स्वाधीनता पूर्व किसान कविताओं में
जनचेतना                                               
                                                                                                 
  गिरहे
दिलीप लक्ष्म,
                                                                                      
                         पी-एच.डी. 
                                                                                           
  हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग,
                                                                     
महात्मा
गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र
                                                                                                 
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भारत में लगभग 19 वीं शतीं के
प्रारंभ से ही किसानों की समस्याओं को लेकर विविध भागों में आंदोलन चल रहे है। इस
आंदोलन को प्रभावित होकर कई कवियों ने हाथ में कलम उठाई और किसान आंदोलन को कागज
पर उतार दिया। आज किसान के सामने
मुक्ति के तीन ही
रास्ते दिखाई देते है उसमे 1) विस्थापन 2) आत्महत्या और 3) प्रतिरोध
, आज किसानों को शहरीकरण और व्यापार के कारण उनकी जमीने बड़े-बड़े व्यापारी
हस्तगत कर रहें है। इसी के कारण वह विस्थापन कर रहे है। लाखों किसानों ने खेती से
तंग आकार आत्महत्या कर ली है और सिलसिला आज भी जारी है। लूट एवं दमन से परेशान
होकर आदिवादी किसान और मुख्य समाज के किसान प्रतिरोध के रूप में आज जगह-जगह आंदोलन
कर रहें है।

          हिंदी में
किसान जीवन पर लिखित कविता बहुत ही पुरानी हैं । इन सभी कविताओं में किसान जीवन
,किसान शोषण और स्वरूप
पर बात की गयी है। क्या किसान जीवन और आंदोलन से जुड़ी हुई हर कविता
किसान कवितानहीं हो सकती? जब
की किसान का दु
;ख और दर्द को कविता में उतारा जा सकता है। लेकिन
उनके विविध प्रश्नों का हल क्यों नहीं हो सकता है। किसान कविता की अवधारणा को
समझना है
? तो सबसे पहले हमें किसान के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक प्रश्नों को समझना होगा। तभी हम
किसान कविता की अवधारणा समझ सकते हैं।

          भारत में
स्वाधीनता पूर्व की स्थिति के दौर में कई कवियों ने किसान जीवन पर कविताएँ लिखी। 1857
के विद्रोह पर किसान कविता का गहरा संबंध दिखाई देता है। रामविलास शर्मा इस कथन पर
कहते हैं कि-“धर्म और वर्ण की सीमाएं तोड़कर ये जो लाखों किसान एक ही लड़ाई में
शामिल हुये
, उसका बड़ा गहरा असर, उसकी संस्कृति पर पड़ा और यह असर
उनके लोकगीतों में दिखाई देता हैं।” उनका मानना हैं कि 1857 का नेतृत्व उन किसानों
ने किया जो फौज में सिपाहियों और सूबेदारों के रूप में काम कर रहें थे। इन्हीं
किसानों ने न धर्म का पालन न जात आखरी दम तक लड़ते ही रहे । इसी समय जिन कवियों ने
किसान जीवन पर कविता लिखि उनमे प्रमुख हैं-सनेही की कविता
सन
1857 की जनक्रांति
,प्रताप नारायण
मिश्र की
बेगारी विलाप’, बालमुकुंद
गुप्त की
वसंत बंधु, मेघ मनवाली सन 1909 में प्रेमघन की जीर्ण जनपद’, महावीर प्रसाद द्विवेदी की कविता वर्तमान दुर्भिक्ष’, आदि है। यह कविता मनमाने लगाम और जमींदारी अत्याचार का विरोध करती है।
1912 में मैथिलीशरण गुप्त का लोकप्रिय काव्य
भारत भारती छपा जिसमे भारत दुर्दशा के विभिन्न पहलुओं को लेकर किसान कि तबाही का
चिंतन किया हैं। उसके बाद गुप्त जी ने
किसान नामक खंडकाव्य लिखा जिसमें हिंदी प्रदेश के गिरमिटिया कृषक मजदूरों के
अप्रवाशी जीवन का लेखा-जोखा हाल है। गुप्त जी किसान नामक कविता में लिखते हैं कि-
होते हैं सैकड़ों
निछावर एक वोट पर जिसके
फहराते विश्वास-केतु हैं मान-कोट पर
जिसके
राजा और प्रजा दोनों का जिसका मुख
दर्पण है
उसी आनरेबुल पदवी को यह किसान अर्पण
है। “1
          इस खंडकाव्य
में गुप्त जी ने पहली बार हिंदी प्रदेश के गिरमिटिया कृषक मजदूरों के अप्रवासी
जीवन कि कहानी बताई है। 19 वीं सदीं से ही किसानों और मजदूरों का शोषण बड़ी मात्रा
में हो रहा था। फ़िजी
, मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनिनाद
एवं दक्षिण के इलाके में यह शोषण हो रहा था। किसान में गिरमिटिया मजदूर भी
आत्महत्या कर रहे थे। सितंबर  1914 की
सरस्वती में पटना से होरोडोम की कविता अछूत की शिकायत’ प्रकाशित हुई यह हिंदी की प्रथम दलित किसान कविता मानी
जाती है। इस कविता में प्रेमचंद के कथा साहित्य से लेकर पहले दलित कृषकों
, मजदूरों का शोषण जमीनदार एवं हाकिम किस पद्धति से करते है इसका चित्रण इस
कविता में किया है। भोजपुरी की यह कविता शारीरिक शोषण
, ठाकुर
के जुल्म का पर्दाफाश करती है।

          किसान की
प्रतिरोध चेतना को देखकर गणेश शंकर विद्यार्थी ने
प्रताप नाम की पत्रिका
का संपादन किया जिसमें भानु नामक व्यक्ति ने 7 जून 1915 में
भारतीय कृषक लेख छपा  इसमे लिखा था कि किसानों की दशा एवं दिशा को
बदलना होगा और सावकारों के अत्याचारों से किसानों को बचाना होगा । 10 जुलाई 1937
को सीताराम देव की
संतृप्त कृषक कविता
छपी जिसमे स्त्री शोषण का जिक्र किया गया था वह शोषण इस प्रकार हैं –
बोए बीज न हुए
अंकुरित
, चुकी न मालगुजारी
कर्जा ले पुत्री विवाह कर सिर से भीड़
उतारी
गहने बेच बेच वामा के, अब तक उदर चलाया
गिरवी रखकर खेत ,कर्ज भी शायद सभी
चुकाया।“ 2
          आज वर्तमान
स्थिति में किसानों की परिस्थिति को देखा जाए तो किसान दिन-रात मेहनत करता है वह
खेत में बीज बोयाता भी है वह कितने हिम्मत के साथ मिट्टी में बीज बोया करता हैं।
वह यह भी नहीं सोचता की इस पैसे से उसे कितना लाभ होगा। उसके परिवार के स्थिति
देखि जाए तो वह अपनी बेटी का विवाह सेठ सावकारों से कर्जा लेकर करता है और अपने
पत्नी के गहने बेचकर भी अपनी बेटी के विवाह के लिए लगाता है वह कितना मजबूर है
? इसी बात को लेकर
केदारनाथ अग्रवाल लिखते हैं कि –
“जमींदार यह अन्यायी है
कामकाज सब करवाता है
पर पैसे देता है छै ही
वह कहता है बस इतना लो
काम कारों या गाँव छोड़ दो
पंचो! यह बेहद बेजा है
हाथ उठाओं । “3
          प्राचीन काल
में जमीदारी प्रथा होने के कारण जमींदार किसानों पर अन्याय-अत्याचार कराते थे।
अपने घर का और खेती का सारा काम मजदूर किसानों से करवाते थे। जब किसान उन्हे पैसा
माँगता था। तब वह छै पैसे देते थे और कहते थे कि अगर काम करना है तो करलों नहीं तो
गाँव छोड़ दो। आज कि स्थिति में देखा जाए तो व्यापारी लोग किसानों का आर्थिक शोषण
करते हुए दिखाई दे रहे है। किसान साल भर मेहनत करता है और आखिर उनके माल का भाव
सेठ बनिया ही करते है।

          किसान कविता की भाषा के चार स्तर है। मौखिक भाषा
में जनपदीय बोलियों और उपभाषाओं की किसान गीत आते है। लिखित भाषा में प्रकाशित
कविताएं है जिनके कवि हिंदी की मुख्यधारा से बाहर के किसान
, किसान बुद्धिजीवी ,किसान नेता, किसान कार्यकर्ता और किसान कवि है। भाषा
का तीसरा स्तर वहाँ देखने को मिलता है जहाँ मुख्यधारा की किसान कविताएं है। भाषा
का चौथा स्तर जो राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में कविताओं के माध्यम से किसानों के
विविध प्रश्नों को लेकर सामने आ रहा हैं। मुख्यधारा की किसान कविता का उदाहरण इस
तरह बताया जा सकता हैं कि–
“खेत निरवों खेत निरवों खेत निरवों
खेत
घास बढ़्ति है घास बढ़्ति है घास बढ़्ति
घास
घास बढ़्ति है घास बढ़्ति है घास बढ़्ति
घास
खेतिहर भैया !खेतिहर भैया !खेतिहर
भैया चेत
मुंडी काटे देश मिलत है चारा काटे
खेत
खेत निरावौ खेत नीरावौ खेत नीरावौ
खेत “4

          आज उद्योग
और सरकारी दफ्तरों में निम्नतम मजदूरी वेतन
, महँगाई भत्ता आदि निचित है लेकिन किसानों को
इस प्रकार भत्ता या सुविधा नहीं मिलती है। यही सच हैं कि एक तबके के रूप में आज
किसान कि स्थिति हुई है। आज किसानों के पास खेती होकर भी वह एक मजदूर के रूप में
अपना जीवन बिता रहें हैं। राष्ट्रीय काव्यधारा में भी किसान आंदोलन को लेकर
कविताएं लिखि गई। अप्रैल 1917 में म. गांधी ने चंपारण्य किसान सत्याग्रह को
स्वतन्त्रता संग्राम कि व्यापक धारा से जोड़ दिया 1 फरवरी 1917 में श्यामलाल गुप्त
ने
प्रतिज्ञा कविता लिखि जिसमें
भारतमाता का पुत्र होने की एक शर्त यह भी रखी कि उसे किसानों की दशा एवं दिशा को
सुधारा जाना चाहिए । उसी कविता में श्यामलाल गुप्त जी लिखते हैं कि–
“तब में भारत पुत्र कहाऊ
दुखमय दशा सुधारि देश को ,उन्नति पथ पर लाऊँ
लखत विलखते कृषक बंधु को आँसू पोछ
हँसाऊँ ।“5

          गुप्त जी
भारत का पुत्र तभी कहेंगे जब तक किसानों के सुखमय दिन नहीं आयेंगे और जब तक
किसानों के सुखमय नहीं आते तब तक इस देश कि उन्नति नहीं हो सकती है। आज किसान के
परिवार खाने के लिए अनाज नहीं वह अपने ही खेत में अनाज उगाता है लेकिन आज उसी के
घर में अनाज नहीं है। भूमंडलीकरण ले दौर में किसान पिसता जा रहा हैं। बड़े-बड़े
किसान आंदोलन तो हो रहे है लेकिन उस आंदोलनों में जिन-जिन मुद्दो को लेकर बातें हो
रही है वह बातें कितनी सच के रूप में सामने आ रही है। आज किसान शोषण
, कृषि उत्पादनों को
उचित दाम न मिलना
, किसानो पर बड़ता कर्जा, बिजली के बढ़ते बिल आदि प्रश्नों से हतबल होकर किसान आज आत्महत्या कर रहा
है। इन सभी आंदोलनों के बावजूद भी भारत के किसान की क्या स्थिति हैं
? किसान आंदोलन की जो प्रमुख माँगे भी, वे पूरी होना
तो दूर की बात है
, लेकिन उनकी हालत उल्टी हो गई । किसान
कविता की रचना किसान जीवन के विविधतापूर्ण भावों और स्थितियों से हुई है। किसान
कविता का धरती
, फसल, मौसम और जीवन
संघर्ष से गहरा रिश्ता है। इसलिए किसान कविता में धरती और फसल से जुड़ी मांसल
संवेदना और अनुभव भरपूर मात्रा में मौजूद है। इतना ही नहीं किसान कविता के बिम्ब
खेत की छाती फाड़कर अंकुरित पौधों की तरह सघन
, ताजे, जीवंत और अग्रगामी होते है। मुक्तधर्मी किसान कविता में बिम्ब के कई रूप
एक साथ दिखाई देते है। जैसे –
“आये न बहुत दिन बादल
होता नित घाम भयंकर
हरियाली रही न निर्मल
,लगी फसल मुरझाने
आखिर अपने बल लेकर। “6
          भारतीय खेती
पर बढ़ते इस संकट ने पिछली 30-40 वर्षों में अनेक सशक्त किसान आंदोलनों को जन्म
दिया। तमिलनाडु
, कर्नाटक,  महाराष्ट्र , गुजरात, पंजाब, पश्चिम उत्तर प्रदेश,
हरियाणा आदि। राज्यों में लाखों की संख्या में किसान अपनी माँगों को लेकर सड़कों पर
निकले है। और उसके बाद में उड़ीसा
, राजस्थान, आदि राज्यों में भी किसानों के सशक्त आंदोलन उभरे है। ये आंदोलन स्वतंत्र
रहे। किसान आंदोलन ही नहीं इस क्षेत्र के सभी जन आंदोलन प्रमुख राजनितिक दलों के
दायरे से बाहर रहे है। जिसमें जाहिर होता है कि ये दल आम जनता से कहते गए अभिजन
राजनीति से जन राजनीति वाली किसान कविता कि लोकप्रियता का प्रमाण नेहरू नागर घटना
से दिया जा सकता है। किसान कवि
खेम सिंह नागर की  कविता सुनने के लिए 1936 में
किसानों ने जवाहरलाल नेहरू का बहिष्कार कर दिया । वह कविता थी-
“ओ मजदूर किसान
बदल दो दुनिया
जग के खेवनदार
बदल दो दुनिया।”7
          किसान कविता का कार्यक्षेत्र और उनकी संवेदना
ही किसान जीवन कहलाती है। इसलिए मध्यम वर्गीय बोध
, अनुभव और राजनीति की चेतना के भाषण का प्रभाव
किसानों पर किसान कविता से कम पड़ा है। नेहरू की लोकप्रियता ब्रज के किसानों में
लोक कवि
खेम सिंह नागर से कम होने के
कारण किसान की माँग पहले हुई । इसलिए कहा जाता है कि किसान की मानवीय संवेदना ही
किसान कविता है। आज किसान मुक्त हो गया तो समझो
किसान कविता भी मुक्त हो गयी । किसान कविता मुक्ति का मतलब है-“किसान वर्ग कि संवेदना, अनुभव, बोध और सौंदर्यबोध की मुक्ति पाना।”

          अत: यह कहा
जाता हैं कि किसान कविता पश्चिमी पूंजीवाद और आधुनिकता को प्रकृति
, संस्कृति और भाषा की
विविधता का नंबर एक शत्रु मानती है। वह लाखों साल में निर्मित प्रकृति और उसकी कोख
में मौजूद संसाधनों को नव साम्राज्य द्वारा कुछ सालों में उपभोग कर लेने की लालसा
और प्रकृति का तीखा विरोध करती है। वह संघर्ष के
अदृश्य देशज
नायक
की खोज करती है तथा स्वतन्त्रता संग्राम की वर्चस्वशील
संरचना को चुनौती देती है। यही आज की किसान कविता है।



संदर्भ ग्रंथ सूची
1)     
गुप्त, मैथिलीशरण .(1986). किसान. चिरगाँव. साकेत प्रकाशन. पृ
. 40
2)     
 शास्त्री, देववृत
(सं)  .(1936). नवशक्ति. पटना . पृ . 15
3)     
शर्मा, रामविलास .(1980). प्रगतिशील काव्याधारा और केदारनाथ
अग्रवाल. इलाहाबाद . परिमल प्रकाशन . पृ . 111
4)     
अग्रवाल, केदारनाथ .(1986). जो शिलाएँ तोड़ते है. इलाहाबाद .
परिमल प्रकाशन. पृ .110
5)     
विद्यार्धी, गणेश शंकर.(1917). प्रताप साप्ताहिक.प्रताप
कार्यालय कानपुर. पृ . 8
6)     
मिश्र, शोभाकांत (सं). (1985). नागार्जुन की चुनी हुई रचनाएँ (भाग
-2). दिल्ली. वाणी प्रकाशन. पृ
.
59

7)     
विद्यार्धी, गणेश शंकर.(1917). प्रताप साप्ताहिक.प्रताप
कार्यालय कानपुर. पृ. 6
           
         [साभार: जनकृति पत्रिका, अंक 30-32, 2017]



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