अपराध बोध

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राजेश कुमार सिन्हा

वीरेंद्र मेरा अच्छा दोस्त था,हम दोनों एक ही कालेज में थे बस फर्क यह था कि वह साइन्स से ग्रेज्युएशन कर रहा था और मैं आर्ट्स से।इसके अलावा हम दोनों मे कई समानताएं थीं,मसलन हम दोनों के पिताजी रेलवे कर्मचारी थे और हम एक ही रेलवे कालोनी में रहते थे।कालेज साथ जाना और आना फिर शाम में भी साथ ही रहना यानी हमारा ज्यादा समय साथ मे ही गुजरता था।हमारी आगे की योजना भी यही थी कि ग्रेज्युएशन की पढाई पूरी हो जाने के बाद हमलोग पी .जी मे एडमिशन ले लेंगे और फिर कम्पीटिशन की तैयारी करेंगे ताकि कोई अच्छी सी नौकरी मिल जाये फिर  आगे की सोची जायेगी।

5 मई से हमारे फाइनल एक्जाम होने थे,युनिवर्सिटी से तारीख की घोषणा होते ही हमने अपने आपको पूरी तरह से पढाई के हवाले कर दिया,वैसे भी हम दोनो के विषय अलग अलग थे इसलिए कम्बाइंड स्टडी की सम्भावना तो थी नहीं अत: हम बमुश्किल ही मिल पाते थे।हफ्ते में एक बार मिलना होता था हमारा और उस छोटी से मुलाकात मे ही हम पूरे  हफ्ते भर का कोटा पूरा कर लेते थे।जिन्दगी अपने रफ्तार से चल रही थी,फाइनल एक्जाम की तारीख बिल्कुल करीब आ गई थी,हालांकि तैयारी तो ठीक ठाक थी पर डर तो स्वभाविक था जिसे हमलोग अपने अपने ईष्ट का नाम लेकर दूर कर लिया करते थे।खैर,फाइनल एक्जाम की शुरुवात हो गई और कब खत्म भी हो गया पता भी नहीं चला।इसके बाद एक दो  बार हमारी मुलाक़ात हुई और फिर वीरेंद्र अपनी दीदी के पास छुट्टियाँ मनाने दिल्ली चला गया और मै भी अपने अन्य मित्रों की कम्पनी मे शामिल हो गया और वक़्त मजे मे गुजरने लगा।दो महीने कैसे बीत गए पता ही नहीं चला और फिर एक दिन रिजल्ट की तारीख भी आ गई।सच कहूँ तो रिजल्ट के दिन मुझे पहली बार ऐसा लगा कि वीरेंद्र मेरा प्रतियोगी था और उस प्रतियोगिता में मै पीछे हो गया हूँ।दरअसल सिर्फ कुछ अंकों की वज़ह से मेरी फ़र्स्ट क्लास रह गई जबकि वीरेंद्र को फ़र्स्ट क्लास मिली थी।मैने बधाई तो उसे बहुत जोरदार तरीके से दी पर मन ही मन मै खुश नहीं था।हालांकि वीरेंद्र ने मुझे समझाया था।

देखो शिव आर्ट्स के साथ फ़र्स्ट क्लास थोड़ा मुश्किल होता है,साइन्स मे प्रैक्टिकल के मार्क्स से फायदा होता है,तुम्हे 58 प्रतिशत अंक मिले हैं जिसे किसी भी ऐंगल से कम नहीं कहा जा सकता है।

अरे दोस्त,मै खुश हूँ,तुम परेशान क्यों हो रहे हो,मै समझता हूँ।

वैसे मैं खुद को सहज दिखाने की कोशिश कर रहा था पर मै सहज था नहीं,शायद इस बात को वीरेंद्र समझ रहा था पर बोल नहीं रहा था।

कुछ दिनों बाद ही मार्क्स शीट के आते ही पी जी मे एडमिशन का सिलसिला शुरू हो गया।उसके मार्क्स अच्छे थे जाहिर है उसके घरवाले चाहते थे कि वह दिल्ली चला जाये और आगे की पढाई वहीं करे,और ठीक ऐसा ही हुआ भी उसे दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन मिल गया।मैने अपने ही कालेज के पी जी सेंटर में एम.ए(अर्थशास्त्र)मे एडमिशन ले लिया,और तय कर लिया कि बस अब कम्पीटिशन की तैयारी करनी है।वीरेंद्र के जाने के बाद कुछ दिनों तक तो नियमित बातचीत का सिलसिला चलता  रहा जो  धीरे धीरे कम होता गया।हाँ,एक बात ज़रुर थी कि वह जब भी छुट्टियों में आता था तो उसकी कोशिश यही रहती थी कि वह अपना अधिक से अधिक समय मेरे साथ बिताये।इसमे कोई दो राय नहीं थी कि मुझे उसके साथ रहना अच्छा लगता था पर जब वह अपनी पढाई और आगे की योजनाओं के बारे में बताता था तो मुझे उससे जलन सी होती थी।वह बार बार कहता था

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शिव कितना अच्छा होता कि हम दोनों साथ साथ रहते,हमारी तैयारी जोरदार होती,हम कोई भी एक्जाम क्रैक कर लेते

तुम सही कह रहे हो,मुझे भी ऐसा ही लगता है,और फिर हम दोनों मिल कर एक बड़ा ठहाका लगाते थे।

इस बार जब वह गर्मी की छुट्टी में आया तो थोड़ा परेशान सा लगा,वह बार बार एक ही बात कहता था

शिव,पापा से पैसे लेने मैने बन्द कर दिया है,वहां दो कोचिंग सेंटर में केमेस्ट्री पढ़ाता हूँ और कुछ ट्यूशन ले लेता हूँ तो मेरा काम चल जाता है,पर मुझे अपने पढ़ने के लिए वक़्त नहीं मिल पाता,और यही बात मुझे परेशान करती है।

तुम किसी कम्पीटिशन की तैयारी क्यों नहीं करते,मान लो अगर निकल गये तो आगे का काम आसान हो जायेगा

बिल्कुल सही कहा तुमने,अभी कोई वैकेंसी आई है क्या?

हाँ,अभी हाल ही में तो आई है इनकम टैक्स और कस्टम वाली,मै खुद भी भरने वाला हूँ

औह ग्रेट,फिर तो मै भी अप्लाई करता हूँ,एक काम करते हैं तुम भी अपना सेंटर दिल्ली ही दे देना और थोड़ा पहले आ जाना तो साथ बैठ कर  रिवाइज भी कर लेंगे।

आइडिया बढ़िया है,मैने भी उत्साहित होते हुए कहा

चलो यही तय रहा,तुम मुझे सारी डिटेल्स दे देना

श्योर,मै कल तुम्हारे घर पर आकर दे जाऊंगा

दूसरे दिन मै उसका इन्तज़ार करता रहा की वह आयेगा,पर नहीं आया,मुझे लगा शायद उसने अपना इरादा बदल दिया होगा।करीब दो हफ्ते बाद वह मेरे घर आया और उसने मुझे सारी डिटेल्स और फॉर्म मुझे देते हुए कहा

शिव,मै कल सुबह की गाड़ी से दिल्ली के लिए निकल रहा हूँ,प्लीज तुम जब अपना फॉर्म पोस्ट करोगे तो मेरी भी कर देना,और हाँ,दिल्ली ही सेंटर देना,कितना मजा आयेगा जब हम दोनों ही कम्पीट कर जायेंगे।

मैने भी उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा

यस माई डीयर ऐसा ही होने वाला है,और फिर वह चला गया।

मैने दूसरे दिन सबेरे ही सब रेडी कर लिया और पोस्ट ऑफिस निकल पड़ा।रास्ते में मुझे तरह तरह के ख्याल आ रहे थे,एक मन यह कह रहा था कि “शिव,वीरेंद्र तुमसे ज्यादा बेहतर कैंडिडेट है,उसका होना तय है,और अगर ऐसा हुआ तो लोग क्या कहेंगे!दूसरा मन यह कह रहा था कि शिव,ऐसा कुछ नहीं होता सबका अपना अपना मुक़द्दर होता है!पर अन्दर से मेरा मन भी विचलित हो रहा था,समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूं,इसी उधेड़ बुन मे पोस्ट ओफिस भी आ गया पर मेरी दुविधा अभी तक बनी हुई थी।अचानक मुझे ख्याल आया कि शिव तो दिल्ली में पढाई कर रहा है,बाद में वहां कोचिंग भी कर सकता है और सिविल सर्विसेज के लिए भी ट्राई कर सकता है जबकि शायद मै वह सब कुछ नहीं कर पाऊं।यह सोच कर मैने एक तरकीब निकाली,अगर मै उसका आप्लिकेशन पोस्ट ही करूं तो कम से कम एक मुझसे बेहतर कैंडिडेट तो कम हो ही जायेगा।मुझे यह आइडिया पसंद आया और सिर्फ अपना फॉर्म पोस्ट करके   लौट आया और मैने वीरेंद्र के घरवालों को इसकी जानकारी दे दी कि फॉर्म पोस्ट हो गया।

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करीब तीन महीने के बाद एक्जाम की तारीख के साथ एडमिट कार्ड भी आ गया,मैने स्थानीय सेंटर ही मांगा था जो मुझे मिल भी गया था।मेरी तैयारी भी ठीक ठाक थी,और मुझे उम्मीद थी कि  मेरा कुछ ना कुछ होना चाहिए।उसी दिन शाम को वीरेंद्र की माँ भी मेरे घर आईं,थोड़ी सी परेशान दिखीं,वीरेंद्र के एडमिट कार्ड  को ले कर वे बहुत चिंतित थीं

शिव,देखो ना,वीरेंद्र का एडमिट कार्ड नहीं आया,पता नहीं क्या बात है

आंटी मैने तो दोनो फॉर्म एक साथ ही ड्रॉप किये थे

बेटा तुम भला क्यों कुछ करोगे,यह सब तो नसीब की बात होती है,जैसी मालिक की मर्जी

मुझे सुन कर थोड़ा अजीब सा लगा पर मैने दिल को समझाया,किसी की हत्या तो नहीं की है ना मैने

मैने  नियत तारीख पर एक्जाम दिया,मुझे पूरा विश्वास था कि रिटेन टेस्ट में मेरा ज़रुर होना चाहिए और ऐसा ही हुआ।वीरेंद्र ने भी मुझे बधाई दी,रेलवे कालोनी के सभी लोग काफी खुश थे।मेरा इंटरव्यू भी अच्छा रह और मेरा चयन आयकर निरीक्षक के पद के लिए हो गया।इसी बीच मेरे पिताजी का भी प्रोमोशन हो गया और हमे दूसरे शहर जाना पड़ा।वीरेंद्र से मेरी अन्तिम मुलाकात,उस दिन हुई थी जिस दिन मै ज्वाइनिंग के लिए निकल रहा था।हम काफी देर तक साथ थे पर  उसने एक बार भी अपने फॉर्म के बारे मे नहीं पूछा।उसने मुझे ढेर सारी बधाइयां दीं और मेरे घर से निकलते वक़्त उसकी आँखें गीलीँ हो गई थीं।

मेरी ज्वाइनिंग के बाद कुछ समय तक हम दोनों सम्पर्क में रहे फिर धीरे धीरे हमारा सम्पर्क टूट गया।

आज लगभग बीस सालों बाद उससे मेरी मुलाकात इस तरह होगी यह मैने सोचा भी नहीं था।इन दो दशकों के दौरान मै आयकर निरीक्षक से प्रमोट हो कर आयकर अधिकारी बन गया,मेरी शादी हो चुकी थी ,मेरे दो बच्चे थे और भोपाल में मै सेटल हो चुका था,अपना मकान,गाड़ी,बैंक बैलेंस सब कुछ था।हुआ यों कि एक पार्टी ने स्क्रुटनी मे अनियमितता को लेकर मेरे खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी,प्राथमिक जांच पड़ताल के हिसाब से मेरे खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरु किये जाने के पर्याप्त सबूत थे।शिकायत कर्ता पार्टी रसूख वाली थी लिहाजा मेरे आयुक्त ने मेरे मामले को मुख्य आयुक्त के पास आवश्यक आदेश के लिये भेजा था।मुझे मेरे सह्कर्मियों ने सलाह दी कि मुझे एक बार उनके पास व्यक्तिगत रूप से मिल कर अपनी बात कहनी चाहिये वर्ना एक बार अगर जांच शुरु हो गई तो मेरे लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है।मैने पता किया तो मुझे मालूम चला कि मि. कुमार अतिरिक्त मुख्य आयुक्त हैं जिनके पास मेरा मामला है,और वो कुछ दिनों पहले ही चेन्नई से ट्रांसफर हो कर यहां आये हैं और स्वभाव से बहुत ज्यादा सख्त हैं।

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मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था,मुझे अच्छी तरह समझ में आ गया था कि जांच के बाद क्या होगा।फिर भी मैने खुद को संभालने की कोशिश की और सुबह ठीक 9.30 मे उनके कार्यालय पहुंच गया।मेरी उम्मीद के विपरीत मुझे बताया गया कि कुमार सर अपने चैंबर 9 बजे ही आ जाते हैं,जबकि मै तो यह सोच कर गया था कि सर 10 बजे के पहले नहीं मिलेंगे।मैने बाहर बैठे सब स्टाफ को अपने बारे में बताया तो उसका पहला सवाल यही था कि आपने अप्वाइंटमेंट लिया है क्या,मैने कहा,लिया तो नहीं है पर तुम साहब से पूछ लो,अगर बुला लेंगे तो मिल लूंगा।तभी मेरी नज़र दरवाजे के उपर टंगे नेम प्लेट पर गई ,वहां वीरेंद्र कुमार लिखा था।तभी सब स्टाफ ने कहा “आपको सर बुला रहे हैं,

मैने खुद को सहज करते हुए दरवाजे पर हल्की सी दस्तक दी

कम इन मि .शिव,एक मृदुल आवाज़ आई

मै जैसे ही अन्दर गया,मेरी नज़र कुर्सी पर बैठे शख्स पर पड़ी,चेहरा परिचित सा लगा बस थोड़ा वज़न ज्यादा था

शिव,मै वीरेंद्र हूँ,ऐसे क्यों देख रहे हो,बैठ जाओ,

मुझे काटो तो खून नहीं,हे ईश्वर अब तो मेरा सस्पेंड होना तय है

  यस सर,,,,,,मेरी आवाज़ हलक मे फंस गई सी लगी

और सुनाओ,कैसे हो,मै भी जल्दी ही फैमिली शिफ्ट कर रहा हूँ,

सर,मै अपनी इन्क्वायरी के बारे मे आपसे बात करने आया हूँ,मै बमुश्किल बोल पाया

अरे भाई,मुझे सर क्यों बोल रहे हो,मै तो तुम्हारा दोस्त हूँ,मै तो रोज ईश्वर का शुक्रिया अदा करता हूँ कि मेरा सेलेक्शन उस समय नहीं हुआ वर्ना मैं आई आर एस कम्पीट नहीं कर पाता

सर आपने मेरा केस पढ़ा है क्या

हाँ पढ़ा है,थोड़ा पेचीदा है,तुमसे गलती तो हुई है पर मेरी कोशिश रहेगी कि तुम्हे कम से कम पेनाल्टी मिले

सर अब आप पर ही भरोसा है

शिव तुम ऐसा क्यों कह रहे हो,मै तुम्हारे साथ हूँ,विभाग तुम्हारे साथ है,तुम बिलकुल चिन्ता नहीं करो

यस सर,अब मेरी चिन्ता कम हो गई है,आप पर मुझे पूरा भरोसा है

चाय लोगे शिव

नहीं,अभी चलता हूँ,घर जाकर सब कुछ सिम्मी को बताता हूँ,उसकी टेंशन कम हो जायेगी

मुझे घर पर नहीं बुलाओगे

सर क्यों नहीं,ज़रुर,अभी इजाजत दीजिये

इतना कह कर मै केबिन से बाहर आ गया,मुझे फॉर्म नहीं ड्रॉप करने का अपराध इस कदर परेशान कर रहा था कि मै वीरेंद्र से नज़र नहीं मिला पा रहा था।इस अपराध बोध ने मेरी आँखें गीलीँ कर दी थी,ऐसा लग रहा था मानो धरती फट जाये और मै उसमे समा जाउँ।

राजेश कुमार सिन्हा

बांद्रा(वेस्ट),मुम्बई50

7506345031

परिचय

राजेश कुमार सिन्हा

शिक्षाएम ए (अर्थशास्त्र)पत्रकारिता में डिप्लोमा

साहित्य की सभी विधाओं में नियमित लेखन

रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर के पत्र/पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित

6 पुस्तकें प्रकाशित

भारत सरकार के फिल्म प्रभाग के लिए

डाक्यूमेन्ट्री फिल्मों हेतु नियमित कमेन्ट्री लेखन

एक दर्जन से अधिक पुस्तकों का अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद

एक सरकारी बीमा कंपनी में सीनियर डिवीजनल मैंनेजर

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