-ओंम प्रकाश नौटियाल

अंकित अक्षित संस्कार हो
मातॄ भू नमन जयकार हों
खुले ज्ञान के सब द्वार हों
निज भाषा से पर प्यार हो
अलंकृत करे हर अंजुमन
श्रद्धा से हिन्दी को नमन
-1-
अंतरस्थ भाव  करे प्रकट
अभिव्यक्ति अंतस के निकट
संभव उसी भाषा में बस
मिट्टी की जिसमें गंध रस
इसी सत्य का हो आचमन
हिन्दी को श्रद्धा से नमन
-2-
जिस भाषा में अंतरंग से
सुखदुख सदा छंटे बंटे
निरंतर जिसे भाषित किए
बालपन से बुढापा कटे
उस भाषा का ना हो दमन
हिन्दी को श्रद्धा से नमन
-3-
जो सशक्त करती देश को
और ध्वस्त करती द्वेष को
नष्टप्राय कर दे पीर को
अपनाए सबके क्लेश को
कष्टों को बाँट करे शमन
हिन्दी को श्रद्धा से नमन
-4-
भाषा विदेशी झेली है
यह विचित्र सी पहेली है
संस्कृत जनित सब भाषाएं
बहने हैं चिर सहेली हैं
पूरित हो निज भाषा वरण
हिन्दी को श्रद्धा से नमन

-ओंमप्रकाश नौटियाल
(पूर्व प्रकाशित-सर्वाधिकार सुरक्षित_
बडौदा, मो: 9427345810 

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