गीतिका

गरीबी का सर्वनाम अपना आम आदमी,
बुजदिली का एक नाम  अपना आम आदमी।

भीड़ में खोया हुआ , न अपना कोई वजूद,
है खुद से भी अनजान अपना आम आदमी।

रोटी की तलाश में वह दर दर फिरे मारा,
बिक जाये बस  बेदाम अपना आम आदमी।

ये पैसे वाले लोग  बडे नाम वाले हैं,
है पर घूमता अनाम अपना आम आदमी।

जाये जहाँ भी उसको बस दुत्कार ही मिले,
निबल सा है ’हाय राम’  अपना आम आदमी।

काम की तलाश के ही काम में जुटा रहे,
है कहने को बेकाम  अपना आम आदमी ।

गालों पर उनके तो काले धन की चमक है,
पर है दुपहर में शाम अपना आम आदमी।

अखबार मे उसकी कभी चर्चा नहीं होती,
कार्टून को रहे याद  अपना आम आदमी।

’ओंम’ सभी कहते  उसे किसी  काम का नही,
पर चुनाव की है जान  अपना आम आदमी।
-ओंम प्रकाश नौटियाल
(पूर्व प्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित)

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