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मीडिया विमर्श

डिजिटल दुनिया और युवा पीढ़ी-दिव्या शर्मा

दुनिया में दो तरह की सिविलाइजेशन का दौर शुरू हो चुका है, वर्चुअल और फिजिकल सिविलाइजेशन । आने वाले समय में जल्द ही दुनिया की आबादी से दो तीन गुना अधिक आबादी अंतरजाल पर होगी।

दूसरे दौर की पत्रकारिता और समसामयिक समीकरण

मीडिया और समसामयिक समीकरण विषय पर बातचीत करें तो यह कथन पूर्णतः सत्य होगा कि वर्तमान युग मीडिया का युग है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मीडिया का दखल है ।लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया क्या अपनी निर्धारित भूमिका निभाने में सफल हो रहा है? यह एक विचारणीय प्रश्न है

नक्सलवादी आन्दोलन और हिंदी की प्रमुख लघु पत्रिकाएं (1950 से 1980 के विशेष संदर्भ में) – डॉ. निकिता जैन

प्रस्तुत शोधालेख ‘नक्सलवादी आन्दोलन और हिंदी की प्रमुख लघु पत्रिकाएं (1950 से 1980 के विशेष संदर्भ में)’ में मुख्य रूप से उन लघु पत्रिकाओं को शामिल किया गया है जिनको नक्सलवादी आन्दोलन को हिंदी जगत से रूबरू कराने का श्रेय जाता है। प्रस्तुत शोधालेख में ‘लघु पत्रिकाओं’ का ज़िक्र किया गया है अर्थात ऐसी पत्रिकाएं जो व्यक्तिगत साधनों के आधार पर निकाली जा रही थीं जो किसी सरकारी या गैर सरकारी संगठन से जुड़ी हुई नहीं थी और जिनका केवल एक ही उद्देश्य था समाज और सत्ता में व्याप्त अनीतियों के खिलाफ जमकर लिखना जो उस समय की बड़ी पत्रिकाएं (सरकारी या गैर सरकारी संगठन से जुड़ी पत्रिकाएं ) नहीं कर पा रहीं थीं। यह शोधालेख केवल लघु पत्रिका के आईने से ‘नक्सलवाद’ का छोटा सा चित्र प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। न तो इसमें तत्कालीन समय में निकलने वाली नक्सलवादी सम्बन्धी सभी पत्रिकाओं का ज़िक्र है न ही ये दावा पेश किया जा रहा है कि यह शोधालेख ‘नक्सलवाद’ की नयी व्याख्या प्रस्तुत कर रहा है अपितु इस शोधालेख द्वारा लघु पत्रिकाओं की महत्ता का आंकलन प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है कि कैसे वह सीमित संसाधनों के दायरों में रहते हुए भी अपनी सामाजिक एवं राजनीतिक भूमिका का निर्वाह भलीभांति कर रहीं थीं। प्रस्तुत शोधालेख में ‘फिलहाल’, ‘आमुख’ एवं अन्य पत्रिकाओं  का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि ‘नक्सलवाद’ को साहित्यिक आईने से किस तरह देखा जा रहा था और लघु पत्रिकाओं की उसमें क्या भूमिका थी।

मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता- देवराज

हिंदीतरभाषी क्षेत्रों में हिंदी पत्रकारिता --------------------------------------------------------------------------- मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता देवराज पृष्ठभूमि : मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता की पृष्ठभूमि का गहरा संबंध ‘आज़ाद हिंद फौज’ के विजय अभियान और...

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता-श्‍याम कश्‍यप

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता हिन्दी साहित्य के विकास का अभिन्न अंग है। दोनों परस्पर एक-दूसरे का दर्पण हैं। इस दृष्टि से दोनों में द्वन्द्वात्मक (डायलेक्टिकल) और आवयविक (ऑर्गेनिक) एकता सहज ही लक्षित की जा सकती है। वस्तुतः हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता हमारे आधुनिक साहित्यिक इतिहास का अत्यंत गौरवशाली स्वर्णिम पृष्‍ठ है। स्मरणीय है कि हिन्दी के गद्य साहित्य और नवीन एवं मीलिक गद्य-विधाओं का उदय ही हिन्दी पत्रकारिता की सर्जनात्मक कोख से हुआ था।

मीडिया में राष्ट्रवाद की बहस- राकेश कुमार

प्रस्तुत शोध आलेख मीडिया में मौजूदा राष्ट्रवाद, देशद्रोही, देशभक्त और हिंसा की बहस और उसके विभिन्न पहलुओं को मौजूदा समय से व्याख्यायित करने की पहल करता है। राष्ट्र और राष्ट्रवाद दो ऐसे विचार रहे है जिन पर कई सालों से हर अलग-अलग देश में विचार-विमर्श हुआ है। राष्ट्र और राष्ट्रवाद का उदय हर देश में एक समान नहीं रहा है और न ही राष्ट्रवाद के परिणाम। भारत में राष्ट्रवाद का उदय उपनिवेशी सत्ता के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के लिए हुआ था। राष्ट्रवाद ने भारत की स्वतंत्रता में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया था। स्वतंत्रता के इतने सालों बाद मीडिया में एक बार फिर राष्ट्रवाद और इसका विमर्श केंद्र में है। प्रस्तुत शोध आलेख इसी विमर्श और बहस का आलोचनात्मक परीक्षण करने का प्रयास करता है।

हिंदी की लघु पत्रिकाएं और बांग्ला साहित्य: एक नज़र-डॉ. निकिता जैन

प्रस्तुत शोधालेख में हिंदी की लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित बांग्ला भाषा के अनुवादित (हिंदी में) साहित्य का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इस विश्लेषण के ज़रिये न केवल ये पता लगाने की कोशिश की गयी है कि हिंदी की लघु पत्रिकाओं का अन्य क्षेत्रीय या प्रादेशिक भाषाओं का प्रति क्या दृष्टिकोण था बल्कि यह भी मूल्यांकित करने का प्रयास भी किया गया है कि किस तरह यह पत्रिकाएं हिंदी के पाठकों के समक्ष अन्य भाषाओं के अनुवादित साहित्य (हिंदी में) को प्रस्तुत कर रही थीं ताकि वह अन्य भाषाओं की साहित्यिक प्रवृत्तियों से न केवल परिचित हों बल्कि उन्हें आत्मसात करने के पथ पर भी अग्रसर हों। प्रस्तुत शोधालेख में बांग्ला साहित्य को तत्कालीन स्थितियों (1950 से लेकर 1980 तक के विशेष संदर्भ में ) के अनुसार अलग-अलग भागों और संदर्भों में विवेचित करने प्रयास किया गया है जैसे – बांग्लादेश मुक्ति आन्दोलन, हंगरीजेनरेशन मूवमेंट आदि का बांग्ला साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा और उसे किस प्रकार लेखकों ने अपनी रचनाओं के द्वारा प्रस्तुत किया -इन सभी पहलुओं को इस लेख में विवेचित किया गया है।

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