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जीतेन्द्र भारतीOffline

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    • कविता "प्रवास"

      प्रवास जैसे चलती यह पुरवाई, मै तो बस ऐसे ही चला था, जैसे चलती धारा नदी की, मै तो बस ऐसे ही चला था  I ना कुछ पा ना ना कुछ खो ना, सुख-दुःख की कोई तमा नही थी मेरी कोई मंझील नही थी मै तो बस...

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