महात्मा गाँधी की पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ की प्रासंगिकता

अमन कुमार

पीएच.डी(शोधार्थी)

(गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय)

मो. 931270598

ई.मेल- aman1994rai@gmail.com

सारांशः- 2 अक्टूबर 2021 को महात्मा गांधी जी की 152 वीं जन्म दिवस मनाई जाएगी । लिहाजा इस हिसाब से बापू की रचना हिंद स्वराज की प्रासंगिकता पर चर्चा करना अनिवार्य हो जाता हैं । महात्मा गांधी जी ने अपनी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ को भारत आने से काफी वर्ष पूर्व लिखा था । बापू ने यहां पुस्तक भारत के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखकर लिखा था। मुझे तो यह लगता है, कि प्रत्येक भारतवासी को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। बापू ने अपनी पुस्तक को विभिन्न अध्यायों में विभाजित कर भारत की तमाम समस्याओं का समाधान इस पुस्तक में दिया हैं । बापू इस पुस्तक के माध्यम से कहीं ना कहीं एक आदर्श भारत, एक आदर्श समाज, एक आदर्श व्यक्ति और एक आदर्श व्यक्तित्व की निर्मिति चाहते हैं । इस पुस्तक के अध्ययन से हम बापू की दूरदर्शिता से भी वाकिफ होंगे । यह पुस्तक एक व्यक्ति के संपूर्ण विकास हेतु महत्वपूर्ण दस्तावेज है । बापू के जन्मदिवस पर प्रत्येक भारतीय को यह अवश्य विचार करना चाहिए कि क्या हम ऐसे भारत का निर्माण कर पाए? जिसकी कल्पना पूज्य बापू ने की थी?

बीज शब्दः- हिन्द स्वराज, राजनैतिक-सार्वजनिक, अशांति और असंतोष, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, कांग्रेस और उसके कर्ता-धर्ता, सनातन भारतीय सभ्यता, शांति एवं सुव्यवस्था, हिन्दू-मुस्लिम संबंधों, सांस्कृतिक परिष्कार, वसुधैव कुटुम्बकम, देश-काल, आधुनिक प्रजातंत्र,

भूमिकाः- भारत को स्वतंत्रता दिलाने में जिन लोगों का नाम लिया जाता है उनमें महात्मा गाँधी अग्रणी है। हिंदी ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में जिस व्यक्ति पर सबसे अधिक लिखा गया उनमें महात्मा गाँधी का नाम महत्वपूर्ण है। महात्मा गाँधी ने स्वयं भी अपने साठ वर्षो के व्यस्ततम राजनैतिक-सार्वजनिक जीवन के बीच विपुल साहित्य रचा। उनका यह साहित्य उनके लेखों, बयानों, भाषणों और पत्रों में फैला है। उनकी व्यवस्थित रचनाएँ है ‘हिन्द स्वराज’, ‘आत्मकथा’, अथवा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ तथा ‘दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास’ है। इनमें से ‘हिन्द स्वराज’ सबसे लोकप्रिय और प्रासंगिक पुस्तक है। यह पुस्तक महात्मा गाँधी के सक्रिय सार्वजनिक जीवन की प्रारंभिक कृतियों में से एक है। ‘हिन्द स्वराज को महात्मा गाँधी की सम्पूर्ण रचनाओं का सर कहा जा सकता है दूसरे शब्दों में यह पुस्तक महात्मा गाँधी के विचारों का दर्पण है।

‘हिन्द स्वराज’ का महत्व गांधीवाद के लिए लगभग वैसा ही है जैसा मार्क्सवाद के लिए कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणा पत्र का। सन् 1909 में लन्दन से दक्षिण अफ्रीका की वापसी की यात्रा में मूलतः गुजराती में लिखी इस पुस्तक का प्रकाशन आधुनिक भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है । सर्वप्रथम यह ‘इंडियन ओपिनियन’ के गुजराती संस्करण में दो लेखों में प्रकाशित हुआ। 1910 में सरकार ने इसे खतरनाक मानते हुए जब्त कर लिया। उसी वर्ष गाँधीजी ने इसका अनुवाद अंग्रेजी में प्रस्तुत किया और तब से लेकर आज तक यह पुस्तक प्रासंगिक बनी हुई है। महात्मा गाँधी ने ‘हिन्द स्वराज’ के विषय में 1921 के ‘यंग इंडिया’ के गुजराती अनुवाद में लिखा कि “यह बालक के हाथ में भी दी जा सकती है। यह द्वेष-धर्म की जगह प्रेम-धर्म सिखाती है; हिंसा की जगह आत्म-बलिदान को रखती है; पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है; इसकी अनेक आवृत्तियाँ हो चुकी हैं; और जिन्हें इसे पढने की परवाह है उनसे इसे पढने की मैं जरुर सिफारिश करूँगा..।”1

इस प्रदत्त पत्र में मैं ‘हिन्द स्वराज’ पुस्तक के अध्यायों की चर्चा करते हुए इस पुस्तक की प्रासंगिकता पर विचार करूँगा। ‘हिन्द स्वराज’ पुस्तक के प्रथम तीन अध्यायों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा भारतीय जन जागरूकता का जिक्र आया है। पहले अध्याय का शीर्षक ‘कांग्रेस और उसके कर्ता-धर्ता’ है। इस अध्याय में गांधीजी अपनी दृष्टी में आम-आदमी व लोकपक्ष का तर्क प्रस्तुत करते हैं । ‘हिन्द स्वराज’ का दूसरा अध्याय ‘बंग-भंग’ एवम् तीसरे अध्याय ‘अशांति और असंतोष’ आपस में जुड़ा हुआ है। दूसरे अध्याय में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा बंगाल का बंटवारा (1905) और तीसरे अध्याय में बंग-भंग के बारे में अंग्रेज सरकार के निर्णय के उपरांत पूरे देश और खासकर बंगाल में पैदा हुए “अशांति और असंतोष” के बारे में अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया है। हिन्द स्वराज के दूसरे अध्याय में ‘बंग-भंग’ के बारे में गाँधीजी कहते हैं, “स्वराज के बारे में सही जागृति के दर्शन बंग-भंग से हुई।…प्रजा एक दिन में नहीं बनती, उसे बनाने में कई बरस लग जाते हैं।”2 तीसरे अध्याय में बंगाल विभाजन के परिणाम स्वरूप उपजे अशांति एवं असंतोष के बारे में अपने विश्लेषण में गाँधीजी कहते हैं कि नींद और जागने की प्रक्रिया में अंगडाई की स्थिति स्वाभाविक होती है ठीक उसी प्रकार गुलामी की प्रक्रिया में सुप्त चेतना और आत्म चेतना के बीच अशांति और असंतोष भी स्वाभाविक है। गाँधीजी ने इस अशांति और असंतोष को समाज के विकास के लिए जरूरी माना। उनका मानना था कि अशांति और असंतोष उसी समाज में होगा जो अपनी यथा-स्थिति से खुश नहीं होगा और अपने भीतर किसी प्रकार सकारात्मक बदलाव चाहता होगा। अर्थात अशांति और असंतोष की भी समाज के विकास में बड़ी भूमिका है गाँधी जी के यह विचार इतने प्रासंगिक हैं कि किसी भी देश-काल में विश्व की किसी भी सभ्यता के समाज पर लागू किए जा सकते हैं।

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अध्याय चार, ‘स्वराज क्या है?’ इस अध्याय से हिन्द स्वराज का असली असली घोषणापत्र शुरू होता है। इस अध्याय में गाँधीजी स्वराज का अर्थ एवं प्रकृति समझते हैं। उनका कहना है कि यह समझना बहुत आवश्यक है कि इस देश से अंग्रेजों क्यों निकाला जाना चाहिए। गाँधी जी कहते हैं कि कुछ लोग अंग्रेजों को तो इस देश से भगाना चाहते हैं परंतु वे अंग्रेजी राज और अंग्रेज़ी राज के विधान में कोई बुराई नहीं देखते। गाँधीजी ने स्वराज के सही अर्थ को इस अध्याय में स्पष्ट किया है। इस अध्याय को पढ़ कर स्वराज की जो विस्तृत परिकल्पना स्पष्ट होती है जो बहुत शुद्ध और विराट है। गाँधीजी जिस स्वराज की तस्वीर सामने रखते हैं वह स्वशासन से पूर्व व्यक्ति के आत्मिक परिष्कार की मांग करता है। ऐसा स्वराज भारत में आज भी प्रासंगिक है।

आधुनिक औद्योगिक सभ्यता की मीमांसा अध्याय पांच और छः में की गई है। अपनी कल्पना के स्वराज की चर्चा गाँधीजी हिन्द स्वराज के पांचवें अध्याय में करते हैं। जिसका शीर्षक है- ‘इंग्लैंड की हालत’। गांधीजी कहते हैं कि इंग्लैंड में जो राज्य चलता है वह ठीक नहीं है और हमारे लायक नहीं है। इंग्लैंड की संसद तो बांझ और वेश्या है। वास्तव में इस अध्याय में अंग्रेजी राज के विधान को अपने तर्क से नकारते हैं। इस अध्याय में गाँधीजी ने आधुनिक प्रजातंत्र की संसदीय प्रणाली की सही और कटु आलोचना प्रस्तुत की है। इस आलोचना का महत्व समकालीन भारतीय संदर्भ में और भी बढ़ गया है। गाँधीजी के संसदीय व्यवस्था पर किए गये विचार आज भारत में बहुत प्रासंगिक हैं।

छठे अध्याय का शीर्षक है- ‘सभ्यता का दर्शन’। इस अध्याय का सैद्धान्तिक आधार एक ओर सनातन भारतीय सभ्यता की उनकी समझ है जो मूलतः गाँधीजी की व्यक्तिगत अनुभूतियों पर आधारित हैं तो दूसरी ओर यह प्लेटो, रस्किन, थोरो और टाल्सटाय की रचनाओं से प्रभावित है। भारतीय दृष्टि से यूरोपीय सभ्यता की प्रारम्भिक सैद्धान्तिक आलोचना है। आधुनिक सभ्यता की इतनी सटीक, इतनी कटु, इतनी सरल भाषा में और इतनी कलात्मक आलोचना अन्यत्र दुर्लभ है। पश्चिम की सभ्यता की जिन खामियों को गाँधीजी ने अपने समय में ही पहचान लिया था। आज उन्हीं खामियों की वजह से भारत अपनी अस्मिता पर, संस्कृति पर संकट महसूस कर रहा है। गाँधीजी के यह विचार आज बहुत प्रासंगिक हो चुके हैं।

‘हिन्दुस्तान कैसे गया?’ का वर्णन अध्याय सात में है। सातवें अध्याय में गाँधीजी पिछले अध्याय के तर्क को आगे बढ़ाते हैं। इस अध्याय का शीर्षक में गाँधीजी ने स्पष्ट किया कि – “हम अपनी पारम्परिक संस्कृति की आन्तरिक कमियों या समाज व्यवस्था की रणनीतिक कमजोरियों के कारण या अंग्रेजी संस्कृति की आन्तरिक शक्ति या उनकी समाज व्यवस्था की आन्तरिक गुणवत्ता के कारण नहीं हारें हैं बल्कि हमारे प्रभुत्व वर्ग और उभरते हुए मध्य वर्ग के लोभ और लालच के कारण बिना संघर्ष किये एक स्वैच्छिक समझौते के तहत हारे हैं।”3 अंग्रेजी राज एक अनैतिक एवं चालबाज सभ्यता की उपज है जो लोभ, लालच और अनैतिक समझौतों का प्रचार करती है और एक साजिश के तहत हमारे शासक एवं व्यापारी वर्ग को रिझाकर अपना उल्लू सीधा करती है। गाँधीजी उस समय उपनिवेशवाद की जिन खामियों को इंगित कर रहे थे वह खामियां आज के इस नवउपनिवेशवादी युग में अत्यंत प्रासंगिक है।

गाँधीजी का मानना था कि अंग्रेजों को यहाँ लाने वाले हम ही हैं और वे हमारी बदौलत ही यहाँ रहते हैं। हमने उनकी सभ्यता अपनायी है, इसलिए वे यहाँ रह रहे हैं। जिस दिन एक देश के रूप में हिन्दुस्तान का स्वाभिमान जाग गया और हमने उनकी शैतानी सभ्यता का आकर्षण त्याग दिया उसी क्षण हमें गुलामी से आजादी मिल जायेगी। वास्तव में इस अध्याय में हिन्दुस्तान अंग्रेजों के हाथ में क्यों है, इसकी सूक्ष्म व्याख्या की गई है। इस अध्याय में गाँधीजी ने भारत के लोगों की जिन कमजोरियों और लालच को इंगित किया है वह आज भारतीय समाज में चरम पर है पश्चिमी सभ्यता ने आज भारत को अपने रंग में पूरी तरह रंग दिया है जिसने भारतीय सभ्यता को पूर्णतः बिगाड़ कर रख दिया है।

आठ से ग्यारह तक गाँधीजी हिन्दुस्तान की दशा की व्याख्या करते हैं। अध्याय आठ में गाँधीजी कहते हैं कि ‘आज हिन्दुस्तान की रंक (कंगाल) दशा है। हिन्दुस्तान अंग्रेजों से नहीं, बल्कि आजकल की सभ्यता से कुचला जा रहा है, उसकी चपेट में वह फंस गया है। उसमें से बचने का अभी भी उपाय है, लेकिन दिन-ब-दिन समय बीतता जा रहा है। मुझे तो धर्म प्यारा है। हिन्दुस्तान धर्मभ्रष्ट होता जा रहा है। धर्म का अर्थ मैं यहां हिन्दू, मुस्लिम या जरथोस्ती धर्म नहीं करता। लेकिन इन सब धर्मों के अंदर जो धर्म है वह हिन्दुस्तान से जा रहा है। हम ईश्वर से विमुख होते जा रहें हैं। धर्म से विमुखता गाँधीजी की पहली चिन्ता है। दूसरी चिन्ता गाँधीजी की यह है कि आधुनिक लोग हिन्दुस्तान पर यह तोहमत लगाते हैं कि हम आलसी हैं और गोरे लोग मेहनती और उत्साही हैं। गाँधीजी आगे कहते हैं कि हिन्दुस्तानी लोगों ने इस झूठी तोहमत को सच मान लिया है और आधुनिक मानदंडो पर खरा उतरने के लिए अनावश्यक रूप से गलत दिशा में प्रयत्नशील हो गये हैं। हिन्दू, मुस्लिम, जरथोस्ती, ईसाई सब धर्म सिखाते हैं कि हमें दुनियावी बातों के बारे में मंद और धार्मिक (दीनी) बातों के बारे में भी उत्साही रहना चाहिए। हमें अपने सांसारिक लोभ, लालच और स्वार्थ की हद (सीमा) बांधनी चाहिए और आत्म विकास एवं सांस्कृतिक परिष्कार पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करना चाहिए। गाँधीजी बल देकर कहते हैं कि जैसे पाखंड आधुनिक सभ्यता में पाया जाता है उसकी तुलना में सभी धर्मों में पाया जाने वाला व्यवहारिक पाखंड कम खतरनाक और कम दुखदायी होता है। आधुनिक सभ्यता एक प्रकार का मीठा जहर है। उसका असर जब हम जानेंगे तब पुराने वहम और धार्मिक पाखंड इसके मुकाबले मीठे लगेंगे। आधुनिक सभ्यता के वहमों और पाखंडों से आधुनिक सभ्यता में आस्था रखने वाले लोगों को लड़ने का कोई कारण नजर नहीं आता। जबकि सभी धर्मों के भीतर धर्म और पाखंड के बीच धार्मिक संघर्ष सदैव चलता रहा है। गाँधीजी की तीसरी चिन्ता यह है कि कुछ लोगों को भी भ्रम है अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान में शांति एवं सुव्यवस्था कायम की है और अंग्रेज नहीं होते तो ठग, पिंडारी, भील आदि आम आदमियों का जीना नामुमकिन कर देते। गाँधीजी इसे भी अंग्रेजी राज प्रेरित आधुनिक कुप्रचार मानते हैं। इन सबका इस अध्याय में गहराई से विचार किया गया है।

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इसी क्रम को नवें अध्याय में ‘हिन्दुस्तान की दशा’ की व्याख्या करते हुए रेलगाड़ियों के महत्व पर प्रकाश डालते हैं। हिन्दुस्तान की तत्कालीन दशा के बारे में गाँधीजी की सोच यह है कि- “वास्तव में जिन चीजों ने हिन्दुस्तान को रंक (कंगाल) बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है उसे ही हम लोगों ने लाभकारी मानना शुरू कर दिया है। हिन्दुस्तान को रेलों ने, वकीलों ने और डॉक्टरों ने कंगाल बना दिया है। गाँधीजी की दृष्टि में आधुनिक सभ्यता एक अदृश्य रोग है। इसका नुकसान मुश्किल से मालूम हो सकता है |”4 इस अध्याय का मूल उद्देश्य आधुनिक सभ्यता के तकनीकी आधार पर सूक्ष्म समालोचना है। इसमें गाँधीजी कहना चाहते हैं कि किसी भी सच्ची, अच्छी और कल्याणकारी सभ्यता का आधार धर्म, नीति और मूल्य होते हैं तथा यंत्रों, तकनीकों एवं मशीनों का उपयोग मात्र साधन के रूप में होता है। जबकि आधुनिक सभ्यता का आधार मूल्य, नीति और धर्म के बदले आधुनिक तकनीक वाला मशीन बन जाता है। गाँधीजी तकनीक की सांस्कृतिक उपयुक्तता का प्रश्न उठाते हैं। उनका मानना है कि मनुष्य के जीवन, आकांक्षा, सुख-दुख, सफलता-असफलता, हानि-लाभ, प्रगति-पतन जैसे मूल विषयों को जब मूल्यों के स्थान पर तकनीक परिभाषित करने लगते हैं तब सभ्यता पर असली संकट आता है। गाँधीजी के तर्क में दम तो है परन्तु पिछले अध्यायों के तर्क से थोड़ी असंगति भी दिखती है।

गाँधीजी की पांचवीं चिन्ता यह है कि – “लोग अंग्रेजों के इस कुप्रचार को सच मानते हैं कि हिन्दुस्तानी लोग अंग्रेजों और रेलवे के आने से पहले एक राष्ट्र नहीं थे और एक राष्ट्र बनाने में हम लोगों को सैकड़ों बरस लगेंगे। गाँधीजी साफ-साफ कहते हैं कि यह बिल्कुल बेबुनियाद बात है। जब अंग्रेज हिन्दुस्तान में नहीं थे तब भी हम एक राष्ट्र थे। हमारे विचार एक थे। हमारा रहन-सहन एक था। तभी तो अंग्रेजों ने यहां एक राज्य कायम किया। हमारे बीच भेद तो बाद में उन्होंने पैदा किया। एक राष्ट्र का अर्थ यह नहीं कि हमारे बीच कोई मतभेद नहीं था।”5 परन्तु हमारे बीच एकता के महत्वपूर्ण सूत्र प्राचीनकाल से रहे हैं। हमारे यहां रेलवे नहीं थी लेकिन हमारे समाज के प्रमुख लोग पैदल या बैलगाड़ी में हिन्दुस्तान का सफर करते थे। वे लोग एक-दूसरे की भाषा सीखते थे। देश के चारों कोनों तक लोग तीर्थ करने जाते थे। हमारे यहां एकता का सूत्र अलग प्रकार के रहें हैं।

हिन्द स्वराज के दसवें अध्याय में गाँधीजी हिन्दुस्तान में हिन्दू-मुस्लिम संबंधों की दशा-दिशा की समालोचना करते हैं। हिन्दुस्तान की तत्कालीन दशा के बारे में गाँधीजी की छठी चिन्ता यह है कि विदेशी शिक्षा और कुप्रचार के प्रभाव में कुछ लोग मानने लगे हैं कि भारत में हिन्दू-मुसलमान कभी मिलकर नहीं रह सकते। यह एक काल्पनिक मिथ है। हिन्दुस्तान में इसलिए सभी धर्मों और मतों के लिए स्थान है। यहां राष्ट्र सभ्यतामूलक अवधारणा है। राष्ट्र या सभ्यता का अर्थ यहां तात्विक रूप से सदैव विश्व व्यवस्था या वसुधैव कुटुम्बकम के रूप में रहा है। नये धर्मों या विदेशी धर्मों एवं उनके अनुयायियों के प्रवेश से यह राष्ट्र कभी आतंकित और चिंतित नहीं होता। यह एक सनातन सभ्यता है, सनातन राष्ट्र है। यह अंततः मिटने वाली नहीं है। जो नये लोग इसमें दाखिल होते हैं, वे इस राष्ट्र की प्रजा को तोड़ नहीं सकते, वे इसकी प्रजा में अंततः घुल-मिल जाते हैं। हिन्दुस्तान ऐसा रहा है और आज भी ऐसा ही है। गाँधीजी ने स्पष्ट किया कि पूजा पद्धति, रीति-रिवाज और उपासना की साम्प्रदायिक व्यवस्था के स्तर पर हिन्दू-मुसलमानों में अंतर अवश्य है परंतु यह अंतर उन्हें दो राष्ट्रों की प्रजा नहीं बना सकता। 1947 में देश के बंटवारे के अवसर पर भी गाँधीजी ने नहीं माना कि दो राज्य बनने से भारत और पाकिस्तान नामक दो राष्ट्र बन गए। वे हमेशा मानते रहे कि भारत में राष्ट्र की अवधारणा सभ्यतामूलक रही है, एक प्रकार की भू-सांस्कृतिक अवधारणा रही है और समय-समय पर इनमें न सिर्फ एक से अधिक राज्य होते रहें हैं बल्कि उनके बीच राजनैतिक शत्रुता भी रही है। गाँधीजी का मानना था कि बंटवारे के बावजूद भारत और पाकिस्तान के हिन्दू-मुसलमान एक ही सभ्यता के अंग रहेंगे।

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हिन्द स्वराज के ग्याहरवें अध्याय में वे तत्कालीन हिन्दुस्तानी समाज में वकीलों, जजों और आधुनिक न्यायालयों के द्वारा ब्रिटिश राज के संवर्धन की समालोचना करते हैं। उस समय के हिंदुस्तानी समाज के बारे में गांधीजी की सातवीं चिंता भारतीय समाज में वकीलों के बढ़ते महत्व को लेकर है। उनकी राय में वकीलों ने हिंदुस्तान को गुलाम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस अध्याय में गांधीजी भारतीय वकीलों की सुप्त राष्ट्रवाद को जगाकर उन्हें अंग्रेजों से असहयोग करने के लिए प्रेरित करते हैं।

हिंद स्वराज के बारहवें अध्याय में वे हिंदुस्तान की तत्कालीन दशा से संबंधित अपना पाँचवाँ लेख डॉक्टर शीर्षक से पूरा करते हैं। इस दृष्टि से पांच लेखों के अंतर्गत गांधीजी की आठवीं चिंता वकीलों, डॉक्टरों जैसे नये पेशों के प्रचार-प्रसार के बहाने अनीति अधर्म के नये-नये क्षेत्रों के प्रचार प्रसार को लेकर है। इस अध्याय के संदर्भ में ध्यान देने पर इसमें अंग्रेजी राज के विरुद्ध और हिंदुस्तानी सभ्यता में स्वराज की प्राप्ति की दृष्टि में गांधी अपना आठवां तर्क और अंतिम चिंता प्रस्तुत करते हैं। यह अध्याय अंग्रेजी राज और आधुनिक सभ्यता के खिलाफ है यह अध्याय गांधीजी के तरकश का अंतिम बाण है। इस अध्याय में अंग्रेजी राज में डॉक्टरों की भूमिका की वे सरल भाषा में समालोचना प्रस्तुत करते हैं। यह अध्याय अपने समय से काफी पहले उत्तर आधुनिकता के आधार पर ही व्यक्ति को अपना डॉक्टर खुद बनने, अपने शरीर के स्वभाव और जरूरतों को समझकर अपने रोगों का खुद इलाज करने और अपने सर्वांगीण स्वास्थ्य का ख्याल रखने की अपील करता है। साथ ही साथ अंग्रेजी राज के हिंदुस्तान में बने रहने का अंतिम और सबसे मजबूत नैतिक स्तंभ ढहाने की कोशिश करता है।

हिंद स्वराज के अंतिम अध्याय में गांधीजी पूरे हिंद स्वराज का निष्कर्ष बताते हैं साथ ही पाठक गांधीजी से राष्ट्र के नाम और उनके संदेश के बारे में पूछता है। गांधीजी का संदेश स्पष्ट है कि “इस रास्ते से मैं कहूंगा कि जिस हिंदुस्तानी को स्वराज की सच्ची खुमारी या मस्ती चढ़ी होगी, वही अंग्रेजों से ऊपर की बात कह सकेगा और उनके रोब से नहीं दबेगा।… सच्ची मस्ती तो उसी को चढ़ सकती है, जो ज्ञानपूर्वक समझ-बूझकर यह मानता हो कि हिंद की सभ्यता सबसे अच्छी है और यूरोप की सभ्यता चार दिन की चांदनी है।”5

हिंद स्वराज में जिस आधुनिक सभ्यता की निंदा-भर्त्सना की गई है, उसके पीछे गांधीजी की मूल भावना यही है कि यह आधुनिक सभ्यता मनुष्य की आत्मा की अवहेलना कर उसके शारीरिक सुख को महत्वपूर्ण मानती है। यह मुख्यतः भौतिक और आध्यात्मिकता के बीच के चुनाव का मामला है। आधुनिक सभ्यता की प्रेरणा मनुष्य को उपभोक्ता मानने में है जबकि गांधीजी ‘हिन्दस्वराज’ के मनुष्य को नियन्ता मानते हैं। शरीर सुख या उपभोक्तावाद की बढ़त से ना सिर्फ मनुष्य की आत्मीयता की, आध्यात्मिकता की अवमानना होती है, बल्कि बाह्य जगत के साथ उसकी आत्मीयता से बाधित होती है और समाज के विभिन्न समूहों के बीच एक परिचय और संवेदनहीनता की स्थिति बनती है। परंतु हिंद स्वराज को दो सभ्यताओं के टकराव के रूप में देखने के साथ-साथ भविष्य के समाज की रूपरेखा के मॉडल के रूप में भी देखना चाहिए और समूचे मानव और प्रकृति के संतुलित और समग्र दृष्टिकोण के तहत भी इसका महत्व बनता है जिसमें पूर्व और पश्चिम का सवाल शायद उतना नहीं है जितना अच्छे और बुरे का,करणीय और अकरणीय का और व्यापक अर्थ में पुण्य और पाप का। गाँधीजी के यह विचार उन सभी सभ्यताओं के लिए प्रासंगिक है जो अपने मूल को खोती जा रही हैं।

निष्कर्षतः हिंद स्वराज गांधी द्वारा लिखी उन महत्वपूर्ण रचनाओं में से है जिसे गांधीजी ने अपने विचार व दर्शन को स्पष्ट करने के लिए लिखा। राज्य समाज व राष्ट्र पर गांधी के विचारों की शायद यह सबसे परिष्कृत वस्तु स्पष्ट व्याख्या थी यद्यपि हिंद स्वराज एक मौलिक रचना है तथापि इसे लिखने के क्रम में गांधी कुछ प्रमुख पाश्चात्य विचारकों के साथ-साथ भारतीय दर्शन से अत्यधिक प्रभावित हैं इसमें गांधीवादी राजनीति के कुछ अत्यंत ही मौलिक सिद्धांतों का प्रतिपादन हुआ है दूसरे शब्दों में गांधी ने अपनी वास्तविक स्थिति को हिंद स्वराज के माध्यम से स्पष्ट किया तथा अंत तक उस पर कायम रहे वास्तव में हिंद स्वराज में हिंदुस्तान के स्वराज की उपलब्धि के लिए गांधी की संपूर्ण रणनीति का सबसे निर्णायक पहलू सामने आता है इसके अलावा स्वराज व सत्याग्रह से संबंधित गांधीजी के सामाजिक व राजनीतिक विचारों का सबसे प्रमाणिक दस्तावेज है। हिंद स्वराज में गांधी जी ने अपने पूर्व भारतीयों की अपेक्षा कहीं अधिक मौलिक रूप से भारतीय समाज के आध्यात्मिक व नैतिक ताने-बाने तथा यूरोपीय राज्यों के तथा राजनीतिक रूप से भ्रष्ट प्रकृति के बीच के अंतर को स्पष्ट किया है

सन्दर्भ ग्रन्थ

  1. हिन्द स्वराज, गाँधी महात्मा, शिक्षा भारती प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2017, पृष्ठ संख्या-25
  2. वहीं, पृष्ठ संख्या-45
  3. वहीं, पृष्ठ संख्या-56
  4. वहीं, पृष्ठ संख्या-70
  5. वहीं, पृष्ठ संख्या-77
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