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ग़ज़ल

डी एम मिश्र की ग़ज़लें

बात भी आदमी की करता हूँ। बात भी आदमी से करता हूँ।

गजल

गजल - दीप नारायण क्या पता है कब तलक तुम्हारे पास मियाँ ये जो तिरा जिस्म है कागज का लिबास मियाँ ​सूरज को हथेली पे लिए फिरा करता है अजीब शख्स है रखता है अजीब प्यास मियाँ मेरा मकसद है के दुनियाँ बदले किसी सूरत में अब देखो मेरा ही गर्दन है सूली के पास मियाँ अभावों में रहा है वो आज कई दिन से भूखा एकादशी है मुस्करा के कहेगा उपवास मियाँ ​कोई नई साजिश नहीं, है रूप बस बदला हुआ सोंच की जो बात हुई है उसका पर्दाफाश मियाँ ​मत लूटो अब और मुझे शेष नहीं कुछ पास मेरे जो भी थोड़ा शेष है चंद कतरा विश्वास मियाँ ​हो कोई रहबर जो मिला दे मुझसे मुझे कब से नहीं है मुझको खुद का तलाश मियाँ ​

हिन्दी कविता की परम्परा में ग़ज़ल-डा. जियाउर रहमान जाफरी

गजल हिंदी की बेहद लोकप्रिय विधा है. यह जब उर्दू से हिंदी में आई तो इसने अपना अलग लहजा अख्तियार किया. उर्दू का यह प्रेम काव्य हिंदी में जन समस्याओं से जुड़ गया. ग़ज़ल की परंपरा भले खुसरो कबीर या भारतेंदु होते हुए आगे बढ़ी हो, लेकिन ग़ज़ल को एक विधा के तौर पर स्थापित करने का काम दुष्यंत ने किया. आलोचना के स्तर पर भी आज ग़ज़ल को स्वीकारा जा रहा है. हिंदी के कई गजलगो दुष्यंत के बाद की इस परंपरा को संभाले हुए हैं.

गजल

वर्षों बाद उसकी याद आई मेरी अधूरी इश्क मुझे किस मोड़ पर लाई जिसे दिल से भूला दिया था ना जाने क्यों लब पर उसका नाम आई जिससे...

आह निकली है तो दूर तक जाएगी …. (गजल)

आह निकली है तो दूर तलक जाएगी , आसमां को चीर कर ख़ुदा तक जाएगी । अरे इंसा ! कर ले जी भरकर मनमानी...

मेरे अल्फाज

वह लड़की है या नूर है लेकिन, खूबसूरत तो जरूर है मुझे देखकर उसका पलके झुकाना उसे भी इश्क जरूर है क्यों मेरा दिल उसे ही चाहे कोई...

जवानी दीवानी

जवानी दिवानी ये जवानी कोई दीवानी तो नहीं, और दुनिया भी सयानी तो नहीं. आप हम मिलकर सामना करे, आफते ये आसमानी तो नहीं. राह पर सब ही...

ज़रूरी है माँ को मुनव्वर राना की आखों से देखना: प्रकाश बादल

ज़रूरी है माँ को मुनव्वर राना की आखों से देखना  अक्सर हम यह दावा करते हैं कि हम अपनी मां को बहुत करीब से जानते...

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