इस ‘संकट काल’ में एक बेहद जरुरी पत्रिका – ‘गाँव के लोग’ 

अब जब मुख्यधारा की मीडिया ने सत्ता की तरह गाँव को लुप्त कर दिया है और चापलूस बनकर सत्ता के जयगान में मस्त है ऐसे समय में ‘ गाँव के लोग’ पढ़कर आप समझ सकते हैं कि देश कहाँ है ! क्या हालात हैं देश के भीतर | लेखक, पत्रकार और कलाकारों को सत्ता के गोद में नहीं बैठना चाहिए किन्तु अब ऐसा नहीं है | बकौल रमाशंकर यादव विद्रोही – ‘ राजा किसी का नहीं होता, पर राजा के सब होते हैं ….गाय , गंगा लक्ष्मी ….’ आज यही मंजर है देश में | जनता के पक्ष में कोई नहीं है खड़ा , सब सत्ता के साथ है और सत्ता अहंकार से भर चुका है | ऐसे में जनसरोकारों के पक्ष में जब कोई खड़ा होता है तो उम्मीद की किरण दिखाई पड़ती है | 


‘गाँव के लोग’ मार्च -अप्रैल अंक को पढ़ते हुए आप ऐसा महसूस करेंगे | इस अंक में सभी सामग्री बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं | देश की नब्ज़ को छूती इस पत्रिका को पढ़िए | देश को जानिए , खुद को पहचानिए 

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