शब्दखोज

उत्तर-उपनिवेशवाद -

उत्तर-उपनिवेशवाद की अवधारणा यूरोपीय उपनिवेशों से आजाद होने वाले देशों में स्वत्व की तलाश से पैदा हुई है। अपनी अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान को हासिल करने की छटपटाहट उत्तर उपनिवेशवाद के केंद्र में है। उत्तर-उपनिवेशवाद के बहस के केंद्र में संस्कृति और भाषा है। इस विचारधारा के चिंतकों का मानना है कि कोई भी साम्राज्यवादी देश अपने उपनिवेश न सिर्फ भौतिक रूप से क्षति पहुँचाता है, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी। उत्तर-उपनिवेशवाद मानता है कि उपनिवेशवाद से आजाद होने के बावजूद औपनिवेशिक अवशेष संस्कृति, भाषा, इतिहास दृष्टि आदि के रूप में बचे होते हैं। इन औपनिवेशिक अवशेषों को नष्ट करना ही उत्तर उपनिवेशवादी विचारधारा का उद्देश्य है। इसके लिए देसी बुद्धिजीवी स्थानीय साहित्य, संस्कृति, भाषा, इतिहास का पुर्ननिर्माण करने का प्रयास करते हैं, जो उस आजाद हुए देश और उसके लोगों को अलग पहचान देता है। इस प्रक्रिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जन्म होता है। इस राष्ट्रवाद में नस्ल, जाति, धर्म और अतीत के कई सवाल उठते हैं, जिनका उद्देश्य ‘अस्मिता की तलाश’ होता है।

उत्तराधुनिकवाद - उत्तराधुनिकवाद: वर्तमान समय में कुछ पाश्चात्य समाज वैज्ञानिक अपने देश के संदर्भ में आधुनिकवाद के स्तर से एक कदम आगे बढ़ कर आधुनिकोत्तर स्तर की बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि पाश्चात्य विकसित देशों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया अब लगभग समाप्त हो चुकी है। उनका समाज विकास के एक नई अवस्था में प्रवेश कर चुका है, जिसे वें उत्तराधुनिकतावाद की संज्ञा देते हैं। दूसरे शब्दों में, आज पाश्चात्य देश औद्यौगिक विकास एवं आधुनिकता की चरम सीमा को लाँघ चुका है। पाश्चात्य देशों की सभ्यता और संस्कृति विकास की उस ऊँचाई पर खड़ी है कि उसे आधुनिक की जगह उत्तराधुनिक काल कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। उत्तर आधुनिकता की अवधारणा का प्रयोग आधुनिकता जैसी अवधारणा की विरोधी अवधारणा के रूप में किया जाता है।

गिरमिटिया - इतिहास के अनुसार भारत में अंग्रेजों द्वारा गिरमिटिया प्रथा सन् 1834 में शुरु की गई थी, जिसमें वे ग़रीबीलाचारीबेरोजगारी और भुखमरी से बेहाल लगभग 10 से 15 हज़ार भारतीय मजदूरों को हर साल गुलाम बनने की शर्त पर एक `एग्रीमेंट करवाकर फिजीब्रिटिश गुयानाडच गुयानाकीनियामॉरिशसट्रिनीडाडटोबेगानेटाल (दक्षिण अफ्रीका) आदि देशों में भेज दिया जाता था। चूँकि ये लोग एग्रिमेंट के तहत जाते थे और भारतीय लोग इस अँग्रेजी शब्द का उच्चारण गिरमिट करते थे, अतः शनैः शनैः अँग्रेज भी उनको गिरमिट मजदूर कहने लगे। इस तरह इन मज़दूरों को गिरमिटिया कहा जाने लगा और यह प्रथा भारत की अँग्रेजों द्वारा बनाई गई गिरमिटिया प्रथा के नाम से इतिहास में दर्ज हो गई। गिरमिटिया प्रथा बाकायदा सरकारी नियमों और सरकारी संरक्षण प्राप्त लोगों के कारोबार के तहत खूब फली फूली। जिन देशों में ये भारतीय गुलाम इस प्रथा के तहत भेजे गए, आज भी वे देश गिरमिटिया देशों के नाम से जाने जाते हैं।

छायावाद - छायावादी काव्य में आत्मपरकता, प्रकृति के अनेक रूपों का सजीव चित्रण, विश्व मानवता के प्रति प्रेम आदि की अभिव्यक्ति हुई है। इसी काल में मानव मन के सूक्ष्म भावों को प्रकट करने की क्षमता हिंदी भाषा में विकसित हुई। छायावाद विशेष रूप से हिंदी साहित्य के रोमांटिक उत्थान की वह काव्य-धारा है जो लगभग 1918 से 1936 तक की प्रमुख युगवाणी रही। इसमें जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा आदि मुख्य कवि हुए। यह सामान्य रूप से भावोच्छवास प्रेरित स्वच्छन्द कल्पना-वैभव की वह स्वच्छन्द प्रवृत्ति है जो देश-कालगत वैशिष्ट्य के साथ संसार की सभी जातियों के विभिन्न उत्थानशील युगों की आशा-आकांक्षा में निरंतर व्यक्त होती रही है।

तार्किक भाववाद - तार्किक भाववाद अपने मूल रूप में विश्लेषणात्मक दर्शन है। भाषा का तार्किक विश्लेषण इत्यादि सिद्धांतों से लगता है कि तार्किक भाववाद वस्तुवादी सिद्धांत है। किंतु ज्ञानमीमांसा की दृष्टि से यह वर्कले के आत्मगत प्रत्ययवाद के निकट पड़ता है। यद्यपि यह वैज्ञानिक संकेत, प्रतीक, वाक्यों इत्यादि की शब्दार्थ विज्ञान के अनुसार व्याख्या करता है, तथापि इसे बाह्य जगत् में विश्वास नहीं है। तार्किक भाववाद के अनुसार हमें बाह्य   जगत् का ज्ञान नहीं हो सकता। हम सिर्फ अपने संवेदों को जान सकते हैं, बस। गुलाब स्वयं में क्या है, नहीं कहा जा सकता। लेकिन वह लाल है, सुगंधित और कोमल है, यही कहा जा सकता है। जिस गुलाब को हम जानते हैं, वह हमारे संवेदों से निर्मित होता है। यहीं इस दर्शन की सीमा समाप्त होती है।

तुलनात्मक साहित्य - तुलनात्मक साहित्य किसी भी देश या राष्ट्र के विभिन्न विचारधारा एवं उसके चिंतन के अध्ययन करने का महत्वपूर्ण अंग है.तुलनात्मक साहित्य अंग्रेजी के कम्पेरेटिव लिटरेचर (Comparative Literature)का हिंदी अनुवाद है|तुलनात्मक शब्द की बात करें तो अंग्रेजी में सबसे पहले इसका प्रयोग मैथ्यू अर्नाल्ड ने ऐम्पियर के शब्दों इस्तवार कोपरातीव का अनुवाद करते हुए सन 1848 . में किया था.तुलनात्मक शब्द में तुलना करने की प्रक्रिया जुडी हुयी है और तुलना में वस्तुओं को कुछ इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है जिससे उनमें  साम्य या वैषम्य का पता लग सके|इसी दृष्टि से अंग्रेजी में तुलनात्मक शब्द का प्रयोग लगभग सन 1598 .से हो रहा है क्योंकि इसी समय फ्रांसिस मेयरस ने इसी अर्थ को ध्यान में रखकर एक पुस्तक लिखी थी ,'ए कंपरेटिव डिस्कोर्स ऑफ आवर इंग्लिश पोएट्स विद द ग्रीक लैटिन एंड इटालियन पोएट्स ' परंतु तुलनात्मक तथा साहित्य इन् दो शब्दों का युग्म प्रयोग पहले-पहल मैथ्यू अर्नाल्ड ने किया|सन 1886 ई में अपनी एक पुस्तक का शीर्षक कम्पेरेटिव लिटरेचररखकर सर्वप्रथम एच.एम.पासनेट ने इस विद्याशाखा को स्थायित्व प्रदान करने का प्रयत्न किया था.बाद में सन 1901 .मेंद साइंस ऑफ कम्पेरेटिव लिटरेचरके नाम से उनका एक लेख भी प्रकाशित हुआ.वस्तुतः 20 वीं सदी की शुरुआत से कम्पेरेटिव लिटरेचर पद का प्रयोग शुरू  हो गया था.

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद - इस भौतिकवाद को तीन तत्वों- अवस्थान (थीसिस), प्रत्यवस्थान (ऐन्टीथीसिस) और साम्यावस्था (सिनेथीसिस) के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया है। मार्क्स का मानना है कि इस जगत में प्रत्येक वस्तु में विरोधी तत्व विद्यमान रहते हैं और उनमें निरंतर द्वंद चलता रहता हैं। इस निरंतर द्वंद के चलते एक समय ऐसा आता है कि इन विरोधी तत्वों में संतुलन स्थापित हो जाता है- “अवस्थावान (थीसिस) अपने ही सन्नहित विरोधी तत्वों से द्वंद्व करता हुआ प्रत्यावस्थान (ऐन्टीथीसिस) में परिणत हो जाता है और आगे चलकर दोनों में संतुलन स्थापित हो जाता है, तो वह साम्यावस्था (सिन्थेसिस) की स्थिति में आ जाती है, किन्तु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रह पाती। विरोधी तत्त्व पुनः उद्भूत होते हैं, द्वंद्व चलने लगता है। मार्क्स इसी प्रक्रिया को आधार बनाकर वर्तमान समय को व्याख्यायित करते हुए बताता है कि- “पूंजीवादी वर्ग प्रस्तुत अवस्थावान (थीसिस) है। सर्वहारा वर्ग प्रत्यवस्थावान (ऐन्टीथीसिस) है। इन दोनों का द्वंद्व अनिवार्य है। द्वंद्व के पश्चात साम्यवाद के रूप में साम्यावस्थान (सिन्थिसिस) की स्थिति आना अवश्यम्भावी है।

पुनर्जागरण - पुनर्जागरण या नवजागरण के फलस्वरूप उत्पन्न हुई आधुनिकता से जोड़ा जा सकता है। पुनर्जागरण ने धर्म के स्थान पर तर्क को वरीयता दी और पुरानी धार्मिक मान्यताएँ ध्वस्त हुईं। अलग-अलग पहचान समूहों के लोगों ने अपने शोषण और पीड़ा के कारणों को धार्मिक ग्रंथों की जगह इतिहास और स्मृति के आईने में देखना शुरू किया।

पुष्टिमार्ग - पुष्टिमार्गीय भक्ति का दर्शन शुद्धादैतवाद है जो शंकाराचार्य के अद्वैतवाद के विरोध के फलस्वरूप आया। अद्वैतवाद जहां निर्गुण भक्ति का समर्थन करता है वहीं शुद्धाद्वैतवाद सगुण भक्ति का । पुष्टिमार्गीय भक्ति के आधारभूमि लिए शंकाराचार्य का अद्वैतवाद तो एक कारण बना ही, इसके अलावा तत्कालीन परिस्थितियां भी उतनी ही जिम्मेदार रहीं । इस भक्ति के प्रतिपादक आचार्य महाप्रभु वल्लभाचार्य ने श्रीमदभागवत के ‘पोषणं तदनुग्रह:’ के आधार पर अपनी भक्ति का नाम ‘पुष्टिमार्ग’ रखा। श्रीमदभागवत के द्वितीय स्कन्ध के दशम अध्याय में वर्णित जो दस विषय हैं, उनमें से एक ‘पोषण’ भी है। भक्तों के उपर जब भगवान की असीम कृपा होती है तब भक्त और भगवान का तादात्मीकरण हो जाता है । इसी कृपा को ‘पोषण’ कहते हैं । ‘पोषण’ भगवान के अनुग्रह पर अवलम्बित होता है । इसलिए इसमें भगवान के अनुग्रह पर सर्वाधिक बल दिया जाता है । यह अनुग्रह ही भक्त का कल्याण करता है । पुष्टिमार्ग की भक्ति प्रेम-लक्षणा भक्ति है ।

प्रगतिवाद - मार्क्सवादी विचारधारा का साहित्य में प्रगतिवाद के रूप में उदय हुआ। यह समाज को शोषक और शोषित के रूप में देखता है। प्रगतिवादी शोषक वर्ग के खिलाफ शोषित वर्ग में चेतना लाने तथा उसे संगठित कर शोषण मुक्त समाज की स्थापना की कोशिशों का समर्थन करता है। यह पूँजीवाद, सामंतवाद, धार्मिक संस्थाओं को शोषक के रूप में चिन्हित कर उन्हें उखाड़ फेंकने की बात करता है। प्रगति का सामान्य अर्थ है- आगे बढ़ना और वाद का अर्थ है- सिद्धान्त। इस प्रकार प्रगतिवाद का सामान्य अर्थ है - आगे बढ़ने का सिद्धांत। लेकिंग प्रगतिवाद में इस आगे बढ़ाने का एक विशेष ढंग है, विशेष दिशा है जो उसे विशिष्ट परिभाषा देता है। इस अर्थ में प्राचीन से नवीन की ओर, आदर्श से यथार्थ की ओर, पूँजीवाद से समाजवाद की ओर, रूढ़ियों से स्वच्छंद जीवन की ओर, उच्चवर्ग की ओर तथा शांति से क्रांति की ओर बढ़ाना ही प्रगतिवाद है।

Sending
User Review
0 (0 votes)