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साहित्यिक विमर्श

सरगुन निर्गुण मन की छाया बड़े सयाने भटके

एक बूंद,एकै माल मूतर, एक कहां, एक गूदा। एक जोती से सब उतपना, को बामन को शूदा।|

रवीन्‍द्रनाथ और निराला : कितने दूर, कितने पास

‘रवीन्‍द्र कविता- कानन’ जैसी भावनापूर्ण और आधिकारिक समालोचना लिखकर निराला ने हिन्‍दी साहित्यिकों का ध्‍यान टैगोर की ओर आकर्षित किया।

नये काव्यशास्त्र/ सौंदर्यशास्त्र की आवश्यकता और नये कवि

नये काव्यशास्त्र की मांग के संदर्भ में हिंदी साहित्य में वस्तु और शिल्प दोनों ही स्तरों पर नवीनता का प्रवेश विशेष रूप से आधुनिक काल से उपलब्ध होता है

समकालीन युग बोध के कवि कुँवर बेचैन

कुंवर बेचैन ने समय को केवल परखा ही नहीं तराशा भी है | बेहतरीन गीतकार तो वह हैं ही बेहतरीन ग़ज़लकार के रूप में उन्होने पाठकों को हिन्दी ग़ज़ल के रूप में खूबसूरत सौगात भेंट की है |

गोविंद मिश्र के यात्रा साहित्य में अंतर्निहित लोक संस्कृति

हिंदी यात्रा-साहित्य के विकास में समकालीन गोविंद मिश्र का प्रदान अहमियत रखता है | वे बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न रचनाकार हैं |

गुमनामी के अंधेरों में खोया सितारा : इंद्र बहादुर खरे-डॉ.नूतन पाण्डेय

दी साहित्य का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि उनके जीवनकाल में उनकी रचनाएं लोगों तक नहीं पहुँच सकीं लेकिन उनकी लेखनी में एक ऐसा जादू था, शिल्प का एक ऐसा चमत्कार था, भावों का एक ऐसा अपूर्व संयोजन था, पाठक जिसके वशीभूत हुए बिना नहीं रह सकते।

प्रसाद का आरंभिक काव्य: विराट संभावना का उन्मेष-डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय

प्रसादजी के रचनात्मक जीवन का आरंभ काव्य-लेखन से ही हुआ । आपकी आरंभिक कविताएं ' चित्राधार' में संकलित हैं।आपने 'कलाधर 'उपनाम से ब्रजभाषा में काव्यारंभ किया।यद्यपि यहां रीतिकाल का पूर्ण रूप से अतिक्रमण नहीं हो सका है परन्तु नयी उद्भावनाओं का संकेत बड़े ही स्पष्ट तरीके से व्यक्त हुआ है।

प्रेमचंद के आलोचक और आलोचकों के प्रेमचंद-सुशील द्विवेदी

प्रेमचंद पर विचार करते हुए इस बात पर भी बहस जरुरी है कि आलोचकों ने प्रेमचंद को किस रूप में पढ़ा है | उनके प्रेमचंदीय –पाठ ने हिन्दी आलोचना के संवर्धन में कितनी श्रीवृद्धि की है | हमें उनके मूल्यों पर भी विचार करना होगा |

कविता

हिंदी साहित्यकार प्रेमचंदजी कर सुर है, कि साहित्य केवल मन (दिल) बह्लानेकी चीज नहीं है मनोरंजन के सिवा उसका और भी उदेश्य है | जो दलित है, पीड़ित है, वंचित है, चाहे वो व्यक्ति को या समूह उसकी वकालत करना ही साहित्य का कर्म है |

सत्ता के दाँव –पेंच से रूबरू कराती रघुवीर की कविताएँ

रघुवीर सहाय की कविताओं में लोकतंत्र के बचाव की गहरी चिंता है। उन्होंने लोकतंत्र को महज सत्ता से जुड़े संदर्भ में ही नहीं देखा बल्कि वे लगातार सामाजिक संरचना और आपसी संबंधों के विविध स्तरों के बीच भी इसकी स्थापना के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहे। अलोकतांत्रिक व्यवस्था और संबंधों को अपनी कविता का विषय बनाते रहे।

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