परिमल सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

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    मुख पृष्ठ / साहित्यकोश / परिमल सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

    Parimal Suryakant Tripathi Nirala

    परिमल सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

    1. स्वप्न-स्मृति

    आँख लगी थी पल-भर,
    देखा, नेत्र छलछलाए दो
    आए आगे किसी अजाने दूर देश से चलकर।
    मौन भाषा थी उनकी, किन्तु व्यक्त था भाव,
    एक अव्यक्त प्रभाव
    छोड़ते थे करुणा का अन्तस्थल में क्षीण,
    सुकुमार लता के वाताहत मृदु छिन्न पुष्प से दीन।

    भीतर नग्न रूप था घोर दमन का,
    बाहर अचल धैर्य था उनके उस दुखमय जीवन का;
    भीतर ज्वाला धधक रही थी सिन्धु अनल की,
    बाहर थीं दो बूँदें- पर थीं शांत भाव में निश्चल-
    विकल जलधि के जर्जर मर्मस्थल की।

    भाव में कहते थे वे नेत्र निमेष-विहीन-
    अन्तिम श्वास छोड़ते जैसे थोड़े जल में मीन,
    “हम अब न रहेंगे यहाँ, आह संसार!
    मृगतृष्णा से व्यर्थ भटकना, केवल हाहाकार
    तुम्हारा एकमात्र आधार;
    हमें दु:ख से मुक्ति मिलेगी- हम इतने दुर्बल हैं-
    तुम कर दो एक प्रहार!”

    2. अध्यात्म फल

    जब कड़ी मारें पड़ीं, दिल हिल गया
    पर न कर चूँ भी, कभी पाया यहाँ;
    मुक्ति की तब युक्ति से मिल खिल गया
    भाव, जिसका चाव है छाया यहाँ।

    खेत में पड़ भाव की जड़ गड़ गयी,
    धीर ने दुख-नीर से सींचा सदा,
    सफलता की थी लता आशामयी,
    झूलते थे फूल-भावी सम्पदा।

    दीन का तो हीन ही यह वक्त है,
    रंग करता भंग जो सुख-संग का
    भेद कर छेद पाता रक्त है
    राज के सुख-साज-सौरभ-अंग का।

    काल की ही चाल से मुरझा गये
    फूल, हूले शूल जो दुख मूल में
    एक ही फल, किन्तु हम बल पा गये;
    प्राण है वह, त्राण सिन्धु अकूल में।

    मिष्ट है, पर इष्ट उनका है नहीं
    शिष्ट पर न अभीष्ट जिनका नेक है,
    स्वाद का अपवाद कर भरते मही,
    पर सरस वह नीति – रस का एक है।

    3. दीन

    सह जाते हो
    उत्पीड़न की क्रीड़ा सदा निरंकुश नग्न,
    हृदय तुम्हारा दुबला होता नग्न,
    अन्तिम आशा के कानों में
    स्पन्दित हम – सबके प्राणों में
    अपने उर की तप्त व्यथाएँ,
    क्षीण कण्ठ की करुण कथाएँ
    कह जाते हो
    और जगत की ओर ताककर
    दुःख हृदय का क्षोभ त्यागकर,
    सह जाते हो।
    कह जातेहो-
    “यहाँकभी मत आना,
    उत्पीड़न का राज्य दुःख ही दुःख
    यहाँ है सदा उठाना,
    क्रूर यहाँ पर कहलाता है शूर,
    और हृदय का शूर सदा ही दुर्बल क्रूर;
    स्वार्थ सदा ही रहता परार्थ से दूर,
    यहाँ परार्थ वही, जो रहे
    स्वार्थ से हो भरपूर,
    जगतकी निद्रा, है जागरण,
    और जागरण जगत का – इस संसृति का
    अन्त – विराम – मरण
    अविराम घात – आघात
    आह! उत्पात!
    यही जग – जीवन के दिन-रात।
    यही मेरा, इनका, उनका, सबका स्पन्दन,
    हास्य से मिला हुआ क्रन्दन।
    यही मेरा, इनका, उनका, सबका जीवन,
    दिवस का किरणोज्ज्वल उत्थान,
    रात्रि की सुप्ति, पतन;
    दिवस की कर्म – कुटिल तम – भ्रान्ति
    रात्रि का मोह, स्वप्न भी भ्रान्ति,
    सदा अशान्ति!”

    4. ध्वनि

    अभी न होगा मेरा अन्त

    अभी-अभी ही तो आया है
    मेरे वन में मृदुल वसन्त-
    अभी न होगा मेरा अन्त

    हरे-हरे ये पात,
    डालियाँ, कलियाँ कोमल गात!

    मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
    फेरूँगा निद्रित कलियों पर
    जगा एक प्रत्यूष मनोहर

    पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,
    अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं,

    द्वार दिखा दूँगा फिर उनको
    है मेरे वे जहाँ अनन्त-
    अभी न होगा मेरा अन्त।

    मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण,
    इसमें कहाँ मृत्यु?
    है जीवन ही जीवन
    अभी पड़ा है आगे सारा यौवन
    स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे, बालक-मन,

    मेरे ही अविकसित राग से
    विकसित होगा बन्धु, दिगन्त;
    अभी न होगा मेरा अन्त।

    5. मौन

    बैठ लें कुछ देर,
    आओ,एक पथ के पथिक-से
    प्रिय, अंत और अनन्त के,
    तम-गहन-जीवन घेर।
    मौन मधु हो जाए
    भाषा मूकता की आड़ में,
    मन सरलता की बाढ़ में,
    जल-बिन्दु सा बह जाए।
    सरल अति स्वच्छ्न्द
    जीवन, प्रात के लघुपात से,
    उत्थान-पतनाघात से
    रह जाए चुप,निर्द्वन्द ।

    6. तुम और मैं

    तुम तुंग – हिमालय – शृंग
    और मैं चंचल-गति सुर-सरिता।
    तुम विमल हृदय उच्छवास
    और मैं कांत-कामिनी-कविता।

    तुम प्रेम और मैं शांति,
    तुम सुरा – पान – घन अंधकार,
    मैं हूँ मतवाली भ्रांति।
    तुम दिनकर के खर किरण-जाल,
    मैं सरसिज की मुस्कान,
    तुम वर्षों के बीते वियोग,
    मैं हूँ पिछली पहचान।

    तुम योग और मैं सिद्धि,
    तुम हो रागानुग के निश्छल तप,
    मैं शुचिता सरल समृद्धि।
    तुम मृदु मानस के भाव
    और मैं मनोरंजिनी भाषा,
    तुम नन्दन – वन – घन विटप
    और मैं सुख -शीतल-तल शाखा।

    तुम प्राण और मैं काया,
    तुम शुद्ध सच्चिदानंद ब्रह्म
    मैं मनोमोहिनी माया।
    तुम प्रेममयी के कंठहार,

    मैं वेणी काल-नागिनी,
    तुम कर-पल्लव-झंकृत सितार,
    मैं व्याकुल विरह – रागिनी।

    तुम पथ हो, मैं हूँ रेणु,
    तुम हो राधा के मनमोहन,
    मैं उन अधरों की वेणु।
    तुम पथिक दूर के श्रांत
    और मैं बाट – जोहती आशा,
    तुम भवसागर दुस्तर
    पार जाने की मैं अभिलाषा।

    तुम नभ हो, मैं नीलिमा,
    तुम शरत – काल के बाल-इन्दु
    मैं हूँ निशीथ – मधुरिमा।
    तुम गंध-कुसुम-कोमल पराग,
    मैं मृदुगति मलय-समीर,
    तुम स्वेच्छाचारी मुक्त पुरुष,
    मैं प्रकृति, प्रेम – जंजीर।

    तुम शिव हो, मैं हूँ शक्ति,
    तुम रघुकुल – गौरव रामचन्द्र,
    मैं सीता अचला भक्ति।
    तुम आशा के मधुमास,
    और मैं पिक-कल-कूजन तान,
    तुम मदन – पंच – शर – हस्त
    और मैं हूँ मुग्धा अनजान!

    तुम अम्बर, मैं दिग्वसना,
    तुम चित्रकार, घन-पटल-श्याम,
    मैं तड़ित् तूलिका रचना।
    तुम रण-ताण्डव-उन्माद नृत्य
    मैं मुखर मधुर नूपुर-ध्वनि,
    तुम नाद – वेद ओंकार – सार,
    मैं कवि – श्रृंगार शिरोमणि।

    तुम यश हो, मैं हूँ प्राप्ति,
    तुम कुन्द – इन्दु – अरविन्द-शुभ्र
    तो मैं हूँ निर्मल व्याप्ति।

    7. भिक्षुक

    दो टूक कलेजे के करता पछताता
    पथ पर आता।

    पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
    चल रहा लकुटिया टेक,
    मुट्ठी भर दाने को– भूख मिटाने को
    मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता–
    दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

    साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
    बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
    और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाये।
    भूख से सूख ओठ जब जाते
    दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?–
    घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।
    चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
    और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!

    8. संध्या सुन्दरी

    दिवसावसान का समय-
    मेघमय आसमान से उतर रही है
    वह संध्या-सुन्दरी, परी सी,
    धीरे, धीरे, धीरे
    तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास,
    मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर,
    किंतु ज़रा गंभीर, नहीं है उसमें हास-विलास।
    हँसता है तो केवल तारा एक-
    गुँथा हुआ उन घुँघराले काले-काले बालों से,
    हृदय राज्य की रानी का वह करता है अभिषेक।
    अलसता की-सी लता,
    किंतु कोमलता की वह कली,
    सखी-नीरवता के कंधे पर डाले बाँह,
    छाँह सी अम्बर-पथ से चली।
    नहीं बजती उसके हाथ में कोई वीणा,
    नहीं होता कोई अनुराग-राग-आलाप,
    नूपुरों में भी रुन-झुन रुन-झुन नहीं,
    सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा ‘चुप चुप चुप’
    है गूँज रहा सब कहीं-

    व्योम मंडल में, जगतीतल में-
    सोती शान्त सरोवर पर उस अमल कमलिनी-दल में-
    सौंदर्य-गर्विता-सरिता के अति विस्तृत वक्षस्थल में-
    धीर-वीर गम्भीर शिखर पर हिमगिरि-अटल-अचल में-
    उत्ताल तरंगाघात-प्रलय घनगर्जन-जलधि-प्रबल में-
    क्षिति में जल में नभ में अनिल-अनल में-
    सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा ‘चुप चुप चुप’
    है गूँज रहा सब कहीं-

    और क्या है? कुछ नहीं।
    मदिरा की वह नदी बहाती आती,
    थके हुए जीवों को वह सस्नेह,
    प्याला एक पिलाती।
    सुलाती उन्हें अंक पर अपने,
    दिखलाती फिर विस्मृति के वह अगणित मीठे सपने।
    अर्द्धरात्री की निश्चलता में हो जाती जब लीन,
    कवि का बढ़ जाता अनुराग,
    विरहाकुल कमनीय कंठ से,
    आप निकल पड़ता तब एक विहाग!

    9. जूही की कली

    विजन-वन-वल्लरी पर
    सोती थी सुहाग-भरी–स्नेह-स्वप्न-मग्न–
    अमल- कोमल -तनु तरुणी–जुही की कली,
    दृग बन्द किये, शिथिल–पत्रांक में,
    वासन्ती निशा थी;
    विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़
    किसी दूर देश में था पवन
    जिसे कहते हैं मलयानिल ।
    आयी याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात,
    आयी याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात,
    आयी याद कान्ता की कमनीय गात,
    फिर क्या ? पवन
    उपवन-सर-सरित गहन -गिरि-कानन
    कुञ्ज-लता-पुञ्जों को पार कर
    पहुँचा जहाँ उसने की केलि
    कली खिली साथ ।
    सोती थी,
    जाने कहो कैसे प्रिय-आगमन वह ?
    नायक ने चूमे कपोल,
    डोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल ।
    इस पर भी जागी नहीं,
    चूक-क्षमा माँगी नहीं,
    निद्रालस बंकिम विशाल नेत्र मूँदे रही–
    किंवा मतवाली थी यौवन की मदिरा पिये,
    कौन कहे ?
    निर्दय उस नायक ने
    निपट निठुराई की
    कि झोंकों की झाड़ियों से
    सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली,
    मसल दिये गोरे कपोल गोल;
    चौंक पड़ी युवती–
    चकित चितवन निज चारों ओर फेर,
    हेर प्यारे को सेज-पास,
    नम्र मुख हँसी-खिली,
    खेल रंग, प्यारे संग ।

    10. बादल राग

    झूम-झूम मृदु गरज-गरज घन घोर।
    राग अमर! अम्बर में भर निज रोर!

    झर झर झर निर्झर-गिरि-सर में,
    घर, मरु, तरु-मर्मर, सागर में,
    सरित-तड़ित-गति-चकित पवन में,
    मन में, विजन-गहन-कानन में,
    आनन-आनन में, रव घोर-कठोर-
    राग अमर! अम्बर में भर निज रोर!

    अरे वर्ष के हर्ष!
    बरस तू बरस-बरस रसधार!
    पार ले चल तू मुझको,
    बहा, दिखा मुझको भी निज
    गर्जन-भैरव-संसार!

    उथल-पुथल कर हृदय-
    मचा हलचल-
    चल रे चल-
    मेरे पागल बादल!

    धँसता दलदल
    हँसता है नद खल्-खल्
    बहता, कहता कुलकुल कलकल कलकल।

    देख-देख नाचता हृदय
    बहने को महा विकल-बेकल,
    इस मरोर से- इसी शोर से-
    सघन घोर गुरु गहन रोर से
    मुझे गगन का दिखा सघन वह छोर!
    राग अमर! अम्बर में भर निज रोर!

    सिन्धु के अश्रु!
    धारा के खिन्न दिवस के दाह!
    विदाई के अनिमेष नयन!
    मौन उर में चिह्नित कर चाह
    छोड़ अपना परिचित संसार-

    सुरभि का कारागार,
    चले जाते हो सेवा-पथ पर,
    तरु के सुमन!
    सफल करके
    मरीचिमाली का चारु चयन!
    स्वर्ग के अभिलाषी हे वीर,
    सव्यसाची-से तुम अध्ययन-अधीर
    अपना मुक्त विहार,

    छाया में दुःख के अन्तःपुर का उद्घाचित द्वार
    छोड़ बन्धुओ के उत्सुक नयनों का सच्चा प्यार,
    जाते हो तुम अपने पथ पर,
    स्मृति के गृह में रखकर
    अपनी सुधि के सज्जित तार।

    पूर्ण-मनोरथ! आए-
    तुम आए;
    रथ का घर्घर नाद
    तुम्हारे आने का संवाद!
    ऐ त्रिलोक जित्! इन्द्र धनुर्धर!
    सुरबालाओं के सुख स्वागत।
    विजय! विश्व में नवजीवन भर,
    उतरो अपने रथ से भारत!
    उस अरण्य में बैठी प्रिया अधीर,
    कितने पूजित दिन अब तक हैं व्यर्थ,
    मौन कुटीर।

    आज भेंट होगी-
    हाँ, होगी निस्संदेह
    आज सदा-सुख-छाया होगा कानन-गेह
    आज अनिश्चित पूरा होगा श्रमिक प्रवास,
    आज मिटेगी व्याकुल श्यामा के अधरों की प्यास।

    सिन्धु के अश्रु!
    धरा के खिन्न दिवस के दाह!
    बिदाई के अनिमेष नयन!
    मौन उर में चिन्हित कर चाह
    छोड़ अपना परिचित संसार–
    सुरभि के कारागार,
    चले जाते हो सेवा पथ पर,
    तरु के सुमन!
    सफल करके
    मरीचिमाली का चारु चयन।
    स्वर्ग के अभिलाषी हे वीर,
    सव्यसाची-से तुम अध्ययन-अधीर
    अपना मुक्त विहार,
    छाया में दुख के
    अंतःपुर का उद्घाटित द्वार
    छोड़ बन्धुओं के उत्सुक नयनों का सच्चा प्यार,
    जाते हो तुम अपने रथ पर,
    स्मृति के गृह में रखकर
    अपनी सुधि के सज्जित तार।
    पूर्ण मनोरथ! आये–
    तुम आये;
    रथ का घर्घर-नाद
    तुम्हारे आने का सम्वाद।
    ऐ त्रिलोक-जित! इन्द्र-धनुर्धर!
    सुर बालाओं के सुख-स्वागत!
    विजय विश्व में नव जीवन भर,
    उतरो अपने रथ से भारत!
    उस अरण्य में बैठी प्रिया अधीर,
    कितने पूजित दिन अब तक हैं व्यर्थ,
    मौन कुटीर।
    आज भेंट होगी–
    हाँ, होगी निस्सन्देह,
    आज सदा सुख-छाया होगा कानन-गेह
    आज अनिश्चित पूरा होगा श्रमित प्रवास,
    आज मिटेगी व्याकुल श्यामा के अधरों की प्यास।

    उमड़ सृष्टि के अन्तहीन अम्बर से,
    घर से क्रीड़ारत बालक-से,
    ऐ अनन्त के चंचल शिशु सुकुमार!
    स्तब्ध गगन को करते हो तुम पार!
    अन्धकार– घन अन्धकार ही
    क्रीड़ा का आगार।
    चौंक चमक छिप जाती विद्युत
    तडिद्दाम अभिराम,
    तुम्हारे कुंचित केशों में
    अधीर विक्षुब्ध ताल पर
    एक इमन का-सा अति मुग्ध विराम।
    वर्ण रश्मियों-से कितने ही
    छा जाते हैं मुख पर–
    जग के अंतस्थल से उमड़
    नयन पलकों पर छाये सुख पर;
    रंग अपार
    किरण तूलिकाओं से अंकित
    इन्द्रधनुष के सप्तक, तार; —
    व्योम और जगती के राग उदार
    मध्यदेश में, गुडाकेश!
    गाते हो वारम्वार।
    मुक्त! तुम्हारे मुक्त कण्ठ में
    स्वरारोह, अवरोह, विघात,
    मधुर मन्द्र, उठ पुनः पुनः ध्वनि
    छा लेती है गगन, श्याम कानन,
    सुरभित उद्यान,
    झर-झर-रव भूधर का मधुर प्रपात।
    वधिर विश्व के कानों में
    भरते हो अपना राग,
    मुक्त शिशु पुनः पुनः एक ही राग अनुराग।

    निरंजन बने नयन अंजन!
    कभी चपल गति, अस्थिर मति,
    जल-कलकल तरल प्रवाह,
    वह उत्थान-पतन-हत अविरत
    संसृति-गत उत्साह,
    कभी दुख -दाह
    कभी जलनिधि-जल विपुल अथाह–
    कभी क्रीड़ारत सात प्रभंजन–
    बने नयन-अंजन!
    कभी किरण-कर पकड़-पकड़कर
    चढ़ते हो तुम मुक्त गगन पर,
    झलमल ज्योति अयुत-कर-किंकर,
    सीस झुकाते तुम्हे तिमिरहर–
    अहे कार्य से गत कारण पर!
    निराकार, हैं तीनों मिले भुवन–
    बने नयन-अंजन!
    आज श्याम-घन श्याम छवि
    मुक्त-कण्ठ है तुम्हे देख कवि,
    अहो कुसुम-कोमल कठोर-पवि!
    शत-सहस्र-नक्षत्र-चन्द्र रवि संस्तुत
    नयन मनोरंजन!
    बने नयन अंजन!

    तिरती है समीर-सागर पर
    अस्थिर सुख पर दुःख की छाया-
    जग के दग्ध हृदय पर
    निर्दय विप्लव की प्लावित माया-
    यह तेरी रण-तरी
    भरी आकांक्षाओं से,
    घन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर
    उर में पृथ्वी के, आशाओं से
    नवजीवन की, ऊँचा कर सिर,
    ताक रहे है, ऐ विप्लव के बादल!
    फिर-फिर!
    बार-बार गर्जन
    वर्षण है मूसलधार,
    हृदय थाम लेता संसार,
    सुन-सुन घोर वज्र हुँकार।
    अशनि-पात से शायित उन्नत शत-शत वीर,
    क्षत-विक्षत हत अचल-शरीर,
    गगन-स्पर्शी स्पर्द्धा-धीर।
    हँसते है छोटे पौधे लघुभार-
    शस्य अपार,
    हिल-हिल
    खिल-खिल,
    हाथ मिलाते,
    तुझे बुलाते,
    विप्लव-रव से छोटे ही है शोभा पाते।
    अट्टालिका नही है रे
    आतंक-भवन,
    सदा पंक पर ही होता
    जल-विप्लव प्लावन,
    क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से
    सदा छलकता नीर,
    रोग-शोक में भी हँसता है
    शैशव का सुकुमार शरीर।
    रुद्ध कोष, है क्षुब्ध तोष,
    अंगना-अंग से लिपटे भी
    आतंक-अंक पर काँप रहे हैं
    धनी, वज्र-गर्जन से, बादल!
    त्रस्त नयन-मुख ढाँप रहे है।
    जीर्ण बाहु, है शीर्ण शरीर
    तुझे बुलाता कृषक अधीर,
    ऐ विप्लव के वीर!
    चूस लिया है उसका सार,
    हाड़ मात्र ही है आधार,
    ऐ जीवन के पारावार!

    11. जागो फिर एक बार

    जागो फिर एक बार!
    प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें
    अरुण-पंख तरुण-किरण
    खड़ी खोलती है द्वार-
    जागो फिर एक बार!

    आँखे अलियों-सी
    किस मधु की गलियों में फँसी,
    बन्द कर पाँखें
    पी रही हैं मधु मौन
    अथवा सोयी कमल-कोरकों में?-
    बन्द हो रहा गुंजार-
    जागो फिर एक बार!

    अस्ताचल चले रवि,
    शशि-छवि विभावरी में
    चित्रित हुई है देख
    यामिनीगन्धा जगी,
    एकटक चकोर-कोर दर्शन-प्रिय,
    आशाओं भरी मौन भाषा बहु भावमयी
    घेर रहा चन्द्र को चाव से
    शिशिर-भार-व्याकुल कुल
    खुले फूल झूके हुए,
    आया कलियों में मधुर
    मद-उर-यौवन उभार-
    जागो फिर एक बार!

    पिउ-रव पपीहे प्रिय बोल रहे,
    सेज पर विरह-विदग्धा वधू
    याद कर बीती बातें, रातें मन-मिलन की
    मूँद रही पलकें चारु
    नयन जल ढल गये,
    लघुतर कर व्यथा-भार
    जागो फिर एक बार!

    सहृदय समीर जैसे
    पोछों प्रिय, नयन-नीर
    शयन-शिथिल बाहें
    भर स्वप्निल आवेश में,
    आतुर उर वसन-मुक्त कर दो,
    सब सुप्ति सुखोन्माद हो,
    छूट-छूट अलस
    फैल जाने दो पीठ पर
    कल्पना से कोमन
    ऋतु-कुटिल प्रसार-कामी केश-गुच्छ।
    तन-मन थक जायें,
    मृदु सरभि-सी समीर में
    बुद्धि बुद्धि में हो लीन
    मन में मन, जी जी में,
    एक अनुभव बहता रहे
    उभय आत्माओं मे,
    कब से मैं रही पुकार
    जागो फिर एक बार!

    उगे अरुणाचल में रवि
    आयी भारती-रति कवि-कण्ठ में,
    क्षण-क्षण में परिवर्तित
    होते रहे प्रृकति-पट,
    गया दिन, आयी रात,
    गयी रात, खुला दिन
    ऐसे ही संसार के बीते दिन, पक्ष, मास,
    वर्ष कितने ही हजार-
    जागो फिर एक बार!