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यात्रा वृत्तान्त

यात्रा साहित्य : स्वरूप एवं तत्त्व yatra sahitya

यात्रा साहित्य मनुष्य के उड़न-छू मन द्वारा की गई सैर की निजगत अनुभूतियों से आप्लावित ऐसी अभिव्यक्ति है जो पाठक को उस परिवेश और समय के साथ यात्रा कराती है

मेवाड़ की धरती चितौड़गढ़  : यात्रा वृतांत- गुलाबचंद एन. पटेल,  

मेवाड़ की वीर भूमि पर ९ मई सन १५४० को  वीर शिरोमणि महाराजा प्रताप का जन्म हुआ था | महाराजा प्रताप सन १५७२ में मेवाड़ की गद्दी पर बैठे, उस समय चितौड़ सहित मेवाड़ के अधिकांश ठिकानों पर अकबर का अधिकार हो गया था |             अजमेर खंडवा जाने वाले रेल मार्ग पर चितौड़ जंक्शन आता है | चारों ओर मैदान से घिरी हुई पहाड़ी है | जिस पर प्रसिध्ध किला चित्रकूट  (चितौड़गढ़) बना हुआ है | ६३ एकड़ भूमि पर ये बसा है | चितौड़गढ़ के प्रथम द्वार को पाडन पोल कहते है | वहां एक चबूतरा है | वहां बांधसिंह का स्मारक है | धमासान युध्ध के दौरान लहू की नदी बहती थी | उसमें एक पाडा बहकर प्रवेश द्वार तक आ पहुंचा | इसी लिए उसे पाडन पोल द्वार कहेते है |

हरसिल गाँव और  महापंडित  राहुल सांस्कृत्यायन की कुटिया-संतोष बंसल

जो  व्यक्ति तिब्बत से खच्चरों की पीठ पर लाद कर बौद्ध धर्म की पाली में लिखित पुस्तके लाया था। वे न जाने कितनी अमूल्य धरोहर थी ,जिन के अध्ययन के  लिए उन्होंने पाली भाषा सीखी और भारत में पुनः बौद्ध धर्म की विस्तृत जानकारी उपलब्ध  करवाई। वास्तव में मध्यकाल में नालंदा के पुस्तकालय में लगाई आग से  यहाँ का ज्ञान कोष पूरा  विनष्ट हो चूका था और नालंदा के ही बहुत से भिक्षु अपने साथ पुस्तकों को लेकर एशिया के अन्य देशो में चले गए थे। इसी कारण घुमक्कड़ी प्रवृति के श्री राहुल सांस्कृत्यायन जी चार  बार तिब्बत गए और जो जानकारी भारतीय  पटल से लुप्त हो गयी थी ,उसे साहित्यिक जगत के सम्मुख पुनः प्रकशित किया।

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