शब्दखोज

पुनर्जागरण - पुनर्जागरण या नवजागरण के फलस्वरूप उत्पन्न हुई आधुनिकता से जोड़ा जा सकता है। पुनर्जागरण ने धर्म के स्थान पर तर्क को वरीयता दी और पुरानी धार्मिक मान्यताएँ ध्वस्त हुईं। अलग-अलग पहचान समूहों के लोगों ने अपने शोषण और पीड़ा के कारणों को धार्मिक ग्रंथों की जगह इतिहास और स्मृति के आईने में देखना शुरू किया।

पुष्टिमार्ग - पुष्टिमार्गीय भक्ति का दर्शन शुद्धादैतवाद है जो शंकाराचार्य के अद्वैतवाद के विरोध के फलस्वरूप आया। अद्वैतवाद जहां निर्गुण भक्ति का समर्थन करता है वहीं शुद्धाद्वैतवाद सगुण भक्ति का । पुष्टिमार्गीय भक्ति के आधारभूमि लिए शंकाराचार्य का अद्वैतवाद तो एक कारण बना ही, इसके अलावा तत्कालीन परिस्थितियां भी उतनी ही जिम्मेदार रहीं । इस भक्ति के प्रतिपादक आचार्य महाप्रभु वल्लभाचार्य ने श्रीमदभागवत के ‘पोषणं तदनुग्रह:’ के आधार पर अपनी भक्ति का नाम ‘पुष्टिमार्ग’ रखा। श्रीमदभागवत के द्वितीय स्कन्ध के दशम अध्याय में वर्णित जो दस विषय हैं, उनमें से एक ‘पोषण’ भी है। भक्तों के उपर जब भगवान की असीम कृपा होती है तब भक्त और भगवान का तादात्मीकरण हो जाता है । इसी कृपा को ‘पोषण’ कहते हैं । ‘पोषण’ भगवान के अनुग्रह पर अवलम्बित होता है । इसलिए इसमें भगवान के अनुग्रह पर सर्वाधिक बल दिया जाता है । यह अनुग्रह ही भक्त का कल्याण करता है । पुष्टिमार्ग की भक्ति प्रेम-लक्षणा भक्ति है ।

प्रगतिवाद - मार्क्सवादी विचारधारा का साहित्य में प्रगतिवाद के रूप में उदय हुआ। यह समाज को शोषक और शोषित के रूप में देखता है। प्रगतिवादी शोषक वर्ग के खिलाफ शोषित वर्ग में चेतना लाने तथा उसे संगठित कर शोषण मुक्त समाज की स्थापना की कोशिशों का समर्थन करता है। यह पूँजीवाद, सामंतवाद, धार्मिक संस्थाओं को शोषक के रूप में चिन्हित कर उन्हें उखाड़ फेंकने की बात करता है। प्रगति का सामान्य अर्थ है- आगे बढ़ना और वाद का अर्थ है- सिद्धान्त। इस प्रकार प्रगतिवाद का सामान्य अर्थ है - आगे बढ़ने का सिद्धांत। लेकिंग प्रगतिवाद में इस आगे बढ़ाने का एक विशेष ढंग है, विशेष दिशा है जो उसे विशिष्ट परिभाषा देता है। इस अर्थ में प्राचीन से नवीन की ओर, आदर्श से यथार्थ की ओर, पूँजीवाद से समाजवाद की ओर, रूढ़ियों से स्वच्छंद जीवन की ओर, उच्चवर्ग की ओर तथा शांति से क्रांति की ओर बढ़ाना ही प्रगतिवाद है।

प्रतिभासवाद - प्रतिभासवाद इस सिद्धांत के अनुसार दर्शन का प्रतिभास है। प्रतिभास से अर्थ है - जो भी प्रदत्त वस्तु प्रत्यक्षानुभूति का विषय बनती हो। फलत: प्रकृति विज्ञान के विपरीत युद्ध अपनाते हुए भी सह-प्रत्ययवाद से भी अलग पड़ता है। प्रतिभासवाद ज्ञानमीमांसा से अध्ययन प्रारंभ नहीं करता। दूसरी विशेषता यह है कि प्रतिभासवाद सारतत्वों को विषयवस्तु के रूप में चुनता है। ये सारतत्व प्रतिभासी आदर्श एवं बोधगम्य होते हैं। ये प्रत्याक्षानुभूति की क्रिया में मन में छूट जाते हैं इसीलिए इसे सारतत्वों का दर्शन भी कहते हैं। साभिप्रायिकता इस शुद्ध चेतना से संबंधित होती है। प्रेम, आस्वादन इत्यादि चेतना हैं, ये साभिप्रायिक अनुभव हैं। ये साभिप्रायिक अनुभव जिस वस्तु को ग्रहण करते हैं, उसे संपूर्ण रूप से जान लेते हैं। अनुभव स्वयं शुद्ध क्रिया है। साभिप्रायिक वस्तु और शुद्ध चेतना का साभिप्रायिक संबंध ही यह क्रिया है। आज एक बेहद अमानवीय दबाव है “लूटो नहीं तो लूट लिए जाओगे”, इन्हीं विखंडित और ध्वंसोन्मुख मूल्यों के अक्स आज साहित्य में उभर रहे हैं। इन्हीं मूल्यों का नियामक है आज का हिंदी साहित्य।

प्रयोगवाद - प्रयोगवाद धारा में समाज के शोषित वर्ग, मज़दूर और किसानों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की गयी, धार्मिक रूढ़ियों और सामाजिक विषमता पर चोट की गयी और हिंदी कविता एक बार फिर खेतों और खलिहानों से जुड़ी। वैयक्तिकता को सुरक्षित रखने का प्रयत्न करने वाली धारा, जिसमें अज्ञेय, धर्मवीर भारती, कुंवर नारायण, श्रीकांत वर्मा, जगदीश गुप्त प्रमुख हैं तथा प्रगतिशील धारा जिसमें गजानन माधव मुक्तिबोध, रामविलास शर्मा, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, त्रिलोचन शास्त्री, रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह तथा सुदामा पांडेय धूमिल आदि उल्लेखनीय हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना में इन दोनों धराओं का मेल दिखाई पड़ता है। इन दोनों ही धाराओं में अनुभव की प्रामाणिकता, लघुमानव की प्रतिष्ठा तथा बौधिकता का आग्रह आदि प्रमुख प्रवृत्तियां हैं। साधारण बोलचाल की शब्दावली में असाधारण अर्थ भर देना इनकी भाषा की विशेषता है।

प्राच्यवाद - इस शब्द को बहस के केंद्र में लाने के श्रेय एडवर्ड सईद को जाता है। प्राच्यवाद का अर्थ है कि यूरोप की निगाह में पूर्व। यानी गुलाम देशों के इतिहास को लिखने और देखने का यूरोपीय नजरिया, जिसमें यूरोपीय इतिहासकार इन गुलाम देशों को पिछड़ा, बर्बर, असभ्य आदि बताकर उन पर यूरोपीय देशों के कब्जे को न्यायोचित बताते थे। एडवर्ड सईद ने प्राच्यवाद की इस अवधारणा को खारिज कर यानी यूरोपीय इतिहासकारों के निष्कर्षों को खारिज कर स्वयं अपने विषय में इतिहास लिखने की बात कहते हैं। ताकि पश्चिम की निगाह में पूरब की जो पहचान निर्मित की गई है, उसे तोड़ कर नई पहचान या अस्मिता निर्मित की जा सके।

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