प्रिय प्रवास अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

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    प्रिय प्रवास अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

    अनुक्रम

    Priy Pravas Ayodhya Singh Upadhyay ‘Hariaudh’

    भूमिका

    विचार-सूत्र

    सहृदय वाचकवृन्द!

    मैं बहुत दिनों से हिन्दी भाषा में एक काव्य-ग्रन्थ लिखने के लिए लालायित था। आप कहेंगे कि जिस भाषा में ‘रामचरित-मानस’, ‘सूरसागर’, ‘रामचन्द्रिका’, ‘पृथ्वीराज रासो’, ‘पद्मावत’ इत्यादि जैसे बड़े अनूठे काव्य प्रस्तुत हैं, उसमें तुम्हारे जैसे अल्पज्ञ का काव्य लिखने के लिए समुत्सुक होना वातुलता नहीं तो क्या है? यह सत्य है, किन्तु मातृभाषा की सेवा करने का अधिकार सभी को तो है; बने या न बने, सेवा-प्रणाली सुखद और हृदय-ग्राहिणी हो या न हो, परन्तु एक लालायित-चित्त अपनी प्रबल लालसा को पूरी किये बिना कैसे रहे? जिसके कान्त-पादांबुजों को निखिल-शास्त्र-पारंगत पूज्यपाद महात्मा तुलसीदास, कवि-शिरोरत्न महात्मा सूरदास, जैसे महाजनों ने परम सुगंधित अथच उत्फुल्ल पाटल प्रसून अर्पण कर अर्चना की है| कविकुल-मण्डली-मण्डन केशव, देव, बिहारी, पद्माकर इत्यादि सहृदयों ने अपनी विकच-मल्लिका चढ़ा कर भक्ति-गद्गद-चित्त से आराधना की है,क्या उसकी मैं एक नितान्त साधरण पुष्प द्वारा पूजा नहीं कर सकता? यदि ‘स्वान्त: सुखाय’ मैं ऐसा कर सकता हूँ तो अपनी टूटी-फूटी भाषा में एक हिन्दी काव्य-ग्रन्थ भी लिख सकता हूँ; निदान इसी विचार के वशीभूत होकर मैंने ‘प्रियप्रवास’ नामक इस काव्य की रचना की है।

    काव्य-भाषा

    यह काव्य खड़ी बोली में लिखा गया है। खड़ी बोली में छोटे-छोटे कई काव्य-ग्रन्थ अब तक लिपिबध्द हुए हैं, परन्तु उनमें से अधिकांश सौ-दो सौ पद्यों में ही समाप्त हैं, जो कुछ बड़े हैं वे अनुवादित हैं मौलिक नहीं। सहृदय कवि बाबू मैथलीशरण गुप्त का ‘जयद्रथवध’ निस्सन्देह मौलिक ग्रन्थ है, परन्तु यह खण्ड-काव्य है। इसके अतिरिक्त ये समस्त ग्रन्थ अन्त्यानुप्रास विभूषित हैं, इसलिए खड़ी बोलचाल में मुझको एक ऐसे ग्रन्थ की आवश्यकता देख पड़ी, जो महाकाव्य हो; और ऐसी कविता में लिखा गया हो जिसे भिन्नतुकान्त कहते हैं। अतएव मैं इस न्यूनता की पूर्ति के लिए कुछ साहस के साथ अग्रसर हुआ और अनवरत परिश्रम करके इस ‘प्रियप्रवास’ नामक ग्रन्थ की रचना की; जो कि आज आप लोगों के कर-कमलों में सादर समर्पित है। मैंने पहले इस ग्रन्थ का नाम ‘ब्रजांगना-विलाप’ रखा था, किन्तु कई कारणों से मुझको यह नाम बदलना पड़ा, जो इस ग्रन्थ के समग्र पढ़ जाने पर आप लोगों को स्वयं अवगत होंगे। मुझमें महाकाव्यकार होने की योग्यता नहीं, मेरी प्रतिभा ऐसी सर्वतोमुखी नहीं जो महाकाव्य के लिए उपयुक्त उपस्कर संग्रह करने में कृतकार्य्य हो सके, अतएव मैं किस मुख से यह कह सकता हूँ कि ‘प्रियप्रवास’ के बन जाने से खड़ी बोली में एक महाकाव्य न होने की न्यूनता दूर हो गई। हाँ, विनीत भाव से केवल इतना ही निवेदन करूँगा कि महाकाव्य का आभास-स्वरूप यह ग्रन्थ सत्रह सर्गों में केवल इस उद्देश्य से लिखा गया है कि इसको देखकर हिन्दी-साहित्य के लब्धाप्रतिष्ठ सुकवियों और सुलेखकों का ध्यान इस त्रुटि के निवारण करने की ओर आकर्षित हो। जब तक किसी बहुज्ञ मर्म्मस्पर्शिनी-सुलेखनी द्वारा लिपिबध्द होकर खड़ी बोली में सर्वांग सुन्दर कोई महाकाव्य आप लोगों को हस्तगत नहीं होता, तब तक यह अपने सहज रूप में आप लोगों के ज्योति-विकीर्णकारी उज्ज्वल चक्षुओं के सम्मुख है, और एक सहृदय कवि के कण्ठ से कण्ठ मिलाकर यह प्रार्थना करता है, ‘जबलौं फुलै न केतकी; तबलौं बिलम करील।’

    कविता-प्रणाली

    यद्यपि वर्तमान पत्र और पत्रिकाओं में कभी-कभी एक आध भिन्नतुकान्त कविता किसी उत्साही युवक कवि की लेखनी से प्रसूत होकर आजकल प्रकाशित हो जाती है, तथापि मैं यह कहूँगा कि भिन्नतुकान्त कविता भाषा-साहित्य के लिए एक बिल्कुल नई वस्तु है; और इस प्रकार की कविता में किसी काव्य का लिखा जाना तो ‘नूतनं नूतनं पदे पदे’ है। इसलिए महाकाव्य लिखने के लिए लालायित होकर जैसे मैंने बालचापल्य किया है, उसी प्रकार अपनी अल्प विषया-मति साहाय्य से अतुकान्त कविता में महाकाव्य लिखने का यत्न करके मैं अतीव उपहासास्पद हुआ हूँ। किन्तु, यह एक सिध्दान्त है कि ‘अकरणात् मन्दकरणम् श्रेय:’ और इसी सिध्दान्त पर आरूढ़ होकर मुझसे उचित वा अनुचित यह साहस हुआ है। किसी कार्य्य में सयत्न होकर सफलता लाभ करना बड़े भाग्य की बात है, किन्तु सफलता न लाभ होने पर सयत्न होना निन्दनीय नहीं कहा जा सकता। भाषा में महाकाव्य और भिन्नतुकान्त कविता में लिखकर मेरे जैसे विद्या बुध्दि के मनुष्य का सफलता लाभ करना यद्यपि असंभव बात है किन्तु इस कार्य्य के लिए सयत्न होना गर्हित नहीं हो सकता, क्योंकि ‘करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।’ जो हो परन्तु यह ‘प्रियप्रवास’ ग्रन्थ आद्योपान्त अतुकान्त कविता में लिखा गया है- अत: मेरे लिए यह पथ सर्वथा नूतन है, अतएव आशा है कि विद्वद्जन इसकी त्रुटियों पर सहानुभूतिपूर्वक दृष्टिपात करेंगे।

    संस्कृत के समस्त काव्य-ग्रन्थ अतुकान्त अथवा अन्त्यानुप्रासहीन कविता से भरे पड़े हैं। चाहे लघुत्रयी, रघुवंश आदि, चाहे बृहत्रयी किरातादि, जिसको लीजिए उसी में आप भिन्नतुकान्त कविता का अटल राज्य पावेंगे। परन्तु हिन्दी काव्य-ग्रन्थों में इस नियम का सर्वथा व्यभिचार है। उसमें आप अन्त्यानुप्रासहीन कविता पावेंगे ही नहीं। अन्त्यानुप्रास बड़े ही श्रवण-सुखद होते हैं और कथन को भी मधुरतर बना देते हैं। ज्ञात होता है कि हिन्दी-काव्य-ग्रन्थों में इसी कारण अन्त्यानुप्रास की इतनी प्रचुरता है। बालकों की बोलचाल में, निम्न जातियों के साधरण कथन और गान तक में आप इसका आदर देखेंगे, फिर यदि हिन्दी काव्य-ग्रन्थों में इसका समादर अधिकता से हो तो आश्चर्य क्या है? हिन्दी ही नहीं, यदि हमारे भारतवर्ष की प्रान्तिक भाषाओं बँगला, पंजाबी, मरहठी, गुजराती आदि पर आप दृष्टि डालेंगे तो वहाँ भी अन्त्यानुप्रास का ऐसा ही समादार पावेंगे; उर्दू और फारसी में भी इसकी बड़ी प्रतिष्ठा है। अरबी का तो जीवन ही अन्त्यानुप्रास है, उसके पद्य-भाग को कौन कहे, गद्य-भाग में भी अन्त्यानुप्रास की बड़ी छटा है। मुसलमानों के प्रसिध्द धर्म्म-ग्रन्थ कुरान को उठा लीजिए, यह गद्य-ग्रन्थ है; किन्तु इसमें अन्त्यानुप्रास की भरमार है। चीनी, जापानी जिस भाषा को लीजिए, एशिया छोड़कर यूरोप और अफ्रीका में चले जाइए, जहाँ जाइयेगा वहीं कविता में अन्त्यानुप्रास का समादर देखियेगा। अन्त्यानुप्रास की इतनी व्यापकता पर भी समुन्नत भाषाओं में भिन्नतुकान्त कविता आदृत हुई है, और इस प्रकार की कविता में उत्तमोत्तम ग्रन्थ लिखे गये हैं। संस्कृत की बात मैं ऊपर कह चुका हूँ; बँगला में इस प्रकार की कविता से भूषित ‘मेघनाद वध’ नाम का एक सुन्दर काव्य है। अंगरेजी में भी भिन्नतुकान्त कविता में लिखित कई उत्तमोत्तम पुस्तकें हैं।

    कहा जाता है, भिन्नतुकान्त कविता सुविधा के साथ की जा सकती है; और उसमें विचार स्वतन्त्रता, सुलभता और अधिक उत्तमता से प्रकट किये जा सकते हैं। यह बात किसी अंश में सत्य है, परन्तु मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं हूँ कि केवल इसी विचार से अन्त्यानुप्रास विभूषित कविता की आवश्यकता नहीं है। यदि अन्त्यानुप्रास आदर की वस्तु न होता, तो वह कदापि संसारव्यापी न होता; उसका इतना समादृत होना ही यह सिध्द करता कि वह आदरणीय है। इसके अतिरिक्त एक साधरण वाक्य को भी अन्त्यानुप्रास सरस कर देता है। हाँ, भाषा सौकर्य्य साधन के लिए उसको प्रकार की कविता से विभूषित करने के उद्देश्य से अतुकान्त कविता के भी प्रचलित होने की आवश्यकता है; और मैंने इसी विचार से इस ‘प्रियप्रवास’ ग्रन्थ की रचना, इस प्रकार की कविता में की है।

    काव्यवृत्त

    मैंने ऊपर निवेदन किया है कि संस्कृत कविता का अधिकांश भिन्नतुकान्त है, इसलिए यह स्पष्ट है कि भिन्नतुकान्त कविता लिखने के लिए संस्कृत-वृत्त बहुत ही उपयुक्त है। इसके अतिरक्त भाषा छन्दों में मैंने जो एक आध अतुकान्त कविता देखी, उसको बहुत ही भद्दी पाया; यदि कोई कविता अच्छी मिली भी तो उसमें वह लावण्य नहीं मिला, जो संस्कृत-वृत्तों में पाया जाता है; अतएव मैंने इस ग्रन्थ को संस्कृत-वृत्तों में ही लिखा है। यह भी भाषा-साहित्य में एक नई बात है। जहाँ तक मैं अभिज्ञ हूँ अब तक हिन्दी-भाषा में केवल संस्कृत-छन्दों में कोई ग्रन्थ नहीं लिखा गया है। जब से हिन्दी भाषा में खड़ी बोली की कविता का प्रचार हुआ है, तब से लोगों की दृष्टि संस्कृत-वृत्तों की ओर आकर्षित है, तथापि मैं यह कहूँगा कि भाषा में कविता के लिए संस्कृत-छन्दों का प्रयोग अब भी उत्तम दृष्टि से नहीं देखा जाता। हम लोगों के आचार्यवत् मान्य श्रीयुत् पण्डित बाल कृष्ण भट्ट अपनी द्वितीय साहित्य-सम्मेलन की स्वागत-सम्बंधिनी वक्तृता में कहते हैं

    आजकल छन्दों के चुनाव में भी लोगों की अजीब रुचि हो रही है; इन्द्रवज्रा, मन्द्राक्रान्ता, शिखरिणी आदि संस्कृत छन्दों का हिन्दी में अनुकरण हममें तो कुढ़न पैदा करता है।

    ( द्वितीय हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन का कार्यविवरण 2 भाग ; पृ. 8)

    ‘प्रियप्रवास’ ग्रन्थ 15 अक्तूबर, सन् 1909 ई. को प्रारम्भ और कार्य्य-बाहुल्य से 24 फरवरी, सन् 1913 ई. को समाप्त हुआ है। जिस समय आधे ग्रन्थ को मैं लिख चुका था, उस समय माननीय पण्डित जी का उक्त वचन मुझे दृष्टिगोचर हुआ। देखते ही अपने कार्य्य पर मुझको कुछ क्षोभ-सा हुआ, परन्तु मैं करता तो क्या करता, जिस ढंग से ग्रन्थ प्रारम्भ हो चुका था, उसमें परिवर्तन नहीं हो सकता था। इसके अतिरिक्त श्रध्देय पण्डित जी का उक्त विचार मुझको सर्वांश में समुचित नहीं जान पड़ा, क्योंकि हिन्दी-भाषा के छन्दों से संस्कृत-वृत्त खड़ी बोली की कविता के लिए अधिक उपयुक्त हैं, और ऐसी अवस्था में सर्वथा त्याज्य नहीं कहे जा सकते। मैं दो एक वर्तमान भाषा-साहित्य-अनुरागियों की अनुमति नीचे प्रकाशित करता हूँ। इन अनुमतियों के पठन से भी मेरे उस सिध्दान्त की पुष्टि होती है, जिसको अवलम्बन कर मैंने संस्कृत-वृत्तों में अपना ग्रन्थ रचा है। उदीयमान युवक कवि पं. लक्ष्मीधर वाजपेयी वि. सम्वत् 1968 में प्रकाशित अपने ‘हिन्दी मेघदूत’ की भूमिका के पृष्ठ 3, 4 में लिखते हैं

    जब तक खड़ी बोली की कविता में संस्कृत के ललित-वृत्तों की योजना न होगी तब तक भारत के अन्य प्रान्तों के विद्वान् उससे सच्चा आनन्द कैसे उठा सकते हैं? यदि राष्ट्रभाषा हिन्दी के काव्य-ग्रन्थों का स्वाद अन्य प्रान्तवालों को भी चखाना है, तो उन्हें संस्कृत के मन्दाक्रान्ता, शिखरिणी, मालिनी, पृथ्वी, वसंततिलका, शार्दूलविक्रीड़ित आदि ललित वृत्तों से अलंकृत करना चाहिए। भारत के भिन्न-भिन्न प्रान्तों के निवासी विद्वान् संस्कृत-भाषा के वृत्तों से अधिक परिचित हैं, इसका कारण यही है कि संस्कृत भारतवर्ष की पूज्य और प्राचीन भाषा है। भाषा का गौरव बढ़ाने के लिए काव्य में अनके प्रकार के ललित वृत्तों और नूतन छन्दों का भी समावेश होना चाहिए।

    साहित्यमर्मज्ञ, सहृदयवर, समादरणीय श्रीयुत पण्डित मन्नन द्विवेदी, सम्वत् 1970 में प्रकाशित ‘मर्यादा’ की ज्येष्ठ, आषाढ़ की मिलित संख्या के पृष्ठ 96 में लिखते हैं

    यहाँ एक बात बतला देना बहुत जरूरी है। जो बेतुकान्त की कविता लिखे, उसको चाहिए कि संस्कृत के छन्दों को काम में लाये। मेरा ख्याल है कि हिन्दी पिंगल के छन्दों में बेतुकान्त कविता अच्छी नहीं लगती। स्वर्गीय साहित्याचार्य पं. अम्बिकादत्त जी व्यास ऐसे विद्वान् भी हिन्दी-छन्दों में अच्छी बेतुकान्त कविता नहीं कर सके। कहना नहीं होगा कि व्यास जी का ‘कंसवध’ काव्य बिलकुल रद्दी हुआ है।

    अब रही यह बात कि संस्कृत-छन्दों का प्रयोग मैं उपयुक्त रीति से कर सका हूँ या नहीं, और उनके लिखने में मुझको यथोचित सफलता हुई है या नहीं। मैं इस विषय में कुछ लिखना नहीं चाहता, इसका विचार भाषा-मर्म्मज्ञों के हाथ है। हाँ, यह अवश्य कहूँगा कि आद्य उद्योग में असफल होने की ही अधिक आशंका है।

    भाषा-शैली

    ‘प्रियप्रवास’ की भाषा संस्कृत-गर्भित है। उसमें हिन्दी के स्थान पर संस्कृत का रंग अधिक है। अनेक विद्वान् सज्जन इससे रुष्ट होंगे, कहेंगे कि यदि इस भाषा में ‘प्रियप्रवास’ लिखा गया तो अच्छा होता यदि संस्कृत में ही यह ग्रन्थ लिखा जाता। कोई भाषा-मर्म्मज्ञ सोचेंगे इस प्रकार संस्कृत-शब्दों को ठूँसकर भाषा के प्रकृत रूप को नष्ट करने की चेष्टा करना नितान्त गर्हित कार्य है। उक्त वक्तृता में भट्ट जी एक स्थान पर कहते हैं

    दूसरी बात जो मैं आजकल खड़ी बोली के कवियों में देख रहा हूँ, वह समासबध्द, क्लिष्ट संस्कृत-शब्दों का प्रयोग है, यह भी पुराने कवियों की पध्दति के प्रतिकूल है।

    इस विचार के लोगों से मेरी यह प्रार्थना है कि क्या मेरे इस एक ग्रन्थ से ही भाषा-साहित्य की शैली परिवर्तित हो जावेगी? क्या मेरे इस काव्य की लेख-प्रणाली ही अब से सर्वत्र प्रचलित और गृहीत होगी? यदि नहीं, तो इस प्रकार का तर्क समीचीन न होगा। हिन्दी-भाषा में सरल पद्य में एक से एक सुन्दर ग्रन्थ हैं। जहाँ इस प्रकार के अनेक ग्रन्थ हैं, वहाँ एक ग्रन्थ ‘प्रियप्रवास’ के ढंग का भी सही। इसके अतिरिक्त मैं यही कहूँगा कि क्या ऐसे संस्कृत-गर्भित ग्रन्थ हिन्दी में अब तक नहीं लिखे गये हैं? और क्या जनसमाज में वे समाप्त नहीं हैं? क्या रामचरितमानस, विनय पत्रिका और रामचन्द्रिका से भी ‘प्रियप्रवास’ अधिक संस्कृत-गर्भित है? क्या जिस प्रकार की संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली की कविता आजकल सामयिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही हैं, ‘प्रियप्रवास’ की कविता दुरूहता में उससे आगे निकल गई है? यह ग्रन्थ न्यायदृष्टि से पढ़कर यदि मीमांसा की जावेगी तो कहा जावेगा कभी नहीं, और ऐसी दशा में मुझे आशा है कि इस विषय में मैं विशेष दोषी न समझा जाऊँगा। कुछ संस्कृत-वृत्तों के कारण और अधिकतर मेरी रुचि से इस ग्रन्थ की भाषा संस्कृत-गर्भित है, क्योंकि अन्य प्रान्तवालों में यदि समादर होगा तो ऐसे ही ग्रन्थों का होगा। भारतवर्ष भर में संस्कृत-भाषा आदृत है। बँगला, मरहठी, गुजराती, वरन् तमिल और पंजाबी तक में संस्कृत शब्दों का बाहुल्य है। इन संस्कृत शब्दों को यदि अधिकता से ग्रहण करके हमारी हिन्दी-भाषा उन प्रान्तों के सज्जनों के सम्मुख उपस्थित होगी तो वे साधरण हिन्दी से उसका अधिक समादर करेंगे, क्योंकि उसके पठन-पाठन में उनको सुविधा होगी और वे उसको समझ सकेंगे। अन्यथा हिन्दी के राष्ट्र-भाषा होने में दुरूहता होगी, क्योंकि सम्मिलन के लिए भाषा और विचार का साम्य ही अधिक उपयोगी होता है। मैं यह नहीं कहता कि अन्य प्रान्तवालों से घनिष्ठता का विचार करके हम लोग अपने प्रान्तवालों की अवस्था और अपनी भाषा के स्वरूप को भूल जावें। यह मैं मानूँगा कि इस प्रान्त के लोगों की शिक्षा के लिए और हिन्दी भाषा के प्रकृत-रूप की रक्षा के निमित्त, साधरण वा सरल हिन्दी में लिखे गये ग्रन्थों की ही अधिक आवश्यकता है; और यही कारण है कि मैंने हिन्दी में कतिपय संस्कृत-गर्भित ग्रन्थों की प्रयोजनीयता बतलाई है। परन्तु यह भी सोच लेने की बात है कि क्या यहाँ वालों को उच्च हिन्दी से परिचित कराने के लिए ऐसे ग्रन्थों की आवश्यकता नहीं है, और यदि है तो मेरा यह ग्रन्थ केवल इसी कारण से उपेक्षित होने योग्य नहीं। जो सज्जन मेरे इतना निवेदन करने पर भी अपनी भौंह की बंकता निवारण न कर सकें, उनसे मेरी यह प्रार्थना है कि वे ‘वैदेही-वनवास’ के कर-कमलों में पहुँचने तक मुझे क्षमा करें, इस ग्रन्थ को मैं अत्यन्त सरल हिन्दी और प्रचलित छन्दों में लिख रहा हूँ।

    मैंने ऊपर लिखा है कि क्या ‘रामचरितमानस’ ‘रामचंद्रिका’ और ‘विनयपत्रिका’ से भी ‘प्रियप्रवास’ अधिक संस्कृत-गर्भित है, मेरे इस वाक्य से संभव है कि कुछ भ्रम उत्पन्न होवे, और यह समझा जावे कि मैं इन पूज्य-ग्रन्थों के वन्दनीय ग्रन्थकारों से स्पर्द्धा कर रहा हूँ और अपने काँच की हीरक-खण्ड के साथ तुलना करने में सयत्न हूँ। अतएव मैं यहाँ स्पष्ट शब्दों में प्रकट कर देता हूँ कि मेरे उक्त वाक्य का मर्म्म केवल इतना ही है कि संस्कृत-शब्दों के बाहुल्य से कोई ग्रन्थ अनादृत नहीं हो सकता। यह और बात है कि संस्कृत-शब्दों का प्रयोग उचित रीति और चारु-रूपेण न हो सके, और इस कारण से कोई ग्रन्थ हास्यास्पद और निन्दनीय बन जावे।

    कवितागत स्वारस्य

    हिन्दी के कतिपय साहित्यसेवियों का यह भी विचार है कि खड़ी बोली में सरस और मनोहर कविता नहीं हो सकती। पूज्य पण्डित जी अपने उक्त भाषण में ही एक स्थान पर लिखते हैं

    खड़ी बोली की कविता पर हमारे लेखकों का समूह इस समय टूट पड़ा है। आजकल के पत्रों और मासिक-पत्रिकाओं में बहुत-सी इस तरह की कवितायें छपी हैं, परन्तु इनमें अधिकतर ऐसी हैं जिनको कविता कहना ही कविता की मानो हँसी करना है; हमें तो काव्य के गुण इनमें बहुत कम जँचते हैं।

    मेरे विचार में खड़ी बोली में एक इस प्रकार का कर्कशपन है कि कविता

    के काम में ला उसमें सरसता सम्पादन करना प्रतिभावान के लिए भी कठिन है, तब तुकबन्दी करनेवालों की कौन कहे।

    इन सज्जनों का विचार यह है कि ‘मधुर कोमलकांत पदावली’ जिस
    कविता में न हो वह भी कोई कविता है! कविता तो वही है जिसमें कोमल शब्दों का विन्यास हो, जो ‘मधुर अथच कान्तपदावली द्वारा अलंकृत हो। खड़ी बोली में अधिकतर संस्कृत-शब्दों का प्रयोग होता है, जो हिन्दी के शब्दों की अपेक्षा कर्कश होते हैं। इसके व्यतीत उसकी क्रिया भी ब्रजभाषा की क्रिया से रूखी
    और कठोर होती है; और यही कारण है कि खड़ी बोली की कविता सरस नहीं होती और कविता का प्रधान गुण माधुर्य और प्रसाद उसमें नहीं पाया जाता। यहाँ पर मैं यह कहूँगा कि पदावली की कान्तता, ‘मधुरता, कोमलता केवल
    पदावली में ही सन्निहित है, या उसका कुछ सम्बन्ध मनुष्य के संस्कार और
    उसके हृदय से भी है? मेरा विचार है कि उसका कुछ सम्बन्ध नहीं, वरन् बहुत कुछ सम्बन्ध मनुष्य के संस्कार और उसके हृदय से है। कर्पूरमंजरीकार प्रसिध्द राजशेखर कवि अपनी प्रस्तावना में प्राकृत-भाषा की कोमलता की प्रशंसा करते हुए कहते हैं

    परुसा सक्कअबंधा पाउअबन् धो बिहोइ सुउमारो।

    पुरुसांणं महिलाणं जेत्तिय मिहन्तरं तेत्तिय मिमाणम्॥

    इस श्लोक के साथ निम्नलिखित संस्कृत रचनाओं को मिलाकर पढ़िए

    इतर पापफलानि यथेच्छया वितरतानि सहे चतुरानन।

    अरसिकेषु कवित्वनिवेदनं शिरसि मा लिख मा लिख मा लिख॥

    विद्या विनयोपेता हरति न चेतांसि कस्य मनुजस्य।

    काद्बचनमणिसंयोगो नो जनयति कस्य लोचनानंदम्॥

    वारिजेनेव सरसी शशि नेत्र निशीथिनी।

    यौवनेनेव वनिता नयेन श्रीर्मनोहरा॥

    आयाति याति पुनरेव जलं प्रयाति

    पद्मां कुराणि विचिनोति धु नोति पक्षौ।

    उन्मत्तवद् भ्रमति कूजति मन्दमन्दम्

    कान्तावियोगवि धु रो निशि चक्रवाक:॥

    कतिपय पंक्तियाँ दोनों के गद्य की भी देखिए

    एसा अहं देवदामिहुणम् रोहिणीमि अलद्बछणम् मक्खीकदुअ अज्जउत्तम् प्पसादेमि, अज्ज प्पहुदि अज्जउत्तीजम् इत्थिअम् कामेदि जा अ अज्जउत्तस्स समागमप्पणइणी ताएम एपीदिवन्धेण वत्ति दव्वम्।

    विक्रोमर्वशी

    अहं खलु सिध्दादेशजनितपरित्रासेन राज्ञा पालकेन घोषादानीय विशसने गूढ़ागारे बन्धनेन बध्द: तस्माच्च प्रियसुहृत्शविलकप्रसादेन-बन्धनात् विमुक्तोस्मि।

    मृच्छकटिक

    अब बतलाइए कोमल-कान्त-पदावली और सरसता किसमें अधिक है? उक्त प्राकृत श्लोक का रचयिता कहता है किसंस्कृत की रचना परुष और प्राकृत की सुकुमार होती है, पुरुष स्त्री में जो अन्तर है वही अन्तर इन दोनों में है। परन्तु दोनों भाषाओं की ऊधर्व लिखित कपितप पंक्तियों को पढ़कर आप अभिज्ञ हुए होंगे कि उसके कथन में कितनी सत्यता है। कोमल-कान्त पद कौन हैं? वही जिनके उच्चारण में मुख को सुविधा हो और जो श्रुतिकटु न हो। संयुक्ताक्षर और टवर्ग जिस रचना में जितने न्यून होंगे वह रचना उतनी ही कोमल और कान्त होगी; और वे जितने अधिक होंगे उतनी ही अधिक वह कर्कश होगी। अब आप देखें शब्द-संख्या निर्देश से प्राकृत और संस्कृत के उध्दृत श्लोकों और वाक्यों में से किसमें युक्ताक्षर और टवर्ग अधिक हैं। आप प्राकृत श्लोक और वाक्य में ही अधिक पावेंगे, और ऐसी दशा में यह सिध्द है कि प्राकृत से संस्कृत की ही पदावली कोमल, ‘मधुर और कान्त है।

    मैं कतिपय प्राकृत वाक्यों को उनके संस्कृत अनुवाद सहित नीचे लिखता हूँ। आप इनको भी पढ़कर देखिए किसमें कोमलता और ‘मधुरता अधिक है। और प्राकृत एवं संस्कृत के उन शब्दों को विशेष मनोनिवेश-पूर्वक पढ़िए जिनके नीचे लकीर खींची हुई है, और इस बात की मीमांसा कीजिए कि एक-दूसरे का रूपान्तर होने पर भी उनमें कौन कान्त है

    अज्जस्सज्जेब पिअबअस्सेन चुण बुङ्ढेण।

    आर्य्यस्यैव प्रियवयस्येन चूर्ण वृध्देन।

    आ:दासीए पुत्त चुणबुङ्ढा कदाणुक्खु तुम कुबिदेणरणा पालयेण

    णवं बहु केस कलावं बिअ ससुअन्ध ं कप्पिजन्तं पेक्सिस्सं।

    आ: दास्या: पुत्र चूर्ण वृध्द कदानु खलु त्वां कुपितेन राज्ञा

    पालकेननवव धू केशकलापमिव ससुगन्ध ं छेद्यमानं प्रेक्षिष्ये।

    अम्हारिस जण जोग्गेण बम्हणेण ऊबनिमन्तितेण।

    अस्मादृश जन योग्येन ब्राह्मणेन उपनिमन्त्रितेन॥

    द्दादेहं शलिल जलेहिं पाणिएहिं उज्जाणेउबबण काणणेणिशणे

    णालीहिसहजुबदी हिइत्थिआहिंगन्धव्बोबिअशुदेहिअङ्गकेहि

    स्नातोहं सलिलजलं पानीय: उद्याने उपवन कानने निशण्णे।

    नारीभि: सह युवतीभि: स्त्री भिर्गन्धर्व इव सुहितैरङ्गकै:।

    हत्थशद्बजदो मुहशद्बजदो इन्द्रियशद्बजदो शेक्खु माणुशे।

    किं कलेदि लाअउले तश्श पललोओ हत्थे णिच्चले।

    हस्तसंयत: मुखसंयत इन्द्रियसंयत: सखलु मनुष्य:।

    किं करोति राजकुलं तस्य परलोको हस्ते निश्चल:॥

    मृच्छकटिक

    यदि कहा जावे कि संस्कृत-श्लोकों और वाक्यों के चुनने में जिस सहृदयता से काम लिया गया है, प्राकृत के श्लोकों और वाक्यों के चुनने में वैसा नहीं किया गया, तो पहले तो यह तर्क इसलिए उचित न होगा कि प्राकृत वाक्यों या श्लोकों का ही अनुवाद तो संस्कृत में नीचे दिया गया है। दूसरे मैं इस तर्क के समाधन के लिए कतिपय प्राकृत और संस्कृत के मनोहर श्लोकों और वाक्यों को नीचे लिखता हूँ। आप उनको मिलाइए, और देखिए कि दोनों की सरसता और कोमलता में कितना अन्तर है

    असारे सार मतिनो सारे चासार दस्सिनो।

    ते सारे नाधि गच्छन्ति मिच्छा संकप्पगोचरा॥ 1 ॥

    अप्पमादेन मघवा देवानं सेद्वतं गतो।

    अप्पमादं परां सन्ति पमादो गरहितो सदा॥ 2 ॥

    नपुष्पगं धो पटिवातमेति न चन्दनं तग्गर मल्लिका वा।

    सतं च गं धो पटिवातमेति सब्बादिसा सप्पुरिसोपवायति॥ 3 ॥

    उदकं हि नयन्ति नेतिका उसुकारानमयन्ति तेजनं।

    दारुनमयन्ति तच्छका अत्तानं दमयन्ति पण्डिता॥ 4 ॥

    मासे मासे सहस्सेनयो यजेथ सतं समम्।

    एकं च भावितत्तान मुहुत्तामपि पूजये॥ 5 ॥

    धम्मपद

    रणन्त मणिणेउरं झणझणन्तहारच्छडं।

    कलक्कणिद किंकिणी मुहर मेहलाडम्बरं।

    विलोल बलआवलीजणिदमंजुसिंजारवं।

    णकस्समणमोहणं ससिमुहीअहिन्दोलणम्॥ 6 ॥

    क़र्पूरमंजरी

    अलिरसौ नलिनीवनवल्लभ: कुमुदिनीकुलकेलिकलारस:।

    विधिवशेन विदेशमुपागत: कुटजपुष्परसं बहुमन्यते॥ 1 ॥

    केवानसन्तिभुवितामरसावतंसाहंसावलीबलयिनोबल सन्निवेशा।

    किंचातकोफलमवेक्ष्यसवज्रपातांपौरन्दरीमुपगतोनववारिधाराम्॥ 2 ॥

    निर्वाणदीपे किमु तैलदानं चौरे गते वा किमु साव धन म्।

    वयोगते किं वनिताविलास: पयोगते किं खलु सेतुबंध:॥ 3 ॥

    वरमसिधारा तरुतलवासो वरमिह भिक्षा वरमुपवास:।

    वरमपि घोरे नरके पतनं न च धनगर्वितबान्धवशरणम्॥ 4 ॥

    विहाररासखेदभेद धी रतीर मारुता।

    गतागिरामगोचरे यदीयनीरचारुता।

    प्रवाहसाहचर्य्य पूत मेदिनी नदी नदा

    धु नोतु नो मनोमलंकलिन्दनन्दिनी सदा॥ 5 ॥

    क़ाव्यसंग्रह

    शिलीमुखेस्मिंस्तवनामवांछिते मृगोपनीते मृगशावलोचना।

    प्रमोदमाप्तेयमितो विलोकिते करे चकोरीव तुषारदी धि तै:॥ 1 ॥

    मनसिजवरबीर बैजयन्त्यास्त्रिाभुवनदुर्लभविभ्रमैकभूमे:।

    कुचमुकुलविचित्र पत्र वल्लीपरिचित एष सदा शशिप्रभाया:॥ 2 ॥

    साहसांकचरित

    णम् पहादा रअणीं ता सिग्धाम् सअणम् परिच्चआमि। अधवा लहु लहु उत्थिदाबि किं कारिस्समणमे उद्ददेसुम पहादकरणीये सुम्हथ्यपादाओप्सरन्ति, कामो दाणिम् सकामोभोदु, जेण असच्चसन्धे जणेपिअसही सुध्दहिअआपदं कारिदा।

    शकुन्तला नाटक

    सैवाहं कादम्बरीयानेन कुमारेण मत्तमदमुखरमधुकरकुलकलकोलाहलाकुलिते, कोककामिनीकरुणकूजिते विरहिजनमनोदु:खेविकचदलारविन्द निस्यन्दसुगन्ध मन्दगन्धवाहानन्दितदशदिशि प्रदोषसमये विकसितकुसुममामोदमुकुलित- मानिनीमानग्रहोन्मोचनहस्ते, कुसुमायुधे।

    क़ादम्बरी

    यदि इन श्लोकों और गद्य अवतरणों को पढ़कर यह युक्ति उपस्थित की जावे कि प्राकृत भाषा की उत्पत्ति कैसे हुई? प्राकृत भाषा की उत्पत्ति का कारण यही है न कि संस्कृत के कठिन शब्दों को सर्वसाधरण यथा रीति उच्चारण नहीं कर सकते थे, वे उच्चारण सौकर्य्य-साधन और मुख की सुविधा के लिए उसे कुछ कोमल और सरल कर लेते थे क्योंकि मनुष्य का स्वभाव सरलता और सुविधा को प्यार करता है; तो यह सिध्द है कि प्राकृत भाषा की उत्पत्ति ही सरलता और कोमलतामूलक है। अर्थात् प्राकृत भाषा उसी का नाम है जो संस्कृत के कर्कश शब्दों को कोमल स्वरूप में ग्रहण कर जन-साधरण के सम्मुख यथाकाल उपस्थित हुई है; और ऐसी अवस्था में यह निर्विवाद है कि संस्कृत भाषा से प्राकृत कोमल और कान्त होगी। मैं इस युक्ति को सर्वांश में स्वीकार करने के लिए प्रस्तुत नहीं हूँ। यह सत्य है कि प्राकृत भाषा में अनेक शब्द ऐसे हैं जो संस्कृत के कर्कश स्वरूप को छोड़कर कोमल हो गये हैं। किन्तु कितने शब्द ऐसे हैं जो संस्कृत शब्दों का मुख्य रूप त्याग कर उच्चारण-विभेद से नितान्त कर्ण-कटु हो गये हैं और यही शब्द मेरे विचार में प्राकृत वाक्यों को संस्कृत वाक्यों से अधिकांश स्थलों पर कोमल नहीं होने देते।

    निम्नलिखित शब्द ऐसे हैं जो संस्कृत का कर्कश रूप छोड़कर प्राकृत में कोमल और कान्त हो गये हैं :

    1 संस्कृत प्राकृत संस्कृत प्राकृत संस्कृत प्राकृत

    धर्म्म धम्म गर्ब गब्ब पुत्र पुत्त

    गन्धर्ब्ब गन्धाब्ब दशिन: दस्सिनो अप्रमादेन अप्पमादेन

    2 प्रशंसन्ति पसंसन्ति प्रमाद: प्रमादो सर्व सब्ब

    किन्तु निम्नलिखित शब्द नितान्त श्रुति-कटु हो गये हैं :

    संस्कृत प्राकृत संस्कृत प्राकृत

    प्रियवयस्येन पिअवअस्सेण वृध्देन बुङ्ढेण

    वृध्द बुङ्ढा कदानु कदाणु

    खलु क्खु कुपितेन कुबिदेण

    राज्ञा रणा पालकेन पालयेण

    नव णव मिव बिअ

    जन जण योग्येन जोग्गेण

    सलिल शलिल पानीयै: पाणिएहि

    उद्याने उज्जाणे उपबन उबबण

    उपनिमंत्रितेन उबणिमन्तिदेण स्नातोहं ह्वादेहं

    इन दोनों प्रकार के उद्धात शब्दों के अवलोकन से यह स्पष्ट हो गया कि प्राकृत में संस्कृत के यदि अनेक शब्द कर्कश से कोमल हो गये हैं, तो उच्चारण-विभिन्नता, जल-वायु और समय-स्रोत के प्रभाव से बहुत से शब्द कोमल बनने के स्थान पर परम कर्ण-कटु बन गये हैं। संस्कृत के न, ध्द, व, य इत्यादि के स्थान पर प्राकृत भाषा में ण, ड, ढ, ब, अ इत्यादि का प्रयोग उसको बहुत ही श्रुति-कटु कर देता है, और ऐसी अवस्था में जिस युक्ति का उल्लेख किया गया है, वह केवल एकांश में मानी जा सकती है, सर्वांश में नहीं। और जब यह युक्ति सर्वांश में गृहीत नहीं हुई, तो जिस सिध्दान्त का प्रतिपादन मैं ऊपर से करता आया हूँ वही निर्विवाद ज्ञात होता है, और हमको इस बात के स्वीकार करने के लिए बाध्य करता है कि प्राकृत भाषा से संस्कृत भाषा परुष नहीं है। तथापि राजशेखर जैसा वावदूक विद्वान् उसको प्राकृत से परुष बतलाता है, इसका क्या कारण है?

    मैं समझता हूँ इसके निम्नलिखित कारण हैं :

    1. एक संस्कार जो सहस्रों वर्ष तक भारतवर्ष में फैला था, और जो प्राकृत को संस्कृत की जननी और उससे उत्तम बतलाता था।

    2. प्राकृत का सर्वसाधरण की भाषा अथवा अधिकांश उसका निकटवर्ती होना।

    3. बोलचाल में अधिक आने के कारण प्राकृत का संस्कृत की अपेक्षा बोधगम्य होना।

    और इसीलिए मेरा यह विचार है कि पदावली की कान्तता, कोमलता और ‘मधुरता केवल पदावली में ही सन्निहित नहीं है। वरन् उसका बहुत कुछ सम्बन्ध संस्कार और हृदय से भी है। सम्भव है कि मेरा यह विचार इन कतिपय पंक्तियों द्वारा स्पष्टतया प्रतिपादित न हुआ हो। इसके अतिरिक्त यह कदापि सर्वसम्मत न होगा कि प्राकृत से संस्कृत परुष नहीं है, अतएव मैं एक दूसरे पथ से अपने इस विचार को पुष्ट करने की चेष्टा करता हूँ।

    जिस प्राकृत भाषा के विषय में यह सिध्दान्त हो गया था कि :

    सा मागधी मूलभाषा नरेय आदि कप्पिक।

    ब्राह्मणमसूटल्लाप समबुध्दच्चापि भाषरे॥

    पतिसम्बिध अत्तृय, नामक पाली ग्रन्थ में जिस भाषा के विषय में लिखा गया है कि यह भाषा देवलोक, नरलोक, प्रेतलोक और पशु जाति में सर्वत्र ही प्रचलित है, किरात, अन्धक, योणक, दामिल, प्रभृति भाषा परिवर्तनशील हैं। किन्तु मागधी आर्य और ब्राह्मणगण की भाषा है, इसलिए अपरर्वत्तनीय और चिरकाल से समानरूपेण व्यवहृत है। मागधी भाषा को सुगम समझकर बुध्ददेव ने स्वयं पिटकनिचय को सर्वसाधरण के बोध-सौकर्य्य के लिए इस भाषा में व्यक्त किया था। जिस प्राकृत को राजशेखर जैसा असाधरण विद्वान् संस्कृत से कोमल और ‘मधुर होने का प्रशंसापत्र देता है, काल पाकर वह अनादृत क्यों हुई? उसका प्रचार इतना न्यून क्यों हो गया कि उसके ज्ञाताओं की संख्या उँगलियों पर गिनी जाने योग्य हो गई? ‘मधुरता, कोमलता, कान्तता किसको प्यारी नहीं है, सुविधा का आदर कौन नहीं करता; फिर सुविधामूलक ‘मधुर कोमलकान्त भाषा का व्यवहार क्यों कवियों की रचनाओं आदि में दिन-दिन अल्प होता गया? कहा जावेगा कि प्राकृत भाषा की प्रिय-दुहिता परम सरला और मनोहरा हिन्दी भाषा का प्रचार ही इस द्रास का कारण है। परन्तु प्रश्न तो यह है कि यह प्रिय दुहिता अपनी जन्मदायिनी से इतनी विरक्त क्यों हो गई कि दिन-दिन उसके शब्दों को त्याग कर संस्कृत शब्दों को ग्रहण करने लगी; काल पाकर क्यों थोड़े प्राकृत शब्द भी अपने मुख्य रूप में उसमें शेष न रहे, और उस संस्कृत के अनेक शब्द उसमें क्यों भर गये जो कि परुष कही जाती है।

    उस काल के ग्रन्थों में केवल एक ग्रन्थ पृथ्वीराज रासो, अब हम लोगों को प्राप्त है, अतएव मैं उसी ग्रन्थ के कुछ पद्यों को यहाँ उध्दृत करता हूँ। आप लोग इनको पढ़कर देखिए कि किस प्रकार उस समय प्राकृत भाषा के शब्दों का व्यवहार न्यून और कैसे संस्कृत के शब्दों का समादर अधिक हो चला था। आज कल प्राकृत भाषा हम लोगों को इतनी अपरिचिता है कि उसके बहुत से शब्दों का व्यवहार करने के कारण ही, हम लोग अनुराग के साथ ‘पृथ्वीराज रासो’ को नहीं पढ़ सकते और उससे घबड़ाते हैं।

    श्लोक

    आसामहीब कब्बी नवनव कित्तिाय संग्रहं ग्रन्थं।

    सागरसरिसतरंगी वोहथ्थयं उक्तियं चलयं॥

    दोहा

    काव्य समुद कविचन्द कृकृत युगति समप्पन ज्ञान।

    राजनीति वोहिथ सुफल पार उतारन यान॥

    सत्ता सहस नष सिष सरस सकल आदि मुनि दिष्य।

    घट बढ़ मत कोऊ पढ़ौ मोहि दूसन न बसिष्य॥

    चन्द की रचना में तो प्राकृत शब्द मिलते भी हैं, वरन् कहीं-कहीं अधिकता से मिलते हैं, किन्तु महाकवि चन्द के पश्चात् के जितने कवियों की कवितायें मिलती हैं उनमें प्राकृत भाषा के शब्दों का व्यवहार बिल्कुल नहीं पाया जाता। कारण इसका यह है कि इस समय प्राकृत भाषा का व्यवहार उठ गया था और हिन्दी का राज्य हो गया था। इस काल की रचना में अधिकांश हिन्दी-शब्द ही पाये जाते हैं; हिन्दी शब्द के साथ आते हैं तो संस्कृत के शब्द आते हैं, प्राकृत के शब्द बिलकुल नहीं आते। महात्मा तुलसीदास, भक्तवर सूरदास और कविवर केशवदास की रचना में तो कहीं-कहीं हिन्दी शब्दों से भी अधिक संस्कृत शब्दों का प्रयोग हुआ है।

    पहले आप इन तीनों महोदयों के प्रथम की रचनाओं को देखिये

    तरवर से एक एक तिरिया उतरी उसने बहुत रिझाया।

    बाप का उसके नाम जो पूछा आधा नाम बताया॥

    सर्व सलोना सब गुन नीका। वा बिन सब जग लागे फीका॥

    वाके सिर पर होवे कोन। ए सखि साजन ? ना सखि लोन॥

    सिगरी रैन मोहि संग जागा। भोर भया तो बिछुरन लागा॥

    वाके बिछुरत फाटत हीया। ए सखि साजन ? ना सखि दीया॥

    अमीर खुसरो

    क्या पढ़ियै क्या गुनियै। क्या वेद पुराना सुनियै॥

    पढ़े सुने क्या होई। जो सहज न मिलियो सोई॥

    हरि का नाम न जपसि गँवारा। क्या सोचै बारम्बारा॥

    अंधि यारे दीपक चहियै। इक वस्तु अगोचर लहियै॥

    वस्तु अगोचर पाई। घट दीपक रह्यो समाई॥

    कह कबीर अब जाना। जब जाना तो मन माना॥

    हृदय कपट मुख ज्ञानी। झूठे कहा बिलोवसि पानी॥

    काया माँजसि कौन गुना। जो घट भीतर है मलना॥

    लौकी अठ सठ तीरथ न्हाई। कौरापन तऊ न जाई॥

    कह कबीर बीचारी। भवसागर तार मुरारी॥

    क़बीरसाहब

    नागमती चित्त ौर पथ हेरा। पिउ जो गये फिर कीन न फेरा॥

    सुआ काल ह्नै लैगा पीऊ। पीउ न जात जात बरु जीऊ॥

    भयो नरायन बावन करा। राज करत राजा बलि छरा॥

    करन बान लीनो कै छंदू। भरथहिं भो झलमला अनंदू॥

    लै कंतहिं भा गरुर अलोपी। विरह वियोग जियहिं किमि गोपी॥

    का सिर बरनों दिपइ मयंकू। चाँद कलंकी वह निकलंकू॥

    तेही लिलार पर तिलक बईठा। दुइज पास मानो ध्रुव डीठा॥

    मलिक मुहम्मद जायसी

    अब आप उक्त तीनों महोदयों की रचनाओं को देखिए। इनमें संस्कृत शब्दों की कितनी प्रचुरता है

    जमुना जल बिहरति ब्रज-नारी

    तट ठाड़े देखत नँदनन्दन ‘ मधुर -मुरलि कर धरी॥

    मोर मुकुट श्रवनन मणि कुण्डल जलज-माल उर भ्राजत।

    सुन्दर सुभग श्याम तन नव घन बिच बग-पाँति विराजत॥

    उर बनमाल सुभग बहु भाँतिन सेत लाल सित पीत।

    मनो सुरसरि तट बैठे शुक बरन बरन तजि भीत॥

    पीतांबर कटि मैं छुद्रावलि बाजत परम रसाल।

    सूरदास मनो कनकभूमि ढिग बोलत रुचिर मराल॥

    भक्तवर सूरदास

    सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ॥

    सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जीके॥

    चितवन चारु मार मद हरनी। भावत हृदय जात नहिं बरनी॥

    कलकपोल श्रुति कुण्डल लोला। चिबुक अधर सुन्दर मृदु बोला॥

    कुमुद-बं धु कर निन्दक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा॥

    भाल विशाल तिलक झलकाहीं। कच विलोकि अलि अवलि लजाहीं॥

    रेखा रुचिर कम्बु कल ग्रीवा। जनु त्रिभुवन सोभा की सींवा॥

    महात्मा तुलसीदास

    हरि कर मंडन सकल दुख खंडन

    मुकुर महि मंडल को कहत अखण्ड मति।

    परम सुबास पुनि पीयुख निवास

    परिपूरन प्रकास केसोदास भू अकाश गति॥

    बदन मदन कैसो श्री जू को सदन जहँ ,

    सोदर सुभोदर दिनेस जू को मीत अति।

    सीता जू के मुख सुखमा की उपमा को

    कहि कोमल न कमल अमल न रजनिपति॥

    क़विवर केशवदास

    यदि अभिनिविष्ट चित्त से इस विषय में विचार किया जावे तो स्पष्टतया यह बात हृदयङ्गम होगी कि संस्कृत-शब्दों के समादर और प्राकृत शब्दों में अप्रीति का मुख्य कारण बौध्द-धर्म को पराजित कर पुन: वैदिक धर्म्म का प्रतिष्ठा-लाभ करना है; जिसने संस्कृत की ममता पुन: जागरित कर दी। जब वैदिक-धर्म्म के साथ-साथ संस्कृत-भाषा का फिर आदर हुआ, तब यह असम्भव था कि प्राकृत शब्दों के स्थान पर फिर संस्कृत-शब्दों से अनुराग न प्रकट किया जाता। सर्वसाधरण की बोलचाल की भाषा का त्याग असम्भव था, किन्तु यह सम्भव था कि उसमें उपयुक्त संस्कृत-शब्द ग्रहण कर लिये जावें। निदान उस काल और उसके परवर्ती काल के कवियों की रचनायें मैंने जो ऊपर उध्दृत की हैं उनमें आप ये ही बातें पावेंगे।

    प्राकृत कोमल, कान्त और ‘मधुर होकर भी क्यों त्यक्त हुई? इसलिए कि सर्वसाधरण का संस्कार और हृदय उसके अनुकूल न रहा, इसलिए कि वह बोलचाल की भाषा से दूर जा पड़ी और बोधगम्य न रही। संस्कृत के शब्द बोलचाल की भाषा से और भी दूर पड़ गये थे; और वह भी बोधगम्य नहीं थे; किन्तु, धार्मिक-संस्कार ने उसके साथ सहानुभूति की, और इस सहानुभूति-जनित-हृदय-ममता ने उसको पुन: समादर का पान दिया। एक बात और है मुख-सुविधा और श्रवन-सुखदाता मानसिक श्रम के सम्मुख आदृत और वांछनीय नहीं होती, और कान्तता एवं कोमलता धार्मिक किंवा जाति-भाषा-मूलक संस्कार और तज्जनितहृदय-ममता के सामने स्थान और सम्मान नहीं पाती। मुख और श्रवण मन के अनुचर हैं। जिस कविता के पठन करने में मुख को सुविधा हुई, सुनने में कान को आनन्द हुआ, किन्तु समझने में मन को श्रम करना पड़ा, तो वह कविता अवश्य उद्वेगकर होगी, और यदि अपार श्रम करके भी मन उसको न समझ सका तो उसकी कान्तता और कोमलता उसकी दृष्टि में कठोरता, दुरूहता और जटिलता की मूर्ति छोड़ और क्या होगी? इसके विपरीत वह यदि लिखने पढ़ने किंवा बोलचाल की भाषा की निकटवर्त्तिनी हो, मन के श्रम का आधार न हो, और उसमें मुख-सुविधाकारक अथच श्रवण्-सुखद शब्द पर्याप्त न भी पाये जावें तो भी वह कविता आदृत और गृहीत होगी; और उसके श्रवण-कटु एवं मुख-असुविधाकारक शब्द कोमल और कान्त बन जावेंगे, क्योंकि सुविधा ही प्रधान है।

    जब इस व्यापार में धार्मिक किंवा जातिभाषा-मूलक संस्कार भी आकर सम्मिलित हो जाता है, तब इसका रंग और गहरा हो जाता है। ब्रजभाषा ऐसी ‘मधुर भाषा दूसरी नहीं मानी जाती, किन्तु कुछ लोगों का विचार है कि फारसी के समान ‘मधुर भाषा संसार में दूसरी नहीं है। इस भाषा का प्रसिध्द विद्वान और कवि अलीहजीं जब हिन्दुस्तान में आया, तो उसको ब्रजभाषा के माधुर्य की प्रशंसा सुनकर कुछ स्पर्द्धा हुई। वह ब्रज-प्रान्त में इस कथन की सत्यता की परीक्षा के लिये गया। मार्ग में उसको एक ग्वालिन जल ले जाते हुए मिली, जिसके पीछे पीछे एक छोटी कोमल बालिका यह कहती हुई दौड़ रही थी, ‘मायरे माय गैल साँकरी पगन मैं काँकरी गड़तु हैं।’ इस बालिका का कथन सुनकर वे चक्कर में आ गये और सोचा कि जहाँ की गँवार बालिकाओं का ऐसा सरस भाषण है, वहाँ के कवियों की वाणी का क्या कहना! परन्तु उनके सहधार्मियों ने इसी परम लावण्यमती, कोमला अथच मनोहरा ब्रजभाषा का क्या समादर किया, उन्होंने चुन-चुन कर इसके शब्दों को अपनी कविता में से निकाल बाहर किया और उसके स्थान पर फारसी, अरबी के अकोमल और श्रुति-कटु शब्दों को भर दिया।

    सबसे पहले मुसलमान कवि जिन्होंने हिन्दी-भाषा में कविता करने के लिए लेखनी उठाई, अमीर खुसरो थे। यह कवि तेरहवें शतक में हुआ है। इसकी कविता का रंग देखिए

    खालिकबारी सिरजनहार। वाहिद एक बेदाँ करतार।

    रसूल पयम्बर जान बसीठ। यार दोस्त बोली जा ईठ॥

    जेहाल मिस्कीं मफुन तग़ाफुल। दुराय नैना बनाय बतियाँ।

    किताबे हिंज़राँ न दारम् ऐ जाँ। न लेहु काहे लगाय छतियाँ॥

    दक्षिण का सादी नामक एक आदिम उर्दू कवि बतलाया जाता है। उसकी कविता का नमूना यह है

    हम तुम्हन को दिल दिया , तुम दिल लिया और दुख दिया।

    हम यह किया तुम वह किया , ऐसी भली यह मीत है॥

    वली भी उर्दू का आदिम कवि है, उसकी कविता का भी उदाहरण अवलोकन कीजिए

    दिल वली का ले लिया दिल्ली ने छीन।

    जा कहो कोई मुहम्मद शाह सों॥

    इन दोनों के उपरान्त ही शाह मुबारक का समय है, उसकी कविता का ढंग यह है

    मत कष्ह्न सेतीं हाथ में ले दिल हमारे को।

    जलता है क्यों पकड़ता है जालिम अंगारे को॥

    ऊपर की कविताओं से प्रकट है कि पहले मुसलमान कवियों ने जो रचना की है, उसमें या तो हिन्दी-पदों और शब्दों को बिल्कुल फारसी पदों या शब्दों से अलग रखा है, या फारसी अरबी शब्दों को मिलाया है तो बहुत ही कम; अधिकांश हिन्दी शब्दों से ही काम लिया है, किन्तु आगे चलकर समय ने पलटा खाया और निम्नलिखित प्रकार की कविता होने लगी

    नूर पैदा है जमाले यार के साया तले।

    गुल है शरमिन्दा रुखे दिलदार के साया तले॥

    नासिंख़

    आफ ता बे हश्र है या रब कि निकाला गर्म गर्म।

    कोई ऑंसू दिलजलों के दीदये ग़मनाक से॥

    न लौह गोर पै मस्ती के हो न हो तावीज़।

    जो हो तो ख़िश्ते खुमे मैं कोई निशाँ के लिये॥

    ज़ौक

    खमोशी में निहाँ खूँगश्ता लाखों आरजूयें हैं।

    चिराग़े मुर्दा हूँ मैं बेज़बाँ गोरे ग़रीबाँ का॥

    नक्श्श नाज़े बुतेतन्नाजश् ब आग़ोश र की ब।

    पायताऊस पये जामये मानी माँगे॥

    यह तूफा ं गाह जोशेइजतिराबे शाम तनहाई।

    शोआये आफ ता बे सुब्हमहशरतारे बिस्तर है॥

    लबे ईसा की जुम्बिश करती है गहवारा जुँबानी।

    क या मत कुश्तये लाले बुताँ का ख्वाबे संगीं है॥

    ग़ालिब

    अब प्रश्न यह है कि वह कौन-सी बात है कि जिसके कारण ब्रजभाषा का, कि किसके माधुर्य पर अलीहजीं ऐसा उदार हृदय पारसी कवि लोट-पोट हो गया था, पीछे मुसलमान कवियों द्वारा तिरस्कार हुआ। क्यों, उन्होंने उसके कोमल कान्त पदों के स्थान पर फारसी और अरबी के श्रुति-कटु शब्दों का व्यवहार करना उचित समझा? क्या उन्होंने ब्रजभाषा के सुविधापूर्वक उच्चारित होने वाले ग, ख, ज, फ, इत्यादि अक्षरों से निर्मित शब्दों के स्थान पर गैन, ख़े, .जे, फे इत्यादि श्रुतिकंठ-विदीर्णकारी अक्षरों से मिलित शब्दों का आदर किया? इसका उत्तर इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है कि अरबी और फारसी भाषा में उसके अक्षरों और शब्दों में, उनके धार्मिक और जातिभाषा-मूलक संस्कार ही ने उन्हें उनसे आदृत बनाया, इनमें जो उनकी हृदय-ममता है उसी ने उन्हें इनको अंगीकृत करने के लिए बाध्य किया।

    जो कुछ अब तक कहा गया, उससे यह बात भली प्रकार सिध्द हो गई कि किसी पदावली की कोमलता, कान्तता, ‘मधुरता का बहुत कुछ सम्बन्ध, संस्कार और हृदय से है। इस अवसर पर यह कहा जा सकता है कि कोमलता, कान्तता इत्यादि का सम्बन्ध हृदय या संस्कार से नहीं है, वास्तव में उसका सम्बन्ध पदावली से ही है। हाँ, उसके आदृत या अनादृत होने का सम्बन्ध निस्सन्देह संस्कार और हृदय से है। क्योंकि यदि दो बालक ऐसे उपस्थित किये जावें कि जिनमें एक सुन्दर हो और दूसरा असुन्दर, तो निज अपत्य होने के कारण असुन्दर बालक में पिता की हृदय-ममता हो सकती है, उसका स्वाभाविक संस्कार उसे निज पुत्र को आदर और सम्मान-दृष्टि से देखने के लिए बाध्य कर सकता है, किन्तु इससे वह सुन्दर नहीं हो जावेगा; सुन्दर बालक को ही सुन्दर कहा जावेगा। इसी प्रकार किसी अकान्त और अकोमल पद को किसी का संस्कार और हृदय-भाव कान्त और कोमल नहीं बना सकता; क्योंकि न्याय-दृष्टि कोमल और कान्त को ही कोमल और कान्त कह सकती है। जब सबको अपना ही अपत्य सुन्दर ज्ञात होता है तो इससे यह सिध्द है कि उसको दूसरे के अपत्य के सौन्दर्य्य की अनुभूति नहीं होती; और जब अनुभूति नहीं होती तो उसकी दृष्टि में उसका सौन्दर्य्य ही क्या? इसी प्रकार जब किसी पदावली की कान्तता, ‘मधुरता और कोमलता की अनुभूति ही नहीं होती, तो उसकी कान्तता, ‘मधुरता, कोमलता ही क्या? वास्तव में बात यह है कि ऐसे स्थानों पर संस्कार और हृदय ही प्रधान होता है।

    पीयूषवर्षी कवि बिहारीलाल के निम्नलिखित दोहे कितने सुन्दर और मनोहरहैं

    बड़े बड़े छबि छाकु छकि छिगुनी छोर छुटैन।

    रहे सुरँग रँग रँग वही , नहँदी महँदी नैन॥

    सतर भौंह रूखे बचन , करति कठिन मन नीठि।

    कहा कहौं ह्नै जात हरि हेरि हँसोंहीं डीठि॥

    बतरस लालच लाल की , मुरली धरी लुकाय।

    सौंह करै भौंहनि हँसै , देन कहै , नटि जाय॥

    यक भींगे चहले परे , बूड़े बहे हजार।

    किते न औगुन जग करे , नै बै चढ़ती बार॥

    परन्तु आधुनिक पाठशालाओं के विद्यार्थियों और वर्तमान खड़ी बोली के अनुरागियों के सामने इनको रखिये, देखिये वह इनका कितना आदर करते हैं। मैंने देखा है कि आजकल के खड़ी बोली के रसिक ब्रजभाषा की कविता से उतना ही घबड़ाते हैं, जितना कि वह किसी अपरिचित किंवा अल्प परिचित भाषा की कविता से घबड़ा सकते हैं। कारण इसका क्या है? कारण इसका यही है कि लिखने-पढ़ने और बोलचाल की भाषा से वह दूर पड़ गई है। इन दोहों का माधुर्य, लालित्य, और कोमलता अथच कान्तता निर्विवाद है; किन्तु जब वह इनको समझते ही नहीं, यदि समझने की चेष्टा करते हैं तो मन को विशेष श्रम करना पड़ता है, फिर उनकी दृष्टि में इनकी कोमलता और कान्तता ही क्या? किन्तु यदि इन दोहों के स्थान पर कोई संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली की कविता रख दीजिये, तो देखिये वह उसको पढ़ कर कितना मुग्ध होते हैं और कितना आनन्दानुभव करते हैं; अतएव उनको उसी में कोमलता और कान्तता दृष्टिगत होती है। और यही कारण है कि आजकल संस्कार और हृदय-ममता दोनों खड़ी बोली की ओर आकर्षित हो गई हैं; कि जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण खड़ी बोली की कविता का समधिक प्रचार है।

    जिन प्राचीन विद्वान् सज्जनों का संस्कार ब्रजभाषा के माधुर्य और कान्तता के विषय में दृढ़ हो गया है, और इस कारण उसकी ममता उनके हृदय में बध्दमूल है, वे यदि कहें कि खड़ी बोली की कविता कर्कश होती है, तो इसमें आश्चर्य ही क्या। ऐसे ही जिन्होंने ब्रजभाषा का अभूतपूर्व रस आस्वादन नहीं किया है, जो ब्रजभाषा की रचना में दुर्बोधता उपलब्ध करते हैं, वे यदि खड़ी बोली का समादर और प्यार करें और उसे ही कान्त और कोमल समझें तो इसमें भी कोई आश्चर्य्य नहीं, सदा ऐसा ही होता आया है और आगे भी ऐसा ही होगा। अब मुझे केवल इतना ही कहना है कि समय का प्रवाह खड़ी बोली के अनुकूल है; इस समय खड़ी बोली में कविता करने से अधिक उपकार की आशा है। अतएव मैंने भी ‘प्रियप्रवास’ को खड़ी बोली में ही लिखा है। सम्भव है कि उसमें अपेक्षित कोमलता और कान्तता न हो, परन्तु इससे यह सिध्दान्त नहीं हो सकता कि खड़ी बोली में सुन्दर कविता हो ही नहीं सकती। वास्तव बात यह है कि यदि उसमें कान्तता और ‘मधुरता नहीं आई है तो यह मेरी विद्या, बुध्दि और प्रतिभा का दोष है, खड़ी बोली का नहीं।

    ग्रन्थ का विषय

    इस ग्रन्थ का विषय श्रीकृकृष्णचन्द्र की मथुरा-यात्रा है; और इसी से इसका नाम ‘प्रियप्रवास’ रखा गया है। कथा-सूत्र से मथुरा-यात्रा के अतिरिक्त उनकी और ब्रज-लीलायें भी यथास्थान इसमें लिखी गई हैं। जिस विषय के लिखने के लिए महर्षि व्यासदेव, कवि-शिरोमणि सूरदास और भाषा के अपर मान्य कवियों तथा विद्वानों ने लेखनी की परिचालना की है, उसके लिए मेरे जैसे मंदधी का लेखनी उठाना नितान्त मूढ़ता है। परन्तु जैसे रघुवंश लिखने के लिए लेखनी उठा कर कवि-कुल-गुरु कालिदास ने कहा था, मणौवज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गति:। उसी प्रकार इस अवसर पर मैं भी स्वच्छ हृदय से यही कहूँगा अति अपार जे सरित वर, जो नृप सेतु कराहिं। चढ़ि पिपीलिका परम लघु, बिनु श्रम पारहिं जाहिं॥ रहा यह कि वास्तव में मैं पार जा सका हूँ या बीच ही में रह गया हूँ, किंवा उस पावन सेतु पर चलने का साहस करके निन्दित बना हूँ, इसकी मीमांसा विबुध जन करें। मेरा विचार तो यह है कि मैंने इस मार्ग में भी अनुचित दुस्साहस किया है, अतएव तिरस्कृत और कलंकित होने की ही आशा है। हाँ, यदि मर्म्मज्ञ विद्वज्जन इसको उदार दृष्टि से पढ़कर उचित संशोधन करेंगे, तो आशा है कि किसी समय में इस ग्रन्थ का विषय भी रसिकों के लिए आनन्दकारक होगा।

    हम लोगों का एक संस्कार है, वह यह कि जिनको हम अवतार मानते हैं, उनका चरित्र जब कहीं दृष्टिगोचर होता है तो हम उसकी प्रति पंक्ति में या न्यून से न्यून उसके प्रति पृष्ठ में ऐसे शब्द या वाक्य अवलोकन करना चाहते हैं, जिसमें उसके ब्रह्मत्व का निरूपण हो। जो सज्जन इस विचार के हों, वे मेरे प्रेमाम्बुप्रश्रवण, प्रेमाम्बुप्रवाह और प्रेमाम्बुवारिधि नामक ग्रन्थों को देखें; उनके लिए यह ग्रन्थ नहीं रचा गया है। मैंने श्रीकृष्णचन्द्र को इस ग्रन्थ में एक महापुरुष की भाँति अंकित किया है, ब्रह्म करके नहीं। अवतारवाद की जड़ मैं श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक मानता हूँ यद् यद् विभूतिमत्सत्तवं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छत्वं मम तेजोंशसंभवम्; अतएव जो महापुरुष है, उसका अवतार होना निश्चित है। मैंने भगवान् श्रीकृष्ण का जो चरित अंकित किया है, उस चरित का अनुधावन करके आप स्वयं विचार करें कि वे क्या थे, मैंने यदि लिखकर आपको बतलाया कि वे ब्रह्म थे, और तब आपने उनको पहचाना तो क्या बात रही! आधुनिक विचारों के लोगों को यह प्रिय नहीं है कि आप पंक्ति-पंक्ति में तो भगवान् श्रीकृष्ण को ब्रह्म लिखते चलें और चरित्र लिखने के समय कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तु समर्थ: प्रभु: के रंग में रँगकर ऐसे कार्य्ययों का कर्ता उन्हें बनावें कि जिनके करने में एक साधरण विचार के मनुष्य को भी घृणा होवे। संभव है कि मेरा यह विचार समीचीन न समझा जावे, परन्तु मैंने उसी विचार को सम्मुख रखकर इस ग्रन्थ को लिखा है, और कृष्णचरित को इस प्रकार अंकित किया है जिससे कि आधुनिक लोग भी सहमत हो सकें। आशा है कि आप लोग दयार्द्र हृदय से मेरे उद्देश्य को समझने की चेष्टा करेंगे और मुझको वृथा वाग्वाण का लक्ष्य न बनावेंगे।

    वर्णन-शैली

    रुचि-वैचित्रय-स्वाभाविक है।कोई संक्षेप वर्णन को प्यार करता है, कोई विस्तृत वर्णन को। किसी को कालिदास की प्रणाली प्रिय है, किसी को भवभूति की। संक्षेप वर्णन से जो हृदय पर क्षणिक गहरा प्रभाव पड़ता है कोई उसको आदर देता है, कोई उस विस्तृत वर्णन से मुग्ध होता है, जिसमें कि पूरी तौर पर रस का परिपाक हुआ हो। निदान किसी ग्रन्थ की वर्णन-शैली का प्रभाव किसी मनुष्य पर उसकी रुचि के अनुसार पड़ता है। जो विस्तृत वर्णन को नहीं प्यार करता वह अवश्य किसी ग्रन्थ के विस्तृत वर्णन को पढ़कर ऊब जावेगा; इसी प्रकार जिसको किसी रस का संक्षेप वर्णन प्रिय नहीं, वह अवश्य एक ग्रन्थ के संक्षेप वर्णन को पढ़कर अतृप्त रह जावेगा। और यही कारण है कि प्रतिष्ठित ग्रन्थकारों की समालोचनायें भी नाना रूपों में होती हैं। मैंने अपने ग्रन्थ में वर्णन के विषय में मध्य पथ ग्रहण किया है, किन्तु इस दशा में भी संभव है कि किसी सज्जन को कोई प्रसंग संक्षेप में वर्णन किया जान पड़े और किसी को कोई कथा भाग अनुचित विस्तार से लिखा गया ज्ञात हो। मैं अत्यन्त अनुगृहीत हूँगा, यदि ग्रन्थ के सहृदय पाठकगण इस विषय में मुझे समुचित सम्मति देंगे, जिसमें कि दूसरी आवृत्ति में मैं अपने वर्णनों पर उचित मीमांसा कर सकूँ।

    कवितागत कतिपय शब्द

    अब मैं इस ग्रन्थ की कविता में व्यवहृत किये गये कुछ शब्दों के विषय में विचार करना चाहता हूँ। सब भाषाओं में गद्य की भाषा से पद्य की भाषा में कुछ अन्तर होता है, कारण यह है कि छन्द के नियम में बँधा जाने से ऐसी अवस्था प्राय: उपस्थित हो जाती है, कि जब उसमें शब्दों को तोड़-मरोड़ कर रखना पड़ता है, या उसमें कुछ ऐसे शब्द सुविधा के लिए रख देने पड़ते हैं, जो गद्य में व्यवहृत नहीं होते। यह हो सकता है कि जो शब्द तोड़ या मरोड़कर रखना पड़े वह, या गद्य में अव्यवहृत शब्द कविता में से निकाल दिया जावे, परन्तु ऐसा करने में बड़ी भारी कठिनता का सामना करना पड़ता है; और कभी-कभी तो यह दशा हो जाती है कि ऐसे शब्दों के स्थान पर दश शब्द रखने से भी काम नहीं चलता। इसलिए कवि उन शब्दों को कविता में रखने के लिए बाध्य होता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि उन शब्दों के पर्य्यायवाची दूसरे शब्द उसी भाषा में मौजूद होते हैं, और यदि वे शब्द उन शब्दों के स्थान पर रख दिये जावें, तो किसी शब्द को विकलांग बनाकर या गद्य में अव्यवहृत शब्द रखने के दोष से कवि मुक्त हो सकता है; परन्तु लाख चेष्टा करने पर भी कवि को समय पर वे शब्द स्मरण नहीं आते, और वह विकलांग अथवा गद्य में अव्यवहृत शब्द रख कर ही काम चलाता है। और यही कारण है कि गद्य की भाषा से पद्य की भाषा में कुछ अन्तर होता है। कवि-कर्म्म बहुत ही दुरूह है। जब कवि किसी कविता का एक चरण निर्माण करने में तन्मय होता है, तो उस समय उसको बहुत ही दुर्गम और संकीर्ण मार्ग से होकर चलना पड़ता है। प्रथम तो छन्द की गिनी हुई मात्रा अथवा गिने हुए वर्ण उसका हाथ-पाँव बाँध देते हैं, उसकी क्या मजाल कि वह उसमें से एक मात्रा घटा या बढ़ा देवे, अथवा एक गुरु को लघु के स्थान पर या एक गुरु के स्थान पर एक लघु को रख देवे। यदि वह ऐसा करे तो वह छन्द-रचना का अधिकारी नहीं। जो इस विषय में सतर्क होकर वह आगे बढ़ा, तो हृदय के भावों और विचारों को उतनी ही मात्रा वा उतने ही वर्णों में प्रकट करने का झगड़ा सामने आया, इस समय जो उलझन पड़ती है, उसको कवि-हृदय ही जानता है। यदि विचार नियत मात्रा अथवा वर्णों में स्पष्टतया न प्रकट हुआ, तो उसका यह दोष लगा कि उसका वाच्यार्थ साफ नहीं, यदि कोमल वर्णों में वह स्फुरित न हुआ, तो कविता श्रुतिकटु हो गई। यदि उसमें कोई घृणाव्यंजक शब्द आ गया तो अश्लीलता की उपाधि शिर पर चढ़ी, यदि शब्द तोड़े-मरोड़े गये तो च्युतदोष ने गला दबाया, यदि उपयुक्त शब्द न मिले तो सौ-सौ पलटा खाने पर भी एक चरण का निर्माण दुस्तर हो गया, यदि शब्द यथा-स्थान न पड़े तो दूरान्वय दोष ने ऑंखें दिखायीं। कहाँ तक कहें, ऐसी कितनी बातें हैं, जो कविता रचने के समय कवि को उद्विग्न और चिन्तित करती हैं, और यही कारण है कि प्रसिध्द ‘बहारदानिश’ ग्रन्थ के रचयिता ने बड़ी सहृदयता से एक स्थान पर यह शेर लिखा है

    बराय पाकिये लफ्श्जे शबे बरोजश् आरन्द

    कि मुर्ग माही बाशन्द खुफ्श्ता ऊबेदार॥

    इसका अर्थ यह है कि कवि एक शब्द को परिष्कृत करने के लिए उस रात्रि को जागकर दिन में परिणत करता है, जिसको चिड़ियाँ और मछलियाँ तक निद्रा देवी के शान्तिमय अङ्क में शिर रखकर व्यतीत करती हैं।यदि कवि-कर्म्म इतना कठोर न होता, तो कवि-कुल-गुरु कालिदास जैसे असाधरण विद्वान और विद्या-बुध्दि-निधन, ‘त्रायम्बकम् संयमिनं ददर्श’ इस लोक-खण्ड में ‘त्रयम्बकम्’ के स्थान पर ‘त्रायम्बकम्’ न लिख जाते, जो कि ‘त्रयम्बकम्’ का अशुध्द रूप है। यदि इस त्रयम्बकम् के स्थान पर वह त्रिलोचनम् लिखते तो कविता सर्वथा निर्दोष होती; किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया, जिससे यह सिध्द होता है, कि कविता करने के समय बहुत चेष्टा करने पर भी उनको यह शुध्द और कोमल शब्द स्मरण नहीं आया, और इसी से उन्होंने एक ऐसे शब्द का प्रयोग किया जो च्युत-दोष से दूषित है। किसी-किसी ने लिखा है कि उस काल में एक ऐसा व्याकरण प्रचलित था कि जिसके अनुसार ‘त्रयम्बकम्’ शब्द भी अशुध्द नहीं है, किन्तु यह कथन ऐसे लोगों का उस समय तक मान्य नहीं है, जब तक कि वह व्याकरण का नाम बतला कर उस सूत्र को भी न बतला दें कि जिसके द्वारा यह प्रयोग भी शुध्द सिध्द हो। इस विचार के लोग यह समझते हैं कि यदि कवि-कुल-गुरु कालिदास की रचना में कोई अशुध्दि मान ली गई, तो फिर उनकी विद्वत्ता सर्वमान्य कैसे होगी। उनकी वह प्रतिष्ठा जो संसार की दृष्टि में एक चकितकर वस्तु है, कैसे रहेगी। अतएव येन केन प्रकारेण वे लोग एक साधरण दोष को छिपाने के लिए एक बहुत बड़ा अपराध करते हैं, जिसको विबुध समाज नितान्त गर्हित समझताहै।

    इस विचार के लोग भाव-राज्य के उस मनोमुग्धकर-उपवन पर दृष्टि नहीं डालते, कि जिसके अंक में सदाशय और सद्विचार रूपी हृदय-विमोहक प्रफुल्ल-प्रसूनों के निकटवर्ती दो-चार दोष-कण्टकों पर कोई दृष्टिपात ही नहीं करता। कवि किसी भाषा-हीन शब्द को यथाशक्ति तो रखता नहीं; जब रखता है तो विवश होकर रखता है। जिसकी रचना अधिकांश सुन्दर है, जिसके भाव लोक-विमुग्धकर और उपकारक हैं, उसकी रचना में यदि कहीं कोई दोष आ जावे तो उस पर कौन सहृदय दृष्टिपात करता है, और यदि दृष्टिपात करता है तो वह सहृदय नहीं

    जड़ चेतन गुन दोष मय , विश्व कीन्ह करतार।

    संत हंस गुन गहहिं पय , परिहरि बारि बिकार॥

    संसार में निर्दोष कौन वस्तु है? सभी में कुछ न कुछ दोष हैं, जो शरीर बड़ा प्यारा है; उसी को देखिए, उसमें कितना मल है। चन्द्रमा में कलंक है, सूर्य में धब्बे हैं, फूल में कीड़े हैं; तो क्या ये संसार की आदरणीय वस्तुओं में नहीं हैं? वरन् जितना इनका आदर है, अन्य का नहीं है। कवि-कर्म्म-कुशल कालिदास की रचना इतनी अपूर्व और प्यारी है, इतनी सरस और सुन्दर है, इतनी उपदेशमय और उपकारक है, कि उसमें यदि एक दोष नहीं, सैकड़ों दोष होवें, तो भी वे स्निग्ध-पत्रावली-परिशोभित, मनोरम-पुष्प-फल-भार-विनम्र पादप के, दश पाँच नीरस, मलीन, विकृत पत्तों समान दृष्टि डालने योग्य न होंगे। फिर उन दोषों के विषय में बात बनाने से क्या लाभ? मैं यह कह रहा था कि कवि-कर्म्म नितान्त दुरूह है। अलौकिक प्रतिभाशाली कालिदास जैसे जगन्मान्य कवि भी इस दुरूहता-वारिधि-सन्तरण में कभी-कभी क्षम नहीं होते। जिनका पदानुसरण करके लोग साहित्य-पथ में पाँव रखना सीखते हैं, उन हमारे संस्कृत और हिन्दी के धुरन्धर और मान्य साहित्याचार्यों की मति भी इस संकीर्ण स्थल पर कभी-कभी कुण्ठित होती है, और जब ऐसों की यह गति है तो साधरण कवियों की कौन कहे? मैं कवि कहलाने योग्य नहीं, टूटी-फूटी कविता करके कोई कवि नहीं हो सकता, फिर यदि मुझसे भ्रम प्रमाद हो, यदि मेरी कविता में अनेक दोष होवें तो क्या आश्चर्य! अतएव आगे जो मैं लिखूँगा, उसके लिखने का यह प्रयोजन नहीं है, कि मैं रूपान्तर से अपने दोषों को छिपाना चाहता हूँ, प्रत्युत् उसके लिखने का उद्देश्य कतिपय शब्दों के प्रयोग पर प्रकाश डालना मात्रा है।

    कतिपय क्रिया

    हिन्दी गद्य में देखने के अर्थ में अधिकांश देखना धातु के रूपों का ही व्यवहार होता है, कोई-कोई कभी अवलोकना, विलोकना, दरसना, जोहना, लखना धातु के रूपों का भी प्रयोग करते हैं; किन्तु इसी अर्थ के द्योतक निरखना और निहारना धातु के रूपों का व्यवहार बिलकुल नहीं होता। अतएव इन कतिपय क्रियाओं के रूपों का व्यवहार कोई-कोई खड़ी बोली के पद्य में करना उत्तम नहीं समझते, किन्तु मेरा विचार है कि इन कतिपय क्रियाओं से भी यदि खड़ी बोली के पद्यों में संकीर्ण स्थलों पर काम लिया जावे तो उसके विस्तार और रचना में सुविधा होगी। मैं ऊपर दिखला चुका हूँ कि गद्य की भाषा से पद्य की भाषा में कुछ अन्तर होता है, अतएव इनको ब्रजभाषा की क्रिया समझकर तज देना मुझे उचित नहीं जान पड़ता और इसी विचार से मैंने अपनी कविता में देखने के अर्थ में इन क्रियाओं के रूपों का व्यवहार भी उचित स्थान पर किया है। ऐसी ही कुछ और क्रियाएँ हैं, जो ब्रजभाषा की कविता में तो निस्सन्देह व्यवहृत होती हैं, परन्तु खड़ी बोली के गद्य में इनका व्यवहार सर्वथा नहीं होता; या यदि होता है तो बहुत न्यून। किन्तु मैंने अपनी कविता में इनको भी निस्संकोच स्थान दिया है। मेरा विचार है कि इन क्रियाओं के व्यवहार से खड़ी बोली का पद्य-भण्डार सुसम्पन्न और ललित होने के स्थान पर क्षति-ग्रस्त और असुन्दर न होगा। ये क्रियाएँ लसना, विलसना, रचना, विराजना, सोहना, बगरना, बलजाना, तजना इत्यादि हैं। आधुनिक खड़ी बोली के कविता-लेखकों में से यद्यपि कई एक अपर सज्जनों को भी इनको काम में लेता देखा जाता है, किन्तु इन लोगों में अधिकांश वे सज्जन हैं, जो ब्रजभाषा से कुछ परिचित हैं। जिन्होंने ब्रजभाषा का कोमल-कान्त-वदन बिल्कुल नहीं देखा, उनकी कविता में इन क्रियाओं का प्रयोग कथंचित् होता है। मैं अपने कथन की पुष्टि गद्य के अवतरणों और आधुनिक वर्तमान कवियों की कविताओं का अपेक्षित अंश उठाकर, कर सकता हूँ किन्तु ऐसा करने में यह लेख बहुत विस्तृत हो जावेगा। ब्रजभाषा की क्रियाओं का प्रयोग खड़ी बोली में उसके नियमानुसार होना चाहिए; ब्रजभाषा के नियमानुसार नहीं, अन्यथा वह अवैध और भ्रामक होगा।

    कुछ वर्णों का हलन्त प्रयोग

    हिन्दी भाषा के कतिपय सुप्रसिध्द गद्य-पद्य लेखकों को देखा जाता है कि ये इसका, उसका इत्यादि को इस्का, उस्का इत्यादि और करना, धरना इत्यादि को कर्ना, धर्ना इत्यादि लिखने के अनुरागी हैं। पद्य में ही संकीर्ण स्थलों पर वे ऐसा नहीं करते, गद्य में भी इसी प्रकार इन शब्दों का व्यवहार वे उचित समझते हैं। खड़ी बोली की कविता के लब्धाप्रतिष्ठ प्रधान लेखक श्रीयुत पं. श्रीधर पाठक लिखित नीचे की कतिपय गद्य-पद्य की पंक्तियों को देखिये

    यह एक प्रेम-कहानी आज आपको भेंट की जाती है निस्सन्देह इस्में ऐसा तो कुछ भी नहीं जिस्से यह आपको एक ही बार में अपना सके

    नम्र भाव से कीनी उस्ने विनय समेत प्रणाम

    चला साथ योगी के हर्षित जहँ उस्का विश्राम

    नहीं बड़ा भण्डार मढ़ी में कीजै जिस्की रखवाली

    दोनों जीव पधारे भीतर जिन्के चरित अमोल

    एकान्तवासी योगी

    हमारे उत्साही नवयुवक पण्डित लक्ष्मीधर जी वाजपेयी ने भी अपने ‘हिन्दी मेघदूत’ में कई स्थानों पर इस प्रणाली को ग्रहण किया है; नीचे के पद्यों को अवलोकन कीजिए

    उस्का नीला जल पट तट श्रोणि से तू हरेगा

    उस्के शांतीहर शिखर पै तू लखेगा सखा यों

    जिस्की सेवा उचित रति के अंत में मत्करों से

    वाजपेयी जी की कविता वर्णवृत्त में लिखी गई है, जिसमें लघु गुरु नियत संख्या से आते हैं, इसलिए यदि उन्होंने दो दीर्घ रखने के लिए कविता में उसका, उसके, जिसकी के स्थान पर उस्का, उस्के, जिस्की लिखा तो उनका यह कार्य्य विवशतावश है। ऐसे स्थलों पर यह प्रयोग अधिक निन्दनीय नहीं है, किन्तु गद्य में अथवा वहाँ, जहाँ कि शुध्द रूप में ये शब्द लिखे जा सकते हैं, इन शब्दों का संयुक्त रूप में प्रयोग मैं उचित नहीं समझता; इसके निम्नलिखित कारण हैं

    1. यह कि गद्य की भाषा में जो शब्द जिस रूप में व्यवहृत होते हैं, मुख्य अवस्थाओं को छोड़कर पद्य की भाषा में भी उन शब्दों का उसी रूप में व्यवहृत होना समीचीन, सुसंगत और बोधगम्य होगा।

    2. यह कि उसको, जिसमें, जिसको इत्यादि शब्दों को प्राचीन और आधुनिक अधिकांश गद्य-पद्य लेखक इसी रूप में लिखते आते हैं, फिर कोई कारण नहीं है कि इस प्रचलित प्रणाली का बिना किसी मुख्य हेतु के परित्याग किया जावे।

    3. यह कि हिन्दी भाषा की स्वाभाविक प्रवृत्ति यथासंभव संयुक्ताक्षरत्व से बचकर रहने की है, अतएव उसके सर्वनामों इत्यादि को जो कि समय-प्रवाह-सूत्र से संयुक्त रूप में नहीं हैं, संयुक्त रूप में परिणत करना दुर्बोधता और क्लिष्टता सम्पादन करना होगा।

    अब रही यह बात कि यदि वास्तव में हिन्दी में कुछ अकारान्त वर्ण, शब्द-खण्ड और धातु-चिह्न के प्रथम के अक्षर हलन्तवत् बोले जाते हैं, तो कोई कारण नहीं है, कि उच्चारण के अनुसार वे लिखे न जावें। इस विषय में मेरा यह निवेदन है कि इन वर्णों, शब्द-खण्डों और धातु-चिह्नों के प्रथम के अक्षरों का ऐसा उच्चारण हिन्दी के जन्म-काल से ही है, या कुछ काल से हो गया है? और यदि जन्म-काल से ही है,तो इसके व्याकरण-रचयिताओं और लेखकों ने इस विषय में अमनोनिवेश क्यों किया? यदि उन्होंने मनोनिवेश नहीं भी किया तो एक वास्तव और युक्तिसंगत बात के ग्रहण करने में इस समय संकोच क्या? और यदि उसके ग्रहण में संकोच उचित नहीं, तो केवल पद्य में ही वे क्यों ग्रहण किये जावें, गद्य में भी क्यों न गृहीत हों? इन प्रश्नों के उत्तर में अधिक न लिखकर मैं केवल इतना ही कहूँगा कि इन वर्णों, शब्द-खण्डों और धातु-चिह्नों के प्रथम के अक्षरों को भाषाव्याकरण् कत्तर्ओं ने स्वर-संयुक्त माना है, हलन्तवत् नहीं। क्योंकि हलन्तवत् क्या? कोई व्यंजन या तो स्वर-संयुक्त होगा या हलन्त, और जब उन्होंने उनको स्वर-संयुक्त मानकर ही उनके सब रूप बनाये हैं, तो अब उनके विषय में एक नवीन पध्दति स्थापित करने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती; क्योंकि व्याकरण उच्चारण के अनुकूल ही बनता है, उससे प्रतिकूल नहीं। समय पाकर उच्चारण में भिन्नता अवश्य हो जाती है और उस समय व्याकरण भी बदलता है, परन्तु इन वर्णों, शब्द-खण्डों और धातु-चिह्नों के प्रथम के अक्षर के लिए अभी वे दिन नहीं आये हैं। सोचिए, यदि इसको, जिसको इत्यादि को इस्को, जिस्को लिखें और करना, धारना, चलना इत्यादि को कर्ना, धर्ना, चल्ना इत्यादि लिखने लगें, तो हिन्दी भाषा में कितना बड़ा परिवर्तन उपस्थित होगा।

    समादरणीय पाठक जी का एक लेख खड़ी बोली की कविता पर प्रथम हिन्दी साहित्य सम्मेलन के कार्य्य विवरण में मुद्रित हुआ है, उसके पृष्ठ 32 में एक स्थान पर उन्होंने इस विषय पर विचार करते हुए ऐसे शब्दों के विषय में यह लिखाहै:

    भाषा के शील संरक्षण की दृष्टि से पद्य लिखने में आवश्यकतानुसार बोलने की रीति अवलम्बन करने से कोई आपत्ति तो नहीं उपस्थित होती।

    इस सब जगड्बाल के प्रदर्शन से मेरा अभिप्राय यह नहीं है, कि हमारी भाषा के पद्य में इस प्रकार शब्द व्यवहार करना चाहिए, किन्तु बुधजनों के विचार के लिए यह मेरी केवल एक प्रस्तावना मात्र है।

    ये दोनों वाक्य यह स्पष्ट बतला देते हैं कि प्रशंसित पाठक जी भी गद्य में इस प्रकार शब्दों को लिखना उचित नहीं समझते; पद्य में भी वह आवश्यकतानुसार ऐसा प्रयोग आपत्ति-रहित मानते हैं। पाठक जी के निम्नलिखित वाक्यांशों से भी यही बात सिध्द होती है।

    आजकल मैं ऐसे स्थान पर हूँ कि उदाहरण नहीं दे सकता।, दूसरा वह जिसमें भाषा का यह गुण अपेक्षित-सा देखने में आता है, मिश्रित वा खिचड़ी भाषा के पद्य में यह योग्यता नहीं आ सकती, ऐसी भाषा का प्रयोग उत्कृष्ट काव्य में कदापि न करना चाहिए। ( हि.सा.स.वि. प्रथम भाग, पृ‑ 29)

    उसके मन में सर्वोत्तम है उसका ही प्रिय जन्मस्थान

    उनके उर के मध्य मूर्खता का अंकुर भी बोता है

    श्रान्तपथिक , पृ. 4,13

    अब मैं यह दिखलाना चाहता हूँ कि कुछ अकारान्त वर्ण जैसे बस, अब जतन इत्यादि के स, ब, न आदि, कुछ ऐसे शब्द-खण्ड के अन्त्याक्षर जिन पर बोलने में आघात-सा पड़ता है, जैसे गलबाहीं, मन-भावना इत्यादि के गल और मन आदि, कुछ ऐसे वर्ण जो धातु-चिह्न के पहले रहते हैं जैसे करना, धरना, चलना इत्यादि के र, ल आदि, यदि आवश्यकतानुसार उच्चारण का ध्यान करके पद्य में हलन्त कर लिये जावें तो उससे कुछ सुविधा होगी या नहीं? और ऐसे प्रयोग का हिन्दी भाषा के पद्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा? मैं प्रशंसित पाठक जी के उक्त लेख में से ही एक पद्य यहाँ उठाता हूँ, आप इसे अवलोकन कीजिए

    प इत्ने प भी तो नहिं मन हुआ शान्त उनका।

    वस् अब् क्या करना था जब जतन कोई नहिं चला।

    इस पद्य में इतने को इत्ने, पर को प बस को बस् और अब को अब् किया गया है। यह संस्कृत का शिखरिणी छन्द है। यगण, भगण, नगण, सगण, मगण, लघु गुरु का शिखरिणी छंद होता है। श्रुतबोध में इसका लक्षण यह लिखा है

    यदि प्राच्यो ह्र्स्व स्तुलितकमले पद्बचरव:।

    ततो वर्णा: पद्बच प्रकृतिसुकुमाराङ्ग लघव:॥

    त्रयोन्ये चोपान्त्या: सुतनुजघने भोगसुभगे।

    रसैरीशै यस्यां भवति विरति: सा शिखरिणी॥

    इसलिए यदि ऊपर के दोनों चरण निम्नलिखित रीति से लिखे जावें तो निर्दोष होंगे; जैसे वे लिखे गये हैं, उस रीति से लिखने में छन्दो-भङ्ग होता है

    परित्ने प भी तो नहिं मन हुआ शान्त उनका।

    बसब क्या कर्ना था जब जतन कोई नहिं चला॥

    प्रथम प्रकार से लिखने में पहले चरण में दो लघु के उपरान्त चार गुरु पड़ते हैं, किन्तु उक्त नियमानुसार एक लघु के पश्चात् पाँच गुरु होने चाहिए। इस लिए यह चरण खंड ‘परित्ने पर भी’ कर दिया जावे तो दोष निवृत्त हो जाता है। इसी प्रकार ‘बस् अब क्या करना था’। यों लिखने से दूसरे चरण के प्रथम खंड में पहले तीन गुरु फिर दो लघु और बाद को दो गुरु पड़ते हैं, अतएव यह चरण खंड भी सदोष है, यह जब यों लिखा जावे कि ‘बसब क्या कर्ना था’ तो ठीक होगा। किन्तु यह बतलाइए कि इस प्रकार शब्द-विन्यास कहाँ तक समुचित होगा। संस्कृत के यत्, तत् की भाँति पर को प, बस को बस् और अब को अब् लिखकर एक गुरु बना लेना कहाँ तक युक्तिसंगत और हिन्दी भाषा की प्रणाली के अनुकूल है, इसको सहृदय पाठक स्वयं विचारें। इन्हीं दोनों चरणों में मन, उनका, जब और जतन भी हैं, किन्तु ये मन्, उन्का, जब् और जतन् नहीं बनाये गये। मुख्य कारण यह है कि ऐसा करने से छन्द और सदोष हो जाता तथा उसकी भङ्गता का पारा और ऊँचा चढ़ जाता। इसलिए उनके रूप परिवर्तन की आवश्यकता नहीं हुई। यदि यह प्रणाली भाषा पद्य में चलाई जावे तो उसमें कितनी जटिलता और दुरूहता आ जावेगी इसके उल्लेख की आवश्यकता नहीं; कथित दोनों बातें ही इसका पर्य्याप्त प्रमाण हैं। हिन्दी भाषा की प्रकृति हलन्त को प्राय: सस्वर बना लेने की है। यदि उसकी इस प्रकृति पर दृष्टि न रखकर उसके सस्वर वर्णों को भी हलन्त बनाकर उसे संस्कृत का रूप दिया जाने लगे तो उसका हिन्दीपन तो नष्ट हो ही जायगा, साथ ही वह संस्कृत भाषा के हलन्त वर्णों के समान संधिसाहाय्य से सौन्दर्य-सम्पादन करने के स्थान पर नितान्त असुविधामूलक पध्दति ग्रहण करेगी और अपनी स्वाभाविक सरलता खो देगी।

    संस्कृत के निम्नलिखित पद्यों को देखिए, इनमें किस प्रकार हलन्त वर्णों ने सस्वर व्यद्बजन का रूप ग्रहण किया है; और इस परिवर्तन से इन पदों में कितना माधुर्य आ गया है। हिन्दी में किसी हलन्त वर्ण को यह सुयोग कदापि प्राप्त नहीं हो सकता, क्योंकि उसकी प्रकृति ही ऐसी नहीं है। उदाहरण के लिए नीचे की कविता के दोनों चरण ही पर्याप्त हैं

    वसुधामपि हस्तगामिनीमकरोदिन्दुमतीमिवापराम्।

    इति यथाक्रममाविरभून्म धु र्द्रुमवतीमव र्ती य्य वनस्थलीम्।

    रघुवंश

    मामपि दहत्येकायमहर्निशिमनल इवापत्यतासमु्द्भव: शोक:।

    शून्यमिव प्रतिभाति मे जगत् अफलमिव पश्यामि राज्यम्।

    क़ादम्बरी

    जो उर्दू के ढंग का पद्य सुधी पाठक जी ने संगीत शाकुन्तल से उठाया है, उसको भी मैं नीचे लिखता हूँ, आप लोग इसे भी देखिए

    पर इस्से पूछ ले क्या इसका मन है।

    तू सोचे जा न कर चिन्ता कुछ इसकी॥

    इस पद्य में इससे को इस्से कर दिया गया है; किन्तु दोनों की ही चार मात्रायें हैं, इसलिए इस पद्य में यदि इस्से के स्थान पर इससे ही रहता तो भी कोई अन्तर नहीं पड़ता जैसा कि पद्य के दूसरे चरण के इसकी, और इसी चरण के ‘इसका’ के इसी रूप में लिखे जाने से कोई अन्तर नहीं पड़ा। यह उन्नीस मात्रा का मात्रिक छन्द है, इसके चरणों में दो-दो मात्रा अधिक हैं। इससे जो तौल कर न पढ़ा जावे, तो इनमें छन्दोभङ्ग होता है। परन्तु यह छन्दोभङ्ग-दोष उनमें के इससे, इसका, इसकी को इस्से, इस्का, इस्की कर देने से दूर नहीं हो सकता, क्योंकि मात्रा दोनों रूपों में ही समान हैं फिर उसको यह रूप देने से क्या लाभ? हाँ, यदि वे निम्नलिखित प्रकार से लिखे जावें तो निस्सन्देह उनकी सदोषता दूर हो जावेगी, परन्तु ऐसी अवस्था में शब्दार्थ के समझने में कितनी उलझन होगी, यह अविदित नहीं है

    प , इससे पूछ ले क्या इसक मन है।

    तु सोचे जा , न कर चिन्ता कुछिसकी॥

    संस्कृत के वर्णवृत्त और हिन्दी के मात्रिक छन्दों की नियमावली इतनी सुन्दर और तुली हुई है, और उसमें लघु गुरु वर्णों के संस्थान और मात्राओं की संख्या इस रीति से नियत की गई है कि यदि सावधनी से कार्य्य किया जावे, तो उनकी रचना में छन्दोभङ्ग हो ही नहीं सकता। दूसरी बात यह कि जब पद्य-रचना हो गई तो जैसे चाहिए पढ़िए, दूसरे से पढ़वाइए, इसके पढ़ने में उलझन होगी ही नहीं। क्योंकि उसमें एक लघु गुरु अक्षर का हेर-फेर नहीं, एक मात्रा घट-बढ़ नहीं, फिर छन्दोभङ्ग कैसे होगा; और जब छन्दोभङ्ग नहीं होगा तो उलझन क्यों होगी? किन्तु उर्दू पद्यों की रचना वजन पर होती है, न उनमें लघु, गुरु का नियम है, न मात्राओं का; केवल कुछ वजन नियत हैं, उन्हीं वजश्नों को कैंडा मानकर उसी कैंडे पर उसमें कविता की जाती है। जैसे, एक वजन बताया गया, मफष्ऊलफषयलातुन मफष्ऊलफषयलातुन अब इसी वजन पर उर्दू के कवि को कविता करनी पड़ती है, उसको यह ज्ञात नहीं है कि कितने अक्षर और मात्रा से इस वजन का छन्द बनेगा। यह प्रणाली उसने अरबी और फारसी से ली है। अभ्यास एक अद्भुत वस्तु है, उससे सब कुछ हो सकता है; और उसी के द्वारा केवल वजन के आश्रय से अरबी फारसी में बिना छन्दोभङ्ग के बड़ी सुन्दर कवितायें लिखी गई हैं। उनमें एक मात्रा की भी घटी-बढ़ी नहीं पाई जाती; वजन पर ही उनकी अधिकांश कविता छन्दों-गति विषय में सर्वथा निर्दोष हैं। परन्तु उर्दू में केवल वजन ने बड़ी उलझन पैदा की है; मुख्य कर उन लोगों के लिए जो वर्णवृत्त और मातृक छन्द पढ़ने के अभ्यस्त हैं। उर्दू कवियों ने वजन पर काम किया है, इसलिए भाषा की क्रियाओं और शब्दों को बेतरह दबा-दुबू और तोड़-फोड़ डाला है। क्योंकि वजन के कैंड़े पर वे प्राय: ठीक नहीं उतर सके। उर्दू भाषा में लिखे गये छन्द को कोई मनुष्य उस समय तक शुध्दता से कदापि नहीं पढ़ सकता, जब तक कि उसको वजन न ज्ञात हो। यदि कोई अक्षरों और मात्राओं के सहारे शब्दों का शुध्द उच्चारण करके उर्दू के पद्यों को पढ़ना चाहेगा, तो अधिकांश स्थलों पर उसका पतन होगा। मिर्जा ग़ालिब का एक शे’र है

    यह कहाँ की दोस्ती है जो बने हैं दोस्त नासेह।

    कोई चाराकार होता कोई ग़म गुसार होता॥

    यह शे’र यदि निम्नलिखित प्रकार से लिख दिया जावे तब तो उसको सब शुध्दतापूर्वक पढ़ लेंगे, अन्यथा बिना वजन पर दृष्टि डाले उसका ठीक-ठीक पढ़ना असंभव है

    य कहाँ की दोस्ती है जुबनेह दोस्त नासह।

    को चारकार होता को ग़म गुसार होता॥

    यह हिन्दी भाषा का चौबीस मात्रा का दिग्पाल छन्द है, जिसमें बारह-बारह मात्राओं पर विराम होता है। किन्तु आप देखें, चौबीस मात्रा का छन्द बनाकर लिखने में उक्त शेर के कुछ शब्द कितने विकृत हुए हैं और किस प्रकार उनमें दुर्बोधता आ गई है। अतएव बोध के लिए शब्दों का शुध्द रूप में लिखा जाना ही समुचित और आवश्यक ज्ञात होता है। हाँ, पढ़ने के लिए उस वजन का अवलम्बन करना पड़ेगा जो कि दिग्पाल छन्द का है, चाहे शब्दों और रसना को कितना ही दबाना पड़े, निदान यही प्रणाली प्रचलित भी है। जब उर्दू बह्न में लिखे गये शेर, या हिन्दी-भाषा के पद्य, लिखे चाहे जिस प्रकार से जावें, पढ़े वजन के अनुसार ही जावेंगे तो फिर शब्दों को विकृत करने से क्या प्रयोजन? मैं समझता हूँ इस विषय में वही पध्दति अवलम्बनीय है, जो अब तक प्रचलित और सर्वसम्मतहै।

    मैं यह स्वीकार करता हूँ कि कभी-कभी मात्रिक छन्दों में भी स्वर संयुक्त वर्ण को हलन्तवत् पढ़ने से ही छन्द की गति निर्दोष रहती है, और कहीं कहीं इस छन्द में भी वर्णवृत्त के समान नियमित स्थान पर नियत रीति से लघु, गुरु रखने से ही काम चलता है। किन्तु उर्दू बह्न के वजन ही जब इस काम को पूरा कर देते हैं, तो शब्दों को विकृत कर के बोध में व्याघात उत्पन्न करना युक्तिसंगत नहीं जान पड़ता। वजन के अनुकूल शब्दों को विकृत करके कविता को ठीक कर लेना यद्यपि छन्द की गति के लिए अवश्य उपयोगी होगा, परन्तु उससे जो शब्दों में विकृति होगी, वह बड़ी ही दुर्बोधता और जटिलतामूलक होगी; अतएव ऐसी अवस्था में वजन का आश्रय ही वांछनीय है, शब्द की विकृति नहीं; निदान इस समय यही प्रणाली प्रचलित और गृहीत है।

    मैंने इन्हीं बातों पर दृष्टि रखकर ‘प्रियप्रवास’ में इसको, जिसको, करना इत्यादि को इसी रूप में लिखा है; उनको संयुक्ताक्षर का रूप नहीं दिया है। न, जन, मन, मदन, बस, अब इत्यादि के अन्तिम अक्षरों को कहीं गुरु बनाने के लिए हलन्त किया है, आशा है मेरी यह प्रणाली बुधजन द्वारा अनुमोदित समझी जायेगी।

    हलन्त वर्णों का सस्वर प्रयोग

    मैं ऊपर लिख आया हूँ कि हिन्दी भाषा की यह स्वाभाविकता है कि वह प्राय: युक्त वर्णों को सारल्य के लिए अयुक्त बना लेती है और हलन्त वर्ण को सस्वर कर लेती है; गर्व, मर्म, धर्म, दर्प, मार्ग इत्यादि का गरब, मरम, धरम, दरप, मारग इत्यादि लिखा जाना इस बात का प्रमाण है। यद्यपि आजकल की भाषा अर्थात् गद्य में ये शब्द प्राय: शुध्द रूप में ही लिखे जाते हैं, किन्तु साधरण बोलचाल में वे अपभ्रंश रूप में ही काम देते हैं। खड़ी बोलचाल की कविता में गद्य के संसर्ग से वे शुध्द रूप में ही लिखे जाने लगे हैं। किन्तु आवश्यकता पड़ने पर उनके अपभ्रंश रूप से भी काम लिया जाता है। मेरे विचार में यह दोनों प्रणाली ग्राह्य है। हलन्त वर्ण को सस्वर करके लिखने और युक्त वर्ण को अयुक्त वर्ण का रूप देने की प्रथा प्राचीन है। उसके पास आचायों और प्रधान काव्य-कर्ताओं द्वारा व्यवहार किये जाने की सनद भी है, जैसा कि निम्नलिखित पद्य-खण्डों के अवलोकन करने से अवगत होगा

    शुक से मुनि शारद से बकता ]

    चिरजीवन लोमस से अ धि काने।

    ग़ोस्वामी तुलसीदास

    आपने करम करि उतरोंगो पार ,

    तो पै हम करतार करतार तुम काहे को।

    सेनापति

    राति ना सुहात ना सुहात परभात आली ,

    जब मन लागि जात काहू निरमोही सों।

    पद्माकर

    जो विपति हूँ मैं पालि पूरब प्रीति काज सँवारहीं।

    ते धन्य नर तुम सारिखे दुरलभ अहैं संशय नहीं॥

    भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (मुद्राराक्षस)

    निदान इसी प्रणाली का अवलम्बन करके मैंने भी ‘प्रियप्रवास’ में मरम इत्यादि शब्दों का प्रयोग संकीर्ण स्थलों पर किया है। ऐसा प्रयोग मेरी समझ में उस दशा में यथाशक्ति न करना चाहिए, जहाँ वह परिवर्ततित रूप में किसी दूसरे अर्थ का द्योतक होवे। जैसा कि कविवर बिहारीलाल के निम्नलिखित पद्य का समर शब्द है, जो स्मर का अशुध्द रूप है और कामदेव के अर्थ में ही प्रयुक्त है; परन्तु अपने वास्तव अर्थ संग्राम की ओर चित्त को आकर्षित करता है

    धस्यो मनो हिय घर समर डयोढ़ी लसत निसान

    हिन्दी-भाषा की कथित प्रकृति पर दृष्टि रखकर ही प्राचीन कतिपय लेखकों ने पद्य क्या गद्य में भी अनेक शब्दों के हलन्त वर्ण को सस्वर लिखना प्रारम्भ कर दिया था। मुख्यत: वे उस हलन्त वर्ण को प्राय: सस्वर करके लिखते थे जो कि किसी शब्द के अन्त में होता था। इस बात को प्रमाणित करने के लिए मैं मार्मिक लेखक स्वर्गीय श्रीयुत पंडित प्रतापनारायण मिश्र लिखित कतिपय पंक्तियाँ उनके प्रसिध्द ‘ब्राह्मण’ मासिक पत्र के खंड 4, संख्या 1, 2 से नीचे अविकल उध्दृत करता हूँ

    तो कदाचित कोई परमेश्वर का नाम भी न ले

    आप को चन्द्र सूर्य इन्द्र करण व हातिम बनाया करते हैं ?

    छोटे-बड़े दरिद्री धनी मूर्ख विद्वान सब का यही सिध्दान्त है

    पृष्ठ संख्या 10

    सभी या तो प्रत्यक्ष ही विषवत या परम्परा द्वारा कुछ न कुछ नाश करनेवाले

    बंधनरहित होने पर भी भगवान का नाम दामोदर क्यों पड़ा

    संख्या 2, पृष्ठ 2

    द्रुपदतनया को केशाकरषण एवं वनवास आदि का दुख सहना पड़ा

    यदि थोड़े से लोग उसके चाहनेवाले हैं भी तो निर्बल निरधन बदनाम

    संख्या 2, पृष्ठ 3

    यद्यपि कभी कभी विद्वान , धनवान और प्रतिष्ठावान लोग भी उसके यहाँ जा रहते हैं

    संख्या 2, पृष्ठ 5

    उसके चाहनेवाले उसे सारे जगत की भाषा से उत्तम माने बैठे हैं

    संख्या 2, पृष्ठ 6

    इससे निरलज्ज हो के साफ-साफ लिखते हैं।

    संख्या 1, पृष्ठ 4

    किन्तु आजकल गद्य में किसी हलन्त वर्ण को सस्वर लिखना तो उठता ही जा रहा है, प्रत्युत पद्य में भी इसका प्रचार हो चला है। मध्य के हलन्त वर्ण की बात तो दूर रही, इन दिनों किसी शब्द के अन्त्यस्थित हलन्त को भी कतिपय आधुनिक प्रधान लेखक सस्वर लिखना नहीं चाहते। कदाचित्, विद्वान्, विषवत्, भगवान्, धनवान्, प्रतिष्ठावान्, जगत् इत्यादि शब्दों के अन्तिम वर्ण को भी वे अब संस्कृत की रीति के अनुसार हलन्त ही लिखते हैं। आजकल वही लोग ऐसा नहीं करते जो संस्कृत कम जानते हैं अथवा प्राचीन प्रणाली के अनुमोदक हैं, अन्यथा प्राय: हिन्दी-लेखक इसी पथ के पान्थ हैं। मैं यह कहूँगा कि इस प्रथा का जितना अधिक सामयिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रचार हो रहा है, उतना ही संस्कृत से अनभिज्ञ लेखक को हिन्दी लिखना एक प्रकार से दुस्तर हो चला है और इस मार्ग में कठिनता उत्पन्न हो गई है; परन्तु समय के प्रवाह को कौन रोक सकता है? पद्य में अब भी यह प्रणाली सर्वतोभावेन गृहीत नहीं हुई है; उदाहरण स्वरूप अग्रलिखित पद्यों पर दृष्टिपात कीजिए

    विधेय बन्धु विद्वान साधु -समुदाय एक सपना पाया।

    इस प्रकार हो विज्ञ जगत में नहीं किसी पर मरता हूँ।

    तो भी किन्तु कदाचित यदि बहु देशों का हम करें मिलान।

    परिमित इच्छावान वहाँ के योग्य वहाँ का है वासी।

    दीन उसे बेंचे है औ धनवान मोल को माँगे है।

    पं. श्रीधर पाठक (श्रान्तपथिक)

    थे नियम विद्या विनय के और हम विद्वान थे।

    धर्म्मनिष्ठा थी सभी गुणवान थे श्रीमान थे॥

    सरस्वती , भाग 14, खंड 2, संख्या 5, पृ. 633

    मैंने भी ‘प्रियप्रवास’ में कदाचित्, महत् इत्यादि शब्दों का प्रयोग आवश्यक स्थलों पर उनके अन्तिम हलन्त वर्ण को सस्वर बना कर किया है। मेरा विचार है कि कविता के लिए इतनी सुविधा आवश्यक है, यों तो हिन्दी की गठन-प्रणाली का ध्यान करके इनका गद्य में भी इस प्रकार लिखा जाना सर्वथा असंगत नहींहै।

    शाब्दिक विकलांगता

    इस ग्रन्थ में जायेंगे, वैसाही, वैसीही इत्यादि के स्थान पर जायँगे, वैसिही, वैसही इत्यादि भी कहीं-कहीं लिखा गया है। यह शाब्दिक विकलांगता पद्य में इस सिध्दान्त के अनुसार अनुचित नहीं समझी जाती अपि माषं मषं कुर्य्यात् छन्दोभङ्गं न कारयेत्। अतएव इस विषय में मैं विशेष कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं समझता। केवल ‘जायँगे’ के विषय में इतना कह देना चाहता हूँ कि अधिकांश लेखक गद्य में भी इस क्रिया को इसी प्रकार लिखते हैं। नीचे के वाक्यों को देखिए

    अरे वेणुवेत्राक , पकड़ इस चन्दनदास को , घरवाले आप ही रो पीट कर चले जायँगे

    कृभारतेन्दु हरिश्चन्द्र (मुद्राराक्षस)

    धार्मिक अथवा सामाजिक विषयों पर विचार न किया जायगा , हिन्दी समाचार पत्रों में छापने के लिए भेज दी जाय

    द्वि. हि. सा. स. वि. प्रथम भाग , पृष्ठ 50-51

    अब इसके प्रतिकूल प्रयोगों को देखिए :

    कहीं भी इतने लाल नहीं होते कि वे बोरियों में भरे जावे ं।

    हिन्दी भाषा के उत्तमोत्तम लेखों के साथ गिना जाव े।

    धीरे-धीरे अपने सिध्दान्त के कोसों दूर हो जावेंगे ।

    द्वि. हि. सा. स. वि. की भूमिका , पृ. 1, 2, 4

    मेरे ही प्रभाव से भारत पायेगा परमोज्ज्वल ज्ञान।

    मिट अवश्य ही जायेगा यह अति अनर्थकारी अज्ञान।

    जिसमें इस अभागिनी का भी हो जावे अब बेड़ा पार।

    श्रीयुत् पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी

    मेरा विचार है कि जायँगे, जायगा, दी जाय इत्यादि के स्थान पर जायेंगे या जावेंगे, जायेगा वा जावेगा, दी जाये वा दी जावे इत्यादि लिखना अच्छा है, क्योंकि यह प्रयोग ऐसी सब क्रियाओं में एक-सा होता है, किन्तु प्रथम प्रयोग इस प्रकार की अनेक क्रियाओं में एक-सा नहीं हो सकता। जैसे जाना धातु का रूप तो जायँगे, जायगा इत्यादि बन जावेगा; परन्तु आना, पीना इत्यादि धातुओं का रूप इस प्रकार न बन सकेगा, क्योंकि आयगा, पीयगा इत्यादि नहीं लिखा जाता। आयेगा या आवेगा, पीयेगा या पीवेगा इत्यादि ही लिखा जाता है।

    विशेषण-विभिन्नता

    हिन्दी भाषा के गद्य-पद्य दोनों में विशेषण के प्रयोग में विभिन्नता देखी जाती है। सुन्दर स्त्री या सुन्दरी स्त्री, शोभित लता या शोभिता लता, दोनों लिखा जाता है। निम्नलिखित गद्य-पद्य को देखिए इनमें आपको दोनों प्रकार का प्रयोग मिलेगा:

    अभी जो इसने अपने कानों को छूनेवाली चद्बचल चितवन से मुझे देखा

    जो स्त्रियाँ ऐसी सुन्दर हैं उन पर पुरुष को आसक्त कराने में कामदेव को अपना धनुष नहीं चढ़ाना पड़ता।

    क़र्पूरमंजरी पृ. 10,11

    निरवलम्बा, शोकसागरमग्ना, अभागिनी अपनी जननी की दुरवस्था एक बार तो ऑंखें खोलकर देखो।

    तुम लोग अब एक बेर जगतविख्याता, ललनाकुलकमलकलिका-प्रकाशिका राजानिचयपूजितपादपीठा, सरलहृदया, आर्द्रचित्ता, प्रजारंजन-कारिणी, दयाशीला, आर्य्यस्वामिनी, राज राजेश्वरी महारानी विक्टोरिया के चरणकमलों में अपने दु:ख को निवेदन करो।

    भारत जननी , पृष्ठ 9, 11

    धूनी तपै आग की ज्वाला चद्बचल शिखा झलकती है

    कोमल , मृदुल , मिष्टवाणी से दुख का हेतु परखता है

    अपनी अमृतमयी वाणी से प्रेमसुधा बरसाता था

    एकान्तवासी योगी (पं. श्रीधर पाठक)

    जयति पतिप्रेमपनप्रानसीता।

    नेहनिधि रामपद प्रेमअवलम्बिनी सततसहवास पतिव्रत पुनीता

    पं. श्रीधर पाठक

    भृकुटी विकट मनोहर नासा

    सोह नवल तन सुन्दर सारी

    मोह नदी कहँ सुन्दर तरनी

    सकल परमगति के अधिकारी

    पुनि देखी सुरसरी पुनीता

    मम धमदा पुरी सुखरासी

    नखनिर्गता सुरबन्दिता त्रायलोकपावन सुरसरी

    महात्मा तुलसीदास

    इस सर्वसम्मत प्रणाली पर दृष्टि रखकर ही इस ग्रन्थ में भी विशेषणों का प्रयोग उभय रीति से किया गया है।

    हिन्दी-प्रणाली प्रस्तुत शब्द

    कुछ शब्द इसमें ऐसे भी प्रयुक्त हुए हैं, जो सर्वथा हिन्दी प्रणाली पर निर्मित हैं। संस्कृत-व्याकरण का उनसे कुछ सम्बन्ध नहीं है। यदि उसकी पध्दति के अनुसार उनके रूपों की मीमांसा की जावेगी तो वे अशुध्द पाये जावेंगे, यद्यपि हिन्दी भाषा के नियम से वे शुध्द हैं। ए शब्द मृगदृगी, दृगता इत्यादि हैं। मृगदृगी का मृगदृषी, दृगता का दृक्ता शुध्द रूप है; परन्तु कवितागत सौकर्य्य-सम्पादन के लिए उनका वही रूप रखा गया है। हिन्दी भाषा के गद्य-पद्य दोनों में इसके उदाहरण मिलेंगे, एक यहाँ पर दिया जाता है

    ऐसी रुचिर-दृगी मृगियों के आगे शोभित भले प्रकार।

    बाबू मैथिलीशरण गुप्त (सरस्वती , भाग 8, संख्या 6, पृष्ठ 244)

    शब्द-विन्यास विभिन्नता

    शब्द-विन्यास में भी विभिन्नता इस ग्रन्थ में आप लोगों को मिलेगी; ऐसा अधिकतर पद्य की भाषा का विचार करके और कहीं-कहीं छन्द की अवस्था पर दृष्टि रखकर हुआ है। ‘रोये बिना न छन भी मन मानता था’, ‘रोना महा अशुभ जान पयान बेला’ यदि मैं इन चरणों में छन के स्थान पर क्षण, पयान के स्थान पर प्रयाण लिखता तो इनके लालित्य में कितना अन्तर पड़ जाता। इसी प्रकार यदि मैं ‘सचेष्ट होते भर वे क्षणेक थे’ इस चरण में क्षणेक के स्थान पर छनेक लिख देता तो इसके ओज और रस में कितना विभेद होता; और यही कारण है कि आप इस ग्रन्थ में कहीं छन कहीं क्षण, कहीं भाग कहीं भाग्य, कहीं पयान कहीं प्रयाण इत्यादि विभिन्न प्रयोग देखेंगे।

    मैंने इस विषय का पूर्ण ध्यान रखा है कि ग्रन्थ की भाषा एक प्रकार की हो; और यथाशक्य मैंने ऐसा किया भी है, तथापि रस और अवसर के अनुसरण से आप इस ग्रन्थ की भाषा को स्थान-स्थान पर परिवर्तित पावेंगे। मैंने ऊपर कहा है कि जिस पद्य में मुझको जिस प्रकार का शब्द रखना उचित जान पड़ा, मैंने उसमें वैसा ही शब्द रखा है; परन्तु नहीं कह सकता कि मैं अपने उद्देश्य में कहाँ तक कृतकार्य्य हुआ हूँ, और सहृदय कवि एवं विद्वानों को मेरी यह परिपाटी कहाँ तक उचित जान पड़ेगी। मेरा यह भी विचार हुआ था कि मैं ब्रजभाषा की प्रणाली के अनुसार ण, श इत्यादि को न, स इत्यादि से बदल कर इस ग्रन्थ की भाषा को विशेष कोमल कर दूँ। रमणीय, श्रवण, शोभा, शक्ति इत्यादि को रमनीय स्रवन, सोभा, सक्ति करके लिखूँ। परन्तु ऐसा करने से प्रथम तो इस ग्रन्थ की भाषा वर्तमान-काल की गद्य की भाषा से अधिक भिन्न हो जाती, दूसरे इसमें जो संस्कृत का यत्किंचित् रंग है वह न रहता और भद्दापन एवं अमनोहारित्व आ जाता। इस समय जितना ‘रमणीय’ शब्द श्रुतिसुखद और प्यारा ज्ञात होता है उतना रमनीय नहीं; जो ‘शोभा’ लिखने में सौन्दर्य्य और समादर है वह ‘सोभा’ लिखने में नहीं। अतएव कोई कारण नहीं था कि मैं सामयिक प्रवृत्ति और प्रवाह पर दृष्टि न रखकर एक स्वतन्त्रता पथ ग्रहण करता। किसी कवि ने कितना अच्छा कहा है

    दधि मधुरं मधु मधुरं द्राक्षा मधुरा सितापि मधुरेव।

    तस्य तदेव हि मधुरं यस्य मनोवाति यत्र संलग्नम्॥

    इस ग्रन्थ में आप कहीं-कहीं बहुवचन में भी यह और वह का प्रयोग देखेंगे, इसी प्रकार कहीं-कहीं यहाँ के स्थान पर याँ, वहाँ के स्थान पर वाँ, नहीं के स्थान पर न और वह के स्थान पर सो का प्रयोग भी आप को मिलेगा। उर्दू के कवि एकवचन और बहुवचन दोनों में यह और वह लिखते हैं; और यहाँ और वहाँ के स्थान पर प्राय: याँ और वाँ का प्रयोग करते हैं; परन्तु मैंने ऐसा संकीर्ण स्थलों पर ही किया है। हिन्दी भाषा के आधुनिक पद्य-लेखकों को भी ऐसा करते देखा जाता है। मेरा विचार है कि बहुवचन में ए और वे का प्रयोग ही उत्तम है और इसी प्रकार यहाँ और वहाँ लिखा जाना ही यथाशक्य अच्छा है; अन्यथा चरण संकीर्ण स्थलों पर अनुचित नहीं, परन्तु वहीं तक वह ग्राह्य है जहाँ तक कि मर्यादित हो। नहीं और वह के स्थान पर न और सो के विषय में भी मेरा यही विचार है। उक्त शब्दों के व्यवहार के उदाहरण स्वरूप कुछ पद्य और गद्य नीचे लिखे जाते हैं

    जिन लोगों ने इस काम में महारत पैदा की है, वह लफ.जों को देखकर साफ पहचान लेते हैं।

    ख्यालात का मरतबा जवान से अव्वल है, लेकिन जब तक वह दिल में हैं, माँ के पेट में अधूरे बच्चे हैं।

    या यह दोनों जबानें एक जबान से इस तरह निकली होंगी, जिस तरह एक बाप की दो बेटियाँ जुदा हो गईं।

    वरना खाना-बदोशी के आलम में खुशबाश जिन्दगी बसर करते हैं, और जंगलों के चरिन्द और पहाड़ों के परिन्द ऐसी बोलियाँ बोलते हैं।

    सखुनदान .फा रस , सफहा 2, 3, 25

    वह झाड़ियाँ चमन की वह मेरा आशियाना।

    वह बाग़ की बहारें वह सबका मिलके गाना॥

    ( सरस्वती पत्रिका)

    तो वाँ जर्श्रा जर्श्रा यह करता है एलाँ।

    हवा याँ की थी जिन्दगी बख्श दौराँ॥

    कि आती हो वाँ से न ज र सारी दुनिया।

    ज मा ना की गरदिश से है किसको चारा॥

    कभी याँ सिकन्दर कभी याँ है दारा।

    मुसद्दसहाली

    है धन्य वही परमात्मा जो याँ तक लाया हमें।

    सरस्वती पत्रिका , भाग 8, संख्या 1, पृष्ठ 25

    जाइ न बरनि मनोहर जोरी। दरस लालसा सकुच न थोरी॥

    महात्मा तुलसीदास

    रूप सुधा इकली ही पियै पियहूँ को न आरसी देखन देत है।

    भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

    न स्वर्ग भी सुखद जो परतन्त्रता है।

    पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी

    इके तो कियो वायु सेवन को मानहुँ अपर प्रकारा है

    सबै सो अहो एक तेरे निहोरे

    पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी

    और जो है सो है ही, किन्तु पाठक जरा इस कथन को ध्यानपूर्वक देखें।

    अभ्युदय , भाग 8, संख्या 3, पृ. 3, कालम 3

    ब्रजभाषा-शब्द-प्रयोग

    आजकल के कतिपय साहित्य-सेवियों का विचार है कि खड़ी बोली की कविता इतनी उन्नत हो गई है और इस पद पर पहुँच गई है कि उसमें ब्रजभाषा के किसी शब्द का प्रयोग करना उसे अप्रतिष्ठित बनाना है; परन्तु मैं इस विचार से सहमत नहीं हूँ। ब्रजभाषा कोई पृथक् भाषा नहीं है, इसके अतिरिक्त उर्दू-शब्दों से उसके शब्दों का हिन्दी भाषा पर विशेष स्वत्व है। अतएव कोई कारण नहीं है कि उर्दू के शब्द तो निस्संकोच हिन्दी में गृहीत होते रहें और ब्रजभाषा के उपयुक्त और मनोहर शब्दों के लिए भी उसका द्वार बन्द कर दिया जावे। मेरा विचार है कि खड़ी बोलचाल का रंग रखते हुए जहाँ तक उपयुक्त एवं मनोहर शब्द ब्रजभाषा के मिलें, उनके लेने में संकोच न करना चाहिए। जब उर्दू भाषा सर्वथा ब्रजभाषा के शब्दों से अब तक रहित नहीं हुई तो हिन्दी भाषा उससे अपना सम्बन्ध कैसे विच्छिन्न कर सकती है। इसके व्यतीत मैं यह भी कहूँगा कि उपयुक्त और आवश्यक शब्द किसी भाषा का ग्रहण करने के लिए सदा हिन्दी भाषा का द्वार उन्मुक्त रहना चाहिए; अन्यथा वह परिपुष्ट और विस्तृत होने के स्थान पर निर्बल और संकुचित हो जावेगी। सहृदय कवि भिखारीदास कहते हैं

    तुलसी गंग दुवौ भये सुकविन के सरदार।

    इनके काव्यन में मिली भाषा विविध प्रकार॥

    इस सिध्दान्त द्वारा परिचालित होकर मैंने ब्रजभाषा के विलग, बगर इत्यादि शब्दों का प्रयोग भी कहीं-कहीं किया है, आशा है मेरा यह अनुचित साहस न समझा जायगा।

    ह्र स्व वर्णों का दीर्घ बनाना

    संस्कृत का यह नियम है कि उसके पद्य में कहीं-कहीं ह्र्स्व वर्ण का प्रयोग दीर्घ की भाँति किया जाता है। सहृदयवर बाबू मैथिलीशरण गुप्त के निम्नलिखित पद्य के उन शब्दों को देखिए जिनके नीचे लकीर खिंची हुई है। प्रथम चरण के घ, द्वितीय चरण के ‘श, तृतीय चरण के त्र और चतुर्थ चरण के व तथा ति ह्र्स्व वर्णों का उच्चारण इन पद्यों के पढ़ने में दीर्घ की भाँति होगा

    निदाघ ज्वाला से विचलित हुआ चातक अभी।

    भुलाने जाता था निज विमल वंश-व्रत सभी॥

    दिया पत्र द्वारा नव बल मुझे आज तुमने।

    सुसाक्षी हैं मेरे विदित कुल-देव ग्रह पति॥

    इस प्रकार के प्रयोगों का व्यवहार यद्यपि हिन्दी भाषा में आजकल सफलता से हो रहा है; और लोगों का विचार है कि यदि संस्कृत के वृत्तों की खड़ी बोली के पद्य के लिए आवश्यकता है, तो इस प्रणाली के ग्रहण की भी आवश्यकता है; अन्यथा बड़ी कठिनता का सामना करना पड़ेगा और एक सुविधा हाथ से जाती रहेगी। मैं इस विचार से सहमत हूँ; परन्तु इतना निवेदन करना चाहता हूँ कि जहाँ तक संभव हो, ऐसा प्रयोग कम किया जावे; क्योंकि इस प्रकार का प्रयोग हिन्दी-पद्य में एक प्रकार की जटिलता ला देता है। आप लोग देखेंगे कि ऐसे प्रयोगों से बचने की इस ग्रन्थ में मैंने कितनी चेष्टा की है।

    दोषक्षालन चेष्टा

    इस ग्रन्थ के लिखने में शब्दों के व्यवहार का जो पथ ग्रहण किया गया है, मैंने यहाँ पर थोड़े में उसका दिग्दर्शन मात्रा किया है। इस ग्रन्थ के गुण-दोष के विषय में न तो मुझको कुछ कहने का अधिकार है और न मैं इतनी क्षमता ही रखता हूँ कि इस जटिल मार्ग में दो-चार डग भी उचित रीत्या चल सकूँ। शब्द-दोष, वाक्य-दोष, अर्थ-दोष और रस-दोष इतने गहन हैं और इतने सूक्ष्म इसके विचार एवं विभेद हैं कि प्रथम तो उनमें यथार्थ गति होना असम्भव है; और यदि गति हो जावे, तो उस पर दृष्टि रखकर काव्य करना नितान्त दुस्तर है। यह धुरन्धर और प्रगल्भ विद्वानों की बात है, मुझ-से अबोधो की तो इस पथ में कोई गणना ही नहीं जेहि मारुत गिरि मेरु उडाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं। श्रध्देय स्वर्गीय पण्डित सुधाकर द्विवेदी, प्रथम हिन्दी साहित्य सम्मेलन के कार्य्य-विवरण के पृष्ठ 37 में लिखते हैं

    हिन्दी और संस्कृत काव्यों में जितने भेद हैं, उन सब पर ध्यान देकर जो काव्य बनाया जावे तो शायद एकाध दोहा या श्लोक काव्य-लक्षण से निर्दोष ठहरे।

    जब यह अवस्था है, तो मुझ-से अल्पज्ञ का अपनी साधरण कविता को निर्दोष सिध्द करने की चेष्टा करना मूर्खता छोड़ और कुछ नहीं हो सकता। अतएव मेरी इन कतिपय पंक्तियों को पढ़कर यह न समझना चाहिए कि मैंने इनको लिखकर अपने ग्रन्थ को निर्दोष सिध्द करने की चेष्टा की है। प्रथम तो अपना दोष अपने को सूझता नहीं, दूसरे कवि-कर्म्म महा कठिन; ऐसी अवस्था में यदि कोई अलौकिक प्रतिभाशाली विद्वान् भी ऐसी चेष्टा करे तो उसे उपहासास्पद होना पड़ेगा। मुझ-से ज्ञानलव-दुर्विदग्ध की तो कुछ बात ही नहीं।

    विनीत

    ‘ हरिऔध ‘

    प्रिय प्रवास (महाकाव्य) अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

    1. प्रथम सर्ग

    दिवस का अवसान समीप था।
    गगन था कुछ लोहित हो चला।
    तरु-शिखा पर थी अब राजती।
    कमलिनी-कुल-वल्लभ की प्रभा॥1॥
    विपिन बीच विहंगम वृंद का।
    कलनिनाद विवर्द्धित था हुआ।
    ध्वनिमयी-विविधा विहगावली।
    उड़ रही नभ-मंडल मध्य थी॥2॥
    अधिक और हुई नभ-लालिमा।
    दश-दिशा अनुरंजित हो गई।
    सकल-पादप-पुंज हरीतिमा।
    अरुणिमा विनिमज्जित सी हुई॥3॥
    झलकने पुलिनों पर भी लगी।
    गगन के तल की यह लालिमा।
    सरि सरोवर के जल में पड़ी।
    अरुणता अति ही रमणीय थी॥4॥
    अचल के शिखरों पर जा चढ़ी।
    किरण पादप-शीश-विहारिणी।
    तरणि-बिम्ब तिरोहित हो चला।
    गगन-मंडल मध्य शनैः शनैः॥5॥
    ध्वनि-मयी कर के गिरि-कंदरा।
    कलित कानन केलि निकुंज को।
    बज उठी मुरली इस काल ही।
    तरणिजा तट राजित कुंज में॥6॥
    कणित मंजु-विषाण हुए कई।
    रणित शृंग हुए बहु साथ ही।
    फिर समाहित-प्रान्तर-भाग में।
    सुन पड़ा स्वर धावित-धेनु का॥7॥
    निमिष में वन-व्यापित-वीथिका।
    विविध-धेनु-विभूषित हो गई।
    धवल-धूसर-वत्स-समूह भी।
    विलसता जिनके दल साथ था॥8॥
    जब हुए समवेत शनैः शनैः।
    सकल गोप सधेनु समंडली।
    तब चले ब्रज-भूषण को लिये।
    अति अलंकृत-गोकुल-ग्राम को॥9॥
    गगन मंडल में रज छा गई।
    दश-दिशा बहु शब्द-मयी हुई।
    विशद-गोकुल के प्रति-गेह में।
    बह चला वर-स्रोत विनोद का॥10॥
    सकल वासर आकुल से रहे।
    अखिल-मानव गोकुल-ग्राम के।
    अब दिनांत विलोकित ही बढ़ी।
    ब्रज-विभूषण-दर्शन-लालसा॥11॥
    सुन पड़ा स्वर ज्यों कल-वेणु का।
    सकल-ग्राम समुत्सुक हो उठा।
    हृदय-यंत्र निनादित हो गया।
    तुरत ही अनियंत्रित भाव से॥12॥
    बहु युवा युवती गृह-बालिका।
    विपुल-बालक वृद्ध व्यस्क भी।
    विवश से निकले निज गेह से।
    स्वदृग का दुख-मोचन के लिए॥13॥
    इधर गोकुल से जनता कढ़ी।
    उमगती पगती अति मोद में।
    उधर आ पहुँची बलबीर की।
    विपुल-धेनु-विमंडित मंडली॥14॥
    ककुभ-शोभित गोरज बीच से।
    निकलते ब्रज-बल्लभ यों लसे।
    कदन ज्यों करके दिशि कालिमा।
    विलसता नभ में नलिनीश है॥15॥
    अतसि पुष्प अलंकृतकारिणी।
    शरद नील-सरोरुह रंजिनी।
    नवल-सुंदर-श्याम-शरीर की।
    सजल-नीरद सी कल-कांति थी॥16॥
    अति-समुत्तम अंग समूह था।
    मुकुर-मंजुल औ मनभावना।
    सतत थी जिसमें सुकुमारता।
    सरसता प्रतिबिंबित हो रही॥17॥
    बिलसता कटि में पट पीत था।
    रुचिर वस्त्र विभूषित गात था।
    लस रही उर में बनमाल थी।
    कल-दुकूल-अलंकृत स्कंध था॥18॥
    मकर-केतन के कल-केतु से।
    लसित थे वर-कुंडल कान में।
    घिर रही जिनकी सब ओर थी।
    विविध-भावमयी अलकावली॥19॥
    मुकुट मस्तक था शिखि-पक्ष का।
    मधुरिमामय था बहु मंजु था।
    असित रत्न समान सुरंजिता।
    सतत थी जिसकी वर चंद्रिका॥20॥
    विशद उज्ज्वल उन्नत भाल में।
    विलसती कल केसर-खौर थी।
    असित-पंकज के दल में यथा।
    रज-सुरंजित पीत-सरोज की॥21॥
    मधुरता-मय था मृदु-बोलना।
    अमृत-सिंचित सी मुस्कान थी।
    समद थी जन-मानस मोहती।
    कमल-लोचन की कमनीयता॥22॥
    सबल-जानु विलंबित बाहु थी।
    अति-सुपुष्ट-समुन्नत वक्ष था।
    वय-किशोर-कला लसितांग था।
    मुख प्रफुल्लित पद्म समान था॥23॥
    सरस-राग-समूह सहेलिका।
    सहचरी मन मोहन-मंत्र की।
    रसिकता-जननी कल-नादिनी।
    मुरलि थी कर में मधुवर्षिणी॥24॥
    छलकती मुख की छवि-पुंजता।
    छिटकती क्षिति छू तन की घटा।
    बगरती बर दीप्ति दिगंत में।
    क्षितिज में क्षणदा-कर कांति सी॥25॥
    मुदित गोकुल की जन-मंडली।
    जब ब्रजाधिप सम्मुख जा पड़ी।
    निरखने मुख की छवि यों लगी।
    तृषित-चातक ज्यों घन की घटा॥26॥
    पलक लोचन की पड़ती न थी।
    हिल नहीं सकता तन-लोम था।
    छवि-रता बनिता सब यों बनी।
    उपल निर्मित पुत्तलिका यथा॥27॥
    उछलते शिशु थे अति हर्ष से।
    युवक थे रस की निधि लूटते।
    जरठ को फल लोचन का मिला।
    निरख के सुषमा सुखमूल की॥28॥
    बहु-विनोदित थीं ब्रज-बालिका।
    तरुणियाँ सब थीं तृण तोड़तीं।
    बलि गईं बहु बार वयोवती।
    छवि विभूति विलोक ब्रजेन्दु की॥29॥
    मुरलिका कर-पंकज में लसी।
    जब अचानक थी बजती कभी।
    तब सुधारस मंजु-प्रवाह में।
    जन-समागम था अवगाहता॥30॥
    ढिग सुसोभित श्रीबलराम थे।
    निकट गोप-कुमार-समूह था।
    विविध गातवती गरिमामयी।
    सुरभि थीं सब ओर विराजती॥31॥
    बज रहे बहु-शृंग-विषाण थे।
    क्वणित हो उठता वर-वेणु था।
    सरस-राग-समूह अलाप से।
    रसवती-बन थी मुदिता-दिशा॥32॥
    विविध-भाव-विमुग्ध बनी हुई।
    मुदित थी बहु दर्शक-मंडली।
    अति मनोहर थी बनती कभी।
    बज किसी कटि की कलकिंकिणी॥33॥
    इधर था इस भाँति समा बँधा।
    उधर व्योम हुआ कुछ और ही।
    अब न था उसमें रवि राजता।
    किरण भी न सुशोभित थी कहीं॥34॥
    अरुणिमा-जगती-तल-रंजिनी।
    वहन थी करती अब कालिमा।
    मलिन थी नव-राग-मयी-दिशा।
    अवनि थी तमसावृत हो रही॥35॥
    तिमिर की यह भूतल-व्यापिनी।
    तरल-धार विकास-विरोधिनी।
    जन-समूह-विलोचन के लिए।
    बन गई प्रति-मूर्ति विराम की॥36॥
    द्युतिमयी उतनी अब थी नहीं।
    नयन की अति दिव्य कनीनिका।
    अब नहीं वह थी अवलोकती।
    मधुमयी छवि श्री घनश्याम की॥37॥
    यह अभावुकता तम-पुंज की।
    सह सकी न नभस्थल तारका।
    वह विकाश-विवर्द्धन के लिए।
    निकलने नभ मंडल में लगी॥38॥
    तदपि दर्शक-लोचन-लालसा।
    फलवती न हुई तिलमात्र भी।
    यह विलोक विलोचन दीनता।
    सकुचने सरसीरुह भी लगे॥39॥
    खग-समूह न था अब बोलता।
    विटप थे बहुत नीरव हो गए।
    मधुर मंजुल मत्त अलाप के।
    अब न यंत्र बने तरु-वृंद थे॥40॥
    विगह औ विटपी-कुल मौनता।
    प्रकट थी करती इस मर्म को।
    श्रवण को वह नीरव थे बने।
    करुण अंतिम-वादन वेणु का॥41॥
    विहग-नीरवता-उपरांत ही।
    रुक गया स्वर शृंग विषाण का।
    कल-अलाप समापित हो गया।
    पर रही बजती वर-वंशिका॥42॥
    विविध-मर्म्मभरी करुणामयी।
    ध्वनि वियोग-विराग-विवोधिनी।
    कुछ घड़ी रह व्याप्त दिगंत में।
    फिर समीरण में वह भी मिली॥43॥
    ब्रज-धरा-जन जीवन-यंत्रिका।
    विटप-वेलि-विनोदित-कारिणी।
    मुरलिका जन-मानस-मोहिनी।
    अहह नीरवता निहिता हुई॥44॥
    प्रथम ही तम की करतूत से।
    छवि न लोचन थे अवलोकते।
    अब निनाद रुके कल-वेणु का।
    श्रवण पान न था करता सुधा॥45॥
    इसलिए रसना-जन-वृंद की।
    सरस-भाव समुत्सुकता पगी।
    ग्रथन गौरव से करने लगी।
    ब्रज-विभूषण की गुण-मालिका॥46॥
    जब दशा यह थी जन-यूथ की।
    जलज-लोचन थे तब जा रहे।
    सहित गोगण गोप-समूह के।
    अवनि-गौरव-गोकुल ग्राम में॥47॥
    कुछ घड़ी यह कांत क्रिया हुई।
    फिर हुआ इसका अवसान भी।
    प्रथम थी बहु धूम मची जहाँ।
    अब वहाँ बढ़ता सुनसान था॥48॥
    कर विदूरित लोचन लालसा।
    स्वर प्रसूत सुधा श्रुति को पिला।
    गुण-मयी रसनेन्द्रिय को बना।
    गृह गये अब दर्शक-वृंद भी॥49॥
    प्रथम थी स्वर की लहरी जहाँ।
    पवन में अधिकाधिक गूँजती।
    कल अलाप सुप्लावित था जहाँ।
    अब वहाँ पर नीरवता हुई॥50॥
    विशद-चित्रपटी ब्रजभूमि की।
    रहित आज हुई वर चित्र से।
    छवि यहाँ पर अंकित जो हुई।
    अहह लोप हुई सब-काल को॥51॥

    2. द्वितीय सर्ग
    द्रुतविलंबित छंद

    गत हुई अब थी द्वि-घटी निशा।
    तिमिर-पूरित थी सब मेदिनी।
    बहु विमुग्ध करी बन थी लसी।
    गगन मंडल तारक-मालिका॥1॥
    तम ढके तरु थे दिखला रहे।
    तमस-पादप से जन-वृंद को।
    सकल गोकुल गेह-समूह भी।
    तिमिर-निर्मित सा इस काल था॥2॥
    इस तमो-मय गेह-समूह का।
    अति-प्रकाशित सर्व-सुकक्ष था।
    विविध ज्योति-निधान-प्रदीप थे।
    तिमिर-व्यापकता हरते जहाँ॥3॥
    इस प्रभा-मय-मंजुल-कक्ष में।
    सदन की करके सकला क्रिया।
    कथन थीं करतीं कुल-कामिनी।
    कलित कीर्ति ब्रजाधिप-तात की॥4॥
    सदन-सम्मुख के कल ज्योति से।
    ज्वलित थे जितने वर-बैठके।
    पुरुष-जाति वहाँ समवेत हो।
    सुगुण-वर्णन में अनुरक्त थी॥5॥
    रमणियाँ सब ले गृह–बालिका।
    पुरुष लेकर बालक-मंडली।
    कथन थे करते कल-कंठ से।
    ब्रज-विभूषण की विरदावली॥6॥
    सब पड़ोस कहीं समवेत था।
    सदन के सब थे इकठे कहीं।
    मिलित थे नरनारि कहीं हुए।
    चयन को कुसुमावलि कीर्ति की॥7॥
    रसवती रसना बल से कहीं।
    कथित थी कथनीय गुणावली।
    मधुर राग सधे स्वर ताल में।
    कलित कीर्ति अलापित थी कहीं॥8॥
    बज रहे मृदु मंद मृदंग थे।
    ध्वनित हो उठता करताल था।
    सरस वादन से वर बीन के।
    विपुल था मधु-वर्षण हो रहा॥9॥
    प्रति निकेतन से कल-नाद की।
    निकलती लहरी इस काल थी।
    मधुमयी गलियाँ सब थीं बनी।
    ध्वनित सा कुल गोकुल-ग्राम था।10॥
    सुन पड़ी ध्वनि एक इसी घड़ी।
    अति-अनर्थकरी इस ग्राम में।
    विपुल वादित वाद्य-विशेष से।
    निकलती अब जो अविराम थी॥11॥
    मनुज एक विघोषक वाद्य की।
    प्रथम था करता बहु ताड़ना।
    फिर मुकुंद-प्रवास-प्रसंग यों।
    कथन था करता स्वर–तार से॥12॥
    अमित विक्रम कंस नरेश ने।
    धनुष-यज्ञ विलोकन के लिए।
    कुल समादर से ब्रज-भूप को।
    कुँवर संग निमंत्रित है किया॥13॥
    यह निमंत्रण लेकर आज ही।
    सुत-स्वफल्क समागत हैं हुए।
    कल प्रभात हुए मथुरापुरी।
    गमन भी अवधारित हो चुका॥14॥
    इस सुविस्तृत-गोकुल ग्राम में।
    निवसते जितने वर-गोप हैं।
    सकल को उपढौकन आदि ले।
    उचित है चलना मथुरापुरी॥15॥
    इसलिए यह भूपनिदेश है।
    सकल-गोप समाहित हो सुनो।
    सब प्रबंध हुआ निशि में रहे।
    कल प्रभात हुए न विलंब हो॥16॥
    निमिष में यह भीषण घोषणा।
    रजनि-अंक-कलंकित-कारिणी।
    मृदु-समीरण के सहकार से।
    अखिल गोकुल-ग्राममयी हुई॥17॥
    कमल-लोचन कृष्ण-वियोग की।
    अशनि-पात-समा यह सूचना।
    परम-आकुल-गोकुल के लिए।
    अति-अनिष्टकरी घटना हुई॥18॥
    चकित भीत अचेतन सी बनी।
    कँप उठी कुलमानव-मंडली।
    कुटिलता कर याद नृशंस की।
    प्रबल और हुई उर-वेदना॥19॥
    कुछ घड़ी पहले जिस भूमि में।
    प्रवहमान प्रमोद-प्रवाह था।
    अब उसी रस प्लावित भूमि में।
    बह चला खर स्रोत विषाद का॥20॥
    कर रहे जितने कल गान थे।
    तुरत वे अति कुंठित हो उठे।
    अब अलाप अलौकिक कंठ के।
    ध्वनित थे करते न दिगंत को॥21॥
    उतर तार गए बहु बीन के।
    मधुरता न रही मुरजादि में।
    विवशता-वश वादक-वृंद के।
    गिर गए कर के करताल भी॥22॥
    सकल-ग्रामवधू कल कंठता।
    परम-दारुण-कातरता बनी।
    हृदय की उनकी प्रिय-लालसा।
    विविध-तर्क वितर्क-मयी हुई॥23॥
    दुख भरी उर-कुत्सित-भावना।
    मथन मानस को करने लगी।
    करुण प्लावित लोचन कोण में।
    झलकने जल के कण भी लगे॥24॥
    नव-उमंग-मयी पुर-बालिका।
    मलिन और सशंकित हो गई।
    अति-प्रफुल्लित बालक-वृंद का।
    वदन-मंडल भी कुम्हला गया॥25॥
    ब्रज धराधिप तात प्रभात ही।
    कल हमें तज के मथुरा चले।
    असहनीय जहाँ सुनिए वहीं।
    बस यही चरचा इस काल थी॥26॥
    सब परस्पर थे कहते यही।
    कमल-नेत्र निमंत्रित क्यों हुए।
    कुछ स्वबंधु समेत ब्रजेश का।
    गमन ही, सब भाँति यथेष्ट था॥27॥
    पर निमंत्रित जो प्रिय हैं हुए।
    कपट भी इसमें कुछ है सही।
    दुरभिसंधि नृशंस-नृपाल की।
    अब न है ब्रज-मंडल में छिपी॥28॥
    विवश है करती विधि वामता।
    कुछ बुरे दिन हैं ब्रज-भूमि के।
    हम सभी अतिही-हतभाग्य हैं।
    उपजती नित जो नव-व्याधि है॥29॥
    किस परिश्रम और प्रयत्न से।
    कर सुरोत्तम की परिसेवना।
    इस जराजित-जीवन-काल में।
    महर को सुत का मुख है दिखा॥30॥
    सुअन भी सुर विप्र प्रसाद से।
    अति अपूर्व अलौकिक है मिला।
    निज गुणावलि से इस काल जो।
    ब्रज-धरा-जन जीवन प्राण है॥31॥
    पर बड़े दुख की यह बात है।
    विपद जो अब भी टलती नहीं।
    अहह है कहते बनती नहीं।
    परम-दग्धकरी उर की व्यथा॥32॥
    जनम की तिथि से बलवीर की।
    बहु-उपद्रव हैं ब्रज में हुए।
    विकटता जिन की अब भी नहीं।
    हृदय से अपसारित हो सकी॥33॥
    परम-पातक की प्रतिमूर्ति सी।
    अति अपावनतामय-पूतना।
    पय-अपेय पिला कर श्याम को।
    कर चुकी ब्रज-भूमि विनाश थी॥34॥
    पर किसी चिर-संचित-पुण्य से।
    गरल अमृत अर्भक को हुआ।
    विष-मयी वह होकर आप ही।
    कवल काल-भुजंगम का हुई॥35॥
    फिर अचानक धूलिमयी महा।
    दिवस एक प्रचंड हवा चली।
    श्रवण से जिसकी गुरु-गर्जना।
    कँप उठा सहसा उर दिग्वधू॥36॥
    उपल वृष्टि हुई तम छा गया।
    पट गई महि कंकर-पात से।
    गड़गड़ाहट वारिद-व्यूह की।
    ककुभ में परिपूरित हो गई॥37॥
    उखड़ पेड़ गए जड़ से कई।
    गिर पड़ीं अवनी पर डालियाँ।
    शिखर भग्न हुए उजड़ीं छतें।
    हिल गए सब पुष्ट निकेत भी॥38॥
    बहु रजोमय आनन हो गया।
    भर गए युग-लोचन धूलि से।
    पवन-वाहित-पांशु-प्रहार से।
    गत बुरी ब्रज-मानव की हुई॥39॥
    घिर गया इतना तम-तोम था।
    दिवस था जिससे निशि हो गया।
    पवन-गर्जन औ घन-नाद से।
    कँप उठी ब्रज-सर्व वसुंधरा॥40॥
    प्रकृति थी जब यों कुपिता महा।
    हरि अदृश्य अचानक हो गए।
    सदन में जिस से ब्रज-भूप के।
    अति-भयानक-क्रंदन हो उठा॥41॥
    सकल-गोकुल था यक तो दुखी।
    प्रबल-वेग प्रभंजन-आदि से।
    अब दशा सुन नंद-निकेत की।
    पवि-समाहत सा वह हो गया॥42॥
    पर व्यतीत हुए द्विघटी टली।
    यह तृणावरतीय विडंबना।
    पवन-वेग रुका तम भी हटा।
    जलद-जाल तिरोहित हो गया॥43॥
    प्रकृति शांत हुई वर व्योम में।
    चमकने रवि की किरणें लगीं।
    निकट ही निज सुंदर सद्म के।
    किलकते हँसते हरि भी मिले॥44॥
    अति पुरातन पुण्य ब्रजेश का।
    उदय था इस काल स्वयं हुआ।
    पतित हो खर वायु-प्रकोप में।
    कुसुम-कोमल बालक जो बचा॥45॥
    शकट-पात ब्रजाधिप पास ही।
    पतन अर्जुन से तरु राज का।
    पकड़ना कुलिशोषम चंचु से।
    खल बकासुर का बलवीर को॥46॥
    वधन-उद्यम दुर्जय-वत्स का।
    कुटिलता अघ संज्ञक-सर्प की।
    विकट घोटक की अपकारिता।
    हरि निपातन यत्न अरिष्ट का॥47॥
    कपट-रूप-प्रलंब प्रवंचना।
    खलपना-पशुपालक-व्योम का।
    अहह ए सब घोर अनर्थ थे।
    ब्रज-विभूषण हैं जिनसे बचे॥48॥
    पर दुरंत-नराधिप कंस ने।
    अब कुचक्र भयंकर है रचा।
    युगल बालक संग ब्रजेश जो।
    कल निमंत्रित हैं मख में हुए॥49॥
    गमन जो न करें बनती नहीं।
    गमन से सब भाँति विपत्ति है।
    जटिलता इस कौशल जाल की।
    अहह है अति कष्ट प्रदायिनी॥50॥
    प्रणतपाल कृपानिधि श्रीपते।
    फलद है प्रभु का पद-पद्म ही।
    दुख-पयोनिधि मज्जित का वही।
    जगत में परमोत्तम पोत है॥51॥
    विषम संकट में ब्रज है पड़ा।
    पर हमें अवलंबन है वही।
    निबिड़ पामरता, तम हो चला।
    पर प्रभो बल है नख-ज्योति का॥52॥
    विपद ज्यों बहुधा कितनी टली।
    प्रभु कृपाबल त्यों यह भी टले।
    दुखित मानस का करुणानिधे।
    अति विनीत निवेदन है यही॥53॥
    ब्रज-विभाकर ही अवलंब हैं।
    हम सशंकित प्राणि-समूह के।
    यदि हुआ कुछ भी प्रतिकूल तो।
    ब्रज-धरा तमसावृत हो चुकी॥54॥
    पुरुष यों करते अनुताप थे।
    अधिक थीं व्यथिता ब्रज-नारियाँ।
    बन अपार-विषाद-उपेत वे।
    बिलख थीं दृग वारि विमोचतीं॥55॥
    दुख प्रकाशन का क्रम नारि का।
    अधिक था नर के अनुसार ही।
    पर विलाप कलाप बिसूरना।
    बिलखना उनमें अतिरिक्त था॥56॥
    ब्रज-धरा-जन की निशि साथ ही।
    विकलता परिवर्द्धित हो चली।
    तिमिर साथ विमोहक शोक भी।
    प्रबल था पल ही पल रो रहा॥57॥
    विशद-गोकुल बीच विषाद की।
    अति-असंयत जो लहरें उठीं।
    बहु विवर्द्धित हो निशि–मध्य ही।
    ब्रज-धरातलव्यापित वे हुईं॥58॥
    विलसती अब थी न प्रफुल्लता।
    न वह हास विलास विनोद था।
    हृदय कंपित थी करती महा।
    दुखमयी ब्रज-भूमि-विभीषिका॥59॥
    तिमिर था घिरता बहु नित्य ही।
    पर घिरा तम जो निशि आज की।
    उस विषाद-महातम से कभी।
    रहित हो न सकी ब्रज की धरा॥60॥
    बहु-भयंकर थी यह यामिनी।
    बिलपते ब्रज भूतल के लिए।
    तिमिर में जिसके उसका शशी।
    बहु-कला युत होकर खो चला॥61॥
    घहरती घिरती दुख की घटा।
    यह अचानक जो निशि में उठी।
    वह ब्रजांगण में चिर काल ही।
    बरसती बन लोचनवारि थी॥62॥
    ब्रज-धरा-जन के उर मध्य जो।
    विरह-जात लगी यह कालिमा।
    तनिक धो न सका उस को कभी।
    नयन का बहु-वारि-प्रवाह भी॥63॥
    सुखद थे बहु जो जन के लिए।
    फिर नहीं ब्रज के दिन वे फिरे।
    मलिनता न समुज्वलता हुई।
    दुख-निशा न हुई सुख की निशा॥64॥

    3. तृतीय सर्ग
    द्रुतविलंबित छंद

    समय था सुनसान निशीथ का।
    अटल भूतल में तम-राज्य था।
    प्रलय-काल समान प्रसुप्त हो।
    प्रकृति निश्चल, नीरव, शांत थी॥1॥
    परम-धीर समीर-प्रवाह था।
    वह मनों कुछ निद्रित था हुआ।
    गति हुई अथवा अति-धीर थी।
    प्रकृति को सुप्रसुप्त विलोक के॥2॥
    सकल-पादप नीरव थे खड़े।
    हिल नहीं सकता यक पत्र था।
    च्युत हुए पर भी वह मौन ही।
    पतित था अवनी पर हो रहा॥3॥
    विविध-शब्द-मयी वन की धरा।
    अति-प्रशांत हुई इस काल थी।
    ककुभ औ नभ-मंडल में नहीं।
    रह गया रव का लवलेश था॥4॥
    सकल-तारक भी चुपचाप ही।
    बितरते अवनी पर ज्योति थे।
    बिकटता जिस से तम-तोम की।
    कियत थी अपसारित हो रही॥5॥
    अवश तुल्य पड़ा निशि अंक में।
    अखिल-प्राणि-समूह अवाक था।
    तरु-लतादिक बीच प्रसुप्ति की।
    प्रबलता प्रतिबिंबित थी हुई॥6॥
    रुक गया सब कार्य-कलाप था।
    वसुमती-तल भी अति-मूक था।
    सचलता अपनी तज के मनों।
    जगत था थिर होकर सो रहा॥7॥
    सतत शब्दित गेह समूह में।
    विजनता परिवर्द्धित थी हुई।
    कुछ विनिद्रित हो जिनमें कहीं।
    झनकता यक झींगुर भी न था॥8॥
    बदन से तज के मिष धूम के।
    शयन-सूचक श्वास-समूह को।
    झलमलाहट-हीन-शिखा लिए।
    परम-निद्रित सा गृह-दीप था॥9॥
    भनक थी निशि-गर्भ तिरोहिता।
    तम-निमज्जित आहट थी हुई।
    निपट नीरवता सब ओर थी।
    गुण-विहीन हुआ जनु व्योम था॥10॥
    इस तमोमय मौन निशीथ की।
    सहज-नीरवता क्षिति-व्यापिनी।
    कलुपिता ब्रज की महि के लिए।
    तनिक थी न विराम प्रदायिनी॥11॥
    दलन थी करती उसको कभी।
    रुदन की ध्वनि दूर समागता।
    वह कभी बहु थी प्रतिघातता।
    जन-विवोधक-कर्कश-शब्द से॥12॥
    कल प्रयाण निमित्त जहाँ-तहाँ।
    वहन जो करते बहु वस्तु थे।
    श्रम-सना उनका रव-प्रायश:।
    कर रहा निशि-शांति विनाश था॥13॥
    प्रगटती बहु-भीषण मूर्ति थी।
    कर रहा भय तांडव नृत्य था।
    बिकट-दंट भयंकर-प्रेत भी।
    बिचरते तरु-मूल-समीप थे॥14॥
    वदन व्यादन पूर्वक प्रेतिनी।
    भय-प्रदर्शन थी करती महा।
    निकलती जिससे अविराम थी।
    अनल की अति-त्रासकरी-शिखा॥15॥
    तिमिर-लीन-कलेवर को लिए।
    विकट-दानव पादप थे बने।
    भ्रममयी जिसकी विकरालता।
    चलित थी करती पवि-चित्त को॥16॥
    अति-सशंकित और सभीत हो।
    मन कभी यह था अनुमानता।
    ब्रज समूल विनाशन को खड़े।
    यह निशाचर हैं नृप-कंस के॥17॥
    अति-भयानक-भूमि मसान की।
    बहन थी करती शव-राशि को।
    बहु-विभीषणता जिनकी कभी।
    दृग नहीं सकते अवलोक थे॥18॥
    बिकट-दंत दिखाकर खोपड़ी।
    कर रही अति-भैरव-हास थी।
    विपुल-अस्थि-समूह विभीषिका।
    भर रही भय थी बन भैरवी॥19॥
    इस भयंकर-घोर-निशीथ में।
    विकलता अति-कातरता-मयी।
    विपुल थी परिवर्द्धित हो रही।
    निपट-नीरव-नंद-निकेत में॥20॥
    सित हुए अपने मुख-लोम को।
    कर गहे दुखव्यंजक भाव से।
    विषम-संकट बीच पड़े हुए।
    बिलखते चुपचाप ब्रजेश थे॥21॥
    हृदय-निर्गत वाष्प समूह से।
    सजल थे युग-लोचन हो रहे।
    बदन से उनके चुपचाप ही।
    निकलती अति-तप्त उसास थी॥22॥
    शयित हो अति-चंचल-नेत्र से।
    छत कभी वह थे अवलोकते।
    टहलते फिरते स-विषाद थे।
    वह कभी निज निर्जन कक्ष में॥23॥
    जब कभी बढ़ती उर की व्यथा।
    निकट जा करके तब द्वार के।
    वह रहे नभ नीरव देखते।
    निशि-घटी अवधारण के लिए॥24॥
    सब-प्रबंध प्रभात-प्रयाण के।
    यदिच थे रव-वर्जित हो रहे।
    तदपि रो पड़ती सहसा रहीं।
    विविध-कार्य-रता गृहदासियाँ॥25॥
    जब कभी यह रोदन कान में।
    ब्रज-धराधिप के पड़ता रहा।
    तड़पते तब यों वह तल्प पै।
    निशित-शायक-विद्धजनो यथा॥26॥
    ब्रज-धरा-पति कक्ष समीप ही।
    निपट-नीरव कक्ष विशेष में।
    समुद थे ब्रज-वल्लभ सो रहे।
    अति-प्रफुल्ल मुखांबुज मंजु था॥27॥
    निकट कोमल तल्प मुकुंद के।
    कलपती जननी उपविष्ट थी।
    अति-असंयत अश्रु-प्रवाह से।
    वदन-मंडल प्लावित था हुआ॥28॥
    हृदय में उनके उठती रही।
    भय-भरी अति-कुत्सित-भावना।
    विपुल-व्याकुल वे इस काल थीं।
    जटिलता-वश कौशल-जाल की॥29॥
    परम चिंतित वे बनती कभी।
    सुअन प्रात प्रयाण प्रसंग से।
    व्यथित था उनको करता कभी।
    परम-त्रास महीपति-कंस का॥30॥
    पट हटा सुत के मुख कंज की।
    विचकता जब थीं अवलोकती।
    विवश सी जब थीं फिर देखती।
    सरलता, मृदुता, सुकुमारता॥31॥
    तदुपरांत नृपाधम-नीति की।
    अति भयंकरता जब सोचतीं।
    निपतिता तब होकर भूमि में।
    करुण क्रंदन वे करती रहीं॥32॥
    हरि न जाग उठें इस सोच से।
    सिसकतीं तक भी वह थीं नहीं।
    इसलिए उन का दुख-वेग से।
    हृदया था शतधा अब रो रहा॥33॥
    महरि का यह कष्ट विलोक के।
    धुन रहा सिर गेह-प्रदीप था।
    सदन में परिपूरित दीप्ति भी।
    सतत थी महि-लुंठित हो रही॥34॥
    पर बिना इस दीपक-दीप्ति के।
    इस घड़ी इस नीरव-कक्ष में।
    महरि का न प्रबोधक और था।
    इसलिए अति पीड़ित वे रहीं॥35॥
    वरन कंपित-शीश प्रदीप भी।
    कर रहा उनको बहु-व्यग्र था।
    अति-समुज्वल-सुंदर-दीप्ति भी।
    मलिन थी अतिही लगती उन्हें॥36॥
    जब कभी घटता दुख-वेग था।
    तब नवा कर वे निज-शीश को।
    महि विलंबित हो कर जोड़ के।
    विनय यों करती चुपचाप थीं॥37॥
    सकल-मंगल-मूल कृपानिधे।
    कुशलतालय हे कुल-देवता।
    विपद संकुल है कुल हो रहा।
    विपुल वांछित है अनुकूलता॥38॥
    परम-कोमल-बालक श्याम ही।
    कलपते कुल का यक चिन्ह है।
    पर प्रभो! उसके प्रतिकूल भी।
    अति-प्रचंड समीरण है उठा॥39॥
    यदि हुई न कृपा पद-कंज की।
    टल नहीं सकती यह आपदा।
    मुझ सशंकित को सब काल ही।
    पद-सरोरुह का अवलंब है॥40॥
    कुल विवर्द्धन पालन ओर ही।
    प्रभु रही भवदीय सुदृष्टि है।
    यह सुमंगल मूल सुदृष्टि ही।
    अति अपेक्षित है इस काल भी॥41॥
    समझ के पद-पंकज-सेविका।
    कर सकी अपराध कभी नहीं।
    पर शरीर मिले सब भाँति में।
    निरपराध कहा सकती नहीं॥42॥
    इस लिये मुझसे अनजान में।
    यदि हुआ कुछ भी अपराध हो।
    वह सभी इस संकट-काल में।
    कुलपते! सब ही विधि क्षम्य है॥43॥
    प्रथम तो सब काल अबोध की।
    सरल चूक उपेक्षित है हुई।
    फिर सदाशय आशय सामने।
    परम तुच्छ सभी अपराध हैं॥44॥
    सरलता-मय-बालक श्याम तो।
    निरपराध, नितांत-निरीह है।
    इस लिये इस काल दयानिधे।
    वह अतीव-अनुग्रह-पात्र है॥45॥

    मालिनी छंद

    प्रमुदित मथुरा के मानवों को बना के।
    सकुशल रह के औ’ विघ्न बाधा बचा के।
    निजप्रिय सुत दोनों साथ लेके सुखी हो।
    जिस दिन पलटेंगे गेह स्वामी हमारे॥46॥
    प्रभु दिवस उसी मैं सत्विकी रीति द्वारा।
    परम शुचि बड़े ही दिव्य आयोजनों से।
    विधिसहित करूँगी मंजु पादाब्ज-पूजा।
    उपकृत अति होके आपकी सत्कृपा से॥47॥

    द्रुतविलंबित छंद

    यह प्रलोभन है न कृपानिधे।
    यह अकोर प्रदान न है प्रभो।
    वरन है यह कातर–चित्त की।
    परम-शांतिमयी-अवतारणा॥48॥
    कलुष-नाशिनि दुष्ट-निकंदिनी।
    जगत की जननी भव–वल्लभे।
    जननि के जिय की सकला व्यथा।
    जननि ही जिय है कुछ जानता॥49॥
    अवनि में ललना जन जन्म को।
    विफल है करती अनपत्यता।
    सहज जीवन को उसके सदा।
    वह सकंटक है करती नहीं॥50॥
    उपजती पर जो उर व्याधि है।
    सतत संतति संकट-शोच से।
    वह सकंटक ही करती नहीं।
    वरन जीवन है करती वृथा॥51॥
    बहुत चिंतित थी पद-सेविका।
    प्रथम भी यक संतति के लिए।
    पर निरंतर संतति-कष्ट से।
    हृदय है अब जर्जर हो रहा॥52॥
    जननि जो उपजी उर में दया।
    जरठता अवलोक-स्वदास की।
    बन गई यदि मैं बड़भागिनी।
    तब कृपाबल पाकर पुत्र को॥53॥
    किस लिये अब तो यह सेविका।
    बहु निपीड़ित है नित हो रही।
    किस लिये, तब बालक के लिये।
    उमड़ है पड़ती दुख की घटा॥54॥
    ‘जन-विनाश’ प्रयोजन के बिना।
    प्रकृति से जिसका प्रिय कार्य्य है।
    दलन को उसके भव-वल्लभे।
    अब न क्या बल है तव बाहु में॥55॥
    स्वसुत रक्षण औ पर-पुत्र के।
    दलन की यह निर्म्मम प्रार्थना।
    बहुत संभव है यदि यों कहें।
    सुन नहीं सकती ‘जगदंबिका’॥56॥
    पर निवेदन है यह ज्ञानदे।
    अबल का बल केवल न्याय है।
    नियम-शालिनि क्या अवमानना।
    उचित है विधि-सम्मत-न्याय की॥57॥
    परम क्रूर-महीपति-कंस की।
    कुटिलता अब है अति कष्टदा।
    कपट-कौशल से अब नित्य ही।
    बहुत-पीड़ित है ब्रज की प्रजा॥58॥
    सरलता-मय-बालक के लिए।
    जननि! जो अब कौशल है हुआ।
    सह नहीं सकता उसको कभी।
    पवि विनिर्मित मानव-प्राण भी॥59॥
    कुबलया सम मत्त-गजेन्द्र से।
    भिड़ नहीं सकते दनुजात भी।
    वह महा सुकुमार कुमार से।
    रण-निमित्त सुसज्जित है हुआ॥60॥
    विकट-दर्शन कज्जल-मेरु सा।
    सुर गजेन्द्र समान पराक्रमी।
    द्विरद क्या जननी उपयुक्त है।
    यक पयो-मुख बालक के लिये॥61॥
    व्यथित हो कर क्यों बिलखूँ नहीं।
    अहह धीरज क्योंकर मै धरूँ।
    मृदु-कुरंगम शावक से कभी।
    पतन हो न सका हिम शैल का॥62॥
    विदित है बल, वज्र-शरीरता।
    बिकटता शल तोशल कूट की।
    परम है पटु मुष्टि-प्रहार में।
    प्रबल मुष्टिक संज्ञक मल्ल भी॥63॥
    पृथुल-भीम-शरीर भयावने।
    अपर हैं जितने मल कंस के।
    सब नियोजित हैं रण के लिए।
    यक किशोरवयस्क कुमार से॥64॥
    विपुल वीर सजे बहु-अस्त्र से।
    नृपति-कंस स्वयं निज शस्त्र ले।
    विबुध-वृन्द विलोड़क शक्ति से।
    शिशु विरुध्द समुद्यत हैं हुए॥65॥
    जिस नराधिप की वशवर्तिनी।
    सकल भाँति निरन्तर है प्रजा।
    जननि यों उसका कटिबध्द हो।
    कुटिलता करना अविधेय है॥66॥
    जन प्रपीड़ित हो कर अन्य से।
    शरण है गहता नरनाथ की।
    यदि निपीड़न भूपति ही करे।
    जगत में फिर रक्षक कौन है?॥67॥
    गगन में उड़ जा सकती नहीं।
    गमन संभव है न पताल का।
    अवनि-मध्य पलायित हो कहीं।
    बच नहीं सकती नृप-कंस से॥68॥
    विवशता किससे अपनी कहूँ।
    जननि! क्यों न बनूँ बहु-कातरा।
    प्रबल-हिंसक-जन्तु-समूह में।
    विवश हो मृग-शावक है चला॥69॥
    सकल भाँति हमें अब अम्बिके!
    चरण-पंकज ही अवलम्ब है।
    शरण जो न यहाँ जन को मिली।
    जननि, तो जगतीतल शून्य है॥70॥
    विधि अहो भवदीय-विधन की।
    मति-अगोचरता बहु-रूपता।
    परम युक्ति-मयीकृति भूति है।
    पर कहीं वह है अति-कष्टदा॥71॥
    जगत में यक पुत्र बिना कहीं।
    बिलटता सुर-वांछित राज्य है।
    अधिक संतति है इतनी कहीं।
    वसन भोजन दुर्लभ है जहाँ॥72॥
    कलप के कितने वसुयाम भी।
    सुअन-आनन हैं न विलोकते।
    विपुलता निज संतति की कहीं।
    विकल है करती मनु जात को॥73॥
    सुअन का वदनांबुज देख के।
    पुलकते कितने जन हैं सदा।
    बिलखते कितने सब काल हैं।
    सुत मुखांबुज देख मलीनता॥74॥
    सुखित हैं कितनी जननी सदा।
    निज निरापद संतति देख के।
    दुखित हैं मुझ सी कितनी प्रभो।
    नित विलोक स्वसंतति आपदा॥75॥
    प्रभु, कभी भवदीय विधन में।
    तनिक अन्तर हो सकता नहीं।
    यह निवेदन सादर नाथ से।
    तदपि है करती तव सेविका॥76॥
    यदि कभी प्रभु-दृष्टि कृपामयी।
    पतित हो सकती महि-मध्य हो।
    इस घड़ी उसकी अधिकारिणी।
    मुझ अभागिन तुल्य न अन्य है॥77॥
    प्रकृति प्राणस्वरूप जगत्पिता।
    अखिल-लोकपते प्रभुता निधे।
    सब क्रिया कब सांग हुई वहाँ।
    प्रभु जहाँ न हुई पद-अर्चना॥78॥
    यदिच विश्व समस्त-प्रपंच से।
    पृथक से रहते नित आप हैं।
    पर कहाँ जन को अवलम्ब है।
    प्रभु गहे पद-पंकज के बिना॥79॥
    विविध-निर्जर में बहु-रूप से।
    यदिच है जगती प्रभु की कला।
    यजन पूजन से प्रति-देव के।
    यजित पूजित यद्यपि आप हैं॥80॥
    तदपि जो सुर-पादप के तले।
    पहुँच पा सकता जन शान्ति है।
    वह कभी दल फूल फलादि से।
    मिल नहीं सकती जगतीपते॥81॥
    झलकती तव निर्मल ज्योति है।
    तरणि में तृण में करुणामयी।
    किरण एक इसी कल-ज्योति की।
    तम निवारण में क्षम है प्रभो॥82॥
    अवनि में जल में वर व्योम में।
    उमड़ता प्रभु-प्रेम-समुद्र है।
    कब इसी वरवारिधि बूँद का।
    शमन में मम ताप समर्थ है॥83॥
    अधिक और निवेदन नाथ से।
    कर नहीं सकती यह किंकरी।
    गति न है करुणाकर से छिपी।
    हृदय की मन की मम-प्राण की॥84॥
    विनय यों करतीं ब्रजपांगना।
    नयन से बहती जलधार थी।
    विकलतावश वस्त्र हटा हटा।
    वदन थीं सुत का अवलोकती॥85॥

    शार्दूल-विक्रीड़ित छन्द

    ज्यों-ज्यों थीं रजनी व्यतीत करती औ देखती व्योम को।
    त्यों हीं त्यों उनका प्रगाढ़ दुख भी दुर्दान्त था हो रहा।
    ऑंखों से अविराम अश्रु बह के था शान्ति देता नहीं।
    बारम्बार अशक्त-कृष्ण-जननी थीं मूर्छिता हो रही॥86॥

    द्रुतविलम्बित छन्द

    विकलता उनकी अवलोक के।
    रजनि भी करती अनुताप थी।
    निपट नीरव ही मिष ओस के।
    नयन से गिरता बहु-वारि था॥87॥
    विपुल-नीर बहा कर नेत्र से।
    मिष कलिन्द-कुमारि-प्रवाह के।
    परम-कातर हो रह मौन ही।
    रुदन थी करती ब्रज की धरा॥88॥
    युग बने सकती न व्यतीत हो।
    अप्रिय था उसका क्षण बीतना।
    बिकट थी जननी धृति के लिए।
    दुखभरी यह घोर विभावरी॥89॥

    4. चतुर्थ सर्ग
    द्रुतविलम्बित छन्द

    विशद-गोकुल-ग्राम समीप ही।
    बहु-बसे यक सुन्दर-ग्राम में।
    स्वपरिवार समेत उपेन्द्र से।
    निवसते वृषभानु-नरेश थे॥1॥
    यह प्रतिष्ठित-गोप सुमेर थे।
    अधिक-आदृत थे नृप-नन्द से।
    ब्रज-धरा इनके धन-मन से।
    अवनि में अति-गौरविता रही॥2॥
    यक सुता उनकी अति-दिव्य थी।
    रमणि-वृन्द-शिरोमणि राधिका।
    सुयश-सौरभ से जिनके सदा।
    ब्रज-धरा बहु-सौरभवान थी॥3॥

    शार्दूल-विक्रीड़ित छन्द

    रूपोद्यान प्रफुल्ल-प्राय-कलिका राकेन्दु-विम्बनना।
    तन्वंगी कल-हासिनी सुरसिका क्रीड़ा-कला पुत्तली।
    शोभा-वारिधि की अमूल्य-मणि सी लावण्य लीला मयी।
    श्रीराधा-मृदुभाषिणी मृगदृगी-माधुर्य की मुर्ति थीं॥4॥
    फूले कंज-समान मंजु-दृगता थी मत्त कारिणी।
    सोने सी कमनीय-कान्ति तन की थी दृष्टि-उन्मेषिनी।
    राधा की मुसकान की ‘मधुरता थी मुग्धता-मुर्ति सी।
    काली-कुंचित-लम्बमान-अलकें थीं मानसोन्मादिनी॥5॥
    नाना-भाव-विभाव-हाव-कुशला आमोद आपूरिता।
    लीला-लोल-कटाक्ष-पात-निपुणा भ्रूभंगिमा-पंडिता।
    वादित्रादि समोद-वादन-परा आभूषणाभूषिता।
    राधा थीं सुमुखी विशाल-नयना आनन्द-आन्दोलिता॥6॥
    लाली थी करती सरोज-पग की भूपृष्ठ को भूषिता।
    विम्बा विद्रुम को अकान्त करती थी रक्तता ओष्ठ की।
    हर्षोत्फुल्ल-मुखारविन्द-गरिमा सौंदर्य्यआधार थी।
    राधा की कमनीय कान्त छवि थी कामांगना मोहिनी॥7॥
    सद्वस्त्रा-सदलंकृकृता गुणयुता-सर्वत्र सम्मानिता।
    रोगी वृध्द जनोपकारनिरता सच्छास्त्रा चिन्तापरा।
    सद्भावातिरता अनन्य-हृदया-सत्प्रेम-संपोषिका।
    राधा थीं सुमना प्रसन्नवदना स्त्रीजाति-रत्नोपमा॥8॥

    द्रुतविलम्बित छन्द

    यह विचित्र-सुता वृषभानु की।
    ब्रज-विभूषण में अनुरक्त थी।
    सहृदया यह सुन्दर-बालिका।
    परम-कृष्ण-समर्पित-चित्त थी॥9॥
    ब्रज-धराधिप औ वृषभानु में।
    अतुलनीय परस्पर-प्रीति थी।
    इसलिए उनका परिवार भी।
    बहु परस्पर प्रेम-निबध्द था॥10॥
    जब नितान्त-अबोध मुकुन्द थे।
    विलसते जब केवल अंक में।
    वह तभी वृषभानु निकेत में।
    अति समादर साथ गृहीत थे॥11॥
    छविवती-दुहिता वृषभानु की।
    निपट थी जिस काल पयोमुखी।
    वह तभी ब्रज-भूप कुटुम्ब की।
    परम-कौतुक-पुत्तलिका रही॥12॥
    यह अलौकिक-बालक-बालिका।
    जब हुए कल-क्रीड़न-योग्य थे।
    परम-तन्मय हो बहु प्रेम से।
    तब परस्पर थे मिल खेलते॥13॥
    कलित-क्रीड़न से इनके कभी।
    ललित हो उठता गृह-नन्द का।
    उमड़ सी पड़ती छवि थी कभी।
    वर-निकेतन में वृषभानु के॥14॥
    जब कभी काल-क्रीड़न-सूत्र से।
    चरण-नूपुर औ कटि-किंकिणी।
    सदन में बजती अति-मंजु थी।
    किलकती तब थी कल-वादिता॥15॥
    युगल का वय साथ सनेह भी।
    निपट-नीरवता सह था बढ़ा।
    फिर यही वर-बाल सनेह ही।
    प्रणय में परिवर्तित था हुआ॥16॥
    बलवती कुछ थी इतनी हुई।
    कुँवरि-प्रेम-लता उर-भूमि में।
    शयन भोजन क्या, सब काल ही।
    वह बनी रहती छवि-मत्त थी॥17॥
    वचन की रचना रस से भरी।
    प्रिय मुखांबुज की रमणीयता।
    उतरती न कभी चित से रही।
    सरलता, अतिप्रीति सुशीलता॥18॥
    मधुपुरी बलवीर प्रयाण के।
    हृदय-शैल-स्वरूप प्रसंग से।
    न उबरी यह बेलि विनोद की।
    विधि अहो भवदीय विडम्बना॥19॥

    शार्दूल-विक्रीड़ित छन्द

    काले कुत्सित कीट का कुसुम में कोई नहीं काम था।
    काँटे से कमनीय कंज कृति में क्या है न कोई कमी।
    पोरों में अब ईख की विपुलता है ग्रंथियों की भली।
    हा! दुर्दैव प्रगल्भते! अपटुता तूने कहाँ की नहीं॥20॥

    द्रुतविलम्बित छन्द

    कमल का दल भी हिम-पात से।
    दलित हो पड़ता सब काल है।
    कल कलानिधि को खल राहु भी।
    निगलता करता बहु क्लान्त है॥21॥
    कुसुम सा प्रफुल्लित बालिका।
    हृदय भी न रहा सुप्रफुल्ल ही।
    वह मलीन सकल्मष हो गया।
    प्रिय मुकुन्द प्रवास-प्रसंग से॥22॥
    सुख जहाँ निज दिव्य स्वरूप से।
    विलसता करता कल-नृत्य है।
    अहह सो अति-सुन्दर सद्म भी।
    बच नहीं सकता दुखलेश से॥23॥
    सब सुखाकर श्रीवृषभानुजा।
    सदन-सज्जित-शोभन-स्वर्ग सा।
    तुरत ही दुख के लवलेश से।
    मलिन शोक-निमज्जित हो गया॥24॥
    जब हुई श्रुति-गोचर सूचना।
    ब्रज धराधिप तात प्रयाण की।
    उस घड़ी ब्रज-वल्लभ प्रेमिका।
    निकट थी प्रथिता ललिता सखी॥25॥
    विकसिता-कलिका हिमपात से।
    तुरत ज्यों बनती अति म्लान है।
    सुन प्रसंग मुकुन्द प्रवास का।
    मलिन त्यों वृषभानुसुता हुईं॥26॥
    नयन से बरसा कर वारि को।
    बन गईं पहले बहु बावली।
    निज सखी ललिता मुख देख के।
    दुखकथा फिर यों कहने लगीं॥27॥

    मालिनी छन्द

    कल कुवलय के से नेत्रवाले रसीले।
    वररचित फबीले पीते कौशेय शोभी।
    गुणगण मणिमाली मंजुभाषी सजीले।
    वह परम छबीले लाडिले नन्दजी के॥28॥
    यदि कल मथुरा को प्रात ही जा रहे हैं।
    बिन मुख अवलोके प्राण कैसे रहेंगे।
    युग सम घटिकायें वार की बीतती थीं।
    सखि! दिवस हमारे बीत कैसे सकेंगे॥29॥
    जन मन कलपाना मैं बुरा जानती हूँ।
    परदुख अवलोके मैं न होती सुखी हूँ।
    कहकर कटु बातें जी न भूले जलाया।
    फिर यह दुखदायी बात मैंने सुनी क्यों?॥30॥
    अयि सखि! अवलोके खिन्नता तू कहेगी।
    प्रिय स्वजन किसी के क्या न जाते कहीं हैं।
    पर हृदय न जानें दग्ध क्यों हो रहा है।
    सब जगत हमें है शून्य होता दिखाता॥31॥
    यह सकल दिशायें आज रो सी रही हैं।
    यह सदन हमारा, है हमें काट खाता।
    मन उचट रहा है चैन पाता नहीं है।
    विजन-विपिन में है भागता सा दिखाता॥32॥
    रुदनरत न जानें कौन क्यों है बुलाता।
    गति पलट रही है भाग्य की क्यों हमारे।
    उह! कसक समाई जा रही है कहाँ की।
    सखि! हृदय हमारा दग्ध क्यों हो रहा है॥33॥
    मधुपुर-पति ने है प्यार ही से बुलाया।
    पर कुशल हमें तो है न होती दिखाती।
    प्रिय-विरह-घटायें घेरती आ रही हैं।
    घहर घहर देखो हैं कलेजा कँपाती॥34॥
    हृदय चरण तो मैं चढ़ा ही चुकी हूँ।
    सविधि-वरण की थी कामना और मेरी।
    पर सफल हमें सो है न होती दिखाती।
    वह कब टलता है भाल में जो लिखा है॥35॥
    सविधि भगवती को आज भी पूजती हूँ।
    बहु-व्रत रखती हूँ देवता हूँ मनाती।
    मम-पति हरि होवें चाहती मैं यही हूँ।
    पर विफल हमारे पुण्य भी हो चले हैं॥36॥
    करुण ध्वनि कहाँ की फैल सी क्यों गई है।
    सब तरु मन मारे आज क्यों यों खड़े हैं।
    अवनि अति-दुखी सी क्यों हमें है दिखाती।
    नभ-पर दुख-छाया-पात क्यों हो रहा है॥37॥
    अहह सिसकती मैं क्यों किसे देखती हूँ।
    मलिन-मुख किसी का क्यों मुझे है रुलाता।
    जल जल किसका है छार-होता कलेजा।
    निकल निकल आहें क्यों किसे बेधती हैं॥38॥
    सखि, भय यह कैसा गेह में छा गया है।
    पल-पल जिससे मैं आज यों चौंकती हूँ।
    कँप कर गृह में की ज्योति छाई हुई भी।
    छन-छन अति मैली क्यों हुई जा रही है॥39॥
    मनहरण हमारे प्रात जाने न पावें।
    सखि! जुगुत हमें तो सूझती है न ऐसी।
    पर यदि यह काली यामिनी ही न बीते।
    तब फिर ब्रज कैसे प्राणप्यारे तजेंगे॥40॥
    सब-नभ-तल-तारे जो उगे दीखते हैं।
    यह कुछ ठिठके से सोच में क्यों पड़े हैं।
    ब्रज-दुख अवलोके क्या हुए हैं दुखारी।
    कुछ व्यथित बने से या हमें देखते हैं॥41॥
    रह-रह किरणें जो फूटती हैं दिखाती।
    वह मिष इनके क्या बोध देते हमें हैं।
    कर वह अथवा यों शान्ति का हैं बढ़ाते।
    विपुल-व्यथित जीवों की व्यथा मोचने को॥42॥
    दुख-अनल-शिखायें व्योम में फूटती हैं।
    यह किस दुखिया का हैं कलेजा जलाती।
    अहह अहह देखो टूटता है न तारा।
    पतन दिलजले के गात का हो रहा है॥43॥
    चमक-चमक तारे धीर देते हमें हैं।
    सखि! मुझ दुखिया की बात भी क्या सुनेंगे?
    पर-हित-रत-हो ए ठौर को जो न छोड़ें।
    निशि विगत न होगी बात मेरी बनेगी॥44॥
    उडुगण थिर से क्यों हो गये दीखते हैं।
    यह विनय हमारी कान में क्या पड़ी है?
    रह-रह इनमें क्यों रंग आ-जा रहा है।
    कुछ सखि! इनको भी हो रही बेकली है॥45॥
    दिन फल जब खोटे हो चुके हैं हमारे।
    तब फिर सखि! कैसे काम के वे बनेंगे।
    पल-पल अति फीके हो रहे हैं सितारे।
    वह सफल न मेरी कामनायें करेंगे॥46॥
    यह नयन हमारे क्या हमें हैं सताते।
    अहह निपट मैली ज्योति भी हो रही है।
    मम दुख अवलोके या हुए मंद तारे।
    कुछ समझ हमारी काम देती नहीं है॥47॥
    सखि! मुख अब तारे क्यों छिपाने लगे हैं।
    वह दुख लखने की ताब क्या हैं न लाते।
    परम-विफल होके आपदा टालने में।
    वह मुख अपना हैं लाज से या छिपाते॥48॥
    क्षितिज निकट कैसी लालिमा दीखती है।
    बह रुधिर रहा है कौन सी कामिनी का।
    बिहग विकल हो-हो बोलने क्यों लगे हैं।
    सखि! सकल दिशा में आग सी क्यों लगी है॥49॥
    सब समझ गई मैं काल की क्रूरता को।
    पल-पल वह मेरा है कलेजा कँपाता।
    अब नभ उगलेगा आग का एक गोला।
    सकल-ब्रज-धार को फूँक देता जलाता॥50॥

    मन्दाक्रान्ता छन्द

    हा! हा! ऑंखों मम-दुख-दशा देख ली औ न सोची।
    बातें मेरी कमलिनिपते! कान की भी न तूने।
    जो देवेगा अवनितल को नित्य का सा उँजाला।
    तेरा होना उदय ब्रज में तो अंधेरा करेगा॥51॥
    नाना बातें दुख शमन को प्यार से थी सुनाती।
    धीरे-धीरे नयन-जल थी पोंछती राधिका का।
    हा! हा! प्यारी दुखित मत हो यों कभी थी सुनाती।
    रोती-रोती विकल ललिता आप होती कभी थी॥52॥
    सूख जाता कमल-मुख था होठ नीला हुआ था।
    दोनों ऑंखें विपुल जल में डूबती जा रही थीं।
    शंकायें थीं विकल करती काँपता था कलेजा।
    खिन्ना दीना परम-मलिना उन्मना राधिका थीं॥53॥

    5. पंचम सर्ग
    मन्दाक्रान्ता छन्द

    तारे डूबे तम टल गया छा गई व्योम-लाली।
    पक्षी बोले तमचुर जगे ज्योति फैली दिशा में।
    शाखा डोली तरु निचय की कंज फूले सरों में।
    धीरे-धीरे दिनकर कढ़े तामसी रात बीती॥1॥
    फूली फैली लसित लतिका वायु में मन्द डोली।
    प्यारी-प्यारी ललित-लहरें भानुजा में विराजीं।
    सोने की सी कलित किरणें मेदिनी ओर छूटीं।
    कूलों कुंजों कुसुमित वनों में जगी ज्योति फैली॥2॥
    प्रात: शोभा ब्रज अवनि में आज प्यारी नहीं थी।
    मीठा-मीठा विहग रव भी कान को था न भाता।
    फूले-फूले कमल दव थे लोचनों में लगाते।
    लाली सारे गगन-तल की काल-व्याली समा थी॥3॥
    चिन्ता की सी कुटिल उठतीं अंक में जो तरंगें।
    वे थीं मानो प्रकट करतीं भानुजा की व्यथायें।
    धीरे-धीरे मृदु पवन में चाव से थी न डोली।
    शाखाओं के सहित लतिका शोक से कंपिता थी॥4॥
    फूलों-पत्तों सकल पर हैं वारि बूँदें दिखातीं।
    रोते हैं या विटप सब यों ऑंसुओं को दिखा के।
    रोई थी जो रजनि दुख से नंद की कामिनी के।
    ये बूँदें हैं, निपतित हुईं या उसी के दृगों से॥5॥
    पत्रों पुष्पों सहित तरु की डालियाँ औ लतायें।
    भींगी सी थीं विपुल जल में वारि-बूँदों भरी थीं।
    मानो फूटी सकल तन में शोक की अश्रुधारा।
    सर्वांगों से निकल उनको सिक्तता दे बही थी॥6॥
    धीरे-धीरे पवन ढिग जा फूलवाले द्रुमों के।
    शाखाओं से कुसुम-चय को थी धरा पै गिराती।
    मानो यों थी हरण करती फुल्लता पादपों की।
    जो थी प्यारी न ब्रज-जन को आज न्यारी व्यथा से॥7॥
    फूलों का यों अवनि-तल में देख के पात होना।
    ऐसी भी थी हृदय-तल में कल्पना आज होती।
    फूले-फूले कुसुम अपने अंक में से गिरा के।
    बारी-बारी सकल तरु भी खिन्नता हैं दिखाते॥8॥
    नीची-ऊँची सरित सर की बीचियाँ ओस बूँदें।
    न्यारी आभा वहन करती भानु की अंक में थीं।
    मानो यों वे हृदय-तल के ताप को थीं दिखाती।
    या दावा थी व्यथित उर में दीप्तिमाना दुखों की॥9॥
    सारा नीला-सलिल सरि का शोक-छाया पगा था।
    कंजों में से मधुप कढ़ के घूमते थे भ्रमे से।
    मानो खोटी-विरह-घटिका सामने देख के ही।
    कोई भी थी अवनत-मुखी कान्तिहीना मलीना॥10॥

    द्रुतविलम्बित छन्द

    प्रगट चिन्ह हुए जब प्रात के।
    सकल भूतल औ नभदेश में।
    जब दिशा सितता-युत हो चली।
    तममयी करके ब्रजभूमि को॥11॥
    मुख-मलीन किये दुख में पगे।
    अमित-मानव गोकुल ग्राम के।
    तब स-दार स-बालक-बालिका।
    व्यथित से निकले निज सद्म से॥12॥
    बिलखती दृग वारि विमोचती।
    यह विषाद-मयी जन-मण्डली।
    परम आकुलतावश थी बढ़ी।
    सदन ओर नराधिप नन्द के॥13॥
    उदय भी न हुए जब भानु थे।
    निकट नन्दनिकेतन के तभी।
    जन समागम ही सब ओर था।
    नयन गोचर था नरमुण्ड ही॥14॥

    वसन्ततिलका छन्द

    थे दीखते परम वृध्द नितान्त रोगी।
    या थी नवागत वधू गृह में दिखाती।
    कोई न और इनको तज के कहीं था।
    सूने सभी सदन गोकुल के हुए थे॥15॥
    जो अन्य ग्राम ढिग गोकुल ग्राम के थे।
    नाना मनुष्य उन ग्राम-निवासियों के।
    डूबे अपार-दुख-सागर में स-बामा।
    आके खड़े निकट नन्द-निकेत के थे॥16॥
    जो भूरि भूत जनता समवेत वाँ थी।
    सो कंस भूप भय से बहु कातरा थी।
    संचालिता विषमता करती उसे थी।
    संताप की विविध-संशय की दुखों की॥17॥
    नाना प्रसंग उठते जन-संघ में थे।
    जो थे सशंक सबको बहुश: बनाते।
    था सूखता धार औ कँपता कलेजा।
    चिन्ता अपार चित में चिनगी लगाती॥18॥
    रोना महा-अशुभ जान प्रयाण-काल।
    ऑंसू न ढाल सकती निज नेत्र से थी।
    रोये बिना न छन भी मन मानता था।
    डूबी दुविधा जलधि में जन मण्डली थी॥19॥

    मन्दाक्रान्ता छन्द

    आई बेला हरि-गमन की छा गई खिन्नता सी।
    थोड़े ऊँचे नलिनपति हो जा छिपे पादपों में।
    आगे सारे स्वजन करके साथ अक्रूर को ले।
    धीरे-धीरे सजनक कढ़े सद्म में से मुरारी॥20॥
    आते ऑंसू अति कठिनता से सँभाले दृगों के।
    होती खिन्ना हृदय-तल के सैकड़ों संशयों से।
    थोड़ा पीछे प्रिय तनय के भूरि शोकाभिभूता।
    नाना वामा सहित निकलीं गेह में से यशोदा॥21॥
    द्वारे आया ब्रज नृपति को देख यात्रा निमित्त।
    भोला-भाला निरख मुखड़ा फूल से लाडिलों का।
    खिन्ना दीना परम लख के नन्द की भामिनी को।
    चिन्ता डूबी सकल जनता हो उठी कम्पमाना॥22॥
    कोई रोया सलिल न रुका लाख रोके दृगों का।
    कोई आहें सदुख भरता हो गया बावला सा।
    कोई बोला सकल-ब्रज के जीवनाधार प्यारे।
    यों लोगों को व्यथित करके आज जाते कहाँ हो॥23॥
    रोता-धोता विकल बनता एक आभीर बूढ़ा।
    दीनों के से वचन कहता पास अक्रूर के आ।
    बोला कोई जतन जन को आप ऐसा बतावें।
    मेरे प्यार कुँवर मुझसे आज न्यारे न होवें॥24॥
    मैं बूढ़ा हूँ यदि कुछ कृपा आप चाहें दिखाना।
    तो मेरी है विनय इतनी श्याम को छोड़ जावें।
    हा! हा! सारी ब्रज अवनि का प्राण है लाल मेरा।
    क्यों जीयेंगे हम सब उसे आप ले जायँगे जो॥25॥
    रत्नों की है न तनिक कमी आप लें रत्न ढेरों।
    सोना चाँदी सहित धन भी गाड़ियों आप ले लें।
    गायें ले लें गज तुरग भी आप ले लें अनेकों।
    लेवें मेरे न निजधन को हाथ मैं जोड़ता हूँ॥26॥
    जो है प्यारी अवनि ब्रज की यामिनी के समाना।
    तो तातों के सहित सब गोपाल हैं तारकों से।
    मेरा प्यारा कुँवर उसका एक ही चन्द्रमा है।
    छा जावेगा तिमिर वह जो दूर होगा दृगों से॥27॥
    सच्चा प्यारा सकल ब्रज का वंश का है उँजाला।
    दीनों का है परमधन औ वृध्द का नेत्रतारा।
    बालाओं का प्रिय स्वजन औ बन्धु है बालकों का।
    ले जाते हैं सुरतरु कहाँ आप ऐसा हमारा॥28॥
    बूढ़े के ए वचन सुनके नेत्र में नीर आया।
    ऑंसू रोके परम मृदुता साथ अक्रूर बोले।
    क्यों होते हैं दुखित इतने मानिये बात मेरी।
    आ जावेंगे बिवि दिवस में आप के लाल दोनों॥29॥
    आई प्यारे निकट श्रम से एक वृध्दा-प्रवीणा।
    हाथों से छू कमल-मुख को प्यार से लीं बलायें।
    पीछे बोली दुखित स्वर से तू कहीं जा न बेटा।
    तेरी माता अहह कितनी बावली हो रही है॥30॥
    जो रूठेगा नृपति ब्रज का वास ही छोड़ दूँगी।
    ऊँचे-ऊँचे भवन तज के जंगलों में बसूँगी।
    खाऊँगी फूल फल दल को व्यंजनों को तजूँगी।
    मैं ऑंखों से अलग न तुझे लाल मेरे करूँगी॥31॥
    जाओगे क्या कुँवर मथुरा कंस का क्या ठिकाना।
    मेरा जी है बहुत डरता क्या न जाने करेगा।
    मानूँगी मैं न सुरपति को राज ले क्या करूँगी।
    तेरा प्यारा-वदन लख के स्वर्ग को मैं तजूँगी॥32॥
    जो चाहेगा नृपति मुझ से दंड दूँगी करोड़ों।
    लोटा-थाली सहित तन के वस्त्र भी बेंच दूँगी।
    जो माँगेगा हृदय वह तो काढ़ दूँगी उसे भी।
    बेटा, तेरा गमन मथुरा मैं न ऑंखों लखूँगी॥33॥
    कोई भी है न सुन सकता जा किसे मैं सुनाऊँ।
    मैं हूँ मेरा हृदयतल है हैं व्यथायें अनेकों।
    बेटा, तेरा सरल मुखड़ा शान्ति देता मुझे है।
    क्यों जीऊँगी कुँवर, बतला जो चला जायगा तू॥34॥
    प्यारे तेरा गमन सुन के दूसरे रो रहे हैं।
    मैं रोती हूँ सकल ब्रज है वारि लाता दृगों में।
    सोचो बेटा, उस जननि की क्या दशा आज होगी।
    तेरे जैसा सरल जिस का एक ही लाडिला है॥35॥
    प्राचीन की सदुख सुनके सर्व बातें मुरारी।
    दोनों ऑंखें सजल करके प्यार के साथ बोले।
    मैं आऊँगा कुछ दिन गये बाल होगा न बाँका।
    क्यों माता तू विकल इतना आज यों हो रही है॥36॥
    दौड़ा ग्वाला ब्रज नृपति के सामने एक आया।
    बोला गायें सकल बन को आप की हैं न जाती।
    दाँतों से हैं न तृण गहती हैं न बच्चे पिलाती।
    हा! हा! मेरी सुरभि सबको आज क्या हो गया है॥37॥
    देखो-देखो सकल हरि की ओर ही आ रही हैं।
    रोके भी हैं न रुक सकती बावली हो गई हैं।
    यों ही बातें सदुख कहके फूट के ग्वाल रोया।
    बोला मेरे कुँवर सब को यों रुला के न जाओ॥38॥
    रोता ही था जब वह तभी नन्द की सर्व गायें।
    दौड़ी आईं निकट हरि के पूँछ ऊँचा उठाये।
    वे थीं खिन्ना विपुल विकला वारि था नेत्र लाता।
    ऊँची ऑंखों कमल मुख थीं देखती शंकिता हो॥39॥
    काकातूआ महर-गृह के द्वार का भी दुखी था।
    भूला जाता सकल-स्वर था उन्मना हो रहा था।
    चिल्लाता था अति बिकल था औ यही बोलता था।
    यों लोगों को व्यथित करके लाल जाते कहाँ हो॥40॥
    पक्षी की औ सुरभि सब की देख ऐसी दशायें।
    थोड़ी जो थी अहह! वह भी धीरता दूर भागी।
    हा हा! शब्दों सहित इतना फूट के लोग रोये।
    हो जाती थी निरख जिसको भग्न छाती शिला की॥41॥
    आवेगों के सहित बढ़ता देख संताप-सिंधु।
    धीरे-धीरे ब्रज-नृपति से खिन्न अक्रूर बोले।
    देखा जाता ब्रज दुख नहीं शोक है वृध्दि पाता।
    आज्ञा देवें जननि पग छू यान पै श्याम बैठें॥42॥
    आज्ञा पाके निज जनक की, मान अक्रूर बातें।
    जेठे-भ्राता सहित जननी-पास गोपाल आये।
    छू माता के पग कमल को धीरता साथ बोले।
    जो आज्ञा हो जननि अब तो यान पै बैठ जाऊँ॥43॥
    दोनों प्यारे कुँवरवर के यों बिदा माँगते ही।
    रोके ऑंसू जननि दृग में एक ही साथ आयें।
    धीरे बोलीं परम दुख से जीवनाधार जाओ।
    दोनों भैया विधुमुख हमें लौट आके दिखाओ॥44॥
    धीरे-धीरे सु-पवन बहे स्निग्ध हों अंशुमाली।
    प्यारी छाया विटप वितरें शान्ति फैले वनों में।
    बाधायें हों शमन पथ की दूर हों आपदायें।
    यात्रा तेरी सफल सुत हो क्षेम से गेह आओ॥45॥
    ले के माता-चरणरज को श्याम औ राम दोनों।
    आये विप्रों निकट उनके पाँव की वन्दना की।
    भाई-बन्दों सहित मिलके हाथ जोड़ा बड़ों को।
    पीछे बैठे विशद रथ में बोध दे के सबों को॥46॥
    दोनों प्यारे कुँवर वर को यान पै देख बैठा।
    आवेगों से विपुल विवशा हो उठीं नन्दरानी।
    ऑंसू आते युगल दृग से वारि-धारा बहा के।
    बोलीं दीना सदृश पति से दग्ध हो हो दु:खों से॥47॥

    मालिनी छन्द

    अहह दिवस ऐसा हाय! क्यों आज आया।
    निज प्रियसुत से जो मैं जुदा हो रही हूँ।
    अगणित गुणवाली प्राण से नाथ प्यारी।
    यह अनुपम थाती मैं तुम्हें सौंपती हूँ॥48॥
    सब पथ कठिनाई नाथ हैं जानते ही।
    अब तक न कहीं भी लाडिले हैं पधारे।
    ‘मधुर फल खिलाना दृश्य नाना दिखाना।
    कुछ पथ-दुख मेरे बालकों को न होवे॥49॥
    खर पवन सतावे लाडिलों को न मेरे।
    दिनकर किरणों की ताप से भी बचाना।
    यदि उचित जँचे तो छाँह में भी बिठाना।
    मुख-सरसिज ऐसा म्लान होने न पावे॥50॥
    विमल जल मँगाना देख प्यासा पिलाना।
    कुछ क्षुधित हुए ही व्यंजनों को खिलाना।
    दिन वदन सुतों का देखते ही बिताना।
    विलसित अधरों को सूखने भी न देना॥51॥
    युग तुरग सजीले वायु से वेग वाले।
    अति अधिक न दौड़ें यान धीरे चलाना।
    बहु हिल कर हाहा कष्ट कोई न देवे।
    परम मृदुल मेरे बालकों का कलेजा॥52॥
    प्रिय! सब नगरों में वे कुबामा मिलेंगी।
    न सुजन जिनकी हैं वामता बूझ पाते।
    सकल समय ऐसी साँपिनों से बचाना।
    वह निकट हमारे लाडिलों के न आवें॥53॥
    जब नगर दिखाने के लिए नाथ जाना।
    निज सरल कुमारों को खलों से बचाना।
    संग-संग रखना औ साथ ही गेह लाना।
    छन सुअन दृगों से दूर होने न पावें॥54॥
    धनुष मख सभा में देख मेरे सुतों को।
    तनिक भृकुटि टेढ़ी नाथ जो कंस की हो।
    अवसर लख ऐसे यत्न तो सोच लेना।
    न कुपित नृप होवें औ बचें लाल मेरे॥55॥
    यदि विधिवश सोचा भूप ने और ही हो।
    यह विनय बड़ी ही दीनता से सुनाना।
    हम बस न सकेंगे जो हुई दृष्टि मैली।
    सुअन युगल ही हैं जीवनाधार मेरे॥56॥
    लख कर मुख सूखा सूखता है कलेजा।
    उर विचलित होता है विलोके दुखों के।
    शिर पर सुत के जो आपदा नाथ आई।
    यह अवनि फटेगी औ समा जाऊँगी मैं॥57॥
    जगकर कितनी ही रात मैंने बिताई।
    यदि तनिक कुमारों को हुई बेकली थी।
    यह हृदय हमारा भग्न कैसे न होगा।
    यदि कुछ दुख होगा बालकों को हमारे॥58॥
    कब शिशिर निशा के शीत को शीत जाना।
    थर-थर कँपती थी औ लिये अंक में थी।
    यदि सुखित न यों भी देखती लाल को थी
    सब रजनि खड़े औ घूमते ही बिताती॥59॥
    निज सुख अपने मैं ध्यान में भी न लाई।
    प्रिय सुत सुख ही से मैं सुखी हूँ कहाती।
    मुख तक कुम्हलाया नाथ मैंने न देखा।
    अहह दुखित कैसे लाडिले को लखूँगी॥60॥
    यह समझ रही हूँ और हूँ जानती ही।
    हृदय धन तुमारा भी यही लाडिला है।
    पर विवश हुई हूँ जी नहीं मानता है।
    यह विनय इसी से नाथ मैंने सुनाई॥61॥
    अब अधिक कहूँगी आपसे और क्या मैं।
    अनुचित मुझसे है नाथ होता बड़ा ही।
    निज युग कर जोड़े ईश से हूँ मनाती।
    सकुशल गृह लौटें आप ले लाडिलों को॥62॥

    मन्दाक्रान्ता छन्द

    सारी बातें अति दुखभरी नन्द अर्धाङ्गिनी की।
    लोगों को थीं व्यथित करती औ महा कष्ट देती।
    ऐसा रोई सकल-जनता खो बची धीरता को।
    भू में व्यापी विपुल जिससे शोक उच्छ्वासमात्रा॥63॥
    आविर्भूता गगन-तल में हो रही है निराशा।
    आशाओं में प्रकट दुख की मुर्तियाँ हो रही हैं।
    ऐसा जी में ब्रज-दुख-दशा देख के था समाता।
    भू-छिद्रों से विपुल करुणा-धार है फूटती सी॥64॥
    सारी बातें सदुख सुन के नन्द ने कामिनी को।
    प्यारे-प्यारे वचन कहके धीरता से प्रबोध।
    आई थी जो सकल जनता धर्य्य दे के उसे भी।
    वे भी बैठे स्वरथ पर जा साथ अक्रूर को ले॥65॥
    घेरा आके सकल जन ने यान को देख जाता।
    नाना बातें दुखमय कहीं पत्थरों को रुलाया।
    हाहा खाया बहु विनय की और कहा खिन्न हो के।
    जो जाते हो कुँवर मथुरा ले चलो तो सभी को॥66॥
    बीसों बैठे पकड़ रथ का चक्र दोनों करों से।
    रासें ऊँचे तुरग युग की थाम लीं सैकड़ों ने।
    सोये भू में चपल रथ के सामने आ अनेकों।
    जाना होता अति अप्रिय था बालकों का सबों को॥67॥
    लोगों को यों परम-दुख से देख उन्मत्त होता।
    नीचे आये उतर रथ के नन्द औ यों प्रबोध।
    क्यों होते हो विकल इतना यान क्यों रोकते हो।
    मैं ले दोनों हृदय धन को दो दिनों में फिरूँगा॥68॥
    देखो लोगों, दिन चढ़ गया धूप भी हो रही है।
    जो रोकोगे अधिक अब तो लाल को कष्ट होगा।
    यों ही बातें मृदुल कह के औ हटा के सबों को।
    वे जा बैठे तुरत रथ में औ उसे शीघ्र हाँका॥69॥
    दोनों तीखे तुरग उचके औ उड़े यान को ले।
    आशाओं में गगन-तल में हो उठा शब्द हाहा।
    रोये प्राणी सकल ब्रज के चेतनाशून्य से हो।
    संज्ञा खो के निपतित हुईं मेदिनी में यशोदा॥70॥
    जो आती थी पथरज उड़ी सामने टाप द्वारा।
    बोली जाके निकट उसके भ्रान्त सी एक बाला।
    क्यों होती है भ्रमित इतनी धूलि क्यों क्षिप्त तू है।
    क्या तू भी है विचलित हुई श्याम से भिन्न हो के॥71॥
    आ आ, आके लग हृदय से लोचनों में समा जा।
    मेरे अंगों पर पतित हो बात मेरी बना जा।
    मैं पाती हूँ सुख रज तुझे आज छूके करों से।
    तू आती है प्रिय निकट से क्लान्ति मेरी मिटा जा॥72॥
    रत्नों वाले मुकुट पर जा बैठती दिव्य होती।
    धूलि छा जाती अलक पर तू तो छटा मंजु पाती।
    धूलि तू है निपट मुझ सी भाग्यहीना मलीना।
    आभा वाले कमल-पग से जो नहीं जा लगी तू॥73॥
    जो तू जाके विशद रथ में बैठ जाती कहीं भी।
    किंवा तू जो युगल तुरगों के तनों में समाती।
    तो तू जाती प्रिय स्वजन के साथ ही शान्ति पाती।
    यों होहो के भ्रमित मुझ सी भ्रान्त कैसे दिखाती॥74॥
    हा! मैं कैसे निज हृदय की वेदना को बताऊँ।
    मेरे जी को मनुज तन से ग्लानि सी हो रही है।
    जो मैं होती तुरग अथवा यान ही या ध्वजा ही।
    तो मैं जाती कुँवर वर के साथ क्यों कष्ट पाती॥75॥
    बोली बाला अपर अकुला हा! सखी क्या कहूँ मैं।
    ऑंखों से तो अब रथ ध्वजा भी नहीं है दिखाती।
    है धूली ही गगन-तल में अल्प उदीयमाना।
    हा! उन्मत्ते! नयन भर तू देख ले धूलि ही को॥76॥
    जी होता है विकल मुँह को आ रहा है कलेजा।
    ज्वाला सी है ज्वलित उर में ऊबती मैं महा हूँ।
    मेरी आली अब रथ गया दूर ले साँवले को।
    हा! ऑंखों से न अब मुझको धूलि भी है दिखाती॥77॥
    टापों का नाद जब तक था कान में स्थान पाता।
    देखी जाती जब तक रही यान ऊँची पताका।
    थोड़ी सी भी जब तक रही व्योम में धूलि छाती।
    यों ही बातें विविध कहते लोग ऊबे खड़े थे॥78॥

    द्रुतविलम्बित छन्द

    तदुपरान्त महा दुख में पगी।
    बहु विलोचन वारि विमोचती।
    महरि को लख गेह सिधारती।
    गृह गई व्यथिता जनमंडली॥79॥

    मन्दाक्रान्ता छन्द

    धाता द्वारा सृजित जग में हो धारा मध्य आके।
    पाके खोये विभव कितने प्राणियों ने अनेकों।
    जैसा प्यारा विभव ब्रज ने हाथ से आज खोया।
    पाके ऐसा विभव वसुधा में न खोया किसी ने॥80॥

    6. षष्ठ सर्ग
    मन्दाक्रान्ता छन्द

    धीरे-धीरे दिन गत हुआ पद्मिनीनाथ डूबे।
    दोषा आई फिर गत हुई दूसरा वार आया।
    यों ही बीतीं विपुल घड़ियाँ औ कई वार बीते।
    कोई आया न मधुपुर से औ न गोपाल आये॥1॥
    ज्यों-ज्यों जाते दिवस चित का क्लेश था वृध्दिपाता।
    उत्कण्ठा थी अधिक बढ़ती व्यग्रता थी सताती!
    होतीं आके उदय उर में घोर उद्विग्नतायें।
    देखे जाते सकल ब्रज के लोग उद्भ्रान्त से थे॥2॥
    खाते-पीते गमन करते बैठते और सोते।
    आते-जाते वन अवनि में गोधनों को चराते।
    देते-लेते सकल ब्रज की गोपिका गोपजों के।
    जी में होता उदय यह था क्यों नहीं श्याम आये॥3॥
    दो प्राणी भी ब्रज-अवनि के साथ जो बैठते थे।
    तो आने की न मधुवन से बात ही थे चलाते।
    पूछा जाता प्रतिथल मिथ: व्यग्रता से यही था।
    दोनों प्यारे कुँवर अब भी लौट के क्यों न आये॥4॥
    आवासों में सुपरिसर में द्वार में बैठकों में।
    बाजारों में विपणि सब में मंदिरों में मठों में।
    आने ही की न ब्रजधन के बात फैली हुई थी।
    कुंजों में औ पथ अ-पथ में बाग में औ बनों में॥5॥
    आना प्यारे महरसुत का देखने के लिए ही।
    कोसों जाती प्रतिदिन चली मंडली उत्सुकों की।
    ऊँचे-ऊँचे तरु पर चढ़े गोप ढोटे अनेकों।
    घंटों बैठे तृषित दृग से पंथ को देखते थे॥6॥
    आके बैठी निज सदन की मुक्त ऊँची छतों में।
    मोखों में औ पथ पर बने दिव्य वातायनों में।
    चिन्तामग्ना विवश विकला उन्मना नारियों की।
    दो ही ऑंखें सहस बन के देखती पंथ को थीं॥7॥
    आके कागा यदि सदन में बैठता था कहीं भी।
    तो तन्वंगी उस सदन की यों उसे थी सुनाती।
    जो आते हो कुँवर उड़ के काक तो बैठ जा तू।
    मैं खाने को प्रतिदिन तुझे दूध औ भात दूँगी॥8॥
    आता कोई मनुज मथुरा ओर से जो दिखाता।
    नाना बातें सदुख उससे पूछते तो सभी थे।
    यों ही जाता पथिक मथुरा ओर भी जो जनाता।
    तो लाखों ही सकल उससे भेजते थे सँदेसे॥9॥
    फूलों पत्तों सकल तरुओं औ लता बेलियों से।
    आवासों से ब्रज अवनि से पंथ की रेणुओं से।
    होती सी थी यह ध्वनि सदा कुंज से काननों से।
    मेरे प्यारे कुँवर अब भी क्यों नहीं गेह आये॥10॥

    मालिनी छन्द

    यदि दिन कट जाता बीतती थी न दोषा।
    यदि निशि टलती थी वार था कल्प होता।
    पल-पल अकुलाती ऊबती थीं यशोदा।
    रट यह रहती थी क्यों नहीं श्याम आये॥11॥
    प्रति दिन कितनों को पंथ में भेजती थीं।
    निज प्रिय सुत आना देखने के लिए ही।
    नियत यह जताने के लिए थे अनेकों।
    सकुशल गृह दोनों लाडिले आ रहे हैं॥12॥
    दिन-दिन भर वे आ द्वार पै बैठती थीं।
    प्रिय पथ लखते ही वार को थीं बिताती।
    यदि पथिक दिखाता तो यही पूछती थीं।
    मम सुत गृह आता क्या कहीं था दिखाया॥13॥
    अति अनुपम मेवे औ रसीले फलों को।
    बहु ‘मधुर मिठाई दुग्ध को व्यंजनों को।
    पथश्रम निज प्यारे पुत्र का मोचने को।
    प्रतिदिन रखती थीं भाजनों में सजा के॥14॥
    जब कुँवर न आते वार भी बीत जाता।
    तब बहुत दुख पा के बाँट देती उन्हें थीं।
    दिन-दिन उर में थी वृध्दि पाती निराशा।
    तम निबिड़ दृगों के सामने हो रहा था॥15॥
    जब पुरबनिता आ पूछती थी सँदेसा।
    तब मुख उनका थीं देखती उन्मना हो।
    यदि कुछ कहना भी वे कभी चाहती थीं।
    न कथन कर पातीं कंठ था रुध्द होता॥16॥
    यदि कुछ समझातीं गेह की सेविकायें।
    बन विकल उसे थीं ध्यान में भी न लातीं।
    तन सुधि तक खोती जा रही थीं यशोदा।
    अतिशय बिमना औ चिन्तिता हो रही थीं॥17॥
    यदि दधि मथने को बैठती दासियाँ थीं।
    मथन-रव उन्हें था चैन लेने न देता।
    यह कह-कह के ही रोक देतीं उन्हें वे।
    तुम सब मिल के क्या कान को फोड़ दोगी॥18॥
    दुख-वश सब धंधो बन्द से हो गये थे।
    गृह जन मन मारे काल को थे बिताते।
    हरि-जननि-व्यथा से मौन थीं शारिकायें।
    सकल सदन में ही छा गई थी उदासी॥19॥
    प्रतिदिन कितने ही देवता थीं मनाती।
    बहु यजन कराती विप्र के वृन्द से थीं।
    नित घर पर कोई ज्योतिषी थीं बुलाती।
    निज प्रिय सुत आना पूछने को यशोदा॥20॥
    सदन ढिग कहीं जो डोलता पत्र भी था।
    निज श्रवण उठाती थीं समुत्कण्ठिता हो।
    कुछ रज उठती जो पंथ के मध्य यों ही।
    बन अयुत-दृगी तो वे उसे देखती थीं॥21॥
    गृह दिशि यदि कोई शीघ्रता साथ आता।
    तब उभय करों से थामतीं वे कलेजा।
    जब वह दिखलाता दूसरी ओर जाता।
    तब हृदय करों से ढाँपती थीं दृगों को॥22॥
    मधुवन पथ से वे तीव्रता साथ आता।
    यदि नभ-तल में थीं देख पाती पखेरू।
    उस पर कुछ ऐसी दृष्टि तो डालती थीं।
    लख कर जिसको था भग्न होता कलेजा॥23॥
    पथ पर न लगी थी दृष्टि ही उत्सुका हो।
    न हृदय तल ही की लालसा वर्ध्दिता थी।
    प्रतिपल करता था लाडिलों की प्रतीक्षा।
    यक यक तन रोऑं नँद की कामिनी का॥24॥
    प्रतिपल दृग देखा चाहते श्याम को थे।
    छन-छन सुधि आती श्याम मुर्ति की थी।
    प्रति निमिष यही थीं चाहती नन्दरानी।
    निज वदन दिखावे मेघ सी कान्तिवाला॥25॥

    मन्दाक्रान्ता छन्द

    रो रो चिन्ता-सहित दिन को राधिका थीं बिताती।
    ऑंखों को थीं सजल रखतीं उन्मना थीं दिखाती।
    शोभा वाले जलद-वपु की हो रही चातकी थीं।
    उत्कण्ठा थी परम प्रबला वेदना वर्ध्दिता थी॥26॥
    बैठी खिन्ना यक दिवस वे गेह में थीं अकेली।
    आके ऑंसू दृग-युगल में थे धारा को भिगोते।
    आई धीरे इस सदन में पुष्प-सद्गंधा को ले।
    प्रात: वाली सुपवन इसी काल वातायनों से॥27॥
    आके पूरा सदन उसने सौरभीला बनाया।
    चाहा सारा-कलुष तन का राधिका के मिटाना।
    जो बूँदें थीं सजल दृग के पक्ष्म में विद्यमाना।
    धीरे-धीरे क्षिति पर उन्हें सौम्यता से गिराया॥28॥
    श्री राधा को यह पवन की प्यार वाली क्रियायें।
    थोड़ी सी भी न सुखद हुईं हो गईं वैरिणी सी।
    भीनी-भीनी महँक मन की शान्ति को खो रही थी।
    पीड़ा देती व्यथित चित को वायु की स्निग्धता थी॥29॥
    संतापों को विपुल बढ़ता देख के दुखिता हो।
    धीरे बोलीं सदुख उससे श्रीमती राधिका यों।
    प्यारी प्रात: पवन इतना क्यों मुझे है सताती।
    क्या तू भी है कलुषित हुई काल की क्रूरता से॥30॥
    कालिन्दी के कल पुलिन पै घूमती सिक्त होती।
    प्यारे-प्यारे कुसुम-चय को चूमती गंध लेती।
    तू आती है वहन करती वारि के सीकरों को।
    हा! पापिष्ठे फिर किसलिए ताप देती मुझे है॥31॥
    क्यों होती है निठुर इतना क्यों बढ़ाती व्यथा है।
    तू है मेरी चिर परिचिता तू हमारी प्रिया है।
    मेरी बातें सुन मत सता छोड़ दे बामता को।
    पीड़ा खो के प्रणतजन की है बड़ा पुण्य होता॥32॥
    मेरे प्यारे नव जलद से कंज से नेत्रवाले।
    जाके आये न मधुवन से औ न भेजा सँदेसा।
    मैं रो-रो के प्रिय-विरह से बावली हो रही हूँ।
    जा के मेरी सब दु:ख-कथा श्याम को तू सुनादे॥33॥

    हो पाये जो न यह तुझसे तो क्रिया-चातुरी से।
    जाके रोने विकल बनने आदि ही को दिखा दे।
    चाहे ला दे प्रिय निकट से वस्तु कोई अनूठी।
    हा हा! मैं हूँ मृतक बनती प्राण मेरा बचा दे॥34॥
    तू जाती है सकल थल ही बेगवाली बड़ी है।
    तू है सीधी तरल हृदया ताप उन्मूलती है।
    मैं हूँ जी में बहुत रखती वायु तेरा भरोसा।
    जैसे हो ऐ भगिनि बिगड़ी बात मेरी बना दे॥35॥
    कालिन्दी के तट पर घने रम्य उद्यानवाला।
    ऊँचे-ऊँचे धवल-गृह की पंक्तियों से प्रशोभी।
    जो है न्यारा नगर मथुरा प्राणप्यारा वहीं है।
    मेरा सूना सदन तज के तू वहाँ शीघ्र ही जा॥36॥
    ज्यों ही मेरा भवन तज तू अल्प आगे बढ़ेगी।
    शोभावाली सुखद कितनी मंजु कुंजें मिलेंगी।
    प्यारी छाया मृदुल स्वर से मोह लेंगी तुझे वे।
    तो भी मेरा दुख लख वहाँ जा न विश्राम लेना॥37॥
    थोड़ा आगे सरस रव का धाम सत्पुष्पवाला।
    अच्छे-अच्छे बहु द्रुम लतावान सौन्दर्य्यशाली।
    प्यारा वृन्दाविपिन मन को मुग्धकारी मिलेगा।
    आना जाना इस विपिन से मुह्यमाना न होना॥38॥
    जाते-जाते अगर पथ में क्लान्त कोई दिखावे।
    तो जा के सन्निकट उसकी क्लान्तियों को मिटाना।
    धीरे-धीरे परस करके गात उत्ताप खोना।
    सद्गंधो से श्रमित जन को हर्षितों सा बनाना॥39॥
    संलग्ना हो सुखद जल के श्रान्तिहारी कणों से।
    ले के नाना कुसुम कुल का गंध आमोदकारी।
    निधधूली हो गमन करना उध्दता भी न होना।
    आते-जाते पथिक जिससे पंथ में शान्ति पावें॥40॥
    लज्जाशीला पथिक महिला जो कहीं दृष्टि आये।
    होने देना विकृत-वसना तो न तू सुन्दरी को।
    जो थोड़ी भी श्रमित वह हो गोद ले श्रान्ति खोना।
    होठों की औ कमल-मुख की म्लानतायें मिटाना॥41॥
    जो पुष्पों के ‘मधुर-रस को साथ सानन्द बैठे।
    पीते होवें भ्रमर भ्रमरी सौम्यता तो दिखाना।
    थोड़ा सा भी न कुसुम हिले औ न उद्विग्न वे हों।
    क्रीड़ा होवे न कलुषमयी केलि में हो न बाधा॥42॥
    कालिन्दी के पुलिन पर हो जो कहीं भी कढ़े तू।
    छू के नीला सलिल उसका अंग उत्ताप खोना।
    जी चाहे तो कुछ समय वाँ खेलना पंकजों से।
    छोटी-छोटी सु-लहर उठा क्रीड़ितों को नचाना॥43॥
    प्यारे-प्यारे तरु किसलयों को कभी जो हिलाना।
    तो हो जाना मृदुल इतनी टूटने वे न पावें।
    शाखापत्रों सहित जब तू केलि में लग्न हो तो।
    थोड़ा सा भी न दुख पहुँचे शावकों को खगों के ॥44॥
    तेरी जैसी मृदु पवन से सर्वथा शान्ति-कामी।
    कोई रोगी पथिक पथ में जो पड़ा हो कहीं तो।
    मेरी सारी दुखमय दशा भूल उत्कण्ठ होके।
    खोना सारा कलुष उसका शान्ति सर्वाङ्ग होना॥45॥
    कोई क्लान्ता कृषक ललना खेत में जो दिखावे।
    धीरे-धीरे परस उसकी क्लान्तियों को मिटाना।
    जाता कोई जलद यदि हो व्योम में तो उसे ला।
    छाया द्वारा सुखित करना, तप्त भूतांगना को॥46॥
    उद्यानों में सु-उपवन में वापिका में सरों में।
    फूलोंवाले नवल तरु में पत्र शोभा द्रुमों में।
    आते-जाते न रम रहना औ न आसक्त होना।
    कुंजों में औ कमल-कुल में वीथिका में वनों में॥47॥
    जाते-जाते पहुँच मथुरा-धाम में उत्सुका हो।
    न्यारी-शोभा वर नगर की देखना मुग्ध होना।
    तू होवेगी चकित लख के मेरु से मन्दिरों को।
    आभावाले कलश जिनके दूसरे अर्क से हैं॥48॥
    जी चाहे तो शिखर सम जो सद्य के हैं मुँडेरे।
    वाँ जा ऊँची अनुपम-ध्वजा अङ्क में ले उड़ाना।
    प्रासादों में अटन करना घूमना प्रांगणों में।
    उद्युक्ता हो सकल सुर से गेह को देख जाना॥49॥
    कुंजों बागों विपिन यमुना कूल या आलयों में।
    सद्गंधो से भरित मुख की वास सम्बन्ध से आ।
    कोई भौंरा विकल करता हो किसी कामिनी को।
    तो सद्भावों सहित उसको ताड़ना दे भगाना॥50॥
    तू पावेगी कुसुम गहने कान्तता साथ पैन्हे।
    उद्यानों में वर नगर के सुन्दरी मालिनों को।
    वे कार्यों में स्वप्रियतम के तुल्य ही लग्न होंगी।
    जो श्रान्ता हों सरस गति से तो उन्हें मोह लेना॥51॥
    जो इच्छा हो सुरभि तन के पुष्प संभार से ले।
    आते-जाते स-रुचि उनके प्रीतमों को रिझाना।
    ऐ मर्मज्ञे रहित उससे युक्तियाँ सोच होना।
    जैसे जाना निकट प्रिय के व्योम-चुम्बी गृहों के॥52॥
    देखे पूजा समय मथुरा मन्दिरों मध्य जाना।
    नाना वाद्यों ‘मधुर-स्वर की मुग्धता को बढ़ाना।
    किम्वा ले के रुचिर तरु के शब्दकारी फलों को।
    धीरे-धीरे ‘मधुररव से मुग्ध हो हो बजाना॥53॥
    नीचे फूले कुसुम तरु के जो खड़े भक्त होवें।
    किम्वा कोई उपल-गठिता-मूर्ति हो देवता की।
    तो डालों को परम मृदुता मंजुता से हिलाना।
    औ यों वर्षा कर कुसुम की पूजना पूजितों को॥54॥
    तू पावेगी वर नगर में एक भूखण्ड न्यारा।
    शोभा देते अमित जिसमें राज-प्रासाद होंगे।
    उद्यानों में परम-सुषमा है जहाँ संचिता सी।
    छीने लेते सरवर जहाँ वज्र की स्वच्छता हैं॥55॥
    तू देखेगी जलद-तन को जा वहीं तद्गता हो।
    होंगे लोने नयन उनके ज्योति-उत्कीर्णकारी।
    मुद्रा होगी वर-वदन की मूर्ति सी सौम्यता की।
    सीधे सीधे वचन उनके सिक्त होंगे सुधा से॥56॥
    नीले फूले कमल दल सी गात की श्यामता है।
    पीला प्यारा वसन कटि में पैन्हते हैं फबीला।
    छूटी काली अलक मुख की कान्ति को है बढ़ाती।
    सद्वस्त्त्रों में नवल-तन की फूटती सी प्रभा है॥57॥
    साँचे ढाला सकल वपु है दिव्य सौंदर्य्यशाली।
    सत्पुष्पों सी सुरभि उस की प्राण संपोषिका है।
    दोनों कंधो वृषभ-वर से हैं बड़े ही सजीले।
    लम्बी बाँहें कलभ-कर सी शक्ति की पेटिका हैं॥58॥
    राजाओं सा शिर पर लसा दिव्य आपीड़ होगा।
    शोभा होगी उभय श्रुति में स्वर्ण के कुण्डलों की।
    नाना रत्नाकलित भुज में मंजु केयूर होंगे।
    मोतीमाला लसित उनका कम्बु सा कंठ होगा॥59॥
    प्यारे ऐसे अपर जन भी जो वहाँ दृष्टि आवें।
    देवों के से प्रथित-गुण से तो उन्हें चीन्ह लेना।
    थोड़ी ही है वय तदपि वे तेजशाली बड़े हैं।
    तारों में है न छिप सकता कंत राका निशा का॥60॥
    बैठे होंगे जिस थल वहाँ भव्यता भूरि होगी।
    सारे प्राणी वदन लखते प्यार के साथ होंगे।
    पाते होंगे परम निधियाँ लूटते रत्न होंगे।
    होती होंगी हृदयतल की क्यारियाँ पुष्पिता सी॥61॥
    बैठे होंगे निकट जितने शान्त औ शिष्ट होंगे।
    मर्य्यादा का प्रति पुरुष को ध्यान होगा बड़ा ही।
    कोई होगा न कह सकता बात दुर्वृत्तता की।
    पूरा-पूरा प्रति हृदय में श्याम आतंक होगा॥62॥
    प्यारे-प्यारे वचन उनसे बोलते श्याम होंगे।
    फैली जाती हृदय-तल में हर्ष की बेलि होगी।
    देते होंगे प्रथित गुण वे देख सद्दृष्टि द्वारा।
    लोहा को छू कलित कर से स्वर्ण होंगे बनाते॥63॥
    सीधे जाके प्रथम गृह के मंजु उद्यान में ही।
    जो थोड़ी भी तन-तपन हो सिक्त होके मिटाना।
    निर्धूली हो सरस रज से पुष्प के लिप्त होना।
    पीछे जाना प्रियसदन में स्निग्धता से बड़ी ही॥64॥
    जो प्यारे के निकट बजती बीन हो मंजुता से।
    किम्वा कोई मुरज-मुरली आदि को हो बजाता।
    या गाती हो ‘मधुर स्वर से मण्डली गायकों की।
    होने पावे न स्वर लहरी अल्प भी तो विपिन्ना॥65॥
    जाते ही छू कमलदल से पाँव को पूत होना।
    काली-काली कलित अलकें गण्ड शोभी हिलाना।
    क्रीड़ायें भी ललित करना ले दुकूलादिकों को।
    धीरे-धीरे परस तन को प्यार की बेलि बोना॥66॥
    तेरे में है न यह गुण जो तू व्यथायें सुनाये।
    व्यापारों को प्रखर मति और युक्तियों से चलाना।
    बैठे जो हों निज सदन में मेघ सी कान्तिवाले।
    तो चित्रों को इस भवन के ध्यान से देख जाना॥67॥
    जो चित्रों में विरह-विधुरा का मिले चित्र कोई।
    तो जाके निकट उसको भाव से यों हिलाना।
    प्यारे हो के चकित जिससे चित्र की ओर देखें।
    आशा है यों सुरति उनका हो सकेगी हमारी॥68॥
    जो कोई भी इस सदन में चित्र उद्यान का हो।
    औ हों प्राणी विपुल उसमें घूमते बावले से।
    तो जाके सन्निकट उसके औ हिला के उसे भी।
    देवात्मा को सुरति ब्रज के व्याकुलों की कराना॥69॥
    कोई प्यारा-कुसुम कुम्हला गेह में जो पड़ा हो।
    तो प्यारे के चरण पर ला डाल देना उसी को।
    यों देना ऐ पवन बतला फूल सी एक बाला।
    म्लाना ही हो कमल पग को चूमना चाहती है॥70॥
    जो प्यारे मंजु-उपवन या वाटिका में खड़े हों।
    छिद्रों में जा क्वणित करना वेणु सा कीचकों को।
    यों होवेगी सुरति उनको सर्व गोपांगना की।
    जो हैं वंशी श्रवण रुचि से दीर्घ उत्कण्ठ होतीं॥71॥
    ला के फूले कमलदल को श्याम के सामने ही।
    थोड़ा-थोड़ा विपुल जल में व्यग्र हो हो डुबाना।
    यों देना ऐ भगिनि जतला एक अंभोजनेत्र।
    ऑंखों को हो विरह-विधुरा वारि में बोरती है॥72॥
    धीरे लाना वहन करके नीप का पुष्प कोई।
    औ प्यारे के चपल दृग के सामने डाल देना।
    ऐसे देना प्रकट दिखला नित्य आशंकिता हो।
    कैसी होती विरहवश मैं नित्य रोमांचिता हूँ॥73॥
    बैठे नीचे जिस विटप के श्याम होवें उसी का।
    कोई पत्ता निकट उनके नेत्र के ले हिलाना।
    यों प्यारे को विदित करना चातुरी से दिखाना।
    मेरे चिन्ता-विजित चित का क्लान्त हो काँप जाना॥74॥
    सूखी जाती मलिन लतिका जो धरा में पड़ी हो।
    तो पाँवों के निकट उसको श्याम के ला गिराना।
    यों सीधे से प्रकट करना प्रीति से वंचिता हो।
    मेरा होना अति मलिन औ सूखते नित्य जाना॥75॥
    कोई पत्ता नवल तरु का पीत जो हो रहा हो।
    तो प्यारे के दृग युगल के सामने ला उसे ही।
    धीरे-धीरे सँभल रखना औ उन्हें यों बताना।
    पीला होना प्रबल दुख से प्रोषिता सा हमारा॥76॥
    यों प्यारे को विदित करके सर्व मेरी व्यथायें।
    धीरे-धीरे वहन करके पाँव की धूलि लाना।
    थोड़ी सी भी चरणरज जो ला न देगी हमें तू।
    हा! कैसे तो व्यथित चित को बोध मैं दे सकूँगी॥77॥
    जो ला देगी चरणरज तो तू बड़ा पुण्य लेगी।
    पूता हूँगी भगिनि उसको अंग में मैं लगाके।
    पोतूँगी जो हृदय तल में वेदना दूर होगी।
    डालूँगी मैं शिर पर उसे ऑंख में ले मलूँगी॥78॥
    तू प्यारे का मृदुल स्वर ला मिष्ट जो है बड़ा ही।
    जो यों भी है क्षरण करती स्वर्ग की सी सुधा को।
    थोड़ा भी ला श्रवणपुट में जो उसे डाल देगी।
    मेरा सूखा हृदयतल तो पूर्ण उत्फुल्ल होगा॥79॥
    भीनी-भीनी सुरभि सरसे पुष्प की पोषिका सी।
    मूलीभूता अवनितल में कीर्ति कस्तूरिका की।
    तू प्यारे के नवलतन की वास ला दे निराली।
    मेरे ऊबे व्यथित चित में शान्तिधारा बहा दे॥80॥
    होते होवें पतित कण जो अंगरागादिकों के।
    धीरे-धीरे वहन करके तू उन्हीं को उड़ा ला।
    कोई माला कलकुसुम की कंठसंलग्न जो हो।
    तो यत्नों से विकच उसका पुष्प ही एक ला दे॥81॥
    पूरी होवें न यदि तुझसे अन्य बातें हमारी।
    तो तू मेरी विनय इतनी मान ले औ चली जा।
    छू के प्यारे कमलपग को प्यार के साथ आ जा।
    जी जाऊँगी हृदयतल में मैं तुझी को लगाके॥82॥
    भ्रांता हो के परम दुख औ भूरि उद्विग्नता से।
    ले के प्रात: मृदुपवन को या सखी आदिकों को।
    यों ही राधा प्रगट करतीं नित्य ही वेदनायें।
    चिन्तायें थीं चलित करती वर्ध्दिता थीं व्यथायें॥83॥

    7. सप्तम सर्ग
    मन्दाक्रान्ता छन्द

    ऐसा आया यक दिवस जो था महा मर्म्मभेदी।
    धाता ने हो दुखित भव के चित्रितों को विलोका।
    धीरे-धीरे तरणि निकला काँपता दग्ध होता।
    काला-काला ब्रज-अवनि में शोक का मेघ छाया॥1॥
    देखा जाता पथ जिन दिनों नित्य ही श्याम का था।
    ऐसा खोटा यक दिन उन्हीं वासरों मध्य आया।
    ऑंखें नीची जिस दिन किये शोक में मग्न होते।
    देखा आते सकल-ब्रज ने नन्द गोपादिकों को॥2॥
    खो के होवे विकल जितना आत्म-सर्वस्व कोई।
    होती हैं खो स्वमणि जितनी सर्प को वेदनायें।
    दोनों प्यारे कुँवर तज के ग्राम में आज आते।
    पीड़ा होती अधिक उससे गोकुलाधीश को थी॥3॥
    लज्जा से वे प्रथित-पथ में पाँव भी थे न देते।
    जी होता था व्यथित हरि का पूछते ही सँदेसा।
    वृक्षों में हो विपथ चल वे आ रहे ग्राम में थे।
    ज्यों-ज्यों आते निकट महि के मध्य जाते गड़े थे॥4॥
    पाँवों को वे सँभल बल के साथ ही थे उठाते।
    तो भी वे थे न उठ सकते हो गये थे मनों के।
    मानो यों वे गृह गमन से नन्द को रोकते थे।
    संक्षुब्ध हो सबल बहती थी जहाँ शोक-धारा॥5॥
    यानों से हो पृथक तज के संग भी साथियों का।
    थोड़े लोगों सहित गृह की ओर वे आ रहे थे।
    विक्षिप्तों सा वदन उनका आज जो देख लेता।
    हो जाता था वह व्यथित औ था महा कष्ट पाता॥6॥
    आँसू लाते कृशित दृग से फूटती थी निराशा।
    छाई जाती वदन पर भी शोक की कालिमा थी।
    सीधे जो थे न पग पड़ते भूमि में वे बताते।
    चिन्ता द्वारा चलित उनके चित्त की वेदनायें॥7॥
    भादोंवाली भयद रजनी सूचि-भेद्या अमा की।
    ज्यों होती है परम असिता छा गये मेघ-माला।
    त्योंही सारे ब्रज-सदन का हो गया शोक गाढ़ा।
    तातों वाले ब्रज नृपति को देख आता अकेले॥8॥
    एकाकी ही श्रवण करके कंत को गेह आता।
    दौड़ी द्वारे जननि हरि की क्षिप्त की भाँति आईं।
    वोहीं आये ब्रज अधिप भी सामने शोक-मग्न।
    दोनों ही के हृदयतल की वेदना थी समाना॥9॥
    आते ही वे निपतित हुईं छिन्न मूला लता सी।
    पाँवों के सन्निकट पति के हो महा खिद्यमाना।
    संज्ञा आई फिर जब उन्हें यत्न द्वारा जनों के।
    रो रो हो हो विकल पति से यों व्यथा साथ बोलीं॥10॥

    मालिनी छन्द

    प्रिय-पति वह मेरा प्राणप्यारा कहाँ है।
    दुख-जलधि निमग्ना का सहारा कहाँ है।
    अब तक जिसको मैं देख के जी सकी हूँ।
    वह हृदय हमारा नेत्र-तारा कहाँ है॥11॥
    पल-पल जिसके मैं पंथ को देखती थी।
    निशि-दिन जिसके ही ध्यान में थी बिताती।
    उर पर जिसके है सोहती मंजुमाला।
    वह नवनलिनी से नेत्रवाला कहाँ है॥12॥
    मुझ विजित-जरा का एक आधार जो है।
    वह परम अनूठा रत्न सर्वस्व मेरा।
    धन मुझ निधनी का लोचनों का उँजाला।
    सजल जलद की सी कान्तिवाला कहाँ है॥13॥
    प्रतिदिन जिसको मैं अंक में नाथ ले के।
    विधि लिखित कुअंकों की क्रिया कीलती थी।
    अति प्रिय जिसको हैं वस्त्र पीला निराला।
    वह किसलय के से अंगवाला कहाँ है॥14॥
    वर-वदन विलोके फुल्ल अंभोज ऐसा।
    करतल-गत होता व्योम का चंद्रमा था।
    मृदु-रव जिसका है रक्त सूखी नसों का।
    वह मधु-मय-कारी मानसों का कहाँ है॥15॥
    रस-मय वचनों से नाथ जो गेह मध्य।
    प्रति दिवस बहाता स्वर्ग-मंदाकिनी था।
    मम सुकृति धरा का स्रोत जो था सुधा का।
    वह नव-घन न्यारी श्यामता का कहाँ है॥16॥
    स्वकुल जलज का है जो समुत्फुल्लकारी।
    मम परम-निराशा-यामिनी का विनाशी।
    ब्रज-जन विहगों के वृन्द का मोद-दाता।
    वह दिनकर शोभी रामभ्राता कहाँ है॥17॥
    मुख पर जिसके है सौम्यता खेलती सी।
    अनुपम जिसका हूँ शील सौजन्य पाती।
    परदुख लख के है जो समुद्विग्न होता।
    वह कृति सरसी का स्वच्छ सोता कहाँ है॥18॥
    निविड़तम निराशा का भरा गेह में था।
    वह किस विधु मुख की कान्ति को देख भागा।
    सुखकर जिससे है कामिनी जन्म मेरा।
    वह रुचिकर चित्रों का चितेरा कहाँ है॥19॥
    सह कर कितने ही कष्ट औ संकटों को।
    बहु यजन कराके पूज के निर्जरों को।
    यक सुअन मिला है जो मुझे यत्न द्वारा।
    प्रियतम! वह मेरा कृष्ण प्यारा कहाँ है॥20॥
    मुखरित करता जो सद्म को था शुकों सा।
    कलरव करता था जो खगों सा वनों में।
    सुध्वनित पिक सा जो वाटिका को बनाता।
    वह बहु विधा कंठों का विधाता कहाँ है॥21॥
    सुन स्वर जिसका थे मत्त होते मृगादि।
    तरुगण-हरियाली थी महा दिव्य होती।
    पुलकित बन जाती थी लसी पुष्प-क्यारी।
    उस कल मुरली का नादकारी कहाँ है॥22॥
    जिस प्रिय वर को खो ग्राम सूना हुआ है।
    सदन सदन में हा! छा गई है उदासी।
    तम वलित मही में है न होता उँजाला।
    वह निपट निराली कान्तिवाला कहाँ है॥23॥
    वन-वन फिरती हैं खिन्न गायें अनेकों।
    शुक भर-भर ऑंखें गेह को देखता है।
    सुधि कर जिसकी है शारिका नित्य रोती।
    वह श्रुचि रुचि स्वाती मंजु मोती कहाँ है॥24॥
    गृह-गृह अकुलाती गोप की पत्नियाँ हैं।
    पथ-पथ फिरते हैं ग्वाल भी उन्मना हो।
    जिस कुँवर बिना मैं हो रही हूँ अधीरा।
    वह छवि खनि शोभी स्वच्छ हीरा कहाँ है॥25॥
    मम उर कँपता था कंस-आतंक ही से।
    पल-पल डरती थी क्या न जाने करेगा।
    पर परम-पिता ने की बड़ी ही कृपा है।
    वह निज कृत पापों से पिसा आप ही जो॥26॥
    अतुलित बलवाले मल्ल कूटादि जो थे।
    वह गज गिरि ऐसा लोक-आतंक-कारी।
    अनु दिन उपजाते भीति थोड़ी नहीं थे।
    पर यमपुर-वासी आज वे हो चुके हैं॥27॥
    भयप्रद जितनी थीं आपदायें अनेकों।
    यक यक करके वे हो गईं दूर यों ही।
    प्रियतम! अनसोची ध्यान में भी न आई।
    यह अभिनव कैसी आपदा आ पड़ी है॥28॥
    मृदु किसलय ऐसा पंकजों के दलों सा।
    वह नवल सलोने गात का तात मेरा।
    इन सब पवि ऐसे देह के दानवों का।
    कब कर सकता था नाथ कल्पान्त में भी॥29॥
    पर हृदय हमारा ही हमें है बताता।
    सब शुभ-फल पाती हूँ किसी पुण्य ही का।
    वह परम अनूठा पुण्य ही पापनाशी।
    इस कुसमय में है क्यों नहीं काम आता॥30॥
    प्रिय-सुअन हमारा क्यों नहीं गेह आया।
    वर नगर छटायें देख के क्या लुभाया?।
    वह कुटिल जनों के जाल में जा पड़ा है।
    प्रियतम! उसको या राज्य का भोग भाया॥31॥
    ‘मधुर वचन से औ भक्ति भावादिकों से।
    अनुनय विनयों से प्यार की उक्तियों से।
    सब मधुपुर-वासी बुध्दिशाली जनों ने।
    अतिशय अपनाया क्या ब्रजाभूषणों को?॥32॥
    बहु विभव वहाँ का देख के श्याम भूला।
    वह बिलम गया या वृन्द में बालकों के।
    फँस कर जिसमें हा! लाल छूटा न मेरा।
    सुफलक-सुत ने क्या जाल कोई बिछाया॥33॥
    परम शिथिल हो के पंथ की क्लान्तियों से।
    वह ठहर गया है क्या किसी वाटिका में।
    प्रियतम! तुम से या दूसरों से जुदा हो।
    वह भटक रहा है क्या कहीं मार्ग ही में॥34॥
    विपुल कलित कुंजें भानुजा कूलवाली।
    अतुलित जिनमें थी प्रीति मेरे प्रियों की।
    पुलकित चित से वे क्या उन्हीं में गये हैं।
    कतिपय दिवसों की श्रान्ति उन्मोचने को॥35॥
    विविध सुरभिवाली मण्डली बालकों की।
    मम युगल सुतों ने क्या कहीं देख पाई।
    निज सुहृद जनों में वत्स में धेनूओं में।
    बहु बिलम गये वे क्या इसी से न आये?॥36॥
    निकट अति अनूठे नीप फूले फले के।
    कलकल बहती जो धार है भानुजा की।
    अति-प्रिय सुत को है दृश्य न्यारा वहाँ का।
    वह समुद उसे ही देखने क्या गया है?॥37॥
    सित सरसिज ऐसे गात के श्याम भ्राता।
    यदुकुल जन हैं औ वंश के हैं उँजाले।
    यदि वह कुलवालों के कुटुम्बी बने तो।
    सुत सदन अकेले ही चला क्यों न आया॥38॥
    यदि वह अति स्नेही शील सौजन्य शाली।
    तज कर निज भ्राता को नहीं गेह आया।
    ब्रजअवनि बता दो नाथ तो क्यों बसेगी।
    यदि बदन विलोकूँगी न मैं क्यों बचूँगी॥39॥
    प्रियतम! अब मेरा कंठ में प्राण आया।
    सच-सच बतला दो प्राण प्यारा कहाँ है?।
    यदि मिल न सकेगा जीवनाधार मेरा।
    तब फिर निज पापी प्राण मैं क्यों रखूँगी॥40॥
    विपुल धन अनेकों रत्न हो साथ लाये।
    प्रियतम! बतला दो लाल मेरा कहाँ है।
    अगणित अनचाहे रत्न ले क्या करूँगी।
    मम परम अनूठा लाल ही नाथ ला दो॥41॥
    उस वर-धन को मैं माँगती चाहती हूँ।
    उपचित जिससे है वंश की बेलि होती।
    सकल जगत प्राणी मात्रा का बीज जो है।
    भव-विभव जिसे खो है वृथा ज्ञात होता॥42॥
    इन अरुण प्रभा के रंग के पाहनों की।
    प्रियतम! घर मेरे कौन सी न्यूनता है।
    प्रति पल उर में है लालसा वर्ध्दमाना।
    उस परम निराले लाल के लाभ ही की॥43॥
    युग दृग जिससे हैं स्वर्ग सी ज्योति पाते।
    उर तिमिर भगाता जो प्रभापुंज से है।
    कल द्युति जिसकी है चित्त उत्ताप खोती।
    वह अनुपम हीरा नाथ मैं चाहती हूँ॥44॥
    कटि-पट लख पीले रत्न दूँगी लुटा मैं।
    तन पर सब नीले रत्न को वार दूँगी।
    सुत-मुख-छवि न्यारी आज जो देख पाऊँ।
    बहु अपर अनूठे रत्न भी बाँट दूँगी॥45॥
    धन विभव सहस्रों रत्न संतान देखे।
    रज कण सम हैं औ तुच्छ हैं वे तृणों से।
    पति इन सबको त्यों पुत्र को त्याग लाये।
    मणि-गण तज लावे गेह ज्यों काँच कोई॥46॥
    परम-सुयश वाले कोशलाधीश ही हैं।
    प्रिय-सुत बन जाते ही नहीं जी सके जो।
    वह हृदय हमारा बज्र से ही बना है।
    वह तुरत नहीं जो सैकड़ों खंड होता॥47॥
    निज प्रिय मणि को जो सर्प खोता कभी है।
    तड़प-तड़प के तो प्राण है त्याग देता।
    मम सदृश मही में कौन पापीयसी है।
    हृदय-मणि गँवा के नाथ जो जीविता हूँ॥48॥
    लघुतर-सफरी भी भाग्य वाली बड़ी है।
    अलग सलिल से हो प्राण जो त्यागती है।
    अहह अवनि में मैं हूँ महा भाग्यहीना।
    अब तक बिछुड़े जो लाल के जी सकी हूँ॥49॥
    परम पतित मेरे पातकी-प्राण ए हैं।
    यदि तुरत नहीं हैं गात को त्याग देते।
    अहह दिन न जानें कौन सा देखने को।
    दुखमय तन में ए निर्म्ममों से रुके हैं॥50॥
    विधिवश इन में हा! शक्ति बाकी नहीं है।
    तन तज सकने की हो गये क्षीण ऐसे।
    वह इस अवनी में भाग्यवाली बड़ी है।
    अवसर पर सोवे मृत्यु के अंक में जो॥51॥
    बहु कलप चुकी हूँ दग्ध भी हो चुकी हूँ।
    जग कर कितनी ही रात में रो चुकी हूँ।
    अब न हृदय में है रक्त का लेश बाकी।
    तन बल सुख आशा मैं सभी खो चुकी हूँ॥52॥
    विधु मुख अवलोके मुग्ध होगा न कोई।
    न सुखित ब्रजवासी कान्ति को देख होंगे।
    यह अवगत होता है सुनी बात द्वारा।
    अब बह न सकेगी शान्ति-पीयूष धारा॥53॥
    सब दिन अति-सूना ग्राम सारा लगेगा।
    निशि दिवस बड़ी ही खिन्नता से कटेंगे।
    समधिक ब्रज में जो छा गई है उदासी।
    अब वह न टलेगी औ सदा ही खलेगी॥54॥
    बहुत सह चुकी हूँ और कैसे सहूँगी।
    पवि सदृश कलेजा मैं कहाँ पा सकूँगी।
    इस कृशित हमारे गात को प्राण त्यागो।
    बन विवश नहीं तो नित्य रो रो मरूँगी॥55॥

    मन्दाक्रान्ता छन्द

    हा! वृध्दा के अतुल धन हो! वृध्दता के सहारे।
    हा! प्राणों के परम-प्रिय हा! एक मेरे दुलारे।
    हा! शोभा के सदन सम हा! रूप लावण्यवाले।
    हा! बेटा हा! हृदय-धन हा! नेत्र-तारे हमारे॥56॥
    कैसे होके अलग तुझसे आज भी मैं बची हूँ।
    जो मैं ही हूँ समझ न सकी तो तुझे क्यों बताऊँ।
    हाँ जीऊँगी न अब, पर है वेदना एक होती।
    तेरा प्यारा वदन मरती बार मैंने न देखा॥57॥
    यों ही बातें स-दुख कहते अश्रुधारा बहाते।
    धीरे-धीरे यशुमति लगीं चेतना-शून्य होने।
    जो प्राणी थे निकट उनके या वहाँ, भीत होके।
    नाना यत्नों सहित उनको वे लगे बोध देने॥58॥
    आवेगों से बहु विकल तो नन्द थे पूर्व ही से।
    कान्ता को यों व्यथित लख के शोक में और डूबे।
    बोले ऐसे वचन जिनसे चित्त में शान्ति आवे।
    आशा होवे उदय उर में नाश पावे निराशा॥59॥
    धीरे-धीरे श्रवण करके नन्द की बात प्यारी।
    जाते जो थे वपुष तज के प्राण वे लौट आये।
    ऑंखें खोलीं हरि-जननि ने कष्ट से, और बोलीं।
    क्या आवेगा कुँवर ब्रज में नाथ दो ही दिनों में॥60॥
    सारी बातें व्यथित उर की भूल के नन्द बोले।
    हाँ आवेगा प्रिय-सुत प्रिये गेह दो ही दिनों में।
    ऐसी बातें कथन कितनी और भी नन्द ने कीं।
    जैसे-तैसे हरि-जननि को धीरता से प्रबोध॥61॥
    जैसे स्वाती सलिल-कण पा वृष्टि का काल बीते।
    थोड़ी सी है परम तृषिता चातकी शान्ति पाती।
    वैसे आना श्रवण करके पुत्र का दो दिनों में।
    संज्ञा खोती यशुमति हुईं स्वल्प आश्वासिता सी॥62॥
    पीछे बातें कलप कहती काँपती कष्ट पाती।
    आईं लेके स्वप्रिय पति को सद्म में नंद-वामा।
    आशा की है अमित महिमा धन्य है दिव्य आशा।
    जो छू के है मृतक बनते प्राणियों को जिलाती॥63॥

    8. अष्टम सर्ग
    मन्दाक्रान्ता छन्द

    यात्रा पूरी स-दुख करके गोप जो गेह आये।
    सारी-बातें प्रकट ब्रज में कष्ट से कीं उन्होंने।
    जो आने की विवि दिवस म%E