सिनेमा और सेंसर

फिल्म समीक्षक अजय ब्रम्हात्ज्म के अनुसार …..  ‘एक ऐसा देश जिसके संविधान से हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी मिली हुई है, उस देश में किसी प्रकार के सेंसर की जरूरत भी है क्या ? देश के जागरुक फिल्मकार,दर्शक और नागरिक यह सवाल उठाते रहे हैं । समय-समय पर जिस प्रकार से फिल्में प्रतिबंधित की जाती हैं, उनसे इस सवाल की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। दूसरी तरफ, समाज का एक तबका मानता है कि अर्धशिक्षित भारतीय समाज में सेंसर की अनिवार्यता बनी रहेगी’ | 

 गांधी जी ने  एक बार सेंसरशिप को अपने अंदाज़ में परिभाषित करते हुए कहा था, इफ यू डोंट लाइक समथिंग, क्लोज़ योर आइज़ |  साउथ फिल्मों का सेंसर बोर्ड इस फलसफे के दोनों पहलुओं का इस्तेमाल करता है | अपने मुताबिक़ आंखें खोलता और बंद करता है | शायद इसीलिए इसे आए दिन क़ानूनी तमाचे पड़ते   रहते हैं | अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मे दायित्व का बोध भी स्पष्टत: निहित है| यह दूसरी बात है की उसका निर्वाह कम ही लोग करना चाहते है | विश्व का शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां किसी अभिव्यक्ति को किसी न किसी आधार पर कभी ना कभी प्रतिबंधित न किया गया हो |  1970 में एक मामले की सुनवाई में न्यायालय ने भी माना था कि सेंसर के मामले में सरकारी दखल जरूरी है।

सेंसर बोर्ड का प्रमुख कार्य स्वस्थ मनोरंजन और शिक्षा के लिए फिल्मों को प्रमाण पत्र देना है। भारत में चार कैटेगरी में प्रमाण पत्र दिए जाते हैं- यू,यूए,ए और एस । फिल्म के कंटेंट के आधार पर अभी फिल्मों को यू (यूनिवर्सल), ए (एडल्ट), यूए (पैरेंटल गाइडेंस) या एस (स्पेशल) सर्टिफिकेट दिए जाते हैं। इतिहास में जाएं तो भारत में फिल्मों को लकर पहली सेंसर नीति 1918 में बनी थी। तब अंग्रेजों का शासन था। भारत में सिनेमा को आए पांच साल हो गए थे। अंग्रेज शासकों को खतरा था की फिल्मों से स्वतंत्रता की राष्ट्रीय भावनाएं फैलायी जा सकती हैं। तब जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारी मिल कर तय करते थे कि फिल्मों को प्रदर्शन की अनुमति दी जाए या नहीं? उनका सारा जोर इसी पर रहता था कि फिल्मों में अंग्रेजो के खिलाफ कोई संदेश न हो,जबकि फिल्मकार राष्ट्रीय भावनाओं के बातें कहने और दिखाने के अप्रत्यक्ष तरीके खोज निकालते थे। आजादी के पहले अनेक फिल्में राष्ट्रीय भावनाओं के प्रचार-प्रसार की वजह से प्रतिबंधित भी की गईं।

सिनेमा जब जब अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त करना चाहता है या करता तो सेंसरशिप उस अभिव्यक्ति की गले की फांस बन कर सामने होता है | आखिर क्योकि नहीं सेंसरशिप के ऐसे मानदंड बनाए जाते जो स्वयं मे उच्चस्तरीय हो | जिनहे निर्देशक स्वतः मानकर ही फिल्म का निर्माण करे | गौर करें तो अब सेंसर बोर्ड का मुख्य काम शालीनता और नैतिकता का पालन करवाना रह गया है। धूम्रपान,मदिरापान,अंग प्रदर्शन,चुंबन,अश्लीलता,हिंसा,गाली,गोली आदि की मात्रा और पात्रता ही अधिकारी जांचते रहते हैं। बॉलीवुड में समय-समय पर ऐसी कई फिल्में  बनीं, जिनमें कई ‘बोल्ड  सीन’ फिल्माए गए. इनमें से कई फिल्मों ने बेजोड़ व कलात्मिक फिल्मांकन की वजह से दर्शकों की तारीफें बटोरीं. कई फिल्में अर्द्धनग्न दृश्यों के कारण बुद्धिजीवियों की आलोचना का शिकार हुईं और ‘सेंसर बोर्ड’ की ओर उंगलियां उठीं | 

पर बॉलीवुड ने इस तरह की आपत्तियों को यह कहकर खारिज कर दिया कि यह सीन तो कहानी की डिमांड है |

सेंसर की कार्यप्रणाली पर अगर शंका व्यक्त करते हुए कहा जाए तो देखने को मिलता है हाल ही मे बनी फिल्म विश्वरूपम को सेंसर बोर्ड ने पास किया था और तत्कालीन केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) की अध्यक्षा लीला सैमसन ‘विश्वरूपम’ पर रोक लगने से अचम्भित थी और उन्होंने कहा था कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है। और वही डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम की विवादास्पद फिल्म ‘मैसेंजर ऑफ गॉड’ (एमएसजी) को मंजूरी मिलने की खबरों के बीच सेंसर बोर्ड प्रमुख लीला सैमसन ने इस्तीफा देने का फैसला करती है | तो कहीं न कहीं यह अभिव्यक्ति कि स्वतन्त्रता का हनन ही है | एक और बड़ा सवाल ये उठता है कि जब फिल्म विश्वरूपम के किसी दृश्य पर किसी डॉयलाग पर सेंसर बोर्ड ने आपत्ति नहीं जतायी और फिल्म को हरी झंडी दे दी तो फिर आखिर क्यों राज्य सरकार ने सेंसर बोर्ड के फैसले का सम्मान नहीं किया और फिल्म की रिलीज पर रोक लगा दी.. ?
अगर राज्य सरकार को ही सब कुछ तय करना है तो फिर सेंसर बोर्ड की जरूरत ही क्या है.. ?       हालांकि ऐसी फिल्मों को प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए जिसमें समुदाय विशेष को निशाना बनाया गया हो या फिर ऐसे दृश्य या डॉयलाग हों जो समाज के लिए खतरा हों या समाज में वैमनस्य पैदा करते हों लेकिन सेंसर बोर्ड एक जिम्मेदार संस्था है और जब वह किसी फिल्म को प्रमाणित कर रहा है तो फिर सवाल नहीं उठने चाहिए। हालांकि संविधान के चतुर्थ भाग में सन्निहित राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों, में संविधान की प्रस्तावना में प्रस्तावित आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना हेतु मार्गदर्शन के लिए राज्य को निदेश दिए गए हैं | अनुच्छेद51 के अनुसार, राज्य को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के संवर्धन हेतु प्रयास करने चाहिएं |तथा  अनुच्छेद 51 ए के अंतर्गत राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रीय गीत का सम्मान करने का अनुदेश दिया गया है |

एक और फिल्म जो पोर्न स्टार सनी लियोन की पहली हिंदी फिल्म थी, जिस्म 2 के प्रोमो देख ही समझ में आ गया था कि सेंसर बोर्ड फिल्म को पास करने में व्यवधान पैदा करेगा और ऐसा ही हुआ। अनसेंसर्ड प्रोमो को इंटरनेट पर लोड करने के बाद फिल्म की निर्माता-निर्देशक पूजा भट्ट मान रही थी कि इस समय उदार हो गया सेंसर बोर्ड आंख मूंदकर उनकी फिल्म को सर्टिफिकेट दे देगा। वे ‘ए’ (केवल वयस्कों के लिए) सर्टिफिकेट के लिए तैयार थीं, लेकिन उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब सेंसर बोर्ड ने ढेर सारे सीन उन्हें काटकर छोटे करने को कहा । सही मायने मे देखा जाय तो यह भी तो अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन ही तो है | लेकिन वहीं आईटी एक्ट की धारा 66-ए के अनुसार यदि कोई व्यक्ति कंप्यूटर या संचार उपकरण के जरिए ऐसी सूचना प्रेषित करता है जो अत्यधिक आपत्तिजनक या भयभीत करने वाली हो तो उसे तीन साल तक की कैद और जुर्माने की सजा हो सकती है। 

‘कमीने’, ‘इश्किया’, ‘ओमकारा’ और ‘गंगाजल’ जैसी फ़िल्में कथित अभद्र भाषा के इस्तेमाल की वजह से ख़ूब चर्चा में रहीं | वही फिल्म हम्टी शर्मा की दुल्हनिया फिल्म के ट्रेलर के आते ही सेंसर बोर्ड को आलिया भट्ट के इस किस सीन पर परेशानी हो गई। फिल्म से पूरा किस सीन तो नहीं हटा लेकिन उसकी लंबाई जरूर कम करनी पड़ी। एक विलेन फिल्म को सेंसर बोर्ड ने एक नहीं सात बार कट किया। यह दृश्य श्रद्घा कपूर और सिद्घार्थ मेल्होत्रा पर फिल्माए जाने थे।विद्या बालन की फिल्म डर्टी पिक्चर फिल्म रिलीज के पहले उसके कई दृश्यों को काटने पर अड़ गया। कुछ दृश्य तो तब भी कटे जब यह छोटे पर्दे पर रिलीज हुई।हिमेश रेशमिया की फिल्म द एक्सपोज में छिनी हुई साड़ी का दृश्य सेंसर को खटक गया। फिल्म में इस दृश्य का धुंधला करके दिखाया गया। चर्चित फिल्म मिल लवली में 175 कट सेंसर बोर्ड ने कट किए। आपने जो फिल्म देखी है वह इन 175 सीन के कट करने के बाद ही रिलीज हुई। संजय लीला भंसाली की फिल्म रामलीला 12 कट के बाद पास हुई। इसके बाद भी फिल्म के सीन चर्चाओं में रहे। सनी लियोनी की चर्चित फिल्म रागिनी एमएमएस 2 के एक सीन पर सेंसर को घोर दिक्कत थी। सेंसर को सनी के क्लीवेज दिखाने पर आपत्ति थी। बाद में फिल्म का एक दृश्य फिल्म से हटा भी दिया गया।

फिल्म की स्क्रिप्ट के आधार पर ही सीन लिए जाते है | कई फिल्मों मे प्रतिबंधित किए गए सीन जबरजस्ती  निर्देशक डाल देते है पर कई फिल्मों मे ये देखने को मिलता है की प्रतिबंधित सीन ही कहानी की मांग है | ऐसे मे सेंसरशिप अभिव्यक्ति का खून करता दिखता है | राजा रवि वर्मा पर आधारित फिल्म रंग रसिया को रिलीज होने मे कितना समय लगा यह निर्देशक से ज्यादा कौन जान सकता है,  पर फिल्म देखने के बाद एक दर्शक के तौर पर यह जरूर कह सकता हूँ फिल्म के किसी सीन को प्रतिबंधित किया जाना सरासर गलत था | अगर दूसरी फिल्मों मे तुलना करने पर इस फिल्म को देखे तो पाते है की कहीं ना कहीं फिल्म राजनीतिक दवाब के चलते पास और बैन की जाती है | मान लिया फिल्म किसी तरह रिलीज हो भी गयी तो राज्य सरकार अपना नियम कानून लगा कर उसे प्रदर्शित नहीं होने देती | ऐसी कई फिल्मों के उदाहरण आपको देखने को मिल जाएगे जिसमे एक राज्य  ने फिल्म को हाथो हाथ लिया वही दूसरा राज्य उसे प्रतिबंधित कर देता | फिल्म पीके इसका ताजा उदाहरण है |

सेंसरशिप द्वारा राज्य किसकी स्वतन्त्रता को प्रभावित करता है –प्रेषक अथवा प्राप्तकर्ता की | निस्संदेह फिल्म के आख्यान मे काँट-छांट के आदेश देकर राज्य प्राप्तकर्ता के उन मौलिक अधिकारों की अवहेलना करता है जो सम्प्रेषण तथा उसके आदान से संबन्धित है | यह अधिकार तभी सुरक्षित  रह सकते है जब सेंसर की कैंची को चलने से पूरी तरह रोक दिया जाय || 

अगर सेंसरबोर्ड और राज्य सरकार इसी तरह अपनी मनमानी करते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब कोई निर्माता निर्देशक फिल्म की कहानी सेंसरबोर्ड के नियमों के अनुरूप ही लिख कर फिल्म को पास कराएगा लेकिन इससे सबसे ज्यादा नुकसान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) को होगा | जिसके तहत भारत के नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अधिकार प्राप्त है | 

मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की मौजूदा सेंसर बोर्ड के लिए गए फैसले के बाद क्या वही होता है जो सेंसर बोर्ड ने पास किया है | फिल्म के व (वयस्क A ) सर्टिफिकेट या फिर एस (स्पेशल) सर्टिफिकेट दिये जाने के बाद गारंटी है की वह फिल्म सिर्फ वही लोग देखेंगे जिनके लिए पास की गयी है. भले ही संविधान ने हमे आईटी एक्ट 66 A के तहत दिशा निर्देश दिये हुए है की कोई भी अश्लील सामाग्री ऑनलाइन किए जाने पार दंड का प्रावधान है | पर वयस्क श्रेणी के लिए पास की गयी फिल्म कुछ दिनो के पास  इन्टरनेट पर आसानी से उपलब्ध हो जाती है | सेंसर बोर्ड अपने प्रमाण पत्र के आधार पर दर्शकों की अंतिम विभाजन रेखा तैयार नहीं की कर सकता जब तक उन सभी नियम कानूनों का पालन नहीं करता जो सेंसर बोर्ड और समाज के नैतिक मानदंडो के लिए बनाए गए है |

वर्तमान मे सेंसरशिप फिल्मों के प्रमोशनल टूल्स की जगह लेता हुआ दिखाई देने लगा है | 

मनीष कुमार जैसल 

पी-एच॰डी॰  शोधार्थी 

नाट्यकला एवं फिल्म अध्ययन विभाग 

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय 

वर्धा महाराष्ट्र 442001  

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