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पुल पर बैठा बूढ़ा: मूल कथा : अर्नेस्ट हेमिंग्वे- अनुवाद : सुशांत सुप्रिय

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( अनूदित अमेरिकी कहानी )

पुल पर बैठा बूढ़ा

मूल कथा : अर्नेस्ट हेमिंग्वे

अनुवाद : सुशांत सुप्रिय

स्टील के फ़्रेम वाला चश्मा पहने एक बूढ़ा आदमी सड़क के किनारे बैठा था । उसके कपड़े धूल-धूसरित थे । नदी पर पीपों का पुल बना हुआ था और घोड़ा-गाड़ियाँ , ट्रक , मर्द , औरतें और बच्चे उस पुल को पार कर रहे थे । घोड़ा-गाड़ियाँ नदी की खड़ी चढ़ाई वाले किनारे से लड़खड़ा कर पुल पर चढ़ रही थीं । सैनिक पीछे से इन गाड़ियों को धक्का दे रहे थे । ट्रक अपनी भारी घुरघुराहट के साथ यह कठिन चढ़ाई तय कर रहे थे और किसान टखने तक की धूल में पैदल चलते चले जा रहे थे । लेकिन वह बूढ़ा आदमी बिना हिले-डुले वहीं बैठा हुआ था । वह बेहद थक गया था इसलिए आगे कहीं नहीं जा सकता था ।

पुल को पार करके यह देखना कि शत्रु कहाँ तक पहुँच गया है , यह मेरी ज़िम्मेदारी थी । आगे तक का एक चक्कर लगा कर मैं लौट कर पुल पर आ गया । अब पुल पर ज़्यादा घोड़ा-गाड़ियाँ नहीं थीं , और पैदल पुल पार करने वालों की संख्या भी कम थी । पर वह बूढ़ा अब भी वहीं बैठा था ।

” आप कहाँ के रहने वाले हैं ? ” मैंने उससे पूछा ।

” मैं सैन कार्लोस से हूँ , ” उसने मुस्करा कर कहा ।

वह उसका अपना शहर था । उसका ज़िक्र करने से उसे खुशी होती थी , इसलिए वह मुस्कराया ।

” मैं तो पशुओं की देखभाल कर रहा था , ” उसने बताया ।

” ओह , ” मैंने कहा , हालाँकि मैं पूरी बात नहीं समझ पाया ।

” हाँ , मैं पशुओं की देख-भाल करने के लिए वहाँ रुका रहा । सैन कार्लोस शहर को छोड़ कर जाने वाला मैं अंतिम व्यक्ति था । “

वह किसी गरड़िए या चरवाहे जैसा नहीं दिखता था । मैंने उसके मटमैले कपड़े और धूल से सने चेहरे और उसके स्टील के फ़्रेम वाले चश्मे की ओर देखते हुए पूछा — ” वे कौन से पशु थे ? “

” कई तरह के , ” उसने अपना सिर हिलाते हुए कहा , ” मुझे उन्हें छोड़ कर जाना पड़ा । “

मैं पुल पर हो रही आवाजाही और आगे एब्रो के पास नदी के मुहाने वाली ज़मीन और अफ़्रीकी-से लगते दृश्य को ध्यान से देख रहा था । मन-ही-मन मैं यह आकलन कर रहा था कि कितनी देर बाद मुझे शोर का वह रहस्यमय संकेत मिलेगा ,

जब दोनों सेनाओं की आमने-सामने भिड़ंत होगी । किंतु वह बूढ़ा अब भी वहीं बैठा हुआ था ।

” वे कौन-से पशु थे ? ” मैंने दोबारा पूछा ।

” उनकी संख्या तीन थी , ” उसने बताया । ” दो बकरियाँ थीं और एक बिल्ली थी और कबूतरों के चार जोड़े थे । “

” और आप को उन्हें छोड़ कर जाना पड़ा ? ” मैंने पूछा ।

” हाँ , तोपख़ाने की गोलाबारी के डर से । सेना के कप्तान ने मुझे तोपख़ाने की मार से बचने के लिए वहाँ से चले जाने का आदेश दिया । “

” और आपका कोई परिवार नहीं है ? ” मैंने पूछा । मैं पुल के दूसरे छोर पर कुछ अंतिम घोड़ा-गाड़ियों को किनारे की ढलान से तेज़ी से नीचे उतरते हुए देख रहा था ।

” नहीं , ” उसने कहा , ” मेरे पास केवल मेरे पशु थे । बिल्ली तो ख़ैर अपना ख़्याल रख लेगी , लेकिन मेरे बाक़ी पशुओं का क्या होगा , मैं नहीं जानता । “

” आप किस राजनीतिक दल का समर्थन करते हैं ? ” मैंने पूछा ।

” राजनीति में मेरी रुचि नहीं , ” वह बोला । ” मैं छिहत्तर साल का हूँ । मैं बारह किलोमीटर पैदल चल कर यहाँ पहुँचा हूँ , और अब मुझे लगता है कि मैं और आगे नहीं जा सकता । “

” रुकने के लिए यह अच्छी जगह नहीं है , ” मैंने कहा । ” अगर आप जा सकें तो आगे सड़क पर आपको वहाँ ट्रक मिल जाएँगे , जहाँ से टौर्टोसा के लिए एक और सड़क निकलती है । “

” मैं यहाँ कुछ देर रुकूँगा , ” उसने कहा । ” और फिर मैं यहाँ से चला जाऊँगा । ट्रक किस ओर जाते हैं ? “

” बार्सीलोना की ओर , ” मैंने उसे बताया ।

” उस ओर तो मैं किसी को नहीं जानता , ” उसने कहा , ” लेकिन आपका शुक्रिया । आपका बहुत-बहुत शुक्रिया । “

उसने खोई और थकी हुई आँखों से मुझे देखा और फिर अपनी चिंता किसी से बाँटने के इरादे से कहा , ” मुझे यक़ीन है ,बिल्ली तो अपना ख़्याल रख लेगी । बिल्ली के बारे में फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं । लेकिन बाक़ियों का क्या होगा ? बाक़ियों के बारे में आप क्या सोचते हैं ? “

” मुझे तो लगता है कि शायद आपके बाक़ी पशु-पक्षी भी इस मुसीबत से सही-सलामत निकल आएँगे । “

” क्या आपको ऐसा लगता है ? “

” क्यों नहीं , ” दूर स्थित नदी के किनारे को देखते हुए मैंने कहा । वहाँ अब कोई घोड़ा-गाड़ी नहीं थी ।

” लेकिन वे तोपख़ाने की मार से कैसे बचेंगे जबकि मुझे तोपख़ाने की संभावित गोलाबारी की वजह से वहाँ से चले जाने के लिए कहा गया था ? “

” क्या आपने कबूतरों का पिंजरा खुला छोड़ दिया था ? ” मैंने पूछा ।

” जी हाँ । “

” तब तो वे उड़ जाएँगे । “

” जी हाँ , वे ज़रूर उड़ जाएँगे । लेकिन बाक़ियों का क्या होगा ? बेहतर होगा कि मैं बाक़ियों के बारे में सोचूँ ही नहीं । ” उसने कहा ।

” अगर आपने आराम कर लिया हो , तो मैं चलूँ , ” मैंने कहा । ” अब आप उठ कर चलने की कोशिश कीजिए । “

” शुक्रिया , ” उसने कहा और वह उठ कर खड़ा हो गया , लेकिन उसके थके हुए पैर उसे नहीं सँभाल पाए , और काँपते हुए वह वापस नीचे बैठ गया ।

” मैं तो केवल पशुओं की देख-भाल कर रहा था , ” उसने निरुत्साहपूर्वक कहा , हालाँकि अब वह मुझसे बातचीत नहीं कर रहा था । ” मैं तो केवल पशुओं की देख-भाल कर रहा था । “

अब उसके लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता था । वह ईस्टर के रविवार का दिन था और फ़ासिस्ट फ़ौजें एब्रो की ओर बढ़ रही थीं । वह बादलों से घिरा सलेटी दिन था । बादल बहुत नीचे तक छाए हुए थे जिसकी वजह से शत्रु के विमान उड़ान नहीं भर रहे थे । यह बात और यह तथ्य कि बिल्लियाँ अपनी देख-भाल खुद कर सकती थीं — उस बूढ़े के पास अच्छी किस्मत के नाम पर केवल यही चीज़ें मौजूद

थीं ।

————०————

प्रेषक : सुशांत सुप्रिय

A-5001 ,

गौड़ ग्रीन सिटी ,

वैभव खंड ,

इंदिरापुरम ,

ग़ाज़ियाबाद – 201014

( उ. प्र. )

मो : 8512070086

ई-मेल : sushant1968@gmail.com

दयानंद कनकदंडे जी की अनुदित कविताएँ-अनुवाद :प्रेरणा उबाळे

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मराठी के लेखक, समीक्षक, कवि एवं “सगुणा” पत्रिका के संपादक दयानंद कनकदंडे जी एक जीवनदानी सामाजिक कार्यकर्ता हैं l सामाजिक तथा अन्य विषयों पर उनका लेखन और अनुवाद अनेक मराठी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ है l

दयानंद कनकदंडे जी की अनुदित कविताएँ

अनुवाद – प्रेरणा उबाळे

१.         कचोट

भ्रमपूर्ण अतीत की

गहरी स्मृतियाँ

कभी-कभी

अचानक उभरकर

कचोटती हैं बहुत

पीछा ही नहीं छोड़ती ……..

हमारे न रहने के बाद भी

वे रहती हैं क्या ?

…….. पता नहीं ……..

अब वही करें ऐसी प्रार्थना

कि

“विस्मृतियों के दोहद

लग जाए तुम्हें !”

काश !

मैं उसे बता पाऊं ……

अगर वह मिल जाए तो ……..

         .

अगर वह आती

तो

क्या भ्रम के अतीत की

गहरी स्मृतियाँ

जिन्दा रहती ? ? ?……

२.         पानी

पानी को लेकर विवाद होने पर

और भी कुछ खोजना था उसे

जन्म ….

मृत्यु ….

दुःख….

तृष्णा…..

वह खोजने निकला

और बुद्ध बन गया

आज और कल भी

पानी को लेकर

झगड़े होनेवाले हैं

पानी

हवा

और

बहुत कुछ

बिकेंगी वस्तुएँ

तब आप क्या करेंगे ?

३.         गिरावट

किसान की आत्महत्या

बन जाती है एक खबर……..

किसी अखबार में

सेन्सेक्स के गिरने – उछलने

के बाद

जैसे छपते हैं

आंकड़े l

पर यह सच है

कि

किसान की आत्महत्याओं से

कभी सेन्सेक्स नहीं गिरता

वह तब गिरता है

जब किसानविरोधी सरकार

गिरने की स्थिति में

आ जाती है l

४.         मुहर लगाएँगे

हम आसिफा के खूनी को

फाँसी पर चढाने के लिए कहते हैं…..

पटवर्धन मैम को

बंगले पर बुलाते हैं …….

रवीना को पूछा था –

गाजर जमीन पर उगते हैं या

जमीन के नीचे ?

और उसे बताया भी कि

उसे सिर्फ एक ही गाजर मालूम होगा —-

उन्होंने हमारी औरतों को भोगा

और अब हम तुम्हारी भोगेंगे

और

औरतें किसी की जागीर होती हैं

इस बात पर

मुहर लगा देंगे l 

५.         साम्राज्यवादी वैश्वीकरण

वसुधैव कुटुम्बकम

समूचा विश्व एक परिवार …………

परिवार कहें तो

सत्ता से सम्बन्ध आता है

अधिकार तो होगा ही

कुछ लोगों का l

आप ख्वामखा ही उन्हें बुरा कहते हैं

असल में

प्रधान सेवक

उन्हीं कुछ लोगों का सेवक होता है

उनकी सेवा में

कोई कमी ना रह जाए

हजारों पेड़ हमने काट दिए

तो क्या हुआ ?

समूचा परिवार ही विश्व परिवार है

तो फिर

“आदिवासी मूल निवासी हैं”

यह लोजिक

क्या मूर्खता नहीं दर्शाता ?…………..

डॉ प्रेरणा उबाले

                                                                        सहायक प्राध्यापक

                                                                       हिंदी विभागाध्यक्षा

                                                                       मॉडर्न कला, विज्ञान और

                                                                       वाणिज्य महाविद्यालय,

                                                                        शिवाजीनगर, पुणे- ४११०३३

                                                                        सं.नं.- ७०२८५२५३७८

                                                                    prerana.ubale@yahoo.com

ओड़िया कहानी-बिना मिट्टी के पृथ्वी: भूपेन महापात्र (अनुवादक- स्मृतिरेखा नायक)

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 ओड़िया कहानी                                     

बिना मिट्टी के पृथ्वी

                                                                  मूल लेखक- भूपेन महापात्र

अनुवादक- स्मृतिरेखा नायक

सूखी खुद एक किलोमीटर दूर नदी से पानी लाती है।  अस्पताल भी आठ किलोमीटर दूरी पर है और उसी आठ किलोमीटर दूर में लगी बाजार को शाल पत्र, दातुन, जंगली चीजें आदि बैचने के लिए जाती है। इसलिए उसके लिए दो किलोमीटर की दूरी कुछ भी नहीं है। असल बात तो यह है कि वह रास्ता सही नहीं है। रास्ता जंगल से होते हुए बाजार तक जा पहुँचती है। इतना घना जंगल है कि उसमें भेड़ से लेकर शेर तक सभी की संख्या बहुत अधिक है। कभी-कभी तो हाथियों की झुंड अचानक से रास्ते पर आ पहुँचती है। वह चईना को एक-दो बार बताई है कि —“चलो हम शहर को चले जाते हैं। यहाँ तो जंगल से कुछ खास जंगली चीजें नहीं मिल रही है। अब तो हर बात में नियम कानून बना दी गयी है। पेड़ में हाथ देते ही पुलिस आँख दिखाने लगती है। चलो ! शहर को चले जाते हैं। अंतत: वहाँ हम दोनों को काम तो मिलेगा। मैं घर-घर में जाकर काम कर लूँगी। वहाँ पर बाबू लोगों के घर में काम करने को मिल जाती है। और तुझे भी काम की कमी नहीं होगी। इसमें क्या परेशानी है ?”

            शुक्रा को भी पढ़ा पायेंगे। सुना है वहाँ हर बस्ती में स्कूल है। स्कूल की संख्या इतनी अधिक है कि पढ़ने के लिए बच्चे नहीं मिलते। यह बात सुनकर चईना का सिर फिर जाता है। वह गुस्से में आकार कहता है, तेरे दिमाग पर यह सब बातें कौन डालता है ? पढ़ाई क्या है ? इंसान कैसे जियेगा उसके बारे में कोई चिंता नहीं, बोल रही है बच्चा पढ़ेगा कैसे ? तू मुझे बस इतना बता दे कि अगर सभी पढ़ने में ही जुट जायेंगे तब गाय कौन रखेगा ? जंगल को कौन संभालेगा ? हम यहाँ है तभी तो जंगल है, नहीं तो यह पुलिस वाले क्या इसे रहने देते ? जंगल न हो तो हम कैसे जियेंगे ?

            सूखी कभी-कभी सोचती है कि इन परूषों को कौन कैसा बनाया किया ? कुछ भी नहीं समझते हैं। अगर पढ़ाई जरूरी नहीं है तब ऐसे हजार-हजार बच्चे क्यूँ पढ़ते हैं ? उनके माँ-बाप क्या मूर्ख हैं ? दूसरे गाँव के बच्चे तो साइकिल से स्कूल जाते हैं।

            वह चईना को समझाने की कोशिश में लगी रहती है। पढ़ाई की भी अपना महत्व है। अगर नहीं है तो सरकार बच्चों को किताब, कपड़े, मध्यान्ह भोजन की योजना, साइकिल आदि क्यूँ देता ? कभी-कभी उसे दु:ख भी होता है कि उसकी और एक-दो बच्चे होते तो कितना अच्छा होता ? स्कूल से एक वक्त की खाना तो मिलती है। जितने दिन चाहते स्कूल जाते, उसके बाद जमीन की देख-रेख करते और कहीं मजदूरी करते। पर चईना वह सब बातें बिलकुल भी नहीं समझता है। कहता है, पढ़ाई से बेकार और कुछ नहीं है और  इस बारे में मुझसे बिलकुल बात नहीं करना।

            हर दिन की तरह उस दिन भी सूखी चईना को हाथ जोड़कर कहने लगी— “बेटे को जरा जंगल के उस पार छोड़ आओ, ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। मैं तुम्हारे गाय-बकरी को लेकर जंगल जाती हूँ ।”

            स्थिर होकर चईना सूखी को देखना लगा। उसके बाद बोला –“तू तो पढ़ाई को जोंक जैसे पकड़ के रखी हो। उससे सारा रक्त क्या तू अकेले ही चूस लेगी ? ज्यादा मत चूस। जोंक जैसे फूलकर मोटि हो जाएगी।” उसने सूखी की बात अनसुना कर दिया। सूखी ने देखा कि दूसरे टोली वाले बच्चे चले गए हैं। उनके साथ जाता तो चला जाता। पुआल की बने हुए छप्पर में घुसाये हुए लकड़ी की डांडा को निकालकर वह खुद तैयार हो गयी। चईना भी अपने काम को जाने के लिए तैयार है। उसने सूखी को पूछा —“तू कब तक लौटेगी ? मैं आज साहूकार के घर जाऊँगा। साला, आज को तीन महीना हो गये मगर तलाब खुदाई करने का पैसा अब तक नहीं दिया है। बोल रहा है कि सरपंच नहीं दे रहा है। और सरपंच बोल रहा है ब्लॉक से नहीं मिला है। साला कौन यहाँ सही है ?”

            अरे! तू थोड़ा धीरे से बोल, रास्ते से जा रहे लोगों में से अगर कोई सून ले तो खैर नहीं। मैं क्या गलत कह रहा हूँ ? अब तक गंदी गाली तो नहीं बका है न ? मैं तुझे गाली देने की बात नहीं कह रही हूँ , तो तू क्या कह रही है ? मैं अभी आती हूँ।

            सूखी बेटे को लेकर चली गयी। रास्ते में बेटे को समझाती है – “मास्टर जी किताब और पेंट –सर्ट देंगे, वह सब लेते आना। हाँ, और एक बात भात खाने समय कुछ भी नहीं छोड़ना। बाद में भूख लगेगी।” जंगल पार होने के बाद भी और कुछ रास्ता बेटे को पैदल चलना है। अब उसे कोई डर नहीं। सूखी उस जंगली रास्ता पार कराकर बेटे को दूसरी गाँव के रास्ते तक पहुँचने तक खड़ी होकर वहाँ से देखने लगी। आते समय ओर कोई डर नहीं, बाकि बच्चों के साथ वापस आ जायेगा।

            सूखी की लौटने तक चईना वैसे ही घर के सामने बैठा हुआ था। हैरानी की बात है, तू तो साहूकार के घर जाने बाला था ?

            ‘क्या हुआ तूझे ?’

            ‘नहीं गया ?’ सूखी पूछने लगी।

            “जाने से क्या होगा ? साला दृष्ट कहीं का ? घनिआ गया था उसके घर, बोल रहा है स्वतन्त्रता दिवस के दिन आए हुए मंत्री जी के लिए जो दावत हुई थी उसमें खर्च हुए पैसा हमारा मजदूरी का पैसा है। हिसाब लगाने के बाद जितना बचेगा उसे हम सब में बांट देगा।” यह सुनकर सूखी कहती है “उसमें से हमें कितना मिलेगा ? हम तो किसी खाने में शामिल नहीं हुए थे, न कहीं खाये थे। हम तो ये भी नहीं कहे थे कि हमारे पैसों से दावत दी जाए ?”

            “मैं क्या ऐसे ही गुस्सा हो रहा था ? मौज – मस्ती तुम करोगे और पैसे हम देंगे ? यह कैसा न्याय है ?  तुम इतना गुस्सा होकर भी क्या कर लोगे ? मार-पीट करोगे क्या ? गुस्सा करने से अपना ही नुकसान है। भलाई इसमें है कि चूप रहो और देखो क्या नतीजा निकलता है। सब जो करेगें हम भी वही करेगें।”

            घर के अंदर जाकर सूखी फिर वापस आँगन में आ गयी और गहरी सोच में डूब गयी। चईना पूछता है “तू क्या सोच रही है कि बच्चे को जैसे भी हो पढ़ाएगी ? क्यूँ उसके पीछे इतनी लगी हुई है ? पढ़कर क्या तुझे वह पक्का घर में रखेगा ? और तू कुर्सी-मेज पर बैठेगी ?”

            “तू क्यूँ हर वक्त उसी बात को लेकर शुरू हो जाता है ? उसके पढ़ाई में तेरा कौनसा पैसा खर्च हो रहा है ? उसे तो सरकार सब दे रहा है। दिन में चावल-दाल भी मिल रहा है, नहीं तो तू दे पता क्या ?” अब चईना भी गुस्से में आ गया। “मैं दे रहा हूँ तेरे सरकार को ! वह तो देख रहा है न वे लोग कैसे हमारे पैसे से मजा कर रहे हैं ? अब बेटे को सात साल पूरा होकर आठ साल होने को है। धीरे-धीरे वह भी अब सियाना होने लगा है। इस उम्र में उसे काम शिखना चाहिए। घर चलाने में मेरा मदद करना चाहिए , मुझे भी थोड़ा आराम मिल जाता। तू गाँव के दूसरों बच्चों को देख नहीं रही है ? हमारे गाँव के कितने बच्चे स्कूल जा रहे हैं बोल तो ? यह कहकर वह थोड़ा शांत हो गया जैसे आग से लोहे को निकालने के बाद धीरे-धीरे ठंडा होने लगता है।”

            “तू मेरा बात सून ! वह फिर कहने लगा, दीना राऊत मुझे कह रहा था, बेटे को मेरे पास छोड़ दे। मैं उसे शहर में दूध बेचने वाले होटल में रखवा दूँगा। बहुत बड़ा होटल है। एक दिन में कम-से-कम दस हजार रोजगार वहाँ होता है। उधर खा-पीकर दो-चार दिन में ही तगड़ा हो जाएगा। माह की माह तनख्वा भी मिलेगी। बैसे भी क्या काम करना है ? बस बर्तन धोना है और रषोईया की थोड़ी मदद करनी है।”

            सूखी चूप होकर सून रही थी। बेटे की पढ़ाई और नहीं हो पायेगी। यह बात उसे बहुत कष्ट पहुंचाई  थी। एक ही तो बेटा है, भगवान उसे दो भी नहीं दिये हैं। दो अक्षर पढ़ता तो गाँव में उसका इज्जत होता। गाँव के थोड़े बहुत पढ़े-लिखे बच्चों को वह देख रही है। उनमें से कई तो ब्लॉक ऑफिस, पंचायत ऑफिस में काम करके पैसे कमा रहे हैं। पैंट-सर्ट पहन कर साइकिल में आना-जाना करते हैं। जरा-सी कष्ट सहकर बेटे को पढ़ाती तो दस साल बाद उसको अपने बेटे पर फक्र होता। और पढ़ाई का भी सारा खर्च तो सरकार उठा रहा है।

            फिर सूखी सोचने लगी कि दो वक़्त के लिए खाना मिले तो सही, इतवार के दिन तो स्कूल छुट्टी रहती है और रात में तीनों का पेट भूखा रहता है। कुछ समेटना चाहे तो बाकि बिखरा हुआ रहता है। कमाई तो थोड़ा –सा है और खर्च उससे कई गुना ज्यादा। कहाँ से होगा ? दो लोग चाहे जितने भी काम करें पर वहीं सरकार छलकर भूखे रहने के लिए मजबूर कर देता है। “चलो ! हम दोनों तो न खाकर पानी पीकर सो जायेंगे मगर बच्चे का पेट खाली रहेगा तो क्या हम शांति से रह पायेंगे ? खाने के लिए कुछ दो सुनते ही जैसे माथे पर पहाड़ टूट पड़ता हुआ लगने लगता है।”

            बी.पी.एल कार्ड तो है मगर खाली कार्ड रहने से क्या होता है ? सरकार चावल देगा तो उसके लिए भी पैसे चाहिए। अचानक उसकी दिमाग में यह सवाल उमड़ने लगी कि सरकार के घर में तो हमारा ही पैसा है। इसलिए सरपंच को हमें दो रूपये वाली चावल देना चाहिए और हम मुफ़्त में तो मांग नहीं रहे हैं। यह सब सुनकर चईना आश्चर्य से उसे देखने लगता है। तेरे दिमाग में इतनी बुद्धि कहाँ से आती है ? दीना राऊत कि बात सूखी की मन को फिर से उदास कर दिया। पर किसी भी प्रकार वह अपने बेटे को होटल में बर्तन धोने नहीं  देगा। चाहे उसके लिए वह खुद को तैयार कर लेगी पर बेटे को जैसे भी हो पढ़ने देगी। बच्चे का भी पढ़ने में मन है। जितना हो पायेगा उतना पढ़ेगा और बाद में उसके किस्मत में जो होगा उसे वह भुगतना पड़ेगा। वह चईना को यह सब बातें खुलकर बता दी। शूक्रा का पढ़ाई बंद नहीं होगी। चाहे इसके लिए मुझे उसी होटल में काम क्यूँ न करना पड़े ?”

            “धेत ! चईना ज़ोर से चिल्लाने लगा। तू औरत जात ! जाकर होटल में काम करेगी ? होटल में काम कब शुरू होती है और कब खत्म होती है उसके बारे में कुछ पता है ? शुबह के चार बजे से शुरू होकर रात के ग्यारह बजे खत्म होती है। तू मर्दों के साथ रात में काम करेगी ? और तू रहेगी कहाँ ? शहरी मर्दों के बारे में कुछ आता-पता है ?” बोलते-बोलते चईना के मुँह में स्मित अर्थपूर्ण हास्य उभरने लगी। सूखी को यह हँसी सुई जैसे चुभ गई। वह सोची कि यह जान-बूझकर चईना ने कहा है। मर्दों के साथ काम करने से क्या होगा ? क्या यहाँ में मर्दों के साथ काम नहीं करती हूँ ? मिट्टी उठाते समय कितने बार सीना से सीना टकराया है। मदन भोई हो या सपन तंति, जाने या अनजाने में, न जाने कितने बार धक्का हुआ है। यह नहीं हुआ है, कहा नहीं जा सकता। उसके हाथ-पैर भी खूब शक्त एवं मोटा है। बड़े-बड़े पैडों को काटकर जंगल से घर तक सिर के बल पर उठा ला सकता है। लेकिन कभी उसे किसी जानवर जैसे भूखे आँखों में नहीं देखा है।

            हाँ, सरपंच दाम सिंह की बात कुछ अलग है। मिट्टी की खुदाई करने समय वह कई बार सूखी के पास जाकर खड़ा हुआ है, हँसा है और उससे मज़ाक करके बात करने की कोशिश किया है। मगर सूखी उसे कभी सीधे मुँह न कभी देखी है न उसके साथ बात की है। हर साँप जैसे बीन सुनने के लिए नहीं ठहरते हैं, उसी तरह हताश होकर लौटने वाली लहर जैसे हृदय लेकर वह लौट जाता था। हजारों पुरूषों के पास काम करने या जान बूझकर कोई उसके शरीर से घिसने से उसको क्या फर्क पड़ता है ? वह अपने को मजबूत बना ली है। उसके शरीर और मन को काबू में रखी है। लेकिन आज चईना यह क्या कह रहा है ? वह क्या सूखी को आज पहली बार देखा है ? दस साल से घर-संसार करने के बाद यह पहली बार देखा है ?

            ये भी तो एक मर्द है। सब मर्द समान हैं। सिर्फ खूद की औरत को छोड़कर सारे मर्द दूसरें औरतों को देखते रहते हैं। सूखी के अंदर एक नारी सुलभ स्वाभिमान उमड़ पड़ा, जिसके ऊपर थोड़ा सा भी दरार सहन नहीं करेगी।

            तूम क्या मुझे उस तरह की औरत समझते हो ? ऐसे क्यूँ कह रहे हो ? ऐसे क्यूँ कह रहे हो ? मुझे काम करना है और मैं करूँगी भी। मैं मर्दों को दोष नहीं देती हूँ। हम औरतों का भी दोष है। पैर फिसलने से गहरे पानी में जा गिरेगें और उठ नहीं पाएंगे। सूखी वहाँ से चली गई। गुस्से से एक जहरली साँप जैसे वह फाँ-फाँ कर रही थी। इतनी छोटी सी बात पर सूखी इतनी आग बबूला बन जायेगी यह बात चईना को पता नहीं था। वह तो मज़ाक में बोल दिया और चूप हो गया।

            उस दिन दोपहर को चईना खाकर घर के सामने छांव में चटाई बिछाकर सोया हुआ देखकर सूखी चौंक गई। वह तो दोपहर में कभी नहीं सोता है। पिछली रात को भी कुछ नहीं खाया था। तब वह तो कोई सोचने बाली बात नहीं है। इस टोली में कितनों के घर में चूल्हा दो बार जलती है ? हाँ ! दो दिन पहले साहूकार के दुकान से दो केजी चावल उधारी से लाया था तब आज दिन में भात पका था। खाने के बाद चईना को नशे जैसे लगा होगा और अब अभी काम भी तो कुछ करने को नहीं है।

            ‘तू सो गया ?’

‘कहीं जाने का नहीं है क्या ?’

            तबीयत ठीक नहीं लग रहा है। बुखार जैसे लग रहा है। सूखी उसके सिर पर हाथ रखी तो उसे पता चला कि चईना को तेज बुखार है। “तू बाहर क्यों शोया है ? मैं घर के अंदर बिस्तर लगा देती हूँ । वहाँ जाकर सो जा। बारिश भी होने बाली है। सूखी परेशानी में पड़ गयी। घर के मर्द अगर बिस्तर पर आ जाए तब चारों ओर अंधकार दिखाई पड़ती है। वही साहूकार बुखार की दवाई भी देता है और तंत्र-मंत्र के पानी भी। सभी का वह पहला डाक्टर होता है।

            कहता है कि “ईश्वर के नाम पर एक रूपये रखकर प्रणाम करो।” सूखी सोची कि संध्या समय उसके पास जायेगी। पर यह नहीं हो पाया। संध्या से पहले झड़-तूफान होने लगी। बिजली कड़कने लगी। सूखी देवी माँ के पास दीया जलायी और प्रार्थना की। अब वह क्या करेगी, कहाँ जायेगी ?  कौन उसकी मदद करेगा। उसके आँखों से आँसू बहने लगी। सूखी को इस विपत्ति से बचाने के लिए कोई नहीं है। मनुष्य के पास इसी तरह के विपदा कभी-कभार आती है जहाँ सब होते हुए भी कोई नहीं होता है। मनुष्य का भरोसा केवल ईश्वर पर और किसीके ऊपर नहीं। सूखी के जीवन जंजाल में ईश्वर ने कभी कोई सूखी नहीं दिया है। इस बात को सूखी कई बार परखा है। फिर भी वह ईश्वर से गुहार लगाती रहती है। इस जीवन रूपी समुद्र में कहीं कोई सहारा न देने समय अगर वह सहायता कर दें तो उसकी घर बच सकता था।

            चईना को सात दिन से बुखार हुआ है, छूटता ही नहीं। सभी प्रकार के ईलाज करा चुकी है। साहूकार बैदराज से लेकर चमनपूर के तंत्र-मंत्र के साधक भी दो बार झाड़-फूँक किया है पर नतीजा कुछ नहीं। उस दिन सरपंच आया था, कहा कि इन सब देहाती ईलाज को छोड़कर सरकारी अस्पताल जाओ। वह अपने और से कहा “मैं आदमी भेज दूंगा, वह दवाई लेकर आजाएगा।”

            जब सूखी उधारी से लाये हुये दस रूपये सरपंच को दिए तब अचानक से सरपंच खड़ा हो गया और कहने लगा  “अरे! यह क्या बात हुई। सरकारी अस्पताल में मुफ्त की दवाईयां मिलती है। वहाँ पैसों की कोई जरूरत नहीं है। अरे! सुरिया तू चला जा, मेरा नाम डाक्टर बाबू को कहना और दबाई लेते आना। उसके बाद वह घूमकर सूखी से कहा, ठीक है तू उसे दस रूपये दे दे। वापस आने में एक दिन तो चला जाएगा, रास्ते में कुछ खा-पी लेगा। बेचारा वह भी तो गरीब है। अपने से खाने के लिए कहाँ से पैसे लायेगा।”

            रात के करीब दो बजे तक सुरिया खाली हाथ लौट आया। कहा कि वहाँ डाक्टर या कम्पाउंडर कोई नहीं था। सात दिन से बंद है।  वहाँ एक लड़का बैठा था। उसने  दो दिन के बाद आने को कहा है।  तभी डाक्टर से मुलाक़ात हो पायेगी। बुखार ही तो हुआ है, इतना परेशान होने की क्या है ? सूखी की दु:ख पहाड़ जैसे बढ़ती जा रही थी। चईना चित्कार करने लगा। “ओह! मुझे पकड़ो, पकड़ो ! सूखी दौड़ते हुए उसके पास गयी। चईना ज़ोर –ज़ोर से हाथ पैर पटक रहा था और सिर पकड़कर रोता जा रहा था। माँ –बेटे दोनों उसे ज़ोर से पकड़े हुए थे पर उसे संभाल नहीं पा रहे थे।”

            पड़ोश में रहने वाला नरीया चईना के घर गया और कहा कि ‘सूखी, अगर तू कहेगी तो मैं एक खटिया और उसे ढ़ोहने वाले आदमियों को साथ ले आऊँगा। उनके साथ मैं भी चलूँगा। वे कुछ नहीं लेगें। शहर के बड़े अस्पताल को इसे ले जायेंगे। इसके बिना ओर कोई ऊपाय नहीं है। पर इसके लिए भी कुछ चाहिए। मैं एक बात कहूँगा, मानोगी ?’

            सूखी आँसू चाहे जितना पोंछ रही थी लेकिन आँसू खत्म ही नहीं हो रही थी। आँसू क्या कभी खत्म होती है ? शायद भगवान इन आँखों के पीछे एक विस्तृत नदी जोड़ दिये हैं, जिससे हर बात में, काम में और हर समय औरतें आँसू से मुँह धो पायेंगी  ईश्वर द्वार दी गयी यह एक सुंदर वरदान है। इसे कोई बदल नहीं सकता है।

            नरीया ने कहा “तू पैसों की इंतजाम करने चली जा, मैं यहाँ खटिया और बाकि इंतजाम करता हूँ । आज रात में ही इसे अस्पताल ले जाना होगा। रात होने से क्या है ? हम चार लोग तो जा रहे हैं, डरने की कोई बात नहीं है। नरीया की बात मानकर सूखी गाँव के अंदर के तरफ भागने लगी और जाकर साहूकार की पैर पकड़ ली। ‘मुझे बचाओ साईं ! जो कहोगे वही करूंगी। मुझे बस अभी ५०० रूपये उधारी दे दो। मैं चईना को लेकर बड़े अस्पताल को जाऊँगी। नहीं तो मैं आपके पैर नहीं छोडूंगी।

            साहूकार खा चुके थे और खड़े होकर अपने मोटे से पेट पर हाथ फिरा रहे थे। कुछ समय तक शांत हो गये। उसके बाद कहने लगे ‘अरे! तू क्यूँ रो रही है ? इसमें रोने की क्या है ? हाँ, तू विपत्ति के समय में मेरे पास आयी है, इन कुछ रूपये के लिए…क्या मैं नहीं दूँगा ? एक ही गाँव में तो रहते हैं।’

            पर मैं खाली हाथ आयी हूँ। सूखी रो-रोकर कहने लगी। तुम जो कहोगे मैं वह करने के लिए  तैयार हूँ। साहूकार की गला नरम होने लगी और कहा कि “तू तो औरत है, मैं तुझे क्या कहूँगा ? तू कर भी क्या सकती है ? ठीक है, यह ले ! बस यहाँ अपनी उंगली की निशान लगा दे और कुछ करने की जरूरत नहीं है। एक लंबाऔर मोटा –सा कागज उसके सामने रख दिया। उसके बाद सूखी के उंगली में काली लगाकर कागज में प्यार से निशान लगा दी।”

            तब नरीया और शुक्रा भागते हुए वहाँ आ पहुँचे। वे दोनों कुछ नहीं कह पा रहे थे। उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था, जैसे गूंगे हो गए हैं। एकदम चूप होकर खड़ा हुआ शुक्रा ज़ोर से रोने लगा। उसके क्रंदन से सूखी और नरीया के अंदर अज्ञात भय की सिहरण पैदा कर रहा था। शुक्री अपनी माँ को पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर रो रहा था। बारिश की वह रात अधिक गंभीर और गहरी हो उठी थी। जंगल-पहाड़ सभी उस बारिश के साथ एकात्म हो गए थे।  

                                                                                                                        पता-

स्मृतिरेखा नायक

                                                                                          ग्राम-भीमपुर, पोस्ट-काऊपुर

                                                                                     भाया-बरपदा,जिला-भद्रक

                                                                                        पिन न.-756113, ओड़िशा

                                                                                     Mobile-7749026444

                                                                                                   ई मेल-smruti032@gmail.com 

तेलुगु लघुकथा ‘हस्ताक्षर (दस्तकत)’-जाजुला गौरी

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तेलुगु लघुकथा ‘हस्ताक्षर’

हस्ताक्षर  (दस्तकत)

लेखिका- जाजुला गौरी

 अनुवादक- के. कांचन

          सुबह के समय नौ बजे, लोतुकुंटा प्राथमिक पाठशाला में टन…टन घंटी बजी l घंटी की आवाज सुनते ही उस स्कूल के मैदान में खेल रहे बच्चे आकर अपनी-अपनी कक्षाओं के अनुसार क्रम में खड़े हो गएँ l प्रार्थना पाठ होते ही हमेशा की तरह सब बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में क्रम से जाकर बैठ गएँ l उपस्थिति-रजिस्टर लेकर सब अध्यापक अपनी-अपनी कक्षाओं की ओर जा रहे थे, तभी चौथी और पाँचवी कक्षा के अध्यापकों को थोड़ी देर रूकने के लिए हेडमास्टर रंगाराव ने कहा l

       फिर अलमारी में से फॉर्म निकाल कर देते हुए हेडमास्टर ने कहा “यह सोशल वेल्फ़र ऑफिस से हमारे स्कूल को आए हुए हैं l तुम्हारी कक्षा में जितने भी एस.सी. एस.टी. के बच्चे हैं उन्हें यह फार्म दे कर एक सप्ताह के भीतर भर कर ले आने के लिए कह देना, हमें इसे दस दिन के भीतर प्रस्तुत (सबमिट) करना होगा”  l

         अध्यापक लक्ष्मण राव और अन्नम्मा अध्यापक दोनों रजिस्टरों के साथ फार्म भी लेकर अपनी-अपनी कक्षाओं में चले गयें l

        कक्षा में हाजरी लेना और पाठ पढ़ना भी ख़त्म हो गया l उसके बाद अचानक ही हेडमास्टर ने दिए हुए फार्म की ओर ध्यान गया और अध्यापक लक्ष्मण राव विद्यार्थियों की तरफ देखते हुए – “अरे.. तुम में से कोई एस.सी., एस.टी. जाति का हो तो हाथ उठाओ” कहते ही बच्चे सब एक दूसरे के चेहरे देखने लगे l इस तरह कहने से बच्चों को समझ में नहीं आया होगा कहते हुए “तुम में से निम्न जाति वाले कोई हैं ?” फिर से प्रश्न किया l तब भी बच्चे एक दूसरे के चेहरे देख रहे थे l

        एक लडके ने पूछा “निम्न जातियों  का क्या मतलब है गुरु जी ?”

       “निम्न जाति का मतलब, जैसे कि चमार जाति, महार जति… आदि । इन जातियों के कोई है क्या ?” उसके कही हुई बात में से बच्चों को एक अक्षर भी न समझ आने से बच्चों का चेहरा फीका पड़ गया l “अरे ! मूर्ख.. बच्चों, तुम्हारी जात क्या है ? नहीं जानते हो क्या ?” आश्चर्य से पुछा l बच्चों ने “उहूँ” कहते हुए सिर हिलाया l उतने में एक लड़की ने पूछा कि “असल में जाति का मतलब क्या है गुरू जी ? ”

     इस प्रश्न से गुरु लक्ष्मण राव का छहरा एक दम फीका पड़ गया l उन्हें क्या कहूँ कुछ समझ में न आने से धीरे से चेहरा छुपाते हुए स्कॉलरशिप फार्म सब विद्यार्थियों को देकर कहा कि “इसे तुम्हारे माता-पिता को बताकर, उनसे भरवाकर ले आओंगे  तो तुम्हें कुछ दिनों बाद स्कॉलरशिप मिलेगी l अभी आप लोग चौथी कक्षा के विध्यार्थी हैं  न ! इसके लिए जितने भी लोग योग्य होंगे, उनमें से एक-एक को चालीस-चालीस रुपये मिलेंगे” l 

       रुपये मिलेंगे कहते ही बच्चों को आशा होने लगी और फार्म की ओर देखने लगे l लेकिन उन्हें अपनी जाति कौन-सी है, इसका पता न होने से वे नाराज़ हो गए l

       उस दिन ही लगभग दोपहर के भोजन के बाद लक्ष्मणराव हेडमास्टर के पास जाकर कक्षा की परिस्थिति के बारे में बताया l उसी समय वहाँ पर अन्नम्मा टीचर को भी आते हुए देखकर हेडमास्टर ने हँसते हुए….पूछा l

      “अन्नम्मा जी तुम्हारी परिस्थिति क्या है ? ”               

  “केवल दोनों ने ही लिया है सर”  अन्नम्मा ने कहा । हेडमास्टर क्यों हँस रहें होंगे ? अन्नम्मा को समझ नहीं आया ।

हेडमास्टर ने कहा “आपके बच्चे तो थोड़े ठीक ही है, लेकिन लक्ष्मणराव जी की परिस्थिति तो और भी खराब है” कहते हुए लक्ष्मणराव की कक्षा बीती हुई घटना के बारे में बताया l

     “मेरी कक्षा में भी लगभग परिस्थिति वैसी ही थी, सर l फिर भी वो छोटे बच्चे हैं, उन्हें क्या पता होगा जाति के बारे में, सर l चार बच्चों के साथ मिलजुलकर पढ़ाई और खेलने वाले नादान बच्चों को हम अभी से ही जाति के नाम से विभाजित कर रहे हैं”  अन्नम्मा ने कहा l

      “सही है टीचर जी, आपकी बातों से मैं सहमत हूँ l लेकिन यह ऊपर से दिया गया आदेश है, हमारी जिम्मेदारी तो हमें निभानी ही पड़ेगी” कहते हुए एडमिशन बुक निकालकर उन्हें दे दिया l 

       “इसमें विद्यार्थियों का पूरा पता लिखा हुआ है l तुम्हारे कक्षा में निम्न जाति के बच्चों को इसके द्वारा ही पहचाना जा सकता है l यह काम जल्दी-जल्दी निपटाकर आज शाम तक इसके लिए जो भी योग्य है उन्हें यह फार्म दे देना l इसे वापस लाकर देने में उन्हें एक सप्ताह का समय तो लगेगा ही l उस फार्म को हमें दस दिन के अंदर सबमिट करना होगा, जल्दी उन्हें दे  दो” l कहते हुए हडमास्टर जल्दबाजी करने लगा  l

     कक्षाओं के अनुसार सब विद्यार्थियों के नाम लिखकर ले जाने तक अंतिम बेल बजने में कुछ  ही मिनट शेष थे, इस भीतर ही निम्न जाति के विद्यार्थियों को फार्म दे दिये गये l

    स्कॉलरशिप फॉर्म प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों में चौथी कक्षा का रामुडु भी था l फॉर्म हाथ में आते ही उसका चेहरा चमक उठा l उस फॉर्म को ऐसे निहारने लगा, जैसे उसके हाथ में चालीस रुपये आ गये हो …

   एक बार में खुशी से उसकी सांसें भर आई l फॉर्म को किताब में रखकर वह बहुत उत्साह से उछल–कूद करते हुए घर की ओर दौड़ा  l रामुडु के घर पहुँचने पर वहाँर कोई नहीं था l मजदूरी के लिए  गए माँ-बाप का इंतजार करते-करते वह चबूतरे पर बैठा रहा l अँधेरा होते समय घर आ रहे माँ-बाप को देखकर खुशी से दौड़ते हुए उनके सामने जाकर “माँ आज स्कूल में स्कॉलरशिप फार्म मिला है l इसे भरकर देने पर चालीस रुपये मिलेंगे” सकुचाते हुए उसने कहा l 

     “बेटा, स्कॉलरशिप फॉर्म का मतलब क्या है ?” मल्लम्मा ने अनजाने में पूछा l

     “सो तो, मुझे नहीं पता l यह सब भरकर ले जाने से इसे गुरूजी किसी सरकारी ऑफिस में दे देंगे और उसके बाद हमें रुपये मिल जायेंगे” रामुडु ने कहा l

“हाथ-पैर धोकर, वह फॉर्म देखूंगी, लेकिन तू पहले घर पर तो चल” माँ ने कहा l रामुडु घर जाते ही थैली में से स्कॉलरशिप फॉर्म हाथ में लेकर तैयार है….

        माँ आते ही “यह देखो माँ, यह वहीं कागज़ है, इसे ही स्कॉलरशिप फॉर्म कहते हैं, यह निम्न जाति वाले बच्चों को दिए जाते हैं, हमारे गुरू जी ने पुछा कि तुम्हारी जात कौन सी है, माँ असल में जाति का मतलब क्या है ? भौएं ऊपर उड़ाते हुए माँ से उसने प्रश्न किया l

      “बेटा जाति का मतलब जाति ही होती है l इसमें उच्च-निम्न जाति के लोग होते हैं l जैसे उच्च जाति वालों को उच्च जाति के बच्चे और निम्न जाति वालों को निम्न जाति के बच्चे कहा जाता है, बस l “तो फिर हमारी जात कौन-सी है, सर ने बताया कि निम्न जाति वालों के भी नाम हैं l”   “बेटा तुझे यह भी नहीं पता ? हम चमार जाति के हैं” बेटे के प्रश्न के जवाब में माँ ने कहा l

“मुझे कैसे पता होगा तुमने कभी नहीं बताया और पिताजी ने भी नहीं”  कहते हुए रामुडु  अपना सर खुजाने लगा  l “रुको बेटा पिताजी से पूछती हूँ” यह कहकर मल्लम्मा बाहर बैठे राजय्या के पास वह फॉर्म लेकर पहुँच गई l “अजी सुनते हो ! अपने रामु को स्कूल में आज यह स्कॉलरशिप फॉर्म दिया गया है, यह क्यों दिया है थोडा देखों” पति को फॉर्म देते हुए मल्लम्मा ने कहा l राजय्या ने उस फॉर्म को लेकर एक बार नीचे से ऊपर तक देखा और उसे एक अक्षर भी समझ में नहीं आया, लेकिन वह क्यों दिया गया है यह उसे समझ में आ गया था, सो उसने कहा “हाँ… यह क्या है न, पिछले साल लक्ष्मण भैया के बेटे को भी यह फार्म दिया गया था l इसके ऊपर अपनी जाति और अपना पता लिखना होता है, और इस पर हमें हस्ताक्षर करने होते हैं l वहाँ तक तो ठीक है लेकिन असल मुद्दा वहीं से ही शुरू होता है l हम चमार जाति के हैं या नहीं यह जानने के लिए गवाह के रूप में एक ठाकुर के हस्ताक्षर की जरूरत होती है, सभी जगह हमारी जात तो चमार ही रहेगी, लेकिन यहाँ पर तो हमें हमारी ‘चमार जाति’ ही है, यह साबित करने के लिए उच्च जाति वालों के हस्ताक्षर चाहिए l असल में उन्हें कैसे पता चलेगा कि हम इस जाती के  हैं ? यह क्या हमारे चेहरे पर लिखा रहेगा? वहाँ जाने के बाद तो पहले तुम किस जाति के हो पूछेंगे l”

     ‘चमार जाति’ के कहने के लिए तुम्हारें पास क्या गवाह है पूछेंगे, यह सब होने के बावजूद रुपये देने पर भी हस्ताक्षर नहीं करेंगे l वह हस्ताक्षर लेने के लिए घूम-घूम कर थक जायेंगे, यह सब हम नहीं जानते हैं, इसलिए तो हमें पढ़ाई करनी चाहिए l ऐसी नोबत तो अभी तक नहीं आई है, लेकिन हमारे बच्चों की जिंदगी में तो रुपये देकर खरीदी गयी हस्ताक्षर ही एक गवाह है l इसी के लिए तो लक्ष्मण भैय्या घूम-घूम कर परेशान हो गए थे, समझ में आया!” यह कहते हुए राजय्या ने पूरा इतिहास बता दिया l थोड़ी देर रुककर, सिर को खुजलाते हुए “यह सब बेकार है लेकिन असल में इन कागजों पर किस-किस के हस्ताक्षर चाहिए, यह बताओ ना” मल्लम्मा ने कहा l

     “उसी के बारे में तो बता रहा हूँ, कोई डॉक्टर, इंजीनियर और कोई दफ्तर में काम करने वाला कोई बड़ा ऑफिसर की इस पर हस्ताक्षर चाहिए l वे भी सरकारी नौकरी करने वाले ही चाहिए l यह सब तो हम से नहीं होगा, रख दो वहाँ, हाथ में फार्म लेकर भी नहीं लिये जैसे गुस्से से कहा l पिता के इस तरह कहते ही रामुडु का मन सिकुड़ने लगा और उसे ऐसा लगा जैसे कि अचानक चालीस रुपये छिन कर हवा में उड़ गए या उड़ा दिये गए हो l

    “यह क्या समझाने के लिए कह रही थी, पर क्यों तुम ऐसे इसकी कोई जरूरत ही नहीं है, जैसे बात करे रहे हो ?” कहते हुए गुस्से से फॉर्म छीनकर मल्लम्मा घर में चली गयी l रामुडु अपनी माँ के पीछे-पीछे ही जाते हुए आशा भरे स्वर में कहा – “माँ, कुछ भी करके इस फॉर्म पर हस्ताक्षर करवाओ, हमें रुपयें मिलेंगे  l”

      “चुप हो जा… अभी ही आयी हूँ, और अभी के अभी लाकर मेरे मुँह पर फेक रहा है, पूरा काम जहाँ का तहाँ पड़ा हुआ है, तुम्हारे पिता से तो कुछ होता ही नहीं, थोड़ी देर रुक नहीं सकता, कहाँ जाने वाले हैं ये पैसे, कहीं भाग जा रहे हैं क्या ?” यह कहते हुए मल्लम्मा ने पति का गुस्सा बेटे पर उतारा l यह बातें सुनकर रामुडु बहुत नाराज हो गया l अपना चेहरा फुलाके घर में एक कोने में बैठा रह गया l रसोई होते ही तीनों के लिए थालियों में खाना परोसकर भोजन करने के लिए उसने रामुडु और राजय्या को आवाज दी l “मैं नहीं आऊँगा, और ना ही खाना खाऊँगा ” कहते हुए रामुडु रूठ कर बैठ गया था  l राजय्या भोजन की थाली के सामने बैठकर “क्या है, ये तेरी जिद्दी हरकतें, खाले नहीं खाएगा तो तू ही दुबला हो जायेगा जा” कहते हुए धमकाया l

     “क्या है… चुप नहीं बैठ सकते, वह भूखे पेट बैठा हुआ है और ऊपर से और भी ज्यादा नाराज़ करने की बातें कर रहे हो l तुम तो उसे भोजन करने के लिए कहते तो हो नहीं ” कहते हुए थाली में भोजन ले कर बेटे को खिलाने लगी, मल्लम्मा l रामुडु बहुत देर तक मैं खाना नहीं खाउंगा कहते हुए जिद्द कर रहा था l बेटे के सिर पर हाथ सँवारते हुए माँ “बेटा लक्ष्मण भैया के पास जायेंगे, अब यह खाना खालो, थोड़ी देर बाद चलते हैं” यह कहकर बेटे को समझाते हुए उसे खाना खिला दी और बर्तन धो कर घर में रखकर घने अंधेरें में लक्ष्मण भैय्या के घर रामुडु को लेकर चली गई l देहली पर खड़े होकर “लक्ष्मण भैया….ओ….लक्ष्मण भैया…” कहते हुए पुकारने लगी l

     बुलावा सुनकर लक्ष्मण घर से बाहर आते हुए  मल्लम्मा को देखा l पास आकर “कैसी हो बहन , ठीक हो ! क्या बात है, क्यों  इतनी रात को आई हो ?” प्रश्न किया l

     “कुछ नहीं भैया, रामु के स्कूल में यह फॉर्म दिया गया है, इस फार्म का क्या करना है थोडा बताओ भैया!”  बिनती भरे स्वर में पूछने लगी l

     पिछले साल यह फॉर्म हमारे रवि को भी दिया गया था, लेकिन बहुत दिक्कत हुई इस पर हस्ताक्षर करवाने में, सरकारी आस्पताल को छः दिन आते-जाते रहा लेकिन हस्ताक्षर नहीं हो पाये l आखिर बीस रुपये लेकर दूसरे डॉकटर ने हस्ताक्षर कर दिये थे, लेकिन वह डॉक्टर अब नहीं है”  उसने विस्तार से बताया l

      “ठीक है, कोई बात नहीं, वह डॉक्टर नहीं तो नहीं, सरकारी अस्पताल को जाऊँगी” यह कहते हुए मल्लम्मा घर चली गई l सुबह नौ बजे के समय मजदूरी को न जा कर वह  अपने बेटे को साथ लेकर सरकारी अस्पताल पहुँच गई l वह वहाँ जाते ही इलाज करवाने आये रोगियों की बहुत लम्बी क़तार थी l अंदर जाकर हस्ताक्षर लेना उसके बस की बात नहीं थी l कितनी देर तक खड़े होने पर भी रोगियों की संख्या घट  ही नहीं रही थी, बढ़ती ही जा रही थी l आखिर देख-देखकर निराश होकर वापस घर पहुँच गई l

      दूसरे दिन भी मजदूरी को न जा कर, किसी भी तरह आज हस्ताक्षर लेना ही होगा यह सोंचकर बेटे को लेकर जल्दी-जल्दी अस्पताल चली गई l नौ बजे डॉक्टर आते ही प्यून एक एक को अंदर भेज रहा था l प्यून उसकी ओर आते ही उसके हाथ पैर कांपने लगे फिर भी हिम्मत करके वह अंदर चली गई l

     माँ, बेटे को देखकर डॉक्टर ने पुछा कि “क्या हुआ खाँसी किसको है ? तुम्हारी समस्या क्या है ?”

     मल्लम्मा थोड़ी लड़खड़ाते हुए “बीमारी कुछ भी नहीं है, माँ” कहकर सांस ली l

     डॉक्टर ने नीचे से ऊपर की ओर देखकर खींजते हुए कहा “बीमारी नहीं है तो फिर क्यों आये हो यहाँ ?”

     बेटे को दिखाते हुए “इसे स्कूल में यह फॉर्म दिया है, और सुना है कि इस से पैसे मिलने वाले हैं, इसके ऊपर हस्ताक्षर चाहिए, हस्ताक्षर कर दो अम्मा,” फार्म दिखाते हुए बड़ी विनम्रता से विनती करने लगी मल्लम्मा  l

     फार्म देखते ही डॉक्टर गुस्से से “क्या है अम्मा ? क्या हम लोग यहाँ पर रोगियों को देखने आये हैं या हस्ताक्षर करने के लिए ही हैं ! क्यों समय बर्बाद करते हो” कहते हुए अटेंडर को बुलाकर “क्या बाबु, दरवाजे के पास क्या कर रहे हो ? ऐसे लोगों को भेजते हो क्या ? इन्हें पहले बाहर निकाल दो” यह कहकर चिल्लाने लगी l

   उस आवाज़ को सुनते ही अटेंडर जल्दी-जल्दी आकर मल्लम्मा का पल्लू पकड़कर और दूसरे हाथ से रामुडु का कॉलर पकड़कर, “खाना हज़म नहीं हो रहा है, ऐसी हरकते करते हो, ‘तेरी माँ की’ यहाँ से निकलो” कहते हुए तुरंत ही बाहर खींचकर ले आया l

    मल्लम्मा इस बर्ताव को नज़र अंदाज़ कर रामुडु को दिखाते हुए “ओ डॉक्टर अम्मा, तुम्हें पूण्य प्राप्त होगा जरा हस्ताक्षर कर दो” यह कहते हुए विनती करते ही रहीं l लेकिन वहाँ, माँ और बेटे के परिस्तिथि को कोई  समझने को तैयार नहीं था l

    रामुडु यह सब देख डर के मारे माँ को पकड़कर जोर-जोर से रोने लगा l लेकिन वह उसके बेटे को समझने की स्थिति में नहीं थी l हस्ताक्षर न  होने से निराश होकर वहीं पेड़ के नीचे ही बैठी रह गई l परंतु मन ही मन सोंच रही थी कि कुछ भी करके उस फार्म पर हस्ताक्षर करवाना ही होगा, यह मन में ठान कर, अस्पताल की ओर देखते वैसे ही बैठ गई l

     बारह बज गए, सब लोग जहाँ के वहाँ चले गए l लेकिन मल्लम्मा को वहाँ से न हिलते देख उस अस्पताल का कंपौन्डर पास आकार “सुबह से देख रहा हूँ, यहीं बैठी हो, क्या बात   है ? ” पूछते हुए पता किया l

    आँखों में आंसू भरे हुए मल्लम्मा की परिस्थिति को देखकर कंपौन्डर ने उस पर दया आकर वह फार्म लेकर “ठीक है इस पर डॉक्टर जी से हस्ताक्षर करवाऊँगा, लेकिन तीस रुपये चाहिए, पैसे दे दो हस्ताक्षर करवाउंगा” कहकर डिमान्ड करने लगा l

     “हम लोग मजदूरी करके जीने वाले हैं सार, तीस रुपये कहाँ से आएंगे, इसके वजह से कल और आज मेरी मजदूरी भी चली गई, हर दिन चालीस रुपये मिलते थे, बच्चे की स्कूल भी चली गई” धीरे से हाथ फिराते हुए मल्लम्मा ने कहा l

    “यह सब मुझे नहीं पता, हस्ताक्षर चाहिए तो पैसे भी चाहिए, यूँ ही कोई हस्ताक्षर नहीं करेगा” उसने कहा l

    रामुडु उन बातों को सुनते ही घबरा गया, हस्ताक्षर हो पाएँगे भी या नहीं सोचकर विचलित होने लगा,  उसने अपनी माँ से कहा – “माँ सार जितने पैसे मांग रहें हैं, उतने दे सकती हो न”  l

    “मेरे बेटे का तो चेहरा देखकर थोड़ी सी कृपा कीजिए सार, तीस रुपये कहने से मुझसे नहीं होगा सार… बीस रुपये दूंगी सार बेटे को दिखाते हुए कहा” कंपौन्डर रामुडु की ओर देखकर “हाँ, ठीक है..ठीक है, किसी को भी न पता चले जैसा इस कागज़ में मोड़कर रख दो, चोर की तरह इधर-उधर देखते हुए कहा” l

    मल्लम्मा ने अपनी कमर में कसकर रखी छोटी सी थैली में से पूरा ढूंड-ढूंडकर बीस रुपये निकालकर उस कागज में रख दिये l फटक से वह फार्म लेकर कंपौन्डर “ठीक है, लेकिन बच्चे का नाम तेरे पति का नाम और तुम्हारा पता बताओ” कहते हुए जेब से कागज़ पेन निकालकर मल्लम्मा से बताया गया पूरा पता लिख लिया l कागज़ को जेब में रखते हुए “कल इसी टाइम को आ जाना ! सुबह आओगी तो यह काम नहीं होगा l सुबह सब तुम्हें पहचानेंगे l पहले ही आज बहुत बड़ा झगड़ा हुआ है ।” कहकर चेतावनी दी l

    मल्लम्मा दीनता से उसकी ओर देखते हुए “ठीक है सार, तब ही आउंगी l कुछ भी करके इस पर हस्ताक्षर करवा देना, तुम्हें पुण्य मिलेगा” कहकर बेटे को लेकर सोंचते हुए घर की ओर बढ़ गई l

    उस दीन रात में मल्लम्मा के साथ पति झगडा करने लगा “ बेवकूफ़, दो दिन से देख रहा हूँ कहाँ गई थी, तू ? काम को भी नहीं आ रही हो और उसे भी स्कूल जाने नहीं दे रही हो ? वो सब हमारे से नहीं होगा, इतना समझाने पर भी तुम्हें मेरी बात को समझ मे नहीं रही है, देखो अगर कल से काम पर नहीं आवोगी तो चुप नहीं बैठूँगा…हाँ…” कहते हुए उसके ऊपर गुस्से से आँखे फाड़ने लगा l

   “क्यों जी, इस तरह बातें क्यों कर रहे हो ! क्या मैं यूँ ही घर पर खाली हूँ…या गाँव में घूम रही हूँ…तुम भी नहीं करते और मुझे भी नहीं करने देते हो, जो कुछ कर रही हूँ, अपने बेटे के लिए ही तो कर रही हूँ ना, मैंने कुछ गलत काम किया है क्या ? पुछो ! आज भगवान की तरह कंपौन्डर सार मिले थे, और यह काम कल हो जायेगा,  उसके बाद यह स्कूल में देगा तो पूरा काम हो गया जैसा ही समझो, फिर अपने बेटे को पैसे मिलेंगे” किन्तु, उसके पास से कंपौन्डर ने बीस रुपये लिए थे, यह बात उसने अपने पति को नहीं बताया l

    तीसरें दिन भी मल्लम्मा मजदूरी को नहीं गई l ग्यारह बजे का समय आस्पताल जाकर गेट के बाहर  धूप  में खड़ी हो गई l आस्पताल से सभी बाहर जाने के बाद कंपौडर का आना देखकर माँ और बेटा जल्दी-जल्दी भागके उसके सामने गए l उन्हें देखकर कंपौन्डर बगल में जाकर “इस तरह सामने भागते हुए आने की बजाय उधर बाजु में खड़े हो सकते हो ना ? मैं ही आकर दे दूँगा” कहते हुए जेब में से फार्म निकालकर छिडकते हुए दे दिया l उसे मल्लम्मा कितने प्यार से लेकर “भगवान तुम्हारा भला करे ! भगवन तुम्हें हमेशा सुखी रखे ! कहते हुए हाथ जोड़कर प्रणाम कर, बेटे को लेकर घर पहुँच गई l

     चौथे दिन सुबह पति-पत्नी मजदूरी करने गए, और बेटा स्कूल चला गया l स्कूल जाते समय लम्बा रास्ता काटते हुए तीन दिन से घटी घटनाएँ रामुडु के आँखों के सामने       साफ़-साफ़ दिखाई दे रही थी l तीन दिन के बाद स्कूल को आनेवाले रामुडु को देखकर स्कूल को क्यों नहीं आया यह पूछते हुए, दो थप्पड़ मारकर दिवार के पास मुर्गी की तरह बिठा दिया, लक्ष्मण राव सर ने l तीन दिन से की गई मेहनत के सामने, अपने अध्यापक द्वारा दी गई यह सजा उसे बहुत छोटी लगी थी l

      दूसरी बेल बजने को थोडा समय था उससे पहले लक्ष्मण राव अध्यापक ने विद्यार्थियों से पूछा कि “स्कॉलरशिप फार्म भरकर लाये हो क्या ?”  नहीं लेकर आये हैं , ऐसा बच्चों ने सिर हिलाते हुए कहा  l

    “आज भी कोई लेकर नहीं आए ? और तीन दिन ही बाकि है जल्दी लेकर आ जाना देर करोगे तो परेशानी होगी” कहते हुए अध्यापक बेल होते ही रजिस्टर साथ लेकर क्लॉस के बाहर जाने लगा l

    लक्ष्मण राव सर बाहर जाते ही रामुडु अपनी थैली में से स्कॉलरशिप का फॉर्म लेकर “सर…सर…” कहते हुए दौड़ कर अध्यापक के पास पहुँचा l 

    पीछे से ‘सर’ कहने की आवाज़ आते ही पीछे मुड़ कर लक्ष्मण राव ने देखा l पीछे मुड़ते ही सामने स्कॉलरशिप फॉर्म के साथ रामुडु था । उसने “स्कालरशिप फार्म” दिखाया l

    रामुडु के पास से फॉर्म लेते हुए “इससे पहले पूछा था न, तब क्यों नहीं दिया ?” कहने पर रामुडु ने कहा –

    “मुझे मुर्गी बिठाया था न सार ! इसलिए नहीं दिया” 

     लक्ष्मण राव सर रामुडु के भुजाओं पर हाथ रखकर शाबाशी देकर हँसते हुए चला गया l रामुडु बहुत खुश हुआ और सर के हाथ रखे हुए भुजाओं को गर्व से देख रहा था l अच्छी पढ़ाई करूँगा और मैं भी बहुत बड़ा सर बनकर हस्ताक्षर करूँगा, इस तरह वह अपने भावी जीवन की सोंच में डूब गया l 

के.कांचन, (पीहेच.डी.शोधार्थी)

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा खैरताबाद, हैदराबाद

Email:kanchanahcu@gmail.com

Cell no.7901551837

गुजराती कहानी-भैयादादा (लेखक: स्वर्गीय धूमकेतु)-अनुवादक: डॉ.रजनीकांत एस.शाह

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गुजराती कहानी                            

भैयादादा

लेखक: स्वर्गीय धूमकेतु

अनुवादक: डॉ.रजनीकांत एस.शाह

रंगपुर के छोटे स्टेशन पर तीन लोग अधिकारी सहज गुस्ताख से खड़े थे। दूर से आये हुए देहाती लोग,अन्य गाँवों के यात्री और पहली बार ही गाड़ी में मुसाफ़री करने आयी हुई स्त्रियाँ, हुजूम में भी अलग थलग नजर आनेवाले तीन गृहस्थों की ओर बारबार देखकर, आपस में कुछ चोरी छिपे बातचीत कर लेती थीं।

पर उस जगह पर पॉइंट्समेन कौन है? अपनी साहबनुमा टोपी को हाथ में घुमाते हुए एक युवक ने सवाल किया। उसकाकी सवाल करने का अंदाज कहा रहा था कि वह उन सब से बड़ा अधिकारी था।

लम्बे सूखे हुए मुँहवाले एक प्रौढ़ (वयस्क) ने विनयपूर्वक उत्तर दिया:` साहब! वहाँ पच्चीस वर्ष से एक ही आदमी रहता है।’

`पच्चीस वर्ष!’

तीसरा आदमी जो न तो कारकून था और न ही अधिकारी सा- मध्यम पदाधिकारी सा लगता था, उसने मुस्कुराकर हाँ कहा।

`और उस आदमी से आप नियमित काम की अपेक्षा रखते हैं?’ युवा अधिकारी ने अपनी बेंत की छड़ी को जमीं में खोंसकर उसे मोडते हुए कहा।

दोनों में से किसी ने जवाब नहीं दिया। अंत में वह कारकुन सा आदमी बोला:`साहब! बुढा आदमी है। अब वह नौकरी के पच्चीसवें वर्ष में कहाँ जायेगा?’ अब उसका निबाह कर लेने में ही हम सबकी भलाई है।’’

युवा अधिकारी ने अपने होंठ सख्ती के भाव सहित दबाये। अपनी छड़ी से एक कंकड़ दूर तक उडाकर उसने कहा: `आदमी से हमारी कोई निस्बत नहीं है। काम से काम है। उसे जहाँ जाना है जाये। हमें तो मात्र यही देखना है कि वह काम कैसा करता है।

कारकुन का फीका चेहरा कुछ और फीका पड़ा। उसका हृदय निखालिस था। पंद्रह वर्ष की अवस्था से वह कारकुन रहा है। उसने कुछ काली करतूतें करके नहीं पर अनेक अधिकारियों की अधीनता में मृदुल स्वभाव रखकर शिरस्तेदारी प्राप्त की थी। अत: उसमें अपना कोई तेज या प्रभाव तो नहीं था तथापि अच्छा स्वभाव होने के कारण कुछ अच्छा करने का उसका अभिगम रहता था। साहब के होठों की सख्ती को देखकर उसने बहुत नरमी के साथ कहा: `भैया बद्रीनाथ वहां पच्चीस साल से नौकरी कर रहा है।’

`और उसकी अभी क्या उम्रह है?’

`होगी कोई अंदाजन सत्तावन –अट्ठावन की।’

तब तो वह काम के लायक नहीं है!’ साहब ने फैसला सुनाया। साहब के मन में अभी अधिकारी का मद भी है। चतुर शिरस्तेदार ने इस बात को समझ लिया। अत: फिर कभी समझायेंगे,ऐसा सोचकर वह चूप रहा।

हुआ कुछ ऐसा था कि रंगपुर स्टेशन से करीब दो–एक मिल की दूरी पर रेल की पटरियाँ सड़क को काटकर जा रही थी। इसलिए उस क्रोसिंग के पास रेलवे सत्ताधीशों ने एक छोटा सा कमरा बांधकर एक आदमी को वहां रखा था। बद्रीनाथ भैया आज पच्चीस वर्ष हुए, उसी जड़ और जबरदस्त लकडे को गाड़ी के आने-जाने के समय नीचे रख देता था और गाड़ी के चले जाने के बाद उठा लेता था। कुछ समय पहले उसकी असावधानीवश एक दुर्घटना होते होते रह गई। रंगपुर स्टेशन पर ट्राफिक सुप्रिन्टेंडंट,ट्राफिक इन्स्पेक्टर और शिरस्तेदार आज उसकी बात कर रहे थे।

ऐसे में स्टेशन पर गाड़ी आई और साहब अपने डिब्बे में बैठ गए। बैठते हुए भी अपने बदमिजाज स्वभाव को ख़ुशी हो रही हो ऐसे कारकुन के साथ वही बात बारबार कर रहे थे: `उस जगह पर किसी अनुभवी या किसी हुशियार व्यक्ति को नियुक्त करना पड़ेगा।’

उनके आखिरी शब्द गाड़ी की सिटी में डूब गए। दोनों कनिष्क अधिकारियों ने सलामी दी और गाड़ी रवाना हो गई।

शिरस्तेदार विनायकराव हमेशा गाँव की उस सड़क पर दो-तीन मिल सैर करता था। उसकी रुपे के हत्थेवाली छड़ी, पुराना सम्हालकर रखा हुआ रेशमी दुपट्टा, दक्षिणी पगड़ी और चप्पल इस रास्ते पर विगत दस वर्ष से नियमित यात्रा करते थे। बद्रीनाथ के कमरे तक जाकर वे दो घडी बैठकर सुस्ता लेते थे। रावसाहब को आया हुआ देखकर भैया भी अपनी छोटी सी बाडी(बगिया) से बाहर निकलकर ठंडा पाणी भरकर रखता था,बाद में दोनों परदेशी अपने अपने सुख-दु:ख की बातें करते रहते थे और इस प्रकार शाम गुजर जाती थी।

आज भी विनायकराव के धीमे कदम उस तरफ मुड रहे थे। धीर धीरे वह वहां पहुंचे पर भैया को नहीं देखकर, कुछ आश्चर्य अनुभव करते हुए, अपनी हमेशा की चौकी पर बैठा। गहन विचार करते हुए वह वह भैया की सुन्दर कृति को निहार रहा था।-भैया ने अपने कमरे के पीछे बाड़े(बगिया) जैसा बनाकर उसमें गेंदा,कनेर,केल और पपीते लगाये थे। करेली और एक सेम का ऐसे दो लतामंड़प भी बनाये थे। कमरे के दरवाजे के पास कुछ मिर्ची की पौध,अजवाईन,धनिया और तुलसी की क्यारियां थी। आगे के हिस्से में दो-चार छोटे छोटे फूलबेलें चढ़ाकर मंडप जैसा बना लिया था। उसके इर्दगिर्द कुछ बांस लगाकर खपाचें बांधकर दीवार बनायीं थी और नीचे जमीन एकदम स्वच्छ बना रखी थी। उसमें भैया की एक बकरी बंधी रहती थी। विनायकराव,भैया का घर और उसका कलाविधान देखता रहा।

ऐसे में भैया के घर से आठ-दस वर्ष की एक लड़की बाहर आई। विनायकराव को देखकर तुरंत वापस लौटी और भैया से कहा:`भैयादादा! बाहर कोई बैठा हुआ है!’

`कौन है?’-ऐसा कहते हुए भैया बाहर आया।

आज आठेक दिन हुए,वह कुछ अस्वस्थ सा था। तो इस तरफ विनायकराव भी एकाध हप्ता हुआ,

इस तरफ आये नहीं थे। अत: विनायकराव होंगे, यह बुढऊ को याद रहा नहीं। बाहर आकर उन्होंने विनायक

-राव को देखा।

`ओहो! पानी बेटा! यह तो हमारे रावसाहब हैं। ठंडा पानी लाओ,चलो’। भैया अपनी नित्य आदत के अनुसार विनायकराव के पास जा बैठा। दोतीन बिलौटे उसके शरीर से सटते हुए घुमने लगे।

विनायकराव को दिल फटा जा रहा था। भैया को इस जगह से कितना प्यार है, इस बात का सही अंदाज तो उसे आज ही हुआ। आसपास थूअर की बाड हो,बबुल का पेड़ हो या बेर का पौधा हो पर प्रत्येक पेड़ को उस कलाविधान में अपना योगदान करनेवाला बनाकर भैया ने दो चार पल बीताने को मन कर जाये ऐसी छोटी सी सुन्दर बाड़ी(बगिया) बनायीं थी।

पर आज तो उसने कुछ नया ही नजारा देखा। भैया ने,किसी बाड़ीवाले की लड़की को पुत्रीवत लाड़ से बुलाया, राव को यह दृश्य नया लगा, क्योंकि पानी को उसने आज ही देखा था।

`भैयादादा! यह लड़की किसकी है?’आज विनायकराव `भैया’ बोल नहीं सका।

यह तो बाडीवाले की है। बेचारी आठ दिन हुए,वह बकरी दूह देती है। ईश्वर उसका कल्याण करे!’

पानी ठंडे पानी का चमकता-दमकता हुआ लोटा लेकर आई थी। छोटी सी आठ-दस वर्षीया लड़की

की आँख में काजल ऐसा तो सुरेख ढंग से निकला हुआ था कि विनायकराव की दृष्टि वहां जमी की जमी रह गई।

`भैयादादा! अब जाती हूँ,हाँ।’

‘टिलाडी को दूह लिया?’

 टिलाडी भैया की बकरी का नाम था। भोले भैया ने टीका देखकर उसका नाम टिलाडी रखा था।

यदि इन्सान के ऐसे नामकरण हों तो इन्सान भी पशु से बेहतर लगे और शब्द भी यथार्थाक्षर: हो जाये।

`हाँ,भैयादादा!’

`ठीक है। जाओ,कल जल्दी आ जाना हाँ।’

पानी चल दी,पर कुछ देर हुई नहीं कि वह वापस लौटी:

`भैयादादा! चार दिन बाद दीवाली है। क्या आपको लपसी पिसवाना नहीं है?’

वृद्ध भैया हर्षित हुआ। उसने मीठी हंसी बीखेर दी: मुझे और लपसी?’

`ऐसे थोड़े ही होता है? सब लोग खायेंगे-जूठायेंगे और क्या आप नहीं खायेंगे?’

विनायकराव ने नि:श्वास छोड़ा।

`ठीक है, ले, थोड़े से गेहूं ले जा लेकिन बहुत मोटा नहीं पिसना।’

`ना,दादा! मैं तो झीना ही दलती हूँ।’

पानी बिदा हुई। किसान की वह लड़की भैया को इतनी ममतापूर्वक चाह रही थी- विनायकराव को आज ही इस बात का पता चला। उसने धीरे से कहा :`भैयादादा! आप यह नौकरी अब छोड़ दीजिये। अब उम्र भी हुई है।’

अब मुझे कितने वर्ष निकालने हैं? भैया ने जवाब दिया,`ज्यादा से ज्यादा पांच।’

`इसीलिए कहता हूँ कि अब भजन करो!’

`अब इस उम्र में मैं किसका सहारा थामूं! लड़का प्लेग का शिकार हुआ; उसकी बहु भाग गई, अब तो एक मात्र पेट ही है तो भगवान जब तक चलाये तब तक काम करते रहना है और खाना है।’ बद्रीनाथ ने जवाब दिया। विनायकराव का अंत:करण भैया के जवाब से और अधिक आर्द्र होता जा रहा था। वह जाने के लिए खड़ा हुआ तब उसे अचूक लगा कि भैया को उसकी बाड़ी के प्रति माँ से अधिक प्यार था।

दूसरे दिन ट्राफिक इन्स्पेक्टर बराबर नियम से ऑफिस में उपस्थित हुए थे; सामने अपना माथा झुकाए विनायकराव खड़ा था।

`क्यों राव! आप उस भैया बद्रीनाथ की जगह पर किसे बदल रहे हो?मैंने देखा है कि वह बुढा सारा वक्त पेडपौधों को निराने के पीछे बीताता है!’ साहब ने अपनी अवलोकन शक्ति से आश्चर्य अनुभव करने से शुरुआत करके बाघ की सी तीखी नजर से उस विनायकराव की ओर देखते रहे।

राव के मन में कुछ उलझन चल रही थी। एकबार तो उसे अपनी जेब से त्यागपत्र का कागज भी कुछ बाहर आया हुआ नजर आया; पर तुरंत उसके हाथ-पैर कांपने लगे और उसने साहब की ओर झुककर सलाम की।

`विनायकराव!’ बिल्ली जैसे चूहे से खेलती है ऐसे साहब ने पासा फेंका।`आपने क्या सोचा?’

विनायकराव ने विचार करके कुछ जोश तो कुछ रोष करते हुए कहा: `यह नहीं होगा!’

साहब ने होठ चबाये:`क्या?’

हमेशा की गुलामी–कमजोरी अपना जोर ज़माने लगी। राव ने होशोहवास खों दिया। उतायली में भूल हो गई-इस बात को वह समझ गया। वह कही गई बात को बदलने में माहिर होने के कारण तुरंत बोला;` साहब! यह तो मैं किसी और विचारों में उलझा हुआ था। भैया बद्रीनाथ की जगह पर कालू को रखना बेहतर होगा!’

`हाँ,और बद्रीनाथ भैया को चौबीस घंटे का नोटिस दे दो!’

`बहुत बेहतर!’शिरस्तेदार झुककर सलामी देकर बाहर चला गया।

फिरभी विनायकराव ने वृद्ध भैया को कुछ तो मदद की। दूसरे दिन भैया को साहब की हुजुर में लाने के लिए उसने एक खबर भेजी बुढा हाजिर हुआ। साहब अपने कमरे में अधिकारी के रुआब से उतने ही अकड़कर बैठे हुए थे। भैया को देखते ही कहा;`तुम्हारा नाम भैया बद्रीनाथ?

`जी हाँ,साहब!’

`तुम बड़े बूढ़े हो गए हो सरकार की नौकरी की,अब तो आराम लीजिये!’

`जी हाँ,साहब! यह सफेदी नौकरी में ही आयी है।’

`अच्छा!’

भैया तो इस उम्मीद में था कि साहब लम्बी नौकरी के लिए कुछ इनाम देने की सोच रहे होंगे। ऐसे में साहब ने कागज से मुंह उठाकर उसकी तरफ रुख करके समाचार दे दिए:`अच्छा। तुम विनायकराव कूं मिलो। तुम्हारा हिसाब करने के लिए हुक्म दे दिया है,अब तुम आराम करो!’

वज्रपात हुआ हो ऐसे भैया मूढ़ की तरह साहब के सामने खड़ा रहा। अपनी हद में दुर्घटना होने से रह गई,वह बात उसे याद आई। साहब इसलिए उसे बरतरफ कर रहे हैं। आख़िरकार यह बात उसकी समझ में आ गई। वह आर्द्र होगया,`साहब! आज अब…’

साहब बद्रीनाथ की ओर देखता रहा। बद्रीनाथ ने कुछ आगे बढ़कर कहा;` साहब! आप मेरा बुढ़ापा  क्यों बिगाड़ रहे हैं?अब मुझे कौन रखेगा?’

`बूढ़े,बेटा तो है ना?’

`जी,ना! प्लेग…’बद्रीनाथ ज्यादा बोल नहीं सका।`मेरा झोंपड़ा और पेड़-पौधे ही मेरे बच्चे है, अब आखिरी दो-चार वर्ष वहां गुजार लेने दीजिये।’

`अ फुलिश सेंटीमेंटलिस्ट!(मूर्ख रोतल(रो पड़नेवाला) साहब ने उस बुढऊ के शब्दों को मानसशास्त्र में तौलकर देखा।

`ठीक ,ठीक,सोचेंगे,अभी तो जाओ।’

पर भैया बद्रीनाथ तो विनायकराव से मिले बिना धीमी चाल से अपने झोंपड़े पर गया। जिस जमीन के साथ वह बालक की भांति पच्चीस वर्ष तक खेला था,उस जमीन को अब कुछ दिन के लिए छोड़ते हुए उसका दिल कांप रहा था।

दूसरे दिन विनायकराव टहलने के लिए गया। बद्रीनाथ की नौकरी का वह आखिरी दिन था। भैया चौकी पर ही विनायकराव का रास्ता देख रहा था।

`का?काय होईल का? उसने बड़ी आतुरता के साथ विनायकराव से पूछा।

`नहीं,तुमाला जावें लागेल। दूसरा मनुष्ययांची नेमणुंक ढाली।’

बद्रीनाथ भावुक हो गया,लेकिन साहस करके बोला:कल सुबह?’

`हाँ।’

विनायकराव तुरंत भैया के पैरों में गिर पड़ा!

`अरे,अरे! रावसाहब,यह क्या?’

`भैयादादा! यहाँ से सीधे मेरे घर आ जाना। मुझे अपने बेटे जैसा समझकर मेरे साथ रहिये।’

`अरे रावसाहेब!’ भैया फीका हंसा,`यह आपकी उदारता है पर मैं तो यहीं कहीं इस जमीन के पास रहूँगा।’

विनायकराव ने सोचा कि दूसरे दिन भैयादादा को समझायेंगे। दोनों जब उठे तब भैया ने अश्रु सहित विनायकराव को गले से लगा लिया। दो-तीन बिलौटे तो उसके बूढी देह पर खेल रहे थे।

`रावसाहब! मैं इन्हें आपको सौंप रहा हूँ हाँ!;’बुढा इतना ही कहा सका और दोनों विलग हुए।

दूसरे दिन सबेरे दिन उगा नहीं उगा कि विनायकराव आ गया था। पानी भी बकरी को दुहने के लिए उपस्थित हो गई थी। विनायकराव चौकी पर बैठा क्योंकि भैया अभी तक बाहर नहीं आया था। अंतत: थककर पानी ने दरवाजा खटखटाया। किंवाड तो खुला ही था।

`भैयादादा! ओ भैयादादा! किसान की बेटी का स्नेहिल स्वर एकांत खेत में स्पष्ट रूप से चीख रहा था।

`भैयादादा! चलिए,चलिए टिलाडी को दुह रही हूँ!’

पर भैयादादा ने जवाब दिया नहीं।

पानी ने अपनी आवाज को थोडी ऊँची करके कहा,` और यह रही आपकी दीवाली की लपसी,दादा!’

अब विनायकराव उठकर वहां गया। झोंपड़े में अडिग और खड़े होकर वृद्ध भैयादादा ओढ़कर आराम से सोये हुए थे। बिलौटे उसकी देह से सटकर खेल रहे थे। मेमने तो उसके बिछौने के पास बैठकर करुण स्वरों में मिमिया रहे थे।

विनायकराव की आँखें डबडबा आई और भीतर गया।

पानी दादा की देह को हिलाकर हंस रही थी। अभी भैयादादा `रुक,अभी पकड़ता हूँ’ कहकर ऊठेंगे ऐसे विनोद की आश के साथ खुश होती हुई हंस रही थी। विनायकराव ने पास जाकर शरीर को खूब टटोला और जोर से चिल्लाये:`भैयादादा!’

झोंपड़ी से कोई निकाले नहीं इसलिए भैयादादा अडिग सोये रहे।

विनायकराव की आवाज फट गई और उसकी आँखें चूने लगी। उसने पानी की ओर मुड़कर कहा,

`पानी! अब भैयादादा नहीं बोलेंगे।’और कभी मान नहीं सकते छोटी लड़की ने भैयादादा की देह के पास जो रुदन किया, वह आज भी मुझे जब याद आता है तब मेरे जीवन में बिजली जैसे झटके लगते हैं। अनंत समय और अगाध आकाश को भेदकर वह स्वर बारबार सुनाई देगा।

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भैयादादा की बाड़ी में अब कभी भी ऐसी सफाई रहती नहीं है। फाख्ता, बैठते थे,गोरैया गातीं और कोयल बाड और बेलों के अन्दर चली जाती रहती थी -ऐसी सृष्टि अब वहां नहीं है। काम करनेवाली आत्मा के बदले काम करनेवाली काया है। बीसवीं शताब्दी को काव्यमय जीवन से क्या लेना-देना?संस्था…को व्यक्ति के निजी भव्य जीवन से क्या निस्बत? यंत्रवाद नियमित जड़त्व के बदले में रसमय चैतन्य का क्या करे? इस यंत्रवाद में एक दिन यह जगत भी यन्त्र जैसा होकर रहेगा।

संपर्क:2-`शील-प्रिय’,विमलनगर सोसायटी,नवाबजार,करजण.जिला.वड़ोदरा.गुजरात.पिनकोड:३९१२४०. मोबाईल:९९२४५६७५१२.E.Mail Id : navkar1947@gmail.com

हिंदी भाषा शिक्षण हेतु वेब आधारित सामग्री का मूल्यांकन-संजय कुमार

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हिंदी भाषा शिक्षण  हेतु वेब आधारित सामग्री का मूल्यांकन

संजय कुमार

पी-एच.डी. हिंदी (भाषा प्रौद्योगिकी)

भाषा प्रौद्योगिकी विभाग, भाषा विद्यापीठ

म.गां.अं.हि.वि. वर्धा

सार

पिछले दो दशक में प्रौद्योगिकी का विकास हुआ है वह बेशक असाधारण और आश्चर्यजनक रूप से निरंतर आगे बढ़ रही है। आज इंटरनेट का व्यापक उपयोग भाषा शिक्षण के लिए हो रहा है। अनेक अन्य भाषाओं के लिए नए-नए वेबसाइट डिजाइन किए जा रहे है। जहाँ मल्टीमीडिया और हाइपर्टेक्ट के माध्यम से कथ्य, ध्वनि, एवं वीडियों आदि की सहायता से भाषा का शिक्षण अधिगम किया जाता है। हिंदी भाषा के शिक्षकों द्वारा भी स्वीकार किया गया है कि यह भाषा और संचार के लिए प्रामाणिक स्रोत है। भाषा शिक्षण से संबंधित वेबसाइट बहुत ही सरल होती है। इंटरनेट सुविधा से युक्त विद्यार्थी सहज और सरल तरीके से भाषा अधिगम में समर्पित वेबसाइट पर लाँगऑन करके भाषा का अध्ययन कर हिंदी भाषा में प्रमाणिक जानकारी प्राप्त कर अप्रत्यक्ष रूप से अपनी लक्ष्य भाषा का अभ्यास कर सकते हैं।

इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य उन वेबसाइट का मूल्यांकन करना है, जो हिंदी भाषा अधिगम हेतु समर्पित है।

की-वर्ड-

इंटरनेट, वेबसाइट, भाषा शिक्षण।

प्रस्तावना

पिछले दो दशक में जिस गति से तकनीक विकसित हुई है, वह स्वीकार्य  रूप से असाधारण एवं निरंतर चकित करने वाली है। हिंदी भाषा अधिगम हेतु पर्याप्त संख्या में अकादिमिक संस्थानों, शैक्षणिक संगठनों एवं व्यक्तियों ने वेबसाइट प्रकाशित किए हैं। शिक्षण संबंधी सॉफ़्टवेयर में भी एक क्रांतिकारी परिवर्तन यह हुआ है कि जो सॉफ़्टवेयर कल तक संगणक कार्यक्रम हेतु प्रयोग में लाए जा रहे थे वे अधिकाधिक सरल एवं संग्राह्य हो गए है। वही दूसरी ओर levy(1997) के अपने शब्दों में कहा है कि “हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर के तीव्र विकास ने शिक्षार्थीयों हेतु मूल्यांकन करने के लिए बहुत अल्प समय छोड़ दिया है, शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक का निरंतर तीव्र विकास ने ठीक प्रकार से मूल्यांकन करने की क्षमता को भी बहुत पीछे छोड़ दिया है।”[1] तकनीकी के विकास के कारण एक से अधिक संख्या में वेबसाइट उपलब्ध है। एक उदाहरण यह है कि ‘भाषा शिक्षण या भाषा अधिगम’ को इंटरनेट के सर्च इंजन पर डालते ही इंटरनेट एक से अधिक उन वेबसाइट का विवरण प्रस्तुत करने लगता है जो भाषा शिक्षण में सहायक होती है। परिणाम स्वरूप एक इंटरनेट उन्मुख भाषा शिक्षक के लिए ये दुष्कर हो जाता है कि वे किन-किन वेबसाइट को खोजें, वर्गीकृत करे, मूल्यांकित करे या अपने शिक्षण में किन वेबसाइट को जोड़े।

वेबसाइट-

वेबसाइट सर्वर पर डिजिटल रूप में संचित होती है वेबसाइट को कंप्यूटर या लेपटॉप पर देखने के लिए एक विशेष प्रोग्राम का उपयोग किया जाता जिसे हम वेब ब्राउजर (इन्टरनेट एक्स्प्लोरर, मोजिला फ़ायरफ़ॉक्स, सफारी, ऑपेरा, फ्लॉक और गूगल क्रोम) कहते है। वेबसाइट को URL (यूनीफॉर्म रिसोर्स लोकेटर) के रूप में लोकेट किया जाता है। वेबएड्रेस या डोमेन नेम यह किसी विशिष्ट फ़ाइल, डायरेक्टरी या वेबसाइट के पेज का एड्रस होता हैं| वेबसाइट का एड्रेस वेबसाइट के होम पेज को रिप्रेजेंटे करता है। इस वेबएड्रेस का आरंभ अंग्रेज़ी के अक्षर-समूह http (हाइपरटेक्स्ट ट्रांसफ़र प्रोटोकॉल) से होता है, जैसे-

  • http://www.ispeakhindi.com/
  • http://www.mindurhindi.com
  • http://www.akhlesh.com
  • http://www.rocketlanguages.com/hindi/
  • http://www.learning-hindi.com

वेब पर उपलब्ध शिक्षण कार्यक्रम ऑनलाइन शिक्षण कार्यक्रम है। जिसे हम अन्य नाम जैसे- आभासी शिक्षण, इंटरनेट आधारित शिक्षण और वेब आधारित शिक्षण के नाम से जानते हैं। यह दूरस्थ शिक्षण कार्यक्रम है। इसमें भौगोलिक सीमाएँ नहीं होती हैं। यहाँ शिक्षण सामग्री कथ्य, श्रव्य और श्रव्य-दृश्य रूप में होती हैं। जिसके माध्यम से भाषा शिक्षण और अधिगम का कार्य किया जाता है। वेब पाठ्यक्रम के अंतर्गत संचार साधनों के रूप में चैट रूम, ई-मेल, आदि का उपयोग किया जाता है।

सामग्री-

आज कल वेबसाइटका प्रयोग भाषा शिक्षण के लिए अधिक हो रहा है। जिससे कुछ समस्याएँ भी आ सकती है, क्योंकि यहाँ भाषा शिक्षण सामग्री बहुत अधिक मात्रा में होती है और प्रभूत सामग्री के कारण हतोत्साहित और विचलित होने की संभावना बनी रहती है। प्रकाशन से पूर्व सामग्री की छँटनी के अभाव में वर्तनी और व्याकरण की त्रुटियों के अतिरिक्त बिशिष्ट अस्वीकार्य सांस्कृतिक सूचनाओं के निहित होने की स्थिति बनी रहती है, और वेब पर प्रस्तुत सामग्री में विषयनुसार संरचित न होने के कारण उसे खोजना कठिन हो जाता है, इन सभी संभावित उपयोगों और समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुए वेब आधारित भाषा शिक्षण सामग्री का मूल्यांकन किया जाता है।

भाषा शिक्षण और अधिगम हेतु इंटरनेट के चार प्रकार से उपयोग होते हैं-

1.      व्यक्ति  उपयोग 
2.      सामूहिक उपयोग 
3.      वर्गीय कक्षा उपयोग 
4.      स्वीकार्य पहुँच उपयोग 
 
इंटरनेट आधारित सामग्रियों का मूल्यांकन- मूल्यांकन दोनों आधार पर संभव है।  
1.      भाषा आधारभूत सिद्धांत 
2.      भाषा का व्यवहार में अनुप्रयोग
 
यह मूल्यांकन इस बात का है कि क्या वेब आधारित सामग्री का आधारभूत सिद्धांत  एवं व्यवहार में उसके वास्तविक अनुप्रयोग के आधार पर किया जा सकता है।  प्रस्तुत मूल्यांकन में निम्नलिखित पर विचार किया गया है :- 
1.      भाषा संबंधी मुद्दे (द्वितीय भाषा अर्जन के सिद्धांत, शिक्षण प्रविधियाँ)
2.      विषयवस्तुपरक मुद्दे (प्रामाणिकता,सटीकता,गुणवत्ता और सामग्री की मात्रा, संरचना और संगठन, इनपुट(निवेश), आउट्पुट(निर्गत),प्रतिपुष्टि वर्ग और स्वीकार्य के प्रयोजन के आधार पर उपयोगिता)
3.      मानव कंप्यूटर अंतरक्रिया (प्रयोजनीयता, अधिगम्यता, अंतरापृष्ठ)
4.      मल्टीमीडिया के अनुप्रयोगों की उपयुक्क्ता और प्रभावशीलता (दृश्यश्रव्य प्रस्तुति, पाठ ग्राफिक्स की उपयुकता और प्रभावशीलता, प्रयुक्त युक्तियाँ और प्रस्तुत सुविधाएँ)
मूल्यांकन में व्यक्तिगत आत्म-निरीक्षण अभिगम का उपयोग करते हुए अपने अनुभव के आधार पर कई उपरयुक्त चरों की जाँच सूची का प्रयोग करते हुए मूल्यांकन विंदुओं का मूल्यांकन किया। इस प्रकार के मूल्यांकन में वस्तुनिष्टता का अभाव हो सकता है भले ही इसके निराकरण के लिए एक से अधिक विशेषज्ञयों  का उपयोग किया गया हो। 
विधि-
यह मूल्यांकन एक समय अवधि (जुलाई 2016 से अगस्त 2016)में उपलब्ध 5 वेबसाइटों को लेकर किया गया है। वे सभी वेबसाइट किसी संस्था या संगठन से संबंधित है जो इस प्रकार हैं ।
  1. वेब साइट का नाम – I SPEAK HINDI

http://www.ISpeakHindi.com

Email:Support@ISpeakHindi.com

  • वेब साइट का नाम – Mind ur Hindi

Contact : Akshay@mindurhindi.com

  • वेब साइट का नाम – आओ हिंदी सीखें

http://www.akhlesh.com

akhlesh.agarwal@gmail.com

  • वेब साइट का नाम – Rocket languages speak and understand a new language faster

http://www.rocketlanguages.com/hindi/

support@rocketlanguages.com

  • वेब साइट का नाम – Learning Hindi!

वेब साइट का पता – http://www.learning-hindi.com

  
परिणाम :-
 भाषा संबंधित चिंतन – 
इनमें से अधिकतर वेबसाइटों में स्किनर के उद्दीपन, अनुक्रिया और पुनर्बलन के   सिद्धांत पर आधारित हैं अर्थात व्यवहारवादी प्रकृति के है, और यहाँ यह आश्चर्यजनक है कि जो संरचना और शब्दावली सिखी जानी है उन्हें आदर्श निर्माण के लिए दोहराया नहीं गया है। यहाँ सीखने वालों के लिए पर्यटन से संबंधी जानकारी को सम्मिलित किया गया है  जिससे उनके शब्दों के ज्ञान में वृद्धि हो, वह अपने व्यावहारिक जीवन में उनका श्रवण तथा व्याकरण का अभ्यास कर सकें। यहाँ भाषा जानकारी के स्रोत का कार्य करती है जिससे छात्र एक प्राक्क्ल्पना तैयार कर भाषा अधिगम प्रक्रिया में सक्रियता के साथ भाग ले सके। 
इन साइटों का आधारभूत सिद्धांत SLA(द्वितीय भाषा अर्जन के सिद्धांत) के लक्ष्य के अनुरूप है जो श्रोतागण प्रयोजन तथा स्थिति के अनुरूप औपचारिक और अनौपचारिक प्रस्थितियों में संप्रेषण एवं सांस्कृतिक रूप में स्वीकार्य विधियों से हिंदी भाषा व्यवहार का कार्य करता है। कुछ वेबसाइटों में अंतरण,संज्ञानात्मक, नमनीयता तथा निर्माणत्कतावाद के सिद्धांतों का वेहतर उपयोग किया गया है।
 
विषयवस्तुपरक मुद्दे- 
1.      भाषा आधारित विचार/ मुद्दे – अधिकांश साइट अभ्यास आधारित है। 
2.      सामग्री – सभी वेबसाइट पर उपलब्ध सामग्री प्रामाणिक हैं। सामगी में वर्तनीगत त्रुटियाँ नहीं के बराबर पाई गयी सामान्यतः कुछ त्रुटि पंचमाक्षर से संबंधित थे। ये इस बात का द्योतक है कि वेबसाइट का अद्यतीकरण नहीं किया गया है।
3.      संरचना – संरचना से संबंधित किसी प्रकार की त्रुटि नहीं पाई गई। 
4.      गुणवत्ता और सामग्री की मात्रा- प्रयोजन के अनुसार सामग्री की मात्रा और गुणवत्ता उपयुक्त है। 
 
 
मानव कंप्यूटर अंतरक्रिया- 
1.      प्रयोग अंतरापृष्ठ- वेबसाइट सही तरह से निर्मित है, इनमें रंगों, इंटरनेट डिज़ाइन तकनीकों, मानव मशीन अंतरापृष्ठ तकनीकों का उपयोग किया गया हैं। 
उपयुक्कता और प्रभावशीलता (मल्टीमीडिया अनुप्रयोगों का)- 
1.      I SPEAK HINDI- पाठ कथ्य और श्रव्य में है। पाठों को अधिगमकर्ता के आरंभिक स्तर, मध्य स्तर और उच्च स्तर में विभाजित कर प्रस्तुत किया गया है।
2.      Mind ur Hindi- इस वेबसाइट पर हिंदी वर्णमाला, हिंदी अभ्यास, हिंदी पाठ, हिंदी व्याकरण, हिंदी संवाद शीर्षक दिए गए हैं। हिंदी वर्णमाला से संबंधित पाठ स्वर, व्यंजन और बारहखड़ी को क्थ्य और श्रव्य रूप में दिए गए हैं। हिंदी पाठ के अंतर्गत पाठों को फ्लैस कार्ड के माध्यम से अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद एवं हिंदी वाक्यों का लिप्यंत्रण कर प्रस्तुत किया गया है। हिंदी अभ्यास के अंतर्गत अंग्रेज़ी शब्द का हिंदी में अनुवाद कर हिंदी शब्द को वाक्य में प्रयोग कर प्रस्तुत किया गया है। ये पाठ कथ्य रूप में है। 
3.      आओ हिंदी सीखें- इस वेबसाइट की सामग्री ईमेज के रूप में है। जिसे अधिगमकर्ता पढ़ सकता है, साथ ही उसे डाउनलोड भी कर सकते हैं।   
4.      Rocket languages- इस वेबसाइट पर पाठ श्रव्य रूप में दिया गया है। पाठ के वाक्य/शब्द हिंदी और अंग्रेज़ी में दिए गए हैं। साथ ही हिंदी शब्द/ वाक्य का लिप्यंत्रण कर प्रस्तुत किया गया है।
5.      Learning Hindi!-  शिक्षण और अधिगम सामग्री को छोटे-छोटे पाठ में विभक्त किया गया हैं जैसे- स्वर ध्वनियां (अ,आ) (इ,ई) (उ,ऊ) (ए,ऐ) (ओ,औ) (ऋ) में विभाजन कर प्रस्तुत किया गया है, उसी प्रकार व्यंजन ध्वनियां को उच्चारण स्थान के आधार पर विभाजित किया गया है। स्वर और व्यंजन ध्वनियां के उच्चारण दिए गए हैं। शेष पाठ कथ्य रूप में दिए गए हैं। उन पाठ में प्रयुक्त शब्द आदि को चित्रों के माध्यम दर्शाया गया है।     
निष्कर्षतः- 
यहाँ जितनी भी वेबसाइटों का मूल्यांकन किया गया है वे सही तरह से निर्मित है इनमें रंगों,इंटरनेट डिजाइन तकनीकों, मानव मशीन अंतरापृष्ठ तकनीकों का उपयोग किया गया है। तथा जो सामग्री प्रस्तुत की गई वह भी सटीक और शैक्षणिक गुणवत्तायुक्त पाई गई। यहाँ मूल्यांकन में यह भी दिखाया गया है कि जिस वेबसाइटों का मूल्यांकन किया गया है उनमें से अधिकांश प्रकृति से व्यवहारवादी थी। यद्यपि ये पूर्णतः इच्छित आदत निर्माण हेतु पुनरावृत्तिपरक  नहीं थी।  यहाँ एक बात महत्वपूर्ण है कि CALL की तरह पुरानी शिक्षण पद्धतियों को बढ़ावा देते हुए उच्च तकनीक का प्रयोग किया गया है। अन्य कल्पनाशील साइटों द्वारा प्रस्तुत भाषा संबंधित सामग्री सांस्कृतिक सूचनाओं सहित कई संदर्भों का उपयोग कर शिक्षार्थी के लिए नई-नई जानकारी देने का प्रयास किया गया है, जिससे कि वह सांस्कृतिक रूप से जागरूकता बढ़ाते हुए सीखने में सक्रिय रूप से संलग्न हो सके । 
अंततः यह दावा किया जा सकता है कि अधिकांश विदेशी भाषा के रूप में हिंदी भाषा शिक्षण वेबसाइट शिक्षक के अभाव में स्वयं संचालित की जा सकती है।
 

संदर्भ ग्रंथ सूची-

  1. गुप्त,मनोरमा, (): भाषा शिक्षण : सिद्धांत और प्रविधि, आगरा केंद्रीय हिंदी संस्थान|.
  2. नारंग, वैश्ना (1996):संप्रेषणपरक हिंदी भाषा शिक्षण, नई दिल्ली प्रकाशन संस्थान।
  3. भाटिया, कैलाशचंद्र (2001) : आधुनिक भाषा-शिक्षण, नई दिल्ली तक्षशिला प्रकाशन।   
  4. शर्मा, डॉ. गीता, (2009): हिंदी शिक्षण सिद्धांत और व्यवहार, मेरठ: श्री हरिअंग प्रकाशन। .
  5. श्रीवास्तव, रवींद्रनाथ, (2000): अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान: सिद्धांत एवं प्रयोग, दिल्ली: राधाकृष्ण प्रकाशन लिमिटेड।

English book

  1. Alexander, J. Tate, M. A. (1996). Checklist for an informational Web page. Retrieved June 24, 2003 from http://www2.widener.edu/WolfgramMemorial-Library/webevaluation/inform.htm
    1. Joseph, L. C. (1999). WWW CyberGuide ratings for content evaluation. Retrieved June 24, 2003 from http://www.cyberbee.com/guides.html
    1. Kelly, K. (2000). Guidelines for designing a good Web site for ESL students. The Internet TESL Journal, 6(3). Retrieved June 24, 2003 from http://iteslj.org/Articles/Kelly-Guidelines.html
    1. McKenzie, J. (1997). Comparing & evaluating Web information sources. Retrieved June 24, 2003 from http://www.fno.org/jun97/eval.html
    1. Nelson, J. (1998). A system for the evaluation of ESL Web sites. Retrieved June 24, 2003 from http://www.wsu.edu:8080/%7Ejtnelson/thesis/complete_thesis.html

वेब लिंक

  1. http://guides.library.cornell.edu/c.php?g=32334&p=203767&preview=ad0bac0490cf7ab0653096fe3b4a0fee
  2. http://www.lib.umd.edu/tl/guides/evaluating-web
  3. http://www.widener.edu/about/campus_resources/wolfgram_library/evaluate/
  4. http://lib.colostate.edu/howto/evalweb.html
  5. ttp://www.lib.vt.edu/instruct/evaluate/
  6. http://guides.lib.berkeley.edu/evaluating-resources
  7. http://www.library.kent.edu/criteria-evaluating-web-resources
  8. https://eprints.usq.edu.au/820/1/Son_ch13_2005.pdf
  9. http://www.conta.uom.gr/conta/publications/html/EVALUATION%20OF%20INTERNET%20BASED%20MATERIALS%20FOR%20LANGUAGE%20LEARNING.htm
1] Levy, M. (1997). Computer-assisted language learning: Context and conceptualization. Oxford University Press.

जीवन संगिनी

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इस कविता का आधार है एक ऐसा पति जिसकी पत्नी की अचानक से मृत्यु हो जाती है, तब उसके मन की जो संकल्पनाऐं जन्म लेती हैं उनका वर्णन किया है, !

सब सन्न हैं ,
सब मौन हैं ,
स्तब्ध हैं सब कोई यहाँ
है गिरी बिजली सी कोई,
या गिर पङा पहाड़ है
आत्मा का है ग़मन,
अब
ये जिस्म भी बेजान है
थी ,
कल चहकती सी , महकती सी
जैसे हो कुमुदुनी की कली ,
छोङकर मुझको अकेला ,
वो अकेली ही चली ,
जन्मों की खाई थीं कसमें,
फेरे सात जन्मों के लिये,
साथ देंगे एक दूसरे का ,
फिर क्या हुआ? मेरी प्रिये ,
कुछ अनौखी अटपटी सी ,
तेरी वो नादानियां ,
एक फिल्म जैसी रील चलती ,
हैं झलकतीं झलकियां,
क्या हुआ? कैसे हुआ?
कब हुआ ये हादसा ?
कुछ न,
समझ में आ रहा है,
जिंदगी का इम्तहान,
हंसती खेलती जिंदगी में ,
हो गया बिखराव है ,
दो दिलों के मिलन में,
हो गया एक घाव है ,
दर्द इसका है अजब सा ,
टीस दिल में ही रहे
सब दिखेंगे चलते फिरते ,
न तुम दिखोगी हे प्रिये ,
बात किससे में कहूँगा,
अपने दिल ए जजबात की ,
प्यार किससे में करूँगा,
ये तुम नहीं हो जानती ,
हूँ अकेला में तेरे बिन,
इस भरे संसार में,
लङ सके सबसे अकेला ,
शक्ति है वो प्यार में ,
न दिखेगा रूप तेरा ,
जो मुझे इठलाऐगा ,
सोच कर हर बार तुमको ,
दिल मेरा भर आएगा ,
क्यों अकेला रह गया मैं,
संग मुझको क्यों न ले चली ,
लग रही हो सेज पर,
लेटी हुई भी सुंदरी ,
क्या कहूँ, किसकी सुनूं मैं,
सब कुछ मेरा बेकार है ,
आदमी की जिंदगी में,
पत्नी ही संसार है ,
इस दर्द को ,
अपने मैं कैसे ,
तुमको बांटूँ , हे प्रिये
एक पल ही बिन तेरे , यूं लगता ,
जैसे वर्षों से तन्हा जिये ।

पुरूषोत्तम व्यास की कविताएँ

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पुरूषोत्तम व्यास की कविताएँ

अघोषित युध्द….

कहाँ…कहाँ नही

विचारों में

चौराहों में

हर नगर गांव की गलीयों में

बच नही पाता कोई

न कोई बडे-बडे टेक

न कोई मशीनगन

फिर भी चल रहा

अघोषित युध्द…

बोझा पहाड-सा

इसको पकडू

इसको जकडू

नफरत फैलाने वाले आदोंलन…

अलग मैं

मेरे विचार अलग

मेरा झंडा अलग

मेरा एजेडा अलग

मै सबसे अलग…

हिड्डियाँ का साम्राज्य

भडक रहा…तूफान.

नई-नई योजनाओं संग

नये-नये नारों के संग

अघोषित युध्द……

वेक्यूमकिनर 

कितना डर समेटे रहता

नही मालूम

कौन से कोने से

डर भरे विचार आ

जाते…..

तोड़ते रहते हिम्मत

चारों तरफ

टूट टूट के गिर रहे

पहाड़ चारो ओर

हा-हाकार…..

कीजड़ कीजड़

फैली हजारों लाशे

फट पडे बादल…..

स्थिती अतिभयानक

मौंत का ताड़व

भूखे प्यासे भटक रहे…….

टूटा/ टूटा

फटा/ फटा

कटा /कटा

मिटा /मिटा

चल रहे अधंकार के

तरफ…….

सीधी-सरल जीवन शैली

शून्य/ शून्य

दिवश/ दिवश  बीत रहे

चितायें दीमक की तरह

शरीर को खाई जा रही……..

स्थितीयों पर बस नही

ईष्या..

घ़ृणा…

के भाव पालते हुयें……

धोखा….

षड़यत्र…..

लूट खसोट

पेड़ो पर चमगादड़ लटकते हुयें

मांस नोचते हुयें बाज

पखों की घड-घड आवाज

कमरे में गुजंती हुई……….

कहाँ उड़ो मैं

पिघल गई

हिमशिलायें

पूर्ण रूप से झनझोर

देना चाहता विचारो को……..

आरसी में

जब भी आपने आप को देखता

आखों में नफरत ही दिखती……

विचारो की श्रृंखला

खून चूसते हुयें

कीड़े…….

वहम का बहुत बड़ा

साम्राज्य

टूट टूट के गिर रहे

हरे हरे पत्ते…….

मंथता रहता

बस मे नही

करवटे बदलती रहती…

स्थितीयाँ

अभिशाप

प्रेम के फूल महकते

नही

भड़की हुई आग

धुआँ का अता पत्ता नही

बारिस का मौसम

टिन पर बूदों की आवाज…….

दिवारों पर पपड़ीयाँ

घाव भी हरे हो जाते….

समझोंता

गंदगी मन-में

कोनसे वेक्यूमकिनर का उपयोग किया जायें…….।

पुरूषोत्तम व्यास

C/o घनश्याम व्यास

एल.जी 63 नानक बगीचे के पास

शांतीनगर कालोनी

नागपुर(महाराष्ट)

ई-मेल pur_vyas007@yahoo.com

मो. न. 8087452426

काम पर जाने वाली औरत-संगीता सहाय

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काम पर जाने वाली औरत

अलसुबह उठती है वो

अपने उनिंदे नयनों को

ठंढे पानी के छींटो से

तरोताजा करती ….

जुट जाती है

‘काम’ पर जाने के

पहले वाले कामो पर.

सधे हाथो से निपटाती है-

झाडू-पोंछा,

आटा-मसाला,

रोटी-दाल-सब्जी,

और भी ढेरो काम.

निपटकर चुल्हा-चौके से

थमती है पलभर

लेकर एक गहरी सांस

देखती है

बेफ्रिक सोये घरवालों को.

उसकी आँखों में नाराजगी की

अश्फूट रेखा झलकती है.

और वो फिर से लग जाती है

शेष कामो के निपटारे में.

ईश्वर के सामने

धूप-दीप करते उसके हाथ,

प्रार्थना के चंद कतरे

उच्चारते उसके होंठ,

घड़ी की सूइयों की ओर

तकती उसकी आँखे,

और सुबह से शाम तक के कामों के

फेरहिस्त बनाते उसके दिमाग

सब चलते हैं एक साथ.

उसे याद आती है

अपनी बीमार माँ की

जिनसे मिले हो गए है महिनो.

मन की आकुलता

आँखों से पानी बनकर बरसते हैं.

चाय का कप लेकर आती

नन्हीं सी बेटी

उसके ख्यालों के दुर्ग को भेदकर

चेहरे पर एक स्मित सी

मुस्कान बिखेरती है.

प्यालों से उठते भाप के धूंध में

अपने वजूद को तलाशती वह

जानना चाहती है

अपने लिए अपने होने के मायने.

—– संगीता सहाय.

पुलिस कालोनी, B – 175

अनीसाबाद, पटना बिहार

मोबाईल नंबर – 9905400867.

Email id ; sangitasahay111@gmail.com

मनु-स्मृति: आलोक कुमार

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पात्र-सूची

मनु(स्त्री-पात्र)

दीपक

चंदन/चुन्नू-(भाई)

दुखन दास-(पिताजी)

समाज-1

समाज-2

समाज-3

समाज-4

 

अंक-प्रथम

 

दृश्य-प्रथम

(मंच के बीच में एक बेंच रखा रहेगा,जहाँ मनु और दीपक बैठे होते हैं दीपक मनु को कहानी ‘यही सच है’ का एक अंश सुनाते रहता है)

‘’आँसू-भरी आँखों से मैं प्लेटफॉर्म को पीछे छूटता हुआ देखती हूँ। सारी आकृतियाँ धुँधली-सी दिखाई देती हैं। असंख्य हिलते हुए हाथों के बीच निशीथ के हाथ को, उस हाथ को, जिसने मेरा हाथ पकड़ा था, ढूँढने का असफल-सा प्रयास करती हूँ। गाड़ी प्लेटफॉर्म को पार कर जाती है, और दूर-दूर तक कलकत्ता की जगमगाती बत्तियाँ दिखाई देती हैं।- धीरे-धीरे वे सब दूर हो जाती हैं, पीछे छूटती जाती हैं। मुझे लगता है, यह दैत्याकार ट्रेन मुझे मेरे घर से कहीं दूर ले जा रही है – अनदेखी, अनजानी राहों में गुमराह करने के लिए, भटकाने के लिए!’’

दीपक:-मनु तुम सुन रही हो न ? मनु !

मनु :- दीपक न जाने क्यों मेरा मन बहुत घबरा रहा है,ऐसा अलग रहा जैसे कुछ बुरा होने वाला है. तुम मेरा साथ दोगे न दीपक ?

दीपक:-हमेशा.

मनु:-हमने जो कदम उठाया है वह सही तो है न ?

दीपक:-हां बिल्कुल, शिक्षा भी तो हमे सही और गलत में फर्क करना सिखलाती है. अगर हम आज़ादी से जी नहीं सकते तो ऐसी जिंदगी का क्या अर्थ मनु. साहित्य भी तो हमे जीना ही सिखलाता है.अगर तुम पढना चाहती हो आगे बढ़ना चाहती हो और अपनी अस्मिता का निर्माण खुद करना चाहती हो तो इस में गलत क्या है. ऐसे में यदि पुरानी परम्परा को तोडना भी पड़े तो तोड़ दो नवीन परंपरा का पुरानी परम्परा हमेशा ही विरोध ही तो करती आई है.

मनु:-मेरे साथ सदा रहोगे न दीपक?

दीपक:-वादारहा
मनु:-मुझे बीच मझधार में छोड़ कर नहीं जाओगे ?

दीपक:-तुम्हारे साथ ही रहूँगा अपनी आखिरी साँस तक.

(मंच पर मनु के पिता और भाई का प्रवेश जो पहले से ही छीप कर दोनों की बातें सुनते रहते हैं दोनों काफी गुस्से में होते हैं तभी गोली चलती है जो मनु का भाई चलाता है वह गोली दीपक को जा कर लगती है)

चंदन:-(क्रोध में) ये लो ये रहे तुम्हारे वादे और बंद किये देते हैं तुम्हारी आखरी साँस चंदन गोली चलाता है जो सीधा दीपक के सीने पे जा कर लगती हैं.(दीपक वही सीना पकडे मनु की तरफ अपना हाथ बढ़ाता है जहाँ दीपक के मुख से एक हलकी आवाज़ निकलती है मनु..उ..उ..उ ! और अचेत नीचे गिर जाता है)

मनु:-(जोर से चिल्लाती है) नहीं..ई..इ..इ..इ..इ..इ..इ! ये क्या किया तुम लोगों ने ? (मनु वहीं अचेत दीपक के शरीर को हिला डुला कर उठाने का प्रयत्न करती हैं)दीपक दीपक दीपक (और फिर पास बैठ फूट-फूट कर रोने लगती है.)

दुखन दास:- बहुत देख लिया तेरा ये पागलपन बहुत दे दी तुम्हे आज़ादी. दो डिग्री क्या ले ली खुद को मदर टरेसा, झासी की रानी समझने लगी है, बेटा इस कुत्ते की लाश को घसीट कर जंगल में फेक दो और इस पागल को ले चलो इसका फैसला घर पर ही करते हैं. (चंदन दीपक की लाश को घसीटते हुए और दुखन दास मनु को बाजू से पकड़ कर खींचते हुए लेकर मंच से प्रस्थान करता है)

दृश्य:-2

(पुनः तीनो का मंच पर प्रवेश)

 

(एक अभावग्रस्त कमरे का दृश्य, कमरे में एक पुराना बक्सा. उस बक्से में एक कपड़े का बना गुड्डा गुडिया, 2 हाथ का रस्सा और एक कुर्सी पहले से रखा रहेगा)

दुखन दास:-चल तू चल,बंद कर दो इसे कमरे में ये पागल हो चुकी है पागल.

चंदन:-प्यार करेगी हम्म !समाज के बनाए कानून को तोड़ेगी ? ये तेरे थैले में क्या है ? दिखा.

मनु:-छोड़ो इसे नहीं दूंगी मैं.

चंदन:- नहीं देगी ? हम्म कैसे नहीं देगी, चल ला (चंदन एक जोरदार थप्पड़ मनु को मारता है मनु नीचे गिर जाती है और थैली छीन कर उससे कुछ पन्ने निकालता है जिसमें मनु की कविताएँ लिखी होती हैं जिसे चंदन पढ़ता है)’हम हैं आज की नारी,सशक्त हम हैं आज की नारी हम पे किसी का न जोर हम हैं खुद के अधिकारी…(चंदन व्यंग करते हुए कहता है) ये देखो इसे अधिकार चाहिए आज़ादी चाहिए (यह कहते हुए चंदन उन पन्नों को फाड़ देता है और हवा में उछालते हुए कहता है) ये ले, ये रहा तेरा अधिकार और ये रही तेरी आज़ादी. (मनु चीखते हुए) मेरी कविताएँ नहीं मेरी कविताएँ…(मनु बिखरे पन्नों को समेटने लगती है और फिर वही सुबक सुबक कर रोने लगती है)

दुखनदास:-इसके हाथ पैर बांध दो बेटा और पड़े रहने दो इसे यही इसकी यही सजा है ये पागल हो चुकी है पागल पागल कही की.

(नेपथ्य से एक कविता का वाचन)

“अंदर की अनगिनत धडकनों में जाने क्यों इतनी चुभन है

क्या है ऐसा जो बस हर पल दुखता है इतने तो आँसू हैं

पलकों के अधमुहें दरवाजों पर

जैसे सागर में तूफ़ान लहराता है

कहते हैं किताबों में जैसा जीवन सिखलाता है जीना वैसा

सांस जो अब थम जाए कैसा सिखाना फिर परीक्षण कैसा

काठ का कोई पुतला औरों के चलाए जैसे चलता है

कब तक चले ये भी

रास्तों के साथ-साथ कदम भी सहम गए

पहले उम्मीद गई फिर सारी आस गई

एक-एक कर के सारे ही भ्रम गए

मन ऐसा भोला है जाने किन आंखों से हैरानी जताता है

ऐसा भी होता है !

(नेपथ्य से कविता का वाचन समाप्त होने पर)

(कुछ सैकेंड तक मनु रोते रहती है फिर वह अपना सर उठाती है)

मनु:- पागल मैं पागल नहीं हूँ, मैं पागल नहीं हूँ मैं पागल नहीं हूँ, मैं एक नारी हूँ नारी एक भारतीय नारी जो सदियों से संस्कृति, परम्परा,रीति-निति के नाम पर स्वाहा होते आई है.मुझे सब याद है बचपन से लेकर आज तक सब याद है क्या नहीं सहा है मैंने. बचपन !(मनु जैसे अपने बचपन की स्मृतियों में खो गई हो)मेरा बचपन गुड्डे-गुडियों से खेलने की उम्र थी..याद आया रुको-रुको मैं दिखाती हूँ मेरा बचपन..मेरे बचपन के वे गुड्डे-गुडिया..माँ ने बना के दिये थे कपड़ो के बने थे घर में होते हैं न फटे पुराने उनके बने थे मेरे गुड्डे-गुडिया. रुको रुको दिखाती हूँ मैं (मनु तेजी से बक्से की ओर बढती है तभी रस्सी पैरो में तन जाने की वजह से गिर जाती है वह किसी तरह से अपने शरीर को घसीट कर बक्से तक ले जाती है जिस से वह अपनी गुडिया निकलती है साथ ही वह एक रस्सी भी निकालती है जिसे वह एक टक नजर से देखने लगती है मनु फिर मानो अपनी किसी स्मृतियों में खो गई हो फिर वह उस रस्सी को बक्से के ऊपर रख अपनी गुडिया से बाते करने लगती है)

मनु:- आओ मिन्नी मैं तुम्हे अपने दोस्तों से मिलवाती हूँ पता है मिन्नी मुझे सब पागल कहते हैं, पर तुम्हे तो पता है न मैं पागल नहीं हूँ तुम तो बचपन से मुझे देखती आई हो और तुम्हे सारी बाते भी तो बताया करती थी, है न ? याद है न वह रस्सी वाली बात जो मैंने बाबा से बोली थी. जब चुन्नू ने बाबा से बल्ला ला देने बोला था तो बाब ने क्या बोला था ?अरे वाह मेरा बेटा सचिन बनेगा ठीक है बेटा मैं रामबाबू से बोल कर तेरे लिए बल्ला बनवा देता हूँ. और जब मैंने बोला बाबा मुझे भी रस्सी ला दो खेलने के लिए तो बाबा ने क्या बोला था याद है न ? रस्सी ला दू कहा से ला दूँ रस्सी? दिन रात ज़मींदार के यहाँ काम करता हूँ तो दो वक़्त की रोटी नसीब होती है और तुम्हे रस्सी ला दूँ कहा से ला दूँ तुम्हे रस्सी जा उस तख्ते पर एक रस्सा है जा कर उस से खेल ले और हा खेल लो तो फिर उसी रस्से से फाँसी लगा कर मर जाना तेरी माँ भी रस्सेसे लटक कर मर गई थी तू भी मर जा. एक लड़का है किसी तरह पाल लूंगा(यह कहते-कहते मनु फिर से रोने लगती है)

मनु:-याद है न मिन्नी तेरे आगे मैं कितना रोई थी तू ही तो थी जो मेरे आँसू पोछा करती थी (तभी दर्शको की ओर देखते हुए भाव मनु के बदल जाते हैं धीमे मुस्काते आँसू पोछते हुए बोलती है)

मनु:-पता है उस दिन मिन्नी ने कौन सी कविता सुना कर मुझे चुप करवाया था ? ‘मत रो मेरी गुडिया रानी तेरी शादी होगी रानी ढोल बजेंगे ढामा-ढम मैं नाचूंगी छमा-छम. (यह कहते-कहते मनु खड़े होकर नाचने लगती है,और फिर एकदम से वह जड़ खड़ी हो जाती है मानो उसके धूमिल पटल पर फिर से कुछ धुंधलाई स्मृतियों कोंध गई हो. दर्शको को देखते हुए गुस्से से बोलती है)

मनु:-लोक-लाज भूल गई है तू !लड़की ऐसे बेढंग तरीके से लडकों की तरह नाचती है ! अब तू बड़ी हो गई है ,गाँव वाले क्या कहेंगे बेटी को कुछ सिखलाया नहीं ,नज़र नहीं रखी बेटी पर ! नज़र ?(मनु संकुचित डरने का भाव करती है धीरे-धीरे पीछे हटती है और बिलकुल सिकुड कर अपने कपड़ो को इधर उधर से ठीक करती है और कह उठती है)

मनु:-मेरे ही घर में मेरे बाबा के नज़र के सामने बेटी-बेटी बोल कर मुझे वह इधर-उधर छुआ करता था. उसकी छुअन मुझे पितृात्मक नहीं लगती थी. एक चुभन थी. उस उम्र में भी में उस असहजता को समझ ले रही थी पर मेरे बाबा यह सब अपने नज़रो के आगे सब देख कर भी न जाने क्यों अपनी नज़रे फेर लिया करते थे. तब मैं उस का कारण नहीं समझ पाई थी पर अब सब समझती हूँ. यह समझते-समझते आज मैं 23 वर्ष की हो चुकी हूँ.वर्षो की गुलामी,गरीबी,और वर्ग-भेद ने शायद उनकी जुबान बंद कर रखी थी. पर अब बस मैं चुप नहीं रहूंगी मैं लडूंगी इस सड़ी गली रीति-रिवाजो को तोड़ दूंगी इन बन्धनों को तोड़ दूंगी. एक नवीन संस्कृति के लिए जोड़ लगाउँगी. हाँ मैं कविताएँ लिखती हूँ गीत लिखती हूँ सुनोंगे मेरी कविताएँ….

(नेपथ्य से एक कविता का वाचन)

सूर्य की अब किसी को जरुरत नहीं जुगनुओं को अंधेरों में ढकेला गया

करके बीते शहर में साजिश रौशनी को शहर से निकाला गया

साँझ बनकर भिखारिन भटकती रही

होके बेइज्जत सरे आम बाज़ार से सर झुकाए-झुकाए उजाला गया

उसका अपमान होता रहा हर तरफ सच का ओढा जिसने दुपट्टा यहाँ

उसका पूजन हुआ उसका अर्चन हुआ ओढ़ कर झूट का जो दुशाला गया

जाने किस शान से लोग पत्थर हुए एक भी लफ़्ज ज़ुबा पे बाकी नहीं

बांध कर कौन आँखों पर पट्टी गया

डाल कर कौन ज़ुबा पर ताला गया

वृक्ष जितने हरे थे तिरिस्कृत हुए,ठूठ जितने खड़े थे पुरस्कृत हुए

सर्वस्व खो कर भी जिसने सच बोला यहाँ

नाम उसका हवा में उछाला गया…..

(नेपथ्य से कविता का वाचन समाप्त होने पर)

मनु:-यह मेरी सब से पहली कविता थी. जिसे मैंने कॉलेज की एक प्रतियोगता में सुनाया था. दीपक से मेरी मुलाक़ात वहीं हुई और दोस्ती भी. आगे मुझे वह हमेशा हर तरह से मदद करता रहा शुरू के 2 वर्षो तक हम साथ बैठते, पढ़ते, बाते करते पर पर हम में थोड़ी-थोड़ी दूरी होती थी.मैं दीपक के साथ कभी असहज नहीं महसूस करती थी. हम आज तृतीय वर्ष में पहुच चुके थे, मैं कक्षा नहीं गई थी और कैंपस के कोने में बैठी रो रही थी जहाँ अक्सर हम बैठें बाते किया करते थे. दीपक जब आया तो उसने मेरे रोने का कारण पूछा मैंने बताया की मेरे बाबा ने मेरी शादी मुझ से बिना पूछे सुरेश से तय कर दी है ,जो मुझ से कम पढ़ा-लिखा है और तो और वह जमींदार के लिए हर जगह लड़ता-झगड़ता रहता है. कई बार तो वह जेल भी इसी कारण से जा चुका है. मैंने भी कह दिया बाबा से से मैं उस से शादी नहीं करुँगी नहीं करुँगी नहीं करुँगी….और हाँ दीपक मैं अगर करुँगी भी तो सिर्फ शादी तुम से करुँगी सिर्फ तुम से तुम से सिर्फ तुम से (यह कहते हुए मनु आखरी वाक्य में जहां वह कहती है ‘अगर करुँगी भी तो सिर्फ शादी तुम से करुँगी’ में दीपक के आँखों में देखने का अभिनय करती है और उसके बाजुओ को थामते हुए उसके कंधे पर अपने सर को रख देती है और फिर से एक बार दोहराती है ‘हाँ जब करुँगी शादी तो तुम से करुँगी दीपक. दीपक वहाँ मनु की कल्पना मात्र में होगा वह यह सब उस कुर्सी को देख कर कहती रहती है जो उसके सामने रखी होती है कुर्सी के ही वह बाजू को थामती है और कुर्सी पर ही अपना सर रखती है)

मनु:- दीपक ने भी मेरे माथे को सहलाते हुए मानो अपनी रज़ामंदी दे दी उस दिन पहली बार दीपक ने मुझे स्पर्श किया था उसके स्पर्श में एक अपनापन था बिलकुल माँ के स्पर्श की तरह. ऐसा लग रहा था मानो एक बार दुबारा शिशु की तरह सिमट कर अपनी आज तक की सम्पूर्ण वेदना कह गुजरू. शायद इसे ही प्रेम कहते हैं. पर मेरी यह ख़ुशी ज्यादा दिन की नहीं थी इस समाज ने उसकी कई अन्य परिभाषाए गढ़ दीये. किसी ने कहा-

पहला व्यक्ति:-यह समाज के लिए ये कलंक है.

(मनु पहले व्यक्ति को देखते हुए डरते-सहमते खुद को दाये घसीटती है)

दूसरा व्यक्ति:-यह प्रेम नहीं वासना है.

(मनु फिर दुसरे व्यक्ति को देखते डरते-सहमते खुद को बाएँ घसीटती है)

 

तीसरा व्यक्ति:-समाज को ये पथ भ्रष्ट कर देगी.

(फिर वो खुद को घसीटते हुए सब के मध्य में आ जाती है)

चौथा व्यक्ति:- इसे सजा दो.

(सभी व्यक्ति एक स्वर में बोलेंगे)

सभी व्यक्ति:- इसे सजा दो इसे सजा दो इसे सजा दो

(चौथा व्यक्ति के बोलने पर वह उठ कर पीछे हटने लगती है जैसे-जैसे सभी इसे सजा दो इसे सजा दो बोलते जाते वैसे-वैसे मनु पीछे हटती जाती है और फिर मनु अपनी आँखे बंद कर अपने दोनों कानो को मूँदते हुए जोर से चिलाती है दूर हट जाओ मैं कहती हूँ दूर हट जाओ मनु के चीखते ही सभी चारो डर के थोड़े पीछे हट जाते हैं और मनु के हाथ पैर में जो रस्से बंधे होंगे उसे पकड के खड़े हो जाएँगे. तभी नेपथ्य से एक कविता का वाचन)

जब- जब सिर उठाया, मन चौखट से जा टकराया

माथे पर लगी चोट मन में आया कचोट

आखिर क्यों मैंने ये घर बनाया

जब- जब सिर उठाया, मन चौखट से जा टकराया

दरवाजे हट गए या वो ही बड़ा हो गया

दर्द के क्षणों में कुछ समझ न आया

सर झुका आओ बोला, बाहर का आसमान

सर झुका आओ बोली भीतर की दीवारे

दोनों ने ही मुझे छोटा करना चाहा

बुरा किया जो मैं ने ये घर बनाया

जब- जब सिर उठाया, मन चौखट से जा टकराया.

(कविता समाप्त होने पर मनु अपना झुका सर उठाती है गुस्से से उसकी आँखे बड़ी- बड़ी हो जाती है और कहती है)

मनु:-अब बस

(वह धीमे-धीमे आगे बढ़ने लगती है उसके हाथ और पैर में जो रस्से बंधे होंगे उसे अब मनु अपनी पूरी ताकत से खीचने लगती है और कहती है)

मनु:-अब यह आसू नहीं बहेंगे, तोड़ दूंगी मैं इन बेरियो को नहीं मानूंगी इस सड़ी गली रीति-रिवाज़ो को इस दकियानुसी परंपरा को. नहीं मानूंगी…

(लय में मनु गरजते हुए कहती है)

नारी हूँ मैं नारी,मेरी भी अपनी एक सत्ता है,

सह लिया अब नहीं सहेंगे

अपना बस एक अरमान है,

है अगर तू पुरुष तो क्या हम भी तेरी माँ हैं

जन्म लिया तू कोख से मेरी तेरी सही पहचान हैं

साथ चलेगा साथ चलूंगी रोके से अब न बात बनेगी

क्योंकि नारी की भी अपना , इस धरती पे एक मान है..

एक मान है..एक मान है एक मान है….

(मनु यह कहते-कहते अपने पूरी ताकत से रस्से को खीचती है रस्सा टूट जाता है जिस से चारों व्यक्ति नीचे गिर जाता है मनु धीमे-धीमे मंच से नीचे उतर जाती है और दर्शकों के आगे आकर खड़ी हो जाती है साथ ही निरंतर कहते जाती है)

मनु:- एक मान है..एक मान है एक मान है….

(अंततः मनु धीमे-धीमे अपना सर आसमान की ओर ऊपर उठाती है)

समाप्त