21.4 C
Delhi
होम ब्लॉग पेज 61

गुमनामी के अंधेरों में खोया सितारा : इंद्र बहादुर खरे-डॉ.नूतन पाण्डेय

0

गुमनामी के अंधेरों में खोया सितारा : इंद्र बहादुर खरे

डॉ.नूतन पाण्डेय*

इंद्र बहादुर खरे हिंदी जगत की वे महान विभूति हैं,जिन्होंने भौतिक रूप से इस संसार में कुछ ही दिनों के लिए अवतरण लिया, लेकिन अल्प समय में ही वे साहित्य को इतना कुछ दे गए, जिसके लिए हिंदी साहित्य सदैव उनका ऋणी रहेगा। आयु की दृष्टि से रोबर्ट बर्न्स, बायरन ,कीट्स ,पुश्किन और रांगेय राघव आदि महान साहित्यकारों की परंपरा का अनुसरण करने वाले इंद्र बहादुर खरे को मात्र बत्तीस वर्ष की आयु (16/12/1922-13/04/1953) का वरदान मिला, लेकिन वीणापाणि माँ सरस्वती ने उनकी कलम को अपने आशीर्वाद से यथासंभव अभिसिंचित किया। अपनी लेखनी की अद्भुत प्रभावोत्पादकता के बल पर उन्होंने जो लिखा,जितना लिखा उसकी गुणवत्ता को साहित्य जगत द्वारा कतई नजरंदाज नहीं किया जा सकता। जीवन की अल्पावधि में ही इंद्र बहादुर खरे ने साहित्य की अनेक विधाओं में अपनी कलम चलाकर गंभीर साहित्य का सृजन किया लेकिन उनकी अधिकांश रचनाएं उनके जाने के बाद प्रकाशित हुईं । यह हिंदी साहित्य का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि उनके जीवनकाल में उनकी रचनाएं लोगों तक नहीं पहुँच सकीं लेकिन उनकी लेखनी में एक ऐसा जादू था, शिल्प का एक ऐसा चमत्कार था, भावों का एक ऐसा अपूर्व संयोजन था, पाठक जिसके वशीभूत हुए बिना नहीं रह सकते। इंद्र बहादुर खरे के साहित्यिक प्रदेय की बात करें तो मूलरूप से वे कवि के रूप में चर्चित रहे। भोर के गीत,सुरबाला,सिंदूरी किरण ,विजन के फूल,रजनी के पल (गद्य कविता), हेमू कालानी, नीड़ के तिनके और आंबेडकर एक नई किरण कविता संग्रहों में समय-समय पर लिखी गई उनकी कविताएँ प्रकाशित हुई हैं। उनके गीतों की संख्या लगभग पांच सौ के ऊपर पहुँचती है, जिनमें राष्ट्रपरक गीतों के साथ ही बालगीतों की भी बहुलता है। अपने देशभक्तिपरक गीतों के माध्यम से इंद्र बहादुर खरे ने अपने प्रशंसकों के मध्य एक विशिष्ट स्थान बनाया। कविताओं के अतिरिक्त उन्होंने गद्य की अनेक विधाओं ,जैसे –कहानी,उपन्यास और अनेक विषयों पर आलेख भी लिखे । आरती के दीप,सपनों की नगरी,आजादी के पहले आजादी के बाद और जीवन पथ के राही उनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं जिनमें समाज के गंभीर विषयों को वर्ण्य विषय बनाया है । कश्मीर,जीवन पथ के राही, मेरे जीवन नहीं और लख होली आदि उपन्यासों ने इंद्र बहादुर खरे को एक पुख्ता आधार-स्तंभ प्रदान किया जिससे उनको बहुमुखी साहित्यकार के रूप में स्थान बनाने में सहायता मिली। साहित्य सृजन के अतिरिक्त अन्य विविध साहित्यिक गतिविधियों से भी उनकी आजीवन सक्रिय रूप से संलग्नता बनी रही। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनकी विशिष्ट रुचि थी। अपनी इसी रुचि के कारण उन्होंने समय-समय पर अनेक पत्रिकाओं का संपादन कार्य किया,जिनमें ख्यातिलब्ध साहित्यकार रामकुमार वर्मा के साथ “प्रकाश” पत्रिका, हरिशंकर परसाईं के साथ “हरिंद्र” पत्रिका और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के साथ “युगारंभ” पत्रिका का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है ।

इंद्र बहादुर खरे को मूलतः उनके गीतों के लिए स्मरण किया जाता है । गीत लिखना शायद उनके ह्रदय के सर्वाधिक नजदीक और सबसे प्रिय कर्म था । वे कविता लिखना अपने जीवन का आधार मानते थे जिसके बिना उनका जीवन अपूर्ण था, तभी वह कविता लिखने के क्षण को अपने जीवन की सबसे सुखद अनुभूति मानकर कहा करते थे -“जिस दिन मेरे मन के अंतस में गीत की कली खिलती है,उस दिन ऐसा लगता है मानो जिन्दगी के दिगंत व्यापी रेगिस्तान में बाढ़ आ गई हो । जन्म- जन्म की प्यासी आँखों में जैसे कोई शीतल मीठा स्वप्न विहंस गया हो । कविता मेरे जीवन के समस्त अभावों की पूर्ति है। कविता में ही मुझे आनंद की चिरशांति के दर्शन होते हैं ।”

“भोर का गीत” इंद्र बहादुर खरे की प्रसिद्ध और सर्वाधिक लोकप्रिय कृति कही जा सकती है,जिसमें संकलित गीतों को उन्होंने सन 1939-42 के मध्य अर्थात सत्रह से बीस वर्ष की आयु में लिखा था । गीत लिखना उनकी सहजात और स्वाभाविक प्रवृत्ति रही है जो स्थाई भाव होकर उनके ह्रदय के अंतस्थल में विराजती थी, और स्वतः ही गीतों के रूप में फूट पड़ती थी । गीत लिखने का यह उद्वेग कब और कैसे प्रवाहित हो जाता था इससे वे बिलकुल अनजान होकर कहते हैं कि-“ कह नहीं सकता कि मैंने कब से गीत लिखना प्रारंभ किया ।प्रेरणा की एक निश्चित तिथि नहीं।डाली पर खिलने वाला फूल जैसे अपनी मधु , अपनी आभा,अपनी खुशबू की परिभाषा नहीं कर सकता, अपनी नाभि में बसी कस्तूरी की खुशबू को मस्त मृग जैसे अपने को मालिक नहीं मान सकता वैसे ही मैं भी नहीं जानता कि मेरे गीतों के फूलों ने कब खिलना सीख लिया ।”

इंद्र बहादुर खरे प्रकृति सौंदर्य के अनुपम पुजारी थे । उनके गीतों में प्रकृति के कण-कण की सुखद अनुभूति व्याप्त है और ये अनुभूति मात्र भौतिक और बाह्य नहीं है बल्कि उसका एक आभ्यंतरिक दृष्टिकोण भी है जो उन्हें छायावादी कवियों के समकक्ष ला खडा करता है । प्रकृति का मौन निमंत्रण उन्हें न केवल परमात्मा के और निकट ले जाता है बल्कि उसके निस्सीम सौंदर्य के साक्षात् दर्शन भी कराता है जो अन्यत्र दुर्लभ है । सृष्टि के सौंदर्य की रहस्यमय अभिव्यक्ति इंद्रबहादुर खरे के गीतों का वह ख़ूबसूरत पक्ष है जो दैहिक होने के बावजूद देहातीत है,लौकिक होने पर भी परलौकिक है और भौतिक होने पर भी अध्यात्म की ओर प्रवृत्त है । तभी तो कवि यह स्वीकार करता है कि-“ मेरे गीतों की भूमि बिलकुल पार्थिव है ,आध्यात्मिक नहीं है। धरती पर नर-नारी ,फूल –पौधे,नदी-तालाब,पर्वत-घाटी के रूप में जो राशि-राशि सौंदर्य बिखरा पडा है मैं उसी का पुजारी हूँ । रूप की प्रस्तुति मुझे प्रिय है । यह सौंदर्य ही मेरी आत्मा का रस है – मेरे गीतों की पार्श्वभूमि है । उपर्युक्त स्वीकरण के बावजूद वह इस वास्तविकता को अस्वीकृत नहीं कर पाता कि-“ भावों के अभिव्यक्तिकरण में मैंने सदा बौद्धिक पीठिका का सहारा लिया है । इसमें यह भ्रम न हो कि मैं बुद्धि और हृदय को एक मानता हूँ । मेरा तात्पर्य यह है कि ह्रदय की बातें जब एक भोली गंभीरता के साथ,जब अज्ञान बनकर भी अपने समस्त ज्ञान के साथ व्यक्त की जाती हैं तब मुझे अभिव्यक्तिकरण में सुखद तृप्ति का अनुभव होता है । कवि जब तक जीवन के समस्त व्यापारों के प्रति दार्शनिक दृष्टिकोण को प्रश्रय नहीं देता ,उसकी सारे बातें बच्चों के सामान चंचल और सारहीन होती हैं,भले ही उनमें थोड़ी देर को श्रोता को लुभाने की शक्ति हो । दार्शनिक दृष्टिकोण को मैंने सदैव महत्त्व दिया है । ” अपने इसी अध्यात्मिक दृष्टिकोण के कारण कवि ह्रदय का प्रकृति के रहस्यमय स्वरूप की ओर आकर्षित होना अत्यंत स्वाभाविक है जिससे प्रभावित होकर वे सहसा गा उठते हैं :

तुमसे क्या पहचान बढाऊँ

तुम रहस्य हो, मैं जिज्ञासा

युग-युग डूबूं, थाह न पाऊँ

जीवन के विविध भावों को ग्रहण करने के लिए जिस प्रकार की सूक्ष्म निरीक्षण दृष्टि एक कवि में अपेक्षित होती है और उन भावों को गहनता से शब्दों में उतारने के लिए भाषा और छंद को अनूठे ढंग से संयोजित करने की जैसी क्षमता एक कुशल कवि में होनी चाहिए, उस सन्दर्भ में इंद्रबहादुर खरे की लेखनी निश्चित ही धनी मानी जाएगी । छंद्बधता और लयात्मकता की जुगलबंदी इनके गीतों को अपूर्व गेयता प्रदान करती है और इस जुगलबंदी के पीछे उनकी दीर्घ स्वर साधना और शिल्प पर उनका पूर्णाधिकार है । इंद्र बहादुर खरे ने अपने गीतों में अनेक प्रयोग किये जिनका प्रभाव उनके पूर्ववर्ती कवियों पर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है । इंद्र बहादुर खरे के गीतों में आशा और उत्साह की खनक है,प्रेरणा की लहराती हिलोरें हैं ,संसार में बिखरे सौंदर्य के प्रति रागभाव है ,परमात्मा के प्रति समर्पण के लिए निष्ठा है, सांसारिक जगत के प्रति सहज मानवीय संवेदना है और इन सबके साथ ही इस जीवन पर अगाध विश्वास भी है । तभी तो जीवन के अंतिम समय में असाध्य बीमारी से जूझने के बावजूद उनमें जीवन-सौंदर्य की अदम्य अभिलाषा और जीने की भरपूर इच्छा है :

सच मानो संसार बहुत ही है प्यारा,

अब लाख बुलाये मृत्यु ,मैं न जाउंगा

गीतकार होने के साथ ही इंद्र बहादुर खरे ने गद्य विधा में भी अपनी कलम चलाई है।उनके कई कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं जिनकी कहानियाँ कलात्मकता सौदर्य और भावबोध की दृष्टि से बेहतरीन मानी जाती हैं, बावजूद इसके वे खुद को कहानीकार के रूप में नहीं देखते और बड़ी विनम्रता से स्वीकारते हैं कि वे न तो जन्मजात कहानी लेखक हैं और न ही उन्हें ऐसा वातावरण मिला कि कहानीकार के साँचें में खुद को ढाल सकते । लेकिन जिसने भी उनकी कहानियों को पढ़ा है ,वह इस बात से इत्तेफाक रखता है कि उनकी कहानियाँ जीवन के बहुत करीब हैं, जो अपने भावबोध द्वारा समाज को व्यापक रूप से चित्रित करती हैं, उसकी समस्याओं को उठाती हैं, उन्हें अभिव्यक्ति देती हैं और इसी कारण आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं,जितनी उस समय थीं जब वे लिखी गई थीं । इस सन्दर्भ में मैं यहाँ उनकी एक कहानी का विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूंगी, जिसका शीर्षक है ‘जीवन पथ के राही’। अपनी इस कहानी के बारे में इंद्र बहादुर जी के महत्वपूर्ण विचार उल्लेख्य हैं,जहाँ वे कहते हैं कि-“ यह जीवन के पथ की कहानी है, ऐसी कहानियाँ जीवन का सत्य बन जाती हैं जो दुनिया के हर साधारण मनुष्य का हाथ पकड़ उसी की कहानी बन जाती हैं –और हर मनुष्य की कहानी आलेख्य नहीं-इसीलिए विश्वास नहीं होता ।”

इस कहानी में भारतीय समाज में स्त्री की शोचनीय स्थिति का चित्रण करते हुए स्त्री विमर्श के नए रास्ते खोले हैं । हमारे समाज में यह स्त्री की दुर्नियति ही कही जाएगी कि जीवन की प्रत्येक अवस्था में उसे समाज के ठेकेदारों द्वारा विविध प्रकार के शोषणों का सामना करना पड़ता है । प्रस्तुत कहानी भी फूलो नामक एक लडकी की कहानी है ,जब वो बहु बनकर सोना लोधी के घर जाती है तो उसे सर आँखों पर रखा जाता है ,लेकिन दुर्भाग्यवश उसके पति की असमय मृत्यु से उसके भाग्य पर ताले ला जाते हैं और उसे ससुराल में “एक जवान लड़के को चाट जाने” के अपराध में दिन – रात अपमान सहना पड़ता है । अकेले जीवन काटती फूलो के जीवन में अचानक उसी गाँव का नंदन नामक एक आधुनिक विचारों वाला युवक प्रवेश करता है । नन्दन के मन में उसके प्रति प्रेम का भाव उपजता है, गाँव वालों से यह सहन नहीं होता और उबके द्वारा प्रताड़ित किये जाने पर वह गाँव छोड़कर चली जाती है । लेकी दुर्भाग्य उसका पीछा नहीं छोड़ता और वह वैश्यवृत्ति करने वाली एक महिला के फ़ंदे चढ़ जाती है,लेकिन फूलो की निश्छलता देखकर वह उसे अपनी बेटी मान लेती है । भाग्य उसे एक बार फिर नंदन के सामने लाकर खड़ा कर देता है और नन्दन उसके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखता है । नंदन के पिता जो गांव के ठाकुर हैं वे भी इस विवाह के लिए अपनी रजामंदी दे देते हैं । फूलो की कहानी सुखद मोड़ की ओर जाती लगती है,लेकिन नंदन जब फूलो ,अपने प्रथम प्यार के चिह्नों को देखने आम के पेड़ के नीचे जाकर देखता है तो पाटा है कि फूलो ने प्राण त्याग दिए थे,न जाने क्यों? लोगों का कहना था कि शाम को घर लौटे हुए किआनों,चरवाहों ने उसे देखा और जैसे-तैसे कटने वाले गाँव के कलंक को पुनः गाँव में घुसते जान उसका अंत कर दिया । कहानी के अंत में कहानीकार का कथन जहाँ ह्रदय विदारक और दिल को छूने वाला है वहीँ समाज पर एक तमाचा है, एक कडा प्रहार है, जिसे सहना तथाकथित सभ्य समाज के लिए आसान नहीं होगा– नन्दन अब रूपपुर का जमींदार है उसने फूलो की समाधि बनवा दी है । समाधि का ऊपरी हिस्सा सदा ही फटा रहता ही। लोगों का कहना है कि फूलो की आत्मा रोती है,इसलिए वह समाधि फट जाती है । नंदन रोज सुबह शाम उसकी पूजा करता है और गाँव वाले जमींदार की बात नहीं टालते : वे भी उसे “प्रेम की देवी” मानकर उस पर फूल चढाते हैं । वे ‘पुन्य’ लूटने से भला क्यों बचें ? कितना क्रूर और कटु सत्य है यह हमारे दोहरे आवरण वाले समाज का जिसका इंद्र बहादुर इस कहानी में पर्दाफ़ाश करते हैं । वही समाज जो उसे चैन से जीने नहीं देता, उस पर तरह-तरह के लांछन लगाकर उसका अपमान करता है,वही उसकी जान लेने के पश्चात् उसे देवी का तमगा दे देता है । इंद्र बहादुर समाज की इस कठोर विसंगति पर अट्टहास करते हैं,व्यंग्य करते हैं साथ ही उस पर अपनी पीड़ा भी व्यक्त करते हैं । इन सबके साथ ही वे समाज की व्यवस्था और कुरीति पर अनेक प्रश्न भी खड़े करते हैं जिसमें स्त्री की समाज में असुरक्षा,विवाह के बाद के नारकीय जीवन ,अपने भविष्य के लिए स्वतंत्र निर्णय लेने की असमर्थता ,घर-बाहर हर जगह शारीरिक-मानसिक शोषण और समाज का उसके प्रति असमानता और दोयम दर्जे का अमानवीय व्यवहार आदि मुद्दों का समावेश हो जाता है । कहानी सोचने पर विवश करती है कि समय के परिवर्तन के साथ क्या स्त्री के प्रति समाज के रवैये में सकारात्मक परिवर्तन आया है या फिर स्थितियां अभी भी जस की तस बनी हुई हैं ।

जीवन-पथ के राही कहानी के समान ही इंद्र बहादुर खरे की अन्य सभी कहानियाँ जीवन के अनेक मूल्यवान अनुभवों से परिपूर्ण हैं जिनमें समाज की विसंगतियों,जीवन मूल्यों , प्रेमपरक आदर्शों और स्त्री उत्थान से संबंधित विभिन्न मुद्दों को उठाया गया है । इंद्र बहादुर खरे की कहानियाँ समाज के लिए महत्वपूर्ण सन्देश लेकर चलती हैं और एक स्वस्थ सोच युक्त समाज निर्माण की कामना रखती हैं । उनकी कहानियों में सत्यता के साथ कल्पना का,जग के साथ ह्रदय का मेल है और इनके लिए वे पाठकों से भी अपेक्षा रखते हैं कि -“न तो इनमें कोई दर्शन की खोज करे, न शाश्वत चिंतन की आशा और न विश्व को खुली आँखों से देखने की चेष्टा, केवल कहानी के ही निकटस्थ आकर इन्हें समझे और सोचे कि कहाँ तक बात ठीक है और कहाँ तक बालकों की बातों सी नादान है ।”

इस प्रकार कह सकते हैं कि इंद्र बहादुर खरे ने साहित्य जगत को जितना दिया, निश्चित ही उसका मूल्यांकन करना अभी शेष है । यह हमारे समाज का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इंद्र बहादुर खरे जैसे साहित्य को समर्पित अनेक निस्वार्थ साधक ऐसे हैं जिन्हें जीवित रहते वह मान- सम्मान नहीं मिल पाता, जिसके वे अधिकारी हैं । यहाँ तक कि उनकी साधना, उनकी कृतियों का भी परिस्थितिवश संतोषजनक और सम्यक मूल्यांकन नहीं हो पाता । यह संतोष की बात है कि खरे जी के परिवार के प्रयत्नों से पिछले कुछ समय से मध्यप्रदेश और विभिन्न राज्यों के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में उनकी कृतियों को शामिल किया गया है और विद्यार्थियों द्वारा उनके साहित्य पर शोध कार्य भी किए जा रहे हैं । देश के प्रकाशन के क्षेत्र में अग्रणी वाणी प्रकाशन,दिल्ली द्वारा उनकी कई किताबों का प्रकाशन भी किया गया है ।

एक साहित्य साधक को क्या चाहिए, बस पाठकों तक उसके लेखन की पहुँच ,साहित्य जगत में उसकी एक निश्चित पहचान और उसकी रचनाओं को साहित्यिक जगत की स्वीकृति । लेकिन कई बार साहित्य जगत इन विभूतियों को जीते जी पहचान नहीं पाता जिस कारण वह इन विराट व्यक्तित्वों की छाँव से वंचित रह जाता है । लेकिन निश्चित ही यह सभी हिंदी प्रेमियों के लिए संतोषजनक है कि इंद्र बहादुर जी के परिवारीजनों के व्यक्तिगत प्रयत्नों से आज उनकी रचनाएं प्रकाशित होकर साहित्य प्रेमियों तक पहुँच रही हैं और डॉ.खरे अपनी रचनाओं के माध्यम से हमारे आसपास हैं, हमारे भीतर पुनर्जीवित हो रहे हैं ।लेखक की असली पूंजी,असली धरोहर उसकी रचनाएं ही होती हैं, जिनसे वह अपने पाठकों तक पहुँचता है । सरकार और संस्थाओं का यह कर्तव्य है कि वे इस दिशा में आगे आयें और इस तरह की योजनाएं अमल में लायें जिसके माध्यम से डॉ. खरे और उन जैसे साहित्य सेवकों का लेखन व्यर्थ न जाए और उनके साहित्य की सार्थकता अनंत काल तक बनी रहे।

*सहायक निदेशक,केंद्रीय हिंदी निदेशालय

शिक्षा मंत्रालय,भारत सरकार

ई-मेल-pandeynutan91 @gmail.com

गुजराती कहानी-भैयादादा (लेखक: स्वर्गीय धूमकेतु)-अनुवादक: डॉ.रजनीकांत एस.शाह

0

गुजराती कहानी                            

भैयादादा

लेखक: स्वर्गीय धूमकेतु

अनुवादक: डॉ.रजनीकांत एस.शाह

रंगपुर के छोटे स्टेशन पर तीन लोग अधिकारी सहज गुस्ताख से खड़े थे। दूर से आये हुए देहाती लोग,अन्य गाँवों के यात्री और पहली बार ही गाड़ी में मुसाफ़री करने आयी हुई स्त्रियाँ, हुजूम में भी अलग थलग नजर आनेवाले तीन गृहस्थों की ओर बारबार देखकर, आपस में कुछ चोरी छिपे बातचीत कर लेती थीं।

पर उस जगह पर पॉइंट्समेन कौन है? अपनी साहबनुमा टोपी को हाथ में घुमाते हुए एक युवक ने सवाल किया। उसकाकी सवाल करने का अंदाज कहा रहा था कि वह उन सब से बड़ा अधिकारी था।

लम्बे सूखे हुए मुँहवाले एक प्रौढ़ (वयस्क) ने विनयपूर्वक उत्तर दिया:` साहब! वहाँ पच्चीस वर्ष से एक ही आदमी रहता है।’

`पच्चीस वर्ष!’

तीसरा आदमी जो न तो कारकून था और न ही अधिकारी सा- मध्यम पदाधिकारी सा लगता था, उसने मुस्कुराकर हाँ कहा।

`और उस आदमी से आप नियमित काम की अपेक्षा रखते हैं?’ युवा अधिकारी ने अपनी बेंत की छड़ी को जमीं में खोंसकर उसे मोडते हुए कहा।

दोनों में से किसी ने जवाब नहीं दिया। अंत में वह कारकुन सा आदमी बोला:`साहब! बुढा आदमी है। अब वह नौकरी के पच्चीसवें वर्ष में कहाँ जायेगा?’ अब उसका निबाह कर लेने में ही हम सबकी भलाई है।’’

युवा अधिकारी ने अपने होंठ सख्ती के भाव सहित दबाये। अपनी छड़ी से एक कंकड़ दूर तक उडाकर उसने कहा: `आदमी से हमारी कोई निस्बत नहीं है। काम से काम है। उसे जहाँ जाना है जाये। हमें तो मात्र यही देखना है कि वह काम कैसा करता है।

कारकुन का फीका चेहरा कुछ और फीका पड़ा। उसका हृदय निखालिस था। पंद्रह वर्ष की अवस्था से वह कारकुन रहा है। उसने कुछ काली करतूतें करके नहीं पर अनेक अधिकारियों की अधीनता में मृदुल स्वभाव रखकर शिरस्तेदारी प्राप्त की थी। अत: उसमें अपना कोई तेज या प्रभाव तो नहीं था तथापि अच्छा स्वभाव होने के कारण कुछ अच्छा करने का उसका अभिगम रहता था। साहब के होठों की सख्ती को देखकर उसने बहुत नरमी के साथ कहा: `भैया बद्रीनाथ वहां पच्चीस साल से नौकरी कर रहा है।’

`और उसकी अभी क्या उम्रह है?’

`होगी कोई अंदाजन सत्तावन –अट्ठावन की।’

तब तो वह काम के लायक नहीं है!’ साहब ने फैसला सुनाया। साहब के मन में अभी अधिकारी का मद भी है। चतुर शिरस्तेदार ने इस बात को समझ लिया। अत: फिर कभी समझायेंगे,ऐसा सोचकर वह चूप रहा।

हुआ कुछ ऐसा था कि रंगपुर स्टेशन से करीब दो–एक मिल की दूरी पर रेल की पटरियाँ सड़क को काटकर जा रही थी। इसलिए उस क्रोसिंग के पास रेलवे सत्ताधीशों ने एक छोटा सा कमरा बांधकर एक आदमी को वहां रखा था। बद्रीनाथ भैया आज पच्चीस वर्ष हुए, उसी जड़ और जबरदस्त लकडे को गाड़ी के आने-जाने के समय नीचे रख देता था और गाड़ी के चले जाने के बाद उठा लेता था। कुछ समय पहले उसकी असावधानीवश एक दुर्घटना होते होते रह गई। रंगपुर स्टेशन पर ट्राफिक सुप्रिन्टेंडंट,ट्राफिक इन्स्पेक्टर और शिरस्तेदार आज उसकी बात कर रहे थे।

ऐसे में स्टेशन पर गाड़ी आई और साहब अपने डिब्बे में बैठ गए। बैठते हुए भी अपने बदमिजाज स्वभाव को ख़ुशी हो रही हो ऐसे कारकुन के साथ वही बात बारबार कर रहे थे: `उस जगह पर किसी अनुभवी या किसी हुशियार व्यक्ति को नियुक्त करना पड़ेगा।’

उनके आखिरी शब्द गाड़ी की सिटी में डूब गए। दोनों कनिष्क अधिकारियों ने सलामी दी और गाड़ी रवाना हो गई।

शिरस्तेदार विनायकराव हमेशा गाँव की उस सड़क पर दो-तीन मिल सैर करता था। उसकी रुपे के हत्थेवाली छड़ी, पुराना सम्हालकर रखा हुआ रेशमी दुपट्टा, दक्षिणी पगड़ी और चप्पल इस रास्ते पर विगत दस वर्ष से नियमित यात्रा करते थे। बद्रीनाथ के कमरे तक जाकर वे दो घडी बैठकर सुस्ता लेते थे। रावसाहब को आया हुआ देखकर भैया भी अपनी छोटी सी बाडी(बगिया) से बाहर निकलकर ठंडा पाणी भरकर रखता था,बाद में दोनों परदेशी अपने अपने सुख-दु:ख की बातें करते रहते थे और इस प्रकार शाम गुजर जाती थी।

आज भी विनायकराव के धीमे कदम उस तरफ मुड रहे थे। धीर धीरे वह वहां पहुंचे पर भैया को नहीं देखकर, कुछ आश्चर्य अनुभव करते हुए, अपनी हमेशा की चौकी पर बैठा। गहन विचार करते हुए वह वह भैया की सुन्दर कृति को निहार रहा था।-भैया ने अपने कमरे के पीछे बाड़े(बगिया) जैसा बनाकर उसमें गेंदा,कनेर,केल और पपीते लगाये थे। करेली और एक सेम का ऐसे दो लतामंड़प भी बनाये थे। कमरे के दरवाजे के पास कुछ मिर्ची की पौध,अजवाईन,धनिया और तुलसी की क्यारियां थी। आगे के हिस्से में दो-चार छोटे छोटे फूलबेलें चढ़ाकर मंडप जैसा बना लिया था। उसके इर्दगिर्द कुछ बांस लगाकर खपाचें बांधकर दीवार बनायीं थी और नीचे जमीन एकदम स्वच्छ बना रखी थी। उसमें भैया की एक बकरी बंधी रहती थी। विनायकराव,भैया का घर और उसका कलाविधान देखता रहा।

ऐसे में भैया के घर से आठ-दस वर्ष की एक लड़की बाहर आई। विनायकराव को देखकर तुरंत वापस लौटी और भैया से कहा:`भैयादादा! बाहर कोई बैठा हुआ है!’

`कौन है?’-ऐसा कहते हुए भैया बाहर आया।

आज आठेक दिन हुए,वह कुछ अस्वस्थ सा था। तो इस तरफ विनायकराव भी एकाध हप्ता हुआ,

इस तरफ आये नहीं थे। अत: विनायकराव होंगे, यह बुढऊ को याद रहा नहीं। बाहर आकर उन्होंने विनायक

-राव को देखा।

`ओहो! पानी बेटा! यह तो हमारे रावसाहब हैं। ठंडा पानी लाओ,चलो’। भैया अपनी नित्य आदत के अनुसार विनायकराव के पास जा बैठा। दोतीन बिलौटे उसके शरीर से सटते हुए घुमने लगे।

विनायकराव को दिल फटा जा रहा था। भैया को इस जगह से कितना प्यार है, इस बात का सही अंदाज तो उसे आज ही हुआ। आसपास थूअर की बाड हो,बबुल का पेड़ हो या बेर का पौधा हो पर प्रत्येक पेड़ को उस कलाविधान में अपना योगदान करनेवाला बनाकर भैया ने दो चार पल बीताने को मन कर जाये ऐसी छोटी सी सुन्दर बाड़ी(बगिया) बनायीं थी।

पर आज तो उसने कुछ नया ही नजारा देखा। भैया ने,किसी बाड़ीवाले की लड़की को पुत्रीवत लाड़ से बुलाया, राव को यह दृश्य नया लगा, क्योंकि पानी को उसने आज ही देखा था।

`भैयादादा! यह लड़की किसकी है?’आज विनायकराव `भैया’ बोल नहीं सका।

यह तो बाडीवाले की है। बेचारी आठ दिन हुए,वह बकरी दूह देती है। ईश्वर उसका कल्याण करे!’

पानी ठंडे पानी का चमकता-दमकता हुआ लोटा लेकर आई थी। छोटी सी आठ-दस वर्षीया लड़की

की आँख में काजल ऐसा तो सुरेख ढंग से निकला हुआ था कि विनायकराव की दृष्टि वहां जमी की जमी रह गई।

`भैयादादा! अब जाती हूँ,हाँ।’

‘टिलाडी को दूह लिया?’

 टिलाडी भैया की बकरी का नाम था। भोले भैया ने टीका देखकर उसका नाम टिलाडी रखा था।

यदि इन्सान के ऐसे नामकरण हों तो इन्सान भी पशु से बेहतर लगे और शब्द भी यथार्थाक्षर: हो जाये।

`हाँ,भैयादादा!’

`ठीक है। जाओ,कल जल्दी आ जाना हाँ।’

पानी चल दी,पर कुछ देर हुई नहीं कि वह वापस लौटी:

`भैयादादा! चार दिन बाद दीवाली है। क्या आपको लपसी पिसवाना नहीं है?’

वृद्ध भैया हर्षित हुआ। उसने मीठी हंसी बीखेर दी: मुझे और लपसी?’

`ऐसे थोड़े ही होता है? सब लोग खायेंगे-जूठायेंगे और क्या आप नहीं खायेंगे?’

विनायकराव ने नि:श्वास छोड़ा।

`ठीक है, ले, थोड़े से गेहूं ले जा लेकिन बहुत मोटा नहीं पिसना।’

`ना,दादा! मैं तो झीना ही दलती हूँ।’

पानी बिदा हुई। किसान की वह लड़की भैया को इतनी ममतापूर्वक चाह रही थी- विनायकराव को आज ही इस बात का पता चला। उसने धीरे से कहा :`भैयादादा! आप यह नौकरी अब छोड़ दीजिये। अब उम्र भी हुई है।’

अब मुझे कितने वर्ष निकालने हैं? भैया ने जवाब दिया,`ज्यादा से ज्यादा पांच।’

`इसीलिए कहता हूँ कि अब भजन करो!’

`अब इस उम्र में मैं किसका सहारा थामूं! लड़का प्लेग का शिकार हुआ; उसकी बहु भाग गई, अब तो एक मात्र पेट ही है तो भगवान जब तक चलाये तब तक काम करते रहना है और खाना है।’ बद्रीनाथ ने जवाब दिया। विनायकराव का अंत:करण भैया के जवाब से और अधिक आर्द्र होता जा रहा था। वह जाने के लिए खड़ा हुआ तब उसे अचूक लगा कि भैया को उसकी बाड़ी के प्रति माँ से अधिक प्यार था।

दूसरे दिन ट्राफिक इन्स्पेक्टर बराबर नियम से ऑफिस में उपस्थित हुए थे; सामने अपना माथा झुकाए विनायकराव खड़ा था।

`क्यों राव! आप उस भैया बद्रीनाथ की जगह पर किसे बदल रहे हो?मैंने देखा है कि वह बुढा सारा वक्त पेडपौधों को निराने के पीछे बीताता है!’ साहब ने अपनी अवलोकन शक्ति से आश्चर्य अनुभव करने से शुरुआत करके बाघ की सी तीखी नजर से उस विनायकराव की ओर देखते रहे।

राव के मन में कुछ उलझन चल रही थी। एकबार तो उसे अपनी जेब से त्यागपत्र का कागज भी कुछ बाहर आया हुआ नजर आया; पर तुरंत उसके हाथ-पैर कांपने लगे और उसने साहब की ओर झुककर सलाम की।

`विनायकराव!’ बिल्ली जैसे चूहे से खेलती है ऐसे साहब ने पासा फेंका।`आपने क्या सोचा?’

विनायकराव ने विचार करके कुछ जोश तो कुछ रोष करते हुए कहा: `यह नहीं होगा!’

साहब ने होठ चबाये:`क्या?’

हमेशा की गुलामी–कमजोरी अपना जोर ज़माने लगी। राव ने होशोहवास खों दिया। उतायली में भूल हो गई-इस बात को वह समझ गया। वह कही गई बात को बदलने में माहिर होने के कारण तुरंत बोला;` साहब! यह तो मैं किसी और विचारों में उलझा हुआ था। भैया बद्रीनाथ की जगह पर कालू को रखना बेहतर होगा!’

`हाँ,और बद्रीनाथ भैया को चौबीस घंटे का नोटिस दे दो!’

`बहुत बेहतर!’शिरस्तेदार झुककर सलामी देकर बाहर चला गया।

फिरभी विनायकराव ने वृद्ध भैया को कुछ तो मदद की। दूसरे दिन भैया को साहब की हुजुर में लाने के लिए उसने एक खबर भेजी बुढा हाजिर हुआ। साहब अपने कमरे में अधिकारी के रुआब से उतने ही अकड़कर बैठे हुए थे। भैया को देखते ही कहा;`तुम्हारा नाम भैया बद्रीनाथ?

`जी हाँ,साहब!’

`तुम बड़े बूढ़े हो गए हो सरकार की नौकरी की,अब तो आराम लीजिये!’

`जी हाँ,साहब! यह सफेदी नौकरी में ही आयी है।’

`अच्छा!’

भैया तो इस उम्मीद में था कि साहब लम्बी नौकरी के लिए कुछ इनाम देने की सोच रहे होंगे। ऐसे में साहब ने कागज से मुंह उठाकर उसकी तरफ रुख करके समाचार दे दिए:`अच्छा। तुम विनायकराव कूं मिलो। तुम्हारा हिसाब करने के लिए हुक्म दे दिया है,अब तुम आराम करो!’

वज्रपात हुआ हो ऐसे भैया मूढ़ की तरह साहब के सामने खड़ा रहा। अपनी हद में दुर्घटना होने से रह गई,वह बात उसे याद आई। साहब इसलिए उसे बरतरफ कर रहे हैं। आख़िरकार यह बात उसकी समझ में आ गई। वह आर्द्र होगया,`साहब! आज अब…’

साहब बद्रीनाथ की ओर देखता रहा। बद्रीनाथ ने कुछ आगे बढ़कर कहा;` साहब! आप मेरा बुढ़ापा  क्यों बिगाड़ रहे हैं?अब मुझे कौन रखेगा?’

`बूढ़े,बेटा तो है ना?’

`जी,ना! प्लेग…’बद्रीनाथ ज्यादा बोल नहीं सका।`मेरा झोंपड़ा और पेड़-पौधे ही मेरे बच्चे है, अब आखिरी दो-चार वर्ष वहां गुजार लेने दीजिये।’

`अ फुलिश सेंटीमेंटलिस्ट!(मूर्ख रोतल(रो पड़नेवाला) साहब ने उस बुढऊ के शब्दों को मानसशास्त्र में तौलकर देखा।

`ठीक ,ठीक,सोचेंगे,अभी तो जाओ।’

पर भैया बद्रीनाथ तो विनायकराव से मिले बिना धीमी चाल से अपने झोंपड़े पर गया। जिस जमीन के साथ वह बालक की भांति पच्चीस वर्ष तक खेला था,उस जमीन को अब कुछ दिन के लिए छोड़ते हुए उसका दिल कांप रहा था।

दूसरे दिन विनायकराव टहलने के लिए गया। बद्रीनाथ की नौकरी का वह आखिरी दिन था। भैया चौकी पर ही विनायकराव का रास्ता देख रहा था।

`का?काय होईल का? उसने बड़ी आतुरता के साथ विनायकराव से पूछा।

`नहीं,तुमाला जावें लागेल। दूसरा मनुष्ययांची नेमणुंक ढाली।’

बद्रीनाथ भावुक हो गया,लेकिन साहस करके बोला:कल सुबह?’

`हाँ।’

विनायकराव तुरंत भैया के पैरों में गिर पड़ा!

`अरे,अरे! रावसाहब,यह क्या?’

`भैयादादा! यहाँ से सीधे मेरे घर आ जाना। मुझे अपने बेटे जैसा समझकर मेरे साथ रहिये।’

`अरे रावसाहेब!’ भैया फीका हंसा,`यह आपकी उदारता है पर मैं तो यहीं कहीं इस जमीन के पास रहूँगा।’

विनायकराव ने सोचा कि दूसरे दिन भैयादादा को समझायेंगे। दोनों जब उठे तब भैया ने अश्रु सहित विनायकराव को गले से लगा लिया। दो-तीन बिलौटे तो उसके बूढी देह पर खेल रहे थे।

`रावसाहब! मैं इन्हें आपको सौंप रहा हूँ हाँ!;’बुढा इतना ही कहा सका और दोनों विलग हुए।

दूसरे दिन सबेरे दिन उगा नहीं उगा कि विनायकराव आ गया था। पानी भी बकरी को दुहने के लिए उपस्थित हो गई थी। विनायकराव चौकी पर बैठा क्योंकि भैया अभी तक बाहर नहीं आया था। अंतत: थककर पानी ने दरवाजा खटखटाया। किंवाड तो खुला ही था।

`भैयादादा! ओ भैयादादा! किसान की बेटी का स्नेहिल स्वर एकांत खेत में स्पष्ट रूप से चीख रहा था।

`भैयादादा! चलिए,चलिए टिलाडी को दुह रही हूँ!’

पर भैयादादा ने जवाब दिया नहीं।

पानी ने अपनी आवाज को थोडी ऊँची करके कहा,` और यह रही आपकी दीवाली की लपसी,दादा!’

अब विनायकराव उठकर वहां गया। झोंपड़े में अडिग और खड़े होकर वृद्ध भैयादादा ओढ़कर आराम से सोये हुए थे। बिलौटे उसकी देह से सटकर खेल रहे थे। मेमने तो उसके बिछौने के पास बैठकर करुण स्वरों में मिमिया रहे थे।

विनायकराव की आँखें डबडबा आई और भीतर गया।

पानी दादा की देह को हिलाकर हंस रही थी। अभी भैयादादा `रुक,अभी पकड़ता हूँ’ कहकर ऊठेंगे ऐसे विनोद की आश के साथ खुश होती हुई हंस रही थी। विनायकराव ने पास जाकर शरीर को खूब टटोला और जोर से चिल्लाये:`भैयादादा!’

झोंपड़ी से कोई निकाले नहीं इसलिए भैयादादा अडिग सोये रहे।

विनायकराव की आवाज फट गई और उसकी आँखें चूने लगी। उसने पानी की ओर मुड़कर कहा,

`पानी! अब भैयादादा नहीं बोलेंगे।’और कभी मान नहीं सकते छोटी लड़की ने भैयादादा की देह के पास जो रुदन किया, वह आज भी मुझे जब याद आता है तब मेरे जीवन में बिजली जैसे झटके लगते हैं। अनंत समय और अगाध आकाश को भेदकर वह स्वर बारबार सुनाई देगा।

+ + +

भैयादादा की बाड़ी में अब कभी भी ऐसी सफाई रहती नहीं है। फाख्ता, बैठते थे,गोरैया गातीं और कोयल बाड और बेलों के अन्दर चली जाती रहती थी -ऐसी सृष्टि अब वहां नहीं है। काम करनेवाली आत्मा के बदले काम करनेवाली काया है। बीसवीं शताब्दी को काव्यमय जीवन से क्या लेना-देना?संस्था…को व्यक्ति के निजी भव्य जीवन से क्या निस्बत? यंत्रवाद नियमित जड़त्व के बदले में रसमय चैतन्य का क्या करे? इस यंत्रवाद में एक दिन यह जगत भी यन्त्र जैसा होकर रहेगा।

संपर्क:2-`शील-प्रिय’,विमलनगर सोसायटी,नवाबजार,करजण.जिला.वड़ोदरा.गुजरात.पिनकोड:३९१२४०. मोबाईल:९९२४५६७५१२.E.Mail Id : navkar1947@gmail.com

गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, हिंदी अध्ययन एवं शोध केंद्र द्वारा द्वि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय परिसंवाद: प्रपत्र आमंत्रित

0
गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, हिंदी अध्ययन एवं शोध केंद्र द्वारा द्वि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय परिसंवाद: हिंदी कहानी: नई सदी का सृजन और सरोकार-  

15267576 1317392991633570 5081752188809414913 n

15232255 1317393128300223 7298266308380280820 n

15356766 1317393088300227 3238116305951493979 n


गीता गैरोला की रचनाएँ-

0
16508664 1704514372895711 7797401739339647756 n

ये मेरे सपनो के खिलाफ सोचा समझा षड्यंत्र है
क्योंकि मेरे सपने उन्हें सोने नहीं देते
नींद की पहली सरगोशी में ही
मेरे इतिहास की सागर तरंगें
और बिना खाद पानी की नस्लें
उनकी नींदों की अतल गहरा इयों में नारे लगाती
हैं
ये युद्ध है उनकी नींद
और मेरे सपनों की नस्लों का
उनकी नींदों के पाल चौकन्ने हैं
पर हवा विरोधी है
मेरे स्वप्नों के मुक्त पाखी
विरोधी हवा के चौकन्ने पालों को
असीम शून्य की नीलाई में
युद्ध के लिए ललकारते हैं
तुम परवाज को आवाज दो
मेरी नस्लें मिट्टी के नीचे कुलबुला रही हैं
……………………………………..
पहाड़ जब तक रहेंगे,
तब तक रहूंगी मै
जब तक मै रहूंगी
तब तक पहाड़ रहेंगे
जैसे पहाड़ में रहते हैं,
पेड़,पौधे,जानबर,पक्षी
मिट्टी,पत्थर,आद, पानी और आग
मुझमे रहता है खून,राख, पानी,हड्डियां
नफरत और प्रेम
हम दोनों एक हैं
एक दूसरे के विरुद्ध
मै पहाड़ को जलाती हूँ,
काटती हूँ,खोदती हूँ
पहाड़ मुझे जलाता है
पहाड़ फिर फिर उग आता है
और मै भी बार बार जन्म लेती हूँ
जब तक काटने,जलाने की रीत
रहेगी
पहाड़ और मै
एक दूसरे के सामने खड़े रहेंगे
ना पहाड़ खत्म होंगे ना ही मै
हम दोनों जिन्दा रहने का युद्ध
एक साथ लड़ेंगे।

……………………………..

गिरमिटियाओं ने हिन्‍दी को अन्तर्राष्ट्रीय विस्तार दिया: डॉ. शुभ्रता मिश्रा

0
indentured labourers

गिरमिटियाओं ने हिन्‍दी को अन्तर्राष्ट्रीय विस्तार दिया

– डॉ. शुभ्रता मिश्रा (वास्को-द-गामा, गोवा,)

निजी जरुरतों के लिए, अपने परिवार के पोषण के लिए बँधुआ मजदूर बनने तक की अपनी
निरीहता में स्वयं को उन तथाकथित समृद्धों के पैरों तले रौंदवाने के स्तर तक भी
गिर जाता है, क्योंकि उसके देश की सीमाएं उसके बौद्धिक स्तर के हिसाब से उसके भूखे
परिवार तक सिमटी होती हैं, जहाँ क्या देशभक्ति और क्या राष्ट्रभाषाॽ सिर्फ और
सिर्फ रोजी-रोटी कमाने की सुध, बच्चों के पेट में अन्न के कुछ दाने डल जाने की
चिंता। उनके ये मानदण्ड कहीं से उनको महान जैसे विशाल शब्द से उद्बोधित करने की
चेष्टा नहीं कर सकते। पर फिर भी वे महान हैं, निःसंदेह वे गिरमिटिए महान हैं,
जिन्होंने सत्रहवीं सदी में आये क्रूर अंगरेज़ों की बनाई गिरमिटिया प्रथा की
यातनाओं को झेला और निःशब्द सहा भी।
इतिहास के अनुसार भारत में अंग्रेजों द्वारा गिरमिटिया प्रथा सन् 1834 में
शुरु की गई थी, जिसमें वे ग़रीबी
, लाचारी, बेरोजगारी और भुखमरी से बेहाल लगभग 10 से 15 हज़ार भारतीय मजदूरों को हर साल गुलाम
बनने की शर्त पर एक
`एग्रीमेंट
 करवाकर फिजी, ब्रिटिश गुयाना,
डच गुयाना, कीनिया, मॉरिशस,
ट्रिनीडाड, टोबेगा, नेटाल (दक्षिण अफ्रीका) आदि देशों में भेज दिया जाता था। चूँकि ये लोग एग्रिमेंट
के तहत जाते थे और भारतीय लोग इस अँग्रेजी शब्द का उच्चारण गिरमिट करते थे, अतः
शनैः शनैः अँग्रेज भी उनको गिरमिट मजदूर कहने लगे। इस तरह इन मज़दूरों को
गिरमिटिया कहा जाने लगा और यह प्रथा भारत की अँग्रेजों द्वारा बनाई गई गिरमिटिया
प्रथा के नाम से इतिहास में दर्ज हो गई। गिरमिटिया प्रथा बाकायदा सरकारी नियमों और
सरकारी संरक्षण प्राप्त लोगों के कारोबार के तहत खूब फली फूली। जिन देशों में ये
भारतीय गुलाम इस प्रथा के तहत भेजे गए, आज भी वे देश गिरमिटिया देशों के नाम से
जाने जाते हैं।

उस समय भले ही गिरमिटियाओं की देशभक्ति परिवार की भेंट चढ़ने के लिए बाध्य रही
होगी, अपनी जन्मभूमि को फिर कभी न देख पाने की टीस भी हृदय के कहीं अंदरुनी कोने
में छिपा दी गई होगी, परन्तु उन देशों में पहुँचकर अनजाने में ही सही अपने देश की
संस्कृतियों, त्योहारों और परम्पराओं को इन गिरमिटियों ने छोड़ा नहीं। वे वहां
गन्ने के खेतों में काम करते हुए रामचरितमानस की चौपाइयों का गान करते थे और संकट
में हनुमान चालीसा पढ़ते थे। एग्रीमेंट के कारण वे पांच साल बाद छूट तो सकते थे,
लेकिन उनके पास इतना धन नहीं होता था कि वे वापस भारत लौट सकें। अतः बाध्यतावश वे
अपने ही तथाकथित स्वामी के पास काम करने लगते थे या किसी और के गिरमिटिये हो जाते
थे। गिरमिटिया एग्रीमेंट के तहत ये मजदूर बेचे जा सकते थे, काम न करने की स्थिति
में अथवा

कामचोरी करने पर बुरी तरह दण्डित भी किये जा सकते थे। यहाँ
तक कि गिरमिटियाओं को विवाह करने की छूट नहीं थी और यदि कुछ गिरमिटिया विवाह कर भी
लेते थे तो भी उन पर गुलामी वाले नियम ही लागू होते थे। इसके तहत उनकी स्त्रियाँ
और बच्चे किसी और को बेचे जा सकते थे। शिक्षा
, मनोरंजन आदि
मूलभूत आवश्यकताओं से भी उनको वंचित रखा जाता था। इन सभी सख्तियों में बँधे निरीह
से उन भारतीयों को किसी भी तरह से अपना हृदय कठोर बनाकर हजारों किलोमीटर दूर की उस
विदेशी भूमि में ही अपनी भारतमाता को स्थापित कर लेना पड़ा। अपने और अपनी
मातृभूमि, सब छूट गया था, शेष था तो सिर्फ हृदय में बसी अपनी संस्कृति, अपनी भाषा हिन्दी
और अपनी परम्पराएं, जिनको गिरमिटिया मज़दूरों से किसी तरह का कोई भी एग्रीमेंट
नहीं छीन सकता था।

सदियों पहले अपने देश छोड़ हजारों किलोमीटर दूर गए भारतीय गिरमिटिया लोगों को
एक दूसरे से जोड़े रखने की डोर एक ही थी वह थी उनकी अपनी भाषा हिंदी, जिसके माध्यम
से वे आपस में अपनी संवेदनाएं बाँट लेते थे।  हिंदी ने ही गिरमिटियों को अपनेपन और आत्मीयता
के साथ एक दूसरे से जोड़े रखा। गिरमिटियों ने इन देशों में हिंदी को जीवित रखकर एक
अनूठा स्थान दिया है, क्योंकि पीढ़ी दर पीढ़ी हिन्दी इन देशों में पुष्पित पल्लवित
होती रही है। वैसे तो सन् 1917 में ब्रिटिश सरकार ने इस गिरमिटिया एग्रीमेंट को
महात्मा गांधी,
गोपाल कृष्ण गोखले के साथ साथ ब्रिटिश सीएफ एंड्रयूज और
हेनरी पोलाक सहित अनगिनत भारतीयों के इस अमानवीय प्रथा को समाप्त करने की मुहिम
छेड़ने के चलते निषिद्ध घोषित कर दिया था। पर जो भारतीय उन देशों से कभी नहीं आ
पाए वे वहीं बस गए। इनमें से अधिकांश गिरमिटों ने वहाँ पर या तो स्वतंत्र मज़दूर
बनकर या छोटे-मोटे व्यापारी बनकर जीविकोपार्जन आरम्भ कर दिया। कुछ देशों में तो इन
भारतीय गिरमिटियों की संतानें प्रधानमंत्री से लेकर बड़े बड़े अधिकारी बने। मॉरीशस
के भूतपूर्व प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम इनमें से ही एक हैं। वर्तमान में एक
गिरमिटिया देश फिजी का उदाहरण लें, तो हम पाते हैं कि वहां की जनसँख्या 9 लाख है
और उसमें से साढ़े तीन लाख से अधिक लोग भारतीय मूल के हैं, जो फिजियन हिंदी बोलते हैं।
वर्तमान गिरमिटिया पीढ़ी के लोगों का हिंदी से आत्मीय संबंध आज भी अपने पूर्वजों
की तरह ही है। वे उन भारतीयों की तरह तो कदापि नहीं हैं जो हिन्दी की बात तो बहुत
करते हैं किन्तु हिन्दी में बात नहीं कर सकते। गिरमिटियाओं ने इस दुराग्रह से
स्वयं को मुक्त रखते हुए उन देशों में भारत की संस्‍कृति के साथ साथ हिन्दी भाषा को
जीवित रखा और लगातार समृद्ध किया। गिरमिटिया अपने ऊपर हो रहे अन्‍यायों और समस्त
दुख-दर्द के बावजूद भी भारतीय त्‍योहारों को पूरे उत्‍साह के साथ मनाते थे और वही
परम्परा आज भी उनके बच्चे निर्वहन करते आ रहे हैं। वैश्‍वीकरण के दौर में भारतीय
नई पीढ़ी जहाँ हिन्दी भाषा और संस्‍कृति से दूर होती जा रही है, वहीं आज भी
गिरमिटियाओं की नयी पीढियां आपस में हिन्दी में बात करते हुए दादा
, नाना,
चाचा, मामा, मौसा-मौसी आदि भारतीय संबोधनों को का ही उपयोग करती हैं। यहाँ तक कि बाद में गिरमिटियाओं
द्वारा मॉरीशस में भारत की संस्‍कृति पर आधारित बसाये गॉंवों में वे आज भी पूर्ण
भारतीयता के साथ रह रहे हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्‍दी को स्थापित करने में गिरमिटिया देशों में
रहने वाले भारतीय लोगों के व्यापक योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता है। आज कहने
को तो विश्व के 132 देशों में विस्तारित हिन्दी को तीन करोड़ अप्रवासी भारतीयों ने
फैलाया है, लेकिन सच यह है कि इनमें वे अप्रवासी भारतीय कदापि शामिल नहीं हैं,
जिनको हिन्दी बोलने में हीनता महसूस होती है, अपितु इनमें वे गिरमिटिये शामिल हैं,
जिन्होंने हिन्दी में बोलना अपनी शान समझा और उसका वैश्विक स्तर पर विस्तार करना
अपना धर्म। उन्होंने सही मायनों में विश्व के समक्ष इस बात को प्रस्तुत किया कि
अभिव्यक्ति
,
सामर्थ्य और साहित्य की दृष्टि से हिन्दी ही सर्वाधिक समर्थ
भाषा है। गिरमिटियों ने हिन्दी की वैश्विक स्थिति को बाजार की भाषा के रुप में
निरुपित कर एक नया ही स्वरुप दिया है। इस तरह गिरमिटियों ने शताब्दियों पूर्व
मजबूरी में ही सही वैश्विक परिवेश में भारत की उपस्थिति दर्ज कराकर हिंदी की
हैसियत में भी उन्नयन किया और भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के बीच खाड़ी देशों
, मध्य एशियाई देशों,
रूस,
समूचे यूरोप, कनाडा, अमेरिका तथा मैक्सिको जैसे प्रभावशाली देशों में रागात्मक जुड़ाव तथा
विचार-विनिमय का सबल माध्यम बनाया है। गिरमिटियों द्वारा हिन्दी के प्रचार व
प्रसार में इतने अधिक कार्य किए गए हैं कि इसी को दृष्टिगत रखते हुए भारत ने हिन्दी
को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में संवर्द्धित करने के लिए विश्व हिन्दी सचिवालय
की स्थापना हेतु गिरमिटिया देश मॉरीशस को चुना। मॉरीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री
सर शिवसागर रामगुलाम ने विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना का प्रस्ताव 1975 में
नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान रखा था। भारत और मॉरीशस की
सरकारों के बीच एक समझौते के तहत 11 फरवरी 2008 को गिरमिटियों द्वारा बसाए गए मोका
गाँव में विश्व हिन्दी सचिवालय स्थापित किया। यह सचिवालय तब से आज तक अनवरत विश्व
हिन्दी सम्मेलनों के आयोजन को एक संस्थागत व्यवस्था के तहत आयोजित करता आ रहा है।
13886291 917031541758435 3246575460126970828 n


लेखक परिचय-
डॉ. शुभ्रता मिश्रा मूलतः भारत के मध्यप्रदेश से हैं और वर्तमान में गोवा में
हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं। उन्होंने डॉ. हरिसिंह गौर
विश्वविद्यालय सागर से वनस्पतिशास्त्र में स्नातक (
B.Sc.) व स्नातकोत्तर (M.Sc.) एवम् विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से वनस्पतिशास्त्र में पीएच.डी (Ph.D.) और पोस्ट डॉक्टोरल अनुसंधान कार्य किया।
डॉ. शुभ्रता मिश्रा की अँग्रेजी भाषा में वनस्पतिशास्त्र व पर्यावरणविज्ञान से
संबंधित अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। सन् 2004 से हिन्दी में सतत्
वैज्ञानिक लेखन कर रही हैं। डॉ. मिश्रा के हिन्दी में वैज्ञानिक एवम् सामयिक लेख
विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमितरुप से प्रकाशित होते रहते हैं। उनकी
अनेक कविताएँ भी विभिन्न कविता-संग्रहों में संकलित हैं।

प्रकाशित हिन्दी पुस्तकें
भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र
धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर

सम्मान
वीरांगना सावित्रीबाई फुले राष्ट्रीय फेलोशिप सम्मान (2016)
नारी गौरव सम्मान (2016)
राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012 (2014 में
प्रदत्त)
मध्यप्रदेश युवा वैज्ञानिक पुरस्कार (1999)

गति

0
wapt image 5404
wapt image 5404

नि:श्वासों के आरोह पर
श्वासें ही प्रमाण है
गति – गति और गति
ब्रह्माण्ड ही सारांश है

जीव जीवन कण्टकें
सभी कुछ पर्याय है
जन्म के कगार पर
मृत्यु ही विश्राम है

शब्द और नि:शब्द पर
आकाश बस अवाक है
सूर्य – चंद्र और धरा
इस काल के प्रमाण हैं

नीर नदी और लहर
समुद्र का प्रवाह हैं
हृदय के अक्षांश पर
नश्वरता ही बहाव है

पुष्प – कलियां और भंवर
जीवन रस प्रतिमान है
अग्नि पृथ्वी वायु जल
नभ – रहस्य के सोपान हैं……

 ... प्रतिभा...✍?

गढ़ी जा रही ‘वास्तविकताओं’ की जादुई तस्वीर: नाकोहस- संजय जोठे

0
16114221 10210788072885476 4489309058919968342 n
गढ़ी जा रही वास्तविकताओंकी जादुई तस्वीर: नाकोहस
नाकोहस एक सामान्य
उपन्यास नहीं है. अपनी बुनावट में ये जिन मुद्दों और सरोकारों को शामिल करता है वे
समाज
,
शिक्षा, राजनीति, संस्कृति,
प्रगतिशीलता और सामान्य बोध से गहराई से जुड़े हैं. बीते कुछ दशकों
में खासकर वैश्वीकरण और उत्तर आधुनिकता की छांव में आधुनिकता को नकारते हुए
अस्मिता की लड़ाइयों या राजनीतियों ने बहुत सारे रूप धरे हैं.
विश्वस्तर पर अस्मिता
की खोज और अस्मिताओं को उभारने – नकारने के जो आन्दोलन या प्रवृत्तियाँ जन्मी हैं
, उनके घमासान में भावनाओं, आस्थाओं और निष्ठाओं का
प्रश्न अब बहुत महत्वपूर्ण बनता जा रहा है
, और बनाया भी जा
रहा है. इसके जो नकारात्मक पक्ष हैं वे किन्हीं खेमों की षड्यंत्रकारी राजनीति के
हाथ में पड़कर भयानक हथियारों में बदलते जा रहे हैं.
आहत
भावना
ऐसा ही एक भयानक हथियार है जो बहुत बारीकी से हर राष्ट्रभक्त” “धर्मप्राणसंस्कृति
गर्वी
” “भारतीयया देशप्रेमीके मन में आसानी से निर्मित किया जा सकता
है.
इस हथियार की
स्वीकृति
,
मारक क्षमता और पहुँच अद्भुत है, ये गजब का
आविष्कार है जो मरणासन्न समाज खुद अपने ही खिलाफ इस्तेमाल करता है और उस समाज को
आत्मघात हेतु उकसाने वाले धर्म
, संस्कृति और समाज के ठेकेदार
आदरणीय भी बने रहते हैं.
आहत भावनाओं और इन पर
सवार एक नये किस्म के फासीवाद के इस पूरे मनोविज्ञान को उजागर करती यह रचना असल
में बीत गये से ज्यादा चल रहे की बात करती है और शायद उससे भी ज्यादा उसकी बात
करती है जो आने वाला है. आधुनिकता का नकार जिस तरह से दक्षिणपंथ और कारपोरेट के
गठजोड़ को ताकत दे रहा है उसकी प्रष्ठभूमि में भारत में धर्म
, संस्कृति, वर्ण, परम्परा और
सर्वाधिक महत्वपूर्ण – जाति और जेंडर के उभरते विमर्शों को अनेकों रंगों में रंगने
का प्रयास हो रहा है.
इतिहास, संस्कृति, भाषा, दर्शन,
लोक-साहित्य, परंपरा, पुरातत्व
और मानवशास्त्र की खोज एसा बहुत कुछ नया ला रही है जिससे भारत में ज्ञात और
प्रयासपूर्वक निर्मित
मेटा नेरेटिवको
बहुत दिशाओं से चोट पहुँचने वाली है. ऐसे में स्वदेशी इंडोलोजी या पौराणिक मिथकों
में आधुनिकता के सूत्र प्रक्षिप्त करके स्वयं आधुनिकता को ही नकारकर प्राचीन सतयुग
में खींच ले जाने वाले प्रयास भी अब बढ़ते जाने वाले हैं. इस प्राचीन नेरेटिव में
बहुत सारे निहित स्वार्थों की प्रेरणाएं हैं जो अतीत और भविष्य को अपने-अपने ढंग
से रंगना चाहती हैं. ऐसे में वह खेमा जो पश्चिम से ही नहीं बल्कि भारत की देशज
प्रगतिशीलता के आवश्यक तत्वों को भी भविष्य निर्माण के लिए सावधानी से चुन लेना
चाहता है
, उसकी लड़ाई उस विपक्षी खेमे से होनी तय है जो कि
पूर्वाग्रहों और निहित स्वार्थों से प्रेरित उस प्राचीन मेटा नेरेटिव के स्वघोषित
रक्षक बने हुए हैं
, या रक्षक नजर आते हुए कुछ अन्य ही
राजनीती खेलते आये हैं.
ये मेटा नेरेटिव भारत
के इतिहास को एक विश्वगुरु और धर्मप्राण भारतवर्ष की तरह देखना चाहता है जिसमे आई
खराबियां और गुलामियाँ सब दूसरों की दी हुई हैं और जिसमे उभरी श्रेष्ठताएँ इतनी
दिव्य हैं कि उनको समझना स्वयं भारतीयों के लिए कठिन है
, ऐसे में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि ये श्रेष्ठताएँ भारतीय समाज
को सभ्य
, लोकतान्त्रिक, वैज्ञानिक और
प्रगतिशील क्यों नहीं बना सकीं
? अब ऐसे प्रश्न उठते ही
बहुतों की भावनाएं
आहतहो जाती हैं.
फिर शुरू होता है आहत भावनाओं का तांडव और इसके समानांतर रचे गये षड्यंत्र जो अब
हर खेमे की राजनीति का मुख्य स्वर बनते जा रहे हैं. ये आहत भावनाएं और इनके रक्षण
के आग्रहों का दबाव और खेल ही इस
नेशनल कमीशन फॉर हर्ट
सेंटिमेंट
नाकोहसकी प्रेरणा है.
यह उपन्यास जिस खतरे
को उजागर करता है उसे एक अन्य दिशा में भी पलता हुआ देखा जाना चाहिए. हालाँकि उस
दिशा में इशारा करना खतरनाक है लेकिन ये खतरा मोल लेना ही होगा. भारत में न सिर्फ
सनातन संस्कृति के रक्षकों की भावनाओं से ही खिलवाड़ नहीं हो रहा है. इस उपन्यास
में गिनाये गये बौनेसर (बौद्धिक नैतिक संस्कृति रक्षक)
, या चौड़ासिंग और सपाटचन्द सभी खेमों और अस्मिताओं की राजनीतियों में फ़ैल
गये हैं.
मुस्लिमों की अपनी
आहत भावनाएं हैं
, दलितों आदिवासियों के शोषकों
ने अपनी तरफ से दलितों की आहत भावनाओं की इबारत बनाकर पेश करना शुरू कर दिया है अब
दलित आन्दोलन या जेंडर विमर्श को भी आहत भावनाओं के खेल की मदद से बौद्धिक यात्रा
से भटकाने का प्रयास चलने लगा है. मुस्लिम आहत भावनाओं को षड्यंत्रपूर्वक इस्तेमाल
करते हुए बीते साठ सत्तर सालों में उन्हें मदरसों
, बुर्कों
और तीन तलाकों में कैद करके रखा गया है. इसी तरह दलितों
, आदिवासियों,
स्त्रीयों के खेमों से आने वाली आहत भावनाओं
की जोर शोर से खोज हो रही है और अब वे अधिकाधिक महत्वपूर्ण होती
जायेंगी और इन भावनाओं के आहत होने की घोषणा करने वाले आश्चर्यजनक रूप से वे लोग
हैं जिन्हें इन भावनाओं को षड्यंत्र की तरह इस्तेमाल करके दलितों
, मुसलमानों और आदिवासियों का शोषण करना है. ऐसे में इन खेमों में एक
इमानदार विमर्श की या बौद्धिक नवाचारों की संभावनाओं को आहत भावनाओं के हथियार से
कुचला जायेगा.
अंबेडकर के
ब्राह्मणीकरण के प्रयास के समानांतर उन्हें एक हिन्दू समाज सुधारक बनाने का या एक
देवता बनाने का जो प्रयास है उसमे इस खतरे को सूंघा जा सकता है. दलितों
, पिछड़ों, मुसलमानों और स्त्रीयों को उनकी आहत भावनाओंके प्रति सेलेक्टिव ढंग से कंडीशन किया
जा सकता है और उनके आहत होने या न होने का निर्णय भी कहीं दूर बैठकर लिया जाएगा.
इस तरह न केवल हिन्दू
समाज के संस्कृति रक्षकों और धर्म भीरुओं की भावनाओं का शोषण बढ़ता जायेगा बल्कि
इससे कहीं भयानक खेल जो अब शुरू हो रहा है वह है
पिछड़ों,
बहुजनों की आहत भावनाओं से खिलवाड़ – जो खुद उन्ही के खिलाफ उन्ही से
खिलवाया जाएगा. मेरे लिए इस उपन्यास से मिलने वाला सबसे बड़ा सन्देश यही है. इस
खतरे के संकेत साफ़ देखे जा सकते हैं. बहुजनों
, पिछड़ों दलितों
के नायकों की प्रचलित छवियों में देवत्व आरोपित करके उस देवत्व की महिमा या अपमान
की परिभाषा को नियंत्रित करके इन समुदायों को बौद्धिक रूप से सक्षम होने से रोका
जाएगा
रोका जाने लगा है. इस खेल में ये समुदाय स्वयं भी कब
शामिल हो जायेंगे यह भी कहना कठिन है.
इस उपन्यास के तीन
मुख्य किरदार जिस प्रष्ठभूमि में इन प्रश्नों से जूझ रहे हैं वह प्रष्ठभूमि कोमरेड
चंद्रशेखर
, रोहित वेमुला, कन्हैया
या नजीब अहमद के बाद के उभरते प्रश्नों से निर्मित होती है. विश्वविद्यालय न सिर्फ
भविष्य का बल्कि अतीत का भी आइना होता है जहां जीवित वर्तमान इन दोनों को तौलते
हुए अपने लिए करणीय की तलाश करता है. इसी तलाश में इस उपन्यास के तीन मुख्य किरदार
अपनी आधी उम्र इन प्रश्नों से जूझते हुए गुजार चुके हैं.
ये तीनों किरदार जो
तीन भिन्न धर्मों से आते हुए भी धर्म मात्र की राजनीति को नकारते आये हैं
उनकी व्यथा कथा हमारे पूरे समाज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट नजर आती है.
उपन्यास की शुरुआत पौराणिक आख्यान
गजेन्द्र मोक्षके रूपक से होती है और बुद्धि, बल के प्रतीक हाथी को
शैतानी और धूर्त मगरमच्छों के जबड़े में फंसता हुआ दिखाया जाता है जो उपन्यास के
अंत तक जारी रहता है. निश्चित ही रेंगने वाला मगरमच्छ हाथी के पाँव दबोचकर उस कीचड
में ले जाना चाहता है जहां निशाचरों और मगरमच्छों का साम्राज्य है
, वहीं इस बुद्धि और बल की ह्त्या की जा सकती है.
ये बल या बुद्धि
आधुनिकता और सूचना क्रांति से हासिल हुई है जिससे सजे गजेन्द्र को दिन दहाड़े उस
कीचड में खींचा जा रहा है जहां से कमल पैदा होते हैं. इस ह्त्या के षड्यंत्र को
देखते हुए भी नारायण या विष्णु का कहीं कोई अता-पता नहीं है. यह रूपक आज की पीढ़ी
की समझ और रुझान के बाहर होते हुए भी महत्वपूर्ण है. दो
बौनेसरमगरमच्छ चौड़ा सिंह
और सपाट चन्द
जो राजनीति और कारपोरेट के प्रतिनिधि हैं वे
उस हाथी को डुबाये जा रहे हैं जो काल के तीनों खण्डों की श्रेष्ठताओं के सत्व को
समेटकर जीनेवाले उन तीन भिन्न धर्मों से आने वाले मित्रों का सम्मिलित प्रतीक है.
ये बौनेसर मगरमच्छ
क्या कर रहे हैं
? कमल के फूलों से पटे पड़े दलदल
में बैठकर ये देशप्रेम
, देशद्रोह, प्रगतिशीलता
और संस्कार की परिभाषाएं तय कर रहे हैं और भावनाओं के आहत होने का फतवा जारी कर
रहे हैं. भगत सिंह जैसे नास्तिक को पगड़ी पहनाकर एक धर्म विशेष से जोड़ना हो या गीता
जयंती पर पोस्टरों में अंबेडकर की तस्वीर इस्तेमाल करना हो. या फिर मकबूल फ़िदा
हुसैन की पेंटिंग्स में नग्नता खोजनी हो या अनंतमूर्ति के लेखन में ईशनिंदा या
संस्कृति निंदा खोजनी हो
सबमे एक ही खेल चल रहा है. अनंतमूर्ति
और हुसैन के साथ रचे खेल को तो हमने देखा लेकिन भगतसिंह और अंबेडकर का हिन्दुकरण
या ब्राह्मणीकरण इससे भी आगे का खेल है और निस्संदेह वह भी इसी आहत भावना के रथ पर
बैठे महारथी ही खेलेंगे.
उपन्यास के एक नायक
सुकेत की प्रष्ठभूमि
, उसका जीवन उसके रुझान और उसकी
सीमाएं बहुत कुछ व्यक्त करती हैं. उसके साथ एक मध्यकालीन बर्बरता जिस तरह का
व्यवहार करती है उसके समानांतर भी एक अन्य कथा चल रही है.
विश्वविद्यालयों में
प्रेम की उष्मा की चाह और देह की मांग के दबाव के साथ जीने का प्रयास करने वाली
युवा बौद्धिकता कदम-कदम पर खुद अपनी ही प्रगतिशीलता की इबारतों में संशोधन करना
चाहती है. नारीवाद
, सेक्युलरिज्म, प्रगतिवाद, रिश्तों की पारदर्शिता और प्रेम की
राजनीति में भी आहत भावनाएं समानांतर बह रही हैं. इस तरह यह उपन्यास समाज की
राजनीति के साथ व्यक्तिगत रिश्तों की राजनीति की तरफ भी गहराई से संकेत करता चलता
है और बहुत खूबसूरती से इन दो समानांतर धाराओं में एक दिशासाम्य खोजकर सिद्ध कर
देता है
यह आवश्यक भी है क्योंकि जो समाज अपने सार्वजनिक
जीवन में षड्यंत्र का शिकार है उसके एकांत जीवन में और बेडरूम तक में भी षड्यंत्र
फ़ैल ही जाने वाला है.
ये एक अन्य समानांतर
सन्देश है जो बहुत मुखर होकर इस उपन्यास में मौजूद है और जिसे युवा पीढ़ी नजरअंदाज
नहीं कर सकती. उपन्यास के तीन अधेड़ नायकों का नाकोहस के
बौनेसरप्रतिनिधियों द्वारा उत्पीडन और उन्हें
समझाने का जो उपक्रम है वह भी बहुत सूचक है. ये बौनेसर अन्तर्यामी प्रतीत होते हैं
सुकेत की चिंताओं और इतिहास को पढ़ लेते हैं. यह बहुत गहरा संकेत है. सुकेत
,
रघु या शम्स जैसे प्रगतिशील भी जिस सामूहिक अतीत का हिस्सा हैं उसी
से ये बौनेसर भी आते हैं
, उस बर्बर मध्यकालीन सामूहिक अवचेतन
में इन बौनेसरों के या सुकेतों के भय एक जैसे हैं
, उनकी
भावनाएं भी बहुत हद तक एक जैसी हैं और इस समानता के पुल पर चलते हुए न केवल सुकेत
बौनेसर के भयों और भावनाओं में सेंध मार सकता है बल्कि इसी पुल से आते हुए ये
बौनेसर भी सुकेतों के भयों को पढ़ लेते हैं.
यही वो पुल है जो
उपन्यासकार ने सार्वजनिक आहत भावनाओं और व्यक्तिगत आहत भावनाओं के बीच भी खूबसूरती
से निर्मित किया है
, जो सुकेत की प्रेमिकाओं
करुणा और रचना के छोटे से प्रकरण में नजर आता है, ‘मुनकिरशम्स से नफरत करने वाले इमानदारऔर परहेजगार
माता पिता की संतान फलकके संबंधों की त्रासदी के एक अन्य उल्लेख में भी यह पुल नजर आता है जो
विशेष रूप से युवा पीढ़ी के प्रेम और रूढीयों के बीच चलते आये संघर्ष के एक
महत्वपूर्ण विषय की तरफ संकेत करता है. इन प्रेम संबंधों की त्रासदियाँ हमारे युवा
वर्ग की आंतरिक टूटन को सामने लाती है.
यह टूटन बहुत अर्थों
में टूट चुके समाज की अनिवार्य परछाई है जो व्यक्तिगत संबंधों के छोटे डबरों में
झलक रही है. समाज का वह भवन जो इन डबरों को घेरकर खड़ा है वह धीरे-धीरे दरक रहा है
, और उसकी दरकन का प्रतिबिंब जैसे इन युवाओं के रिश्तों में उजागर हो रहा
है. आगे बढ़ते हुए उपन्यास में जब यह प्रश्न उठता है कि
क्या
कभी ऐसी कोई व्यवस्था बन पाएगी जिसके निर्माण में किसी इंसानी पहचान से नफ़रत का
गारा न इस्तेमाल किया गया हो
?’ तो यह इंसानी पहचानराजनीतिक, सामाजिक
पहचानों से परे लैंगिक भाषाई पहचानों कि राजनीति को भी कटघरे में खड़ा करती है.
नायकों से चर्चा के
दौरान गिरगिट जिन शब्दों को दोहराता है और नायक स्वयं सड़कों पर लगे होर्डिंग्स में
जो इबारत पढ़ते हैं वह अपने आप में एक पूरी कहानी है.
कला वही जो दिल बहलाए” “साहित्य वही जो मौज कराये
चिन्तन वही जो झट चेतन कर जाए” “लेखन वही जो
झट पल्ले पड़ जाए
और अंत में बुद्धि
वही जो नाकोहस दिलवाए
”. इन सबके बाद एक खतरनाक लेकिन
केन्द्रीय चेतावनी की तरह गिरगिट का घिनौना वाक्य अत है
अपन
आहत वाहत होते नहीं
, प्यारे अपन तो करते हैं … भगवान फगवान
से नहीं
, हमें मतलब है पावर से, मैनेजमेंट
से
”. इस वाक्य तक आते आते उपन्यास अपने सन्देश को चरम तक उठा
लेता है और सब कुछ कह डालता है.
इसके बाद एक अन्य
संवाद और में गिरगिट के मुख से जाहिर होता है कि
सेक्युलरिज्म
आहत भावनाओं का एम्ब्युलेंस है
” “और नाकोहस सेक्युलर
डेमोक्रेटिक कन्सेंट्स का देहधारी रूप है… यह सब पर निगाह रखता है
”. इसी तरह कुछ अन्य नए मुहारों का सृजन भी यहाँ हुआ है सबसे महत्वपूर्ण
सूफ़ीयापे की कढ़ी’, ‘जिससे भय हो उसपर करुणा
नहीं होती
इनके साथ ही कुंठित
पुन्सत्व
और कमर से फिसलते पजामे में नैतिक चिंता का नाड़ाजैसे चुभते कटाक्षों ने भाषाई
सर्जनात्मकता को भी समृद्ध किया है. इन पंक्तियों में सूचना क्रान्ति के युग में
इंटेलेक्चुअल होना पाप है और टेक-नेक्चुअल सबका बाप हैजैसे महावाक्यसे उभरते खतरे
को साकार होता देखते हैं.
उपन्यासकार ने इस
अंतिम
महावाक्यमें जैसे हमारे सारे भयों को साकार कर
दिया है. टेक-नेक्चुअल असल में सबका बाप बनता जा रहा है. विषयों और सन्दर्भों की
जानकारी के बिना सूचना क्रान्ति के घोड़ों पर अफवाहों और प्रोपेगेंडा की सवारी बड़ी
तेजी से चल रही है और आहत भावनाओं के इंधन से इनकी रफ़्तार और पहुँच में चार चाँद
लग गये हैं. इस प्रकार
होमो-इन्फोमेटीकसमें बदलती जा रही यह पीढी भीतर आहत भावनाएं लिए और बाहर सूचना क्रान्ति के
हथियार लिए न जाने किन किन रिमोट कंट्रोल्स के द्वारा एक सामूहिक आत्मघात की तरफ
धकियाये जा रही है और गिरगिट
, चौडासिंह और सपाट चन्द जैसे
पुराने जानकार लेकिन अपने अतीत से शर्माते हुए बौनेसर
, संस्कृति-सभ्यता
और धर्म का झंडा लहराते हुए हमारे समय को दिशा दे रहे हैं.
चौड़ासिंह से चर्चा
में सुकेत और रघु को पता चलता है कि वह काफी कुछ जानकार है सुकेत सोचता है कि
“ऐसा आदमी नाकोहस का बौनेसर कैसे बन गया” ठीक यही प्रश्न तीनों नायकों
की पेशी के समय उठता है जब नाकोहस प्रमुख गिरगिट महाशय अपने ज्ञान से कटाक्ष करते
हैं
,
तब रघु अपने मित्र सुकेत के आश्चर्य पर विराम लगाते हुए हल्के अंदाज
में एक भयानक संकेत करता है. रघु कहता है “मेरा तो कयास है कि इस जॉब में आने
से पहले अपने वाले वोकेशन में ही थे… यहां जमाने के पहले खुद इंटेलेक्चुअल ही
रहे होंगे” यह सुनकर गिरगिट भभक पड़ता है और कहता है कि उसे अपने अतीत के रेशे
रेशे से नफरत है. ये गजब का बिंदु है इस उपन्यास में और मेरी नजर में यही इसका
सबसे महत्वपूर्ण सन्देश है
, हर इंटेलेक्चुअल एक बिंदु पर आकर
पुराना पड़ जाता है और उसकी भी आहत होने योग्य भावनाओं की अपनी लिस्ट तैयार हो जाती
है. इंटेलेक्चुअल न जाने कब कैसे टेक-नेक्चुअल में बदलते बदलते
होमो-इन्फोमेटिकसबनने की रपटीली राह पर फिसलने लगता
है.
यह पतन आज के दौर के
लिए बहुत प्रासंगिक है
, खासकर प्रगतिशीलता की तरल और
चिकनी सी परिभाषा को थामें रहने में असफल कई लोग अचानक पुराणपंथी
, दक्षिणपंथी, ब्राह्मणवादी, पोंगापंथी,
नक्सली, दलितवादी, नारीवादी,
कम्युनिस्ट आदि न जाने क्या क्या करार दे दिए जाते हैं, और इस तरह वृहत्तर समाज से और सार्थक संवाद की संभावनाओं से काट दिए जाते
हैं. यह अस्मिताओं के संघर्ष की राजनीति का एक अन्य काला पहलू है जो बहुत अलग
किस्म की असुरक्षाओं और भयों का निर्माण कर रहा है. यह बिंदु इसलिए भी महत्वपूर्ण
है कि यह स्वयं इस उपन्यास से जुडी एक समस्या को भी व्यक्त करता है.
वह समस्या है गजेन्द्र मोक्षके रूपक के चुनाव से जुडी है,
पहली समस्या यह कि इस पौराणिक रूपक से आज की युवा पीढ़ी का कोई
सम्बन्ध नहीं रहा गया है और इसी चुनाव से कई अन्य आहत भावनाएं भडक सकती हैं और वह
काल्पनिक लेकिन ठोस और सर्वव्यापी अन्तर्यामी नाकोहस अचानक स्वयं उपन्यासकार के
खिलाफ ही सक्रिय हो सकता है. हालाँकि यह भी माना जा सकता है कि इस रूपक का चुनाव
हमारी प्रगतिशीलता और प्राचीन भारतीय रूपकों के सार्थक सत्व के बीच नजर आने वाले
द्वंद्व को लेकर एक नई बहस को सुलगा सकता है.
इस उम्मीद के साथ अंत
में कहा जा सकता है कि यह हमारी युवा पीढ़ी के लिए एक अवश्य पठनीय उपन्यास है.
विश्वविद्यालय
, शिक्षण, मोबाइल,
कंप्यूटर, टीवी, विज्ञापन,
प्रेम, रोमांस और इन सबकी राजनीति के साथ
संस्कृति और प्रगतिशीलता की यह बहस सबके काम की है. खासकर युवाओं के लिए यह भविष्य
को लेकर तैयार होने में मदद कर सकने वाली कालजयी रचना है.
संजय जोठे
* चित्र गूगल
से साभार

गजल

0
wapt image 5847
wapt image 5847

वर्षों बाद उसकी याद आई
मेरी अधूरी इश्क मुझे किस मोड़ पर लाई

जिसे दिल से भूला दिया था
ना जाने क्यों लब पर उसका नाम आई

जिससे इश्क हुआ उससे बयां नहीं किया
मैंने भी इश्क की राह में खुद को गुमनाम किया

मत कर इश्क किशन इस मुक्कमल जहां से
जहाँ जख्म कांटों से नहीं, मिलते हैं खूबसूरत कलीयों से

मेरे मुक्कदर में उसका प्यार नहीं है
लगता है मेरी मुक्कदर मुझसे रूठ गई है
:कुमार किशन कीर्ति,बिहार

गजल

0
d0adea1206a5d8e48004fa1a1e3bf73b-3a595e56

IMG 20200723 155443 55b1e056

खोरदेकपा परंपरा की जटिलताएं और ‘सोनम’ उपन्यास-डॉक्टर स्नेह लता नेगी

0

खोरदेकपा परंपरा की जटिलताएं औरसोनमउपन्यास

डॉक्टर स्नेह लता नेगी,
हिंदी विभाग,
दिल्ली विश्वविद्यालय
दिल्ली।

शोध सार

आलोच्य उपन्याससोनमभूटान के साकतेंग और मिरोक क्षेत्र में तथा अरुणाचल के पश्चिमी श्रेत्र कामेंग और तवांग के आसपास बसने वाले ब्रोक्पा (पशुपालक) आदिवासी समाज की अनोखी एवं विशिष्ट संस्कृति पर आधारित है।  इस उपन्यास की कथा याक, चंवरी गाय, भेड़बकरी और घोड़ा आदि का पालन करने वाले ब्रोक्पा समुदाय जो बहुपति प्रथा का पालन करते हैं के इर्दगिर्द घूमती है। जिन की सामाजिकसांस्कृतिक परिवेश और प्रथाओं की समाजशास्त्रीय दृष्टि से व्याख्या करने की भी जरूरत है।

बीज शब्द: उपन्यास, सोनम, भूटान, आदिवासी, समाज, संस्कृति,

शोध विस्तार

भारत के पूर्वोत्तर में स्थित अरुणाचल प्रदेश के छोटे से गांव ‘जिगांव’ में येशे दोरजी थोंगछी का जन्म हुआ। थोंगछी जी अरुणाचल की शेरदुकपेन आदिवासी समुदाय से आते हैं। थोंगछी जी बहुभाषाविद हैं। उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत असमिया भाषा से की। कविता कहानी और उपन्यास लेखन में वह बहुत सक्रिय रहे हैं। उनकी महत्वपूर्ण कृतियां ‘सोनम’, ‘पापोर  पुखुरी'( पाप का पोखर), ‘बा फूलोर गोंधो’ (बांस फूल की गंद), ‘विष कोन्यार देशोत’ (विष कन्या के देश में), ‘ शो काटा मानुह’ ( शव काटने वाला आदमी), ‘ मौन ओंठ मुखौर हृदोय’ (मौन होंठ मुखर हृदय) आदि महत्वपूर्ण हैं। सन 2005 में ‘ मौन होंठ मुखर हृदय’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया । अब तक उनकी रचनाओं का अंग्रेजी, हिंदी, बांग्ला और रूसी भाषा में अनुवाद हुआ है।  ‘शव काटने वाला आदमी’, ‘सोनम’, ‘मौन होंठ मुखर हृदय’ का अनुवाद हिंदी में हुआ है । थोंगछी जी की रचनाओं में अरुणाचल की प्राकृतिक सौंदर्य और वहां की अनेक जनजातियों की संस्कृति, रीति-रिवाज, परंपराएं, आचार विचार और उनके आपसी संबंधों का  सुंदर चित्रण देखने को मिलता है। प्रस्तुत आलेख में उनकी अनुदित उपन्यास ‘सोनम’ पर मुख्य रूप से विचार होगा। राष्ट्रपति के रजत कमल पुरस्कार से सम्मानित इस उपन्यास पर फिल्म भी बन चुकी है। जिसे अनेक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में सराही गई है।आलोच्य उपन्यास ‘सोनम’ भूटान के साकतेंग और मिरोक क्षेत्र में तथा अरुणाचल के पश्चिमी श्रेत्र कामेंग और तवांग के आसपास बसने वाले ब्रोक्पा (पशुपालक) आदिवासी समाज की अनोखी एवं विशिष्ट संस्कृति पर आधारित है।  इस उपन्यास की कथा याक, चंवरी गाय, भेड़- बकरी और घोड़ा आदि का पालन करने वाले ब्रोक्पा समुदाय जो बहुपति प्रथा का पालन करते हैं के इर्द-गिर्द घूमती है। जिन की सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश और प्रथाओं की समाजशास्त्रीय दृष्टि से व्याख्या करने की भी जरूरत है। उपन्यास में ब्रोक्पा समुदाय के खोरदेकपा परंपरा और उससे प्रभावित नायिका सोनम और उसके दो पतियों लबजांग और पेमा वांगछू के बीच  संबंधों के बनते बिगड़ते समीकरणों का गहन आंकलन किया है।

 

ब्रोक्पा यानी पशुपालक समुदाय जो साल के छः महीने दुर्गम पहाड़ियों के चरागाहओं में अपनी जीविका का एकमात्र स्रोत संग प्रवास करता है और जाड़े में अपने गांव लौट आता हैं। युवा लबजांग  का खानदानी व्यवसाय भी यही है। आरंभ में लबजांग और सोनाम दोनों बहुत ही सुखी वैवाहिक जीवन जीते हैं। चुंकि लबजांग के परिवार में अन्य कोई सदस्य नहीं है तो लबजांग को ही छ:  महीने के लिए चरागाहों में पशुओं के साथ पहाड़ियों पर रहना पड़ता है और  सोनाम गांव में अकेली पड़ जाती है। ऐसे में पेमा वांगछू मौके का फायदा उठाकर प्रेम याचना लेकर हमेशा ही सोनम के पीछे लगा रहता है। और एकांकी जीवन व्यतीत करती सोनम के मन में भी पेमा के लिए प्रेम का भाव जागृत होता है और यहीं से  उपन्यास प्रेम त्रिकोण की जटिलताओं के साथ आगे बढ़ता है। सामान्यता एक पुरुष की अनेक पत्नियां तो हम मुख्यधारा के समाजों में देखने के आदी हैं और हम उसे स्वीकार भी करते हैं क्यों कि अनेक स्त्रियों के साथ पुरुष रह रहा है, पुरुष तो पुरुष है उसे अधिकारी है वह जो चाहे कर सकता है। लेकिन एक स्त्री की एक से अधिक पति देखने की आदत बहुसंख्यक समाज को नहीं है। ऐसे में स्वीकार करने की बात तो सोच ही नहीं सकते हैं। परन्तु ब्रोक्पा समुदायों में एक अनूठी परंपरा है जिसे यहां की भाषा में खोरदेकपा  कहा जाता है। जहां दो तीन भाइयों की  एक ही स्त्री के साथ विवाह कर दिया जाता। जिसे समाजिक मान्यता प्राप्त है। जो लंबे समय से चली आ रही है ।

उपन्यास का मुख्य पात्र लबजांग की मां भी उसी खोरदेकपा परंपरा का पालन करते हुए अपने दोनों पतियों के साथ सुखद जीवन व्यतीत कर चुकी थी । इस संदर्भ में यह पंक्तियां महत्वपूर्ण हैं: “बर्फीली पहाड़ियों के इस अंचल के ब्रोक्पा समाज में मान्य प्रथा के अनुरूप लबजांग की मां ने उसके पिताजी से विवाह के साथ साथ ही उसके चाचा जी के साथ भी खोरदेकपा अर्थात समानाधिकारिक विवाह किया था। दोनों को अपने पति के रूप में ग्रहण किया था। उन तीनों का जीवन बिना किसी झगड़ा झंझट, बिना किसी प्रकार के मन-मुटावे के बड़े सहज सुंदर ढंग से बीता था”1 इसी तरह योनतन, टिकरा और दवा आदि गांव के सभी ब्रोक्पा परिवार इसी तरह के संबंधों का निर्वाह करते हैं। ब्रोक्पाओं में प्रचलित खोरदेकपा प्रथा अरुणाचल के अलावा पश्चिमोत्तर हिमालय के किन्नौर, लाहौल- स्पीति, और लद्दाख आदि क्षेत्रों में भी रही है। इन क्षेत्रों के कबीलाई समुदाय भी ब्रोक्पाओं की तरह ही पशुपालक रहे हैं। यहां भी साल के कुछ महीने घर का पुरुष चरागाहों  में अपने पशुधन के साथ रहता और सर्दियों में गर्म इलाकों की ओर प्रस्थान करता। यह सभी कबीलाई पशुपालक हिमालय क्षेत्र में एक स्थान से दूसरे स्थान पर चरागाहों की तलाश में घूमते रहे हैं और देश के अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर बस भी गए। अरुणाचल के ब्रोक्पा कबीला लद्दाख में भी ब्रोक्पा के नाम से भी जाना जाता है।इन सभी समुदायों की धार्मिक आस्था, सामाजिक- सांस्कृतिक व्यवहार आदि बहुत कुछ मिलता जुलता है। इन समुदायों में प्रचलित परंपरा की सामाजिक संरचना को यहां समझने की जरूरत है। चुंकि ब्रोक्पा समुदाय पशुपालक समाज है जिसके पास आय का एकमात्र स्रोत यही है। तो दूसरी और अन्य हिमालयी क्षेत्र की स्थिति भी कमोबेश वैसी ही रही है। पशुपालन के साथ इनके पास कृषि योग्य भूमि बहुत ही सीमित है। सीमित संपत्ति का बंटवारा ना हो और परिवार के बीच एकता बनी रहे इसी दृष्टिकोण से यहां खोरदेकपा परंपरा को सामाजिक मान्यता प्राप्त है। चुंकि उपन्यास का नायक लबजांग को ऐसी कोई सुविधा प्राप्त नहीं है। क्योंकि अपने माता-पिता का वह एकमात्र संतान है। जबकि खोरदेक्पा एक ही माता-पिता के संतानों में ही होता है ।

‘ सोनाम’  उपन्यास में खोरदेकपा के कारण तीनों ही पात्रों के संबंधों में जटिलता आती है। क्योंकि पेमा वांगछू लबजांग के जाति बिरादरी का नहीं है। जाति बिरादरी का ना होते हुए भी पेमा वांगछू को सोनम के साथ खोरदेकपा कर  लाने के लिए गांव के सरपंच के साथ लबजांग पेमा वांगछू के घर उस के माता- पिता को मनाने जाता है जिसमें वह   सफल होता है और पेमा वांगछू, लबजांग और सोनम खोरदेकपा के पवित्र बंधन में बंध जाते हैं।

“निर्णय के दो दिन बाद एक सादे समारोह में संक्षिप्त सा वैवाहिक संस्कार आयोजन करके सोनम का दूसरा विवाह पेमा वांगछू के साथ संपन्न हो गया। उसी दिन दुपहरियो से ही एक-एक कर गांव के स्त्री पुरुष लबजांग के घर आ -आ कर इकट्ठे होते गये। अपनी ओर से उपहार के रूप में लाई गई खाटा उन्होंने सोनम और पेमा वांगछू को तो पहनाई ही लबजांग को भी खाटा पहनायी….. स्त्रियां बोलने लगीं ….अरे आज ही वह सचमुच की ब्रोक्पा पत्नी लग रही है”2 हर समाज अपनी भौगोलिक पृष्ठभूमि उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक  गठन और आर्थिक व्यवस्थाओं के आधार पर जीवन को सुगम बनाने की कोशिश करता है और उसी सामाजिक प्रक्रिया के तहत जीवन यापन करता है। ब्रोक्पा समुदाय भी इससे अछूता नहीं है। इसीलिए यहां खोरदेकपा जैसी परंपराएं प्रचलित हैं। जो उसकी भौगोलिक, सामाजिक – सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुकूल उन्हें लगता है।

जिस तरह बहुपत्नी प्रथा में पत्नियों के बीच आपसी ईर्ष्या, द्वेष के कारण गृह कलह आम बात   है। ठीक उसी तरह की समस्या इस उपन्यास में दृष्टिगोचर होता है और यहीं से संबंध बिगड़ कर द्वद्वं पूर्ण आकार लेने लगता है। एक तरफ पेमा सोनम के मन में लबजांग के खिलाफ उसके अन्य स्त्री के साथ संबंध आदि को लेकर भड़काता रहता है तो वही आलसी पेमा चरागाह में जाने से जी चुराने लगता है। जब भी उसकी बारी चरागाह जाने आती थी तो वह वहां लापरवाही से काम करता और पशुओं का ध्यान नहीं रखता। हमेशा ही कुछ न कुछ नुकसान करता जिसके कारण लबजांग की आर्थिक स्थिति भी खराब होने लगती है। “आगे चलकर लबजांग और सोनाम का वैवाहिक जीवन, उनकी अपनी घर- गृहस्थी, सुखी और स्वस्थ नहीं रह पायी, अनुकूल परिस्थिति और अवसर की तलाश में लगा रहने वाला पेमा वांगछू सोनाम के कान में लबजांग की ऐसी ढेर सारी मनगढ़ंत बातें घुसेडता रहता।….इन्हीं सब कारणों से वह लबजांग की अपेक्षा पेमा वांगछू के अधिक करीब हो गयी। हालात यहां तक बढ़ गई कि दोनों पतियों को जो एक समान रूप में प्यार करने, दोनों के प्रति समान रूप से आदर भाव रखने का जो उसका पवित्र उत्तरदायित्व था, धीरे-धीरे वह उस में असफल होने लगी”3 अगर यहां पेमा वांगछू की जगह खोरदेकपा में लबजांग का अपना सगा भाई होता तो शायद समस्या इस रूप में नहीं उभरती। पेमा किसी दूसरे जाति बिरादरी का व्यक्ति है। जिसे ना तो लबजांग के घर-गृहस्थी, चरागाह और पशुओं से कोई लगाव है। इसीलिए वह इतनी लापरवाही से काम करता है। क्योंकि नुकसान उसका नहीं बल्कि लबजांग का हो रहा है इसलिए पेमा के मन में अपनत्व का भाव कभी भी नहीं आता है। जबकि खोरदेकपा के नियमानुसार लबजांग पेमा को अपनी संपत्ति, घर-द्वार और पशु संपत्ति में बराबरी का हिस्सा देता है। “जिस दिन से तुमने मेरे साथ खोरदेकपा किया तुम मेरे द्वारा पाले गए इन सभी पशुओं के मालिक हो गए हो”4 इसके बावजूद भी पेमा वांगछू के व्यवहार में किसी भी प्रकार का बदलाव दिखाई नही देता। संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलने पर भी पेमा में घर – गृहस्थी के प्रति किसी भी तरह का लगाव लबजांग के परिवार के साथ स्थापित करता हुआ  दिखाई नहीं देता। यहां रचनाकार पेमा के आलसी और अवसरवादी व्यक्तित्व के माध्यम से यह दर्शाने की कोशिश करते हैं कि पेमा जैसा व्यक्ति किस तरह समाज की मान्य परंपराओं का दुरुपयोग अपने फायदे के लिए करता है। जिस भाव के साथ सोनाम और लबजांग पेमा के साथ खोरदेकपा करते हैं और उसे अपने परिवार का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। लेकिन पेमा का व्यवहार इसके बिल्कुल विपरीत दिखाई देता है। वक्त गुजरने के साथ-साथ पेमा सोनाम से भी ऊब चुका था और उससे छुटकारा पाने की सोचने लगा। इसीलिए सोनाम जब बीमार रहने लगी और लबजांग चरागाह में पेमा के भरोसे सोनाम और बच्चों  को छोडकर जाता है तब भी वह अपने परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से वह दूर भागता है। बीमारी में भी सोनाम दिन रात काम करती और परिवार का भरण-पोषण करती जिसके चलते सोनाम ने एक दिन खटिया पकड़ लिया तो उसके बाद अंतिम यात्रा तक उस खटिया से उठ नहीं पाई। उपन्यास अंत तक आते-आते सोनाम की मृत्यु के साथ खोरदेकपा परंपरा की खामियों की तरफ भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है। जहां उपन्यास अंत में आकर ट्रेजिक  हो जाता है।

ब्रोक्पा समुदाय मूलता बौद्ध धर्मावलंबी हैं। सोनाम कई वर्षों से संतान सुख से वंचित रहती है तो पति-पत्नी विचार करते हैं कि उन्हें तवांग गोंफा  में जाकर पलदेन लामो (आराध्य देवी) और शाक्य टोबा (गौतम बुद्ध )की शरण में संतान प्राप्ति के लिए यात्रा पर निकलना चाहिए और दोनों तवांग की यात्रा के लिए निकलते हैं। उन्हें विश्वास है कि पलदेन लामो  उनकी मनोकामना पूर्ण करेंगी । जब सोनाम गर्भ धारण करती है तो पलदेन लामो  के प्रति  उनकी आस्था और गहरी हो जाती है। सोनाम लबजांग से कहती है “हमारे परम पूज्य पलदेन लामो और टोम्बा  शाक्या दावा देवताओं ने हमारी प्रार्थना सुन ली है, क्या इस बात को तुम जान पाए हो, उन्होंने हमारी प्रार्थना स्वीकार कर ली है। और हमारी इच्छा के अनुरूप हमें इच्छित वरदान भी दे दिया है।”5 उपन्यास में तवांग गोम्पा (बौद्ध विहार)  के बनने के पीछे का संक्षिप्त इतिहास भी हमें मिलता है। जिससे हमें ज्ञात होता है कि तवांग गोम्पा तिब्बत देश की राजधानी ल्हासा के पोतला गोम्पा ( पोतला पैलेस) के बाद संसार में द्वितीय स्थान पर इस की ख्याती है। सन 1681 में अरुणाचल के मनपा जनजाति के विद्वान मेरा लामा धार्मिक शिक्षा ग्रहण कर तिब्बत से लौटने के बाद तवांग गोम्पा के निर्माण कार्य में जुट गए थे । तवांग नाम के पड़ने के पीछे भी यहां कई तरह की दंत कथाएं प्रचलित हैं। मेरा लामा गोम्पा निर्माण के लिए उचित स्थान की तलाश में पहाड़ियों पर अपने घोड़े पर चढ़कर विभिन्न स्थानों का निरीक्षण करने जाते थे। एक दिन असावधानी के चलते घोड़ा गायब हो गया तो उसे खोजते हुए वह पहाड़ी पर पहुंचे तो वह देखते हैं कि घोड़ा अपने दोनों खुरों से उस पहाड़ी को खोदकर गड्ढा बना रहा है। तो मेरा लामा के अंतर्मन में आभास हुआ कि घोड़ा उसी पवित्र स्थान को चिन्हित कर दिखा रहा है। और वहीं तवांग गोम्पा (बौद्ध विहार) का निर्माण हुआ। “चुंकि वह स्थान घोड़े के आशीर्वाद से धन्य हुआ था। इसी से उसका नाम रखा गया। तवांग, इस संयुक्त शब्द में पहले अंश- ‘त’ का अर्थ है घोड़ा और ‘वांग’ का अर्थ है –आशीर्वाद”6 समय बीतने के साथ-साथ जनसाधारण में यह गोम्पा तवांग के नाम से विख्यात हुआ। उस समय इस क्षेत्र में तिब्बत का शासन चलता था। तिब्बत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में मेरा लामा इस गोम्पा का प्रशासन देखते थे और यहां के लोग राजस्व कर, मालगुजारी, धर्म का दान-दक्षिणा तवांग गोम्पा में जमा करते थे।

ब्रोक्पा समुदाय पुनर्जन्म में विश्वास रखता है। वह मानते हैं कि सभी प्राणी पुनः जन्म लेते हैं। उपन्यास में एक प्रसंग आता है जब लबजांग का   वफादार कुत्ता डब्बू हिमबाघ का शिकार होता है और मर जाता है। गांव में सभी लोग मानते हैं कि लबजांग की बेटी रिनचिन जांमू के रूप में डब्बू ने पुनर्जन्म  लिया है । रिनचिन जांमू चार-पांच साल की उम्र में पूर्व जन्म में अपने साथ घटित घटना को अपने पिता लबजांग को वैसा ही सुनाती है जैसे वास्तव में डब्बू के साथ घटित हुआ था। “फिर उसी भय की अवस्था में लड़खड़ाती आवाज में कहने लगती है-“समझ रहे हैं ना पिताजी। उस बाघ ने मुझे अपने पंजों में जकड़ लिया था । मेरी गर्दन पर अपने दांतो से काट खाया था। फिर मुझे उस बर्फिली घाटी में घसीटते-घसीटते बहुत दूर तक लिए चला गया था। उस समय मुझे जो असहनीय कष्ट हुआ था उसके बारे में अब आपको कैसे बतलाऊं।” 7 यह पंक्तियां ब्रोक्पाओं की पुर्नजन्म के प्रति उनके विशवास को और प्रबल करती है।  आदिवासी समाज किसी भी क्षेत्र का क्यों ना हो उसकी अपनी विशिष्ट पारंपरिक विश्वास और आस्था उन्हें दुसरे समाजों से अलग करती है जिनका अनुपालन हर आदिवासी समुदाय करता है।

जहां तक आदिवासी स्त्रियों का सवाल है वह अपने समाज में अधिकांश मामलों में पुरुष के समान अधिकार रखतीं हैं। यहां स्त्रियां भी पुरुषों के समान अपनी शारीरिक क्षमता के अनुरूप श्रम करती हैं। इसलिए उसे घर गृहस्थी से लेकर अपने लिए निर्णय लेने का स्वतंत्र अधिकार है। दूसरे समाजों की अपेक्षा आदिवासी स्त्रियों की स्थिति सम्मानजनक है। आलोच्य उपन्यास की बात करें तो हम पाते हैं कि खोरदेकपा में रहना है या नहीं इसका अंतिम निर्णय स्त्री के हाथ में है। इसलिए अगर चाहे तो वह मना भी कर सकती है। सोनाम पेमा वांगछू के साथ खोरदेकपा करना चाहती है तभी लबजांग पेमा के घर खोरदेकपा का प्रस्ताव लेकर जाता है। दूसरी ओर खोरदेकपा में रहते हुए संतान पैदा होने पर किस पति का संतान है इसका निर्णय लेने का अधिकार भी स्त्री को ही प्राप्त है। अन्य आदिवासी समाजों की तरह ब्रोक्पा समुदाय में भी स्त्री-पुरुष दोनों के लिए पुनर्विवाह बहुत ही आसान है । कोई भी स्त्री पुरुष पति-पत्नी में से एक के ना रहने पर एक वर्ष के बाद दूसरे साथी का चयन कर घर गृहस्थी बसाने का अधिकार रखता है। ब्रोक्पा समुदाय की यह खासियत है कि वह जीवन की सतत गतिशीलता में विश्वास रखता है। इसलिए जीवन को संबंधों के साथ खुशहाल और सुखी संपन्न बनाने का हर संभव कोशिश करता है । यहां इस संदर्भ में उल्लेखनीय है “किसी भी एक दंपत्ति में से पति या पत्नी किसी एक की मृत्यु हो जाने पर जीवित बचा हुआ दूसरा साथी एक वर्ष काल की अवधि तक प्रतीक्षा करता है, इस समय के अंदर कोई दूसरा विवाह नहीं करता, किंतु साल बीतते ही कोई दूसरा जीवन संगी चुनकर विवाह कर नयी गृहस्थी बसा लेता है।”8 यह समाज जीवन में परंपराओं से ऊपर मनुष्य की संवेदनाओं को महत्व देने में विश्वास रखता है। यह उसका जीवन अमूल्य है इसलिए हर दुख के बाद जीवन को नई ऊर्जा के साथ संचालित करने में विश्वास रखता है।

रचनाकार ने इस उपन्यास के माध्यम से ब्रोक्पा समुदाय के पर्व त्योहार और उनकी सांस्कृतिक विशेषताओं के साथ प्रेम की एकनिष्ठता तथा स्त्री की स्वतंत्रता जैसे गंभीर मुद्दों को अपने सधे हुए कलम से उकेरा है। मनुष्य सुलभ कमजोरियों को सहजता के साथ प्रस्तुत करने में तथा जिस रूप में आदिवासी जीवन उस अंचल में है उसी रूप में उसे प्रस्तुत करने में थोंगछी जी सफल हुए हैं। उपन्यास की कथा संरचना सुगठित और व्यवस्थित है। कथा पाठक को अंत तक बांधे रखती है कहीं किसी तरह का बिखराव कथावस्तु में हमें नहीं मिलता है। आंचलिक शब्द ब्रोक्पा समाज की परंपराओं की वास्तविकता को जानने समझने में सहायक सिद्ध होता है।  यहां कहा जा सकता है कि आदिवासी साहित्य अभी भी अपने शैशवावस्था में है।  ऐसे में थोंगछी जी जैसे रचनाकारों से भविष्य में आदिवासी साहित्य लेखन समृद्ध होगा ऐसी मेरी परिकल्पना है।

जनकृति के जुलाई 2020 अंक में प्रकाशित

चित्र साभार: डैली मेल 

संदर्भ:
1 सोनाम, येसे दर्जे थोंगछी, अनुवादक: डॉ.   महेंद्रनाथ दुबे, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2009, पृष्ठ 8-9.
2 वही, पृष्ठ  64.
3 वही, पृष्ठ 151.
4 वहीं, पृष्ठ 76.
5 वहीं, पृष्ठ 141.
6 वहीं, पृष्ठ 107.
7 वहीं, पृष्ठ 153.
8 वहीं, पृष्ठ 238.

[embedyt] https://www.youtube.com/embed?listType=playlist&list=UUY8HT3yS4_Q4kwD2sUJGsyA&layout=gallery[/embedyt]