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अवधी

अवधी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति पर आधारित पुस्तकें

यहाँ आप अवधी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति पर आधारित पुस्तकें ऑनलाइन पढ़ सकते हैं

कवितई: बजरंग बिहारी ‘बजरू’

हेरित है इतिहास जौन दिन झूठ बदलि कै फुर होइगा झूर आँख अंसुवात जौन दिन झूठ बदलि कै फुर होइगा।

अवधी लोकगीतों में वर्णित स्त्री समस्या का अध्ययन-अंशु यादव

अवधी लोकगीतों में स्त्रियों की अनेक समस्याओं का वर्णन मिलता हैं। जैसे- बाल विवाह की समस्या, कन्या भ्रूण हत्या की समस्या, दहेज़ प्रथा की समस्या, बेमेल विवाह की समस्या, सती प्रथा की समस्या, परदा प्रथा की समस्या, सतीत्व परीक्षा, गोदना की प्रथा, बंध्या स्त्री की समस्या और विधवा स्त्री की समस्या इत्यादि ।

शिवमूर्ति की कहानियों की संरचना में अवध-लोक: प्रदीप त्रिपाठी

वमूर्ति लोक-जीवन के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनका सरोकार अवध क्षेत्र से है। उनकी रचनाओं में आंचलिकता की गहरी पैठ है। प्रेमचंद और रेणु की परंपरा के वे एक ऐसे कथाकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी में ही नहीं अपितु पूरे कथा-साहित्य में समाज के भूले-भटके और बेहद सामान्य चरित्रों को जिस तरह से क्लासिक बनाया, निस्संदेह महत्त्वपूर्ण है।

अवधी सम्राट पं. बंशीधर शुक्ल को याद करते हुए-राहुल देव

शुक्ल जी लोकचेतना से संपृक्त एक राष्ट्रवादी कवि हैं | उन्हें मालूम है कि लोक से विमुख रहकर साहत्य रचने का कोई मतलब नहीं | उनका सम्पूर्ण साहित्य समाज को नई राह दिखाने वाला साबित हुआ | ऐसे रचनाकारों को साहित्य में आज उनका उचित स्थान न दिया जाना हिंदी साहित्य की कृतघ्नता ही कही जाएगी |

आधुनिक अवधी काव्य में व्यंग्य – डॉ. अरविंद कुमार

आधुनिक अवधी कवियों में वंशीधर शुक्ल ‘रमई काका’ गुरु प्रसाद सिंह ‘मृगेश’ राजेश दयालु ‘राजेश’ बल भद्र दीक्षित ‘पढ़ीस’ आद्या प्रसाद मिश्र ‘उन्मत्त’ द्वारिका प्रसाद मिश्र’ त्रिलोचन शास्त्री’, जुमई खॉ आजाद’ आद्याप्रसाद पीयूष’ जगदीश पीयूष’ सुशील सिद्धार्थ भारतेंदु मिश्र’ विशाल मूर्ति मिश्र’ विशाल’ निर्झर प्रताप गढ़ी’ दयाशंकर दीक्षित देहाती’ काका बैसवारी’ विकल गोंडवी’ लवकुश दीक्षित’ केदारनाथ मिश्र’ ‘‘चंचल’ अजमल सुल्तानपुरी’ सतीश आर्य’ अदम गोंडवी’ इत्यादि की सर्जनात्मक प्रतिभा ने अवधी को अभिव्यक्ति का नया अंदाज दिया है।

जनता द्वारा मूल्यांकित कवि हैं रमई काका! : विश्वनाथ त्रिपाठी

मई काका के साथ एक कवि थे, ‘सरोज’ नाम में था उनके। नये कवि थे, मशहूर थे। लेकिन रमई काका ज्यादा मशहूर थे। तब रमई काका की उमर रही होगी ३५-४० के बीच में। अच्छे दिखते थे, पतले थे। काली शेरवानी पहने थे। पान खाए हुए थे। उन्होंने काव्य-पाठ किया। उन्होंने जो कविताएँ पढ़ीं, तो उसकी पंक्तियाँ सभी को याद हो गईं।

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