विमर्श व स्त्री-विमर्श की अवधारणा को समझते हुए प्रस्तुत शोध आलेख हिंदी में स्त्री-विमर्श के स्वरूप को उद्घाटित करता है तथा हिंदी में स्त्री विमर्श के विकास में अनुवाद की भूमिका को विश्लेषित करता है। हिंदी के मूल रचनाकार जैसे नासिरा शर्मा, कृष्णा सोबती, चित्रा मुद्गल, मैत्रेयी पुष्पा, मृदुला गर्ग, अनामिका, सूर्यबाला आदि की रचनाओं से हिंदी में स्त्री-विमर्श का स्वरूप स्पष्ट होता है। ये रचनाकार स्त्री को पाठ रूप में स्वीकार कर स्त्री जाति का मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, आर्थिक, एतिहासिक रूप में विश्लेषण कर स्त्री-विमर्श की विभिन्न समस्याओं पर बात कर रही है, परंतु साथ ही साथ हिंदी में इस विमर्श तथा विचारधारा को स्वरूप प्रदान करने में हिंदीतर भाषाओं से हिंदी में स्त्री पाठ विषयक अनुवादों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतीय भाषाओं से हिंदी में अनूदित उपन्यासों की चर्चा प्रस्तुत शोध आलेख में की गई है, जो हिंदी साहित्य में मूलतः नहीं है, परंतु अनुवाद के माध्यम से इन उपन्यासों में उठाई गयी समस्या हिंदी के स्त्री-विमर्श को न केवल विकसित करती है, अपितु सुदृढ़ भी करती है।
35-40 चेहरे और शरीर की सर्जरी। 20-30 लाख और इससे भी ज्यादा का खर्च। बावजूद उसके आप पहले जैसा चेहरा या शरीर ना पा सकें तो क्या गुजरेगी आप पर। इसी कहानी को कहती है यह डॉक्यूमेंट्री- 'ब्यूटी ऑफ़ लाइफ़'।
प्रेमचंद के उपन्यासों की पत्रकारिता विभिन्न समाचार पत्रों-पत्रिकाओं के संपादन एवं उनमें प्रकाशित होने वाले समाचार नोटिस आदि को व्यक्त करती है। इनके उपन्यासों में व्यक्त पत्रकारिता से पता चलता है कि आजादी से पूर्व के भारतीय समाचार- पत्र जनता एवं ब्रिटिश सरकार की गतिविधियों को प्रसारित करने का कार्य किया करते थे। ज्यादातर पत्रों में देशभक्ति और स्वदेश को महत्व दिया जाता था। प्रेमचंद के उपन्यासों में कमला, सरस्वती, जगत, हिंदुस्तान-रिव्यू, गौरव, आर्य-जगत्, प्रजा-मित्र बिजली आदि पत्रों के संपादन से संबंधित प्रसंग व्यक्त हुए हैं।
आलोच्य उपन्यास 'सोनम' भूटान के साकतेंग और मिरोक क्षेत्र में तथा अरुणाचल के पश्चिमी श्रेत्र कामेंग और तवांग के आसपास बसने वाले ब्रोक्पा (पशुपालक) आदिवासी समाज की अनोखी एवं विशिष्ट संस्कृति पर आधारित है। इस उपन्यास की कथा याक, चंवरी गाय, भेड़- बकरी और घोड़ा आदि का पालन करने वाले ब्रोक्पा समुदाय जो बहुपति प्रथा का पालन करते हैं के इर्द-गिर्द घूमती है। जिन की सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश और प्रथाओं की समाजशास्त्रीय दृष्टि से व्याख्या करने की भी जरूरत है।
भारत को परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त करवाने में यदि किसी ने योगदान दिया तो वह पहाड़ियां समाज के वीर नायक बाबा तिलकामांझी थे। जिन्होंने अपने अदम्य साहस और शौर्य से ईस्ट इंडिया कंपनी के झंडे को ललकारा और अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों से कंपनी की दमनकारी योजनाओं का विनाश किया। इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि भारत को स्वतंत्र कराने में समय-समय पर अनेक प्रकार के आंदोलन और विद्रोह हुए। जिन्होंने ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया लेकिन इन सभी आंदोलनों के नायक तो आदि नायक अर्थात् आदिवासी ही थे। हुल पहाड़िया उपन्यास यथार्थ के धरातल को व्यक्त करने वाला एक ऐसा उपन्यास है। जिसमें इतिहास को यथार्थ के धरातल पर पाठकों के समक्ष लेखक ने बड़ी मेहनत के साथ प्रकट किया है। इतिहास के वीर नायकों को आधुनिक पीढ़ी से रूबरू कराने में कुल पहाड़िया उपन्यास सर्वदा सार्थक सिद्ध हुआ है।
तुलसीदास निःसंदेह मध्ययुग की महत्त्वपूर्ण वैचारिक क्रांति की चरम परिणति थे परन्तु साथ ही उन्होंने जिन मूल्यों की स्थापना की वे आज भी मानव-समाज की मूल्य-रिक्तता को भरने में पूर्णरूपेण सक्षम है। नवीन बौद्धिक चेतना से संबंधित आज का युव-मानस पुराने मूल्यों को नकार रहा है पर उनके समक्ष नवीन जीवन मूल्यों का कलेवर स्पष्ट नहीं हो पा रहा है ऐसे में तुलसी के सामाजिक परिवेश, उनकी लोकमंगलवादी मान्यता और भक्ति-संबंधिनी विशिष्ट दृष्टि से हम अपनी समस्याओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
२५ दिसम्बर १९२७ का दिन भारतीय इतिहास का एक अविस्मरणीय दिन बन गया, जब एक आधुनिक न्यानवादी मनु ने पुरातन अन्यायवादी मनु की व्यवस्थाओं को भस्मीभूत कर दिया। इसी मनु द्वारा भारतीय संविधान के रूप में नई व्यवस्था दी गई थी जो आज हमारे देश का सर्वोच्च विधान है। इस प्रकार डॉ बाबा साहेब अंबेडकर ने नारी व दलितों को समानता एवं स्वतंत्रता के मानवाधिकार दिलाकर भारतीय समाज के माथे पर लगी अन्याय और असमानताओं की कलंक कालिमा को धोने में अपना सारा जीवन खपा दिया।
प्रभात रंजन की कहानियों में जो घटनाएं हैं उनका कारण और उनका समय पहचानने के लिए ‘जानकीपुल’ कहानी का यह एक पैरा ही पर्याप्त है, ‘जब तक पक्की सड़क नहीं बनी थी मधुवन गांव के लोग बड़े संतोषपूर्वक रहते और नदी के उस पार के जीवन को शहर का जीवन मानते और अपने जीवन को ग्रामीण और बड़े संतोषपूर्वक अपना सुख-दुख जीते। कोलतार की उस पक्की सड़क ने उनके मन को उम्मीदों से भर दिया था।
हिन्दी कहानी का सौन्दर्य : चिंतन और विश्लेषण
डॉ. प्रवीण कुमारहिंदी विभाग,इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय,अमरकंटक मध्यप्रदेश-484887मो- 09424895615/9752916192ई-मेलः pravinkmr05@gmail.com
सारांशः
प्रस्तुत शोधपत्र हिन्दी कहानी के बदलते सौन्दर्य...