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निदा नवाज़ की कविताएँ

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1-हमारी अम्मा की ओढ़नी 

वे जब आते हैं रात-समय 
दस्तक नहीं देते हैं 
तोड़ते हैं दरवाजे़ 
और घुस आते हैं हमारे घरों में 
वे दाढ़ी से घसीटते हैं 
हमारे अब्बू को 
छिन जाती है 
हमारी अम्मा की ओढ़नी 
या हम एक दूसरे के सामने 
नंगे किए जाते हैं 
सिसकती है शर्म 
बिखर जाते हैं रिश्ते 
वे नकाबपोश होते हैं 
केकिन 
हम खोज ही लेते हैं उनके चेहरे 
अतीत की पुस्तक के एक एक पन्ने से 
बचपन बिताए आंगन से 
दफ़्तर में रखी सामने वाली कुर्सी से 
एक साथ झुलाये हुए झूले से 
स्कूल की कक्षा में बैठे लड़कों से 
हमारे बचपन के आंगन पर 
रेंगते हैं सांप 
यमराज दिखाई देता है 
हमारी सामने वाली कुर्सी पर 
जल जाती है 
हमारे बचपन के झूले की रस्सी 
हम उस काली नक़ाब के पीछे छिपे 
कभी उस लड़के का चेहरा भी देखते हैं 
जिसको हमने पढ़ाया होता है 
पहली कक्षा में 
वे जब आते हैं रात-समय 
ले जाते हैं जिसको वे चाहें घर-परिवार से 
और कुछ दिनों के बाद 
मिलती हे उसकी लाश 
किसी सेब के पेड़ से लटकी 
या किसी चौराहे पर लुथडी 
मारने से पहले वे 
लिख देते हैं अपना नाम 
उसकी पीठ पर 
आतंक की भाषा में 
दहकती सलाखों से 
आग के अक्षरों में 
वे जब आते हैं रात-समय 
दस्तक नहीं देते हैं 
तोड़ते हैं दरवाज़े 
रोंदते हैं पाव तले 
हमारी संस्कृति को 
हमारे रिश्तों को 
हमारी शर्म को . 

2-विद्रोह

मैंने काले घनघोर मेघों से 
कभी रास्तों का पता नहीं पूछा  
मैंने रेबीज़ से ग्रस्त कुत्तों से 
कभी यारी नहीं गांठी 
मैंने कसी भगवान के आगे 
कभी नहीं किया कोई मन्त्र पाठ 
और न ही मांगी 
किसी अंधविश्वास के देवता से 
कोई जीवनदान की दुआ  
मैं धर्म के दलालों को 
सदैव जज़िया१ देने से इनकारी हुआ  
अपनी उम्र के सूर्योदय से लेकर 
आज तक 
मैं समेटता रहा 
रौशनी की एक एक किरन 
अपने विवेक का आहार 
मैं दर्ज करना चाहता हूँ 
रात के गहरे अँधेरे के ख़िलाफ़ 
एक मशाल भर विद्रोह . 
———————————
जज़िया:- इस्लामी शासन में गेर-मुस्लिमों से लिया जाने वाला टेक्स.

3-एहतिजाज का पोस्टर 
(
दुनिया भर के शरणार्थियों के नाम)

तुम्हारे घरों पर बोल दिया है 
पागल कुत्तों ने धावा 
कहीं ताना शाहों के रूप में 
तो कहीं आईएसआईएस के 
क्रूर आतंकियों के रूप में 
जिनकी पीठ थपथपा रहें हैं 
साम्राज्यवाद के सफ़ेद भेड़िये 
और कट्टरवाद के कायर कौए 
एक नाटकीय षड्यंत्र 
कुत्तों, कौओं और भेड़ियों के बीच 
मानवता को लहुलुहान करने का 
प्रागैतिहासिक पाखंडी घुफाओं में 
मानव को वापस धकेलने का 
अंधविश्वास के गहरे अँधेरे में 
फैंक देने का 
तुम सब निकल पड़े हो 
अपने बचे-खुचे परिवारों सहित 
सांस भर जीवन
और आँख भर सपनों को तलाशते 
अपने सिरों और कांधों पर 
बच्चों भर भविष्य  
और आशा-भर पोटलियाँ लिए 
सफ़र-भर शंकाएं और सागर-भर डर के साथ
अतीत-वसंत और वर्तमान-पतझड़ की 
यादों के कारवाँ को हांकते 
छाओं-भर आकाश 
और बैठने-भर ज़मीन की तलाश में. 
तुम्हारे साथ ही निलका था ऐलान कुर्दी भी 
अपने अब्बू.अम्मी और बड़े भाई के साथ 
अपने नन्हे पांव से फलांगता 
सीरिया और तुर्की की कंटीली सीमाएं 
तीन वर्षीय ऐलान कुर्दी 
जो बीच सागर में डूब कर मर गया 
अपनी अम्मी और बड़े भाई के साथ 
लाखों अनाम शरणार्थियों के साथ 
मानवता के चेहरे पर एक नासूर बनकर 
जिसका ओंधे मुंह पड़ा मृत शरीर  
और नन्हे जूतों के घिसे तलवे 
अल्हड लहरों और रेतीले साहिल पर 
हम सब के ख़िलाफ़ दर्ज कर गये  
एहतिजाज का एक मुखर पोस्टर.

4- मैं उस स्वर्ग में रहता हूँ

मैं उस स्वर्ग में रहता हूँ
जहां मशकूक होना ही होता है
मर जाना
जहां घरों से निकलना ही होता है
ग़ायब हो जाना
जहां हर ऊँचा होता सिर
महाराजा के आदेश पर
काट लिया जाता है
              *
मैं उस स्वर्ग में रहता हूँ
जहां की उपजाव मिटटी में 
अब केसर की घुन्डियाँ नहीं 
बारूदी सुरंगे बोई जाती हैं
जहां के बर्फ़ीले पहाड़
लहू-रंग विलाप में बदल जाते हैं
जहां के पहाड़ी झरनों में
लोगों के आंसुओं का बहाव है
जहां सिमटते जा रहे हैं खेत
फ़ैलती जा रही हैं छावनियां 
जहां देखते ही देखते 
सड़कें हो जाती हैं रक्तिम-लाल 
और मिर्ची-गैस की शलिंग से
आँखें हो जाती हैं सुर्ख़-अंधी
              *
मैं उस स्वर्ग में रहता हूँ
जहां झूठ की आँखों में आँखें डालना ही
होता हैं अपनी आँखें निकलवाना
सिर उठा के चलना ही
होता है अपना सिर कटवा लेना
और सच के हक़ में बोलना ही 
होता है 
सदैव के लिए बेज़ुबान हो जाना 
               *
मैं उस स्वर्ग में रहता हूँ
जहां घर से निकलते समय माएँ
अपने बच्चों के गले में 
परिचय-पत्र डालना कभी नहीं भूलती
भले ही वह भूल जाए 
टिफन या कतबों के बस्ते 
अपने नन्हों के परिचय की ख़ातिर नहीं
बल्कि 
उनका शव घर के ही पत्ते पर पहुंचे
इस की ही चिंता रहती है उन्हें
               *
मैं उस स्वर्ग में रहता हूँ
जिसकी सीमाओं की फ़ज़ाओं पर
वर्षों से मण्डलाते रहते हैं 
चील,कोए और गिद्ध
और जहां मानव कंकाल का 
लगा हुआ है अंतहीन-पर्व
               *
मैं उस स्वर्ग में रहता हूँ
जहां महाराजा की शर्तों पर जीवन
और अपनी शर्तों पर
केवल मौत चुनी जासती है
जहां के बाज़ारों में 
होती है ख़ौफ़ की चहल-पहल 
और लोग लेप लेते हैं चेहरों पर
झूठी मुस्कुराहटों के फीके रंग
               *
मैं उस स्वर्ग में रहता हूँ
जहां के जनगणना-दफ़्तरों में
आधी-माओं और आधी-विदवाओं की 
बढ़ती जा रही हैं सूचियाँ
जितनी बढ़ती जा रही है
ग़ायब किये गए लोगों की संख्या
               *
मैं उस स्वर्ग में रहता हूँ
जहां चेहरों पर खिलता है सोग
पांवों में पड़ती हैं ज़ंजीरें
दिलों में धड़कतीं हैं दहशतें
आँखों में अटकते(मरते) हैं सपने
और 
उँगलियों पर उगती हैं हैरतें
               *
मैं उस स्वर्ग में रहता हूँ
जहां बच्चा होना होता है सहम जाना
जवान होना होता है मर जाना
औरत होना होता है लुट जाना
और बूढ़ा होना होता है
अपनी ही सन्तान का 
क़ब्रिस्तान हो जाना
              *
मैं उस नर्क में रहता हूँ
जो शताब्दियों से भोग रहा है
स्वर्ग होने का एक 
कड़ुआ और झूठ आरोप।

5- दमख़ोर कानून की आड़ में
    (
इरोम शर्मिला के नाम)
                  
ओ मेरे देश की लौह स्त्री 
हम सब जानते हैं 
जानते हैं जब चीते और चील करने लगते हैं सांठ-गांठ
होती है तब किसी देह की ही चीर फाड़ 
जब संविधान के हाशिये पर होने लगती है दलाली
जब कोई ज़ालिम,साधू या मौलवी 
तानाशाह का रूप करने लगता है धारण
आरम्भ हो जाता है मृत्यु का तांडव
चौराहों पर लग ही जाता है नफ़रत का पर्व
हम जानते हैं इरोम शर्मिला
जब धर्म और राजनीति में होने लगती है यारी
इतिहास के पन्नों पर
बिखर ही जातीं हैं लाल तरल की छींटें
आँखों में उमड़ ही आती हैं दुखों की बूंदें 
कुछ लोग अपने घरों,रिश्तों और जड़ों को समेटे
निकल ही जाते हैं अपनी मातृभूमि को छोड़ कर
फ़ज़ाओं पर फैल ही जाता है
टियर-गैस या मर्चि-गैस का ज़हरीला धुँआ
जनसंख्या होने लगती है कम
और सैनिकों की बढ़ने लगती है तादाद
अफ्स्पा१की आदमख़ोर आड़ में 
आरंभ हो जाता है फ़र्जी झड़पों का मृत्यु-काल
कहीं सजने लगते हैं निर्दोषों के कब्रिस्तान
तो कहीं मज़लूमों की असंख्य चिताएं
चाहे वे तुर्की और इराक़ के कुरूद क्षेत्र हों 
या हों अफ़्रीका के एलबिनोज़ बाशिंदे 
जकारताई या पाकिस्तानी अल्पसंख्यक हों
या हों फ़लस्तीन के आम लोग
वे बर्मा के मुसलमान हों
या हों इस्लामी देशों की औरतें
वह कश्मीर की बर्फ़ीली घाटी हो 
या हो पूर्वोत्तर राज्यों के आदिवासी गांव
वह कुन्नि-पोषपोरा२ की सहमी औरतें हों 
या हों मणिपुर की मसली गईं महिलाएं
या हो  इरोम शर्मिला तुम्हारा
अपनाक्रन्तिकारी निड़र मन 
उनहोंने अपने साम्राज्य को
लोकतन्त्र का मन भावन पोशाक पहना दिया
और दुनिया भर में ढंढोरा पीटने लगे
अपने साम्राज्य की महानता का
कितने मुर्ख हैं वे इरोम शर्मिला
जो अपनी आँखों पर कट्टरवाद की पट्टियां बांधें
पूरी दुनिया को अँधा समझने लगे हैं
उनहोंने अपने तन्त्र को ढाल दिया
जनरल डायर के ही सांचे में
वे हमारे देश को ही बदलने लगे हैं
एक विशाल जलियांवाला बाग़ में
आम लोगों को नाममात्र जिन्दा रखकर
वही साम्राज्यवाद की मक्कार-मानसिकता
और वही क्रूर इरादें
वही इंसानी ख़ून के प्यासे क़ानून 
और वही हिटलर मसालोनी का फ़ौजी नशा
लेकिन इरोम शर्मिला हम सब जानते हैं
कि आम लोग मिटटी से जुड़े होते हैं
जुड़े होते हैं साहस से और संघर्ष से
जुड़े होते हैं क्रांति से और प्रतिरोध से
उनकी पृवृति में होते हैं लौह-मनुष्य बनने के सारे गुण
उनकी सांसों में होती है विद्रोह की सारी महक
उनकी पलकों में बस्ते हैं शांति के सपने
जिसका सुंदर उदाहरण स्वयं तुम हो इरोम शर्मिला
जिसने लोगों के जीवन के पूरे अधिकार-प्राप्ति की ख़ातिर
अपने लिए नाममात्र जीवन चुन लिया
तुम्हारी “अमन की खुशबू 
फैल जायेगी 
सारी दुनिया में”३
पराजित हो जाएंगे चीते और चील
इनका यह आदमख़ोर क़ानून 
बह जायेगा किसी गटर के रास्ते से
हम सब दुनिया के शांतिप्रिय लोग 
नमन करते हैं तुम्हें इरोम शर्मिला 
और नमन करते हैं तुम्हारे ऐहतिजज को भी।
—————————————————-
१- अफ्सपा-(आर्म्ड फोर्सिज़ स्पेशल पावर एक्ट)-सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून 1958 में संसद द्वारा पारित किया गया था और तब से यह कानून के रूप में काम कर रहा है. आरंभ में अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा में भी यह कानून लागू किया गया।जम्‍मू-कश्‍मीर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफ्सपा) 1990 में लागू किया गया।  इस क़ानून के तहत संदेह के आधार पर जबरन किसी घर या व्यक्ति की तलाशी और किसी भी व्यक्ति को गोली मारने का अधिकार प्राप्‍त है और कोई भी निर्दोष मरे तो फ़ौजियों को कोई जवाबदेही नहीं।इस आदमख़ोर क़ानून के चलते कश्मीर घाटी और उत्तर पूर्वी राज्यों में फ़ौज द्वारा फ़र्जी झड़पों की आड़ में लाखों निर्दोष लोगों की हत्याएँ की गईं।इरोम शर्मिला पिछले लगभग 16 वर्षों से इस क़ानून के ख़िलाफ़ भूख हड़ताल पर हैं।

२-कुन्नि पोशपोरा- कश्मीर घाटी के कपवारा ज़िले के दो जुड़वाँ गांव जहां 23 और 24 फ़रवरी 1991 की मध्य-रात्र को 68 ब्रिगेड से संबंधित 4-राजपुताना राइफल्स की एक टुकड़ी द्वारा लगभग एक सौ कश्मीरी लड़कियों/औरतों के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया।इनमें 80 साल की एक बूढ़ी औरत और 7 वर्ष की एक छोटी बच्ची भी थी। ३-“——–” इरोम शर्मिला की एक कविता की चन्द पंक्तियाँ।

निदा नवाज़

संपर्क :- निदा नवाज़ ,निकट टेलीफ़ोन एक्सचेंज ,एक्सचेंज कोलोनी ,पुलवामा – 192301 
फोन :- 09797831595 
e.mail :- nidanawazbhat@gmail.com
nidanawaz27@yahoo.com

भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा और अनुवाद- डॉ. अनवर अहमद सिद्दीक़ी

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भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा और अनुवाद

डॉ. अनवर अहमद सिद्दीक़ी

        भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में आज अनुवाद केवल एकल इकाई के रूप में सीमित न होकर एक विस्तृत पटल के रूप में स्थापित हो गया है. अनुवाद के इतिहास पर यदि दृष्टिपात किया जाए तो ज्ञात होगा कि प्रारंभिक दौर में भी भारतीय परिप्रेक्ष्य में अनुवाद की स्थिति को काफ़ी संतोषजनक न रही. लेकिन मुगलकालीन दौर में दाराशिकोह के द्वारा 52 उपनिषदों का अनुवाद “सीर-ए” अकबर में किए जाने का उल्लेख देखने को मिलता है. दाराशिकोह के अनुवाद कर्म को इस्लाम और वेदांत के एकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान माना जा सकता है। दाराशिकोह ने सर्वप्रथम संस्कृत का अध्ययन किया तत्पश्चात उपनिषद, गीता और योग वशिष्ठ का फ़ारसी भाषा में अनुवाद किया. यह भी उल्लेखनीय है कि इस महती कार्य हेतु बनारस के पंडितों की सहायता ली गई।

        प्राचीन समय में विस्तृत पैमाने पर पवित्र बाइबल  के अनुवाद किए गए. जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. बावजूद इसके अनुवाद कर्म को मुख्य धारा से पृथक दोयम दर्जे का माना जाता रहा है. ठीक उसी तरह अनुवादक की स्थिति भी आरंभिक दौर में उतनी सुदृढ़ दिखाई नहीं देती बल्कि अनुवाद के इतिहास पर गौर करने पर यह दिखाई देगा कि अनुवादक को एक सज़ा-ए-आफ़ता के रूप में अपनी भूमिका एवं दायित्वों का निर्वहन करना पड़ता था. कालांतर अनुवाद की स्थिति में शनै-शनै सुधार होता गया और आज ‘पश्चिम में अनुवाद अध्ययन का क्षेत्र बहुत विस्तृत हो चुका है. वहाँ अब यह एक स्वतंत्र अनुशासन है.’  लेकिन आज अनुवाद न केवल भारतीय परिप्रेक्ष्य में ही स्थापित हो पाया है बल्कि अनुवाद ने आज वैश्विक परिदृश्य में अपनी महती भूमिका और उपस्थिति को दर्ज करने में उल्लेखनीय सफलता अर्जित की है.

             वर्तमान दौर में अनुवाद विधा सृजनात्मक साहित्य के क्षेत्र के साथ-साथ ज्ञान-साहित्य के क्षेत्र में भी प्रमुख उपकरण के रूप में स्थापित हो गई है. आज ज्ञान-विज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में अनुवाद की उपयोगिता और महत्ता बढ़ती जा रही है. विभिन्न ज्ञानानुशासनों के भीतर अनुवाद ने अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज की है. विभिन्न विश्वविद्यालयों में अंतरानुशासनिक अध्ययन के माध्यम से अध्ययन, अध्यापन और नित नए-नए विषयों पर शोध हो रहे हैं. ऐसी स्थिति में आज अनुवाद अंतरानुशासनिक अध्ययन के अंतर्गत विभिन्न विषयों को आपस में जोड़ने के लिए एक मुख्य सेतु की भूमिका को अदा कर रहा है. आज भारतीय भाषाओं में रचित प्रतिनिधि साहित्यिक कृतियों का तेज़ी के साथ अनुवाद हो रहा है. ऐसा कहना अन्योक्ति न होगी कि न केवल साहित्य के क्षेत्र में अनुवाद का हस्तक्षेप है बल्कि आज विदेशी भाषाओं में रचित साहित्यिक कृतियों का अनुवाद कार्य भी धड़ल्ले हो रहा है. इतना ही नहीं अनुसंधान के क्षेत्र में भी अनुवाद की विशिष्ट भूमिका दृष्टिगत हो रही हैं. नित नए अनुसंधान चाहे वे किसी भी भाषा के माध्यम से होते जा रहे हैं उनके तत्काल अनुवाद की व्यवस्था हिंदी भाषा के माध्यम से हिंदी पाठकों, अध्येताओं को, शोधार्थियों को, जिज्ञासुओं आदि को सहज रूप से उपलब्ध हो रही हैं.

     हर्ष का विषय है कि आज संसार की श्रेष्ठ प्रतिनिधि कृतियों का हिंदी में अनुवाद सहज उपलब्ध है. साहित्य की विभिन्न विधाओं के माध्यम से जो भी चर्चित-बहुचर्चित या पुरस्कृत कृति बाज़ार में उपलब्ध हो जाती है. ठीक उसी समय उस कृति-विशेष का अनुवाद सहज संभाव्य होता जाने लगता है. ‘मौलिक श्रेष्ठ साहित्य के निर्माण से हिंदी अनुवाद की भाषा से अनुवादनीय भाषा बन जाएगी. भावनात्मक साहित्य के क्षेत्र में हिंदी एक सीमा तक अनुवादनीय भाषा मानी गई क्योंकि उसमें रामचरित्रमानस या गोदान जैसी महान रचनाओं का निर्माण हुआ.’ 2 अभी हाल ही में चर्चित व प्रसिद्ध कथाकार चित्रा मुद्गल के  ‘पोस्ट बॉक्स नं- 203 नाला सोपारा’  नामक हिंदी उपन्यास को साहित्य अकादमी पुरस्कार-2018 से सम्मानित किया गया. जिसका मराठी अनुवाद प्रो. वसुधा सहस्त्रबुद्धे, मुंबई द्वारा किया गया. ‘पोस्ट बॉक्स नं- 203 नाला सोपारा’  उपन्यास के मराठी अनुवाद का लोकार्पण प्रसिद्ध कथाकार चित्रा मुद्गल के हस्ते दिनांक 25 फरवरी, 2019 वर्धा के महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के अनुवाद अध्ययन विभाग के सभागार में सम्पन्न हुआ. कहने का तात्पर्य भूमंडलीकरण के इस दौर में जहाँ वैश्विक भाषा के रूप में हिंदी स्थापित हो गई है ठीक उसके बरक्स एक बेहतर विकल्प के रूप में हिंदी अनुवाद भी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में स्वयं को स्थापित करने हेतु अग्रसर है.

     मशीनी-अनुवाद के क्षेत्र में भी आशातीत प्रगति परिलक्षित हो रही है. मशीन-साधित अनुवाद के रूप में अनुवाद की भूमिका को आज किसी रूप में कमतर आका नहीं जा सकता है. हालांकि मशीन-साधित अनुवाद की अपनी तकनीकी सीमाएँ हैं. जबकि मानव-साधित अनुवाद ‘लक्षणा और व्यंजनायुक्त साहित्यिक कृतियों के अनुवाद के लिए मानव अनुवाद ही श्रेष्ठ है.  बावजूद इसके मशीन-साधित अनुवाद का प्रयोग काफ़ी क्षेत्रों में दिखाई देने लगा है. ‘मशीनी अनुवाद कंप्यूटर के द्वारा होता है. कंप्यूटरों में निरंतर सुधार होने से मशीन अनुवाद की तकनीक में भो सुधार हो रहा है, तथा अधिकाधिक कार्य कंप्यूटर द्वारा किए जा रहे हैं.’  इस तथ्य का प्रमाण ऑनलाइन उपलब्ध अनुवाद उपकरण जैसे गूगल ट्रांसलेशन, सिस्टरोन प्रोग्राम, मंत्रा प्रोग्राम आदि के माध्यम से प्रचूर मात्रा में दिखाई देता है. मशीन-साधित अनुवाद के लिए विभिन्न प्रकार के साफ्टवेयर आज बाज़ार में बड़े पैमाने पर उपलब्ध हो रहे हैं. अतः तकनीकी और प्रौद्यौगिकी के क्षेत्र में अनुवाद की प्रगति सराहनीय है.

      इसके अतिरिक्त गूगल ट्रांसलेशन व गूगल लिप्यंतरण की विधि का अनुसरण भी मशीन-साधित अनुवाद का मुख्य टूल बनता जा रहा है. आज वैश्विक स्तर पर हो रही आपसी प्रतिस्पर्धा के चलते प्रत्येक राष्ट्र स्वयं को परमाणु शक्ति संपन्न घोषित करने की होड़ में हैं. ऐसी स्थिति में रक्षा-सौदे आदि के क्षेत्र में नई शब्दावलियाँ इजाद हो रही है. इन विविध शब्द-संपदा को प्रत्येक राष्ट्र स्वयं के हित व स्वार्थ को साधने के लिए अपनी भाषा में परमाणु क्षेत्र में प्रयुक्त शब्दों को सर्वप्रथम लाना चाहता है. युद्ध से निपटने की कुशल नीति, परस्पर दो राष्ट्रों के मध्य तनाव के समय डिप्लोमेसी अर्थात कूटनीति में पारंगत होने और युद्ध विराम या आपस में संधि प्रस्थापित करने के लिए अनुवाद नामक तंत्र की ही एकमेव सहायता ली जा सकती है. अतः अनुवाद से बेहतर कोई अन्यत्र हथियार उसके पास फ़िलहाल मौजूद नहीं है.

      आज प्रत्येक राष्ट्र नाना प्रकार के परमाणु व रासायनिक शस्त्रों की वह निरंतर खरीद-फ़रोख्त करने में संलिप्त हो रहा है. और अनुवाद के माध्यम से वह इन शस्त्रों की प्रणाली, विधि, प्रयोग, उपयोग आदि की पारिभाषिक शब्दावली को स्वभाषा में अनूदित पारिभाषिक शब्दावली के माध्यम से जानने हेतु आतुर है, जिससे कि वह अन्य आश्रित राष्ट्रों के मध्य आसानी से अपना व्यापार कर सके. केवल इतना ही नहीं दो देशों के मध्य युद्ध से निपटने की कुशल नीति, परस्पर दो राष्ट्रों के मध्य तनाव के समय डिप्लोमेसी अर्थात कूटनीति में पारंगत होने और युद्ध विराम या आपस में संधि प्रस्थापित करने के लिए अनुवाद नामक तंत्र की ही एकमेव सहायता ली जा सकती है. ‘आज व्यावसायिक प्रतियोगिता का दौर है और इस व्यावसायिक प्रतियोगिता में कोई भी देश पिछड़ना नहीं चाहता है, वह प्रतियोगिता में बना रहकर शीर्ष पर रहने की आशा व्यक्त करता है. शीर्ष पर रहने में उसे अनुवाद का सहारा लेना ही होगा. बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपने समझौतों के तहत अनुवादों पर विश्वास करते हुए संधियाँ कर रही हैं.’  अतः अनुवाद से बेहतर कोई अन्यत्र हथियार उसके पास उपयुक्त विकल्प के रूप में फ़िलहाल मौजूद नहीं है. परस्पर दो भाषाओँ, बोलियों, संस्कृतियों, रीति-रिवाजों, खान-पान, परिवेश आदि के प्रति अनभिज्ञता व अज्ञानता को दूर करने में अनुवाद नामक माध्यम के द्वारा जानने व समझने का अवसर प्राप्त होता है, ऐसे समय निश्चय ही अनुवाद की अधिक उपयोगिता और आवश्यकता अनुभूत होती है.

      इतना ही नहीं वैश्विक स्तर पर अनेक प्रकार के भयावह स्थितियों, गंभीर संकटों, संक्रामक बीमारियों, प्राकृतिक आपदाओं, विविध प्रदूषणों आदि को ध्यान में रखते हुए उनकी रोक-थाम के लिए उचित समाधान प्रस्तुत किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन यह निराकरण केवल विकसित राष्ट्रों तक उन्हीं की अपनी भाषाओं में निहित हैं. जिसकी वजह से अर्ध-विकसित, अल्प-विकसित व अविकसित राष्ट्र ऐसी उपलब्ध ज्ञान-संपदा से सर्वथा वंचित हैं. अतः उन राष्ट्रों द्वारा इस ज्ञान-संपदा को अपनी भाषा में अनुवाद के माध्यम से लाने का पुरजोर प्रयास किया जा रहा है. ताकि भावी संकट का यथोचित व योग्यरूपेण निराकरण किया जा सके. भूमंडलीकरण के इस दौर में जहाँ एक और हिंदी भाषा को वैश्विक पहचान मिली है तो वहीँ दूसरी ओर हिंदी भाषा के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार भी तेज़ी से अपनी पकड़ बनाए हुए है.

      विदेशी वस्तुओं के प्रति उपभोक्ताओं के मध्य आकर्षण उत्पन्न करने के लिए लुभावने विज्ञापन भी अलग-अलग तरीके के अपनाए जा रहे हैं. होर्डिग्स, पोस्टर, साइन बोर्ड, फ़लक आदि की सहायता से प्रदर्शन किया जा रहा है. कहने का तात्पर्य है कि विज्ञापन के विविध माध्यमों ने भी ग्राहकों को लालायित करने की दिशा में कोई कसर नहीं छोड़ी है. विज्ञापन की भाषा में नित नए प्रयोग किए जा रहे हैं जिससे कि उत्पाद और विक्रय विपुल प्रमाण में कर अधिकाधिक लाभ हासिल किया जा सकें. अतः इन बहुरंगी भाषाओं के बीच मात्र हिंदी में विज्ञापनों के स्लोगनों को विविध माध्यमों के द्वारा प्रचारित व प्रसारित किया जा रहा है. जिससे कि न केवल भारतीय अधिकाधिक प्रभावित हो रहे हैं बल्कि अप्रवासी भारतीयों के मध्य भी आकर्षण उत्पन्न हो रहा है. ठंडा मतलब कोका-कोला, यह स्लोगन अब न केवल भारतीयों को आकृष्ट व लालायित कर रहा है बल्कि इस स्लोगन ने अंतरराष्ट्रीय पटल पर विदेशियों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है.

       आज हिंदी भाषा केवल साहित्य क्षेत्र के विषय की भाषा न होकर प्रत्येक क्षेत्र के विषय की भाषा बनती जा रही है. आज प्रयोजनमूलक हिंदी के माध्यम से हिंदी  प्रत्येक विषय-क्षेत्र प्रविष्ट हो गई है. आजीविका साधक हिंदी या जीविकोपार्जन हिंदी अथवा कार्यात्मक या कार्यमूलक हिंदी के रूप में कामकाजी हिंदी ने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी मज़बूत पकड़ बना ली है. ‘हिंदी को केवल साहित्य का विषय बनाकर देखना अब बंद करना होगा. साहित्य या विषय के साथ-साथ हिंदी को जन-जन से जोड़ने का आंदोलन चलाना अब बहुत ज़रूरी है.’ 6 अतः ऐसी स्थिति में प्रयोजनमूलक हिंदी की आवश्यकता दिन-प्रतिदिन अनुभूत हो रही है.

     आज हिंदी भाषा को व्यापक रूप में माध्यम के रूप में अपनाया जा रहा है लेकिन अनुवाद के संदर्भ में योग्य प्रशिक्षण के अभाव में उपयुक्त अनुवाद या गुणवत्ता की कसौटी पर खरा उतरने की गति अपेक्षाकृत न्यून है- ‘विशेषज्ञों का मत है कि अनुवाद मूलतः सिद्धांत का विषय न होकर व्यवहार का ही विषय है- और इस बारे में दो राय नहीं हो सकती. शिक्षा के क्षेत्र में हिंदी को माध्यम के रूप में स्वीकार किए जाने के बाद अंग्रेज़ी के मानक ग्रंथों के अनुवाद विपुल संख्या में प्रकाशित हो रहे हैं और इस दिशा में व्यावसायिक प्रकाशन-संस्थाएँ तथा राजकीय अभिकरण निरंतर सक्रिय है. विषयों के अंग्रेज़ी-ग्रंथों के हिंदी-अनुवाद आज उपलब्ध हैं किंतु इन सभी को साधु अनुवाद के नमूने नहीं माना जा सकता.’  अतः अनुवाद को एक ज्ञानुशासन के रूप में शिक्षा के क्षेत्र में समाविष्ट किए जाने की नितांत आवश्यकता है. महारष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा संचालित अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ इस दिशा में कार्य कर रहा है जहाँ एम. ए. एम. फिल. और पीएच. डी. अनुवाद अध्ययन और अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा जैसे पाठ्यक्रमों को सम्मिलित कर अध्ययन व अध्यापन से लेकर उच्च स्तर का शोध का कार्य हो रहा है.

          निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि आज हिंदी भाषा को विविध रूपों में देखा जा रहा है. प्रयोजनमूलक हिंदी न केवल सरकारी महकमों में प्रयुक्त हो रही है बल्कि जीवनानुभवों के प्रत्येक क्षेत्र में भाषा के प्रयोजनमूलक पक्ष अर्थात कार्यात्मक पक्ष को सर्वथा अनुभूत किया जा रहा है इसके लिए पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण भी किया जा रहा है- ’भाषा के प्रयोजनमूलक रूपों में प्रयुक्त क्षेत्रगत विशिष्ट पारिभाषिक शब्दावली की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. अतः प्रयोजनमूलक भाषा के विशिष्ट पारिभाषिक शब्दों का ज्ञान संबंधित क्षेत्र की भाषा के अनुवाद के लिए आवश्यक है. पारिभाषिक शब्दावली के अभाव में अनुवाद निरस्त्र महसूस करेगा.’  निश्चय ही उक्त ज्ञान के बिना अनुवाद की उपयोगिता कारगर सिद्ध न होगी भूमंडलीकरण के इस युग में भाषिक दृष्टि से अभूतपूर्व बदलाव दृष्टिगोचर हो रहे हैं. जो विश्व साहित्य की दृष्टि से हितकारी है जिससे न केवल साहित्य प्रभावित हुआ है अपितु संस्कृति और कला भी लाभान्वित हुए हैं-‘कहना न होगा कि इधर अनुवाद के क्षेत्र में भाषिक अंतरावलंबन बढ़ा है, जो विश्व साहित्य के हित में भी है. इसलिए अनुवाद के महत्व को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्रों में अपूर्व वैश्विक विकास हुआ है. इससे हिंदी का भूमंडलीकरण भी प्रमाणित हुआ है, इसमें संदेह नहीं.’  इससे यह सिद्ध होता है कि हिंदी का अनुवाद के साथ सम्मिलन हो जाने के कारण हिंदी भाषा का आधुनिकीकरण हुआ है ऐसा कहना अतिश्योक्ति न होगी. उक्त तथ्य की पुष्टि इस कथन से प्रमाणित होती है-‘हिंदी भाषा का आधुनिकीकरण हुआ है और हो रहा है और इस आधुनिकीकरण में ‘अनुवाद’ की भूमिका प्रधान रही है.  संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि हिंदी के इस आधुनिकीकरण के फलस्वरूप वैश्विक धरातल पर अनुवाद की महत्ता और भूमिका को अधिकाधिक प्रमाण में बल मिला है अतः यह कहना समीचीन होगा कि भूमंडलीकरण के इस युग में हिंदी भाषा के साथ-साथ अनुवाद के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता है.

मराठी भाषा दिवस के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित…

संदर्भ :

1.         अनुवाद और रचना का उत्तर-जीवन, डॉ. रमण सिन्हा वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, पृ. 27               

2.         विश्व भाषा हिंदी की अस्मिता : स्वप्न और यथार्थ, प्रो. जी. गोपीनाथन, पृ. 54, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा का प्रकाशन

3.         अनुवाद का समकाल, कैप्टन डॉ. मोहसिन ख़ान, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 173

4.         कंप्यूटर के भाषिक अनुप्रयोग, विजय कुमार मल्होत्रा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.117

5.         अनुवाद सिद्धांत की रूपरेखा, डॉ. सुरेश कुमार, विद्यानिधि, दिल्ली, पृ. 74

6.         अनुवाद के विविध आयाम, डॉ. पूरनचंद टण्डन, हरीश कुमार सेठी, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 317

7.         भाषा (भारतीय भाषाओँ एवं साहित्य की पत्रिका), मार्च-अप्रैल,2001, पृ.197

8.         शैली विज्ञान और अनुवाद, डॉ. राम गोपाल सिंह, शांति प्रकाशन, दिल्ली, पृ.90

9.         अनुवाद अंक-116 भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्ली, पृ.

10.       अनुवाद क्या है, सं. डॉ. राजमल बोरा,वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 68  

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डॉ. अनवर अहमद सिद्दीक़ी, प्रभारी- अनुवाद अध्ययन विभाग, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा- 442 001

हिंदी में स्त्री विमर्श और अनूदित उपन्यास-आकांक्षा मोहन

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हिंदी में स्त्री विमर्श और अनूदित उपन्यास

 भारतीय भाषाओं से हिंदी में अनूदित महिला रचनाकारों के उपन्यासों की चर्चा

आकांक्षा मोहन

सारांश

विमर्श व स्त्री-विमर्श की अवधारणा को समझते हुए प्रस्तुत शोध आलेख हिंदी में स्त्री-विमर्श  के स्वरूप को उद्घाटित करता है तथा हिंदी में स्त्री विमर्श के विकास में अनुवाद की भूमिका को विश्लेषित करता है। हिंदी के मूल रचनाकार  जैसे नासिरा शर्मा, कृष्‍णा सोबती, चित्रा मुद्गल, मैत्रेयी पुष्‍पा, मृदुला गर्ग, अनामिका, सूर्यबाला आदि की रचनाओं से हिंदी में स्त्री-विमर्श का स्वरूप स्पष्ट होता है। ये रचनाकार स्त्री को पाठ रूप में स्वीकार कर स्त्री जाति का मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, आर्थिक, एतिहासिक रूप में विश्लेषण कर स्त्री-विमर्श की विभिन्न समस्याओं पर बात कर रही है, परंतु साथ ही साथ हिंदी में इस विमर्श तथा विचारधारा को स्वरूप प्रदान करने में हिंदीतर भाषाओं से हिंदी में स्त्री पाठ विषयक अनुवादों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतीय भाषाओं से हिंदी में अनूदित उपन्यासों की चर्चा प्रस्तुत शोध आलेख में की गई है, जो हिंदी साहित्य में मूलतः नहीं है, परंतु अनुवाद के माध्यम से इन उपन्यासों में उठाई गयी समस्या हिंदी के स्त्री-विमर्श को न केवल विकसित करती है, अपितु सुदृढ़ भी करती है।

कुंजी शब्द : स्त्री-विमर्श, अनुवाद, अस्मिता, अस्तित्व।

            आज विमर्श आलोचनाशास्त्र का पारिभाषिक शब्द है। साहित्यिक विमर्श पाठ केन्द्रित होता है तथा यह पाठ हमारे आस-पास मौजूद समस्या, प्रश्न, स्थिति, विचार आदि पर आधारित होता है। वर्तमान समस्या से जुड़ना ही विमर्श है। जब कोई व्यवस्था जड़वत हो जाती है, तब विमर्श उस व्यवस्था को ध्वस्त कर नई व्यवस्था की मांग करता है। विमर्श शब्द मूलतः गहन सोच-विचार तथा चिंतन-मनन का अर्थ व्यक्त करता है। इस शब्द से हम सभी भली प्रकार परिचित हैं। विचार-विमर्श हमें अधिकतर एक युग्म में सुनने को मिलते है। इस पर अपने विचार व्यक्त करते हुए अनामिका लिखती हैं – “विमर्शों के साथ एक खास बात तो यह है कि वे हमारे साथ ही बड़े हुए। जब हम छोटे-छोटे थे – विचार और विमर्श ‘कल्याण जी – आनंद जी’ या ‘शंकर – जयकिशन’ या ‘तबला-डुग्गी’ या ‘चूल्हा-चक्की’ या ‘प्रेमचंद की कहानी’ के बड़े भाई साहब छोटे भाई साहब की तरह जहाँ प्रकट होते थे – साथ-साथ।”[1] उत्तर-आधुनिक दौर में समाज में कई वैचारिक संघर्ष पनपने लगे। हाशिए व उपेक्षित लोग अपनी अस्मिता के लिए जागरूक होने लगे, इन्हीं वैचारिक संघर्षों ने विमर्श को जन्म दिया।

            स्त्री-पुरुष समाज में दो स्वतंत्र इकाई है। इस संसार में दोनों स्वतंत्र अस्तित्व रखते है परंतु दोनों की स्वतंत्र अस्मिता नहीं है। स्त्री जाति की अस्मिता हाशिए पर है या नहीं, कहा नहीं जा सकता और इन्हीं कारणो से स्त्री विमर्श के दायरे में आई। स्त्री का जैविक रूप में पाठन व विश्लेषण तो पहले से ही मौजूद था, परंतु विमर्श द्वारा स्त्री जाति का मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, आर्थिक, एतिहासिक रूप में विश्लेषण किया जाने लगा। समाज की वह व्यवस्था, जिसमें एक मनुष्य जाति केंद्र में आ जाती है तथा दूसरी हीन भावना से ग्रसित हो जाती है। ऐसी व्यवस्था में जब बौद्धिक विचारों व आंदोलनो द्वारा हाशिए के मनुष्य अपने अस्तित्व और अस्मिता के संकट के प्रति चिंतित होते है, तब विमर्श उत्पन्न होता है। बाहरी दुनिया से संपर्क में रहने की वजह से पुरुष ने अपनी अस्मिता के संकट को पहचाना और उस संकट से लड़ना सीख लिया तथा उसने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई। वहीं स्त्री आंतरिक क्षेत्र में कार्यरत थी, जो अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण था, परंतु उसे उत्पादन की श्रेणी में नहीं रखा गया। घरेलू काम-काज में उसने अपनी पहचान जरूर बनाई, परंतु बाहरी दुनिया से वंचित रह गई। उसे बाहरी दुनिया में पहचान अपने नजदीकी पुरुष से मिलने लगी। स्त्री ने अस्मिता के खतरे उठाने के प्रयास कम ही किए, परंतु जब भी किए एक अविस्मरणीय चरित्र बनकर समाज के समक्ष खड़ी हुई, लेकिन अधिकतर स्त्री जाति की अस्मिता तब से आज तक खतरे में ही है। स्त्री-विमर्श में स्त्री अस्मिता के प्रश्न का संबंध संपूर्ण स्त्री जाति के व्यक्तित्व, अस्तित्व तथा अस्मिता से है।

            बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में स्त्री विषयक चिंतन की शुरुआत होती है। इस संदर्भ में स्त्री से जुड़े सवालों का अस्मितामूलक स्वरूप सबसे पहले विमर्श के केंद्र में आया। आधुनिक काल के आरंभ में स्त्री की पहचान की आवाज उठने लगी। स्त्री का केवल जैविक पाठ के रूप में स्वीकृति ही उसकी अस्मिता के खतरे को नहीं मिटाती, बल्कि स्त्री को एक मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, आर्थिक तथा बौद्धिक पाठ के रूप में उसका स्वीकार आवश्यक है। रचनाकारों ने स्त्री के स्वीकार को महत्वपूर्ण माना है। उसका स्वीकार विमर्श की पहली शर्त है और समस्या यहीं से शुरू हो जाती है- “स्त्रीवाद की बुनियादी चिंता हैं स्त्रीमुक्ति। स्त्रीमुक्ति के प्रयासों को समग्र सामाजिक आर्थिक, राजनीतिक रूपान्तरण में बदलना होगा। आज स्त्रीवाद एक अकादमिक विषय बन कर रह गया है। स्त्री पत्र-पत्रिकाओं के लिए सिर्फ एक विषय है। वे मुक्तिकामी एजेंडे से उसे सिर्फ पृथक करके पेश कर रहे हैं।… कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्हें स्त्री विषय के रूप में आकर्षित करती है, लेकिन सामाजिक परिवर्तन की माँग करती हुई औरतें उन्हें पसंद नहीं है।… स्त्री के लिए लिखना या स्त्री के के हक में लिखना सिर्फ लिखना नहीं है बल्कि स्त्री का बदलना, बदली हुई स्त्री को स्वीकार करना और स्त्री के प्रति स्वयं के रवैए का बदलना भी है।”[2]

            स्त्री अस्तित्व पर 1949 में फ्रेंच लेखिका सिमोन द बोउवा अपनी पुस्तक ‘द सेकेंड सेक्स’ में गंभीरतापूर्वक चिंतन करती हैं। इस पुस्तक में उन्होंने जैविक विभिन्नता के आधार पर स्त्री व पुरुष के कार्य आदि के विभाजन को तर्कसंगत नहीं माना है।। यदि प्रभा खेतान ने इस अमूल्य कृति का हिंदी में अनुवाद न किया होता तो हिंदी पाठक जगत इतनी वृहद वैचारिक क्रांति से वंचित रह जाता। अमेरिका में सन् 1965 में स्त्रियों की स्‍वाधीनता व अधिकारों को लेकर बेट्टी फ्रायडेन की ‘द फेमेनिन मिस्टिक’ नामक चर्चित पुस्‍तक प्रभावशाली रही। इस पुस्तक में इन्होने स्त्री को माँ, पत्नी, गृहिणी की भूमिका स्वीकारने के लिए बाध्य किए जाने का विरोध किया है। 1970 के दशक में केट मिलेट ‘सेक्‍सुअल पॉलिटिक्‍स’ नामक किताब की रचना हुई, जिसने समाज में हलचल मचा दी। यह किताब यौन स्वतन्त्रता के पक्ष को उजागर करती है। इसी तरह अन्‍य कई सैद्धांतिक रचनाएँ हुई, जो स्‍त्री-विमर्श की पृ‍ष्‍ठभूमि बनाने में सफल रहीं। इन पुस्तकों के अध्य्यन के फलस्वरूप स्त्रियों ने पहली बार अपने अस्तित्व और अपनी स्थिति पर गंभीरता से सोचना शुरू किया। भारतीय परिपेक्ष्य में पहली बार सन् 1911 में चिम्मन बाई गायकवाड़ ने ‘पोजीशन ऑफ वुमेन इन इंडियन लाइफ’ पुस्तक में भारतीय महिलाओं के दर्द को स्वर दिया।

            समाज में चल रहे आन्‍दोलनों से साहित्‍य कभी अछूता नहीं रहा है। उत्तर आधुनिक दौर में साहित्‍य में विभिन्‍न विमर्शों को केंद्र में रखकर लेखन-कार्य किया जा रहा है। स्‍त्री प्रश्‍न, स्‍त्री समस्‍या तथा स्‍त्री-विमर्श के विभिन्‍न पक्षों पर लेखन किया जा रहा है। हिंदी में भी आज स्‍त्री-विमर्श पर कई चिंतन साहित्‍यों की रचना हो रही है, जिसमें अनामिका की ‘स्‍त्रीत्‍व का मानचित्र’ पुस्‍तक महत्‍वपूर्ण हैं, इसमें अनामिका नारीवादी आन्‍दोलन के बुनियादी पहलुओं पर विचार करती है। इसके साथ ही इस दिशा में नासिरा शर्मा की ‘औरत के लिए औरत’, कुसुम त्रिपाठी की ‘स्‍त्री अस्मिता के सौ वर्ष’ तथा डॉ. अमरनाथ की ‘नारी मुक्ति का संघर्ष’ उल्‍लेखनीय है।

            इसके साथ ही साहित्‍य में स्‍त्री-विमर्श संबंधी उपन्‍यास, कहानी अर्थात गद्य व पद्य दोनों विधाओं में बखूबी उभर कर सामने आ रहा है। आधुनिक काल की जटिलताओं को व्‍यक्‍त करने के लिए उपन्‍यास एक सशक्‍त माध्‍यम है। स्‍त्री-समस्‍या व स्‍त्री-विमर्श भी उपन्‍यासों में अपने विभिन्‍न स्‍तरों तथा पक्षों में उभरकर आ रहा है।

            जैसा कि हम जानते हैं कि स्‍त्री विमर्श एक वैश्विक विचारधारा है। अत: यह अनेक भाषाओं  में विभिन्‍न पक्षों में अभिव्‍यक्‍त हो रही है। हिंदी के मूल उपन्‍यासकार जैसे नासिरा शर्मा, कृष्‍णा सोबती, चित्रा मुद्गल, मैत्रेयी पुष्‍पा, मृदुला गर्ग, सूर्यबाला आदि तो महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा ही रही हैं, साथ ही स्‍त्री विमर्श के विकास में हिंदी में अनूदित होने वाले स्‍त्रीवादी उपन्‍यास भी अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा रहे है, जिसमें माध्‍यम के रुप में अनुवाद इस वैश्विक विचारधारा के विकास में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। लेखक व पाठक अपने क्षेत्र में हो रहे आंदोलनों व विचारधाराओं से परिचित होने के साथ दूसरे क्षेत्र के साहित्‍य व विचारों से भी परिचित होने को इच्‍छुक होता है। ऐसी स्थिति में अनुवाद के माध्‍यम से साहित्‍य का आदान-प्रदान होता है, जिसमें अनुवाद एक सेतु का कार्य करता है।

            स्‍त्री-विमर्श के विविध पक्ष हैं, विभिन्न धर्म तथा विभिन्न समाज में स्त्रियों की मूलभूत समस्या स्त्री मुक्ति ही है, परंतु प्रत्येक समाज की स्त्रियों का शोषण अलग-अलग रूप मे हो रहा है। कामकाजी स्त्री कार्य-स्थल पर उपभोक्तावाद की शिकार हो रहीं हैं, असुरक्षा के भाव से ग्रसित है तो वहीं ग्रामीण स्त्री अशिक्षा व अंधविश्वासों के कारण समस्याओं को झेलती रही है। कहीं आर्थिक स्वावलंबन की चिंता है तो कहीं मूलभूत अधिकारों की प्राप्ति की समस्या है। अतः ये समस्याएँ विभिन्न भाषाओं के साहित्य मे विभिन्न रूपों में व्यक्त हो रही हैं। हालांकि सभी भाषाओं में लिखी जाने वाली स्‍त्री समस्‍या के उद्देश्‍य एक ही हैं, परंतु विषयवस्‍तु में अंतर है। विभिन्‍न भाषाओं से हिंदी ‘अनूदित’ उपन्‍यासों ने स्‍त्री-विमर्श के विकास में अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें स्‍त्री-विमर्श के बुनियादी पहलुओं पर विचार किया गया। इन उपन्यासों के हिंदी अनुवाद से स्त्री की विविध समाज में विभिन्न समस्याओं का पता चलता है अर्थात अनुवाद के माध्यम से हिंदी में स्त्री विमर्श के विभिन्न आयाम प्रस्तुत होते हैं।  

            अनूदित साहित्‍य द्वारा स्‍त्री-विमर्श के विभिन्‍न पक्ष हिंदी में किस प्रकार आ रहे हैं? अनुवाद के माध्यम से स्त्री-विमर्श के कौन-कौन से पक्ष उजागर हो रहे हैं? इस संदर्भ में चर्चा बहुत कम ही हुई है। स्त्री-विमर्श के सामान्यीकरण और संपूर्ण स्त्री जाति के व्यक्तित्व, अस्तित्व तथा अस्मिता के संकटों को उद्घाटित करने में अनुवाद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। क्षेत्रीय भाषाओं में उठे सवालों को अनुवाद विमर्श के महासागर में छोड़ने का प्रयत्न कर रहा है, जिसमें माध्‍यम के रुप में अनुवाद इस वैश्विक विचारधारा के विकास में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

हिंदी में अनूदित उपन्यासों में उद्धृत महत्वपूर्ण स्त्री प्रश्नो और समस्याएँ स्‍त्री-विमर्श की विचारधारा के विकास में सक्षम है, परंतु समस्या ये है कि हिंदी साहित्य चिंतन स्त्री-विमर्श के मील के पत्थर प्रभा खेतान द्वारा अनूदित ‘स्त्री उपेक्षिता’ तथा पाश्चात्य से हुए कुछ अनुवादों तक ही सीमित है। दुर्भाग्यवश यह चिंतन धारा भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं से हिंदी में अनूदित स्त्री-विमर्श पर आधारित उपन्यासों तक अपना विस्तार कम ही कर पाई है। विभिन्‍न पक्ष हिंदी में किस प्रकार आ रहे हैं? अनुवाद के माध्यम से स्त्री-विमर्श के कौन-कौन से पक्ष उजागर हो रहे हैं? स्त्री-विमर्श के विकास में अनुवाद एक पुल का कार्य कर रहा है। इसके सामान्यीकरण और संपूर्ण स्त्री जाति के व्यक्तित्व, अस्तित्व तथा अस्मिता के संकटों को उद्घाटित करने में अनुवाद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। क्षेत्रीय भाषाओं में उठे सवालों को अनुवाद हिंदी में विमर्श के महासागर में छोड़ने का प्रयत्न कर रहा है।              

आज हिंदी में अनेकों स्त्री-विमर्श केंद्रित उपन्यासों का अनुवाद उपलब्ध है। जिनमें स्त्री विमर्श के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित किया गया है। अमृता प्रीतम की पिंजर से लेकर तसलीमा नसरीन की लज्जा तक हिंदी जगत में अनुवाद के माध्यम से ही अपना सशक्त योगदान दे रही है। विभिन्न भाषा, संस्कृति तथा देश में स्त्री के अस्तित्व को अपनी लेखनी से मजबूत बनाती लेखिकाएँ  हिंदी जगत में अनुवाद के माध्यम से ही योगदान दे रही हैं। तहमीना की ब्लासफ़ेमी का विनीता गुप्ता यदि अनुवाद न करती तो एक मध्यम वर्ग की लड़की ‘हीर’ की दयनीय स्थिति और समाज के पीरों व संतों का असली चेहरा इतने बुलंद रूप में हिंदी में देखने को नहीं मिलता। अतः हिंदी विमर्श के विकास में अनुवाद की अतुलनीय भूमिका है, क्योंकि कोई भी वैचारिक क्रांति भाषा और स्थान की सीमाओं में बंधकर नहीं हो सकती।

            विभिन्न भारतीय भाषाओं से हिंदी में उपन्यासों का अनुवाद प्रकाश में आ रहा है। बांग्ला, मराठी, कन्नड आदि सभी भारतीय भाषाएँ आंदोलनों की भाषा रही है। अतः ये स्त्री-विमर्श से अछूती रही हो, ऐसा संभव नहीं है। इनमें स्त्री-विमर्श पर दर्जनो उपन्यास लिखे गए तथा वे हिंदी क्षेत्र में अनुवाद के माध्यम से आए, जिन पर हिंदी चिंतकों द्वारा विचार किया जाना अभी बाकी ही है। इस शती में विभिन्न भारतीय भाषाओं से हिंदी में अनूदित उपन्यासों में  बांग्ला से हिंदी में अनूदित मद्रकांता सेन के ‘अंधी छलांग’ उपन्यास में आधुनिक प्रेम विवाह में स्त्री की स्थिति तथा नग्न वास्तविकता का उद्घाटन है। वहीं सुचित्रा भट्टाचार्य के ‘दहन’ में वर्तमान सामाजिक संरचना में स्त्री के त्रास और अपने प्रति समाज की कुत्सित मानसिकता से लड़ती स्त्री को दर्शाया है। महाश्वेता देवी का झाँसी की रानी, स्वाहा, जली थी अग्नि शिखा; आशापूर्णा देवी का उदास मन, वे दिन ये दिन आदि इस शती में बांग्ला से हिंदी में अनूदित स्त्री विषयक अनुवादों में महत्वपूर्ण हैं। मराठी से हिंदी में अनूदित स्त्री-विमर्श संबंधित उपन्यासों में कविता महाजन के ‘ब्र’ उपन्यास का हिंदी अनुवाद ‘चूँ’ उल्लेखनीय है। ये समाज की उस बंदिश को तोड़ने की पहल है, जिसमे स्त्री-अस्मिता तो दूर उसके मुंह से चूँ तक न निकले, इसकी नियति तय की हुई थी। इसके साथ ही भारतीय स्त्री अस्मिता की पहल करने वाली मीराबाई के जीवन संघर्ष पर आधारित शुभांगी भडभड़े का ‘राजवधू’ उपन्यास भी इस दृष्टि से उल्लेखनीय है। इसी तरह असमिया स्त्रीवादी लेखिका इंदिरा गोस्वामी के कई उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद हुआ, जिनमें ‘नीलकंठी ब्रज’ उल्लेखनीय है। इसमें रूढ़ियों और बेड़ियों में छटपटाती विधवा स्त्रियों की दशा का चित्रण हैं। लेखिका स्वयं इस त्रास की भुक्त-भोगी हैं। पति से जुड़ी पहचान खो देने और विधवा होने के बाद भारतीय समाज की प्रताड़ना इतनी भयावह है कि बृज में रहने वाली इन राधेश्याम स्त्रियों की हँसी भी भयावह है। ये उपन्यास स्त्री-अस्मिता को खंडित करते धर्म, परंपरा और समाज के मानदंडो के विरोध में आवाज उठाता है। जहाँ ये असामिया उपन्यास स्त्री के विधवा होने के पश्चात भी उस पर समाज के विवाह-संस्था की तगड़ी जकड़ को प्रदर्शित करता है, वहीं सारा अबूबकर द्वारा रचित ‘चंद्रगिरि के किनारे’ उपन्यास में चरमराई हुई विवाह संस्था का रूप दिखता है। यहाँ लेखिका निकाह व्यवस्था की  कुरूपता से पाठक वर्ग को सचेत करती है, यहाँ स्त्री शौहर के दिल और घर की मालकिन बनकर भी खुश थी परंतु उसे यह भी नहीं मिला। यहाँ भारतीय परिवार में पुरुष द्वारा स्त्री के शोषण की चली आ रही परंपरा को दर्शाया गया है। माँ को थप्पड़ पड़ते देख बेटी अपने आप ही पुरुष जाति से सहम जाती है, पिता गलत हो या सही उसका निर्णय ही सर्वोपरि होता है। उपन्यास में उद्धृत यह स्थिति आज भी प्रासंगिक है। इस उपन्यास में स्त्री समाज की प्रताड़नाओं से मुक्ति के लिए अपने अस्तित्व को ही मिटा देती है। इन लेखिकाओं ने अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में  दर्जनों उपन्यास लिखे है, जिनके अनुवाद भी हिंदी हुए हैं परंतु अध्ययन की सीमितता और स्त्रोत के अभाव में यहाँ इस शती के महत्वपूर्ण उपन्यासों की चर्चा हो पाई, जिससे अध्ययन की अन्य संभावनाएँ अवश्य ही उत्पन्न होती है।

            निष्कर्षतः इन उपन्यासों के हिंदी अनुवादों के माध्यम से भारतीय भाषाओं में उठे स्त्री-विमर्श के महत्वपूर्ण प्रश्न हिंदी में स्त्री-विमर्श के विकास में सहायक हो पा रहें हैं। विवाह संस्था का विघटन, प्रेम विवाह की वास्तविकता, समाज की अनेक बेड़ियों के बावजूद अपनी अस्मिता के खतरे उठाती स्त्रियाँ इन उपन्यासों में सशक्त रूप में दिखतीं हैं। इन उपन्यासों में स्त्रियाँ समाज के साथ साथ स्वयं की कुंठा और हीन भावना से भी लड़ती और जूझती नजर आती हैं, महाश्वेता देवी की ‘स्वाहा’ इसका सशक्त प्रमाण है। आधुनिक शिक्षा का स्वरूप स्त्री-अस्मिता को बुलंद कर रहा है या उसकी अभी तक की अर्जित अस्मिता को खंडित कर रहा है, इस प्रकार के प्रश्न भी अनूदित उपन्यासों के माध्यम से स्त्री-विमर्श में जुड़े हैं। अंतः यहाँ अनुवाद एक सेतु के रुप में कार्य कर रहा है तथा स्त्री-विमर्श में अन्य भारतीय भाषाओं से हिंदी के बीच अनुवाद रूपी सेतु बनाने वाले अनुवादक भी सराहनीय हैं।   

आकांक्षा मोहन

पी.एच.डी शोधार्थी

अनुवाद अध्ययन विभाग

अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ

महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,

वर्धा-442001,  महाराष्ट्र  (भारत)

            संदर्भ ग्रंथ सूची

  •   अनामिका. (2012). स्त्री विमर्श का लोकपक्ष. दिल्ली : वाणी प्रकाशन.
  • अय्यर, विश्वनाथ ए. ई. ( 2011). अनुवाद भाषाएँ- समस्याएँ. दिल्ली: ज्ञान गंगा प्रकाशन.
  • अमरनाथ. (2015). हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली. दिल्ली: राजकमल प्रकाशन.
  • कालिया, ममता .(2015). स्त्री विमर्श का यथार्थ.  दिल्ली: किताबवाले प्रकाशन.
  • कुमारी, सरोज. कालिया, योजना .(2017). स्त्री लेखन का दूसरा परिदृश्य. दिल्ली: भावना प्रकाशन.
  •  खेतान, प्रभा. (1981). स्‍त्री उपेक्षिता(हिंदी अनुवाद). दिल्ली: वाणी प्रकाशन.
  • दुर्रानी, तहमीना .(2004). कुफ़्र (अनु.). दिल्ली: वाणी प्रकाशन.
  • वर्मा, विमलेश कांति. (2009). भाषा, साहित्‍य और संस्‍कृति. हैदराबाद : ओरियंट ब्‍लैकस्‍वॉन प्राईवेट लिमिटेड.
  • सिंह, पुष्पपाल. (2016). 21वीं शती का हिंदी उपन्यास. दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन.
  • सिंह, सुधा .(2008). ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ. दिल्ली : ग्रंथ शिल्पी प्रकाशन.
  • सेतिया, सुभाष .(2008). स्‍त्री अस्मिता के प्रश्‍न. दिल्ली: कल्‍याणी शिक्षा परिषद.
  • ई-साधन :    
  • Links :
  • https://www.sahityakunj.net/LEKHAK/V/VirendraSinghYadav/stri_chintan_parmpara_Alekh.htm
  • http://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/150017
  • http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/150017/10/10_chapter%206.pd
  • http://www.jstor.org/stable/pdf/23348082.pdf?refreqid=excelsior%3Ae298ea82b72c4
  • file:///C:/Users/user/Downloads/FEMINISM%20AND%20MODERN%20INDIAN%20
  • http://www.jansatta.com/politics/indian-woman-exchanged-mirror/74962/
  • TRANSLATING FEMINISM.pdf

[1]अनामिका, स्त्री विमर्श का लोकपक्ष. पृष्ठ 21

[2]सिंह सुधा, ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ प्रश्न पृष्ठ 21

संघर्ष की दास्तान वाया थर्ड जेन्डर-डॉ. आलोक कुमार सिंह

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संघर्ष की दास्तान वाया थर्ड जेन्डर

सार

समाज का अंग होकर भी अपने अधिकारों से वंचित और अपनी अस्मिता के लिए संघर्षत किन्नर समाज आज भी प्रमुखता से चर्चा के केंद्र में नहीं है। इन्हें ‘तीसरी दुनिया’ ‘थर्ड जेंडर’ या ‘हिजड़े’ इत्यादि कई रूप में समाज जानता और पहचानता है। यह वर्ग पुरातनकाल से उपेक्षित रहा है। तब से अब तक इनके संघर्ष का कोई अंत नहीं रहा है। बात की जाए तो उसे समाज का दर्पण कहा जाता है जैसा समाज में घटता है साहित्य उसकी अभिव्यक्ति विभिन्न स्वरों में करने की क्षमता रखता है। लेकिन इस तीसरी सत्ता की बात आते ही साहित्य में भी मौन व्याप्त दिखाई देता है। अधिकारों और कर्तव्यों की लड़ाई की बात तो दूर है, उनकी मूलभूत आवश्यकताओं पर भी कम ही लिखा गया है। इधर कुछ समय से इस क्षेत्र में काफी काम हुआ है। साहित्य में इसकी आमद सुनी जा सकती है। कुछेक साहित्यकार हैं जिन्होंने बेबाकी से इस समाज के यथार्थ को हमारे सामने लाने का प्रयास किया है।

बीज शब्द: समाज, किन्नर, थर्ड जेंडर, विमर्श, साहित्य, अस्मिता, संघर्ष, कहानी, उपन्यास

विस्तार 

            समाज के दो वर्गो में बंटे होने की परिकल्पना बहुत पुरानी है। यहाँ जन्म से ही वर्ग निर्धारण हो जाता है। यशपाल नें अपने उपन्यास ‘दिव्या’ में यह गंभीर प्रश्न उठाया था कि- ‘जन्म का अपराध..? यदि यह अपराध है तो इसका मार्जन किस प्रकार संभव है ? शस्त्र की शक्ति, धन की शक्ति, विद्या की शक्ति, कोई शक्ति जन्म को परिवर्तित नहीं कर सकती! कोई भी उपाय जन्म के अपराध का मार्जन नहीं कर सकता! जन्म के अपराध का प्रतिकार क्या मनुष्य दैव से ले?1 यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर मिलना सम्भव नहीं है। प्रथमदृष्टया तो यह दर्द निम्न वर्ण में जन्में पृथुसेन का है जो वर्ण व्यवस्था का शिकार होता है किन्तु यह जन्म की विडंबना तो हर उस व्यक्ति को झकझोरती है जो मुख्यधारा से इतर है। इसी धारा में वह वर्ग भी है जिसे समाज ‘तीसरी दुनिया’ ‘थर्ड जेंडर’ या ‘हिजड़े’ के रूप में जानता और पहचानता है। यह वर्ग पुरातनकाल से उपेक्षित रहा है। तब से अब तक इनके संघर्ष का कोई अंत नहीं रहा है।

            इनके संघर्ष और समस्याओं के बारे में सुधीश पचैरी ने कहते है कि यह ‘असामान्य लिंगी होने के साथ ही समाज के हाशियों पर धकेल दिए गए, इनकी सबसे बड़ी समस्या आजीविका है जो इन्हें अंततः इनके समुदाय में ले जाती है। ..अकेले अकेले बहिष्कृत ये किन्नर आर्थिक रूप से भी हाशिये पर डाल जाते हैं। ..नपुंसकलिंगी कहाँ कैसे जियेंगे? समाज का सहज स्वीकृत हिस्सा कब बनेंगे।’2 यह प्रश्न सदियों से हमारे सामने मुंह उठाये खड़ा है। साहित्य की बात की जाए तो उसे समाज का दर्पण कहा जाता है जैसा समाज में घटता है साहित्य उसकी अभिव्यक्ति विभिन्न स्वरों में करने की क्षमता रखता है। लेकिन इस तीसरी सत्ता की बात आते ही साहित्य में भी मौन व्याप्त दिखाई देता है। अधिकारों और कर्तव्यों की लड़ाई की बात तो दूर है, उनकी मूलभूत आवश्यकताओं पर भी कम ही लिखा गया है। इधर कुछ समय से इस क्षेत्र में काफी काम हुआ है। साहित्य में इसकी आमद सुनी जा सकती है। कुछेक साहित्यकार हैं जिन्होंने बेबाकी से इस समाज के यथार्थ को हमारे सामने लाने का प्रयास किया है। साहित्य की विविध विधाओं में यह प्रयास देखा जा सकता है। प्रदीप सौरभ का उपन्यास ‘तीसरी ताली’ इस दृष्टि से खूब चर्चित हुआ। इस विषय पर सबसे समृद्ध विधा कहानियों की रही है। अब तो हिंदी में ही नहीं बल्कि अन्य भाषाओं जैसे पंजाबी, गुजराती, बांग्ला, मारवाड़ी आदि में भी इस विषय पर कहानियां लिखी जा रही हैं। इन कहानियों में इस वर्ग के जीवन की कठिनाईयों का सजीव चित्रण मिलता है।

            यह संघर्ष व्यक्ति केन्द्रित न होकर एक पूरे वर्ग की है। बिंदा महराज (शिव प्रसाद सिंह), खलीक अहमद बूआ (राही मासूम रजा), बीच के लोग (सलाम बिन रजाक), संझा (किरण सिंह), त्रासदी (महेंद्र भीष्म), किन्नर (एस.आर. हरनोट), ई मुर्दन का गाँव (कुसुम अंसल), नेग (लवलेश दत्त), संकल्प (विजेंद्र प्रताप सिंह), हिजड़ा (श्री कृष्ण सैनी), रतियावन की चेली (ललित शर्मा) आदि कहानियां तीसरी दुनिया के यथार्थ को निरुपित करती हैं। अभी तक यह कहानियां संकलन के रूप में सामने नहीं आई थी, किन्तु हाल ही में वांग्मय पत्रिका नें अपने थर्ड जेंडर- कहानी विशेषांक द्वारा इन्हें समेकित किया है। इन कहानियों के अपने अलग यथार्थ और निहितार्थ हैं किन्तु सबका उद्देश्य एक ही है, तीसरी दुनिया के सत्य को सामने लाना और उनके संघर्ष को स्वर देना।

            ‘संकल्प’ कहानी में नया फलक पाठक के सामने आता है। हिजड़ों में भी एक अलग वर्ग बुचरा हिजड़ों का होता है, मेडिकल साइंस की सहायता से हिजड़े के अधूरे जीवन से पूर्णतः परिवर्तित होकर पूर्णत्व जीवन को प्राप्त कर सकते है। कहानी में गुरुमाई और माधुरी के माध्यम से इस तथ्य को कथा का रूप देते हुए सामने रखा गया है। यह बात जब माधुरी को पता चलती है कि वह भी समाज में एक बेहतर जीवन जी सकती है तो वह इस दिशा में प्रयास करना शुरू करती है। चूँकि समाज में अपमान और उपेक्षा झेल रहे इस समुदाय में कभी भी समाज के प्रति दृष्टिकोण नहीं बदला। ‘समाज से भी हिजड़ों को शिवाय दर्द और तकलीफ के क्या प्राप्त होता है। लाख कानून बन जाने के बाद भी क्या आज तक समाज में बड़ी जाति वाले आज तक नीची जाति के साथ अपने व्यवहार को बदल पाए। ऐसे में हिजड़ों के लिए नियम कानून बनाए जाने की जानकारी होने के बाद भी माधुरी को समाज से कोई भरोसा नहीं थाकृ। अधिकाँश लोग जानकारी के अभाव में चिकित्सक से बिना परामर्श लिए ही यह मान लेते हैं कि ये तो हिजड़ा है और कभी ठीक नहीं होगा परन्तु ऐसा नहीं है। हाँ इतना अवश्य है की बहुत से मामले ठीक न होने वाले होते हैं परन्तु बहुत से मामलों में ओपरेशन या प्लास्टिक सर्जरी के माध्यम से भी हिजड़ों को ठीक किया भी जा सकता है।’3

            ‘इज्जत के रहबर’ कहानी में इस वर्ग के जीवन की त्रासदी के साथ ही मानवीय संवेदनाओं का भी चित्रण मिलता है। यह वर्ग समाज के द्वारा भले ही हमेशा से उपेक्षा का शिकार होता आया है किन्तु इनके भीतर सामाजिकता की भावना सामान्य स्तर की ही होती है, तभी तो कहानी की मुख्य पात्र सोफिया कहती है- ‘हमारे भी कुछ उसूल है लालजी। लड़की की शादी में लड़की वालों से शगुन नहीं लेते, लड़के वालों से लेते हैं।… और जिनके यहाँ गमी हो जाती है उसके यहाँ साल भर तक नेग दस्तूर नहीं लेते। ..पहली लड़की होने पर जिद नहीं करते। ..गरीबों को कम पैसे में बक्श देते हैं।’ ‘लालजी हमारी संख्या तो ईश्वर बढाता है। खुदा न करे वह और अधिक संख्या बढ़ाए। हमें कितना कष्ट है इस योनि में होने का, ये तो हम ही जानती हैं।’4

            ‘पन्ना बा’ कहानी अत्यन्त मार्मिक है। यह कहानी कम और संस्मरण अधिक है। यह समाज की रूढ़ियों पर करारा व्यंग्य करती है। यह ज्वाजल्यमान प्रश्न आज भी हमारे समक्ष मुंह उठाये खड़ा है कि ‘अगर यह वरदान कि ‘किन्नर की दुआ की कोई होड़ नहीं और उसकी बद्दुआ का कोई तोड़ नहीं’ उनके साथ नही होता तो प्रकृति के इस अभिशाप को झेलता यह वर्ग किस तरह जिंदा रहता।’ लेखिका का आक्रोश समाज और उसकी व्यवस्था के विरुद्ध है वह लिखती है- ‘मेरा मन दुःख और क्रोध से जल रहा थाद्य मृत्यु स्वाभाविक दुःख देती है और क्रोध इसलिए कि मैं भी चाहती थी कि उसकी लाश पर जूते बरसा कर मै भी उसे किन्नर के जन्म पर धिक्कारू। और शायद वह मेरे जूतों की बौछार से डर कर अगले जन्म में किन्नर के रूप में पैदा होने की हिमाकत न करे ।’5

            सलाम बिन रजाक की एक प्रतीकात्मक कहानी है ‘बीच के लोग’। यह कहानी व्यंग्यात्मक तरीके से सामाजिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठाती है। कहानी में हिजड़ों की एक टोली का जुलूस निकल रहा है, उन्हें रोकने में पुलिस प्रशासन के लिए एक चुनौती बन जाता है। शहर एस.पी. कहते हैं-‘स्त्रियों और हिजड़ों में क्या अंतर है।’ तो उत्तर लेडी कांस्टेबल देती है और कहती है- ‘सर! यों देखा जाये तो पुरुषों और हिजड़ों में भी कोई विशेष अंतर नहीं होता है।’6 अर्थात यह पूरा समाज ही अपने मूल रूप में हिजड़ों की प्रवृत्ति को धारण किये हुए है।

            ‘संझा’ इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है, जिसे किरण सिंह नें लिखा है। यह एक लम्बी कहानी है। जिसकी मुख्य पात्र संझा है। संझा एक हिजड़ा है। वह दो लिंगो के बिन्दुओं का मध्य है, इसी कारण उसका नाम संझा रखा जाता है। यह कहानी इस वर्ग की यातना को बहुत ही मनोविज्ञानिक ढंग से व्यक्त करती है। ‘हिजड़ा’ कहानी भी हिजड़ो की संवेदना को दर्शाती है। जिसमें रजिया नाम के एक हिजड़े नें एक अनाथ को पाल-पोस कर न केवल बड़ा करता है बल्कि पढ़ा-लिखा कर उसे आई.एस. भी बना देता है। यह सभी कहानियाँ इस समानांतर दुनिया का जीता जागता दस्तावेज हैं।  ‘खुश रहो क्लिनिक‘ कहानी में किन्नर संतति को सामाजिक रूप से स्वीकार न कर पानें का दंश है। समाज की परम्पराएं व मान्यताएं ऐसी हैं जिसे मानने के लिए हम आदिम काल से बाध्य है। कहानी का मुख्य पात्र ऋषि एक किन्नर है। उसका पिता बचपन से ही उससे नफरत करता है और मौका मिलते ही परिवार से छुप कर उसे किन्नरों के यहाँ भिजवा देता है। उसका बचपन बहुत कष्ट में बीतता है।

            इन कहानियों के पात्रों का अध्ययन करते हुए एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि अधिकाँश किन्नर घोर आस्तिक होते हैं और सदियों से चली आ रही परम्पराओं का शिद्दत से पालन करते हैं। बिंदा महराज, खलीक अहमद बुआ, पार्वती, संझा, सुन्दरी आदि अनेक उदाहरण हैं। सभी कहानियों में भारतीय समाज की परम्परागत कुत्सित सोच दिखाई देती है जो सदियों से लेकर आज भी अपनी संकीर्ण सोच से उबार नहीं पायी। यह वर्ग हमारे समाज का अभिन्न अंग है फिर भी समाज का हर वर्ग इस को हिकारत से देखता है और मनोरंजन से अधिक और कुछ नहीं समझता है। भले ही साहित्य में थर्ड जेंडर पर लेखन अभी प्रारम्भिक अवस्था में है, लेकिन ये कहानियाँ बड़ी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती हैं। यह कहानियाँ व्यवस्था के विरुद्ध प्रश्न खड़े करती हैं और इस वर्ग की मूलभूत आवश्यकताओं को उजागर करती है। जिस समाज में इन्हें हेय द्रष्टि से देखा जाता रहा है, उसी समाज के बरक्स साहित्य में इनकी व्यथा कथा को स्वर देना, बहुत बड़ी उपलब्धि है। ये कहानियां समाज की सोच को बदलने का एक नया नजरिया विकसित करती है ।

सन्दर्भ-

  1. दिव्या-यशपाल, लोक भारती प्रकाशन इलाहाबाद, पृ-21
  2. तीसरी ताली- प्रदीप सौरभ-वाणी प्रकाशन, कवर पेज
  3. डॉ0 एम. फीरोज खान, थर्ड जेन्डरःहिन्दी कहानियां, संकल्प-विजेंद्र प्रताप सिंह, अनुसंधान पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, कानपुर, 2017, पृ0-133
  4. वही, इज्जत के रहबर-डॉ0 पद्यमा शर्मा, पृ0-92,95
  5. वही, पन्ना बा-गरिमा संजय दुबे, पृ0-1213-

वही, बीच के लोग-सलाम बिन रजाक, पृ0- 38

डॉ. आलोक कुमार सिंह

सहायक प्राध्यापक-हिन्दी विभाग

अटल बिहारी वाजपेई नगर निगम

डिग्री कॉलेज , लखनऊ

हिन्दी-उर्दू का अन्तर्संबंध और निदा फ़ाज़ली की कविता-ग़ज़ल: डॉ. बीरेन्द्र सिंह

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हिन्दी-उर्दू का अन्तर्संबंध और निदा फ़ाज़ली की कविता-ग़ज़ल

आज हिन्दी और उर्दू दो प्रमुख भाषाओं के रूप में मान्य हैं । सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ इस भाषा-भेद को स्थापित करने में अहम भूमिका अदा करती हैं फलस्वरूप साधारण तौर पर हिन्दी और उर्दू को न केवल दो भाषाओं बल्कि एक हद तक दो विरोधी भाषाओं का दर्जा प्राप्त है । परन्तु यह मान्यता भाषावैज्ञानिक दृष्टि से वास्तविकता से कोसों दूर ठहरती है । आज तक किसी भी भाषावैज्ञानिक ने हिन्दी और उर्दू को दो भिन्न भाषाएँ नहीं माना है ।

लिपिभेद एवं शब्दावली का किंचित अंतर छोड़ हिन्दी और उर्दू में कोई भेद नहीं है । इस संबंध में हिन्दी के मुर्धन्य आलोचक एवं भाषाशास्त्री डा. रामविलास शर्मा लिखते हैं, ‘‘हिन्दी-उर्दू में सबसे पहला भेद लिपि का है । लिपि लिखने के काम आती है न कि बोलने के । इसलिए लिपि-भेद को हम बुनियादी भेद नहीं मानते । हिन्दी-उर्दू में दूसरा भेद है शब्दभंडार का । यह भेद साधारण लोगों की बोलचाल में बिल्कुल नहीं है, पढ़े-लिखे लोगों में बहुत थोड़ा है और भाषा के लिखित रूपों में बहुत ज्यादा है ।’’1 यानी हिन्दी-उर्दू का भेद एक ही भाषा के लिखित रूपों का भेद है, वो भी वहाँ जहाँ साधारण लोगों की बोलचाल की सहज भाषा का प्रयोग नहीं किया जाता । दूसरे शब्दों में हिन्दी-उर्दू का भेद है नहीं, उसे बनाया जाता है । प्रेमचंद भी यही मानते थे और उनका तो लेखन भी इस बात का गवाह है कि अगर बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग लेखन में भी किया जाये तो हिन्दी उर्दू में कहीं कोई भेद है ही नहीं । फिर हिन्दी-उर्दू के बीच यह भेद की दीवार कैसे खड़ी हो गई, इसके पीछे का इतिहास क्या है, अब आइए इस पर भी ज़रा निगाह डालते हैं ।

आमतौर पर माना जाता है कि भारत में उर्दू का जन्म हिन्दुओं और मुसलमानों के आपसी मेलजोल के फलस्वरूप हुआ । दूसरी ओर भाषा के अर्थ में उर्दू शब्द का प्रयोग 18वीं सदी के अंत तक नहीं मिलता है । दरअसल भारतीय व्यापार की उन्नति के साथ-साथ उत्तर भारत के बड़े हिस्से में जिस खड़ी बोली का व्यापक प्रचार हुआ उसे हिन्दी, हिन्दवी या हिन्दुई कहा गया । कवि-रचनाकारों ने भी अपनी भाषा को इसी नाम से पुकारा चाहें वो किसी भी धर्म के रहे हों । इस संदर्भ में डा. रामविलास शर्मा बड़े ही मजेदार ढंग से लिखते हैं, ‘‘हिन्दी-उर्दू का एक सामान्य आधार है, बोलचाल की खड़ीबोली । इस खड़ीबोली में अरबी-फारसी के कुछ या बहुत ज्यादा शब्द आ मिले तो इससे एक नयी भाषा नहीं उत्पन्न हो गयी । यह खड़ीबोली मुसलमानों के आने से पहले भी थी, उनके शासनकाल में रही और आज भी है । एक दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि जितना ही हम पुराने जमाने के उर्दू लेखकों की रचनाएँ पढ़ते हैं, उतनी ही साधारणतः अरबी-फारसी के शब्दों की खपत कम मिलती है और जितना ही बीसवीं सदी की ओर बढ़ते हैं, उतना ही यह खपत बढ़ती जाती है । अगर बारहवीं-तेरहवीं सदी में मेलजोल के लिए पाँच फीसदी अरबी-फारसी शब्दों की जरूरत थी तो 1947 के आसपास यह जरूरत बढ़कर पचासी फीसदी तक पहुँच गयी है । यानी ज्यों-ज्यों मेलजोल बढ़ा, त्यों-त्यों हिन्दी-उर्दू का अलगाव बढ़ता गया । मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की ।’’2

दरअसल हिन्दी और उर्दू का भेद बढ़ना शुरु हुआ भारत में अंग्रेजों के आगमन के बाद । 18वीं सदी के पहले जिस ‘उर्दू’ शब्द का कहीं जिक्र नहीं मिलता अचानक वह एक नयी भाषा कहलाने लगती है । इसके पीछे फोर्ट विलियम कॉलेज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है । जॉन गिलक्राइस्ट हिन्दी-उर्दू भाषी कौम की शक्ति और इसके खतरों को कहीं-न-कहीं महसूस कर सकते थे । उन्होंने फोर्ट विलियम कॉलेज के साथ-साथ पहला काम ही किया, भाषा को मजहब से जोड़कर देखने-दिखाने की प्रवृति का प्रचार । जातीय भाषा के विकास में दरार डालकर भाषा को धर्म से जोड़ा जाने लगा ।

1857 की जनक्रांति में हिन्दू और मुसलमानों ने जिस प्रकार की एकता का परिचय दिया, अंग्रेजी हुकूमत उससे काफी विचलित हुई । अतः हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दूरी बढ़ाने वाले तत्वों पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा । ‘फूट डालो राज करो’ की नीति अहम हो गई । इस सिलसिले में भाषा-भेद को धर्म से जोड़कर भयावह रूप में बढ़ावा दिया गया । फलतः अब तक सामान्य जनता के बीच जिस सामान्य भाषा का प्रयोग होता आ रहा था, वहाँ मुसलमानों ने अपने लेखन में अरबी-फारसी के शब्दों की खपत बढ़ानी शुरु की और संस्कृत तथा सामान्य बोलचाल के शब्दों को जानबूझकर बाहर निकाला गया जिसे मतरुकात का सिद्धांत कहा गया । इसीतरह हिन्दुओं ने संस्कृत शब्दों की ओर ज्यादा ध्यान देना शुरु किया । दुःख की बात है कि इस अलगाववादी मानसिकता के कारण एक ही भाषा दो रूपों में आगे बढ़ी ।

इसतरह इतना तो स्पष्ट होता ही है कि हिन्दी और उर्दू दो भिन्न भाषाएँ न होकर एक ही भाषा की दो भिन्न शैलियाँ हैं । जिनके बीच का भेद बहुत हद तक आधारहीन है । स्वयं राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी हिन्दी और उर्दू में कोई भेद न देखते थे और एक मिली-जुली सामान्य भाषा जिसे उन्होंने हिन्दुस्तानी कहा था,  राष्ट्रभाषा के रूप में चाहते थे । दरअसल मजहब से भाषाएँ तय नहीं हुआ करतीं । यह घोर साम्प्रदायिक दृष्टिकोण है जिसका खामियाजा हम अब तक भुगत रहे हैं । हिन्दी-उर्दू भेद की तमाम व्यावहारिक सच्चाइयों को मानते हुए भी कम-से-कम हमें यह भी मान लेना चाहिए कि भारत में हिन्दी-उर्दू एक ही क्षेत्र के वासिन्दों की – एक कौम की – भाषा है । यह ‘हिन्दी जाति’ की भाषा है । रामविलास शर्मा के शब्दों में फिर एक बार कहना पड़े तो, ‘‘हिन्दी-उर्दू का व्याकरण एक, वाक्य-रचना एक-सी, शब्द भंडार और क्रियाएँ एक-सी – इसीलिए हिन्दी-उर्दू भाषियों की दो कौमें नहीं हैं । उनकी जाति एक है और बोलचाल की भाषा एक है ।’’3

आज के साहित्य में हिन्दी-उर्दू के इस भेद को मिटाकर रख देने वाले रचनाकारों की एक लम्बी फेहरिस्त है – प्रेमचंद, फिराक गोरखपुरी, चकबस्त, राही मासूम रज़ा, शानी, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, मंजूर एहतेशाम आदि-आदि । इन रचनाकारों ने अपने लेखन में हिन्दी-उर्दू के बीच की बेबुनियाद दीवार को लगातार तोड़ा है । इसी परम्परा के प्रमुख शायर निदा फ़ाज़ली को मैंने अपने अध्ययन का आधार बनाया है । निदा फ़ाज़ली मौजूदा दौर के हिन्दी-उर्दू के ऐसे शायर रहे हैं जिनकी लेखनी हिन्दी और उर्दू के बीच फैलाये गए भ्रम की दीवार को ढहा कर रख देती है ।

भाषा का सवाल जातीय एकता से जुड़ा सवाल है । यह साम्प्रदायिकता और अलगाववाद के विरोध का सवाल है । यह हमारे विकास का सवाल है । पाकिस्तान से लौटने के बाद अपनी एक मशहूर नज़्म में निदा लिखते हैं, गौर करें –

‘‘ख़ूँख्वार दरिन्दों के

फ़क़त नाम अलग हैं

शहरों में बयाबान

यहाँ भी है वहाँ भी

रहमान की कुदरत हो

या भगवान की मूरत

हर खेल का मैदान

यहाँ भी है वहाँ भी

हिन्दू भी मज़े में है

मुसलमाँ भी मज़े में

इन्सान परेशान

यहाँ भी है वहाँ भी’’4

इंसान की परेशानी से जूझने वाले इस शायर की शायरी का विश्लेषण करते हुए हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि आज की जटिल परिस्थितियों की अभिव्यक्ति करते हुए किसी रचनाकार की संवेदना किसी भाषा-भेद का ख़्याल रखती है क्या ! एक और नज़्म देखें –

‘‘मस्जिदों मंदिरों की दुनिया में

मुझको पहचानते कहाँ हैं लोग

रोज़ मैं चाँद बन के आता हूँ

दिन में सूरज सा जगमगाता हूँ

खनखनाता हूँ माँ के गहनों में

हँसता रहता हूँ छुप के बहनों में

मैं ही !

मज़दूर के पसीने में

मैं ही !

बरसात के महीने में’’5

            मस्जिद-मंदिर के बीच की खाई से पीड़ित शायर अल्लाह-ईश्वर की उपस्थिति को सूरज-चाँद से लेकर मानवीय संबंधों और संघर्ष की अभिव्यक्ति तक ले जाकर जिस सेतु के निर्माण का प्रयत्न कर रहा है क्या वहाँ आपको किसी हिन्दी-उर्दू का भेद दीख रहा है? ऐसा शायर प्रार्थना करते हुए ईश्वरीय सत्ता के सामने क्या निवेदन रखता है, इसे देखें –

‘‘नील गगन पर बैठे

कब तक

चाँद सितारों से झाँकोगे

पर्वत की ऊँची चोटी से

कब तक

दुनिया को देखोगे

आदर्शों के बन्द ग्रन्थों में

कब तक

आराम करोगे

मेरा छप्पर

टपक रहा है

बनकर सूरज

इसे सुखाओ

खाली है

आटे का कनस्तर

बनकर गेहूँ

इसमें आओ’’6

अब आप ही निर्णय लीजिए यह प्रार्थना किस धर्म वाले की है, किसके लिए है और किस भाषा में है?…

निदा जैसा शायर जब कहता है –

‘‘बच्चा बोला देख कर मस्जिद आलीशान

अल्ला तेरे एक को, इतना बड़ा मकान’’7

तो कहीं ऐसा नहीं लगता कि जो काम कबीर जैसा क्रांतिकारी 14-15वीं सदी में कर रहा था वही अधूरा काम अपने तरीके से कोई रचनाकार आज भी पूरा कर रहा है । आखिर ‘काँकर-पाथर’ जोड़कर अल्लाह के लिए इतना बड़ा मकान बनवाया जाना तो आज भी बदस्तूर जारी है । वहीं दूसरी ओर –

‘‘अन्दर मूरत पर चढ़े घी, पूरी, मिष्ठान

मन्दिर के बाहर खड़ा, ईश्वर माँगे दान’’8

और निदा इन सारे चोंचलों से मुक्ति का जो रास्ता बताते हैं, उसे देखिए –

‘‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये’’9

निदा के यहाँ मासूमियत को बचाये रखने की गहरी अपील देखने मिलती है । बौद्धिकता आदमी को कहीं-न-कहीं खुंखार बना रही है, निदा इसे व्यक्त करते हुए कहते हैं –

‘‘बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो

चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जायेंगे’’10

और यहीं मैं जोड़ना चाहूँगा कि हिन्दी-उर्दू का झगड़ा यही चार किताबें पढ़ चुके लोगों के बीच का झगड़ा है । निदा अपने लेखन में जिसका प्रतिरोध रचते हैं । इसीलिए सिनेमा जैसे माध्यम से, जहाँ हिन्दी-उर्दू का भाषाई भेद लगभग नहीं है क्योंकि वह आम जन का माध्यम है, निदा को विशेष लगाव रहा । उनका साहित्य, कविता-ग़ज़ल सिनेमा में नई ऊँचाई पाता है । निदा उन्हीं के लिए लिखना पसंद करते थे जो –

‘‘दुःख में नीर बहा देते थे, सुख में हँसने लगते थे

सीधे-सादे लोग थे, लेकिन कितने अच्छे लगते थे’’11

और यही कारण है कि आज की दुनिया में सोच-समझवालों के लिए निदा नादानी माँगते हैं –

‘‘दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है

सोच-समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला’’12

निदा आदमी और आदमियत की तलाश के शायर हैं इसीलिए वह आज एक नई ग़ज़ल सुनाना चाहते हैं –

‘‘उठके कपड़े बदल, घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ

रात के बाद दिन, आज के बाद कल जो हुआ सो हुआ

जब तलक साँस है, भूख है प्यास है ये ही इतिहास है

रख के काँधे पर हल , खेत की ओर चल जो हुआ सो हुआ

*          *          *          *          *          *

मन्दिरों में भजन, मस्जिदों में अज़ाँ आदमी है कहाँ?

आदमी के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल जो हुआ सो हुआ’’13

निदा मानते हैं –

‘‘हम सब

एक इत्तिफ़ाक़ के

मुख़्तलिफ़ नाम हैं

मज़हब

मुल्क

ज़बान

इसी इत्तिफ़ाक़ की अनगिनत कड़ियाँ हैं’’14

आज के दौर की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि इन मुख़्तलिफ (भिन्न) चीजों के बीच का ‘लफ़्जों का पुल’ लगातार दरकते-दरकते कहीं टूट चुका है और इसे किसी भी कीमत पर जोड़े जाने की महती आवश्यकता है । अगर हम ऐसा कर सके तभी हम अपनी-अपनी तन्हाई से निजात पा पायेंगे । निदा की नज़्म है – ‘लफ़्जों का पुल’

‘‘मस्जिद का गुंबद सूना है

मंदिर की घंटी ख़ामोश

जुज़दानों में लिपटे

सारे आदर्शों को

दीमक कब की चाट चुकी है

रंग

गुलाबी

नीले

पीले

कहीं नहीं हैं

तुम उस जानिब

मैं उस जानिब

बीच में मीलों गहरा ग़ार

लफ़्जों का पुल टूट चुका है

तुम भी तन्हा

मैं भी तन्हा’’15

यह लफ़्जों का पुल जब तक नहीं जुड़ेगा, अपनी-अपनी तन्हाइयों में हिन्दी-उर्दू के ‘बीच में मीलों गहरा ग़ार’ बदस्तूर कायम रहेगा । निदा ने अपने सम्पूर्ण रचनाकर्म के माध्यम से इस मीलों गहरी खाई को पाटने की एक अदना-सा कोशिश की है और बाकी का एक विस्तृत कार्य हम सभी के लिए छोड़ गए हैं । निःसंदेह यह काम कठिन तो है पर नामुमकिन नहीं । पुनः निदा के ही शब्दों में –

‘‘मुम्किन है सफ़र हो आसाँ अब साथ भी चल कर देखें

कुछ तुम भी बदल कर देखो, कुछ हम भी बदल कर देखें’’16

संदर्भः

  1. शर्मा रामविलास, भाषा और समाज, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पाँचवा संस्करण, 2002, पृ. 331
  2. वही, पृ. 284
  3. वही, पृ. 331
  4. फ़ाज़ली निदा, सफ़र में धूप तो होगी (सं.-शीन काफ़ निज़ाम और नन्दकिशोर आचार्य), वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, प्रथम संस्करण, 2000, पृ. 155
  5. वही, पृ. 129
  6. वही, पृ. 117
  7. वही, पृ. 157
  8. वही, पृ. 158
  9. वही, पृ. 22
  10. वही, पृ. 39
  11. वही, पृ. 54
  12. वही, पृ. 75
  13. वही, पृ. 74
  14. वही, पृ. 139
  15. वही, पृ. 140
  16. वही, पृ. 63

डॉ. बीरेन्द्र सिंह

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग

स्कॉटिश चर्च कॉलेज, कोलकाता

मो.-9331265343

ई-मेल: birendra_scottish@yahoo.in

हिंदी की लघु पत्रिकाएं और बांग्ला साहित्य: एक नज़र-डॉ. निकिता जैन

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शोध सारांश प्रस्तुत शोधालेख में हिंदी की लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित बांग्ला भाषा के अनुवादित (हिंदी में) साहित्य का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इस विश्लेषण के ज़रिये न केवल ये पता लगाने की कोशिश की गयी है कि हिंदी की लघु पत्रिकाओं का अन्य क्षेत्रीय या प्रादेशिक भाषाओं का प्रति क्या दृष्टिकोण था बल्कि यह भी मूल्यांकित करने का प्रयास भी किया गया है कि किस तरह यह पत्रिकाएं हिंदी के पाठकों के समक्ष अन्य भाषाओं के अनुवादित साहित्य (हिंदी में) को प्रस्तुत कर रही थीं ताकि वह अन्य भाषाओं की साहित्यिक प्रवृत्तियों से न केवल परिचित हों बल्कि उन्हें आत्मसात करने के पथ पर भी अग्रसर हों। प्रस्तुत शोधालेख में बांग्ला साहित्य को तत्कालीन स्थितियों (1950 से लेकर 1980 तक के विशेष संदर्भ में ) के अनुसार अलगअलग भागों और संदर्भों में विवेचित करने प्रयास किया गया है जैसे बांग्लादेश मुक्ति आन्दोलन, हंगरीजेनरेशन मूवमेंट आदि का बांग्ला साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा और उसे किस प्रकार लेखकों ने अपनी रचनाओं के द्वारा प्रस्तुत किया इन सभी पहलुओं को इस लेख में विवेचित किया गया है

मुख्य शब्द लघु पत्रिका (सीमित संसाधनों के अंतर्गत निकलने वाली पत्रिका), अणिमा,उत्कर्ष,कल्पना, संचेतना,नई धारा  (पत्रिकाओं के नाम)

शोधविस्तार

बांग्ला:प्रतिरोध का साहित्य  – हिंदी पर बंगला साहित्य की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है| शरतचन्द्र का देवदास हो या रविन्द्रनाथ टैगोर की चोखेर बाली, इन अविस्मरणीय रचनाओं को कौन भूल सकता है, न जाने कितनी बार हिंदी में इन रचनाओं का रूपांतरण हो चुका है, कितनी हिंदी फिल्मों में इनका चित्रांकन किया जा चुका है। बंगला साहित्य हमेशा से अपनी दृष्टि और कला द्वारा हिंदी साहित्य को समृद्ध करता आ रहा है। इसके अतिरिक्त कितने ही ऐसे हिंदी साहित्यकार हैं जिनका सम्बन्ध बंगाल से है, जो बांग्ला  और हिंदी दोनों में सक्रिय रूप से लिखते रहे हैं। बांग्ला  साहित्य आज भी हिंदी के मुकाबले बहुत समृद्ध माना जाता है क्योंकि बंगाल में ही सबसे पहले नवजागरण का आवागमन हुआ। स्वतंत्रता से पूर्व और उसके पश्चात भी बंगाल राजनीतिक, साहित्यिक, शैक्षिक

एवं सामाजिक सभी दृष्टि से अधिक सक्रिय रहा है। साहित्य की किसी भी नयी प्रवृत्ति या विधा की शुरुआत अधिकतर बंगाल से ही हुई है। लघु पत्रिकाओं की बात की जाए तो भारत में लघु पत्रिका आन्दोलन की शुरुआत भी सर्वप्रथम बंगाल से हुई थी। दरअसल बंगाल शुरू से ही अंग्रेजी एवं अन्य विदेशी भाषाओं के साहित्य के प्रति आकर्षित रहा और यही वजह है कि धीरे-धीरे साहित्य प्रेमियों ने विदेशी भाषाओं के साहित्य का अनुवाद करना शुरू कर दिया। इसी कारण साहित्य की नयी-नयी प्रवृत्तियों और आन्दोलन से ये लोग परिचित होने लगे और इनको अपने साहित्य में आकार देने लगे। हिंदी की लघु पत्रिकाओं का झुकाव बांग्ला  साहित्य की ओर स्पष्ट रूप से दिखलाई पड़ता है। इसका एक कारण यह भी है कि बांग्ला  साहित्य प्रतिरोध का साहित्य है| विद्रोह छोटा हो या बड़ा बांग्ला  भाषा हमेशा से अपनी संस्कृति,कला के प्रति सजग और आक्रमक रही है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो बांग्ला  साहित्य ने कभी-भी पुरानी परम्पराओं को छोड़ने और नए को अपनाने में वक़्त नहीं लगाया। यही वजह है कि 1920 के आस-पास ही बंगाल में लेखकों की एक नयी पीढ़ी तैयार हो गयी थी जबकि हिंदी में नए प्रयोग करने वाले लेखक सन् 1950 के बाद आते हैं।

विद्रोह के तीखे तेवर लिए बांग्ला साहित्य के विकास का एक कारण वहां की राजनीतिक परिस्थितियां भी रहीं हैं। 1905 में बंग-विभाजन का होना, पश्चिमी और पूर्वी बंगाल में परिस्थितियों का बदलना, देश की आज़ादी के बाद पूर्वी बंगाल का पाकिस्तान में शामिल होना, अपने अस्तित्व एवं भाषा की गौरवशाली परम्परा को बनाये रखने के लिए पूर्वी बंगाल का पाकिस्तान को करारा जवाब देना इत्यादि घटनाओं ने प्रतिरोध की ऐसी ज़मीन तैयार की, जिसने आगे चलकर केवल भारतीय इतिहास में ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी ।

सन् 1971 के दशक को कौन भूल सकता है ? जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। बंगपिता शेख मुजीबुर्र रहमान ने एक स्वतंत्र बांग्लादेश की परिकल्पना की और कुछ महीनों के भीतर ही इस कल्पना ने हकीकत का रूप ले लिया। किसी भी देश की जीत के पीछे सबसे बड़ा हाथ उन बुद्धिजीवियों का होता है जिन्हें ये ज्ञात हो कि आने वाली परिस्थितियां किस करवट बैठेंगी। लेखक इस सूची में सबसे आगे रहते हैं। बंगाल के लेखकों की यह सबसे बड़ी खासियत है कि वह विपरीत परिस्थितियों में कभी हथियार नहीं डालते। पूर्वी बंगाल पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ पश्चिमी बंगाल के कथाकारों,शिक्षकों,कवियों आदि ने भी सख्त तेवर अपना रखे थे। पूर्वी बंगाल के लेखकों की तरह ही पश्चिमी

बंगाल के साहित्यकारों ने यह ठान लिया था कि ‘बांग्लादेश’ को एक स्वतंत्र देश बनाकर ही छोड़ेंगे। तत्कालीन बंगाली कहानी, कविता एवं उपन्यासों में केवल बांग्लादेश के मुक्ति आन्दोलन की चर्चा ही मिलती है। बात चाहे बांग्ला देश छोड़कर भारत में आने वाले शरणार्थियों की हो या फिर उस जनता की जो बिना हथियार के भी इस स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़ी या उन स्त्रियों की जिनकी अस्मत को सरेआम बेआबरू किया गया फिर भी वह अपनी अंतिम साँस तक जय बांग्ला  का नारा लगाती रहीं-इन सभी पहलुओं को बंगाली कथाकारों ने बड़ी बारीकी से चित्रित किया। केवल बंगाल में ही नहीं बल्कि हिंदी प्रान्त में भी कुछेक लघु पत्रिकाओं ने ‘बांग्लादेश’ के तत्कालीन मुक्ति आन्दोलन को अपनी पत्रिका में आवाज़ प्रदान की। ऐसी ही पत्रिकाओं में से एक है ‘अणिमा’। शुरुआत में यह पत्रिका कलकत्ता से ही प्रकाशित होती थी। लेकिन नवम्बर 1971 का ‘बंगलादेश कथा विशेषांक’ जयपुर से प्रकाशित हुआ। इस विशेषांक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसने पूर्वी बंगाल की तत्कालीन परिस्थितियों के हर पहलू पर रोशनी डालने की कोशिश की है। उन कथाओं को विशेषांक में जगह दी गयी जो उस समय के हालातों को सही रूप से चित्रित करने में सक्षम थीं। जितनी भी कहानियां इस अंक में प्रकाशित हुईं  सभी भोगे हुए यथार्थ पर आधारित थीं। बांग्लादेश पर केन्द्रित यह अंक केवल इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि यह वहां की घटनाओं का सिलसिलेवार वर्णन प्रस्तुत कर रहा है। बल्कि यह विशेषांक इस बात का प्रमाण है कि- किसी भी राष्ट्र या समाज में होने वाली परिघटनाएं सबसे पहले वहां के कला माध्यमों पर ही असर डालती हैं और ऐसी सूरत में इन माध्यमों का यह कर्तव्य होता है कि वह ऐसे साहित्य की रचना करें जो समाज और राष्ट्र के केवल हित में ही न हों बल्कि उन्हें जुझारू भी बनाएं। बांग्लादेश की मुक्ति में कलम के सिपाहियों का भी उतना ही बड़ा योगदान है जितना कि बन्दूक के सिपाहियों का। लेखक या कलाकार सही वक़्त पर अपनी कला का इस्तेमाल करे तो क्या हो सकता है यह ‘बांग्लादेश’ के रूप में हमारे सामने है।

प्रस्तुत विशेषांक की पहली कहानी ताराशंकर वन्द्योपाध्याय के उपन्यास एकटि कालो मेयेर कथा का एक अंश है। ‘वे दो काल रात्रियाँ’ शीर्षक से छपी यह कहानी अपने अंदर हजारों प्रश्नों को समाये हुए है। कहानी का हर पड़ाव अपने साथ एक नया प्रश्न लेकर आता है कि क्या जो उस समय हुआ वो होना ज़रूरी था ? अगर ज़रूरी था भी तो क्या इस रूप में, जहाँ लाखों लोगों को दो गज ज़मीन भी नसीब नहीं हुई ? प्रस्तुत कहानी केवल दो रातों पर केन्द्रित है। 25 और 26 मार्च 1971 की दो रातें किस तरह भयानक काल रात्रि में बदल गयीं, लोगों को कैसे उनके घरों में जिंदा जला

दिया गया, लड़कियों को खींच-खींच कर सड़कों पर लाया गया और उनके साथ वो सलूक किया गया, जिसे सुनने से पहले लोग मरना पसंद करेंगे – ऐसे हालातों में तीन शख्स कैसे एक जले हुए मकान के अन्दर अपनी जान बचाने के लिए बैठे हुए हैं और पाकिस्तानी सेना एवं याहिया खान के खूनी दरिंदों का यह नंगा नाच देख रहे हैं। इस पूरी कथा को एक एंग्लो –इन्डियन शरणार्थी के द्वारा कहलवाया गया है –जो कि इस पूरे काण्ड का प्रत्यक्षदर्शी है। कहानी का सबसे मर्मस्पर्शी पहलू वो है जहाँ औरतों की आबरू को लूटा जा रहा है लेकिन घरों में छिपे हुए लोग केवल मूक दर्शक बने हुए हैं। उन स्त्रियों की चीखें सुनकर पास पड़ा कुत्ता भी काँप रहा है लेकिन इंसानी ज़मीर मर चुका है और जिनका जिंदा है वो भी मजबूर हैं – “वे कह रही थीं, तुम लोगों के पाँव पड़ते हैं हमें छोड़ दो अल्ला की दुहाई है|………….मैं अपने बालों को दोनों हाथों से नोचता हुआ किसी जानवर की करुण मूक चीत्कार की तरह चीख पड़ना चाहता था……..मिस्टर सेन ने कहाइधर जाइये भूल जाइये कि आप जिंदा है|”1.  कहानी का यह अंश ये सोचने पर मजबूर कर देता है कि ‘बांग्लादेश’ को मुक्ति तो मिली लेकिन किस कीमत पर ? यह सही है कि स्वतंत्रता बलिदान मांगती है लेकिन क्या उस त्याग की भी कोई सीमा निश्चित है ? बांग्लादेश के लोगों ने भी अपने खून से इस आन्दोलन को सींचा। लेकिन क्या बांग्लादेश इतिहास के इस काले पन्ने को कभी भूला पायेगा ? यह सभी प्रश्न कहानी अपने पीछे छोड़ जाती है। दो रातों का चित्र इतना भयानक था तो आगे के नौ महीनों में क्या हुआ होगा यह सोचकर ही रूह काँप उठती है। बांग्ला  कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहां के लेखक  सच को प्रदर्शित करने के लिए किसी आडम्बर का सहारा नहीं लेते, अपनी सधी हुई भाषा के माध्यम से वह यथार्थ को ज्यों का त्यों आपके सामने रख देते हैं। प्रस्तुत कहानी भले ही पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों को व्याख्यायित कर रही हो लेकिन अगर गौर से देखा जाए तो यह कथा प्रतिरोध की एक ज़मीन भी तैयार कर रही है – कहानी में ‘सेन’ अपने साथी से पूछता है कि तुम तो एंग्लो इन्डियन हो, तो तुम्हें किस बात का डर ? प्रत्युत्तर में एंग्लो इन्डियन कहता है –“मिस्टर सेन, इससे बेहतर तो मर जाना है मेरी मां बंगाली है तथा मैं क्रिश्चियन हूँ जानवरों का मित्र बनकर उनसे अपने प्राण बचाने की ख्वाहिश भी नहीं है2.   एंग्लो इन्डियन के ये शब्द इस बात का प्रमाण हैं कि ऐसी परिस्थितियों में हर शख्स जो बांग्लादेश के साथ था, अपने स्तर पर इस अमानवीय व्यवहार का विरोध कर रहा था। ये मायने नहीं रखता कि आप विरोध कैसे कर रहे हैं, मायने ये रखता है कि आप विरोध कर रहे हैं। हर शख्स आन्दोलन में बन्दूक लेकर नहीं उतर सकता। लेकिन जो

अपनी जान की बाजी लगाकर इस पथ पर निकल पड़े हैं उनका साथ कैसे दिया जाये,यही भावना किसी भी क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए काफी होती है। कहानी का अंत भी इसी आशा के साथ होता है जहाँ मिस्टर सेन यह मन बना लेते हैं कि “वे यह लड़ाई अब देखकर ही जायेंगे” इसलिए नहीं कि उन्हें अब अपनी मृत्यु का डर नहीं है बल्कि इसलिए कि जिन हजारों लोगों ने इस आशा में अपने प्राण त्याग दिए हैं कि कभी न कभी दुनिया के नक़्शे में बांग्लादेश का स्वतंत्र अस्तित्व होगा, उनकी इस आशा को पूरा होते हुआ देखने वाला कोई तो हो।

‘अणिमा’ के इस विशेषांक की हर कहानी केवल ‘बांग्लादेश’ की कथा को ही रेखांकित नहीं करती बल्कि बंगाली साहित्यकारों की विचारधारा को भी व्याख्यायित करती है। बंगाली रचनाकारों ने जिस सूक्ष्मता के साथ ‘कहानी’ के प्लाट का चुनाव किया है उससे यह प्रदर्शित होता है कि उन्होंने कितने करीब से उन परिस्थितियों को महसूस किया होगा कि वह उतने ही जीवंत रूप में उसे पन्नों पर उतार पाए| मनोज बसु की कहानी गोरिल्ला भी इसी जीवंतता का उदाहरण है। प्रस्तुत कहानी में निहत्थी जनता के आक्रोश का चित्रण किया गया है जो पाकिस्तानी सेना द्वारा किये गए कत्लेआम को देखकर उठ खड़ी होती है और गोरिल्ला युद्ध द्वारा सेना के नाक में दम कर देती है। छोटे-छोटे कस्बों और गांवों में गोरिल्ला युद्ध कितना महत्त्वपूर्ण था तथा एक आम जनता उसे कैसे अंजाम दे रही थी इसका सजीव चित्रण प्रस्तुत किया गया है – नरम मिट्टी वाले बांग्लादेश देश में यह कैसा आश्चर्यजनक काण्ड हो रहा है ! लड़केलड़कियां अविजीत सैनिक हो गए हैं सिर्फ अपने हृदय की शक्ति से बांग्ला  देश की मूर्ति और असाधारण से हथियारों द्वारा गोरिल्ला सेना का गठन किया है खान लोगों की कदमकदम पर नींद हराम कर रहे हैं3. एक ओर मन्मथ पाल जैसे युवक हैं जो साधारण हथियारों से देश की रक्षा करने के लिए संघर्षरत हैं तो दूसरी ओर जावेद अली जैसे स्वार्थी व्यक्ति हैं जो अपनी जान बचाने के लिए देश के साथ गद्दारी कर रहे हैं। लेकिन पाक सैनिक जावेद अली जैसे शुभचिंतकों के साथ भी कैसा अमानवीय व्यवहार करते हैं –इसका सशक्त चित्रण ही इस कहानी का केन्द्रीय बिंदु है – सूबेदार डबल मार्च करता हुआ आंगन पार करके शयनकक्ष में जा घुसा……कमरे में जावेद की तीसरी शादी की हुई नई दुल्हन थी……जावेद भी पीछेपीछे कमरे में घुसने जा रहा था कि शॉटगन का निशाना साध आँखें तरेरकर सूबेदार बोला, ‘हट जाओ’ ! भड़ाक से सूबेदार ने

दरवाज़ा बंद कर भीतर से कुंडी लगा ली कमरे से आर्तनाद सुनाई दिया…..जावेद अली चिल्ला रहा था – ‘अल्लाह की दुहाई हुज़ूर, मेरी बीवी को छोड़ दो’|”4. इस प्रसंग के पश्चात् ज़ेहन में एक ही बात कौंधती है कि इंसानियत के दुश्मन क्या कभी किसी के सगे हुए हैं ? धर्म और मज़हब के नाम पर कत्लेआम करने वालों और उनका साथ देने वालों को, उनका अल्लाह कभी माफ़ कर पायेगा ? जावेद अली ने देश के वफ़ादारों की मुखबरी करने से पहले शायद ये सोचा नहीं होगा अगर सोचा होता तो जावेद अली को कहानी के अंत में अपनी ही मौत की भीख मांगने की ज़रूरत नहीं पड़ती –“कहाँ हैं गोरिल्ले छोकरे ? …..मेरे नाककान काट लें आँखें निकाल लें जो कुछ मैंने उन्हें कहते सुना था उसमें से आज वे कुछ भी कर लें तो शायद मेरे हृदय को शान्ति मिले5.  बंगाली साहित्य को पढ़कर यह महसूस होता है कि अवश्य ही हिंदी साहित्य को इससे बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। ऐसा कतई नहीं कि हिंदी कहानियों में गंभीरता नहीं है या उनमें समसामयिक घटनाओं का विवेचन नहीं मिलता। लेकिन हिंदी कहानी में बंगाली कहानियों जैसा फ़ोर्स नहीं है। सन् 1971 के दौरान हिंदी में कई कहानी आन्दोलनों की शुरुआत हो चुकी थी। नयी कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी जैसे आन्दोलनों  के दौरान कई तरह के नए प्रयोग हिंदी कहानी में किये गए। कई बेहतर कहानियाँ भी लिखी गयीं लेकिन कुछेक साहित्यकारों की रचनाओं को छोड़ दें तो उस समय की अधिकतम कहानियों में केवल आधुनिक युग के पुरुष-स्त्री संबंधों की व्याख्या ही नज़र आती हैं । क्या ? हिंदी भाषी क्षेत्र बांग्लादेश के हालातों से अनजान थे या वो इस बात से वाकिफ नहीं थे कि लाखों लोग बंगलादेश छोड़कर पश्चिमी बंगाल में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं ? उनकी पीड़ा और स्थिति का वर्णन केवल बंगाली समाचार पत्रों में छपता था ? पश्चिमी बंगाल भारत से अलग था ? और अगर इन सभी प्रश्नों का जवाब नहीं है तो फिर क्यों हिंदी लेखकों की कहानियों में, कविताओं में, उपन्यासों में इतिहास की इस घटना का चित्रण न के बराबर मिलता है। ‘अणिमा’ के इस महत्त्वपूर्ण विशेषांक में एक भी कहानी किसी हिंदी लेखक की नहीं छपी और न ही संपादक ने यह ज़हमत उठाई कि वह इस बात का स्पष्टीकरण करें कि उन्होंने केवल बांग्ला  कथाकारों की ही कहानियों को क्यों  शामिल किया ? बात चाहे जो भी रही हो लेकिन एक हिंदी भाषी पत्रिका में जिसमें अनुवादित बंगाली कहानियां प्रकाशित की जा रही हैं और वो भी उस मुद्दे को केंद्र में रखकर जिसमें भारत की

अहम भूमिका है – ऐसे मुद्दों पर हिंदी लेखक चुप्पी साधे क्यों बैठे थे ? और इसके बाद भी अन्य किसी पत्रिका ने ये प्रयास क्यों नहीं किया कि बांग्लादेश के मुद्दे पर अन्य भाषाओं के लेखकों की राय ली जाए। न ही इस दिशा में तत्कालीन स्थापित हिंदी लेखकों का कोई ठोस पक्ष सामने आया।  वजह चाहे कुछ भी रही हो लेकिन एक बात स्पष्ट है कि बांग्लादेश के संदर्भ में बांग्ला  साहित्य में जिस तरह का विरोध दर्ज है ऐसा विरोध आपातकाल के समय में भी साहित्य में नज़र नहीं आता। हिंदी साहित्य में गिनी-चुनी कहानी -उपन्यास ही इस संदर्भ में लिखे गए वो भी काफी बाद में। जहाँ तक बांग्ला साहित्यकारों की बात है तो चाहे अचिन्त्यकुमार सेनगुप्त हों या जरासंध या फिर बांग्ला  की प्रतिष्ठित लेखिका महाश्वेता देवी सभी ने उस महत्त्वपूर्ण समय को अपनी कहानियों में कैद कर हमेशा के लिए अमर कर दिया है|

महाश्वेता देवी की कहानी जनक राजा के धान खेत भी एक ऐसी कथा है जिसमें बांग्लदेश के उन किसानों की पीड़ा को दिखाया गया है जो अपने खेतों से वैसे ही प्यार करते थे जैसे राजा जनक अपनी पुत्री सीता से। अपने देश को छोड़कर चले जाने का दर्द क्या होता है –इस दर्द को शायद एक किसान से बेहतर कोई और नहीं समझ सकता जो अपनी देश की मिट्टी को सींच-सींच कर उसमें खेती करता है। जिस खेत में कभी फसलें लहलाहतीं थीं आज उसी में लोगों की लाशें सड़ रही हैं। एक आम किसान को यह भी नहीं पता कि वह अपने ही देश में अपने ही लोगों से क्यों लड़ रहे हैं ? एक स्वतंत्रता की लड़ाई अंग्रेजों से लड़ी थी क्योंकि वो विदेशी थे लेकिन अपनों से कैसा युद्ध ? क्या ये वाकई में युद्ध था या उससे भी भीषण कुछ और – सभी इसे युद्ध क्यों कहते हैं ? ……घरघर में आग लगाना, बाज़ारों और हाटों को लूटना, क्या इसी का नाम युद्ध है ? आंच लगने से मिट्टी को फोड़कर चीटियों का झुंड जिस प्रकार निकलता है, उसी प्रकार मनुष्य अपने घरद्वार छोड़कर निकल रहे हैं क्या इसी का नाम युद्ध है6.   जनक के मन में यह प्रश्न रह-रहकर आते हैं कि जिस युद्ध की वजह से उसका पोता मर गया, जिस युद्ध के कारण उसके पोते की बहू पागल हो गयी उस युद्ध से किसी को हासिल क्या होगा ? और अंत में जाकर उसे अपने सभी सवालों का जवाब मिल जाता है –‘जो काम जिस के लिए है उसे करते रहना भी एक युद्ध है।’ किसान का एक ही काम है अपने खेतों का ध्यान रखना, उसे बीमारी से बचाना – इसी कार्य को करने के लिए जनक बीच रास्ते में ही शरणार्थी कैंप को

छोड़कर अपने खेतों की तरफ लौट आता है –“जनक अपने खेत में खड़ा हुआ|…जेठ के महीने में धान के खेत का चारा सब्ज रहता है निराई नहीं हुई इसीलिए बीचबीच में घासफूस भी उगे हुए हैं……जनक पागलों की तरह घासफूस को उखाड़कर फेंकने लगा|…..बड़बड़ाता हुआ वह घासफूस को गालियाँ देने लगा मानो वो युद्ध कर रहा हो मिट्टी की गंध से उसे उत्तेजना मिल रही थी जिसका जो काम है वह उसे नहीं करने दिया जाए तो मनुष्य जिंदा कैसे रह सकता है…… मिट्टी की गंध और धानचारे की खुशबू में जनक अँधा हो गया बहरा हो गया इसलिए वह लोगों का चिल्लाना सुन नहीं सका देख नहीं सका कि सामने कौन हैं जो उस पर बन्दूक तान रहे हैं|”7.  बांग्लादेश की लड़ाई केवल सत्ता के लिए नहीं थी ये लड़ाई हर कोई अपने लिए लड़ रहा था – किसान अपने खेतों के लिए, बच्चे अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए, युवा अपने देश के लिए , सभी अपनी –अपनी इच्छाओं को जिंदा रखना चाहते थे। अपनी इच्छाओं को मरने नहीं देना यह भी तो एक युद्ध ही है| महाश्वेता देवी की यह कहानी भले ही बांग्लादेश की पृष्ठभूमि पर लिखी गयी हो लेकिन गौर से देखा जाए तो ये कथा हर उस देश की है जहाँ युद्ध जैसी भीषण परिस्थितियां बनी हुईं हैं। दरअसल ‘अणिमा’ के इस अंक में प्रकाशित हर कहानी आज भी प्रासंगिक है केवल इसलिए नहीं कि ये युद्ध में मारे गए उन लाखों लोगों की शहादत की याद दिलाती है बल्कि इसलिए कि वर्तमान समय में जो देश के हालात हैं उनसे लड़ने की शक्ति प्रदान करती है। ‘नील फूल’ जैसी कहानियां आज भी बंगलादेशी शरणार्थियों की स्थिति का वर्णन करती हैं जो अपने देश से दूर दूसरे देश में लोगों की दया के पात्र बने हुए हैं। जिनके मन में एक आशा आज भी जिंदा है कि कभी न कभी वह अपने बांग्लादेश के नील फूल ज़रुर देख सकेंगे।

अतीन वन्द्योपाध्याय की कहानी बांग्लादेश के लोग में धर्म और भाषा के नाम पर लोगों को मारने वालों पर करारा व्यंग्य किया गया है| धर्म और भाषा की लड़ाई में पिसने वाले बंगलादेशी लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर उन्हें मारा क्यों जा रहा है। क्यों उन्हें अपने ही देश में परदेसी बना दिया गया है| केवल इसलिए कि उनका धर्म इस्लाम है लेकिन भाषा बंगाली ? या इसलिए कि वह अपने अल्लाह के साथ-साथ माँ दुर्गा का भी नाम लेते हैं ? जो परिस्थितियां उस समय बांग्लादेश के समक्ष थीं वह आज भारत के सामने कश्मीर को

लेकर हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय धर्म के ठेकेदार अब्दुल वारी (कथा का नायक) के कपड़े उतारकर उसके मुस्लिम होने का सबूत मांगते हैं और आज के ठेकेदार फतवा जारी करके यह कहते हैं कि मुस्लिम औरतों के लिए बुर्का पहनना ज़रूरी है। समय ज़रुर बीत गया है लेकिन हालात ज्यों के त्यों बने हुए हैं।           

बांग्लादेश की गाथा को अपने कथा विशेषांक में जगह देकर अणिमा ने बांग्ला  साहित्य के महत्त्व को प्रतिपादित करने की कोशिश की है। निश्चित तौर पर यह कथा विशेषांक केवल बांग्ला  साहित्य की विशिष्टताओं को ही उजागर नहीं करता बल्कि साहित्य-सृजन की कला क्या और कैसी होनी चाहिए- इसकी भी प्रेरणा प्रदान करता है।

          अणिमा के इस कथा-विशेषांक से पूर्व ‘उत्कर्ष’ पत्रिका ने मई और सितम्बर 1971 के अंक में बांग्लादेशी कविताओं को प्रकाशित किया था। इन कविताओं की खासियत यह थी कि ये केवल  बांग्लादेश की पृष्ठभूमि पर ही आधारित नहीं थीं बल्कि बंगलादेशी कवियों द्वारा रचित थीं। इसके अतिरिक्त इस अंक में हिंदी कवियों की उन रचनाओं को भी शामिल किया गया जो बांग्लादेश की स्थितियों पर अपना मत स्पष्ट करते हैं। वेणु गोपाल, गोपी डढूला, वीर राजा, अप्रसाद दीक्षित जैसे कवियों ने यह साबित कर दिया कि केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि भारत के अन्य राज्य भी बांग्लादेश की क्रांति में उनके साथ हैं।  बांग्लादेश के कवियों की पंक्तियों को अपनी पत्रिका में आवाज़ देकर ‘उत्कर्ष’  ने  उन सोये हुए कवियों को जगाने की कोशिश की जो अभी भी क्रांति एवं स्वतंत्रता जैसे शब्दों से अनजान थे। जिनकी कविता अभी –भी प्रेयसी के केशों में उलझी हुई थी। दरअसल 1971 के बांग्लादेश पर केन्द्रित साहित्य हर उस लेखक, कवि एवं कलाकार के लिए एक प्रेरणा हैं जो सच को बाहर लाने से कतराता है। यह कवितायें केवल बांग्लादेश के लोगों को ही नहीं पुकार रही हैं बल्कि हर उस देश के नागरिक को जगा रही हैं जो अभी-भी परतंत्रता की ज़जीरों में जकड़ा हुआ है –

महाप्रलय की पुकार आई है

आगे बढ़ने की

शपथ लेने की

घरघर में।

खून में आया है आदिम ज्वार

उसी के प्रवाह में

हमने ली नई सौगंध

कोई भी बाधा का प्राचीर हम नहीं मानेंगे

कुंठित है, हम दुर्बल।

हम हैं भयंकर :

तोड़ेंगे हम

शत्रुओं का सारा बंधा

रचेंगे दूसरा

नया फंदा।8.

काजी हिमायातुल्ला की यह कविता क्रांति का आह्वान कर रही है। देश के हर नागरिक को उसके कर्त्तव्य की याद दिला रही है कि अब एक स्वतंत्र देश बनाने का वक्त आ गया है,इसलिए यह आवश्यक है कि हम सब मिलकर यह शपथ लें कि अब मरेंगे ही नहीं, मारेंगे भी। शत्रु-पक्ष का फंदा उसी के गले में डाला जाएगा और उसी के खून से बांग्लादेश का नया इतिहास लिखा जाएगा। ज़ाहिर है कि ऐसी कविता करना उस समय की मांग थी – क्रान्ति के आह्वान के लिए ज़रूरी है कि कवि आम-जनता के दिलों से मौत का डर निकाल फेकें क्योंकि सड़क पर पड़ी अपने देशवासियों की लाशों को देखकर कोई भी इंसान कमज़ोर पड़ सकता है। ऐसे हालातों में उसके अन्दर दबे आक्रोश को क्रान्ति का रूप दे देना ही कवि का कर्म था। शमसुर रहमान की कविता ‘लाश’ इसी कवि कर्म को निभाते हुए नज़र आती है –

यह लाश हम रखें तो कहाँ

भला इस लायक कब्र कहाँ

x-x-x-

चूं आज यह लाश नहीं रखता

मिट्टी में, पहाड़ में, सागर में

हर दिल में है ठांव इसका|”9.

बांग्लादेश की लड़ाई में शामिल हर शख्स अपने दिलो-दिमाग में इन लाशों के ढेर को सहजे बैठा है। सड़क पर पड़ी लाशें चीख रही हैं कि अब पीछे मत हटना। इन लाशों को पर्वत, पहाड़,मिट्टी दफ़न नहीं कर सकती क्योंकि अभी भी यह बंगवासियों के दिलों में जिंदा हैं, उनकी लड़ाई में उनके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ रही हैं, उन्हें प्रेरित कर रही हैं कि बिना रुके आगे बढ़ते चलो, मंज़िल करीब है।

हुमांयू आज़ाद की कविता ‘ब्लड बैंक’ भी देशवासियों के मनोबल को बढ़ाती हुई प्रतीत होती है। बांग्ला देश में बंगवासियों के खून की जो नदियाँ बह रही हैं दरअसल वो खून मातृभूमि के लिए ब्लड बैंक का काम कर रहा है। प्रस्तुत कविता में हुमायूँ आज़ाद बंगवासियों की शहादत को संबोधित करते हुए कह रहे हैं कि स्वतंत्रता की लड़ाई को खून से सींचना ही पड़ेगा अगर ऐसा नहीं किया तो तुम्हारा खून अस्पताल की बोतलों में पड़ा-पड़ा गन्दा हो जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि तुम अपना खून इस धरती पर बह जाने दो। धरती पर पड़ी तुम्हारे रक्त की एक बूँद दस गुना होकर तीव्र गति से शत्रु-पक्ष का सफाया कर रही है इसलिए आवश्यक है कि अपने इस ब्लड बैंक को स्वतंत्रता मिलने तक खाली न होने दो –

बंगाल की धरती पर रोज़ाना कैसा रक्तपात हो रहा है

हर बटोही कुछ लोहू दे जाता

ब्लड बैंक में : बंगाल की धरती पर……….

हर मजदूर अपनी मंजिल के पथ पर बिखेरता रक्त सूर्य बीज

स्कूल के बच्चे छात्र युवतीयुवक…….

सब लोग खून छोड़ जाते ब्लड बैंक में।

कौन भला अब ब्लडबैंक अस्पताल में रखे

वह लाल खून गन्दला जाता है

कांच शीशी और दवा के जहरीले स्पर्श से

बंगाल की धरती जैसा ब्लडबैंक कहीं नहीं

बूँद भर लाल खून

दस बूँद बन जाता उस बैंक में रखते ही

इसलिए अब कोई ब्लड बैंकअस्पताल जाता नहीं।10.

बांग्ला देश की हवा में अब मुक्ति की महक आने लगी है। मुक्ति की कल्पना भयभीत चेहरों पर मुस्कान के फूल खिलाने लगी है। स्वतंत्र देश की शुद्ध परिकल्पना कैसे बंगवासियों को भाव-विभोर कर रही है इसका चित्रण हसन हाफिसुर रहमान की इस कविता में मिलता है –

निसर्ग के गले में बंधे रंगगर्ती टाई की नाई

अनगिनत कनकौवे उड़ रहे हैं

सारे देश भर में एक भी अमरीकी झंडा नहीं

बे रोक टोक हवा के शुद्ध आवागमन से

बच्चों के ताज़े चेहरों पर मानों भिनसारे खिले फूल हों11

उपर्युक्त पत्रिकाओं में प्रकाशित बंगला साहित्य के विवेचन से यह स्पष्ट है कि बांग्ला  साहित्य में समसामयिक घटनाओं का चित्रण कितने मुखर रूप में हुआ है। बात भले ही देश की हो या देश के बाहर की बांग्ला  लेखक हर राजनीतिक एवं सामाजिक गतिविधि पर अपनी पैनी दृष्टि रखते है और उसे बड़ी ही बारीकी के साथ साहित्य में व्याख्यायित करते हैं। लेकिन तत्कालीन समय में बांग्ला  साहित्य में और किस प्रकार की साहित्यिक प्रवृत्तियां विद्यमान थीं – कैसी कहानी और कविता लिखी जा रही थीं, राजनीतिक मुद्दों के अलावा बंगला साहित्य और किन मुद्दों की ओर केन्द्रित था, इन प्रश्नों के जवाब जाने बिना तत्कालीन बंगला साहित्य को पूर्ण रूप से विवेचित नहीं किया जा सकेगा।ऊपर जिन कहानियों या कविताओं का ज़िक्र किया गया है वह एक विशेष दृष्टिकोण के अंतर्गत लिखी गयीं थीं लेकिन इसके अलावा बंगला कहानी या कविता का क्या स्वरुप है यह जानने के लिए कुछेक और पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों, कविताओं और लेखों का मूल्यांकन करना आवश्यक होगा –

बंगला कहानी   साहित्यिक प्रवृतियों के दृष्टि से देखा जाए तो 1950 से लेकर 1980 तक का समय काफी महत्त्वपूर्ण था। विशेषत: कहानी और कविता जैसी विधाओं के विकास की दृष्टि से। बंगला कहानी की बात करें तो इन तीस वर्षों में बंगला कहानी के स्वरुप में काफी परिवर्तन आया था।  ऐसा माना जाता है कि 50 के दशक में बंगाली कहानीकार मूलत: कथा के लिए या तो किस्सा-गोई की शैली पसंद करते थे या फिर पाठक के सामने चमत्कारिक शैली में कोई रोमांचकारी घटना का विवेचन कर देते थे। लेकिन 70 के दशक तक आते-आते लेखकों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आया। अब कहानीकार न तो किस्सागोई की शैली पसंद करते थे न ही उन्हें चमत्कारिकता में विश्वास था। संचेतनाके अप्रैलजुलाई 1967 के अंक में प्रकाशित लेख आज की बंगला कहानी में आलोक सरकार पूर्ववती एवं समकालीन बंगला कहानीकारों में अंतर स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि -” वर्तमान बंगला कहानी के चिंताशील एवं संचेतन रचयिताओं ने कहानीरचना के दायित्व को नितांत भिन्न अर्थ में ग्रहण किया है|……आज के कहानीकार कहानी तत्त्व को निकाल, चरित्र का निषेध कर, किसी भी प्रकार के उद्देश्य को वर्जित कर,कहानी को एकांत, एकमात्र शिल्पपरिणत का अर्थ देना चाहते हैं|…पच्चास के दशक के कहानीकार कहानी और कविता में अभिन्नता स्थापित करना चाहते थेबहुधा इसका सुपरिणाम होने पर भी अधिकांशत: यह आवेगपूर्ण रहा और किशोर भावुकता में सीमाबद्ध हो गया ….कुछ लेखक यौनआवेग के खुलासा वर्णन को ही आधुनिकता मानते हैं……जबकि आज के कहानीकार यौनविषय के बचकाने वादविवाद पर बहस नहीं करना चाहते ही समाजसुधार एवं उन्नयन का दायित्व ग्रहण करना चाहते हैं ये केवल कहानी लिखना चाहते हैं|”12. ज़ाहिर है कि नये कहानीकार एक नया तरह का प्रयोग साहित्य में करना चाह रहे थे – उद्देश्य विहीन कहानी लिखना जिसमें पात्रों या कहानी तत्व की प्रधानता न होकर केवल शिल्प का आधिपत्य हो, यह भी तो एक तरह का नया प्रयोग ही हुआ। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि 50 के दशक के कहानीकार केवल किस्सागोई शैली में ही रचनाएँ करते थे या उनकी कहानी में कौरी भावुकता थी।  यहाँ पर ताराशंकर वन्द्योपाध्याय की कहानी मोतीलाल की चर्चा करना आवश्यक है जो कल्पना के फ़रवरी 1953 के अंक में प्रकाशित हुई थी। 50 के दशक में लिखी गयी ये कहानी हर लिहाज़ से उत्कृष्ट है। यह कहानी हाशिये पर पड़े उस आदमी की स्थिति का वर्णन कर रही है जो दलित होने के साथ –

साथ अपनी कुरूपता का मूल्य भी प्रतिदिन समाज के ठेकेदारों को देता है। कहानी में मोतीलाल और उसकी पत्नी देखने में आम इंसानों जैसे नहीं हैं।उनकी कुरूपता को लेकर गाँव भर में चर्चा है। यही वजह है कि मोतीलाल नुक्कड़ नाटकों में रूप बदल-बदलकर हर प्रकार की भूमिकाएं निभाता है। लेकिन उसकी पत्नी भुवन को यह बात पसंद नहीं है वो चाहती है कि उसका पति कोई काम पकड़ ले ताकि आगे चलकर बच्चे हों तो उनका पालन-पोषण भी अच्छे से हो। लेकिन मोतीलाल इससे इक्तिफाक नहीं रखता। उसे लगता है कि उसका रूप ही उसकी पहचान है अत: वो जो कार्य कर रहा है वो ही ठीक है। इसी उधेड़बुन में कहानी आगे बढ़ती है और एक दिन गाँव के किसी माननीय व्यक्ति की बेटी मोतीलाल का रूप देखकर बेहोश हो जाती है। मोतीलाल लड़की का स्वास्थ्य जानने की नीयत से उसके घर जाता है जहाँ उसका स्वागत लात और घूंसों से किया जाता है। मोतीलाल किसी तरह घर पहुँचता है और अपनी पत्नी से कहता है -“हम लोगों का लड़का हम लोगों की तरह ही काला और कुत्सित होगा भुवन ! ज़रूरत नहीं है हमें बालबच्चों की|”13. कहानी का अंत समाज के घिनौने चेहरे से पर्दा उठाता है जो मानवीय संवेदना को महत्त्व न देकर जाति एवं रंग-रूप पर जोर देता है। हाशिये पर पड़े व्यक्ति में न तो इतनी हिम्मत है और न ही इतना धैर्य कि वह इन रुढ़िवादी परम्पराओं के खिलाफ लड़े। इसलिए इसे ही अपनी नियति मानकर ये अपने हालातों के साथ समझौता कर लेते हैं। यह कहानी समाज की एक समस्या की ओर ध्यान आकर्षित अवश्य करती है लेकिन कहानी कोई उपदेश नहीं देती। पूरी कहानी का शिल्प-विधान भी बेजोड़ है। शुरू से लेकर अंत तक कहानी की भाषा पाठकों को बांधे रखती है। कहानी में चित्रित परिस्थितियां एक के बाद एक स्वयं ही कहानी की गति को आगे बढ़ाती हैं। हाँ यह ज़रुर है कि इस कहानी का एक उद्देश्य है। लेकिन एक बात गौर करने लायक है कि अगर साहित्य में से उद्देश्य तत्त्व का ही लोप कर दिया जाएगा तो साहित्य का अर्थ ही क्या रह जाएगा ? नये कहानीकारों का नया प्रयोग हैकेवल कहानी लिखना है- लेकिन क्या कोई कहानीकार उद्देश्य विहीन कहानी लिखा सकता है ? किसी नयी रचना का सृजन करना अपने आप में एक उद्देश्य है इसलिए भले ही कोई कहानीकार ये मानकर चले कि उसने एक उद्देश्यहीन कहानी की रचना की है लेकिन पाठक उस कहानी के लिए कोई न कोई उद्देश्य ढूंढ ही लेगा। जहाँ तक बात नए कहानीकारों की है तो उन्होंने ज़रुर ऐसी कथाओं की रचना की जिसमें कहानी तत्त्व और चरित्र प्रधानता दोनों का ही लोप था। संचेतनाके अप्रैलजुलाई 1967 के अंक में रमानाथ राय की बंगला कहानी दरवाज़ाप्रकाशित हुई। सन् 60 के बाद जिस नयी चाल की कहानी की चर्चा शुरू हुई ये उसमें

बिलकुल फिट बैठती है। इस कहानी में प्रधान पात्र है एक ‘पुराना दरवाज़ा’ जिसे लक्ष्य करके कहानी लिखी गयी है| दरवाज़े के पीछे से सीढ़ियाँ उतरते आदमियों की कुछ-कुछ आवाजें आती हैं और ऐसा लगता है कि ये दरवाज़ा टूट जाएगा।लेकिन वह दरवाज़ा ज्यों का त्यों यूँ ही खड़ा है। कहानी का मूल्यांकन करने के पश्चात् ऐसा लगता है कि जो आवाजें दरवाज़े के पीछे से सीढ़ियाँ उतरते हुए लोगों की आ रही हैं वो केवल सहायक पात्र हैं, जिनका उपयोग उस दरवाज़े की महत्ता को प्रतिपादित करने के लिए किया गया है। कितने ही वर्षों से यह दरवाज़ा खड़ा है। हजारों लोग सीढ़ियों से उतरते –चढ़ते हैं दरवाज़ा उन सभी को देखता है, उनकी बातें सुनता है लेकिन कोई उस दरवाज़े की ओर ध्यान नहीं देता। दरवाज़ा हर अच्छी-बुरी बात को ध्यान से सुन रहा है लेकिन चाहकर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहा क्योंकि उसकी मजबूरी है, वो निर्जीव है, उसकी आवाज़ कोई सुन नहीं सकता। लेकिन आज का मनुष्य तो बोल सकता है  सुन सकता है,  देख सकता है फिर भी जानबूझकर अँधा,बहरा,गूंगा बना हुआ है ?  ऐसा लगता है यह कहानी आधुनिक मनुष्य की प्रवृत्ति को विवेचित कर रही है जो अच्छे-बुरे में भेद तो जानता है लेकिन सही को सही और गलत को गलत कहने से कतराता है। कहानी के अंत में दरवाज़े की पीछे से आ रही आवाजों से ऐसा लगता है जैसे कि इस बार दरवाज़ा ज़रूर टूट जाएगा –पैरों की धम-धम से नहीं बल्कि मनुष्य के गिरते हुए व्यवहार से जिसे एक दरवाज़ा तो महसूस कर रहा है लेकिन इंसान नहीं – और ? /एक मंथली था /और ?/सिनेमा का टिकट था / और ?/ कुछ रुपए थे / और?/एक ब्लेड था /और?/…….और किसी के घर का पता था / और ?/……..दरवाज़े के भीतर से आवाज़ आने लगी धम..धम ….दरवाज़ा इस बार टूटकर गिर पड़ेगा14.  प्रस्तुत कहानी के शिल्प-विधान से स्पष्ट है कि 60 के दशक का लेखक किस तरह की कहानियां लिखना चाह रहा था। केवल नया प्रयोग ही नहीं बल्कि कहानी के स्वरुप को ही नया आकार देने में लगा हुआ था। ‘नई धारा’ पत्रिका में प्रकाशित सभी बंगला कहानियां नए प्रयोग पर ही आधारित हैं । समरेश बसु की कहानी ‘अनजाने’ जहाँ एक ओर आधुनिक –पति और पत्नी के संबंधों को नए रूप में व्याख्यायित करती है वहीं मिहिर आचार्य की कहानी ‘तीर्थ यात्रा’ प्रतीकात्मक रूप में अन्धविश्वास और विश्वास के बीच के भेद को स्पष्ट करती है। ‘नई धारा’ पत्रिका में प्रकाशित अधिकतर बंगला कहानी प्रतीकात्मकता एवं रहस्यवाद का आभास कराती हैं जिससे लेखक की परिकल्पना पर कभी-कभी आश्चर्य  होता है तो कभी-कभी खीझ भी चढ़ती है कि कहानी को इतना दुरूह बनाने की क्या आवश्यकता थी। इसका स्पष्टीकरण देते हुए आलोक सरकार कहते हैं कि – आज के

लेखक मानते हैं कि उनकी कहानी प्रधानत: ऑब्जेक्टिव होगी….ओब्जेक्टिविटी से उनका तात्पर्य है कि कहानी को किसी चरित्र के दृष्टिकोण से रचने की प्रक्रिया मान्य नहीं होगी……लेकिन अधिकतर कहानीकार जिस वस्तुनिष्ठ कहानी की बात करते हैं वे प्राय: उसे कार्यान्वित नहीं कर पाते। उनकी कहानियां पढ़कर, उनकी आत्मनिष्ठता (subjectivity) स्पष्ट हो जाती है….कोई भी साहित्य पूर्णत: वस्तुनिष्ठ हो ही नहीं सकता क्योंकि उसके प्राणउत्स में रहता है एक सब्जेक्ट अर्थात लेखक15.  आलोक सरकार का यह कथन पुराने और नए कहानीकारों के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए नये लेखकों के विज़न को पूर्णत:रेखांकित करता है। हालाँकि इस बिना पर ये नहीं कहा जा सकता कि नए कहानीकार अपने इस प्रयोग में सफल नहीं हुए। एक ओर जहाँ रमानाथ राय, शेखर बसु, कल्याण सेन जैसे लेखकों ने अपने नए विज़न में कहानी को ढालकर बंगला साहित्य को समृद्ध किया है। वहीं दूसरी ओर 50 के दशक के बुद्धदेव बसु,ताराशंकर वन्द्योपाध्याय जैसे कहानीकारों की चर्चा किये बिना बंगाली कहानी का इतिहास अधूरा ही रहेगा।

बंगला कविता – लघु पत्रिकाओं में जितना स्पेस बंगला कहानी को दिया गया है उतना किसी अन्य विधा को नहीं दिया गया। यहाँ तक कि बंगला कविता भी इन लघु पत्रिकाओं की नज़रों से ओझल ही रही। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि 50 के दशक में जितना महत्त्व गद्य का बढ़ा उतना पद्य का नहीं। गद्य की नयी-नयी विधाओं ने साहित्य में अपना स्थान बनाना शुरू कर दिया था इसलिए इन पत्रिकाओं ने भी नई विचारधारा का अनुसरण करते हुए गद्य को अधिक महत्त्व दिया। शायद यही वजह रही हो कि  बंगला कविता पर इन पत्रिकाओं में कोई विशेष चर्चा नहीं हुई है। ‘कल्पना’ के मई 1956 के अंक में ‘बांग्ला  कविता’ पर रवीन्द्रनाथ देव का लेख प्रकाशित हुआ था। प्रस्तुत लेख में आरंभिक युग से लेकर आधुनिक युग तक के बांग्ला  कविता के स्वरुप का विवेचन किया गया है।  बौद्ध भिक्षु के चर्या पदों से लेकर जीवनानंद दास की स्वछन्द कविता तक किस प्रकार बांग्ला  कविता का रूप परिवर्तित होता गया इसका संक्षेप में विवेचन किया गया है। इसके अतिरिक्त ‘उत्कर्ष’, नयी धारा, लहर जैसी पत्रिकाओं ने अपने कुछ अंकों में समसामयिक मुद्दों पर बंगाली कविताओं को प्रकाशित किया है। इन पत्रिकाओं में प्रकाशित बंगला कवितायें मुख्य रूप से तत्कालीन राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों का विवेचन करती हुई दिखाई देती हैं। ‘नई धारा’ के दिसम्बर

1967 के अंक में त्रिदिब मित्र की एक लम्बी कविता ‘हत्याकांड’ प्रकाशित हुई थी। दरअसल सन् 60 के दशक में हंगरी जेनरेशन मूवमेंट ने बंगला संस्कृति एवं साहित्य की तस्वीर को कुछ समय के लिए पूरी तरह से बदल कर रख दिया था। त्रिदिब मित्र भी इस आन्दोलन के सक्रिय प्रचारकर्ताओं में से एक थे। उनकी यह कविता तत्कालीन समय के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने में समेटे हुए है। राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों का केवल ज़िक्र भर ही नहीं है बल्कि आधुनिक मनुष्य  उनमें किस तरह फंसा हुआ है इसका विस्तार से उल्लेख किया गया है। स्वार्थ,लालच,भय, क्रोध,प्रेम इन सबके बीच पिसते हुए मनुष्य का चित्रण इस कविता का केंद्रीय बिंदु है। आधुनिक युग का मनुष्य इतना हताश और निराश हो गया है कि वह अपनी हत्या अपने ही हाथों से करना चाहता है लेकिन मृत्यु भी मनुष्य के इस स्वरुप को देखकर भाग खड़ी होती है –

मुझे बारबार ज़िन्दगी से फिसल कर ज़िन्दगी के फंदे में

फंसना पड़ रहा है

मृत्यु केवल मेरे साथ प्रतारणा कर रही है………

अस्वाभाविक मृत्यु भी मेरे डर से फरार होकर भाग रही है

क्योंकि मैं सरल आँखों से मृत्यु के पास गया था

डर से उसकी आँखें सिकुड़ गयीं थीं

अंधी आँखों से सिर झुकाकर वह रो पड़ी थी।16.

आज के मनुष्य के समक्ष सबसे बड़ी दुविधा है उसका डर। वह डर जिसके कारण वे अपनी आत्मा की आवाज़ को अनदेखा कर देता है, वह डर जिसकी वजह से वे स्वतंत्र होकर भी पराधीनों की ज़िन्दगी जीता है। इस डर ने इंसान को इतना कुत्सित बना दिया है कि वह अपने आप का सामना नहीं कर पाता-

स्वाधीनता के हाथ पर कोई हाथ नहीं रख पा रहा है डर से

ओह मेरे और सभी के बीच में तैयार हो रही है

एक लम्बी, गहरी खाई………….

सारे शरीर छानबीन कर आत्मा ढूंढे नहीं मिल रही है

मैं एक बार भी अपनी ओर मुड़कर नहीं देख पा रहा हूँ।17.

हंगरी जेनरेशन मूवमेंट से प्रभावित यह कविता बँगला साहित्य में आये बदलाव को भली-भांति प्रतिपादित करती है। सन् 60 के बाद की कविता का ध्येय केवल भारी-भरकम शब्दों के माध्यम से काव्यात्मकता का निरूपण करना नहीं था बल्कि एक ऐसी सच्चाई से मनुष्य को वाकिफ करवाना था जिससे वो कोसों दूर है। ज़ाहिर है कि बांग्ला  कवियों ने पूरी ईमानदारी के साथ अपने इस दायित्व को निभाया है।

 निष्कर्ष-       उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिंदी की लघु पत्रिकाओं ने बंगला साहित्य को केवल अपनी पत्रिकाओं में प्रकाशित ही नहीं किया बल्कि बंगला साहित्य को समझने की एक नयी दृष्टि भी प्रदान की है। हालाँकि अधिकतर लघु पत्रिकाओं में समकालीन बंगला कहानी को ही अधिक प्रश्रय दिया गया है, फिर भी बंगला साहित्य में होने वाले नए प्रयोगों और लेखकों के नयी विचारधारा की जो तस्वीर सामने आती है वह निश्चित रूप से हिंदी साहित्य के वर्तमान और भविष्य के लिए मार्ग प्रशस्त करती है।

संदर्भ

  1. संपा- देवड़ा,शरद.( नवम्बर-1971). ‘अणिमा’,कलकत्ता , वर्ष-7, ‘बांग्लादेश कथा विशेषांक’,पृष्ठ संख्या-20.
  2. वही,पृष्ठ संख्या -27
  3. वही,पृष्ठ संख्या -35
  4. वही,पृष्ठ संख्या – 41- 42  
  5. वही,पृष्ठ संख्या – 44. 
  6. वही,पृष्ठ संख्या – 129.
  7. वही,पृष्ठ संख्या – 133.
  8.  संपा – उपाध्याय,गोपाल, उपाध्याय,घनानंद.( मार्च –अप्रैल, 1971). ‘उत्कर्ष’,लखनऊ, वर्ष -12, अंक -3-4, ‘सात समंदर :दस दिगंत बंगलादेश’ , पृष्ठ संख्या -25.
  9.  वही,पृष्ठ संख्या -27.
  10.  वही,पृष्ठ संख्या -26.
  11. वही,पृष्ठ संख्या -27
  12. संपा-सिंह,महीप, बग्गा,कुलदीप.(अप्रैल –जुलाई ,1967). ‘संचेतना -3’,दिल्ली, ‘आज की बंगला कहानी’, पृष्ठ संख्या :- 65-66-67.
  1. संपा- शर्मा, डॉ.आर्येन्द्र. (फ़रवरी -1953). ‘कल्पना’, हैदराबाद, वर्ष-4, अंक-2, पृष्ठ संख्या -164.
  2. संपा-सिंह,महीप, बग्गा,कुलदीप.(अप्रैल –जुलाई ,1967). ‘संचेतना -3’, ‘आज की बंगला कहानी’, पृष्ठ संख्या :-73- 74
  3. वही, पृष्ठ संख्या -68.
  4. संपा- सिंह,उदयराज.(दिसम्बर 1967 – जनवरी 1968) ‘नई धारा’,पटना, ‘हत्याकाण्ड –त्रिदिब मित्र’, वर्ष -18, अंक :- 9-10, पृष्ठ संख्या, 23.
  5. वही, पृष्ठ संख्या – 26.

                                                                                  अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली में अध्यापन

                                                                        nkjn989@gmail.com

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मीडिया में राष्ट्रवाद की बहस- राकेश कुमार

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सारांश :-

प्रस्तुत शोध आलेख मीडिया में मौजूदा राष्ट्रवाद, देशद्रोही, देशभक्त और हिंसा की बहस और उसके विभिन्न पहलुओं को मौजूदा समय से व्याख्यायित करने की पहल करता है। राष्ट्र और राष्ट्रवाद दो ऐसे विचार रहे है जिन पर कई सालों से हर अलगअलग देश में विचारविमर्श हुआ है। राष्ट्र और राष्ट्रवाद का उदय हर देश में एक समान नहीं रहा है और न ही राष्ट्रवाद के परिणाम। भारत में राष्ट्रवाद का उदय उपनिवेशी सत्ता के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के लिए हुआ था। राष्ट्रवाद ने भारत की स्वतंत्रता में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया था। स्वतंत्रता के इतने सालों बाद मीडिया में एक बार फिर राष्ट्रवाद और इसका विमर्श केंद्र में है। प्रस्तुत शोध आलेख इसी विमर्श और बहस का आलोचनात्मक परीक्षण करने का प्रयास करता है।

प्रमुख शब्द :- राष्ट्रवाद, मीडिया, आन्दोलन, वर्तमान राष्ट्रवाद, देशद्रोही, देशभक्त और हिंसा।

परिकल्पना :- राष्ट्रवाद एक नकारात्मक विचार है।

शोध प्रविधि:- प्रस्तुत शोध आलेख में द्वितीयक स्रोतों का प्रयोग किया गया है जिसमे पुस्तकें एवं अखबार शामिल है।

 शोध विस्तार

राष्ट्रवाद:-

राष्ट्र एक लगातार निर्माण की प्रक्रिया है। एक राष्ट्र का अपना एक इतिहास, संस्कृति, सभ्यता, प्रतीक, गान इत्यादि होते है। जब उस राष्ट्र का व्यक्ति या नागरिक अपने राष्ट्र के इतिहास, संस्कृति, सभ्यता, प्रतीकों और गान के प्रति एक सम्मान की भावना रखते है तो उसे राष्ट्रवाद कहा जा सकता है। सरल अर्थों में अपने राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना राष्ट्रवाद है।

राष्ट्रवाद को लेकर विभिन्न-विभिन्न विचारकों के अलग-अलग मत रहे है। अर्नेस्ट गैलनर ने राष्ट्रवाद को एक ऐसी विचारधारा के रूप में देखा जिसका जन्म और आगमन आधुनिक काल में हुआ है। वे कहते है कि “जहां सामंतवादी समाज अपने सामंतवादी बंधनो एवं संबंधो से जुड़े होते है, वहीं आधुनिक औद्योगिक समाज में कोई बंधन नहीं बन पाता क्योंकि यह समाज अधिक गतिशील एवं प्रतिस्पर्धी होता है इसलिए कुछ मूल्यों और विचारधाराओं का होना जरूरी है,

जो समाज की सांस्कृतिक साम्यता को बनाए रखे। जिसका आधार राष्ट्रवाद है।” (अभय प्रसाद सिंह, “भारत में राष्ट्रवादपृष्ठ3)

औद्योगिक समाज एक ऐसा समाज होता है जिसका संबंध हर तबके के व्यक्ति से होता है और यह संबंध हमेशा से ही अपने स्वभाव में प्रतिस्पर्धी और प्रयोगकर्ता होते है। ऐसी अवस्था में हमे एक ऐसे सन्तुलित आधार की जरूरत होती है जो इन संबंधो में एक समानता बनाए रखे और यही समानता का आधार राष्ट्रवाद होता है।

इरिक हॉब्सवॉम राष्ट्रवाद को राजनीतिक विचार के रूप में देखने की कोशिश करते है। उनका मानना था कि किसी भी राष्ट्र की कोई पुरानी नृजातीय परंपरा नहीं होती। वे कहते है कि “प्राचीन परंपरा में विश्वास, सांस्कृतिक शुद्धता, ऐतिहासिक निरंतरता सब एक झूठी कल्पना है, जो स्वयं राष्ट्रवाद द्वारा ही बनाई गई है। यह तो राष्ट्र था जिसने अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए राष्ट्रवाद को जन्म दिया।” (अभय प्रसाद सिंह, “भारत में राष्ट्रवादपृष्ठ4)

हम पुराने समाजों को देखे तो हम पाएंगे कि पुराने समाजों में एक नृजातीय परंपरा होती थी। यह नृजातीय परंपरा कबीलाई समाज के रूप में होती थी। पुराने दौर में मानव जीवन एक-दूसरे पर निर्भर था। यह वह दौर था जब मानव समाज कबीलों में रहा करता था। जीवनयापन और सुरक्षा की दृष्टि से लोग कबीलें बनाकर रहा करते थे। हर कबीलें के लोगों में एक दूसरे के प्रति विश्वास की भावना होती थी, जो कबीलों का मुख्य आधार हुआ करती थी। यही संबंध लगातार विकसित होते गए और जिसने आधुनिक युग में राष्ट्रवाद का रूप लिया।

बेनेडिक्ट एंडरसन राष्ट्रवाद पर लिखते हुए कहते है कि “राष्ट्रवाद को लोग आवश्यकता से अधिक महत्व दे रहे है। क्या ही अच्छा हो कि हम इसे लोगों की आयु और लिंग के समान अध्ययन और विवेचन का कारक भर माने, राष्ट्रवाद को फासीवाद या उदारवाद जैसी किसी विचारधारा से जोड़ने से बेहतर है इसे सामाजिक व्यवहार या धर्म जैसा ही एक तत्व माना जाए और आवश्यकता से अधिक महत्त्व नहीं दिया जाए।” ( Benedict Anderson, “Imagined Communities”, Page no.5) 

इतिहास में कई ऐसे उदहारण है जब राष्ट्रवाद अपने स्वभाव में उग्र हुआ और दो राष्ट्रों के बीच या राष्ट्र के भीतर दो समुदायों के बीच हिंसा के माहौल ने जन्म ले लिया इसलिए एंडरसन का मानना था कि ‘हमें राष्ट्रवाद को आवश्यकता से अधिक महत्व नहीं देना चाहिए।’

एंडरसन कहते है कि “मैं राष्ट्रवाद की मानक सम्बन्धी यह परिभाषा देना चाहूंगा कि यह एक काल्पनिक राजनैतिक समुदाय भर है और काल्पनिक तौर पर ही यह आरंभ से सीमित और स्वायत्त दोनों रहा है।” (Benedict Anderson, “Imagined Communities”, Page no.5-6) 

एंडरसन राष्ट्रवाद को एक काल्पनिक विचार इसलिए मानते है क्योंकि किसी भी राष्ट्र में ऐसे कई लोग या नागरिक होते है जो एक ही राष्ट्र के भीतर वास करते है लेकिन वास्तविक रूप में कभी एक दूसरे को देख या जान नहीं पाते लेकिन तब भी वह यह मानते है कि वह एक ही राष्ट्र के सदस्य है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि राष्ट्रवाद की कोई अंतिम परिभाषा नहीं हो सकती है । यह एक ऐसी भावना है जो काल, देश, समय के अनुसार लगातार बदलती रहती है और स्वभाव में परिवर्तनशील होती है।

मीडिया और राष्ट्रवाद की मौजूदा बहस :- 

मीडिया में राष्ट्रवाद पर जो मौजूदा विमर्श हुआ, उसकी शुरुआत शैक्षणिक संस्थान से हुई। नौ फरवरी 2016 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से राष्ट्रवाद पर बहस शुरू हुई । इस बहस में कई बिंदु थे जैसे भाषा, धर्म, अभिव्यक्ति की आज़ादी, असहमति का अधिकार, समानता का अधिकार, देशभक्त बनाम देशद्रोही आदि। 

मीडिया ने शैक्षणिक संस्थान की इस बहस को व्यापक पटल पर रखा और टीवी चैनल्स, पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से राष्ट्रवाद की इस बहस को विमर्श में तब्दील कर इसके सभी बिंदुओं और आधारों पर एक व्यापक बातचीत की।

मीडिया में राष्ट्रवाद पर जो विमर्श हुआ, उनमें एक मुद्दा भाषा का भी था। निवेदिता मेनन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राष्ट्रवाद पर अपने भाषण के दौरान कहती है कि “प्रोफ़ेसर आयशा किदवई के लेक्चर के बाद किसी ने यह सवाल उठाया था कि एक राष्ट्र बनने के लिए एक भाषा होनी चाहिए, तो वह भाषा कौन सी भाषा होगी? कौन-सी ज़ुबान होगी?” (Azad.R, Nair.J, Singh.M, & Roy.M.S, (Edited) “What The Nation Really Needs To Know; The JNU Nationalism Lectures”) 

अगर हम भारतीय राष्ट्रवाद को देखे तो हम पाते है कि आज़ादी की लड़ाई में सभी वर्गों और समुदायों के लोगों ने अपना समान योगदान दिया था, इन वर्गों के लोग भिन्न-भिन्न भाषा बोलने वाले लोग थे। ज़ाहिर सी बात है कि भारतीय राष्ट्रवाद के मूल में भाषाई विविधता भी है। भारतीय राष्ट्रवाद ने भाषाई विविधता के साथ जन्म लिया था इसलिए भारतीय राष्ट्र के सन्दर्भ में किसी एक भाषा को ज्यादा महत्व नहीं दिया जा सकता है।

आनंद कुमार अपने वक्तव्य में कहते है कि “हमारे मुल्क में नेशनलिज़्म को बनाने और पहचानने के लिए जो विमर्श चला उनमें से एक विचार तो यह वाला था कि बिना एक प्रभुत्व पहचान के राष्ट्र निर्माण कैसे होगा।” (Azad.R, Nair.J, Singh.M, & Roy.M.S, (Edited) “What The Nation Really Needs To Know; The JNU Nationalism Lectures”) 

भारत जब उपनिवेशी सत्ता के विरुद्ध अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, तब सभी वर्गों ने उस लड़ाई में अपना बहुमूल्य योगदान दिया था। ऐसे में हमें इस बात की आवश्यकता थी कि हम एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करें जहाँ सभी वर्गों के लोगों को समान दर्जा, समान अवसर और समान लाभ मिले। हमें जरुरत एक ऐसे विचार और पद्धति को अपनाने की थी जिसमें बिना किसी एक प्रभुत्व पहचान और बिना किसी एक पहचान को विशेष दर्जा देते हुए समावेशी पहलू से राष्ट्र निर्माण हो सके। आज़ादी के बाद हमने एक ऐसे संविधान को अपनाया जिसमें सभी के लिए समान दर्जा और समान अवसर थे। आने वाले दिनों में भाषा के आधार पर राज्य बने और भाषाई विविधता होते हुए भी सभी राज्य एकजुटता के साथ भारतीय संविधान के दायरे में रहे।

योगेंद्र यादव कहते है कि ” राष्ट्रवाद पर जो विमर्श हुआ है, उसका सबसे दुःखद पहलू इसकी फ्रेमिंग है। यह सारा विमर्श दो पक्षों में विभाजित है। दोनों पक्षों का एक भी वर्ग भारतीय राष्ट्रीयता का सच्चा वारिस नहीं है।” ( योगेंद्र यादव, “राष्ट्रवाद की चुनौतियाँअदहन पत्रिका।)

एक देश की राजनीतिक व्यवस्था एक मज़बूत व्यवस्था होती है और इस व्यवस्था की पहुँच समाज में सबसे ज्यादा गहरे और व्यापक स्तर तक होती है। राजनीतिक बदलाव देश में नई परिस्थितियों को जन्म देता है। अगर हम भारत में उपनिवेशी शासन को देखे तो हम पाते है कि आजादी की लड़ाई के दौरान भारतीयों ने अंग्रेजों के खिलाफ कई आंदोलन छेड़े और इन्हीं आंदोलनों के कारण उस समय की राजनीतिक व्यवस्था में अनेक परिवर्तन हुए और यही परिवर्तन अपने आप में भारतीय राष्ट्रवाद के जन्म का आधार बना लेकिन वर्तमान दौर को देखा जाए तो कहीं न कहीं आंदोलनों के प्रयोग पर भी सवाल खड़े हुए है। मीडिया में राष्ट्रवाद का जो मौजूदा विमर्श हुआ। उस विमर्श ने इस सवाल को तो खड़ा किया ही कि एक लोकतंत्र में आंदोलनों की बेहद बड़ी भूमिका होती है लेकिन यह विमर्श साथ में ये भी बताता है कि आंदोलनों का सही प्रयोग बेहद ही आवश्यक है।

” स्वाधीनता प्राप्ति के लक्ष्य ने जिस प्रकार की राष्ट्रीयता को जन्म दिया उसमें विषम आर्थिक विकास और जाति व्यवस्था पर टिके समाज के विभिन्न समुदायों की विशिष्ट जरुरतों को अलग-अलग सुनना और उनके लिए संघर्ष करना प्रमुख नहीं था। अतः बहुत से जरूरी मुद्दे जिनमें स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों के मुद्दे महत्त्वपूर्ण थे- फर्श के नीचे खिसका दिए गए। राष्ट्रवाद के भीतर जिस मनुष्यता की रक्षा करने की जरूरत थी, वह न हो सका।” (सुधा सिंह, “राजनीति: समावेशी राष्ट्रवाद बनाम प्रतीकवाद” , जनसत्ता।)

राष्ट्रवाद का समकालीन विमर्श जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से शुरू हुआ और जाधवपुर विश्वविद्यालय और दिल्ली के रामजस महाविद्यालय जैसे कई पड़ाव से गुजरा। मीडिया में राष्ट्रवाद के इस समकालीन विमर्श में दो शब्द मुख्य रूप से केंद्र बिंदु में घूमते रहे, पहला “देशभक्त” और दूसरा “देशद्रोही” । 

विचारधारा के स्तर पर ये विमर्श दो वर्गों में विभाजित था। एक वर्ग मुख्य रूप से वामपंथ विचारधारा से जुड़ा था और दूसरा वर्ग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (दक्षिणपंथ) से जुड़ा हुआ था। 

वामपंथ विचारधारा का मानना था कि संविधान के अनुसार चलना ही देशभक्ति है, इसके समर्थनकारी यह भी बोलते कि भारत का संविधान हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी प्रदान करता है और इस अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाना सही नहीं है।

वहीं दूसरी ओर जो वर्ग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (दक्षिणपंथ) से जुड़ा हुआ था, उसका मानना था कि यह सही है कि भारत का संविधान अभिव्यक्ति की आज़ादी प्रदान करता है लेकिन यह सही नहीं है कि हम उस अभिव्यक्ति की आज़ादी का ग़लत इस्तेमाल करे और उसका प्रयोग देश की एकता को तोड़ने में करे। हर वह अभिव्यक्ति की आज़ादी जो देश को तोड़ने की बात करती हो वह निश्चित रूप से गलत ही है। अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रयोग तो देश की एकता को बनाए रखने और देश के विकास में होना चाहिए।

राष्ट्रवाद के इस विमर्श, रामजस महाविद्यालय प्रकरण और अभिव्यक्ति की आज़ादी के मुद्दे पर बोलते हुए राकेश सिन्हा कहते है कि ” घटना आधारित विमर्श और विचार आधारित विमर्श में अंतर होता है। अभी जो घटना घटी, ऐसी दस घटनाएं दस-पाँच दिन में शांत हो जाएगी। यह घटना आधारित विमर्श है। कोई आया, उसे रोका गया, धरना दिया गया ऐसी घटनाएं घटती रहती है। मैं अभिव्यक्ति की आज़ादी को बड़े परिप्रेक्ष्य में देखता हूँ।” (राकेश सिन्हा, “बारादरी” , रविवारीय स्तंभ, जनसत्ता)

राष्ट्रवाद के इस समकालीन विमर्श में हर पहलू थे, राष्ट्रवाद के इस समकालीन विमर्श ने सभी मुद्दों को समेटने की कोशिश की। अगर अभिव्यक्ति की आज़ादी को देखा जाए तो हम सब मानते है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी एक लोकतंत्र का प्राणतत्व होती है। एक लोकतंत्र के मज़बूत होने का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वह लोकतंत्र अपने नागरिकों को या अपनी जनता को अभिव्यक्ति की कितनी आज़ादी प्रदान करता है। 

दूसरी तरफ यह भी जरूरी है कि हम लोकतंत्र में संविधान द्वारा दिए गए अपने समस्त अधिकारों का एक उचित प्रयोग सही और सकारात्मक दिशा में करे। हमें चाहिए कि हम अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग संविधान के ही दायरे में करे। यदि संविधान द्वारा दिए गए किसी अधिकार का गलत प्रयोग होता है तो आखिरकार वह गलत प्रयोग हमारे लोकतंत्र और राष्ट्र की एकता को ही नुक़सान पहुंचाएगा और साथ में यह भी सही नहीं कि हम किसी को उसके विचारों और इच्छाओं को अभिव्यक्त करने से रोके। अभिव्यक्ति की आज़ादी का सकारात्मक प्रयोग इस तरीके से होना चाहिए जिससे एक राष्ट्र की बुनियाद और उसके संविधान की मजबूती बनी रहे।

राष्ट्रवाद के इस विमर्श में एक मुख्य बिन्दु ऐसा भी था जिसने उपनिवेशी सत्ता के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया था, वह मुख्य बिंदु था “भारत माता की जय” का नारा राष्ट्रवाद के इस समकालीन विमर्श में “भारत माता की जय” के नारे को कुछ लोगों ने हिंदुत्ववादी नारा कहा और इसे बोलने से इंकार कर दिया। 

योगेंद्र यादव कहते है कि ” भारत माता की जय, कोई राइट विंग हिन्दुत्व राष्ट्रवादियों का स्लोगन नहीं था, इस देश में “भारत माता की जय”, हमारे राष्ट्रीय आंदोलन का बिल्कुल मैनस्ट्रीम स्लोगन था।” (योगेंद्र यादव, “राष्ट्रवाद की चुनौतियांअदहन पत्रिका) 

उपनिवेशी सत्ता के खिलाफ हमारे भारत राष्ट्र की जनता ने अनेक आंदोलन किये थे। उन आंदोलनों में जनता ने कई नारों का उपयोग किया था। इन नारों ने विविधता से भरी हुई जनता का एकबद्ध किया और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपना बहुमूल्य योगदान दिया। ये नारे किसी खास धर्म, जाति और राजनीतिक पार्टी के नहीं थे। ये सभी नारे भारतीय जनता की एकजुटता की उपज थे इसलिए इन नारों को संकीर्ण दायरे में देखना गलत है। ये समस्त नारे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की बहुमूल्य धरोहर हैं।

निष्कर्ष:-

 राष्ट्रवाद के कुछ देशों में नकारात्मक परिणाम ही रहे है पर कुछ देशों में इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले है। कई देशों में एक सकारात्मक विचार के रूप में राष्ट्रवाद ने लोगों को एकजुट करने का काम भी किया है। उपनिवेशी सत्ता के खिलाफ भारत में राष्ट्रवाद ने लोगों को एकरूपता में बांधा है जिसके कारण लोगों में एक दूसरे के प्रति विरोध और नफ़रत की भावना  काफी हद तक समाप्त हो गयी। इस रूप में राष्ट्रवाद ने मानवता को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया है। मीडिया में राष्ट्रवाद की मौजूदा बहस को इन्हीं मुद्दों के साथ आगे बढ़ाना चाहिए और एक सकारात्मक विमर्श के साथ राष्ट्रवाद का प्रयोग राष्ट्र के विकास में करना चाहिए।

संदर्भग्रन्थसूची

  1. चन्द्र, वि. (1996), “भारतीय राष्ट्रवाद कुछ निबंध”, नई दिल्ली: जवाहार पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स।   
  2. Hobsbawm, E.J, (1990) “Nations and Nationalism since 1780” Delhi: Cambridge University Press. 
  3. Anderson, B, (1983) “IMAGINED COMMUNITIES” London: Verso
  4. सिंह, अ.प्र. (2014) “भारत में राष्ट्रवाद” नई दिल्ली: ओरियंट ब्लैकस्वान प्राइवेट लिमिटेड।   
  5. चौधरी, बा.ना. और कुमार, यु, (2013) “आज का भारत: राजनीति और समाज” नई दिल्ली:ओरियंट ब्लैकस्वान प्राइवेट लिमिटेड। 
  6. दुबे, अ.कु. (2005) “बीच बहस में सेकुलरवाद” नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन ।   
  7. Aloysius, G, (1997) “Nationalism without a Nation in INDIA”, New Delhi: Oxford University Press
  8. Azad. R, Nair. J, Singh. M, & Roy. M.S, (Edited), (2016) “WHAT THE NATION REALLY NEEDS TO KNOW: THE JNU NATIONALISM LECTURES” India: HarperCollins Publishers
  • स. रविकान्त (2018) – “आज के आईने में राष्ट्रवाद”, नयी दिल्ली: राजकमल प्रकाशन.
  • Chandra.B. (2009), “History of Modern India”, New Delhi, Orient Blackswan.
  •  Chandra.B. (2012) “The Making of Modern India: From Marx to Gandhi” New Delhi: Orient Blackswan.
  • देसाई, ए. आर. (2016) “भारतीय राष्ट्रवाद की अधुनातन प्रवृत्तियां” , दिल्ली, ग्रन्थशिल्पी।
  • पुनियानी, रा. (2016) “धर्म सत्ता और हिंसा”, नई दिल्ली, राजकमल प्रकाशन।
  • खिलनानी, सु. (2001) “भारतनामा”, नई दिल्ली, राजकमल प्रकाशन।
  • Apporvanand. (2018) “THE IDEA OF A UNIVERSITY” New Delhi, Thomson Press (India) Ltd.

पत्रपत्रिकाएं :-

  1. सिंह सुधा, राजनीति: समावेशी राष्ट्रवाद बनाम प्रतीकवाद, 14 मार्च 2016 

http://www.jansatta.com/politics/inclusive-nationalism-versus-symbolism/76634/

  • सिन्हा राकेश, जनसत्ता, बारादरी, रविवारीय स्तंभ, 7 मार्च 2017 

http://www.jansatta.com/sunday-column/rss-thinker-rakesh-sinha-interview-over-students-union-vs-rss-ideology/268022/

राकेश कुमार

पीएच.डी

विभाग- प्रौढ़ सतत शिक्षा एवं प्रसार विभाग

(Department of Adult, Continuing Education & Extension)

विश्वविद्यालय- दिल्ली विश्वविद्यालय

संपर्क सूत्र- 7503518676 ईमेल- mr.rakeshkumar11@gmail.com

शोध और बोध से ही राष्ट्र का विकास संभव-महेश तिवारी

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शोध सारांश:-  किसी भी राष्ट्र की प्रगति और विकास का आकलन वहां पर संसाधन जुटा देने मात्र से नहीं होता, अपितु वहां के लोगों के द्वारा अपनाने वाली पद्धतियों, संस्कारों, मूल्यों, कार्य-शैलियों से राष्ट्र निर्माण होता है। ऐसे में जिस दौर में भारत के पास लगभग 65 फ़ीसदी आबादी युवाओं की है। साथ ही साथ देश की सियासी परिपाटी भी देश को विश्वगुरु और महाशक्ति बनाने की बात करती। ऐसे में हमें और हमारी व्यवस्था को देखना होगा, कि आख़िर क्या कारण है जिसकी वजह से हम इक्कीसवीं सदी में वैश्विक पटल पर पीछे छूट रहें। इतिहास की निगहबानी करें तो हमारा इतिहास तो कदापि ऐसा न था। जहां हम पिछड़े हुए अपने को महसूस करें। हम तो गौरवशाली इतिहास और परंपरा के वाहक रहें। ऐसे में जब हम आज के समय की स्थितियों और परिस्थितियों को देखते हैं। फ़िर एक बात स्पष्ट होती है, कि हमारे यहां आज के समय में कुछ खामियों ने घर कर लिया है। जैसे शिक्षा में गुणवत्ता नाम की चीज़ नहीं बची है। मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा को हम ढो रहें हैं। उच्च शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में शोध नाममात्र की बात समझ आती। इसके अलावा मानवीय पूंजी को हमारे यहां मानव संसाधन समझ लिया गया है। जिस कारण हम चाहकर भी विश्वगुरु बनने या विश्व को नेतृत्व करने की दिशा में आगेनहीं बढ़ पा रहें। ऐसे में अब हमें शोध के महत्व को समझना होगा। इसके साथ हर क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देना होगा साथ ही साथ मानवीय पूंजी की अहमियत पर भी जोर देना होगा। तभी एक मजबूत राष्ट्र की तरफ़ हम अग्रसर हो पाएंगे।।

कीवर्ड:- शोध, राष्ट्र, नेशन, शिक्षा व्यवस्था, एक भारतश्रेष्ठ भारत, अनुसंधान एवं विकास।

शोध विस्तार

    हते हैं कि आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। ऐसे में कुछ दिन पहले देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उद्बोधन का ज़िक्र करना यहाँ जरूरी हो जाता है। तत्कालीन दौर में जब भारत देश ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व कोरोना संक्रमण से कराह रहा है। हमारे देश के प्रधानमंत्री देश की अवाम को दिए गए संदेश में “आत्मनिर्भर भारत” की बात करते हैं। यहां यक्ष प्रश्न यहीं क्या कोई भी राष्ट्र, समाज या फ़िर व्यक्ति बिना शोध के आत्मनिर्भर हो सकता है? यह बात असंभव सी लगती है। किसी भी राष्ट्र या समाज के विकास के लिए उस समाज या राष्ट्र में शोध को बढ़ावा देना महती जरूरी होता है। चलिए यहाँ एक प्रश्न करते हैं, किसी राष्ट्र का विकास कब होगा? तभी न जब उस राष्ट्र के लोगों का जीवन मूल्य उच्च कोटि का होगा। सांस्कृतिक रूप से समाज मजबूत होगा। नए और परिमार्जित सांस्कृतिक मूल्यों को आत्मसात करने में कोई झिझक नहीं होगी। नई- नई तकनीक को विकसित किया जाएगा। ऐसे में शोध किसी भी क्षेत्र की प्राथमिकता में रहता है। राष्ट्र के विकास की पहली सीढ़ी कहीं न कहीं शोध है। देखिए न राष्ट्र निर्माण में शैक्षिक संस्थानों की भूमिका को कैसे उत्तरप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष ह्रदय नारायण दीक्षित स्वीकृति करते हैं।

    वे कहते हैं कि राष्ट्र निर्माण में शैक्षिक संस्थानों की अहम भूमिका होती है। भारत में 10वीं सदी के पहले से ही राष्ट्र की अवधारणा का निर्माण हो चुका था। बाद में विश्व को नेशन शब्द का बोध हुआ। नेशन और राष्ट्र दो अलग- अलग बातें हैं। हमारे वेदों में राष्ट्र की अवधारणा की व्याख्या मिलती है। शोध और बोध से राष्ट्र का जन्म और विकास होता है।ऐसे में जब राष्ट्र शब्द का जन्म ही अपने आप में शोध शब्द को समाहित किए हुए हो। फ़िर हम आसानी से समझ सकते कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति की राह शोध के माध्यम से ही निकलती है। यहां हम राष्ट्र निर्माण में शोध की भूमिका की चर्चा कर रहें। ऐसे में पहले हम राष्ट्र की परिभाषा समझने का प्रयास करते हैं। उसके उपरांत शोध को समझेंगे और आख़िर में राष्ट्र निर्माण में शोध की भूमिका को।

   राष्ट्र क्या है? राष्ट्र का अर्थ एक स्वशासी राज्य की जनसंख्या से है। जिसमे कई राष्ट्रीयताओं का समावेश हो सकता है। जहां राष्ट्रीयता राजनीतिक स्वतंत्रता और प्रससत्ता प्राप्त कर लेती हैं। वह राष्ट्र बन जाती हैं।2  “राष्ट्र” शब्द जो आप हम समझते हैं, यह आधुनिक समय की उपज है। यह लैटिन शब्द ‘नेशन’ से लिया गया है। ‘Ambedkarian framework of National- Building A critical Enquiry’ में केसी यादव और एसके चहल ने बताया है कि हमें आधुनिक प्रक्रिया को धन्यवाद देना चाहिए जैसे- पुर्नजागरण, पुर्नसुधार, वाणिज्यवाद, फ्रांसीसी क्रांति उपनिवेशवाद, सम्राज्यवाद विश्वयुद्ध आदि। इसी समय में राष्ट्र की उत्पत्ति विभिन्न प्रकार से यूरोप और शेष विश्व में हुई। भारत में इस प्रक्रिया की जड़ें उन्नीसवीं सदी में दिखाई दी।3  ऐसे में प्रथम दृष्टया यह मान लेते हैं आधुनिक राष्ट्र की बात भले भारत में उन्नीसवीं सदी में दिखी, लेकिन उसके पूर्व पुरातन काल से भी तो यहां पर सोलह महाजनपद आदि का ज़िक्र होते आया है। एक बात और राष्ट्र का निर्माण कैसे होता। किसी भू- भाग में रहने वाले प्राणियों से। ऐसे में तो भारत में सदियों से कई मानवीय सभ्यता का इतिहास मिलता है।

   अब हम शोध को समझें तो शोध एक प्रकार की खोज है, जो नवीन संभावनाओं को तलाशने की, मौलिकता का समावेशन करने की और वैज्ञानिक तरीके से कार्य का निष्पादन करने की क्षमता का विकास है। सीसी क्रोफोर्ड के अनुसार, ” शोध चिंतन की एक ऐसी क्रमबद्ध तथा विशुद्ध प्रविधि है, जिसमें विशिष्ट यंत्रों, उपकरणों तथा प्रक्रियाओं का उपयोग इस उद्देश्य से किया जाता है, एक समस्या का समाधान उपलब्ध हो सकें।” वहीं वी यंग के शब्दों में, ” शोध एक ऐसी व्यवस्थित विधि है, जिसके द्वारा नवीन तथ्यों की खोज अथवा प्राचीन तथ्यों की पुष्टि की जाती है तथा उनके उन अनुक्रमों, पारस्परिक सम्बन्धों, कारणात्मक व्याख्याओं तथा प्राकृतिक नियमों का अध्ययन करती है, जो कि प्राप्त तथ्यों को निर्धारित करते हैं।”4 यहां अब हम वर्तमान वैश्विक महामारी कोरोना की ही बात कर लें, इससे सम्पूर्ण विश्व कराह रहा। इससे निज़ात का उपाय क्या होगा। सभी को पता है, कि जब किसी औषधि का अनुसंधान होगा। तभी इस महामारी से विश्व को सुरक्षित किया जा सकता। इतना ही नहीं एक बात और स्पष्ट हो, जो देश इस महामारी की दवा तलाश लेगा, वह सामाजिक और आर्थिक रूप से भी आने वाले समय में मजबूत बनेगा। बाक़ी देश उस पर निर्भर होने की स्थिति में होंगे। इन सब बातों से एक ही तथ्य को मजबूती मिलती कि किसी भी राष्ट्र के विकास, उत्थान में शोध की काफ़ी भूमिका है।

    शोध के महत्व को देखते हैं तो पाएंगे कि शोध हर जगह महत्व रखता है। चलिए एक उदाहरण से बात को स्पष्ट करते। पर्यटन चूंकि राष्ट्र, राज्य और स्थानीय क्षेत्रों से सम्बंधित होता। ऐसे में पर्यटन को अगर बढ़ावा मिलेगा तो समाज और राष्ट्र मजबूत बनेगा। इसलिए भारत में ‘डिपार्टमेंट ऑफ एनवायरनमेंट एन्ड फारेस्ट’ की स्थापना की गई। अब सोचिए इसका उद्देश्य क्या रहा होगा? इसका उद्देश्य है भारत में पर्यटन स्थलों के वातावरण की शुद्धता को बनाएं रखना। जे. ए. स्टीन के मुताबिक भारत में अनेक आश्चर्य है जिनमें ह्रास और विनाश प्रारम्भ हो गया है। ऐसे में पर्यटन के पांच कारणों की और क्रिपेनड्रॉफ ने ध्यान आकर्षित किया:-

1) ग्राम्यांचलों में प्रदूषण फैले।

2) किन्हीं क्रियाओं से व्यतिरेक पैदा हो।

3) पर्यावरण का महत्व आर्थिक विकास और पर्यटन के संदर्भ में बना रहें।

4) वातावरण आदि स्त्रोतों के ह्रास के प्रमाण और अनिश्चितता की स्थिति में कमी हो तथा

5) स्थानीय लोगों की सोच बदलें।5

        ऐसे में जो पर्यटन देश के विकास में योगदान करता। फ़िर वह योगदान आर्थिक और सांस्कृतिक किसी भी तरीक़े का हो। वह पर्यावरण के लिहाज़ से भी समाज और राष्ट्र की समृद्धि का वाहक बनें। यह तथ्य कैसे सभी को पता चला होगा। यकीनन शोध और बोध से ही। ऐसे में सभी योजना के पहले शोध का होना अति आवश्यक है। हम इतिहास में विचरण करेंगे तो पाते हैं कि श्रीराम जी हिन्दू संस्कृति के अनुसार लंका जाने के लिए “रामसेतु” का निर्माण करते हैं। जिसका प्रमाण आज सारी दुनिया मान चुकी है। इसके अलावा “पुष्पक विमान” को कौन भूल सकता। ये सब बातें रामायण में देखने और सुनने को मिल जाएंगी। तो कहीं न कहीं यह सब सम्भव कैसे हुआ होगा? निश्चित ही शोध के कारण। ऐसे में एक बात पूर्णरूपेण सत्य है कि हमारा भारतीय समाज सनातन समय से ही शोध और बोध में विश्वास रखता आया है। अपितु आज के वर्तमान काल में भले हम शोध कार्यों में पिछड़ते जा रहें।

         अनुसन्धान किसी भी राष्ट्र की प्रगति का मूलाधार है। अतः इसका महत्व विविध प्रकार से है। यह ज्ञान के विकास में, उद्देश्य प्राप्ति हेतु, समाज और राष्ट्र को नई गति प्रदान करने में, राष्ट्रीय एवम अंतर्राष्ट्रीय भावना के विकास में, सुधार में, सत्य की खोज में, प्रशासनिक आदि अनेक क्षेत्रों में सहायता प्रदान करता है। तभी तो अनुसन्धान को जॉन डीवी “प्रगतिशील प्रक्रिया” मानते हैं। वैसे भी भारत जैसे देश में शिक्षा का महत्व हमेशा से रहा है और उसे सर्वोच्च धन के रूप में स्वीकार किया गया है। लम्बे समय तक भारत गुलामी की बेड़ियों में रहते हुए भले शोध और बोध में पिछड़ गया हो। इन सब के बाद आज़ादी के उपरांत पुनः भारतीय ज्ञान परम्परा में शोध और बोध को महत्व दिया जाने लगा। तभी तो प्रथम पंचवर्षीय योजना में शिक्षा पर ख़र्च 151 करोड़ रुपए किया जाता। शोध और बोध की ही देन रहीं, कि जो भारत गुलामी की जंजीरों में बंधे-बंधे भुखमरी का शिकार हो गया था। वह आज़ादी के बाद शैने- शैने आत्मनिर्भरता की तरफ़ कदम बढ़ाता है और हरित क्रांति के माध्यम से उठ खड़ा होता है।

एक बार स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था – सुधारकों से मैं कहूंगा कि मैं स्वयं उनसे कहीं बढ़कर सुधारक हूं। वे लोग इधर- उधर थोड़ा सुधार करना चाहते हैं- और मैं चाहता हूँ आमूल सुधार। हम लोगों का मतभेद है केवल सुधार की प्रणाली में। उनकी प्रणाली विनाशात्मक है और मेरी संघटनात्मक। मैं सुधार में विश्वास करता हूँ स्वाभाविक उन्नति में। स्वाभाविक उन्नति तभी होती है जब संसाधन उपलब्ध हो। कार-मोटरसाइकिल घर मे पहले से रहता है तो स्वाभाविक रूप से कम उम्र में ही घर के लोग चलाना सीख जातें हैं। इसलिए सुधार को वो महान शास्त्र- ‘विश्वशास्त्र’ पहले संसाधन के रूप में प्रत्येक घर में उपलब्ध हो। जो आध्यात्मिक और दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत- श्रेष्ठ भारत की परिकल्पना को प्रतिरूप दे सकें।6

     ऐसे में देखें तो राष्ट्र के निर्माण के लिए जरूरी कोई भी पक्ष हो। वह नवीकरणीय ऊर्जा का क्षेत्र हो, धर्म और दर्शन का क्षेत्र हो। अंतरिक्ष से जुड़ी बातें हो। शिक्षा या समाज से जुड़ी संकल्पनाएं हो। सभी क्षेत्रों में जब तक शोध के महत्व को अंगीकार नहीं किया जाएगा। तब तक एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता। एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण नहीं होगा। फ़िर भारत के जो नेतृत्वकर्ता भारत को पुनः सोने की चिड़िया बनते देखना चाहते वह सपना कैसे साकार होगा। इसलिए राष्ट्र का शिल्पी अगर वहां की रहनुमाई व्यवस्था होती तो उसे स्थिति और परिस्थितियों को देखते हुए शोध के महत्व को समझना अति आवश्यक हो जाता, क्योंकि शोध और बोध के माध्यम से ही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण हो सकता।।

       किसी भी राष्ट्र की प्रगति और विकास का आकलन वहां पर संसाधन जुटा देने मात्र से नहीं होता। केवल अवस्थापना या उपकरण जुटाना पर्याप्त नहीं है, अपितु वहां के लोगों के द्वारा अपनाने वाली पद्धतियों, संस्कारों, मूल्यों, कार्य-शैलियों से राष्ट्र निर्माण होता है। हम अपने डिजिटल रिसोर्स से शहर के चप्पे-चप्पे की निगरानी तो कर सकते हैं, लेकिन सन्मार्ग पर चलते हुए हमें अपनी कार्य संस्कृति, संस्कारों, मूल्यों और कार्यशैली को भी उसी के अनुरूप ढालना होगा, तभी शक्तिशाली भारत, समृद्ध भारत, आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार होगा। हमारी अजर अमर भारतीय संस्कृति हमें उन मानवीय मूल्यों के दर्शन कराती है जो सर्वोत्कृष्ट समाज और राष्ट्र के निर्माण का आधार स्तंभ है। विश्व के युवा राष्ट्र के रूप में हम सृजनात्मकता, उद्यमिता, नवाचार, शोध एवं अनुसंधान का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकते हैं। कई बार मैंने विभिन्न मंचों पर यह कहा है कि युवा विद्यार्थियों के रूप में हमारे पास एक बड़ी शक्ति है। अमेरिकी जनसंख्या से अधिक हमारे विद्यार्थियों की संख्या है। हम इसे सकारात्मक दिशा में ले जाने में सक्षम हुए तो हम नए युग का सूत्रपात कर सकते हैं।7

इन सब बातों के मद्देनजर देखें तो आज शिक्षण संस्थानों आदि को लेकर देश में राजनीति ख़ूब होती रहती। शायद इसका आधा हिस्सा भी उसको बेहतर करने में लगा दें सियासतदां तो भारत को आज की स्थिति में शर्मिंदा न होना पड़ें। आप कहते रहिए कि हम विश्वगुरु थे। वैश्विक रैंकिंग में दुनिया के 300 विश्वविद्यालयों में एक भी विश्वविद्यालय भारत का नहीं। 2012 के बाद पहली बार टॉप- 300 में भारत का कोई विश्वविद्यालय नहीं है। 92 देशों के 1396 संस्थानों में भारत का नंबर 300 के नीचे आता है। केवल आईआईटी रोपड़ को ग्लोबल रैंकिंग में टॉप- 350 संस्थानों में जगह दी जाती। तो वेदों- पुराणों, उपनिषदों में महानता की खोज करने वाले कोलंबस कहाँ है? क्या वो बताएंगे कि अगर हम इतने ही महान थे तो विकास के कालखंड में हमारी वो महानताएँ कहाँ जमींदोज हो गई हैं। 337 प्रायवेट यूनिवर्सिटी, 400 राज्य विश्वविद्यालय, 126 डीम्ड यूनिवर्सिटी, 48 सेंट्रल यूनिवर्सिटी, 31 एनआईटी, 28 आईआईटी और 19 आईआईएम यानी कुल संस्थान 984 और कुल छात्र 3.66 करोड़। लेकिन पढ़ाई- लिखाई के संसार में न तो हमारी कोई साख है और न कोई महत्व। तो सिर्फ़ इतिहास का ककहरा पढ़ाते हुए यह मत बताएं कि हम गणेश जी की गर्दन पर हाथी का माथा जोड़ देते थे। जरूरत है राष्ट्र की समृद्धि और विकास के लिए शिक्षा में बदलाव और शोध को बढ़ावा देने की।

    भारत में सरकार के स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में अनुसन्धान एवं विकास ( आर एंड डी) पर बहुत कम निवेश पर संसद की स्थायी समिति ने चिंता व्यक्त करते हुए इस दिशा में तत्काल निजी क्षेत्रों को साथ लाकर शोध को बढ़ावा देने के उपाय लागू करने की सिफारिश की है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय संबन्धी संसदीय स्थायी समिति ने वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसन्धान विभाग से सम्बंधित प्रतिवेदन में केंद्र सरकार द्वारा आर एंड डी पर किए गए निवेश का स्तर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 0.6 प्रतिशत होने पर चिंता जताई है। राज्यसभा सदस्य आनंद शर्मा की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट में अन्य देशों की तुलना में भारत में अनुसन्धान और विकास पर निवेश को बहुत कम बताते हुए कहा गया कि केंद्र सरकार द्वारा निवेश को पर्याप्त मात्रा में बढ़ाएं जाने की तत्काल जरूरत है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में सरकार के स्तर पर अनुसंधान और विकास पर कुल जीडीपी का 2.8 प्रतिशत, चीन में 2.1 फ़ीसदी, इजरायल में 4.3 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया में 4.2 फीसदी ख़र्च होता है। इतना ही नहीं समिति ने कहा कि वैज्ञानिक रिसर्च और विकासमें महिलाओं की आबादी तो बहुत ही कम है।8

     ऐसे में अगर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष सुखदेव थोराट कहते हैं, कि यदि हम वर्तमान प्रमाणों के आधार पर बात करें तो बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय NAAC के मानकों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। इसलिए इन संस्थाओं के भौतिक एवं शैक्षिक आधारभूत संरचना में तत्काल सुधार करने की आवश्यकता है। दूसरे शब्दों में कॉलेजों एवम राज्यस्तरीय विश्वविद्यालयों का पुनरूत्थान समय की मांग है।इसके अलावा जेपी नायक के शब्दों में- “हमने प्रायः गुणात्मक कार्यक्रमों को भी संख्यात्मक कार्यक्रमों में बदल दिया है।”10

 फ़िर अगर हमें और हमारी व्यवस्था को  राष्ट्र को पुष्पित और पल्लवित होते हुए देखना है, तो राष्ट्र निर्माण में शोध की भूमिका को पहचानना होगा। इसके अलावा शोध को हर क्षेत्रों में बढ़ावा देकर ही एक भारत और श्रेष्ठ भारत बनाया जा सकता।।

संदर्भ सूची:-

  1. दैनिक जागरण अखबार में प्रकाशित ख़बर, 11 जनवरी, 2020, दिन- शनिवार
  2. डॉक्टर बी.आर अम्बेडकर और राष्ट्र निर्माण, लेखक- डॉ. राकेश कुमार, पृष्ठ संख्या- 7
  3. डॉक्टर बी.आर अम्बेडकर और राष्ट्र निर्माण, लेखक- डॉ. राकेश कुमार, पृष्ठ संख्या- 7
  4. यूजीसी नेट पत्रकारिता एवं संचार, अरिहंत प्रकाशन
  5. पर्यटन- सिद्धांत और प्रबंधन तथा भारत में पर्यटन, लेखक- शिवस्वरूप सहाय
  6. मैं सत्यकाशी से कल्कि महावतार बोल रहा हूँ, लेखक- लवकुश सिंह “विश्वमानव”
  • मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक द्वारा दैनिक जागरण को लिखें लेख का अंश। प्रकाशन तिथि 11 नवम्बर 2019
  • इंडिया टीवी के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 6 जनवरी 2019 को प्रकाशित रिपोर्ट के अंश
  • योजना, मई, 2007 पृष्ठ संख्या- 19
  1. NAIK, JP. एजुकेशनल प्लानिंग इन इंडिया, पृष्ठ संख्या- 22

स्नाकोत्तर, पत्रकारिता संकाय, 

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल।।

मोबाइल न. 9630377825

ईमेल- tiwariauthor@gmail.com

मुख्यधारा का साहित्य और आदिवासी साहित्य की वैचारिकता-डॉ. अमित कुमार साह

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शोध सारांश

समकालीन हिन्दी साहित्य को अगर देखा जाय तो दो धाराओं को लेकर, दो विचारधाराओं को लेकर, दो समाज को लेकर लिखा जा रहा हैं। इसके बारें में यों कहे तो की हिन्दी साहित्य में समाज का यथार्थ का दो भागों में बांटा गया है। प्रथम धारा मुख्यधारा का हैं, तो दूसरा धारा हाशिए का समाज रहा है। आधुनिक काल के साहित्यकारों के द्वारा अधिकांशतः मुख्यधारा केन्द्रित साहित्य की ही रचना की जा रही हैं। विद्यापति, तुलसी, जायसी, सूरदास, घनानंद, बिहारी और आधुनिक कालीन आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी अन्य की रचनाओं में मुख्यधारा की झलक विशेष तौर पर दिखती है। इन्हीं का गुणगान दिखता है। हाशिए के समाज में दलित, स्त्री और आदिवासी समाज की मूलतः गणना की जाती है। यह समाज का वैसा उपेक्षित वर्ग रहा है, जिसके साथ भेदभाव करके सदियों से अलग रखा गया है; क्योंकि भारतीय समाज का निर्माण कर्म के आधार पर अलगअलग वर्गो व समुदाय को बांटा गया है। अब इन तीनों समाज को हाशिए के समाज में रखा गया है। दलित समुदाय जो सदियों से समानता और हक के लिए संघर्षशील रहा है। वही स्त्री पितृसमाजत्मक और पुरूषवादी मानसिकता वाले समाज से मुक्त होना चाहती है। जबकि आदिवासी विमर्श अस्तित्व और अस्मिता के लिए जुझ रहा है।

बीज शब्द: समाज, मुख्यधारा, हाशिए, दलित, आदिवासी, स्त्री, भाषा, संस्कृति

शोध विस्तार

वर्तमान के साहित्य में जोरों से विमर्श की धारा में कई मुद्दों पर धारा प्रवाह से लेखन का कार्य किया जा रहा है। साहित्य की धारा में समकालीन तत्व की प्रधानता दिखने को मिलती है; क्योंकि साहित्य की विशेषता सामाजिक सरोकार से हैं, जिसमें समाज का प्रतिबिंब दर्ज है। इस सरोकार में समाज के सबल पक्ष फलीभूत हैं, जिसमें समाज के सच्चे यथार्थ को अभिव्यक्त किया जा रहा है। जब भी भारतीय साहित्य पर बात की जाएगी, तब उसमें सामाजिक और राजनीतिक का मिश्रण जरूर देखने को मिलेगा। भारतीय साहित्य की सामाजिकता यहाँ की सांस्कृतिक विरासत पर टिकी रहती हैं; क्योंकि हम जब साहित्य में समाज, समाज और संस्कृति की बातें करते हैं, तो सबसे पहले साहित्य के केन्द्र में वर्णित जन-जीवन को देखते हैं। इसलिए साहित्य में अभिव्यक्त सामाजिक यथार्थ ही साहित्य सृजन का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।

समकालीन हिन्दी साहित्य को अगर देखा जाय तो दो धाराओं को लेकर, दो विचारधाराओं को लेकर, दो समाज को लेकर लिखा जा रहा हैं। इसके बारें में यों कहे तो की हिन्दी साहित्य में समाज का यथार्थ का दो भागों में बांटा गया है। प्रथम धारा मुख्यधारा का हैं, तो दूसरा धारा हाशिए का समाज रहा है। अब हम आपको मुख्यधारा पर केन्द्रित साहित्य की ओर चलते हैं, जहाँ देखते हैं कि हिन्दी साहित्य का इतिहास लगभग हजार वर्षो का है; जिसमें मोटेतौर पर हिन्दी साहित्य के केन्द्र में मुख्यधारा को स्थान दिया गया हैं, चाहें वह आदिकाल हो या मध्यकाल या फिर आधुनिक काल। जब हम प्रत्येक काल के साहित्यिक इतिहास को पलटते हैं तो इसमें मुख्यतः समाज के उस वर्ग को चिन्हित किया गया है, जो सदियों से उन्नत, समृद्ध और शिक्षित रहा हैं। जो अपने परिचय के लिए किसी का मोहताज नहीं रहा है। ना किसी की गुलामी की और न ही किसी की प्राधीनता स्वीकार की है। इसकी स्थिति उच्चे दर्जे की रही है। इनके जीवन स्तर, जीवन दर्शन, वेश-भूशा एवं जीवन जीने की प्रणाली तक इस बात के साक्ष्य हैं कि मुख्यधारा का सामाजिक स्तर सामान्य नहीं था और अब भी सामान्य नहीं है। साहित्य ने मुख्यधारा के सामाज के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पक्ष को अपने में भरपूर स्थान दिया है। जब हम साहित्य में मुख्यधारा के राजनीतिक पक्ष को देखते हैं, तो अचरज होता है कि ये समाज की संरचना का निर्माण एक जाल के समान करते हैं। जो वर्ग और धर्म के आधार पर कर्म में बंटा हुआ है। इसी समाज का एक वर्ग शासक भी है। राजा भी है। महाराजा भी है। मालिक भी है। दूसरा वर्ग शोषितों का है। जो नौकर भी है। मजदूर और मजबूर भी है। जो किसी के द्वारा बनाएं गए सामाजिक विधि में जीता है। यह समाज का वह वर्ग है जिसे एक लम्बे समय से किसी खासवर्ग के द्वारा शोषित किया जाता रहा है।

जब हम मुख्यधारा के आर्थिक पक्ष को देखते हैं, तो जो काफी गहनता के साथ समृद्ध रहा है; क्योंकि उनके द्वारा तब से लगातार, ये समाज को संचालित हो रहे हैं। मनमाने तरीके से लोगों से वसूल कर अपने घर भर रहे हैं। उनके पास बहुत जमीन और आजीविका के कई स्त्रौत रहे हैं। नौकरी, कृषि, पशुपालन, व्यावसायिक-धनधंधे व अन्य तरीके उपलब्ध थे। मुख्यधारा का सांस्कृतिक पक्ष विविध परंपराओं के गठजोड़ से अभीभूत रहा है; क्योंकि इनके जीवन दर्शन, उत्सव और संस्कृति बिल्कुल ही पूरी सुविधा से लैस रही है।

आधुनिक काल के साहित्यकारों के द्वारा अधिकांशतः मुख्यधारा केन्द्रित साहित्य की ही रचना की जा रही हैं। विद्यापति, तुलसी, जायसी, सूरदास, घनानंद, बिहारी और आधुनिक कालीन आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी अन्य की रचनाओं में मुख्यधारा की झलक विशेष तौर पर दिखती है। इन्हीं का गुणगान दिखता है। जो अतिशयोक्तिपूर्ण है। हमारे सामने सर्वप्रमुख प्रश्न यह आता है कि सामाजिक संरचना का निर्माण एक पक्षीय क्यों हैं? क्योंकि समाज के निर्माण में सबों की भागीदारी होती है। श्रमिक और पूंजीपति, दोनों का होना अनिवार्य है। उसी तरह मुख्यधारा के साथ हाशिए का भी समाज होना चाहिए। दोनों का बराबर स्थान रहा है। इन्हीं चीजों का साहित्य में भी समावेश होना चाहिए। तभी जाकर साहित्य की उपादेयता निर्भर करेगी। मुख्यधारा से सम्बन्धित साहित्य के इतिहास को देखा जाय तो अचरज होगा क्योंकि इन इतिहास में हाशिए का नाम मात्र चित्रण है। बौद्धिक वर्गो ने अपने अपने हित साधने के लिए किसी खास समुदाय को अपने रचनाओं में स्थान दिया; जिसकी एक लम्बी परंपरा सी चलती रही है। राजा-महाराजा, सेठ-साहूकारों को बड़े ही सहजता से चित्रित किया गया; किन्तु वहीं मजदूर, किसान, दलित और आदिवासी को छोड़ दिया गया। सीधे तौर पर कहा जाय तो साहित्य का इतिहास भी मुख्यधारा को ही प्रवाहित है।

हाशिए के समाज में दलित, स्त्री और आदिवासी समाज की मूलतः गन्ना की जाती है। यह समाज का वैसा उपेक्षित वर्ग रहा है, जिसके साथ भेदभाव करके सदियों से अलग रखा गया है; क्योंकि भारतीय समाज का निर्माण कर्म के आधार पर अलग-अलग वर्गो व समुदाय को बांटा गया है। अब इन तीनों समाज को हाशिए के समाज में रखा गया है। दलित समुदाय जो सदियों से समानता और हक के लिए संघर्षशील रहा है। वही स्त्री पितृसमाजत्मक और पुरूषवादी मानसिकता वाले समाज से मुक्त होना चाहती है। जबकि आदिवासी विमर्श अस्तित्व और अस्मिता के लिए जुझ रहा है। यह तीनों समाज भूतकाल से लेकर वर्तमान तक ब्राह्मणवाद और मनुवाद के चक्कर में पिसता चला जा रहा है; क्योंकि इस वाद के जरिये मुख्यधारा वालों ने समाज की संरचना को एक जाल बना दिया है। जिसका संचालन कर वे घर बैठे अपनी झोली भरते हैं। इसलिए ब्राह्मम्णवाद वह सर्प है जिसे एक बार डस लिया उसका विष जल्द उतरता ही नहीं है। ये तीनों वर्ग भी इसी विष के शिकार हो रहे हैं।

हिन्दी साहित्य में हाशिए के समाज पर बहुत कुछ नहीं लिखा गया है; किन्तु कबीर, रैदास, ज्योतिवा फुले, बिरसा मुंडा, तिलका माझी ने जरूर इन परंपरा को आगे बढ़ाया है। हाशिए के समाज में आदिवासी साहित्य थोड़ा हटके के है; क्योंकि इस साहित्य में आदिवासी जीवन के उस भाग को चित्रित किया गया जो अपने सम्पूर्ण जीवन को अभिव्यक्त करता है। दलित और स्त्री विमर्श की अवधारणा से इनके दर्शन भिन्न हैं। आदिवासी साहित्य के विमर्श में अस्मितामूलक प्रतिरोध की बात की गई है; जिसमें वह अपने दुनियाँ में बाहरी समाज के हस्तक्षेप से बर्दास्त नहीं करता है। वह अपने समाज के अस्तित्व, संस्कृति और हक के आधार को बनाये रखने में सम्पूर्ण जीवन को लगा देता है। आदिवासियों में मुख्यधारा के तरह एकल परिवार की धारणा नहीं है वह संयुक्त परिवार में जीता है। आदिवासी जीवन के दर्शन ही प्रमुखतम रूप से सामूहिक सामाजिकता को बरकरार रखा है। आज आदिवासी समाज को लेकर मुख्यधारा का चिंतन सटीक नहीं है। इस समाज को लेकर मुख्यधारा के चिंतन में ‘‘जिसको हम डोमिनियन (वर्चस्ववादी) समाज कहते हैं, जब यह बहुसंख्यक वर्चस्ववादी समाज समझेगा कि आदिवासी की दुर्गती करने में हम भी सहयोगी रहे हैं; हम इसके जिम्मेदार हैं, तो आगे बढ़ने का रास्ता खुलेगा। बड़ी सभ्यता, बड़ा समाज वही होता है जो उसके अन्दर के छोटे लोग छोटी हैं; उनके लिए जगह बनाये। दूसरों को हेय समझने वाला समाज बड़ा समाज नहीं कहलाता है।’’1 समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो किसी एक निम्न वर्ग पर शासन करके उसको मानसिक गुलाम बनाकर रखा है एवं उसके अस्तित्व व अस्तित्व को हीन कर दिया है; क्योंकि ये ‘‘मुख्यधारा’ का हिस्सा बनाने का लालच देकर हाशिए पर पडे़ लोगों को अस्तित्वहीन किया जा रहा है। आज के समय और समाज के यथार्थ के ये सभी आयाम वैचारिक दुनिया में विभिन्न अस्मितावादी विमर्शो के रूप में हलचल मचा रहे हैं। दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श, आदिवासी-विमर्श आदि के रूप में इस हलचल को सहज ही देखा जा सकता है। ये दोनों प्रक्रियाएं समानान्तर चल रही हैं और एक दूसरे को प्रभावित कर रहा है और वैचारिक दुनिया के नित नए तर्क, गहन चिंतन से उपजे नए-नए निष्कर्ष पूरे विश्व में हलचल मचा रहे हैं। भारतीय समाज और चिंतन भी इस उथल-पुथल से अछूता नहीं है।’’2 यही भारतीय समाज की विडम्बना है कि यहाँ का समाज किसी एक वर्ग विशेष के द्वारा संचालित होते रहा है।

इसलिए सभी भलीभाँति परिचित हैं कि आदिवासी किस तरह के जीवन जीते थे; किन्तु आज ‘‘आदिवासियों को आज हाशिए की जिन्दगी जीने के लिए विवश होना पड़ रहा है। आज आदिवासियों की दशा किसी से छिपी हुई नहीं है। हम इसके बारे में जानते हैं; पर आदिवासियों की दिशा क्या है और क्या होनी चाहिए? इस सवाल पर विस्तारपूर्वक चर्चा करने की आवश्यकता है। आदिवासी चेतना का ही परिणाम है कि आज आदिवासी ऐजेण्डे में आ रहे हैं; लोग मानें या न मानें। लोग कहते हैं कि आदिवासी हाशिए पर हैं लेकिन वास्तव में कालक्रम में आदिवासी ही केन्द्र में थे जिनको धीरे-धीरे हमने हाशिए पर धकेल दिया।’’3 जिस प्रकार आज हमारे समाज में आदिवासियों की स्थिति है, वैसी ही दशा हिन्दी साहित्य में आदिवासी विमर्श को लेकर धारणा है। इसलिए ‘‘समूचे भारत में लिखित आदिवासी साहित्य नगण्य है। आदिवासी साहित्य के नाम पर हमारे पास आदिवासी वाचिक साहित्य है जिसे हम आदिवासी लोक साहित्य कह सकते हैं। कुछ ईसाई मिशनरियों ने आजादी से पूर्व जो आदिवासी साहित्य संकलित किया था उसकी लिपि रोमन है।’’4 प्रस्तुत कथन से साबित होता है कि आदिवासियों के पास भाषा थी; किन्तु लिपी नहीं रही है। ईसाई मिशनरियों ने आदिवासी से संबंधित साहित्य को रोमन लिपि में प्रकाशित करवाया था। क्योंकि आदिवासी अपनी मातृभाषा में भले ही आदिवासी समाज को अभिव्यक्त करने में सहज महसूस करते है। किन्तु इनका दायरा सीमित हो जाता है। लिपि के बिना किसी भी समस्या या जीवन दर्शन को वैश्विक पटल पर नहीं उठाया जा सकता है।

हिन्दी साहित्य के विमर्श की चर्चा में लोग दलित और आदिवासी को एक समझने की भूल कर बैठते हैं; किन्तु यह भम्र है। दोनों का अपने-अपने अलग प्रश्न है अपने विमर्शो को लेकर। कोई समतामूलक समाज के लिए लड़ता है तो कोई सदियों के अस्तित्व व पहचान के लिए संघर्षरत है। इसलिए ‘‘दलित साहित्य और आदिवासी साहित्य के मध्य की सीमा रेखा को गंभीरता से समझने की जरूरत है। दलित साहित्य के पास कोई भी स्वतंत्र भाषा-बोली नहीं है जो आदिवासी के पास है। हिन्दी भाषा आदिवासी भाषा नहीं है, किन्तु हिन्दी दलित वर्ग की भाषा है, क्योंकि अधिकांश दलित साहित्य हिन्दी में लिखा गया हैं।’’5 इसलिए दलित और आदिवासी साहित्य की भिन्न है। आदिवासी साहित्य में आदिवासियत है। जो सरोकार के लिए जहोजद्द है। ‘‘आदिवासी सिर्फ आदिवासी है और उसका साहित्य भी आदिवासी या जनजातीय साहित्य है। आदिवासी साहित्य को दलित साहित्य की श्रेणी में किसी भी कीमत पर नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि आदिवासी साहित्य की अवधारणा और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अलग प्रकार की है। भारत में ही नहीं संसार में सभी जनजाति समुदायों की भाषा और संस्कृति अन्य गैर आदिवासियों से भिन्न है। आर्थिक पिछड़ेपन और अशिक्षा के कारण सभी दलित हैं, किन्तु आदिवासी दलित नहीं हैं।’’6

क्योंकि आदिवासी जीवन का इतिहास सदियों की परंपरा में कायम है। आदिवासी साहित्यकार ही इसे समझ सकता है। जैसा सभी जानते है कि ‘‘आदिवासी-साहित्य का कुल वातावरण ही आदिम जीवन के दुःखों की खोज करने वाला, आदिम हंुकारों से भड़का हुआ और अंधेरे से लड़ने वाला है। आदिमों के अंतर्मन की तिलमिलाहट इस वातावरण द्वारा संजोकर रखी गई है।’’7 आदिवासियों की पहचान संस्कृति में निहित है। जिसे वे अब भी बचाकर रखे हुए हैं।

देश की आजादी और राष्ट्र के विकास में हाशिए वाले समाज का प्रत्येक सदी में योगदान रहा है। भारत पर जब भी आक्रमण हुआ तो सबसे पहले ये पीड़ित समाज ही आगे बढ़े हैं। अलग-अलग रूपों में इसका योगदान रहा है। विविध संस्कृति और राजनीतिक तालमेल में हाशिए की पहचान रही है। ‘‘वस्तुतः यह हाशिए का समाज ही राष्ट्र समाज की प्रमुख मानवता है जिसकी महत्वपूर्ण भूमिका सभ्यता व संस्कृति के विकास में हुई तथा उत्पादन का कार्य भी इसी वर्ग द्वारा किया गया। इसलिए जब राष्ट्र निर्माण में मानव संसाधन के अवदान पर चर्चा की जायेगी तो श्रम सम्बद्ध इसी हाशिये के समाज को केन्द्र में रखा जायेगा न कि वर्चस्वकारी पराश्रयी प्रभु वर्ग को।’’8

आज मुख्यधारा की सोंच में गुमान जरूर देखे जा सकते है।  वे अपने को ही इस देश का मूल निवासी कहते हैं। किन्तु ये गलत है; क्योंकि वे दूसरे देशों से आये हुए आर्य हैं। भारत के मूल वासी को अजनबी का दर्जा दे दिया गया है। आज ‘‘जिसे हम हाशिये का समाज कहते हैं उसका अधिकांश ज्ञात स्तर पर देश का मूल निवासी है। इस देश की सभ्यता व संस्कृति का निर्माता है। इस राष्ट्र की भूमि का असली वारिस है। जो मानसिकता समानता, सामूहिकता, प्रकृति व प्राणियों के साथ सहअस्तित्व, श्रम की महत्वता आदि में विश्वास नहीं करती उसे राष्ट्र हित के द्यौतक माना जाना चाहिए।’’9

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश में आज अगर हाशिए की समाज के प्रतिनिधित्व को देखा जाय तो कुल आबादी का 70 प्रतिशत है; लेकिन फिर भी ये सब मुट्ठी भर लोगों के गुलाम बने हुए है। इसमें स्त्रियां भी शामिल हैं। इस ‘‘लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनसंख्या एवं मतदाताओं का निर्णय शासन संचालन के लिए प्रमुख शक्ति-स्त्रौत होता है। इस दृष्टि से देखा जाये तो दलित, आदिवासी, अति पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक (महिलाओं सहित) क्रमशः 16, 12, 22 व 20 (कुल 70 प्रतिशत) एवं 30 प्रतिशत प्रभु वर्ग का 50 प्रतिशत अर्थात् कुल का 15 प्रतिशत स्त्रियों को मिलाकर तथाकथित हाशिये समाज का यह वर्ग भारत की 85 प्रतिशत जनसंख्या बनती है और इसी अनुपात में मतदाता। इस बहुजन को हाशिये का समाज कैसे कहा जा सकता है?’’10

इसलिए हाशिये को शिक्षा के बल पर ही अपनी पहचान मिल सकती है। उसे देश की व्यवस्था में दखल देना होगा तभी हमारे समाज की काया पलटेगी। इसलिए ‘‘मुक्ति का मार्ग एक ही है कि हाशिये के जिस समाज को अब हम बहुसंख्यक समाज कहने की स्थिति में हैं उस समाज के विभिन्न घटक एकजुट होकर राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक मोर्चों पर लामबंद हों और शिक्षा, जागृति व नेतृत्व को विकसित करें एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपना सशक्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करें, ताकि निर्णय उनके पक्ष में सम्भव हो सकें और साथ ही वर्चस्वकारी वर्ग को यह आत्मानुभूति हो कि परम्परा-दर-परम्परा उसने जो चालाकियां की हैं वे अन्ततः समग्र मानव समाज के हित में नहीं हैं। ये हरकतें मनुष्य विरोधी हरकतें रही हैं; जिनसे स्वयं वह वर्ग भी सुरक्षित नहीं रह पायेगा।’’11 यह सर्वविदित है कि आदिवासी समाज सदियों से शिक्षा से कटा हुआ है। शिक्षा के बल पर ही ये अपने अधिकारों के लिए आम आदिवासियों के बीच जागृति ला सकते हैं।

आदिवासी समाज की संस्कृति में ईश्वर की धारणा का आधार कभी नहीं था; अपितु ‘‘आदिवासी संस्कृति में ईश्वर या आत्मा नहीं, प्रकृति प्रमुख है, जिसके साथ मनुष्य जीता, पलता, बढ़ता है और फिर खत्म हो जाता है। मरकर भी वह प्रकृति के विकास के लिए खाद बन जाता है। उसका कंकाल, उसकी हड्डिया धरती को उर्वर बनाती हैं, धरती पर कब्जा नहीं करतीं। आदिवासी मान्यताओं के अनुसार उसका मिट्टी का अंश मिट्टी में, पानी का पानी में, ऊर्जा आग में बदल जाती है और श्वास हवा में मिल जाता है। यह आस्थाएं ‘आदि-धर्म’ में भी चिहिृत हैं।’’12 बल्कि यह मुख्यधारा की करतूत और षडयंत्र की उपज है जिसके कारण ये मानसिक गुलाम बना दिए गए हैं। वह प्रकृति की पूजा इसलिए करता है; क्योंकि उसका उपयोग करता है। जाहिर है कि जिसका प्रयोग किया जाता है उसे संरक्षित रखा जाना चाहिए। आदिवासी समाज में आस्था की पहचान उसके समूह को लेकर है। इस तरह हम मुख्यधारा और आदिवासी साहित्य में अंतर देखने को मिलता है।

यद्यपि आदिवासी केन्द्रित उपन्यासों को देखते हैं जिसे आदिवासी और गैर आदिवासी कथाकारों ने अपने-अपने तरीके से आदिवासी साहित्य को समझने का प्रयास किया है। इसलिए दोनों के तुलनात्मक दृष्टि से विचार कर निदान तक पहुँचे जा सकते हैं जिसके कारण मुख्यधारा और आदिवासी के चिंतन में आदिवासी साहित्य की समझ स्पष्ट हो जाएगे।

सर्वप्रथम आदिवासी जीवन के सामाजिक समस्याओं को देखते हैं, जिसमें अशिक्षा भी सामाजिक समस्यों में एक है। जिसे उपन्यासों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। अशिक्षित रहने के कारण आदिवासियों की विडम्बना यह है कि अपने ऊपर हो रहे शोषण का प्रतिकार अशिक्षित रहने के कारण कानूनी ढ़ंग से नहीं कर पाते हैं। परिणाम यह होता है कि साहूकार, जमींदार, विचैलिऐ, ठेकेदार आदि लोग हर तरह से इस समाज का शोषण करने में सफल हो जाते हैं। गैर आदिवासी कथाकार राकेश कुमार सिंह के ‘पठार पर कोहरा’ उपन्यास में सुगना मुंडा पात्र कहता है कि ‘‘साहू सेर-भर अनाज का चैथाई नमक बदले में देता है तुम्हें। जानते हो, शहर में नोन पैसों पर मिलता है और अनाज रूपयों से। तुम पढ़े-लिखे होते तो साहू यँू लूट नहीं सकता था तुम्हें।’’13 आज भी और कल भी शिक्षा का महत्व हर समाज में रहा है और रहेगा।

वहीं आदिवासी कथाकार पीटर पौल एक्का ‘मौन घाटी’ उपन्यास में कहते हैं कि आज आदिवासियों के लिए शिक्षा ही वह माध्यम है जिसके बल पर वह अपने पूरे समाज को सुधार सकता है। इसी के बल पर दिकुओं से केश भी लड़ सकता है। इसी शिक्षा के महत्व को स्वीकारते हुए लेखक अभिव्यक्त करते हैं। काका से किशोर से कहते हैं कि ‘‘तब गाँव-घर के लिए कुछ कर सकोगे बेटे। हम तो जहाँ तक हो सका रास्ता दिखाने का कोशिश किया। अंगरेजों के जमाने में दूसरी जमात तक पढ़कर कितना कर पायेगा। उकील, बेरिस्टर, हाकिम-हुकूम हो जावोगे तो केस मोकदमा में मदद कर सकोगे।’’14 ये सच है कि आदिवासियों में शिक्षा की कमी है। जो भी शिक्षित हुआ है वह अपने अनुकूल समाज में काम करता है। भले ही दिकुओं से मुकदमा ही क्यों न लड़ना पड़े वे इससे पीछे नहीं हटेगे।

प्रस्तुत कथन से अभिव्यक्त होता है कि गैर आदिवासी के चिन्तन में अशिक्षा की समस्या तभी हो पाऐगी जब आदिवासी शिक्षा के महत्व को समझने की कोशिश करेंगे। जब आदिवासी कथाकार भी मानना है कि शिक्षा के बल आदिवासी अपने भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं।

इसके बाद आदिवासियों के सांस्कृतिक समस्या को देखते हैं। आदिवासियों के बीच धर्मान्तरण की समस्या प्रमुख रूप से देखने को मिलते हैं; जिसे समकालीन कथाकारों ने अपने उपन्यासों में अभिव्यक्त किया है। गैर आदिवासी कथाकार मधु काँकरिया के ‘खुले गगन के लाल सितारे’ उपन्यास में धर्मान्तरण की समस्या देखने को मिलते हं;ै जो कि अन्य उपन्यासों से भिन्न है। इसी पर लेखिका लिखती हैं कि ‘‘अपनी संस्कृति और प्रकृति-प्रेम में पूरी तरह डूबे एवं अपनी जातीय स्मृति पर गर्वित है इस समाज के बारें में मिशनरियों द्वारा धर्मान्तरण की जो इतनी बातें आए दिन सुनने को मिलती हैं, क्या है आधार इनका …?……हाँ धर्मान्तरण की ढेर सारी घटनाएँ यहाँ मिल जाएँगी आपको, लेकिन इतना बता देता हँू, किसी आर्थिक प्रलोभन या क्षैक्षिक प्रलोभन के चलते आदिवासी अपना धर्म नहीं छोड़ते हैं। बड़ा स्वाभिमानी है यह समाज लेकिन मृत्यु-दुख, जानलेवा व्याधि, सन्तान या पत्नी की मृत्यु जैसे चरम टूटते क्षणों में ही होता है यह धर्मान्तरण। कहीं-कहीं महज एक क्रोसिन की टेबलेट के चलते एक पूरे परिवार ने गले में क्रांस पहन लिया; क्योंकि पास में रहते हुए भी आप लोगों ने कभी सुध नहीं ली, वरन् हर तरह से उन्हे लूटा। उनकी सूध ली सात समुन्दर पार से आए उन विदेशी मिशनरियों ने। भले ही अपने विश्वासों के आधार पर किन्हीं भी कारणों से ली हो उन्होंने सुध लेकिन ली तो। आप लोगों ने तो उन्हें उनके अपने परम्परागत किसानत्व से भी दुर कर उनके वनों को काट उन्हें भारी संख्या में खेतिहर मजदूर या कारखानों के कैजुअल मजदूर बना डाला है।’’15 इस कथन से जाहिर है कि आदिवासियों ने भले ही आर्थिक मजबूरी के कारण धर्म परिवर्तन किए हों; किन्तु वे अपने आदिवासीपन को अब तक नहीं भूले हैं। यहां पर दिकुओं ने आदिवासियों का धर्म परिवर्तन कराकर मुख्यधारा की मानसिकता को स्पष्ट कर दिये हैं। 

आदिवासी कथाकार हरिराम मीणा ने अपने ‘धूणी तपे तीर’ उपन्यास में धर्मान्तरण की समस्या को अभिव्यक्त किया है। इस उपन्यास के प्रमुख पात्र गोविन्द गुरू हिन्दू धर्म से प्रभावित होते दिखते हैं; क्योंकि गोविन्द गुरू के ऊपर गुरू राजगिरी गोसाई और आर्य समाज के संथापक दयानंद सरस्वती का प्रभाव पड़ा था। गुरू राजगिरी गोसाई ने प्रथमतः औपचारिक शिक्षा दी थीं। इसके बाद दयानंद सरस्वती से उदयपुर के दरबार में मुलाकात और कुछ समय बीताने के पश्चात् वे हिन्दू दर्शन से प्रभावित हुए जिसके बाद उनके व्यक्ति पर प्रभाव दिखने लगा था। इसके बाद वे हिन्दुत्व के पथ पर संप सभा को लक्ष्य करके उसके लक्ष्य निर्धारित करने लगे। धूणी धाम की स्थापना, धर्म प्रचार, भगत का कर्म, मृत्यु के बाद उसके क्रिया-कर्म के साथ कई दृश्य दिखते हैं। लेखक ने इसी ओर संकेत करते हुए लिखा है कि ‘‘धर्म-प्रचार अर्थात्, भक्ति भाव भरे गीतों और भजनों को याद किए रहना, नया सृजन करना, तथा भजनों और वक्तव्यों के माध्यम से सम्प सभा के धार्मिक विचारों का प्रचार करना जिसमें साफ-सफाई से रहना, स्नान करना, तुलसी की माला पहनना, कंठी-जाप करना, चंदन-तिलक लगाना, धूणी में हवन के उह्नेश्य से घी डालना, घी का दीपक जलाना, मुख्य तिथियों पर और विशेषकर पूर्णिमा के अवसर पर नारियल चढ़ाना आदि इस में शामिल था। इस सारे कार्य का जो रचनात्मक पक्ष था वह था नैतिक गुणों का विकास करना और अच्छा मनुष्य बनाना।’’16 इस सामंतवादी मनुवादी व्यवस्था के साठगांठ में गुरू गोविन्द जी आदिवासियों से हवन तक करवा लेते हैं। जो बाद में आदिवासी समाज के पतन का कारण भी बना था। आदिवासियों का अपना धर्म है। इस कथन में अंधविश्वास की भावना को दिखाया गया है जो कि मुख्यधारा की मानसिक उपज है। अंत मे आदिवासी भी स्वीकारते हैं कि अगर खुलकर आमने-सामने अंग्रेजों का सामना करते तो शायद परिदृश्य ही कुछ ओर होता।

उपर्युक्त दोनों के कथन से स्पष्ट होता है कि मुख्यधारा की मानसिकता के कारण अंधविश्वास की परंपरा आदिवासियों के बीच कायम हुआ है। इस कारण आदिवासियों को वर्षो से इस परंपरा का खामियां भुगतना पड़ा है। ऐसा मत् गैर आदिवासी और आदिवासी कथाकारों के हैं।

इसके बाद आदिवासियों के आर्थिक एवं राजनीति समस्याओं को देखते हैं। जिसमें भष्ट्राचार दोनों तरह के समस्याओं में पाऐ जाते हैं। किसी भी अर्थव्यवस्था को चैपट करने में भष्ट्राचार भी हाथ होता है। आदिवासियों के लिए सरकार के तरफ से मुआवजे के लिए जो राशि आती हैं तो बड़े-बड़े साहब, अधिकारी की मिली भगत से गिल लिये जाते हैं और कुछ बचते हैं तो कुछ ही आदिवासियों को वह राशि पाते हैं। यह राशि बहुत कम होते हैं। इसी आदिवासी कथाकार पीटर पौल एक्का कहते हैं कि ‘‘अब तक जितने गांव खाली कराये जा चुके थे उनकी मांगे कागज फाइलों में ही दबी रह गयी थीं। मुआवजा के थोड़े बहुत पैसे मिले थे वे भी उन गरीबों के हाथ आते-आते आधा से भी कम हो गये थे। जमीन दिलाने-बसाने की बात भुला दी गयी थी।’’17 आदिवासी विकास के लिए सरकारी योजना से आई राशि का घटोला हो जाता है।

उपर्युक्त कथन से साबित होता है कि अगर आज आदिवासी आर्थिक मामले में जूझ रहे हैं तो इसके कारण बाहर से आए दिकुओं का हस्तक्षेप है; क्योंकि ये अपने सूझ-बूझ से आदिवासियों का शोषण करते हैं। इन दिकुओं का संबंध मुख्यधारा से जुड़े हुए हैं; क्योंकि आदिवासी समाज सरल, सहज और अबोध होते हैं। मुख्यधारा की सोच आदिवासियों के लिए कभी सही नहीं रहा है ऐसा मानना है आदिवासी कथाकारों का; किन्तु गैर आदिवासी अपने मत में कहते हैं कि आदिवासियों का विकास मुख्यधारा के कारण हो रहा है; क्योंकि वे उसका अनुकरण कर रहे हैं। लेकिन यह सच है कि आदिवासी उनका अनुकरण कर रहे हैं; किन्तु इसके कारण वे अपने पहचान को भी खाते जा रहे हैं।

अब आदिवासी केन्द्रित उपन्यासों में कथाकारों के भाषा-शिल्प को समझने का प्रयास किया जाय, जो उपन्यासों में अभिव्यक्त है। इसके लिए गैर आदिवासी कथाकार राकेश कुमार सिंह के ‘पठार पर कोहरा’ उपन्यास में भाषा-शिल्प को देखते हैं ‘‘पहले तो पक गया था। मेथी कल्हार (भूनकर) माई ने पीसकर लगा दिया तो घाव फूट गया। अब रखतेला रखेंगे घाव पर। रखतेला क्या ? कोई जड़ी-बूटी ?….. गोईठे की राख होती है न…खूब महीन, उसमें करू तेल (सरसों का तेल) फेंटकर घाव पर लगाते हैं। घाव ठीक हो जाता है और का… तुम जाना नई….अभी आते हैं।’’18 यहाँ आदिवासियों के दैनिक जीवन की आम बोलचाल की शब्दावली का प्रयोग किया है। वैसे कुछ शब्द ऐसे भी हैं जो आम समाज के समझ के बाहर हैं जैसे – कल्हार, रखतेला। इसमें पूर्णतः ग्रामीण शब्दों की प्रचुरता है। लेकिन प्रयोग किए गए शब्दों में कहाँ तक वास्तविकता है कि ये आदिवासी के शब्द हैं।

इसके बाद आदिवासी कथाकार पीटर पौल एक्का के ‘मौन घाटी’ उपन्यास में झारखण्ड के आसपास के मुंडा आदिवासी की बोलियों एवं उसके भाषा का प्रयोग किया गया है। वे आदिवासी क्षेत्रों में सरकार के द्वारा दिये गए सुविधाओं के दुर्दशा पर लिखते हैं कि ‘‘गाँव का इस्कूल देखो। साल में कै बार कलास होवे है। दूर आखर के पढ़ाई भी नी होता है। गाँव का इसपिताल देखा है तुमलोग। मलेरिया होगा तो कंपोडर निरोध दे के जायगा। इस्कूल और इसपिताल तो गोदाम ही गवे है। ई सब बनाइ-के-सजाइके हमत तोहर फरिज है। जे जे मरद है, मोंछ है, तो साथ में चलो और नही ंतो इसतरी मन लेखे जनाना कुर्ता-धोती पहिन के चूड़ी लागाइये चूल्हा फुँके रहा। कोई दोसर आके ई काम हमर वास्ते करेगा क्या। आपलोग कहो।’’19 प्रस्तुत कथन में हमे देखने को मिलता है कि इसमें स्थानीय बोलियों के शब्दों में इस्कूल, इसपिताल, फरिज, दोसर प्रमुख शब्द दिखने को मिलते हैं। इसके साथ व्यवहारिक जीवन शैली के शब्द भी दिखने को मिलते हैं।

उपर्युक्त देखा जाय तो मुख्यधारा और आदिवासी साहित्य में विशेष तौर पर अंतर दिखता है। मुख्यधारा की सोच सामंती प्रवृति की है जबकि आदिवासी इनसे अब भी अंजान है। वही मुख्यधारा की शब्दावली कर्कश है और आदिवासी की शब्दावली में कर्कश शब्द ही नहीं दिखने को मिलते हैं। मुख्यधारा का साहित्य सहानुभूति पर लिखा जाते रहा है; जबकि आदिवासी आदिवासी स्वानुभूति को लेकर प्रतिबद्ध है। मुख्यधारा की चिंतन प्रणाली में केवल व्यक्ति स्वार्थ दिखने को मिलता है; जबकि आदिवासी की चिंतन प्रणाली सामूहिकता को लेकर है।

निष्कर्ष

निष्कर्ष: समकालीन आदिवासी लेखक और दिकु आदिवासी लेखन के तुलनात्मक अध्ययन पाया गया कि हिन्दी साहित्य में गैर आदिवासियों ने भी आदिवासी लेखन में आदिवासी रचनाकारों की तुलना में कई रचनाएं रची जिससे हम वाखिफ है। इस रचनाओं के माध्यम से आदिवासी जीवन की दशा को सहानुभूति के बल पर भले ही पेश किया गया हो, किन्तु यह भी सच है कि आदिवासी साहित्य को समृद्ध करने में गैर आदिवासी रचनाकारों का सराहनीय योगदान रहा है। इसके बाद एक ओर सत्य की ओर मैं इशारा करना चाहूँगा कि मुख्यधारा के साहित्य में आदिवासी की क्या स्थिति है ? वह सर्वविदित है। मुख्यधारा का समाज मनुवाद पर कायम है जबकि आदिवासी समाज की धारणा स्व रचित सामूहिकता में कायम है।

संदर्भ सूची

1. मीणा डॉ. रमेशचन्द्र, आदिवासी विमर्श, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ हिन्दी अकादमी, जयपुर, 2014, पृ. 5

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3.  मीणा डॉ. रमेशचन्द्र, आदिवासी विमर्श, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ हिन्दी अकादमी, जयपुर, 2014, पृ. 5

4.  गनी सं. डॉ. शेख अब्दुल, जनजातीय भाषा और साहित्य चिंतन, देव प्रकाशन, नई दिल्ली, 2015, पृ. 14

5.  वही, से पृ. 15

6.  वही, से पृ. 15

7.  गुप्ता सं. रमणिका, आदिवासी समाज और साहित्य, कल्याणी शिक्षा परिषद्, नई दिल्ली, 2015, पृ. 17

8.  कृष्ण सं. बी./भीम सिंह, आदिवासी विमर्श, स्वराज प्रकाशन नई दिल्ली, 2014, पृ. 15

9.  वही, से पृ. 16

10.  वही, से पृ. 16

11.  वही, से पृ. 17

12.  शर्मा सं. विशाला/दत्ता कोल्हारे, आदिवासी साहित्य एवं संस्कृति, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014, पृ. 34-35

13.  सिंह राकेश कुमार, पठार पर कोहरा, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली – 03, दूसरा संस्करण: 2005, पृ. 151

14. डॉ. एक्का फा. पीटर पौल, एस.जे., मौन घाटी, जंगल के गीत, सत्यभारती प्रकाशन, राँची, झारखड -834001, अप्रैल 2013, पृ. 06-07

15. काँकरिया मधु, खुले गगन के लाल सितारे, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली – 02, पहली आवृति: 2007, पृ. 90

16. मीणा हरिराम, धूणी तपे तीर, साहित्य उपक्रम, नई दिल्ली, 2008, पृ. 188

17. डॉ. एक्का फा. पीटर पौल, एस.जे., पलास के फूल, सोन पहाड़ी, सत्यभारती प्रकाशन, राँची, झारखड -834001, मार्च 2012, पृ. 91

18. सिंह राकेश कुमार, पठार पर कोहरा, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली – 03, दूसरा संस्करण: 2005, पृ. 132

19. डॉ. एक्का फा. पीटर पौल, एस.जे., मौन घाटी, जंगल के गीत, सत्यभारती प्रकाशन, राँची, झारखड -834001, अप्रैल 2013, पृ. 73

डॉ. अमित कुमार साह,

महद्दीपुर, खगड़िया, बिहार

ईमेल: amitsmith555@gmail.com

नारी-विमर्श की दृष्टि से ‘कौन नहीं अपराधी’ उपन्यास में नारी संघर्ष: प्रो. राजिन्द्र पाल सिंह जोश, अनुराधा कुमारी

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प्रो. राजिन्द्र पाल सिंह जोश                                                                                       अनुराधा कुमारी

हिंदी विभाग                                                                                                                        शोधार्थी

स्नातकोत्तर राजकीय कन्या महाविद्यालय                                                                  पंजाब विश्वविद्यालय

सेक्टर 42, चंडीगढ                                                                                                               चंडीगढ़                                                         

शोध सार:

नारी विमर्श की दृष्टि से उपरोक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट है कि कौन नही अपराधीउपन्यास नारी संघर्ष की अभिव्यक्ति है । नारी बचपन से ही संघर्ष करना आरम्भ करती है और इस समाज में उसे आयुपर्यन्त संघर्ष ही करना पड़ता है । इस तथ्य को लेखिका ने अनेक पात्रों के संघर्षमयी जीवन से दर्शाया है चाहे नायिका सीमा हो, रीमा, उम्मी, अंशु, प्रमिला, कमला, विमला, महिमा, आसफा, सरिता इत्यादि कोई भी प्राप्त हो वह कहीं न कहीं, किसी ना किसी प्रकार के शोषण से ग्रस्त है। शोषण होने के पश्चात भी उसमें संघर्ष की हिम्मत और असंगत के प्रति रोष है। स्त्री को स्वयं सक्षम बनना होगा।

बीज शब्द: नारी, संघर्ष, उपन्यास, चिंतन, मुक्ति, सशक्तिकरण

शोध विस्तार

विमर्श को चिंतन मनन की प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है और जब इस चिंतन, मनन के केंद्र में नारी व् उसकी स्थिति आ गई तो यह नारी-विमर्श में परिवर्तित हो गया| वास्तव में नारी विमर्श किसी प्रकार की बहस का मुद्दा नहीं है | यह तो नारी जाग्रति और उसके अधिकारों के लिए है| नारी-विमर्श शब्द की उत्पत्ति इन दोनों शब्दों के योग से हुई है| अत: यह सपष्ट ही है की इसमें नारी चिंतन, उत्पीड़न, शोषण, संघर्ष, मुक्ति की चाह, सशक्तिकरण शामिल है |  नारी की स्थिति चिंता का विषय रही है जब उस पर गहन चिंतन आरम्भ हुआ तो नारी विमर्श उभर कर सामने आया | रथ के दो पहियों की भांति नर-नारी का जीवन समान महत्वपूर्ण है परन्तु जब नारी को हिन् दृष्टि से देख सम्मानजनक महत्वपूर्ण स्थान न मिला तो नारी को प्रतिष्ठित स्थान दिलाने का कार्य नारी-विमर्श ने किया |   

            हिन्दी साहित्य में एक सुपरिचित और प्रतिष्ठित नाम है ’कृष्णा अग्निहोत्री’ जिन्होंने अपने साहित्य में समाज के चिरशोषित वर्ग नारी को सार्थक अभिव्यक्ति प्रदान की है। उन्होंने कहानियों और उपन्यासों दोनों पर ही अपनी कलम चलाई और हर रचना के केन्द्र में नारी को ही चुना है। कृष्णा अग्निहोत्री अपने उपन्यासों के माध्यम से न केवल पाठकों और आलोचकों को,  स्थितियों की,  विद्रूपता दिखा कर चौंका  देती हैं बल्कि, उन्हें सोचने और विचारने के लिए भी मजबूर कर देती है। यदि इन्हें शोषित महिलाओं की बेबाक प्रवक्ता कहा जाए तो ये बिल्कुल भी असंगत नहीं होगा। दिनेश द्विवेदी आपके सम्बन्ध में लिखते हैं-’’पुरूष के सामन्ती और भोगवादी केक्टसी नज़रिये से चुभी और बिंधी हुई समर्पित नारी की मूक चीत्कार को यदि किसी ने अपने सशक्त कथानकों और तिलमिला देने वाली समस्याओं से व्यक्त किया है तो वह है-कृष्णा अग्निहोत्री।’’¹यह पूर्णतः सत्य भी है क्योंकि कृष्णा अग्निहोत्री की रचनाओं के केन्द्र में नारी ही है।

नारी चाहे किसी भी वर्ग की हो अमीर-गरीब, चाहे कितनी भी पढ़ी लिखी हो या अनपढ़, चाहे घरेलू हो या फिर कामकाजी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका प्रत्येक स्तर पर शोषण ही होता रहा है। इसी कटु सत्य को आधार बनाकर कृष्णा अग्निहोत्री बार-बार पाठकों के सामने पेश करती हैं तभी उनकी रचना की कथावस्तु के केन्द्र में नारी ही रहती है। उनका ऐसा ही एक उपन्यास है ’कौन नहीं अपराधी’ जिसके केन्द्र में फिर से नारी को रखा गया है। इस उपन्यास की भूमिका में कृष्णा अग्निहोत्री स्वीकार करती हुई कहती है-’’जी हां, पुनः मैनें ’नारी’ को इस उपन्यास का प्रमुख पात्र बनाने की हिम्मत जुटायी है, क्योंकि सच्चाई यह है कि जितनी सूक्ष्मता से मैं उनके अन्दर प्रवेश कर सकती हूँ उतनी

 सहजता से अन्यत्र नहीं।’’² वास्तव में नारी जीवन से जुड़ी हुई समस्याएँ अनन्त हैं जिनका अन्त होता नज़र नहीं आता और उन्हें समाज के समक्ष रखना भी अत्यन्त आवश्यक है।

            ’कौन नहीं अपराधी’ उपन्यास अपने आप को सार्थक करता हुआ समाज के अपराधीपन को उद्घाटित करता है तथा समाज के प्रत्येक तबके से यह प्रश्न करता है कि आखिर नारी की ऐसी स्थिति के लिए अपराधी कौन नहीं है ? अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति इस अपराध में शामिल है चाहे वो नारी ही क्यों न हो, जो ऐसी नियति को स्वीकार करती है। परन्तु इसके बावजूद भी समाज में ऐसी नारियाँ मौजूद है जो संघर्ष करती हैं और अपनी स्थिति को बदलने के लिए प्रयत्नशील हैं। इस उपन्यास में एक ऐसे ही पात्र को लिया गया है जिसमें अनेक गुण विद्यमान हैं, बावजूद इसके उसे समाज का चौतरफा शोषण सहना पड़ता है। कृष्णा अग्निहोत्री ने इस पात्र के चरित्र के सभी पहलू पाठकों के सम्मुख रखकर सचमुच में एक जीवंत पात्र की संकल्पना की है। यह पात्र कहीं न कहीं समाज की नग्न सच्चाई को भी पाठकों के समक्ष पेश करता है कि समाज एक पति परित्यक्ता स्त्री के साथ कैसे पेश आता है। इस उपन्यास की नायिका का नाम सीमा है। सीमा की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए ’डाॅ. बालाजी श्रीपती भुरे’ अपनी पुस्तक ’कृष्णा अग्निहोत्री के उपन्यासों में नारी’ के अन्तर्गत लिखते हैं-’’पुरूष वर्चस्व ने जब चाहा नारी को बाँधा, जब चाहा छोड़ दिया। जीवनसंगिनी बनाया और कुछ क्षणों के बाद परित्यक्ता का खिताब दे डाला। झोली में एक बच्ची का उत्तरदायित्व डाला और विदेश भाग गये।’’ङ इस अचानक से आई स्थिति के कारण सीमा का सारा जीवन संघर्षों से घिर जाता है।

सीमा जो कि इस उपन्यास की नायिका है लेखिका ने उसके अन्दर अनेक गुण दिखाए हैं। वह एक सम्माननीय व्यक्तित्व की स्वामिनी है तो साथ ही अनेक मानवीय गुणों से भरपूर है। उसके हृदय में सभी के लिए स्नेह और दयाभाव है, परन्तु उसके जीवन की कटुता तो देखो कि बचपन से ही उसकी माँ और बहन रीमा उसके साथ बस सौतेला व्यवहार ही करते रहे । कभी-कभी तो उसे लगता भी है कि यह शायद उसकी सगी माँ नहीं अपितु सौतेली है। परन्तु फिर भी उसने ऐसे ख्याल को अपने मन पर कभी हावी नहीं होने दिया। सीमा का विवाह जल्दी हो गया और कुछ समय पश्चात् ही उसने बेटी को जन्म दिया। जिसका नाम उम्मी रखा गया। बेटी के जन्म के पश्चात् बिना किसी कारण के सीमा का पति उसे छोड़ कर विदेश चला जाता है । इस पर भी उसकी बहन रीमा ताना कसती हुई कहती है-’’भाई सबको अपनी समस्याएँ सुलझानी पड़ती है। आप जानो, मैं तो इतना जानती हूँ कि पत्नी में दमखम हो तो पति हाथ से बाहर नहीं जा सकता है।’’4इतना सुनते ही सीमा सकते में आ जाती है कि- क्या यह उसकी सगी बहन है जिसे उसकी हल्की सी भी चिंता नहीं। सीमा अपनी नन्हीं सी बेटी को लेकर किराए का कमरा लेकर रहने लगती है और  उसका जीवन संघर्षों से भर जाता है। सीमा डेकोरेटर का काम आरम्भ करती हुई अपनी बेटी को एम. ए. करवाने के बाद एक शिक्षिका बनाती है। सीमा के माध्यम से कामकाज़ी महिलाओं की समस्याओं की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।

            नारी को समाज में अपना स्थान बनाने के लिए अत्यन्त संघर्ष करना पड़ रहा है। मुख्यतः समाज में उसका शोषण करने वाले लोग ही अधिक मिलते है। चाहे यह शोषण शारीरिक स्तर पर हो या मानसिक धरातल पर। उम्मी जोकि अपने नंपुसक पति द्वारा छली जाती है वह उसे प्रत्येक कदम पर मानसिक और शारीरिक पीड़ा पहुँचा कर संतोष प्राप्त पाता है। लेखिका पति द्वारा छली गई उम्मी की पीड़ा को व्यक्त करती हुई कहती है-’’क्या आज बिस्तर पर घटित उसके इस आहत तन व मन की कोई साक्षी समाज को सौंपी जा सकती है ? उसके इस घाव से रिसते रक्त को कोई देख सकता है ? एक बन्द कमरे में बीते ऐसे कलुषित नकारें क्षणों का किसे निर्णायक होना चाहिए, भोक्ता या श्रोता को ?’’5उम्मी जो घर से बाहर नौकरी करे और वहाँ भी अनेक समस्याओं से संघर्ष करे उसे ही घर आकर पति की मार सहनी पड़ती है। उम्मी बिना वजह अपने पति की मार सहन करती है परन्तु लेखिका ने उसमें परिवर्तन दिखाया और उम्मी अपने पति का विरोध करती हुई कहती है-’’तुमने मेरे हाथों में अदृश्य बेडि़याँ डाल रखी है, अब मैं इन्हें सह नहीं सकुंगी। अच्छी तरह समझ रही हूँ कि इन्हें मुझे ही काटना पड़ेगा। मैं कोई चाभी का खिलौना नहीं जिसे तुम जब चाहो चलाओ, फेंको और तोड़ डालो समझे।’’6उम्मी के भीतर यहीं से विद्रोह की चेतना का उन्मेष होता हुआ दिखाई देता है।

इस उपन्यास के माध्यम से कृष्णा अग्निहोत्री ने समाज की ऐसी स्त्रियों को संघर्ष के मैदान में उतारा है जो पति परित्यक्ता हैं, समाज द्वारा शोषित हैं या पति द्वारा प्रताडि़त हैं अथवा जिनके पति नपुंसक हैं। मध्यवर्ग की उम्मी हो या फिर उच्च वर्ग की सरिता, हिन्दु समाज की शुभाहो या मुस्लिम धर्म की आसफा या ईसाई महिला कमला। सभी किसी न किसी तरह की त्रासदी को भोगने के लिए विवश है। उपन्यास की एक पात्र है -विमला। जिसका बॉस उसका शारीरिक शोषण करता है और विद्रोह करने पर धमकी देता हुआ कहता है-’’यदि विमला मेरे साथ खुशी से रहो तो तुम्हें धन भी मिलेगा और प्रमोशन भी। यदि मुँह खोलोगी तो तुम्हारे मुँह पर तेजाब फिंकवा दूँगा।’’7विमला उसकी धमकी से डरती नहीं है बल्कि जीवन में उससे कभी न मिलने का निर्णय लेते हुए नौकरी छोड़ कर विवाह कर लेती है।

            यह उपन्यास मात्र सीमा की ही गाथा नहीं है अपितु चार पीढि़यों की गाथा है जिसमें सबसे पहली पीढ़ी सीमा की माँ है। दूसरी पीढ़ी सीमा और उसकी बहन रीमा। तीसरी पीढ़ी के अन्तर्गत सीमा की बेटी उम्मी और रीमा की बेटी रवीना। चैथी पीढ़ी में उम्मी की बेटी अंशु शामिल है। ये पीढि़याँ किसी भी आयुवर्ग की हो पर जीवनयापन के लिए संघर्ष प्रत्येक पीढ़ी को करना पड़ता है । इनके संघर्षों के कारण यह उपन्यास केवल नारी मुक्ति तक ही सीमित नहीं अपितु इसमें राजनीतिक भ्रष्टाचार, व्यवस्था की कुरूपता का भी चित्रण किया गया है। ईसाई धर्म की कमला की बेटी महिमा का उसके मौसेरे भाई द्वारा बलात्कार किया गया, यही नहीं इस के बाद वो अपने चार दोस्तों से भी उसका बलात्कार करवाता है कि कहीं वो अपना मुँह न खोल दे। इस जघन्य हत्याकाण्ड को भ्रष्ट व्यवस्था की वजह से भुला दिया गया। लेखिका कहती है-’’पचासी लाख रूपयों के मोह में प्रांत की पुलिस ’महिमा कांड’ भूल गयी। धीरे से वह चैकीदार भी गायब हो गया और गुड्डू के अपराध की फाइल न जाने थाने के किस शैल्फ में ऐसे चिपकी की ढूँढने पर भी नहीं मिली।’’8ऐसे भ्रष्ट तन्त्र से न्याय के लिए एक अकेली महिला कब तक अपना संघर्ष जारी रख सकती है? 

उपन्यास में एक विशिष्ट पात्र रीमा है जो कि सीमा की छोटी बहन है। सीमा से वह बचपन से ही ईष्र्या करती है। कहीं न कहीं उसमें अपने आपको अधिक श्रेष्ठ दिखाने की चाह है। परिवार वालों के विरोध करने के बावजूद भी वो असगर नाम के मुस्लिम युवक से विवाह कर विदेश चली जाती है। जब भी भारत आती है तो अपनी अमीरी का रौब सबके ऊपर झाड़ती है। ऊपर से दिखने में सीमा जितनी संयत और सफल वैवाहिक जीवन वाली लगती है भीतर से वो उतनी ही उलझी और परेशान है। परन्तु वह फिर भी समस्याओं से निपटती हुई उन्हें सुलझाती है। रीमा के पति का पहला विवाह हो चुका है और पहली पत्नी से बच्चे भी है। रीमा को यह बात बहुत बाद में पता चलती है और वो साफ शब्दों में असगर से कह देती है कि मैं यह बिल्कुल सहन नहीं कर सकती। जब असगर अपनी पहली पत्नी और उसकी बेटी की वजह से भारत आकर बसना चाहता है तो रीमा तीव्र विरोध करती हुई अपनी माँ से कहती है-’’मैं कैसे एकाएक सब छोड़कर यहाँ रोने आ जाऊँ। प्लान करना पड़ता है, अपनी जड़ें उखाड़ने के लिए जब तक इनका यह सिलसिला जारी रहेगा, मैं वापस नहीं आ सकूँगी।’’9रीमा के अंदर संघर्षों से लड़ने की जुझारू प्रवृत्ति नजर आती है।

               उपन्यास के अन्य पात्रों के माध्यम से नारी स्वावलम्बन को भी उजागर किया गया है। एक ऐसा ही पात्र है –शांति, जोकि सीमा की कामवाली बाई है और एक निम्न परिवार से है। उसका पति शराबी है और रोज रात को शराब पीकर उसे मारता है। शांति अनपढ़ है परन्तु कर्मठ है। वो जो भी मेहनत करके कमा के लाती है उसे उसका पति छीन कर शराब पी जाता है। सीमा शांति का साथ देती है और उसे समझाती है कि उसे हार नहीं माननी चाहिए बल्कि अपने पति का डटकर मुकाबला करना चाहिए। सीमा की बातों से ही प्रभावित होकर शांति, संघर्ष करती हुई अपने पति को लच्छन सुधारने के लिए कहती है। वह सीमा को इस बारे में बताती है-’’कह दिया है लच्छन सुधार ले, वरना घर में भी ताला डाल दूँगी। दे किराया और खोल ताला।’’10नारी को संघर्ष से यदि मुक्ति चाहिए तो उसका मुख्य आधार नारी का आर्थिक स्वालंबन ही है।    

सरिता एक समाज सेविका है जो कि उच्च वर्ग से सम्बन्ध रखती है। अपने पति के पैसे और प्रेमी की पहुँच के कारण वो नगरपालिका चुनाव जीत जाती है। परन्तु नगर की भलाई के लिए वो कोई भी उचित निर्णय नहीं ले सकती क्योंकि एक तरफ उसका पति कुछ कहता है और दूसरी तरफ उसका प्रेमी सूरजभान कुछ और करवाना चाहता है। उसका जीवन इन दोनों के कारण अनेक संघर्षों में फंस कर रह जाता है। जब वह नगर सुधार के लिए कार्य करना चाहती तो उसका विरोधी ’पालीवाल’ सरिता और सुरजभान के बेहूदा चित्र अखबार में प्रकाशित करवा देता है। यदि किसी औरत को कमजोर करना हो तो सबसे पहला हथियार उसका चरित्र हनन करना है और यही कार्य पालीवाल करता है। इस पर टिप्पणी करते हुए सरिता सीमा से कहती है – ’’मै मानती हूँ कि सूरजभान मुझे पसन्द करते हैं लेकिन मै वेश्या नही हूं कि सारे नेताओं का बिस्तर गरम करूंगी।’’11 जब सरिता अधिक विद्रोह करती है तो संदिग्ध अवस्था में अधजली हुई लाश उसी के घर में मिलती है । कुछ लोग कहते है कि सरिता ने आत्महत्या कर ली तो कुछ लोग दबी हुई आवाज में कहते है कि सरिता की हत्या कर दी गई।

निष्कर्ष   नारी विमर्श की दृष्टि से उपरोक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट है कि ’कौन नही अपराधी’ उपन्यास नारी संघर्ष की अभिव्यक्ति है । नारी बचपन से ही संघर्ष करना आरम्भ करती है और इस समाज में उसे आयुपर्यन्त संघर्ष ही करना पड़ता है । इस तथ्य को लेखिका ने अनेक पात्रों के संघर्षमयी जीवन से दर्शाया है चाहे नायिका सीमा हो, रीमा, उम्मी, अंशु, प्रमिला, कमला, विमला, महिमा, आसफा, सरिता इत्यादि कोई भी प्राप्त हो वह कहीं न कहीं, किसी ना किसी प्रकार के शोषण से ग्रस्त है। शोषण होने के पश्चात भी उसमें संघर्ष की हिम्मत और असंगत के प्रति रोष है। स्त्री को स्वयं सक्षम बनना होगा। इस संदर्भ में रमणिका गुप्ता लिखती हैं- ’’स्त्रियां स्वयं सक्षम बने और कानूनों का उपयोग करें। झूठी इज्जत, बर्बर और गैर जिम्मेवार परिवार व जड़ समाज की प्रतिष्ठा की भावना को अपने मन से निकाले बिना या इन संस्थाओं को ध्वस्त किए बिना, एक ऐसा नया समाज नहीं बन सकता, जहां स्त्री भी एक मनुष्य समझी जाए।’’ यह सत्य भी है कि नारी को अपनी स्थिति सुधारने के लिए स्वयं ही प्रयास करना होगा। समाज में प्रचलित रूढ़ मानसिकता, पितृसत्तात्मक व्यवस्था, अंधविश्वासों. गल चुके रीति -रिवाजों के द्वारा नारी शोषण की जो प्रिक्रिया चलती आ रही है उससे भी नारी को स्वतंत्रता दिला कर स्वयं का अस्तित्व कायम करने में सहायता करना नारी विमर्श का लक्ष्य है| 

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

1.         गीते, नीहार, कृष्णा अग्निहोत्री सम्पूर्ण साहित्य का मूल्यांकन, कानपुर: अमन प्रकाशन, पृष्ठ-45

2.         अग्निहोत्री, कृष्णा, कौन नहीं अपराधी, कानपुर: अमन प्रकाशन, पृष्ठ-7

3.         भुरे, बालाजी श्रीपति, कृष्णा अग्निहोत्री के उपन्यासों में नारी, कानपुर: शैलजा प्रकाशन, पृष्ठ-118

4.         अग्निहोत्री, कृष्णा, कौन नही अपराधी, कानपुर: अमन प्रकाशन, पृष्ठ-29

5.         वही, पृष्ठ-51

6.         वही, पृष्ठ-65

7.         वही, पृष्ठ-251

8.         वही, पृष्ठ-237

9.         वही, पृष्ठ-211

10.       वही, पृष्ठ-240

11.       वही, पृष्ठ-291

12.       गुप्ता, रमणिका, स्त्री मुक्ति संघर्ष और इतिहास, नई दिल्ली: सामयिक प्रकाशन पृष्ठ-1