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यह समय और लेखक होने का मतलब: मनोज कुमार पांडेय

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यह समय और लेखक होने का मतलब

मनोज कुमार पांडेय
जब मैंने लिखना शुरू किया तो एक लड़की थी जिसे मैं प्रभावित करना चाहता था। शुरुआत में मैंने फिल्मी गीतों की तर्ज पर कुछ गीत लिखे थे या बदनाम शायरियों की तर्ज पर कुछ शायरी की थी जिन्हें मेरे पिता ने मेरे सामने ही जला दिया था और मेरी जी भर के लानत मलानत की थी। मेरे कान उमेठे थे। यह लिखने की वजह से सत्ता द्वारा हासिल पहला दंड था। और ईनाम था थोड़े दिन के लिए ही सही पर उस लड़की का प्यार जो मुझे मेरी इस रचनात्मकता की वजह से हासिल हुआ था। क्या तब भी मेरे मन में रचनात्मकता की कोई धारणा रही होगी? और क्या यह उस धारणा से बहुत ज्यादा भिन्न रही होगी जिसके तहत अलिफलैला की शहरजाद ने एक पूर्वाग्रही हत्यारे शासक को कहानियाँ सुनाना शुरू किया होगा और बिना रुके हजार रातों तक सुनाती ही चली गई होगी।
यह बातचीत की बेहद निजी शुरुआत है। पर मुझे लगता है कि इस तरह से मैं अपनी बात ज्यादा तरतीब से रख सकता हूँ। मैं डायरी लिखा करता था। जाहिर है कि वह डायरी पर नहीं किसी कॉपी पर लिखी जाती थी। तो मेरा गीत-गोविंद जब जला दिया गया तो मैं सतर्क हो गया। मैंने देवनागरी वर्णमाला के स्वरों और व्यंजनों की जगह को एक निश्चित क्रम में उलट पुलट दिया। और थोड़े ही दिनों में मैं अपनी इस गुप्त भाषा में सिद्धहस्त हो गया। इस हद तक कि एक बार फिर यह डायरी मेरे पिता को मिली और वह कई दिनों तक उससे जूझते रहे। उनके साथी अध्यापक भी जूझते रहे। जाहिर है कि मुझसे भी पूछताछ की गई। मुझे नहीं बताना था, नहीं बताया और वे कभी नहीं जान पाए कि मैंने उस डायरी में क्या लिखा था। क्या मेरे इस बेहद निजी संघर्ष का जो मैंने अपनी निजता के लिए रचा था आज कोई मतलब नहीं है? वर्णमाला में अपनी तरह से किए गए हेरफेर को मैं आज एक प्रभावी रचनात्मक डिवाइस क्यों न मानूँ।
मेरा साहित्य से रिश्ता बहुत देर से बना। यह वही समय था जब पहले तेरह महीने फिर पूरे पाँच साल के लिए भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई थी। इसके पहले जब वह तेरह दिन के लिए सत्ता में आई थी तब मेरा बीए का आखिरी साल था और मैं तब तक राजनीतिक या साहित्यिक चेतना से पूरी तरह शून्य था। इसके और पहले जब बानबे में ढाँचा गिरा था तब मैं अपनी ननिहाल में रहकर पढ़ता था। उस समय मेरे आसपास जो लोग थे उन्होंने मिठाई बाँटी थी। नाचे थे, पटाखे फोड़े गए थे। अबीर गुलाल उड़ाया गया था। मैंने भी यही सब किया था। मैं उस समय दसवीं का विद्यार्थी था। तब मुझे पता भी नहीं था कि मैं कभी किस्से कहानियाँ लिखूँगा और विद्वानों के बीच खड़ा होकर अपनी बात रखूँगा। 
मैं गाँव से आया हूँ। गाँव के बारे में लिखने का सबसे आसान तरीका यह है कि आप अपनी भाषा में एक गँवई टोन ले आएँ और अपने पात्रों के नाम फुलवा गेंदवा फुलिया धुलिया टाइप के रखें और एक जमींदार या सवर्ण शोषक हो तथा कुछ दूसरे उसके सताए हुए पात्र हों जो पूरी कहानी में सताए जाएँ और आखिर में कोई उम्मीद या उजाले की एक नकली किरण दिखा दी जाय। या सूरज पूरब पश्चिम जहाँ कहीं भी हो वहीं उग आए। एक जमाने में ऐसी बहुत कहानियाँ लिखी गईं और पाठकों के नाम पर, खासतौर पर वामपंथी संगठनों से जुड़े मुर्दार आलोचकों ने उन्हें खूब खूब ऊपर चढ़ाया। बहुतेरे आज भी यही कर रहे हैं।
मुझे ऐसा कुछ पढ़ते हुए गुस्सा आता है। मुझे बार बार लगता है कि लेखक अपने चरित्रों को अपमानित कर रहा है। वह उसे जान-बूझकर हीनतर दिखा रहा है। जो लेखक अपने चरित्रों का कायदे से नाम तक नहीं रख सकता वह उनके प्रति कितनी जिम्मेदारी से पेश आएगा। जबकि बानबे के बाद… टेलीविजन के बाद और बाद में टाटा स्काई या डिश टीवी जैसों की कृपा से सुंदर और आधुनिक लगने वाले नामों की पहुँच एकदम कोनों अँतरों तक भी संभव हो चुकी हैं। वहाँ भी जहाँ भोजन नहीं पहुँचा, शिक्षा नहीं पहुँची, लेकिन नाम पहुँच गया है। एक हद तक ही सही एक खास तरह की चेतना भी पहुँच गई है। उदारीकरण ने शोषण का रूप बहुत हद तक बदल दिया है। उसने प्रतिरोध की चेतना को भी बदला है। और कई बार उसे खरीदा भी है। मैगसेसे से लेकर नोबेल तक चेतना को खरीदने के तमाम उदाहरण हैं। और यह भी यही समय है कि इस सबको समझने के लिए आपको बहुत पढ़ा-लिखा होने की भी जरूरत नहीं है। 
मैं बचपन से ही बहुत ही डरपोक व्यक्ति हूँ। एक समय वह भी था जब मैं अपनी दादी या पिता के सामने काँपता था। बाद में स्कूल गया तो बदमाश लड़कों से डर के रहा। सायास तरीके से कुछ दूसरे बदमाश लड़कों से दोस्ती की ताकि बदमाश लड़कों के दूसरे गिरोह से बचा रह सकूँ। बाद में थोड़ा बड़ा हुआ और इतिहास भूगोल पढ़ा तो जाना कि अरे यह दुनिया भी तो ऐसे ही दो गिरोहों में बँटी हुई थी। और तब मुझे वे लोग या देश बहुत ताकतवर लगे जो दोनों गिरोहों से इतर अपनी राह खुद बना रहे थे। कभी भारत भी उनमें से एक था जिसमें मैं जन्मा था। वही भारत आज डगर-मगर होते होते अंततः एक गिरोह के सरगना के चरणों में लहालोट हो गया है। इस स्थिति को एक कहानीकार के रूप में मैं कैसे देखूँ। और क्या यह कोई इकलौती स्थिति है? ऐसी बहुत सारी स्थितियाँ हैं जो हर एक सुबह के साथ मेरे डर को बढ़ा देती हैं।
आखिर किन चीजों से डरता हूँ मैं और क्यों डरता हूँ। क्या एक व्यक्ति के रूप में मेरा डर और एक लेखक के रूप में मेरा डर दोनों एक ही हो गए हैं या दोनों अलग अलग हैं। नहीं दोनों बहुत अलग हैं दोनों में बहुत झगड़ा है। और मैं चाहता हूँ कि यह झगड़ा निरंतर चलता रहे। साहित्य की बहुत सारी परिभाषाएँ हैं। उनमें से कुछ को पढ़ते हुए और थोड़ा बहुत साहित्य पढ़ते हुए और उससे बहुत ज्यादा जीवन को पढ़ते समझते हुए यह जाना कि साहित्य एक मनुष्य के दूसरे मनुष्य के साथ रिश्ते को, मनुष्य के विभिन्न संस्थाओं के साथ रिश्ते को, मनुष्य के प्रकृति के साथ रिश्ते को संवेदना, विचार और सौंदर्य के स्तर पर समझने की कोशिश का नाम है। पर यह कोशिश कोई आसान चीज नहीं है। 
धर्म, राज्यसत्ता और प्रकृति मेरे निकट यह तीन सत्ताएँ हैं जिनके साथ हमें एक संतुलन बना कर चलना है और भिड़ना भी है। इनमें से पहली दो सत्ताओं को मैं नकारात्मक मानता हूँ। मनुष्यता के इतिहास को सबसे दारुण दुख इन्हीं दोनों ने दिए हैं। खासकर दोनों के मेल ने। जिसका बेहतरीन उदाहरण हम अभी अपनी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार में देख सकते हैं। इस समय की सबसे खतरनाक चिंताओं में से एक सांप्रदायिकता मेरे लिए धर्म का एक प्रोडक्ट भर है। जब तक धर्म रहेगा तब तक सांप्रदायिकता भी रहेगी। यह तब भी रहेगी जब कि मान लीजिए कि दुनिया में कोई एक ही धर्म बचे। यह इसलिए भी बेहद खतरनाक है कि सत्ता इसे एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल करती रही है। इस्तेमाल करने वाली सत्ता जितनी निरंकुश और खतरनाक होगी सांप्रदायिकता का तांडव उतना ही जबर्दस्त होगा।
दोनों ही सत्ताएँ हमारी आजादी पर बहुतेरे प्रतिबंध लगाती हैं। राज्यसत्ता जो काम लौकिक तकाजों का वास्ता देकर करती है धर्म वही काम अलौकिक बातों के आवरण में करता हैं। दोनों की अपनी रूढ़ियाँ और दायरे हैं। अपने दायरे से बाहर जाने वाले के लिए दोनों के पास लौकिक अलौकिक डर हैं, दंड देने की शक्ति है। दोनों के पास अपने अपने अंधविश्वास हैं। दोनों के पास यह दावा है कि आपकी जरूरतों और लौकिक अलौकिक व्यक्तित्व की समझ उन्हें आप से ज्यादा है। और उनके पास अपनी बात मनवाने के लिए अनेक संस्थाएँ हैं। जिसे हम समाज कहते हैं वह कई बार धर्म के एक खतरनाक एजेंट के रूप में भी काम करता दिखता है। राज्यसत्ता के एजेंट ज्यादा मूर्त हैं। 
विकास एक और डरावनी चीज है। जिसका नाम सुनकर कँपकँपी होती है। क्या यह अनायास ही हो गया है कि विकास शब्द आज अपने विलोम का अर्थ देने लगा है। किसका विकास और किस कीमत पर… क्या विकास का वही माडल और भी शातिर रूप में आज भी नहीं चल रहा है जो यूरोप ने कभी बेहद कामयाबी से उत्तर और दक्षिण अमेरिका में चलाया। या यूरोपीय देशों ने अपने उपनिवेशों में किया। क्या वही हमारी सरकारें हमारे अपने ही देश में हमारे अपने ही लोगों के साथ नहीं कर रही हैं! क्या यह एक भयानक अश्लील दृश्य नहीं है कि हमारा लोकतांत्रिक तरीके से चुना गया और अपने को चाकर कहने वाला प्रधानमंत्री किसी ऐसे पूँजी के दैत्य से अपनी पीठ सहलवाए जो खरबों रुपए अपने एक निजी मकान ‘एंटीलिया’ में खर्च कर दे। एक ऐसे देश में जिसकी बड़ी आबादी भुखमरी, कुपोषण, मलेरिया और अशिक्षा से ग्रस्त हो। पर यही हमारा विकास का मॉडल है। 
मेरे लिए निजता और सामाजिकता दोनों बहुत जरूरी चीजें हैं। पर मैं जिस समाज से आता हूँ उसमें निजता के लिए अवकाश न के बराबर है। एक बेहद स्थूल उदाहरण का सहारा लूँ तो मान लीजिए कि आप डायरी लिखते हैं। तो इस डायरी में लिखी गई आपकी निजी बातें आपका भाई-बहन-माँ-पिता-दोस्त-पति-पत्नी-प्रेमी-प्रेमिका कोई भी अधिकारपूर्वक पढ़ सकता है और उसे इसमें कुछ भी गलत या अनैतिक नहीं लगता। आपको किसके साथ जीना या मरना है यह भी आपके माता-पिता-रिश्तेदार या सामाजिक दबाव तय करते हैं। कहने का मतलब यह कि मैं सामाजिकता/सामूहिकता का नकारात्मक रूप ज्यादा देखते हुए बड़ा हुआ हूँ। ऐसे में निजता की बात करता हुआ या निजता के लिए संघर्ष करता हुआ कोई व्यक्ति मेरे लिए प्रतिरोध की लड़ाई लड़ता हुआ व्यक्ति है। यह लड़ाई जितनी निजी है उतनी ही सामाजिक भी है।
पर बहुत कमाल का समय है यह। जो चीजें आजादी के नारे के साथ आईं उन्होंने हमें सबसे अधिक गुलाम बनाया। मोबाइल या आधार कार्ड जैसी चीजें इस बात के कुछ स्थूल उदाहरण भर हैं। इन चीजों ने हम तक सत्ता के शैतानी पंजे की पहुँच को बेहद आसान बना दिया। रफ्तार का कायदे से मूल्यांकन अभी होना बाकी है। पर यह अनायास नहीं है कि हमारे समय का एक बड़ा लेखक जब दीवार में रहने वाली खिड़की खोलता है तो वहाँ तेजरफ्तार कारें और मोटरसाइकिलें नहीं हाथी और साइकिल होते हैं। प्रकृति खिड़की से आकर फल दे जाती है। पानी इतना साफ होता है कि नदी की गहराई में गिरा सिक्का एकदम साफ दिखाई देता है। लोग एकदम सीधे और सरल हैं। कहा गया कि यह एक काल्पनिक दुनिया है। कौन नहीं जानता कि यह एक काल्पनिक दुनिया है। कथाकार नहीं कल्पना करेगा तो क्या आलोचक करेगा? पर सवाल यह है कि यह काल्पनिक दुनिया क्या कोई प्रतिरोध नहीं रचती? क्या प्रतिरोध का एकमात्र तरीका किसी प्रचलित वामपंथीय परिणति तक पहुँचना ही है? क्या वे ही रचनाएँ प्रतिरोधी चेतना की मानी जाएँगी जिनके चरित्र नक्सलवादियों की तरह हथियार उठाए घूमेंगे? 
झूठे किस्म का आशावाद बहुत लुभावनी चीज है। कभी इसने हिंदी रचनाकारों की एक पूरी पीढ़ी को नष्ट कर दिया था। उनकी रचनाओं में आशा ही आशा थी जबकि जीवन में उसकी संभावना बेहद नगण्य थी। उनकी मुश्किल यह भी थी कि जहाँ सचमुच की आशा थी उधर उनका आना जाना ही नहीं था। मुझे लगता है कि जब आप घटनाओं को एक वैश्विक संदर्भ में देखते हैं, दिख रहे यथार्थ के नीचे छुपे हुए यथार्थ की खोज में डुबकियाँ लगाते हैं और साथ में स्मृति और कल्पना से जरूरी रचनात्मक रिश्ता बनाए रखते हैं तो झूठा आशावाद आपके आसपास भी नहीं फटकता।
मैंने कहीं पढ़ा था कि ‘कल्पना’ स्मृति का स्वप्न है। मैं अनुभव की जगह पर स्मृति शब्द का प्रयोग करना पसंद करूँगा। स्मृति मेरे लिए वह सभी अनुभव हैं जिनकी कोई (मामूली सी ही सही) प्रतिक्रिया मेरे भीतर छुपकर बैठी हुई है। जिसे स्तानिस्लेवस्की ‘भावनात्मक स्मृति’ कहा करते थे। स्मृतियों से और स्मृतियों के स्वप्न यानी कल्पना से मैंने एक सचेत रचनात्मक संबंध बनाने की कोशिश की है। मेरा मानना है कि इन दोनों के अभाव में रचना संभव ही नहीं हो सकती। इन दोनों ही चीजों को थोड़ा और व्यापक कर के भी देखा जा सकता है कि स्मृतियाँ मतलब उत्पीड़न और संघर्ष की स्मृतियाँ, दुख और उल्लास की स्मृतियाँ। ऐसे ही कल्पना का मतलब उड़ान, उत्पीड़न के सारे बंधन तोड़कर बाहर आने की ललक, आजादी। और यही वह चीज है जो स्मृतियों के साथ आपके रिश्ते को संतुलित बनाती है। यानी कि आप अतीत के बोझ से दब जाने से बचे रहते हैं। मुझे लगता है कि स्मृति और कल्पना यानी अतीत और भविष्य के बीच वर्तमान की सही अवस्थिति ही रचना को मुकम्मल बनाने वाली चीज है।
रचनाशीलता के अपने हथियार हैं। और यह बुरा समय ही होता है जब आपको अपने हथियारों को आजमाने की जरूरत पड़ती है। पुराने हथियारों को दुरुस्त करना होता है। सड़े गले या अपनी उपयोगिता खो चुके हथियारों को त्यागना भी पड़ता है। यह कठिन है क्योंकि यह सिर्फ आदत का ही मामला नहीं है यह उससे इतर कई बार लक्ष्य का भी मामला बन जाता है। जैसे भारतीय किस्म का यथार्थवाद जो दुनिया भर के संदर्भ में बेहद अजूबे किस्म का है, हिंदी साहित्य में किसी चरवाहे का पैना बन चुका है जिसे वह अपने पशुओं को हाँकने के काम में लाता है। बहुतों के लिए यथार्थवाद साधन न होकर साध्य में बदल चुका है। 
भाषा और यथार्थ का रिश्ता बेहद संश्लिष्ट है। एक कथाकार के रूप में मेरी मुश्किल यह है कि मैं यथार्थवादी रचनाएँ पढ़ते हुए साहित्य में बड़ा हुआ हूँ। दूसरी तरफ बचपन में सुनी हुई कहानियाँ है, या वे लोककथाएँ या आधुनिकता (जिसने हम भारतीयों की चेतना को विकृत बनाने का काम ही ज्यादा किया है) के पहले का साहित्य पढ़ता हूँ तो वहाँ यथार्थवाद या इससे मिलती-जुलती कोई चीज कभी-कभार ही दिखाई पड़ती है। तो जो आज की यथार्थवादी रचनाएँ हैं उनका एक बड़ा हिस्सा (अपनी सारी क्रांतिकारिता के बावजूद) यथास्थितिवाद में ही जाकर गर्क हो जाता है। क्योंकि वह कल्पना के साथ कोई रचनात्मक रिश्ता कायम नहीं कर पाता।
यहाँ से शुरू करूँ तो मुझे लगता है कि आधुनिकता ने भाषा और यथार्थ के संबंध को गड़बड़ा दिया है। अभी का यथार्थ इतना फंतासी भरा और बहुरूपी है कि उसको व्यक्त करने का एक आसान रास्ता तो वही है, जो आज की इलेक्ट्रानिक मीडिया कर रही है, जहाँ सब कुछ एक उत्तेजक ‘स्टोरी’ है पर इसी के साथ बेहद क्षणिक भी है। दूसरा रास्ता संघर्ष भरा है। इसमें यथार्थ का पीछा करना पड़ता है चुपचाप, देर और दूर तक, उसकी मायावी ऐयारियों के जाल को तोड़ना पड़ता है। इस बीच भाषा की खोज भी चुपचाप चलती रहती है। क्योंकि भाषा एक आईने की तरह बर्ताव करती है जिसमें उस बहुरूपी यथार्थ की परछाईं पड़ती रहती है और उसे बदलती रहती है। दूसरे शब्दों में कहें तो यथार्थ की खोज और भाषा की खोज दोनों अलग अलग न होकर एक ही हैं मेरे लिए।
मैं यथार्थवाद से भागता हूँ पर आधुनिकताजनित तमाम दूसरी विकृतियों की तरह वह मेरे भीतर इस हद तक धँसा हुआ है कि कई बार थोड़ा बहुत कामयाब हो पाता हूँ तो ज्यादातर बार फिर-फिर से बिछलकर उसी में गिर पड़ता हूँ। यह भाषा से मेरी निजी लड़ाई है। 
समय बहुत भयानक है। पर यह सभी परिवर्तनकारी शक्तियों के इम्तहान का भी समय है। यह उन्हें भी कुछ रचने के लिए प्रेरित करने वाला समय है जो अपनी कलम किसी संग्रहालय को दान कर चुके हैं और उन्हें भी जिन्होंने अभी तक कलम पकड़ने की तमीज भी नहीं सीखी। क्योंकि इतना जानने समझने के लिए न बहुत कलाकारी की जरूरत है न बौद्धिकता की, कि यह समय उनके पक्ष में खड़े होने का है जो विकास के प्रोजेक्ट के शिकार हैं, जो सांप्रदायिकता के प्रोजेक्ट के शिकार हैं, जो राज्यसत्ता की अबाधित हृदयहीन निरंकुशता के शिकार हैं। जाहिर है कि ऐसा कहते हुए मेरे मन में कलाकार बौद्धिकों के प्रति कोई असम्मान का भाव नहीं हैं न ही मैं उन्हें खाया अघाया बुद्धिजीवी कहने का दुस्साहस कर सकता हूँ पर यह समय जरूर उन्हें जाँचने वाला है।
किताबों को प्रतिबंधित करने के लिए तोड़फोड़ शुरू हो गई है। वे किसी एक किताब के बहाने पूरा का पूरा पुस्तकालय जला देंगे। जल्दी ही यह तोड़फोड़ आपके साथ भी शुरू हो सकती है। आपके हाथ पैर तोड़े जा सकते हैं। आपके घर के सामने प्रदर्शन किया जा सकता है जैसा अभी अनंतमूर्ति के घर के सामने किया गया। आपको देशनिकाला मिल सकता है। न्गुगी वा थ्योंगो की तरह आपको जेल भेजा जा सकता है। पाश, मानबहादुर सिंह, लोर्का या केन सारो वीवा की तरह आपकी हत्या हो सकती है। आपको अपने लिखे के एक एक शब्द की कीमत चुकानी पड़ सकती है। सवाल यह है कि क्या हम इसके लिए तैयार हैं? 
सवाल यह भी है कि अभी बातचीत में जो भी चीजें आई हैं उनका सामना किस तरह से किया जाय। एक लेखक या कलाकार के रूप में जो कि अपनी जनता का सांस्कृतिक प्रतिनिधि दावा होने करता है। ऐसे समय में हिंदी के एक अदने से लेखक के रूप में मैं किसका प्रतिनिधि हूँ? जिस भाषा में मैं लिखता हूँ उस पर भी तमाम आरोप हैं। कोई उसे अपनी सहभाषाओं की हत्यारी कहता है तो कोई उसका एक सवर्ण और पितृसत्तात्मक चरित्र होने की बात करता है। हम जिस समाज में रहते आए हैं उसका असर तो हमारी भाषा पर होगा ही… और कोई भी बन रहा समाज ऐसी चीजों से भिड़ता भी है पर यह सब सवाल परम माता अंग्रेजी की बात करते हुए नहीं उठाए जाते। अंग्रेजी अपनी आतंककारी उपस्थिति मात्र से करोड़ों के सपनों को दुःस्वप्न में बदल देती है फिर भी वह माडर्न है, उदार है समन्वयकारी है लोकमंगलकारी है और हिंदी जो कभी भी सत्ता की भाषा नहीं रही वह दक्षिणपंथी बता दी जाती है और यह देखकर भयानक आश्चर्य होता है कि इस खेल में कई ऐसे हिंदी लेखक भी शामिल हैं जो अंतरराष्ट्रीय होने के लिए मरे जा रहे हैं और इसी अनुपात में स्थानीय हो पाना उनके लिए असंभव होता गया है। 
आधुनिकता ने हमें बहुत सी अच्छी चीजें दी होंगी पर उसने हमें बहुत सारा कचरा भी दिया। अपने को हीन स्वीकार करना भी सिखाया। बिना किसी मूल्यांकन के आधुनिकता से इतर हर बात को कमी के रूप में भी स्वीकार करना सिखाया। शर्म करना सिखाया। हमारी भाषाएँ छीनी। नकल सिखाई। हमारी परंपरा और चिंतन में जो बहुत कुछ हमारी ताकत हो सकता था। आधुनिकता से भिन्न होने की वजह से वह हमारे लिए शर्म बना। तो एक लेखक के रूप में लड़ने के लिए बहुत सारी बातें हैं। यह अलग अलग भी हैं और सामूहिक भी। 
मेरी मुश्किल यह है कि एक ऐसा समाज मिला है मुझे जिसमें अभी भी अनपढ़ों की बड़ी तादाद है। यह भी विडंबना ही है कि यह बात अभिधा लक्षणा व्यंजना तीनों में कही जा सकती है। इस समाज में बहुत ही थोड़े से लोग हैं जो आपको पढ़ते हैं और वैसे तो न के बराबर लोग हैं जो आपके लिखे को लेकर आपसे लड़ते हैं, शिकायत करते हैं, आपसे संवाद करते हैं। दो तीन साल पहले मैं एक अखबार के लिए साप्ताहिक कालम लिखा करता था। एक हफ्ते मैंने रामदेव पर अपनी बात को केंद्रित किया। हर हफ्ते जहाँ मुश्किल से पंद्रह बीस फोन आते थे उस हफ्ते पचासों फोन आए जिनमें ज्यादातर में माँ-बहन की गालियाँ बकी गईं। मैं यहाँ उस तरह की लड़ाइयों की बात नहीं कर रहा हूँ। हालाँकि वैसी गालियाँ भी किसी लेखक के लिए पुरस्कार की तरह हैं। वे आपकी सफलता या असफलता का भी सही आकलन करती हैं। 
तो इतने कम पाठकों के साथ आपका संवाद धीरे धीरे आपको अपने पाठकों से निरपेक्ष बनाता जाता है। एक लेखक के लिए यह गायब हो जाने वाली बात है। अदृश्य हो जाने वाली बात है। मैं भी अदृश्य हो जाना चाहता हूँ पर किसी और तरीके से। मेरी सबसे बड़ी लेखकीय महत्वाकांक्षा इस समय की लोककथाएँ लिखना है। जिसकी पहुँच उन तक भी संभव हो जिन तक अक्षरज्ञान ही नहीं पहुँचा है अभी तक। मैं चाहता हूँ कि मेरी कहानियाँ उनकी इतनी अपनी हों की मैं गायब हो जाऊँ और वे उसमें अपनी मनचाही तोड़फोड़ कर सकें। इस तरह कि उनका मनोरंजन भी हो… रात कटे, दुख कटे, कुछ इस तरह भी कि वह अपना सुख दुख भी जोड़ सकें उसमें अपना। कि उन्हें जीने और लड़ने की ताकत मिले। यह एक असंभव सा लगने वाला सपना है पर मैं रोज देखता हूँ इसे। 
संगमन २० (मंडी) 
मनोज कुमार पांडेय
जन्म : 7 अक्टूबर, 1977, सिसवाँ, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रमुखता से प्रकाशित। कहानियों की दो किताबें शहतूत तथा पानी भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन से प्रकाशित।
सम्मान : प्रबोध मजुमदार स्मृति सम्मान, विजय वर्मा स्मृति सम्मान, मीरा स्मृति पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद का युवा पुरस्कार 
फोन : 08275409685
ई-मेल : chanduksaath@gmail.com

मॉरिशस में कवि सम्मेलन

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मैत्रेयी पुष्पा की कहानियों में व्यक्त नारी समस्याएँ-प्रो. डॉ. हेमल बहन एम. व्यास

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मैत्रेयी पुष्पा की कहानियों में व्यक्त नारी समस्याएँ

  • प्रो. डॉ. हेमल बहन एम. व्यास

एक नहीं दो दो मात्राएं नर से बढ़कर नारी है ।

इस उक्ति के आधार पर नारी संस्कार,मर्यादा,पवित्रता,संवेदना ओढ़े हुए है। इसीलिए नारी को नर से बढ़कर कहाँ है । सीता-राम,राधे-श्याम,उमा-महेश्वर,लक्ष्मी-नारायण में भले ही दैवीय शक्ति को आगे रक्खा गया किन्तु वहीं भारतीय मानसिकता आधि आबादी का हिस्सा स्त्री को अपना अधिकार देने के लिए तत्पर नहीं है । पुरुष प्रधान समाज की इस मानसिकता को स्त्री ने हर क्षेत्र में चुनौती के रूप में रक्खा है । साहित्य भी इससे अछूता नहीं है । स्त्री मुक्त हो गई,थोड़ी बहुत स्वतंत्र भी हो गई अब स्त्री सभी दृष्टि से सशक्त हो रहीं है । इस दिशा में हिन्दी साहित्य की लेखिकाओं ने स्त्री विमर्श की नई बहस छेड़ दी है ।

पुरुषों द्वारा दिये प्रतीकों-पूजा, केवल श्रद्धा हो,नरक का कुंड,नहीं….अब वह अपनी पहचान,अपनी इच्छा, अपनी शोध बताने का कार्य कर रहीं है । ऐसी अनगिनत स्त्री लेखिकाओं ने नारी जीवन का चितार अपने साहित्य में किया है ।

बीसवीं सदी के अंतिम दशक से कहानियों के विषय में काफी परिवर्तन आया है । कहानी लेखन में भूमंडलीय करण,बाज़ार वाद,आधुनिकीकरण एवं पाश्चात्य प्रभाव जैसे विषय पर खुलकर सत्य लिखा गया । साथ ही स्त्री विमर्श,स्त्री संदर्भ अत्यंत विस्तृत विषय बन गये हैं । खास करके लेखिकाओं के साहित्य लेखन में स्त्री विमर्श पर काफी लिखा गया। ऐसी कहानियाँ लिखने वाली प्रमुख लेखिकाएँ है –शिवानी ,मन्नू भंडारी,क्रुष्ना सोबती ,प्रभा खैतान,मैत्रैय पुष्पा,नासीरा शर्मा,मृनाल पांडे,सुर्यबाला ममता कालिया ,मृदुला गर्ग,राजी शेठ,दीप्ति खंडेलवाल,मालती जोशी,मंजुल भगत,सुधा अरोडा,दिव्या माथुर,क्रुष्ना अग्निहोत्री,मधु काकरिया,आदि लेखिकाओं ने अपने अपने अंदाज में नारी की समस्याओं को,नारी के विविध स्वरूप को तथा नारी जीवन से संबंधित विविध पहलुओं को केन्द्र में रखकर ही कहानियों का लेखन किया है ।

मैत्रेयी पुष्पा की कहानियाँ 21वीं शताब्दी की दहलीज पर स्त्री शक्ति की दस्तक है । मैत्रेयी पुष्पा ने अत्यंत सफलता के साथ स्त्री विमर्श पर अपनी कलम चलाई है । मैत्रेयी पुष्पा अपनी कहानियों में स्त्री वादी दृष्टि रखती है । उन्होंने भोगे गये सत्य को ,जीवन की वास्तविकता के चितार को प्रस्तुत किया है । वह स्त्री की पीड़ा को,उनके संघर्ष को,समाज के सामने रखना चाहती है । मैत्रेयी पुष्पा ने पुरुषवादी परिवेश से स्त्री के लिए सशक्तिकरण की,स्त्री मुक्ति की मांग रखी है । उनकी कहानियों में स्त्रियों की समस्याओं को उनके जीवन के संघर्ष तथा उनेक प्रश्नों को बड़ी संवेदन शीलता के साथ रखा गया है । उनके स्त्री पात्र पुरुषों को चुनौती देती दिखाई देती है । मैत्रेयी पुष्पा पुरुषवादी मानसिकता की विरोधी है वे कहती है- —’’मैं स्त्री विमर्श की कट्टर हिमायती हूँ । उस पुरुष व्यवस्था से चीड़ है,मुझे जो स्त्री के चारों तरफ बंधन डालता है —।’’ (1) (मुद्दे की बात–पुष्पा, मैत्रेय 52)

माता पिता का घर छोड़कर स्त्री पराई बन जाती है,पराये को अपना बनाकर भी वहाँ वह अपनी नहीं बन पाती । अपनेपन की तलाश में वह भटकती रहती है । एक स्त्री विवाह के बाद अपना नाम कुल पहचान सब खो बैठती है । ऐसे समय पर शादी के अपनी पहचान खो बैठने वाली मैत्रैय पुष्पा ने साहित्य लेखन में अपने नाम की तलाश में अपने अतीत में झांक कर देखा,पिता को प्रिय मैत्रेयी तथा माता को प्रिय पुष्पा यानि मैत्रेयी पुष्पा नाम धारण करके माता पिता के स्वप्न को साकार किया । यही मैत्रेयी पुष्पा साहित्य जगत में स्त्री शक्ति की मिसाल बन गई। जो स्त्री विमर्श की कट्टर हिमायती है ।

लंबे संघर्ष एवं जीवन में कई उतार चढ़ाव के पश्चात उम्र के 40 वे पड़ाव के बाद लेखन प्रारंभ करने के बावजूद भी 10 साल में मैत्रेयी पुष्पा हिन्दी साहित्य की विशेष पहचान बन गई ।

इदन्नमम,चाक,झूला नट,आल्मा कबूतरी,जैसे सफल उपन्यास लिखने वाली मैत्रेयी पुष्पा ने कहानी लेखन में भी कलम चला कर अपनी विशेष पहचान बनाई है । उनके प्रमुख कहानी संग्रह है-

चिह्नार (1991)-12 कहानियाँ

ललमनियाँ (1996) -10 कहानियाँ

गोमा हंसती है (1998) -10 कहानियाँ

दस प्रतिनिधि कहानियाँ –(2006) छुटकारा नयी कहानी

इन कहानी संग्रहों में कुल 33 कहानियाँ हैं । जिनमें मैत्रेयी पुष्पा ने नारी जीवन की विभिन्न समस्याओं को चित्रित किया है । यदि हम उन समस्याओं पर चिंतन करें तो मैत्रेयी पुष्पा की प्रतिनिधि कहानियाँ में हमें निम्न समस्याएँ दृष्टि गोचर होती हैं । जैसे कि दहेज, बेमेल विवाह,स्त्री भ्रूण हत्या,बाँझपन एक अभिशाप,त्यक्ता नारी,विधवा नारी, बलात्कार-जातीय शोषण ,वेश्या वृत्ति-देह विक्रय जैसी समस्याओं को वर्णित किया है । साथ ही उन समस्याओं का प्रतिकार करती नारियों की शक्ति से भी अवगत करवाया है । मैत्रेयी पुष्पा की कहानियों में चित्रित नारी जीवन की विभिन्न समस्याओं को निम्न रूप से रक्खा जा सकता हैं-

दहेज की समस्या

दहेज भारतीय समाज का सबसे बड़ा कलंक है । जिसने पुरातन समय से लेकर आधुनिक समय तक अपनी झाल फैलाई है । भयानक राक्षस की तरह बढ़ती चली जाती है ।

मैत्रेयी पुष्पा की ”साँप-सीढ़ी” कहानी में सुरजन सिंह ने अपनी बेटी रज्जो को इसीलिए अच्छा पढ़ाया ताकि उसके विवाह में कोई तकलीफ न हो,अच्छा वर को तराशा किया किन्तु विवाह तय करते समय ही बेटी का ससुर अपना वास्तविक स्वरूप दिखाते हुए डेढ़ लाख की माँग करता है ।

”ताला खुला है पापा” कहानी की बिन्दो बड़ी बहन के विवाह में हुए दहेज के कर्ज को देखकर माँ से कहती है ।

”अम्मा तुम मेरे ब्याह की फिकर बिल्कुल न करना।जो रुपे खर्च कराएगा,मैं उससे ब्याह नहीं करूंगी।” (2) (पुष्पा, गोमा हस्ती है-’ताला खुला है पापा’ 75)मैत्रेयी पुष्पा” केवल समस्या उठाना नहीं जानती किन्तु उनका योग्य समाधान भी प्रस्तुत करना जानती है। दहेज जैसी जटिल समस्या का हल उन्होंने ”सफर के बीच” कहानी के द्वारा देना चाहा है । इस कहानी का गिरराज जिलाधिकारी बनता है साथ ही दहेज का विरोध करते हुए गरीब की बेटी से ब्याह करता है ।

बेमेल विवाह

21वीं शताब्दी के युग में विवाह अपनी इच्छा,चाहना ओर पसंदगी का विषय है ,ऐसे समय समय में बेमेल विवाह शब्द भी अचरज पैदा करता है लेकिन ऐसा नहीं है । आज भी कई ऐसी लड़कियां है जिन्हें गरीबी,दहेज या किसी न किसी कारण बेमेल विवाह का शिकार होना पड़ता है । अपनी इच्छाओं को मार कर कड़वे घुट पीना पड़ता है ।

” बहेलिये ” कहानी में गिरजा के पिता की मृत्यु हो जाने के कारण उनके चाचा उनका विवाह पिता के उम्र के पुरुष से तथा उनकी बहन का विवाह एक मरीज से करवा देता है । माँ के विरोध करने पर उनके चाचा कहते है,-”करम की खोटी थी तो भोगना पड़ रहा है । तू अकेली रांड विधवा कैसे ब्याह शादी करेगी ? मरद की उमर नहीं देखी जाती (3) (पुष्पा, चिहनार -बहेलिये 37) गिरजा के जीवन में कोई अरमान नहीं रहते , पति की मृत्यु हो जाने के बाद वह दूसरे विवाह के बारे में नहीं सोचती ,बल्कि वह समाज सुधारक बन जाती है ।

”रास” कहानी की जैमन्ती का विवाह मन सुखा नामक एक ऐसे पुरुष के साथ होता है जो आधा पुरुष और आधी स्त्री है । इस बेमेल विवाह के कारण किस हद तक जैमन्ती पर सामाजिक अत्याचार हुआ है,इसका वर्णन रास कहानी में मैत्रेयी पुष्पा ने बड़ी कुशलता के साथ किया है ।

स्त्री भ्रूण हत्या

21वीं सदी का प्रभाव मैत्रेयी पुष्पा के साहित्य में बखूबी रूप से दिखाई देता है । आज के युग में हम भले ही अपने को आधुनिक मानते हो किन्तु हमारी सोच आज भी सदियों से भी पुरानी है । पहले के युग में लड़की का जन्म होते ही उस को दूध भरे पात्र में डूबो कर मार दिया जाता था,आज के युग में तो लड़कियों को जन्म लेने का भी हमने अधिकार नहीं दिया । उसका गर्भ परीक्षण करके तुरंत ही उसे गर्भ में ही मार दिया जाता है उसे हम स्त्री का शरीर भी धारण करने नहीं देते । दुःख की बात तो यह है कि कभी कभी इसकी जिम्मेदार खुद स्त्री ही होती है।

मैत्रेयी पुष्पा ने ’तुम किसकी हो बिन्नी’ कहानी में सोनोग्राफी करके,बच्ची को जन्म से पहले ही मारने की बात कहीं है। ’’कै बेर तो इसकी माँ ने गरभ गिराये हैं,दूरबीन से दिखवाय लिये। छोरी निकली तो गिरवाय दई । कसाईन री है निरी……..’’(4) (पुष्पा, ललमनियाँ ,तुम किसकी हो बिन्नी 120) डॉं.अग्रवाल खुद गर्भपात के लिए उस जगह का नाम लिख देते है । इस प्रकार मैत्रेयी पुष्पा ने स्त्री भ्रूण हत्या की समस्या उठाई है ।

बाँझपन स्त्री जीवन का अभिशाप

संतान हीनता विवाहिता नारी के जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप माना जाता है । नारी जीवन की अनेक समस्याओं में से एक है,जिसे एक नारी ही दूसरी नारी को इस समस्या के लिए जिम्मेदार मानकर दुःखी और परेशान करती है ।’’मन ना ही दस बीस ’’कहानी में चंदना का पति नपुंसक है,फिर भी उसकी साँस उनकी बहू पर ही दोष लगाती है । देवर से रिश्ता रखने को कहती है,जली कटी सुनाती है ,वह कहती है,’’कच्चे गोद पेट काट डाले होंगे,फिर कहाँ से जनेगी पूत।हमारे करम खोटे थे जो ब्याह लाये छिंनाल को’’(5) (पुष्पा, चिहनार,मन नाहिं दस बीस 64)

त्यक्ता नारी

नारी को हर रूप में पुरुष पर आश्रित रक्खा गया है । पिता,भाई,पति या पुत्र शायद यहीं पर नारी सुरक्षित रह सकती है । पिता विश्वास के साथ बेटी को पति के हाथ में सौपता है लेकिन यदि वही पति जब स्त्री को त्याग दे तब उनकी क्या गति । पति द्वारा पत्नी को त्याग देना नारी का सबसे बड़ा अपमान है । मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी कहानियों में पराधीन नारी की विवशता का बड़ा दर्दनाक चित्र प्रस्तुत किया है ।

’ राय प्रवीण ’कहानी की सावित्री के पति को सावित्री पर हुए शारीरिक अत्याचार का पता चलने पर सहानुभूति देने बजाय उसे गाली देते हुए घर से निकाल देता है…..’’ क्यों आ गई…….आगे पाँव मत रखना रंडी ’’(6) (पुष्पा, गोमा हँस्ती हैं….राय प्रवीण 46)

शारीरिक रूप से शोषित सावित्री पति द्वारा तो परित्यक्ता होती है किन्तु अब सावित्री को उनके पिता भी अपने घर पर रखने के लिए तैयार नहीं होते । मैत्रेयी पुष्पा ने राय प्रवीण कहानी के द्वारा समाज में प्रताड़ित ऐसी नारी की समस्या का वर्णन किया है जो शारीरिक,मानसिक और सामाजिक दृष्टि से शोषित है ।

’’बिछड़े हुए’’कहानी एक ऐसे पलायन वादी पुरुष की कहानी है जो अपनी जिम्मेदारी से भाग जाता है । पति सुग्रीव के त्याग कर साधु बन कर चले जाने के बाद चँदा बेटी को पालने की जिम्मेदारी अकेली ही उठा लेती है।

विधवा नारी

नारी का यह रूप करुणा ,दर्द और अंधकार पूर्ण जीवन का समन्वय मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी कहानियों में नारी के विधवा रूप को और उनके जीवन की कठिनता का अत्यंत ही दर्द पूर्ण वर्णन किया है ।

’’उज्रदारी’’कहानी की विधवा शांति को उनके पति के गुजर जाने के बाद उन्हीं के परिवार वाले उसे जायदाद से बेदखल करते है । ऐसे कठिन समय पर बड़े धैर्य और साहस के साथ शांति अपने हक के लिए लड़ती है ।

’’केतकी’’कहानी में पंडित श्री गोपाल का गाँव की एक बाल विधवा से अनैतिक संबंध रखने का चित्रण हुआ है,साथ ही रेशमिया जैसी पवित्र विधवा नारी पर बलात्कार करने के बाद पंच उसे व्याभिचार बताते है । तब घर की इज्जत बचाने के लिए देवर गिरधर सिंह उनका हाथ पकड़ता है । यह उनकी मजबूरी थी —’’क्या करता विधवा भाभी की कोख में न जाने किसका अंश था,लेकिन पिता का नाम उस शिशु को उसके सिवा देता भी कौन(7) (पुष्पा, चिह्नार …केतकी.. 130)

मैत्रेयी पुष्पा की ’चिहनार’कहानी की सरजु एक विधवा स्त्री है ,उसके साथ उनके परिवार वाले अमानवीय अत्याचार करते है । उसे अपनी बेटी से भी मिलने नहीं देते ।सरजु को घर के पीछे एक कोठे में रक्खा जाता है । समाज में आये दिन शांति,रेशमिया,सरजु जैसी विधवा नारी पर अनेक प्रकार के शारीरिक , मानसिक अत्याचार होते ही रहते है । मैत्रेयी पुष्पा ने नारी के वैधव्य जीवन की समस्याओं का वास्तविक चितार प्रस्तुत किया है ।

बलात्कार-जातीय शोषण

दुनिया बहुत बड़ी है किन्तु सुरक्षा कहीं नहीं ,घर छोटा है किन्तु सुरक्षा सबसे बड़ी है । किन्तु घर परिवार के या आस पास के लोग ही जंगली बन जाए तो सुरक्षा कहीं पर नहीं है । यदि नारी घर में सुरक्षित नहीं है तो वह कहीं पर भी सुरक्षित नहीं है । पुरुष ने नारी को सदा भोग की वस्तु माना है , कोई भी स्त्री क्यों न हों उसे कहीं न कहीं कभी न कभी ,किसी न किसी पुरुष से शारीरिक या मानसिक रूप से जातीय शोषण का शिकार होना पड़ा होगा । संबंधों के नाम पर वह सबसे पहले कौटुंबिक जातीय शोषण का शिकार होती है । जहाँ उसे सदैव चुप रहने के लिए धमकाया जाता मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आत्मकथा गुड़ियां भीतर गुड़ियां में अपने भोगे हुए सत्य का वर्णन किया है । उन्होंने ने अपनी कहानियों में भी नारी पर होते बलात्कार एवं जातीय शोषण का खुलकर वर्णन किया है।

’’बहेलियें’’ कहानी की भोली पर बलात्कार होने के बाद उसे धमकाया जाता है,किसी को भी इस के बारे में न बताने को कहा जाता है। जब भोली के पेट में बच्चा रह जाता है तब उनकी माँ उसी को जली कटी सुनाती है । भोली उन पर हुए दुगुने अत्याचार न सह पाने के कारण वह जलकर मर जाती है । पुलिस घुस लेकर उसे साधारण आत्महत्या का केस बना लेता है ।

’’रास ’’कहानी की जैमन्ती का ब्याह एक ऐसे पुरुष से हुआ जो पूर्ण पुरुष भी नहीं है । परिवार के अन्य पुरुष उसे सदैव बुरी नज़र से देखा करते है। आखिर उनके ससुर द्वारा बलात्कार का प्रयास होने के कारण जैमन्ती मानो नागिन बन जाती है –’’ जैमन्ती की आंखों में भग भग लपटें उठने लगी । सास कांपने लगी ,सास का बेटा आंखें मींडता हुआ कभी बाप को देखे तो कभी उसे। (8) (पुष्या 127) उनका जीवन बरबाद हो जाता है।

’’अब फूल नहीं खिलते ’’ कहानी में शिक्षा के क्षेत्र में नारी का किस प्रकार से शोषण होता है उसे बताया गया है ।’’राय प्रवीण’’ कहानी की सावित्री गाँव में बाढ़ के विनाश के बाद ,अन्न प्राप्ति के लिए सहायता के बजाय सरकारी अधिकारी तथा ठेकेदारों से हवस का शिकार होती है।

’’केतकी’’कहानी का गंधवॅसिंह केतकी से अनैतिक संबंध बनाने की कोशिश करता है।विरोध देखकर अवसर पाकर एक दिन उस पर बलात्कार करता है।केतकी इस यौन शोषण के खिलाफ विद्रोह करती है तथा पुलिस में शिकायत करके गंधवॅसिंह को समाज के सामने लाती है।

प्रतिकार करती नारी

वर्तमान युग की नारी में विद्रोह करने की क्षमता बढ़ी है। अत्याचार करने वाले से अत्याचार सहने वाला ज्यादा गुनहगार होता मैत्रेयी पुष्पा ने एक जिम्मेदार लेखिका की भूमिका अदा की है । उन्होंने ने नारी की विविध समस्याओं का चित्रण किया हैं, साथ ही नारी में रहीं शक्ति का भी परिचय करवाया । मैत्रेयी पुष्पा की कई ऐसी कहानियाँ है जिसकी नायिका अत्याचार सहते-सहते बदला लेने के लिए विद्रोह करती है । वह केवल अत्याचार सहन करना ही नहीं जानती किंतु समय आने पर प्रतिकार भी करती है ,फिर अत्याचार करने वाला पुरुष उसका पति ही क्यों न हो ।-जैसे

’’राय प्रवीण ’’की सावित्री एक साहसी नारी है।उसका पति जब उसे घर से बाहर निकाल देता है,लात-घूसो से पीटता है,तब उनके मन में दबा क्रोध फूट पड़ता है।उस समय का वर्णन करते हुए लेखिका लिखती है- ’’पति ने हाथ लगाया कि चोट दर्द भूलकर दो लाते मारी मर्दानी कमर पर…..तीन चार धक्के दीये लगातार और घर में जा घुसी।’’(9) (पुष्पा, गीमो हँस्ती है-राय प्रवण- 46)

उज्रदारी कहानी की विधवा शांति अपने अधिकार के लिए घर से बाहर निकल जाती है। वह कहती है-’’मेरी जैसी अनाथ औरत क्या किसी भी औरत को जेठ-ससुर के सामने बोलने का हक नहीं,आदमियों की बिरादरी ऊँची है । ’’(10) (पुष्पा, गोमा हँस्ती है-’उज्रदारी’ 100) वहीं शांति जो जेठ-ससुर के सामने बोलने में असमर्थ थी पति की मृत्यु के बाद ज़मीन,घर,परिवार से निष्कासित करने के कारण उनके खिलाफ उज्रदारी करती है।तब वह सोचती है-’’आज मुझे डर नहीं । जेठ का लिहाज नहीं ताज्जुब है । आज क्या हो गया है ऐसा ? शर्मीली बहू कहा गई ? पति के रहते उँगली न दिखा ने वाली अंगूठा दिखाने की सोच रही है ?’’(11) (पुष्पा, गोमा हँस्ती है-’उज्रदारी’ 102)

नारी सदा ही अपने शील और सौन्दर्य से गर्वित रहती है, लेकिन जब उसके चरित्र पर कोई दाग लगाने की कोशिश करता है तब वह महाकाली का स्वरूप धारण कर लेती है ।’केतकी’ की केतकी भी कुछ ऐसा ही करती है । वह गंधर्वसिंह द्वारा किये गये अत्याचार का प्रतिकार करती है । माधुपुर गाँव में आज से पहले कभी पुलिस नहीं आयी, किंतु केतकी ने गंधर्वसिंह को पकड़ ने के लिए पुलिस बुलाई है। वह निर्भीक होकर कहती है।—’’तुम्हारे खिलाफ बोलने का साहस तो सब बेच चूके हैं……….मैं लाई हूँ पुलिस,क्योंकि मुझे तुम्हारा भय नहीं हैं ।’’(12) (म. पुष्पा, चिह्नार-’केतकी’ 132)

’फैसल’ कहानी की वसुमती सरपंच तो बन गई किंतु उसका पति उसे कोई फैसला नहीं लेने देता। अतः वसुमति ने विरोध के रूप में अपने पति को ही वोट नहीं दिया । नारी अपने अधिकार के लिए लड़ना सीख गई है।अब वह हद से ज्यादा अन्याय नहीं सहती बल्कि उनका प्रतिकार कर लेती है । जब अन्याय हद से ज्यादा बढ़ाता है,असहनीय हो जाता है तब वह रणचंडी का रूप लेकर विनाश का कार्य करने के लिए तैयार हो जाती है।जैसे कि’मन नाहीं दस बीस’ कहानी की चन्दा का पति नपुंसक है । उनकी सास संतान पाने के लिए उसे उनके देवर से संबंध बनाने के लिए दबाव डालती है । जब चन्दा के मना करने पर उन पर अत्याचार बढ़ जाता है तब चन्दा उनको मारने के लिए मंगवाए गये धतूरे को भोजन में डाला जिससे उनका देवर तो मर गया,किंतु उसी भोजन को गलती से उनका पति भी खा लेता है और वह भी मर जाता है । इस प्रकार देखा जा सकता है कि मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी कहानियों में नारी जीवन की विभिन्न समस्याओं को चित्रित किया है । इतना ही नहीं इन प्रमुख नारी समस्याओं के अलावा नारी जीवन की अन्य समस्याओं को भी किसी न किसी कहानी में दिखाया गया है । जैसे-

’भँवर’कहानी में -बहु पत्नी प्रथा तथा-मार पीट करना ,’ताला खुला है पापा’ कहानी में-लड़का लड़की भेद,’शतरंज के खिलाड़ी’कहानी में-नारी को केवल राजनैतिक मोहरा समझना,’छुटकारा’ कहानी में – अस्पृश्य नारी के साथ का व्यवहार,’आक्षेप कहानी में – स्त्री पुरुष संबंध,’अपना अपना आकाश’कहानी में -वृद्ध नारी की समस्या,’सहचर’ कहानी में -अपाहिज नारी की पारिवारिक स्थिति ,’मन नाहीं दर बीस’ कहानी में -परिवार में नारी शोषण,’’राय प्रवीण’’कहानी में – कहानी में वेश्यावृत्ति-देह विक्रय की समस्या । इत्यादि ….

इस प्रकार कहा जा सकता है कि मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी कहानियों में नारी जीवन की विभिन्न विषम समस्याओं को विस्तृत रूप से वर्णित किया है । मैत्रेयी पुष्पा ने नारी जीवन के विविध संघर्षों का चितार करते हुए नारी शोषण के हर पहलुओं को उजागर किया है । नववें शतक में कहानी के विकास में मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी अलग ही पहचान बनाई है । उन्होंने बूंद से ही समुद्र का आस्वाद करवाया है। भारतीय नारी की दिशा-दशा बताते हुए उसकी अस्मिता का ,उसके अस्तित्व का चित्रण किया है । पुष्पा जी ने नारी को उनके अधिकार के जागृत किया है यहीं उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है ।

अस्तु धन्यवाद

प्रो. डॉ. हेमल बहन एम. व्यास

अध्यक्षा हिन्दी विभाग,

एम.पी.शाह ऑट्स एन्ड सायन्स कोलेज,

एस.टी.रोड़ ,सुरेन्द्रनगर. (गुजरात) भारत -363001

hemalmvyas@gmail.com M: 09428192298

संदभॅ ग्रंथ-

1) मैत्रेयी पुष्पा. गोमा हँस्ती है-. दिल्ही , किताबघर , 1998. ISBN-81-7016-398-6.

2) मैत्रेयी पुष्पा.-चिहनार-दिल्ली, आर्य प्रकाशन मंडल, 1991. ISBN-81-88118-68-0.

3) मैत्रेयी पुष्पा. ललमनियाँ – दिल्ली , किताब घर, 1996. ISBN-81-706-312-9.

4) “मुद्दे की बात–पुष्पा, मैत्रेयी.” हंस (अक्तुबर -2004):

सहायक ग्रंथः-

1) साहित्य प्रवाह और स्त्री विमर्ष-डॉ.रुचा शर्मा -अन्नपुर्णा प्रकाशन -कानपुर

2) नारी विमर्ष की नई दिशाएँ-डॉ.रेनुका मोरे, – अल्का प्रकाशन, कानपुर

3) समकालीन हिन्दी कहानी और 21वीं सदी की चुनौतियाँ-सं डॉ.इन्दुमती सिंह-आशीष . . . प्रकाशन,कानपुर

4) हिन्दी कहानी और नारी –विमर्ष के अहम सवाल-डॉ.शोभा पवार- अन्नपूर्णा प्रकाशन,कानपुर

5) प्रतिनिधि महिला कहानीकारों मैं चित्रित नारी-डॉ.मीना जोशी-शैलजा प्रकाशन , कानपुर

अध्यक्षा हिन्दी विभाग,

एम.पी.शाह ऑट्स एन्ड सायन्स कोलेज,

एस.टी.रोड़ ,सुरेन्द्रनगर. (गुजरात) भारत -363001

hemalmvyas@gmail.com M: 09428192298

मैं सब कुछ जीना चाहती हूं!!!

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मैं मरघट का बूढ़ा बरगद:चन्दन

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मैं मरघट का बूढ़ा बरगद,
देख रहा हूँ……
देख रहा हूँ जाने कब से याद नहीं है…..
लेकिन खुशियाँ देख सका हूँ यदा-कदा ही…..

मैनें देखा
दूनिया भर की खुशियाँ भोगे….
चार पीढ़ियाँ आगे देखे, चार पीढ़ियाँ पीछे देखे….
कई-कई सालों से हर इंद्रिय को भोगे….
जीवन से उकताये लोगों का आना….

मैनें देखा…..
जो कितने सीधे-सादे थे,जो कितने भोले-भाले थे….
जीवन भर सीमित खुशियाँ चाहीं, जितनी चाहीं उतनी पाईं….
कभी किसी से की ना लड़ाई, समरसता सब ओर फैलाईं….
ऐसे भी लोगों का आना….

मैनें देखा…..
दूनिया भर का बोझ उठाए….
अम्मा-बाबू, दो-दो बिटिया, प्राण-प्रिया के सबसे प्यारे शख्स यानी कि
दोनों छोटी प्यारि परियों के पापा का असमय आना….
ऐसे भी लोगों का आना….

मैंने देखा….
प्यार की भूखी प्रिया को प्रियतम के प्रवंचना से दुधमुँहे को भूल जहर खाना….
मन्नतों के बाद पाये लाडले को छोटी-सी बात पर फंदे में लटक जाना…..


मैंने देखा

सबको जीवन देनेवाले को बेसहारा होकर लावारिस की तरह जलाया जाना….
हर कलुष से दूर सात्विक भाव में जीते मनुज का बुड़बक कहलाना…..
थाम कर ऊँगली चलें जिस ऊम्र में बच्चे, उनकी छत्र छाया का छिन जाना…..
घड़ी भर सुस्ताये बिन घर की सभी समस्याओं को केंद्र में रख जीना और मर जाना…..
कितने तो ऐसे भी जिनकी दूनिया केवल पीना-खाना….
कितने ही ऐसे जो जन्मे तब से सताए और दबाए अंतिम क्षण तक घुटते आना….
कितने ऐसे लोग जिन्होंने नोट कमाए, बेची ज़मीर और रक्खा खजाना….
कितने ऐसे लोग जिन्होंने लोग कमाए…. भलमनसी का संसार दीवाना…
कितने तो ऐसे भी जिनका हँसते आना किंतु नहीं था ठौर ठिकाना….
ऐसे-ऐसे कितने ही लोगों का आना….
कितने रिश्तों का मर जाना, कितनों का फिर से जी जाना……
ऐसे लोगों का भी आना…..

मैंने देखा…..
ऐसे भी लोगों का आना…..
करतूतें जितनी काली थीं, उतना ही था उजला बाना….
कुछ फकीर थे सब ही लुटाए, भूल चुके थे कुछ भी पाना…..
ऐसे भी लोगों का आना…..
दुनिया भर के सारे ही सच, सारे ही दुख देख रहा हूँ…..
देख रहा नित तरह-तरह के कितने ही लोगों का आना…

परिचय:

चन्दन, एम.ए. हिंदी, झारखंड केन्द्रीय विश्वविद्यालय

मैं अज्ञानी

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मेहरून्निसा परवेज़ की कहानियों में आदिवासी स्त्री-आरती

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मेहरून्निसा परवेज़ की कहानियों में आदिवासी स्त्री

नाम- आरती (शोधार्थी)
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,नई दिल्ली.
पता- बी-136,विकास विहार(ईस्ट) विकास नगर, उत्तम नगर, नई दिल्ली, 110059.
मोबाईल न.- 9716668064
ईमेल- Aartichaudhari1991@gmail.com

21 वीं सदी को विमर्शों की सदी कहे तो गलत न होगा। जिसमें अनेक विमर्श हमारे समक्ष मौजूद है जैसे दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श इत्यादि। दलित विमर्श और स्त्री विमर्श के समान ही आदिवासी विमर्श की गूँज भी सुनाई देने लगी। भारत भले ही समृद्ध विकासशील देश की श्रेणी में शामिल है, लेकिन आदिवासी अब भी समाज की मुख्यधारा से कटे नज़र आते हैं। आज भी आदिवासी अपने ही देश में हाशिये पर स्थित है। रचनाकारों ने इन्हीं हाशिये पर स्थित आदिवासियों को अपनी रचनाओं के केंद्र में लाने का प्रयास किया है। जिसमें उन्होंने विकास के नाम पर सरकारी तंत्र द्वारा किया गया उनका शोषण, आदिवासी समाज की गरीबी-लाचारी, उनके विडम्बनापूर्ण जीवन आदि को अभिव्यक्त किया है। समकालीन कहानीकारों में जिन्होंने इन सब समस्याओं को केंद्र बनाकर कहानी लिखीं, उनमें मेहरून्निसा परवेज़ का विशिष्ट स्थान है। मेहरून्निसा परवेज़ की कहानियों का एक बड़ा भाग बस्तर क्षेत्र के आदिवासी समाज और उनकी संस्कृति को चित्रित करता है। लेखिका का जन्म और बचपन आदिवासियों के बीच ही हुआ और गुजरा। उन्होंने आदिवासी जीवन को बहुत करीब से देखा ही नहीं बल्कि जिया भी है। इसलिए उनके साहित्य में आदिवासी समाज मौजूद है। वह लिखती हैं, “बस्तर। जिसे मैं कभी भूल नहीं पाई। जिंदगी का पहला पाठ, यथार्थ का पहला शब्द मैंने यही गढ़ा था। बस्तर की माटी में खेलकर मेरे नन्हें पैर जवान हुए थे। बस्तर का भयानक जंगल आज भी मेरे मन में बसा हुआ है…..”1 उनकी आदिवासी कहानियों के केंद्र में आदिवासी स्त्रियों के शोषण, उनके जीवन-संघर्षों और उनकी समस्याओं आदि का यथार्थ चित्रण हुआ है।

जब हम आदिवासी स्त्री की बात करते हैं तो हमारे ज़हन में उनकी स्वच्छ्न्द, स्वतंत्र, संघर्षशील, आत्मनिर्भर छवि सामने आती है। भारतीय समाज और संस्कृति की तुलना में आदिवासी स्त्रियाँ आरम्भ से ही स्वतंत्र और स्वछंद रही है। चाहे प्रेम करने की स्वतंत्रता हो या फिर वर के चयन करने की स्वतंत्रता हो, आदिवासी स्त्रियाँ आरम्भ से ही आत्मनिर्भर रही है। यही विशेषता है जो आदिवासी स्त्रियों को अन्य स्त्रियों से विशिष्ट बनाती है। मेहरून्निसा परवेज़ ने अपनी कहानियों में इन्हीं आदिवासी स्त्रियों को चित्रित किया है। आदिवासी स्त्रियाँ स्वावलंबी होती है। वे खट-कमाकर अपना और अपने पूरे परिवार का भरण-पोषण करने में समक्ष होती है। मेहरून्निसा परवेज़ की कहानी ‘कानीबाट’ में दुलेसा और उसकी माँ जंगलों में काम करती है और उसका पिता खेतों में काम करता है। वह और उसकी माँ जंगलों से लकड़ी काटना, बोड़ा लाना, मछलियाँ पकड़ना जैसे कार्य करती है साथ ही मुर्गी पालन का कार्य भी करती है। इसी प्रकार का कार्य ‘जंगली हिरनी’ में लच्छो और उसकी माँ भी करती है। ‘शनाख्त’ कहानी में बत्ती का बाप शराबी है। वह उनके साथ नहीं रहता है। कभी-कभी आता है। ऐसी स्थिति में बत्ती की माँ और वह घर-घर अण्डे बेचकर अपनी गृहस्थी चलाती हैं। आदिवासी स्त्रियाँ अपने पति पर निर्भर नहीं रहती हैं। वह घर से बाहर निकल कर जंगलों और खेतों में काम करती हैं और अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करके अपने पति के साथ परिवार का भरण-पोषण करने में सहायता करती है।

आदिवासी समाज में लड़की के होने पर परिवार वाले खुशियाँ मनाते हैं। आदिवासी समाज में ऐसी मान्यता है कि बेटी का जन्म होने से परिवार में धन-दौलत में वृद्धि होती है। ‘कानीबाट’ कहानी में जोनी और लिकेन की लड़की होने पर वह गाँव वालों को दावत देते हैं, “लड़की होना रईसी का सूचक माना जाता है, क्योंकि लड़की घर में धन लाती है।”2 हिंदू समाज की तरह आदिवासी समाज में बेटा और बेटी में भेदभाव नहीं करते हैं। इसके विपरित आदिवासी समाज में बेटी को ज्यादा मान-सम्मान और महत्व दिया जाता है। आदिवासी समाज में जहाँ बेटी को विशेष स्थान है वहीं त्यौहार, मेला, हाट आदि में स्त्रियों की प्रमुख भूमिका होती है। नाच-गाने में भी आदिवासी स्त्रियाँ बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती हैं। त्यौहारों, घोटुल और विवाह में स्त्रियाँ नृत्य और संगीत करती हैं। ‘जंगली हिरनी’ कहानी में दियारी त्यौहार पर लच्छो नाचने के साथ-साथ सुरीली आवाज़ में गाती है, “देवी बलों में दन्तेसरी,देवी बले में माता मावती, बड़े देवी आस आया, तुई बड़े देवी आस।”3 आदिवासी समाज में लड़की को प्रेम करने, वर चुनने और शादी करने की स्वतंत्रता है। ‘कानीबाट’ और ‘जंगली हिरनी’ में प्रेम करने की स्वतंत्रता को व्यक्त किया है। यह अलग बात है कि दोनों कहानी की नायिका अपने-अपने प्रेम में असफल होती है।

उपर्युक्त वर्णन सिक्के का एक पहलू है लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि आदिवासी स्त्रियाँ स्वतंत्र और आत्मनिर्भर तो है परंतु इसके बावजूद, उनके अपने समाज में कुछ ऐसे नियम और कानून है जो स्त्री को पुरूष से कमतर आंकने के लिए बनाये गये है। आदिवासी स्त्रियाँ अपने समाज के साथ ही मुख्यधारा के समाज द्वारा भी शोषित और प्रताड़ित होती आयी है।

मुख्यधारा का समाज आदिवासी स्त्री को मात्र मनोरंजन और भोग का साधन मानते हैं। उनकी नज़र में आदिवासी स्त्री को कोई अस्तित्व नहीं है। उनके अनुसार वह सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक रूप से कमजोर और असहाय होती है। उनके भोलेपन और मासूमियत का मुख्यधारा का समाज गलत फायदा उठाकर शोषण करता है। मेहरून्निसा परवेज़ की कहानी ‘जंगली हिरनी’ बाहरी व्यक्ति द्वारा भोली-भाली आदिवासी स्त्री को छलने की कथा का यथार्थ चित्रण व्यक्त किया है। प्रस्तुत कहानी में मेंगन को जंगलों में लकड़ी तोड़ते समय एक अंग्रेज शिकारी उसकी इज्जत का शिकार करता है। उसे जब बेटी लच्छो होती है तो हूबहू वह अंग्रेजी शिकारी की तरह होती है। मेंगन के पति को भी शक होता है। बुधु बड़बड़ाता है, “न जाने कहाँ से आ मरते हैं खुले साँड की तरह हमारी इज्जत लूटने। मैं देखता उसे तो टँगिया से एक बार में ही काट देता।”4 लेकिन वह लाचार है। लच्छो भी बड़ी होती है तो उसे बस्ती में स्कूल चलाने आये मास्टर से प्रेम हो जाता है। लच्छो भी सपने देखती है। मास्टर भी उससे शादी का वादा करता है लेकिन स्कूल बंद होने के कारण मास्टर भी शहर चला जाता है और वह अकेली रह जाती है। इस प्रकार जो पीड़ा मेंगन भोग चुकी है वही पीड़ा उसकी बेटी के भाग्य में भी आ जाती है। वहीं ‘कानीबाट’ कहानी में आदिवासी स्त्रियाँ अपने ही समाज द्वारा शोषित है। दुलेसा की शादी उसके माता-पिता रामू नामक युवक से करना चाहते हैं। जिसके लिए वह रामू को कुछ दिनों के लिए अपने घर रखते हैं। दुलेसा को यह रिश्ता बिल्कुल पसंद नहीं क्योंकि वह जिलेन नाम के युवक से सच्चा प्रेम करती है और उसी से शादी करना चाहती है। वह जिलेन के बच्चे की माँ बनने वाली है जबकि जिलेन उसे धोखा देकर अन्य लड़की से शादी कर लेता है। इसी कहानी में दुलेसा की सहेली जलयारी वह भी अपनी शादी से खुश नहीं है, क्योंकि उसकी मंगनी बचपन में ही हो गयी थी। बड़े होने पर वह किसी ओर से प्रेम करती है और मौका देखकर भाग जाती है। आदिवासी समाज में लड़की के भागने पर उन्हें कठोर दण्ड दिया जाता है, “पहली बार गाँववाले भागी हुई लड़की को पकड़कर लाते हैं और उसे खूब मारते हैं, बाँध देते हैं। लड़की मौका पाकर फिर भाग जाती है, दूसरी बार उसे पकड़कर लाते हैं और उसे आग से दागते हैं, मारते हैं। तीसरी बार यदि लड़की फिर भाग जाती है, तो गाँववाले उसे पकड़कर लाते हैं और एक पैर चक्के के बीच डाल देते हैं या बाँध देते हैं। उसके बाद उसे तेजी से घुमाते हैं। लड़की पीड़ा से चीखती है, उसका पैर सूज जाता है और वह कष्ट से बुरी तरह चिल्लाती है और बेहोश हो जाती है।”5 इस प्रकार आदिवासी लड़कियों को शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार का दण्ड भुगतना पड़ता है। इस दण्ड की प्रक्रिया में कई लड़कियाँ इस कष्ट को सहन भी कर लेती हैं और फिर मौका पाकर भाग जाती है। इस बार गाँव वाले स्वयं उसे उसके प्रेमी के पास पहुँचा देते है। जिस प्रकार कहा जाता है कि आदिवासी स्त्रियों को अपने समाज में प्रेम करने और शादी करने की स्वतंत्रता होती है लेकिन वहीं कई आदिवासी समाज ऐसे भी हैं जहाँ लड़कियों को प्रेम और शादी करने की स्वतंत्रता नहीं है और ऐसा करने पर उन्हें असहनीय दण्ड भी भुगतना प‌ड़ता है। यह कहानी हमारे उस भ्रम को तोड़ती है कि आदिवासी स्त्रियों को प्रेम और विवाह करने की स्वतंत्रता होती है। ‘देहरी की खातिर’ कहानी में मेहरून्निसा परवेज़ ने आदिवासी स्त्री के दोहरे शोषण की व्यथा को व्यक्त किया है कि किस प्रकार मुख्यधारा के समाज के साथ-साथ उसका स्वयं का समाज भी उसको प्रताड़ित और शोषित करता है। जिसके कारण उसे दोहरे शोषण की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। कहानी की नायिका पापा (नायिका का नाम) शहर के मास्टर से प्रेम करने लगती है तब नानीआया उससे कहती है, “कहीं प्यार तो नहीं कर बैठी?जानती है वह प्यार में फँसकर तेरी जिंदगी बरबाद करेगा। तुझे घर नहीं बैठायेगा, इतनी हिम्मत शहर वालों में नहीं है। हंडी चाटेंगे पर घर के पलँग पर बिरादरी की बराबर घराने की लड़की को ही बैठायेंगे।”6 गर्भवती होने पर शहरी मास्टर उसे पहचानने से इंकार कर देता है। पापा के गर्भवती होने की बात पिता को पता चली तो उसे घर से बाहर निकाल दिया और वह काका-काकी के पास रहने चली गयी लेकिन वहाँ भी काका की वासनापूर्ण नजर हमेशा उस पर रहती। इस प्रकार मुख्यधारा के समाज के लोग अपने प्रेम में फँसा कर झूठे वादों से भोली-भाली आदिवासी स्त्री को फंसाते है तो वहीं उसके पिता समान काका स्वयं उसे अपनी हवस का शिकार बनाना चाहता है।

मेहरून्निसा परवेज़ ने आदिवासी स्त्रियों के शोषित रूप को ही चित्रित नहीं किया है अपितु उससे एक कदम आगे जाकर उन्होंने आदिवासी स्त्रियों में विरोध करने की क्षमता को भी व्यक्त किया है। आदिवासी समाज की स्त्रियाँ अपने ऊपर हो रहे शोषण, अतयाचार को अपनी नियति नहीं समझ कर नहीं बैठ जाती है बल्कि उसके प्रति विद्रोह प्रकट करती है। ‘देहरी की खातिर’ में जब पापा को घर से निकाल देते हैं। तब गाँव की एक काकी उसे अपने घर में आश्रय देती है। चूँकि वह माँ बनने वाली थी, काका-काकी उसे बहुत स्नेह और दुलार से अपने पास रखते हैं। बच्चे के जन्म के बाद काकी ही उसके और उसके बच्चे का ख्याल रखती है। लेकिन काका की नीयत में खोट आ जाता है। वह बेटी जैसी लड़की को अपने हवस का शिकार बनाना चाहता है लेकिन काकी सही समय पर पहुँचकर उसे बचा लेती है। एक लड़की की अस्मिता को बचाये रखने के लिए काकी टँगिया से अपने ही पति का खून कर देती है। ‘शनाख्त’ कहानी में पिता सेक्स का इतना भूखा रहता है कि अपनी ही बेटी पर उसकी बुरी नजर रहती है। शराब के नशे में अपनी बेटी को ही वासना का शिकार बनाने का प्रयास करता है। और इसी मानसिकता को लिये पिता बेटी के बिस्तर तक पहुँच जाता है, “बच्ची का सारा शरीर सुन्न पड़ गया तो क्या उसके पास वह (पिता) ‘नीच, पापी कुत्ते’, उसे माँ ने गुस्से से फनफनाते हुए उसका हाथ पकड़कर उठा दिया। बच्ची घबड़ायी सी उठकर बैठ गयी। भय के मारे उसका चेहरा सफेद पड़ गया था।”6 माँ गुस्से से अपने पति को घर से बाहर निकाल देती है। कुछ दिनों के बाद उसके मरने पर वह उसे पहचानने से भी इंकार कर देती है। ‘सूकी बयड़ी’ में थोरा का पति जब दूसरी औरत को घर पर लाता है लेकिन थोरा अपने पत्नी होने के अधिकार को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। वह अपने पति का विरोध करती है, “…..जा, चले जा, कोठरी में खाली नी करूँ। म्हारे बापू ने ब्याह कराया हैं फेरे लेकर लाया है। ब्याहवाली हूँ। म्हारी इज्जत है।”7 इस प्रकार आदिवासी स्त्रियाँ भी अपनी अस्मिता और अधिकारों के लिये आवाज उठा रही है।

लम्बी संस्कृति की परम्परा कोई भी हो उसमें कुप्रथाएँ, कुरीतियाँ, अपने तरह के कर्मकांड और अंधविश्वास पनपते हैं। आदिवासी समाज भी इनसे मुक्त नहीं है। यह कहा जा सकता है कि अन्य समाज की अपेक्षा आदिवासी समाज में अंधविश्वास की प्रधानता है। इस अंधविश्वास के केंद्र में आदिवासी स्त्री है। ‘टोना’ कहानी में खोड़ी पटेल के साथ शादी करके जब उसके घर आती है, तो पटेल की बड़ी पत्नी को देखकर सहम जाती है। बाद में पता चलता है कि पटेल की बड़ी पत्नी के सिर के बाल नहीं है तथा वह ‘टोनही’ है। उसके विषय में पूर गाँव में यह बात फैली हुई है कि मंत्र की शक्ति से वह अपने दुश्मनों का नाश करती हैं। उसकी आकृति इतनी भयावह है कि खोड़ी उसके बारे में देख और सुन कर सहम जाती है, “बड़ी के सिर में बाल नहीं है, उसका राज जब खुला तो वह कांप-सी गयी। बड़ी पंगनीन(टोनही) थी। वह रात को घर से चली जाती थी और पौ फटने के पहले आदमी का खून पी कर लौटती थी।”8 आदिवासी समाज में किसी स्त्री के मन:स्थिति और आकांक्षा को न समझ कर उसे डायन, पिशाच, कलंकिनी जैसे शब्दों से पुकारा जाता है। पूरा गाँव उसे प्रताड़ित करता है और कभी-कभी ऐसी स्थिति में उसे गाँव से बेदखल कर दिया जाता है। ‘टोना’ कहानी में पटेल की बड़ी पत्नी के बारे में इस प्रकार की जो भी अफवाहें प्रचलित हैं। उसे तथा उस स्त्री को देखकर यही कहा जा सकता है कि पति की उपेक्षा और संतानोत्पत्ति के अभाव में, वह समाज का सबसे घृणित रूप अपनाने को बाध्य होती है, जिससे कि लोग उसकी तरह आकृष्ट हो तथा उसके विषय में करें। इस प्रकार, लेखिका ने आदिवासी समाज में व्याप्त जादू- टोना जैसे कार्यों में स्त्रियों की स्थिति को चित्रित करने का प्रयास किया है।

भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति में काफी सुधार आया है। समाज में स्त्री की स्थिति पहले की तरह द्वितीय स्तर के प्राणी की नहीं रह गयी है। आज स्त्रियाँ अपने अधिकारों को पहचानती है और अपने हक के लिए संघर्ष कर रही है। स्त्रियाँ प्रत्येक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। आज बहुत से संगठन स्त्रियों के अधिकारों, सुरक्षा, स्वास्थ्य आदि के लिए कार्यरत है। लेकिन ठीक इसके विपरित आदिवासी स्त्रियों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। आरम्भ से आदिवासी स्त्रियाँ स्वतंत्र और आत्मनिर्भर है लेकिन यह भी सच है कि आदिवासी स्त्रियाँ भी सदियों से शोषित होती आयी है। मेहरून्निसा परवेज़ ने आदिवासी स्त्री के स्वतंत्र, आत्मनिर्भर, संघर्षशील आदि रूपों के साथ उनके शोषित और प्रताड़ित रूप का यथार्थ चित्रण किया है। वहीं उन्होंने आदिवासी स्त्रियों के विरोध के स्वर को भी कहानियों में मुखरित किया है।

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संदर्भ सूची –

1.मेहरून्निसा परवेज़, मेरी बस्तर की कहानियाँ, वाणी प्रकाश्न, नई दिल्ली, 2006, भूमिका

2.मेहरून्निसा परवेज़, मेरी बस्तर की कहानियाँ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006, पृ.सं.-18.

3.मेहरून्निसा परवेज़, गलत पुरूष, नेशनल पब्लिशिंग हाऊस, दिल्ली, 1978, पृ.सं.-97.

4.मेहरून्निसा परवेज़, गलत पुरूष, नेशनल पब्लिशिंग हाऊस, दिल्ली, 1978, पृ.सं.-96.

5.मेहरून्निसा परवेज़, मेरी बस्तर की कहानियाँ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006, पृ.सं.-23-24.

6.मेहरून्निसा परवेज़, मेरी बस्तर की कहानियाँ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006, पृ.सं.-50.

7.मेहरून्निसा परवेज़, समर, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली,1999, पृ.सं.-144.

8.मेहरून्निसा परवेज़, गलत पुरूष, नेशनल पब्लिशिंग हाऊस, दिल्ली, 1978, पृ.सं.-8.

 

मेवाड़ की धरती चितौड़गढ़  : यात्रा वृतांत- गुलाबचंद एन. पटेल,  

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                                              मेवाड़ की धरती चितौड़गढ़  : यात्रा वृतांत              

गुलाबचंद एन. पटेल,

 

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साहित्यकार के रूप में राजकुमार जैन फाउंडेशन अकोला की ओर से दो अवोर्ड के लिए चयनित कोने के कारण चितौड़गढ़ जाने का, देखने का सुंदर अवसर मिला |

कार्यक्रम के दुसरे दिन हम सभी साथी साहित्यकार / कवि मित्रों ने चितौड़गढ़ में स्थित किल्ला देखने का प्लान बनाया | हम एक कार से मित्रों के साथ चितौड़गढ़ में प्रवेश किया | बहुत ऊंचाई पर यह किल्ला स्थित है | बहुत ही सुंदर है | ऐसी पौराणिक और ऐतिहासिक जगह देखना हमारे नसीब में एक सुंदर तक है | चितौड़गढ़ का पहला शाका राघव रामसिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र रतनसिंह इ.स. १३०२ में चितौड़गढ़ की गद्दी पर बैठा था | उसके बैठने के कुछ ही महीनों बाद अलाउदीन खिलजी ने चितौड़ पर आक्रमण किया | करीबन छह मास तक दुर्ग की रक्षा के लिए टक्कर लिया किन्तु, जब दुर्ग की रक्षा कर पाना संभव न रहा गया तो दुर्ग के भीतर की स्त्रियों ने रतनसिंह की रानी पद्मावती के नेतृत्व में जौहर किया | हिन्दू वीरों ने राजा रतनसिंह को शाका किया | चितौड़ दुर्ग पर खिलजी का अधिकार हो गया | उसके बाद अलाउदीन खिलजी ने चितौड़ का राज्य अपने पुत्र खिजरवां को सोंप दिया व उसका नाम चितौड़ से बदलकर “खिजराबाद” रख दिया |   चितौड़ दुर्ग में मीराबाई का मंदिर स्थित है | मीरा का जन्म इ.स. १५०४ में हुआ था | उसका विवाह महाराजा सांग के जयेष्ट पुत्र लोजराज के साथ हुआ था | मीरा ने अपना मन कृष्ण की भक्ति में लगा दिया था | मीरा के परिवारजनों को ये अच्छा नहीं लगता था | अंत में मीराने मेवाड़ त्याग दिया था | सांगा के बाद में मेवाड़ की गद्धी पर महाराणा रतनसिंह बैठा था | सन १५३३ में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चितौड़ पर आक्रमण कर दिया था |

मेवाड़ की वीर भूमि पर ९ मई सन १५४० को  वीर शिरोमणि महाराजा प्रताप का जन्म हुआ था | महाराजा प्रताप सन १५७२ में मेवाड़ की गद्दी पर बैठे, उस समय चितौड़ सहित मेवाड़ के अधिकांश ठिकानों पर अकबर का अधिकार हो गया था |

अजमेर खंडवा जाने वाले रेल मार्ग पर चितौड़ जंक्शन आता है | चारों ओर मैदान से घिरी हुई पहाड़ी है | जिस पर प्रसिध्ध किला चित्रकूट  (चितौड़गढ़) बना हुआ है | ६३ एकड़ भूमि पर ये बसा है | चितौड़गढ़ के प्रथम द्वार को पाडन पोल कहते है | वहां एक चबूतरा है | वहां बांधसिंह का स्मारक है | धमासान युध्ध के दौरान लहू की नदी बहती थी | उसमें एक पाडा बहकर प्रवेश द्वार तक आ पहुंचा | इसी लिए उसे पाडन पोल द्वार कहेते है |  भैरव पोल, हनुमान पोल और चौथा द्वार गणेश पोल है | पांचवां और छठा साथ होने से जोडन पोल कहते है | लक्ष्मण मंदिर के पास छठा प्रवेश द्वार है उसे लक्ष्मण पोल कहते है | सातवाँ प्रवेश द्वार राम पोल है | राम पोल के भीतर सिसोदिया पता का स्मारक है | पुरोहित की हवेली भी है | तुलजा भवानी का मंदिर भी है | दासी पुत्र बनवीर ने इ.स. १५३६ में निर्माण करवाया था | बनवीर ने इ.स.१५३६ में दुर्ग को दो भागों में दुर्ग की दीवार बना के बाँट दिया था | उसके पास नवलखा भंडार है | यहाँ नौ लाख रुपयों का खजाना पड़ा रहता था इस लिए उसे नवलखा भंडार कहते है |

पुरातत्व संग्रहालय में प्राचीन मूर्तियाँ और बड़ी बड़ी तोपें रखी गयी है | भामाशाह की हवेली भी है | उसने हल्दीघाटी के युध्ध दौरान महाराणा प्रताप का धन राजकोष खाली हो गया था तब भामाशाह ने अपनी पूरी पीढ़ियों का संचित धन महाराणा को भेट किया था | महाराणा सांगा का देवरा शृंगार चवरी के दक्षिण में भगवान नारायण देव की आराधना के लिए बनवाया था |

फ़तेहप्रकाश महल भी है | जो उदेपुर के महाराणा फ़तेहसिंह ने बनवाया था | इ.स. १४४८ में महाराणा कुम्भा के खजांची बेलाक शृंगार ने शृंगार चवरी का निर्माण करवाया था, वो शांतिनाथ मंदिर है | वहां महाराणा कुम्भा का भी महल है | यहाँ मीरा कृष्ण की आराधना की व विषपान स्वीकार किया था | ये महल चितौड़ का गौरव है | एक सुरंग है, जिसे पद्मिनी के जौहर   का स्थान बताया जाता है | सतीत्व की रक्षा के कारण महारानी पद्मिनी के साथ हजारों वीरांगनाओ ने सुरंग के रास्ते से गौ मुख कुंड में स्नान किया व तहखानों में विश्व प्रसिध्ध जौहर किया था | वहां पुराना मोती बाजार भी खंडहर के रूप में है | सतबीस देहरी जैन मंदिर कला उत्कृष्ट है | कुम्भ श्याम का मंदिर भी है |

मीरा मंदिर कुम्भ श्याम मंदिर के चोक में है | अब वहां मीरा व कृष्ण की भक्ति प्रतिमा है | मंदिर के सामने संत रैदास की छतरी भी बनी हुई है | जटाशंकर महादेव का मंदिर विजय स्तंभ की ओर जाते समय मीरा मंदिर के सीधे हाथ की तरफ स्थित है |

विजय स्तंभ मालवा के महमूद शाह खिलजी को हरा कर अपनी ऐतिहासिक विजय की याद में महाराणा कुम्भा ने बनवाया था | इ.स. १४४८ में बनवाया था | १२२ फिट ऊँचा है | नौ मंजिला है ३० फिट चौड़ा है | समिधेश्वर महादेव का भी मंदिर है | महासतियों का जौहर स्थल जो चारों ओर दीवारों से घिरा हुआ है | चितौड़ में बहादुरशाह के आक्रमण के समय हाडी रानी कर्मवती ने १३ हजार वीरांगनाओं के साथ यहाँ जौहर किया था |

कलिका मंदिर के आगे नौ गजा पीर की मजार है | पदमनी महल झील के किनारे बनी है | एक छोटा महल पानी के अंदर बना है | जो जनाना महल कहलाता है | राघव रतनसिंह की रूपवती रानी पदमनी इन महल में रहती थी | वहां मरदाना महल है | उस में एक कमरे में विशाल दर्पण जो जनाना महल की सीढियों पर खड़े व्यक्ति का स्पष्ट प्रतिबिंब दर्पण में नजर आता है | परन्तु पीछे मुड़कर देखने पर सीढि पर खड़े व्यक्ति को कोई भी नहीं देख सकता है | अनुमान है कि अलाउदीन खिलजी और रतनसिंह यहाँ बैठ कर शतरंज खेल रहे थे तो उसने इस दर्पण से रानी पदमनी का प्रतिबिंब देखा | यहाँ गौ मुख कुंड भी है | जयमल पताका महल भी है | कलिका मंदिर है | सूर्य कुंड, खातन रानी का महल भी देखने को मिला | भाक्सी नाम का कारागार भी है | चित्रांग मोरी का तालाब भी है | राज टीला है | दुर्ग की अंतिम छोर चितौड़ी बुज नामसे जाना जाता है | गोरा बादल की हवेली है | राव रमल की हवेली भी है | यहाँ भीमलत कुंड भी है | इस पांडव भीम ने लात मारकर बनाया था | इस लिए उसे भीमलत कुंड कहते है | चौदवीं सताब्दी का ७५ फिट ऊँचा छोटा कीर्ति स्तंभ भी है | उसकी बाजु में महावीर स्वामी का मंदिर बना हुआ है | चारभुजा विष्णुजी का मंदिर है | रतनसिंह का महल है | बाण मातो का मंदिर भी है | लाखोटी बारी महाराणा लाखा ने बनवाया था | चल फिर शाह की दरगाह शहर के बीच गोल प्याऊ चौराहे  के सामने करीबन ८० वर्ष पुराणी है |

चितौड़ दुर्ग से ११ किमी उत्तर में नगरी नाम अति प्राचीन स्थल है | चितौड़ ६० किमी उत्तर पूर्व में मात्रु कुण्डियाँ है | जो राजस्थान का हरिद्वार के रूप में प्रसिध्ध है | बनास नदी के तट पर स्थित है | चितौड़गढ़ से १४२ किमी उत्तर पूर्व में बिजोलिया से ३० किमी दूर दक्षिण में मेनाल धरती पर महानाव नदी में १२२ मीटर की ऊंचाई से एक झरना (जल-प्रपात) गिरता है | ये स्थान पर हम जा नहीं सके | भदेसर गाँव से १५ किमी दूर ‘मंडफिया’ गाँव में सांवरियाजी का विश्व विख्यात मंदिर है | काले पत्थर की श्री कृष्ण की मूर्ति, मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में स्थापित है | यह सावंरिया शेठ का मंदिर कहलाता है | चितौड़ बहुत सुन्दर स्थल है | एक बार अवश्य मुलाकात लें |

धन्यवाद,

दिनांक: १३/१०/२०१८                                         
गुलाबचंद एन. पटेल,
कवि, लेखक/अनुवादक,
नशामुक्ति अभियान प्रणेता,
मो.नो.९९०४४ ८०७५३
ईमेईल: patelgulabchand19@gmail.com

 

 

मेरे अल्फाज

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 वह लड़की है या नूर है

लेकिन, खूबसूरत तो जरूर है

मुझे देखकर उसका पलके झुकाना
उसे भी इश्क जरूर है

क्यों मेरा दिल उसे ही चाहे
कोई बात तो जरूर है

क्यो यह महफिल हसीं है
लगता है, वह लड़की यही कही जरूर है

 :कुमार किशन कीर्ति

मूल नाम:सोनू कुमार पाण्डेय

मेरा दुख ना कोई समझ पाया

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शीर्षक- मेरा दुख ना कोई समझ पाया

मैं मज़दूर मेरा दुख ना कोई समझ पाया ।
राजनीति के गंदे खेल में मेरी आह! ना कोई सुनने पाया ।
नंगे ही चल पड़े थे कदम, तपती सड़को पर ,उन जलती चमड़ियों पर मरहम ना कोई लगाने पाया ।
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया ।


मेरा दोष सिर्फ इतना था पॉकेट में पैसा ना था, सड़क पर चलाने को महँगी कार ना थी, रहने को अट्टालिका ना थी । इसलिए दर्द भरी आह! तुझ तक ना पहुँच पाई और तेरे किये हुए वादे हम तक ना पहुँच पाये।
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया ।


खाली पेट ही निकल पड़ा था मैं, ना था तन पर कपड़ा , ना था बॉटल में पानी,ना था साहस कुछ करने का
बस खाली सड़को को माप रहा था मैं बेसुध खड़ा ।
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया ।


बस एक ही रात में मालिक ने फरमान निकाला, कल से ना आना कह कर बाहर निकाला ।
उन भूखे बच्चों को अब क्या खिलाऊंगा, घर वापिस जा कर मैया को क्या मुंह दिखाऊँगा।
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया ।


ऊंचे पद पर आसिन बड़े लोग
कभी तो हमारी भी आह ! सुन लो
अब बन्द कर राजनीति का गन्दा खेल
हमारा भी उद्धार कर दो।।
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया ।


ये ना कभी भूलना, जिस महल में रह्ते हो, उसकी नींव हमने ही बनाई है, कंकड़-पत्थर उठाते हुए अपनी कई रातों की नींद गवाई है।
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया ।


आज जब वक़्त है हमारा साथ देने का, तो हर रोज़ नये-नये भाषण दे अपनी जैब भरते हो, झूठे आश्वासन दे
विपक्षी दलों के साथ वाद-विवाद करते हो।
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया ।


फैली इस माहामारी में कदम मेरे भी काँपते हैं ।
तो बाट जोहती मुन्नी की माँ की याद आज भी आती है।
कहीं ये यात्रा मेरी आखरी यात्रा ना हो जाये, बस इसी सोच में मेरी हर रात दहशत में गुजर जाती है और हर नया सवेरा अपनों से मिलने के आस की रोज़ एक नई दस्तक ले कर आती है।
मैं मज़दूर मेरा दर्द ना कोई सुनने पाया ।
मेरे दुख का ईलाज ना कोई कर पाया ।
धन्यवाद?
अन्जना झा