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पुस्तक समीक्षा -सपनों के करीब हों आंखें – जयप्रकाश मानस

जीवन का मर्म है ‘सपनों के क़रीब हों आंखें‘ ‘कविता होगी तो ‘ हर लड़ाई के बाद/सिर्फ मनुष्य बच रहेगा/मनुष्य के कुछ स्वप्न होंगे/जिसमें होगी अधिक चहचहानेवाली चिड़िया/और चिड़िया के साथ खिलखिलाती सुबह/कविता होगी तो /बची रहेंगी सारी संभावनाएं/ असीम आशाओं , संभावनाओं  स्वप्न और यथार्थ के बीच समन्वय स्थापित करते हुए सीधे सरल शब्दों की कविताएं हैं आगे पढ़ें

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