“आज हम जो कुछ भी हैं उन्हीं के बनाए हुए हैं । यदि पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिंदी कोसों पीछे होती, समुन्नति की इस सीमा तक आने का अवसर ही नहीं मिलता । उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ प्रदर्शक का भी काम किया । हमारे लिए उन्होने वह तपस्या की है, जों हिंदी-साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी । किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया जितना उन्होंने । वे हिंदी के सरल सुन्दर रूप के उन्नायक बने, हिन्दी-साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाए । जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सेवा कराई । हिंदी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया । हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है |”

– प्रेमचंद

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