20वीं शताब्दी के दूसरे दशक में प्रकाशित मर्यादा (मासिक) की गणना नवजागरण काल की विशिष्ट पत्रिकाओं में होती है क्योंकि इसका मुख्य स्वर राजनीतिक था और यह बहुत निर्भीक विचारों वाली पत्रिका थी । दरअसल यह हमारे गौरवपूर्ण इतिहास का ऐसा जीवन्त दस्तावेज है जिससे गुजरते हुए आज भी पाठक तत्कालीन हलचलों की ऊष्मा महसूस कर सकता है । हमारे पूर्वजों ने बेहद प्रतिकूल स्थितियों में इतिहास के इन अमर अ/यायों की रचना की है––– आप पाएंगे उनकी निगाह तत्कालीन भारत की अंदरूनी गह्वरों तक ही नहीं सुदूर तक गयी और अपनी चिंता में पूरी दुनिया की जनता के संघर्षों को शामिल किया । उनका नजरिया विश्वबोध वाला था । नवजागरण के अध्येता कर्मेन्दु शिशिर ने मर्यादा के लगभग तमाम उपलब्ध अंकों से महत्त्वपूर्ण सामग्री का संकलन, चयन और सम्पादन कर इस दुर्लभ विरासत को सुलभ कराया है । कहना न होगा कि पहली बार इस अप्राप्त सामग्री से परिचित होना जैसे उस युग के रोमांच को महसूस करना है ।


साभार: नयी किताब

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