झीनी झीनी बिनी चदरियाअब्दुल विस्मिल्लाह का
महत्वपूर्ण उपन्यास है. इस उपन्यास पर अभिनव कदम – ३५ का यह अंक केंद्रित है. इस
उपन्यास के तीन दशक पूरे हुए हैं. एक उपन्यास पर अंक केंद्रित करना हमेशा जोखिम
भरा होता है. यह जोखिम अभिनव कदम ने उठाया है.

बुनकरों की जीवन-पद्धति और उसके संघर्ष, पेशे
की जटिलता
, पेशे को जिंदा रखने की जद्दोजहद, पर केंद्रित यह उपन्यास केवल गल्प नहीं है. गल्प की काया से बाहर यह एक
ठोस यथार्थ है. यह और इसी तरह के और भी यथार्थ जो गांवों
, कस्बों,
शहरों में बिखरे हुए हैं, वे सभी वर्तमान समय
में गहरे संकट में है.

झीनी-झीनी बिनी चदरियाउपन्यास पर केंद्रित अभिनव
कदम का यह अंक दरअसल
, यथार्थ के संकट में पड़ जाने को न केवल
पुनः रेखांकित करता है बल्कि हमें सचेत करता है. यह बहस पुरानी है कि भारत में
हजारों – हजार पेशे को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है. उसमें लगे लाखों -लाख हाथ
को बेकार किया जा रहा है. यह एक बड़ा सवाल है कि इक्कीसवीं सदी में हम इन हाथों को
बेकार होने से कैसे बचा सकते हैं
, यह अंक हमें एक बार फिर से
इस सवाल पर सोचने के लिए विवश करेगा.

अमरेंद्र कुमार शर्मा 

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