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डिजिटल दुनिया और युवा पीढ़ी-दिव्या शर्मा

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Photo by Andras Vas on Unsplash

डिजिटल दुनिया और युवा पीढ़ी

*दिव्या शर्मा

सोशल मीडिया मुख्यतया किसी कंप्यूटर या संचार के आपले से जुड़ा है। अनेकों प्रकार की वेबसाइट और एप्स हमें लोगों से जोड़ते हैं सोशल मीडिया की मदद से ही आज कोई भी प्रतिभाशाली व्यक्ति अपनी प्रतिभा को प्रस्तुत करके लोकप्रियता प्राप्त कर सकता है। ” सोशल मीडिया आपको विचारों सामग्री सूचना और समाचार इत्यादि को बहुत तेजी से एक दूसरे को साझा करने में सक्षम बनाता है। पिछले कुछ वर्षों से सोशल मीडिया के उपयोग में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई है तथा इस ने दुनिया भर के लाखों उपयोगकर्ताओं को एक साथ जोड़ लिया है। ” 1 सोशल मीडिया में प्रयोग तरीके ताजगी पन स्थायित्व आदि का प्रयोग हुआ है। नेलसन कहते हैं – ” इंटरनेट प्रयोक्ता अन्य साइट्स की अपेक्षा सामाजिक मीडिया साइट्स पर ज्यादा समय व्यतीत करते है । दुनिया में दो तरह की सिविलाइजेशन का दौर शुरू हो चुका है, वर्चुअल और फिजिकल सिविलाइजेशन । आने वाले समय में जल्द ही दुनिया की आबादी से दो तीन गुना अधिक आबादी अंतरजाल पर होगी। दरअसल अंतरजाल एक ऐसी टेक्नोलॉजी के रूप में हमारे सामने आया है जो उपयोग के लिए सबको उपलब्ध है और सर्वहिताय हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स संचार व सूचना का सशक्त जरिया है, जिनके माध्यम से लोग अपनी बात बिना किसी रोक-टोक के रख पाते हैं। यहीं से सामाजिक मीडिया का स्वरूप विकसित हुआ है ।” 2

सतयुग,द्वापरयुग , त्रेता युग एवं कलयुग के दौर में आज के युग को यदि हम डिजिटल युग कहें तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। डिजिटल युग ने आम मनुष्य के जीवन में इतनी बड़ी क्रांति लाकर खड़ी कर दी है कि मानव जो ईश्वर की सबसे सुंदर रचना है, वह अपना अस्तित्व ही भूलता जा रहा है। समय के साथ धार्मिक, सामाजिक, वैश्विक, पारिवारिक एवं सांस्कृतिक मूल्य की आयाम एवं उनकी रूप रेखाएं बदलती जा रही हैं। आजादी 1947 में हमें अंग्रेजों से मिली किंतु उस आजादी को आज की पीढ़ी ने नए मूल्यों में दर्शाया है। आजादी चाहे बोलने की हो, परिवार की हो, समाज की हो। और यह प्रतिभा बढ़ चढ़कर हमें दिखाई दे रही है सोशल मीडिया पर। फिर चाहे वह टि्वटर हो फेसबुक हो या अन्य मैसेंजर एप्स हो। एक गणना यंत्र का निर्माण चार्ल्स बैबेज ने सन १८२२ में किया था जिसका उद्देश्य मनुष्य के समय की बचत करना होगा। कुछ जानकारियों को एकत्र करना होगा। संगणक के बाद धीरे-धीरे नेटवर्क बढ़ता गया और संपूर्ण देश में एक क्रांति छा गई। ” सबसे पहला संगणक १८२२ में एक गणितज्ञ चार्ल्स बैबेज ने बनाया था। उन्होंने एक गणना करने वाली मशीन बनाई जिसे डिफरेंस मशीन कहा जाता था। पहला इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर जिसने वर्तमान संगणक को आकार दिया वह ENIAC था ।यह १६४५ और १६४६ के बीच ‘ जॉन विलियम और जॉन एकटे ‘ द्वारा बनाया गया था। —— हिंदुस्तान में जो सबसे पहला संगणक बना उसका नाम ‘सिद्धार्थ’ है। इंटरनेट कंप्यूटर का सबसे बड़ा नेटवर्क है। इंटरनेट से अब तक 17 अरब डिवाइस जुड़ चुके हैं। ” 3 कंप्यूटर से जुड़ी चीजों को जमा करने के लिए तरह-तरह के डिवाइस, फ्लॉपी, सीडी, डीवीडी एवं पेन ड्राइव आदि का इस्तेमाल किया जाता है। प्रश्न उठता है मन में कि यह मशीन मनुष्य की मदद के लिए बनाई गई थी। इंटरनेट का उपयोग भी मनुष्य के लिए उपयोगी ही रहा है परंतु मनुष्य न जाने कब इंटरनेट के जाल में स्वयं ही फंस गया। क्या हम इस जाल से कभी मुक्त हो पाएंगे? यह एक चिंता का विषय है और उत्तर अभी हम शायद ना दे सके। किंतु यह बात वर्ल्ड विचारणीय है कि ‘ अति सर्वत्र वर्जनीय ‘ की उक्ति चरितार्थ है। सोशल मीडिया जैसे ब्लॉग्स, फेसबुक, इंस्टाग्राम , ट्विटर या अन्य मैसेंजर एप्स और समय बिताने वाले लोग सामान्य जीवन में काफी नीरस एवं अंतर्मुखी हो जाते हैं। यह एक करिश्माई योग भी है पलक झपकते ही हम विश्व के किसी भी कोने के व्यक्ति से जुड़ सकते हैं। वहां की जानकारियां प्राप्त कर सकते हैं। सोशल मीडिया का ही प्रभाव है कि बाह्य जिंदगी में 1000 लोगों से जुड़े व्यक्ति अक्सर अकेला बैठा पाया जाता है। बर्लिन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर लूस ब्रिंग ने अपने एक महत्वपूर्ण शोध में कहा है, ” समाज पर इंटरनेट की सूचना तंत्र का प्रभाव हर क्षण बढ़ता जा रहा है तथा इसके अच्छे तथा बुरे दोनों तरह के नतीजे दुनिया को चौकानेवाले नजर आ रहे हैं। इंटरनेट ने लोगों को अलग-थलग करना भी शुरू कर दिया है क्योंकि जो लोग इंटरनेट पर ज्यादा समय गुजारते हैं वह लोगों से रूबरू होने पर अपना समय तथा व्यक्तित्व धीरे-धीरे इंटरनेट में ही खोने लगते हैं।” 4 सोशल मीडिया पर अधिक वक्त गुजारने पर मनुष्य का धीमे-धीमे खत्म हो रहा है। जिन प्राकृतिक नजारों की फोटो को हम सोशल मीडिया पर पसंद करते हैं उन दृश्यों को अपने आसपास बनाने का हम 1% भी योगदान नहीं देते है। युवा पीढ़ी- सोशल मीडिया पर अपना समय सबसे ज्यादा बिताती है। यह एक नशे की तरह है। एक 2 वर्ष के बच्चे के हाथ में माता पिता अपना मोबाइल या टैब जब पकडाते हैं तब शायद यह वे लोग सोचते तक नहीं होंगे कि वे अपने बच्चे को ऐसा नशा दे रहे हैं जो उसके भविष्य को खतरे में डाल रहा है। सोशल मीडिया की वजह से बहुत से लोगों का टैलेंट उभर कर आता है। लोगों को अपनी प्रतिभा को दर्शाने के लिए एक ऐसा मंच प्राप्त हुआ है जो वह स्वयं चुनता है। प्रसिद्धि मुकाम को हासिल कर सकता है। ” इस वर्चुअल दुनिया की अफीम की तरह लत लगने के आसार भी दिखाई दे रहे हैं। यहां इस पीढ़ी को शारीरिक तौर पर कोई खतरा नहीं होता और नए होने की कोई संभावना भी है लेकिन मानसिक तौर पर विकलांग पर अब दिखाई दे रहा है। इससे निजात पाने का उपाय वर्चुअल दुनिया में मिलने के आसार भी कम होते हैं। इसलिए मानसिक आघात प्रत्याघाट से उभरने की उनकी क्षमता पर भी प्रश्नचिन्ह उपस्थित हो जाता है। ” 5 हमारे देश का भविष्य हमारी आने वाली पीढ़ी है। हम सब जानते हैं कि हमारी नई पीढ़ी अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए किस प्रकार की प्रयत्न कर रही है। आज हर बच्चे और युवा के हाथ में महंगी फोन उपलब्ध है। 2020 की कोरोना एक महामारी ने एक बहुत बड़ी क्रांति क्षेत्र में लाकर खड़ी कर दी। शिक्षण जगत को भी क्षेत्र से जोड़ दिया। जिन परिवारों की स्थिति सामान्य से भी कमजोर थी उन माता-पिता के द्वारा भी बच्चों के लिए स्मार्टफोन खरीदा या दिलाया गया है। बच्चे कुछ घंटों की पढ़ाई के बाद फोन को रखने की बजाय इस डिजिटल दुनिया में उड़ने लगे हैं। जिन्होंने अभी उड़ान सीखी है उन्हें डिजिटल दुनिया का आकाश अपनी और आकर्षित कर रहा है। भी अपने लक्ष्य से भटक रहे हैं। धीमे धीमे अध्ययन जो एक महत्वपूर्ण पहलू है एक बड़ा विद्यार्थी वर्ग उससे दूर हो रहा है। हमारी शैक्षणिक व्यवस्था से कमजोर हो सकती है। शिक्षा के क्षेत्र में पीछे हैं और सीधा सा अर्थ निकलता है कि देश का भविष्य सुरक्षित नहीं है। बच्चों की चीज को पाने की तलाश उन्हें निराश ना कर दे। उसे निराशा के बादल में स्वयं को अकेला न पाए इसका ध्यान माता पिता एवं परिवार को संपूर्ण रूप से रखना चाहिए। सोशल मीडिया के सकारात्मक पहलुओं के साथ-साथ इसके नकारात्मक पक्ष की भी हम चर्चा करेंगे। जिसे हम साइबर क्राइम कहते है। यह एक कंप्यूटर और नेटवर्क से जुड़ा अपराध है। कंप्यूटर की मदद से किया गया कोई भी गैरकानूनी गलत कार्य कंप्यूटर अपराध कहलाता है। साइबर अपराध के तहत किसी की निजी जानकारी को प्राप्त करके उसका गलत उपयोग करना साइबर क्राइम है। किसी की महत्वपूर्ण जानकारियों को चुरा लेना, उन्हें नष्ट करना, किसी तरह का फेरबदल करना, जानकारी को किसी के साथ साझा करना उन का गलत इस्तेमाल करना अपराध है। इसी तरह कंप्यूटर अपराध में किसी की गतिविधियों पर नजर रखना, हैकिंग , फिशिंग एवं वायरस का हमला करना होता है। साइबर क्राइम का जन्म कहीं से भी हुआ हो, परंतु इसका अंत किसी के पास नहीं है। आज युवा पीढ़ी इस बीमारी से ग्रसित हैं। स्वभाव में अहम का आना, स्वयं को श्रेष्ठ समझना, वाचिक स्वतंत्रता व्यक्ति को स्वच्छंद बना रही है। आज मीडिया एवं सरकार के सूत्र में साइबर आतंकवाद की वजह से होने वाला नुकसान गहरी चिंता का विषय बना है।” अपनी अवधारणाओं से परिवार, समाज और अंत में राष्ट्र का हित होना चाहिए इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं होता। समाज विघातक कृत्य, समाज में विभाजन करने वाली आतंकवादी अपने मंसूबों को अंजाम देते हैं, रेव पार्टियों का आयोजन किया जाता है। इसलिए साइबर क्राइम अब तेजी से बढ़ रहा है।” 6 आज भी कंप्यूटर पर नई नई खोज अविष्कार रुके नहीं है। युवा वर्ग, वैज्ञानिक नई नई खोजो से मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ बनाने का जहां भरसक प्रयत्न कर रहे हैं वही एक वर्ग धोखा – अपना लिंग परिवर्तन करके मनोरंजन करना, सेक्स के लिए खोली दुकान बन रहे हैं। “लड़कियां लड़कों के नाम से एवं लड़के लड़कियों के नाम से फेक अकाउंट खोलते हैं। इन फेक अकाउंट के माध्यम से धोखाधड़ी और बदनामी बढ़ रही है। नेट अब सेक्स की नुमाइश और ओपन शॉप बन गई है। इससे ही अनेक सामाजिक समस्याओं का निर्माण हो रहा है और गुनाहों को खाद पानी भी मिल रहा है। यहां तक कि जिसने नेट को जन्म दिया उनके हाथ में भी अब यह बात नहीं रही है और हम सब नेटीजंस के हाथों से इसके सूत्र कब से फिसल गए हैं इसका हमको पता भी नहीं चला। ” 7 सुबह उठकर प्रभु के दर्शन के स्थान पर आज की युवा पीढ़ी प्रथम दर्शन सोशल मीडिया का करना चाहती है। दिन भर में कितने लाइक्स मिले इसकी प्रतिस्पर्धा बड़ी ही जोर शोर से फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि सोशल मीडिया पर हर दिन चलती रहती है। कुछ समय पूर्व एक और चलन मीडिया पर आया था जिसमे लाइक्स कम मिलने पर बच्चों ने आत्म सम्मान पर इस बात को ले लिया एवं आत्म हत्या जैसा कदम वो उठाने लगे थे। एक लेखक के अनुसार,” जिज्ञासा और अभिव्यक्ति मनुष्य की जन्मजात प्रवृत्तियां है। इसलिए मनुष्य कोई भी नई बात जानने पर उसे दूसरों तक पहुंचाने के लिए सदैव अधीर रहता है। आजकल लोगों को सुबह उठते ही दो चीजों का ध्यान आता है सोशल साइट्स और चाय। अक्षय दिन की शुरुआत सोशल साइट्स को छूने से होती है। बहुत सारे माध्यम होने के बाद भी सोशल साइट का महत्व बढ़ना आश्चर्यजनक ही है। सोशल साइट्स खबर प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन है। इसे कहीं भी और कभी भी प्रयोग में लाया जा सकता है, इसलिए इसका महत्व कभी भी कम नहीं हो सकता। ” 8

तो हम कह सकते हैं कि अगर समय रहते हुए नई पीढ़ी को नहीं संभाला गया तो हम विनाश की लहरों में डूब ना जाए। देश को बाहरी परिजनों से जितना सुरक्षित रखना है उतना ही देश को आंतरिक रूप से मजबूत बनाना होगा। युवा वर्ग को इस अंतरजाल से मुक्त होना पड़ेगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह एक साधन है,यंत्र है। जितना सोशल मीडिया और साइबर क्राइम से बच्चों, युवाओं को दूर रखा जाए उतना ही देश मजबूत होगा। फोन का उपयोग मुफ्त के इंटरनेट ने बढ़ा दिया है। परंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मुफ्त में मिली वस्तुएं हमें नशा करा देती हैं और एक बार लत लगने पर उससे दूर होना बहुत मुश्किल है। अंतिम उल्लेख देना चाहूंगी शिक्षा विधिज्ञ शकील इंजीनियर अपनी पुस्तक मी एंड इंटरनेट वर्ल्ड में लिखते हैं कि, ” सोशल साइट्स या इंटरनेट यह एक गंदी नाली की तरह है हम अपनी सोच के अनुसार इस गंदी नाली से मनचाही हीरे चुने और गंदी वस्तुओं को छोड़ दें।” 9

हम अपनी सोच बदलें ताकि देश बदल सके। सोशल मीडिया युवाओं के लिए महत्वपूर्ण परिबल हो सकता है जरूरत है उसके महत्व को समझने की। इसके दोनों पहलुओं से बच्चों को, युवाओं को अवगत कराने की। हमें उन्हें समझाना होगा कि किस प्रकार से वे इसका सदुपयोग अपने समाज के, देश के विकास के लिए करे।

संदर्भ सूची –

  1. www.hindikiduniya.com
  2. रवींद्र प्रभात – जनसंदेश टाइम्स, 5 जनवरी 2014 , पृष्ठ संख्या – 1 ( पत्रिका – ए टू जेड लाइव) शीर्षक : आम आदमी की नई ताकत बना सोशल मीडिया,
  3. डॉ. विजय महादेव गाड़े – सोशल मीडिया – समसामयिक परिपेक्ष्य में , पृष्ठ संख्या – भूमिका से
  4. डॉ. कृष्ण कुमार रत्तू – नया मीडिया संसार – मीडिया क्रांति के नए संदर्भ – पृष्ठ संख्या – 118
  5. डॉ. विजय महादेव गाड़े – सोशल मीडिया – समसामयिक परिपेक्ष्य में , पृष्ठ संख्या – 21
  6. डॉ. विजय महादेव गाड़े – सोशल मीडिया – समसामयिक परिपेक्ष्य में , पृष्ठ संख्या – 22
  7. डॉ. विजय महादेव गाड़े – सोशल मीडिया – समसामयिक परिपेक्ष्य में , पृष्ठ संख्या – 22
  8. धीरज कुमार – बेनिफिट ऑफ सोशल साइट्स – पृष्ठ संख्या – 78
  9. दैनिक सकाल – 03/ 08/2016

शोधार्थी

विषय – हिंदी

हेमचंद्राचार्य उत्तर गुजरात यूनिवर्सिटी

पाटण ( गुजरात)

गुमनामी के अंधेरों में खोया सितारा : इंद्र बहादुर खरे-डॉ.नूतन पाण्डेय

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गुमनामी के अंधेरों में खोया सितारा : इंद्र बहादुर खरे

डॉ.नूतन पाण्डेय*

इंद्र बहादुर खरे हिंदी जगत की वे महान विभूति हैं,जिन्होंने भौतिक रूप से इस संसार में कुछ ही दिनों के लिए अवतरण लिया, लेकिन अल्प समय में ही वे साहित्य को इतना कुछ दे गए, जिसके लिए हिंदी साहित्य सदैव उनका ऋणी रहेगा। आयु की दृष्टि से रोबर्ट बर्न्स, बायरन ,कीट्स ,पुश्किन और रांगेय राघव आदि महान साहित्यकारों की परंपरा का अनुसरण करने वाले इंद्र बहादुर खरे को मात्र बत्तीस वर्ष की आयु (16/12/1922-13/04/1953) का वरदान मिला, लेकिन वीणापाणि माँ सरस्वती ने उनकी कलम को अपने आशीर्वाद से यथासंभव अभिसिंचित किया। अपनी लेखनी की अद्भुत प्रभावोत्पादकता के बल पर उन्होंने जो लिखा,जितना लिखा उसकी गुणवत्ता को साहित्य जगत द्वारा कतई नजरंदाज नहीं किया जा सकता। जीवन की अल्पावधि में ही इंद्र बहादुर खरे ने साहित्य की अनेक विधाओं में अपनी कलम चलाकर गंभीर साहित्य का सृजन किया लेकिन उनकी अधिकांश रचनाएं उनके जाने के बाद प्रकाशित हुईं । यह हिंदी साहित्य का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि उनके जीवनकाल में उनकी रचनाएं लोगों तक नहीं पहुँच सकीं लेकिन उनकी लेखनी में एक ऐसा जादू था, शिल्प का एक ऐसा चमत्कार था, भावों का एक ऐसा अपूर्व संयोजन था, पाठक जिसके वशीभूत हुए बिना नहीं रह सकते। इंद्र बहादुर खरे के साहित्यिक प्रदेय की बात करें तो मूलरूप से वे कवि के रूप में चर्चित रहे। भोर के गीत,सुरबाला,सिंदूरी किरण ,विजन के फूल,रजनी के पल (गद्य कविता), हेमू कालानी, नीड़ के तिनके और आंबेडकर एक नई किरण कविता संग्रहों में समय-समय पर लिखी गई उनकी कविताएँ प्रकाशित हुई हैं। उनके गीतों की संख्या लगभग पांच सौ के ऊपर पहुँचती है, जिनमें राष्ट्रपरक गीतों के साथ ही बालगीतों की भी बहुलता है। अपने देशभक्तिपरक गीतों के माध्यम से इंद्र बहादुर खरे ने अपने प्रशंसकों के मध्य एक विशिष्ट स्थान बनाया। कविताओं के अतिरिक्त उन्होंने गद्य की अनेक विधाओं ,जैसे –कहानी,उपन्यास और अनेक विषयों पर आलेख भी लिखे । आरती के दीप,सपनों की नगरी,आजादी के पहले आजादी के बाद और जीवन पथ के राही उनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं जिनमें समाज के गंभीर विषयों को वर्ण्य विषय बनाया है । कश्मीर,जीवन पथ के राही, मेरे जीवन नहीं और लख होली आदि उपन्यासों ने इंद्र बहादुर खरे को एक पुख्ता आधार-स्तंभ प्रदान किया जिससे उनको बहुमुखी साहित्यकार के रूप में स्थान बनाने में सहायता मिली। साहित्य सृजन के अतिरिक्त अन्य विविध साहित्यिक गतिविधियों से भी उनकी आजीवन सक्रिय रूप से संलग्नता बनी रही। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनकी विशिष्ट रुचि थी। अपनी इसी रुचि के कारण उन्होंने समय-समय पर अनेक पत्रिकाओं का संपादन कार्य किया,जिनमें ख्यातिलब्ध साहित्यकार रामकुमार वर्मा के साथ “प्रकाश” पत्रिका, हरिशंकर परसाईं के साथ “हरिंद्र” पत्रिका और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के साथ “युगारंभ” पत्रिका का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है ।

इंद्र बहादुर खरे को मूलतः उनके गीतों के लिए स्मरण किया जाता है । गीत लिखना शायद उनके ह्रदय के सर्वाधिक नजदीक और सबसे प्रिय कर्म था । वे कविता लिखना अपने जीवन का आधार मानते थे जिसके बिना उनका जीवन अपूर्ण था, तभी वह कविता लिखने के क्षण को अपने जीवन की सबसे सुखद अनुभूति मानकर कहा करते थे -“जिस दिन मेरे मन के अंतस में गीत की कली खिलती है,उस दिन ऐसा लगता है मानो जिन्दगी के दिगंत व्यापी रेगिस्तान में बाढ़ आ गई हो । जन्म- जन्म की प्यासी आँखों में जैसे कोई शीतल मीठा स्वप्न विहंस गया हो । कविता मेरे जीवन के समस्त अभावों की पूर्ति है। कविता में ही मुझे आनंद की चिरशांति के दर्शन होते हैं ।”

“भोर का गीत” इंद्र बहादुर खरे की प्रसिद्ध और सर्वाधिक लोकप्रिय कृति कही जा सकती है,जिसमें संकलित गीतों को उन्होंने सन 1939-42 के मध्य अर्थात सत्रह से बीस वर्ष की आयु में लिखा था । गीत लिखना उनकी सहजात और स्वाभाविक प्रवृत्ति रही है जो स्थाई भाव होकर उनके ह्रदय के अंतस्थल में विराजती थी, और स्वतः ही गीतों के रूप में फूट पड़ती थी । गीत लिखने का यह उद्वेग कब और कैसे प्रवाहित हो जाता था इससे वे बिलकुल अनजान होकर कहते हैं कि-“ कह नहीं सकता कि मैंने कब से गीत लिखना प्रारंभ किया ।प्रेरणा की एक निश्चित तिथि नहीं।डाली पर खिलने वाला फूल जैसे अपनी मधु , अपनी आभा,अपनी खुशबू की परिभाषा नहीं कर सकता, अपनी नाभि में बसी कस्तूरी की खुशबू को मस्त मृग जैसे अपने को मालिक नहीं मान सकता वैसे ही मैं भी नहीं जानता कि मेरे गीतों के फूलों ने कब खिलना सीख लिया ।”

इंद्र बहादुर खरे प्रकृति सौंदर्य के अनुपम पुजारी थे । उनके गीतों में प्रकृति के कण-कण की सुखद अनुभूति व्याप्त है और ये अनुभूति मात्र भौतिक और बाह्य नहीं है बल्कि उसका एक आभ्यंतरिक दृष्टिकोण भी है जो उन्हें छायावादी कवियों के समकक्ष ला खडा करता है । प्रकृति का मौन निमंत्रण उन्हें न केवल परमात्मा के और निकट ले जाता है बल्कि उसके निस्सीम सौंदर्य के साक्षात् दर्शन भी कराता है जो अन्यत्र दुर्लभ है । सृष्टि के सौंदर्य की रहस्यमय अभिव्यक्ति इंद्रबहादुर खरे के गीतों का वह ख़ूबसूरत पक्ष है जो दैहिक होने के बावजूद देहातीत है,लौकिक होने पर भी परलौकिक है और भौतिक होने पर भी अध्यात्म की ओर प्रवृत्त है । तभी तो कवि यह स्वीकार करता है कि-“ मेरे गीतों की भूमि बिलकुल पार्थिव है ,आध्यात्मिक नहीं है। धरती पर नर-नारी ,फूल –पौधे,नदी-तालाब,पर्वत-घाटी के रूप में जो राशि-राशि सौंदर्य बिखरा पडा है मैं उसी का पुजारी हूँ । रूप की प्रस्तुति मुझे प्रिय है । यह सौंदर्य ही मेरी आत्मा का रस है – मेरे गीतों की पार्श्वभूमि है । उपर्युक्त स्वीकरण के बावजूद वह इस वास्तविकता को अस्वीकृत नहीं कर पाता कि-“ भावों के अभिव्यक्तिकरण में मैंने सदा बौद्धिक पीठिका का सहारा लिया है । इसमें यह भ्रम न हो कि मैं बुद्धि और हृदय को एक मानता हूँ । मेरा तात्पर्य यह है कि ह्रदय की बातें जब एक भोली गंभीरता के साथ,जब अज्ञान बनकर भी अपने समस्त ज्ञान के साथ व्यक्त की जाती हैं तब मुझे अभिव्यक्तिकरण में सुखद तृप्ति का अनुभव होता है । कवि जब तक जीवन के समस्त व्यापारों के प्रति दार्शनिक दृष्टिकोण को प्रश्रय नहीं देता ,उसकी सारे बातें बच्चों के सामान चंचल और सारहीन होती हैं,भले ही उनमें थोड़ी देर को श्रोता को लुभाने की शक्ति हो । दार्शनिक दृष्टिकोण को मैंने सदैव महत्त्व दिया है । ” अपने इसी अध्यात्मिक दृष्टिकोण के कारण कवि ह्रदय का प्रकृति के रहस्यमय स्वरूप की ओर आकर्षित होना अत्यंत स्वाभाविक है जिससे प्रभावित होकर वे सहसा गा उठते हैं :

तुमसे क्या पहचान बढाऊँ

तुम रहस्य हो, मैं जिज्ञासा

युग-युग डूबूं, थाह न पाऊँ

जीवन के विविध भावों को ग्रहण करने के लिए जिस प्रकार की सूक्ष्म निरीक्षण दृष्टि एक कवि में अपेक्षित होती है और उन भावों को गहनता से शब्दों में उतारने के लिए भाषा और छंद को अनूठे ढंग से संयोजित करने की जैसी क्षमता एक कुशल कवि में होनी चाहिए, उस सन्दर्भ में इंद्रबहादुर खरे की लेखनी निश्चित ही धनी मानी जाएगी । छंद्बधता और लयात्मकता की जुगलबंदी इनके गीतों को अपूर्व गेयता प्रदान करती है और इस जुगलबंदी के पीछे उनकी दीर्घ स्वर साधना और शिल्प पर उनका पूर्णाधिकार है । इंद्र बहादुर खरे ने अपने गीतों में अनेक प्रयोग किये जिनका प्रभाव उनके पूर्ववर्ती कवियों पर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है । इंद्र बहादुर खरे के गीतों में आशा और उत्साह की खनक है,प्रेरणा की लहराती हिलोरें हैं ,संसार में बिखरे सौंदर्य के प्रति रागभाव है ,परमात्मा के प्रति समर्पण के लिए निष्ठा है, सांसारिक जगत के प्रति सहज मानवीय संवेदना है और इन सबके साथ ही इस जीवन पर अगाध विश्वास भी है । तभी तो जीवन के अंतिम समय में असाध्य बीमारी से जूझने के बावजूद उनमें जीवन-सौंदर्य की अदम्य अभिलाषा और जीने की भरपूर इच्छा है :

सच मानो संसार बहुत ही है प्यारा,

अब लाख बुलाये मृत्यु ,मैं न जाउंगा

गीतकार होने के साथ ही इंद्र बहादुर खरे ने गद्य विधा में भी अपनी कलम चलाई है।उनके कई कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं जिनकी कहानियाँ कलात्मकता सौदर्य और भावबोध की दृष्टि से बेहतरीन मानी जाती हैं, बावजूद इसके वे खुद को कहानीकार के रूप में नहीं देखते और बड़ी विनम्रता से स्वीकारते हैं कि वे न तो जन्मजात कहानी लेखक हैं और न ही उन्हें ऐसा वातावरण मिला कि कहानीकार के साँचें में खुद को ढाल सकते । लेकिन जिसने भी उनकी कहानियों को पढ़ा है ,वह इस बात से इत्तेफाक रखता है कि उनकी कहानियाँ जीवन के बहुत करीब हैं, जो अपने भावबोध द्वारा समाज को व्यापक रूप से चित्रित करती हैं, उसकी समस्याओं को उठाती हैं, उन्हें अभिव्यक्ति देती हैं और इसी कारण आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं,जितनी उस समय थीं जब वे लिखी गई थीं । इस सन्दर्भ में मैं यहाँ उनकी एक कहानी का विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूंगी, जिसका शीर्षक है ‘जीवन पथ के राही’। अपनी इस कहानी के बारे में इंद्र बहादुर जी के महत्वपूर्ण विचार उल्लेख्य हैं,जहाँ वे कहते हैं कि-“ यह जीवन के पथ की कहानी है, ऐसी कहानियाँ जीवन का सत्य बन जाती हैं जो दुनिया के हर साधारण मनुष्य का हाथ पकड़ उसी की कहानी बन जाती हैं –और हर मनुष्य की कहानी आलेख्य नहीं-इसीलिए विश्वास नहीं होता ।”

इस कहानी में भारतीय समाज में स्त्री की शोचनीय स्थिति का चित्रण करते हुए स्त्री विमर्श के नए रास्ते खोले हैं । हमारे समाज में यह स्त्री की दुर्नियति ही कही जाएगी कि जीवन की प्रत्येक अवस्था में उसे समाज के ठेकेदारों द्वारा विविध प्रकार के शोषणों का सामना करना पड़ता है । प्रस्तुत कहानी भी फूलो नामक एक लडकी की कहानी है ,जब वो बहु बनकर सोना लोधी के घर जाती है तो उसे सर आँखों पर रखा जाता है ,लेकिन दुर्भाग्यवश उसके पति की असमय मृत्यु से उसके भाग्य पर ताले ला जाते हैं और उसे ससुराल में “एक जवान लड़के को चाट जाने” के अपराध में दिन – रात अपमान सहना पड़ता है । अकेले जीवन काटती फूलो के जीवन में अचानक उसी गाँव का नंदन नामक एक आधुनिक विचारों वाला युवक प्रवेश करता है । नन्दन के मन में उसके प्रति प्रेम का भाव उपजता है, गाँव वालों से यह सहन नहीं होता और उबके द्वारा प्रताड़ित किये जाने पर वह गाँव छोड़कर चली जाती है । लेकी दुर्भाग्य उसका पीछा नहीं छोड़ता और वह वैश्यवृत्ति करने वाली एक महिला के फ़ंदे चढ़ जाती है,लेकिन फूलो की निश्छलता देखकर वह उसे अपनी बेटी मान लेती है । भाग्य उसे एक बार फिर नंदन के सामने लाकर खड़ा कर देता है और नन्दन उसके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखता है । नंदन के पिता जो गांव के ठाकुर हैं वे भी इस विवाह के लिए अपनी रजामंदी दे देते हैं । फूलो की कहानी सुखद मोड़ की ओर जाती लगती है,लेकिन नंदन जब फूलो ,अपने प्रथम प्यार के चिह्नों को देखने आम के पेड़ के नीचे जाकर देखता है तो पाटा है कि फूलो ने प्राण त्याग दिए थे,न जाने क्यों? लोगों का कहना था कि शाम को घर लौटे हुए किआनों,चरवाहों ने उसे देखा और जैसे-तैसे कटने वाले गाँव के कलंक को पुनः गाँव में घुसते जान उसका अंत कर दिया । कहानी के अंत में कहानीकार का कथन जहाँ ह्रदय विदारक और दिल को छूने वाला है वहीँ समाज पर एक तमाचा है, एक कडा प्रहार है, जिसे सहना तथाकथित सभ्य समाज के लिए आसान नहीं होगा– नन्दन अब रूपपुर का जमींदार है उसने फूलो की समाधि बनवा दी है । समाधि का ऊपरी हिस्सा सदा ही फटा रहता ही। लोगों का कहना है कि फूलो की आत्मा रोती है,इसलिए वह समाधि फट जाती है । नंदन रोज सुबह शाम उसकी पूजा करता है और गाँव वाले जमींदार की बात नहीं टालते : वे भी उसे “प्रेम की देवी” मानकर उस पर फूल चढाते हैं । वे ‘पुन्य’ लूटने से भला क्यों बचें ? कितना क्रूर और कटु सत्य है यह हमारे दोहरे आवरण वाले समाज का जिसका इंद्र बहादुर इस कहानी में पर्दाफ़ाश करते हैं । वही समाज जो उसे चैन से जीने नहीं देता, उस पर तरह-तरह के लांछन लगाकर उसका अपमान करता है,वही उसकी जान लेने के पश्चात् उसे देवी का तमगा दे देता है । इंद्र बहादुर समाज की इस कठोर विसंगति पर अट्टहास करते हैं,व्यंग्य करते हैं साथ ही उस पर अपनी पीड़ा भी व्यक्त करते हैं । इन सबके साथ ही वे समाज की व्यवस्था और कुरीति पर अनेक प्रश्न भी खड़े करते हैं जिसमें स्त्री की समाज में असुरक्षा,विवाह के बाद के नारकीय जीवन ,अपने भविष्य के लिए स्वतंत्र निर्णय लेने की असमर्थता ,घर-बाहर हर जगह शारीरिक-मानसिक शोषण और समाज का उसके प्रति असमानता और दोयम दर्जे का अमानवीय व्यवहार आदि मुद्दों का समावेश हो जाता है । कहानी सोचने पर विवश करती है कि समय के परिवर्तन के साथ क्या स्त्री के प्रति समाज के रवैये में सकारात्मक परिवर्तन आया है या फिर स्थितियां अभी भी जस की तस बनी हुई हैं ।

जीवन-पथ के राही कहानी के समान ही इंद्र बहादुर खरे की अन्य सभी कहानियाँ जीवन के अनेक मूल्यवान अनुभवों से परिपूर्ण हैं जिनमें समाज की विसंगतियों,जीवन मूल्यों , प्रेमपरक आदर्शों और स्त्री उत्थान से संबंधित विभिन्न मुद्दों को उठाया गया है । इंद्र बहादुर खरे की कहानियाँ समाज के लिए महत्वपूर्ण सन्देश लेकर चलती हैं और एक स्वस्थ सोच युक्त समाज निर्माण की कामना रखती हैं । उनकी कहानियों में सत्यता के साथ कल्पना का,जग के साथ ह्रदय का मेल है और इनके लिए वे पाठकों से भी अपेक्षा रखते हैं कि -“न तो इनमें कोई दर्शन की खोज करे, न शाश्वत चिंतन की आशा और न विश्व को खुली आँखों से देखने की चेष्टा, केवल कहानी के ही निकटस्थ आकर इन्हें समझे और सोचे कि कहाँ तक बात ठीक है और कहाँ तक बालकों की बातों सी नादान है ।”

इस प्रकार कह सकते हैं कि इंद्र बहादुर खरे ने साहित्य जगत को जितना दिया, निश्चित ही उसका मूल्यांकन करना अभी शेष है । यह हमारे समाज का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इंद्र बहादुर खरे जैसे साहित्य को समर्पित अनेक निस्वार्थ साधक ऐसे हैं जिन्हें जीवित रहते वह मान- सम्मान नहीं मिल पाता, जिसके वे अधिकारी हैं । यहाँ तक कि उनकी साधना, उनकी कृतियों का भी परिस्थितिवश संतोषजनक और सम्यक मूल्यांकन नहीं हो पाता । यह संतोष की बात है कि खरे जी के परिवार के प्रयत्नों से पिछले कुछ समय से मध्यप्रदेश और विभिन्न राज्यों के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में उनकी कृतियों को शामिल किया गया है और विद्यार्थियों द्वारा उनके साहित्य पर शोध कार्य भी किए जा रहे हैं । देश के प्रकाशन के क्षेत्र में अग्रणी वाणी प्रकाशन,दिल्ली द्वारा उनकी कई किताबों का प्रकाशन भी किया गया है ।

एक साहित्य साधक को क्या चाहिए, बस पाठकों तक उसके लेखन की पहुँच ,साहित्य जगत में उसकी एक निश्चित पहचान और उसकी रचनाओं को साहित्यिक जगत की स्वीकृति । लेकिन कई बार साहित्य जगत इन विभूतियों को जीते जी पहचान नहीं पाता जिस कारण वह इन विराट व्यक्तित्वों की छाँव से वंचित रह जाता है । लेकिन निश्चित ही यह सभी हिंदी प्रेमियों के लिए संतोषजनक है कि इंद्र बहादुर जी के परिवारीजनों के व्यक्तिगत प्रयत्नों से आज उनकी रचनाएं प्रकाशित होकर साहित्य प्रेमियों तक पहुँच रही हैं और डॉ.खरे अपनी रचनाओं के माध्यम से हमारे आसपास हैं, हमारे भीतर पुनर्जीवित हो रहे हैं ।लेखक की असली पूंजी,असली धरोहर उसकी रचनाएं ही होती हैं, जिनसे वह अपने पाठकों तक पहुँचता है । सरकार और संस्थाओं का यह कर्तव्य है कि वे इस दिशा में आगे आयें और इस तरह की योजनाएं अमल में लायें जिसके माध्यम से डॉ. खरे और उन जैसे साहित्य सेवकों का लेखन व्यर्थ न जाए और उनके साहित्य की सार्थकता अनंत काल तक बनी रहे।

*सहायक निदेशक,केंद्रीय हिंदी निदेशालय

शिक्षा मंत्रालय,भारत सरकार

ई-मेल-pandeynutan91 @gmail.com

‘वैकल्पिक विकास में जैविक कृषि की भूमिका’-आशीष कुमार

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‘वैकल्पिक विकास में जैविक कृषि की भूमिका’

*आशीष कुमार

सारांश

संसाधनों के उपयोग द्वारा आजीविका की आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही विकास होता है। समाज में व्याप्त बेरोजगारी और पलायन की समस्या के समाधान की आज आवश्यकता है। भारतीय कृषि पद्धति में सदैव ही जल, जंगल, जमीन पर महत्व दिया गया है। वैकल्पिक विकास में जैविक कृषि के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। जिस प्रकार से जैविक कृषि में रोजगार के नए-नए सृजन हो रहे है। जैविक कृषि में लागत कम तथा उत्पादन अधिक प्राप्त होता है। उत्पादों में गुणवत्ता अधिक होने कारण अनेक प्रकार की बीमारियों से बचाव होता है। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। पिछले कुछ वर्षों में तो जैविक कृषि क्षेत्र में लगातार बढ़ोत्तरी भी दर्ज की गई है। यही स्थिति रही तो आने वाले समय में जैविक कृषि रोजगार का महत्वपूर्ण साधन होगी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि जैविक कृषि की वैकल्पिक विकास में अहम भूमिका होती है।

की-वर्ड : जैविक कृषि, बाजार, वैकल्पिक विकास, कृषि क्षेत्र।

भूमिका

भारत कृषि प्रधान व ग्राम्य प्रधान देश है। इसकी आत्मा गांवों में बसती है। और गांव का विकास कृषि पर निर्भर रहता है। भारत देश की लगभग 70% जनसंख्या गांवों में निवास करती है। (2011 की जनगणना के अनुसार) हालांकि इस आंकड़े में वर्तमान में कुछ कमी आई है इसका कारण है तेजी से हो रहा शहरीकरण। इसके बावजूद देश का समुचित विकास बिना कृषि के संभव नहीं है। कृषि को बेहतर और वैकल्पिक विकास में सहायक हो इसके लिए एक सुनियोजित कृषि पद्धति की आवश्यकता है। जैविक कृषि ऐसी पद्धति है जिसमें समग्र लाभ (कृषकों की दृष्टि से, पर्यावरण की दृष्टि से, मृदा की दृष्टि से, मानव की दृष्टि से) अर्जित हो जाते हैं। जैविक कृषि पद्धति से कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। जैविक उत्पादों की बाजार में मांग अधिक होती है, जैविक उत्पादों की कीमत रासायनिक उत्पादों की अपेक्षा अधिक प्राप्त होती है। जब कृषि में उत्पादन अच्छा प्राप्त होता है, तथा कीमत अधिक मिलती है तो किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। जिससे किसी भी देश के विकास में गति प्रदान होती है। स्वास्थ्य लाभ के साथ जैविक कृषि में कम लागत आती है। कम लागत और अधिक उत्पादन से किसान समृद्ध होता है तो गांव का विकास होता है। इस प्रकार गांव के विकास से देश के वैकल्पिक विकास में सहायता प्राप्त होती है। अतः किसी भी देश के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए सबसे पहले गांव और गांव के किसानों को विकसित करने की आवश्यकता होती है। क्योंकि गांव का विकास ही देश के वास्तविक विकास को प्रदर्शित करता है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का प्रमुख साधन कृषि है, इसके बारे में महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि “भारत की वास्तविक प्रगति का तात्पर्य शहरी औद्योगिकरण केंद्रों के विकास से नहीं, बल्कि गांवों के विकास से है।”

“मिट्टी की जुताई करने वाले ही अधिकार के साथ जीते हैं, शृंखला के शेष लोग उनके आश्रय की रोटी खाते हैं”। (थिरूवलूवर)

वैकल्पिक विकास की आवश्यकता

सतत विकास “वह विकास है जो भविष्य की आने वाली पीढ़ियों की क्षमताओं और बेहत्तरी से समझौता किए बिना वर्तमान समय की आवश्यकता को आसानी से पूरा किया जा सके, दूसरे शब्दों में कहा जाए एक ऐसा आर्थिक विकास जिसमें हमारे प्राकृतिक संसाधनों को किसी प्रकार की हानि न पहुंचाई जाए या प्राकृतिक संसाधनों के बर्बाद होने की गुंजाइश ना के बराबर हो”।

किसी भी देश के सतत विकास के लिए या वैकल्पिक विकास के लिए ग्रामीण विकास सबसे अनिवार्य होता है। ग्रामीण विकास की आवश्यकता इसलिए महसूस की गई क्योंकि भारत की ज्यादातर जनसंख्या गांवों में निवास करती है। इसलिए ऐसे विकल्पों की आवश्यकता थी जिससे ग्रामीण लोग समाज के साथ सामंजस्य बिठा सके। भारत जैसे देश में समतामूलक समाज की अवधारणा का विकास हो सकता है। एक तरफ जहां गांव में निवास करने वाले लोगों की खुशहाली एवं विकास जरूरी है वही प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग एवं संरक्षण भी बहुत आवश्यक है।

गांधी जी जब भी विकास की बात करते हैं उनकी बातों के केंद्र में हमेशा गांव रहा है गांव के विकास व गांव के पुनर्निर्माण की बात को मुख्य मुद्दा मानते थे गांधीजी भी मानते थे कि गांव के विकास के बिना भारत देश का विकास संभव नहीं है इसलिए गांधीजी आदर्श गांव की मांग करते हैं और भारत के हर गांव को आदर्श ग्राम बनाने की अपनी मंशा भी जाहिर करते हैं। हरिजन सेवक में 1926 में वह इसको लेकर लिखते हैं “ग्रामीणों श्रम के इस प्रकार उठ जाने से ग्रामवासी कंगाल हो रहे हैं और अमीर लोग अमीर हो रहे हैं अगर यह क्रम ऐसे ही चलता रहा तो किसी प्रत्यय के बगैर ही गांवों का नाश हो जायेगा।”

प्राचीन काल से ही भारत कृषि प्रधान देश रहा है और यहां के लोग सदैव प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहते आए हैं। भारत में आज भी प्रकृति की पूजा का विधान है जिसका जिक्र वेद पुराणों के साथ-साथ अनेक रचनाओं में भी किया गया, परंतु जिस प्रकार से पिछले कुछ दशकों में प्रकृति के साथ लूट मचा रखी गई है और सतत विकास के महत्व को बिल्कुल ही नकार दिया गया है, मौजूदा पीढ़ी सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों की रखवाली है और यह उसकी जिम्मेदारी भी है कि वह आने वाली पीढ़ी को बिना किसी प्रकार के हानि पहुंचाए यह प्राकृतिक संपदा अगली पीढ़ी को सौंपे और देश को एक बेहतर भविष्य प्रदान करें इस जिम्मेदारी को हम सबको मिलकर उठाना होगा और एक संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा।

सच्चिदानंद सिन्हा के अनुसार- “वैकल्पिक विकास के मॉडल की बात करना आज उसी तरह अर्थहीन है जैसे कभी यूटोपिया की बात करना समाजवादी आंदोलन के प्रारंभिक काल में था। कोई भी व्यवस्था सामने की हकीकत के संदर्भ में ही बनती है बनी बनाई कल्पना के अनुरूप नहीं”।

जैविक खेती एवं वैकल्पिक विकास

इसमें किसी भी भारतवासी को संदेह नहीं होना चाहिए कि भारत देश के विकास के लिए ग्रामीण विकास और कृषि विकास सबसे आवश्यक है। इसका प्रमुख कारण है भारत एक कृषि प्रधान व ग्राम प्रधान देश है। यहाँ लोगों की आजीविका का साधन मुख्य रूप से कृषि है। अतः ग्रामवासी जैविक कृषि को अपनाकर बहुत सी समस्याओं का सामना उचित प्रकार से कर सकते है। जनसंख्या में लगातार जिस प्रकार से बढ़ोतरी हो रही है। उससे जैविक कृषि पद्धति में खाद्यान्न समस्या का सामना करना पड़ सकता है ऐसा अनुमान बहुत से समाज शास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों का है। जबकि यह एक भ्रम के शिवाय कुछ नहीं है। साथ ही अक्सर यह भी सुना जाता है कि जैविक कृषि कम उत्पादन देती है, लागत अधिक आती है। जबकि जैविक कृषि खाद्य समस्या से जुड़ी प्रत्येक समस्या का एक बेहतर विकल्प है। जैविक कृषि से जलवायु परिवर्तन में स्थिरता प्राप्त होती है। जैविक कृषि पानी की कमी को दूर करती है, मृदा की जल धारण क्षमता का विकास करती है, किसानों की गरीबी और कुपोषण जैसी समस्याओं का समाधान करती है। अतः जैविक कृषि से संबंधित पहलुओं और मिथकों पर विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता है। यह एक बेहतर विकल्प साबित हो सकती है वैकल्पिक विकास में। आवश्यकता है इसे सुनियोजित तरीके से अपनाने की।

जैविक खेती का परिदृश्य

आज विश्व के लगभग 181 देशों में 698 लाख हेक्टेयर भूमि पर जैविक खेती की जा रही है। पूरे विश्व में जैविक कृषि किसानों की संख्या 30 लाख के आसपास है। अगर भारत देश में जैविक कृषि के विस्तार की बात की जाए तो बीते कुछ वर्षों में बहुत तेजी से हुआ है। वर्ष 2017-18 में लगभग 36 लाख हेक्टेयर में प्रमाणित जैविक कृषि क्षेत्र था। 2017-18 में 17 लाख टन जैविक उत्पादों का उत्पादन किया गया। इस उत्पादन के मुख्य सहयोगी राज्य रहे, सिक्किम, असम, मध्य प्रदेश, केरल, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक आदि राज्य थे। वर्तमान में भारत से जैविक उत्पादों का निर्यात भी किया जा रहा है। इससे निश्चित तौर पर वैकल्पिक विकास में सहायता प्राप्त होगी और भविष्य में जैविक कृषि क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा।

इस सत्य से नकारा नहीं जा सकता है कि विश्व को जैविक कृषि भारत की देन है और जब भी जैविक कृषि का इतिहास टटोला जाएगा तो भारत और चीन ही इसके केंद में आएंगे। भारत और चीन की कृषि परंपरा 4000-5000 वर्ष पुरानी है। इस कारण यहां के किसानों का ज्ञान भी लगभग 5000 वर्ष पुराना है। जब से कृषि का आरंभ हुआ है तभी से भारत में खेती का स्वरूप मानव स्वास्थ्य के अनुकूल तथा प्राकृतिक वातावरण के लिए हितकारी हो इसका विशेष ध्यान रखा गया है। जब इन सभी विषयों पर ध्यान रखकर कृषि की जाती है तो जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान निरंतर चक्र चलता रहता है। जिसके कारण जल, मृदा, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता है।

भारतीय कृषि के इतिहास को देखने से पता चलता है कि यहाँ कृषि के साथ-साथ गोपालन भी किया जाता था जिसके प्रमाण हमारे धर्म ग्रंथों से प्राप्त होते हैं। महाभारत में वर्णित श्री कृष्ण और बलराम जिन्हें गोपाल वह हलधर के नाम से संबोधित किया जाता है। परंतु जैसे-जैसे कृषि का परिवेश बदलता गया वैसे-वैसे गोपालन भी कम होता गया तथा रासायनिक खादों और जहरीले कीटनाशकों के प्रयोग को महत्व बढ़ गया। जिसके कारण संपूर्ण विश्व के जैविक और अजैविक पदार्थों का संतुलन बिगड़ता गया। इसके परिणाम वर्तमान में सभी के सम्मुख हैं।

भारत में जैविक कृषि से रोजगार की संभावनाएं

आज भले ही देश के सीमित कृषि क्षेत्र में जैविक खेती की जा रही हो। परंतु यह संभव है कि आने वाले कुछ वर्षों में देश की कृषि योग्य मृदा पूर्ण रुप से जैविक कृषि में परिवर्तित हो जाए। क्योंकि खाद्य सुरक्षा की निरंतरता बनाए रखने के लिए परंपरागत कृषि पद्धति भी आवश्यक है। आज कुछ खास क्षेत्रों में ही जैविक कृषि की जा रही है। लेकिन समय के साथ इसको बढ़ावा मिलेगा। जैविक कृषि का यही बढ़ावा एक तरह के रोजगार का अवसर उत्पन्न करता है। आने वाले समय में जैविक कृषि से संबन्धित रोजगार के अवसर कुछ इस प्रकार होंगे-

  • जिस प्रकार से जैविक कृषि को विश्व भर में बढ़ावा मिल रहा है उसके अनुसार बीजों की उपलब्धता में कमी है। इसलिए किसान बीजों का उत्पादन कर अच्छी कीमत पर बेच सकते हैं। इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी साथ ही रोजगार की भी प्राप्ति होगी। जिससे रोजगार के और नए अवसर उत्पन्न होंगे।
  • जैविक रेस्टोरेंटस खोलना, जैविक कृषक पाठशाला चलाना आदि।
  • जैविक फार्म तथा प्राकृतिक रूप से रखरखाव के स्थानों पर इको भ्रमण में लोगों की रुचि बढ़ रही है जहां लोग जैविक खाद्य पदार्थ आदि व्यवस्थाओं को पसंद करते हैं। भारत में जैविक कृषि फार्म भ्रमण का प्रचलन बढ़ रहा है।
  • जैविक कृषि संबंधी समझ विकसित करने के लिए विशेष कौशल विकास केंद्र खोले जा सकते हैं।
  • जैविक कृषि में बाजार अनुसंधान, उपभोक्ता सर्वे, प्रीमियम मूल्य, सरकारी प्रोत्साहन कार्यक्रम आदि कि सूचना कृषकों तक जल्दी पहुंचाने के लिए विशेषज्ञ सेवाओं की जरूरत है। इच्छुक एवं निपुण व्यक्तियों के लिए यह एक नया एवं अच्छा व्यवसाय हो सकता है।
  • जैविक दूध संबंधी उत्पादों के क्षेत्र में व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से रोजगार के नए अवसर उत्पन्न किए जा सकते हैं।
  • जैविक कृषि की अच्छी समझ रखने वाला व्यक्ति या संगठन एपीडा से प्रशिक्षण प्राप्त कर जैविक कृषि क्षेत्र में सेवादाता का कार्य कर सकते हैं।
  • जैविक रूप से उत्पादित वस्तुओं के प्रमाणीकरण में भी अनेक व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त होगा।
  • जैविक कृषि में फसल चक्र को अपनाया जाता है इससे कृषि क्षेत्र में वर्ष भर रोजगार के अवसर बने रहते हैं।
  • ग्रामीणों को जैविक कृषि पद्धति के उपयुक्त प्रशिक्षण दिए जाएं जिससे उनके कौशल का विकास हो। तथा बाद में इसी कौशल से किसान रोजगार के नए अवसरों का सृजन कर सकें।
  • जैविक कृषि में अनेक प्रकार की जैविक खादों का प्रयोग होता है, इन खादों के उत्पादन कार्यों से रोजगार के अनेक नए सृजन होते हैं।

जैविक कृषि के उत्पादों की गुणवत्ता

यह तो सर्वविदित सत्य है की जैविक कृषि उत्पादों की गुणवत्ता रासायनिक कृषि उत्पादों की गुणवत्ता से अधिक होती है। अनेक अनुसंधान से भी यह सिद्ध हो गया है। जैविक कृषि से उत्पादित उत्पादों में शुद्ध पदार्थ, खनिज और ऑक्सीकारक विरोधी तत्व पाए जाते हैं। जो मानव स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में सहायक सिद्ध होते हैं। जैविक कृषि उत्पादित वस्तुओं में अम्लीय तत्व कम मात्रा में प्राप्त होते हैं, नाइट्रेड की मात्रा रासायनिक कृषि की अपेक्षा जैविक कृषि में 50% कम होती है जो मानव और पशु-पक्षियों के स्वास्थ्य के लिए हितकारी होती है। जैविक रूप से उत्पादित उत्पादों में स्वाद अधिक होता है। इस प्रकार यह प्रमाणित हो चुका है कि जैविक कृषि उत्पाद रासायनिक कृषि उत्पाद से बेहतर और लाभकारी है।

निष्कर्ष-

भारत प्राचीन काल से कृषि प्रधान देश रहा है, यहाँ पर परंपरागत कृषि या जैविक कृषि प्रारम्भ से होती आ रही है। वर्तमान समय में जैविक कृषि वैकल्पिक विकास में अहम भूमिका का निर्वहन कर रही है, जहां एक तरफ जैविक कृषि के माध्यम से नए-नए रोजगार का सृजन हो रहा है, वहीं जैविक कृषि से उत्पादित उत्पादों की गुणवत्ता रासायनिक कृषि की अपेक्षा श्रेष्ठ होती है। जिससे मानव, पर्यावरण और मृदा स्वास्थ्य के लिए बेहतर है। जब सभी क्षेत्रों में उचित वृद्धि होती है तो वैकल्पिक विकास को एक प्रकार की गति प्राप्त होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जैविक कृषि वैकल्पिक विकास में सहायक होती है।

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* पी-एच.डी. (शोध छात्र)

गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय

वर्धा, महाराष्ट्र- 442001

E-mail: ashishpatel3135@gmail.com

Mob. 9839853135

‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की शिक्षक, शिक्षा और शिक्षार्थी ही आधार-प्रदीप सिंह

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‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की शिक्षक, शिक्षा और शिक्षार्थी ही आधार

*प्रदीप सिंह

सन 2015 में सरदार बल्लभ भाई पटेल की 140 वीं जन्म जयंती 31 अक्टूबर को ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’अभियान की शुरुवात देश के विभिन्न राज्यों में सांस्कृतिक एकता ,राष्ट्रीय एकीकरण को कला,संगीत और वाद्य द्वारा सीखने की प्रवृत्ति बढ़ाने हेतु किया गया।एक भारत श्रेष्ठ भारत अभियान मूलतः भारत के राज्यों के लिए है जिसमें प्रतिवर्ष एक राज्य किसी अन्य राज्य का चुनाव करेगा और उस राज्य की भाषा,इतिहास,संस्कृति,ज्ञान विज्ञान आदि को अपनाएगा और उसको पूरे देश के सामने बढ़ाएगा।अगले वर्ष किसी अन्य राज्य का चुनाव किया जाएगा।इस तरह यह योजना पूरे देश में चलती रहेगी जिससे राज्य आपस में संगठित होंगें।एक दूसरे भी भाषा को समझेंगे जिससे अनेकता में एकता का विकास होगा।सरदार पटेल की जीवनी और प्रधानमंत्री जी की प्रेरणा से शिक्षक और छात्र इस अभियान को सफलतम बनाने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास कर रहे हैं।देश सीमाओं तथा राष्ट्र भूमि,जल और संस्कृति के संघात(संयुति) से निर्मित होता है।सरदार पटेल जी ने देश को एकता के सूत्र में पिरोनें का महान कार्य किया था।

प्रेरक प्रसंग:सरदार पटेल के पिताजी किसान थे और सरदार पटेल बाल्यकाल में अपने पिताजी के साथ खेत पर जाते थे।एक दिन सरदार पटेल के पिताजी खेत में हल चला रहे थे और पटेल जी उनके साथ चलते हुए पहाड़े याद कर रहे थे पहाड़े याद करते हुए इतना तन्मय हो गए कि पैर में कांटा चुभने पर भी उनकी तन्मयता में कोई प्रभाव नही पड़ा और वे पहाड़ा याद करते रहे अचानक उनके पिता जी की नजर पटेल जी के पाव पर पड़ी बड़ा कांटा देखकर चौंक गए फिर कांटा निकाला और घाव पर पत्ते बांधकर रक्त बहने से रोका।

सरदार पटेल की इस तरह की एकाग्रता और तन्मयता देखकर उनके पिताजी अत्यंत खुश हुए और उन्हें जीवन में बड़ा करने का आशीर्वाद दिया जिसको उन्होंने अपने जीवन काल में सफल किया।सरदार पटेल जी ने आज़ादी के बाद छोटे-छोटे राज्यों को देश में सम्मिलित कर देश का सुखद एवं शांतिपूर्ण एकीकरण किया था।आज उसी एकीकरण में एक भारत श्रेष्ठ भारत नव ऊर्जा द्वारा देश में शान्ति एवं एकता का संचार कर रहा है।

एक भारत श्रेष्ठ भारत अभियान में 36 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश सम्मिलित रूप से एक दूसरे राज्य कस चुनाव करके उस राज्य की भाषा,संस्कृति,इतिहास,कला,विज्ञान आदि को अपनाएगा और दोनों राज्य इसी तरह से एकता के सूत्र में बंध जाएंगे ।देश की एकता एवं अखण्डता देश के विकास में बहुत सहायक सिद्ध होगी इस तरह की पहल देश के लिए मजबूती का कार्य करेगी।यह सोच बल्लभ भाई पटेल ने देश में बोई थी जिसको फलीभूत करने के लिए यह कदम उठाए जा रहे है जिससे बिना किसी मतभेद के आसानी से राज्यों के बीच संस्कारों का आदान प्रदान होगा जो कि भारत में एकता के रूप में उजागर होगा।पिछले कुछ समय से देश में सांप्रदायिकता का शोर सुनाई दे रहा है जिसे खत्म करना प्रत्येक नागरिक का परम कर्तव्य है लेकिन जेहन में आता है इस प्रकार की योजना एक बेहतर पहल है जो कि सरकार ने बहुत ही व्यवस्थित ढंग से सभी के सामने रखा है।यह अभियान आसानी से देश के भिन्न- भिन्न राज्यों को आपस में जोड़ रहा है। शिक्षकों और छात्रों के माध्यम से त्यौहारों की तरह ही खुशियां फैला रहा है।

मुख्य विशेषता:

1- एक भारत श्रेष्ठ भारत के तहत एक राज्य अन्य राज्य का चुनाव करके उंसकी भाषा ,संस्कृति को अपनाकर आगे बढ़ा रहा है इससे दोनों राज्यों के एक नया रिश्ता बन रहा है।

2-सरकार द्वारा राज्यों के बीच एक समिति का गठन किया गया है जो कि इस योजना को सही तरीके से क्रियान्वयन करने का कार्य कर रही है।

3-इस अभियान में सरकार,नागरिक,सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन,सरकारी एवं निजी क्षेत्र मिलकर कार्य कर रहे हैं।

4-इस योजना के विस्तार के लिए आधुनिक संसाधन एवं मीडिया का उपयोग किया जा रहा है।

5-दो राज्य अपने छात्रों का आदान प्रदान कर रहे हैं जो एक वर्ष तक दूसरे राज्य की संस्कृति को समझ और सीख रहे हैं।

असम के बच्चों द्वारा मध्यप्रदेश के बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले का परधोनी लोकनृत्य,असम का बिहू मध्यप्रदेश के बच्चों द्वारा,गुरुग्राम के छात्रों द्वारा झारखंड के आदिवासी भेषभूसा नृत्य संगीत गुजरात के बच्चों द्वारा ,झारखंड के बच्चों द्वारा डांडिया,दिल्ली के बच्चों द्वारा जम्मू काश्मीर का डोंगरी सीखना एक अभूतपूर्व प्रयोग है।

कहा जाता है कि दिल में उतरने का रास्ता पेट से होकर जाता है।

“जैसा भोजन खाइए, वैसा तन होए,

जैसा पानी पीजिए, वैसी वाणी होए।”

एक भारत श्रेष्ठ भारत अभियान के तहत शिक्षक और छात्रों का खानपान द्वारा एक दूसरे राज्यों के नजदीक आना भारत की एकता को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा।स्कूलों ,कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत(ईबीएसबी) क्लब ‘ द्वारा भाषा व संस्कृति के आधार पर गतिविधियों स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल करने से एक राष्ट्र की अवधारणा को मजबूती मिल रही है।

प्रधानमंत्री जी ने स्पष्ट किया है कि योजना एक भारत श्रेष्ठ भारत देश की अखण्डता के लिए एक बहुत अच्छा प्रयास साबित होगा।इससे लोगों को एक दूसरे से जुड़ने का माहौल मिलेगा जो कि सभी तरह से देश के हित में कार्य करेगा ।उनके द्वारा अपने मासिक प्रोग्राम ‘मन की बात’ में भी इस योजना का जिक्र करते हुए समस्त देशवासियों से बढ़ चढ़कर सहयोग देने और सुझाव देने का आग्रह किया है

निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि जब विश्व के अन्यान्य देश नस्लभेदी और साम्प्रदायिक दंगों की आग में जल रहें हो उस समय भारत को जातीय संघर्ष की आग में झोंकने के प्रयास का सफल न होना भारत के राष्ट्रीय चरित्र का एक होना है।जिसमें ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत अभियान’की भूमिका महत्वपूर्ण रही।इस अभियान को प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक की शिक्षा में अनिवार्य बनाए जाने की आवश्यकता है।जिससे शैक्षणिक प्रक्रिया में संलग्न शिक्षक और छात्र इस अभियान का अभिन्न अंग बनकर भारत को एक और श्रेष्ठ बनाने में अपनी भूमिका सुनिश्चित कर सकेंगे।

प्रदीप सिंह(शिक्षक कुशीनगर उत्तरप्रदेश),ईमेल-psingh.ddu@gmail.com,सम्पर्क सूत्र-9628737874

कवितई: बजरंग बिहारी ‘बजरू’

कवितई

                                बजरंग बिहारी ‘बजरू’

[1]

हेरित है इतिहास जौन दिन झूठ बदलि कै फुर होइगा
झूर आँख अंसुवात जौन दिन झूठ बदलि कै फुर होइगा।
हंडा चढ़ा सिकार मिले बिनु राजाजी बेफिकिर रहे
बोटी जब पहुंची थरिया मा झूठ बदलि कै फुर होइगा।
बिन दहेज सादी कै चर्चा पंडित जी आदर्स बने
कोठी गाड़ी परुआ पाइन झूठ बदलि कै फुर होइगा।
खाली हाथ चले जाना हैसाहूजी उनसे बोले
बस्ती खाली करुआइन जब झूठ बदलि कै फुर होइगा।
बजरूका देखिन महंथ जी जोरदार परबचन भवा
संका सब कपूर बनि उड़िगै झूठ बदलि कै फुर होइगा।

[2]

चढ़ेन मुंडेर मुल नटवर न मिला काव करी
भयी अबेर मुल नटवर न मिला काव करी।
रुपैया तीस धरी जेब, रिचार्ज या रासन
पहिलकै ठीक मुल नटवर न मिला काव करी।
जरूरी जौन है हमरे लिए हमसे न कहौ
होत है देर मुल नटवर न मिला काव करी।
माल बेखोट है लेटेस्ट सेट ई एंड्राइड   
नयी नवेल मुल नटवर न मिला काव करी।
रहा वादा कि चटनी चाटि कै हम खबर करब
बिसरिगा स्वाद मुल नटवर न मिला काव करी।

[3]

गजल मामूली है लेकिन लिहेबा सच्चाई
बिथा किसान कै खोली कि लाई गहराई।
इस्क से उपजै इसारा चढ़ै मानी कै परत
बिना जाने कसस बोली दरद से मुस्काई।
तसव्वुर दुनिया रचै औतसव्वुफ अर्थ भरै
न यहके तीर हम डोली न यहका लुकुवाई5
धरम अध्यात्म से न काम बने जानित है
ककहरा राजनीति कै, पढ़ी औसमझाई।
समय बदले समाज बोध का बदल डारे
बिलाये वक्ती गजल ई कहैम न सरमाई।
चुए ओरौनी जौन बरसे सब देखाए परे
बजरूकै सच न छुपे दबै कहाँ असनाई।

[4]

चले लखनऊ पहुंचे दिल्ली,
चतुर चौगड़ा बनिगा गिल्ली7
हाटडाग सरदी भय खायिन,
झांझर भये सुरू मा सिल्ली9
समझि बूझि कै करो दोस्ती,
नेक सलाह उड़ावै खिल्ली।
बब्बर सेर कार मा बैठा ,
संकट देखि दुबकि भा बिल्ली।
बजरूबचि कै रह्यो सहर मा,
दरकि जाय न पातर झिल्ली।

[5] 

का बेसाह्यो कस रहा मेला
राह सूनी निकरि गा रेला।
बरफ पिघली पोर तक पानी
मजाखैंहस संग संग झेला।
के उठाए साल भर खर्चा
जेबि टोवैं पास ना धेला।
गे नगरची  मुकुटधारी
मंच खाली पूर  भा खेला।
बहुत सोयौ राति भर ‘बजरू
अब  लपक्यो भोर की बेला।

[6]

जियै कै ढंग सीखब बोलिगे काका
भोरहरे तीर जमुना डोलिगे काका।
आँखि  अंगार  कूटैं  धान  काकी,
पुरनका घाव फिर से छोलिगे काका।
झरैया  हल्ल  होइगे  मंत्र  फूंकत
जहर अस गांव भीतर घोलिगे काका।
निहारैं   खेत   बीदुर  काढ़ि  घुरहू,
हंकारिन पसु पगहवा खोलिगे काका।
बिराजैं   ऊँच   सिंघासन   श्री   श्री
नफा नकसान आपन तोलिगे काका।
भतीजा हौ तौ पहुंचौ घाट ‘बजरू
महातम कमलदल कै झोरिगे काका।

[7]

उठाए बीज कै गठरी सवाल बोइत है
दबाए फूल कै मोटरी बवाल पोइत है।
इन्हैं मार्यौ उन्हैं काट्यौ तबौं  प्यास बुझी
रकत डरि कै कहां छिपिगा नसै नसि टोइत है।
जुआठा कांधे पर धारे जबां पर कीर्तिकथा
सभे जानै कि हम जागी असल मा सोइत है 
कहूं खोदी कहूं तोपी सिवान चालि उठा
महाजन देखि कै सोची मजूरी खोइत है।
 घटाटोप अन्हेंरिया उजाड़ रेह भरी
अहेरी भक्त दरोरैं यही से रोइत है।

[8]

देसदाना भवा दूभर राष्ट्रभूसी अस उड़ी
कागजी फूलन कै अबकी साल किस्मत भै खड़ी।
मिली चटनी बिना रोटी पेट खाली मुंह भरा
घुप अमावस लाइ रोपिन तब जलावैं फुलझड़ी।
नरदहा दावा करै खुसबू कै हम वारिस हियां 
खोइ हिम्मत सिर हिलावैं अकिल पर चादर पड़ी।
कोट काला बिन मसाला भये लाला हुमुकि गे।
बीर अभिमन्यू कराहै धूर्तता अब नग जड़ी।
मिलैं बजरूतौ बतावैं रास्ता के रूंधि गा 
मृगसिरा मिरगी औसाखामृग कै अनदेखी कड़ी।  
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अवधी लोकगीतों में वर्णित स्त्री समस्या का अध्ययन-अंशु यादव

2 boys in water during daytime
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अवधी लोकगीतों में वर्णित स्त्री समस्या का अध्ययन

अंशु यादव

मानव की अंतरंग प्रकृति ही लोककलाओं को जन्म देती है। तदान्तर मानव अपने अब तक के उपार्जित संस्कारों से उसे (लोककलारूपों को) युगसंदर्भानुकूल या अपने व्यक्तित्व के अनुकूल ढालकर अभिव्यक्त करता है। प्रकृति में घटने वाली घटनाओं के प्रति वह बेखबर नहीं रहता है । वह उसे जानना और समझना चाहता है। अगर वह उसे समझ लेता है तो उसे अभिव्यक्त करना चाहता है। यही अभिव्यक्ति लोककलाओं के विभिन्न रूपों में हमें  प्राप्त है । लोकसाहित्य में भावाभिव्यक्ति की एक विधा लोकगीत भी है। लोकगीतों को केवल मनोरंजन का साधन नहीं माना जा सकता, न ही लोकगीत बिल्कुल  काल्पनिक होते हैं ।  बल्कि उनमें कहीं न कहीं सामाजिक सच्चाई छिपी होती है। लोकगीत की सर्वप्रथम व्युत्पत्ति उस समय हुई, जब समाज अविभक्त और एकात्म स्वरूप में था। जनसमुदाय के बीच उठते कौंधते विचार, विषय एवं अनुभाव का समावेश लोकगीत में होता है। लोकगीत भारतीय लोक संस्कृति का चिरवाहक और प्राणाधार है। लोकगीतों में तत्कालीन सामाजिक जीवन एवं गोचर संस्कृति यथा नगर, ग्राम, समाज, परिवार, पशु-पक्षी, हाट-बाजार, युद्ध-प्रेम, श्रृंगार-करुण, आस्था-अंधविश्वावस तथा शौर्य-पराक्रम का जीवंत व सहज चित्रण हुआ है।

            लोकगीत लोकमन की अभिव्यक्ति है इनके मूल में संगीत और नृत्य के तत्व निहित हैं । लोकगीत किसी एक व्यक्ति द्वारा रचित नहीं होते बल्कि पूरे समाज द्वारा रचे जाते हैं। लोकगीत मानव जीवन में पूरी तरह रच बस गए हैं । लोकगीत लोक-जीवन की मस्ती के परिचायक, जीवन की रसात्मकता, रागात्मकता के उद्गार एवं उमंग का चटक रंग हैं ।

            मनुष्य अपने जीवन में सुख-दुख का जो अनुभव करता है, अपने परिवेश प्रकृति में जो कुछ देखता है, उससे सहज रूप से उत्पन्न भावों को वह अपनी वाणी तथा हाव-भाव से व्यक्त करता है । साधारण जन अपने मस्तिष्क और हृदय पर प्रभाव डालने वाली घटनाओं के बारे में गाकर, नाचकर रागात्मक भावनाओं की भाषागत अभिव्यक्ति करता है । लोकगीत लोक जीवन में प्रतिदिन उषाकाल से मध्य रात्रि तक किसी क्रिया से निविर्वाद रूप से जुड़े होकर मनुष्य को स्फूर्ति प्रदान करते हैं । इसलिए लोकगीतों को स्वत: स्फूर्त गीत कहा गया हैं ।

            समाज अथवा राष्ट्र के उदय में स्त्री और पुरुष का समान महत्व होता है पुरुष यदि घर के बाहर के कार्यों को उन्नत एवं सुचारु रूप से करता है तो स्त्री सेवा एवं स्नेह आदि के साथ घर के विभिन्न कार्यों का निर्वाह करती है स्त्री और  पुरुष एक दूसरे के पूरक है, जीवन में स्त्री एंव पुरूष दोनों चक्रों के समान रूप से चलने पर ही जीवन सुखमय बनता है । समाज में स्त्री के विभिन्न रूप हैं जैसे-पुत्री, पत्नी, माता आदि ।

            स्त्री समाज का एक अभिन्न अंग है स्त्री के बिना समाज की कल्पना ही नहीं जा सकती है। स्त्री सर्वदा अपना कार्य कर्तव्य निष्ठा के साथ पूर्ण करती है ।  स्त्री को उसके सामाजिक अधिकार कभी नहीं मिल पाए हैं।  स्त्री  चाहे पुत्री, पत्नी, माता के रूप में हो उसके साथ पुत्री होने पर पुत्र के साथ तुलना, पत्नी होने पर परिवार के साथ तुलना तथा माता होने पर ज़िम्मेदारी के नाम पर अमानवीय व्यवहार किया जाता है । यहाँ पर मनु द्वारा कही गई बात सिद्ध होती है कि नारी को बचपन में पिता, जवानी में पति तथा प्रौढ़ावास्था में पुत्रों के संरक्षण में रहना चाहिए। भारतीय समाज की सम्पूर्ण ढांचागत व्यवस्था स्त्री का शोषण करती आ रही  हैं। पुरुष अपने आप को बचाने के लिए मनु नाम की चादर ओढ़ना भी नही भूलता है। भारतीय समाज में स्त्री की वेदना, कुंठा, करुणा, पीड़ा, भावनाओं और समस्याओं का व्यापक वर्णन महिलों ने लोकगीतों के माध्यम से भी किया है । अवधी में स्त्री संबंधित अनेक लोकगीत मिलते हैं।

            अवधी पूर्वी हिंदी की एक बोली है। यह उत्तर प्रदेश में लखनऊ, रायबरेलीसुल्तानपुर,बाराबंकी,हरदोईफतेहपुर,सीतापुरलखीमपुरप्रतापगढ़फैजाबाद और आंशिक रूप से मिर्जापुर, जौनपुर, इलाहाबाद आदि जिलों में बोली जाती है। तुलसीदास ने अपने “रामचरितमानस” में अयोध्या को अवधपुरी कहा है। इसी क्षेत्र का पुराना नाम कोसल भी था जिसकी महत्ता प्राचीन काल से चली आ रही है।

            अवधी लोकसाहित्य में स्त्री संबंधित लोकगीतों की प्रचुरता है । विषयवस्तु के आधार पर इन गीतों का वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है – संस्कार गीत, पर्व-त्यौहार के गीत, धार्मिक गीत, ऋतु गीत, जाति गीत, पारंपरिक खेल गीत, राष्ट्रीय गीत, सांस्कृतिक गीत, श्रम गीत, अन्य गीत आदि । इन सभी लोकगीतों में स्त्री की भागीदारी व्यापक स्तर पर मिलती हैं।

            अवधी लोकगीतों में स्त्रियों की अनेक समस्याओं का वर्णन मिलता हैं। जैसे- बाल विवाह की समस्या, कन्या भ्रूण हत्या की समस्या, दहेज़ प्रथा  की समस्या, बेमेल विवाह की समस्या, सती प्रथा की समस्या, परदा प्रथा की समस्या, सतीत्व परीक्षा, गोदना की प्रथा, बंध्या स्त्री की समस्या और विधवा स्त्री की समस्या इत्यादि ।

बाल विवाह

            प्राचीन समय से ही भारत में बाल विवाह का प्रचलन रहा है।

                        खेलत रहिइउ मैं मइया की गोदिया, खेलत चउंक परीउरे ।

                        केहिके दुवारे बइया बाजन बाजे, केई के दुआरे क चार रे ।

                        तुम्हरे दुवारे बेटी बाजन बाजे, तुम्हरे दुवारे का चार रे ।   

कन्या भ्रूण हत्या की समस्या

            भारतीय समाज में धार्मिक अंधविश्वास, पुरुषात्मकसत्ता, दहेज प्रथा आदि के कारण कन्या भ्रूण हत्या की समस्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं । इसी पीड़ा को अवधी समाज की स्त्रियों ने अवधी लोकगीतों के माध्यम से व्यक्त किया है जो इस प्रकार है –

                        भीतरा से दायज अँगना म गने

                        कोसय बेटी जनमवां

                        जनतिउ जो बेटी जनम लेहैं मोरी

                        डलितिउ मैं कोखिया गिराय रे

                        मरतिउ जहर विष खाय रे 

दहेज प्रथा

            भारतीय समाज में दहेज प्रथा एक बहुत बड़ी कुरीति है इसके कारण माता-पिता के लिए लड़कियों का विवाह एक अभिशाप बन गया है । जीवन साथी चुनने का सीमित क्षेत्र बाल-विवाह की अनिवार्यता कुलीन विवाह शिक्षा एंव सामाजिक प्रतिष्ठा, धन का महत्व ,महंगी शिक्षा, सामाजिक प्रथा एंव प्रदर्शन तथा झूठी शान आदि के कारण दहेज लेना और देना आवश्यक हो गया है। दहेज प्रथा के माता-पिता अपनी पुत्री का विवाह योग्य वर से नही कर पाते । अवधी लोकगीतों में  दहेज की समस्या का  वर्ण इस प्रकार है कि सुंदर कन्या के अनुरूप योग्य वर न मिलने से पिता निराश होकर उसे कुमारी रहने को कहता है ।

                        वै वर मांगै हाथी से घोड़ा

                        मांगै मोहरा पचास

                        वै वर मांगै बेटी नौ लाख दहेज

                        मोरे बूते दइयो न जाय ।

बंध्या स्त्री की समस्या                   

            भारतीय समाज में जिस स्त्री के कोई बच्चा नहीं होता उसे बंध्या कहा जाता है । इसके साथ-साथ अगर किसी स्त्री के केवल पुत्री हो और उसने किसी पुत्र को जन्म नहीं दिया तो उसे भी लोग बंध्या कहते है और परिवार में उसे तरह-तरह के ताने सुनने पड़ते है । इसके साथ ही उसका पति या तो दूसरी शादी कर लेता है या उसे छोड़ देता है ये भी एक समस्या है जिसे अवधी लोकगीतों के माध्यम से स्त्रियाँ अपनी पीड़ा को व्यक्त करती हैं ।

                        सासू मोरी कहे बझिनिया, ननद  वृजवासिन,

                        जेकर बारी वियाहिया वै घरा से निकारे । 

पारिवारिक कलेह

             भारतीय समाज हमेशा से सयुंक्त परिवार के रूप में रहता था और संयुक्त परिवार में कभी-कभी पारिवारिक कलेह होते रहते थे । जैसे- सास-बहू कलह, ननद-भोजाई कलह और देवरानी और जेठानी का कलह लेकिन।  सामाजिक मर्यादाओं के कारण स्त्री चुपचाप पारिवारिक कलह को सहती रहती है।  यहाँ तक अगर कभी पति-पत्नी में किसी बात को लेकर बहस हो जाती थी  तो स्त्री यह समझ के चुप हो जाती थी कि पति उसका परमेश्वर है और वह उसके साथ कुछ भी कर सकता है ।

            परिवारी कलह की इस समस्या को अवध प्रांत की स्त्रियों ने अवधी लोकगीतों के माध्यम से व्यक्त किया है । ननद-भाभी का एक गीत इस प्रकार जिसमें ननद अपनी भाभी को बहुत दुखी करती हैं तो भाभी गीत के माध्यम से व्यथा-कथा व्यक्त करती है –

            दुपहरिया से झगरा डालेओ मोरी ननदी

            भोरोरे हम बढ़नी से अंगना बहारेन

            अँगना मा कूड़ा फइलाएओ मोरी ननदी ।

बेमेल विवाह

बाल विवाह एंव जीवन साथी के चुनाव की स्वतन्त्रता के नहीं होने के कारण कई बार लड़कियों का विवाह अनुपयुक्त लड़कों से करवा दिया जाता है। शिक्षा की असमानता, आदि के कारण उनमें वैचारिक मतभेद उत्पन्न हो जाता है और उनका वैवाहिक जीवन सफल नहीं होता है। ऐसी स्थिति में स्त्री को ही अधिक कष्ट उठाने पड़ते है। अशिक्षा एवं परंपरावादी व्यवस्था के चलते आज भी अनमेल विवाह हो रहे  है।  अवधी लोकगीतों में बेमेल विवाह (बालिका व वृद्ध का विवाहबालक व युवती का विवाह आदि) बहु-विवाह प्रथा का मार्मिक अंकन देखने को मिलता है। यथा- इस विवाह गीत में वृद्ध-विवाह का मज़ाक उड़ाया गया है।   

            बरहै बरिसवा कै मोरि  रँगरैली असिया बरसि क दमाद।

        निकरि न आवै तू मोरि रँगरैली अजगर ठाढ़ दुवार।।1।।

        बाहर किचकिच आँगन किचकिच बुढ़ऊ गिरै मुँह बाय।

        सात सखी मिलि बुढ़ऊ उठावैं बुढ़ऊ क सरग दिखाय।।2।।

सतीत्व परीक्षा

            प्रवासी पति के लौटने पर सास-ननद की ईर्ष्यामय शिकायत के परिणामस्वरूप कुलवधू को अपने सतीत्व की परीक्षा देनी पड़ती थी । अवधी लोकगीतों में इस परीक्षा का वर्णन मिलता है और स्त्री को अपने सतीत्व की परीक्षा अग्नि, जल, सूर्य या पृथ्वी को साक्षी मानकर शपथ या सतीत्व परीक्षा का वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है-

                        जब बहिनी चली हैं अगिनि किरियवां

                        खौला तेल भये जुड़ पनिया हो रामा

                         जब बहिनी चली हैं गंगा किरियवां

                        गगरी गई है झुराई हो रामा

                        जब बहिनी चली हैं सुरुजु किरियवां

                        उगा सुरुजु गए हैं छिपाए हो रामा

                        जब बहिनी चली हैं धरती किरियवां

                        धरती म उठा भुंइडोलवा हो रामा

शिवमूर्ति की कहानियों की संरचना में अवध-लोक: प्रदीप त्रिपाठी

शिवमूर्ति की कहानियों की संरचना में अवध-लोक

       प्रदीप त्रिपाठी

          आजमगढ़, उत्तरप्रदेश

              Mob- 08928110451

tripathiexpress@gmail.com

                   कहानियों की संरचना में लोक-जीवन की उपस्थिति की एक लंबी फेहरिस्त रही है।  इन लेखकों की रचनाओं में जो लोक-चरित्र, लोक-समस्याएँ, लोक-परंपराएँ, लोक-भाषा एवं लोक-गीत चित्रित हैं, निश्चित रूप से उल्लेखनीय है। यह बात अलग है कि अंचल विशेष के कारण उसकी बोली और उसकी समस्याओं की प्रकृति में फर्क पड़ सकता है परंतु लोक-जीवन की जो सामान्य प्रकृति है, वह किसी भी लोक समाज में दिखेगी ही।

            शिवमूर्ति लोक-जीवन के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनका सरोकार अवध क्षेत्र से है। उनकी रचनाओं में आंचलिकता की गहरी पैठ है। प्रेमचंद और रेणु की परंपरा के वे एक ऐसे कथाकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी में ही नहीं अपितु पूरे कथा-साहित्य में समाज के भूले-भटके और बेहद सामान्य चरित्रों को जिस तरह से क्लासिक बनाया, निस्संदेह महत्त्वपूर्ण है। शिवमूर्ति का सबसे बड़ा योगदान उनकी लोक-जीवन के प्रति गहरी संवेदना, लोक-चरित्र की गहरी समझ व अभिव्यक्ति रही है। उनके समूचे साहित्य में अपने समाज को जीवंत बनाने वाले ऐसे चरित्रों की समृद्ध उपस्थिति रही है जो तेजी से बदलती दुनिया में लुप्त होते जा रहे हैं। केशर-कस्तूरी की केशर, तिरियाचरित्तर की विमली जैसे पात्र इसके सशक्त उदाहरण हैं। शिवमूर्ति की कहानियों का केंद्र बिंदु हाशिए का समाज रहा है। वे समाज से ऐसे पात्रों को उठाते हैं जो अन्य रचनाकारों की सोच से या तो परे होते हैं या वे उन चीजों को सूक्ष्म समझकर किनारे कर देते हैं। शिवमूर्ति की कहानियाँ कला, संवेदना एवं लोक के उस द्वन्द्व को प्रस्तुत करती हैं जिसमें जीत अंतत: संवेदना की ही होती है।

लोकभाषा का वैशिष्ट्य

भाषा की बुनावट में लोक का अपना अलग ही वैशिष्ट्य है। किसी भी रचनाकार को उसके शिल्प और संवेदना से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। भाषा-शैली की बुनावट ही रचना सशक्त एवं जीवंत बनती है। भाषा-रचना में भावाभिव्यक्ति का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। शिवमूर्ति की कहानियों में रचना-शिल्प की अहम विशेषता उनकी भाषा है। शिवमूर्ति अपनी कहानियों की भाषा स्वयं नहीं बुनते बल्कि अपने पात्रों के द्वारा ही बुनवाते हैं। उनके पात्रों की भाषा खाँटी अवधी है।   शिवमूर्ति की भाषा के साथ संवेदनाएँ स्वतः जुड़ी हुई होती हैं। यह ऊर्जा उन्हें लोक से ही मिलती है। शिवमूर्ति की यह प्रवृत्ति उन्हें एक बड़े रचनाकार होने का ही परिचय नहीं दिलाती बल्कि उन्हें स्थापित भी करती है। उदाहरण के लिए  कहानी सिरी उपमा जोग में लालू की मार्इ के पत्र को देखा जा सकता है-सरब सिरी उपमा जोग, खत लिखा लालू की मार्इ की तरफ से ,लालू के बप्पा को पाँव छूना पहुंचेआगे समाचार मालूम हो कि हम लोग यहाँ पर राजी खुशी से हैं और आप की राजी खुशी के लिए भगवान से नेक मनाया करते हैं।…. इधर दोतीन साल से आपके चाचा जी ने हम लोगों को सताना शुरू कर दिया है, किसी न किसी बहाने कभीकभी कमला को भी रतेपीटते रहते हैं।कहते हैंगाँव छोड़कर भाग जाओ नहीं तो महतारी बेटे का मूड़ काट लेगें जिस सादगी एवं सरलता की बात हम शिवमूर्ति कहानियों में करते हैं उसका एक महत्त्वपूर्ण आयाम लोक-जीवन की भाषा है। वह शब्दों को लोक से चुराते हैं जो न केवल सरल और सुबोध हैं बल्कि व्यंजक और पारदर्शी भी हैं। शिवमूर्ति की भाषा अपनी सादगी में सुंदर और नितांत संप्रेषणीय है। उनकी कहानियाँ ग्राम्य-जीवन एवं आंचलिकता से लैस हैं। वे अनुभवों की गहरार्इ से उपजी भाषा है। रवि भूषण के शब्दों में कहें तो –ये शिवमूर्ति के अनुभव ही हैं जो उनकी भाषा में गुथकर सूक्तियाँ बने। ये वे सूक्तियाँ हैं जिनमें जीवन का सत्य बोलता है। प्रवाह, सरलता, चित्रमयता, व्यंजकता और सारगर्भिता शिवमूर्ति के रचनात्मक भाषा के वे गुण हैं जो उनकी रचनाओं को लम्बा आयुष्य देते हैं।

            शिवमूर्ति की भाषा के कर्इ रूप-रंग हैं। अपना ठाठ भी है। उनका वाक्य-विन्यास भिन्न है, वाक्य छोटे हैं। वाक्यों में सहायक क्रियाओं का कम प्रयोग करना उनकी विशिष्ट शैली है। भाषा के स्तर पर शिवमूर्ति में बड़ा वैविध्य नहीं रहा है। वे आज भी जन-भाषा के समर्थक हैं। प्रेमचंद ने साहित्य का उद्देश्य निबंध में इस बात की ओर संकेत किया है- जो जनसाधारण का है, वह जनसाधारण की भाषा लिखता है। शिवमूर्ति की कथा-भाषा लोक-भाषा है चूँकि उनके सभी पात्र लगभग ग्रामीण परिवेश के हैं। उनकी भाषा में अवधी लहजे के साथ तद्भव और देशज शब्दों का प्रयोग सर्वाधिक है। उनकी भाषा अर्थगर्भित है, सरल प्रसंगानुकूल है। 

            शिवमूर्ति की भाषिक संरचना का अपना एक अलग ही अंदाज है। समकालीन हिंदी कथाकारों की भाषा से उनकी भाषा-शैली पूर्णतया भिन्न है। शिवमूर्ति ने अपनी भाषा के संदर्भ में स्वयं कहा है कि-भाषा की ताकत मैं लोकजीवन और लोकगीतों से बटोरता हूँमैं प्रचलित मुहावरों की शक्ति सजोता रहता हूँ। मैं अपनी कहानियों में इस शक्ति को विस्तार देता हूँ।इससे यह पूर्णत: स्पष्ट हो जाता है कि शिवमूर्ति का रचना-संसार लोक से ही निर्मित होता है। लोक ही उनकी कहानियों का रंग है। देशकाल, स्थान, पात्र-संबंध आदि के आधार पर यह भाषा अपने विविध रूपों में प्रकट हुर्इ है। शिवमूर्ति के यहाँ भाषा का जनतांत्रिक रूप है। इनके यहाँ लोक-भाषा का पूरा सम्मान है। कर्इ वाक्य सूक्तियों की तरह हैं। केशर-कस्तूरी कहानी में केशर जब यह कहती है-दुख काटने से कटेगा, भागने से तो और पिछुआएगा।तो यह उक्ति निजी न होकर सामाजिक हो जाती है।

कोर्इ भी रचनाकार अपने समय और समाज से किसी न किसी रूप से प्रभावित अवश्य होता है। शिवमूर्ति की रचनाओं को यदि शैलीगत दृष्टि से देखा जाय तो इन पर रेणु की शैली का असर दिखता है। यह उनकी शैली से प्रभावित ही नहीं बल्कि कर्इ कदम आगे तक भी जाते हैं। शिवमूर्ति का शिल्प अत्यंत सहज है। उनके पात्रों की भाषा कथ्य को सहज सरल एवं प्रभाशावली बनाने में सहयोग देती है। जाहिर है, गाँव की उबड़-खाबड़ जमीन से निकलने के कारण शिवमूर्ति के पात्र वहाँ की बोली, लहजे और नज़ाकत से वाकिफ़ हैं। शिवमूर्ति के यहाँ ग्रामीण-जीवन का बहुत ही ठोस एवं मुकम्मल चित्र है। 

शिवमूर्ति ने अपनी कहानियों में आंचलिकता के साथ-साथ क्षेत्रीय शब्दों और रंगों का भरपूर प्रयोग किया है। उनकी भाषा विविध रंगों के साथ-साथ लोक (ग्रामीण) संवेदना को पूरी शालीनता से प्रस्तुत करती है। वे सामान्य शब्दावली को ही अर्थ-गरिमा और सांकेतिकता देने में सफल सिद्ध हुए हैं। इनके साधारण वाक्य व्यापक अर्थवत्ता के साथ व्यंजनापूर्ण हैं। इनकी कहानियों में चित्रित लोक-जीवन कहानियों में जहाँ रोचकता प्रदान करता है वहीं शिल्प के नए-नए विविध आयाम भी खोलता है। लोक-कथा लोकोक्तियों एवं मुहावरों के सहारे शिवमूर्ति अपनी कहानियों को धार देते हैं और लोक-भाषा उस धार को अति तीक्ष्ण करती है जिससे उनकी भाषा और अधिक सारगर्भित बन जाती है। उदाहरण के तौर पर हम उनकी कहानी ख्वाजा! ओ मेरे पीर की शुरुआती पंक्तियों को देख सकते हैं-माधवपुर से सिंहगढ़ तक सड़क पास हो गर्इ। तो सरकार ने आखिर मान ही लिया कि ऊसर जंगल का यह इलाका भी हिन्दुस्तान का ही हिस्सा है। शिवमूर्ति का शिल्प पाठकों की संवेदना और युगानुकूल अभिव्यक्ति में निहित है। अंचल में व्याप्त जीवन की गहरार्इ, जीवनगत यथार्थ और उन स्थापनाओं के वातावरण को प्रकट करने में भी शिवमूर्ति सर्वथा चित्रकार से प्रतीत होते हैं।

भाषा की ताकत मैं लोकजीवन और लोकगीतों से बटोरता हूँ: शिवमूर्ति

            लोक-गीत लोक के दु:ख-द और संवेदना की गहरी अनुभूति कराते हैं। शिवमूर्ति लोक-गीतों के सशक्त प्रयोगकर्ता हैं। उनका मानना है कि लोक-गीतों का प्रयोग किसी भी रचना को सशक्त एवं जीवंत बनाने में मुकम्मल होते हैं। उन्होंने अपनी कहानियों में लोकगीतों का अद्भुत प्रयोग किया है। मिसाल के तौर पर केशर-कस्तूरी कहानी को देखा जा सकता है-

            मोछिया तोहार बप्पा हेठ न होर्इ हैं,

            पगड़ी केहू न उतारी, जी.. र्इ र्इ।

            टुटही मँड़इया में जिनगी बितउबै

            नाहीं जाबै आन की दुआरी जी र्इ र्इ ।।” (केशरकस्तूरी)

 ऐसा ही एक और गीत जिसमें विमली की तरफ आकर्षित बिल्लर गाँव-घर के यथार्थ को वर्णित करता है साथ ही विमली को अपने प्रेम का संदेश भी देता है-

            ”…अरे टुटही मँड़इया के हम हैं राजा

            करीला गुजारा थोरे मा

            तोर मन लागै न लागै पतरकी

            मोर मन लागल बा तोरे मा।”  ((केशरकस्तूरी)

            निश्चित रूप से शिवमूर्ति एक मजे हुए रचनाकार हैं। उनके पास अपनी बात को संक्षेप में रखने का हुनर है। ग्रामीण जीवन में पर्वों-त्यौहारों के गीतों का किस प्रकार से लोग निर्वाह करते चले आ रहे हैं उसकी अभिव्यक्ति हम ख्वाजा! ओ मेरे पीर कहानी में मामा के होली-गीत के जरिये देख सकते हैं-

            सब दिन बसंत जग थिर न रहै

            आवत पुनि जात चला….रे पपीहा प्या ….रे –”

            शिवमूर्ति लोक से गहरे रूप में संपृक्त हैं। उन्हें अपने समाज का खाँटी अनुभव है, उसे वह अपनी रचनाओं में हूबहू टाँकने में कोई कसर नहीं छोड़ते। शिवमूर्ति अपनी कहानियों में लोकगीतों का प्रयोग करने के साथ-साथ उसकी सुदृढ़ परंपरा को बचाए रखने की कोशिश करते हैं। उनकी यही कला उन्हें अपने समकालीन रचनाकारों से अलग करती है।

लोकोक्तियाँ और मुहावरे रचना को जीवंत एवं सारगर्भित बनाते हैं

मुहावरे अथवा लोकोक्तियाँ एक अनुभवपरक ऐसी अभिव्यक्ति है जिसमें जीवन के सुख-दु:ख हास-परिहास, रंग-व्यंग्य, अतीत-वर्तमान का प्रतिबिंब दिखार्इ देता है। शिवमूर्ति की कहानियों में इसका अद्भुत प्रयोग हुआ है। उदाहरण के रूप में हम उनकी कहानियों में लोकोक्तियों एवं मुहावरों को देख सकते हैं- भेड़ ही खेत खा गर्इ, कसार्इ की गाय, अँखिया फूट गर्इ है (तिरियाचरित्तर),दूधपानी अलग करै वाले (कसार्इबाड़ा), चूना लगाना इत्यादि। उनकी कहानियों में कहावतों की भी भरमार  है। जैसे- जेकर काम उही से होय, गदहा कहै कुकुर से रोय, (कसार्इबाड़ा) आदि।

शिवमूर्ति ने अपनी कहानियों में भाषा को जीवंतता प्रदान करने के लिए ग्रामीण मुहावरो एवं कहावतों का प्रयोग किया है। इससे भाषा में गांभीर्य, प्रवाह एवं अभिव्यक्ति में स्पष्टता आर्इ है। शिवमूर्ति ने अपनी कहानियों में प्रतीकों का भी सहारा लिया है। रतौंधी, नाक, सठियाना, हेडलाइट, छिकनहवा, कातिक की कुतिया, विभीषण, पके कैथ की महक, गाँठ पकड़ लेना जैसे प्रत्येक बिंब उनकी कहानियों के कथ्य को और सारगर्भित बना देते हैं।

 गौर करें तो भाषा के धरातल पर शिवमूर्ति अत्यंत सरस हैं। गाँव-देहात की शब्दावली या उच्चारण का प्रयोग कहानी को संप्रेषण की दृष्टि से और सशक्त बनाते हैं। कनमनाना (ध्यान जाना) मुराही (नटखट), सुतंत्र (स्वतंत्र), निमरी (दुबली-पतली), पतरकी (पतली), बेसी (ज्यादा), टेम (समय), आदि शब्द कहानी को जीवंत बनाने के साथ-साथ शब्द-अर्थ की विभिन्न छवियों को भी उजागर करते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शिवमूर्ति अपनी कहानियों में जिस शिल्प (भाषा, मुहावरे, लोकोक्तियों शब्द-प्रयोग आदि) को लेकर आते हैं वह अद्भुत तो है ही साथ ही उनकी विशिष्ट पहचान भी है। 

अवधी सम्राट पं. बंशीधर शुक्ल को याद करते हुए-राहुल देव

अवधी सम्राट पं. बंशीधर शुक्ल को याद करते हुए

 राहुल देव

अवधलोक की वृहद्त्रयी में से एक जनकवि बंशीधर शुक्ल का जन्म उत्तर प्रदेश के लखीमपुर (खीरी) जिले के मन्यौरा गाँव के एक कृषक परिवार में वसंतपंचमी के दिन सन 1904 ई. को हुआ था | इनके पिता पं. छेदीलाल शुक्ल कर्म से कृषक और हृदय से कवि थे | वह अपने क्षेत्र में आल्हा गायक के रूप में प्रसिद्द थे | अपने आसपास के इस अनुकूल परिवेश का प्रभाव बालक बंशीधर शुक्ल पर भी पड़ा | सन 1919 में पिता की मृत्यु हो जाने के बाद पारिवारिक ज़िम्म्मेदारियों का भार अल्पायु में ही उनके कन्धों पर आ पड़ा | पिता की असामयिक मृत्यु से शुक्ल जी की वद्यालयीय शिक्षा कक्षा आठ तक ही हो सकी | बाद में घर पर ही उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत-उर्दू-हिन्दी-अंग्रेजी भाषाओँ का ज्ञान प्राप्त किया | जीविका के लिए कुछ समय के लिए उन्होंने पुस्तक व्यवसाय का कार्य भी भी किया। इसी बीच वह कविताएं भी लिखने लगे। पुस्तक व्यवसाय से जुड़ने के कारण उनका अक्सर कानपुर आना-जाना होता था। इसी दौरान वह गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए और उन्हीं की प्रेरणा से वह सन 1921 में राजनीति में सक्रिय हुए। सन 1938 में आप ने लखनऊ में रेडियों में नौकरी भी की | जीवनसंघर्षों ने कवि बंशीधर शुक्ल के व्यक्तित्व और कृतित्व को धीरे-धीरे जीवंत और जीवट बना दिया | शुक्ल जी ने बापू के नमक आंदोलन से लेकर आजाद भारत में लगाई गयी इमेर्जेन्सी में भी जेल यात्रायें की। खूनी परचा, राम मड़ैया, किसान की अर्ज़ी, लीडराबाद, राजा की कोठी, बेदखली, सूखा आदि रचनाये उस दौर में जनमानस में खूब प्रचलित रही। आजादी के बाद 1957 में पं. बंशीधर शुक्ल लखीमपुर क्षेत्र से विधायक बने। अपनी राजनीतिक दौर में भी वह बेहद सादगी के साथ रहे | 1978 में शुक्ल जी को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने उन्हें ‘मलिक मोहम्मद जायसी पुरस्कार’ से सम्मानित किया। बाद में संस्थान ने इस जनकवि को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी रचनाओं का समग्र संकलन रचनावली के रूप में भी प्रकाशित किया | आज़ादी के सिपाही और अवधी साहित्य के अनन्य उपासक बंशीधर शुक्ल ने 76 वर्ष की आयु में अप्रैल सन 1980 में इस दुनिया को अलविदा कह दिया |

समाजवादी रुझान के शुक्ल जी की रचनाओं में विषयगत विविधता है | गरीब और किसान वर्ग की व्यथा-कथा से तो इनका काव्य भरा पड़ा है । ऐसी ही उनकी एक मार्मिक कविता ‘अछूत की होरी’ को देखें तो,

“हमैं यह होरिउ झुरसावइ। 
खेत बनिज ना गोरू गैया ना घर दूध न पूत।
मड़ई परी गाँव के बाहर, सब जन कहैं अछूत॥
द्वार कोई झँकइउ ना आवइ।
..
हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
ठिठुरत मरति जाड़ु सब काटित, हम औ दुखिया जोइ।
चारि टका तब मिलै मजूरी, जब जिउ डारी खोइ॥ 
दुःख कोई ना बँटवावइ।
..
हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
नई फसिल कट रही खेत मा चिरइउ करैं कुलेल।
हमैं वहे मेहनत के दाना नहीं लोनु न तेल॥
खेलु हमका कैसे भावइ।
..
हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
गाँव नगर सब होरी खेलैं, रंग अबीर उड़ाय।
हमरी आँतैं जरैं भूख ते, तलफै अँधरी माय॥
बात कोई पूँछइ न आवइ।
..
हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
सुनेन राति मा जरि गइ होरी, जरि के गई बुझाय।
हमरे जिउ की बुझी न होरी जरि जरि जारति जाय॥
नैन जल कब लैं जुड़वावइ।
..
हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
हाड़ मास जरि खूनौ झुरसा, धुनी जरै धुँधुवाय।
जरे चाम की ई खलइत का तृष्णा रही चलाय॥
आस पर दम आवइ जावइ।
..
हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
यह होरी औ पर्ब देवारी, हमैं कछू न सोहाइ।
आप जरे पर लोनु लगावै, आवै यह जरि जाइ॥
कौनु सुखु हमका पहुँचावइ।
..
हमैं यह होरिउ झुरसावइ। 
हमरी सगी बिलैया, कुतिया रोजुइ घर मथि जाय।
साथी सगे चिरैया कौवा, जागि जगावैं आय॥
मौत सुधि लेइउ न आवइ।
..
हमैं यह होरिउ झुरसावइ।“

कवि के सामाजिक सरोकारों और उसकी जनपक्षधर सोच को दर्शाती यह कविता 1936 में लिखी गयी थी | ध्यातव्य है कि हिंदी साहित्य जगत में वह समय प्रगतिशील चेतना के उभार का दौर था | ऐसे में शुक्ल जी अवधांचल में इस तरह की कविता लिख रहे थे | यानि कि उन्हें अपने समय का भलीभांति ज्ञान था तभी उनकी रचनाएँ लोगों को प्रभावित कर सकने में सफल हो पातीं थीं | दुखद है कि इस सन्दर्भ में उनका समग्र मूल्यांकन न हो सका | आलोचकों द्वारा उनकी रचनाधर्मिता को लेकर लगातार उपेक्षा की गयी | प्रश्न यह है कि क्या क्षेत्रीयता आलोचना में रूकावट डालने का कोई मपदंड थी, विचार करें तो हम पाते हैं कि ऐसा नहीं है | सोचिये अगर ऐसा होता तो तुलसी बाबा साहित्य जगत में आज कहाँ पर होते ? हिंदी पट्टी के कई प्रतिभाशाली कवियों के साथ यह दोहरा व्यवहार हुआ | अवधी, ब्रज, मैथिली, राजस्थानी, मगधी, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, बुन्देलखंडी आदि हिंदी की तमाम सारी बोलियाँ हैं | फिर आलोचकों का यह पूर्वाग्रह समझ से परे है | उन्हें समझना होगा कि हिंदी भाषा अगर एक वृक्ष है तो उसकी बोलियाँ उसकी शाखाएं हैं जिसे उससे अलग नहीं किया जा सकता | अन्य लोगों की तो छोड़ दीजिये अब तो अंचलों के लोग भी अपनी भाषा के प्रति जागरूक नज़र नहीं आते | वैश्वीकरण और भाषाई दुराग्रह से आज बोलियाँ भी अपने अस्तित्व से जूझ रही हैं | हमारी अस्मिता पर मंडराता यह संकट गंभीर है इसे सभी को समझना होगा |

इसके अतिरिक्त उठो सोने वालों सबेरा हुआ है..जैसी पंक्तियाँ हों या उठ जाग मुसाफिर भोर भई..जैसी कालजयी कविता । ‘उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई’ कविता से मेरा पुराना नाता है क्योंकि बचपन में अक्सर सुबह सुबह घर पर माता जी या पिता जी इस गीत को गाया करते थे | शुक्ल जी अपने समय में बहुत लोकप्रिय कवि रहे थे | उनके इसी योगदान को लेकर आज भी हम उन्हें सम्मान के साथ याद करते हैं | जनमानस में उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता था कि अवध के गाँव-गाँव में लोगों को उनकी रचनाएँ जबानी याद थीं |

जीवन-जगत की तमाम स्थितियों-परिस्थितियों ने उनमें व्यवस्था के प्रति विद्रोही स्वर पैदा किया था | उस समय देश में स्वतंत्रता आन्दोलन अपने चरम पर था | इस सबका प्रभाव कवि बंशीधर शुक्ल पर भी पड़ा और उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी सक्रिय भागीदारी करते हुए अनेक बार जेल गये | शुक्ल जी वैचारिक स्तर पर कहीं न कहीं गाँधी जी से भी बहुत प्रभावित थे | गाँधी जी को याद करते हुए लिखी गयी उनकी ‘गाँधी बाबा के बिना’ शीर्षक यह कविता दृष्टव्य है,

हमरे देसवा की मँझरिया ह्वैगै सूनि,

अकेले गाँधी बाबा के बिना।

कौनु डाटि के पेट लगावै, कौनु सुनावै बात नई,

कौनु बिपति माँ देय सहारा, कौनु चलावै राह नई,

को झँझा माँ डटै अकेले, बिना सस्त्र संग्राम करै,

को सब संकट बिथा झेलि, दुसमन का कामु तमाम करै।

सत्य अहिंसा की उजेरिया ह्वैगै सूनि,

अकेले गाँधी बाबा के बिना।

उन्होंने स्वतंत्रता से पहले अगर अंग्रेजों की खिलाफत की तो वहीँ स्वतंत्रता मिलने के बाद लोकतंत्र के समाजवादी विरोधी चेहरे को देखकर उन्होंने यह भी कहा, ओ शासक नेहरु सावधान/ पलटो नौकरशाही विधान/ अन्यथा पलट देगा तुमको/ मजदूर, वीर, योद्धा, किसान |” उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि व साफगोई यहाँ स्पष्ट है |

शुक्ल जी ने हिंदी और अवधी दोनों में लेखन किया | अवधी उनकी मातृभाषा थी | उन्हें भान था कि

लोगों के बीच अपनी बात रखने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम उनकी अपनी भाषा-बोली में ही संभव है इसीलिए उन्होंने एक सच्चे जनकवि की भांति अपना अधिकतर लेखन लोकभाषा अवधी में ही किया |

उनकी एक प्रसिद्द कविता ‘महेंगाई’ को देखें,

“हमका चूसि रही मंहगई।
रुपया रोजु मजूरी पाई, प्रानी पाँच जियाई
पाँच सेर का खरचु ठौर पर, सेर भरे माँ खाई। 
सरकारी कंट्रोलित गल्ला हम ना ढूँढे पाई
छा दुपहरी खराबु करी तब कहूँ किलो भर पाई।
हमका चूसि रही मंहगाई।“

बंशीधर शुक्ल की लम्बे लेखन सफ़र (1925 से लेकर 1980 तक) के पीछे एक वृहद् अनुभव संसार था | अपने परिवेश से उन्हें जो कुछ भी मिला उसे उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से वे लगातार अपनी पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ अभिव्यक्त करते रहे | वर्ष 2014 में आपकी जन्मशती पर ‘अवध ज्योति’ पत्रिका के द्वारा विशेषांक निकाला जा रहा है | यह कार्य बहुत ही सराहनीय है | इस तरह के प्रयासों को और गति मिलनी चाहिए | कुल मिलाकर कहा जाय तो  शुक्ल जी लोकचेतना से संपृक्त एक राष्ट्रवादी कवि हैं | उन्हें मालूम है कि लोक से विमुख रहकर साहत्य रचने का कोई मतलब नहीं | उनका सम्पूर्ण साहित्य समाज को नई राह दिखाने वाला साबित हुआ | ऐसे रचनाकारों को साहित्य में आज उनका उचित स्थान न दिया जाना हिंदी साहित्य की कृतघ्नता ही कही जाएगी |

संपर्क सूत्र- 9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध) स.प्र.) ईमेल- rahuldev.bly@gmail.com

आधुनिक अवधी काव्य में व्यंग्य – डॉ. अरविंद कुमार

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आधुनिक अवधी काव्य में व्यंग्य – डॉ. अरविंद कुमार

 जब से सृष्टि का विकास हुआ है तब से मानव अपनी मनः भावनाओं की अभिव्यक्ति करता रहा है। हंसना मुस्कराना, रोना, एवं व्यंग्य करना उसका स्वाभाविक गुण है। अवधी काव्य में व्यंग्य का रूप जो मिलता है वह गोस्वामी तुलसीदास द्वारा विरचित रामचरित मानसके नारद मुनि के मोह से मिलता है। एक बार मायावश नारद जी को कामाग्निसतायी तो नारद जी भगवान विष्णु के पास रूप मांगने गये तो भगवान विष्णु के पास रूप मांगने गए तो भगवान विष्णु ने कहा,

                        हरसि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिहसि समेता॥

                        बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया॥

            रमानिवास भगवान् उठकर बड़े आनन्द से उनसे मिले और ऋषि (नारद जी) के साथ आसन पर बैठ गये। चराचर के स्वामी भगवान हँसकर बोले – हे मुनि! आज आपने बहुत दिनों पर दया की।’’ 1

            भगवान ने नारद जी को आगे भी सावधान होने के लिए कहा,

                        रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्री भगवान।

                        तुम्हरे सुमिरन तें मिटहि मोह मार मद मान॥

            भगवान रूखा मुँह करके कोमल वचन बोले – हे मुनिराज! आपका स्मरण करने से दूसरों के मोह काम मद और अभिमान मिट जाते हैं। फिर आपके लिए तो कहना ही क्या है”2

            स्वयंवर में शिवजी के गण उन पर व्यंग्य करने लगते है। जैसेकि

                        करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुन्दरताई ॥

                        रीझिहि राजकुआँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेसी॥

            वे नारद जी को सुना-सुनाकर व्यंग्य वचन कहते थे – भगवान ने इनको अच्छी सुंदरतादी है । इनकी शोभा देखकर रीझ ही जाएगी औश्र हरि’ (वानर) जानकर इन्हीं को खास तौर से वरेगी।’’3

            आगे चलकर नारद जी का मोह भंग हो गया। खीझि कर नारद जी ने गणों को श्राप दे देते है। यह खीझ मानव के मन में विद्यमान है। इन्हीं खीझों के कारण उसके मानस पटल में व्यंग्य की सृष्टिहोने लगती है।

            आधुनिक अवधी कवियों में वंशीधर शुक्ल रमई काका गुरु प्रसाद सिंह मृगेश’  राजेश दयालु राजेश’  बल भद्र दीक्षित पढ़ीसआद्या प्रसाद मिश्र उन्मत्त द्वारिका प्रसाद मिश्रत्रिलोचन शास्त्री, जुमई खॉ आजादआद्याप्रसाद पीयूषजगदीश पीयूषसुशील सिद्धार्थ भारतेंदु मिश्रविशाल मूर्ति मिश्रविशालनिर्झर प्रताप गढ़ी दयाशंकर दीक्षित देहाती’  काका बैसवारीविकल गोंडवीलवकुश दीक्षितकेदारनाथ मिश्रचंचलअजमल सुल्तानपुरीसतीश आर्यअदम गोंडवीइत्यादि की सर्जनात्मक प्रतिभा ने अवधी को अभिव्यक्ति का नया अंदाज दिया है।

            बलभद्र प्रसाद दीक्षित पढ़ीसकी एक मात्र अवधी काव्य संग्रह चकल्लस’ (१९३३) है। पढ़ीस जी के ग्राम- जीवनानुभवों का प्रमाणिक दस्तावेज है। पढ़ीस के अनुभव -जगत का एक  पहलू गाँव का समस्या ग्रस्त और विसंगतिमय जीवन है जिस पर व्यंग्य मूलक भाषा में चोट करना वे अपना कर्त्तव्य-कर्म मानते हैं। मनईसोनामालीतिरफलासिठ्ठाचारभलेमानसरईसी, ठाटुहम और तुम लरिकउनू एम.ए. पास किहिनहम कनउजिया बाभन आहिनइत्यादि इसी कोटि में आने वाली कविताएँ हैं। मनईकविता में दुश्चरित्रव्यक्तियों राक्षसहोने तक की संज्ञा देते हैं। जैसेकि

                        जो अपनयि मा बूड़ा बाढ़ा,

                        संसारु सयिंति कयि सोंकि लिहिस

                        वुहु राकसु हयि, वहु दानव हयि!

                        अब कउनु कही सुंदर मनई 4

            वंशीधर शुक्ल की कविता का सर्वप्रमुख बिषय है गाँव और किसान पर उनका किसान गाँवखेत के प्रति नहीं अपने देश के प्रति भी सजग है। अशिक्षा अज्ञानता स्वार्थ नई सभ्यता पुरानी परंपराओं और रीतियों में होने वाले बदलाव पर व्यंग्य करते हुए राम-मड़ैया’  कविता में कहते हैः

                        करिया अच्छर  भैंसि बराबरि उजड़ मूढ़ भगवान

                        मचा अँधेरू स्वार्थ का गाना बैरिन का सम्मान।

                        जहाँ नहीं व्यापी अंगरेजी जमि न सकी सुलतानी,

                        नई सभ्यता डरि डरि भागी घर-घर रीति पुरानी।5

            किसान के अर्जीकविता में भारतीय समाज में निर्धनता पर व्यंग्य करते हुए कवि कहता है :

                        गुल्लर हाँथन ते छीनइ भइँसिन का खूब खवावइ

                        जब मेहरी मुँहि ते माँगइ तब उ कुतवा हुइरावइ।

                        वह हुकुरु-हुकुरु कइ रोवइ गिरि-परि कै घर का आवइ

                        जब झुरसइ लगइ करेजा तब पानी सींचि जुड़ावइ।’’ 6

            चन्द्रभूषण त्रिवेदी रमईकाकाका रचना क्षेत्र ग्राम्य जीवन के अनुभवों को विस्तृत फलक पर चित्रित किया है। गाँव की जड़ता और वहाँ के अंधविस्वासों पर प्रहार करने वाली उनकी शैली पाठक और श्रोता के मन को बरबस बाँध लेती है। कचेहरीबरखोजबुढ़ऊ का ब्याह, यह छीछाल्यादरि द्याखौदिसासूलपहली नौकरीतलबध्वारवासाहब ते भ्याँटइत्यादि कविताओं से उनके व्यंग्य-विषय स्पष्ट होते हैं। दादा का खेतुकविता में कवि विरासत में मिली जमीन  को पाकर फूले नहीं समाता है जैसेकि

                        है मिला बपौती मा हमका , फिरि हकु कस दुसरे क्यार हो।

                        केतनिहुँ देवारिन पर यहिका गहबर अँधिया३ भगावा है।’’ 7

            त्रिलोचन शास्त्री का एक मात्र पूर्वी अवधी में लिखित अमोला’ (१९८७) काव्य है। इस काव्य में २७०० बरवै संकलित हैं। अमोला’ (१९८७) की रचनाशीलता के विषय में विश्वनाथ त्रिपाठी का कथन है अमोला त्रिलोचन की सबसे सहज कृति है। यह अभिव्यक्ति उनकी रचनात्मक अनिवार्यता थी। इसमें मुक्तकों में संकलित अंतरंग जीवन-कथा का रस है। अमोलाजनपदीय है इसीलिए वास्तविक भी और सार्वभौम भी। इसमें युग की पीड़ा निजी पीड़ा में निहित होकर आई है। पीड़ा को त्रिलोचन ने बैसवाड़े के किसान का बोली में हमें सुनाया है इसी फक्कड़पने में अंगीकार करके। मानो उपवास बेकारी भूख उपेक्षा आकाश वनस्पति प्रिय-संयोग आदि जीवन -अमोला की डाले, पत्ते, जड़े और फुनगियाँ हों।’’ 8

            कवि त्रिलोचन कहते है चतुर व्यक्ति से सदैव सावधान रहो वह मीठा बोलकर रिश्ता बना लेगा :

                        चाँड़ चँड़ासे केहु केहु से नगचाइ।

                        लखि के बोलइ दादा काका भाइ॥’’9

            कवि ऐसे लोगों के बारे में कहता है जिन्होंने आपके साथ बुरा व्यवहार किया है। यदि चतुर मित्र आपके साथ कूटिनीति करता है, तो समयानुकुल आपको चुप रहना होगा। कवि का कथन है :

                        राजू तोहँकाँ लिहेन सङ्हती लूटि।

                        चुप  मारा  जे सुने  ऊ  करे  कूटि॥’’ 10

            कवि विश्वनाथ पाठक भी सर्वमंगलामहाकाव्य में देशद्रोहियों पर व्यंग्य किया है । न्याय व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करते हुए कहता है :

                        उल्लू बइठे न्यायासन पै

                        राजदंड  लै  हाथे

                        वै हंसन का न्याय पढ़ावें,

                        बड़े गरब के साथ।’’ 11

            यहाँ उल्लूशब्द से आशय अपात्र व्यक्ति सेतथा हंसनशब्द का अर्थ पात्रव्यक्ति से अर्थात न्यायशील व्यक्ति से है। सत्ता शासन अन्यायी अत्याचारी व्यक्तियों के हाथों न्यायवस्थाआ गयी है। उत्तम चरित्र वालों के हाथों में न्याय व्यवस्थादुश्चरित्र व्यक्तियों के हाथों में चली गई है।

            आद्या प्रसाद मिश्र उन्मत्तअनेक कविताओं में व्यंग्य की सहज अभिव्यक्ति हुई है। उनका नितांत अहिंसक है। उनका आक्रोश क्रूरता तक नहीं आता । वे आक्रोश के आक्रामक रूप और व्यंग्य के तीखेपन को हास्य की निर्मलता में ढाल देने वाले सिद्धहस्त कवि हैं। उनकी व्यंग्य कविताओं में तोहरी नानी के हाँड़े माझाड़े रौ मँहगुआदैजा कै मारी कलझि-कलझि पंडित कै परबतिया मरिगैइत्यादि हैं। माटी और महतारीकविता संकलन में उन्मत्त जी सांप्रदायिक उन्माद को उत्पन्न करने वालों की अच्छी खबर लेते है।

                        कबहूँ मस्जिद कबहूँ मंदिर कबहूँ गुरुद्वारा कै बवाल

                        हर परब तीज-तिउहारे मा मनई मुरगा अस भै हलाल।

                        ई चाल-ढाल झंडा- नारा तोहका दुसरेन से मोह अहै

                        आपन पुरखा आपन धरती तोहका अपनेन से द्रोह अहै।

                                    सुख पाया अपनी धरती पै दुसरे कै झंडा गाड़े मा।

                                    तोहरी नानी कै हाँड़े मा।’’12

                                                                        (तोहरी नानी कै हाँड़े मा कविता से)

            इसी तरह उन्मत्त जी ने अपनी कविता झाड़े रौ मँहगुआमें राजनेताओं और उनके चमचों -पिच्छलगुआं पर तीखा व्यंग्य किया है।

            वैश्वीकरण के इस दौर जब समस्त विश्व को एक ग्रामके रूप में स्थापित कर दिया है। ऐसे में हम एक वास्तविक दुनिया का समाज देखने के लिए सपना देख रहे हैं। तब भारत के एक ही गाँव में जाति-धर्म ऊँच-नीच छोटे-बड़े की भावना खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। इस उत्तर आधुनिक युग में छुआछूत अपने पूरे वैभव और ठाटबाट के साथ जीवित है। जुमई खाँ आजाद की कविता कवन मनईमें इस करारे व्यंग्य का स्वाद लिया जा सकता है। जैसेकि

                        छुवई पाई न बसनवाँ कवन मनई।

                        छुआछूम औ भेद-भाव मां फरक न तनिकौ आवा

                        इतना दिन होइगा सोराज का तबौ न फुरसत पावा।

                        खावा पतवा मा भोजनवाँ कवन मनई।

                        छुवई पाई न बसनवाँ कवन मनई॥’’13

            एक ओर हम प्रगति पथ पर चलने का झूठा दिखावा कर रहे हैं दूसरी ओर ब्लैकमेलिंग, ब्लैक मार्केटिंग, घूसखोरी, भ्रष्टाचार में  सचमुच आगे बढ़ते जा रहे है। हाँ देश के महान होने का ढिंढोरा जरूर पीट रहे हैं। नेताओं का जन्मदिन अवश्य मना रहे हैं। नौकरी के लिए आयोजित समस्त परीक्षाओं को संदेह के घेरे में खड़ा करके पउआ भिड़ा रहे हैंघूस दे रहे हैं और नौकरी प्राप्त कर रहे हैं। इन स्थितियों पर व्यंग्य करने वाली आजाद की जन्मदिनकविता  सराहनीय है :

“भरतीय भाव से आरती साजि कै, लीडरन कै जन्मदिन मनावत रहब।

तेल चाही खरीदबै बिलकेइ से हम, मुल प्रगति पथ पर दियना जरावत रहब।

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सख्त कानून बनियन बरे बन गवा, अब मिलावट कै कौनो सवालइ न बा।

अफसरी रंग आपन जमाये अहै, चोरी-डाका कै कौनो बवालै न बा॥’’ 14

अवधी व्यंग्यकारों में विशालमूर्ति मिश्र विशालका एक अलग स्थान है। उनकी व्यंग्य कविताओं में इनके कौन भरोसा लेइहैं वेचि वतनवाँजुर्म केहू आन कै जुर्माना माँगै हमसेहे भइया अपना देश महान केतनाससुरी बेइमनियाँखटिया खड़ी विस्तरा गोलरक्षा किहा तुही भगवानरे मा गयि ससुरी परधानीछाता कै अकाल मौत, पी.ए.सी। कै भरतीझूठी बात नहीं अब फुरवइ सोनचिरैया तरि गयि पलटि के देखा मुसकी मारै मुसम्मात मँहगाईफील गुड फैक्टरकाट्या सब कै कान बहादुर गजब किह्याखूब किह्या कल्यान बहादुर गजब किह्याइत्यादि इनकी हास्य-व्यंग्यपरक श्रेष्ठ अवधी कविताएं हैं। फिर भी भारत देश महान। कितना कडुवा व्यंग्य है – हम तमाचा मारकर गाल लाल कर रहे हैं। भारतीय वोट राजनीति का पोल खोलते हुए कवि कहता है : –

                        जनता माने केवल ओट । बाकी सब कुछ उनकै नोट,

                        एक्कै लक्ष्य एक संधान – रक्षा किहा तुही भगवान।

                          ..                      ..                      ..                    ..

                        वैसे उदई भान वैसे भान। न उनके पूँछ न उनके कान,

                        सब कुछ होय आन कै तान – रक्षा किहा तुही भगवान॥’’ 15

            जगदीश पीयूष अपने नव गीतों में देश की त्रासद स्थिति पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैः-

                        भवा देश म चलन।

                        भाई भाई से जलन॥

                        कैसे जियरा कै हलिया बताई माई जी।

                        केका चबरा कै गलवा देखाई माई जी॥

                        रोवें कनिया म लाल ।

                        भये बनिया बेहाल॥

                          *          *          *

                        होय लूट पाट मार।

                        बाटै रेवड़ी अन्हार॥’’ 16

            मँहगाई के मार से आम – जनजीवन त्रस्त है। समस्त उत्पाद खाद्यान्न, डीजल, पेट्रोल, मँहगा होने से उन्हे खरीद पाना मुश्किल है। कवि अपने गीतों में इस वेदना को व्यंग्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहते है :

                        डीजल आवै दूने दाम।

                        बिजुरी होइगै जै जै राम॥

                        लरिका पांवें नाहीं सेवई औ खीर रामजी।

                        मंहगी होइगै हमरी गटई कै जंजीर रामजी॥’’ 17

            प्राथमिक शिक्षा में शिक्षकोंपर व्यंग्य करते हुए सुशील सिद्धार्थ भारतीय शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलते है। उनके गीतों से स्पष्ट समझा जा सकता है :

                        बारा बजे महट्टर आये

                        तइकै सोइ रहे तनियाये

                        कहिकै गदहौ पढ़ौ पहाड़ा, चुप्पे ते।

                        सिच्छा के भे बंद केंवाड़ा, चुप्पे ते॥

                          *                      *                      *

                        चादरि ओढि़ व्यवस्था स्वावै

                        फाइल फाइल कुतवा रवावै

                        द्यास की आंखि म परिगा माड़ा चुप्पे ते॥’’ 18

            दुनिया आज संक्रमण काल की परिधि में आ गयी है  संस्कृति भी प्रभाव पड़ना लाजमी है। भारतीय समाज पश्चिमी सभ्यता का असर पड़ रहा है। ऐसे में कवि की पैनी नजर तुरंत भाँप लेती है। भारतेंदु मिश्र के गीतों में इस पीड़ा की कसक व्यंग्य के रूप में देखी जा सकती है। जैसेकि :

                        रीति रिवाज पश्चिमी हुइगे

                        लगै लागि पछियाहु।’’ 19

            भारतीय समाज में व्याप्त दहेज एक विकराल समस्या है इसका जितना इलाज किया जा रहा है उतना ही बढ़ता जा रहा है। भारतेंदु मिश्र की नजर इससे ओझल नहीं होने पाई है :

                        सविता की किरनै फूटि रहीं

                        कुता – छंगो सुखु लूटि रहीं

                        तिकड़म की चाल ते अजान

                        बिनु ब्याही बिटिया है जवान ।’’ 20

            दहेजको आज लोगों ने स्वीकार कर लिया है क्योंकि लोग ले रहें है लोग दे रहें है। इसका हल यही है कि दहेजलेने व दहेजदेने वालों के घर विवाहही न करे युवा। इस बात को माता-पिता को भी समझना होगा।

            अनीस देहाती अवधी रचनाकारों में अपना विशिष्ट स्थान बनाए हुए है। वह बहुत ही सधा व्यंग्य करते है तो लोग तिलमिला उठते है । करम कमाई, चँहटा में बूड़ अहै, अरे राम! इतनी अंधेर, केहका देई वोट, मेल – मोहब्बत, रुपइया की खातिरइत्यादि से ओत – प्रोत कविताएं हैं। मेल – मोहब्बत कविता में हिंदु-मुस्लिमपर व्यंग्य करते हुए कहते हैं :

                        मेल –मोहब्बत दुआ – बंदगी,

                        अस गायब भै पाँड़े ।

                        वह देखा ! अब्दुल्लौ चच्चा, खसकेन आँड़े-आँड़े।’’ 21

            क्योंकि बात-चीत , मेल-मिलाप आपस में रिश्ते मजबूत होते है । ऐसे तो आपसी भाई-चारा में दरार पड़ती है। अनीस देहाती इस दरार को मिटाना चाहते हैं। उनकी रचनाओं में विस्तार ही देखा जा सकता है । कवि कहीं न कहीं भाग्यवादी है वह स्वयं पर व्यंग्य करता है :

‘‘सबर करा इ आपन -आपन

करम कमाई बाबू जी।

के देखिस कब चोर-पुलिस मा,

हाथापाई बाबू जी।

            जवन उठा लुंगाड़ा छिन मा,

            टोला जरिके राख भवा,

            एकादसी का लरिकै खेलेन

            हड़ाहडाई बाबू जी।’’ 22

            कवि जयसिंह व्यथितसज्जन को सचेत करते हुए दुरजन की पहचान कैसे करनी चाहिए। उदाहरण देते हुए कहते है :

                        सज्जनता कै ढाल लई दुरजन करै अहेर।

                        सिधवा-सिधवा पेड़ का , करै काटि कै ढेर॥

                        दुरजन अपनी ताक मा, सदा लगावै दावँ।

                        पहिरि अँचला संत कै , घूमै गाँवैं गाँव ॥’’ 23

            व्यथितफैसनकविता में परिधानपर व्यंग्य करते हैं । फैसन के कारण  असली वस्तुएवं नकली वस्तु में पहचान करना बेहद मुश्किल हो गया है।

                        खान पान सनमान मा, फैसन बा अगुवान ।

                        असली का नकली कहै, नकली भा भगवान॥

                          *                      *                      *

                        देखे घर-घर जाइकै फैसन कै करतूत।

                        छोटके बड़के पै चढ़ा ई पश्चिम कै भूत॥’’ 24

            कवि इतने से ही संतुष्ट नहीं है, वह धरम-करम, जातिवाद, भूख, दहेज, स्वास्थ्य, शराब से होने वाले नुकसान इत्यादि पर भी व्यंग्य करता है।

            विजय बहादुर सिंह अक्खड़’  बोर्ड परीक्षा, देखा देखी, हमहूँ अबकी परधान होबपरिवेश का यथार्थ चित्रण व्यंग्य के रूप में किया है। दिखावेपन का कवि उल्लिखित करता हुआ कहता है । जब पिता शराब पियेगा तो पुत्र भी उसी का अनुसरण करेगा। जैसेकि

                        देखा-देखी पाप होइ रहा देखा-देखी पुन्न

                        बाप मस्त गाँजा मा बेटवा दारू पी के टुन्न।’’ 25

            आज तो समय एकल परिवार का हो गया है संयुक्त परिवार विरले ही देखने में शायद मिल जाय। ऐसे में एकल परिवारविखंडित संरचना का मुख्य कारण आये दिन हो ने वाले पारिवारिक झगड़े, आमदनी का स्रोत कम होना, कमाए एक उसी पर समस्त परिवार का टिके रहना । आये दिन खिच – खिच, चिक-चिक, मोटे तौर सास -बहु  के संबन्धों में खटास होना । आजकल तो सास को अपनी प्रिय बहू नहीं समझती न ही बहु साससमझती है। क्योंकि सासबहु को दूसरे की बिटिया समझती रहती और बहु सासबहु को  कभी अपनी माँनहीं समझ पाती है। इन्हीं कमियों को निर्झर प्रतापगढ़ीने आज की सास पतोहुनामक कविता में व्यंग्य के रूप् में प्रस्तुत किया है :

                        अपुवा बुढ़ायी दायीं सोरहौ सिंगार करैं

                                    दिन भै घुमति रहैं गाँव -गली नाका।

                        अपुवा सुपारी खाय पिच्च थूँकि रहैं

                                    ओकरे जौ मन होय परि जाय डाका।

                        मधु कै माछी एस भुन -भुन – भुन -भुन लागि रहीं

                                    सुनत -सुनत ओकर जिउ भवा पाका ।

                        दौडि़ के पतोहु एक बेलना हचकि दिहेस

                                    सासु जी की खोपड़ी मा लाग तीन टाँका”। 26

            निष्कर्षतः इन रचनाकारों की कविताओं के माध्यम से बेइमानों, भ्रष्टाचारियों,  भ्रष्ट नौकरशाह आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था, दहेज फैशन, चोरों, लुटेरों, दुश्चरित्र, खल-कामी, दुर्जन,  पारिवारिक विखण्डन की विसंगतियों , राजनीतिक छल-छदम, साम्प्रदायिक उन्माद, ऊँच-नीच, छुआ-छूत, बेरोजगारी, रीति-रिवाज परंपराओं में परिवर्तन , पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव इत्यादि पर व्यंग्य किया गया है।

संदर्भ:

1.         रामचरित मानस : तुलसीदास , टीकाकार हनुमान प्रसाद पोद्दार  (मझला साइज गीता प्रेस, गोरखपुर , संस्करण 2007, पृ० 115

2.         वही पृ० 115 -116

3.         वही पृ० 119-120

4.         आधुनिक अवधी काव्यः सं० डा० महावीर प्रसाद उपाध्याय, प्रकाशन केंद्र डालीगंज रेलवे क्रासिंग, सीतापुर रोड लखनऊ पृ० 70

5.         वही पृ० 80

6.         वही पृ० 81

7.         वही पृ० 151

8.         युग तेवर : सं० कमल नयन पाण्डेय, त्रैमासिक , दिस० – फरवरी 2008-09 वर्ष 3-4 अंक -4, पृ० 192

9.         अमोला : त्रिलोचन शास्त्री, पृ० 93

10.       वही पृ० 95

11.       आधुनिक अवधी काव्य : सं० डॉ० महावीर प्रसाद उपाध्याय, पृ० 103

12.       माटी औ महतारी : आद्या प्रसाद मिश्र उन्मत्त , पृ० 49-50

13.       पहरुआ : जुमई खाँ आजाद, पृ० 74

14.       वही, पृ० 35

15.       गीता माधुरी : विशालमूर्ति मिश्र विशालपृ० 109

16.       अवधी त्रिधारा : सं० राम बहादुर मिश्र, अवधी अकादमी सृजनपीठ गौरीगंज, सुल्तानपुर (उ०प्र०) संस्करण 2007, पृ० 54

17.       वही पृ० 55

18.       वही पृ० 90

19.       वही पृ० 120

20.       वही पृ० 107

21.       करम कमाई : अनीस देहाती ,अनुज प्रकाशन बाबागंज, प्रतापगढ़ उ०प्र०  संस्करण 2009, पृ० 52

22.       वही पृ० 88

23.       अवध सतसई : डा० जयसिंह व्यथित, गुजरात हिंदी विद्यापीठ, कमलेश पार्क  महेश्वरी नगर ओढ़व अहमदाबाद सं० 1999 पृ० 44

24.       वही, पृ० 66

25.       निर्झर प्रतापगढ़ी : हास्य फुलझडि़याँ  पृ 53

                                                                                        संप्रतिः असि० प्रो० हिंदी

                                                                                     रा० म० महावि० ढिंढुई पट्टीप्रतापगढ़उ०प्र०

जनता द्वारा मूल्यांकित कवि हैं रमई काका! : विश्वनाथ त्रिपाठी

जनता द्वारा मूल्यांकित कवि हैं रमई काका! : विश्वनाथ त्रिपाठी

यह ४८-४९ की बात है, भारत आजाद हो गया था। मैं बलरामपुर में पढ़ता था। बलरामपुर रियासत थी, अवध की मशहूर तालुकेदारी थी वहाँ, समझिये कि लखनऊ और गोरखपुर के बीच की सबसे बड़ी जगह वही थी। वहीं मैं डी.ए.वी. स्कूल से हाई स्कूल कर रहा था। वहाँ एक बहुत अच्छा स्कूल था, एल.सी. कहलाता था, लॊयल कॊलिजिएट, महाराजा का बनवाया हुआ था और बहुत अच्छा था। उसमें बहुत अच्छे अध्यापक होते थे। संस्कृत के पं. रामप्रगट मणि थे। उर्दू में थे इशरत साहेब जिनको हम गुरू जी कहते थे। वहाँ मुशायरे बहुत अच्छे होते थे, बहुत अच्छे कवि सम्मेलन होते थे। एक बार कवि सम्मेलन हुआ वहाँ, उसी में रमई काका आये हुए थे।

3

 रमई काका के साथ एक कवि थे, ‘सरोजनाम में था उनके। नये कवि थे, मशहूर थे। लेकिन रमई काका ज्यादा मशहूर थे। तब रमई काका की उमर रही होगी ३५-४० के बीच में। अच्छे दिखते थे, पतले थे। काली शेरवानी पहने थे। पान खाए हुए थे। उन्होंने काव्य-पाठ किया। उन्होंने जो कविताएँ पढ़ीं, तो उसकी पंक्तियाँ सभी को याद हो गईं। अवधी में थी, बैसवाड़ी में। इतना प्रभाव पड़ा उनके काव्य-पाठ का, कि हम लोगों ने एक बार उनका काव्य-पाठ सुना और कविताएँ याद हो गयीं। कवि सम्मेलन समाप्त होने के बाद भी हम लोग उन कविताओं को पढ़ते घूमते।

जो कविता उनकी सुनी थी, उसका शीर्षक था ध्वाखा होइगा। अभी याद है, इसकी पंक्तियाँ इस तरह हैं:
हम गयन याक दिन लखनउवै , कक्कू संजोगु अइस परिगा
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख , सो कहूँकहूँ ध्वाखा होइगा!
जब गएँ नुमाइस द्याखै हम , जंह कक्कू भारी रहै भीर
दुई तोला चारि रुपइया कै , हम बेसहा सोने कै जंजीर
लखि भईं घरैतिन गलगल बहु , मुल चारि दिनन मा रंग बदला
उन कहा कि पीतरि लै आयौ , हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा!


इसमें फिर तमाम स्थितियाँ आती हैं, हम कहाँ-कहाँ गये फिर वहाँ क्या हुआ। एक जो गाँव का ग्रामीण है वह शहर जाता है तो उसे अपरिचित दुनिया मिलती है। उस अपरिचित दुनिया में वह अपने को ढाल नहीं पाता। वहाँ का आचार-विचार-व्यवहार सब अपरिचित होता है। वह भी उस दुनिया में आश्चर्य में रहता है और दूसरे भी उसे लेकर आश्चर्य में पड़ते हैं। इसमें एक जगह है, दुकान में जैसे औरत की मूर्ति बनाकर कपड़े पहना देते हैं तो वह ग्रामीण उसे सचमुच की औरत समझ बैठता है, लोगों के बताने पर समझ में आता है कि ध्वाखा होइगा।फिर एक जगह सचमुच की औरत को वह माटी की मूर्ति समझ कर हाथ रख बैठता है, स्थिति इस तरह बन जाती है, ‘उइ झझकि भकुरि खउख्वाय उठीं , हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा!बहुत अच्छी कविता है।

रमई काका की कविताएँ देशभक्ति की भावना से भरी हुई हैं। उनकी हर तरह की कविताओं में, चाहे वह हास्य कविताएँ हों, व्यंग्य की कविताएँ हों, शृंगार की कविताएँ हों; सबमें देशभक्ति का भाव रचा-बसा है। एक तो देशभक्ति का भाव दूसरे वे कविताएँ आदमी को बनाने की, संवारने की, कर्तव्य पथ पर लगाने की प्रेरणा देती थीं। एक तरफ तो कविताओं में देशभक्ति का पाठ था दूसरी तरफ वे कविताएँ एक आचार-संहिता भी इससे प्रस्तुत करती थीं; चाहे हास्य से, चाहे व्यंग्य से, चाहे करुणा से, चाहे उत्साह देकर। ये कविताएँ जीवनवादी कविताएँ भी हैं। चूँकि ये कविताएँ अवधी में थीं इसलिए बड़ी आत्मीय थीं। बड़ा फर्क पड़ जाता है, कविता कोई अपनी बोली में हो, कविता कोई राष्ट्रभाषा में हो और कविता कोई विदेशी भाषा में हो। आस्वाद में भी बड़ा अंतर पड़ जाता है।

भारत वर्ष नया नया आजाद हुआ था। उस समय बड़ा उत्साह-आह्लाद था। आशा-आकांक्षा भी थी। हालांकि विभाजन की त्रासदी झेल रहा था देश, और वह भी कविता में व्यक्त होता था। ये जो कविताएँ अवधी में हैं, भोजपुरी में हैं या दूसरी बोलियों में हैं, हम लोग समझते हैं कि इनमें ज्यादातर हास्य या व्यंग्य की ही कविताएँ होती हैं। इन कविताओं के सौंदर्य-पक्ष की कई बातों की हम उपेक्षा कर देते हैं। जैसे बौछारकी यह कविता अवधी मेंहै

 ‘विधाता कै रचना’:
जगत कै रचना सुघरि निहारि
कोयलिया बन-बन करति पुकारि
झरे हैं झर-झर दुख के पात
लहकि गे रूखन के सब गात
डरैयन नये पात दरसानि
पलैयन नये प्वाप अंगुस्यानि
पतौवन गुच्छा परे लखाय
परी है गुच्छन कली देखाय
कली का देखि हँसी है कली
गगरिया अमरित की निरमली
प्रकृति की इतनी सुन्दर कविताएँ निराला को छोड़ दीजिये तो शायद ही खड़ी बोली के किसी कवि के यहाँ मिलें। निराला की भाषा और इस भाषा में कितना अंतर है। एकदम सीधे असर! जगत कै रचना सुघरि निहारि / कोयलिया बन-बन करति पुकारि’ : अब इसका आप विश्लेषण करें तो कोयल जो बोल रही है वह जगत की सुन्दर रचना को निहार करके बोल रही है। यह निहारना क्रिया अद्भुत क्रिया है। इसका उपयुक्त प्रयोग खड़ी बोली में निराला ने किया है। सरोज स्मृतिमें जब सरोज के भाई ने उसे पीटा, दोनों बच्चे थे खेल रहे थे, तो पीट कर मनाने लगे सरोज को — ‘चुमकारा फिर उसने निहार। बेचारी छोटी बहन है, रो रही है, ये सारी बातें उस निहारने में आ गयीं। निहारका अप्रतिम कालजयी उपयोग तुलसीदास ने किया है। जनक के दूत जब दशरथ के यहाँ पहुँचे संदेश ले कर कि दोनों भाई सकुशल हैं, तो दशरथ दूतों से कहते हैं:
भैया, कुसल कहौ दोउ बारे।
तुम नीके निज नैन निहारे॥


निहारनादेखना नहीं है। मन लगा कर देखने को निहारना कहते हैं। कोयलिया बन-बन पुकार रही है। यह तो सीधे लोकगीतों से आया है। हमारे यहाँ अवधी के कवि हैं, बेकल उत्साही, बलरामपुर के हैं, हमारे साथ पढ़ते थे। उनकी पहली कविता जो बहुत मशहूर हुई थी, ‘सखि बन-बन बेला फुलानि। बन-बन का मतलब सर्वत्र।

ये हमारे जो कवि हैं, अन्य को दोष क्या दूँ मैंने भी नहीं किया यह काम, जिनके अंदर सौंदर्य है उनका विश्लेषण हम लोग नहीं करते। बाकी कविताओं का तो करते हैं। होता यह है कि फिर ये हमारे कवि उपेक्षित रह जाते हैं। जो इनके योग्य है, वह इन्हें मिलता नहीं है। दुर्भाग्य कुछ ऐसा है कि जिन लोगों ने अवधी भाषा को, इसके सौंदर्य को ऊपर उठाने का जिम्मा ले रखा है जोकि अच्छा काम है लेकिन मैं इस अवसर पर जरूर कहना चाहता हूँ कि उन लोगों की गतिविधियों को देख करके ऐसा नहीं लगता कि ये लोग सचमुच किसी उच्च आदर्श से, देशप्रेम से या अवधी के प्रेम से काम कर रहे हैं। कभी-कभी तो यह शक होने लगता है कि वे अपने छोटे-छोटे किसी स्वार्थ से लगे हुए हैं। ऐसे में भी ये कवि उपेक्षित रह जाते हैं। ऐसे ही कवियों में रमई काका भी हैं। वरना जरूरत तो यह है कि बहुत व्यापक दृष्टि से इन कवियों का पुनर्मूल्यांकन क्या कहें, मूल्यांकन ही नहीं हुआ है, यह किया जाय। लेकिन जनता ने इनका मूल्यांकन किया है। अभी भी जहाँ रमई काका की कविताएँ पढ़ी जाती हैं, लोग सुनते हैं, उन पर इनका असर होता है।

(प्रस्तुति: अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी। यह लेख विश्वनाथ त्रिपाठी जी द्वारा बोलागया, जिसे बाद में लिपिबद्ध किया गया। साभार: अवधी कै अरघान से)

[जनकृति के लोकभाषा विशेषांक में प्रकाशित]