विभाजन का दर्द शायरों के
मार्फ़त
–डॉ. मनोज मोक्षेंद्र
    कहां
है अब वोह जो कह रहे थे कि “दौरे-आज़ाद में वतन को-
   नए
  नजूमो-क़मर   मिलेंगे,    नई-नई     ज़िंन्दगी    मिलेगी।।”
–आरिफ़ बांकोटी
बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों तक समस्त भारतवासी सभी सांप्रदायिक,
नस्लीय-जातीय तथा धार्मिक संकीर्णताओं को दरकिनार कर पूरी तन्मयता के साथ अंग्रेजी
शासन के ख़िलाफ़ संघर्षरत थे। किंतु, इस आज़ादी की लड़ाई में अचानक मंदी आ गई जिसकी
अनेक वज़हों में एक अहम वज़ह मुस्लिम लीग़ का वर्ष 1906 में गठन था। ऑल इंडिया
मुस्लिम लीग़ का अहम मंसूबा देश में मुस्लिम बहुमत जुटाने के लिए सिर्फ़ मुस्लिमों
के लिए राष्ट्रवादी नीतियों को हृष्टपुष्ट बनाना था और इस प्रयोजनार्थ एक इस्लामिक
राष्ट्र की स्थापना के लिए मार्ग प्रशस्त करना था। बेशक, ऐसे में अंग्रेजी हुक़ूमत
के ख़िलाफ़ क़ौमी एकता हासिल करने में भारी अड़चनें आने लगीं। तब अमन-चैन और स्वशासन
की चाह रखने वाले हिंदुस्तानी कलमकारों को आवाम को आज़ादी का सटीक सबक देने में भी
उलझनें पेश आने लगीं। इन सब बातों का आगामी वर्षों में इतना दूरगामी असर हुआ कि
देश में दो राष्ट्रों के निर्माण के सिद्धांत ने जोर पकड़ा जिसकी परिणति वर्ष 1947
में भारत के आज़ाद होने के साथ-साथ पाकिस्तान का एक अलग मुल्क़ के तौर पर आज़ाद होना था।
बेशुमार बलवा-फ़साद इसी बंटवारे का अंजाम था। उस घटना पर ‘सबा’ मथरावी के लफ़्ज
ग़ौर-तलब हैं
:
बट गया सहने गुलिस्तां, आशियाने बट गए
बागबां देखा किया, वे आशियानों का मआल
हर तरफ़ औरा के-गुलशन के फ़साने बट गए
रह गए बे-सख़्त टुकड़े बनकर इक लाहल सवाल
और इस बंटवारे का ख़ामियाजा कुछ इस तरह भुगतना पड़ा; साल 1947 में ‘सबा’
मथरावी द्वारा दिया गया ब्योरा
:
मंज़िलत पर कुछ लुटे, कुछ राह में मारे गए,
बारे गुलशन हो गए जो थे कभी जाने-चमन
दीद कलियों की गई, फूलों के नज्जारे गए
लुट गई शाखे-नशेमन मिट गई शाखे-चमन
खेद इस बात का है कि इस घटना से जहां हिंदुस्तान का
पुरातन काल से चला आ रहा भौगोलिक अस्तित्व छिन्न-भिन्न हुआ, वहीं भारतीय महाद्वीप
का समूचा इतिहास और भूतकालीन गौरव-गरिमा धूल-धूसरित हुई; टुकड़ों में विभाजित
भारतीय महाद्वीप का बौद्धिक हृदय आज भी लहू-लुहान है। विभाजन का दर्द उन सभी के
हृदय में स्थायी तौर पर घर कर चुका है जो इस मुल्क़ में धर्म-मजहब और वर्ग-संप्रदाय
को तौबा करते हुए सिर्फ़ इन्सानियत के फलने-फूलने की उत्कट इच्छा रखते थे और रखते हैं।
विभाजन के पश्चात भारत और पाकिस्तान की जनता, वह चाहे हिंदू हो या मुसलमान, आज भी
उस नासूर का जख़्म भर पाने में ख़ुद को असफल पा रही है। यह कहना अतिरंजित नहीं होगा
कि भविष्य में भी न तो इस जख़्म को कभी भरा जा सकेगा, न ही इस नासूर का टींसता दर्द
आइंदा कम होगा। यह दर्द ख़ासतौर से आज़ादी के बाद के क़लमकारों में इतना मुखर और
हृदय-द्रावक है कि देश का हर भारतवासी, चाहे वह किसी भी धर्म या संप्रदाय का हो,
उस काले दिवस को याद कर कराह उठता है। रमजी इटावी हिंदुस्तान के बंटवारे से पैदा
हुए सूरते-हाल का जायज़ा बखूबी लेते हैं। साल 1948 में वह मुसलमानों से सवाल करते
हैं
:
सच बताओ ऐ मुसलमानों! तुम्हें
हक़ की क़सम
क्या सिखाता है, तुम्हें क़ुरआन यह जोरो-सितम?
मज़हबे इसलाम रुसवा है, तुम्हारी जात से
दिन तुम्हारे ज़ुर्म क्या तारीक़तर हैं रात से
फ़िर, वह हिंदुओं से भी दरख्वास्त करते हैं:
सच बताओ हिंदुओं! तुमको अहिंसा की
क़सम
जज़्बए रहमोकरम और गायरक्षा की क़सम
क्या तुम्हारे वेद-गीता की यही तालीम है?
राम-लछमन और सीता की यही तालीम है
अपने रूठों को मनाओ, हमबग़ल हो एक हो
रस्मे-उल्फ़त देखकर दुनिया कहे, तुम नेक हो
वह दोनों को चुन-चुन कर गालियां देते हैं और जी-भर कर कोसते हैं:
नामुरादो, ज़ालिमो, बदबख़्त, मूजी, भेडियो!
ऐ दरिंदो, अहरमन के नायबो, ग़ारत ग़रो!
ऐ लुटेरो, वहशियो, जल्लाद, गुण्डो, मुफ़सदो!
दुश्मने इन्सानियत, रोना मुबारक हब्सियो!
रख दिया सारा वतन लाशों से तुमने पाटकर
पारा-पारा कर दिया इन्सान का तन काटकर
गरदनें तोड़ी हैं, लाखों गुल रुख़ाने-क़ौम की
इस्मतें छीनी हैं तुमने मादराने-क़ौम की
यहां यह विशेष रूप से उल्लेख्य है कि जिस कश्मीर में
आज भी विघटनकारी तत्व राष्ट्रीय अखंडता को छिन्न-भिन्न करने पर आमादा हैं, उसी
कश्मीर के एक प्रमुख शायर आनन्दनारायण ‘मुल्ला’ भारत-विभाजन से आहत होकर लिखते हैं
:
कैसा गुबार चश्मे-मुहब्बत में आ गया,
सारी बहार हुस्न की मिट्टी में मिल गई।
हालांकि भारत के आज़ाद होने की खुशी का इज़हार तो सभी ने दबे मन से की; लेकिन
यह कड़वा सच तत्कालीन क़लमकारों के जरिए उद्घाटित होता है कि विभाजन के बाद सारा
भारतीय समाज रोष और आक्रोश से पागल हो उठा था। उसे ऐसी आज़ादी कभी रास आने वाली
नहीं थी जिसके हासिल होते ही वहशियाने बलवा-फ़साद को अंज़ाम दिया गया और जिस
हत्याकांड का सिलसिला आरंभ हुआ, उसमें तमाम बच्चे यतीम हो गए, बेशुमार औरतें बेवा
हो गईं, बेग़ुनाह लड़कियों की इस्मतदारी हुई और अखंड रूप में स्वर्णिम भारत का सपना
देखने वालों की इच्छाएं मिट्टी में मिल गईं। इस तथ्य को बार-बार उजागर करना उचित
नहीं होगा कि ‘लीग’ दूषित मनोवृत्तियों से सराबोर थी। उसके नापाक इरादे से कुपित
होकर ‘मुल्ला’ की कलम गर्जना कर उठती है
:
जहां से अपनी हक़ीक़त छुपाए बैठे हैं
यह लीग का जो घरोन्दा बनाए बैठे हैं
भड़क रही है तआस्सुब की दिल में चिनगारी
चरागे-अम्लो-हक़ीक़त बुझाए बैठे हैं
…                     …                     …                     …
सजाए बैठे हैं दूकां वतन-फ़रोशी की
हरेक चीज की क़ीमत लगाए बैठे हैं
क़फ़स में उम्र कटे जी में है ग़ुलामों के
चमन की राह में कांटें बिछाए बैठे हैं
मुस्लिम लीग़ ने न केवल हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कभी न भरा जा सकने वाला
दरार पैदा किया अपितु उसने सांप्रदायिकता और मज़हबदारी के जरिए सिर्फ़ स्वार्थ की रोटियां
सेंकी और अस्मिता की ऐसी लड़ाई लड़ी जिसमें इंसानियत के असंख्य हिज्जे हुए। ‘मुल्ला’
साहब लीग़ पर निशाना साध कर उसके बुरे मंसूबे पर तीर फेंकते हैं
:
गिराई एक पसीने की बूंद भी न कभी
मता-ए-क़ौम में हिस्सा बटाए बैठे हैं।
जिस हिस्से की चर्चा ‘मुल्ला’ साहब करते हैं, उसका साकार रूप पाकिस्तान ही
है। बहरहाल, विभाजन का मातम मनाते हुए उसी दौर की जोहरा निग़ाह की कलम कुछ इस तरह
बिलखती है
:
तमाम अहले-चमन कर रहे हैं यह महसूस।
बहारे-नौका तबस्सुम तो सोगबार-सा है।।
उस दौर के सभी हिंदू और मुस्लिम शायर आज़ादी की क़ीमत पर देश को विभाजित करने
के सियासतदारों के शैतानी खेलों से बेहद ख़फ़ा थे क्योंकि उनकी वज़ह से स्वतंत्र भारत
में हिंदू और मुसलमान दोनों ही अपनी जमीन पर परदेसी हो गए। उसी काल के मशहूर शायर
अर्श मलसियानी भी लिखते हैं
:
जो धर्म पै बीती देख चुके, ईमां पै जो गुज़री देख चुके।
इस रामो-रहीम की दुनियां में इनसान का जीना मुश्किल है।।
क्योंकि इधर भारत आज़ाद हुआ, उधर पूरे मुल्क में ख़ून-ख़राबा का माहौल तारी हो
गया। यह ख़ून-ख़राबा भारत-विभाजन के लिए खेल खेलने वालों और भारत को अखंड रूप में
देखने वालों के बीच हुआ। तभी तो तत्कालीन शायर आदीब मालीगांवी का जज़्बाती होकर
आंसू बहाना दिल को चीर जाता है
:
तू अपने को ढूंढ रहा है दुनियां के मामूरे में।
यह बेग़ाना देस है ऐ दिल! इसमें
सब बेग़ाने हैं।।
हिंदुस्तान के बिखरने का दर्द हरेक ने महसूसा–वह चाहे हिंदू हो, मुसलमां
हो, सिख हो या कोई और धर्म-संप्रदाय का। टुकड़ों में बांटने वालों की संख्या नगण्य
थी जबकि विशाल भारत को स्वतंत्र रूप में देखने की इच्छा सभी की थी। अंग्रेज देश
में उफ़नती हुई सांप्रदायिक वैमनष्यता को देखकर बेहद खुश थे क्योंकि उनका मंसूबा भी
यही था और वे इस वैमनष्यता को एक अचूक विघटनकारी घटक बनाने पर आमादा थे जिसमें वे
बिलाशक सफल भी रहे। उस दौर के सरमायादारों को हिंदुस्तान या पाकिस्तान से कुछ भी
लेना-देना नहीं था; उन्हें तो बस
! हुक़ूमत में,
चाहे वह पाकिस्तानी हुक़ूमत हो या हिंदुस्तानी, शिरक़त करना था–जिसे उन्होंने भारत
माता को लहू-लुहान करके बखूबी किया और उनकी मानसिकता वाली संतानें आज भी वही कर
रही हैं। घिनौनी धार्मिक-सांप्रदायिक मनोवृत्तियां आज भी इनसानियत का सिर कलम करने
में जरा-सा भी हिचक नहीं कर रही हैं। उस दौर के शायर अदम साहब उनकी नंगाझोरी बेख़ौफ़
करते हैं
:
सुना कि कितनी सदाक़त से मस्जिदों के इमाम
फ़रोख़्त करते हैं बेख़ौफ़ फ़तवाहा-ए-हराम
जो बेदरेग़ ख़ुदा को भी बेच देते हैं
ख़ुदा भी क्या है हया को भी बेच देते हैं
नमाज़ जिनकी तिजारत का एक हीला है
ख़ुदा का नाम ख़राबात का वसीला है
उस दौर की घटनाओं का चश्मदीद ब्योरा क्या इतिहासकार दे पाएंगे? इतिहासकार
तो सिर्फ़ तारीक़ी वाक़यात बयां करते हैं; वे ऐसे ब्योरे देकर इनसानी जज़्बात कहां
पैदा कर सकते हैं? यह काम तो शफ़ीक़ ज्वालापुरी सरीखे शायर ही कर सकते हैं; साल 1951
में लिखी उनकी चंद लाइनें
:
उस हंसी ख़्वाब की उफ़ ऐसी भयानक ताबीर
जैसे भूचाल से गिर जाए कोई रंगमहल
डूब जाए कोई कश्ती लबे-साहिल आकर
जिस प्रकार के बलवा-फ़साद और ख़ून-ख़राबा को अंज़ाम दिया गया, वैसा तो जंगली
जानवरों में भी नजर नहीं आता। इल्म और तहज़ीब का सरताज़ कहा जाने वाला हरेक हिंदुस्तानी,
जानवरों से भी ज़्यादा वहशी और क्रूर हो गया। अदीबी मालीगांवी व्यंग्यात्मक लहजे
में इन्सानी हरक़तों का मख़ौल उड़ाते हुए कहते हैं
:
दरिन्दों में हुआ करती है सरगोशियां इस पर।
कि इन्सानों से बढ़कर कोई ख़ूं आशाम क्या होगा।।
बिलाशक, वह चाहे हिंदी का कोई कवि हो या उर्दू का कोई शायर, उसने इस सच्चाई
को तहे-दिल अहसासा कि जो कुछ भी हुआ, वह मज़हबी वहश और धार्मिक उन्माद के कारण हुआ।
बहरहाल, यहाँ जिस सच्चाई का अहसास अर्श मलसियानी को हुआ था, वह आज भी
भारतीय महाद्वीप का कोई शख़्स नहीं करता है; ऐसा आख़िर क्यों है? क्या ईश्वर और धर्म
मानवता से ऊपर है या ईश्वर भी तमाम मज़हबदारों का अलग-अलग होता है? अर्श साहब लिखते
हैं
:
डंक निहायत जहरीले हैं, मजहब और सियासत के।
नागों के नगरी के बासी! नागों
के फ़ुंकार तो देख।।
आज़ादी के ख़्वाबग़ाह में उगे वहशियाना आदम कैक्टसों ने किसे घायल नहीं किया?
उस दौर की रोंगटे खड़े करने वाली घटनाएं शायर जगन्नाथ आज़ाद को इन्सानी तहजीब पर
फ़िकरा कसने के लिए मजबूर कर देती है
:
इन्सानियत ख़ुद अपनी निग़ाहों में है जलील
इतनी बुलंदियों पै तो इन्सां न था कभी?
दरअसल, बर्तानी सियासतदारों की शह पर मुस्लिमों के लिए सियासी हक़ के लिए
बारंबार बग़ावत करने वाली मुस्लिम लीग़ को यह भय खाए जा रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि
हिंदुस्तान के आज़ाद होने के बाद यहां की राजनीति हिंदू-बहुल हो जाए और मुसलमान
अलग-थलग पड़ जाएं। पर यह लीग़ की बडी भूल थी–या यूं कहिए कि उसका सोचना था कि वह
पूरी इस्लामी अस्मिता की लड़ाई ख़ुद ही लड़ रही थी। जबकि उसकी लड़ाई अपने सीमित
स्वार्थों की पूर्ति के लिए थी। यही कारण है कि आज़ादी के बाद वह भारत की पार्टी न
होकर, पाकिस्तान की पार्टी बनी और अपनी संकीर्ण विचारधाराओं के कारण पाकिस्तानी
चुनावों में धीरे-धीरे अपना जनाधार खोती गई तथा वर्ष 1960 के आते-आते यह पूर्णतया
नेश्तनाबूद हो गई। मोहम्मद अली जिन्ना के पाकिस्तान चले जाने के बाद, मुस्लिम
लीगियों की हालत तबाहक़ुन हो गई। वे करते भी क्या? मुस्लिम लीग की साज़िशों के शिकार
बनने के सिवाय। वे तो अपनी ही सरजमीं पर ख़ुद को तन्हा पाते हैं। आज़ादी के ही साल
में ‘निसार’ इटावी मायूस होकर कहते हैं
:
राहे तलब में राहबर छोड़ गया कहां मुझे?
अब है न मौत की उम्मीद, न ज़िंदगी की आस है।
आख़िर, यह क्या हो गया? आज़ादी के इतने सालों बाद भी हम अमन-चैन के लिए क्यों
तरस रहे हैं? दहशत से सारा भारतीय महाद्वीप तबाही की आग में क्यों ख़ाक हो रहा है?
क्या अमन-चैन अब मयस्सर नहीं हो पाएगा? क्या हम बिस्मिल सईदी के साथ आज़ादी का ज़श्न
मनाते हुए कुछ इस तरह गुनगुनाने के लिए तरसते ही रहेंगे
:
ओजे आज़ादी पै है जमहूरियत का आफ़ताब
आज जो ज़र्रा जहां भी है वहां आज़ाद है
…                                 …                                 …
गुरदवारे पर, कलीसा पर, हरम पर, दैर पर
चाहे जिस मंज़िल पै ठहरे कारवां आज़ाद है
(समाप्त)
[साभार: जनकृति पत्रिका]

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