ही विस्तृत है । इन्होंने उपन्यास, कहानी, आलोचना, रिपोर्ताज, नाटक, अनुवाद, सीरियल-टेली फ़िल्म आदि क्षेत्रों में लेखनी की है । नासिरा शर्मा बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं । सृजनात्मक लेखन के साथ ही साथ उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है । हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी व पश्तो भाषा का ज्ञान इनके पास है । इनकी 2001 में प्रकाशित कहानी-संग्रह ‘इंसानी नस्ल’ की सारी कहानियाँ स्त्री विमर्श से संबंधित हैं । इन कहानियों में बहु-विवाह की समस्या, मेहर की समस्या, बाँझ स्त्री की समस्या, प्रेम-विवाह, दम्पत्ति के बीच टूटन आदि समस्याओं को देखा जा सकता है । इनकी कहानियों के बारे में प्रो. वीरेंद्र मोहन ने इस प्रकार टिप्पणी की है -“दिक्-काल के परिवर्तित होते रूपों और बदलते मूल्यों से बनने वाले समाज को भीतर से पहचानने का प्रयत्न यदि नासिरा शर्मा की कहानियों की एक विशेषता है तो नारी मन और जीवन की अनेक-अनेक पर्तों को खोजने का उपक्रम भी इन कहानियों की एक विशेषता कही जाएगी ।”4

मंजूर एहतेशाम की 2001 में प्रकाशित कहानी-संग्रह ‘तमाशा तथा अन्य कहानियों’ का विषय मुस्लिम परिवेश की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक समस्या है । इस संग्रह में संकलित ‘घेरा’ कहानी एक वृद्ध पुरुष और उसकी नव युवती पत्नी के बीच संबंधों को लेकर लिखी गई है । आज मनुष्य के पास धन है लेकिन वह ख़ुश नहीं है, वह धन से सब कुछ हासिल कर ले रहा है, परन्तु सुखी नहीं है । मंजूर एहतेशाम ने इस कहानी के माध्यम से मुस्लिम समाज में व्याप्त अवैध-सम्बन्धों की पोल को खोला है, जो कि एक यथार्थ है । ‘पुल पुख्ता’ कहानी सरकार की दोहरी नीति की पोल खोलती है । ‘तमाशा’ कहानी मुस्लिम समाज में व्याप्त बेरोजगारी की समस्या पर केन्द्रित है । कहानी का एक प्रसंग है -“आलम ने अपनी दुल्हन के लिए सात कोठरियों से एक कोठरी किसी किरायेदार को उसकी मुंहमांगी रकम देकर, खाली करा ली थी, उसके कहे अनुसार, आरा मशीन के मालिक से एडवांस लेकर ।”5 इस कहानी में मुस्लिम समाज में छोटी उम्र की लड़कियों पर किस तरह धर्म को उड़ेल दिया जाता है, उसकी ओर भी संकेत किया गया है -“दरअसल जमीला के फ़ौरन बाद शादी के लायक तो घर में शकीला थी, लेकिन उस ज़माने में उस पर अल्लाह मियाँ की गाय बनने और कहलाने का भूत सवार था । एक छोटी-सी कोठरी में भी उससे जितना बन सकता, वह पर्दा भी करती और इबादत भी । उसके सिर से दुपट्टा, सोते-जागते, इस तरह बंधा रहता जैसे आमतौर पर औरतें नमाज़ पढ़ने वक्त कसकर बांधती हैं ।”6

गीतांजलि श्री की कहानियों में एक ख़ास सिग्नेचर ट्यून मिलता है । इनकी कहानियों में एक अलग तरह का फक्कड़पन, एक अजीब तरह की दार्शनिकता और एक अजीब तरह की भाषा मिलती है । उन्होंने मुस्लिम जीवन को केन्द्र बनाकर कई कहानियाँ गढ़ी हैं । इनकी ‘आजकल’ शीर्षक कहानी साम्प्रदायिकता को केन्द्र बनाकर लिखी गई है । इस कहानी में साम्प्रदायिकता के चलते मुस्लिम समाज कितना भयभीत हो जाता है, उसका सजीव चित्रण किया गया है । इस कहानी को गुजरात दंगे से जोड़कर देखा जा सकता है । इनकी एक और कहानी है -‘बेलपत्र’ । इस कहानी में दम्पत्ति के ऊपर धर्म के प्रभाव को रेखांकित किया गया है । पत्नी मुस्लिम और पति हिन्दू है, दोनों प्रेम विवाह करते हैं । लेकिन कुछ ही समय बीतने के बाद दोनों में दरार पड़ जाती है, कारण मज़हब । “यह हमारी हार है फ़ातिमा ! कोई वजह नहीं कि हम हारें …तुम…तू…त…तुम…”ओम घोर निराशा में हकलाने लगा । “मैं अब कुछ नहीं जानती । बंद करो ।” फ़ातिमा त्रस्त हो चुकी थी । ओम का ह्रदय कराह उठा, फ़ातिमा, डूब जाओगी । हम दोनों मिट जाएँगे ।”7

भारत में साम्प्रदायिकता के चलते मुस्लिम समाज को बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़ता है । हालाँकि हिन्दू और मुस्लिम दोनों कौमों को हानि पहुँचती है । भारत में इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में प्रमुख रूप से सन् 2002, सन् 2006, सन् 2007, सन् 2008, सन् 2009 में बड़े पैमाने पर दंगे हुए । उदाहरण के तौर सन् 2007 पर में निम्नलिखित जगहों पर दंगे हुए -18 जनवरी, जयपुर, 21 जनवरी, इंदौर, 27 जनवरी, गोरखपुर, 12 फरवरी, इंदौर, 16 फरवरी, जयपुर, 24 मार्च, जम्मू कश्मीर, 28 मार्च, गुजरात (जामनगर), 1 अप्रैल, मध्यप्रदेश, 12 अप्रैल, नांदेड़, 13 मई, शाहजहांपुर, 14 जून, अहमदाबाद, 1 सितम्बर, इलाहाबाद, 17 सितम्बर, महाराष्ट्र , 19 सितम्बर, सूरत, 27 सितम्बर, बड़ौदा आदि । साम्प्रदायिकता पर असग़र अली इंजीनियर ने इस प्रकार टिप्पणी की है -“अगर धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ हिम्मत और धैर्य से काम लें तो कोई कारण नहीं कि हमारे देश से साम्प्रदायिक हिंसा का दानव हमेशा के लिए विदा हो जाए ।”8

नसरीन बानो की कहानियों का विषय अधिकांश हिन्दू समाज ही रहा है, लेकिन कुछ कहानियाँ मुस्लिम स्त्री समाज पर भी आधारित हैं -‘बाबुल का द्वार’ कहानी मुस्लिम स्त्री पीड़ा को व्यंजित करती है । कहानी में एक माँ अपनी चार लड़कियों का किसी तरह पालन पोषण करती है । एक दिन एक लड़की आर्थिक तंगी के चलते गैर लड़के के साथ भाग जाती है । इस कहानी की भाषा-शैली बहुत ही मार्मिक है ।

इधर बीच एक बहस चली है- ‘अल्पसंख्यकवाद के खतरे की’ । दुनिया की हर सरकार अल्पसंख्यक को अपनी क्षमता अनुसार सुविधाएँ प्रदान करती हैं । यदि अल्पसंख्यक, अल्पसंख्यक बनकर रहें तो किसी भी देश की सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन अल्पसंख्यक अपनी विचारधारा को सरकार पर जबरदस्ती थोपने लगते हैं तब मामला गड़बड़ा जाता है । अल्पसंख्यक की विचारधार जब एक राजनीतिक रूप पकड़ लेती है, तब वह देश की एकता को खतरा पैदा करती है, यही वह जड़ है जहाँ से अल्पसंख्यकवाद के खतरे सामने आने लगते हैं । मुजफ्फर हुसैन ने अल्पसंख्यकवाद के खतरे पर इस प्रकार टिप्पणी की है -“अल्पसंख्यकों का एक चरित्र यह भी देखा जाता है कि वे राजनीतिक रूप से बड़े सतर्क और जागरूक होते हैं । इसलिए हर देश में उनके अपने समाचार-पत्र और मीडिया के अन्य साधन हैं । किसी भी देश को किसी समाज की भाषा, वेशभूषा और त्योहार से भला क्या आपत्ति हो सकती है; लेकिन जब आपकी यह पहचान राजनीतिक स्वरूप लेने लगती है तब अल्पसंख्यकवाद के खतरे खड़े हो जाते हैं ।”9 हबीब कैफ़ी की कहानी ‘मार-मारकर’ धर्मान्तरण के प्रश्न को उजागर करती है । जेबा रशीद की कहानी ‘तपती रेत’ स्त्री विमर्श को उकेरती है, कहानी का एक प्रसंग है -“हालात ने अन्नो को तन्हा ज़िन्दगी जीने को मजबूर कर दिया । अगर किसी औरत को पति से दबते देखती तो उसे शेरनी बनने को उकसाती, लेकिन खुद बशीरा के आगे दब्बू बन जाती ।”10

नीला प्रसाद की कहानी ‘एक दुनिया समानांतर’ गोधरा कांड को कथ्य बनाकर लिखी गई है । कहानी में गोधरा कांड से भयभीत मुस्लिमों की पीड़ा का चित्रण किया गया है । शकील की ‘तहारत’ कहानी में मज़हब की आड़ में हो रहे खून खराबे, दंगे का सजीव चित्रण है । अनुज की कहानी ‘अनवर भाई नहीं रहे’ में मुस्लिम समुदाय में युवाओं में भटकाव, पीड़ा, कुंठा और रोष आदि को सम्प्रेषित किया गया है । कहानी में पीड़ा से दम तोड़ते मनुष्य का बहुत ही सूक्ष्म चित्रण है -“ऐसे में हम सब ये तो जानते थे की किसी भी दिन अनवर भाई की मौत की ख़बर आ सकती है, लेकिन यह ख़बर इतनी जल्दी आ जाएगी इसकी उम्मीद नहीं थी ।”11

विवेचन के बाद कहा जा सकता है कि इक्कीसवीं सदी की पहले दशक की कहानियों में मुस्लिम जीवन का यथार्थ अंकन किया गया है । इस दशक के कहानीकारों ने अलग-अलग शिल्प के माध्यम से कहानियाँ गढ़ी हैं । मुस्लिम समुदाय का एक तबका तो अच्छी स्थिति में है, लेकिन इस समुदाय का निचला तबका जिसे ‘पसमांदा मुसलमान’ के नाम से जाना जाता है उसकी हालत दयनीय है । जिसके कारण ‘पसमांदा समाज’ हाशिये का जीवन यापन कर रहा है । इस दशक की कहानियों की भाषा बेजोड़ रही है ।

सन्दर्भ

  1. अब्दुल बिस्मिल्लाह-रफ़-रफ़ मेल, पृ.20

  2. अली अनवर-मसावात की जंग पसेमंजर: बिहार के पसमांदा मुसलमान, पृ.24

  3. अनवर सुहैल-चहल्लुम, पृ.124

  4. एम.फिरोज अहमद (सं.)-नासिरा शर्मा: एक मूल्यांकन, पृ.251

  5. मंजूर एहतेशाम-तमाशा तथा अन्य कहानियाँ, पृ.140

  6. वही, पृ.139

  7. गीतांजलि श्री-प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ.38

  8. असगर अली इंजीनियर-धर्म और साम्प्रदायिकता, पृ.146

  9. मुजफ्फर हुसैन-खतरे अल्पसंख्यकवादके, पृ.114

  10. हरिनारायण(सं.)-कथादेश, वर्ष-14,अंक-5, जुलाई, 2004, पृ.79

  11. रवीन्द्र कालिया(सं.)- वागर्थ, जून,2006, पृ.73

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हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

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एम.ए. हिंदी पाठ्यक्रम

सत्रप्रश्न पत्र शीर्षक 
प्रथम सत्र101- हिंदी साहित्य का इतिहास (आदिकाल से रीतिकाल तक) 
 102- आदिकालीन हिंदी काव्य 
 103- भक्तिकालीन हिंदी काव्य 
 104- हिंदी कथा साहित्य 
 105- भारतीय काव्यशास्त्र 
द्वितीय सत्र201- रीतिकालीन हिंदी काव्य 
 202- आधुनिक हिंदी काव्य-1 
 203- हिंदी नाटक 
 204- सामान्य भाषाविज्ञान 
तृतीय सत्र301- आधुनिक हिंदी काव्य- 2 
 302- हिंदी आलोचना 
 303- हिंदी के अनेक गद्य रूप 
 304- हिंदी साहित्य का इतिहास (आधुनिक काल) 
 305- पाश्चात्य काव्यशास्त्र 
 202- आधुनिक हिंदी काव्य-1 
 203- हिंदी नाटक 
 204- सामान्य भाषाविज्ञान 

प्रथम सत्र [प्रश्न पत्र- 1] [101- हिंदी साहित्य का इतिहास (आदिकाल से रीतिकाल तक)]

इकाई – 1: इतिहास-दर्शन

 इतिहास और आलोचना, इतिहास और अनुसंधन

 साहित्येतिहास-दर्शन के समकालीन सिद्धान्त

 साहित्येतिहास-लेखन की प्रमुख अवधरणाएँ: मध्ययुगीनता, पुनर्जागरण और आधुनिकता

 हिंदी साहित्य के इतिहासों का इतिहास

 काल-विभाजन और उसकी समस्याएँ

इकाई – 2: आदिकाल

 नामकरण की समस्या, पृष्ठभूमि: विभिन्न परिस्थितियाँ

 रासोकाव्य-परंपरा, प्रमुख प्रवृत्तियाँ

 प्रमुख कवि (चंदबरदाई, जगनिक, अमीर खुसरो, विद्यापति)

इकाई – 3: भक्तिकाल

पृष्ठभूमि एवं प्रवृत्तियाँ

प्रमुख एवं गौण कवि तथा उनका काव्य (कबीर, रविदास, दादू, सुंदरदास, कुतुबन, मंझन, जायसी,

तुलसीदास, सूरदास, नंददास )

निर्गुण एवं सगुण काव्यधराएँ: प्रमुख विशेषताएँ

इकाई – 4: रीतिकाल

नामकरण की समस्या

पृष्ठभूमि एवं प्रवृत्तियाँ

प्रमुख एवं गौण कवि तथा उनका काव्य (केशव, बिहारी, देव, मतिराम, घनानंद, बोध, आलम, ठाकुर,

गुरुगोविंद सिंह, रज्जब)

रीतिबद्ध और रीतिमुक्त काव्यधराओं की विभेदक विशेषताएँ

प्रस्तावित पुस्तकें-

हिंदी साहित्य का इतिहास: रामचंद्र शुक्ल

हिंदी साहित्य की भूमिका: हजारीप्रसाद द्विवेदी

रीतिकाव्य की भूमिका: डॉ. नागेंद्र

हिंदी साहित्य का इतिहास: संपादक डॉ. नागेंद्र

साहित्य का इतिहास दर्शन: नलिन विलोचन शर्मा

हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास: रामकुमार वर्मा

अन्य सहायक पुस्तकें

साहित्य और इतिहास दृष्टि: मैनेजर पाण्डेय

मध्यकालीन बोध् का स्वरूप: हजारीप्रसाद द्विवेदी

हिंदी साहित्य का अतीत (भाग 1, 2): विश्वनाथ प्रसाद मिश्र

हिंदी साहित्य का इतिहास: पूरनचंद टंडन, विनीता कुमारी

अप्रभ्रंश साहित्य: हरिवंश कोछड़

आदिकालीन हिंदी साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि: राममूर्ति  त्रिपाठी

हिंदी साहित्य के इतिहास पर कुछ नोट्स: रसाल सिंह

प्रथम सत्र [प्रश्न पत्र- 2] [102- आदिकालीन हिंदी काव्य]

इकाई 1: दोहाकोश: (सं.) राहुल सांकृत्यायन

षड्दर्शन खंडन-ब्राह्मण: दोहा 1, 2

करुणा सहित भावना: दोहा-17

चित्त: दोहा-24, 25

सहज, महासुख: दोहा-42, 43, 44

परमपद: 49

देह ही तीर्थ: 96

(कुल: 10)

इकाई 2; गोरखबानी: (सं) पीतांबरदत्त बड़थ्वाल

पद-1 से 20 तक

इकाई 3:  पृथ्वीराज रासो: (सं) माता प्रसाद गुप्त

कयमासवध् (संपूर्ण)

इकाई 4: विद्यापति की पदावली: (सं) रामवृक्ष बेनीपुरी

पद: 1, 2, 5, 10, 18, 23, 27, 29, 36, 42 (कुल;10 पद)

प्रस्तावित पुस्तकें

हिंदी साहित्य का आदिकाल: हजारी प्रसाद द्विवेदी

अपभ्रंश साहित्य: हरिवंश कोछड़

नाथ संप्रदाय: हजारीप्रसाद द्विवेदी

हिंदी के विकास मे अपभ्रंश का योग: नामवर सिंह

पृथ्वीराज रासो की भाषा: नामवर सिंह

अन्य सहायक पुस्तकें

प्राकृत-अपभ्रंश साहित्य और उसका हिंदी पर प्रभाव: राम सिंह तोमर

सिद्ध-साहित्य: धर्मवीर भारती

अपभ्रंश भाषा और साहित्य: राजमणि शर्मा

विद्यापति: शिव प्रसाद सिंह

आदिकालीन हिंदी साहित्य: अध्ययन की दिशाएँ: अनिल राय

गोरखनाथ और उनका युग: रांगेय राघव

प्रथम सत्र [प्रश्न पत्र- 3] [103- [भक्तिकालीन हिंदी काव्य]

इकाई – 1: कबीर

कबीर: हजारीप्रसाद द्विवेदी

पद स संख्या: 35, 108, 112, 123, 126, 134, 153, 168, 181, 206, 250 (कुल 11)

साखी स संख्या: 103, 113, 139, 157, 190, 191, 199, 200, 201, 231, 237 (कुल 11)

इकाई – 2: जायसी

जायसी-ग्रंथावली: रामचन्द्र शुक्ल (सं.)

नागमती वियोग खंड

इकाई – 3: सूरदास

भ्रमरगीतसार: रामचन्द्र शुक्ल (सं.)

पद संख्या: 3, 4, 7, 9, 11, 16, 18, 21, 22, 24, 30, 34, 37, 42, 45, 52, 62, 75, 85, 100,

 125, 133 (कुल 22)

इकाई – 4: तुलसीदास

विनय पत्रिका: (सं.) वियोगी हरि

पद स संख्या: 90, 101, 102, 105, 111, 112, 115, 116, 117, 119, 120, 121, 123, 124, 162,

 167, 172, 174, 198, 201 (कुल 20)

प्रस्तावित पुस्तकें

गोस्वामी तुलसीदास: रामचंद्र शुक्ल

तुलसी आधुनिक वातायन से: रमेश कुंतल मेघ

लोकवादी तुलसीदास: विश्वनाथ त्रिपाठी

तुलसी काव्य-मीमांसा: उदयभानु सिंह

गोसाईं तुलसीदास: विश्वनाथ प्रसाद मिश्र

सूरदास: रामचन्द्र शुक्ल

सूर साहित्य: हजारी प्रसाद द्विवेदी

अन्य सहायक पुस्तकें

महाकवि सूरदास: नंद दुलारे वाजपेयी

सूर और उनका साहित्य: हरवंशलाल शर्मा

सूरदास: ब्रजेश्वर वर्मा

कबीर: हजारी प्रसाद द्विवेदी

कबीर की विचारधरा: गोविंद त्रिगुणायत

कबीर साहित्य की परख: परशुराम चतुर्वेदी

त्रिवेणी: रामचन्द्र शुक्ल

जायसी: विजयदेव नारायण साही

हिंदी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, एम.ए. (हिंदी) पाठ्यक्रम

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एम.. (हिंदी) पाठ्यक्रम

पाठ्यक्रमों का सत्रानुसार विवरण

एम00 (हिंदी) प्रथम वर्ष

पहला सत्र (पावस सत्र)

पहला प्रश्नपत्र                   –           छायावादी काव्य

दूसरा प्रश्नपत्र                   –           निबंध और नाटक

तीसरा प्रश्नपत्र                  –           भाषा विज्ञान एवं हिंदी भाषा

चैथा प्रश्नपत्र                    –           हिंदी साहित्य का इतिहास (आरंभ से रीतिकाल तक)

दूसरा सत्र (शीतकालीन सत्र)

पांचवाँ प्रश्नपत्र                 –           छायावादोत्तर काव्य

छठा प्रश्नपत्र                    –           कथा-साहित्य

सातवां प्रश्नपत्र                 –           हिंदी साहित्य का इतिहास (भारतेंदु युग से अब तक)

आठवां प्रश्नपत्र (वैकल्पिक)-           कोई एक मूलभाषा (संस्कृत/प्राकृत/पालि/अपभ्रंश) अथवा आधुनिक भारतीय भाषा (बंगला/मराठी/तेलुगु/ कन्नड़/उर्दू/ तमिल)।

एम00 (हिंदी) द्वितीय वर्ष

तीसरा सत्र (पावस सत्र)

नवाँ प्रश्नपत्र                                 –           आदिकालीन एवं निर्गुणकाव्य

दसवाँ प्रश्नपत्र                               –           सगुण भक्ति काव्य

ग्यारहवां प्रश्नपत्र                           –           संस्कृत काव्यशास्त्र

बारहवाँ प्रश्नपत्र                            –           आधुनिक भारतीय साहित्य

चैथा सत्र (शीतकालीन सत्र)

तेरहवाँ प्रश्नपत्र                 –           रीतिकाव्य

चैदहवाँ प्रश्नपत्र                –           पाश्चात्य साहित्य-सिद्धांत

पन्द्रहवाँ प्रश्नपत्र                –           हिंदी समीक्षा

सोलहवाँ प्रश्नपत्र (वैकल्पिक)-         किसी एक साहित्यकार (जायसी/सूर/तुलसी/भारतेन्दु

हरिश्चन्द्र/प्रेमचंद/प्रसाद/निराला/ रामचन्द्र शुक्ल/ हजारीप्रसाद द्विवेदी/ अज्ञेय/ मुक्तिबोध/ यशपाल/जैनेन्द्र/ अमृतलाल नागर) अथवा किसी एक साहित्य प्रवृत्ति (संतकाव्य/रीतिकाव्य/ आधुनिक  हिंदी साहित्य 1919- 1947/ स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य) अथवा किसी एक भाषापरक या अन्य विषय (हिंदी भाषाशिक्षण /अनुवाद: सिद्धांत एवं प्रयोग/प्रयोजनमूलक हिंदी/ बोली विज्ञान एवं सर्वेक्षण पद्धति/हिंदी पत्रकारिता – इतिहास, सिद्धांत और प्रयोग/हिंदी नाटक एवं रंगमंच/हिंदीतर एवं देशांतर क्षेत्रों का हिंदी साहित्य/भारतीय साहित्य/लोक साहित्य) का विशेष अध्ययन ।

एम. ए. (हिंदी) प्रथम वर्ष

पहला प्रश्नपत्र: छायावादी काव्य

पाठ्यांश:

1- कामायनी: जयशंकर प्रसाद (चिंता, आशा एवं श्रद्धा सर्ग)

2- अनामिका: निराला (राम की शक्तिपूजा, सरोजस्मृति)

3- तारापथ: सुमित्रानंदन पंत (बादल, भावी पत्नी के प्रति, नौका विहार, अनामिका के कवि के प्रति, आः धरती कितना देती है)

4- दीपशिक्षा: महादेवी (पंथ होने दो अपरिचित, सब बुझे दीपक जला लूँ, जब यह दीप थके तब आना, यह मंदिर का दीप, जो न प्रिय पहचान पाती, मोम सा तन घुल चुका, सब आँखों के आँसू उजले, मैं पलकों में पाल रही हूँ, पूछता क्यों शेष कितनी रात, अलि मैं कण कण को जान चली)

 

अनुशंसित ग्रंथ:

1- जयशंकर प्रसाद – नंददुलारे वाजपेयी, भारती भंडार, इलाहाबाद

2- कामायनी – एक पुनर्विचार – मुक्तिबोध, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

3- निराला की साहित्य साधना (तीन भाग) – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

निराला की साहित्य साधना खंड 1, निराला की साहित्य साधना खंड – 2, निराला की साहित्य साधना खंड 3

4- सुमित्रानंदन पंत: डॉ. नगेन्द्र

5- छायावाद: नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

6- महादेवी वर्मा: जगदीश गुप्त, नई दिल्ली, 1994

7- छायावाद की प्रासंगिकता: रमेशचन्द्र शाह, नई दिल्ली, 1973

8- छायावाद और नवजागरण: महेन्द्रनाथ राय, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली

 

दूसरा प्रश्नपत्र

निबंध और नाटक

पाठ्यांश:

अनुशंसित ग्रंथ:

 

तीसरा प्रश्नपत्र

भाषा विज्ञान एवं हिंदी भाषा

पाठ्यांश:

  1. भाषा: परिभाषा, तत्त्व, अंग, प्रकृति और विशेषताएं । भाषा परिवर्तन के कारण एवं दिशाएं ।
  2. भाषाविज्ञान – परिभाषा एवं स्वरूप, अंग, प्रमुख अध्ययन-पद्धतियाँ ।
  3. स्वनविज्ञान – परिभाषा, स्वन, संस्वन और स्वनिम । औच्चारणिक स्वनविज्ञान (स्वनयंत्र और स्वन उत्पादन प्रक्रिया), स्वनभेद, मानस्वर, स्वनपरिवर्तन के कारण एवं दिशाएं ।
  4. स्वनिमविज्ञान – परिभाषा, स्वनिम के भेद – स्वनिम और उपस्वनिम, स्वनिमवितरण के सिद्धांत ।
  5. रूपिमविज्ञान – शब्द और रूप (पद), संबंध तत्त्व और अर्थतत्त्व, रूप, संरूप, रुपिम और स्वनिम, रूपिमों का स्वरूप, रूपिमों का वर्गीकरण ।
  6. वाक्यविज्ञान – वाक्य की परिभाषा, संरचना, निकटस्थ अवयव, वाक्य के प्रकार, वाक्य-रचना में परिवर्तन – कारण एवं दिशाएं ।
  7. अर्थविज्ञान – शब्दार्थ सम्बन्ध विवेचन, अर्थपरिवर्तन के कारण एवं दिशाएं
  8. भाषाविज्ञान की प्रमुख शाखाएं – समाजभाषा विज्ञान, शैलीविज्ञान और कोशविज्ञान का सामान्य परिचय ।
  9. संपर्क भाषा एवं राजभाषा के रूप में हिंदी
  10. नागरी लिपि का मानकीकरण । 

अनुशंसित ग्रंथ:

  1. भाषा विज्ञान की भूमिका – देवेन्द्र नाथ शर्मा, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली
  2. भाषा विज्ञान – भोलानाथ तिवारी, किताब महल, इलाहाबाद ।
  3. सामान्य भाषाविज्ञान- बाबूराम सक्सेना, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग
  4. हिंदी भाषा का उद्भव और विकास – उदयनारायण तिवारी, भारती भंडार, इलाहाबाद ।
  5. भाषा और समाज – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
  6. राष्ट्रभाषा हिंदी: समस्याएं और समाधान – देवेन्द्रनाथ शर्मा, लोकभारती, इलाहाबाद ।
  7. भारत की भाषा समस्या – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
  8. संपर्क भाषा हिंदी – सं0 सुरेश कुमार, ठाकुर दास, केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ।
  9. राजभाषा हिंदी: प्रचलन और प्रसार – डॉ. रामेश्वर प्रसाद, अनुपम प्रकाशन, पटना
  10. नागरी लिपि: हिंदी और वर्तनी – अनंत चैधरी, दिल्ली माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली
  11. समसामयिक हिंदी में रूपस्वानिमिकी – सुधाकर सिंह