कविता में राजनीती: विचारधारा और वर्चस्व के
विरुद्ध आत्म-संघर्ष
अनूप कुमार बाली
पीएचडी साहित्यिक कला
स्कूल ऑफ़ कल्चर एंड
क्रिएटिव एक्सप्रेशन (SCCE)
अम्बेडकर
विश्वविद्यालय दिल्ली (AUD)
कीवर्ड: आत्मसंघर्ष;
सत्य-प्रक्रियात्मकता; एकात्मकता;
बाह्य का आभ्यंतीकरण; व्यक्तित्व के भीतर क्रांतियाँ
परिचय
किसी
भी घटना-परिघटना को मात्र अस्मितावादी स्वरूप में देखना निश्चित ही उस बुनियादी
समस्या की तरफ संकेत है जहाँ  हम किसी
घटना, परिघटना या प्रक्रिया को द्विभाजक विरोधी-युग्मों के रूप में देखतें
हैं.  कविता और राजनीती के सन्दर्भ में यह
तथ्य विशेषत: महत्वपूर्ण है. एक ओर जहाँ राजनितिक स्वार्थों के लिए कविता को मात्र
राजनितिक उपकरण में बदल देने के विघटनवादी वर्चस्व को हम देखते हैं तो वहीँ दूसरी
तरफ कला के लिए कला जैसी अभिजात्यवादी अवधारणा कविता और कलाओं को सौंदर्यवादी
किलेबंदी में जकड़ती  है. कला के दोनों ही
निरूपणों को अस्वीकृत करते हुए समकालीन मार्क्सवादी दार्शनिक ऐलन बाद्यु कला की स्वत:
सत्य-प्रक्रिया पर ज़ोर देते हैं तथा बताते हैं कि कला की इस सत्य-प्रक्रियात्मकता
को अन्य सत्यों में विघटित नहीं किया जा सकता.
“This
also means that art, as a singular regime of thought is irreducible to
philosophy” (2005
: 9). यहाँ
यह गौरतलब है कि बाद्यु के कला-चिंतन के अनुसार सत्य कला में एकात्मक रूप से
अंतर्निहित है. अत: क्रांतिकारी राजनीती की कर्मजन्यता घटनाओं-परिघटनाओं की
द्विभाजक पृथकताओं को प्रश्नांकित करते हुए उन कारणों का अनुसंधान करती है जोकि
घटनाओं-परिघटनाओं को विरोधी-युग्म के रूप में दिखाते हैं. इस तरह राजनीती कोई  एकांगी समरूप अवधारणा नहीं जिसे की जीवन और
विश्व पर थोपा जाए, बल्कि यह जीवन एवं विश्व के विविध क्षेत्र हैं जोकि राजनितिक
संघर्षों के विशिष्ट और नव स्वरूपों को सामने लाते हैं. इसीलिए राजनीती और साहित्य
के अंतर्संबंधों पर प्रस्तुत शोध-पत्र में 
मेरी समझ न तो राजनीती के लिए कविता की समझ से सहमति रखती है न ही कविता
की राजनीती
को मैं यहाँ प्रधानता दे रहा हूँ, बल्कि मेरा लक्ष्य कविता में
अंतर्निहित राजनीती
को आलोकित करना है जहाँ कविता अपनी राजनीती के रूप में स्वयं
प्रस्तुत होती है. (घोष, 2016)
इस
शोध-पत्र द्वारा मेरा लक्ष्य उस क्रांतिकारी राजनीती पर ज़ोर देना है जोकि
काव्यात्मक-कर्मजन्यता की रचना-प्रक्रिया के सन्दर्भ में संबंधपरकता की प्रक्रिया
के निरस्त की संभावना को सामने लाती है. संबंधपरकता का यह निरस्तीकरण (Nagation)
पूंजीवादी संरचना में अंतर्निहित विनिमय की सैद्धांतिकी के निरस्तीकरण द्वारा ही
संभव है जोकि सार्वभौमिक समतुल्यता के द्वारा अपना सामान्यीकरण करती है. कला में
अंतर्निहित एकात्मक सत्य विनिमय-प्रक्रिया को निरस्त करते हुए कविता को
सौंदर्यवादी किलेबंदी से मुक्त कराते हुए “सौन्दर्य प्रक्रिया की स्वायत्ता”
(बाद्यु, 2013) को स्थापित करता है.
कवि
के आत्म-सघर्ष को केंद्र में रखकर इस शोध-पत्र द्वारा मेरी कोशिश विचारधारा और
वर्चस्व की उस प्रक्रिया को आलोकित करना 
है जिसके द्वारा पूंजीवादी समाज में 
एक व्यक्ति पूंजी का विषय बनता है. कवि का आत्मसंघर्ष दरअसल इसी विचारधारा
और वर्चस्व के विरुद्ध राजनितिक संघर्ष है जिसकी राजनीती उसके रचनात्मक साहित्य और
समीक्षात्मक चिंतन में अवस्थित होती है. 
व्यक्तित्व
के सवाल: आभ्यन्तर और बाह्य की अंत:क्रियाओं के सन्दर्भ में
आत्मसंघर्ष
अपने आप में एक शब्द मात्र है. उसका अवधारणात्मक विश्लेषण उस व्यक्तित्व की
जीवन-दृष्टि और  कर्मजन्यता के इर्द-गिर्द
ही हो सकता है कि जिस व्यक्तित्व के सन्दर्भ में हम आत्मसंघर्ष को समझ रहें हैं.
मुक्तिबोध के आत्मसंघर्ष के बारे में विचार करते हुए इस बात का क्या अर्थ हो सकता
है? मुक्तिबोध की लम्बी कविताओं और उनमें अंतर्निहित आत्मसंघर्ष के सन्दर्भ में डॉ.
नामवर सिंह ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही है. उन्होंने दोहरे संघर्ष की महत्ता को
रेखांकित करते हुए लिखा है:
अंग्रेजी
कवि डब्ल्यू. बी. एट्स ने कहीं कहीं लिखा है कि जब हम अपने से बाहर संघर्ष करते
हैं, तो कथा साहित्य की सृष्टि होती है, और अपने आप से लड़ते हैं तो गीत-काव्य की.
अपने आप से लड़ने पर जो गीत-काव्य पैदा होता है, वह निस्संदेह छायावादी गीत नहीं
बल्कि आज की कविता का गीत है. लेकिन एक तीसरी भी स्थिति है, जब हम अपने आप से लड़ते
हुए बाहरी स्थिति से भी लड़ने की कोशिश करते हैं, और एक विशेष प्रकार की लम्बी
कविताएँ पैदा होती हैं,
………...
मुक्तिबोध की लम्बी कविता उसी परम्परा में आती हैं.  (1983:1)
मुक्तिबोध
अपने आत्म से लड़ते हुए सामाजिक-राजनीतिक वर्चस्व से भी संघर्षरत थे जिसका
साक्ष्य  न सिर्फ मुक्तिबोध की कविताएँ,
बल्कि उनका समग्र साहित्य और चिंतन है. इसीलिए यहाँ आत्मसंघर्ष को उसकी जटिलताओं
और व्यापक सन्दर्भों के साथ समझना अपेक्षित और आवश्यक हो जाता है.
व्यक्ति
अपने बाहर तथा अपने परिवेश से अपने संघर्ष में अपने जीवन-संघर्ष की रणनीति अपने
भीतर की शक्ति द्वारा बनाता है, उसकी यह भीतरी चेतना शक्ति उसके निजी जीवन के साथ
ही साथ उसके परिवेश से भी जुड़ी होती है. सामाजिक यथार्थ इच्छाओं-आकांक्षाओं के
आघात-प्रत्याघात द्वारा व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों को रचता है, और इन्ही आयामों
के विभिन्न पक्ष मिलकर, व्यक्ति की मनोदशा को निर्देशित करते हैं. इसी तरह दूसरी
प्रक्रिया में भी मनोवैज्ञानिकता शामिल होती है कि जब व्यक्ति किसी विशेष कारण
द्वारा किसी विशिष्ट इच्छा को ही प्रकट करता है. यह विशिष्ट इच्छा व्यक्ति के
मनोविज्ञान में उसके सामाजिक परिवेश, उसके वर्ग-चरित्र, उसके पारिवारिक और
सामुदायिक संबंधों का परिणाम होती है. इस तरह व्यक्ति का मनोविज्ञान कई स्तरों पर
समाज की संरचना के विभिन्न तत्त्वों से होकर बनता है. ज़रूरी सवाल यह है कि उपरोक्त
वर्णित दोनों प्रक्रियाएं क्या एक दूसरे से अलग-थलग होते हुए किसी  विरोधी-युग्म (Binary opposition) के रूप में
होती हैं या इनकी अंत:क्रियाओं को किसी और दृष्टिकोण से समझना हमारे लिए उपयोगी
होगा? यह सवाल इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इसी वैचारिक धरातल पर यह निर्भर है कि हम
आभ्यन्तर और बाह्य के पारस्परिक संबंधों को किस प्रकार विश्लेषित कर रहे हैं.
मनोचिकित्सिक डॉ. अनूप धर और अर्थशास्त्री डॉ. अंजन चक्रबर्ती  इसी सवाल का सामना करते हुए साइको-सोशल स्टडीज
की संभावना को सामने रखते हैं. इस संभावना के लिए उनके सामने मार्क्सवादी चिन्तक
और दार्शनिक लुइस अल्थुसर और मनोविश्लेषक जैक लकां के बीच 1963 से 1969 के बीच
पत्राचार के माध्यम से हुई बातचीत के साक्ष्य हैं. अपने एक शोध आलेख में इन्ही
साक्ष्यों के द्वारा वह आभ्यंतर और बाह्य के मिथ्या विभेदों पर हमला करते हुए कई
सवाल हमारे सामने रखते हैं:
If the condition of the psychic is
traceable to the “factory of [unconscious] thoughts” (Freud, 1965, p. 317), and
if unconscious thoughts are an inalienable thread of the
overdetermined social, affecting the social and, in turn,
being affected by it, how can this dialogue be avoided? How is the
“psychic”, which is usually understood as a kind of interiority, always already “social”? How is the social, which is usually understood as a
kind of exteriority, paradoxically “psychic”? What is the
connection then between the psychic and the social? How
are they interlinked? Where is the overdetermination and contradiction between interiority and exteriority? – and can the Althusser–Lacan
correspondence stand in as the ground for the
above-mentioned question?
(2014: 221)
अल्थुसर
की अवधारणा “interpelleting appratuses” राज्य के दमनकारी और विचारधारात्मक
उपकरणों द्वारा पूंजीवादी समाज में व्यक्तित्व (सब्जेक्ट) निर्माण की प्रकिया को
चिन्हित करती है. इस अवधारणा को डॉ. धर और डॉ. चक्रबर्ती ‘आभ्यन्तर के दर्शन’ के
रूप में प्रयुक्त करते हैं. इसी तरह  जैक
लकां की अवधारणा ‘Real’, जिसे की मनोविज्ञान के क्षेत्र में Lacanian ‘Real’ के
नाम से जाना जाता है, इसे वह ‘बाह्य के दर्शन’ के रूप में प्रयुक्त करते हैं. Real
के माध्यम से लकां यह बताते हैं कि प्रतीकात्मकता या सांकेतिकता की प्रक्रिया में
जो चीज़ भाषा की पकड़ में नहीं आती है या जो भाषा की प्रतीकात्मकता का अधिशेष है, वही
Real है. इस तरह Real भाषा और सांकेतिकता की सीमा से परे है, जिसे अभिव्यक्त करना
ही नहीं, बल्कि जिसके बारे में कल्पना करना भी असंभव है. इस तरह डॉ. धर और डॉ. चक्रबर्ती  पूंजीवादी विचारधारा एवं वर्चस्व द्वारा
व्यक्तित्व को परिसीमित करने की प्रक्रिया को; अल्थुसर के आभ्यन्तर के दर्शन
को,  लकां के बाह्य के दर्शन से जोड़ना
चाहते हैं, ताकि सामाजिक यथार्थ के भीतर वर्चस्व की उस गतिमयता को समझा जा सके
जिसके कारण व्यक्ति अपने अस्तित्व की वास्तविक परिस्थितियों को किसी कल्पनात्मक
आलोक में देखता है. इसे ही अल्थुसर विचारधारा कहते हैं जोकि व्यक्ति का अपने
अस्तित्व की वास्तविक परिस्थितियों के साथ कल्पनात्मक संबंध है.  (अल्थुसर, 2012: 32) आगे वह अंग्रेज़ी शब्द
“extimacy” के सन्दर्भ में मेक्सिकन मनोविश्लेषक Pavon-Cuellar को उद्धृत करते
हैं. यहाँ Pavon-Cuellar लकां के सन्दर्भ में इस शब्द के प्रयोग द्वारा अभ्यन्तर
और बाह्य के मिथ्या विभाजन को ध्वस्त करते हैं:
The term “extimacy”, an English translation of the
French neologism (extimité) coined by the psychoanalyst Jacques
Lacan (1959–1960), is deployed in this paper for the purpose of problematizing,
questioning, challenging, and even rejecting and going
beyond the traditional psychological distinction between exteriority
and psychic interiority or intimacy. Instead of this fundamental distinction
and the resultant fixed conceptual dualities that cross
and constitute psychology, extimacy indicates the non-distinction and essential identity between the dual terms of the outside and the deepest
inside, the exterior and the most interior of the psyche,
the outer world and the inner world of the subject, culture and the core of
personality, the social and the mental, surface and depth,
behaviour and thoughts or feelings (see Pavon-Cuellar, 2014; धर
एवं चक्रबर्ती द्वारा उद्धृत 2014: 224
).
इस
सब विमर्श के बाद यह देखना ज़रूरी लगता है कि क्या मुक्तिबोध अपने चिंतन में ऐसी
कोई रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं, जहाँ वह साहित्य के सन्दर्भ में मनुष्य के सूक्ष्म
और व्यापक, व्यवहारों तथा गतिविधियों को सामने रखते हैं. मुक्तिबोध के एक निबंध वस्तु
और रूप: दो
में इस विमर्श से संबंधित एक ज़रूरी विचार देखने को मिलता है, वह
लिखते हैं:
अतएव,
मनुष्य की समाजशास्त्रीय व्याख्या और मनोवैज्ञानिक व्याख्या को एक-दूसरे से अलग
करना सुविधाजनक भले ही हो, इन दोनों की सीमाएं जान लेना ज़रूरी है. इस सीमा-बोध के
अभाव ने ही कला की व्याख्या को यदि एक ओर यांत्रिक समाजशास्त्रीय बना दिया है, तो
दूसरी ओर उसे विशुद्ध मनोवैज्ञानिक का या अध्यात्मवाद का अंग मान लिया गया है.
(2011: 108)
मुक्तिबोध
के उपरोक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि मुक्तिबोध व्यक्ति के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक
आयामों  की अंत: क्रियाओं के सन्दर्भ में
साहित्य में मनुष्यता का दर्शन देखते थे. अब देखने का विषय यह है कि क्या आभ्यंतर
और बाह्य के विभाजन की मिथ्या को प्रश्नांकित करने का या इन दोनों के बीच सतत
अंत:क्रिया का कोई प्रयास हमें मुक्तिबोध के विचारों में दिखता है? इस बिंदु पर
पहुंचकर डॉ. अपूर्वाननंद का यह कथन एक प्रासंगिक जान पड़ता है कि मुक्तिबोध
मार्क्सवाद की तलाश कर रहे थे या अपना मार्क्सवाद तैयार कर रहे थे. दिलचस्प बात यह
है कि यह बात वह एक साहित्यिक की डायरी के सन्दर्भ में कहते  हैं. (आलोचना, सहस्राब्दी अंक 55: 11). हम इस
बात से परिचित हैं कि मनोविश्लेषण में रूचि के कारण हिंदी साहित्य में मुक्तिबोध
को अस्तित्वादी तक कहा गया है लेकिन जैसा कि आगे प्रकट होगा कि मनोविश्लेषण में
मुक्तिबोध की रूचि आत्म के सवाल के कारण ही थी. और इसीलिए मुक्तिबोध बाह्य और
आभ्यन्तर की मिथ्या विभाजनों से आगे जाते हुए 
उनकी अंत: क्रियाओं को बार-बार अपने लेखन में उजागर करते हैं. एक जगह इसी
ओर ध्यान दिलाते हुए मुक्तिबोध लिखते हैं:
हमारे
जन्म-काल से ही शुरू होने वाला हमारा जो जीवन है, वह बाह्य जीवन-जगत के
आभ्यंतरीकरण द्वारा ही सम्पन्न और विकसित होता है. यदि वह आभ्यंतरीकरण न हो, तो हम
अंध-कृमि, हाइड्रा-बन जाएँ. हमारी भाव सम्पदा, ज्ञान सम्पदा, अनुभव समृद्धि तो उस
अंतर्ततत्त्व-व्यवस्था ही का अभिन्न अंग है, कि जो अंतर्ततत्त्व-व्यवस्था हमने
बाह्य जीवन-जगत के आभ्यंतरीकरण से प्राप्त की है. हमें मरते दम तक बाह्य जीवन-जगत
का आभ्यंतरीकरण करते जाते हैं. किन्तु बातचीत, बहस, लेखन, भाषण, साहित्य और काव्य
द्वारा हम निरंतर स्वयं का बाह्यीकरण करते जाते हैं. बाह्य का आभ्यंतरीकरण और
आभ्यंतरीकृत का बाह्यीकरण एक निरंतर चक्र है. यह आभ्यंतरीकरण मात्र मनन-जन्य नहीं,
वरन् कर्म-जन्य भी है. जो हो, कला आभ्यंतर के बाह्यीकरण का एक रूप है. (2011: 105)
इस
तरह सामाजिक और मानसिक के विभाजनों से आगे बढ़ जाने की इस प्रक्रिया में एक बात
स्पष्ट रूप से समझ आती है कि हमारे सामाजिक यथार्थ में किसी भी तरह के परिवर्तन से
यह दोनों ही क्षेत्र (सामाजिक और मानसिक) प्रभावित होते हैं और इसी तरह वह
द्वन्द्वात्मक संबंध में  एक दूसरे से
प्रभावित भी होते हैं और एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं. इस बिंदु पर सामाजिक
यथार्थ पर ध्यान केंदित करना ज़रूरी हो जाता हैं, चूँकि यथार्थ का एक प्रारूप
सामाजिक-मानसिक के युग्म को अविभाजित करता है और ‘यथार्थ’ का दूसरा प्रारूप उन्हें
द्विभाजित भी दिखाता है. एक ओर सामाजिक-मानसिक का अविभाजित होना और दूसरी ओर उनका द्विभाजित
दिखना किस बात की ओर संकेत करता है? क्या यह नियंत्रण इन्ही के द्वन्द्वात्मक
गठजोड़ तक होता है? या नियन्त्रण को किसी और तरह का हस्तक्षेप भी नियंत्रित करता
है? सवाल यह भी है कि इस हस्तक्षेप का 
‘यथार्थ’ के उस दूसरे प्रारूप से क्या संबंध है जो सामाजिक-मानसिक के युग्म
को द्विभाजित दिखाता है? एक ओर सामाजिक-मानसिक का अविभाजित होना और दूसरी ओर उनका
द्विभाजित दिखना किस बात की ओर संकेत करता है?
आत्मसंघर्ष:
वर्चस्व और प्रभावशील विचारधारा से संघर्ष
सामाजिक-मानसिक
का द्विभाजित दिखना इस बात की ओर संकेत है कि व्यक्ति को अपने सामाजिक यथार्थ तक
पहुँच बनाने से कोई प्रक्रिया बाधित करती है. मनुष्य और उसके सामाजिक यथार्थ के
बीच कोई अलगाव है. पीछे हम मार्क्सवादी विचारक लुइस अल्थुसर की विचारधारा संबंधी
अवधारणा का ज़िक्र कर चुकें हैं जिसके अनुसार विचारधारा व्यक्ति की अपनी वास्तविक
स्थितियों के साथ कल्पनात्मक संबंध है. इस अर्थ में व्यक्ति, उसके सामाजिक यथार्थ
और उसके दृष्टिकोण में एक अलगाव और अन्तर्विरोध की स्थिति स्पष्ट होती है. मार्क्स
और एंगेल्स ने अपनी पुस्तक ‘जर्मन विचारधारा’ में मिथ्या चेतना के सिद्धांत
को प्रतिपादित किया है और इस मिथ्या चेतना से पोषित विचारधारा की विशेषता यह बताते
हैं कि “मनुष्य और उसकी परिस्थितियां सिर नीचे, पैर ऊपर किए, दिखाई देती हैं.

इस तरह वह किसी युग-विशेष में शासक वर्गों के विचारों को प्रभुत्वशाली विचारों के
रूप में प्रस्तुत करते हैं. शासक वर्ग वह वर्ग है जो समाज का प्रभुत्वशाली वर्ग
होने के साथ ही साथ प्रभुत्वशाली बौद्धिक वर्ग भी है. (1986)  इस तरह मार्क्स और एंगेल्स शासक विचारधारा को
उस हस्तक्षेप के रूप में देखते हैं जो सामाजिक यथार्थ को नियंत्रित करती है.
समकालीन मार्क्सवादी दार्शनिक स्लावोज ज़िज़ेक विचारधारा को यथार्थ से अलग करने की
जगह ‘यथार्थ’ को ही प्रश्नांकित करते हैं. वह लिखते हैं:
 ….ideology
is not simply a ‘false consciousness’, an illusory representation of reality,
it is rather this reality itself which is already to be conceived as
‘ideological’ – ‘ideological’ is a social reality whose very existence
implies the non-knowledge of its participants as to its essence
– that is,
the social effectivity, the very reproduction of which implies that the
individuals ‘do not know what they are doing’. ‘Ideological is not the
‘false consciousness’ of a (social) being but this being itself in so far as it
is supported by ‘false consciousness’.
(2013: 15-16)
ज़िज़ेक पूंजीवादी सामाजिक ढ़ांचे में विनिमय
प्रक्रिया के द्वारा किए जा रहे वास्तविक अमूर्तन की उस संरचनागत हिंसा को सामने
लाते हैं जो पण्य के उपयोग-मूल्य को दबाने और छिपाने में संलग्न है. विनिमय-मूल्य
का रूप उपयोग-मूल्य के वस्तु-तत्त्व को दबा कर अस्तित्व में आता है और पण्य की
रहस्यवादी अंधभक्ति में उपयोग-मूल्य को छिपाए रखता है. परिणामस्वरूप
, पण्य में विनिमय-मूल्य और उपयोग-मूल्य के बीच एक प्रतिरोध  हमेशा विद्यमान रहता है. इसी ओर संकेत करते हुए
मार्क्स पूंजी के प्रथम खंड में लिखते हैं
,  “As
use value, commodities are above all, of different qualities but as exchange
value they are merely different quantities, and consequently do not contain an
atom of use value

(1986: 45)
इस तरह उपयोग-मूल्य को दबाकर विनिमय-मूल्य के
अस्तित्व में आने और विनिमय की अनिवार्य ज़रूरत बनने से विनिमय-प्रक्रिया का
सामान्यीकरण हो जाता है. हम सामाजिक
, आर्थिक
तथा सांस्कृतिक हर क्षेत्र में इस विनिमय-प्रक्रिया को सार्वभौम मानने लगते हैं.
अत: पूंजीवादी समाज में व्यक्ति पूंजी का सब्जेक्ट होता है जो एक उपभोक्ता के रूप
में इसी वास्तविक अमूर्तन के तर्क को आत्मसात् कर चुका होता है. 
इस
तरह वास्तविक अमूर्तन का यह तर्क स्वयं में व्यक्ति के लिए ‘यथार्थ’ बन जाता  है, जिसकी आलोचना ज़िज़ेक ऊपर कर रहे हैं. ज़िज़ेक
बताते है कि इस वास्तविक अमूर्तन के यथार्थ का अज्ञान ही इसकी भौतिकता का बुनियादी
हिस्सा है और यह इसी शर्त पर टिका हुआ है कि विनिमय प्रक्रिया में भाग लेने वाले
व्यक्ति इस तर्क से अनभिज्ञ हों. और अगर हम ‘बहुत कुछ जान गए’ और सामाजिक यथार्थ
की सच्ची कार्य-पद्धति के भीतर प्रवेश कर गए, तो यह यथार्थ अपने आप ही विलीन हो
जाएगा. (2013:15, मेरा अनुवाद)
रचना-प्रक्रिया, आत्मसंघर्ष और वर्चस्व
मुक्तिबोध यथार्थ को उसके स्थानिक, विशिष्ट और सूक्ष्म
रूप में देखते हैं, जिसकी गतिमयता यथार्थ की सूक्ष्मता को यथार्थ की व्यापकता से
जोड़ती है. यथार्थ की यह सूक्ष्मता जहाँ एक ओर व्यक्ति के मनोविज्ञान से जुड़ती है,
तो वहीँ दूसरी ओर सामाजिक यथार्थ की गतिमयता से भी प्रभावित और नियंत्रित होती है.
इसीलिए मुक्तिबोध की यथार्थ-प्रक्रिया मात्र व्यक्ति के सामाजिक-राजनितिक जीवन के
सन्दर्भों को ही प्रस्तुत नहीं करती बल्कि 
सामाजिक-राजनीतिक की उथल-पुथल को भी व्यक्ति के अंतर्मन में चिन्हांकित
करती है. उसके अंतर्मन की क्रिया-प्रतिक्रियाओं की गतिविधि के यथार्थ को पकड़ती है.
इस क्रिया-प्रतिक्रिया और आघात-प्रत्याघात में यथार्थ के खिंचाव और उलझाव के
विभिन्न आयामों के जटिलतर स्वरूप को सामने रखती है. मुक्तिबोध के लिए यह
यथार्थ-प्रक्रिया जिसे वह बाह्य का आभ्यंतीकरण 
कहते है, इसीलिए बेहद ज़रूरी है, क्योंकि इसी प्रक्रिया पर कलाकार का कला-अभ्यास
और कला जीवन आधारित है:
बाह्य का आभ्यंतीकरण एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है. यदि
यह आभ्यंतीकरण, बचकाने ढंग से, दूषित दृष्टि से, अवैज्ञानिक रूप से और
मनो-विकृतियों से ग्रस्त होकर किया गया हो, तो तुरंत ही उसका साहित्य पर भी परिणाम
होता है. इसीलिए कवि के लिए सतत आत्म-संस्कार आवश्यक है, जिसके द्वारा बाह्य का
आभ्यंतीकरण सही-सही हो. (2011: 216)
इस तरह मुक्तिबोध के लिए बाह्य का आभ्यंतीकरण एक सचेतन
प्रक्रिया है, जहाँ सतत् आत्मालोचना यथार्थ-प्रक्रिया को उसकी एकात्मकता में
आलोकित करती है. इस एकात्मकता का कदापि यह अर्थ नहीं कि मुक्तिबोध के लिए यथार्थ
एकायामी या एकरंगी है, बल्कि मुक्तिबोध तो यथार्थ को उसकी विशिष्टता में संदर्भित
करते हैं. विशिष्ट यथार्थ की एकात्मकता का आशय यहाँ यथार्थ का केवल अपने लिए होने
से है. यह यथार्थ का अपना उपयोग-मूल्य या उसकी उपयोगिता है जो विनिमय की
सैद्धांतिकी को निरस्त करके मुक्तिबोध के यथार्थ को पूंजी का उपकरण बनने से रोकता
है. अत: यह देखना ज़रूरी है कि मुक्तिबोध वस्तु-तत्त्व और रूप को उनकी एकात्मकता और
उपयोगिता में किस तरह सामने रखते हैं. अपने निबंध वस्तु और रूप: तीन में
मुक्तिबोध इस सवाल का उत्तर देते हुए लिखते हैं:
निश्चय ही रूप के विकास का प्रश्न तत्त्व के विकास के
प्रश्न के साथ जुड़ा हुआ है. वह सारे जीवन से जुड़ा है. हम अपनी बौद्धिक सुविधा की
दृष्टि से भले ही रूप और तत्त्व के प्रश्नों को अलग-अलग करके देखें, वे एक दूसरे
से अविछिन्न हैं. इन संबंधों के सम्बन्ध-सूत्र, वृक्ष-मूलों की भांति सारे जीवन
में समाये हुए हैं. सच तो यह है कि रूप की समस्या ही तब उठती है जब तत्त्व की
समस्या उठती है. (2011: 118)
उपरोक्त उद्धरण स्पष्टटत: पूंजी की विनिमय सैद्धांतिकी
के विरुद्ध मुक्तिबोध को एक क्रांतिकारी कवि और चिन्तक के रूप में स्थापित करता
है. यथार्थ, वस्तु और रूप की समग्र एकात्मकता से बढ़कर यहाँ मुक्तिबोध सम्पूर्ण
जीवन को ही समग्र एकात्मकता में देखते हैं जो मार्क्सवादी दार्शनिक ऐलन बाद्यु के
“सार्वभौम एकात्मकता” (2003: 14-15) की ओर संकेत करता है, जो विशिष्ट एकात्मकताओं
की परस्पर सहभागिता का सामान्यीकरण है, जोकि पूंजीवादी संबंधपरकता के विरुद्ध
पूंजी की विनिमय प्रक्रिया को निरस्त करता है. इसे ही समकालीन मार्क्सवादी चिंतक
और कार्यकर्ता पोथिक घोष गैर-संबंधपरकता की संबंधपरकता  कहते हैं. (2016: 78).
इस तरह मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष बाह्य के आभ्यंतीकरण की
सचेतन प्रक्रिया से आगे बढ़ते हुए वस्तु-तत्त्व और रूप में विशिष्ट एकात्मकताओं की
पारस्परिक सहभागिताओं के लिए संघर्षरत है. यहाँ सवाल उठता है कि मुक्तिबोध की
रचना-प्रक्रिया अंतर्मन की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के सूक्ष्म यथार्थ और
सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल के व्यापक यथार्थ के द्वन्द्वात्मक संबंध को कैसे
संश्लेषित करती है? इस रचना-प्रक्रिया के संश्लेषण द्वारा अस्तित्व में आयी
कलाकृति अपनी उत्पादन-प्रक्रिया में यथार्थ की उस एकात्मकता को किस तरह बनाये रखती
है? क्या इस प्रक्रियात्मकता में यथार्थ के वस्तु-तत्त्व के साथ कलाकृति के रूप का
अस्तित्व में आना किसी द्विभाजन का अस्तित्व में आना है, जो द्विभाजन यथार्थ की
एकात्मकता और उसकी उपयोगिता को बाधित करके विनिमय संबंधों के संजालों को
अस्तित्वमान करता है?  दूसरे शब्दों में, क्या
कलाकृति के इस रूप की जड़े यथार्थ की विशिष्ट एकात्मकता में अवस्थित हैं या फिर
कलाकृति का रूप विचारधारात्मक यथार्थ के वर्चस्व में विचार के रूप द्वारा
नियंत्रित और वशीभूत है?
मुक्तिबोध जब अपने रचना-प्रक्रिया संबंधी लेख में यह
कहते हैं कि “बहुतेरे लोग जिनमे कवि भी शामिल हैं, इस तथ्य को भूल जाते हैं,
क्योंकि वे उस पर चलना नहीं चाहते, अथवा बीच में से ही भाग जाना चाहते हैं.”
(2011: 215)  तो इसका क्या अर्थ है? क्या
यह एकात्मक यथार्थ के वस्तु-तत्त्व से आविर्भूत रूप की एकात्मकता के आत्मसंघर्ष से
पलायन है जिस आत्मसंघर्ष का अर्थ अपने आप से एकात्मकता में संघर्षरत होते हुए
पूंजी के तर्क (विनिमय की सैद्धांतिकी) और पूंजीवादी वर्चस्व से संघर्षरत होना है?
मुक्तिबोध के लिए यह अत्यधिक ज़रूरी  है कि
कलाकृति के रूप का अन्वेषण किसी भी बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त हो. यह बाहरी
हस्तक्षेप स्वयं कलाकार की रचना-प्रक्रिया के किसी पुरानी कलाकृति के इतिहास से भी
अविरत रचना-प्रक्रिया में दाखिल हो सकता है. इस बाहरी हस्तक्षेप का रचना-प्रक्रिया
की एकात्मक प्रक्रियात्मकताओं और प्रक्रियात्मक एकात्मकताओं में दाखिल होना ही
दरअसल एकात्मकताओं का पतन और विनिमय की सैद्धांतिकी का स्थापित हो जाना है. यह इस
अर्थ में कि कलाकार की किसी स्थापित कलाकृति के रूप-तत्त्व यदि किसी अविरत
रचना-प्रक्रिया में हस्तक्षेप करें, तो स्थापित कलाकृति जोकि अब कलाकार से अलग
पूंजीवादी विनिमय संजालों में एक पण्य है, अपने हस्तक्षेप द्वारा विनिमय संजालो का
फैलाव अविरत रचना-प्रक्रिया में भी कर देती हैं. इसलिए मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष
यथार्थ की  एकात्मतकताओं की निरंतर खोज है;
चाहे बाह्य के आभ्यंतीकरण में या रूप में गतिमय यथार्थ की नयी खोज के लिए. इस
आत्मसंघर्ष से जूझना बहुत मुश्किल और पीड़ादायक है, निश्चित ही इसीलिए मुक्तिबोध
लिखते हैं:
किन्तु, बहुतेरे कवि इन कठिनाइयों के बोध तक, जीवन के उस
घुमाव तक, आ ही नहीं पाते. वे आगे के विकास के बजाय अपने ही आस-पास घूमते रहते
हैं. फलत: उनके पूर्व की स्थिति स्थापना, यांत्रिक रूप से, पुरानी गूंजे प्रकट
कराती रहती हैं. उनके खुद के तैयार किये गए पुराने शिकंजे- यानी पुराने भाव और
उनकी अभिव्यक्ति-उन्हें आगे नहीं बढ़ने देती. कण्डीशण्ड साहित्यिक रिफ्लेक्सेज़
यंत्रवत् कविताएँ तैयार करवाते हैं. मनोवेग यांत्रिक हो जाते हैं, अभिव्यंजक रूप
जड़ीभूत हो जाते हैं. कवि अपने बनाये कटघरे में फंस जाता है. और एक समय आता है जब
कवि कतई मर जाता है, किन्तु उसका शरीर शतायु रहता है. (2011: 214)
मुक्तिबोध यहाँ उस समस्या को ज़ाहिर कर रहे हैं जब कलाकार
यथार्थ की चुनौती के आत्मसंघर्ष से बचते हुए संबंधपरकता के संजालो में फंसता हुआ
विनिमय की सैद्धांतिकी का सब्जेक्ट बन जाता है. लेकिन मुक्तिबोध के लेखन में हम संबंधपरकता
और विनिमय के निरस्त को भी  देखते हैं, जब
मुक्तिबोध यथार्थवादी कवि के लिए सतत् आत्मनिरीक्षण की ज़रूरत को सामने रखते हुए
लिखते हैं:
कण्डीशण्ड साहित्यिक रिफ्लेक्सेज़ बनने का नियम प्राकृतिक
है. किन्तु इसके साथ यह भी स्वाभाविक है कि कवि मनुष्य के अंतर्व्यक्तित्व में
परिवर्तन होता जाए. इस परिवर्तन के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली नयी भाव-श्रेणियां,
पुराने रिफ्लेक्सों से टकराएंगी ही. यदि साहसपूर्वक कवि इस आत्मसंघर्ष को तीव्र
करता गया, और आत्म-निरीक्षण द्वारा उसे और 
सार्थक बनाता गया, तो यह आशा की जानी चाहिए कि वह नयी भूमि की खोज करके
रहेगा. (2011: 214)
कलाकार के लिए नयी भूमि की खोज इस तरह कलाकार द्वारा
यथार्थ को खोजने और बनाने के अर्थ को ध्वनित करती है. इस दिशा में मुक्तिबोध
पूंजीवाद वर्चस्व के हस्तक्षेप को नहीं मानते जो व्यक्ति और यथार्थ को अलग करता
है. मुक्तिबोध इस अलगाव को अपनी जीवन-प्रक्रिया, रचना-प्रक्रिया और
चिंतन-प्रक्रिया की विशिष्ट एकात्मकताओं और इनकी पारस्परिक सहभागिताओं द्वारा
लगातार अपने साहित्य और चिंतन तथा उनकी प्रक्रियात्मकता में निरस्त करते हैं.
किन्तु यह निरस्तीकरण आसान नहीं है.  इसके
लिए रचनाकार को बार-बार खुद से टकराना पड़ता है तथा बार-बार खुद को प्रश्नांकित
करना पड़ता है. इस प्रक्रिया में कवि ‘इनफीरियर’ भी महसूस करता है. लेकिन इस स्तर
से टकराए बगैर कवि यथार्थ को नहीं खोज सकता, यथार्थ को नहीं बना सकता. उसका यथार्थ
की प्रतीकात्मक व्यवस्था को वर्चस्व के आधिपत्य से आज़ाद करवाना ही, सामाजिक यथार्थ
के नए ‘सिंबॉलिक आर्डर’ को खोजना है. और उसकी यह खोज उसके आत्म के पर्यवेक्षण से
जुड़ी है. उसकी आत्म की खोज से जुड़ी है. अपने आत्म से बार-बार टकराना और अपने आत्म
को बार-बार प्रश्नांकित करना ही दरअसल आत्म की खोज की प्रक्रियात्मकता है. यह
प्रक्रियात्मकता अपनी गतिमयता में नयी खोजी गयी आत्म की परिघटना को पुन:
प्रश्नांकित करती है और इस तरह आत्म-खोज की निरंतरता को सुनिश्चित करती है.
आत्म-खोज की यह निरंतरता ही व्यक्ति में आत्म-रूपांतरण करती हैं. इसी अर्थ में
देखें तो मुक्तिबोध न केवल अपने आभ्यंतीकृत यथार्थ के मनस्तत्त्व (वस्तु-तत्त्व)
द्वारा अपनी कलाकृति के रूप की खोज और क्रमश: रूपांतरण करते हैं बल्कि इस जीवंत-यथार्थ
के रचनात्मक-यथार्थ में रूपांतरण की प्रक्रिया में मुक्तिबोध का भी आत्म-रूपांतरण
निरंतर चलता रहता है. मुक्तिबोध की डायरी और उनका समस्त आलोचनात्मक चिंतन जहाँ इसी
आत्म-रूपांतरण की निरंतरताओं का साक्ष्य है वहीँ उनका रचनात्मक साहित्य, कविताएँ
और कहानियाँ, इस आत्म-रूपांतरण द्वारा प्राप्त कलात्मक-सत्यों की अविरल श्रृंखलाएं
हैं. कला की सत्य-प्रक्रियात्मकता के सन्दर्भ में बाद्यु मानते हैं कि वारदात
(Event) के बिना सत्य की उत्पति नहीं होती तथा कला के सन्दर्भ में सत्य कलाकृति
नहीं बल्कि वह कलात्मक प्रक्रिया है जोकि वारदात द्वारा प्रारंभ होती है.
(2005: 11-12) फूको सत्य की
प्राप्ति के लिए किये जा रहे अथक परिश्रम को अस्केसिस से प्रयुक्त करते हैं, जहाँ
उनका मानना है कि बिना आत्म-रूपांतरण के व्यक्ति को सत्य की उपलब्धि नहीं हो सकती.
इस तरह फूको का यह विचार मुक्तिबोध के जीवन और कलात्मक संघर्ष को एक नया अर्थ देता
है. फूको लिखते हैं:
spirituality, as it appears in the West … postulates
that the truth is never given to the subject by right.
…truth is not given to the subject by the simple act of
knowledge (connaissance), … for the subject to have right
of access to the truth he [or she] must be changed, transformed, shifted, and
become, to some extent and up to a certain point other
than himself [or herself]. The truth is only given to the subject at a price that brings the subject’s being into play.…there can be no
truth without a conversion or a transformation of the
subject, without a long labor of ascesis (askesis).  (2005: 15–16)
मुक्तिबोध का सम्पूर्ण जीवन कलात्मक सत्यों को प्राप्त
करने के लिए किये जा रहे अथक परिश्रम का पर्यायवाची प्रतीत होता है. जहाँ वह
विचारधारात्मक यथार्थ से सुसज्जित पूंजीवादी वर्चस्व के विरुद्ध अपनी कला
लेबोरेट्री में अथक परिश्रम करते हुए संघर्षरत रहते हैं. मुक्तिबोध इस तरह अपने
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी कला, चिंतन और रचना-प्रक्रिया के लिए संघर्ष
करते दिखाई देते हैं. उनके लिए कला के रूप अथवा कलाकृति का अस्तित्व में आना दरअसल
प्रक्रियात्मक निरंतरता है. कहने की ज़रूरत नहीं कि इस प्रक्रियात्मक निरंतरता को
मुक्तिबोध विशिष्ट एकात्मकताओं की श्रृंखलाओं के रूप में प्रस्तुत करते हैं. इस
अर्थ में यथार्थ से प्राप्त मनस्तत्त्व (वस्तु-तत्त्व) और उससे आविर्भूत रूप
कलाकार के यथार्थ के मौलिक अनुभव से विकसित होते हुए रूप को अपनी स्वतंत्र दिशा
में प्रवाहित होने देते हैं. रूप का यह स्वतंत्र प्रवाह ही कला की अपनी
स्वतन्त्रता है, जिसे पूंजीवादी वर्चस्व नियंत्रित करते हुए अपने अधीनस्थ करना
चाहता है. मुक्तिबोध की कला इससे इंकार करते हुए अपनी प्रक्रियात्मकता में कलात्मक
सत्यों को प्राप्त करती है, जिसकी प्राप्ति के लिए मुक्तिबोध का कलात्मक संघर्ष और
आत्मसंघर्ष अथक परिश्रम में लगा रहता है. मुक्तिबोध के कला-उत्पादन की इस एकात्मक
प्रक्रियात्मकता का साक्ष्य मुक्तिबोध की अवधारणात्मक खोज कला के तीन क्षण हैं.
मुक्तिबोध की कला-उत्पादन की एकात्मकता की पहचान के लिए उनकी कला-प्रयोगशाला में प्रवेश
करना ज़रूरी लगता है. उनकी डायरी के एक लम्बे अप्रकाशित लेख, तीसरा क्षण,  में इस अवधारणा का विशद वर्णन है.
रचना-प्रक्रिया की अविछिन्न एकात्मताओं की प्रक्रियात्मकता को स्पष्ट करते हुए
मुक्तिबोध लिखते हैं
कला का पहला क्षण है जीवन का उत्कट तीव्र अनुभव क्षण.
दूसरा क्षण है इस अनुभव का अपने कसकते-दुखते हुए मूलों से पृथक् हो जाना, और एक
ऐसी फैंटेसी का रूप धारण कर लेना, मानों वह फैंटेसी अपनी आँखों के सामने ही खड़ी
हो. तीसरा और अंतिम क्षण है इस फैंटेसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया का आरम्भ और
उस प्रक्रिया की परिपूर्णावस्था तक की गतिमानता. 
(2011: 85) .
उपसंहार
मुक्तिबोध का अविछिन्न एकात्मकताओं की प्रक्रियात्मकता
को जारी रखने का आत्म-संघर्ष दरअसल आत्म को पूंजीवादी वर्चस्व के प्रभामंडल से
मुक्त रखने का संघर्ष है. इस तरह मुक्तिबोध पूंजीवादी वर्चस्व के बुनियादी तार्किक
आधार पर हमला करते हैं. इस हमले का संबंध मात्र राजनीतिक सक्रियता से ही नहीं,
बल्कि आत्म-सक्रियता के सवाल से भी जुड़ा है. मुक्तिबोध यहाँ आत्म-सक्रियता के सवाल
को राजनीतिक-सक्रियता के सवाल के लिए अनिवार्य बना देते है.  यह आत्म-सक्रियता, आत्म-खोज की उस निरंतर
प्रक्रियात्मकता को रेखांकित करती है जो परिघटनात्मक आत्म को बार-बार प्रश्नांकित
करते हुए आत्म-निरीक्षण को सम्भव बनाती है. इस तरह यह आत्म-सक्रियता आत्म-रूपांतरण
का ठोस आधार बनती है जोकि व्यक्ति की समर्पित राजनीतिक सक्रियता, जिसे वह सामाजिक-रूपांतरण
के संघर्ष के लिए धारण करता है, की अनिवार्य शर्त और प्रक्रियात्मक अर्थों में
द्वन्द्वात्मक ज़रूरत बनती है. इस तरह आत्म-रूपांतरण और सामाजिक रूपांतरण के
संबंधों की रूपरेखा मुक्तिबोध स्पष्ट करते हैं. 
परिघटनात्मक आत्म को प्रश्नांकित करते हुए आत्म-रूपांतरण की निरंतर
प्रक्रियात्मकता उसी ओर संकेत करती है जिसे लकांनियन मार्क्सवादी विचारक इयान पार्कर
व्यक्तित्व के भीतर क्रांतियाँ (
revolutions
in subjectivity)
(2011:
197) कहते हैं और इस आत्म-रूपांतरण को सामाजिक रूपांतरण की अनिवार्य और
द्वन्द्वात्मक ज़रूरत बनाने के लिए वह क्रांति में व्यक्तियों (
subjects
in revolutions)
के विचार को प्रयुक्त करते हैं. व्यक्तित्व
के भीतर क्रांतियाँ
तथा क्रांति में व्यक्तियों का विचार ही मुक्तिबोध
के
साहित्य और चिंतन को विलक्षणता प्रदान करता है. 
उनके साहित्य का यही वह गुण है जो उनको कभी पुराना नहीं पड़ने देता. इसीलिए
नया समय और नया युग अपनी नयी स्थितियों-परिस्थितियों में किसी नए मुक्तिबोध को
खोजता
, गढ़ता और प्रस्तुत
करता रहा है. मुक्तिबोध की एक साहित्यिक की डायरी भी इन्ही आत्मनिरीक्षणों (
व्यक्तित्व के भीतर क्रांतियाँ) और
आत्मसंघर्षों (
क्रांति
में व्यक्तियों)  
का
रचनात्मक दस्तावेज़ है.
सन्दर्भ-ग्रन्थ
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 [साभार: जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका, अंक 30-32, सयुंक्त अंक, 2017]

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