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नाटक

अंधेर नगरी- भारतेंदु हरिश्चंद्र

1881 में भारतेंदु हरिश्चंद्र का ताजा नाटक 'अंधेर नगरी' काशी की जानी-मानी नाटक संस्था नेशनल थियेटर (जिसके संरक्षक खुद भारतेंदु थे) की रंगमंडली द्वारा काशी के दशाश्वमेध घाट पर खेला गया।

जनता कर्फ्यू

कोरोना महामारी से बचाव के लिए भारत में लगाए गए 'जनता कर्फ्यू' के दौरान एक बालक और उसकी माता के बीच वार्तालाप पर आधारित एकांकी .

नाट्यशास्त्रोक्त लक्षण एवं नाटक में उसकी उपादेयता: आशुतोष कुमार

नाट्य में वाचिक अभिनय का महत्त्वपूर्ण स्थान है इसे नाट्य का शरीर कहा गया है, क्योंकि नाटककार इसी के माध्यम से अपनी कथावस्तु को दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत करता है। नाट्यशास्त्र में  वाचिक अभिनय के अन्तर्गत ही षट्त्रिंशत् लक्षण वर्णित है। इनकी संयोजना से वाणी में वैचित्र्य की सृष्टि होती है, जिससे प्रेक्षागृह में बैठे दर्शक विस्मित तथा आनन्द विभोर हो जाते हैं। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र के 16 वें अध्याय में 36 लक्षण बताया है। इन्हीं लक्षणों से परवर्ती काल में अलंकारों का भी विकास हुआ। अलंकार काव्य के बाह्य सौन्दर्य को बढाता है तो लक्षण उसके आन्तरिक सौन्दर्य में वृद्धि करता है। प्रस्तुत शोध प्रपत्र के माध्यम से नाट्यशास्स्त्र में निरूपित लक्षण एवं इसके स्वरूप तथा नाट्य में इसकी उपयोगीता को बताया गया है।

महात्‍मा जोतीराव फुले द्वारा रचित मराठी रंगमंच का पहला नाटक – ‘तृतीय रत्‍न‘: डॉ. सतीश पावड़े

महात्‍मा जोतीराव फुले द्वारा रचितमराठी रंगमंच का पहला नाटक - ‘तृतीय रत्‍न‘ -- डॉ. सतीश पावड़े  महात्‍मा जो‍तीराव फुले की रचनाओं में ‘तृतीय रत्‍न’...

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