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    धान सी लड़कियाँ।

    धान सी लड़कियाँ| ———————- धान के बिरवे सी होती लड़कियाँ, जिन्हें उखाड़ दिया जाता है, उनकी डीह से अचानक ही, बिन पूछे बिन बताये, बिन देखे, बिन समझे, उनका दर्द, उनकी टीस, सच, माटी भी उनकी नहीं होती, उनके हिस्से है सारा खारापन, और हँसी किसी और के, कुछ-कुछ जंगली घास सी भी, उग ही Read more

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    सदैव प्रेम में रहा हूँ मैं।

    सदैव प्रेम में रहा हूँ मैं| —————————-   वस्तुतः प्रेम नहीं किया मैंने, “करना” अस्वाभाविक है प्रेम हेतु, प्रेम में असहजता हेतु स्थान कहाँ, कदाचित जन्म से या उससे भी पूर्व, यह तृष्णा भटकाती रही है मुझे, आत्मा सदैव ही ढूंढती रही प्रेम, माँ के प्रेम से जग को जाना, जुड़ा उन बाबा के कन्धों Read more

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